13 जहाँ पहिया है पुडुको‘इर् ;तमिलनाडुद्धः साइकिल चलाना एक सामाजिक आंदोलन है? वुफछ अजीब - सी बात हैμहै न! लेकिन चैंकने की बात नहीं है। पुडुको‘इर् िाले की हशारों नवसाक्षर ग्रामीण महिलाओं के लिए यह अब आम बात है। अपने पिछड़ेपन पर लात मारने, अपना विरोध व्यक्त करने और उन शंजीरों को तोड़ने का जिनमें वे जकड़े हुए हैं, कोइर् - न - कोइर् तरीका लोग निकाल ही लेते हैं। कभी - कभी ये तरीके अजीबो - गरीब होते हैं। भारत के सवार्िाक गरीब िालों में से एक है पुडुको‘इर्। पिछले दिनों यहाकी ग्रामीण महिलाओं ने अपनी स्वाधीनता, आशादी और गतिशीलता को अभ्िाव्यक्त करने के लिए प्रतीक के रूप में साइकिल को चुना है। उनमें से अिाकांश नवसाक्षर थीं। अगर हम दस वषर् से कम उम्र की लड़कियों को अलग कर दें तो इसका अथर् यह होगा कि यहाँ ग्रामीण महिलाओं के एक - चैथाइर् हिस्से ने साइकिल चलाना सीख लिया है औरइन महिलाओं में से सत्तर हशार से भी अिाक महिलाओं ने ‘प्रदशर्न एवं प्रतियोगिता’ जैसे सावर्जनिक कायर्क्रमों में बड़े गवर् के साथ अपने नए कौशल का ँ 72 वसंत भाग 3 प्रदशर्न किया और अभी भी उनमें साइकिल चलाने की इच्छा जारी है। वहाँ इसके लिए कइर् ‘प्रश्िाक्षण श्िाविर’ चल रहे हैं। ग्रामीण पुडुको‘इर् के मुख्य इलाकों में अत्यंत रूढि़वादी पृष्ठभूमि से आईं युवा मुस्िलम लड़कियाँ सड़कों से अपनी साइकिलों पर जाती हुइर् दिखाइर् देती हैं। जमीला बीवी नामक एक युवती ने जिसने साइकिल चलाना शुरू किया है, मुझसे कहाμफ्यह मेरा अिाकार है, अब हम कहीं भी जा सकते हैं। अब हमें बस का इंतशार नहीं करना पड़ता। मुझे पता है कि जब मैंने साइकिल चलाना शुरू किया तो लोग प़्ाफब्ितयाँ कसते थे। लेकिन मैंने उस पर कोइर् ध्यान नहीं दिया।य् पफातिमा एक माध्यमिक स्वूफल में पढ़ाती हैं और उन्हें साइकिल चलाने का ऐसा चाव लगा है कि हर शाम आधा घंटे के लिए किराए पर साइकिल लेती हैं। एक नयी साइकिल खरीदने की उनकी हैसियत नहीं है। पफातिमा ने बताया किμफ्साइकिल चलाने में एक खास तरह की आशादी है। हमंे किसी पर निभर्र नहीं रहना पड़ता। मैं कभी इसे नहीं छोडँ़गी।य् जमीला, पफातिमा औरूउनकी मित्रा अवकन्नीμइन सबकी उम्र 20 वषर् के आसपास है और इन्होंने अपने समुदाय की अनेक युवतियों को साइकिल चलाना सिखाया है। इस िाले में साइकिल की धूम मची हुइर् है। इसकी प्रशंसकों में हैं महिला खेतिहर मशदूर, पत्थर खदानों में मशदूरी करनेवाली औरतें और गाँवों में काम करनेवाली नसे±। बालवाड़ी और आँगनवाड़ी कायर्कतार्, बेशकीमती पत्थरों को तराशने में लगी औरतें और स्वूफल की अध्यापिकाएँ भी साइकिल का जमकर इस्तेमाल कर रही हैं। ग्राम सेविकाएँ और दोपहर का भोजन पहुँचानेवाली औरतें भी पीछे नहीं हैं। सबसे बड़ी संख्या उन लोगों की है जो अभी नवसाक्षर हुइर् हैं। जिस किसी नवसाक्षर अथवा नयी - नयी साइकिल चलानेवाली महिला से मैंने बातचीत की, उसने साइकिल चलाने और अपनी व्यक्ितगत आशादी के बीच एक सीधा संबंध बताया। साइकिल आंदोलन की एक अगुआ का कहना है, फ्मुख्य बात यह है कि इस आंदोलन ने महिलाओं को बहुत आत्मविश्वास प्रदान किया। महत्वपूणर् यह जहाँ पहिया है 73 है कि इसने पुरुषों पर उनकी निभर्रता कम कर दी है। अब हम प्रायः देखते हैं कि कोइर् औरत अपनी साइकिल पर चार किलोमीटर तक की दूरी आसानी से तय कर पानी लाने जाती है। कभी - कभी साथ में उसके बच्चे भी होते हैं। यहाँ तक कि साइकिल से दूसरे स्थानों से सामान ढोने की व्यवस्था भी खुद ही की जा सकती है। लेकिन यकीन मानिए, जब इन्होंने साइकिल चलाना शुरू किया तो इन पर लोगों ने जमकर प्रहार किया जिसे इन्हें झेलना पड़ा। गंदी - गंदी टिप्पण्िायाँ की गईं लेकिन धीरे - धीरे साइकिल चलाने को सामाजिकस्वीकृति मिली। इसलिए महिलाओं ने इसे अपना लिया। साइकिल प्रश्िाक्षण श्िाविर देखना एक असाधारण अनुभव है। किलावुफरुचि गाँव में सभी साइकिल सीखनेवाली महिलाएँ रविवार को इकऋी हुइर् थीं। साइकिल चलाने के आंदोलन के समथर्न में ऐसे आवेग देखकर कोइर् भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता। उन्हें इसे सीखना ही है। साइकिल ने उन्हें पुरुषों का रास्ता दिखाया। ये नव - साइकिल चालक गाने भी गाती हैं। उन गानों में साइकिल चलाने को प्रोत्साहन दिया गया है। इनमें से एक गाने की पंक्ित का भाव हैμ‘ओ बहिना, आ सीखंे साइकिल, घूमें समय के पहिए संग...’ जिन्हें साइकिल चलाने का प्रश्िाक्षण मिल चुका है उनमें से बहुत बड़ी संख्या में साइकिल सीख 74 वसंत भाग 3 चुकी महिलाएँ अभी नयी - नयी साइकिल सीखनेवाली महिलाओं को भरपूर सहयोग देती हैं। उनमें यहाँ न केवल सीखने - सिखाने की इच्छा दिखाइर् देती हैऋ बल्िक उनके बीच यह उत्साह भी दिखाइर् देता है कि सभी महिलाओं को साइकिल चलाना सीखना चाहिए। 1992 में अंतरार्ष्ट्रीय महिला दिवस के बाद अब यह िाला कभी भी पहले जैसा नहीं हो सकता। हैंडल पर झंडियाँ लगाए, घंटियाँ बजाते हुए साइकिल पर सवार 1500 महिलाओं ने पुडुको‘इर् में तूपफान ला दिया। महिलाओं़की साइकिल चलाने की इस तैयारी ने यहाँ रहनेवालों को हक्का - बक्का कर दिया। इस सारे मामले पर पुरुषों की क्या राय थी? इसके पक्ष में ‘आर. साइकिल्स’ के मालिक को तो रहना ही था। इस अकेले डीलर के यहाँ लेडीश साइकिल की बिक्री में साल भर के अंदर कापफी वृि हुइर्। माना जा सकता है कि इस आँकड़े को दो कारणों से कम करके आँका गया। पहली बात तो यह है किμढेर सारी महिलाओं ने जो लेडीश साइकिल का इंतशार नहीं कर सकती थीं, जेंट्स साइकिलें खरीदने लगीं। दूसरे, उस डीलर ने बड़ी सतवर्फता के साथ यह जानकारी मुझे दी थीμउसे लगा कि मैं बिक्री कर विभाग का कोइर् आदमी हूँ। वुफदिमि अन्नामलाइर् की चिलचिलाती धूप में एक अद्भुत दृश्य की तरह पत्थर के खदानों में दौड़ती - भागती बाइर्स वषीर्य मनोरमनी को लोगों ने साइकिल सिखलाते देखा। उसने मुझे बतायाμफ्हमारा इलाका मुख्य शहर से कटा हुआ है। यहाँ जो साइकिल चलाना जानते हैं उनकी गतिशीलता बढ़ जाती है।य् साइकिल चलाने के बहुत निश्िचत आथ्िार्क निहिताथर् थे। इससे आय में वृि हुइर् है। यहाँ की वुफछ महिलाएँ अगल - बगल के गाँवों में वृफष्िा संबंधी अथवा अन्य उत्पाद बेच आती हैं। साइकिल की वजह से बसों के इंतशार में व्यय होने वाला उनका समय बच जाता है। खराब परिवहन व्यवस्था वाले स्थानों के लिए तो यह बहुत महत्वपूणर् है। दूसरे, इससे इन्हें इतना समय मिल जाता है कि ये अपने सामान बेचने पर श्यादा ध्यान वेंफदि्रत कर पाती हंै। तीसरे, इससे ये और अिाक इलाकों में जा पाती हैं। अंतिम बात यह है कि जहाँ पहिया है 75 अगर आप चाहें तो इससे आराम करने का कापफी समय मिल सकता है।़जिन छोटे उत्पादकों को बसों का इंतशार करना पड़ता था, बस स्टाॅप तक पहुँचने के लिए भी पिता, भाइर्, पति या बेटों पर निभर्र रहना पड़ता था। वे अपना सामान बेचने के लिए वुफछ गिने - चुने गाँवों तक ही जा पाती थीं। वुफछ को पैदल ही चलना पड़ता था। जिनके पास साइकिल नहीं है वे अब भी पैदल ही जाती हंै। पिफर उन्हें बच्चों की देखभाल के लिए या पीने का पानी लाने जैसे घरेलू कामों के लिए भी जल्दी ही भागकर घर पहुँचना पड़ता था। अब जिनके पास साइकिलें हैं वे सारा काम बिना किसी दिक्कत के कर लेती हैं। इसका अथर् यह हुआ कि अब आप किसी सुनसान रास्ते पर भी देख सकते हैं कि कोइर् युवा - माँ साइकिल पर आगे अपने बच्चे को बैठाए, पीछे वैफरियर पर सामान लादे चली जा रही है। वह अपने साथ पानी से भरे दो या तीन बतर्न लिए अपने घर या काम पर जाती देखी जा सकती है। 76 वसंत भाग 3 अन्य पहलुओं से श्यादा आथ्िार्क पहलू पर ही बल देना गलत होगा। साइकिल प्रश्िाक्षण से महिलाओं के अंदर आत्मसम्मान की भावना पैदा हुइर् है यह बहुत महत्वपूणर् है। पफातिमा का कहना हैμफ्बेशक, यह मामला केवल आथ्िार्क नहीं है।य् पफातिमा ने यह बात इस तरह कही जिससे मुझे लगा कि मैं कितनी मूखर्तापूणर् ढंग से सोच रहा था। उसने आगे कहाμफ्साइकिल चलाने से मेरी कौन सी कमाइर् होती है। मैं तो पैसे ही गँवाती हूँ। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं साइकिल खरीद सवूँफ। लेकिन हर शाम मैं किराए पर साइकिल लेती हूँ ताकि मैं आशादी और खुशहाली का अनुभव कर सवूँफ।य् पुडुको‘इर् पहुँचने से पहले मैंने इस विनम्र सवारी के बारे में कभी इस तरह सोचा ही नहीं था। मैंने कभी साइकिल को आशादी का प्रतीक नहीं समझता था। एक महिला ने बतायाμफ्लोगों के लिए यह समझना बड़ा कठिन है कि ग्रामीण महिलाओं के लिए यह कितनी बड़ी चीश है। उनके लिए तो यह हवाइर् जहाश उड़ाने जैसी बड़ी उपलब्िध है। लोग इस पर हँस सकते हैं लेकिन केवल यहाँ की औरतें ही समझ सकती हैं कि उनके लिए यह कितना महत्वपूणर् है। जो पुरुष इसका विरोध करते हैं, वे जाएँ और टहलें क्योंकि जब साइकिल चलाने की बात आती है, वे महिलाओं की बराबरी कर ही नहीं सकते।य् μपी. साइर्नाथ प्रश्न - अभ्यास जंजीरें 1.फ्...उन जंजीरों को तोड़ने का जिनमें वे जकड़े हुए हैं, कोइर् - न - कोइर् तरीका लोग निकाल ही लेते हैं...य् आपके विचार से लेखक ‘जंजीरों’ द्वारा किन समस्याओं की ओर इशारा कर रहा है? जहाँ पहिया है 77 2.क्या आप लेखक की इस बात से सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण भी बताइए। पहिया 1.‘साइकिल आंदोलन’ से पुडुको‘इर् की महिलाओं के जीवन में कौन - कौन से बदलाव आए हैं? 2.शुरूआत में पुरुषों ने इस आंदोलन का विरोध किया परंतु आर. साइकिल्स के मालिक ने इसका समथर्न किया, क्यों? 3.प्रारंभ में इस आंदोलन को चलाने में कौन - कौन सी बाधा आइर्? शीषर्क की बात 1.आपके विचार से लेखक ने इस पाठ का नाम ‘जहाँ पहिया है’ क्यों रखा होगा? 2.अपने मन से इस पाठ का कोइर् दूसरा शीषर्क सुझाइए। अपने दिए हुए शीषर्क के पक्ष में तवर्फ दीजिए। समझने की बात 1.फ्लोगों के लिए यह समझना बड़ा कठिन है कि ग्रामीण औरतों के लिए यह कितनी बड़ी चीश है। उनके लिए तो यह हवाइर् जहाश उड़ाने जैसी बड़ी उपलब्िध है।य् साइकिल चलाना ग्रामीण महिलाओं के लिए इतना महत्वपूणर् क्यों है? समूह बनाकर चचार् कीजिए। 2.फ्पुडुको‘इर्र् पहुँचने से पहले मैंने इस विनम्र सवारी के बारे में इस तरह सोचा ही नहीं था।य् साइकिल को विनम्र सवारी क्यों कहा गया है? साइकिल 1.पफातिमा ने कहा,य्...मैं किराए पर साइकिल लेती हूँ ताकि मैं आशादी और खुशहाली का अनुभव कर सवूँफ।य् 78 वसंत भाग - 3 साइकिल चलाने से पफातिमा और पुडुको‘इर् की महिलाओं को ‘आशादी’ का अनुभव क्यों होता होगा? कल्पना से 1.पुडुको‘इर् में कोइर् महिला अगर चुनाव लड़ती तो अपना पाटीर् - चिÉ क्या बनाती और क्यों? 2.अगर दुनिया के सभी पहिए हड़ताल कर दंे तो क्या होगा? 3.फ्1992 में अंतरार्ष्ट्रीय महिला दिवस के बाद अब यह िाला कभी भी पहले जैसा नहीं हो सकता।य् इस कथन का अभ्िाप्राय स्पष्ट कीजिए। 4.मान लीजिए आप एक संवाददाता हैंे। आपको 8 माचर् 1992 के दिन पुडुको‘इर् में हुइर् घटना का समाचार तैयार करना है। पाठ में दी गइर् सूचनाओं और अपनी कल्पना के आधर पर एक समाचार तैयार कीजिए। 5.अगले पृष्ठ पर दी गयी ‘पिता के बाद’ कविता पढि़ए। क्या कविता में और पफातिमा की बात में कोइर् संबंध हो सकता है? अपने विचार लिख्िाए। भाषा की बात उपसगा±े और प्रत्ययों के बारे में आप जान चुके हैं। इस पाठ में आए उपसगर्युक्त शब्दों को छाँटिए। उनके मूल शब्द भी लिख्िाए। आपकी सहायता के लिए इस पाठ में प्रयुक्त वुफछ ‘उपसगर्’ और ‘प्रत्यय’ इस प्रकार हैंμअभ्िा, प्र, अनु, परि, वि;उपसगर्द्ध, इक, वाला, ता, ना। केवल पढ़ने के लिए पिता के बाद लड़कियाँ ख्िालख्िालाती हैं तेश धूप में, लड़कियाँ ख्िालख्िालाती हैं तेश बारिश में, लड़कियाँ हँसती हैं हर मौसम में। लड़कियाँ पिता के बाद सँभालती हंै पिता के पिता से मिली दुकान, लड़कियाँ वारिस हंै पिता की। लड़कियों ने समेट लिया माँ को पिता के बाद, लड़कियाँ होती हैं माँ। दुकान पर बैठ लड़कियाँ μमुक्ता

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Vasant Bhag 3 Chapter-13

13

जहाँ पहिया है

पुडुकोट्टई (तमिलनाडु)ः साइकिल चलाना एक सामाजिक आंदोलन है? कुछ अजीब-सी बात है–है न! लेकिन चौंकने की बात नहीं है। पुडुकोट्टई ज़िले की हज़ारों नवसाक्षर ग्रामीण महिलाओं के लिए यह अब आम बात है। अपने पिछड़ेपन पर लात मारने, अपना विरोध व्यक्त करने और उन ज़ंजीरों को तोड़ने का जिनमें वे जकड़े हुए हैं, कोई-न-कोई तरीका लोग निकाल ही लेते हैं। कभी-कभी ये तरीके अजीबो-गरीब होते हैं।

भारत के सर्वाधिक गरीब ज़िलों में से एक है पुडुकोट्टई। पिछले दिनों यहाँ की ग्रामीण महिलाओं ने अपनी स्वाधीनता, आज़ादी और गतिशीलता को अभिव्यक्त करने के लिए प्रतीक के रूप में साइकिल को चुना है। उनमें से अधिकांश नवसाक्षर थीं। अगर हम दस वर्ष से कम उम्र की लड़कियों को अलग कर दें तो इसका अर्थ यह होगा कि यहाँ ग्रामीण महिलाओं के एक-चौथाई हिस्से ने साइकिल चलाना सीख लिया है और इन महिलाओं में से सत्तर हज़ार से भी अधिक महिलाओं ने ‘प्रदर्शन एवं प्रतियोगिता’ जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़े गर्व के साथ अपने नए कौशल का प्रदर्शन किया और अभी भी उनमें साइकिल चलाने की इच्छा जारी है। वहाँ इसके लिए कई ‘प्रशिक्षण शिविर’ चल रहे हैं।

ग्रामीण पुडुकोट्टई के मुख्य इलाकों में अत्यंत रूढ़िवादी पृष्ठभूमि से आईं युवा मुस्लिम लड़कियाँ सड़कों से अपनी साइकिलों पर जाती हुई दिखाई देती हैं। जमीला बीवी नामक एक युवती ने जिसने साइकिल चलाना शुरू किया है, मुझसे कहा–"यह मेरा अधिकार है, अब हम कहीं भी जा सकते हैं। अब हमें बस का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। मुझे पता है कि जब मैंने साइकिल चलाना शुरू किया तो लोग फ़ब्तियाँ कसते थे। लेकिन मैंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।"

फातिमा एक माध्यमिक स्कूल में पढ़ाती हैं और उन्हें साइकिल चलाने का एेसा चाव लगा है कि हर शाम आधा घंटे के लिए किराए पर साइकिल लेती हैं। एक नयी साइकिल खरीदने की उनकी हैसियत नहीं है। फातिमा ने बताया कि–"साइकिल चलाने में एक खास तरह की आज़ादी है। हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मैं कभी इसे नहीं छोडँ़ूगी।" जमीला, फातिमा और उनकी मित्र अवकन्नी–इन सबकी उम्र 20 वर्ष के आसपास है और इन्होंने अपने समुदाय की अनेक युवतियों को साइकिल चलाना सिखाया है।

इस ज़िले में साइकिल की धूम मची हुई है। इसकी प्रशंसकों में हैं महिला खेतिहर मज़दूर, पत्थर खदानों में मज़दूरी करनेवाली औरतें और गाँवों में काम करनेवाली नर्सें। बालवाड़ी और आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, बेशकीमती पत्थरों को तराशने में लगी औरतें और स्कूल की अध्यापिकाएँ भी साइकिल का जमकर इस्तेमाल कर रही हैं। ग्राम सेविकाएँ और दोपहर का भोजन पहुँचानेवाली औरतें भी पीछे नहीं हैं। सबसे बड़ी संख्या उन लोगों की है जो अभी नवसाक्षर हुई हैं। जिस किसी नवसाक्षर अथवा नयी-नयी साइकिल चलानेवाली महिला से मैंने बातचीत की, उसने साइकिल चलाने और अपनी व्यक्तिगत आज़ादी के बीच एक सीधा संबंध बताया।

साइकिल आंदोलन की एक अगुआ का कहना है, "मुख्य बात यह है कि इस आंदोलन ने महिलाओं को बहुत आत्मविश्वास प्रदान किया। महत्वपूर्ण यह है कि इसने पुरुषों पर उनकी निर्भरता कम कर दी है। अब हम प्रायः देखते हैं कि कोई औरत अपनी साइकिल पर चार किलोमीटर तक की दूरी आसानी से तय कर पानी लाने जाती है। कभी-कभी साथ में उसके बच्चे भी होते हैं। यहाँ तक कि साइकिल से दूसरे स्थानों से सामान ढोने की व्यवस्था भी खुद ही की जा सकती है। लेकिन यकीन मानिए, जब इन्होंने साइकिल चलाना शुरू किया तो इन पर लोगों ने जमकर प्रहार किया जिसे इन्हें झेलना पड़ा। गंदी-गंदी टिप्पणियाँ की गईं लेकिन धीरे-धीरे साइकिल चलाने को सामाजिक स्वीकृति मिली। इसलिए महिलाओं ने इसे अपना लिया।

साइकिल प्रशिक्षण शिविर देखना एक असाधारण अनुभव है। किलाकुरुचि गाँव में सभी साइकिल सीखनेवाली महिलाएँ रविवार को इकट्ठी हुई थीं। साइकिल चलाने के आंदोलन के समर्थन में एेसे आवेग देखकर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता। उन्हें इसे सीखना ही है। साइकिल ने उन्हें पुरुषों द्वारा थोपे गए दायरे के अंदर रोज़मर्रा की घिसी-पिटी चर्चा से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया। ये नव-साइकिल चालक गाने भी गाती हैं। उन गानों में साइकिल चलाने को प्रोत्साहन दिया गया है। इनमें से एक गाने की पंक्ति का भाव है–‘ओ बहिना, आ सीखें साइकिल, घूमें समय के पहिए संग...’

जिन्हें साइकिल चलाने का प्रशिक्षण मिल चुका है उनमें से बहुत बड़ी संख्या में साइकिल सीख चुकी महिलाएँ अभी नयी-नयी साइकिल सीखनेवाली महिलाओं को भरपूर सहयोग देती हैं। उनमें यहाँ न केवल सीखने-सिखाने की इच्छा दिखाई देती है; बल्कि उनके बीच यह उत्साह भी दिखाई देता है कि सभी महिलाओं को साइकिल चलाना सीखना चाहिए।

1992 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के बाद अब यह ज़िला कभी भी पहले जैसा नहीं हो सकता। हैंडल पर झंडियाँ लगाए, घंटियाँ बजाते हुए साइकिल पर सवार 1500 महिलाओं ने पुडुकोट्टई में तूफ़ान ला दिया। महिलाओं की साइकिल चलाने की इस तैयारी ने यहाँ रहनेवालों को हक्का-बक्का कर दिया।

इस सारे मामले पर पुरुषों की क्या राय थी? इसके पक्ष में ‘आर. साइकिल्स’ के मालिक को तो रहना ही था। इस अकेले डीलर के यहाँ लेडीज़ साइकिल की बिक्री में साल भर के अंदर काफी वृद्धि हुई। माना जा सकता है कि इस आँकड़े को दो कारणों से कम करके आँका गया। पहली बात तो यह है कि–ढेर सारी महिलाओं ने जो लेडीज़ साइकिल का इंतज़ार नहीं कर सकती थीं, जेंट्स साइकिलें खरीदने लगीं। दूसरे, उस डीलर ने बड़ी सतर्कता के साथ यह जानकारी मुझे दी थी–उसे लगा कि मैं बिक्री कर विभाग का कोई आदमी हूँ।

कुदिमि अन्नामलाई की चिलचिलाती धूप में एक अद्भुत दृश्य की तरह पत्थर के खदानों में दौड़ती-भागती बाईस वर्षीय मनोरमनी को लोगों ने साइकिल सिखलाते देखा। उसने मुझे बताया–"हमारा इलाका मुख्य शहर से कटा हुआ है। यहाँ जो साइकिल चलाना जानते हैं उनकी गतिशीलता बढ़ जाती है।"

साइकिल चलाने के बहुत निश्चित आर्थिक निहितार्थ थे। इससे आय में वृद्धि हुई है। यहाँ की कुछ महिलाएँ अगल-बगल के गाँवों में कृषि संबंधी अथवा अन्य उत्पाद बेच आती हैं। साइकिल की वजह से बसों के इंतज़ार में व्यय होने वाला उनका समय बच जाता है। खराब परिवहन व्यवस्था वाले स्थानों के लिए तो यह बहुत महत्वपूर्ण है। दूसरे, इससे इन्हें इतना समय मिल जाता है कि ये अपने सामान बेचने पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर पाती हैं। तीसरे, इससे ये और अधिक इलाकों में जा पाती हैं। अंतिम बात यह है कि अगर आप चाहें तो इससे आराम करने का काफ़ी समय मिल सकता है।

जिन छोटे उत्पादकों को बसों का इंतज़ार करना पड़ता था, बस स्टॉप तक पहुँचने के लिए भी पिता, भाई, पति या बेटों पर निर्भर रहना पड़ता था। वे अपना सामान बेचने के लिए कुछ गिने-चुने गाँवों तक ही जा पाती थीं। कुछ को पैदल ही चलना पड़ता था। जिनके पास साइकिल नहीं है वे अब भी पैदल ही जाती हैं। फिर उन्हें बच्चों की देखभाल के लिए या पीने का पानी लाने जैसे घरेलू कामों के लिए भी जल्दी ही भागकर घर पहुँचना पड़ता था। अब जिनके पास साइकिलें हैं वे सारा काम बिना किसी दिक्कत के कर लेती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब आप किसी सुनसान रास्ते पर भी देख सकते हैं कि कोई युवा-माँ साइकिल पर आगे अपने बच्चे को बैठाए, पीछे कैरियर पर सामान लादे चली जा रही है। वह अपने साथ पानी से भरे दो या तीन बर्तन लिए अपने घर या काम पर जाती देखी जा सकती है।

अन्य पहलुओं से ज़्यादा आर्थिक पहलू पर ही बल देना गलत होगा। साइकिल प्रशिक्षण से महिलाओं के अंदर आत्मसम्मान की भावना पैदा हुई है यह बहुत महत्वपूर्ण है। फातिमा का कहना है–"बेशक, यह मामला केवल आर्थिक नहीं है।" फातिमा ने यह बात इस तरह कही जिससे मुझे लगा कि मैं कितनी मूर्खतापूर्ण ढंग से सोच रहा था। उसने आगे कहा–"साइकिल चलाने से मेरी कौन सी कमाई होती है। मैं तो पैसे ही गँवाती हूँ। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं साइकिल खरीद सकूँ। लेकिन हर शाम मैं किराए पर साइकिल लेती हूँ ताकि मैं आज़ादी और खुशहाली का अनुभव कर सकूँ।" पुडुकोट्टई पहुँचने से पहले मैंने इस विनम्र सवारी के बारे में कभी इस तरह सोचा ही नहीं था। मैंने कभी साइकिल को आज़ादी का प्रतीक नहीं समझता था।

एक महिला ने बताया–"लोगों के लिए यह समझना बड़ा कठिन है कि ग्रामीण महिलाओं के लिए यह कितनी बड़ी चीज़ है। उनके लिए तो यह हवाई जहाज़ उड़ाने जैसी बड़ी उपलब्धि है। लोग इस पर हँस सकते हैं लेकिन केवल यहाँ की औरतें ही समझ सकती हैं कि उनके लिए यह कितना महत्वपूर्ण है। जो पुरुष इसका विरोध करते हैं, वे जाएँ और टहलें क्योंकि जब साइकिल चलाने की बात आती है, वे महिलाओं की बराबरी कर ही नहीं सकते।"

–पी. साईनाथ

प्रश्न-अभ्यास

जंजीरें

1. "...उन जंजीरों को तोड़ने का जिनमें वे जकड़े हुए हैं, कोई-न-कोई तरीका लोग निकाल ही लेते हैं..."

आपके विचार से लेखक ‘जंजीरों’ द्वारा किन समस्याओं की ओर इशारा कर रहा है?

2. क्या आप लेखक की इस बात से सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण भी बताइए।

पहिया

1. ‘साइकिल आंदोलन’ से पुडुकोट्टई की महिलाओं के जीवन में कौन-कौन से बदलाव आए हैं?

2. शुरूआत में पुरुषों ने इस आंदोलन का विरोध किया परंतु आर. साइकिल्स के मालिक ने इसका समर्थन किया, क्यों?

3. प्रारंभ में इस आंदोलन को चलाने में कौन-कौन सी बाधा आई?

शीर्षक की बात

1. आपके विचार से लेखक ने इस पाठ का नाम ‘जहाँ पहिया है’ क्यों रखा होगा?

2. अपने मन से इस पाठ का कोई दूसरा शीर्षक सुझाइए। अपने दिए हुए शीर्षक के पक्ष में तर्क दीजिए।

समझने की बात

1. "लोगों के लिए यह समझना बड़ा कठिन है कि ग्रामीण औरतों के लिए यह कितनी बड़ी चीज़ है। उनके लिए तो यह हवाई जहाज़ उड़ाने जैसी बड़ी उपलब्धि है।"

साइकिल चलाना ग्रामीण महिलाओं के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? समूह बनाकर चर्चा कीजिए।

2. "पुडुकोट्टई पहुँचने से पहले मैंने इस विनम्र सवारी के बारे में इस तरह सोचा ही नहीं था।"

साइकिल को विनम्र सवारी क्यों कहा गया है?

साइकिल

1. फातिमा ने कहा,"...मैं किराए पर साइकिल लेती हूँ ताकि मैं आज़ादी और खुशहाली का अनुभव कर सकूँ।"

साइकिल चलाने से फातिमा और पुडुकोट्टई की महिलाओं को ‘आज़ादी’ का अनुभव क्यों होता होगा?

कल्पना से

1. पुडुकोट्टई में कोई महिला अगर चुनाव लड़ती तो अपना पार्टी-चिह्न क्या बनाती और क्यों?

2. अगर दुनिया के सभी पहिए हड़ताल कर दें तो क्या होगा?

3. "1992 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के बाद अब यह ज़िला कभी भी पहले जैसा नहीं हो सकता।"

इस कथन का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।

4. मान लीजिए आप एक संवाददाता हैें। आपको 8 मार्च 1992 के दिन पुडुकोट्टई में हुई घटना का समाचार तैयार करना है। पाठ में दी गई सूचनाओं और अपनी कल्पना के आधार पर एक समाचार तैयार कीजिए।

5. अगले पृष्ठ पर दी गयी ‘पिता के बाद’ कविता पढ़िए। क्या कविता में और फातिमा की बात में कोई संबंध हो सकता है? अपने विचार लिखिए।

भाषा की बात

उपसर्गाें और प्रत्ययों के बारे में आप जान चुके हैं। इस पाठ में आए उपसर्गयुक्त शब्दों को छाँटिए। उनके मूल शब्द भी लिखिए। आपकी सहायता के लिए इस पाठ में प्रयुक्त कुछ ‘उपसर्ग’ और ‘प्रत्यय’ इस प्रकार हैं–अभि, प्र, अनु, परि, वि(उपसर्ग), इक, वाला, ता, ना।

शब्दार्थ

फब्ती – चोट करने वाली या चुभती बात

यकीन – विश्वास

घिसीपिटी – जो बहुत दिनों से चली आ रही, पुरानी

केवल पढ़ने के लिए

पिता के बाद

लड़कियाँ खिलखिलाती हैं तेज़ धूप में,

लड़कियाँ खिलखिलाती हैं तेज़ बारिश में,

लड़कियाँ हँसती हैं हर मौसम में।

लड़कियाँ पिता के बाद सँभालती हैं

पिता के पिता से मिली दुकान,

लड़कियाँ वारिस हैं पिता की।

लड़कियों ने समेट लिया

माँ को पिता के बाद,

लड़कियाँ होती हैं माँ।

दुकान पर बैठ लड़कियाँ

सुनती हैं पूर्वजों की प्रतिध्वनियाँ,

उदास गीतों में वे ढूँढ़ लेती हैं जीवन राग,

धूप में, बारिश में,

हर मौसम में खिलखिलाती हैं लड़कियाँ।

–मुक्ता

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