था। मक्खनपुर के स्वूफल और गाँव के बीच पड़ने वाले आम के पेड़ों से प्रतिवषर् उससे आम झुर1े जाते थे। इस कारण वह मूक डंडा सजीव - सा प्रतीत होता था। प्रसन्नवदन2 हम दोनों मक्खनपुर की ओर तेशी से बढ़ने लगे। चिऋियों को मैंने टोपी में रख लिया, क्योंकि वुफतेर् में जेबें न थीं। हम दोनों उछलते - वूफदते, एक ही साँस में गाँव से चार पफला±ग दूर उस वुफएँ के पास आ गए जिसमें एक अति भयंकर काला साँप पड़ा हुआ था। वुफआँ कच्चा था, और चैबीस हाथ गहरा था। उसमें पानी न था। उसमें न जाने साँप वैफसे गिर गया था? कारण वुफछ भी हो, हमारा उसके वुफएँ में होने का ज्ञान केवल दो महीने का था। बच्चे नटखट होते ही हैं। मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली हमारी टोली पूरी बानर टोली थी। एक दिन हम लोग स्वूफल से लौट रहे थे कि हमको वुफएँ में उझकने3 की सूझी। सबसे पहले उझकने वाला मैं ही था। वुफएँ में झाँककर एक ढेला पेंफका कि उसकी आवाश वैफसी होती है। उसके सुनने के बाद अपनी बोली की प्रतिध्वनि4 सुनने की इच्छा थी, पर वुफएँ में ज्योंही ढेला गिरा, त्योंही एक पुफसकार सुनाइर् पड़ी। वुफएँ के किनारे खड़े हुए हम सब बालक पहले तो उस पुफसकार से ऐसे चकित हो गए जैसे किलोलें5 करता हुआ मृगसमूह अति समीप के वुफत्ते की भौंक से चकित हो जाता है। उसके उपरांत सभी ने उछल - उछलकर एक - एक ढेला पेंफका और वुफएँ से आने वाली व्रफोधपूणर् पुफसकार पर कहकहे लगाए। गाँव से मक्खनपुर जाते और मक्खनपुर से लौटते समय प्रायः प्रतिदिन ही वुफएँ में ढेले डाले जाते थे। मैं तो आगे भागकर आ जाता था और टोपी को एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ से ढेला पेंफकता था। यह रोशाना की आदत - सी हो गइर् थी। साँप से पुफसकार करवा लेना मैं उस समय बड़ा काम समझता था। इसलिए जैसे ही हमदोनों उस वुफएँ की ओर से निकले, वुफएँ में ढेला पेंफककर पुफसकार सुनने की प्रवृिा6 जाग्रत हो गइर्। मैं वुफएँ की ओर बढ़ा। छोटा भाइर् मेरे पीछे ऐसे हो लिया जैसे बडे़1. तोड़ना 2. प्रसन्न चेहरा 3. उचकना, पंजे के बल उचककर झाँकना 4. किसी शब्द के उपरांत सुनाइर् पड़ने वाला उसी से उत्पन्न शब्द, गूँज 5. व्रफीड़ा 6. मन का किसी विषय की ओर झुकाव मृगशावक1 के पीछे छोटा मृगशावक हो लेता है। वुफएँ के किनारे से एक ढेला उठाया और उछलकर एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर ढेला गिरा दिया, पर मुझ पर तो बिजली - सी गिर पड़ी। साँप ने पुफसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं यह बात अब तक स्मरण नहीं। टोपी के हाथ में लेते ही तीनों चिऋियाँ चक्कर काटती हुइर् वुफएँ में गिर रही थीं। अकस्मात् जैसे घास चरते हुए हिरन की आत्मा गोली से हत होने पर निकल जाती है और वह तड़पता रह जाता है, उसी भाँति वे चिऋियाँ क्या टोपी से निकल गईं, मेरी तो जान निकल गइर्। उनके गिरते ही मैंने उनको पकड़ने के लिए एक झप‘ा भी माराऋ ठीक वैसे जैसे घायल शेर श्िाकारी को पेड़ पर चढ़ते देख उस पर हमला करता है। पर वे तो पहँुच से बाहर हो चुकी थीं। उनको पकड़ने की घबराहट में मैं स्वयं झटके के कारण वुफएँ में गिर गया होता। वुफएँ की पाट पर बैठे हम रो रहे थेμछोटा भाइर् ढाढ़ें2 मारकर और मैं चुपचाप आँखें डबडबाकर। पतीली में उप़्ाफान आने से ढकना उफपर उठ जाता है और पानी बाहर टपक जाता है। निराशा, पिटने के भय और उद्वेग3 से रोने का उपफान आता़था। पलकों के ढकने भीतरी भावों को रोकने का प्रयत्न करते थे, पर कपोलों पर आँसू ढुलक ही जाते थे। माँ की गोद की याद आती थी। जी चाहता था कि माँ आकर छाती से लगा ले और लाड़ - प्यार करके कह दे कि कोइर् बात नहीं, चिऋियाँ पिफर लिख ली जाएँगी। तबीयत करती थी कि वुफएँ में बहुत - सी मि‘ी डाल दी जाए और घर जाकर कह दिया जाए कि चिऋी डाल आए, पर उस समय मैं झूठ बोलना जानता ही न था। घर लौटकर सच बोलने पर रफइर् की तरह धुनाइर् होती। मार के खयाल से शरीर ही नहीं मन भी काँप जाता था। सच बोलकर पिटने के भावी भय और झूठ बोलकर चिऋियों के न पहँुचने की िाम्मेदारी के बोझ से दबा मैं बैठा सिसक रहा था। इसी सोच - विचार में पंद्रह मिनट होने को आए। देर हो रही थी, और उधर दिन का बुढ़ापा बढ़ता जाता था। कहीं भाग जाने को तबीयत करती थी, पर पिटने का भय और िाम्मेदारी की दुधारी4 तलवार कलेजे पर पिफर रही थी। 1. हिरन का बच्चा 2. शोर - शोर से रोना 3. बेचैनी, घबराहट 4. दोनों तरप़्ाफ से धर वाली, दो धरों वाली थे। इसलिए वुफएँ में घुसते समय मुझे साँप का तनिक भी भय न था। उसको मारना मैं बाएँ हाथ का खेल समझता था। वुफएँ के धरातल से जब चार - पाँच गश रहा हूँगा, तब ध्यान से नीचे को देखा। अक्ल चकरा गइर्। साँप पफन पैफलाए धरातल से एक हाथ उफपर उठा हुआ लहरा रहा था। पूँछ और पूँछ के समीप का भाग पृथ्वी पर था, आधा अग्र भाग उफपर उठा हुआ मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। नीचे डंडा बँधा था, मेरे उतरने की गति से जो इधर - उधर हिलता था। उसी के कारण शायद मुझे उतरते देख साँप घातक1 चोट के आसन पर बैठा था। सँपेरा जैसे बीन बजाकर काले साँप को ख्िालाता है और साँप व्रफोिात हो पफन पैफलाकर खड़ा होता और पुँफकार मारकर चोट करता है, ठीक उसी प्रकार साँप तैयार था। उसका प्रतिद्वंद्वी2μमैंμउससे वुफछ हाथ उफपर धोती पकड़े लटक रहा था। धोती डेंग से बँधी होने के कारण वुफएँ के बीचांेबीच लटक रही थी और मुझे वुफएँ के धरातल की परििा के बीचांेबीच ही उतरना था। इसके माने थे साँप से डेढ़ - दो पुफटμगश नहींμकी दूरी पर पैर रखना, और इतनी दूरी पर साँप पैर रखते ही चोट करता। स्मरण रहे, कच्चे वुफएँ का व्यास बहुत कम होता है। नीचे तो वह डेढ़ गश से अिाक होता ही नहीं। ऐसी दशा में वुफएँ में मैं साँप से अिाक - से - अिाक चार पुफट की दूरी पर रह सकता था, वह भी उस दशा में जब साँप मुझसे दूर रहने का प्रयत्न करता, पर उतरना तो था वुफएँ के बीच में, क्योंकि मेरा साधन बीचांेबीच लटक रहा था। उफपर से लटककर तो साँप नहीं मारा जा सकता था। उतरना तो था ही। थकावट से उफपर चढ़ भी नहीं सकता था। अब तक अपने प्रतिद्वंद्वी को पीठ दिखाने का निश्चय नहीं किया था। यदि ऐसा करता भी तो वुफएँ के धरातल पर उतरे बिना क्या मैं उफपर चढ़ सकता थाμधीरे - धीरे उतरने लगा। एक - एक इंच ज्यों - ज्यों मैं नीचे उतरता जाता था, त्यों - त्यों मेरीएकाग्रचित्तता3 बढ़ती जाती थी। मुझे एक सूझ4 सूझी। दोनों हाथों से धोती पकड़े हुए मैंने अपने पैर वुफएँ की बगल में लगा दिए। दीवार से पैर लगाते ही वुफछ मि‘ी 1. जो नुकसान पहुँचाए, घात करने वाला 2. विपक्षी, शत्राु 3. स्िथरचित्त, ध्यान 4. तरीका, उपाय उसे डंडे से दबाने का खयाल छोड़ दिया। ऐसा करना उचित भी न था। अब प्रश्न था कि चिऋियाँ वैफसे उठाइर् जाएँ। बस, एक सूरत थी। डंडे से साँप की ओर से चिऋियों को सरकाया जाए। यदि साँप टूट पड़ा, तो कोइर् चारा न था। वुफतार् था, और कोइर् कपड़ा न था जिससे साँप के मुँह की ओर करके उसके पफन को पकड़ लूँ। मारना या बिलवुफल छेड़खानी न करनाμये दो मागर् थे। सो पहला मेरी शक्ित के बाहर था। बाध्य होकर दूसरे मागर् का अवलंबन1 करना पड़ा। डंडे को लेकर ज्यों ही मैंने साँप की दाईं ओर पड़ी चिऋी की ओर उसे बढ़ाया कि साँप का पफन पीछे की ओर हुआ। धीरे - धीरे डंडा चिऋी की ओर बढ़ा और ज्योंही चिऋी के पास पहुँचा कि पुँफकार के साथ काली बिजली तड़पी और डंडे पर गिरी। हृदय में वंफप हुआ, और हाथों ने आज्ञा न मानी। डंडा छूट पड़़ा। मैं तो न मालूम कितना उफपर उछल गया। जान - बूझकर नहीं, यों ही बिदककर। उछलकर जो खड़ा हुआ, तो देखा डंडे के सिर पर तीन - चार स्थानों पर पीव - सा वुफछ लगा हुआ है। वह विष था। साँप ने मानो अपनी शक्ित का सटीर्पिफकेट सामने रख दिया था, पर मैं तो उसकी योग्यता का पहले ही से कायल2 था। उस सटीर्पिफकेट की शरूरत न थी। साँप ने लगातार पूँफ - पूँफ करके डंडे पर तीन - चार चोटें कीं। वह डंडा पहली बार इस भाँति अपमानित हुआ था, या शायद वह साँप का उपहास कर रहा था। उधर उफपर पूँफ - पूँफ और मेरे उछलने और पिफर वहीं धमाके से खड़े होने से छोटे भाइर् ने समझा कि मेरा कायर् समाप्त हो गया और बंधुत्व का नाता पूँफ - पूँफ और धमाके में टूट गया। उसने खयाल किया कि साँप के काटने से मैं गिर गया। मेरे कष्ट और विरह के खयाल से उसके कोमल हृदय को धक्का लगा। भ्रातृ - स्नेह के ताने - बाने को चोट लगी। उसकी चीख निकल गइर्। छोटे भाइर् की आशंका बेजा न थी, पर उस पूँफ और धमाके से मेरा साहस वुफछ बढ़ गया। दुबारा पिफर उसी प्रकार लिप़्ाफापेफ को उठाने की चेष्टा की। अबकी बाऱसाँप ने वार भी किया और डंडे से चिपट भी गया। डंडा हाथ से छूटा तो नहीं पर 1. सहारा 2. मानने वाला सन् 1915 में मैट्रीक्युलेशन पास करने के उपरांत यह घटना मैंने माँ को सुनाइर्। सजल नेत्रों से माँ ने मुझे अपनी गोद में ऐसे बिठा लिया जैसे चिडि़या अपने बच्चों को डैने1 के नीचे छिपा लेती है। कितने अच्छे थे वे दिन! उस समय रायपफल न थी, डंडा था और डंडे का श्िाकारμकम - से - कम उस साँप का श्िाकारμरायपफल के श्िाकार से कम रोचक और भयानक न था। बोध - प्रश्न 1.भाइर् के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था? 2.मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले वुफएँ में ढेला क्यों पेंफकती थी? 3.‘साँप ने पुफसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’μयह कथन लेखक की किस मनोदशा को स्पष्ट करता है? 4.किन कारणों से लेखक ने चिऋियों को वुफएँ से निकालने का निणर्य लिया? 5.साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या - क्या युक्ितयाँ अपनाइंर्? 6.वुफएँ में उतरकर चिऋियों को निकालने संबंधी साहसिक वणर्न को अपने शब्दों में लिख्िाए। 7.इस पाठ को पढ़ने के बाद किन - किन बाल - सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है? 8.‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी - कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं’μका आशय स्पष्ट कीजिए। 9.‘पफल तो किसी दूसरी शक्ित पर निभर्र है’μपाठ के संदभर् में इस पंक्ित का आशय स्पष्ट कीजिए। 1. पंख

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Sanchayan-002

स्मृति

श्रीराम शर्मा

सन् 1908 ई. की बात है दिसंबर का आखीर या जनवरी का प्रारंभ होगा चिल्ला1 जाड़ा पड़ रहा था दो-चार दिन पूर्व कुछ बूँदा-बाँदी हो गई थी, इसलिए शीत की भयंकरता और भी बढ़ गई थी सायंकाल के साढ़े तीन या चार बजे हाेंगे कई साथियों के साथ मैं झरबेरी के बेर तोड़-तोड़कर खा रहा था कि गाँव के पास से एक आदमी ने ज़ोर से पुकारा कि तुम्हारे भाई बुला रहे हैं, शीघ्र ही घर लौट जाओ मैं घर को चलने लगा साथ में छोटा भाई भी था भाई साहब की मार का डर था इसलिए सहमा हुआ चला जाता था समझ में नहीं आता था कि कौन-सा कसूर बन पड़ा डरते-डरते घर में घुसा आशंका2 थी कि बेर खाने के अपराध में ही तो पेशी न हो पर आँगन में भाई साहब को पत्र लिखते पाया अब पिटने का भय दूर हुआ हमें देखकर भाई साहब ने कहा-"इन पत्रों को ले जाकर मक्खनपुर डाकखाने में डाल आओ तेज़ी से जाना, जिससे शाम की डाक में चिट्ठियाँ निकल जाएँ ये बड़ी ज़रूरी हैं|"


1. कड़ी सरदी 2. डर 3. हड्डी के भीतर भरा मुलायम पदार्थ 4. भुनवाना

जाड़े के दिन थे ही, तिस पर हवा के प्रकोप से कँप-कँपी लग रही थी हवा मज्जा3 तक ठिठुरा रही थी, इसलिए हमने कानों को धोती से बाँधा माँ ने भुँजाने4 के लिए थोड़े चने एक धोती में बाँध दिए हम दोनों भाई अपना-अपना डंडा लेकर घर से निकल पड़े उस समय उस बबूल के डंडे से जितना मोह था, उतना इस उमर में रायफल से नहीं मेरा डंडा अनेक साँपों के लिए नारायण-वाहन हो चुका था मक्खनपुर के स्कूल और गाँव के बीच पड़ने वाले आम के पेड़ों से प्रतिवर्ष उससे आम झुरे1 जाते थे इस कारण वह मूक डंडा सजीव-सा प्रतीत होता था प्रसन्नवदन2 हम दोनों मक्खनपुर की ओर तेज़ी से बढ़ने लगे चिट्ठियों को मैंने टोपी में रख लिया, क्योंकि कुर्ते में जेबें न थीं|

हम दोनों उछलते-कूदते, एक ही साँस में गाँव से चार फर्लांग दूर उस कुएँ के पास आ गए जिसमें एक अति भयंकर काला साँप पड़ा हुआ था कुआँ कच्चा था, और चौबीस हाथ गहरा था उसमें पानी न था उसमें न जाने साँप कैसे गिर गया था? कारण कुछ भी हो, हमारा उसके कुएँ में होने का ज्ञान केवल दो महीने का था बच्चे नटखट होते ही हैं मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली हमारी टोली पूरी बानर टोली थी एक दिन हम लोग स्कूल से लौट रहे थे कि हमको कुएँ में उझकने3 की सूझी सबसे पहले उझकने वाला मैं ही था कुएँ में झाँककर एक ढेला फेंका कि उसकी आवाज़ कैसी होती है उसके सुनने के बाद अपनी बोली की प्रतिध्वनि4 सुनने की इच्छा थी, पर कुएँ में ज्योंही ढेला गिरा, त्योंही एक फुसकार सुनाई पड़ी कुएँ के किनारे खड़े हुए हम सब बालक पहले तो उस फुसकार से ऐसे चकित हो गए जैसे किलोलें5 करता हुआ मृगसमूह अति समीप के कुत्ते की भौंक से चकित हो जाता है उसके उपरांत सभी ने उछल-उछलकर एक-एक ढेला फेंका और कुएँ से आने वाली क्रोधपूर्ण फुसकार पर कहकहे लगाए|




1. तोड़ना 2. प्रसन्न चेहरा 3. उचकना, पंजे के बल उचककर झाँकना 4. किसी शब्द के उपरांत सुनाई पड़ने वाला उसी से उत्पन्न शब्द, गूँज 5. क्रीड़ा 6. मन का किसी विषय की ओर झुकाव


गाँव से मक्खनपुर जाते और मक्खनपुर से लौटते समय प्रायः प्रतिदिन ही कुएँ में ढेले डाले जाते थे मैं तो आगे भागकर आ जाता था और टोपी को एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ से ढेला फेंकता था यह रोज़ाना की आदत-सी हो गई थी साँप से फुसकार करवा लेना मैं उस समय बड़ा काम समझता था इसलिए जैसे ही हम दोनों उस कुएँ की ओर से निकले, कुएँ में ढेला फेंककर फुसकार सुनने की प्रवृत्ति6 जाग्रत हो गई मैं कुएँ की ओर बढ़ा छोटा भाई मेरे पीछे ऐसे हो लिया जैसे बड़े मृगशावक1 के पीछे छोटा मृगशावक हो लेता है कुएँ के किनारे से एक ढेला उठाया और उछलकर एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर ढेला गिरा दिया, पर मुझ पर तो बिजली-सी गिर पड़ी साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं यह बात अब तक स्मरण नहीं टोपी के हाथ में लेते ही तीनों चिट्ठियाँ चक्कर काटती हुई कुएँ में गिर रही थीं अकस्मात् जैसे घास चरते हुए हिरन की आत्मा गोली से हत होने पर निकल जाती है और वह तड़पता रह जाता है, उसी भाँति वे चिट्ठियाँ क्या टोपी से निकल गईं, मेरी तो जान निकल गई उनके गिरते ही मैंने उनको पकड़ने के लिए एक झपट्टा भी मारा; ठीक वैसे जैसे घायल शेर शिकारी को पेड़ पर चढ़ते देख उस पर हमला करता है पर वे तो पहुँच से बाहर हो चुकी थीं उनको पकड़ने की घबराहट में मैं स्वयं झटके के कारण कुएँ में गिर गया होता|

कुएँ की पाट पर बैठे हम रो रहे थे-छोटा भाई ढाढ़ें2 मारकर और मैं चुपचाप आँखें डबडबाकर पतीली में उफ़ान आने से ढकना ऊपर उठ जाता है और पानी बाहर टपक जाता है निराशा, पिटने के भय और उद्वेग3 से रोने का उफ़ान आता था पलकों के ढकने भीतरी भावों को रोकने का प्रयत्न करते थे, पर कपोलों पर आँसू ढुलक ही जाते थे माँ की गोद की याद आती थी जी चाहता था कि माँ आकर छाती से लगा ले और लाड़-प्यार करके कह दे कि कोई बात नहीं, चिट्ठियाँ फिर लिख ली जाएँगी तबीयत करती थी कि कुएँ में बहुत-सी मिट्टी डाल दी जाए और घर जाकर कह दिया जाए कि चिट्ठी डाल आए, पर उस समय मैं झूठ बोलना जानता ही न था घर लौटकर सच बोलने पर रुई की तरह धुनाई होती मार के खयाल से शरीर ही नहीं मन भी काँप जाता था सच बोलकर पिटने के भावी भय और झूठ बोलकर चिट्ठियों के नपहुँचने की जि़म्मेदारी के बोझ से दबा मैं बैठा सिसक रहा था इसी सोच-विचार में पंद्रह मिनट होने को आए देर हो रही थी, और उधर दिन का बुढ़ापा बढ़ता जाता था कहीं भाग जाने को तबीयत करती थी, पर पिटने का भय और जि़म्मेदारी की दुधारी4 तलवार कलेजे पर फिर रही थी|


1. हिरन का बच्चा 2. ज़ोर-ज़ोर से रोना 3. बेचैनी, घबराहट 4. दोनों तरफ़ से धार वाली, दो धारों वाली

दृढ़ संकल्प से दुविधा की बेड़ियाँ कट जाती हैं मेरी दुविधा भी दूर हो गई कुएँ में घुसकर चिट्ठियों को निकालने का निश्चय किया कितना भयंकर निर्णय था! पर जो मरने को तैयार हो, उसे क्या? मूर्खता अथवा बुद्धिमत्ता से किसी काम को करने के लिए कोई मौत का मार्ग ही स्वीकार कर ले, और वह भी जानबूझकर, तो फिर वह अकेला संसार से भिड़ने को तैयार हो जाता है और फल? उसे फल की क्या चिता फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है उस समय चिट्ठियाँ निकालने के लिए मैं विषधर से भिड़ने को तैयार हो गया पासा फेंक दिया था मौत का आलिंगन हो अथवा साँप से बचकर दूसरा जन्म-इसकी कोई चिंता न थी पर विश्वास यह था कि डंडे से साँप को पहले मार दूँगा, तब फिर चिट्ठियाँ उठा लूँगा बस इसी दृढ़ विश्वास के बूते पर मैंने कुएँ में घुसने की ठानी|

छोटा भाई रोता था और उसके रोने का तात्पर्य था कि मेरी मौत मुझे नीचे बुला रही है, यद्यपि वह शब्दों से न कहता था वास्तव में मौत सजीव और नग्न रूप में कुएँ में बैठी थी, पर उस नग्न मौत से मुठभेड़ के लिए मुझे भी नग्न होना पड़ा छोटा भाई भी नंगा हुआ एक धोती मेरी, एक छोटे भाई की, एक चनेवाली, दो कानों से बँधी हुई धोतियाँ-पाँच धोतियाँ और कुछ रस्सी मिलाकर कुएँ की गहराई के लिए काफ़ी हुईं हम लोगों ने धोतियाँ एक-दूसरी से बाँधी और खूब खींच-खींचकर आज़मा लिया कि गाँठें कड़ी हैं या नहीं अपनी ओर से कोई धोखे का काम न रखा धोती के एक सिरे पर डंडा बाँधा और उसे कुएँ में डाल दिया दूसरे सिरे को डेंग (वह लकड़ी जिस पर चरस-पुर टिकता है) के चारों ओर एक चक्कर देकर और एक गाँठ लगाकर छोटे भाई को दे दिया छोटा भाई केवल आठ वर्ष का था, इसीलिए धोती को डेंग से कड़ी करके बाँध दिया और तब उसे खूब मज़बूती से पकड़ने के लिए कहा मैं कुएँ में धोती के सहारे घुसने लगा छोटा भाई रोने लगा मैंने उसे आश्वासन1 दिलाया कि मैं कुएँ के नीचे पहुँचते ही साँप को मार दूँगा और मेरा विश्वास भी ऐसा ही था कारण यह था कि इससे पहले मैंने अनेक साँप मारे थे इसलिए कुएँ में घुसते समय मुझे साँप का तनिक भी भय न था उसको मारना मैं बाएँ हाथ का खेल समझता था|


1. भरोसा, दिलासा

कुएँ के धरातल से जब चार-पाँच गज़ रहा हूँगा, तब ध्यान से नीचे को देखा अक्ल चकरा गई साँप फन फैलाए धरातल से एक हाथ ऊपर उठा हुआ लहरा रहा था पूँछ और पूँछ के समीप का भाग पृथ्वी पर था, आधा अग्र भाग ऊपर उठा हुआ मेरी प्रतीक्षा कर रहा था नीचे डंडा बँधा था, मेरे उतरने की गति से जो इधर-उधर हिलता था उसी के कारण शायद मुझे उतरते देख साँप घातक1 चोट के आसन पर बैठा था सँपेरा जैसे बीन बजाकर काले साँप को खिलाता है और साँप क्रोधित हो फन फैलाकर खड़ा होता और फुँकार मारकर चोट करता है, ठीक उसी प्रकार साँप तैयार था उसका प्रतिद्वंद्वी2-मैं-उससे कुछ हाथ ऊपर धोती पकड़े लटक रहा था धोती डेंग से बँधी होने के कारण कुएँ के बीचाेंबीच लटक रही थी और मुझे कुएँ के धरातल की परिधि के बीचाेंबीच ही उतरना था इसके माने थे साँप से डेढ़-दो फुट-गज़ नहीं-की दूरी पर पैर रखना, और इतनी दूरी पर साँप पैर रखते ही चोट करता स्मरण रहे, कच्चे कुएँ का व्यास बहुत कम होता है नीचे तो वह डेढ़ गज़ से अधिक होता ही नहीं ऐसी दशा में कुएँ में मैं साँप से अधिक-से-अधिक चार फुट की दूरी पर रह सकता था, वह भी उस दशा में जब साँप मुझसे दूर रहने का प्रयत्न करता, पर उतरना तो था कुएँ के बीच में, क्योंकि मेरा साधन बीचाेंबीच लटक रहा था ऊपर से लटककर तो साँप नहीं मारा जा सकता था उतरना तो था ही थकावट से ऊपर चढ़ भी नहीं सकता था अब तक अपने प्रतिद्वंद्वी को पीठ दिखाने का निश्चय नहीं किया था यदि ऐसा करता भी तो कुएँ के धरातल पर उतरे बिना क्या मैं ऊपर चढ़ सकता था-धीरे-धीरे उतरने लगा एक-एक इंच ज्यों-ज्यों मैं नीचे उतरता जाता था, त्यों-त्यों मेरी एकाग्रचित्तता3 बढ़ती जाती थी मुझे एक सूझ4 सूझी दोनों हाथों से धोती पकड़े हुए मैंने अपने पैर कुएँ की बगल में लगा दिए दीवार से पैर लगाते ही कुछ मिट्टी नीचे गिरी और साँप ने फू करके उस पर मुँह मारा मेरे पैर भी दीवार से हट गए, और मेरी टाँगें कमर से समकोण बनाती हुई लटकती रहीं, पर इससे साँप से दूरी और कुएँ की परिधि पर उतरने का ढंग मालूम हो गया तनिक झूलकर मैंने अपने पैर कुएँ की बगल से सटाए, और कुछ धक्के के साथ अपने प्रतिद्वंद्वी के सम्मुख कुएँ की दूसरी ओर डेढ़ गज़ पर-कुएँ के धरातल पर खड़ा हो गया आँखें चार हुईं |


1. जो नुकसान पहुँचाए, घात करने वाला 2. विपक्षी, शत्रु 3. स्थिरचित्त, ध्यान 4. तरीका, उपाय 

शायद एक-दूसरे को पहचाना साँप को चक्षुःश्रवा1 कहते हैं मैं स्वयं चक्षुःश्रवा हो रहा था अन्य इंद्रियों ने मानो सहानुभूति से अपनी शक्ति आँखों को दे दी हो साँप के फन की ओर मेरी आँखें लगी हुई थीं कि वह कब किस ओर को आक्रमण करता है साँप ने मोहनी-सी डाल दी थी शायद वह मेरे आक्रमण की प्रतीक्षा में था, पर जिस विचार और आशा को लेकर मैंने कुएँ में घुसने की ठानी थी, वह तो आकाश-कुसुम था मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी-कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं मुझे साँप का साक्षात् होते ही अपनी योजना और आशा की असंभवता प्रतीत हो गई डंडा चलाने के लिए स्थान ही न था लाठी या डंडा चलाने के लिए काफ़ी स्थान चाहिए जिसमें वे घुमाए जा सकें साँप को डंडे से दबाया जा सकता था, पर ऐसा करना मानो तोप के मुहरे पर खड़ा होना था यदि फन या उसके समीप का भाग न दबा, तो फिर वह पलटकर ज़रूर काटता, औैर फन के पास दबाने की कोई संभावना भी होती तो फिर उसके पास पड़ी हुई दो चिट्ठियों को कैसे उठाता? दो चिट्ठियाँ उसके पास उससे सटी हुई पड़ी थीं और एक मेरी ओर थी मैं तो चिट्ठियाँ लेने ही उतरा था हम दोनों अपने पैंतरों2 पर डटे थे उस आसन पर खड़े-खड़े मुझे चार-पाँच मिनट हो गए दोनों ओर से मोरचे पड़े हुए थे, पर मेरा मोरचा कमज़ोर था कहीं साँप मुझ पर झपट पड़ता तो मैं-यदि बहुत करता तो-उसे पकड़कर, कुचलकर मार देता, पर वह तो अचूक3 तरल विष मेरे शरीर में पहुँचा ही देता और अपने साथ-साथ मुझे भी ले जाता अब तक साँप ने वार न किया था, इसलिए मैंने भी उसे डंडे से दबाने का खयाल छोड़ दिया ऐसा करना उचित भी न था अब प्रश्न था कि चिट्ठियाँ कैसे उठाई जाएँ बस, एक सूरत थी डंडे से साँप की ओर से चिट्ठियों को सरकाया जाए यदि साँप टूट पड़ा, तो कोई चारा न था कुर्ता था, और कोई कपड़ा न था जिससे साँप के मुँह की ओर करके उसके फन को पकड़ लूँ मारना या बिलकुल छेड़खानी न करना-ये दो मार्ग थे सो पहला मेरी शक्ति के बाहर था बाध्य होकर दूसरे मार्ग का अवलंबन1 करना पड़ा|


1. आँखों से सुनने वाला 2. मुद्रा, स्थिति 3. खाली न जाने वाला, निश्चित

डंडे को लेकर ज्यों ही मैंने साँप की दाईं ओर पड़ी चिट्ठी की ओर उसे बढ़ाया कि साँप का फन पीछे की ओर हुआ धीरे-धीरे डंडा चिट्ठी की ओर बढ़ा और ज्योंही चिट्ठी के पास पहुँचा कि फुँकार के साथ काली बिजली तड़पी और डंडे पर गिरी हृदय में कंप हुआ, और हाथों ने आज्ञा न मानी डंडा छूट पड़़ा मैं तो न मालूम कितना ऊपर उछल गया जान-बूझकर नहीं, यों ही बिदककर उछलकर जो खड़ा हुआ, तो देखा डंडे के सिर पर तीन-चार स्थानों पर पीव-सा कुछ लगा हुआ है वह विष था साँप ने मानो अपनी शक्ति का सर्टीफिकेट सामने रख दिया था, पर मैं तो उसकी योग्यता का पहले ही से कायल2 था उस सर्टीफिकेट की ज़रूरत न थी साँप ने लगातार फूँ-फूँ करके डंडे पर तीन-चार चोटें कीं वह डंडा पहली बार इस भाँति अपमानित हुआ था, या शायद वह साँप का उपहास कर रहा था|

उधर ऊपर फूँ-फूँ और मेरे उछलने और फिर वहीं धमाके से खड़े होने से छोटे भाई ने समझा कि मेरा कार्य समाप्त हो गया और बंधुत्व का नाता फूँ-फूँ और धमाके में टूट गया उसने खयाल किया कि साँप के काटने से मैं गिर गया मेरे कष्ट और विरह के खयाल से उसके कोमल हृदय को धक्का लगा भ्रातृ-स्नेह के ताने-बाने को चोट लगी उसकी चीख निकल गई|

छोटे भाई की आशंका बेजा न थी, पर उस फूँ और धमाके से मेरा साहस कुछ बढ़ गया दुबारा फिर उसी प्रकार लिफ़ाफ़े को उठाने की चेष्टा की अबकी बार साँप ने वार भी किया और डंडे से चिपट भी गया डंडा हाथ से छूटा तो नहीं पर झिझक, सहम अथवा आतंक से अपनी ओर को खिंच गया और गुंजल्क1 मारता हुआ साँप का पिछला भाग मेरे हाथों से छू गया उफ़, कितना ठंडा था! डंडे को मैंने एक ओर पटक दिया यदि कहीं उसका दूसरा वार पहले होता, तो उछलकर मैं साँप पर गिरता और न बचता, लेकिन जब जीवन होता है, तब हज़ारों ढंग बचने के निकल आते हैं वह दैवी कृपा थी डंडे के मेरी ओर खिंच आने से मेरे और साँप के आसन बदल गए मैंने तुरंत ही लिफ़ाफ़े और पोस्टकार्ड चुन लिए चिट्ठियों को धोती के छोर में बाँध दिया, और छोटे भाई ने उन्हें ऊपर खींच लिया|


1. सहारा 2. मानने वाला

डंडे को साँप के पास से उठाने में भी बड़ी कठिनाई पड़ी साँप उससे खुलकर उस पर धरना देकर बैठा था जीत तो मेरी हो चुकी थी, पर अपना निशान गँवा चुका था आगे हाथ बढ़ाता तो साँप हाथ पर वार2 करता, इसलिए कुएँ की बगल से एक मुट्ठी मिट्टी लेकर मैंने उसकी दाईं ओर फेंकी कि वह उस पर झपटा, और मैंने दूसरे हाथ से उसकी बाईं ओर से डंडा खींच लिया, पर बात-की-बात में उसने दूसरी ओर भी वार किया यदि बीच में डंडा न होता, तो पैर में उसके दाँत गड़ गए होते|

अब ऊपर चढ़ना कोई कठिन काम न था केवल हाथों के सहारे, पैरों को बिना कहीं लगाए हुए 36 फुट ऊपर चढ़ना मुझसे अब नहीं हो सकता 15-20 फुट बिना पैरों के सहारे, केवल हाथों के बल, चढ़ने की हिम्मत रखता हूँ; कम ही, अधिक नहीं पर उस ग्यारह वर्ष की अवस्था में मैं 36 फुट चढ़ा बाहें भर गई थीं छाती फूल गई थी धौंकनी चल रही थी पर एक-एक इंच सरक-सरककर अपनी भुजाओं के बल मैं ऊपर चढ़ आया यदि हाथ छूट जाते तो क्या होता इसका अनुमान करना कठिन है ऊपर आकर, बेहाल होकर, थोड़ी देर तक पड़ा रहा देह को झार-झूरकर धोती-कुर्ता पहना फिर किशनपुर के लड़के को, जिसने ऊपर चढ़ने की चेष्टा को देखा था, ताकीद3 करके कि वह कुएँ वाली घटना किसी से न कहे, हम लोग आगे बढ़े|

सन् 1915 में मैट्रीक्युलेशन पास करने के उपरांत यह घटना मैंने माँ को सुनाई सजल नेत्रों से माँ ने मुझे अपनी गोद में ऐसे बिठा लिया जैसे चिड़िया अपने बच्चों को डैने1 के नीचे छिपा लेती है|

कितने अच्छे थे वे दिन! उस समय रायफल न थी, डंडा था और डंडे का शिकार-कम-से-कम उस साँप का शिकार-रायफल के शिकार से कम रोचक और भयानक न था|


1. गुत्थी, गाँठ 2. प्रहार, चोट 3. बार-बार चेताने की क्रिया


बोध-प्रश्न

  1. भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था?
  2. मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढेला क्यों फेंकती थी?
  3. ‘साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’-यह कथन लेखक की किस मनोदशा को स्पष्ट करता है?
  4. किन कारणों से लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया?
  5. साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या-क्या युक्तियाँ अपनाईं?
  6. कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकालने संबंधी साहसिक वर्णन को अपने शब्दों में लिखिए
  7. इस पाठ को पढ़ने के बाद किन-किन बाल-सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है?
  8. ‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी-कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलतीहैं’-का आशय स्पष्ट कीजिए
  9. ‘फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है’-पाठ के संदर्भ में इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए



1. पंख

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