5चिऋियों की अनूठी दुनियापत्रों की दुनिया भी अजीबो - गरीब है और उसकी उपयोगिता हमेशा से बनी रही है। पत्रा जो काम कर सकते हैं, वह संचार का आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्रा जैसा संतोष पफोन या एसएमएस का संदेश कहाँ दे सकता है। पत्रा एक नया सिलसिला शुरू करते हैं और राजनीति, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों में तमाम विवाद और नयी घटनाओं की जड़ भी पत्रा ही होते हैं। दुनिया का तमाम साहित्य पत्रों पर वेंफदि्रत है और मानव सभ्यता के विकास में इन पत्रों ने अनूठी भूमिका निभाइर् है। पत्रों का भाव सब जगह एक - सा है, भले ही उसका नाम अलग - अलग हो। पत्रा को उदर्ू में खत, संस्वृफत में पत्रा, कन्नड़में कागद, तेलुगु में उत्तरम्, जाबू और लेख तथा तमिल में कडिद कहा जाता है। पत्रा यादों को सहेजकर रखते हैं, इसमें किसी को कोइर् संदेह नहीं है। हर एक की अपनी पत्रा लेखन कला है और हर एक के पत्रों का अपना दायरा। दुनिया भर में रोश करोड़ों पत्रा एक दूसरे को तलाशते तमाम वसंत भाग 3 ठिकानों तक पहुँचते हैं। भारत में ही रोश साढ़े चार करोड़ चिऋियाँ डाक में डाली जाती हैं जो साबित करती हैं कि पत्रा कितनी अहमियत रखते हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1953 में सही ही कहा था किμफ्हशारों सालों तक संचार का साधन केवल हरकारे ;रनसर्द्ध या पिफर तेश घोड़े रहे हैं। उसके बाद पहिए आए। पर रेलवे और तार से भारी बदलाव आया। तार ने रेलों से भी तेश गति से संवाद पहुँचाने का सिलसिला शुरू किया। अब टेलीपफोन, वायरलैस और आगे रेडार - दुनिया बदल रहा है।य् पिछली शताब्दी में पत्रा लेखन ने एक कला का रूप ले लिया। डाक व्यवस्था के सुधार के साथ पत्रों को सही दिशा देने के लिए विशेष प्रयास किए गए। पत्रा संस्वृफति विकसित करने के लिए स्वूफली पाठ्यक्रमांें में पत्रा लेखन का विषय भी शामिल किया गया। भारत ही नहीं दुनिया के कइर् देशों में ये प्रयास चले और विश्व डाक संघ ने अपनी ओर से भी काप़्ाफी प्रयास किए। विश्व डाक संघ की ओर से 16 वषर् से कम आयुवगर् के बच्चों के लिए पत्रा लेखन प्रतियोगिताएँ आयोजित करने का सिलसिला सन् 1972 से शुरू किया गया। यह सही है कि खास तौर पर बड़े शहरों और महानगरों में संचार साधनों के तेश विकास तथा अन्य कारणों से पत्रों की आवाजाही प्रभावित हुइर् है पर देहाती दुनिया आज भी चिऋियों से ही चल रही है। पैफक्स, इर् - मेल, टेलीपफोन तथ मोबाइल ने चिऋियों की तेशी को रोका है पर व्यापारिक डाक की संख्या लगातार बढ़ रही है। जहाँ तक पत्रों का सवाल है, अगर आप बारीकी से उसकी तह में जाएँ तो आपको ऐसा कोइर् नहीं मिलेगा जिसने कभी किसी को पत्रा न लिखा या न लिखाया हो या पत्रों का बेसब्री से जिसने इंतजार न किया हो। हमारे सैनिक तो पत्रों का जिस उत्सुकता से इंतजार करते हैं, उसकी कोइर् मिसाल ही नहीं। एक दौर था जब लोग पत्रों का महीनों इंतजार करते थे पर अब वह बात नहीं। परिवहन साधनों के विकास ने दूरी बहुत घटा दी है। पहले लोगों के लिए संचार का इकलौता साधन चिऋी ही थी पर आज और भी साधन विकसित हो चुके हैं। आज देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने पुरखों की चिऋियों को सहेज और सँजोकर विरासत के रूप में रखे हुए हों या पिफर बड़े - बड़े लेखक, पत्राकारों, उद्यमी, कवि, प्रशासक, संन्यासी या किसान, इनकी पत्रा रचनाएँ अपने आप में अनुसंधान का विषय हैं। अगर आज जैसे संचार साधन होते तो पंडित नेहरू अपनी पुत्राी इंदिरा गांधी को पफोन करते, पर तब पिता के पत्रा पुत्राी के नाम नहीं लिखे जाते जो देश के करोड़ों लोगों को प्रेरणा देते हैं। पत्रों को तो आप सहेजकर रख लेते हैं पर एसएमएस संदेशों को आप जल्दी ही भूल जाते हंै। कितने संदेशों को आप सहेजकर रख सकते हैं? तमाम महान हस्ितयों की तो सबसे बड़ी यादगार या धरोहर उनके द्वारा लिखे गए पत्रा ही हैं। भारत में इस श्रेणी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को सबसे आगे रखा जा सकता है। दुनिया के तमाम संग्रहालय जानी मानी हस्ितयों के पत्रों का अनूठा संकलन भी हैं। तमाम पत्रा देश, काल और समाज को जानने - समझने का असली पैमाना हंै। भारत में आशादी के पहले महासंग्राम के दिनों में जो वुफछ अंग्रेश अपफसरों ने अपने परिवारजनों को पत्रा में लिखे वे आगे चलकर बहुत महत्त्व की पुस्तक तक बन गए। इन पत्रों ने साबित किया कि यह संग्राम कितनी जमीनी मशबूती लिए हुए था। महात्मा गांधी के पास दुनिया भर से तमाम पत्रा केवल महात्मा गांधी - इंडिया लिखे आते थे और वे जहाँ भी रहते थे वहाँ तक पहुँच जाते थे। आशादी के आंदोलन की कइर् अन्य दिग्गज हस्ितयों के साथ भी ऐसा ही था। गांधीजी के वसंत भाग 3 पास देश - दुनिया से बड़ी संख्या में पत्रा पहुँचते थे पर पत्रों का जवाब देने के मामले में उनका कोइर् जोड़ नहीं था। कहा जाता है कि जैसे ही उन्हें पत्रा मिलता था, उसी समय वे उसका जवाब भी लिख देते थे। अपने हाथों से ही श्यादातर पत्रों का जवाब देते थे। जब लिखते - लिखते उनका दाहिना हाथ ददर् करने लगता था तो वे बाएँ हाथ से लिखने में जुट जाते थे। महात्मा गांधी ही नहीं आंदोलन के तमाम नायकों के पत्रा गाँव - गाँव में मिल जाते हैं। पत्रा भेजनेवाले लोग उन पत्रों को किसी प्रशस्ितपत्रा से कम नहीं मानते हैं और कइर् लोगों ने तो उन पत्रों को प्रेफम कराकर रख लिया है। यह है पत्रों का जादू। यही नहीं, पत्रों के आधार पर ही कइर् भाषाओं में जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं। वास्तव में पत्रा किसी दस्तावेश से कम नहीं हैं। पंत के दो सौ पत्रा बच्चन के नाम और निराला के पत्रा हमको लिख्यौ है कहा तथा पत्रों के आइर्ने में दयानंद सरस्वती समेत कइर् पुस्तवेंफ आपको मिल जाएँगी। कहा जाता है कि प्रेमचंद खास तौर पर नए लेखकों को बहुत प्रेरक जवाब देते थे तथा पत्रों के जवाब में वे बहुत मुस्तैद रहते थे। इसी प्रकार नेहरू और गांधी के लिखे गए रवींद्रनाथ टैगोर के पत्रा भी बहुत प्रेरक हंै। ‘महात्मा और कवि’ के नाम से महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच सन् 1915 से 1941 के बीच के पत्राचार का संग्रह प्रकाश्िात हुआ है जिसमें बहुत से नए तथ्यों और उनकी मनोदशा का लेखा - जोखा मिलता है। पत्रा व्यवहार की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। पर इसका असली विकास आशादी के बाद ही हुआ है। तमाम सरकारी विभागों की तुलना में सबसे श्यादा गुडविल डाक विभाग की ही है। इसकी एक खास वजह यह भी है कि यह लोगों को जोड़ने का काम करता है। घर - घर तक इसकी पहुँच है। संचार के तमाम उन्नत साधनों के बाद भी चिऋी - पत्राी की हैसियत बरकरार है। शहरी इलाकों में आलीशान हवेलियाँ हों या पिफर झोपड़प‘ियांे में रह रहे लोग, दुगर्म जंगलों से घ्िारे गाँव हों या पिफर बपफर्बारी के बीच जी रहे पहाड़ों के लोग, समुद्र तट पर रह रहे मछुआरे हों या पिफर रेगिस्तान की ढाँण्िायों में रह रहे लोग, आज भी खतों का ही सबसे अिाक बेसब्री से इंतजार होता है। एक दो नहीं, करोड़ों लोग खतों और अन्य सेवाओं के लिए रोज भारतीय डाकघरों के दरवाशों तक पहुँचते हैं और इसकी बहु आयामी भूमिका नशर आ रही है। दूर देहात में लाखों गरीब घरों में चूल्हे मनीआडर्र अथर्व्यवस्था से ही जलते हैं। गाँवों या गरीब बस्ितयों में चिऋी या मनीआडर्र लेकर पहुँचनेवाला डाकिया देवदूत के रूप में देखा जाता है। - अरविंद वुफमार सिंह पाठ सेे 1.पत्रा जैसा संतोष पफोन या एसएमएस का संदेश क्यों नहीं दे सकता? 2.पत्रा को खत, कागद, उत्तरम्, जाबू, लेख, कडिद, पाती, चिऋी इत्यादि कहा जाता है। इन शब्दों से संबंिात भाषाओं के नाम बताइए। 3.पत्रा लेखन की कला के विकास के लिए क्या - क्या प्रयास हुए? लिख्िाए। 4.पत्रा धरोहर हो सकते हैं लेकिन एसएमएस क्यों नहीं? तवर्फ सहित अपना विचार लिख्िाए। 5.क्या चिऋियों की जगह कभी पैफक्स, इर् - मेल, टेलीपफोन तथा मोबाइल ले सकते हैं? पाठ से आगे 1.किसी के लिए बिना टिकट सादे लिपफाप़़्ोफ पर सही पता लिखकर पत्रा बैरंग भेजने पर कौन - सी कठिनाइर् आ सकती है? पता कीजिए। वसंत भाग 3 2.पिन कोड भी संख्याओं में लिखा गया एक पता है, वैफसे? 3.ऐसा क्यों होता था कि महात्मा गांधी को दुनिया भर से पत्रा ‘महात्मा गांधीμइंडिया’ पता लिखकर आते थे? अनुमान और कल्पना 1.रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘भगवान के डाकिए’ आपकी पाठ्यपुस्तक में है। उसके आधार पर पक्षी और बादल को डाकिए की भांति मानकर अपनी कल्पना से लेख लिख्िाए। 2.संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास ने बादल को संदेशवाहक बनाकर ‘मेघदूत’ नाम का काव्य लिखा है। ‘मेघदूत’ के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए। 3.पक्षी को संदेशवाहक बनाकर अनेक कविताएँ एवं गीत लिखे गए हैं। एक गीत हैμ‘जा - जा रे कागा विदेशवा, मेरे पिया से कहियो संदेशवा’। इस तरह के तीन गीतों का संग्रह कीजिए। प्रश्िाक्ष्िात पक्षी के गले में पत्रा बाँधकर निधार्रित स्थान तक पत्रा भेजने का उल्लेख मिलता है। मान लीजिए आपको एक पक्षी को संदेशवाहक बनाकर पत्रा भेजना हो तो आप वह पत्रा किसे भेजना चाहेंगे और उसमें क्या लिखना चाहेंगे। 4.केवल पढ़ने के लिए दी गइर् रामदरश मिश्र की कविता ‘चिऋियाँ’ को ध्यानपूवर्क पढि़ए और विचार कीजिए कि क्या यह कविता केवल लेटर बाॅक्स में पड़ी निधार्रित पते पर जाने के लिए तैयार चिऋियों के बारे में है? या रेल के डिब्बे में बैठी सवारी भी उन्हीं चिऋियों की तरह हैं जिनके पास उनके गंतव्य तक का टिकट है। पत्रा के पते की तरह और क्या विद्यालयभी एक लेटर बाक्स की भाँति नहीं है जहाँ से उत्तीणर् होकर विद्याथीर् अनेक क्षेत्रों में चले जाते हैं? अपनी कल्पना को पंख लगाइए और मुक्त मन से इस विषय में विचार - विमशर् कीजिए। भाषा की बात 1.किसी प्रयोजन विशेष से संबंिात शब्दों के साथ पत्रा शब्द जोड़ने से वुफछ नए शब्द बनते हैं, जैसेμप्रशस्ित पत्रा, समाचार पत्रा। आप भी पत्रा के योग से बननेवाले दस शब्द लिख्िाए। चिऋियों की अनूठी दुनिया 2.‘व्यापारिक’ शब्द व्यापार के साथ ‘इक’ प्रत्यय के योग से बना है। इक प्रत्यय के योग से बननेवाले शब्दों को अपनी पाठ्यपुस्तक से खोजकर लिख्िाए। 3.दो स्वरों के मेल से होनेवाले परिवतर्न को स्वर संिा कहते हैंऋ जैसेμरवीन्द्र त्र रवि ़ इन्द्र। इस संध्ि में इ ़ इ त्र इर् हुइर् है। इसे दीघर् संध्ि कहते हैं। दीघर् स्वर संध्ि के और उदाहरण खोजकर लिख्िाए। मुख्य रूप से स्वर संिायाँ चार प्रकार की मानी गइर् हैंμदीघर्, गुण, वृि और यण। ”स्व या दीघर् अ, इ, उ के बाद ”स्व या दीघर् अ, इ, उ, आ आए तो ये आपस में मिलकर व्रफमशः दीघर् आ, इर्, उफ हो जाते हैं, इसी कारण इस संिा को दीघर् संिा कहते हैंऋ जैसेμसंग्रह ़ आलय त्र संग्रहालय, महा ़ आत्मा त्र महात्मा। इस प्रकार के कम - से - कम दस उदाहरण खोजकर लिख्िाए और अपनी श्िाक्ष्िाका/श्िाक्षक को दिखाइए। चिऋियाँ लेटरबक्स में पड़ी हुइर् चिऋियाँ अनंत सुख - दुख वाली अनंत चिऋियाँ लेकिन कोइर् किसी से नहीं बोलती सभी अकेले - अकेले अपनी मंजिल पर पहुँचने का इंतजार करती हैं। वैफसा है यह एक साथ होना

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Vasant Bhag 3 Chapter-5

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चिट्ठियों की अनूठी दुनिया


पत्रों की दुनिया भी अजीबो-गरीब है और उसकी उपयोगिता हमेशा से बनी रही है। पत्र जो काम कर सकते हैं, वह संचार का आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश कहाँ दे सकता है। पत्र एक नया सिलसिला शुरू करते हैं और राजनीति, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों में तमाम विवाद और नयी घटनाओं की जड़ भी पत्र ही होते हैं। दुनिया का तमाम साहित्य पत्रों पर केंद्रित है और मानव सभ्यता के विकास में इन पत्रों ने अनूठी भूमिका निभाई है। पत्रों का भाव सब जगह एक-सा है, भले ही उसका नाम अलग-अलग हो। पत्र को उर्दू में खत, संस्कृत में पत्र, कन्नड़ में कागद, तेलुगु में उत्तरम्, जाबू और लेख तथा तमिल में कडिद कहा जाता है। पत्र यादों को सहेजकर रखते हैं, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। हर एक की अपनी पत्र लेखन कला है और हर एक के पत्रों का अपना दायरा। दुनिया भर में रोज़ करोड़ों पत्र एक दूसरे को तलाशते तमाम ठिकानों तक पहुँचते हैं। भारत में ही रोज़ साढ़े चार करोड़ चिट्ठियाँ डाक में डाली जाती हैं जो साबित करती हैं कि पत्र कितनी अहमियत रखते हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1953 में सही ही कहा था कि–"हज़ारों सालों तक संचार का साधन केवल हरकारे (रनर्स) या फिर तेज़ घोड़े रहे हैं। उसके बाद पहिए आए। पर रेलवे और तार से भारी बदलाव आया। तार ने रेलों से भी तेज़ गति से संवाद पहुँचाने का सिलसिला शुरू किया। अब टेलीफोन, वायरलैस और आगे रेडार-दुनिया बदल रहा है।"


पिछली शताब्दी में पत्र लेखन ने एक कला का रूप ले लिया। डाक व्यवस्था के सुधार के साथ पत्रों को सही दिशा देने के लिए विशेष प्रयास किए गए। पत्र संस्कृति विकसित करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमाें में पत्र लेखन का विषय भी शामिल किया गया। भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में ये प्रयास चले और विश्व डाक संघ ने अपनी ओर से भी काफ़ी प्रयास किए। विश्व डाक संघ की ओर से 16 वर्ष से कम आयुवर्ग के बच्चों के लिए पत्र लेखन प्रतियोगिताएँ आयोजित करने का सिलसिला सन् 1972 से शुरू किया गया। यह सही है कि खास तौर पर बड़े शहरों और महानगरों में संचार साधनों के तेज़ विकास तथा अन्य कारणों से पत्रों की आवाजाही प्रभावित हुई है पर देहाती दुनिया आज भी चिट्ठियों से ही चल रही है। फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथ मोबाइल ने चिट्ठियों की तेज़ी को रोका है पर व्यापारिक डाक की संख्या लगातार बढ़ रही है।

जहाँ तक पत्रों का सवाल है, अगर आप बारीकी से उसकी तह में जाएँ तो आपको एेसा कोई नहीं मिलेगा जिसने कभी किसी को पत्र न लिखा या न लिखाया हो या पत्रों का बेसब्री से जिसने इंतजार न किया हो। हमारे सैनिक तो पत्रों का जिस उत्सुकता से इंतजार करते हैं, उसकी कोई मिसाल ही नहीं। एक दौर था जब लोग पत्रों का महीनों इंतजार करते थे पर अब वह बात नहीं। परिवहन साधनों के विकास ने दूरी बहुत घटा दी है। पहले लोगों के लिए संचार का इकलौता साधन चिट्ठी ही थी पर आज और भी साधन विकसित हो चुके हैं।

आज देश में एेसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने पुरखों की चिट्ठियों को सहेज और सँजोकर विरासत के रूप में रखे हुए हों या फिर बड़े-बड़े लेखक, पत्रकारों, उद्यमी, कवि, प्रशासक, संन्यासी या किसान, इनकी पत्र रचनाएँ अपने आप में अनुसंधान का विषय हैं। अगर आज जैसे संचार साधन होते तो पंडित नेहरू अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को फोन करते, पर तब पिता के पत्र पुत्री के नाम नहीं लिखे जाते जो देश के करोड़ों लोगों को प्रेरणा देते हैं। पत्रों को तो आप सहेजकर रख लेते हैं पर एसएमएस संदेशों को आप जल्दी ही भूल जाते हैं। कितने संदेशों को आप सहेजकर रख सकते हैं? तमाम महान हस्तियों की तो सबसे बड़ी यादगार या धरोहर उनके द्वारा लिखे गए पत्र ही हैं। भारत में इस श्रेणी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को सबसे आगे रखा जा सकता है। दुनिया के तमाम संग्रहालय जानी मानी हस्तियों के पत्रों का अनूठा संकलन भी हैं। तमाम पत्र देश, काल और समाज को जानने-समझने का असली पैमाना हैं। भारत में आज़ादी के पहले महासंग्राम के दिनों में जो कुछ अंग्रेज़ अफसरों ने अपने परिवारजनों को पत्र में लिखे वे आगे चलकर बहुत महत्त्व की पुस्तक तक बन गए। इन पत्रों ने साबित किया कि यह संग्राम कितनी जमीनी मज़बूती लिए हुए था।

महात्मा गांधी के पास दुनिया भर से तमाम पत्र केवल महात्मा गांधी-इंडिया लिखे आते थे और वे जहाँ भी रहते थे वहाँ तक पहुँच जाते थे। आज़ादी के आंदोलन की कई अन्य दिग्गज हस्तियों के साथ भी एेसा ही था। गांधीजी के पास देश-दुनिया से बड़ी संख्या में पत्र पहुँचते थे पर पत्रों का जवाब देने के मामले में उनका कोई जोड़ नहीं था। कहा जाता है कि जैसे ही उन्हें पत्र मिलता था, उसी समय वे उसका जवाब भी लिख देते थे। अपने हाथों से ही ज़्यादातर पत्रों का जवाब देते थे। जब लिखते-लिखते उनका दाहिना हाथ दर्द करने लगता था तो वे बाएँ हाथ से लिखने में जुट जाते थे। महात्मा गांधी ही नहीं आंदोलन के तमाम नायकों के पत्र गाँव-गाँव में मिल जाते हैं। पत्र भेजनेवाले लोग उन पत्रों को किसी प्रशस्तिपत्र से कम नहीं मानते हैं और कई लोगों ने तो उन पत्रों को फ्रेम कराकर रख लिया है। यह है पत्रों का जादू। यही नहीं, पत्रों के आधार पर ही कई भाषाओं में जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं।


वास्तव में पत्र किसी दस्तावेज़ से कम नहीं हैं। पंत के दो सौ पत्र बच्चन के नाम और निराला के पत्र हमको लिख्यौ है कहा तथा पत्रों के आईने में दयानंद सरस्वती समेत कई पुस्तकें आपको मिल जाएँगी। कहा जाता है कि प्रेमचंद खास तौर पर नए लेखकों को बहुत प्रेरक जवाब देते थे तथा पत्रों के जवाब में वे बहुत मुस्तैद रहते थे। इसी प्रकार नेहरू और गांधी के लिखे गए रवींद्रनाथ टैगोर के पत्र भी बहुत प्रेरक हैं। ‘महात्मा और कवि’ के नाम से महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच सन् 1915 से 1941 के बीच के पत्राचार का संग्रह प्रकाशित हुआ है जिसमें बहुत से नए तथ्यों और उनकी मनोदशा का लेखा-जोखा मिलता है।

पत्र व्यवहार की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। पर इसका असली विकास आज़ादी के बाद ही हुआ है। तमाम सरकारी विभागों की तुलना में सबसे ज़्यादा गुडविल डाक विभाग की ही है। इसकी एक खास वजह यह भी है कि यह लोगों को जोड़ने का काम करता है। घर-घर तक इसकी पहुँच है। संचार के तमाम उन्नत साधनों के बाद भी चिट्ठी-पत्री की हैसियत बरकरार है। शहरी इलाकों में आलीशान हवेलियाँ हों या फिर झोपड़पट्टियाें में रह रहे लोग, दुर्गम जंगलों से घिरे गाँव हों या फिर बर्फबारी के बीच जी रहे पहाड़ों के लोग, समुद्र तट पर रह रहे मछुआरे हों या फिर रेगिस्तान की ढाँणियों में रह रहे लोग, आज भी खतों का ही सबसे अधिक बेसब्री से इंतजार होता है। एक दो नहीं, करोड़ों लोग खतों और अन्य सेवाओं के लिए रोज भारतीय डाकघरों के दरवाज़ों तक पहुँचते हैं और इसकी बहु आयामी भूमिका नज़र आ रही है। दूर देहात में लाखों गरीब घरों में चूल्हे मनीआर्डर अर्थव्यवस्था से ही जलते हैं। गाँवों या गरीब बस्तियों में चिट्ठी या मनीआर्डर लेकर पहुँचनेवाला डाकिया देवदूत के रूप में देखा जाता है।

-अरविंद कुमार सिंह

प्रश्न-अभ्यास

पाठ सेे

1. पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश क्यों नहीं दे सकता?

2. पत्र को खत, कागद, उत्तरम्, जाबू, लेख, कडिद, पाती, चिट्ठी इत्यादि कहा जाता है। इन शब्दों से संबंधित भाषाओं के नाम बताइए।

3. पत्र लेखन की कला के विकास के लिए क्या-क्या प्रयास हुए? लिखिए।

4. पत्र धरोहर हो सकते हैं लेकिन एसएमएस क्यों नहीं? तर्क सहित अपना विचार लिखिए।

5. क्या चिट्ठियों की जगह कभी फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथा मोबाइल ले सकते हैं?

पाठ से आगे

1. किसी के लिए बिना टिकट सादे लिफ़ाफ़े पर सही पता लिखकर पत्र बैरंग भेजने पर कौन-सी कठिनाई आ सकती है? पता कीजिए।

2. पिन कोड भी संख्याओं में लिखा गया एक पता है, कैसे?

3. एेसा क्यों होता था कि महात्मा गांधी को दुनिया भर से पत्र ‘महात्मा गांधी–इंडिया’ पता लिखकर आते थे?

अनुमान और कल्पना

1. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘भगवान के डाकिए’ आपकी पाठ्यपुस्तक में है। उसके आधार पर पक्षी और बादल को डाकिए की भांति मानकर अपनी कल्पना से लेख लिखिए।

2. संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास ने बादल को संदेशवाहक बनाकर ‘मेघदूत’ नाम का काव्य लिखा है। ‘मेघदूत’ के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।

3. पक्षी को संदेशवाहक बनाकर अनेक कविताएँ एवं गीत लिखे गए हैं। एक गीत है–‘जा-जा रे कागा विदेशवा, मेरे पिया से कहियो संदेशवा’। इस तरह के तीन गीतों का संग्रह कीजिए। प्रशिक्षित पक्षी के गले में पत्र बाँधकर निर्धारित स्थान तक पत्र भेजने का उल्लेख मिलता है। मान लीजिए आपको एक पक्षी को संदेशवाहक बनाकर पत्र भेजना हो तो आप वह पत्र किसे भेजना चाहेंगे और उसमें क्या लिखना चाहेंगे।

4. केवल पढ़ने के लिए दी गई रामदरश मिश्र की कविता ‘चिट्ठियाँ’ को ध्यानपूर्वक पढ़िए और विचार कीजिए कि क्या यह कविता केवल लेटर बॉक्स में पड़ी निर्धारित पते पर जाने के लिए तैयार चिट्ठियों के बारे में है? या रेल के डिब्बे में बैठी सवारी भी उन्हीं चिट्ठियों की तरह हैं जिनके पास उनके गंतव्य तक का टिकट है। पत्र के पते की तरह और क्या विद्यालय भी एक लेटर बाक्स की भाँति नहीं है जहाँ से उत्तीर्ण होकर विद्यार्थी अनेक क्षेत्रों में चले जाते हैं? अपनी कल्पना को पंख लगाइए और मुक्त मन से इस विषय में विचार-विमर्श कीजिए।

भाषा की बात

1. किसी प्रयोजन विशेष से संबंधित शब्दों के साथ पत्र शब्द जोड़ने से कुछ नए शब्द बनते हैं, जैसे–प्रशस्ति पत्र, समाचार पत्र। आप भी पत्र के योग से बननेवाले दस शब्द लिखिए।

2. ‘व्यापारिक’ शब्द व्यापार के साथ ‘इक’ प्रत्यय के योग से बना है। इक प्रत्यय के योग से बननेवाले शब्दों को अपनी पाठ्यपुस्तक से खोजकर लिखिए।

3. दो स्वरों के मेल से होनेवाले परिवर्तन को स्वर संधि कहते हैं; जैसे–रवीन्द्र = रवि + इन्द्र। इस संधि में इ + इ = ई हुई है। इसे दीर्घ संधि कहते हैं। दीर्घ स्वर संधि के और उदाहरण खोजकर लिखिए। मुख्य रूप से स्वर संधियाँ चार प्रकार की मानी गई हैं–दीर्घ, गुण, वृद्धि और यण।

ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ के बाद ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, आ आए तो ये आपस में मिलकर क्रमशः दीर्घ आ, ई, ऊ हो जाते हैं, इसी कारण इस संधि को दीर्घ संधि कहते हैं; जैसे–संग्रह + आलय = संग्रहालय, महा + आत्मा = महात्मा।

इस प्रकार के कम-से-कम दस उदाहरण खोजकर लिखिए और अपनी शिक्षिका/शिक्षक को दिखाइए।

शब्दार्थ

अजीबो-गरीब – अनोखा

एसएमएस – लघु संदेश सेवा

सिलसिला – आरंभ होना,

रास्ता खुलना

अहमियत – महत्त्व

हरकारा – दूत, डाकिया, संदेश पहुँचाने वाला

आवाजाही – आना-जाना

तह – गहराई

प्रशस्ति पत्र – प्रशंसा पत्र

मुस्तैद – तत्पर

दस्तावेज़ – प्रमाण संबंधी कागजात, प्रमाण पत्र

गुडविल – सुनाम, अच्छी छवि

हैसियत – दरजा

आलीशान – शानदार

ढाँणी – अस्थाई निवास, कच्चे मकानों की बस्ती जो गाँव से कुछ दूर बनी हो

केवल पढ़ने के लिए 

चिट्ठियाँ

लेटरबक्स में पड़ी हुई चिट्ठियाँ

अनंत सुख-दुख वाली अनंत चिट्ठियाँ

लेकिन कोई किसी से नहीं बोलती

सभी अकेले-अकेले

अपनी मंजिल पर पहुँचने का इंतजार करती हैं।

कैसा है यह एक साथ होना

दूसरे के साथ हँसना न रोना

क्या हम भी

लेटरबक्स की चिट्ठियाँ हो गए हैं।

– रामदरश मिश्र



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