अध्याय 3 निदेर्शांक ज्यामिति ॅींजष्े जीम हववक व िडमतबंजवतष्े छवतजी च्वसमे ंदक म्ुनंजवतेए ज्तवचपबेए र्वदमे ंदकडमतपकपंद स्पदमेघ् ैव जीम ठमससउंद ूवनसक बतलय ंदक बतमू ूवनसक तमचसल ष् ज्ीमल ंतमउमतमसल बवदअमदजपवदंस ेपहदे!ष् ;मरकेटर के उत्तरी ध््रुवों और विषुवत वृत्तों, उष्ण कटिबंधें, मंडलों और यामोत्तर रेखाओं मेंक्या अच्छाइर् है? इसलिए बेलमैन ने शोर मचाया होगा और नाविक दल ने उत्तर दिया होगा,‘‘ये केवल परंपरागत चिÉ हैं’’।द्ध स्म्ॅप्ै ब्।त्त्व्स्स्ए ज्ीम भ्नदजपदह व िजीम ैदंता 3ण्1 भूमिका आप यह पढ़ चुके हैं कि एक संख्या रेखा पर एक बिन्दु का स्थान निधर्रण किस प्रकार किया जाता है। आप यह भी पढ़ चुके हैं कि एक रेखा पर एक बिन्दु की स्िथति की व्याख्या किस प्रकार की जाती है। ऐसी अनेक स्िथतियाँ हैं जिनमेें एक बिन्दु ज्ञात करने के लिए हमें एक से अध्िक रेखाओं के संदभर् में उसकी स्िथति की व्याख्या करनी होती है। उदाहरण के लिए, निम्नलिख्िात स्िथतियों पर विचार कीजिएः प्ण् आवृफति 3.1 में एक मुख्य मागर् है जो पूवर् से पश्िचम की ओर जाता है और इस पर कुछ सड़कें बनी हैं, इनकी सड़क ;मागर्द्ध संख्याएँ पश्िचम से पूवर् की ओर दी गइर् हैं। प्रत्येक सड़क ;मागर्द्ध पर बने मकानों पर संख्याएँ अंकित कर दी गइर् हैं। आपको यहाँ अपनी सहेली के मकान का पता लगाना है। क्या इसके लिए केवल एक निदेर्श - बिन्दु का ज्ञात होना पयार्प्त होगा? उदाहरण के लिए, यदि हमें केवल यह ज्ञात हो कि वह सड़क 2 पर रहती है तो क्या हम उसके घर का पता सरलता से लगा सकते हैं? उतनी सरलता से नहीं जितनी सरलता से तब जबकि हमें दो जानकारियाँ अथार्त् सड़क की वह संख्या जिस पर उसका मकान है और मकान की संख्या ज्ञात होने पर होती है। यदि आप उस मकान पर जाना चाहते हैं जो सड़क 2 पर स्िथत है और जिसकी संख्या 5 है, तो सबसे पहले आपको यह पता लगाना होगा कि सड़क 2 कौन - सी है और तब उस मकान का पता लगाना होता है जिसकी संख्या 5 है। आवृफति 3.1 में भ् इसी मकान का स्थान दशार्ता है। इसी प्रकार, च् उस मकान को दशार्ता है जो सड़क संख्या 7 पर है और जिसकी संख्या 4 है। प्प्ण् मान लीजिए आप एक कागज की शीट पर एक बिन्दु लगा देते हैं ख्आवृफति 3.2 ;ंद्ध,। यदि हम आपसे कागश पर लगे बिन्दु की स्िथति के बारे में पूछें, तोआप इसे वैफसे बताएँगे? संभवतः आप इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दें: फ्बिन्दु कागश केआध्े के ऊपरी भाग में स्िथत हैय् या ‘‘यह भी कह सकते हैं कि यह बिन्दु कागश की बायींकोर के निकट स्िथत है’’ या ‘‘यह बिन्दु कागश की बायीं ओर के ऊपरी कोने के कापफीनिकट स्िथत है।य् क्या ऊपर दिए गए कथनों में से किसी भी कथन के आधर पर आप बिन्दुकी ठीक - ठीक स्िथति बता सकते हैं? स्पष्ट है कि उत्तर ‘‘नहीं’’ है। परन्तु, यदि आप यह कहें कि फ्बिन्दु कागश की बायीं कोर से लगभग 5 बउ दूर है, तो इससे आपको बिन्दु की स्िथति का आभास तो हो जाता है पिफर भी ठीक - ठाक स्िथति का पता नहीं चलता। थोड़ा बहुत सोच - विचार के बाद आप यह कह सकते हैं कि सबसे नीचे वाली रेखा से बिन्दु 9 बउ की दूरी पर है। अब हम बिन्दु की स्िथति ठीक - ठाक बता सकते हैं। आवृफति 3ण्2 इसके लिए हम दो नियत रेखाओं अथार्त् कागज की बायीं कोर और कागश की सबसे नीचे वाली रेखा से बिन्दु की स्िथति नियत करते हैं ख्आवृफति 3.2 ;इद्ध,। दूसरे शब्दों में, हम यह कह सकते हैं कि बिन्दु की स्िथति ज्ञात करने के लिए दो स्वतंत्रा सूचनाओं का होना आवश्यक होता है। अब आप कक्षा में फ्बैठने की योजनाय् नामक निम्नलिख्िात ियाकलाप कीजिएः ियाकलाप 1 ;बैठने की योजनाद्ध रू सभी मेशों को एक साथ खींचकर अपनी कक्षा में बैठने की एक योजना बनाइए। प्रत्येक मेश को एक वगर् से निरूपित कीजिए। प्रत्येक वगर् में उस विद्याथीर् का नाम लिख्िाए जिस पर वह बैठता है और जिसे वह वगर् निरूपित करता है। कक्षा में प्रत्येक विद्याथीर् की स्िथति का ठीक - ठीक निधर्रण निम्नलिख्िात दो सूचनाओं की सहायता से किया जाता है। ;पद्ध वह स्तंभ जिसमें वह बैठता / बैठती है। ;पपद्ध वह पंक्ित जिसमें वह बैठता / बैठती है। यदि आप उस मेश पर बैठते हैं जो 5वें स्तंभ और तीसरी पंक्ित में है, जिसे आवृफति 3.3 में छायित वगर् से दिखाया गया है, तो आपकी स्िथति को ;5, 3द्ध के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, जहाँ पहली संख्या स्तंभ संख्या को प्रकट करती है और दूसरी संख्या पंक्ित संख्या को प्रकट करती है। क्या यह वही है जो कि ;3, 5द्ध है? आप अपनी कक्षा के अन्य विद्याथ्िार्यों के नाम और उनके बैठने की स्िथतियाँ लिखें। उदाहरण के लिए, यदि सोनिया चैथे स्तंभ और पहली पंक्ित में बैठती है, तो उसके लिए ै;4, 1द्ध लिख्िाए। श्िाक्षक की मेश आपके बैठने की योजना के अंतगर्त नहीं आती है। यहाँ हम श्िाक्षक को केवल एक प्रेक्षक ही मानते हैं। आवृफति 3ण्3 ऊपर की चचार् में आपने यह देखा है कि एक तल पर रखी हुइर् किसी वस्तु की स्िथति दो लंब रेखाओं की सहायता से निरूपित की जा सकती है। यदि वस्तु एक बिन्दु है, तो हमें सबसे नीचे वाली रेखा से और कागज की बायीं कोर से बिन्दु की दूरी ज्ञात होना आवश्यक होता है। ‘‘बैठने की योजना’’ के संबंध् में हमें स्तंभ की संख्या और पंक्ित की संख्या का जानना आवश्यक होता है। इस सरल विचारधरा के दूरगामी परिणाम होते हैं और इससे गण्िात की निदेर्शांक ज्यामिति ;ब्ववतकपदंजम ळमवउमजतलद्ध नामक एक अति महत्वपूणर् शाखा की व्युत्पिा हुइर्। इस अध्याय में, हमारा लक्ष्य निदेर्शांक ज्यामिति की वुफछ आधरभूत संकल्पनाओं से आपको परिचित कराना है। इसके बारे में आप विस्तार से अध्ययन उच्च कक्षाओं में करेंगे। प्रारंभ में प्रफांसीसी दाशर्निक और गण्िातज्ञ रेने दकातेर् ने इस अध्ययन को विकसित किया था। वुफछ लोग प्रातःकाल में बिस्तर पर लेटे रहना पसंद करते हैं। यही आदत सत्राहवीं शताब्दी के महान प्रफांसीसी गण्िातज्ञ रेने दकातेर् की थी। परन्तु वह आलसी व्यक्ित नहीं था, वह यह समझता था कि बिस्तर पर पड़े - पड़े ही अध्िक ¯चतन किया जा सकता है। एक दिन जबकि वह अपने बिस्तर पर लेटे - लेटे आराम कर रहा था, उसने एक तल में एक बिन्दु की स्िथति का निधर्रण करने से संबंध्ित समस्या का हल ढूँढ़ निकाला। जैसाकि आप देखेंगे उसकी विध्ि अक्षांश और देशांतर की पुरानी रेने दकातेर् ;1596 .1650द्ध विचारधरा की ही एक विकसित रूप थी। एक तल की एक आकृति 3.4 बिन्दु की स्िथति का निधर्रण करने में प्रयुक्त प(ति को दकातेर् के सम्मान में कातीर्य प(ति ;ब्ंतजमेपंद ैलेजमउद्ध भी कहा जाता है। प्रश्नावली 3ण्1 1ण् एक अन्य व्यक्ित को आप अपने अध्ययन मेज पर रखे टेबल लैंप की स्िथति किस तरह बताएँगे? 2ण् ;सड़क योजनाद्ध रू एक नगर में दो मुख्य सड़वेंफ हैं, जो नगर के केन्द्र पर मिलती हैं। येदो सड़वेंफ उत्तर - दक्ष्िाण की दिशा और पूवर् - पश्िचम की दिशा में हैं। नगर की अन्य सभी सड़वेंफ इन मुख्य सड़कों के समांतर परस्पर 200 मीटर की दूरी पर हैं। प्रत्येक दिशा में लगभग पाँच सड़वेंफ हैं। 1 सेंटीमीटर त्र 200 मीटर का पैमाना लेकर अपनी नोट बुक में नगर का एक माॅडल बनाइए। सड़कों को एकल रेखाओं से निरूपित कीजिए। आपके माॅडल में एक - दूसरे को काटती हुइर् अनेक क्राॅस - स्ट्रीट ;चैराहेद्ध हो सकती हैं।एक विशेष क्राॅस - स्ट्रीट दो सड़कों से बनी है, जिनमें से एक उत्तर - दक्ष्िाण दिशा में जाती है और दूसरी पूवर् - पश्िचम की दिशा में। प्रत्येक क्राॅस - स्ट्रीट का निदेर्शन इस प्रकार किया जाताहैः यदि दूसरी सड़क उत्तर - दक्ष्िाण दिशा में जाती है और पाँचवीं सड़क पूवर् - पश्िचम दिशा में जाती है और ये एक क्राॅ¯सग पर मिलती हैं, तब इसे हम क्राॅस - स्ट्रीट ;2, 5द्ध कहेंगे। इसी परंपरा से यह ज्ञात कीजिए कि ;पद्ध कितनी क्राॅस - स्ट्रीटों को ;4, 3द्ध माना जा सकता है। ;पपद्ध कितनी क्राॅस - स्ट्रीटों को ;3, 4द्ध माना जा सकता है। 3ण्2 कातीर्य प(ति ‘संख्या प(ति’ के अध्याय में आप संख्या रेखा के बारे में पढ़ चुके हैं। संख्या रेखा पर एक नियत बिन्दु से दूरियों को बराबर एककों में एक दिशा में ध्नात्मक और दूसरी दिशा में )णात्मक अंकित किया जाता है। उस बिन्दु को, जहाँ से दूरियाँ अंकित की जाती हैं, मूल - बिन्दु ;वतपहपदद्ध कहा जाता है। एक रेखा पर समान दूरियों पर बिन्दुओं को अंकित करके, हम संख्या रेखा का प्रयोग संख्याओं को निरूपित करने के लिए करते हैं। यदि एक एकक दूरी संख्या ‘1’ को निरूपित करती हो, तो 3 एकक दूरी संख्या ‘3’ को निरूपित करेगी, जहाँ श्व्श् मूलबिन्दु है। मूलबिन्दु से ध्नात्मक दिशा में दूरी त पर स्िथत बिन्दु संख्या त को निरूपित करती है। मूलबिन्दु से )णात्मक दिशा में दूरी त पर स्िथत बिन्दु संख्या त को निरूपित करती है। संख्या रेखा पर विभ्िान्न संख्याओं के स्थान आवृफति 3.5 में दिखाए गए हैं। आवृफति 3ण्5 दकातेर् ने एक तल पर एक दूसरे पर लंब दो रेखाओं को खींचने और इन रेखाओं के सापेक्ष तल पर बिन्दुओं का स्थान निधर्रण करने का विचार प्रस्तुत किया। लंब रेखाएँ किसी भी दिशा में हो सकती हैं, जैसा कि आवृफति 3.6 में दिखाया गया है। लेकिन जब हम इस अध्याय मेें एक तल में स्िथत एक बिन्दु का स्थान निधर्रण करने के लिए दो रेखाएँ लंेगे,तो एक रेखा क्षैतिज होगी और दूसरी रेखा ऊध्वार्ध्र, जैसा कि आवृफति 3.6 ;बद्ध में दिखाया गया है। आवृफति 3ण्6 वास्तव में ये रेखाएँ इस प्रकार प्राप्त की जाती हैं: दो संख्या रेखाएँ लीजिए और उन्हें ग्′ग् औरल्′ल् का नाम दे दीजिए। ग्′ग् को क्षैतिज रख्िाए ख्जैसा कि आवृफति 3ण्7;ंद्ध में दिखाया गया है, और इस पर ठीक उसी प्रकार संख्याएँ लिख्िाए जैसा कि संख्या रेखा पर लिखी जाती हैं। ये ही सभी ियाएँ आप ल्′ल् के साथ कीजिए। अंतर केवल यही है कि ल्′ल् क्षैतिजनहीं है, अपितु ऊध्वार्ध्र है ख्देख्िाए आकृति 3ण्7 ;इद्ध,। आवृफति 3ण्7 दोनों रेखाओं का संयोजन इस प्रकार कीजिए कि ये दो रेखाएँ एक - दूसरे को मूलबिन्दु पर काटती हों ;आवृफति 3.8द्ध। क्षैतिज रेखा ग्′ग् को ग .अक्ष कहा जाता है और ऊध्वार्धर रेखा ल्′ल् कोल .अक्ष कहा जाता है। वह बिन्दु, जहाँ ग्′ग् और ल्′ल् एक - दूसरे को काटती हैं, उसे मूलबिन्दु ;वतपहपदद्ध कहा जाता है और इसे व् से प्रकट किया जाता है। क्योंकि धनात्मक संख्याएँ व्ग् और व्ल् की दिशाओं में स्िथत हैं, इसलिए व्ग् और व्ल् को क्रमशः ग.अक्ष और ल.अक्ष की ध्नात्मक दिशाएँ कहा जाता है। इसी प्रकार, व्ग्′ और व्ल्′ को ग.अक्ष और ल.अक्ष की क्रमशः )णात्मक दिशाएँ कहा जाता है। यहाँ आप यह देखते हैं कि ये दोनों अक्ष तल को चार भागों में विभाजित करती हैं। इन चार भागों को चतुथा±श;ुनंकतंदजेद्ध ;एक - चैथाइर्द्ध कहा जाता है। व्ग् से वामावतर् दिशा में इन्हें प्ए प्प्ए प्प्प् और प्ट चतुथा±श कहा जाता है ;देख्िाए आवृफति 3.9द्ध। इस प्रकार, इस तल में दोनों अक्ष और चारों चतुथा±श सम्िमलित हैं। हम इस तल को कातीर्य तल ;ब्ंतजमेपंद चसंदमद्ध या निदेर्शांक तल ;ब्ववतकपदंजम चसंदमद्ध या गल.तल ;गल.चसंदमद्ध कहते हैं। अक्षों को निदेर्शांक अक्ष ;बववतकपदंजम ंगमेद्ध कहा जाता है। आवृफति 3ण्8 आवृफति 3ण्9 आइए अब हम यह देखें कि गण्िात में इस प(ति का इतना महत्व क्यों है और यह किस प्रकार उपयोगी होती है। आगे दिया गया आरेख लीजिए, जहाँ अक्षों को आलेख कागज ;हतंची चंचमतद्ध पर खींचा गया है। आइए हम अक्षों से बिन्दुओं च् और फ की दूरियाँ ज्ञात करें। इसके लिए ग.अक्ष पर लंब च्ड और ल.अक्ष पर लंब च्छ डालिए। इसी प्रकार, हम लंब फत् और फै डालते हैं, जैसा कि आवृफति 3.10 में दिखाया गया है। आवृफति 3ण्10 आप पाते हैं कि ;पद्ध ल.अक्ष से बिन्दु च् की लांबिक दूरी, जिसे ग.अक्ष की ध्नात्मक दिशा में मापा गया है, च्छ त्र व्ड त्र 4 एकक है। ;पपद्ध ग.अक्ष से बिन्दु च् की लांबिक दूरी, जिसे ल.अक्ष की ध्नात्मक दिशा में मापा गया है, च्ड त्र व्छ त्र 3 एकक है। ;पपपद्ध ल.अक्ष से बिन्दु फ की लांबिक दूरी, जिसे ग.अक्ष की )णात्मक दिशा में मापा गया है, व्त् त्र ैफ त्र 6 एकक है। ;पअद्ध ग.अक्ष से बिन्दु फ की लांबिक दूरी, जिसे ल.अक्ष की )णात्मक दिशा मंे मापा गया है, व्ै त्र त्फ त्र 2 एकक है। इन दूरियों की सहायता से हम बिन्दुओं का निधर्रण किस प्रकार करें कि कोइर् भ्रम न रह जाए? हम निम्नलिख्िात परंपराओं को ध्यान में रखकर एक बिन्दु के निदेर्शांक लिखते हैंः ;पद्ध एक बिन्दु का ग .निदेर्शांक ;ग.बववतकपदंजमद्धए ल.अक्ष से इस बिन्दु की लांबिक दूरी है, जिसे ग .अक्ष पर मापा जाता है ;जो कि ग.अक्ष की ध्नात्मक दिशा में ध्नात्मक और ग.अक्ष की )णात्मक दिशा में )णात्मक होती हैद्ध। बिन्दु च् के लिए यह ़ 4 है और फ के लिए यह दृ 6 है। ग .निदेर्शांक को भुज ;ंइेबपेेंद्ध भी कहा जाता है। ;पपद्ध एक बिन्दु का ल.निदेर्शांक, ग.अक्ष से उसकी लांबिक दूरी होती है जिसे ल.अक्ष पर मापा जाता है ;जो ल.अक्ष की ध्नात्मक दिशा में ध्नात्मक और ल.अक्ष की )णात्मक दिशा में )णात्मक होती हैद्ध। बिन्दु च् के लिए यह ़ 3 है और फ के लिए दृ2 है। ल.निदेर्शांक को कोटि ;वतकपदंजमद्ध भी कहा जाता है। ;पपपद्ध निदेर्शांक तल में एक बिन्दु के निदेर्शांक लिखते समय पहले ग.निदेर्शांक लिखते हैं और उसके बाद ल.निदेर्शांक लिखते हैं। हम निदेर्शांकों को कोष्ठक के अंदर लिखते हैं। अतः च् के निदेर्शांक ;4ए 3द्ध हैं और फ के निदेर्शांक ;दृ 6ए दृ 2द्ध हैं। ध्यान दीजिए कि तल में एक बिन्दु के निदेर्शांक अद्वितीय होते हैं। इसके अनुसार निदेर्शांक ;3ए 4द्ध और निदेर्शांक ;4ए 3द्ध समान नहीं हैं। उदाहरण 1 रू नीचे दी गइर् आवृफति 3.11 को देखकर निम्नलिख्िात कथनों को पूरा कीजिएः ;पद्ध बिन्दु ठ का भुज और कोटि क्रमशः ऋ ऋ ऋ ऋ और ऋ ऋ ऋ ऋ हैं। अतः ठ के निदेर्शांक ;ऋ ऋ ऋए ऋ ऋ ऋद्ध हैं। ;पपद्ध बिन्दु ड के ग.निदेर्शांक और ल.निदेर्शांक क्रमशः ऋ ऋ ऋ और ऋ ऋ ऋ हैं। अतः ड के निदेर्शांक ;ऋ ऋए ऋ ऋद्ध हैं। ;पपपद्ध बिन्दु स् के ग.निदेर्शांक और ल.निदेर्शांक क्रमशः ऋ ऋ ऋ और ऋ ऋ ऋ हैं। अतः स् के निदेर्शांक ;ऋ ऋए ऋ ऋद्ध हैं। ;पअद्ध बिन्दु ै के ग.निदेर्शांक और ल.निदेर्शांक क्रमशः ऋ ऋ ऋ और ऋ ऋ ऋ हैं। अतः ै के निदेर्शांक ;ऋ ऋए ऋ ऋद्ध हैं। आकृति 3ण्11 हल रू ;पद्ध क्योंकि ल.अक्ष से बिन्दु ठ की दूरी 4 एकक है, इसलिए बिन्दु ठ का ग.निदेर्शांक या भुज 4 होगा। ग.अक्ष से बिन्दु ठ की दूरी 3 एकक है, इसलिए बिन्दु ठ का ल.निदेर्शांक अथार्त् कोटि 3 होगी। अतः बिन्दु ठ के निदेर्शांक ;4, 3द्ध हैं। ऊपर ;पद्ध की भांतिः ;पपद्ध बिन्दु ड के ग.निदेर्शांक और ल.निदेर्शांक क्रमशः दृ3 और 4 हैं। अतः बिन्दु ड के निदेर्शांक;दृ3ए 4द्ध हैं। ;पपपद्ध बिन्दु स् के ग.निदेर्शांक और ल .निदेर्शांक क्रमशः दृ5 और दृ 4 हैं। अतः बिन्दु स् के निदेर्शांक ;दृ5ए दृ 4द्ध हैं। ;पअद्ध बिन्दु ै के ग.निदेर्शांक और ल.निदेर्शांक क्रमशः 3 और दृ 4 है। अतः बिन्दु ै के निदेर्शांक ;3ए दृ 4द्ध हैं। उदाहरण 2 रू आवृफति 3ण्12 में अक्षों पर अंकित बिन्दुओं के निदेर्शांक लिख्िाएः हल रू आप यहाँ देख सकते हैं कि: ;पद्ध बिन्दु ।ए ल.अक्ष से ़ 4 एकक की दूरी पर है और ग.अक्ष से दूरी 0 पर है। अतः बिन्दु । का ग.निदेर्शांक 4 है और ल.निदेर्शांक 0 है। इसलिए । के निदेर्शांक ;4ए 0द्ध हैं। ;पपद्ध ठ के निदेर्शांक ;0ए 3द्ध हैं। क्यों? ;पपपद्ध ब् के निदेर्शांक ;दृ 5ए 0द्ध हैं। क्यों? ;पअद्ध क् के निदेर्शांक ;0ए दृ 4द्ध हैं। क्यों? ;अद्ध म् के निदेर्शांक  ए0 हैं। क्यों? आकृति 3.12 2  3  क्योंकि ग.अक्ष का प्रत्येक बिन्दु ग.अक्ष से शून्य दूरी पर है, इसलिए ग.अक्ष पर स्िथत प्रत्येक बिन्दु का ल.निदेर्शांक सदा ही शून्य होगा। इस तरह, ग.अक्ष पर स्िथत किसी भी बिन्दु के निदेर्शांक ;गए 0द्ध के रूप के होंगे, जहाँ ल.अक्ष से बिन्दु की दूरी ग है। इसी प्रकार, ल.अक्ष पर स्िथत किसी भी बिन्दु के निदेर्शांक ;0ए लद्ध के रूप के होंगे, जहाँ ग.अक्ष से बिन्दु की दूरी ल है। क्यों? मूलबिन्दुव् के निदेर्शांक क्या हैं? क्योंकि दोनों अक्षों से इसकी दूरी शून्य है, इसलिए इसके भुज और कोटि दोनों ही शून्य होंगे। अतः मूलबिन्दु के निदेर्शांक ;0ए 0द्ध होते हैं। ऊपर के उदाहरणों में, आपने एक बिन्दु के निदेर्शांकों में लगे चिÉों और उस बिन्दु के चतुथा±श, जिसमें वह स्िथत है, के बीच के निम्नलिख्िात संबंधें की ओर अवश्य ध्यान दिया होगाः ;पद्ध यदि बिन्दु पहले चतुथा±श में है, तो बिन्दु ;़ए ़द्ध के रूप का होगा, क्योंकि पहला चतुथा±श ध्नात्मक ग.अक्ष और ध्नात्मक ल.अक्ष से परिब( है। ;पपद्ध यदि बिन्दु दूसरे चतुथा±श में है, तो बिन्दु ;दृए ़द्ध के रूप का होगा, क्योंकि दूसरा चतुथा±श )णात्मक ग.अक्ष और ध्नात्मक ल.अक्ष से परिब( है। ;पपपद्ध यदि बिन्दु तीसरे चतुथा±श में है, तो बिन्दु ;दृए दृद्ध के रूप में होगा, क्योंकि तीसरा चतुथा±श )णात्मक ग.अक्ष और )णात्मक ल.अक्ष से परिब( है। ;पअद्ध यदि बिन्दु चैथे चतुथा±श में है, तो बिन्दु ;़ए दृद्ध के रूप में होगा, क्योंकि चैथा चतुथा±श ध्नात्मक ग.अक्ष और )णात्मक ल.अक्ष से परिब( है ;देख्िाए आवृफति 3.13द्ध। आवृफति 3ण्13 टिप्पणी रू एक तल में स्िथत एक बिन्दु की व्याख्या करने के संबंध् में ऊपर हमने जिस प(ति के बारे में चचार् की है, वह केवल एक परंपरा है जिसको पूरे विश्व में स्वीकार किया जाता है। उदाहरण के लिए, प(ति में ऐसा भी हो सकता है कि पहले कोटि लिखी जाए और उसके बाद भुज लिखा जाए। पिफर भी, जिस प(ति का उल्लेख हमने किया है उसे पूरा विश्व बिना किसी भ्रम के स्वीकार करता है। प्रश्नावली 3ण्2 1ण् निम्नलिख्िात प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दीजिएः ;पद्ध कातीर्य तल में किसी बिन्दु की स्िथति निधर्रित करने वाली क्षैतिज और ऊध्वार्ध्र रेखाओं के क्या नाम हैं? ;पपद्ध इन दो रेखाओं से बने तल के प्रत्येक भाग के नाम बताइए। ;पपपद्ध उस बिन्दु का नाम बताइए जहाँ ये दो रेखाएँ प्रतिच्छेदित होती हैं। 2ण् आवृफति 3.14 देखकर निम्नलिख्िात को लिख्िाएः ;पद्ध ठ के निदेर्शांक ;पपद्ध ब् के निदेर्शांक ;पपपद्ध निदेर्शांक ;दृ3ए दृ5द्ध द्वारा पहचाना गया बिन्दु ;पअद्ध निदेर्शांक ;2ए दृ 4द्ध द्वारा पहचाना गया बिन्दु ;अद्ध क् का भुज ;अपद्ध बिन्दु भ् वफी कोटि ;अपपद्ध बिन्दु स् के निदेर्शांक ;अपपपद्ध बिन्दु ड के निदेर्शांक 3ण्3 तल में एक बिन्दु आलेख्िात करना जबकि इसके निदेर्शांक दिए हुए हों अभी तक हमने आपके लिए बिन्दु खींचे हैं और आपसे उनके निदेर्शांक बताने के लिए कहा है। अब हम आपको यह दशार्एँगे कि तल में इन बिन्दुओं को किस प्रकार अंकित करते हैं जबकि इनके निदेर्शांक हमें ज्ञात हों। इस प्रक्रम को हम फ्बिन्दु का आलेखनय् ;चसवजजपदह जीम चवपदजद्ध कहते हैं। मान लीजिए एक बिन्दु के निदेर्शांक ;3, 5द्ध हैं। हम इस बिन्दु को निदेर्शांक तल में आलेख्िात करना चाहते हैं। हम निदेर्शांक अक्ष खींचते हैं और अपने एककों का चयन इस प्रकार करते हैं कि दोनों अक्षों पर एक सेंटीमीटर एक एकक को निरूपित करता हो। बिन्दु ;3, 5द्ध के निदेर्शांक से हमें यह पता चलता है कि ध्नात्मक ग.अक्ष पर इस बिन्दु की ल.अक्ष से दूरी 3 एकक है और ध्नात्मक ल.अक्ष पर इस बिन्दु की ग.अक्ष से दूरी 5 एकक है। मूलबिन्दु व् से प्रारंभ करके हम ध्नात्मक ग.अक्ष पर 3 एकक की गिनती करते हैं और संगत बिन्दु को । के रूप में अंकित करते हैं। अब । से प्रारंभ करके हम ल.अक्ष की ध्नात्मक दिशा में चलते हैं और 5 एकक की गिनती करते हैं तथा संगत बिन्दु को च् के रूप में अंकित करते हैं ;देख्िाए आवृफति 3.15द्ध। आप यहाँ यह देखते हैं कि ल.अक्ष से च् की दूरी 3 एकक है और ग .अक्ष से 5 एकक है। अतः च् विचाराध्ीन बिन्दु की स्िथति है। ध्यान दीजिए कि च् पहले चतुथा±श में स्िथत है, क्यांेंकि च् के दोनों निदेर्शांक ध्नात्मक हैं। इसी प्रकार आप निदेर्शांक तल में बिन्दु फ ;5ए दृ 4द्ध आलेख्िात कर सकते हैं। )णात्मक ल.अक्ष के अनुदिश ग.अक्ष से फ की दूरी 4 एकक है जिससे कि इसका ल.निदेर्शांक दृ 4 है ;देख्िाए आवृफति 3.15द्ध। बिन्दु फ चैथे चतुथा±श में स्िथत है। क्यों? उदाहरण 3 रू कातीर्य तल में बिन्दुओं ;5ए 0द्धए ;0ए 5द्धए ;2ए 5द्धए ;5ए 2द्धए ;दृ3ए 5द्धए ;दृ3ए दृ5द्धए ;5ए दृ3द्ध और ;6ए 1द्ध का स्थान निधर्रण कीजिए। हल रू 1बउ त्र 1 एकक लेकर हम ग.अक्ष और ल.अक्ष खींचते हैं। बिन्दुओं की स्िथतियों को आवृफति 3.16 में गहरे बिन्दुओं से दिखाया गया है। आवृफति 3ण्16 नोट रू ऊपर दिए गए उदाहरण में हम यह देखते हैं कि ;5ए 0द्ध और ;0ए 5द्ध समान नहीं हैं। इसी प्रकार, ;5ए 2द्ध और ;2ए 5द्ध अलग - अलग स्िथतियाँ हैं और ;दृ3ए 5द्ध और ;5ए दृ3द्ध भ्िान्न - भ्िान्न स्िथतियाँ हैं। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण लेने पर आप यह देखेंगे कि यदि ग ≠ ल हो, तोे कातीर्य तल में ;गए लद्ध की स्िथति ;लए गद्ध की स्िथति से भ्िान्न होती है। अतः यदि हम निदेर्शांकों ग और ल में अदला - बदली करें, तो ;लए गद्ध की स्िथति ;गए लद्ध की स्िथति से भ्िान्न हो जाएगी। इससे यह अथर् निकलता है कि ;गए लद्ध में ग और ल के क्रम का कापफी महत्व होता है। अतः ;गए लद्ध को क्रमित युग्म ;वतकमतमक चंपतद्ध कहा जाता है। क्रमित युग्म ;गए लद्ध ≠ क्रमित युग्म ;लए गद्धए यदि ग ≠ ल है और ;गए लद्ध त्र ;लए गद्धए यदि ग त्र ल है। उदाहरण 4 रू निम्नलिख्िात संख्या - युग्मों को कातीर्य तल के बिन्दुओं के रूप में आलेख्िात कीजिए। अक्षों पर पैमाना 1 सेंटीमीटर त्र 1 एकक लीजिए। ग दृ 3 0 दृ 1 4 2 ल 7 दृ3ण्5 दृ 3 4 दृ 3 हलरू सारणी में दिए गए संख्या - युग्मों को बिन्दुओं ;दृ 3ए 7द्धए ;0ए दृ3ण्5द्धए ;दृ 1ए दृ 3द्धए ;4ए 4द्ध और ;2ए दृ3द्ध से निरूपित किया जा सकता है। बिन्दुओं के स्थानों को आवृफति 3ण्17 में गहरे बिन्दुओं आवृफति 3ण्17 ियाकलाप 2 रू दो व्यक्ितयों का एक खेल। ;आवश्यक वस्तुएँ - दो काउंटर या सिक्के, ग्रापफ पेपर, अलग - अलग रंगों के दो पासे, मान लीजिए लाल और हरे रंग के दो पासेद्ध। प्रत्येक काउंटर को ;0ए 0द्ध पर रख्िाए। प्रत्येक ख्िालाड़ी एक साथ दो पासे पेंफकती हैं। जब पहली ख्िालाड़ी ऐसा करती है, तो मान लीजिए लाल पासे पर 3 आता है और हरे पासे पर 1 आता है। अतः वह अपना काउंटर ;3ए 1द्ध की ओर ले जाती है। इसी प्रकार, यदि दूसरी ख्िालाड़ी लाल पर 2 और हरे पर 4 पेंफकती है, तो वह अपना काउंटर ;2ए 4द्ध की ओर ले जाती है। दूसरी बार पेंफकने पर यदि पहली ख्िालाड़ी लाल पर 1 और हरे पर 4 पेंफकती है, तो वह अपना काउंटर ;3ए 1द्ध से ;3 ़ 1ए 1 ़ 4द्ध की ओर ले जाती है। अथार्त् ;3, 1द्ध केग.निदेर्शांक में 1 जोड़ देती है और ल.निदेर्शांक में 4 जोड़ देती है। इस खेल का उद्देश्य सीमा लाँघे बिना पहले ;10, 10द्ध पर पहुँचना है, अथार्त् न तो भुज और न ही कोटि 10 से अध्िक हो सकती है। ध्यान रहे कि एक काउंटर की स्िथति दूसरे काउंटर की स्िथति के साथ संपाती नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि पहली ख्िालाड़ी का काउंटर उस बिन्दु की ओर गतिमान होता है जहाँ पहले से ही दूसरी ख्िालाड़ी का काउंटर स्िथत है, तो दूसरी ख्िालाड़ी का काउंटर ;0, 0द्ध पर आ जाएगा। यदि सीमा लाँघे बिना चाल चलना संभव नहीं है, तो ख्िालाड़ी से वह बारी छूट जाती है। इस खेल को अध्िक संख्या में अपनी सहेलियों को लेकर आप खेल सकती हैं। टिप्पणी रू कातीर्य तल में बिन्दुओं के आलेखन की तुलना वुफछ सीमा तक समय - दूरी ग्रापफ, भुजा - परिमाप ग्रापफ, आदि जिनका अध्ययन आप पिछली कक्षाओं में कर चुके हैं, जैसी विभ्िान्न स्िथतियों से की जा सकती है। ऐसी स्िथति में, ग.अक्ष और ल.अक्ष के स्थान पर अक्षों को ज.अक्ष, क.अक्षए े.अक्ष या च.अक्ष आदि कह सकते हैं। प्रश्नावली 3ण्3 1ण् किस चतुथा±श में या किस अक्ष पर बिन्दु ;दृ 2ए 4द्धए ;3ए दृ 1द्धए ;दृ 1ए 0द्धए ;1ए 2द्ध और ;दृ 3ए दृ 5द्ध स्िथत हैं? कातीर्य तल पर इनका स्थान निधर्रण करके अपने उत्तर सत्यापित कीजिए। 2ण् अक्षों पर दूरी का उपयुक्त एकक लेकर नीचे सारणी में दिए गए बिन्दुओं को तल पर आलेख्िात कीजिएः ग दृ 2 दृ1 0 1 3 ल 8 7 दृ 1ण्25 3 दृ 1 3ण्4 सारांश इस अध्याय में, आपने निम्नलिख्िात बिन्दुओं का अध्ययन किया हैः 1ण् एक तल में एक वस्तु या एक बिन्दु का स्थान निधर्रण करने के लिए दो लांबिक रेखाओंकी आवश्यकता होती है जिसमें एक क्षैतिज होती है और दूसरी ऊध्वार्ध्र होती है। 2ण् तल को कातीर्य या निदेर्शांक तल कहा जाता है और रेखाओं को निदेर्शांक अक्ष कहा जाता है। 3ण् क्षैतिज रेखा को ग .अक्ष और ऊध्वार्ध्र रेखा को ल.अक्ष कहा जाता है। 4ण् निदेर्शांक अक्ष तल को चार भागों में बाँट देते हैं, जिन्हें चतुथा±श कहा जाता है। 5ण् अक्षों के प्रतिच्छेद बिन्दु को मूलबिन्दु कहा जाता है। 6ण् ल .अक्ष से किसी बिन्दु की दूरी को उसका ग.निदेर्शांक या भुज कहा जाता है। साथ ही, ग.अक्ष से बिन्दु की दूरी को ल.निदेर्शांक या कोटि कहा जाता है। 7ण् यदि एक बिन्दु का भुज ग हो और कोटि ल हो, तो ;गए लद्ध को बिन्दु के निदेर्शांक कहा जाता है। 8ण् ग.अक्ष पर एक बिन्दु के निदेर्शांक ;गए 0द्ध के रूप के होते हैं और ल.अक्ष पर बिन्दु के निदेर्शांक ;0ए लद्ध के रूप के होते हैं। 9ण् मूलबिन्दु के निदेर्शांक;0ए 0द्ध होते हैं। 10ण् एक बिन्दु के निदेर्शांक पहले चतुथा±श मंें ;़ ए ़द्ध के रूप के दूसरे चतुथा±श में ;दृए ़द्ध के रूप के, तीसरे चतुथा±श में ;दृए दृद्ध के रूप के और चैथे चतुथा±श में ;़ए दृद्ध के रूप के होते हैं, जहाँ ़ एक ध्नात्मक वास्तविक संख्या को और दृ एक )णात्मक वास्तविक संख्या को प्रकट करते हैं। 11ण् यदि ग ≠ ल हो, तो ;गए लद्ध ≠ ;लए गद्ध होगा और यदि ग त्र ल हो, तो;गए लद्धत्र ;लए गद्ध होगा।

>Chap-3>

अध्याय 3

निर्देशांक ज्यामिति

What’s the good of Mercator’s North Poles and Equators, Tropics, Zones and Meridian Lines? So the Bellman would cry; and crew would reply ‘ They are merely conventional signs!’

(मरकेटर के उत्तरी ध्रुवों और विषुवत वृत्तों, उष्ण कटिबंधों, मंडलों और यामोत्तर रेखाओं में क्या अच्छाई है? इसलिए बेलमैन ने शोर मचाया होगा और नाविक दल ने उत्तर दिया होगा, ‘‘ये केवल परंपरागत चिह्न हैं’’।)

LEWIS CARROLL, The Hunting of the Snark

3.1 भूमिका

आप यह पढ़ चुके हैं कि एक संख्या रेखा पर एक बिन्दु का स्थान निर्धारण किस प्रकार किया जाता है। आप यह भी पढ़ चुके हैं कि एक रेखा पर एक बिन्दु की स्थिति की व्याख्या किस प्रकार की जाती है। एेसी अनेक स्थितियाँ हैं जिनमेें एक बिन्दु ज्ञात करने के लिए हमें एक से अधिक रेखाओं के संदर्भ में उसकी स्थिति की व्याख्या करनी होती है। उदाहरण के लिए, निम्नलिखित स्थितियों पर विचार कीजिएः


आकृति 3.1

I. आकृति 3.1 में एक मुख्य मार्ग है जो पूर्व से पश्चिम की ओर जाता है और इस पर कुछ सड़कें बनी हैं, इनकी सड़क (मार्ग) संख्याएँ पश्चिम से पूर्व की ओर दी गई हैं।

प्रत्येक सड़क (मार्ग) पर बने मकानों पर संख्याएँ अंकित कर दी गई हैं। आपको यहाँ अपनी सहेली के मकान का पता लगाना है। क्या इसके लिए केवल एक निर्देश-बिन्दु का ज्ञात होना पर्याप्त होगा? उदाहरण के लिए, यदि हमें केवल यह ज्ञात हो कि वह सड़क 2 पर रहती है तो क्या हम उसके घर का पता सरलता से लगा सकते हैं? उतनी सरलता से नहीं जितनी सरलता से तब जबकि हमें दो जानकारियाँ अर्थात् सड़क की वह संख्या जिस पर उसका मकान है और मकान की संख्या ज्ञात होने पर होती है। यदि आप उस मकान पर जाना चाहते हैं जो सड़क 2 पर स्थित है और जिसकी संख्या 5 है, तो सबसे पहले आपको यह पता लगाना होगा कि सड़क 2 कौन-सी है और तब उस मकान का पता लगाना होता है जिसकी संख्या 5 है। आकृति 3.1 में H इसी मकान का स्थान दर्शाता है। इसी प्रकार, P उस मकान को दर्शाता है जो सड़क संख्या 7 पर है और जिसकी संख्या 4 है।

II. मान लीजिए आप एक कागज की शीट पर एक बिन्दु लगा देते हैं [आकृति 3.2 (a)]। यदि हम आपसे कागज़ पर लगे बिन्दु की स्थिति के बारे में पूछें, तो आप इसे कैसे बताएँगे? संभवतः आप इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दें ः "बिन्दु कागज़ के आधे के ऊपरी भाग में स्थित है" या ‘‘यह भी कह सकते हैं कि यह बिन्दु कागज़ की बायीं कोर के निकट स्थित है’’ या ‘‘यह बिन्दु कागज़ की बायीं ओर के ऊपरी कोने के काफी निकट स्थित है।" क्या ऊपर दिए गए कथनों में से किसी भी कथन के आधार पर आप बिन्दु की ठीक-ठीक स्थिति बता सकते हैं? स्पष्ट है कि उत्तर ‘‘नहीं’’ है। परन्तु, यदि आप यह कहें कि "बिन्दु कागज़ की बायीं कोर से लगभग 5 cm दूर है, तो इससे आपको बिन्दु की स्थिति का आभास तो हो जाता है फिर भी ठीक-ठाक स्थिति का पता नहीं चलता। थोड़ा बहुत सोच-विचार के बाद आप यह कह सकते हैं कि सबसे नीचे वाली रेखा से बिन्दु 9 cm की दूरी पर है। अब हम बिन्दु की स्थिति ठीक-ठाक बता सकते हैं।

आकृति 3.2

इसके लिए हम दो नियत रेखाओं अर्थात् कागज की बायीं कोर और कागज़ की सबसे नीचे वाली रेखा से बिन्दु की स्थिति नियत करते हैं [आकृति 3.2 (b)]। दूसरे शब्दों में, हम यह कह सकते हैं कि बिन्दु की स्थिति ज्ञात करने के लिए दो स्वतंत्र सूचनाओं का होना आवश्यक होता है।

अब आप कक्षा में "बैठने की योजना" नामक निम्नलिखित क्रियाकलाप कीजिएः

क्रियाकलाप 1 (बैठने की योजना) : सभी मेज़ों को एक साथ खींचकर अपनी कक्षा में बैठने की एक योजना बनाइए। प्रत्येक मेज़ को एक वर्ग से निरूपित कीजिए। प्रत्येक वर्ग में उस विद्यार्थी का नाम लिखिए जिस पर वह बैठता है और जिसे वह वर्ग निरूपित करता है। कक्षा में प्रत्येक विद्यार्थी की स्थिति का ठीक-ठीक निर्धारण निम्नलिखित दो सूचनाओं की सहायता से किया जाता है।

(i) वह स्तंभ जिसमें वह बैठता / बैठती है।

(ii) वह पंक्ति जिसमें वह बैठता / बैठती है।

यदि आप उस मेज़ पर बैठते हैं जो 5वें स्तंभ और तीसरी पंक्ति में है, जिसे आकृति 3.3 में छायित वर्ग से दिखाया गया है, तो आपकी स्थिति को (5, 3) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, जहाँ पहली संख्या स्तंभ संख्या को प्रकट करती है और दूसरी संख्या पंक्ति संख्या को प्रकट करती है। क्या यह वही है जो कि (3, 5) है? आप अपनी कक्षा के अन्य विद्यार्थियों के नाम और उनके बैठने की स्थितियाँ लिखें। उदाहरण के लिए, यदि सोनिया चौथे स्तंभ और पहली पंक्ति में बैठती है, तो उसके लिए S(4, 1) लिखिए। शिक्षक की मेज़ आपके बैठने की योजना के अंतर्गत नहीं आती है। यहाँ हम शिक्षक को केवल एक प्रेक्षक ही मानते हैं।

आकृति 3.3

ऊपर की चर्चा में आपने यह देखा है कि एक तल पर रखी हुई किसी वस्तु की स्थिति दो लंब रेखाओं की सहायता से निरूपित की जा सकती है। यदि वस्तु एक बिन्दु है, तो हमें सबसे नीचे वाली रेखा से और कागज की बायीं कोर से बिन्दु की दूरी ज्ञात होना आवश्यक होता है। ‘‘बैठने की योजना’’ के संबंध में हमें स्तंभ की संख्या और पंक्ति की संख्या का जानना आवश्यक होता है। इस सरल विचारधारा के दूरगामी परिणाम होते हैं और इससे गणित की निर्देशांक ज्यामिति (Coordinate Geometry) नामक एक अति महत्वपूर्ण शाखा की व्युत्पत्ति हुई। इस अध्याय में, हमारा लक्ष्य निर्देशांक ज्यामिति की कुछ आधारभूत संकल्पनाओं से आपको परिचित कराना है। इसके बारे में आप विस्तार से अध्ययन उच्च कक्षाओं में करेंगे। प्रारंभ में फ्रांसीसी दार्शनिक और गणितज्ञ रेने दकार्ते ने इस अध्ययन को विकसित किया था।


रेने दकार्ते (1596 -1650)

आकृति 3.4

कुछ लोग प्रातःकाल में बिस्तर पर लेटे रहना पसंद करते हैं। यही आदत सत्रहवीं शताब्दी के महान फ्रांसीसी गणितज्ञ रेने दकार्ते की थी। परन्तु वह आलसी व्यक्ति नहीं था, वह यह समझता था कि बिस्तर पर पड़े-पड़े ही अधिक चिंतन किया जा सकता है। एक दिन जबकि वह अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे आराम कर रहा था, उसने एक तल में एक बिन्दु की स्थिति का निर्धारण करने से संबंधित समस्या का हल ढूँढ़ निकाला। जैसाकि आप देखेंगे उसकी विधि अक्षांश और देशांतर की पुरानी विचारधारा की ही एक विकसित रूप थी। एक तल की एक बिन्दु की स्थिति का निर्धारण करने में प्रयुक्त पद्धति को दकार्ते के सम्मान में कार्तीय पद्धति (Cartesian System) भी कहा जाता है।

प्रश्नावली 3.1

1. एक अन्य व्यक्ति को आप अपने अध्ययन मेज पर रखे टेबल लैंप की स्थिति किस तरह बताएँगे?

2. (सड़क योजना) : एक नगर में दो मुख्य सड़कें हैं, जो नगर के केन्द्र पर मिलती हैं। ये दो सड़कें उत्तर-दक्षिण की दिशा और पूर्व-पश्चिम की दिशा में हैं। नगर की अन्य सभी सड़कें इन मुख्य सड़कों के समांतर परस्पर 200 मीटर की दूरी पर हैं। प्रत्येक दिशा में लगभग पाँच सड़कें हैं। 1 सेंटीमीटर = 200 मीटर का पैमाना लेकर अपनी नोट बुक में नगर का एक मॉडल बनाइए। सड़कों को एकल रेखाओं से निरूपित कीजिए।

आपके मॉडल में एक-दूसरे को काटती हुई अनेक क्रॉस-स्ट्रीट (चौराहे) हो सकती हैं। एक विशेष क्रॉस-स्ट्रीट दो सड़कों से बनी है, जिनमें से एक उत्तर-दक्षिण दिशा में जाती है और दूसरी पूर्व-पश्चिम की दिशा में। प्रत्येक क्रॉस-स्ट्रीट का निर्देशन इस प्रकार किया जाता हैः यदि दूसरी सड़क उत्तर-दक्षिण दिशा में जाती है और पाँचवीं सड़क पूर्व-पश्चिम दिशा में जाती है और ये एक क्रॉसिंग पर मिलती हैं, तब इसे हम क्रॉस-स्ट्रीट (2, 5) कहेंगे। इसी परंपरा से यह ज्ञात कीजिए कि

(i) कितनी क्रॉस-स्ट्रीटों को (4, 3) माना जा सकता है।

(ii) कितनी क्रॉस-स्ट्रीटों को (3, 4) माना जा सकता है।

3.2 कार्तीय पद्धति

‘संख्या पद्धति’ के अध्याय में आप संख्या रेखा के बारे में पढ़ चुके हैं। संख्या रेखा पर एक नियत बिन्दु से दूरियों को बराबर एककों में एक दिशा में धनात्मक और दूसरी दिशा में ऋणात्मक अंकित किया जाता है। उस बिन्दु को, जहाँ से दूरियाँ अंकित की जाती हैं, मूल- बिन्दु (origin) कहा जाता है। एक रेखा पर समान दूरियों पर बिन्दुओं को अंकित करके, हम संख्या रेखा का प्रयोग संख्याओं को निरूपित करने के लिए करते हैं। यदि एक एकक दूरी संख्या ‘1’ को निरूपित करती हो, तो 3 एकक दूरी संख्या ‘3’ को निरूपित करेगी, जहाँ 'O' मूलबिन्दु है। मूलबिन्दु से धनात्मक दिशा में दूरी r पर स्थित बिन्दु संख्या r को निरूपित करती है। मूलबिन्दु से ऋणात्मक दिशा में दूरी r पर स्थित बिन्दु संख्या r को निरूपित करती है। संख्या रेखा पर विभिन्न संख्याओं के स्थान आकृति 3.5 में दिखाए गए हैं।

आकृति 3.5

दकार्ते ने एक तल पर एक दूसरे पर लंब दो रेखाओं को खींचने और इन रेखाओं के सापेक्ष तल पर बिन्दुओं का स्थान निर्धारण करने का विचार प्रस्तुत किया। लंब रेखाएँ किसी भी दिशा में हो सकती हैं, जैसा कि आकृति 3.6 में दिखाया गया है। लेकिन जब हम इस अध्याय मेें एक तल में स्थित एक बिन्दु का स्थान निर्धारण करने के लिए दो रेखाएँ लेंगे, तो एक रेखा क्षैतिज होगी और दूसरी रेखा ऊर्ध्वाधर, जैसा कि आकृति 3.6 (c) में दिखाया गया है।

आकृति 3.6

वास्तव में ये रेखाएँ इस प्रकार प्राप्त की जाती हैं : दो संख्या रेखाएँ लीजिए और उन्हें XX और YY का नाम दे दीजिए। XX को क्षैतिज रखिए [जैसा कि आकृति 3.7(a) में दिखाया गया है] और इस पर ठीक उसी प्रकार संख्याएँ लिखिए जैसा कि संख्या रेखा पर लिखी जाती हैं। ये ही सभी क्रियाएँ आप YY के साथ कीजिए। अंतर केवल यही है कि YY क्षैतिज नहीं है, अपितु ऊर्ध्वाधर है [देखिए आकृति 3.7 (b)]।

आकृति 3.7

दोनों रेखाओं का संयोजन इस प्रकार कीजिए कि ये दो रेखाएँ एक-दूसरे को मूलबिन्दु पर काटती हों (आकृति 3.8)। क्षैतिज रेखा XX को x - अक्ष कहा जाता है और ऊर्ध्वाधर रेखा YY को y - अक्ष कहा जाता है। वह बिन्दु, जहाँ XX और YY एक-दूसरे को काटती हैं, उसे मूलबिन्दु (origin) कहा जाता है और इसे O से प्रकट किया जाता है। क्योंकि धनात्मक संख्याएँ OX और OY की दिशाओं में स्थित हैं, इसलिए OX और OY को क्रमशः x-अक्ष और y-अक्ष की धनात्मक दिशाएँ कहा जाता है। इसी प्रकार, OX और OY को x-अक्ष और y-अक्ष की क्रमशः ऋणात्मक दिशाएँ कहा जाता है।

यहाँ आप यह देखते हैं कि ये दोनों अक्ष तल को चार भागों में विभाजित करती हैं। इन चार भागों को चतुर्थांश (quadrants) (एक-चौथाई) कहा जाता है। OX से वामावर्त दिशा में इन्हें I, II, III और IV चतुर्थांश कहा जाता है (देखिए आकृति 3.9)। इस प्रकार, इस तल में दोनों अक्ष और चारों चतुर्थांश सम्मिलित हैं। हम इस तल को कार्तीय तल (Cartesian plane) या निर्देशांक तल (Coordinate plane) या xy-तल (xy-plane) कहते हैं। अक्षों को निर्देशांक अक्ष (coordinate axes) कहा जाता है।

आकृति 3.8

आकृति 3.9

आइए अब हम यह देखें कि गणित में इस पद्धति का इतना महत्व क्यों है और यह किस प्रकार उपयोगी होती है। आगे दिया गया आरेख लीजिए, जहाँ अक्षों को आलेख कागज (graph paper) पर खींचा गया है। आइए हम अक्षों से बिन्दुओं P और Q की दूरियाँ ज्ञात करें। इसके लिए x-अक्ष पर लंब PM और y-अक्ष पर लंब PN डालिए। इसी प्रकार, हम लंब QR और QS डालते हैं, जैसा कि आकृति 3.10 में दिखाया गया है।

आकृति 3.10

आप पाते हैं कि

(i) y-अक्ष से बिन्दु P की लांबिक दूरी, जिसे x-अक्ष की धनात्मक दिशा में मापा गया है, PN = OM = 4 एकक है।

(ii) x-अक्ष से बिन्दु P की लांबिक दूरी, जिसे y-अक्ष की धनात्मक दिशा में मापा गया है, PM = ON = 3 एकक है।

(iii) y-अक्ष से बिन्दु Q की लांबिक दूरी, जिसे x-अक्ष की ऋणात्मक दिशा में मापा गया है, OR = SQ = 6 एकक है।

(iv) x-अक्ष से बिन्दु Q की लांबिक दूरी, जिसे y-अक्ष की ऋणात्मक दिशा में मापा गया है, OS = RQ = 2 एकक है।

इन दूरियों की सहायता से हम बिन्दुओं का निर्धारण किस प्रकार करें कि कोई भ्रम न रह जाए?

हम निम्नलिखित परंपराओं को ध्यान में रखकर एक बिन्दु के निर्देशांक लिखते हैंः

(i) एक बिन्दु का x - निर्देशांक (x-coordinate), y-अक्ष से इस बिन्दु की लांबिक दूरी है, जिसे x -अक्ष पर मापा जाता है (जो कि x-अक्ष की धनात्मक दिशा में धनात्मक और x-अक्ष की ऋणात्मक दिशा में ऋणात्मक होती है)। बिन्दु P के लिए यह + 4 है और Q के लिए यह – 6 है। x - निर्देशांक को भुज (abscissa) भी कहा जाता है।

(ii) एक बिन्दु का y-निर्देशांक, x-अक्ष से उसकी लांबिक दूरी होती है जिसे y-अक्ष पर मापा जाता है (जो y-अक्ष की धनात्मक दिशा में धनात्मक और y-अक्ष की ऋणात्मक दिशा में ऋणात्मक होती है)। बिन्दु P के लिए यह + 3 है और Q के लिए –2 है। y-निर्देशांक को कोटि (ordinate) भी कहा जाता है।

(iii) निर्देशांक तल में एक बिन्दु के निर्देशांक लिखते समय पहले x-निर्देशांक लिखते हैं और उसके बाद y-निर्देशांक लिखते हैं। हम निर्देशांकों को कोष्ठक के अंदर लिखते हैं।

अतः P के निर्देशांक (4, 3) हैं और Q के निर्देशांक (– 6, – 2) हैं।

ध्यान दीजिए कि तल में एक बिन्दु के निर्देशांक अद्वितीय होते हैं। इसके अनुसार निर्देशांक (3, 4) और निर्देशांक (4, 3) समान नहीं हैं।

उदाहरण 1 : नीचे दी गई आकृति 3.11 को देखकर निम्नलिखित कथनों को पूरा कीजिएः

(i) बिन्दु B का भुज और कोटि क्रमशः _ _ _ _ और _ _ _ _ हैं। अतः B के निर्देशांक
(_ _ _, _ _ _) हैं।

(ii) बिन्दु M के x-निर्देशांक और y-निर्देशांक क्रमशः _ _ _ और _ _ _ हैं। अतः M के निर्देशांक (_ _, _ _) हैं।

(iii) बिन्दु L के x-निर्देशांक और y-निर्देशांक क्रमशः _ _ _ और _ _ _ हैं। अतः L के निर्देशांक (_ _, _ _) हैं।

(iv) बिन्दु S के x-निर्देशांक और y-निर्देशांक क्रमशः _ _ _ और _ _ _ हैं। अतः S के निर्देशांक (_ _, _ _) हैं।

आकृति 3.11

हल : (i) क्योंकि y-अक्ष से बिन्दु B की दूरी 4 एकक है, इसलिए बिन्दु B का x-निर्देशांक या भुज 4 होगा। x-अक्ष से बिन्दु B की दूरी 3 एकक है, इसलिए बिन्दु B का y-निर्देशांक अर्थात् कोटि 3 होगी। अतः बिन्दु B के निर्देशांक (4, 3) हैं।

ऊपर (i) की भांतिः

(ii) बिन्दु M के x-निर्देशांक और y-निर्देशांक क्रमशः –3 और 4 हैं। अतः बिन्दु M के निर्देशांक (–3, 4) हैं।

(iii) बिन्दु L के x-निर्देशांक और y - निर्देशांक क्रमशः –5 और – 4 हैं। अतः बिन्दु L के निर्देशांक (–5, – 4) हैं।

(iv) बिन्दु S के x-निर्देशांक और y- निर्देशांक क्रमशः 3 और – 4 है। अतः बिन्दु S के निर्देशांक (3, – 4) हैं।

उदाहरण 2 : आकृति 3.12 में अक्षों पर अंकित बिन्दुओं के निर्देशांक लिखिएः

हल : आप यहाँ देख सकते हैं कि :

(i) बिन्दु A, y-अक्ष से + 4 एकक की दूरी पर है और x-अक्ष से दूरी 0 पर है। अतः बिन्दु A का x-निर्देशांक 4 है और y-निर्देशांक 0 है। इसलिए A के निर्देशांक (4, 0) हैं।

आकृति 3.12

(ii) B के निर्देशांक (0, 3) हैं। क्यों?

(iii) C के निर्देशांक (– 5, 0) हैं। क्यों?

(iv) D के निर्देशांक (0, – 4) हैं। क्यों?

(v) E के निर्देशांक हैं। क्यों?

क्योंकि x-अक्ष का प्रत्येक बिन्दु x-अक्ष से शून्य दूरी पर है, इसलिए x-अक्ष पर स्थित प्रत्येक बिन्दु का y-निर्देशांक सदा ही शून्य होगा। इस तरह, x-अक्ष पर स्थित किसी भी बिन्दु के निर्देशांक (x, 0) के रूप के होंगे, जहाँ y-अक्ष से बिन्दु की दूरी x है। इसी प्रकार, y-अक्ष पर स्थित किसी भी बिन्दु के निर्देशांक (0, y) के रूप के होंगे, जहाँ x-अक्ष से बिन्दु की दूरी y है। क्यों?

मूलबिन्दु O के निर्देशांक क्या हैं? क्योंकि दोनों अक्षों से इसकी दूरी शून्य है, इसलिए इसके भुज और कोटि दोनों ही शून्य होंगे। अतः मूलबिन्दु के निर्देशांक (0, 0) होते हैं।

ऊपर के उदाहरणों में, आपने एक बिन्दु के निर्देशांकों में लगे चिह्नों और उस बिन्दु के चतुर्थांश, जिसमें वह स्थित है, के बीच के निम्नलिखित संबंधों की ओर अवश्य ध्यान दिया होगाः

(i) यदि बिन्दु पहले चतुर्थांश में है, तो बिन्दु (+, +) के रूप का होगा, क्योंकि पहला चतुर्थांश धनात्मक x-अक्ष और धनात्मक y-अक्ष से परिबद्ध है।

(ii) यदि बिन्दु दूसरे चतुर्थांश में है, तो बिन्दु (–, +) के रूप का होगा, क्योंकि दूसरा चतुर्थांश ऋणात्मक x-अक्ष और धनात्मक y-अक्ष से परिबद्ध है।

(iii) यदि बिन्दु तीसरे चतुर्थांश में है, तो बिन्दु (–, –) के रूप में होगा, क्योंकि तीसरा चतुर्थांश ऋणात्मक x-अक्ष और ऋणात्मक y-अक्ष से परिबद्ध है।

(iv) यदि बिन्दु चौथे चतुर्थांश में है, तो बिन्दु (+, –) के रूप में होगा, क्योंकि चौथा चतुर्थांश धनात्मक x-अक्ष और ऋणात्मक y-अक्ष से परिबद्ध है (देखिए आकृति 3.13)।

आकृति 3.13

टिप्पणी : एक तल में स्थित एक बिन्दु की व्याख्या करने के संबंध में ऊपर हमने जिस पद्धति के बारे में चर्चा की है, वह केवल एक परंपरा है जिसको पूरे विश्व में स्वीकार किया जाता है। उदाहरण के लिए, पद्धति में एेसा भी हो सकता है कि पहले कोटि लिखी जाए और उसके बाद भुज लिखा जाए। फिर भी, जिस पद्धति का उल्लेख हमने किया है उसे पूरा विश्व बिना किसी भ्रम के स्वीकार करता है।

प्रश्नावली 3.2

1. निम्नलिखित प्रश्नों में से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दीजिएः

(i) कार्तीय तल में किसी बिन्दु की स्थिति निर्धारित करने वाली क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर रेखाओं के क्या नाम हैं?

(ii) इन दो रेखाओं से बने तल के प्रत्येक भाग के नाम बताइए।

(iii) उस बिन्दु का नाम बताइए जहाँ ये दो रेखाएँ प्रतिच्छेदित होती हैं।

2. आकृति 3.14 देखकर निम्नलिखित को लिखिएः

(i) B के निर्देशांक

(ii) C के निर्देशांक

(iii) निर्देशांक (3, 5) द्वारा पहचाना गया बिन्दु

(iv) निर्देशांक (2, 4) द्वारा पहचाना गया बिन्दु

(v) D का भुज

(vi) बिन्दु H की कोटि

(vii) बिन्दु L के निर्देशांक

(viii) बिन्दु M के निर्देशांक

आकृति 3.14

3.3 तल में एक बिन्दु आलेखित करना जबकि इसके निर्देशांक दिए हुए हों

अभी तक हमने आपके लिए बिन्दु खींचे हैं और आपसे उनके निर्देशांक बताने के लिए कहा है। अब हम आपको यह दर्शाएँगे कि तल में इन बिन्दुओं को किस प्रकार अंकित करते हैं जबकि इनके निर्देशांक हमें ज्ञात हों। इस प्रक्रम को हम "बिन्दु का आलेखन" (plotting the point) कहते हैं।

मान लीजिए एक बिन्दु के निर्देशांक (3, 5) हैं। हम इस बिन्दु को निर्देशांक तल में आलेखित करना चाहते हैं। हम निर्देशांक अक्ष खींचते हैं और अपने एककों का चयन इस प्रकार करते हैं कि दोनों अक्षों पर एक सेंटीमीटर एक एकक को निरूपित करता हो। बिन्दु (3, 5) के निर्देशांक से हमें यह पता चलता है कि धनात्मक x-अक्ष पर इस बिन्दु की y-अक्ष से दूरी 3 एकक है और धनात्मक y-अक्ष पर इस बिन्दु की x-अक्ष से दूरी 5 एकक है। मूलबिन्दु O से प्रारंभ करके हम धनात्मक x-अक्ष पर 3 एकक की गिनती करते हैं और संगत बिन्दु को A के रूप में अंकित करते हैं। अब A से प्रारंभ करके हम y-अक्ष

आकृति 3.15

की धनात्मक दिशा में चलते हैं और 5 एकक की गिनती करते हैं तथा संगत बिन्दु को P के रूप में अंकित करते हैं (देखिए आकृति 3.15)। आप यहाँ यह देखते हैं कि y-अक्ष से P की दूरी 3 एकक है और x - अक्ष से 5 एकक है। अतः P विचाराधीन बिन्दु की स्थिति है। ध्यान दीजिए कि P पहले चतुर्थांश में स्थित है, क्याेंकि P के दोनों निर्देशांक धनात्मक हैं। इसी प्रकार आप निर्देशांक तल में बिन्दु Q (5, 4) आलेखित कर सकते हैं। ऋणात्मक y-अक्ष के अनुदिश x-अक्ष से Q की दूरी 4 एकक है जिससे कि इसका y-निर्देशांक 4 है (देखिए आकृति 3.15)। बिन्दु Q चौथे चतुर्थांश में स्थित है। क्यों?

उदाहरण 3 : कार्तीय तल में बिन्दुओं (5, 0), (0, 5), (2, 5), (5, 2), (–3, 5), (–3, –5), (5, –3) और (6, 1) का स्थान निर्धारण कीजिए।

हल : 1cm = 1 एकक लेकर हम x-अक्ष और y-अक्ष खींचते हैं। बिन्दुओं की स्थितियों को आकृति 3.16 में गहरे बिन्दुओं से दिखाया गया है।

आकृति 3.16

नोट : ऊपर दिए गए उदाहरण में हम यह देखते हैं कि (5, 0) और (0, 5) समान नहीं हैं। इसी प्रकार, (5, 2) और (2, 5) अलग-अलग स्थितियाँ हैं और (–3, 5) और (5, –3) भिन्न-भिन्न स्थितियाँ हैं। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण लेने पर आप यह देखेंगे कि यदि x y हो, तोे कार्तीय तल में (x, y) की स्थिति (y, x) की स्थिति से भिन्न होती है। अतः यदि हम निर्देशांकों x और y में अदला-बदली करें, तो (y, x) की स्थिति (x, y) की स्थिति से भिन्न हो जाएगी। इससे यह अर्थ निकलता है कि (x, y) में x और y के क्रम का काफी महत्व होता है। अतः (x, y) को क्रमित युग्म (ordered pair) कहा जाता है। क्रमित युग्म (x, y) क्रमित युग्म (y, x), यदि x y है और (x, y) = (y, x), यदि x = y है।

उदाहरण 4 : निम्नलिखित संख्या-युग्मों को कार्तीय तल के बिन्दुओं के रूप में आलेखित कीजिए। अक्षों पर पैमाना 1 सेंटीमीटर = 1 एकक लीजिए।

x – 3
0 – 1 4 2
y 7 –3.5 – 3  4 – 3   

हल : सारणी में दिए गए संख्या-युग्मों को बिन्दुओं ( 3, 7), (0, –3.5), (– 1, 3), (4, 4) और (2, 3) से निरूपित किया जा सकता है। बिन्दुओं के स्थानों को आकृति 3.17 में गहरे बिन्दुओं से दिखाया गया है।

आकृति 3.17

क्रियाकलाप 2 : दो व्यक्तियों का एक खेल। (आवश्यक वस्तुएँ - दो काउंटर या सिक्के, ग्राफ पेपर, अलग-अलग रंगों के दो पासे, मान लीजिए लाल और हरे रंग के दो पासे)।

प्रत्येक काउंटर को (0, 0) पर रखिए। प्रत्येक खिलाड़ी एक साथ दो पासे फेंकती हैं। जब पहली खिलाड़ी एेसा करती है, तो मान लीजिए लाल पासे पर 3 आता है और हरे पासे पर 1 आता है। अतः वह अपना काउंटर (3, 1) की ओर ले जाती है। इसी प्रकार, यदि दूसरी खिलाड़ी लाल पर 2 और हरे पर 4 फेंकती है, तो वह अपना काउंटर (2, 4) की ओर ले जाती है। दूसरी बार फेंकने पर यदि पहली खिलाड़ी लाल पर 1 और हरे पर 4 फेंकती है, तो वह अपना काउंटर (3, 1) से (3 + 1, 1 + 4) की ओर ले जाती है। अर्थात् (3, 1) के x-निर्देशांक में 1 जोड़ देती है और y-निर्देशांक में 4 जोड़ देती है।

इस खेल का उद्देश्य सीमा लाँघे बिना पहले (10, 10) पर पहुँचना है, अर्थात् न तो भुज और न ही कोटि 10 से अधिक हो सकती है। ध्यान रहे कि एक काउंटर की स्थिति दूसरे काउंटर की स्थिति के साथ संपाती नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि पहली खिलाड़ी का काउंटर उस बिन्दु की ओर गतिमान होता है जहाँ पहले से ही दूसरी खिलाड़ी का काउंटर स्थित है, तो दूसरी खिलाड़ी का काउंटर (0, 0) पर आ जाएगा। यदि सीमा लाँघे बिना चाल चलना संभव नहीं है, तो खिलाड़ी से वह बारी छूट जाती है। इस खेल को अधिक संख्या में अपनी सहेलियों को लेकर आप खेल सकती हैं।

टिप्पणी : कार्तीय तल में बिन्दुओं के आलेखन की तुलना कुछ सीमा तक समय-दूरी ग्राफ, भुजा-परिमाप ग्राफ, आदि जिनका अध्ययन आप पिछली कक्षाओं में कर चुके हैं, जैसी विभिन्न स्थितियों से की जा सकती है। एेसी स्थिति में, x-अक्ष और y-अक्ष के स्थान पर अक्षों को t-अक्ष, d-अक्ष, s-अक्ष या p-अक्ष आदि कह सकते हैं।

प्रश्नावली 3.3

1. किस चतुर्थांश में या किस अक्ष पर बिन्दु ( 2, 4), (3, 1), (– 1, 0), (1, 2) और ( 3, 5) स्थित हैं? कार्तीय तल पर इनका स्थान निर्धारण करके अपने उत्तर सत्यापित कीजिए।

2. अक्षों पर दूरी का उपयुक्त एकक लेकर नीचे सारणी में दिए गए बिन्दुओं को तल पर आलेखित कीजिएः

x  2 1 3
y 8 7 – 1.25 3  1

3.4 सारांश

इस अध्याय में, आपने निम्नलिखित बिन्दुओं का अध्ययन किया हैः

1. एक तल में एक वस्तु या एक बिन्दु का स्थान निर्धारण करने के लिए दो लांबिक रेखाओं की आवश्यकता होती है जिसमें एक क्षैतिज होती है और दूसरी ऊर्ध्वाधर होती है।

2. तल को कार्तीय या निर्देशांक तल कहा जाता है और रेखाओं को निर्देशांक अक्ष कहा जाता है

3. क्षैतिज रेखा को x -अक्ष और ऊर्ध्वाधर रेखा को y-अक्ष कहा जाता है।

4. निर्देशांक अक्ष तल को चार भागों में बाँट देते हैं, जिन्हें चतुर्थांश कहा जाता है।

5. अक्षों के प्रतिच्छेद बिन्दु को मूलबिन्दु कहा जाता है।

6. y - अक्ष से किसी बिन्दु की दूरी को उसका x-निर्देशांक या भुज कहा जाता है। साथ ही,
x-अक्ष से बिन्दु की दूरी को y-निर्देशांक या कोटि कहा जाता है।

7. यदि एक बिन्दु का भुज x हो और कोटि y हो, तो (x, y) को बिन्दु के निर्देशांक कहा जाता है।

8. x-अक्ष पर एक बिन्दु के निर्देशांक (x, 0) के रूप के होते हैं और y-अक्ष पर बिन्दु के निर्देशांक (0, y) के रूप के होते हैं।

9. मूलबिन्दु के निर्देशांक (0, 0) होते हैं।

10. एक बिन्दु के निर्देशांक पहले चतुर्थांश में (+ , +) के रूप के दूसरे चतुर्थांश में (–, +) के रूप के, तीसरे चतुर्थांश में (–, –) के रूप के और चौथे चतुर्थांश में (+, –) के रूप के होते हैं, जहाँ + एक धनात्मक वास्तविक संख्या को और – एक ऋणात्मक वास्तविक संख्या को प्रकट करते हैं।

11. यदि x y हो, तो (x, y) (y, x) होगा और यदि x = y हो, तो (x, y) = (y, x) होगा।

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