2 लाख की चूडि़याँ सारे गाँव में बदलू मुझे सबसे अच्छा आदमी लगता था क्योंकि वह मुझे सुंदर - सुंदर लाख की गोलियाँ बनाकर देता था। मुझे अपने मामा के गाँव जाने का सबसे बड़ा चाव यही था कि जब मैं वहाँ से लौटता था तो मेरे पास ढेर सारी गोलियाँ होतीं, रंग - बिरंगी गोलियाँ जो किसी भी बच्चे का मन मोह लंे। वैसे तो मेरे मामा के गाँव का होने के कारण मुझे बदलू को ‘बदलू मामा’ कहना चाहिए था परंतु मैं उसे ‘बदलू मामा’ न कहकर बदलू काका कहा करता था जैसा कि गाँव के सभी बच्चे उसे कहा करते थे। बदलू का मकान वुफछ उँफचे पर बना था। मकान के सामने बड़ा - सा सहन था जिसमें एक पुराना नीम का वृक्ष लगा था। उसी के नीचे बैठकर बदलू अपना काम किया करता था। बगल में भऋी दहकती रहती जिसमें वह लाख पिघलाया करता। सामने एक लकड़ी की चैखट पड़ी रहती जिस पर लाख के मुलायम होने पर वह उसे सलाख के समान पतला करके चूड़ी का आकार देता। पास में चार - छह विभ्िान्न आकार की बेलननुमा मुंँगेरियाँ रखी रहतीं जो आगे से वुफछ पतली और पीछे से मोटी होतीं। लाख की चूड़ी का आकार देकर वह उन्हें मुँगेरियों पर चढ़ाकर गोल और चिकना बनाता और तब एक - एक कर पूरे हाथ की चूडि़याँ बना चुकने के पश्चात वह उन पर रंग करता। बदलू यह कायर् सदा ही एक मचिये पर बैठकर किया करता था जो बहुत ही पुरानी थी। बगल में ही उसका हुक्का रखा रहता जिसे वह बीच - बीच में पीता रहता। गाँव में मेरा दोपहर का समय अिाकतर बदलू के पास बीतता। वह मुझे ‘लला’ कहा करता और मेरे पहुँचते ही मेरे लिए तुरंत एक मचिया मँगा देता। मैं घंटों बैठे - बैठे उसे इस प्रकार चूडि़याँ बनाते देखता रहता। लगभग रोज ही वह चार - छह जोड़े चूडि़याँ बनाता। पूरा जोड़ा बना लेने पर वह उसे बेलन पर चढ़ाकर वुफछ क्षण चुपचाप देखता रहता मानो वह बेलन न होकर किसी नव - वधू की कलाइर् हो। बदलू मनिहार था। चूडि़याँ बनाना उसका पैतृक पेशा था और वास्तव में वह बहुत ही सुंदर चूडि़याँ बनाता था। उसकी बनाइर् हुइर् चूडि़यों की खपत भी बहुत थी। उस गाँव में तो सभी स्ित्रायाँ उसकी बनाइर् हुइर् चूडि़याँ पहनती ही थीं आस - पास के गाँवों के लोग भी उससे चूडि़याँ ले जाते थे। परंतु वह कभी भी चूडि़यांे को पैसों से बेचता न था। उसका अभी तक वस्तु - विनिमय का तरीका था और लोग अनाज के बदले उससे चूडि़याँ ले जाते थे। बदलू स्वभाव से बहुत सीधा था। मैंने कभी भी उसे किसी से झगड़ते नहीं देखा। हाँ, शादी - विवाह के अवसरों पर वह अवश्य िाद पकड़ जाता था। जीवन भर चाहे कोइर् उससे मु ़फ्रत चूडि़याँ ले जाए परंतु विवाह के अवसर पर वह सारी कसर निकाल लेता था। आख्िारसुहाग के जोड़े का महत्त्व ही और होता है। मुझे याद है, मेरे मामा के यहाँ किसी लड़की के विवाह पर जरा - सी किसी बात पर बिगड़ गया था और पिफर उसको मनाने में लोहे लग गए थे। विवाह में इसी जोड़े का मूल्य इतना बढ़ जाता था कि उसके लिए उसकी घरवाली को सारे वस्त्रा मिलते, ढेरों अनाज मिलता, उसको अपने लिए पगड़ी मिलती और रुपये जो मिलते सो अलग। लाख की चूडि़याँ 7 यदि संसार में बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो वह थी काँच की चूडि़यांे से। यदि किसी भी स्त्राी के हाथों में उसे काँच की चूडि़याँ दिख जातीं तो वह अंदर - ही - अंदर वुफढ़ उठता और कभी - कभी तो दो - चार बातें भी सुना देता। मुझसे तो वह घंटांे बातें किया करता। कभी मेरी पढ़ाइर् के बारे में पूछता, कभी मेरे घर के बारे में और कभी यों ही शहर के जीवन के बारे में। मैं उससे कहताकि शहर में सब काँच की चूडि़याँ पहनते हैं तो वह उत्तर देता, फ्शहर की बात और है, लला! वहाँ तो सभी वुफछ होता है। वहाँ तो औरतें अपने मरद का हाथ पकड़कर सड़कों पर घूमती भी हैं और पिफर उनकी कलाइयाँ नाशुक होती हैं न! लाख की चूडि़याँ पहनें तो मोच न आ जाए।य् कभी - कभी बदलू मेरी अच्छी खासी खातिर भी करता। जिन दिनों उसकी गाय के दूध होता वह सदा मेरे लिए मलाइर् बचाकर रखता और आम की पफसल में तो मैं रोश ही उसके यहाँ से दो - चार आम खा आता। परंतु इन सब बातों के अतिरिक्त जिस कारण वह मुझे अच्छा लगता वह यह था कि लगभग रोश ही वह मेरे लिए एक - दो गोलियाँ बना देता। मैं बहुधा हर गमीर् की छु‘ी में अपने मामा के यहाँ चला जाता और एक - आध महीने वहाँ रहकर स्वूफल खुलने के समय तक वापस आ जाता। परंतु दो - तीन बार ही मैं अपने मामा के यहाँ गया होउँफगा तभी मेरे पिता की एक दूर के शहर में बदली हो गइर् और एक लंबी अविा तक मैं अपने मामा के गाँव न जा सका। तब लगभग आठ - दस वषो± के बाद जब मैं वहाँ गया तो इतना बड़ा हो चुका था कि लाख की गोलियों में मेरी रुचि नहीं रह गइर् थी। अतः गाँव में होते हुए भी कइर् दिनों तक मुझे बदलू का ध्यान न आया। इस बीच मैंने देखा कि गाँव में लगभग सभी स्ित्रायाँ काँच की चूडि़याँ पहने हैं। विरले ही हाथों में मैंने लाख की चूडि़याँ देखीं। तब एक दिन सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया। बात यह हुइर् कि बरसात में मेरे मामा की छोटी लड़की आँगन में पिफसलकर गिर पड़ी और उसके हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसकी कलाइर् में घुस गइर् और उससे खून बहने लगा। मेरे मामा उस समय घर पर न थे। मुझे ही उसकी मरहम - प‘ी करनी पड़ी। तभी सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया और मैंने सोचा कि उससे मिल आउँफ। अतः शाम को मैं घूमते - घूमते उसके घर चला गया। बदलू वहीं चबूतरे पर नीम के नीचे एक खाट पर लेटा था। नमस्ते बदलू काका! मैंने कहा।नमस्ते भइया! उसने मेरी नमस्ते का उत्तर दिया और उठकर खाट पर बैठ गया। परंतु उसने मुझे पहचाना नहीं और देर तक मेरी ओर निहारता रहा। मैं हूँ जनादर्न, काका! आपके पास से गोलियाँ बनवाकर ले जाता था। मैंने अपना परिचय दिया। बदलू पिफर भी चुप रहा। मानो वह अपने स्मृति पटल पर अतीत के चित्रा उतार रहा हो और तब वह एकदम बोल पड़ा, आओ - आओ, लला बैठो! बहुत दिन बाद गाँव आए।हाँ, इधर आना नहीं हो सका, काका! मैंने चारपाइर् पर बैठते हुए उत्तर दिया। वुफछ देर पिफर शांति रही। मैंने इधर - इधर दृष्िट दौड़ाइर्। न तो मुझे उसकी मचिया ही नशर आइर्, न ही भऋी। आजकल काम नहीं करते काका? मैंने पूछा। नहीं लला, काम तो कइर् साल से बंद है। मेरी बनाइर् हुइर् चूडि़याँ कोइर् पूछे तब तो। गाँव - गाँव में काँच का प्रचार हो गया है। वह वुफछ देर चुप रहा, पिफर बोला, मशीन युग है न यह, लला! आजकल सब काम मशीन से होता है। खेत भी मशीन से जोते जाते हैं और पिफर जो सुंदरता काँच की चूडि़यों में होती है, लाख में कहाँ संभव है? लेकिन काँच बड़ा खतरनाक होता है। बड़ी जल्दी टूट जाता है। मैंने कहा। नाशुक तो पिफर होता ही है लला! कहते - कहते उसे खाँसी आ गइर् और वह देर तक खाँसता रहा। मुझे लगा उसे दमा है। अवस्था के साथ - साथ उसका शरीर ढल चुका था। उसके हाथों पर और माथे पर नसें उभर आइर् थीं। जाने वैफसे उसने मेरी शंका भाँप ली और बोला, फ्दमा नहीं है मुझे। पफसली खाँसी है। यही महीने - दो - महीने से आ रही है। दस - पंद्रह दिन में ठीक हो जाएगी।य् मैं चुप रहा। मुझे लगा उसके अंदर कोइर् बहुत बड़ी व्यथा छिपी है। मैं देर तक सोचता रहा कि इस मशीन युग ने कितने हाथ काट दिए हैं। वुफछ देर पिफर शांति रही जो मुझे अच्छी नहीं लगी। आम की पफसल अब वैफसी है, काका? वुफछ देर पश्चात मैंने बात का विषय बदलते हुए पूछा।‘अच्छी है लला, बहुत अच्छी है, उसने लहककर उत्तर दिया और अंदर अपनी बेटी को आवाश दी, अरी रज्जो, लला के लिए आम तो ले आ। पिफर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला, मापफ करना लला, तुम्हें आम ख्िालाना भूल गया था।़नहीं, नहीं काका आम तो इस साल बहुत खाए हैं। वाह - वाह, बिना आम ख्िालाए वैफसे जाने दूँगा तुमको? मैं चुप हो गया। मुझे वे दिन याद हो आए जब वह मेरे लिए मलाइर् बचाकर रखता था। गाय तो अच्छी है न काका? मैंने पूछा। गाय कहाँ है, लला! दो साल हुए बेच दी। कहाँ से ख्िालाता? इतने में रज्जो, उसकी बेटी, अंदर से एक डलिया में ढेर से आम ले आइर्। यह तो बहुत हैं काका! इतने कहाँ खा पाउँफगा? मैंने कहा। वाह - वाह! वह हँस पड़ा, शहरी ठहरे न! मैं तुम्हारी उमर का था तो इसके चैगुने आम एक बखत में खा जाता था।आप लोगों की बात और है। मैंने उत्तर दिया। अच्छा, बेटी, लला को चार - पाँच आम छाँटकर दो। ¯सदूरी वाले देना। देखो लला वैफसे हंै? इसी साल यह पेड़ तैयार हुआ है। रज्जो ने चार - पाँच आम अंजुली में लेकर मेरी ओर बढ़ा दिए। आम लेने के लिए मैंने हाथ बढ़ाया तो मेरी निगाह एक क्षण के लिए उसके हाथों पर ठिठक गइर्। गोरी - गोरी कलाइयों पर लाख की चूडि़याँ बहुत ही पफब रही थीं। बदलू ने मेरी दृष्िट देख ली और बोल पड़ा, यही आख्िारी जोड़ा बनाया था जमींदार साहब की बेटी के विवाह पर। दस आने पैसे मुझको दे रहे थे। मैंने जोड़ा नहीं दिया। कहा, शहर से ले आओ। मैंने आम ले लिए और खाकर थोड़ी देर पश्चात चला आया। मुझे प्रसन्नता हुइर् कि बदलू ने हारकर भी हार नहीं मानी थी। उसका व्यक्ितत्व काँच की चूडि़यों जैसा न था कि आसानी से टूट जाए। - कामतानाथ प्रश्न - अभ्यास कहानी से 1.बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव चाव से क्यों जाता था और बदलू को ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ क्यों कहता था? लाख की चूडि़याँ 11 2.वस्तु - विनिमय क्या है? विनिमय की प्रचलित प(ति क्या है? 3.‘मशीनी युग ने कितने हाथ काट दिए हैं।’μइस पंक्ित में लेखक ने किस व्यथा की ओर संकेत किया है? 4.बदलू के मन में ऐसी कौन - सी व्यथा थी जो लेखक से छिपी न रह सकी। 5.मशीनी युग से बदलू के जीवन मेें क्या बदलाव आया? कहानी से आगे 1.आपने मेले - बाशार आदि में हाथ से बनी चीशों को बिकते देखा होगा। आपके मन में किसी चीश को बनाने की कला सीखने की इच्छा हुइर् हो और आपने कोइर् कारीगरी सीखने का प्रयास किया हो तो उसके विषय में लिख्िाए। 2.लाख की वस्तुओं का निमार्ण भारत के किन - किन राज्यों में होता है? लाख से चूडि़यों के अतिरिक्त क्या - क्या चीशें बनती हैं? ज्ञात कीजिए। अनुमान और कल्पना 1.घर में मेहमान के आने पर आप उसका अतिथ्िा - सत्कार वैफसे करेंगे? 2.आपको छु‘ियों में किसके घर जाना सबसे अच्छा लगता है? वहाँ की दिनचयार् अलग वैफसे होती है? लिख्िाए। 3.मशीनी युग मंे अनेक परिवतर्न आए दिन होते रहते हैं। आप अपने आस - पास से इस प्रकार के किसी परिवतर्न का उदाहरण चुनिए और उसके बारे में लिख्िाए। 4.बाशार में बिकने वाले सामानों की डिशाइनों में हमेशा परिवतर्न होता रहता है। आप इन परिवतर्नों को किस प्रकार देखते हैं? आपस में चचार् कीजिए। 5.हमारे खान - पान, रहन - सहन और कपड़ों में भी बदलाव आ रहा है। इस बदलाव के पक्ष - विपक्ष में बातचीत कीजिए और बातचीत के आधार पर लेख तैयार कीजिए। भाषा की बात 1.‘बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो काँच की चूडि़यों से’ और बदलू स्वयं कहता हैμफ्जो सुंदरता काँच की चूडि़यों में होती है लाख में कहाँ संभव है?य् ये पंक्ितयाँ बदलू की दो प्रकार की मनोदशाओं को सामने लाती हैं। दूसरी पंक्ित में उसके मन की पीड़ा है। उसमें व्यंग्य भी है। हारे हुए मन से, या दुखी मन से अथवा व्यंग्य में बोले गए वाक्यों के अथर् सामान्य नहीं होते। वुफछ व्यंग्य वाक्यों को ध्यानपूवर्क समझकर एकत्रा कीजिए और उनके भीतरी अथर् की व्याख्या करके लिख्िाए। 2.‘बदलू’ कहानी की दृष्िट से पात्रा है और भाषा की बात ;व्याकरणद्ध की दृष्िट से संज्ञा है। किसी भी व्यक्ित, स्थान, वस्तु, विचार अथवा भाव को संज्ञा कहते हैं। संज्ञा को तीन भेदों में बाँटा गया है ;कद्ध व्यक्ितवाचक संज्ञा, जैसेμलला, रज्जो, आम, काँच, गाय इत्यादि ;खद्ध जातिवाचक संज्ञा, जैसेμचरित्रा, स्वभाव, वजन, आकार आदि द्वारा जानी जाने वाली संज्ञा। ;गद्ध भाववाचक संज्ञा, जैसेμसुंदरता, नाजुक, प्रसन्नता इत्यादि जिसमें कोइर् व्यक्ित नहीं है और न आकार या वजन। परंतु उसका अनुभव होता है। पाठ से तीनों प्रकार की संज्ञाएँ चुनकर लिख्िाए। 3.गाँव की बोली में कइर् शब्दों के उच्चारण बदल जाते हैं। कहानी में बदलू वक्त ;समयद्ध को बखत, उम्र ;वय/आयुद्ध को उमर कहता है। इस तरह के अन्य शब्दों को खोजिए जिनके रूप में परिवतर्न हुआ हो, अथर् में नहीं।

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Vasant Bhag 3 Chapter-2

2

लाख की चूड़ियाँ

सारे गाँव में बदलू मुझे सबसे अच्छा आदमी लगता था क्योंकि वह मुझे सुंदर-सुंदर लाख की गोलियाँ बनाकर देता था। मुझे अपने मामा के गाँव जाने का सबसे बड़ा चाव यही था कि जब मैं वहाँ से लौटता था तो मेरे पास ढेर सारी गोलियाँ होतीं, रंग-बिरंगी गोलियाँ जो किसी भी बच्चे का मन मोह लें।

वैसे तो मेरे मामा के गाँव का होने के कारण मुझे बदलू को ‘बदलू मामा’ कहना चाहिए था परंतु मैं उसे ‘बदलू मामा’ न कहकर बदलू काका कहा करता था जैसा कि गाँव के सभी बच्चे उसे कहा करते थे। बदलू का मकान कुछ ऊँचे पर बना था। मकान के सामने बड़ा-सा सहन था जिसमें एक पुराना नीम का वृक्ष लगा था। उसी के नीचे बैठकर बदलू अपना काम किया करता था। बगल में भट्ठी दहकती रहती जिसमें वह लाख पिघलाया करता। सामने एक लकड़ी की चौखट पड़ी रहती जिस पर लाख के मुलायम होने पर वह उसे सलाख के समान पतला करके चूड़ी का आकार देता। पास में चार-छह विभिन्न आकार की बेलननुमा मुंँगेरियाँ रखी रहतीं जो आगे से कुछ पतली और पीछे से मोटी होतीं। लाख की चूड़ी का आकार देकर वह उन्हें मुँगेरियों पर चढ़ाकर गोल और चिकना बनाता और तब एक-एक कर पूरे हाथ की चूड़ियाँ बना चुकने के पश्चात वह उन पर रंग करता।

बदलू यह कार्य सदा ही एक मचिये पर बैठकर किया करता था जो बहुत ही पुरानी थी। बगल में ही उसका हुक्का रखा रहता जिसे वह बीच-बीच में पीता रहता। गाँव में मेरा दोपहर का समय अधिकतर बदलू के पास बीतता। वह मुझे ‘लला’ कहा करता और मेरे पहुँचते ही मेरे लिए तुरंत एक मचिया मँगा देता। मैं घंटों बैठे-बैठे उसे इस प्रकार चूड़ियाँ बनाते देखता रहता। लगभग रोज ही वह चार-छह जोड़े चूड़ियाँ बनाता। पूरा जोड़ा बना लेने पर वह उसे बेलन पर चढ़ाकर कुछ क्षण चुपचाप देखता रहता मानो वह बेलन न होकर किसी नव-वधू की कलाई हो।

बदलू मनिहार था। चूड़ियाँ बनाना उसका पैतृक पेशा था और वास्तव में वह बहुत ही सुंदर चूड़ियाँ बनाता था। उसकी बनाई हुई चूड़ियों की खपत भी बहुत थी। उस गाँव में तो सभी स्त्रियाँ उसकी बनाई हुई चूड़ियाँ पहनती ही थीं आस-पास के गाँवों के लोग भी उससे चूड़ियाँ ले जाते थे। परंतु वह कभी भी चूड़ियाें को पैसों से बेचता न था। उसका अभी तक वस्तु-विनिमय का तरीका था और लोग अनाज के बदले उससे चूड़ियाँ ले जाते थे। बदलू स्वभाव से बहुत सीधा था। मैंने कभी भी उसे किसी से झगड़ते नहीं देखा। हाँ, शादी-विवाह के अवसरों पर वह अवश्य ज़िद पकड़ जाता था। जीवन भर चाहे कोई उससे मु ़फ्त चूड़ियाँ ले जाए परंतु विवाह के अवसर पर वह सारी कसर निकाल लेता था। आखिर सुहाग के जोड़े का महत्त्व ही और होता है। मुझे याद है, मेरे मामा के यहाँ किसी लड़की के विवाह पर जरा-सी किसी बात पर बिगड़ गया था और फिर उसको मनाने में लोहे लग गए थे। विवाह में इसी जोड़े का मूल्य इतना बढ़ जाता था कि उसके लिए उसकी घरवाली को सारे वस्त्र मिलते, ढेरों अनाज मिलता, उसको अपने लिए पगड़ी मिलती और रुपये जो मिलते सो अलग।

यदि संसार में बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो वह थी काँच की चूड़ियाें से। यदि किसी भी स्त्री के हाथों में उसे काँच की चूड़ियाँ दिख जातीं तो वह अंदर-ही-अंदर कुढ़ उठता और कभी-कभी तो दो-चार बातें भी सुना देता।

मुझसे तो वह घंटाें बातें किया करता। कभी मेरी पढ़ाई के बारे में पूछता, कभी मेरे घर के बारे में और कभी यों ही शहर के जीवन के बारे में। मैं उससे कहता कि शहर में सब काँच की चूड़ियाँ पहनते हैं तो वह उत्तर देता, "शहर की बात और है, लला! वहाँ तो सभी कुछ होता है। वहाँ तो औरतें अपने मरद का हाथ पकड़कर सड़कों पर घूमती भी हैं और फिर उनकी कलाइयाँ नाज़ुक होती हैं न! लाख की चूड़ियाँ पहनें तो मोच न आ जाए।"

कभी-कभी बदलू मेरी अच्छी खासी खातिर भी करता। जिन दिनों उसकी गाय के दूध होता वह सदा मेरे लिए मलाई बचाकर रखता और आम की फसल में तो मैं रोज़ ही उसके यहाँ से दो-चार आम खा आता। परंतु इन सब बातों के अतिरिक्त जिस कारण वह मुझे अच्छा लगता वह यह था कि लगभग रोज़ ही वह मेरे लिए एक-दो गोलियाँ बना देता।

मैं बहुधा हर गर्मी की छुट्टी में अपने मामा के यहाँ चला जाता और एक-आध महीने वहाँ रहकर स्कूल खुलने के समय तक वापस आ जाता। परंतु दो-तीन बार ही मैं अपने मामा के यहाँ गया होऊँगा तभी मेरे पिता की एक दूर के शहर में बदली हो गई और एक लंबी अवधि तक मैं अपने मामा के गाँव न जा सका। तब लगभग आठ-दस वर्षों के बाद जब मैं वहाँ गया तो इतना बड़ा हो चुका था कि लाख की गोलियों में मेरी रुचि नहीं रह गई थी। अतः गाँव में होते हुए भी कई दिनों तक मुझे बदलू का ध्यान न आया। इस बीच मैंने देखा कि गाँव में लगभग सभी स्त्रियाँ काँच की चूड़ियाँ पहने हैं। विरले ही हाथों में मैंने लाख की चूड़ियाँ देखीं। तब एक दिन सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया। बात यह हुई कि बरसात में मेरे मामा की छोटी लड़की आँगन में फिसलकर गिर पड़ी और उसके हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसकी कलाई में घुस गई और उससे खून बहने लगा। मेरे मामा उस समय घर पर न थे। मुझे ही उसकी मरहम-पट्टी करनी पड़ी। तभी सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया और मैंने सोचा कि उससे मिल आऊँ। अतः शाम को मैं घूमते-घूमते उसके घर चला गया। बदलू वहीं चबूतरे पर नीम के नीचे एक खाट पर लेटा था।

नमस्ते बदलू काका! मैंने कहा।

नमस्ते भइया! उसने मेरी नमस्ते का उत्तर दिया और उठकर खाट पर बैठ गया। परंतु उसने मुझे पहचाना नहीं और देर तक मेरी ओर निहारता रहा।

मैं हूँ जनार्दन, काका! आपके पास से गोलियाँ बनवाकर ले जाता था। मैंने अपना परिचय दिया।

बदलू फिर भी चुप रहा। मानो वह अपने स्मृति पटल पर अतीत के चित्र उतार रहा हो और तब वह एकदम बोल पड़ा, आओ-आओ, लला बैठो! बहुत दिन बाद गाँव आए।

हाँ, इधर आना नहीं हो सका, काका! मैंने चारपाई पर बैठते हुए उत्तर दिया।

कुछ देर फिर शांति रही। मैंने इधर-इधर दृष्टि दौड़ाई। न तो मुझे उसकी मचिया ही नज़र आई, न ही भट्ठी।

आजकल काम नहीं करते काका? मैंने पूछा।

नहीं लला, काम तो कई साल से बंद है। मेरी बनाई हुई चूड़ियाँ कोई पूछे तब तो। गाँव-गाँव में काँच का प्रचार हो गया है। वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, मशीन युग है न यह, लला! आजकल सब काम मशीन से होता है। खेत भी मशीन से जोते जाते हैं और फिर जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है, लाख में कहाँ संभव है?

लेकिन काँच बड़ा खतरनाक होता है। बड़ी जल्दी टूट जाता है। मैंने कहा।

नाज़ुक तो फिर होता ही है लला! कहते-कहते उसे खाँसी आ गई और वह देर तक खाँसता रहा।

मुझे लगा उसे दमा है। अवस्था के साथ-साथ उसका शरीर ढल चुका था। उसके हाथों पर और माथे पर नसें उभर आई थीं।

जाने कैसे उसने मेरी शंका भाँप ली और बोला, "दमा नहीं है मुझे। फसली खाँसी है। यही महीने-दो-महीने से आ रही है। दस-पंद्रह दिन में ठीक हो जाएगी।"

मैं चुप रहा। मुझे लगा उसके अंदर कोई बहुत बड़ी व्यथा छिपी है। मैं देर तक सोचता रहा कि इस मशीन युग ने कितने हाथ काट दिए हैं। कुछ देर फिर शांति रही जो मुझे अच्छी नहीं लगी।

आम की फसल अब कैसी है, काका? कुछ देर पश्चात मैंने बात का विषय बदलते हुए पूछा।

‘अच्छी है लला, बहुत अच्छी है, उसने लहककर उत्तर दिया और अंदर अपनी बेटी को आवाज़ दी, अरी रज्जो, लला के लिए आम तो ले आ। फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला, माफ़ करना लला, तुम्हें आम खिलाना भूल गया था।

नहीं, नहीं काका आम तो इस साल बहुत खाए हैं।

वाह-वाह, बिना आम खिलाए कैसे जाने दूँगा तुमको?

मैं चुप हो गया। मुझे वे दिन याद हो आए जब वह मेरे लिए मलाई बचाकर रखता था।

गाय तो अच्छी है न काका? मैंने पूछा।

गाय कहाँ है, लला! दो साल हुए बेच दी। कहाँ से खिलाता?

इतने में रज्जो, उसकी बेटी, अंदर से एक डलिया में ढेर से आम ले आई।

यह तो बहुत हैं काका! इतने कहाँ खा पाऊँगा? मैंने कहा।

वाह-वाह! वह हँस पड़ा, शहरी ठहरे न! मैं तुम्हारी उमर का था तो इसके चौगुने आम एक बखत में खा जाता था।

आप लोगों की बात और है। मैंने उत्तर दिया।

अच्छा, बेटी, लला को चार-पाँच आम छाँटकर दो। सिंदूरी वाले देना। देखो लला कैसे हैं? इसी साल यह पेड़ तैयार हुआ है।

रज्जो ने चार-पाँच आम अंजुली में लेकर मेरी ओर बढ़ा दिए। आम लेने के लिए मैंने हाथ बढ़ाया तो मेरी निगाह एक क्षण के लिए उसके हाथों पर ठिठक गई। गोरी-गोरी कलाइयों पर लाख की चूड़ियाँ बहुत ही फब रही थीं।

बदलू ने मेरी दृष्टि देख ली और बोल पड़ा, यही आखिरी जोड़ा बनाया था जमींदार साहब की बेटी के विवाह पर। दस आने पैसे मुझको दे रहे थे। मैंने जोड़ा नहीं दिया। कहा, शहर से ले आओ।

मैंने आम ले लिए और खाकर थोड़ी देर पश्चात चला आया। मुझे प्रसन्नता हुई कि बदलू ने हारकर भी हार नहीं मानी थी। उसका व्यक्तित्व काँच की चूड़ियों जैसा न था कि आसानी से टूट जाए।

-कामतानाथ

प्रश्न-अभ्यास

कहानी से

1. बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव चाव से क्यों जाता था और बदलू को ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ क्यों कहता था?

2. वस्तु-विनिमय क्या है? विनिमय की प्रचलित पद्धति क्या है?

3. ‘मशीनी युग ने कितने हाथ काट दिए हैं।’–इस पंक्ति में लेखक ने किस व्यथा की ओर संकेत किया है?

4. बदलू के मन में एेसी कौन-सी व्यथा थी जो लेखक से छिपी न रह सकी।

5. मशीनी युग से बदलू के जीवन मेें क्या बदलाव आया?

कहानी से आगे

1. आपने मेले-बाज़ार आदि में हाथ से बनी चीज़ों को बिकते देखा होगा। आपके मन में किसी चीज़ को बनाने की कला सीखने की इच्छा हुई हो और आपने कोई कारीगरी सीखने का प्रयास किया हो तो उसके विषय में लिखिए।

2. लाख की वस्तुओं का निर्माण भारत के किन-किन राज्यों में होता है? लाख से चूड़ियों के अतिरिक्त क्या-क्या चीज़ें बनती हैं? ज्ञात कीजिए।

अनुमान और कल्पना

1. घर में मेहमान के आने पर आप उसका अतिथि-सत्कार कैसे करेंगे?

2. आपको छुट्टियों में किसके घर जाना सबसे अच्छा लगता है? वहाँ की दिनचर्या अलग कैसे होती है? लिखिए।

3. मशीनी युग में अनेक परिवर्तन आए दिन होते रहते हैं। आप अपने आस-पास से इस प्रकार के किसी परिवर्तन का उदाहरण चुनिए और उसके बारे में लिखिए।

4. बाज़ार में बिकने वाले सामानों की डिज़ाइनों में हमेशा परिवर्तन होता रहता है। आप इन परिवर्तनों को किस प्रकार देखते हैं? आपस में चर्चा कीजिए।

5. हमारे खान-पान, रहन-सहन और कपड़ों में भी बदलाव आ रहा है। इस बदलाव के पक्ष-विपक्ष में बातचीत कीजिए और बातचीत के आधार पर लेख तैयार कीजिए।

भाषा की बात

1. ‘बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो काँच की चूड़ियों से’ और बदलू स्वयं कहता है–"जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है लाख में कहाँ संभव है?" ये पंक्तियाँ बदलू की दो प्रकार की मनोदशाओं को सामने लाती हैं। दूसरी पंक्ति में उसके मन की पीड़ा है। उसमें व्यंग्य भी है। हारे हुए मन से, या दुखी मन से अथवा व्यंग्य में बोले गए वाक्यों के अर्थ सामान्य नहीं होते। कुछ व्यंग्य वाक्यों को ध्यानपूर्वक समझकर एकत्र कीजिए और उनके भीतरी अर्थ की व्याख्या करके लिखिए।

2. ‘बदलू’ कहानी की दृष्टि से पात्र है और भाषा की बात (व्याकरण) की दृष्टि से संज्ञा है। किसी भी व्यक्ति, स्थान, वस्तु, विचार अथवा भाव को संज्ञा कहते हैं। संज्ञा को तीन भेदों में बाँटा गया है (क) व्यक्तिवाचक संज्ञा, जैसे–लला, रज्जो, आम, काँच, गाय इत्यादि (ख) जातिवाचक संज्ञा, जैसे–चरित्र, स्वभाव, वजन, आकार आदि द्वारा जानी जाने वाली संज्ञा। (ग) भाववाचक संज्ञा, जैसे–सुंदरता, नाजुक, प्रसन्नता इत्यादि जिसमें कोई व्यक्ति नहीं है और न आकार या वजन। परंतु उसका अनुभव होता है। पाठ से तीनों प्रकार की संज्ञाएँ चुनकर लिखिए।

3. गाँव की बोली में कई शब्दों के उच्चारण बदल जाते हैं। कहानी में बदलू वक्त (समय) को बखत, उम्र (वय/आयु) को उमर कहता है। इस तरह के अन्य शब्दों को खोजिए जिनके रूप में परिवर्तन हुआ हो, अर्थ में नहीं।

शब्दार्थ

चाव – चाह, रुचि, तीव्र इच्छा

सलाख – सलाई, धातु की छड़

मुँगरी – गोल, मुठियादार लकड़ी जो ठोकने-पीटने के
काम आती है

पैतृक – पूर्वजों का, पिता से प्राप्त या पुश्तैनी

खपत – माल की बिक्री

वस्तु – पैसों से न खरीदकर एक

विनिमय वस्तु के बदले दूसरी

वस्तु लेना

कसर – घाटा पूरा करना, कमी

नाजुक – कोमल

पगड़ी – सिर पर लपेट कर बाँधा जाने वाला लंबा कपड़ा, पाग

मरहम-पट्टी – जख्म का इलाज, घाव पर दवा लगाकर पट्टी बाँधना

मचिया – बैठने के उपयोग में आने वाली सुतली आदि से बुनी छोटी/चौकोर खाट

मुखातिब – देखकर बात करना

डलिया – बाँस का बना एक छोटा पात्र

फबना – सजना, शोभा देना


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