10 कामचोर बड़ी देर के वाद - विवाद के बाद यह तय हुआ कि सचमुच नौकरों को निकाल दिया जाए। आख्िार, ये मोटे - मोटे किस काम के हैं! हिलकर पानी नहीं पीते। इन्हें अपना काम खुद करने की आदत होनी चाहिए। कामचोर कहीं के!‘‘तुम लोग वुफछ नहीं। इतने सारे हो और सारा दिन ऊधम मचाने के सिवा वुफछ नहीं करते।’’ और सचमुच हमें खयाल आया कि हम आख्िार काम क्यों नहीं करते? हिलकर पानी पीने में अपना क्या खचर् होता है? इसलिए हमने तुरंत हिल - हिलाकर पानी पीना शुरू किया। हिलने में धक्के भी लग जाते हैं और हम किसी के दबैल तो थे नहीं कि कोइर् धक्का दे, तो सह जाएँ। लीजिए, पानी के मटकों के पास ही घमासान यु( हो गया। सुराहियाँ उधर लुढ़कीं। मटके इधर गए। कपड़े भीगे, सो अलग। ‘यह भला काम करेंगे।’ अम्मा ने निश्चय किया। ‘‘करेंगे कैसे नहीं! देखो जी! जो काम नहीं करेगा, उसे रात का खाना हरगिज नहीं मिलेगा। समझे।’’ यह लीजिए बिलवुफल शाही पफरमान जारी हो रहे हैं। ‘‘हम काम करने को तैयार हैं। काम बताए जाएँ,’’ हमने दुहाइर् दी। ‘‘बहुत - से काम हैं जो तुम कर सकते हो। मिसाल के लिए, यह दरी कितनी मैली हो रही है। आँगन में कितना वूफड़ा पड़ा है। पेड़ों में पानी देना है और भाइर्मुफ्रत तो यह काम करवाए नहीं जाएँगे। तुम सबको तनख्वाह भी मिलेगी।’’ अब्बा मियाँ ने वुफछ काम बताए और दूसरे कामों का हवाला भी दियाμमाली को तनख्वाह मिलती है। अगर सब बच्चे मिलकर पानी डालें, तो..‘ऐ हे! खुदा के लिए नहीं। घर मंे बाढ़ आ जाएगी।’ अम्मा ने याचना की। पिफर भी तनख्वाह के सपने देखते हुए हम लोग काम पर तुल गए। एक दिन पफशीर् दरी पर बहुत - से बच्चे जुट गए और चारों ओर से कोने पकड़कर झटकना शुरू किया। दो - चार ने लकडि़याँ लेकर धुआँधार पिटाइर् शुरू कर दी। सारा घर धूल से अट गया। खाँसते - खाँसते सब बेदम हो गए। सारी धूल जो दरी पर थी, जो पफशर् पर थी, सबके सिरों पर जम गइर्। नाकों और आँखों में घुस गइर्र्। बुरा हाल हो गया सबका। हम लोगों को तुरंत आँगन में निकाला गया। वहाँ हम लोगों ने पफौरन झाड़ देने का पफैसला किया।ूझाड़ क्योंकि एक थी औरूतनख्वाह लेनेवाले उम्मीदवार बहुत, इसलिए क्षण - भर में झाड़ के पुजेर् उड़ गए। जितनीूसींके जिसके हाथ पड़ीं, वह उनसे ही उलटे - सीधे हाथ मारने लगा। अम्मा ने सिर पीट लिया। भइर्, ये बुजुगर् काम करने दें तो इंसान काम करे। जब शरा - शरा सी बात पर टोकने लगे तो बस, हो चुका काम! कामचोर असल में झाड़ देने से पहले शरा - सा पानी छिड़क लेना चाहिए। बस, यहूखयाल आते ही तुरंत दरी पर पानी छिड़का गया। एक तो वैसे ही धूल से अटी हुइर् थी। पानी पड़ते ही सारी धूल कीचड़ बन गइर्। अब सब आँगन से भी निकाले गए। तय हुआ कि पेड़ों को पानी दिया जाए। बस, सारे घर की बालटियाँ, लेाटे, तसले, भगोने, पतीलियाँ लूट ली गईं। जिन्हें ये चीजें भी न मिलीं, वे डोंगे - कटोरे और गिलास ही ले भागे। अब सब लोग नल पर टूट पड़े। यहाँ भी वह घमासान मची कि क्या मजाल जो एक बूँद पानी भी किसी के बतर्न में आ सके। ठूसम - ठास! किसी बालटी पर पतीला और पतीले पर लोटा और भगोने और डोंगे। पहले तो धक्के चले। पिफर वुफहनियाँ और उसके बाद बरतन। पफौरन बड़े भाइयों, बहनों, मामुओं और दमदार मौसियों, पूफपिफयों की वुफमक भेजी गइर्, पफौज मैदान में हथ्िायार पेंफककर पीठ दिखा गइर्। इस धींगामुश्ती में वुफछ बच्चे कीचड़ में लथपथ हो गए जिन्हें नहलाकर कपड़े बदलवाने के लिए नौकरों की वतर्मान संख्या कापफी नहीं थी। पास के बंगलों से नौकर आए और चार आना प्रति बच्चा के हिसाब से नहलवाए गए। हम लोग कायल हो गए कि सचमुच यह सपफाइर् का काम अपने बस की बात़नहीं और न पेड़ों की देखभाल हमसे हो सकती है। कम - से - कम मुगिर्याँ ही बंद कर दें। बस, शाम ही से जो बाँस, छड़ी हाथ पड़ी, लेकर मुगिर्याँ हाँकने लगे। ‘चल दड़बे, दड़बे।’पर साहब, मुगिर्यों को भी किसी ने हमारे विरु( भड़का रखा था। ऊट - पटाँग इधर - उधर वूफदने लगीं। दो मुगिर्याँ खीर के प्यालों से जिन पर आया चाँदी के वकर् लगा रही थी, दौड़ती - पफड़पफड़ाती हुइर् निकल गईं। तूपफान गुजरने के बाद पता चला कि प्याले खाली हैं और सारी खीर दीदी वेफ़कामदानी के दुप‘े और ताजे धुले सिर पर लगी हुइर् है। एक बड़ा - सा मुगार् अम्मा के खुले हुए पानदान में वूफद पड़ा और कत्थे - चूने में लुथड़े हुए पंजे लेकर नानी अम्मा की सप़्ोफद दूध जैसी चादर पर छापे मारता हुआ निकल गया। एक मुगीर् दाल की पतीली में छपाक मारकर भागी और सीधी जाकर मोरी में इस तेशी से पिफसली कि सारी कीचड़ मौसी जी के मुँह पर पड़ी जो बैठी हुइर् हाथ - मुँह धो रही थीं। इधर सारी मुगिर्याँ बेनकेल का उँफट बनी चारों तरप़्ाफ दौड़ रही थीं। एक भी दड़बे में जाने को राजी न थी। इधर, किसी को सूझी कि जो भेड़ें आइर् हुइर् हैं, लगे हाथों उन्हें भी दाना ख्िाला दिया जाए। दिन - भर की भूखी भेड़ें दाने का सूप देखकर जो सबकी सब झपटीं तो भागकर जाना कठिन हो गया। लश्टम - पश्टम तख्तों पर चढ़ गईं। पर भेड़ - चाल मशहूर है। उनकी नशर तो बस दाने के सूप पर जमी हुइर् थी। पलंगों को पफलाँगती, बरतन लुढ़काती साथ - साथ चढ़ गईं। तख्त पर बानी दीदी का दुप‘ा पैफला हुआ था जिस पर गोखरी, चंपा और सलमा - सितारे रखकर बड़ी दीदी मुगलानी बुआ को वुफछ बता रही थीं। भेड़ें बहुत निःसंकोच सबको रौंदती, मेंगनों का छिड़काव करती हुइर् दौड़ गईं। जब तूप़्ाफान गुजर चुका तो ऐसा लगा जैसे जमर्नी की सेना टैंकों और बमबारों सहित उधर से छापा मारकर गुजर गइर् हो। जहाँ - जहाँ से सूप गुजरा, भेड़ें श्िाकारीवुफत्तों की तरह गंध सूँघती हुइर् हमला करती गईं। हज्जन माँ एक पलंग पर दुप‘े से मुँह ढाँके सो रही थीं। उन पर से जो भेड़ें दौड़ीं तो न जाने वह सपने में किन महलों की सैर कर रही थीं, दुप‘े में उलझी हुइर् ‘मारो - मारो’ चीखने लगीं। इतने में भेड़ें सूप को भूलकर तरकारीवाली की टोकरी पर टूट पड़ीं। वह दालान में बैठी मटर की पफलियाँ तोल - तोल कर रसोइए को दे रही थी। वह अपनी तरकारी का बचाव करने के लिए सीना तान कर उठ गइर्। आपने कभी भेड़ों को मारा होगा, तो अच्छी तरह देखा होगा कि बस, ऐसा लगता है जैसे रुइर् के तकिए को वूफट रहे हों। भेड़ को चोट ही नहीं लगती। बिलवुफल यह समझकर कि आप उससे मशाक कर रहे हैं। वह आप ही पर चढ़ बैठेगी। शरा - सी देर में भेड़ों ने तरकारी छिलकों समेत अपने पेट की कड़ाही में झौंक दी। कामचोर इधर यह प्रलय मची थी, उधर दूसरे बच्चे भी लापरवाह नहीं थे। इतनी बड़ी पफौज थी - जिसे रात का खाना न मिलने की धमकी मिल चुकी थी। वे चार भैंसों का दूध दुहने पर जुट गए। धुली - बेधुली बालटी लेकर आठ हाथ चार थनों पर पिल पड़े। भैंस एकदम जैसे चारों पैर जोड़कर उठी और बालटी को लात मारकर दूर जा खड़ी हुइर्। तय हुआ कि भैंस की अगाड़ी - पिछाड़ी बाँध दी जाए और पिफर काबू में लाकर दूध दुह लिया जाए। बस, झूले की रस्सी उतारकर भैंस के पैर बाँध दिए गए। पिछले दो पैर चाचा जी की चारपाइर् के पायों से बाँध, अगले दो पैरों को बाँधने की कोश्िाश जारी थी कि भैंस चैकन्नी को गइर्। छूटकर जो भागी तो पहले चाचा जी समझे कि शायद कोइर् सपना देख रहे हैं। पिफर जब चारपाइर् पानी के ड्रम से टकराइर् और पानी छलककर गिरा तो समझे कि आँधी - तूपफान में पँफसे हैं। साथ में़भूचाल भी आया हुआ है। पिफर जल्दी ही उन्हें असली बात का पता चल गया और वह पलंग की दोनों पटियाँ पकड़े, बच्चों को छोड़ देनेवालों को बुरा - भला सुनाने लगे। यहाँ बड़ा मशा आ रहा था। भैंस भागी जा रही थी और पीछे - पीछे चारपाइर् और उस पर बैठे हुए थे चाचा जी। ओहो! एक भूल ही हो गइर् यानी बछड़ा तो खोला ही नहीं, इसलिए तत्काल बछड़ा भी खोल दिया गया। तीर निशाने पर बैठा और बछड़े की ममता में व्यावुफल होकर भैंस ने अपने खुरों को ब्रेक लगा दिए। बछड़ा तत्काल जुट गया। दुहने वाले गिलास - कटोरे लेकर लपके क्योंकि बालटी तो छपाक से गोबर में जा गिरी थी। बछड़ा पिफर बागी हो गया। वुफछ दूध जमीन पर और कपड़ों पर गिरा। दो - चार धारें गिलास - कटोरों पर भी पड़ गईं। बाकी बछड़ा पी गया। यह सब वुफछ, वुफछ मिनट के तीन - चैथाइर् में हो गया। घर में तूपफान उठ खड़ा हुआ। ऐसा लगता था जैसे सारे घर में मुगिर्याँ, भेडें,़टूटे हुए तसले, बालटियाँ, लोटे, कटोरे और बच्चे थे। बच्चे बाहर किए गए। मुगिर्याँ बाग में हँकाइर् गईं। मातम - सा मनाती तरकारी वाली के आँसू पोंछे गए और अम्मा आगरा जाने के लिए सामान बाँधने लगीं। ‘‘या तो बच्चा - राज कायम कर लो या मुझे ही रख लो। नहीं तो मैं चली मायके,’’ अम्मा ने चुनौती दे दी। और अब्बा ने सबवफो कतार में खड़ा करके पूरी बटालियन का कोटर् माशर्ल कर दिया। ‘‘अगर किसी बच्चे ने घर की किसी चीश को हाथ लगाया तो बस, रात का खाना बंद हो जाएगा।’’ ये लीजिए! इन्हंे किसी करवट शांति नहीं। हम लोगों ने भी निश्चय कर लिया कि अब चाहे वुफछ भी हो जाए, हिलकर पानी भी नहीं पिएँगे। μइस्मत चुगताइर् कामचोर 57 कहानी से 1.कहानी में ‘मोटे - मोटे किस काम के हैं?’ किन के बारे में और क्यों कहा गया? 2.बच्चों के उफध्म मचाने के कारण घर की क्या दुदर्शा हुइर्? 3.फ्या तो बच्चाराज कायम कर लो या मुझे ही रख लो।य् अम्मा ने कब कहा? और इसका परिणाम क्या हुआ? 4.‘कामचोर’ कहानी क्या संदेश देती है? 5.क्या बच्चों ने उचित निणर्य लिया कि अब चाहे वुफछ भी हो जाए, हिलकर पानी भी नहीं पिएँगे। कहानी से आगे 1.घर के सामान्य काम हों या अपना निजी काम, प्रत्येक व्यक्ित को अपनी क्षमता के अनुरूप उन्हें करना आवश्यक क्यों है? 2.भरा - पूरा परिवार वैफसे सुखद बन सकता है और वैफसे दुखद? कामचोर कहानी के आधर पर निणर्य कीजिए। 3.बड़े होते बच्चे किस प्रकार माता - पिता के सहयोगी हो सकते हैं और किस प्रकार भार? कामचोर कहानी के आधर पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। 4.‘कामचोर’ कहानी एकल परिवार की कहानी है या संयुक्त परिवार की? इन दोनों तरह के परिवारों में क्या - क्या अंतर होते हैं? अनुमान और कल्पना 1.घरेलू नौकरों को हटाने की बात किन - किन परिस्िथतियों में उठ सकती है? विचार कीजिए। 2.कहानी में एक समृ( परिवार के उफध्मी बच्चों का चित्राण है। आपके अनुमान से उनकी आदत क्यों बिगड़ी होगी? उन्हें ठीक ढंग से रहने के लिए आप क्या - क्या सुझाव देना चाहेंगे? 3.किसी सपफल व्यक्ित की जीवनी से उसके विद्याथीर् जीवन की दिनचयार् के बारे में पढ़ंे और सुव्यवस्िथत कायर्शैली पर एक लेख लिखें। भाषा की बात फ्ध्ुली - बेध्ुली बालटी लेकर आठ हाथ चार थनों पर पिल पड़े।य् ध्ुली शब्द से पहले ‘बे’ लगाकर बेध्ुली बना है। जिसका अथर् है ‘बिना धुली’ ‘बे’ एक उपसगर् है। ‘बे’ उपसगर् से बननेवाले वुफछ और शब्द हैंμ बेतुका, बेइर्मान, बेघर, बेचैन, बेहोश आदि। आप भी नीचे लिखे उपसगो± से बननेवाले शब्द खोजिएμ 1 प्र ............ 2 आ ............ 3 भर ............ 4 बद ............

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