7 बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक चित्रा 1 - सत्राहवीं सदी में सूरत बंदरगाह पर व्यापारिक जहाश। भारत के पश्िचमी तट पर गुजरात स्िथत सूरत हिंद महासागर के रास्ते होने वाले व्यापार के सबसे महत्त्वपूणर् बंदरगाहों में से एक था। डच और बि्रटिश व्यापारिक जहाश सत्राहवीं सदी की शुरुआत से ही इस बंदरगाह काइस्तेमाल करने लगे थे। अठारहवीं सदी में इस बंदरगाह का महत्त्व गिरने लगा। इस अध्याय में हम कपड़ा और लोहा व इस्पात उद्योग, इन दो उद्योगों का विशेष अध्ययन करते हुए देखेंगे कि बि्रटिश शासन के अंतगर्त भारतीय कारीगरी और उद्योगों की दशा क्या थी।आधुनिक विश्व में औद्योगिक क्रांति की दृष्िट से ये दोनों ही उद्योग बहुत महत्त्वपूणर् थे। सूतीकपड़े के मशीनी उत्पादन ने ही उन्नीसवीं सदी में बि्रटेन को दुनिया का सबसे प्रमुख औद्योगिक राष्ट्र बना दिया था। 1850 के दशक से जब बि्रटेन का लोहा और इस्पात उद्योग भी पनपने लगातो बि्रटेन फ्दुनिया का कारखानाय् कहलाने लगा। बि्रटेन के औद्योगीकरण और भारत पर बि्रटिश विजय और उपनिवेशीकरण में गहरा संबंध था। आप अध्याय 2 में देख चुके हैं कि इर्स्ट इंडिया कम्पनी के व्यापारिक हितों की रक्षा करनेके लिए किस तरह भारतीय भूभागों पर व़्ाफब्शे हुए और किस तरह व्यापार का ढाँचा बदलतागया। अठारहवीं सदी के आख्िार में इर्स्ट इंडिया कम्पनी भारत से चीशें खरीदती थी और उन्हें इंग्लैंड व यूरोप में ले जाकर बेच देती थी। इसी क्रय - विक्रय से उसे भारी मुनापफा होता था।जैसे - जैसे बि्रटेन का औद्योगिक उत्पादन बढ़ने लगा, वहाँ के उद्योगपति भारत को अपनेऔद्योगिक उत्पादों के विशाल बाशार के रूप में देखने लगे। इस तरह, बि्रटेन से तैयार माल भारत के बाशारों में आने लगा। इससे भारतीय श्िाल्पों और उद्योगों पर किस तरह के असर पड़े?प्रस्तुत अध्याय में हम इसी सवाल पर चचार् करेंगे। भारतीय कपड़े और विश्व बाशार आइए पहले कपड़ा उत्पादन पर नशर डालें। बंगाल पर अंग्रेशों की विजय से पहले1750 के आस - पास भारत पूरी दुनिया में कपड़ा उत्पादन के क्षेत्रा में औरों से कोसोंआगे था। भारतीय कपड़े लंबे समय सेअपनी गुणवत्ता और बारीक कारीगरी के लिए दुनिया भर में मशहूर थे। दक्ष्िाण - पूवीर्एश्िाया ;जावा, सुमात्रा और पेनांगद्ध तथापश्िचमी एवं मध्य एश्िाया में इन कपड़ों का भारी व्यापार था। सोलहवीं शताब्दी सेयूरोप की व्यापारिक कम्पनियाँ यूरोप मेंबेचने के लिए भारतीय कपड़े खरीदने लगी थीं। इस पफलते - पफूलते व्यापार औरभारतीय बुनकरों के हुनर की यादें अंग्रेशीऔर अन्य भाषाओं के बहुत सारे शब्दों में आज भी जिंदा हैं। ऐसे शब्दों की जड़ों को ढूँढ़ना और उनके अथर् जाननाबड़ा मशेदार है। शब्दों में इतिहास छिपा है यूरोप के व्यापारियों ने भारत से आया बारीक सूती कपड़ा सबसे पहलेमौजूदा इर्राक के मोसूल शहर में अरब के व्यापारियों के पास देखा था। इसी आधार पर वे बारीक बुनाइर् वाले सभी कपड़ों को फ्मस्िलनय्;मलमलद्ध कहने लगे। जल्दी ही यह शब्द खूब प्रचलित हो गया। मसालोंकी तलाश में जब पहली बार पुतर्गाली भारत आए तो उन्होंने दक्ष्िाण - पश्िचमी भारत में केरल के तट पर कालीकट में डेरा डाला। यहाँ से वे मसालों केसाथ - साथ सूती कपड़ा भी लेते गए। कालीकट से निकले शब्द कोफ्वैफलिकोय् कहने लगे। बाद में हर तरह के सूती कपडे़ को वैफलिको ही कहा जाने लगा। ऐसे बहुत सारे शब्द हैं जो पश्िचमी बाशारों में भारतीय कपड़ों कीलोकपि्रयता की कहानी कहते हैं। चित्रा 3 में आप एक आॅडर्र बुक का पन्नादेख सकते हैं जिसे 1730 में बि्रटिश इर्स्ट इंडिया कम्पनी ने कलकत्ता स्िथतअपने नुमाइंदों के पास भेजा था। बही के मुताबिक, उस साल कपड़े के 5,89,000 थानों का आॅडर्र मिला था। यदि आप इसी बही के पन्नों को पलटते तो आपको पता चलता किउसमें सूती और रेशमी कपड़े की 98 किस्मों का िाव्रफ किया गया है।यूरोपीय व्यापारी उन्हें पीस गुड्स कहते थे जो आम तौर पर 20 गज लंबा और 1 गज चैड़ा थान होता था। चित्रा 2 - पटोला बुनाइर्, उन्नीसवीं सदी के मध्य में। पटोला बुनाइर् सूरत, अहमदाबाद और पाटन में होती थी। इंडोनेश्िाया में इस बुनाइर् का भारी बाशार था और वहाँ यह स्थानीय बुनाइर् परंपरा का हिस्सा बन गइर् थी। आइए अब इसी बही में दी गइर् विभ्िान्न किस्मों के नामों को देखें। थोकमें जिन कपड़ों का आॅडर्र दिया गया था उनमें छापेदार सूती कपड़े भी शामिल थे। उन्हें ये व्यापारी श्िांट्श, कोसा ;या खस्साद्ध और बंडाना कहते थे। क्याआप जानते हैं कि अंग्रेशी का श्िांट्श शब्द कहाँ से आया है? जी हाँ, यहहिंदी के ‘छींट’ शब्द से निकला है। हमारे यहाँ छींट रंगीन पफूल - पत्ितयों वाले छोटे छापे के कपड़े को कहा जाता है। 1680 के दशक तक इंग्लैंड औरयूरोप में छापेदार भारतीय सूती कपड़े की जबरदस्त माँग पैदा हो चुकी थी।आकषर्क पफूल - पत्ितयों, बारीक रेशे और सस्ती कीमत की वजह से भारतीय कपड़े का एक अलग ही रुतबा था। इंग्लैंड के रइर्स ही नहीं बल्िक खुदमहारानी भी भारतीय कपड़ों से बने परिधान पहनती थीं। बंडाना शब्द का इस्तेमाल गले या सिर पर पहनने वाले चटक रंग के छापेदार गुलूबन्द के लिए किया जाता है। यह शब्द हिंदी के ‘बाँधना’ शब्द चित्रा 3 - इर्स्ट इंडिया वंफपनी की आॅडर्र बही का एक पन्ना, 1730 ग़्ाौर से देखें कि बही में किस तरह एक - एक चीश की कीमत लंदन में ही तय कर दी गइर् थी। ये सामान मँगाने के लिए वंफपनी को दो साल पहले आॅडर्र देने पड़ते थे क्योंकि आॅडर्र को भारत भेजने, शरूरी कपड़े बनवाने और उन्हें वापस भ्िाजवाने में इतना समय तो लग ही जाता था। जब कपड़े के थान लंदन पहुँच जाते थे तो उन्हें नीलामी के शरिए बेच दिया जाता था। चित्रा 4 - जामदानी बुनाइर्, बीसवीं सदी की शुरुआत में। जामदानी एक तरह का बारीक मलमलहोता है जिस पर करघे में सजावटी चिÉ बुने जाते हैं। इनका रंग प्रायः सलेटी और सपेफद होता है। आमतौर पर सूती और सोने के धागों का इस्तेमाल किया जाता था जो कि इस चित्रा में दिखाइर् दे रहा है। बंगाल में स्िथत ढाका और संयुक्त प्रांत ;वतर्मानउत्तर प्रदेशद्ध स्िथत लखनउफ जामदानी बुनाइर्के सबसे महत्त्वपूणर् वेंफद्र थे। चित्रा 5 - मसूलीपट्टðनम, आंध्र प्रदेश में बारीक कपड़े पर छपाइर् ;छींटद्ध, उन्नीसवीं सदी के मध्म में। इर्रान और यूरोप को नियार्त होने वाले छींट का यह बढि़या उदाहरण है। चित्रा 6 - बंडाना डिजाइन, बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में। कपड़े के मध्य से गुजरती लकीर को देखें। आप जानते हैं यह क्यों है? दरअसल, इस ढनी मओ़ंेदो बाँध् कर रँगे गये ;ज्पम ंदक कलमद्ध रेशमी कपड़े के टुकड़ों को सोने की कढ़ाइर् के शरिए एक - दूसरे में सीं दिया गया है। बंडाना शैली के कपड़े अिाकांशतः राजस्थान और गुजरात में बनाए जाते थे। से निकला है। इस श्रेणी में चटक रंगों वाले ऐसी बहुत सारी किस्म के कपड़ेआते थे जिन्हें बाँधने और रँगसाशी की विध्ियों से ही बनाया जाता था। बही में कइर् दूसरी तरह के कपड़ों का भी िाक्र है जिनका नाम उनकेजन्म स्थान के अनुसार लिखा गया है: कासिमबाशार, पटना, कलकत्ता,उड़ीसा, चारपूर आदि। इन शब्दों के व्यापक प्रयोग से पता चलता है कि दुनिया के विभ्िान्न भागों में भारतीय कपड़े कितने मशहूर हो चुके थे। यूरोपीय बाशारों में भारतीय कपड़ा अठारहवीं सदी की शुरुआत तक आते - आते भारतीय कपड़े की लोकपि्रयतासे बेचैन इंग्लैंड के ऊन व रेशम निमार्ता भारतीय कपड़ों के आयात काविरोध करने लगे थे। इसी दबाव के कारण 1720 में बि्रटिश सरकार ने इंग्लैंड में छापेदार सूती कपड़े μ छींट μ के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने केलिए एक व़्ाफानून पारित कर दिया। संयोगवश, इस व़्ाफानून को भी वैफलिकोअध्िनियम ही कहा जाता था। उस समय इंग्लैंड में नए - नए कपड़ा कारख़ाने खुल रहे थे। भारतीयकपड़ों के सामने लाचार अंग्रेश कपड़ा उत्पादक अपने देश में भारतीय कपड़ोंके प्रवेश पर पूरी पाबंदी चाहते थे ताकि पूरे इंग्लैंड में केवल उन्हीं का कपड़ा बिके। इस क्रम में इंग्लैंड की सरकार ने सबसे पहले वैफलिको छपाइर्उद्योग को ही सरकारी संरक्षण में विकसित किया। अब सपेफद मलमल याबिना मांड वाले कोरे भारतीय कपड़े पर इंग्लैंड में ही भारतीय डिजाइन छापे जाने लगे। भारतीय कपड़ों के साथ इस होड़ की वजह से इंग्लैंड में तकनीकीसुधारों की शरूरत दिखाइर् देने लगी थी। 1764 में जाॅन के ने स्िपनिंग जैनी का आविष्कार किया जिससे परंपरागत तकलियों की उत्पादकता कापफी बढ़गइर्। 1786 में रिचडर् आवर्फराइट ने वाष्प इंजन का आविष्कार किया जिसनेसूती कपड़े की बुनाइर् को क्रान्ितकारी रूप से बदल दिया। अब बहुत सारा कपड़ा बेहद कम कीमत पर तैयार किया जा सकता था। इसके बावजूद, दुनिया के बाशारों पर भारतीय कपड़े का दबदबाअठारहवीं सदी के आख्िार तक बना रहा। डच, प्ऱफेंच, बि्रटिश और अन्य यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने इस व्यापार से बेहिसाब मुनाप़्ाफा कमाया। येकम्पनियाँ भारत आकर चाँदी के बदले सूती और रेशमी कपड़े खरीदती थीं।परंतु जैसा कि आप जानते हैं, जब इंग्िलश इर्स्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल की राजनीतिक सत्ता मिल गइर् तो उसे भारतीय चीशें खरीदने के लिए चाँदीमँगाने की शरूरत नहीं रही ;अध्याय 2द्ध। इसके बाद तो इर्स्ट इंडिया कम्पनीभारत में ही किसानों और शमींदारों से राजस्व इकट्ठा करके उस पैसे से कपड़ा खरीदने लगी। गतिवििाऽ आपकी राय में वैफलिकोअिानियम का यह नाम‘वैफलिको अिानियम’ क्यों रखा गया? इस नाम से इस बारे मेंक्या पता चलता है कि कौनसे कपड़े पर पाबंदी लगाइर् जा रही थी? स्िपनिंग जैनी - एक ऐसी मशीन जिससे एक कामगार एक साथ कइर् तकलियों पर कामकर सकता था। जब पहियाघूमता था तो सारी तकलियाँ घूमने लगती थीं। चित्रा 7 - कोचीन स्िथत डच बस्ती का समुद्र से दिखता दृश्य, सत्राहवीं शताब्दी में। जैसे - जैसे यूरोपीय व्यापार पैफला, विभ्िान्न बंदरगाहों पर व्यापारिक बस्ितयाँ भी बनने लगीं। कोचीन में डच बस्ितयाँ सत्राहवीं शताब्दी में विकसित हुईं। बस्ती के चारों तरपफ स्िथत किलेबंदी को देख्िाए। अठारहवीं सदी के आख्िार में बुनाइर् के मुख्य वेंफद्र कहाँ - कहाँ थे? सपेफद चेक और धरीदार¯शट्श सिल्क चित्रा 8 - बुनाइर् वेंफद्र: 1500 - 1750 अगर आप इस नक्शे को देखें तो पाएँगे कि उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में कपड़ा उत्पादन चार क्षेत्रों मेंवेंफदि्रत था। बंगाल सबसे महत्त्वपूणर् वेंफद्रों में से एक था। डेल्टा की असंख्य नदियों से सटे बंगाल के उत्पादन वेंफद्र अपना माल दूर - दूर तक आसानी से भेज सकते थे। याद रखें कि उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में रेलवे की शुरुआत नहीं हुइर् थी और सड़वेंफ भी अभी बननी ही शुरू हो रही थीं। पूवीर् बंगाल ;अब बांगलादेशद्ध स्िथत ढाका अठारहवीं सदी में सबसे महत्त्वपूणर् कपड़ा उत्पादन वेंफद्र था। ये शहर अपनी मलमल और जामदानी बुनाइर् के लिए दूर - दूर तक प्रसि( था। यदि आप नक्शे में भारत के दक्ष्िाणी भाग को देखें तो मद्रास से उत्तरी आंध्र प्रदेश तक पैफले कोरोमंडल तट के साथ - साथ सूती कपड़ा बुनाइर् वेंफद्रों का एक और समूह दिखाइर् पड़ेगा। पश्िचमी तट पर मुख्य बुनाइर् वेंफद्र गुजरात में स्िथत थे। 1823 में भारत की वंफपनी सरकार को 12,000 बुनकरों की तरपफ से एक पत्रा मिला जिसमें कहा गया था कि: हमारे पुरखे और हम लोगों को वंफपनी से पेशगी मिलती थी जिससे हम वंफपनी के लिए बढि़या कपड़े बुनकर अपने - अपने परिवारों का पेट पालते थे। हमारी बदनसीबी है कि अब औरांग ख़त्म कर दिए गए हैं जिसकी वजह से हम लोगों और हमारे परिवारों के पास आजीविका के साधन नहीं बचे हैं। हम बुनकर हैं और कोइर् दूसरा कारोबार नहीं जानते। अगर बोडर् आॅपफट्रेड ;व्यापार बोडर्द्ध हम पर कृपा नहीं करता और हमें कपड़ों के आॅडर्र नहीं देता है तो हम भूखों मर जाएँगे। व्यापारिक बोडर् की कारर्वाइर्, 3 पफरवरी 1824 बुनकर कौन थे? बुनकर आमतौर पर बुनाइर् का काम करने वाले समुदायों के ही कारीगर होतेथे। वे पीढ़ी - दर - पीढ़ी इसी हुनर को आगे बढ़ाते थे। बंगाल के तांती, उत्तरभारत के जुलाहे या मोमिन, दक्ष्िाण भारत के साले व वैफकोल्लार तथा देवांग समुदाय बुनकरी के लिए प्रसि( थे। सूत कातना कपड़ा उत्पादन का सबसे पहला चरण था। यह कामअिाकांशतः महिलाओं के जिम्मे रहता था। चरखा और तकली घर - घर में पाए जाते थे। धागे को चरखे पर कात कर तकली पर लपेट दिया जाता था।जब कताइर् पूरी हो जाती थी तो बुनकर इस धागे से कपड़े बुनते थे। श्यादातरसमुदायों में बुनाइर् का काम पुरुष करते थे। रंगीन कपड़ा बनाने के लिए रँगरेश इस धागे को रँग देते थे। छपाइर्दार कपड़ा बनाने के लिए बुनकरों कोचिप्पीगर नामक माहिर कारीगरों की शरूरत होती थी जो ठप्पे से छपाइर् करतेथे। हथकरघों पर होने वाली बुनाइर् और उससे जुड़े व्यवसायों से लाखों भारतीयों की रोशी - रोटी चलती थी। चित्रा 9 - बंगाल का एक तांती बुनकर, बेल्िजयन चित्राकार सोलविंस द्वारा बनाया भारतीय कपड़े का पतन गया चित्रा, 1790 का दशक। इस चित्रा में तांती बुनकर गड्ढे वाले करघे बि्रटेन में सूती कपड़ा उद्योग के विकास से भारतीय कपड़ा उत्पादकों पर कइर्तरह के असर पड़े। पहला: अब भारतीय कपड़े को यूरोप और अमरीकाके बाशारों में बि्रटिश उद्योगों में बने कपड़ों से मुकाबला करना पड़ता था। दूसरा: भारत से इंग्लैंड को कपड़े का नियार्त मुश्िकल होता जा रहा थाक्योंकि बि्रटिश सरकार ने भारत से आने वाले कपड़े पर भारी सीमा शुल्कथोप दिए थे। इंग्लैंड में बने सूती कपड़े ने उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक भारतीयकपड़े को अप्ऱफीका, अमरीका और यूरोप के परंपरागत बाशारों से बाहर करदिया था। इसकी वजह से हमारे यहाँ के हशारों बुनकर बेरोशगार हो गए। सबसे बुरी मार बंगाल के बुनकरों पर पड़ी। बि्रटिश और यूरोपीय कम्पनियोंने भारतीय माल खरीदने बंद कर दिए और उनके एजेंटों ने तयशुदा आपूतिर्के लिए बुनकरों को पेशगी देना बंद कर दिया था। परेशान बुनकरों ने मदद के लिए बार - बार सरकार से गुहार लगाइर्। औरांग - पफारसी भाषा में गोदामको औरांग कहा जाता है। वहाँ बिव्रफी से पहले चीशों को जमाकरके रखा जाता है। ववर्फशाॅपके लिए भी यह शब्द इस्तेमाल होता है। में काम कर रहा है। क्या आप जानते हैं कि गड्ढे वाला करघा क्या होता है? ड्डोत 1 फ्हम भूखों मर जाएँगेय् गतिवििाऽ ड्डोत 1 और 2 को देखें। अजीर्भेजने वालों ने अपनी भुखमरी के लिए किन परिस्िथतियों कोजिम्मेदार बताया है? आपने पश्िचमी भारत में स्िथत शोलापुर और दक्ष्िाण भारत में स्िथत मदुरा काजिक्र शरूर सुना होगा। ये शहर उन्नीसवीं सदी के आख्िार में बुनकरी के नएमहत्त्वपूणर् केन्द्र बनकर सामने आए। बाद में, राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महात्मागांधी ने भी लोगों से आह्नान किया कि वे आयातित कपड़े का बहिष्कार करें औरहाथ से कते सूत और हाथ से बुने कपड़े ही पहनें। इस तरह खादी राष्ट्रवाद का प्रतीक बनती चली गइर्। चरखा भारत की पहचान बन गया और 1931 में उसेभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तिरंगे झंडे की बीच वाली पट्टी में जगह दी गइर्। आइए देखें कि आजीविका के साधन गँवा चुके बुनकरों और सूत कातने वालों का क्या हुआ? उनमें से बहुत सारे तो खेतिहर मशदूर बन गए थे। कुछ काम कीतलाश में शहरों की तरपफ चले गए और बहुत से देश से बाहर अप्ऱफीका व दक्ष्िाणीअमरीका के बागानों में काम करने के लिए चले गए। इनमें से कुछ हथकरघा बुनकरों को बम्बइर् ;अब मुंबइर्द्ध, अहमदाबाद, शोलापुर, नागपुर और कानपुर में खुले नएकपड़ा कारख़ानों में नौकरी भी मिल गइर्। सूती कपड़ा मिलों का उदय भारत में पहली सूती कपड़ा मिल 1854 में बम्बइर् में स्थापित हुइर्। यह कताइर् मिलथी। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही भारत से इंग्लैंड और चीन को होने वालेकच्चे कपास के नियार्त के लिए बम्बइर् एक महत्त्वपूणर् बंदरगाह बन चुका था। बम्बइर्पश्िचमी भारत की काली मिट्टी वाली उस विशाल पट्टी से कापफी निकट था जहाँकपास की खेती की जाती थी। जब वहाँ सूती कपड़ा मिलों की स्थापना हुइर् तो उन्हें कच्चा माल आसानी से मिलने लगा। चित्रा 10 - एक कपास कारख़ाने में काम करती मजदूर महिलाएँ, सन् 1900 के लगभग राजा दीनदयाल द्वारा लिया गया चित्रा। कताइर् विभाग में श्यादातर मशदूर महिलाएँ होती थीं जबकि बुनकर विभाग में श्यादातर पुरुष होते थे। प्रगलन - चट्टान ;या मिट्टीद्धको बहुत उँफचे तापमान पर गमर्करके धातु तैयार करने या धातु की बनी चीशों को पिघलाने कीप्रिया जिससे कोइर् नइर् चीशबनाइर् जा सके। चित्रा 11 - अठारहवीं सदी के अंत में टीपू की तलवार। टीपू सुल्तान की तलवार की मूठ पर कुरान की आयतें लिखी हुइर् हैं जिनमें यु( में पफतह के संदेश दिए गए हैं। गौर से देख्िाए की शेर का सिर मूठ के निचले सिरे की तरपफ है। सन् 1900 तक आते - आते बम्बइर् में 84 कपड़ा मिलें चालू हो चुकी थीं।उनमें से बहुत सारी मिलें पारसी और गुजराती व्यवसायियों ने खोली थीं जोचीन के साथ व्यापार के शरिए काप़्ाफी पैसा कमा चुके थे। इस दौरान दूसरे शहरों में भी ऐसे कइर् कारख़ाने खोले गए। अहमदाबाद मेंपहला कारख़ाना 1861 में खुला। अगले ही साल संयुक्त प्रांत स्िथत कानपुर मेंभी एक कारख़ाना खुल गया। सूती कपड़ा मिलों की बढ़ती संख्या के कारण मशदूरों की माँग भी बढ़ने लगी। हशारों गरीब काश्तकार, दस्तकार और खेतिहरकामगार कारख़ानों में काम करने के लिए शहरों की तरपफ जाने लगे। प्रारंभ्िाक कुछ दशकों के दौरान भारतीय कपड़ा कारख़ानों को बहुत सारी समस्याओं से जूझना पड़ा। सबसे पहली समस्या तो यही थी कि इस उद्योगको बि्रटेन से आए सस्ते कपड़ों का मुकाबला करना पड़ता था। श्यादातर देशोंमें सरकारें आयातित वस्तुओं पर सीमा शुल्क लगा कर अपने देश में औद्योगीकरण को बढ़ावा देती थीं। इससे प्रतिस्पधार् खत्म हो जाती थी औरसंबंिात देश के नवजात उद्योगों को संरक्षण मिलता था। परंतु औपनिवेश्िाकभारतीय सरकार ने स्थानीय उद्योगों को आम तौर पर इस तरह की सुरक्षा नहीं दी। लिहाश़ा, भारत में औद्योगिक सूती वस्त्रोत्पादन की पहली बड़ी लहरप्रथम विश्व यु( के समय दिखाइर् दी जब बि्रटेन से आने वाले कपड़े कीमात्रा में कापफी कमी आ गइर् थी और सैनिक शरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय कारख़ानों से कपड़े का उत्पादन बढ़ाने की माँग की जाने लगी। टीपू सुल्तान की तलवार और वुट्श स्टील भारतीय इस्पात और लौह धातु कला की कहानी हम टीपू सुल्तान के एकमशहूर किस्से से शुरू करते हैं। ये वही टीपू सुल्तान हैं जिन्होंने 1799 तक मैसूर पर शासन किया और अंग्रेशों से चार लड़ाइयाँ लड़ीं और हाथ मेंतलवार लिए लड़ते - लड़ते मारे गए थे। टीपू की विश्वविख्यात तलवारें आजइंग्लैंड के संग्रहालयों की बहुमूल्य संपत्ित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि टीपू की तलवार इतनी ख़ास क्यों थी? दरअसल इस तलवार की धार इतनीसख्त और पैनी थी कि वह दुश्मन के लौह - कवच को भी आसानी से चीरसकती थी। इस तलवार में यह गुण काबर्न की अिाक मात्रा वाली वुट्श नामक स्टील से पैदा हुआ था जो पूरे दक्ष्िाण भारत में बनाया जाता था। इसवुट्श स्टील की तलवारें बहुत पैनी और लहरदार होती थीं। इनकी यहबनावट लोहे में गड़े काबर्न के बेहद सूक्ष्म कणों से पैदा होती थी। टीपू सुल्तान की मृत्यु के एक साल बाद 1800 में मैसूर की यात्रा करनेवाले प्ऱफांसिस बुकानन ने इस बात का ब्योरा दिया है कि मैसूर की सैकड़ों प्रगलन भटि्ठयों में वुट्श स्टील किस तरह बनाया जाता था। इन भटि्ठयों में लोहे को काठकोयले के साथ मिलाकर मिट्टी की छोटी - छोटी हांडियों में रखदिया जाता था। तापमान के जटिल उतार - चढ़ावों को नियंत्रिात करते हुए प्रगालकइस्पात की सिल्िलयाँ तैयार कर लेते थे जिनका न केवल भारत बल्िक पश्िचमी और मध्य एश्िाया में भी तलवार बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। वुट्श असल में कन्नड शब्द उक्कू, तेलगु शब्द हुक्कू और तमिल व मलयालम शब्दउरुक्कू यानी स्टील का ही बिगड़ा हुआ अंग्रेशी रूप है। भारतीय वुट्श स्टील ने यूरोपीय वैज्ञानिकों को कापफी आकष्िार्त किया था।विश्वविख्यात वैज्ञानिक और बिजली व विद्युत चुम्बकत्व का आविष्कार करनेवाले माइकल प़ैफराडे ने भारतीय वुट्श स्टील की विशेषताओं का चार साल ;1818 - 22द्ध तक अध्ययन किया। परंतु दक्ष्िाण भारत में इतनी प्रचलित वुट्शस्टील निमार्ण प्रवि्रफया उन्नीसवीं सदी के मध्य तक आते - आते पूरी तरह लुप्तहो चुकी थी। क्या आप बता सकते हैं ऐसा क्यों हुआ होगा? भारत पर अंग्रेशों की जीत के साथ ही यहाँ का तलवार और हथ्िायार उद्योग समाप्त हो गया औरभारतीय कारीगरों द्वारा बनाए गए लोहे और इस्पात का स्थान इंग्लैंड से आएलोहे और इस्पात ने ले लिया। गाँवों की उजड़ी भटि्ठयाँ वुट्श स्टील उत्पादन के लिए लोहे के परिशोधन की बेहद परिष्वृफत तकनीक शरूरी थी। परंतु भारत में उन्नीसवीं सदी के अंत तक लोहे का प्रगलन एकसामान्य गतिवििा थी। खासतौर से बिहार और मध्य भारत के हरेवफ जिले मेंऐसे प्रगालक कारगर थे जो लोहा बनाने के लिए लौह अयस्क के स्थानीय भंडारों का इस्तेमाल करते थे। इसी लोहे से कारख़ानों में दैनिक इस्तेमाल केऔशार और साधन बनाए जाते थे। श्यादातर भटि्ठयाँ मिट्टी और धूप मेंसुखायी गइर् ईंटों से बनी होती थीं। प्रगलन का काम पुरुष करते थे जबकि महिलाएँ धौंकनी चलाती थीं। वे कोयले को लगातार दहकाने के लिए हवा धौंकनी - हवा पेफंकने का यंत्रा। गतिवििाऽ नवाबों और राजाओं की हार सेलौह एवं इस्पात उद्योग वैफसेप्रभावित होता था? चित्रा 13 - मध्य भारत का एक गाँव जहाँ लौह प्रगालकों का अगरिया समुदाय रहता था। अगरिया जैसे कइर् समुदाय लोहा बनाने में माहिर थे। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में बार - बार पड़े अकाल की वजह से भारत के सूखे इलाके पूरी तरह तबाह हो चुके थे। मध्य भारत में बहुत सारे अगरिया कारीगरों ने काम बंद कर दिया, गाँव छोड़ दिया और रोजी - रोटी की तलाश में दूसरे इलाकों में चले गए। उनमें से बहुत सारे लोगों ने दोबारा कभी भटि्ठयाँ नहीं चलाइर्ं। ड्डोत 3 एक व्यापक उद्योग प्राणी - विज्ञान सवेर्क्षण विभाग की एक रिपोटर् के अनुसार: एक जमाने में लोहा प्रगलन भारत का बहुत व्यापक उद्योग था और सिंधु, गंगा व ब्रह्मपुत्रा के विशाल बलुआ मैदानों के अलावा शायद ही कोइर् ऐसा जिला था जहाँं धातु - मल न दिखाइर् देता हो। यहाँ के आदिम लौह प्रगालकों को ऐसे भंडारों से अयस्क हासिल करने में कोइर् परेशानी नहीं होती जिन पर कोइर् यूरोपीय लौह विशेषज्ञ एक पल के लिए विचार करना भी उचित नहीं समझेगा। पेंफकती रहती थीं। उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते - आते लोहे के प्रगलन का हुनरखत्म होने लगा था। श्यादातर गाँवों में भटि्ठयाँ ठंडी पड़ चुकी थीं औरलोहे का उत्पादन गिरता जा रहा था। ऐसा क्यों हुआ? इसकी एक वजह तो नए वन व़्ाफानून ही थे जिनके बारे में आप अध्याय4 में पढ़ चुके हैं। जब औपनिवेश्िाक सरकार ने आरक्ष्िात वनों में लोगों केप्रवेश पर पाबंदी लगा दी तो लोहा बनाने वालों को कोयले के लिए भला लकड़ी कहाँ से मिलती? और, लौह अयस्क भी वे कहाँ से ला सकते थे?वन व़्ाफानूनों को नशरअंदाज करते हुए वे अकसर चोरी - छिपे जंगलों में जाकरलकड़ी इकट्ठा कर लाते थे परंतु लंबे समय तक केवल इसी तरह अपना कारोबार जारी नहीं रख सकते थे। लिहाशा, बहुत सारे कारीगरों ने यह पेशाछोड़ दिया और वे आजीविका के दूसरे साधन ढूँढ़ने लगे। वुफछ क्षेत्रों में सरकार ने जंगलों में आवाजाही की अनुमति दे दी थी। लेकिन प्रगालकों को अपनी प्रत्येक भट्ठी के लिए वन विभाग को बहुतभारी कर चुकाने पड़ते थे जिससे उनकी आय गिर जाती थी। उन्नीसवीं सदी के आख्िार तक बि्रटेन से लोहे और इस्पात का आयात भी होने लगा था। भारतीय लुहार भी घरेलू बतर्न व औशार आदिबनाने के लिए आयातित लोहे का इस्तेमाल करने लगे थे। इसकी वजहसे स्थानीय प्रगालकों द्वारा बनाए जा रहे लोहे की माँग कम होने लगी। बीसवीं सदी की शुरुआत तक लोहा और इस्पात बनाने वाले कारीगरोंके सामने एक नइर् चुनौती आ खड़ी हुइर्। भारत में लोहा व इस्पात कारख़ानों का उदय साल 1904 की बात है। अप्रैल के महीने में अमरीकी भूवैज्ञानिक चाल्सर् वेल्ड और जमशेदजी टाटा के सबसे बड़े बेटे दोराबजी टाटा छत्तीसगढ़ में लौह अयस्कभंडारों की खोजबीन करते घूम रहे थे। वे भारत में एक आधुनिक लौह एवं इस्पातसंयंत्रा लगाने के लिए अच्छे लौह अयस्क भंडारों की तलाश में कइर् महीने और कापफी सारा पैसा खचर् कर चुके थे। जमशेदजी टाटा भारत में बड़ा लौह एवं इस्पातकारख़ाना लगाने के लिए अपनी संपिा का बड़ा भाग खचर् करने को तैयार थे।लेकिन इसके लिए पहली शतर् यह थी कि उम्दा लौह अयस्क भंडारों का पता लगा लिया जाए। एक दिन, कइर् घंटे तक जंगल की खाक छानने के बाद वेल्ड और दोराबजी एकछोटे से गाँव में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि वुफछ स्त्राी - पुरुष टोकरियों में भरकर लौह अयस्क ले जा रहे हैं। ये अगरिया समुदाय के लोग थे। जब उनसे पूछा गयाकि वे अयस्क कहाँ से लाए हैं तो उन्होंने दूर स्िथत एक पहाड़ी की तरपफ उँगलीउठा दी। वेल्ड और दोराबजी घने जंगलों से होते हुए कापफी देर बाद थककर उस पहाड़ी पर जा पहुँचे। पहाड़ी का अध्ययन करने के बाद वेल्ड ने बताया कि उन्हेंजिस चीश की तलाश थी वह मिल चुकी है। रझारा पहाडि़याँ दुनिया के सबसेबेहतरीन लौह अयस्क भंडारों में से एक थीं। लेकिन यहाँ एक परेशानी थी। यह सूखा इलाव़्ाफा था और कारख़ाना चलाने केलिए आसपास कहीं पानी नहीं था। लिहाशा, कारख़ाना लगाने के लिए सही जगहके बारे में टाटा की तलाश जारी रही। अगरिया समुदाय के लोगों ने ही लौह अयस्कका एक और ड्डोत ढूँढ़ने में मदद दी जहाँ से बाद में भ्िालाइर् स्टील संयंत्रा को अयस्ककी आपूतिर् की गइर्। वुफछ साल बाद सुबणर्रेखा नदी के तट पर बहुत सारा जंगल सापफ करके प़्ौफक्ट्री और एक औद्योगिक शहर बसाने के लिए जगह बनाइर् गइर्। इस शहर को जमशेदपुरका नाम दिया गया। इस स्थान पर लौह अयस्क भंडारों के निकट ही पानी भीउपलब्ध था। यहाँ टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी ;टिस्कोद्ध की स्थापना हुइर् जिसमें 1912 से स्टील का उत्पादन होने लगा। टिस्को की स्थापना बहुत सही समय पर हुइर् थी। उन्नीसवीं सदी में भारत चित्रा 15 - यु( के आख्िार में विस्तार। यु( की शरूरतों को पूरा करने के लिए टिस्को को अपनी क्षमता और प़ैफक्ट्री का आकार बढ़ाना पड़ा। विस्तार का यह काम यु( के बाद भी चलता रहा। इस चित्रा में नए विद्युत संयंत्रा और बायलर संयंत्रा बनाए जा रहे हैं, जमशेदपुर 1919आमतौर पर बि्रटेन में बने स्टील का आयात कर रहा था। भारत में रेलवे केविस्तार की वजह से बि्रटेन में बनी पटरियों की यहाँ भारी माँग थी। कापफी समय तक भारतीय रेलवे से जुड़े अंग्रेश विशेषज्ञ यह मानने को तैयार ही नहीं थे किभारत में भी श्रेष्ठ इस्पात का निमार्ण संभव है। जब तक टिस्को की स्थापना हुइर्, हालात बदलने लगे थे। 1914 में पहला विश्व यु( शुरू हुआ। बि्रटेन में बनने वाले इस्पात को यूरोप में यु( संबंधीआवश्यकताओं को पूरा करने के लिए झोंक दिया गया। इस तरह भारत आनेवाले बि्रटिश स्टील की मात्रा में भारी गिरावट आइर् और रेल की पटरियों के लिए भारतीय रेलवे टिस्को पर आश्रित हो गया। जब यु( लंबा ¯खच गयातो टिस्को को यु( के लिए गोलों के खोल और रेलगाडि़यों के पहिये बनानेका काम भी सौंप दिया गया। 1919 तक स्िथति यह हो गइर् थी कि टिस्को में बनने वाले 90 प्रतिशत इस्पात को औपनिवेश्िाक सरकार ही खरीद लेतीथी। जैसे - जैसे समय बीता टिस्को समूचे बि्रटिश साम्राज्य में इस्पात का सबसेबड़ा कारख़ाना बन चुका था। सूती कपड़े की तरह लोहे एवं इस्पात के मामले में भी औद्योगिक विस्तारतभी शुरू हुआ जब भारत में बि्रटिश आयात गिरने लगा और भारतीय औद्योगिक वस्तुओं की माँग में इशापफा हुआ। ये बदलाव पहले विश्व यु( केदौरान और उसके बाद सामने आए। जैसे - जैसे राष्ट्रीय आंदोलन विकसित हुआ, औद्योगिक वगर् ताकतवर होता गया और सरकारी संरक्षण की माँग बुलंदहोती गइर्। भारत पर अपना नियंत्राण बनाए रखने के लिए संघषर्रत बि्रटिशसरकार को औपनिवेश्िाक शासन के आख्िारी दशकों में इनमें से बहुत सारी माँगें माननी पड़ीं। जापान में औद्योगीकरण के शुरुआती साल उन्नीसवीं सदी के आख्िार में जापान के औद्योगीकरण का इतिहास भारत के औद्योगीकरण से बिलकुल उल्टा दिखाइर् देता है। भारत में औपनिवेश्िाक सरकार बि्रटिश वस्तुओं का बाशार बढ़ाना चाहती थी इसलिए उसने भारतीय उद्योगपतियों को किसी तरह की सहायता नहीं दी। दूसरी तरपफ, जापान की सरकार ने अपने देशी उद्योगों को खुलकर बढ़ावा दिया। 1868 में जापान की सत्ता सँभालने वाले मेजी राजवंश का मानना था कि जापान को पश्िचमी प्रभुत्व का सामना करने के लिए औद्योगीकरण के रास्ते पर चलना चाहिए। इसलिए उसने औद्योगीकरण को आगे बढ़ानेके लिए कइर् महत्त्वपूणर् कदम उठाए। इसी क्रम में डाक सेवाओं, टेलीग्रापफ, रेलवे और वाष्पचालित जलपोतों का विकास किया गया। पश्िचम से नवीनतम तकनीक का आयात किया गया और उसे जापान की शरूरतों के हिसाब से ढाला गया। जापानी पेशेवरों को प्रश्िाक्ष्िात करने के लिए विदेशी विशेषज्ञों को बुलाया गया। निवेश के लिए सरकारी बैंकों से उद्योगपतियों को उदार शतोर्ं पर कजेर् दिए गए। सरकार ने पहले विशाल उद्योग शुरू किए और बाद में उन्हें सस्ती कीमत पर व्यावसायिक घरानों को बेच दिया। भारत में औपनिवेश्िाक प्रभुत्व ने औद्योगीकरण के रास्ते में बाधाएँ पैदा कर दी थीं जबकि जापान में विदेशी कब्जे के भय की वजह से ही औद्योगीकरण को बढ़ावा मिला था। लेकिन इसका एक अथर् यह भी था कि जापान का औद्योगिक विकास शुरू से ही उसकी सैनिक शरूरतों से जुड़ा हुआ था। 1.यूरोप में किस तरह के कपड़ों की भारी माँग थी? 2.जामदानी क्या है? 3.बंडाना क्या है? 4.अगरिया कौन होते हैं? 5. रिक्त स्थान भरें: ;कद्ध अंग्रेशी का श्िांट्श शब्द हिंदी के ....... शब्द से निकला है। ;खद्ध टीपू की तलवार ... स्टील से बनी थी। ;गद्ध भारत का कपड़ा नियार्त ... सदी में गिरने लगा। आइए विचार करें 6.विभ्िान्न कपड़ों के नामों से उनके इतिहासों के बारे में क्या पताचलता है? 7.इंग्लैंड के ऊन और रेशम उत्पादकों ने अठारहवीं सदी की शुरुआतमें भारत से आयात होने वाले कपड़े का विरोध क्यों किया था? 8.बि्रटेन में कपास उद्योग के विकास से भारत के कपड़ा उत्पादकों परकिस तरह के प्रभाव पड़े? 9. उन्नीसवीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग का पतन क्यों हुआ? 10 भारतीय वस्त्रोद्योग को अपने शुरुआती सालों में किन समस्याओं सेजूझना पड़ा? 11 पहले महायु( के दौरान अपना स्टील उत्पादन बढ़ाने में टिस्को कोकिस बात से मदद मिली? आइए करके देखंे 12.जहाँ आप रहते हैं उसके आस - पास प्रचलित किसी हस्तकला काइतिहास पता लगाएँ। इसके लिए आप दस्तकारों के समुदाय, उनकी तकनीक में आए बदलावों और उनके बाशारों के बारे में जानकारियाँइकट्ठा कर सकते हैं। देखें कि पिछले 50 साल के दौरान इन चीशोंमें किस तरह बदलाव आए हैं? 13 भारत के नक्शे पर विभ्िान्न हस्तकलाओं के अलग - अलग वेंफद्रों कोचिित करें। पता लगाएँ कि ये वेंफद्र कब पैदा हुए?

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