वीर वुँफवर ¯सह पने सुभद्रा वुफमारी चैहान की कविता ‘झाँसी की रानी’ छठी कक्षा में पढ़ी होगी। इस कविता में ठावुफर वुँफवर ¯सह का नाम भी आया है। आपको कविता की पंक्ितयाँ याद आ रही होंगी। एक बार पिफर से इन पंक्ितयों को पढि़एμ यहाँ स्वतंत्राता संग्राम के उसी वीर वुँफवर ¯सह के बारे में जानकारी दी जा रही है। सन् 1857 के व्यापक सशस्त्रा - विद्रोह ने भारत में बि्रटिश शासन की जड़ों को हिला दिया। भारत में बि्रटिश शासन ने जिस दमन नीति को आरंभ किया उसके विरु( विद्रोह शुरू हो गया था। माचर् 1857 में बैरकपुर में अंग्रेशों के विरु( बगावत करने पर मंगल पांडे को 8 अप्रैल 1857 को पफाँसी दे दी गइर्। 10 मइर् 1857 को मेरठ में भारतीय सैनिकों ने बि्रटिश अिाकारियों के विरु( आंदोलन किया और सीधे दिल्ली की ओर वूफच कर गए। दिल्लीवुँफवर ¯सह में तैनात सैनिकों के साथ मिलकर 11 मइर् को उन्होंने दिल्ली पर कब्शा कर लिया और अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह शपफर को भारत़का शासक घोष्िात कर दिया। यह विद्रोह जंगल की आग की भाति दूर - दूर तक पैफलँवीर वुँफवर ¯सह गया। कइर् महीनों तक उत्तरी और मध्य भारत के विस्तृत भूभाग पर विद्रोहियों का कब्शा रहा। दिल्ली के अतिरिक्त जहाँ अत्यिाक भीषण यु(हुआ, वे वेंफद्र थेμकानपुर, लखनऊ, बरेली, बुंदेलखंड और आरा। इसके साथ ही देश के अन्य कइर् भागों में भी स्थानीय विद्रोह हुए। विद्रोह के मुख्य नेताओं में नाना साहेब, ताँत्या टोपे, बख्त खान, अशीमुल्ला खान, रानी लक्ष्मीबाइर्, बेगम हशरत महल,बेगम हशरत महल वुँफवर ¯सह, मौलवी अहमदुल्लाह, बहादुर खान और राव तुलाराम थे। 1857 का आंदोलन स्वतंत्राता प्राप्ित की दिशा में एक दृढ़ कदम था। आगे चलकर जिस राष्ट्रीय एकता और आंदोलन की नींव पड़ी, उसकी आधारभूमि को नि£मत करने का काम 1857 के आंदोलन ने किया। भारत में सांप्रदायिकसद्भाव को बढ़ाने की दिशा में भी इस आंदोलन का विशेष महत्त्व है। 1857 के आंदोलन में वीर वुँफवर ¯सह का नाम कइर् दृष्िटयों से उल्लेखनीय है। वुँफवर ¯सह जैसे वयोवृ( व्यक्ित ने बि्रटिश शासन के ख्िालापफ बहादुरी वेफ़साथ यु( किया। वीर वुँफवर ¯सह के बचपन के बारे में बहुत अिाक जानकारी नहीं मिलती। कहा जाता है कि वुँफवर ¯सह का जन्म बिहार में शाहाबाद िाले के जगदीशपुर में सन् 1782 इर्॰ में हुआ था। उनके पिता का नाम साहबशादा ¯सह और माता का नाम पंचरतन वुँफवर था। उनके पिता साहबशादा ¯सह जगदीशपुर रियासत के शमींदार थे, परंतु उनको अपनी शमींदारी हासिल करने में बहुत संघषर् करना पड़ा। पारिवारिक उलझनों के कारण वुँफवर ¯सह के पिता बचपन में उनकी ठीक से देखभाल नहीं कर सके। जगदीशपुर लौटने के बाद ही वे वुँफवर ¯सह की पढ़ाइर् - लिखाइर् की ठीक से व्यवस्था कर पाए। वुँफवर ¯सह के पिता वीर होने के साथ - साथ स्वाभ्िामानी एवं उदार स्वभाव के व्यक्ित थे। उनके व्यक्ितत्व का प्रभाव वुँफवर ¯सह पर भी पड़ा। वुँफवर ¯सह की श्िाक्षा - दीक्षा की व्यवस्था उनके पिता ने घर पर ही की, वहीं उन्होंने ¯हदी, 123 वसंत भाग - 2 ़संस्कृत और पफारसी सीखी। परंतु पढ़ने - लिखने से अिाक उनका मन घुड़सवारी, तलवारबाशी और वुफश्ती लड़ने में लगता था। बाबू वुँफवर ¯सह ने अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1827 में अपनी रियासत की िाम्मेदारी सँभाली। उन दिनों बि्रटिश हुवूफमत का अत्याचार चरम सीमा पर था। इससे लोगों में बि्रटिश हुवूफमत के ख्िालाप़्ाफ भयंकरबहादुरशाह शप़्ाफर असंतोष उत्पन्न हो रहा था। कृष्िा, उद्योग और व्यापार का तो बहुत ही बुरा हाल था। रजवाड़ों के राजदरबार भी समाप्त हो गए थे। भारतीयोंको अपने ही देश में महत्त्वपूणर् और उँफची नौकरियों से वंचित कर दिया गया था।इससे बि्रटिश सत्ता के विरु( देशव्यापी संघषर् की स्िथति बन गइर् थी। ऐसी स्िथति में वुँफवर ¯सह ने बि्रटिश हुवूफमत से लोहा लेने का संकल्प लिया। जगदीशपुर के जंगलों में ‘बसुरिया बाबा’ नाम के एक सि( संत रहते थे। उन्होंने ही वुँफवर ¯सह में देशभक्ित एवं स्वाधीनता की भावना उत्पन्न की थी।उन्होंने बनारस, मथुरा, कानपुर, लखनऊ आदि स्थानों पर जाकर विद्रोह की सिय योजनाएँ बनाईं। वे 1845 से 1846 तक काप़्ाफी सिय रहे और गुप्त ढंग से बि्रटिश हुवूफमत के ख्िालाप़्ाफ विद्रोह की योजना बनाते रहे। उन्होंने बिहार के प्रसि( सोनपुर मेले को अपनी गुप्त बैठकों की योजना के लिए चुना। सोनपुर के मेले को एश्िाया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। यह मेला का£तक पू£णमा के अवसर पर लगता है। यह हाथ्िायों के क्रय - विक्रय के लिए भी विख्यात है। इसी ऐतिहासिक मेले में उन दिनों स्वाधीनता के लिए लोग एकत्रा होकर क्रांति के बारे में योजना बनाते थे। 25 जुलाइर् 1857 को दानापुर की सैनिक टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया और सैनिक सोन नदी पार कर आरा की ओर चल पड़े। वुँफवर ¯सह से उनका संपवर्फ पहले से ही था। इस मुक्ितवाहिनी के सभी बागी सैनिकों ने वुँफवर ¯सह का जयघोष करते हुए आरा पहुँचकर जेल की सलाखें तोड़ दीं और वैफदियों को आशाद कर दिया। 27 जुलाइर् 1857 को वुँफवर ¯सह ने आरा पर विजय प्राप्त की। 124 सिपाहियों ने उन्हें पफौजी सलामी दी। यद्यपि वुँफवर ¯सह बूढ़े हो चले थे परंतु वह़वीर वुँफवर ¯सह बूढ़ा शूरवीर इस अवस्था में भी यु( के लिए तत्पर होगया और आरा क्रांति का महत्त्वपूणर् वेंफद्र बन गया। दानापुर और आरा की इस लड़ाइर् की ज्वाला बिहार में सवर्त्रा व्याप्त हो गइर् थी। लेकिन देशी सैनिकों में अनुशासन की कमी, स्थानीय शमींदारों का अंग्रेशों के साथ सहयोग करना एवं आधुनिकतम शस्त्रों की कमी के कारण जगदीशपुर का पतन रोका न जा सका। 13 अगस्त को जगदीशपुर मेंमंगल पांडे वुँफवर ¯सह की सेना अंग्रेशों से परास्त हो गइर्। ¯कतु इससे वीरवर वुँफवर ¯सह का आत्मबल टूटा नहीं और वे भावी संग्राम की योजना बनाने में तत्पर हो गए। वे क्रांति के अन्य संचालक नेताओं से मिलकर इस आशादी की लड़ाइर् को आगे बढ़ाना चाहते थे। वुँफवर ¯सह सासाराम से मिशार्पुर होते हुए रीवा, कालपी,कानपुर एवं लखनऊ तक गए। लखनऊ में शांति नहीं थी इसलिए बाबू वुँफवर ¯सह ने आशमगढ़ की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने आशादी की इस आग को बराबर जलाएरखा। उनकी वीरता की कीतिर् पूरे उत्तर भारत में पैफल गइर्। वुँफवर ¯सह की इस विजय यात्रा से अंग्रेशों के होश उड़ गए। कइर् स्थानों के सैनिक एवं राजा वुँफवर ¯सह की अधीनता में लड़े। उनकी यह आशादी की यात्रा आगे बढ़ती रही, लोग शामिल होते गए और उनकी अगुवाइर् में लड़ते रहे। इस प्रकार ग्वालियर, जबलपुर के सैनिकों केसहयोग से सपफल सैन्य रणनीति का प्रदशर्न करते हुए वे लखनऊ पहुँचे। आशमगढ़ की ओर जाने का उनका उद्देश्य थाμइलाहाबाद एवं बनारस पर आक्रमण कर शत्राुओं को पराजित करना और अंततः जगदीशपुर पर अिाकार करना। अंग्रेशों और वुँफवर ¯सह की सेना के बीच घमासान यु( हुआ। उन्होंने 22 माचर् 1858 को आशमगढ़ पर कब्शा कर लिया। अंग्रेशों ने दोबारा आशमगढ़ पर आक्रमण किया। वुँफवर ¯सह ने एक बार पिफर आशमगढ़ में अंग्रेशों को हराया। इस प्रकार अंग्रेशी सेना को परास्त कर वीर वुँफवर ¯सह 23 अप्रैल 1858 को स्वाधीनता की विजय पताका पफहराते हुए जगदीशपुर पहुँच गए। ¯कतु इस बूढ़े शेर को बहुत अिाक दिनों तक इस विजय का आनंद लेने का सौभाग्य न मिला। इसी दिन विजय उत्सव मनाते हुए लोगों ने यूनियन जैक ;अंग्रेशों का झंडाद्ध उतारकर अपना झंडा पफहराया। इसके तीन दिन बाद ही 26 अप्रैल 1858 को यह वीर इस 125संसार से विदा होकर अपनी अमर कहानी छोड़ गया। वसंत भाग - 2 स्वाधीनता सेनानी वीर वुँफवर ¯सह यु( - कला में पूरी तरह वुफशल थे। छापामार यु( करने में उन्हें महारत हासिल थी। वुँफवर ¯सह के रणकौशल को अंग्रेशी सेनानायक समझने में पूणर्तः असमथर् थे। दुश्मन को उनके सामने से या तो भागना पड़ता था या कट मरना पड़ता था। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम में इन्होंने तलवार की जिस धार से अंग्रेशी सेना को मौत के घाट उतारा उसकी चमक आज भी भारतीय इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है। उनकी बहादुरी के बारे में अनेक किस्से प्रचलित हैं। कहा जाता है एक बार वीर वुँफवर ¯सह को अपनी सेना के साथ गंगा पार करनी थी। अंग्रेशी सेना निरंतर उनका पीछा कर रही थी, पर वुँफवर ¯सह भी कम चतुर नहीं थे। उन्होंने अपफवाह पैफला दी कि वे अपनी सेना को बलिया के पास हाथ्िायों पऱचढ़ाकर पार कराएँगे। पिफर क्या था, अंग्रेश सेनापति डगलस बहुत बड़ी सेना लेकर बलिया के निकट गंगा तट पर पहुँचा और वुँफवर ¯सह की प्रतीक्षा करने लगा। वुँफवर ¯सह ने बलिया से सात मील दूर श्िावराजपुर नामक स्थान पर अपनी सेना को नावों से गंगा पार करा दिया। जब डगलस को इस घटना की सूचना मिली तो वह भागते हुए श्िावराजपुर पहुँचा, पर वुँफवर ¯सह की तो पूरी सेना गंगा पार कर चुकी थी। एक अंतिम नाव रह गइर् थी और वुँफवर ¯सह उसी पर सवार थे। अंग्रेश सेनापति डगलस को अच्छा मौका मिल गया। उसने गोलियाँ बरसानी आरंभ कर दीं, तब वुँफवर ¯सह के बाएँ हाथ की कलाइर् को भेदती हुइर् एक गोली निकल गइर्। वुँफवर ¯सह को लगा कि अब हाथ तो बेकार हो ही गया और गोली का शहर भी पैफलेगा, उसी क्षण उन्होंने गंगा मैया की ओर भावपूणर् नेत्रों से देखा और अपने बाएँ हाथ को काटकर गंगा मैया को अपिर्त कर दिया। वुँफवर ¯सह ने अपने ओजस्वी स्वर में कहा, फ्हे गंगा मैया! अपने प्यारे की यह अ¯कचन भेंट स्वीकार करो।य् वीर वुँफवर ¯सह ने बि्रटिश हुवूफमत के साथ लोहा तो लिया ही उन्होंने अनेक सामाजिक कायर् भी किए। आरा िाला स्वूफल के लिए शमीन दान में दी जिस पर स्वूफल के भवन का निमार्ण किया गया। कहा जाता है कि उनकी आ£थक स्िथति बहुत अच्छी नहीं थी, पिफर भी वे निधर्न व्यक्ितयों की सहायता करते थे। उन्होंने अपने इलाके में अनेक सुविधाएँ प्रदान की थीं। उनमें से एक हैμआरा - जगदीशपुर सड़क और आरा - बलिया सड़क का निमार्ण। उस समय जल की पूतिर् के लिए लोग वुफएँ खुदवाते थे और तालाब बनवाते थे। वीर वुँफवर ¯सह ने अनेक वुफएँ126 खुदवाए और जलाशय भी बनवाए। वुँफवर ¯सह उदार एवं अत्यंत संवेदनशील व्यक्ित थे। इब्राहीम खाँ और किपफायत हुसैन उनकी सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। उनके यहाँ ¯हदुओं औऱमुसलमानों के सभी त्योहार एक साथ मिलकर मनाए जाते थे। उन्होंने पाठशालाएँ और मकतब भी बनवाए। बाबू वुँफवर ¯सह की लोकपि्रयता इतनी थी कि बिहार की कइर् लोकभाषाओं में उनकी प्रशस्ित लोकगीतों के रूप में आज भी गाइर् जाती है। बिहार के प्रसि( कवि मनोरंजन प्रसाद ¯सह ने उनकी वीरता और शौयर् का वणर्न करते हुए लिखा हैμ 127वीर वुँफवर ¯सह ने मेले का उपयोग किस रूप में किया? निबंध से आगे 1.सन् 1857 के आंदोलन में भाग लेनेवाले किन्हीं चार सेनानियों पर दो - दो वाक्य लिख्िाए। 2.सन् 1857 के क्रांतिकारियों से संबंिात गीत विभ्िान्न भाषाओं और बोलियों में गाए जाते हैं। ऐसे वुफछ गीतों को संकलित कीजिए। अनुमान और कल्पना 1.वीर वुँफवर ¯सह का पढ़ने के साथ - साथ वुफश्ती और घुड़सवारी में अध्िक मन लगता था। आपको पढ़ने के अलावा और किन - किन गतिवििायों या कामों में खूब मशा आता है? लिख्िाए। 2.सन् 1857 में अगर आप 12 वषर् के होते तो क्या करते? कल्पना करके लिख्िाए। 3.आपने भी कोइर् मेला देखा होगा। सोनपुर के मेले और इस मेले में आप क्या अंतर पाते हैं? भाषा की बात ऽ आप जानते हैं कि किसी शब्द को बहुवचन में प्रयोग करने पर उसकी वतर्नी में बदलाव आता है। जैसेμसेनानी एक व्यक्ित के लिए प्रयोग करते हैं और सेनानियों एक से अिाक के लिए। सेनानी शब्द की वतर्नी में बदलाव यह 128

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