रेशम की खोज रेशम की खोज का यथाथर् समय संभवतः अज्ञात है। एक प्राचीन चीनी विंफवदंती के अनुसार, सम्राट हुआंग - टी ने साम्राज्ञी सी - लुंग - ची से अपने बगीचे में उगने वाले शहतूत के वृक्षों की पिायों के क्षतिग्रस्त होने का कारण पता लगाने के लिए कहा था। साम्राज्ञी ने पाया कि सप़्ोफद कृमि शहतूत की पिायों को खा रहे थे। उन्होंने यह भी देखा कि कृमि अपने इदर् - गिदर् चमकदार कोवूफन बुन लेते थे। संयोग से एक कोवूफन उनके चाय के प्याले में गिर गया और कोवूफन में से नाशुक धागों का गुच्छा पृथक हो गया। रेशम उद्योग चीन में आरंभ हुआ और सैंकड़ों वषो± तक इसे कड़ी पहरेदारी में गुप्त रखा गया। बाद में यात्रिायों और व्यापारियों ने रेशम को अन्य देशों में प्रचलित किया। जिस मागर् से उन्होंने यात्रा की थी, उसे आज भी ‘सिल्क रूट’ कहते हैं। वैफटरपिलर खाना बंद कर देते हैं और कोवूफन बनाने के लिए वे बाँस के बने छोटे - छोटे कक्षों में चले जाते हैं ¹चित्रा 3.10 ;कद्धह्। ;इसके लिए ट्रे में छोटी रैक या टहनियाँ रख दी जाती हैं, जिनसे कोवूफन जुड़ जाते हैं।द्ध वैफटरपिलर अथवा रेशम कीट कोवूफन बनाते हैं, जिसके भीतर प्यूपा विकसित होता है। रेशम का संसाध्न - रेशम पफाइबर प्राप्त करने वेफ़लिए कोवूफनों की बड़ी ढेरी का उपयोग किया जाता है। वयस्क कीट में विकसित होने से पहले ही कोवूफनों को धूप में रखा जाता है अथवा पानी में उबाला जाता है या भाप में रखा जाता है। इस प्रक्रम में रेशम के पफाइबर पृथक हो जाते हैं। रेशम के रूप में उपयोग वेफ़प्रमुख शब्द लिए कोवूफन में से रेशे निकालने के पश्चात उनसे धगे बनाने की प्रिया रेशम की रीलिंग कहलाती है। रीलिंग विशेष मशीनों में की जाती है, जो कोवूफन में से पफाइबर या रेशों को निकालती हैं। पिफर रेशम वेफ़पफाइबरों की़कताइर् की जाती है, जिससे रेशम के धगे प्राप्त हो जाते हैं। बुनकरों द्वारा रेशम के इन्हीं धागों से वस्त्रा बुने जाते हैं। आपने क्या सीखाविज्ञान 5.किसी ने पहेली को बताया कि एक जंतु जिसे ‘विवुफना’ कहते हैं, से भी ऊन प्राप्त होती है। क्या आप उसे बता सकते हैं कि यह जंतु कहाँ पाया जाता है। इसके बारे में शब्दकोश अथवा एन्साइक्लोपीडिया/ज्ञानकोश में देख्िाए। 6.हथकरघा और वस्त्रा प्रदशर्नियों में प्रायः वुफछ दुकानों पर रेशम की विभ्िान्न किस्मों के कीटों और उनके जीवनचक्र की भ्िान्न - भ्िान्न अवस्थाओं को उनके वास्तविक नमूनों द्वारा प्रदश्िार्त किया जाता है। इन दुकानों पर अपने बुशुगो± अथवा श्िाक्षकों के साथ जाकर इन कीटों और उनके जीवनचक्र की अवस्थाओं को देखने का प्रयास कीजिए। 7.अपने बगीचे अथवा उद्यान या पौधें से भरपूर किसी अन्य स्थान पर किसी कीट अथवा तितली के अंडों को खोजिए। इन्हें पिायों पर छोटे बिंदुओं के रूप में देखा जा सकता है। अंडेयुक्त पिायों को तोड़ लीजिए और उन्हें गत्ते के डिब्बे में रख दीजिए। उसी पौध्े अथवा उसी किस्म के किसी अन्य पौध्े की वुफछ पिायों को काटकर डिब्बे में डाल दीजिए। संभवतः अंडों में से वैफटरपिलर निकल आए। यदि ऐसा हुआ तो आप पाएंगे कि वैफटरपिलर दिन - रात खाने में व्यस्त रहते हैं। उनके खाने के लिए डिब्बे में प्रतिदिन पिायाँ डालते रहें। कभी - कभी आपको पौधें की पिायों में वैफटरपिलर भी मिल सकते हैं। लेकिन सावधन रहिए। वैफटरपिलर को पकड़ने के लिए कागज के नैपकिन अथवा कागज़्ा का उपयोग करना चाहिए।़इन्हें प्रतिदिन देख्िाए। नोट कीजिए ;पद्ध अंडों में से वैफटरपिलर के निकलने में कितने दिन लगते हैं, ;पपद्ध कोवूफन अवस्था तक पहुँचने मेें कितने दिन लगते हैं, और ;पपपद्ध जीवनचक्र को पूणर् होने में कितने दिन लगते हैं। अपने प्रेक्षणों को अपनी नोटबुक में लिख्िाए। क्या आप जानते हैं? भेड़ों की संख्या की दृष्िट से, चीन और आॅस्ट्रेलिया के बाद भारत का विश्व में तीसरा स्थान है। यद्यपि न्यूजीलैंड की भेड़ों से सबसे अच्छी ऊन प्राप्त होती है। 36 विज्ञान

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रेशों से वस्त्र तक

कक्षा 6 में आपने पादपों (पौधों) से प्राप्त होने वाले कुछ रेशों (फ़ाइबरों) के बारे में पढ़ा था। आपने यह भी पढ़ा था कि ऊन और रेशम के रेशे जंतुओं से प्राप्त होते हैं। जंतुओं से प्राप्त किए जाने वाले रेशों को जांतव रेशे कहते हैं। ऊन के रेशे (फ़ाइबर) भेड़ अथवा याक के बालों से प्राप्त किए जाते हैं। रेशम के फ़ाइबर रेशम कीट के कोकून (कोश) से प्राप्त होते हैं। क्या आप जानते हैं कि भेड़ के शरीर के किस भाग से फ़ाइबर मिलते हैं? क्या आप जानते हैं कि इन रेशों को ऊन में कैसे परिवर्तित किया जाता है, जिन्हें हम स्वेटर बुनने के लिए बाज़ार से खरीदते हैं? क्या आपको जानकारी है कि रेशम के फ़ाइबर से रेशम कैसे बनाया जाता है, जिनसे साड़ियाँ बुनी जाती हैं?

इस अध्याय में, हम एेसे कुछ प्रश्नों के उत्तर जानने का प्रयास करेंगे।

जांतव रेशे - ऊन और रेशम

3.1 ऊन

भेड़, बकरी, याक और कुछ अन्य जंतुओं से ‘ऊन’ प्राप्त की जाती है। ऊन प्रदान करने वाले इन जंतुओं के शरीर बालों से ढके होते हैं (चित्र 3.1)। क्या आप जानते हैं कि इन जंतुओं के आवरण पर बालों की मोटी परत क्यों होती है? बालों के बीच अधिक मात्रा में वायु आसानी से भर जाती है। वायु ऊष्मा की कुचालक है, जैसा कि आप अध्याय 4 में पढ़ेंगे। अतः बाल इन जंतुओं को गर्म रखते हैं। ऊन इन रोयेंदार रेशों से प्राप्त की जाती है।

क्रियाकलाप 3.1

अपने शरीर, बाँहों और सिर के बालों को छूकर अनुभव कीजिए। क्या आपको उनमें कोई अंतर लगता है? कौन-से बाल मोटे और रूखे प्रतीत होते हैं तथा कौन-से मुलायम?

हमारी ही तरह भेड़ की रोयेंदार त्वचा पर दो प्रकार के रेशे होते हैं- (i) दाढ़ी के रूखे बाल, और (ii) त्वचा के निकट अवस्थित तंतुरूपी मुलायम बाल। तंतुरूपी बाल ऊन (कर्तित ऊन) बनाने के लिए रेशे प्रदान करते हैं। भेड़ों की कुछ नस्लों में केवल तंतुरूपी मुलायम बाल ही होते हैं। इनके जनकों का विशेष रूप से एेसी भेड़ों को जन्म देने के लिए चयन किया जाता है, जिनके शरीर पर सिर्फ़ मुलायम बाल हों। तंतुरूपी मुलायम बालों जैसे विशेष गुणयुक्त भेड़ें उत्पन्न करने के लिए जनकों के चयन की यह प्रक्रिया ‘वरणात्मक प्रजनन’ कहलाती है।

चित्र 3.1 घने बालों वाली भेड़

ऊन प्रदान करने वाले जंतु

हमारे देश के विभिन्न भागों में भेड़ों की अनेक नस्लें पाई जाती हैं (सारणी 3.1)। यद्यपि, भेड़ों की ऊन ही ऊन का एकमात्र स्रोत नहीं है, फिर भी, बाज़ार में सामान्य रूप से उपलब्ध ऊन भेड़ की ऊन ही होती है (चित्र 3.1)। याक की ऊन तिब्बत और लद्दाख में प्रचलित है (चित्र 3.2)।

चित्र 3.2 याक
बकरी के बालों से भी ऊन प्राप्त की जाती है अंगोरा ऊन को अंगोरा नस्ल की बकरियों से प्राप्त किया जाता है जो जम्मू एवं कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं (चित्र 3.3 और 3.4)। कश्मीरी बकरी की त्वचा के निकट मुलायम बाल (फ़र) होते हैं, इनसे बेहतरीन शॉलें बनाई जाती हैं, जिन्हें पश्मीना शॉलें कहते हैं।


चित्र 3.3 अंगोरा बकरी

चित्र 3.4 बकरी

ऊँट के शरीर के बालों का उपयोग भी ऊन के रूप में किया जाता है (चित्र 3.5)।


चित्र 3.5 ऊँट


दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले लामा और एेल्पेका से भी ऊन प्राप्त होती है (चित्र 3.6 और 3.7)।

चित्र 3.6 लामा

चित्र 3.7 एेल्पेका

क्रियाकलाप 3.2

उन जंतुओं के चित्र एकत्रित कीजिए, जिनके बालों का उपयोग ऊन के रूप में किया जाता है। उन्हें अपनी स्क्रेप पुस्तिका में चिपकाइए। यदि आप चित्र प्राप्त नहीं कर पाएँ, तो इस पुस्तक में दिए गए चित्रों को देखकर उन्हें बनाने का प्रयास कीजिए।

अपनी क्षेत्रीय और देश की अन्य भाषाओं में भेड़, बकरी, ऊँट और याक जिस नाम से जाने जाते हैं, उनका पता लगाने का प्रयास कीजिए।

क्रियाकलाप 3.3

भारत और विश्व के मानचित्र लीजिए। मानचित्र पर उन स्थानों को चिह्नित कीजिए, जहाँ वे जंतु पाए जाते हैं, जिनसे ऊन प्राप्त होती है। ऊन प्रदान करने वाले प्रत्येक किस्म के जंतुओं के स्थान को दर्शाने के लिए विभिन्न रंगों का उपयोग कीजिए।

रेशों से ऊन तक

ऊन प्राप्त करने के लिए भेड़ों को पाला जाता है। उनके बालों को काटकर और फिर उन्हें संसाधित करके ऊन बनाई जाती है। आइए, हम इस प्रक्रम के बारे में जानकारी प्राप्त करें।

भेड़ पालन और प्रजनन- यदि आप जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के पहाड़ी क्षेत्रों अथवा हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के मैदानों की यात्रा करें, तो आप गड़रियों को भेड़ों के झुंडों को चराने के लिए ले जाते हुए देख सकते हैं। भेड़ शाकाहारी होती है और वह घास और पत्तियाँ पसंद करती है। भेड़ पालक (पालने वाला) उन्हें हरे चारे के अतिरिक्त दालें, मक्का, ज्वार, खली (बीज में से तेल निकाल लेने के बाद बचा पदार्थ) और खनिज भी खिलाते हैं। सर्दियों में, भेड़ों को घरों के अंदर रखा जाता है और उन्हें पत्तियाँ, अनाज और सूखा चारा खिलाया जाता है।

हमारे देश के अनेक भागों में भेड़ों को ऊन के लिए पाला जाता है। सारणी 3.1 में भेड़ों की कुछ नस्लों के नाम दिए गए हैं, जिन्हें हमारे देश में ऊन उत्पादन के लिए पाला जाता है। सारणी 3.1 में उनसे प्राप्त होने वाली ऊन की गुणवत्ता और गठन को भी दिखाया गया है।

भेड़ की कुछ नस्लों के शरीर पर बालों की घनी परत होती है, जिससे बड़ी मात्रा में अच्छी गुणवत्ता की ऊन प्राप्त होती है। जैसा कि पहले बताया गया है, इन भेड़ों को ‘वरणात्मक प्रजनन’ द्वारा उत्पन्न किया जाता है, जिनमें से एक जनक किसी अच्छी नस्ल की भेड़ होती है।

जब पाली गई भेड़ के शरीर पर बालों की घनी वृद्धि हो जाती है, तो ऊन प्राप्त करने के लिए उसके बालों को काट लिया जाता है।

रेशों को ऊन में संसाधित करना

स्वेटर बुनने अथवा शॉल बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली ऊन एक लंबी प्रक्रिया द्वारा प्राप्त उत्पाद होती है, जिसमें निम्नलिखित चरण सम्मिलित हैंः

चरण 1- भेड़ के बालों को त्वचा की पतली परत के साथ शरीर से उतार लिया जाता है [चित्र 3.8 (a)]। यह प्रक्रिया ऊन की कटाई कहलाती है। भेड़ के बाल उतारने के लिए उसी प्रकार की मशीन का उपयोग किया जाता है, जैसी नाई द्वारा बाल काटने के लिए प्रयुक्त की जाती है। 

सारणी 3.1 भेड़ों की कुछ भारतीय नस्लें

नस्ल का नाम ऊन की गुणवत्ता  राज्य जहाँ पाई जाती हैं
लोही अच्छी गुणवत्ता की ऊन  राजस्थान, पंजाब
रामपुर बुशायर भूरी ऊन  उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश
नाली (नली)  गलीचे की ऊन  राजस्थान, हरियाणा, पंजाब
बाखरवाल  ऊनी शॉलों के लिए  जम्मू और कश्मीर
मारवाड़ी मोटी/रुक्ष ऊन  गुजरात
पाटनवाड़ी  हौज़री के लिए  गुजरात

सामान्यतः, बालों को गर्मी के मौसम में काटा जाता है, ताकि भेड़ बालों के सुरक्षात्मक आवरण के न रहने पर भी जीवित रह सके। बाल ऊनी रेशे प्रदान करते हैं। इन्हीं ऊनी रेशों को संसाधित करके ऊन का धागा बनाया जाता है। ऊन उतारने के दौरान भेड़ को कोई विशेष कष्ट नहीं होता है जैसे कि आपको बाल कटाने अथवा आपके पिताजी को दाढ़ी बनवाने में नहीं होता। क्या आप जानते हैं, एेसा क्यों होता है? त्वचा की सबसे ऊपर वाली परत अधिकांशतः मृत कोशिकाओं से बनी होती है। साथ ही, भेड़ के बाल फिर से उग आते हैं, जैसे आपके उग आते हैं।

बूझो को आश्चर्य होता है कि जब कोई उसके बालों को खींचता है, तो दर्द होता है, परंतु जब वह बाल कटवाता है, तब दर्द नहीं होता है। एेसा क्यों?

चरण 2- त्वचा सहित उतारे गए बालों को टंकियों में डालकर अच्छी तरह से धोया जाता है, जिससे उनकी चिकनाई, धूल और गर्त निकल जाए। यह प्रक्रम अभिमार्जन कहलाता है। आजकल, अभिमार्जन मशीनों द्वारा किया जाता है [चित्र 3.8 (b) और (c)]।


(a) भेड़ की ऊन उतारना

(b) टंकियों में अभिमार्जन
(c) मशीनों द्वारा अभिमार्जन


(d) ऊन का धागा बनाया जाता है

चित्र 3.8 भेड़ की ऊन के रेशों को संसाधित करने के विभिन्न चरण

रेशों को ऊन में परिवर्तित करने के प्रक्रम को निम्न प्रकार से प्रदर्शित किया जा सकता है

ऊन की कटाई → अभिमार्जन → छँटाई → बर की छँटाई → रंगाई

   ↓

  रीलिंग

व्यावसायिक संकट
ऊन उद्योग हमारे देश में अनेक व्यक्तियों के लिए जीविकोपार्जन का एक महत्वपूर्ण साधन है। लेकिन छँटाई करने वालों का कार्य जोखिम भरा है, क्योंकि कभी-कभी वे एन्थ्रैक्स नामक जीवाणु द्वारा संक्रमित हो जाते हैं, जो एक घातक रक्त रोग का कारक है, जिसे सोर्टर्स रोग कहते हैं। किसी भी उद्योग में कारीगरों द्वारा एेसे जोखिमों को झेलना व्यावसायिक संकट कहलाता है।

चरण 3- अभिमार्जन के बाद छँटाई की जाती है। रोमिल अथवा रोयेंदार बालों को कारखानों में भेज दिया जाता है, जहाँ विभिन्न गठन वाले बालों को छाँटा या पृथक किया जाता है।

चरण 4- अगले चरण में बालों को सुखाया जाता है परंतु इससे पहले बालों में से छोटे-छोटे कोमल व फूले हुए रेशों को छाँट लिया जाता है, जो बर कहलाते हैं। ये वही बर होते हैं, जो कभी-कभी आपके स्वेटर पर एकत्रित हो जाते हैं। इसके पश्चात् रेशों का पुनः अभिमार्जन करके उन्हें सुखा लिया जाता है। इस प्रकार प्राप्त उत्पाद ही धागों के रूप में काते जाने के लिए उपयुक्त ऊन होती है।

चरण 5- रेशों की विभिन्न रंगों में रंगाई की जाती है, क्योंकि भेड़ अथवा बकरी की सामान्य ऊन काली, भूरी अथवा सफेद होती है।

बूझो यह जानने को उत्सुक है कि सर्दियों में सूती कपड़े हमें उतना गर्म क्यों नहीं रख पाते हैं, जितना ऊनी स्वेटर रखता है।

चरण 6- अंतिम चरण को रीलिंग कहते हैं। अब रेशों को सीधा करके सुलझाया जाता है और फिर लपेटकर उनसे धागा बनाया जाता है [चित्र 3.8 (d)]। लंबे रेशों को कातकर स्वेटरों की ऊन के रूप में और अपेक्षाकृत छोटे रेशों को कात कर ऊनी वस्त्र बुनने में उपयोग किया जाता है।

क्रियाकलाप 3.4

अपने सहपाठियों के साथ इस विषय पर चर्चा कीजिए कि क्या मनुष्य के लिए भेड़ों को पालना और फिर ऊन प्राप्त करने के लिए उनके बालों को उतारना उचित है?

3.2 रेशम

रेशम (सिल्क) के रेशे भी ‘जांतव रेशे’ होते हैं। रेशम के कीट रेशम के फ़ाइबरों को बनाते हैं। रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम के कीटों को पालना रेशम कीट पालन (सेरीकल्चर) कहलाता है। अपनी माताजी/ चाचीजी/दादी माँ से विभिन्न प्रकार के रेशम तथा रेशमी साड़ियों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए। विभिन्न प्रकार के रेशम को सूचीबद्ध कीजिए।

इससे पहले कि हम रेशम प्राप्त करने के प्रक्रम पर चर्चा करें, रेशम के कीट के जीवनचक्र के बारे में जानना आवश्यक है।

रेशम कीट का जीवनचक्र

मादा रेशम कीट अंडे देती है जिनसे लार्वा निकलते हैं जो कैटरपिलर/इल्ली या रेशम कीट कहलाते हैं। ये आकार में वृद्धि करते हैं और जब कैटरपिलर अपने जीवनचक्र की अगली अवस्था में प्रवेश करने के लिए 

भारत में, रेशम उत्पादन से संबद्ध विभिन्न प्रकार के उद्योगों में महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। रेशम कीट के पालन, कोकूनों में से रेशम को निकालने और कच्चे रेशम से वस्त्र निर्माण आदि कार्य अधिकतया महिलाओं द्वारा ही किए जाते हैं। अपने उद्यम द्वारा, वे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में योगदान देती हैं। रेशम उत्पादन में चीन विश्व में पहले स्थान पर है। भारत भी प्रमुख रेशम उत्पादक देशों में गिना जाता है।

तैयार होता है, तो यह प्यूपा/कोशित कहलाता है, जो अपने इर्द-गिर्द एक जाल बुन लेता है। यह जाल उसे अपने स्थान में बने रहने में सहायता करता है। फिर यह अँग्रेजी संख्या आठ (8) के रूप में अपने सिर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक ले जाता है। सिर की इस गति के समय कैटरपिलर पतले तार के रूप में प्रोटीन से बना एक पदार्थ स्रावित करता है जो कठोर होकर (सूखकर) रेशम का रेशा बन जाता है। जल्दी ही कैटरपिलर स्वयं को पूरी तरह से रेशम के रेशों से ढक लेता है और प्यूपा बन जाता है। यह आवरण कोकून कहलाता है। कीट का इसके आगे का विकास कोकून के भीतर होता है (चित्र 3.9)। रेशम के रेशों का उपयोग रेशम के वस्त्र बुनने के लिए किया जाता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि रेशम का मृदु रेशा (सूत्र) स्टील के तार जितना मजबूत होता है!


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चित्र 3.9 (a से f ) रेशम कीट का जीवनचक्र

रेशम का धागा रेशम कीट के कोकून से प्राप्त रेशों से तैयार किया जाता है। रेशम कीट अनेक किस्म के होते हैं जो एक-दूसरे से काफी अलग दिखाई देते हैं और उनसे प्राप्त होने वाला रेशम का धागा गठन अर्थात् रुक्षता, चिकनाहट, चमक आदि में भिन्न होता है। अतः टसर रेशम, मूगा रेशम, कोसा रेशम तथा अन्य प्रकार के रेशम विभिन्न किस्म के रेशम कीटों द्वारा काते गए कोकूनों से प्राप्त किए जाते हैं। सबसे सामान्य रेशम कीट शहतूत रेशम कीट है। इस कीट के कोकून से प्राप्त होने वाला रेशम फ़ाइबर मृदु, चमकदार और लचीला होता है तथा इसे सुंदर रंगों में रंगा जा सकता है।

रेशम कीट पालन अथवा रेशम कीटों का संवर्धन भारत का बहुत प्राचीन व्यवसाय है। भारत व्यावसायिक स्तर पर बहुत अधिक रेशम का उत्पादन करता है।

क्रियाकलाप 3.5

विभिन्न प्रकार के रेशमी वस्त्रों के टुकड़े एकत्रित कीजिए और उन्हें अपनी स्क्रेप पुस्तिका में चिपकाइए। आपको ये दर्ज़ी की दुकानों में व्यर्थ कतरनों की ढेरी में मिल सकते हैं। अपनी माताजी, चाचीजी अथवा शिक्षिका की सहायता से विभिन्न किस्म के रेशम जैसे शहतूत रेशम, टसर रेशम, एरी रेशम, मूगा रेशम, आदि की पहचान कीजिए। रेशम के इन टुकड़ों के गठन तथा बुनावट की तुलना कृत्रिम रेशम के टुकड़ों से कीजिए, जो संश्लेषित रेशों से निर्मित होते हैं। उन रेशम के कीटों के चित्र एकत्रित करने का प्रयास कीजिए, जिनके कैटरपिलर विभिन्न प्रकार के रेशम प्रदान करते हैं।

क्रियाकलाप 3.6

किसी कृत्रिम (संश्लेषित) रेशम और शुद्ध रेशम का एक-एक धागा लीजिए। इन धागों को सावधानी से जलाइए। क्या आपको उनके जलते समय उत्पन्न गंध में कोई अंतर महसूस हुआ? अब सावधानी से ऊन के एक धागे को जलाइए। इसके जलने की गंध कृत्रिम रेशम के जलने जैसी है अथवा शुद्ध रेशम जैसी? क्या आप बता सकते हैं कि एेसा क्यों है?

यह जानने के लिए कि रेशम कीट के जीवनचक्र में कोकून अवस्था कब आती है, क्रियाकलाप 3.7 करने का प्रयास कीजिए।

क्रियाकलाप 3.7

चित्र 3.9 की फ़ोटो प्रतिलिपि लीजिए। रेशम कीट के जीवनचक्र की विभिन्न अवस्थाओं के चित्र काट लीजिए और प्रत्येक को गत्ते अथवा चार्ट पेपर पर अलग-अलग चिपकाइए। अब इन चित्रों को आपस में मिला लीजिए। अब चित्रों को जीवनचक्र की अवस्थाओं के सही क्रम में लगाने का प्रयास कीजिए। जो कोई भी सबसे जल्दी एेसा कर लेगा, वह विजेता होगा।

आप अपने शब्दों में रेशम कीट के जीवनचक्र का वर्णन भी कर सकते हैं। इसे अपनी स्क्रेप पुस्तिका में लिखिए।

कोकून से रेशम तक

रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम कीटों को पाला जाता है और उनके कोकूनों को एकत्रित करके रेशम के फ़ाइबर प्राप्त किए जाते हैं।

रेशम कीट पालन- कोई मादा रेशम कीट एक बार में सैकड़ों अंडे देती है [चित्र 3.10 (a)]। अंडों को सावधानी से कपड़े की पट्टियों अथवा कागज़ पर संग्रहित करके रेशम कीट पालकों को बेचा जाता है। ये पालक/किसान अंडों को स्वास्थ्यकर स्थितियों, उचित ताप एवं आर्द्रता की अनुकूल स्थितियों में रखते हैं।

अंडों को उपयुक्त ताप तक गर्म रखा जाता है, जिससे अंडों में से लार्वा निकल आए। यह तब किया जाता है जब शहतूत के वृक्षों पर नई पत्तियाँ आती हैं [चित्र 3.10 (b)]। लार्वा, जो कैटरपिलर अथवा रेशम कीट कहलाते हैं, दिन-रात खाते रहते हैं और आमाप (साइज़) में काफ़ी बड़े हो जाते हैं [चित्र 3.10 (c)]। लार्वा को शहतूत की ताजी कटी पत्तियों के साथ बाँस की स्वच्छ ट्रे में रखा जाता है। 25 से 30 दिनों के बाद कैटरपिलर खाना बंद कर देते हैं और कोकून बनाने के लिए वे बाँस के बने छोटे-छोटे कक्षों में चले जाते हैं [चित्र 3.10 (d)]। (इसके लिए ट्रे में छोटी रैक या टहनियाँ रख दी जाती हैं, जिनसे कोकून जुड़ जाते हैं।) कैटरपिलर अथवा रेशम कीट कोकून बनाते हैं, जिसके भीतर प्यूपा विकसित होता है।


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चित्र 3.10 रेशम कृमि पालन

रेशम की खोज
रेशम की खोज का यथार्थ समय संभवतः अज्ञात है। एक प्राचीन चीनी किंवदंती के अनुसार, सम्राट हुआंग-टी ने साम्राज्ञी सी-लुंग-ची से अपने बगीचे में उगने वाले शहतूत के वृक्षों की पत्तियों के क्षतिग्रस्त होने का कारण पता लगाने के लिए कहा था। साम्राज्ञी ने पाया कि सफ़ेद कृमि शहतूत की पत्तियों को खा रहे थे। उन्होंने यह भी देखा कि कृमि अपने इर्द-गिर्द चमकदार कोकून बुन लेते थे। संयोग से एक कोकून उनके चाय के प्याले में गिर गया और कोकून में से नाज़ुक धागों का गुच्छा पृथक हो गया। रेशम उद्योग चीन में आरंभ हुआ और सैंकड़ों वर्षों तक इसे कड़ी पहरेदारी में गुप्त रखा गया। बाद में यात्रियों और व्यापारियों ने रेशम को अन्य देशों में प्रचलित किया। जिस मार्ग से उन्होंने यात्रा की थी, उसे आज भी ‘सिल्क रूट’ कहते हैं।

रेशम का संसाधन- रेशम फ़ाइबर प्राप्त करने के लिए कोकूनों की बड़ी ढेरी का उपयोग किया जाता है। वयस्क कीट में विकसित होने से पहले ही कोकूनों को धूप में रखा जाता है अथवा पानी में उबाला जाता है या भाप में रखा जाता है। इस प्रक्रम में रेशम के फ़ाइबर पृथक हो जाते हैं। रेशम के रूप में उपयोग के लिए कोकून में से रेशे निकालने के पश्चात उनसे धागे बनाने की प्रक्रिया रेशम की रीलिंग कहलाती है। रीलिंग विशेष मशीनों में की जाती है, जो कोकून में से फ़ाइबर या रेशों को निकालती हैं। फिर रेशम के फ़ाइबरों की कताई की जाती है, जिससे रेशम के धागे प्राप्त हो जाते हैं। बुनकरों द्वारा रेशम के इन्हीं धागों से वस्त्र बुने जाते हैं।


पहेली जानना चाहती है कि क्या कपास के धागे और रेशम के धागे की कताई और बुनाई एक ही प्रकार से की जाती है?

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आपने क्या सीखा

 रेशम कीटों से रेशम तथा भेड़, बकरी एवं याक से ऊन प्राप्त की जाती है। अतः रेशम और ऊन जांतव रेशे हैं।

 ऊँट, लामा और एेल्पेका के बालों को भी ऊन प्राप्त करने के लिए संसाधित किया जाता है।

 भारत में, अधिकतर भेड़ों को ऊन प्राप्त करने के लिए पाला जाता है।

 भेड़ के शरीर से बालों को उतारकर पहले अभिमार्जन व छँटाई की जाती है और फिर सुखाने के बाद उन्हें कात कर उनसे ऊन प्राप्त की जाती है।

 अपने जीवनचक्र में रेशम कीट रेशम के रेशों की कताई करके कोकून बनाते हैं।

 रेशम फ़ाइबर प्रोटीन से बने होते हैं।

 कोकूनों से रेशम के रेशों को पृथक करके उनका संसाधन किया जाता है और फिर रेशम का धागा बनाया जाता है। इस प्रक्रम को रीलिंग कहते हैं।

 बुनकर रेशम के धागों से रेशम के वस्त्र बुनते हैं।


अभ्यास

1. संभवतः आपने नर्सरी कक्षा में निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़ी होंगीः

(क) ‘बा बा ब्लेक शीप हेव यू एनी वूल’

(ख) ‘मेरी हेड ए लिट्ल लैम्ब, हूज़ फ्लीस वास व्हाइट एस स्नो’

ऊपर लिखी पंक्तियों के आधार पर यह बताइए कि

(i) ब्लेक शीप (काली भेड़) के किन भागों में ऊन होती है?

(ii) मेमने (लैम्ब) के सफ़ेद रोमों का क्या तात्पर्य है?

2. रेशम कीट (अ) कैटरपिलर, (ब) लार्वा है। सही विकल्प चुनिए।

(क) केवल (अ)

(ख) केवल (ब)

(ग) (अ) और (ब)

(घ) न ही (अ) और न (ब)

3. निम्नलिखित में से किससे ऊन प्राप्त नहीं होती?

(क) याक

(ख) ऊँट

(ग) बकरी

(घ) घने बालों वाला कुत्ता

4. निम्नलिखित शब्दों का क्या अर्थ है?

(i) पालन  (ii) ऊन कटाई  (iii) रेशम कीट पालन

5. ऊन के संसाधन के विभिन्न चरणों के क्रम में कुछ चरण नीचे दिए गए हैं। शेष चरणों को उनके सही क्रम में लिखिए।

ऊन कटाई, --------------- , छँटाई --------------- , --------------- ।

6. रेशम कीट के जीवनचक्र की उन दो अवस्थाओं के चित्र बनाइए जो प्रत्यक्ष रूप से रेशम के उत्पादन से संबंधित हैं।

7. निम्नलिखित में से कौन-से दो शब्द रेशम उत्पादन से संबंधित हैं?

रेशम कीट पालन, पुष्प कृषि, शहतूत कृषि, मधुमक्षि पालन, वनवर्धन।

संकेतः (i) रेशम उत्पादन में शहतूत की पत्तियों की खेती और रेशम कीटों को

पालना सम्मिलित हैं।

(ii) शहतूत का वैज्ञानिक नाम मोरस एल्बा है।

8. कॉलम A में दिए शब्दों का कॉलम B में दिए गए वाक्यों से मिलाइए

कॉलम A कॉलम B

(क) अभिमार्जन (i)­ रेशम फ़ाइबर उत्पन्न करता है

(ख)­ शहतूत की पत्तियाँ (ii)­ ऊन देने वाला जंतु

(ग)­ याक (iii)­ रेशम कीट का भोजन

(घ)­ कोकून    (iv)­ रीलिंग

(v)­ काटी गई ऊन की सफाई

9. इस पाठ पर आधारित एक वर्ग पहेली दी गई है। रिक्त स्थानों को उन अक्षरों से भरने के लिए संकेतों का उपयोग करिए, जो अक्षर को पूरा करते हैं।



सीधे ऊपर से नीचे

2. कार्तित ऊन को अच्छी तरह से धोने का प्रक्रम 1. इससे बुने वस्त्र शरीर को गरम रखते हैं

3. एक प्रकार का जांतव रेशा 4. इसकी पत्तियों को रेशम कीट खाते हैं

6. लंबी धागे जैसी संरचना जिससे बुनकर वस्त्र बनाते हैं। 5. रेशम कीट के अंडे से निकलते हैं


विस्तारित अध्ययन-क्रियाकलाप एवं परियोजना कार्य

1. 


  पहेली कोकून से प्राप्त हो सकने वाले रेशम के सतत् रेशे की अधिकतम लंबाई जानना चाहती है।


उसके लिए यह जानकारी प्राप्त कीजिए।

2.

 बूझो जानना चाहता है कि वृद्धि करने के पश्चात् कैटरपिलर को अपनी त्वचा को उतारने की आवश्यकता होती है, जबकि हम मानवों के साथ एेसा क्यों नहीं होता है।


क्या आपको इसके बारे में कोई जानकारी है?


3.   

बूझो जानना चाहता है कि कैटरपिलरों को नंगे हाथों से एकत्रित क्यों नहीं करना चाहिए।


क्या आप उसकी सहायता कर सकते हैं?

4. पहेली एक रेशमी फ्रॉक खरीदना चाहती थी और इसके लिए वह अपनी माताजी के साथ बाज़ार गई। वहाँ उन्होंने पाया कि कृत्रिम (संश्लेषित) रेशम कहीं अधिक सस्ता था और वह जानना चाहती थी कि एेसा क्यों है। क्या आप जानते हैं, एेसा क्यों होता है? पता कीजिए।

5. किसी ने पहेली को बताया कि एक जंतु जिसे ‘विकुना’ कहते हैं, से भी ऊन प्राप्त होती है। क्या आप उसे बता सकते हैं कि यह जंतु कहाँ पाया जाता है। इसके बारे में शब्दकोश अथवा एन्साइक्लोपीडिया/ज्ञानकोश में देखिए।

6. हथकरघा और वस्त्र प्रदर्शनियों में प्रायः कुछ दुकानों पर रेशम की विभिन्न किस्मों के कीटों और उनके जीवनचक्र की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को उनके वास्तविक नमूनों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इन दुकानों पर अपने बुज़ुर्गों अथवा शिक्षकों के साथ जाकर इन कीटों और उनके जीवनचक्र की अवस्थाओं को देखने का प्रयास कीजिए।

7. अपने बगीचे अथवा उद्यान या पौधों से भरपूर किसी अन्य स्थान पर किसी कीट अथवा तितली के अंडों को खोजिए। इन्हें पत्तियों पर छोटे बिंदुओं के रूप में देखा जा सकता है। अंडेयुक्त पत्तियों को तोड़ लीजिए और उन्हें गत्ते के डिब्बे में रख दीजिए। उसी पौधे अथवा उसी किस्म के किसी अन्य पौधे की कुछ पत्तियों को काटकर डिब्बे में डाल दीजिए। संभवतः अंडों में से कैटरपिलर निकल आए। यदि एेसा हुआ तो आप पाएंगे कि कैटरपिलर दिन-रात खाने में व्यस्त रहते हैं। उनके खाने के लिए डिब्बे में प्रतिदिन पत्तियाँ डालते रहें। कभी-कभी आपको पौधों की पत्तियों में कैटरपिलर भी मिल सकते हैं। लेकिन सावधान रहिए। कैटरपिलर को पकड़ने के लिए कागज़ के नैपकिन अथवा कागज़ का उपयोग करना चाहिए।

इन्हें प्रतिदिन देखिए। नोट कीजिए (i) अंडों में से कैटरपिलर के निकलने में कितने दिन लगते हैं, (ii) कोकून अवस्था तक पहुँचने मेें कितने दिन लगते हैं, और (iii) जीवनचक्र को पूर्ण होने में कितने दिन लगते हैं। अपने प्रेक्षणों को अपनी नोटबुक में लिखिए।

क्या आप जानते हैं?

भेड़ों की संख्या की दृष्टि से, चीन और अॉस्ट्रेलिया के बाद भारत का विश्व में तीसरा स्थान है। यद्यपि न्यूजीलैंड की भेड़ों से सबसे अच्छी ऊन प्राप्त होती है।

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