final ch-5 अध्याय 5 संस्थाओं का कामकाज परिचय लोकतंत्र का मतलब लोगों द्वारा अपने शासकों का चुनाव करना भर नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासकों को भी कुछ कायदे-कानूनों को मानना होता है। उन्हें भी संस्थाओं के साथ और संस्थाओं के भीतर ही रहकर काम करना होता है। यह अध्याय लोकतंत्र में संस्थाओं के कामकाज से संबंधित है। हम इसमें समझने का प्रयास करेंगे कि हमारे देश में किस तरह महत्त्वपूर्ण फैसले करके उन्हें लागू किया जाता है। हम यह भी देखेंगे कि इन फैसलों से संबंधित विवादों को किस तरह सुलझाया जाता है। इस अध्याय में हम इन फैसलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली तीन संस्थाओं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका-पर ध्यान केंद्रित करेंगे। | आप पहले की कक्षाओं में इन संस्थाओं के बारे में कुछ जानकारी हासिल कर चुके होंगे। हम यहाँ उनका संक्षेप में वर्णन करके कुछ और महत्त्वपूर्ण सवालों पर ध्यान देंगे। हर संस्था के संबंध में हम यह प्रश्न करेंगे कि वह किस तरह के काम करती है? एक संस्था दूसरी संस्था से कैसे जुड़ी है? इनके कामों को क्या चीज़ कम या ज्यादा लोकतांत्रिक बनाती है? इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि किस तरह ये संस्थाएँ मिलकर सरकार का काम करती हैं। कई बार हम इनकी तुलना दूसरी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की इसी तरह की संस्थाओं से करते हैं। इस अध्याय में हम राष्ट्रीय स्तर की सरकार के कामकाज से उदाहरण देंगे, राष्ट्रीय स्तर पर भारत की सरकार को केंद्र या संघ की सरकार भी कहा जाता है। इस अध्याय को पढ़ते हुए आप अपने प्रदेश की सरकार के कामकाज के उदाहरणों पर भी नज़र रख सकते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) 5.1 प्रमुख नीतिगत फैसले कैसे किए जाते हैं ? एक सरकारी आदेश मुश्किल से एक पन्ने का था। अगर आप इसे देखेंगे तो यह एक वैसा ही आम सर्कुलर या 13 अगस्त 199 के दिन भारत सरकार ने एक • नोटिस लगेगा जैसे आपने स्कूल में देखे होंगे। आदेश जारी किया। इसे कार्यालय ज्ञापन कहा सरकार हर रोज विभिन्न मसलों पर सैकड़ों आदेश गया। सभी सरकारी आदेशों की तरह, इस ज्ञापन जारी करती है। लेकिन यह आदेश बहुत महत्त्वपूर्ण पर भी एक संख्या थी। यह आदेश उसी संख्या से था और कई सालों तक विवाद का कारण बना जाना जाता है: ओ.एम.नं. 3612/31/9। कार्मिक, रहा। आइए देखें कि यह निर्णय किस तरह लिया जनशिकायत और पेंशन मंत्रालय के कार्मिक एवं गया और इसके बाद क्या हुआ। प्रशिक्षण विभाग के एक संयुक्त सचिव, ने इस इस सरकारी आदेश में एक प्रमुख नीतिगत आदेश पर दस्तखत किए थे। यह छोटा-सा आदेश, फैसले की घोषणा की गई थी। इसमें कहा गया संस्थाओं का कामकाज 85 2015-16(19/01/2015) था कि भारत सरकार के सरकारी पदों और । प्रधानमंत्री की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति मंत्रियों सेवाओं में 27 फीसदी रिक्तियाँ सामाजिक एवं को नियुक्त करता है। इनसे बनने वाले शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के व (प्रवाईतीखी) के मंत्रिमंडल की बैठकों में ही राजकाज से लिए आरक्षित होंगी। अब तक जिन जाति । जुड़े अधिकतर निर्णय लिए जाते हैं। समूहों को सरकार पिछडा मानती है उन्हीं का ॥ संसद में राष्ट्रपति और दो सदन होते हैं- एक और नाम एसईबीसी (सोशली एंड लोकसभा और राज्यसभा। प्रधानमंत्री को एजुकेशनली बैकवर्ड क्लासेज) हैं। अब तक लोकसभा के सदस्यों के बहुमत का समर्थन क्या हर सरकारी आदेश हासिल होना जरूरी है। नौकरी में आरक्षण का लाभ केवल अनुसूचित एक बड़ा राजनैतिक जाति और जनजातियों को ही मिल रहा था। अब तो, क्या कार्यालय ज्ञापन के फैसले के मामले फैसला होता है? इस एसईबीसी या 'सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से । । में ये सब शामिल थे? इसके बारे में पता । सरकारी आदेश में खास पिछड़े वर्गों के लिए, तीसरी श्रेणी तैयार की जा के करते हैं। बात है। रही थी और इनके लिए 27 फीसदी का अलग खुद करें, खुद सीखें कोटा तैयार किया जा रहा था। अन्य लोग इन 27 फीसदी नौकरियों के लिए प्रतियोगिता नहीं कर । ऊपर बतायी गयी बातों के अलावा इन संस्थाओं के बारे में पिछली कक्षाओं की और कौन-सी बातें आपको याद हैं? कक्षा में उस पर सकते थे। चर्चा करें। । क्या आप अपनी राज्य सरकार द्वारा लिए गए किसी बड़े फैसले को निर्णय करने वाले याद कर सकते हैं? राज्यपाल, मंत्रिमंडल, राज्य विधानसभा और न्यायालय किस तरह इस निर्णय में शामिल थे ? इस ज्ञापन को जारी करने का फैसला किसने किया? जाहिर है, अकेले उस व्यक्ति ने इतना यह सरकारी आदेश एक लंबे घटनाचक्र का बड़ा फैसला नहीं किया होगा जिसके हस्ताक्षर परिणाम था। भारत सरकार ने 1979 में दूसरा उस दस्तावेज पर थे। वह अपने मंत्री द्वारा दिए पिछड़ी जाति आयोग गठित किया था। इसकी गए निर्देशों को लाग करने वाला अधिकारी था। अध्यक्षता बी.पी. मंडल ने की थी और इसी के कामक और प्रशिक्षण विभाग के मंत्री ने भी कारण इसे आम तौर पर मंडल आयोग कहते खुद यह निर्णय नहीं किया होगा। आप अनुमान हैं। इसे भारत में सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से लगा सकते हैं कि इतने बड़े निर्णय में देश के पिछड़े वगों की पहचान के लिए मापदंड तय सभी प्रमख अधिकारी शामिल रहे होंगे। आपने करने और उनका पिछड़ापन दूर करने के उपाय पिछली कक्षा में इनमें से कछ के बारे में पहले बताने का जिम्मा सौंपा गया। इस आयोग ने पढ़ लिया होगा। अब एक बार फिर इन प्रमुख 198 में अपनी सिफ़ारिशें दी। आयोग द्वारा सुझाए बिंदुओं पर सरसरी नज़र डालते हैं। गए उपायों में एक सिफ़ारिश थी-सरकारी नौकरियों में सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से अब आई बात समझ में । राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष होता है और औपचारिक । पिछड़े वर्गों के लिए 27 फीसदी आरक्षण देना। इसीलिए वे राजनीति के रूप से देश का सबसे बड़ा अधिकारी होता है। इस रिपोर्ट और उसकी सिफारिशों पर संसद में मंडलीकरण की बात । प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख होता है और चर्चा हुई। करते हैं। ठीक कहा न मैंने? दरअसल सरकार की ओर से अधिकांश वर्षों तक कई पार्टियाँ और सांसद इसे लागू अधिकारों का इस्तेमाल वही करता है। करने की माँग करते रहे। फिर 1989 का 86 लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) लोकसभा चुनाव हुआ। जनता दल ने अपने में कैबिनेट के फैसले को कामक तथा प्रशिक्षण चुनाव घोषणापत्र में वादा किया कि सत्ता में विभाग को भेज दिया गया। विभाग के आने पर वह मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को वरिष्ठ अधिकारियों ने कैबिनेट के निर्णय लागू करेगा। चुनाव के बाद जनता दल की ही के मुताबिक एक आदेश तैयार किया और सरकार बनी और इसके नेता वी.पी. ङ्क्षसह मंत्री की स्वीकृति केंद्रीय सरकार की तरफ़ प्रधानमंत्री बने। इसके बाद कई घटनाएँ हुईं: से ली। एक अधिकारी ने उस आदेश पर सन् 1990-91 में आरक्षण पर। | नयी सरकार ने संसद में राष्ट्रपति के भाषण । हस्ताक्षर किए और इस तरह 13 अगस्त बहस का मुद्दा इतना महत्त्वपूर्ण था कि तिवापतक के जरिए मंडल रिपोर्ट लागू करने की अपनी 199 को ओ.एम. न. 3612/31/9 तैयार अपने उत्पाद को बेचने के लिए मंशा की घोषणा की। हो गया। इस विषय का उपयोग किया। अगले कुछ महीनों तक यह देश का सबसे क्या आप अमूल के इन ॥ 6 अगस्त 199 को केंद्रीय कैबिनेट की होर्डिंग में राजनैतिक बैठक में इसके बारे में एक औपचारिक ज्यादा चाचत मुद्दा बना रहा। सभा अखबार घटनाओं और बहसों की ओर निर्णय किया गया। और पत्रिकाओं में इस मुद्दे पर तरह-तरह के कोई इशारा ढूंढ सकते हैं? विचार आये, बहस चली। इसके चलते कई अगले दिन प्रधानमंत्री वी.पी. ङ्क्षसह ने एक । । प्रदर्शन और जवाबी प्रदर्शन हुए। इनमें से कुछ बयान के ज़रिए इस निर्णय के बारे में संसद हिंसक भी थे। इससे नौकरियों के हजारों अवसर के दोनों सदनों को सूचित किया। प्रभावित होने वाले थे इसलिए लोगों की प्रतिक्रिया बहुत तीखी थी। कुछ लोगों का मानना था कि भारत में विभिन्न जातियों के बीच असमानता के कारण ही नौकरियों में आरक्षण ज़रूरी है। उनका मानना था कि इससे उन लोगों को बराबरी पर आने का मौका मिलेगा जिनको सरकारी नौकरियों में अभी तक उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। दूसरे पक्ष के लोगों का मानना था कि इस निर्णय से जो पिछड़े वर्ग के नहीं हैं उनके अवसर छिनेंगे। अधिक योग्यता होने पर भी उनको नौकरियाँ नहीं मिलेंगी। कुछ लोगों का मानना था कि इससे जातिवाद बढेगा जिससे देश की प्रगति और एकता पर असर होगा। यह निर्णय अच्छा था या नहीं-इस अध्याय में हम इस बारे में बात नहीं करेंगे। हम इस उदाहरण को यहाँ सिर्फ यह समझाने के लिए बता रहे हैं कि देश में प्रमुख निर्णय कैसे लिए जाते हैं और उन्हें कैसे लागू किया जाता है। फिर इस विवाद का निपटारा किसने किया? आप जानते हैं कि सरकारी निर्णय से उठने वाले © गुजरात सहकारी दुग्ध संघ, भारत संस्थाओं का कामकाज . 2015-16(19/01/2015) विवादों का निपटारा सर्वोच्च न्यायालय और उन्होंने 1992 में बहुमत से फैसला किया कि उच्च न्यायालय करते हैं। इस आदेश के विरोधी भारत सरकार का यह आदेश अवैध नहीं है। कुछ लोगों और संस्थाओं ने अदालतों में कई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से उसके मुकदमे दायर कर दिए। उन्होंने अदालत से मूल आदेश में कुछ संशोधन करने को कहा। इस आदेश को अवैध घोषित करके लागू होने उसने कहा कि पिछड़े वर्ग के अच्छी स्थिति से रोकने की अपील की। भारत के सर्वोच्च वाले लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना न्यायालय ने इन सभी मुकदमों को एक साथ चाहिए। उसी के मुताबिक, 8 सितंबर 1993 जोड़ दिया। इस मुकदमे को 'इंदिरा साहनी को कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय ने एक और एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामला' कहा आदेश जारी किया। यह विवाद सुलझ गया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के 11 सबसे वरिष्ठ और तभी से इस नीति पर अमल किया जा न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। रहा है। कहाँ आरक्षण के मामले में किसने क्या किया? सर्वोच्च न्यायालय मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की औपचारिक घोषणा की। कैबिनेट आदेश जारी करके घोषणा को लागू किया। राष्ट्रपति 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया। सरकारी अधिकारी आरक्षण को वैध करार दिया। qul समझे? राजनैतिक संस्थाओं की। लोगों को इन्हें लागू कराना होता है। अगर इन आवश्यकता फैसलों या फिर लागू करने में कोई विवाद उठता हमने एक उदाहरण देखा कि सरकार कैसे काम है तो यह तय करने वाला भी कोई होना चाहिए करती है। किसी देश को चलाने में इस तरह की कि क्या सही है और क्या गलत है। सबके लिए कई गतिविधियाँ शामिल होती हैं। मिसाल के यह जानना भी ज़रूरी है कि कौन किस काम को तौर पर, सरकार पर नागरिकों की सुरक्षा करने के लिए जिम्मेदार है। यह भी ज़रूरी है कि सुनिश्चित करने और सबको शिक्षा एवं स्वास्थ्य भले ही प्रमुख पदों पर बैठे लोग बदल जाएँ सुविधाएँ मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी होती है। लेकिन ये गतिविधियाँ जारी रहें।। वह कर इकट्ठा करती है और इसे सेना, पुलिस लिहाजा, सभी आधुनिक लोकतांत्रिक देशों तथा विकास कार्यक्रमों पर खर्च करती है। वह में इन कामों को देखने के लिए विभिन्न व्यवस्थाएँ विभिन्न कल्याणकारी योजनाएँ बनाकर उन्हें लागू की गई हैं। इस तरह की व्यवस्थाओं को संस्थाएँ करती है। कुछ व्यक्तियों को इन गतिविधियों कहते हैं। कोई भी लोकतंत्र तभी ठीक से काम को चलाने के लिए फैसला करना होता है। कुछ करता है जब ये संस्थाएँ अपने काम को अच्छी 88 लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) तरह करती हैं। किसी भी देश के संविधान में के कामकाम में कुछ बैठकें, कुछ समितियाँ प्रत्येक संस्था के अधिकारों और कार्यों के बारे और कुछ रूटीन काम होता है। कुछ सामान्य में बुनियादी नियमों का वर्णन होता है। दिए गए रूटीन होता है। इनके कारण अक्सर काम में उदाहरण में हमने इस तरह की विभिन्न संस्थाओं देरी और परेशानियाँ होती हैं। इसलिए संस्थाओं आपके स्कूल को चलाने को काम करते देखा। के साथ कामकाज में परेशानी महसूस की जा के लिए कौन-सी सकती है। ऐसे में कोई सोच सकता है कि एक । प्रधानमंत्री और कैबिनेट ऐसी संस्थाएँ हैं जो संस्थाएँ काम करती हैं? । ही व्यक्ति सारे फैसले ले तो ज्यादा बेहतर होगा। | सभी महत्त्वपूर्ण नीतिगत फैसले करती हैं। क्या यह अच्छा होता कि कायदे-कानून और बैठकों की क्या ज़रूरत है? ज्यादा स्कूल के ॥ मंत्रियों द्वारा किए गए फैसले को लागू करने पर यह सोच लोकतंत्र की बनियादी भावना के कामकाज के बारे में के उपायों के लिए एक निकाय के रूप में अनकल नहीं है। संस्थाओं के कामकाज के सिर्फ एक व्यक्ति सभी नौकरशाह ज़िम्मेदार होते हैं। तरीकों से जो कुछ परेशानियाँ होती हैं या थोड़ा फ़ैसले लेता? ॥ सर्वोच्च न्यायालय वह संस्था है, जहाँ नागरिक वक्त लगता है, वह भी कई मायने में उपयोगी और सरकार के बीच विवाद अंतत: सुलझाए होता है। किसी भी फैसले के पहले अनेक जाते हैं। लोगों से राय-विचार करने का अवसर मिल क्या आप इस उदाहरण में दूसरी संस्थाओं के जाता है। संस्थाओं के कारण एक अच्छा फैसला बारे में सोच सकते हैं? उनकी भूमिका क्या है? झटपट करना आसान नहीं होता लेकिन संस्थाएँ । संस्थाओं के साथ काम करना आसान नहीं बुरा फैसला भी जल्दी ले पाना मुश्किल बना है। संस्थाओं के साथ कायदे-कानून जुड़े होते देती हैं। इसी कारण लोकतांत्रिक सरकारें संस्थाओं हैं। इनसे नेताओं के हाथ बंध सकते हैं। संस्थाओं पर जोर देती है। 5.2 संसद कार्यालय ज्ञापन के उदाहरण में क्या आपको संसद की भूमिका याद है? शायद नहीं। चूंकि यह फैसला संसद ने नहीं किया था, लिहाजा आपको लग सकता है कि इस फैसले में संसद की कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन पहले हम कुछ घटनाओं पर नजर डालकर देखते हैं कि क्या उनमें संसद का कहीं कोई जिक्र था। हम उन्हें निम्नलिखित वाक्यों को पूरा करके याद करने की कोशिश करते हैं: ॥ मंडल आयोग की रिपोर्ट पर ... चर्चा हुई थी। । भारत के राष्ट्रपति ने इसका ... जिक्र किया था। । प्रधानमंत्री ने ... इरफान खान इरफान खान संस्थाओं का कामकाज 89 2015-16(19/01/2015) यह फैसला सीधे संसद में नहीं किया गया 2. दुनिया भर में संसद सरकार चलाने वालों था। लेकिन इस रिपोर्ट पर संसद में हुई चर्चा से को नियंत्रित करने के लिए कुछ अधिकारों सरकार की राय प्रभावित हुई थी। इसकी वजह का प्रयोग करती हैं। भारत जैसे देश में उसे से सरकार पर मंडल आयोग की सिफ़ारिश पर सीधा और पूर्ण नियंत्रण हासिल है। संसद कार्रवाई करने के लिए दबाव पड़ा था। अगर के पूर्ण समर्थन की स्थिति में ही सरकार संसद इस फैसले के पक्ष में नहीं होती तो सरकार चलाने वाले फैसले कर सकते हैं। जब हमें मालूम है कि यह कदम नहीं उठा सकती थी। क्या आप 3. सरकार के हर पैसे पर संसद का नियंत्रण ) अंदाजा लगा सकते हैं कि क्यों सरकार यह होता है। अधिकांश देशों में संसद की मंजरी उसके विचार ही प्रभावी कदम नहीं उठा सकती थी? आपने पहले की के बाद ही सार्वजनिक पैसे को खर्च किया होंगे तो संसद में इतनी कक्षा में संसद के बारे में जो पढ़ा है उसे याद । जा सकता है। बहस और चर्चा करने करके यह कल्पना करने की कोशिश कीजिए। का क्या मतलब है? सार्वजनिक मसलों और किसी देश की कि अगर संसद ने कैबिनेट के फैसले को मंजूरी । राष्ट्रीय नीति पर चर्चा और बहस के लिए न दी होती तो क्या होता? संसद ही सर्वोच्च संघ है। संसद किसी भी मामले में सूचना माँग सकती है। हमें संसद की आवश्यकता क्यों है? संसद के दो सदन हर लोकतंत्र में निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की सभा, जनता की ओर से सर्वोच्च राजनैतिक चूंकि आधुनिक लोकतंत्रों में संसद बड़ी महत्त्वपूर्ण अधिकार का प्रयोग करती है। भारत में निर्वाचित भूमिका निभाता है, लिहाजा आधकाश बड़ दशा 9 भूमिका निभाती है, लिहाजा अधिकांश बड़े देशों प्रतिनिधियों की राष्ट्रीय सभा को संसद कहा ने संसद की भूमिका और अधिकारों को दो हिस्सों जाता है। राज्य स्तर पर इसे विधानसभा कहते में बाँट दिया है। इन्हें चेंबर या सदन कहते हैं। पहले सदन के सदस्य आम तौर से सीधे जनता हैं। अलग-अलग देशों में इनके नाम अलग- अलग हो सकते हैं पर हर लोकतंत्र में निर्वाचित हुआ। द्वारा चुने जाते हैं और जनता की ओर से असली प्रतिनिधियों की सभा होती है। यह जनता की अधिकारों का प्रयोग करते हैं। दूसरे सदन के ओर से कई तरह से राजनैतिक अधिकार का सदस्य अमूमन परोक्ष रूप से चुने जाते हैं और कुछ विशेष काम करते हैं। दूसरे सदन का सामान्य प्रयोग करती है। काम विभिन्न राज्य, क्षेत्र और संघीय इकाइयों के 1. किसी भी देश में कानून बनाने का सबसे हितों की निगरानी करना होता है। बड़ा अधिकार संसद को होता है। कानून हमारे देश में संसद के दो सदन हैं। दोनों बनाने या विधि निर्माण का यह काम इतना सदनों में एक को राज्यसभा (काउंसिल ऑफ महत्त्वपूर्ण होता है कि इन सभाओं को स्टेटस) और दसरे को लोकसभा (हाउस ऑफ विधायिका कहते हैं। दुनिया भर की संसदें पीपल) के नाम से जाना जाता है। भारत का नए कानून बना सकती हैं, मौजूदा कानूनों राष्ट्रपति संसद का हिस्सा होता है हालांकि वह में संशोधन कर सकती हैं या मौजूदा कानून दोनों में से किसी भी सदन का सदस्य नहीं को खत्म कर उसकी जगह नये कानून होता। इसीलिए संसद के फैसले राष्ट्रपति की बना सकती हैं। मंजूरी के बाद ही लागू होते हैं। 90 लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) आपने पिछली कक्षाओं में भारतीय संसद के बारे लोकसभा के विचार को प्राथमिकता में पढ़ा है। अध्याय 4 से आपको पता चल गया है मिलने की संभावना रहती है। कि लोकसभा का चुनाव कैसे होता है। अब संसद 2. लोकसभा पैसे के मामलों में अधिक के दोनों सदनों के गठन में प्रमुख अंतर को याद अधिकारों का प्रयोग करती है लोकसभा करते हैं। इन मामलों में लोकसभा और राज्यसभा । में सरकार का बजट या पैसे से संबंधित के बारे में अलग-अलग जवाब दीजिएः कोई कानून पारित हो जाए तो राज्यसभा । कुल सदस्यों की संख्या कितनी होती है?... उसे खारिज नहीं कर सकती। राज्यसभा ॥ सदस्यों को कौन चुनता है?... उसे पारित करने में केवल 14 दिनों की । उनका कार्यकाल कितना होता है?... देरी कर सकती है या उसमें संशोधन के ॥ क्या सदन को हमेशा के लिए भंग किया जा । सुझाव दे सकती है। यह लोकसभा का सकता है या वह स्थायी है?... अधिकार है कि वह उन सुझावों को माने या न माने। लोकसभा बनाम राज्य सभा 3. सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोकसभा | मंत्रिपरिषद् को नियंत्रित करती है। सिर्फ़ दोनों सदनों में से अधिक प्रभावशाली कौन है? । राज्यसभा को कभी-कभी 'अपर हाउस' और । वही व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है जिसे लोकसभा को 'लोअर हाउस' कहा जाता है। लोकसभा में बहुमत हासिल हो। अगर आधे इसका यह मतलब नहीं है कि राज्यसभा से अधिक लोकसभा सदस्य यह कह दें कि उन्हें मंत्रिपरिषद् पर विश्वास नहीं है। लोकसभा से ज्यादा प्रभावशाली होती है। यह तो प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्रियों को पद महज बोलचाल की पुरानी शैली है और हमारे छोड़ना होगा। राज्यसभा को यह अधिकार संविधान में यह भाषा इस्तेमाल नहीं की गई है। हासिल नहीं है। | हमारे संविधान में राज्यों के संबंध में राज्यसभा को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। लेकिन अधिकतर मसलों पर सर्वोच्च अधिकार लोकसभा के पास ही है। आइए देखें, कैसेः खुद करें, खुद सीखें 1. किसी भी सामान्य कानून को पारित करने के लिए दोनों सदनों की जरूरत होती । संसद सत्र के दौरान दूरदर्शन पर लोकसभा और राज्यसभा की है। लेकिन अगर दोनों सदनों के बीच कार्यवाहियों पर रोज़ाना एक विशेष कार्यक्रम आता है। कार्यवाहियों को देखकर या अखबारों में उसके बारे में पढ़कर निम्नलिखित कोई मतभेद हो तो अंतिम फैसला दोनों । चीज़ों की सूची बनाएँ। के संयुक्त अधिवेशन में किया जाता है। । संसद के दोनों सदनों के अधिकार इसमें दोनों सदनों के सदस्य एक साथ रात की भमिका बैठते हैं। सदस्यों की संख्या अधिक होने । विपक्ष की भूमिका के कारण इस तरह की बैठक में संस्थाओं का कामकाज 2015-16(19/01/2015) | लोकसभा में एक दिन ... चौदहवीं लोकसभा के कार्यकाल में 7 दिसंबर 2004 एक सामान्य दिन था। आइए इस बात पर गौर करें कि सदन में इस दिन क्या हुआ। इस दिन की कार्रवाई के आधार पर संसद की भूमिका और अधिकारों की पहचान करें। आप अपनी कक्षा में इस दिन की कार्रवाई का अभिनय कर सकते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री ने अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान विधेयक, 2004 के लिए राष्ट्रीय आयोग की घोषणा की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसके लिए सरकार को अध्यादेश क्यों लाना पड़ा। 11.00 विभिन्न मंत्रियों ने सदस्यों द्वारा पूछे गए करीब 250 प्रश्नों के लिखित जवाब दिए। इन प्रश्नों में शामिल थेः । कश्मीर के आतंकवादी समूहों से बातचीत के | बारे में सरकार की नीति क्या है? पुलिस और आम लोगों द्वारा अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ़ किए गए अत्याचारों का आँकड़ा बताएँ। बड़ी कंपनियों द्वारा दवाएँ अत्यधिक महँगी किए जाने के बारे में सरकार क्या कर रही है? 12.14 कई सदस्यों ने कुछ मुद्दों को उठाया, जिनमें शामिल थे। ॥ तहलका मामले में कुछ नेताओं के खिलाफ़ मामले दर्ज करने में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का प्रतिशोधात्मक रवैया।। संविधान में एक आधिकारिक भाषा के रूप में राजस्थानी को शामिल करने की ज़रूरत। आंध्र प्रदेश के किसानों और कृषि मजदूरों की बीमा नीतियों के नवीनीकरण की आवश्यकता। 2.26 सरकार द्वारा प्रस्तावित दो विधेयकों पर विचार करके उन्हें पारित किया गया। ये विधेयक थेः । प्रतिभूति कानून (संशोधन) विधेयक । प्रतिभूति ब्याज और ऋण वसूली कानून का प्रत्यावर्तन (संशोधन) विधेयक 1901 12.00 ढेर सारे सरकारी दस्तावेज़ चर्चा के लिए पेश किए गए।इन दस्तावेज़ों में शामिल थे। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल में नियुक्ति के नियम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, खड़गपुर की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड, विशाखापत्तनम की रिपोर्ट और लेखा-जोखा 4.00 आखिर में सरकार की विदेश नीति और इराक की स्थिति के संदर्भ में स्वतंत्र विदेश नीति जारी रखने की जरूरत पर लंबी चर्चा हुई। 12.02 पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास मंत्री ने पूर्वोत्तर परिषद् को पुनर्जीवित करने के बारे में बयान दिया। 7.17 चर्चा समाप्त हुई। सदन अगले दिन तक के लिए स्थगित हुआ। रेल राज्य मंत्री ने एक वक्तव्य देकर बताया कि स्वीकृत रेल बजट के अतिरिक्त रेलवे को और अनुदान की ज़रूरत है। लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) 5.3 राजनैतिक कार्यपालिका क्या आपको उस सरकारी आदेश की कहानी रहते हैं। ये अधिकारी राजनैतिक कार्यपालिका याद है जिससे हमने इस अध्याय की शुरुआत के तहत काम करते हैं और रोजमर्रा के प्रशासन की थी? हमने पाया कि जिस व्यक्ति ने इस में उनकी सहायता करते हैं। क्या आप कार्यालय दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे उसने यह फैसला ज्ञापन के मामले में राजनैतिक और गैर-राजनैतिक नहीं किया था। वह केवल एक नीतिगत फैसले कार्यपालिका की भूमिका बता सकते हैं? को लागू कर रहा था जिसे किसी और ने किया आप पूछ सकते हैं कि राजनैतिक कार्यपालक था। हमने यह फैसला करने में प्रधानमंत्री की को गैर-राजनैतिक कार्यपालक से ज्यादा अधिकार भूमिका देखी थी। लेकिन, हम यह भी जानते हैं क्यों होते हैं? मंत्री किसी नौकरशाह से ज्यादा कि अगर उन्हें लोकसभा का समर्थन नहीं होता प्रभावशाली क्यों होता है? नौकरशाह अमूमन तो वे यह फैसला नहीं कर सकते थे। इस अर्थ अधिक शिक्षित होता है और उसे विषय की में वे सिर्फ़ संसद की मर्जी को लागू कर रहे थे। अधिक महारथ और जानकारी होती है। वित्त | इसी तरह किसी भी सरकार के विभिन्न स्तरों मंत्रालय में काम करने वाले सलाहकारों को पर हमें ऐसे अधिकारी मिलते हैं जो रोज़मर्रा के अर्थशास्त्र की जानकारी वित्त मंत्री से ज्यादा हो फैसले करते हैं लेकिन यह नहीं कहा जा सकता सकती है। कभी-कभी मंत्रियों को अपने मंत्रालय कि वे जनता के द्वारा दिए गए सबसे बड़े के अधीनस्थ मामलों की तकनीकी जानकारी बहुत अधिकारों का इस रूप में इस्तेमाल कर रहे कम हो सकती है। रक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य, विज्ञान हैं। इन सभी अधिकारियों को सामूहिक रूप से और प्रौद्योगिकी, खान आदि मंत्रालयों में ऐसा कार्यपालिका के रूप में जाना जाता है। सरकार होना आम बात है। फिर इन मामलों में अंतिम की नीतियों को ‘कार्यरूप देने के कारण इन्हें निर्णय करने का अधिकार मंत्रियों को क्यों हो? कार्यपालिका कहा जाता है। इस तरह जब हम इसकी वजह बहत सीधी है। किसी भी ‘सरकार' के बारे में बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य लोकतंत्र में लोगों की इच्छा सर्वोपरि होती है। आम तौर पर कार्यपालिका से ही होता है। मंत्री लोगों द्वारा चुना गया होता है और इस तरह उसे जनता की ओर से उनकी इच्छाओं को लागू राजनैतिक और स्थायी करने का अधिकार होता है। वह अपने फैसले कार्यपालिका के नतीजे के लिए लोगों के प्रति जिम्मेदार होता किसी लोकतांत्रिक देश में कार्यपालिका के दो है। इसी वजह से मंत्री ही सारे फैसले करता है। हिस्से होते हैं। जनता द्वारा खास अवधि तक के मंत्री ही उस ढाँचे और उद्देश्यों को तय करता है। लिए निर्वाचित लोगों को राजनैतिक कार्यपालिका जिसमें नीतिगत फैसले किए जाते हैं। किसी कहते हैं। ये राजनैतिक व्यक्ति होते हैं जो बड़े मंत्री से अपने मंत्रालय के मामलों का विशेषज्ञ फैसले करते हैं। दूसरी ओर जिन्हें लंबे समय होने की कतई उम्मीद नहीं की जाती। सभी के लिए नियुक्त किया जाता है उन्हें स्थायी तकनीकी मामलों पर मंत्री विशेषज्ञों की सलाह कार्यपालिका या प्रशासनिक सेवक कहते हैं। लेता है लेकिन विशेषज्ञ अकसर अलग राय लोक सेवाओं में काम करने वाले लोगों को रखते हैं या फिर वे एक से अधिक विकल्प सिविल सर्वेट या नौकरशाह कहते हैं। वे सत्ताधारी मंत्री के सामने पेश करते हैं। मंत्री अपने उद्देश्यों पार्टी के बदलने के बावजूद अपने पदों पर बने के मुताबिक ही निर्णय लेता है। संस्थाओं का कामकाज 93 2015-16(19/01/2015) दरअसल, ऐसा हर बड़े संगठन में होता है। जो पूरे मामले को भली-भाँति समझते हैं, वे ही सबसे महत्त्वपूर्ण फैसले करते हैं, विशेषज्ञ नहीं करते। विशेषज्ञ रास्ता बता सकते हैं लेकिन व्यापक नज़रिया रखने वाला व्यक्ति ही मंजिल के बारे में फैसला करता है। लोकतंत्र में निर्वाचित मंत्री इसी व्यापक नज़रिए वाले व्यक्ति की भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् इस देश में प्रधानमंत्री सबसे महत्त्वपूर्ण राजनैतिक संस्था है। फिर भी प्रधानमंत्री के लिए कोई प्रत्यक्ष चुनाव नहीं होता। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को नियुक्त करते हैं। लेकिन राष्ट्रपति अपनी मर्जी से किसी को प्रधानमंत्री नियुक्त नहीं कर सकते। राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत वाली पार्टी या पाटयों के गठबंधन के नेता को ही प्रधानमंत्री शंकर, डोन्ट स्पेयर मी © चिल्ड्रेस बुक ट्रस्ट नियुक्त करता है। अगर किसी एक पार्टी या मंत्रिपरिषद् उस निकाय का सरकारी नाम है। गठबंधन को बहुमत हासिल नहीं होता तो - जिसमें सारे मंत्री होते हैं। इसमें अमूमन विभिन्न राष्ट्रपति उसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में। स्तरों के 6 से 8 मंत्री होते हैं। नियुक्त करता है जिसे सदन में बहुमत हासिल होने की संभावना होती है। प्रधानमंत्री का । कैबिनेट मंत्री अमूमन सत्ताधारी पार्टी या कार्यकाल तय नहीं होता। वह तब तक अपने गठबंधन की पाँटयों के वरिष्ठ नेता होते हैं। ये प्रमुख मंत्रालयों के प्रभारी होते हैं। कैबिनेट पद पर रह सकता है जब तक वह पार्टी या मंत्री मंत्रिपरिषद् के नाम पर फैसले करने के मंत्री बनने की होड़ नयी नहीं गठबंधन का नेता है। लिए बैठक करते हैं। इस तरह कैबिनेट है। यह कार्टून 1962 के बाद | प्रधानमंत्री को नियुक्त करने के बाद राष्ट्रपति नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रिपरिषद् का शीर्ष समूह होता है। इसमें होने के लिए उम्मीदवारों की प्रधानमंत्री की सलाह पर दूसरे मंत्रियों को नियुक्त करीब 2 मंत्री होते हैं। बेचैनी दर्शाता है। राजनेता करते है। मंत्री अमूमन उसी पार्टी या गठबंधन मंत्री बनने के लिए इतने बेचैन के होते हैं जिसे लोकसभा में बहुमत हासिल स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री अमूमन छोटे क्यों रहते हैं? आप क्या हो। प्रधानमंत्री मंत्रियों के चयन के लिए स्वतंत्र । मंत्रालयों के प्रभारी होते हैं। वे विशेष रूप सोचते हैं? होता है, बशर्ते वे संसद के सदस्य हों। कभी- से आमंत्रित किए जाने पर ही कैबिनेट की कभी ऐसे व्यक्ति को भी मंत्री बनाया जा सकता। बैठकों में भाग लेते हैं। है जो संसद का सदस्य नहीं हो। लेकिन उस ॥ राज्य मंत्री अपने विभाग के कैबिनेट मंत्रियों व्यक्ति का, मंत्री बनने के छह महीने के भीतर से जुड़े होते हैं और उनकी सहायता करते हैं। संसद के दोनों सदनों में से किसी एक का चूँकि सारे मंत्रियों के लिए नियमित रूप से सदस्य चुना जाना जरूरी है। मिलकर हर बात पर चर्चा करना व्यावहारिक लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) un नहीं है लिहाजा फैसले कैबिनेट बैठकों में ही खुद करें, खुद सीखें किए जाते हैं। इसी वजह से अधिकांश देशों में संसदीय लोकतंत्र को सरकार का कैबिनेट रूप । | केंद्र और अपनी राज्य सरकार के पाँच कैबिनेट मंत्रियों और कहा जाता है। कैबिनेट टीम के रूप में काम उनके मंत्रालयों के नाम लिखें। करती है। मंत्रियों की राय और विचार अलग । अपने शहर के नगर निगम/पालिका प्रमुख या अपने जिले के जिला परिषद् के अध्यक्ष से मिले और उनसे पू] कि वे अपने की जिम्मेदारी लेनी होती है। भले ही कोई फैसला शहर या जिले का प्रशासन किस तरह चलाते हैं। किसी दूसरे मंत्रालय या विभाग का हो लेकिन इस कार्टून में अपनी कोई भी मंत्री सरकार के फैसले की खुलेआम लोकप्रियता के उफान वाले आलोचना नहीं कर सकता। हर मंत्रालय में सचिव 1970 के दशक के शुरुआती आधR दिनों में इंदिरा गांधी को । | होते हैं, जो नौकरशाह होते हैं। ये सचिव फैसला प्रधानमत्र कैबिनेट की बैठक करते करने के लिए मंत्री को जरूरी सूचना मुहैया संविधान में प्रधानमंत्री या मंत्रियों के अधिकारों दिखाया गया है। क्या आपको कराते हैं। टीम के रूप में कैबिनेट की मदद या एक-दूसरे से उनके संबंध के बारे में बहुत लगता है कि उनके बाद बने कैबिनेट सचिवालय करता है। उसमें कई वरिष्ठ कुछ नहीं कहा गया है। लेकिन सरकार के प्रमुख किसी प्रधानमंत्री को इसी आकार या रूप में दिखाते | नौकरशाह शामिल होते हैं जो विभिन्न मंत्रालयों के नाते प्रधानमंत्री के व्यापक अधिकार होते हैं। हुए कार्टून बनाया जा के बीच समन्वय स्थापित करने की कोशिश वह कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करता सकता है? करते हैं। है। वह विभिन्न विभागों के कार्य का समन्वय © आर.के. लक्ष्मण, द टाइम्स ऑफ इंडिया संस्थाओं का कामकाज 95 2015-16(19/01/2015) करता है। विभागों के विवाद के मामले में उसका राय भी माननी होती है। इसके अलावा उसे निर्णय अंतिम माना जाता है। वह विभिन्न विभागों गठबंधन के साझीदारों और दूसरी पाँटयों के की सामान्य निगरानी करता है। सारे मंत्री उसी विचारों और स्थितियों को भी देखना होता है, के नेतृत्व में काम करते हैं। प्रधानमंत्री मंत्रियों आखिर उन्हीं के समर्थन के आधार पर सरकार को काम का वितरण और पुनूवतरण करता है। टिकी होती है। उसे किसी मंत्री को बर्खास्त करने का भी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति अधिकार होता है। जब प्रधानमंत्री अपना पद राष्ट्रपति के लिए हमेशा पुलिंग का छोड़ता है तो पूरा मंत्रिमंडल इस्तीफ़ा दे देता है। एक ओर जहाँ प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख इस्तेमाल क्यों होता है? इस तरह अगर भारत में कैबिनेट सबसे अधिक होता है, वहीं राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष होता है। हमारी प्रभावशाली संस्था है तो कैबिनेट के भीतर सबसे । | राजनैतिक व्यवस्था में राष्ट्राध्यक्ष केवल नाम के प्रभावशाली व्यक्ति प्रधानमंत्री होता है। दुनिया । अधिकारों का प्रयोग करता है। भारत का राष्ट्रपति के सभी संसदीय लोकतंत्रों में प्रधानमंत्री के । ब्रिटेन की महारानी की तरह होता हैं, जिसका अधिकार हाल के दशकों में इतने बढ़ गए हैं कि । बढ़ गए हैं कि काम आलंकारिक अधिक होता है। राष्ट्रपति संसदीय लोकतंत्र को कभी-कभी सरकार का देश की सभी राजनैतिक संस्थाओं के काम की प्रधानमंत्रीय रूप कहा जाने लगा है। राजनीति में निगरानी करता है ताकि वे राज्य के उद्देश्यों को राजनैतिक दलों/पाँटयों की भूमिका बढ़ने के हासिल करने के लिए मिल-जुलकर काम करें। साथ ही प्रधानमंत्री पार्टी के जरिए कैबिनेट और राष्ट्रपति का चयन जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से संसद को नियंत्रित करने लगा है। मीडिया नहीं किया जाता। संसद सदस्य और राज्य की राजनीति और चुनाव को पाँटयों के वरिष्ठ नेताओं विधानसभाओं के सदस्य उसे चनते हैं। राष्ट्रपति के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में पेश करके इस पद के प्रत्याशी को चनाव जीतने के लिए बहमत रुझान में अपना योगदान करती है। भारत में भी हासिल करना होता है। इससे यह तय हो जाता हमने प्रधानमंत्री के पास ही सारे अधिकार सीमित है कि राष्ट्रपति परे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता करने की प्रवृत्ति देखी है। भारत के पहले प्रधानमंत्री है। लेकिन राष्ट्रपति उस तरह से प्रत्यक्ष जनादेश जवाहर लाल नेहरू ने ढेर सारे अधिकारों का का दावा नहीं कर सकता जिस तरह से इस्तेमाल किया क्योंकि उनका जनता पर बहुत प्रधानमंत्री। इससे यह तय हो जाता है कि राष्ट्रपति अधिक प्रभाव था। इंदिरा गांधी भी कैबिनेट के कहने मात्र के लिए कार्यपालक की भूमिका अपने सहयोगियों की तुलना में बहुत ज्यादा निभाता है। प्रभावशाली थीं। जाहिर है कि किसी प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अधिकारों के मामले में भी यही का अधिकार उस पद पर बैठे व्यक्ति के व्यक्तित्व बात लागू होती है। अगर आप संविधान को पर भी निर्भर करता है। सरसरी तौर पर पढ़े तो आप सोचेंगे कि ऐसा इस सवाल से तो मेरा लेकिन हाल के वर्षों में भारत में गठबंधन की कुछ नहीं है जो राष्ट्रपति न कर सके। सारी । दिमाग ही चकरा गया। राजनीति के उभार से प्रधानमंत्री के अधिकार सरकारी गतिविधियाँ राष्ट्रपति के नाम पर ही कुछ हद तक सीमित हुए हैं। गठबंधन सरकार होती हैं। सारे कानून और सरकार के प्रमुख राष्ट्रपति बनेगी तो क्या का प्रधानमंत्री अपनी मर्जी से फैसले नहीं कर नीतिगत फैसले उसी के नाम से जारी होते हैं। उसे राष्ट्रपति कहना ठीक सकता। उसे अपनी पार्टी के भीतर विभिन्न समूहों सभी प्रमुख नियुक्तियाँ राष्ट्रपति के नाम पर ही होगा? क्या हमारी भाषा और गुटों के साथ गठबंधन के साझीदारों की होती हैं। वह भारत के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च मर्दो ने बनाई है? 96 लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) लोकतंत्र के लिए कैसा प्रधानमंत्री होता है? ऐसा जो केवल अपनी मर्जी से काम करता है या ऐसा जो दूसरी पार्टियों और व्यक्तियों से भी सलाह लेता है? पत्र सूचना कार्यालय राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी 26 मई 2014 को राष्ट्रपति भवन में श्री नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलाते हुए। न्यायालय और राज्य के उच्च न्यायालयों के पारित करती है तो उसे उस पर हस्ताक्षर करने न्यायाधीशों, राज्यपालों, चुनाव आयुक्तों और ही पड़ेंगे। दूसरे देशों में राजदूतों आदि को नियुक्त करता तो आप सोच रहे होंगे कि राष्ट्रपति करता है। सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और समझौते उसी क्या है? क्या वह अपने विवेक से भी कुछ कर के नाम से होते हैं। भारत के रक्षा बलों का सकता है? एक महत्त्वपूर्ण चीज़ है जो उसे सुप्रीम कमांडर राष्ट्रपति ही होता है। स्वविवेक से करनी चाहिएः प्रधानमंत्री की लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि नियुक्ति। जब कोई पार्टी या गठबंधन चुनाव में राष्ट्रपति इन अधिकारों का इस्तेमाल मंत्रिपरिषद् बहुमत हासिल कर लेता है तो राष्ट्रपति के पास की सलाह पर ही करता है। राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् कोई विकल्प नहीं होता। उसे लोकसभा में को अपनी सलाह पर पुनवचार करने के लिए बहुमत वाली पार्टी या गठबंधन के नेता को कह सकता है। लेकिन अगर वही सलाह दोबारा प्रधानमंत्री नियुक्त करना होता है। जब किसी मिलती है तो वह उसे मानने के लिए बाध्य पार्टी या गठबंधन को लोकसभा में बहुमत होता हैं। इसी प्रकार संसद द्वारा पारित कोई हासिल नहीं होता तो राष्ट्रपति अपने विवेक से विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही कानून काम लेता है। वह ऐसे नेता को नियुक्त करता है बनता है। अगर राष्ट्रपति चाहे तो उसे कुछ समय जो उसकी राय में लोकसभा में बहुमत जुटा के लिए रोक सकता है। वह विधेयक पर सकता है। ऐसे मामले में राष्ट्रपति नवनियुक्त पुनवचार के लिए उसे संसद में वापस भेज प्रधानमंत्री से एक तय समय के भीतर लोकसभा सकता है। लेकिन अगर संसद दोबारा विधेयक में बहुमत साबित करने के लिए कहता है। संस्थाओं का कामकाज 2015-16(19/01/2015) राष्ट्रपति प्रणाली दुनिया में हर जगह राष्ट्रपति भारत की तरह औपचारिक शासनाध्यक्ष नहीं होता। दुनिया के अनेक देशों में राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष भी होता है और सरकार का मुखिया भी। अमेरिकी राष्ट्रपति इस तरह के राष्ट्रपति का जाना-माना उदाहरण है । उसका चुनाव लोग प्रत्यक्ष वोट से करते हैं। वही अपने मंत्रियों का चुनाव और नियुक्ति करता है। कानून बनाने का काम अभी भी विधायिका (अमेरिका में उसे कांग्रेस कहा जाता है) करती है पर राष्ट्रपति किसी भी कानून को वीटो के अधिकार से रोक सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि राष्ट्रपति बनने के लिए उसे कांग्रेस के बहुमत के समर्थन की ज़रूरत नहीं होती और न ही वह उसके प्रति उत्तरदायी है। उसका चार साल का तय कार्यकाल है और अपनी पार्टी का कांग्रेस में बहुमत न होने पर भी वह आराम से अपना कार्यकाल पूरा करता है। अमेरिकी मॉडल को लातिनी अमेरिका के अनेक देशों और सोवियत संघ का हिस्सा रहे कई देशों में अपनाया गया है। चूंकि सरकार के इस स्वरूप में राष्ट्रपति की भूमिका केंद्रीय होती है इसलिए इसे राष्ट्रपति प्रणाली कहा जाता है। ब्रिटेन के मॉडल को मानने वाले भारत जैसे देशों में संसद ही सर्वोच्च होती है। इसलिए, हमारी प्रणाली को शासन की संसदीय प्रणाली कहा जाता है। TET पहुँचे? qui इलियम्मा, अन्नाकुट्टी और मेरीमॉल राष्ट्रपति के विषय वाले हिस्से को पढ़ती हैं। वे तीनों एक-एक सवाल का जवाब जानना चाहती हैं। क्या आप उन्हें उनके सवालों के जवाब दे सकते हैं? इलियम्माः अगर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री किसी नीति पर असहमत हों तो क्या होगा? क्या प्रधानमंत्री का विचार हमेशा प्रभावी होगा? अन्नाकुट्टीः मुझे यह बेतुका लगता है कि सशस्त्र बलों का सुप्रीम कमांडर राष्ट्रपति हो। वह तो एक भारी बंदूक भी नहीं उठा सकता। उसे कमांडर बनाने में क्या तुक है? मेरीमॉलः मेरा सवाल यह है कि अगर असली अधिकार प्रधानमंत्री के पास ही हैं तो राष्ट्रपति की ज़रूरत ही क्या है? समझे? 5.4 न्यायपालिका । उसे अधिकार होता मगर सर्वोच्च न्यायालय से कोई निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं रखता। इस बार भी हम सरकारी आदेश की उसी भले ही वह निष्पक्ष फैसला सुना देता लेकिन कहानी पर लौटते हैं, जिससे हमने शुरुआत की। सरकार के आदेश के खिलाफ़ अपील करने थी। इस बार हम कहानी को याद नहीं करेंगे, वाले उसके फैसले को नहीं मानते। बस यह कल्पना करेंगे कि यह कहानी कितनी अलग हो सकती थी। याद कीजिए कि इस खुद करें, खुद सीखें कहानी का उस समय संतोषजनक अंत हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया। इसे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के किसी बड़े फैसले से जुड़ी हर किसी ने स्वीकार कर लिया। कल्पना कीजिए खबरों पर गौर करें। मूल फैसला क्या था? क्या अदालत ने उसमें कि निम्नलिखित परिस्थितियों में क्या होताः। बदलाव कर दिया? इसका कारण क्या दिया गया? । देश में सर्वोच्च न्यायालय जैसा कुछ नहीं होता। | इसी वजह से लोकतंत्रों के लिए स्वतंत्र और सर्वोच्च न्यायालय तो होता पर उसके पास प्रभावशाली न्यायपालिका को ज़रूरी माना जाता सरकार की कार्रवाइयों को आँकने का है। देश के विभिन्न स्तरों पर मौजूद अदालतों अधिकार नहीं होता। को सामूहिक रूप से न्यायपालिका कहा जाता 98 लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) संयुक्त राज्य अमरीका में न्यायाधीशों को उनके राजनैतिक विचार और दलीय जुड़ाव के आधार पर नियुक्त करना एक आम बात है। यह काल्पनिक विज्ञापन वहाँ सन् 2005 में एक कार्टून के रूप में छपा। उस समय राष्ट्रपति बुश अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय में मनोनयन के लिए विभिन्न उम्मीदवारों के नाम पर विचार कर रहे थे। यह कार्टून व्यायालय की स्वतंत्रता के बारे में क्या कहता है? हमारे देश में इस तरह के कार्टून क्यों नहीं छपते? क्या यह हमारी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को दर्शाता है? © सी.एम.ई. कोहेन, नेशनल, केगल कार्टून्स इंक इस काल्पनिक विज्ञापन में लिखा है : आवश्यकता है सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की । कोई पूर्व अनुभव ज़रूरी नहीं। कुछ टाइपिंग आना आवश्यक है। वह बिना हिचकिचाए ऐसी बातें कह सकेः “मैं अभी तक जितने लोगों से मिला हूँ उनमें राष्ट्रपति (जार्ज बुश) सबसे अधिक प्रतिभाशाली हैं। कोई भी बाहरी व्यक्ति आवेदन न करे। है। भारतीय न्यायपालिका में परे देश के लिए यह फ़ौजदारी और दीवानी मामले में अपील सर्वोच्च न्यायालय, राज्यों में उच्च न्यायालय, । के लिए सर्वोच्च संस्था है। यह उच्च न्यायालयों जिला न्यायालय और स्थानीय स्तर के न्यायालय के फैसलों के खिलाफ़ सुनवाई कर सकता है। होते हैं। भारत में न्यायपालिका एकीकृत है। । न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब है कि इसका मतलब यह कि सर्वोच्च न्यायालय देश १ वह विधायिका या कार्यपालिका के नियंत्रण में में न्यायिक प्रशासन को नियंत्रित करता है। देश । * नहीं है। न्यायाधीश सरकार के निर्देश या सत्ताधारी की सभी अदालतों को उसका फैसला मानना । पार्टी की मर्जी के मुताबिक काम नहीं करते। इसी वजह से सभी आधुनिक लोकतंत्रों में होता है। वह इनमें से किसी भी विवाद की अदालतें, विधायिका और कार्यपालिका के अधीन सुनवाई कर सकता है। नहीं होतीं। भारत ने इस लक्ष्य को हासिल कर देश के नागरिकों के बीच; लिया है। राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च नागरिकों और सरकार के बीच; न्यायालयों के न्यायाधीशों को प्रधानमंत्री की दो या उससे अधिक राज्य सरकारों के | सलाह पर और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के मशविरे से नियुक्त करता है। बीच; और व्यावहारिक तौर पर अब इस व्यवस्था में सर्वोच्च । केंद्र और राज्य सरकार के बीच।। न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश, सर्वोच्च संस्थाओं का कामकाज 99 2015-16(19/01/2015) न्यायालय और उच्च न्यायालयों के नए किसी कानून या कार्यपालिका की कार्रवाई को न्यायाधीशों को चुनते हैं। इसमें राजनैतिक चुनौती मिलती है तो वे उसकी संवैधानिक वैधता कार्यपालिका की दखल की गुंजाइश बेहद कम तय करते हैं। इसे न्यायिक समीक्षा के रूप में है। सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश जाना जाता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने को ही अमूमन मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया यह भी फैसला दिया है कि संसद, संविधान के जाता है। एक बार किसी व्यक्ति को सर्वोच्च मूलभूत सिद्धांतों को बदल नहीं सकती। न्यायालय या उच्च न्यायालय का न्यायाधीश भारतीय न्यायपालिका के अधिकार और नियुक्त करने के बाद उसे उसके पद से हटाना स्वतंत्रता उसे मौलिक अधिकारों के रक्षक के लगभग असंभव हो जाता है। उसे हटाना भारत रूप में काम करने की क्षमता प्रदान करते हैं। के राष्ट्रपति को हटाने जितना ही मुश्किल है। हम नागरिकों के अधिकार वाले अध्याय में देखेंगे किसी भी न्यायाधीश को संसद के दोनों सदनों कि नागरिकों को संविधान से मिले अपने में अलग-अलग दो-तिहाई बहुमत से अविश्वास अधिकारों के उल्लंघन के मामले में इंसाफ़ पाने प्रस्ताव पारित करके ही हटाया जा सकता है। के लिए अदालतों में जाने का अधिकार है। हाल भारतीय लोकतंत्र में ऐसा कभी नहीं हुआ। के वर्षों में अदालतों ने सार्वजनिक हित और भारत की न्यायपालिका दुनिया की सबसे मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए विभिन्न फैसले अधिक प्रभावशाली न्यायपालिकाओं में से एक और निर्देश दिए हैं। सरकार की कार्रवाइयों से है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को जनहित को ठेस पहुँचने की स्थिति में कोई भी देश के संविधान की व्याख्या का अधिकार है। अदालत जा सकता है। इसे जनहित याचिका अगर उन्हें लगता है कि विधायिका का कोई कहते हैं। अदालतें सरकार को निर्णय करने की कानून या कार्यपालिका की कोई कार्रवाई शक्ति के दुरुपयोग से रोकने के लिए हस्तक्षेप संविधान के खिलाफ़ है तो वे केंद्र और राज्य करती हैं। वे सरकारी अधिकारियों को भ्रष्ट आचरण स्तर पर ऐसे कानून या कार्रवाई को अमान्य से रोकती हैं। इसी वजह से लोगों के बीच घोषित कर सकते हैं। इस तरह जब उनके सामने न्यायपालिका को काफ़ी विश्वास हासिल है। DET पहुँचे? निम्नलिखित संदर्भो में एक कारण देकर समझाएँ कि भारतीय न्यायपालिका किस तरह स्वतंत्र हैः न्यायाधीशों की नियुक्तिः न्यायाधीशों को पद से हटानाः न्यायपालिका के अधिकारः समझे ? 100 लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) शब्दावली गठबंधन सरकारः विधायिका में किसी एक पार्टी को बहुमत हासिल न होने की सूरत में दो या उससे अधिक राजनैतिक पाटयों के गठबंधन से बनी सरकार। कार्यपालिकाः व्यक्तियों का ऐसा निकाय जिसके पास देश के संविधान और कानून के आधार पर प्रमुख नीति बनाने, फैसले करने और उन्हें लागू करने का अधिकार होता है। सरकारः संस्थाओं का ऐसा समूह जिसके पास देश में व्यवस्थित जन-जीवन सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने, लागू करने और उसकी व्याख्या करने का अधिकार होता है। व्यापक अर्थ में सरकार किसी देश के लोगों और संसाधनों को नियंत्रित और उनकी निगरानी करती है। न्यायपालिकाः एक राजनैतिक संस्था जिसके पास न्याय करने और कानूनी विवादों के निबटारे का अधिकार होता है। देश की सभी अदालतों को एक साथ न्यायपालिका के नाम से पुकारा जाता है। शः जनप्रतिनिधियों की सभा जिसके पास देश का कानून बनाने का अधिकार होता है। कानून बनाने के अलावा विधायिका को कर बढ़ाने, बजट बनाने और दूसरे वित्त विधेयकों को बनाने का विशेष अधिकार होता है। कार्यालय ज्ञापनः सक्षम अधिकारी द्वारा जारी पत्र जिसमें सरकार के फैसले या नीति के बारे में बताया जाता है। राजनैतिक संस्थाः देश की सरकार और राजनैतिक जीवन के आचार को नियमित करने वाली प्रक्रियाओं का समूह। आरक्षणः भेदभाव के शिकार, वंचित और पिछड़े लोगों और समुदायों के लिए सरकारी नौकरियों तथा शैक्षिक संस्थाओं में पद एवं सीटें आरक्षित करने की नीति। राज्यः निश्चित क्षेत्र में फैली राजनैतिक इकाई, जिसके पास संगठित सरकार हो और घरेलू तथा विदेश नीतियों को बनाने का अधिकार हो। सरकारें बदल सकती हैं पर राज्य बना रहता है। बोलचाल की भाषा में देश, राष्ट्र और राज्य को समानार्थी के रूप में प्रयोग किया जाता है। राज्य' शब्द का एक अन्य प्रयोग किसी देश के अंदर की प्रशासनिक इकाईयों या प्रांतों के लिए भी होता है। इस अर्थ में राजस्थान, झारखंड, त्रिपुरा आदि भी राज्य कहे जाते हैं। अगर आपको भारत का राष्ट्रपति चुना जाए तो आप निम्नलिखित में से कौन-सा फैसला खुद कर सकते हैं? क. अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रधानमंत्री चुन सकते हैं। ख. लोकसभा में बहुमत वाले प्रधानमंत्री को उसके पद से हटा सकते हैं। ग. दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक पर पुनवचार के लिए कह सकते हैं। घ. मंत्रिपरिषद् में अपनी पसंद के नेताओं का चयन कर सकते हैं। निम्नलिखित में कौन राजनैतिक कार्यपालिका का हिस्सा होता है? प्रश्नावली क. जिलाधीश ख. गृह मंत्रालय का सचिव ग. गृह मंत्री घ. पुलिस महानिदेशक संस्थाओं का कामकाज 101 2015-16(19/01/2015) 3. न्यायपालिका के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा बयान गलत है? क. संसद द्वारा पारित प्रत्येक कानून को सर्वोच्च न्यायालय की मंजूरी की ज़रूरत होती है। ख. अगर कोई कानून संविधान की भावना के खिलाफ़ है तो न्यायापालिका उसे अमान्य घोषित कर सकती है। ग. न्यायपालिका कार्यपालिका से स्वतंत्र होती है। घ. अगर किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है तो वह अदालत में जा सकता है। 4. निम्नलिखित राजनैतिक संस्थाओं में से कौन-सी संस्था देश के मौजूदा कानून में संशोधन कर सकती है? क. सर्वोच्च न्यायालय ख. राष्ट्रपति ग. प्रधानमंत्री घ. संसद 5. उस मंत्रालय की पहचान करें जिसने निम्नलिखित समाचार जारी किया होगाः । उधा यंत्रालय 2. कृषि, खाद्यान्न और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय क. देश से जूट का निर्यात बढ़ाने के लिए एक नई नीति बनाई जा रही है। ख. ग्रामीण इलाकों में टेलीफोन सेवाएँ सुलभ करायी जाएँगी। ग. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत । बिकने वाले चावल और गेहूँ की कीमतें कम की जाएँगी। घ. पल्स पोलियो अभियान शुरू किया जाएगा। ङ ऊँची पहाड़ियों पर तैनात सैनिकों के भत्ते बढ़ाए जाएँगे। 3. स्वास्थ्य मंत्रालय 4. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय 5. संचार और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्रालय देश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में से उस राजनैतिक संस्था का नाम बताइए जो निम्नलिखित मामलों में अधिकारों का इस्तेमाल करती है। क. सड़क, छुसचाई जैसे बुनियादी ढाँचों के विकास और नागरिकों की विभिन्न कल्याणकारी गतिविधियों पर कितना पैसा खर्च किया जाएगा। ख. स्टॉक एक्सचेंज को नियमित करने संबंधी कानून बनाने की कमेटी के सुझाव पर विचार-विमर्श | करती है। ग. दो राज्य सरकारों के बीच कानूनी विवाद पर निर्णय लेती है। घ. भूकंप पीड़ितों की राहत के प्रयासों के बारे में सूचना माँगती है। प्रश्नावली 102 लोकतांत्रिक राजनीति 2015-16(19/01/2015) भारत का प्रधानमंत्री सीधे जनता द्वारा क्यों नहीं चुना जाता? निम्नलिखित चार जवाबों में सबसे सही को चुनकर अपनी पसंद के पक्ष में कारण दीजिए: क. संसदीय लोकतंत्र में लोकसभा में बहुमत वाली पार्टी का नेता ही प्रधानमंत्री बन सकता है। ख. लोकसभा, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें हटा सकती है। ग. चूंकि प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति नियुक्त करता है लिहाजा उसे जनता द्वारा चुने जाने की जरूरत ही नहीं है। घ. प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव में बहुत ज्यादा खर्च आएगा। प्रश्नावली 8. तीन दोस्त एक ऐसी फिल्म देखने गए जिसमें हीरो एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनता है और राज्य में बहुत से बदलाव लाता है। इमरान ने कहा कि देश को इसी चीज़ की ज़रूरत है। रिजवान ने कहा कि इस तरह का, बिना संस्थाओं वाला एक व्यक्ति का राज खतरनाक है। शंकर ने कहा कि यह तो एक कल्पना है। कोई भी मंत्री एक दिन में कुछ भी नहीं कर सकता। ऐसी फिल्मों के बारे में आपकी क्या राय है? एक शिक्षिका छात्रों की संसद के आयोजन की तैयारी कर रही थी। उसने दो छात्राओं से अलग-अलग पार्टियों के नेताओं की भूमिका करने को कहा। उसने उन्हें विकल्प भी दिया। यदि वे चाहें तो राज्य सभा में बहुमत प्राप्त दल की नेता हो सकती थी और अगर चाहें तो लोकसभा के बहुमत प्राप्त दल की। अगर आपको यह विकल्प दिया गया तो आप क्या चुनेंगे और क्यों? आरक्षण पर आदेश का उदाहरण पढ़कर तीन विद्याथयों की न्यायपालिका की भूमिका पर अलग- अलग प्रतिक्रिया थी। इनमें से कौन-सी प्रतिक्रिया, न्यायपालिका की भूमिका को सही तरह से समझती है? क. श्रीनिवास का तर्क है कि चूंकि सर्वोच्च न्यायालय सरकार के साथ सहमत हो गई है लिहाजा वह स्वतंत्र नही है। ख. अंजैया का कहना है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है क्योंकि वह सरकार के आदेश के खिलाफ़ फैसला सुना सकती थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को उसमें संशोधन का निर्देश दिया। ग. विजया का मानना है कि न्यायपालिका न तो स्वतंत्र है न ही किसी के अनुसार चलने वाली है। बल्कि वह विरोधी समूहों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाती है। न्यायालय ने इस आदेश के समर्थकों और विरोधियों के बीच बढ़िया संतुलन बनाया। आपकी राय में कौन-सा विचार सबसे सही है? इस अध्याय में हमने देश की चार विभिन्न संस्थाओं के बारे में चर्चा की। आप कम-से-कम एक हफ्ते के समाचारों को इकट्ठा करके उन्हें चार समूहों में वर्गीकृत कीजिए: विधायिका की कार्यशैली राजनैतिक कार्यपालिका की कार्यशैली । नौकरशाही की कार्यशैली । न्यायपालिका की कार्यशैली संस्थाओं का कामकाज 103 2015-16(19/01/2015)

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