2 प्राण्िायों में पोषण आपने अध्याय 1 में पढ़ा है कि पादप ;पौधेद्ध अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं बना सकते हैं परन्तु प्राणी ;जंतुद्ध ऐसा नहीं कर सकते। प्राणी अपना भोजन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पौधें से प्राप्त करते हैं। वुफछ प्राणी सीधे ही पौधों का भक्षण करते हैं जबकि कइर् अन्य उन जंतुओं को अपना आहार बनाते हैं जो पौधे खाते हैं। वुफछ जंतु, पौधों एवं जंतु दोनों को खाते हैं। याद रख्िाए, कि मानव सहित सभी जीवों को वृि करने, शरीर को स्वस्थ एवं गतिशील बनाए रखने के लिए खाद्य पदाथो± की आवश्यकता होती है। प्राण्िायों के पोषण में पोषक तत्त्वों की आवश्यकता, आहार के अंतगर््रहण ;भोजन ग्रहण करनेद्ध की विध्ि और शरीर में इसके उपयोग की वििा सन्िनहित ;सम्िमलितद्ध हैं। आप कक्षा 6 में पढ़ चुके हैं कि खाद्य ;भोजनद्ध के अनेक संघटक हैं। स्मरण कर उनके नाम लिख्िाएः 1. - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 2. - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 3. - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 4. - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - काबोर्हाइड्रेट जैसे वुफछ संघटक जटिल पदाथर् हैं। अनेक जंतु इन जटिल पदाथो± का उपयोग सीध्े इसी रूप में नहीं कर सकते। अतः उन्हें सरल पदाथो± में बदलना आवश्यक है, जैसा निम्न आरेख द्वारा दिखाया गया है। जटिल खाद्य पदाथो± का सरल पदाथो± में जटिल पदाथर् सरल पदाथर् परिवतिर्त होना या टूटना विखंडन कहलाता है तथा इस प्रक्रम को पाचन कहते हैं। 2.1 खाद्य अंतग्रर्हण की विभ्िान्न वििायाँ भोजन के अंतग्रर्हण की विध्ि विभ्िान्न जीवों में भ्िान्न - भ्िान्न होती हैं। मध्ुमक्खी एवं ममर्र पक्षी ;हमिंग बडर्द्ध पौधों का मकरंद चूसते हैं। मानव एवं वुफछ अन्य जंतुओं में श्िाशु माँ का दूध् पीते हैं। अजगर जैसे सपर् वंश के प्राणी अपने श्िाकार को समूचा ही निगल जाते हैं। वुफछ जलीय प्राणी अपने आस - पास पानी में तैरते हुए खाद्य कणों को छान कर उनका भक्षण करते हैं। ियाकलाप 2.1 सारणी 2.1 में दिए गए जंतुओं के भोजन के प्रकार एवं पोषण प्राप्त करने की वििा कौन - सी है? अपने सारणी 2.1 अंतग्रर्हण की विभ्िान्न विध्ियाँ जंतु का नाम आहार का प्रकार आहार की विध्ि घोंघा चींटी चील ममर्र पक्षी जूँ मच्छर तितली मक्खी ;आहार की विध्िः छीलना, चबाना, काटना ;वेध्नद्ध, पकड़ना तथा निगलना, साइपफनी, स्पंजी, चूषण इत्यादिद्ध प्रेक्षण सारणी 2.1 में लिख्िाए। आप देखेंगे कि सारणी के नीचे लिखी गइर् खाद्य अंतग्रर्हण की विध्ियाँ उन वििायों का विवरण लिखने में सहायक हैं, जिनसे जंतु भोजन का अंतगर््रहण करते हैं। 2.2 मानव में पाचन हम अपने मुख द्वारा भोजन का अंतग्रर्हण करते हैं, इसे पचाते हैं तथा पिफर उसका उपयोग करते हैं। आहार का बिना पचा भाग मल के रूप में निष्कासित किया जाता है। क्या आपने कभी यह जानने का प्रयास किया है कि शरीर के अंदर भोजन का क्या होता है? भोजन एक सतत् नली से गुजरता है, जो मुख - गुहिका से प्रारम्भ होकर गुदा तक जाती है। इस नली को विभ्िान्न भागों में बाँट सकते हैंः ;पद्ध मुख - गुहिकाऋ ;पपद्ध ग्रास - नली या ग्रसिकाऋ ;पपपद्ध आमाशयऋ ;पअद्ध क्षुद्रांत्रा ;छोटी आँंतद्धऋ ;अद्ध बृहदांत्रा ;बड़ी आँतद्ध जो मलाशय से जुड़ी होती है तथा ;अपद्ध मलद्वार अथवा गुदा। क्या यह बहुत लंबा मागर् नहीं है? ये सभी भाग मिलकर आहार नाल ;पाचन नलीद्ध का निमार्ण करते हैं। जैसे - जैसे प्राण्िायों में पोषण भोजन विभ्िान्न भागों से गुजरता है, उसके विभ्िान्न घटकों का पाचन भी क्रमिक रूप से होता जाता है।आमाशय की आंतरिक भ्िािा, क्षुद्रांत्रा तथा आहार नाल से संब( विभ्िान्न ग्रंथ्िायाँ जैसे कि लाला - ग्रंथ्िा, यकृत, अग्न्याशय पाचक रस ड्डावित करती हैं। पाचक रस जटिल पदाथो± को उनके सरल रूप में बदल देते हैं। आहार नाल एवं संब( ग्रंथ्िायाँ मिलकर पाचन तंत्रा का निमार्ण करते हैं ;चित्रा 2.2द्ध। चित्रा 2.2 मानव पाचन तंत्रा ग्रसिका यकृत पित्ताशय क्षुद्रांत्रा बृहदांत्रा मलाशय गुदा आइए, अब हम जानें कि आहार नाल के विभ्िान्न भागों में भोजन का क्या होता है। मुख एवं मुख - गुहिका भोजन का अंतग्रर्हण मुख द्वारा होता है। आहार को शरीर के अंदर लेने की िया अंतग्रर्हण कहलाती है। 13 ियाकलाप 2.3 दो परखनलियाँ लीजिए। उन्हें श्।श् तथा श्ठश् चिित कीजिए। परखनली श्।श् में एक चम्मच उबले चावल डालिए। एक चम्मच उबले चावल मुख में लेकर 3 - 5 मिनट तक चबाइए तथा इन्हें दूसरी परखनली श्ठश् में लीजिए। दोनों परखनलियों में 3 - 4 उस् जल डालिए ;चित्रा 2.4द्ध। अब दोनों परखनलियों में आयोडीन चबाया हुआ चावल ।ठ चित्रा 2.4 मंड पर लार का प्रभाव विलयन की 2 - 3 बूँदे डालिए तथा उनका प्रेक्षण कीजिए। आप परखनली श्।श् तथा श्ठश् में क्या अंतर देखते हैं? परखनली के रंग में परिवतर्न क्यों आता है? परिणामों की चचार् अपने मित्रों एवं अध्यापक से कीजिए। लाला रस चावल के मंड को शवर्फरा में बदल देता है। जीभ एक माँसल पेशीय अंग है, जो पीछे की ओर मुख - गुहिका के अध्र तल से जुड़ी होती है ;चित्रा 2.6द्ध। इसका अग्र भाग स्वतंत्रा होता है और किसी भी दिशा में मुड़ सकता है। क्या आपको जीभ प्राण्िायों में पोषण को मिलाने का कायर् करती है तथा निगलने में भी सहायता करती है। जीभ द्वारा ही हमें स्वाद का पता चलता है। जीभ पर स्वाद - कलिकाएँ होती हैं, जिनकी सहायता से हमें विभ्िान्न प्रकार के स्वाद का पता चलता है। ियाकलाप 2.4 द्वारा हम स्वाद - कलिकाओं की स्िथति का पता लगा सकते हैं। ियाकलाप 2.4 1.निम्न पदाथो± के अलग - अलग विलयन तैयार कीजिए - ;पद्ध चीनी का विलयनऋ ;पपद्ध नमक का विलयनऋ ;पपपद्ध नींबू का रसऋ ;पअद्ध नीम की पत्ती अथवा करेले का रस। 2.अपने किसी मित्रा की आँखों पर प‘ी बाँध्कर उससे अपनी जीभ बाहर निकालकर सीध्ी रखने को कहिए। 3.चित्रा 2.6 में दिखाए गए जीभ के विभ्िान्न क्षेत्रों केऊपर उपरोक्त में से किसी एक विलयन के नमूने की एक - दो बूँदें रख्िाए। विलयन रखने के लिए दाँत वुफरेदने की सींक का उपयोग करें। इस प्रिया को अन्य विलयनों के साथ दोहराइए। प्रत्येक विलयन के लिए पृथक - पृथक सींक का उपयोग कीजिए। 4.अपने मित्रा से पूछिए कि जीभ के किस क्षेत्रा से उसे मीठे, नमकीन, ख‘े एवं कड़वे स्वाद का अनुभव होता है। 5.अब अपने प्रेक्षण रिकाॅडर् करें तथा चित्रा 2.6 में दिखाए गए प्रत्येक क्षेत्रा में उस स्वाद का नाम लिख्िाए जिसका संवेदन ;अनुभवद्ध उसके द्वारा होता है। अन्य सहपाठियों के साथ इस ियाकलाप को दोहराइए। भोजन नली ;ग्रसिकाद्ध निगला हुआ ग्रास - नली अथवा ग्रसिका में जाता है। चित्रा 2.2 देख्िाए। ग्रसिका गले एवं वक्ष से होती हुइर् जाती है। ग्रसिका की भ्िािा के संवुफचन से भोजन नीचे की ओर सरकता जाता है। वास्तव में, संपूणर् आहार नाल संवुफचित होती रहती है तथा यह गति भोजन को नीचे की ओर ध्केलती रहती है ;चित्रा 2.7द्ध। कभी - कभी हमारा आमाशय खाए हुए भोजन को स्वीकार नहीं करता, पफलस्वरूप वमन द्वारा उसे बाहर निकाल दिया जाता है। ऐसी घटना याद कीजिए, जब भोजन के बाद आपने वमन किया हो तथा इसके कारण के विषय में सोचिए। अपने अभ्िाभावकों एवं अध्यापक से इस विषय पर चचार् कीजिए। भोजन ग्रसिका आमाशय चित्रा 2.7ग्रसिका में भोजन की गति आमाशय आमाशय मोटी भ्िािा वाली एक थैलीनुमा संरचना है। यह चपटा एवं श्न्श् की आकृति का होता है तथा आहार नाल का सबसे चैड़ा भाग है। यह एक ओर ग्रसिका ;ग्रास नलीद्ध से खाद्य प्राप्त करता है तथा दूसरी ओर क्षुद्रांत्रा में खुलता है। आमाशय का आंतरिक अस्तर ;सतहद्ध श्लेष्मल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस स्रावित करता है। श्लेष्मल आमाशय के आंतरिक अस्तर को सुरक्षा प्रदान करता है। अम्ल अनेक ऐसे जीवाणुओं को नष्ट करता है, जो भोजन के साथ वहाँ तक पहुँच जाते हैं। साथ ही यह माध्यम को अम्लीय बनाता है जिससे पाचक रसों को िया करने में सहायता मिलती है। पाचक रस ;जठर रसद्ध प्रोटीन को सरल पदाथो± में विघटित कर देता है। क्षुद्रांत्रा क्षुद्रांत्रा लगभग 7.5 मीटर लंबी अत्यध्िक वुंफडलितनली है। यह यकृत एवं अग्न्याशय से ड्डाव प्राप्त करतीहै। इसके अतिरिक्त इसकी भ्िािा से भी वुफछ रसड्डावित होते हैं। दस्त कभी - कभी आपको जलरूपी पतले मल के बार - बार निष्कासन की आवश्यकता होती है। इस स्िथति को दस्त कहते हैं। यह संक्रमण, खाद्य विषाक्तता अथवा अपच के कारण होता है। भारत में, विशेषकर बच्चों में यह अति सामान्य स्िथति है। चरमावस्था में यह घातक भी हो सकता है। इसका मुख्य कारण शरीर से जल एवं लवण की अत्यध्िक क्षति होना है। इसे सहजता से नहीं टालना चाहिए। चिकित्सक के पास जाने से पूवर् ही रोगी को उबालकर ठंडा किए हुए जल में एक चुटकी नमक एवं चीनी घोलकर पिलाना चाहिए। इसे जीवन रक्षक घोल अथवा ओ.आर.एस.कहते हैं। क्षुद्रांत्रा में अवशोषण पचा हुआ भोजन अवशोष्िात होकर क्षुद्रांत्रा की भ्िािा में स्िथत रुध्िर वाहिकाओं में चला जाता है। इस प्रक्रम को अवशोषण कहते हैं। क्षुद्रांत्रा की आंतरिक भ्िािा पर अँगुली के समान उभरी हुइर् संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें दीघर्रोम अथवा रसांवुफर कहते हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि दीघर्रोम की आंत्रा में क्या भूमिका है? दीघर्रोम पचे हुए भोजन के अवशोषण हेतु तल क्षेत्रा बढ़ा देते हैं। प्रत्येक दीघर्रोम में सूक्ष्म रुध्िर वाहिकाओं का जाल पैफला रहता है। दीघर्रोम की सतह से पचे हुए भोजन का अवशोषण होता है तथा यह रुध्िर वाहिकाओं में चला जाता है। अवशोष्िात पदाथो± का स्थानांतरण रुध्िर वाहिकाओं द्वारा शरीर के विभ्िान्न भागों तक होता है, जहाँ उनका उपयोग जटिल पदाथो± को बनाने मेें किया जाता है। इस प्रक्रम को स्वांगीकरण कहते हैं। कोश्िाकाओं में उपस्िथत ग्लूकोस का विघटन आॅक्सीजन की सहायता से काबर्न डाइआॅक्साइड एवंजल में हो जाता है और ऊजार् मुक्त होती है। भोजन का वह भाग, जिसका पाचन नहीं हो पाता अथवा अवशोषण नहीं होता, बृहदांत्रा में भेज दिया जाता है। बृहदांत्रा बृहदांत्रा, क्षुद्रांत्रा की अपेक्षा चैड़ी एवं छोटी होती है। यह लगभग 1.5 मीटर लंबी होती है। इसका मुख्य कायर् जल एवं वुफछ लवणों का अवशोषण करना है। बचा हुआ अपचित पदाथर् मलाशय में चला जाता है तथा अध्र्ठोस मल के रूप में रहता है। समय - समय पर गुदा द्वारा यह मल बाहर निकाल दिया जाता है। इसे निष्कासन कहते हैं। 2.3 घास खाने वाले जंतुओं में पाचन क्या आपने गाय, भैंस तथा घास खाने वाले ;शाकाहारीद्ध अन्य जंतुओं को देखा है? वे उस समय भी लगातार जुगाली करते रहते हैं, जब वे खा न रहे हों। वास्तव में वे पहले घास को जल्दी - जल्दी निगलकर आमाशय के एक भाग में भंडारित कर लेते हैं। यह भाग रूमेन ;प्रथम आमाशयद्ध कहलाता है। रूमिनैन्ट में आमाशय चार भागों में बँटा होता है ;चित्रा 2.9द्ध। रूमेन में भोजन का आंश्िाक पाचन होता है, जिसे जुगाल ;कडद्ध कहते हैं। परंतु बाद में जंतु इसको छोटे पिंडकों के रूप में पुनः मुख में लाता है तथा जिसे वह चबाता रहता है। इस प्रक्रम को रोमन्थन चित्रा 2.9 किसी रोमन्थी का आमाशय ;जुगाली करनाद्ध कहते हैं तथा ऐसे जंतु रूमिनैन्ट अथवा रोमन्थी कहलाते हैं। घास में सेलुलोस की प्रचुरता होती है, जो एक प्रकार का काबोर्हाइड्रेट है। बहुत - से जंतु एवं मानव सेलुलोस का पाचन नहीं कर पाते। रूमिनैन्टस में क्षुद्रांत्रा एवं बृहदांत्रा के बीच एक थैलीनुमा बड़ी संरचना होती है जिसे अंध्नाल कहते हैं ;चित्रा 2.9द्ध। भोजन के सेलुलोस का पाचन यहाँ पर वुफछ जीवाणुओं द्वारा किया जाता है, जो मनुष्य के आहार नाल में अनुपस्िथत होते हैं। अब तक आपने उन जंतुओं के विषय में पढ़ा, जिनमें पाचन तंत्रा पाया जाता है। परंतु ऐसे बहुत - से सूक्ष्म प्राणी हैं, जिनमें न तो मुख होता है और न ही पाचन तंत्रा। पिफर वे, किस प्रकार भोजन का अंतगर््रहण करते हैं तथा उसका पाचन करते हैं? खंड 2.4 में आप भोजन ग्रहण करने की एक अन्य रोचक वििा का अध्ययन करेंगे। 2.4 अमीबा में संभरण एवं पाचन अमीबा जलाशयों में पाया जाने वाला एककोश्िाक जीव है। अमीबा की कोश्िाका में एक कोश्िाका झिल्ली होती है, एक गोल सघन केन्द्रक एवं कोश्िाका द्रव्य में बुलबुले के समान अनेक धनियाँ होती हैं प्राण्िायों में पोषण ;चित्रा 2.10द्ध। अमीबा निरंतर अपनी आकृति एवं स्िथति बदलता रहता है। यह एक अथवा अिाक अँगुली के समान प्रवध्र् निकालता रहता है, जिन्हें पादाभ ;अथार्त् कृत्रिाम पाँवद्ध कहते हैं, जो इन्हें गति देने एवं भोजन पकड़ने में सहायता करते हैं। अमीबा वुफछ सूक्ष्म जीवों का आहार करता है। जब इसे भोजन का आभास होता है, तो यह खाद्य कण के चारों ओर पादाभ विकसित करके उसे निगल लेता है। खाद्य पदाथर् उसकी खाद्य धनी में पँफस जाते हैं ;चित्रा 2.10द्ध। वंेफद्रक पादाभ खाद्य कण्िाका ;अंतग्रर्हणद्ध खाद्य धनियाँ बहिक्षेपित अपश्िाष्ट चित्रा 2.10 अमीबा खाद्य धनी में ही पाचक रस स्रावित होते हैं। ये खाद्य पदाथर् पर िया करके उन्हें सरल पदाथो± में बदल देते हैं। पचा हुआ खाद्य ध्ीेरे - ध्ीरे अवशोष्िात हो जाता है। अवशोष्िात पदाथर् अमीबा की वृि, रख - रखाव एवं गुणन के लिए उपयोग किए जाते हैं। बिना पचा अपश्िाष्ट खाद्यधनी द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। भोजन के पाचन का आधरभूत प्रक्रम सभी प्राण्िायों में समान है, जिसमें खाद्य पदाथर् सरल पदाथो± मेंपरिवतिर्त किए जाते हैं एवं ऊजार् मुक्त होती है। अगले अध्याय में आप आंत्रा द्वारा अवशोष्िात खाद्य पदाथो± का शरीर के अन्य भागों में स्थानांतरण के विषय में पढ़ेंगे। 19 प्रमुख शब्द अवशोषण निष्कासन ग्रसिका ऐमीनो अम्ल अग्न्याशय स्वांगीकरणखाद्यधनीअग्रचवर्णकपित्त रस पित्ताशय मुख - गुहिका कृंतक रदनक अंतग्रर्हणसेलुलोस चवर्णक आपने क्या सीखाजंतु पोषण में पोषण आवश्यकताएँ, भोजन अंतग्रर्हण की विध्ियाँ एवं शरीर में इनका उपयोग सम्िमलित है।आहार नाल तथा स्रावी गं्रथ्िायाँ संयुक्त रूप से मानव के पाचन तंत्रा का निमार्ण करती हैं। इसमें ;पद्ध मुख - गुहिकाऋ ;पपद्ध ग्रसिकाऋ ;पपपद्ध आमाशयऋ ;पअद्ध क्षुद्रांत्राऋ ;अद्ध बृहदांत्रा, जो मलाशय में समाप्त होती है तथा ;अपद्ध गुदा सम्िमलित हैं। पाचक रस ड्डावित करने वाली मुख्य ग्रंथ्िायाँ हैंः ;पद्ध लाला - ग्रंथ्िाऋ ;पपद्ध यकृत, एवं ;पपपद्ध अग्न्याशय। आमाशय की भ्िािा एवं क्षुद्रांत्रा की भ्िािा भी पाचक रस ड्डावित करती हैं।विभ्िान्न जीवों में भोजन ग्रहण करने की विध्ियाँ भी भ्िान्न हैं।पोषण एक जटिल प्रक्रम है, जिसमें ;पद्ध अंतग्रर्हणऋ ;पपद्ध पाचनऋ ;पपपद्ध अवशोषणऋ ;पअद्ध स्वांगीकरण एवं ;अद्ध निष्कासन शामिल हैं।मंड जैसे काबोर्हाइड्रेट का पाचन मुख में ही प्रारंभ हो जाता है। प्रोटीन का पाचनआमाशय में प्रारंभ होता है। यकृत द्वारा स्रावित पित्त, अग्न्याशय से अग्न्याशयिक स्रावएवं क्षुद्रांत्रा भ्िािा द्वारा स्रावित पाचक रस की िया से भोजन के सभी घटकों का पाचन क्षुद्रांत्रा में पूरा हो जाता है।जल एवं वुफछ लवण बृहदांत्रा में अवशोष्िात होते हैं। अवशोष्िात पदाथर् शरीर के विभ्िान्न भागों को स्थानांतरित कर दिए जाते हैं।बिना पचे अपश्िाष्ट जिनका अवशोषण नहीं होता, मल के रूप में गुदा द्वारा शरीर के बाहर निकाल दिए जाते हैं। गाय, भैंस एवं हिरण जैसे घास खाने वाले जंतु रोमंथी ;रूमिनैन्टद्ध कहलाते हैं। वेपिायों का अंतग्रर्हण तीव्रता से करके उन्हें निगल लेते हैं तथा रूमेन में भंडारित कर लेते हैं। वुफछ अंतराल के बाद भोजन पुनः मुख में आ जाता है और पशु ध्ीरे - धीरे जुगाली कर उसे चबाते हैं। अमीबा में भोजन का अंतग्रर्हण पादाभ की सहायता से होता है तथा इसका पाचन खाद्य धानी में होता है। अभ्यास 1.उचित शब्द द्वारा रिक्त स्थानों की पूतिर् कीजिए। ;कद्ध मानव पोषण के मुख्य चरण - - - - - - - - - - - - - - - , - - - - - - - - - - - - - - - , - - - - - - - - - - - - - - - , - - - - - - - - - - - - - - - एवं - - - - - - - - - - - - - - - हैं। ;खद्ध मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथ्िा का नाम - - - - - - - - - - - - - - - है। ;गद्ध आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं - - - - - - - - - - - - - - - का स्राव होता है, जो भोजन पर िया करते हैं। ;घद्ध क्षुद्रांत्रा की आंतरिक भ्िािा पर अँगुली के समान अनेक प्रवध्र् होते हैं, जो - - - - - - - - - - - - - - - कहलाते हैं। ;चद्ध अमीबा अपने भोजन का पाचन - - - - - - - - - - - - - - - में करता है। 2.सत्य एवं असत्य कथनों को चिित कीजिए। ;कद्ध मंड का पाचन आमाशय से प्रारंभ होता है। ;खद्ध जीभ लाला - ग्रंथ्िा को भोजन के साथ मिलाने में सहायता करती है। ;गद्ध पित्ताशय में पित्त रस अस्थायी रूप से भंडारित होता है। ;घद्ध रूमिनैन्ट निगली हुइर् घास को अपने मुख में वापस लाकर ध्ीरे - ध्ीरे चबाते रहते हैं। 3.निम्न में से सही विकल्प पर ;ञद्ध का चिÉ लगाइए। ;कद्ध वसा का पूणर्रूपेण पाचन जिस अंग में होता है, वह है ;पद्ध आमाशय ;पपद्ध मुख ;पपपद्ध क्षुद्रांत्रा ;पअद्ध बृहदांत्रा ;खद्ध जल का अवशोषण मुख्यतः जिस अंग द्वारा होता है, वह है ;पद्ध आमाशय ;पपद्ध ग्रसिका ;पपपद्ध क्षुद्रांत्रा ;पअद्ध बृहदांत्रा 4 काॅलम । में दिए गए कथनों का मिलान काॅलम ठ में दिए गए कथनों से कीजिए। काॅलम । काॅलम ठ खाद्य घटक पाचन के उत्पाद काबोर्हाइड्रेट्स वसा अम्ल एवं ग्िलसराॅल प्रोटीन शवर्फरा वसा ऐमीनो अम्ल 5 दीघर्रोम क्या हैं? वह कहाँ पाए जाते हैं एवं उनके कायर् क्या हैं? 6 पित्त कहाँ निमिर्त होता है? यह भोजन के किस घटक के पाचन में सहायता करता है? 7 उस काबोर्हाइड्रेट का नाम लिख्िाए जिनका पाचन रूमिनैन्ट द्वारा किया जाता है परंतु मानव द्वारा नहीं। इसका कारण बताइए। 8 क्या कारण है कि हमें ग्लूकोस से ऊजार् तुरंत प्राप्त होती है? 9 आहार नाल के कौन - से भाग द्वारा निम्न ियाएँ संपादित होती हैं ;पद्ध पचे भोजन का अवशोषण - - - - - - - - - - - - - - - । ;पपद्ध भोजन को चबाना - - - - - - - - - - - - - - - । ;पपपद्ध जीवाणु नष्ट करना - - - - - - - - - - - - - - - । ;पअद्ध भोजन का संपूणर् पाचन - - - - - - - - - - - - - - - । ;अद्ध मल का निमार्ण - - - - - - - - - - - - - - - । 10.मानव एवं अमीबा के पोषण में कोइर् एक समानता एवं एक अंतर लिख्िाए। 11.काॅलम । में दिए गए शब्दों का मिलान काॅलम ठ के उचित कथन से कीजिए। काॅलम । काॅलम ठ ;कद्ध लाला - ग्रंथ्िा ;पद्ध पित्त रस का स्रवण ;खद्ध आमाशय ;गद्ध यकृत ;पपद्ध ;पपपद्ध बिना पचे भोजन का भण्डारणलाला रस ड्डावित करना ;घद्ध मलाशय ;पअद्ध अम्ल का निमोर्चन ;चद्ध क्षुद्रांत्रा ;अद्ध पाचन का पूरा होना ;छद्ध बृहदांत्रा ;अपद्ध जल का अवशोषण ;अपपद्ध मल त्याग 12.चित्रा 2.11 में दिए हुए पाचन तंत्रा के आरेख को नामांकित कीजिए। चित्रा 2.11 मानव पाचन तंत्रा के वुफछ भाग 13.क्या हम केवल हरी सब्िजयों/घास का भोजन कर जीवन निवार्ह कर सकते हैं? चचार् कीजिए। विस्तारित अध्ययन - ियाकलाप एवं परियोजना कायर् 1.किसी चिकित्सक से मिलकर निम्न के विषय में जानकारी एकत्रा कीजिएः ;कद्ध किन परिस्िथतियों में किसी रोगी को ग्लूकोस की डिªप लगाने की आवश्यकता होती है? ;खद्ध रोगी को ग्लूकोस कब तक दिया जाता है? ;गद्ध रोगी की अवस्था के सुधर में ग्लूकोस का क्या योगदान है? अपनी नोटबुक में इनके उत्तर लिख्िाए। 2.पता लगाइए कि विटामिन क्या है? उनके बारे में निम्न जानकारी एकत्रा कीजिएः ;कद्ध हमारे आहार में विटामिन की क्या आवश्यकता है? ;खद्ध विटामिन प्राप्त करने के लिए हमें किन पफलों अथवा सब्िजयों का नियमित उपयोग करना चाहिए। अपने द्वारा एकत्रा जानकारी के आधर पर एक पृष्ठ की टिप्पणी लिख्िाए। आप इसके लिए किसी चिकित्सक, डाइटीश्िायन, अपने अध्यापक अथवा किसी अन्य जानकार व्यक्ित अथवा स्रोत की सहायता से प्राप्त कर सकते हैं। 3.अपने मित्रों, पड़ोसियों एवं सहपाठियों से ‘दूध् के दाँत’ संबंध्ी आँकड़े एकत्रा कीजिए। अपने आँकड़े सारणीब( कीजिए। इसे करने का एक तरीका सारणी में दशार्या गया हैः क्र.सं प्रथम दाँत गिरने के समय की आयु अंतिम दाँत गिरने के समय की आयु दाँतों की संख्या गिरने वाले दाँतों की एवं उनके स्थान पर निकले नए दाँतों की संख्या 1 2 3 4 5 कम से कम 20 बच्चों के आँकड़े एकत्रा कीजिए तथा पता लगाइए कि दूध् के दाँत गिरने की औसत आयु क्या है। आप इसके लिए अपने मित्रों की सहायता भी प्राप्त कर सकते हैं। क्या आप जानते हैं? किसी बकरी के दूध् में मिलने वाली वसा की संरचना गाय के दूध् की वसा की अपेक्षा सरल होती है। अतः बकरी के दूध् का पाचन गाय के दूध् की अपेक्षा आसान होता है।

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प्राणियों में पोषण

आपने अध्याय 1 में पढ़ा है कि पादप (पौधे) अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं बना सकते हैं परन्तु प्राणी (जंतु) एेसा नहीं कर सकते। प्राणी अपना भोजन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। कुछ प्राणी सीधे ही पौधों का भक्षण करते हैं जबकि कई अन्य उन जंतुओं को अपना आहार बनाते हैं जो पौधे खाते हैं। कुछ जंतु, पौधों एवं जंतु दोनों को खाते हैं। याद रखिए, कि मानव सहित सभी जीवों को वृद्धि करने, शरीर को स्वस्थ एवं गतिशील बनाए रखने के लिए खाद्य पदार्थों की आवश्यकता होती है। प्राणियों के पोषण में पोषक तत्त्वों की आवश्यकता, आहार के अंतर्गहण (भोजन ग्रहण करने) की विधि और शरीर में इसके उपयोग की विधि सन्निहित (सम्मिलित) हैं।

आप कक्षा 6 में पढ़ चुके हैं कि खाद्य (भोजन) के अनेक संघटक हैं। स्मरण कर उनके नाम लिखिएः

1. ---------------------

2. ---------------------

3. ---------------------

4. ---------------------

कार्बोहाइड्रेट जैसे कुछ संघटक जटिल पदार्थ हैं। अनेक जंतु इन जटिल पदार्थों का उपयोग सीधे इसी रूप में नहीं कर सकते। अतः उन्हें सरल पदार्थों में बदलना आवश्यक है, जैसा निम्न आरेख द्वारा दिखाया गया है। जटिल खाद्य पदार्थों का सरल पदार्थों में परिवर्तित होना या टूटना विखंडन कहलाता है तथा इस प्रक्रम को पाचन कहते हैं।

        जटिल पदार्थ                सरल पदार्थ

2.1 खाद्य अंतर्ग्रहण की विभिन्न विधियाँ

भोजन के अंतर्ग्रहण की विधि विभिन्न जीवों में भिन्न-भिन्न होती हैं। मधुमक्खी एवं मर्मर पक्षी (हमिंग बर्ड) पौधों का मकरंद चूसते हैं। मानव एवं कुछ अन्य जंतुओं में शिशु माँ का दूध पीते हैं। अजगर जैसे सर्प वंश के प्राणी अपने शिकार को समूचा ही निगल जाते हैं। कुछ जलीय प्राणी अपने आस-पास पानी
में तैरते हुए खाद्य कणों को छान कर उनका भक्षण करते हैं।

क्रियाकलाप 2.1


सारणी 2.1 में दिए गए जंतुओं के भोजन के प्रकार एवं पोषण प्राप्त करने की विधि कौन-सी है? अपने प्रेक्षण सारणी 2.1 में लिखिए। आप देखेंगे कि सारणी के नीचे लिखी गई खाद्य अंतर्ग्रहण की विधियाँ उन विधियों का विवरण लिखने में सहायक हैं, जिनसे जंतु भोजन का अंतर्गहण करते हैं।

सारणी 2.1 अंतर्ग्रहण की विभिन्न विधियाँ

जंतु का नाम  आहार का प्रकार आहार की  विधि
घोंघा
चींटी
चील
मर्मर पक्षी
जूँ
मच्छर
तितली
मक्खी

(आहार की विधिः छीलना, चबाना, काटना (वेधन), पकड़ना तथा निगलना, साइफनी, स्पंजी, चूषण इत्यादि)

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2.2 मानव में पाचन

हम अपने मुख द्वारा भोजन का अंतर्ग्रहण करते हैं, इसे पचाते हैं तथा फिर उसका उपयोग करते हैं। आहार का बिना पचा भाग मल के रूप में निष्कासित किया जाता है। क्या आपने कभी यह जानने का प्रयास किया है कि शरीर के अंदर भोजन का क्या होता है? भोजन एक सतत् नली से गुजरता है, जो मुख-गुहिका
से प्रारम्भ होकर गुदा तक जाती है। इस नली को विभिन्न भागों में बाँट सकते हैंः
(i) मुख-गुहिका; (ii) ग्रास-नली या ग्रसिका; (iii) आमाशय; (iv) क्षुद्रांत्र (छोटी आँंत); (v) बृहदांत्र (बड़ी आँत) जो मलाशय से जुड़ी होती है तथा (vi) मलद्वार अथवा गुदा। क्या यह बहुत लंबा मार्ग नहीं है? ये सभी भाग मिलकर आहार नाल (पाचन नली) का निर्माण करते हैं। जैसे-जैसे भोजन विभिन्न भागों से गुजरता है, उसके विभिन्न घटकों का पाचन भी क्रमिक रूप से होता जाता है। आमाशय की आंतरिक भित्ति, क्षुद्रांत्र तथा आहार नाल से संबद्ध विभिन्न ग्रंथियाँ जैसे कि लाला-ग्रंथि, यकृत, अग्न्याशय पाचक रस स्रावित करती हैं। पाचक रस जटिल पदार्थों को उनके सरल रूप में बदल देते हैं। आहार नाल एवं संबद्ध ग्रंथियाँ मिलकर पाचन तंत्र का निर्माण करते हैं (चित्र 2.2)।


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चित्र 2.2 मानव पाचन तंत्र

आइए, अब हम जानें कि आहार नाल के विभिन्न भागों में भोजन का क्या होता है।

मुख एवं मुख-गुहिका

भोजन का अंतर्ग्रहण मुख द्वारा होता है। आहार को शरीर के अंदर लेने की क्रिया अंतर्ग्रहण कहलाती है। 


बूझो चित्र 2.2 में दिखाई गई अत्यधिक कुण्डलित क्षुद्रांत्र को देखकर आश्चर्यचकित है। वह इसकी लंबाई जानना चाहता है। क्या आप इसका अनुमान लगा सकते हैं? पृष्ठ संख्या 17 में इसकी सन्निकट लंबाई दी गई है। कल्पना कीजिए कि इतनी लंबी संरचना हमारे शरीर के छोटे-से हिस्से में किस प्रकार समायी हुई है।


हम दाँतों की सहायता से भोजन चबाते हैं तथा यांत्रिक विधि द्वारा उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में पीस डालते हैं। प्रत्येक दाँत मसूड़ों के बीच अलग-अलग गर्तिका (सॉकेट) में धँसा होता है (चित्र 2.3)। हमारे दाँतों की आकृति भिन्न-भिन्न है तथा उनके कार्य भी भिन्न हैं। इसके अनुसार उन्हें अलग-अलग नाम दिए गए हैं (चित्र 2.3)।

क्रियाकलाप 2.2


अपने हाथ धोइए। दर्पण में देखते हुए अपने दाँतों की गणना कीजिए। अपनी तर्जनी से दाँतों को छूकर महसूस कीजिए। आपके मुख में कितने प्रकार के दाँत हैं? एक सेब अथवा रोटी का टुकड़ा लेकर उसे काटिए। आप उसे काटने (कर्तन) एवं दंशन के लिए किन दाँतों का उपयोग करते हैं। कौन-से दाँत खाद्य पदार्थों को चीरने (वेधन) और फाड़ने के काम आते हैं। उन दाँतों को भी पहचानिए, जो चबाने एवं पीसने के काम आते हैं? अपने प्रेक्षण सारणी 2.2 में लिखिए।

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हमारे मुख में लाला-ग्रंथि होती है, जो लाला रस (लार) स्रावित करती है। क्या आप जानते हैं कि लाला रस का भोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है? आइए इसका पता लगाएँ।

सारणी 2.2 दाँत के प्रकार एवं उनके कार्य

दाँतों के प्रकार दाँतों की संख्या योग
निचला जबड़ा ऊपरी जबड़ा
कर्तन एवं दंशन वाले दाँत­
चीरने एवं फाड़ने वाले दाँत
चबाने एवं पीसने वाले दाँत


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क्रियाकलाप 2.3


दो परखनलियाँ लीजिए। उन्हें 'A' तथा 'B' चिह्नित कीजिए। परखनली 'A' में एक चम्मच उबले चावल डालिए। एक चम्मच उबले चावल मुख में लेकर 3-5 मिनट तक चबाइए तथा इन्हें दूसरी परखनली 'B' में लीजिए। दोनों परखनलियों में 3-4 mL जल डालिए (चित्र 2.4)। अब दोनों परखनलियों में आयोडीन विलयन की 2-3 बूँदे डालिए तथा उनका प्रेक्षण कीजिए। आप परखनली 'A' तथा 'B' में क्या अंतर देखते हैं? परखनली के रंग में परिवर्तन क्यों आता है? परिणामों की चर्चा अपने मित्रों एवं अध्यापक से कीजिए। लाला रस चावल के मंड को शर्करा में बदल देता है।

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चित्र 2.4 मंड पर लार का प्रभाव

जीभ एक माँसल पेशीय अंग है, जो पीछे की ओर मुख-गुहिका के अधर तल से जुड़ी होती है (चित्र 2.6)। इसका अग्र भाग स्वतंत्र होता है और किसी भी दिशा में मुड़ सकता है। क्या आपको जीभ के कार्य ज्ञात हैं? 

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हम बोलने के लिए जीभ का उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त यह भोजन में लार को मिलाने का कार्य करती है तथा निगलने में भी सहायता करती है। 

चित्र 2.6 जीभ पर स्वाद के विभिन्न क्षेत्र

जीभ द्वारा ही हमें स्वाद का पता चलता है। जीभ पर स्वाद-कलिकाएँ होती हैं, जिनकी सहायता से हमें विभिन्न प्रकार के स्वाद का पता चलता है। क्रियाकलाप 2.4 द्वारा हम स्वाद-कलिकाओं की स्थिति का पता लगा सकते हैं।

क्रियाकलाप 2.4


1. निम्न पदार्थों के अलग-अलग विलयन तैयार कीजिए- (i) चीनी का विलयन; (ii) नमक का विलयन; (iii) नींबू का रस; (iv) नीम की पत्ती अथवा करेले का रस।

2. अपने किसी मित्र की आँखों पर पट्टी बाँधकर उससे अपनी जीभ बाहर निकालकर सीधी रखने को कहिए।

3. चित्र 2.6 में दिखाए गए जीभ के विभिन्न क्षेत्रों के ऊपर उपरोक्त में से किसी एक विलयन के नमूने की एक-दो बूँदें रखिए। विलयन रखने के लिए दाँत कुरेदने की सींक का उपयोग करें। इस प्रक्रिया को अन्य विलयनों के साथ दोहराइए। प्रत्येक विलयन के लिए पृथक-पृथक सींक का उपयोग कीजिए।

4. अपने मित्र से पूछिए कि जीभ के किस क्षेत्र से उसे मीठे, नमकीन, खट्टे एवं कड़वे स्वाद का अनुभव होता है।

5. अब अपने प्रेक्षण रिकॉर्ड करें तथा चित्र 2.6 में दिखाए गए प्रत्येक क्षेत्र में उस स्वाद का नाम लिखिए जिसका संवेदन (अनुभव) उसके द्वारा होता है।

अन्य सहपाठियों के साथ इस क्रियाकलाप को दोहराइए।

भोजन नली (ग्रसिका)

निगला हुआ ग्रास-नली अथवा ग्रसिका में जाता है। चित्र 2.2 देखिए। ग्रसिका गले एवं वक्ष से होती हुई जाती है। ग्रसिका की भित्ति के संकुचन से भोजन नीचे की ओर सरकता जाता है। वास्तव में, संपूर्ण आहार नाल संकुचित होती रहती है तथा यह गति भोजन को नीचे की ओर धकेलती रहती है (चित्र 2.7)। कभी-कभी हमारा आमाशय खाए हुए भोजन को स्वीकार नहीं करता, फलस्वरूप वमन द्वारा उसे बाहर निकाल दिया जाता है। एेसी घटना याद कीजिए, जब भोजन के बाद आपने वमन किया हो तथा इसके कारण के विषय में सोचिए। अपने अभिभावकों एवं अध्यापक से इस विषय पर चर्चा कीजिए।

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चित्र 2.7 ग्रसिका में भोजन की गति

 पहेली जानना चाहती है कि वमन के समय भोजन विपरीत दिशा में किस प्रकार जाता है?


आमाशय

आमाशय मोटी भित्ति वाली एक थैलीनुमा संरचना है। यह चपटा एवं 'J' की आकृति का होता है तथा आहार नाल का सबसे चौड़ा भाग है। यह एक ओर ग्रसिका (ग्रास नली) से खाद्य प्राप्त करता है तथा दूसरी ओर क्षुद्रांत्र में खुलता है।

कभी-कभी जब आप जल्दी-जल्दी खाते हैं, अथवा खाते समय बात करते हैं, आपको खाँसी उठती है या हिचकी आती है अथवा घुटन का अनुभव होता है। यह खाद्य कणों के श्वास नली में प्रवेश करने के कारण होता है। श्वास नली नासिका से आने वाली वायु को फेफड़ों तक ले जाती है। यह ग्रसिका के साथ-साथ चलती है। परंतु, ग्रसनी में वायु एवं भोजन मार्ग एक ही होते हैं। फिर भोजन को श्वास नली में प्रवेश करने से किस प्रकार रोका जाता है? भोजन निगलने के समय एक माँसल रचना वाल्व का कार्य करती है, जो श्वासनली को ढक लेती है तथा भोजन को ग्रसनी में भेज देता है। संयोगवश यदि, भोजन के कण श्वास नली में प्रवेश कर जाते हैं, तो हमें घुटन का अनुभव होता है तथा हिचकी आती है या खाँसी उठती है।


आमाशय का आंतरिक अस्तर (सतह) श्लेष्मल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस स्रावित करता है। श्लेष्मल आमाशय के आंतरिक अस्तर को सुरक्षा प्रदान करता है। अम्ल अनेक एेसे जीवाणुओं को नष्ट करता है, जो भोजन के साथ वहाँ तक पहुँच जाते हैं। साथ ही यह माध्यम को अम्लीय बनाता है जिससे पाचक रसों को क्रिया करने में सहायता मिलती है। पाचक रस (जठर रस) प्रोटीन को सरल पदार्थों में विघटित कर देता है।

क्षुद्रांत्र

क्षुद्रांत्र लगभग 7.5 मीटर लंबी अत्यधिक कुंडलित नली है। यह यकृत एवं अग्न्याशय से स्राव प्राप्त करती है। इसके अतिरिक्त इसकी भित्ति से भी कुछ रस स्रावित होते हैं।

यकृत गहरे लाल-भूरे रंग की ग्रंथि है, जो उदर के ऊपरी भाग में दाहिनी (दक्षिण) ओर अवस्थित होती है। यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह पित्त रस स्रावित करती है, जो एक थैली में संग्रहित होता रहता है, इसे पित्ताशय कहते हैं (चित्र 2.2)। पित्त रस वसा के पाचन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अग्न्याशय हल्के पीले रंग की बड़ी ग्रंथि है, जो आमाशय के ठीक नीचे स्थित होती है (चित्र 2.2)। ‘अग्न्याशयिक रस’, कार्बोहाइड्रेट्स एवं प्रोटीन पर क्रिया करता है तथा इनको उनके सरल रूप में परिवर्तित कर देता है। आंशिक रूप से पचा भोजन अब क्षुद्रांत्र के निचले भाग में पहुँचता है जहाँ आंत्र रस पाचन क्रिया को पूर्ण कर देता है। कार्बोहाइड्रेट सरल शर्करा जैसे कि ग्लूकोस में परिवर्तित हो जाते हैं। ‘वसा’, वसा अम्ल एवं ग्लिसरॉल में तथा ‘प्रोटीन’, एेमीनो अम्ल में परिवर्तित हो जाती है।

एक विलक्षण दुर्घटना द्वारा आमाशय की कार्य प्रणाली की खोज हुई। सन् 1822 ई. में एलेक्सिस सेंट मार्टिन नामक व्यक्ति गोली लगने के कारण बुरी तरह से घायल हुआ। गोली से वक्ष क्षतिग्रस्त हो गया तथा आमाशय में एक छिद्र हो गया। उसे विलियम ब्यूमॉण्ट नामक अमरीकी सैनिक चिकित्सक के पास ले जाया गया। चिकित्सक ने उसकी जान तो बचा ली परन्तु वह आमाशय का छिद्र भली-भाँति बंद न कर सका तथा उसने छिद्र को पट्टी से ढक दिया (चित्र 2.8)। ब्यूमॉण्ट को छिद्र में से आमाशय के अंदर झाँकने का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ। उसने कुछ रोचक प्रेक्षण किए।

ब्यूमॉण्ट ने देखा कि आमाशय भोजन का मंथन कर रहा था। इसकी भित्ति से तरल स्रावित हो रहा था, जो भोजन को पचा सकता था। उसने यह भी देखा कि आमाशय क्षुद्रांत्र में तभी खुलता है, जब आमाशय में भोजन का पाचन पूरा हो जाता है। 

चित्र 2.8 एेलेक्सिस सेंट मार्टिन का गोली का घाव


क्षुद्रांत्र में अवशोषण

पचा हुआ भोजन अवशोषित होकर क्षुद्रांत्र की भित्ति में स्थित रुधिर वाहिकाओं में चला जाता है। इस प्रक्रम कोअवशोषण कहते हैं। क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति पर अँगुली के समान उभरी हुई संरचनाएँ होती हैं, जिन्हेंदीर्घरोम अथवा रसांकुर कहते हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि दीर्घरोम की आंत्र में क्या भूमिका है? दीर्घरोम पचे हुए भोजन के अवशोषण हेतु तल क्षेत्र बढ़ा देते हैं। प्रत्येक दीर्घरोम में सूक्ष्म रुधिर वाहिकाओं का जाल फैला रहता है। दीर्घरोम की सतह से पचे हुए भोजन का अवशोषण होता है तथा यह रुधिर वाहिकाओं में चला जाता है। अवशोषित पदार्थों का स्थानांतरण रुधिर वाहिकाओं द्वारा शरीर के विभिन्न भागों तक होता है, जहाँ उनका उपयोग जटिल पदार्थों को बनाने मेें किया जाता है। इस प्रक्रम को स्वांगीकरण कहते हैं। कोशिकाओं में उपस्थित ग्लूकोस का विघटन अॉक्सीजन की सहायता से कार्बन डाइअॉक्साइड एवं जल में हो जाता है और ऊर्जा मुक्त होती है। भोजन का वह भाग, जिसका पाचन नहीं हो पाता अथवा अवशोषण नहीं होता, बृहदांत्र में भेज दिया जाता है।

बृहदांत्र

बृहदांत्र, क्षुद्रांत्र की अपेक्षा चौड़ी एवं छोटी होती है। यह लगभग 1.5 मीटर लंबी होती है। इसका मुख्य कार्य जल एवं कुछ लवणों का अवशोषण करना है। बचा हुआ अपचित पदार्थ मलाशय में चला जाता है तथा अर्धठोस मल के रूप में रहता है। समय-समय पर गुदा द्वारा यह मल बाहर निकाल दिया जाता है। इसे निष्कासन कहते हैं।

2.3 घास खाने वाले जंतुओं में पाचन

क्या आपने गाय, भैंस तथा घास खाने वाले (शाकाहारी) अन्य जंतुओं को देखा है? वे उस समय भी लगातार जुगाली करते रहते हैं, जब वे खा न रहे हों। वास्तव में वे पहले घास को जल्दी-जल्दी निगलकर आमाशय के एक भाग में भंडारित कर लेते हैं। यह भाग रूमेन (प्रथम आमाशय) कहलाता है। रूमिनैन्ट में आमाशय चार भागों में बँटा होता है (चित्र 2.9)। रूमेन में भोजन का आंशिक पाचन होता है, जिसे जुगाल (कड) कहते हैं। परंतु बाद में जंतु इसको छोटे पिंडकों के रूप में पुनः मुख में लाता है तथा जिसे वह चबाता रहता है। इस प्रक्रम को रोमन्थन (जुगाली करना) कहते हैं तथा एेसे जंतु रूमिनैन्ट अथवा रोमन्थी कहलाते हैं।


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चित्र 2.9 किसी रोमन्थी का आमाशय


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घास में सेलुलोस की प्रचुरता होती है, जो एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट है। किसी रूमिनैन्ट अथवा रोमन्थी पशु, हिरन आदि के रूमेन में सेलुलोस का पाचन करने वाले जीवाणु पाये जाते हैं। बहुत-से जंतु एवं मानव सेलुलोस का पाचन नहीं कर पाते।

पहेली जानना चाहती है कि ये जंतु भोजन करते समय इसे भली-भाँति क्यों नहीं चबा पाते?


 बूझो जानना चाहता है कि मनुष्य मवेशियों की तरह सेलुलोस को क्यों नहीं पचा सकता?


जानवरों जैसे-घोड़ा, खरगोश आदि में क्षुद्रांत्र एवं बृहदांत्र के बीच एक थैलीनुमा बड़ी संरचना होती है जिसे अंधनाल कहते हैं (चित्र 2.9)। भोजन के सेलुलोस का पाचन यहाँ पर कुछ जीवाणुओं द्वारा किया जाता है, जो मनुष्य के आहार नाल में अनुपस्थित होते हैं।

अब तक आपने उन जंतुओं के विषय में पढ़ा, जिनमें पाचन तंत्र पाया जाता है। परंतु एेसे बहुत-से सूक्ष्म प्राणी हैं, जिनमें न तो मुख होता है और न ही पाचन तंत्र। फिर वे, किस प्रकार भोजन का अंतर्गहण करते हैं तथा उसका पाचन करते हैं? खंड 2.4 में आप भोजन ग्रहण करने की एक अन्य रोचक विधि का अध्ययन करेंगे।

2.4 अमीबा में संभरण एवं पाचन

अमीबा जलाशयों में पाया जाने वाला एककोशिक जीव है। अमीबा की कोशिका में एक कोशिका झिल्ली होती है, एक गोल सघन केन्द्रक एवं कोशिका द्रव्य में बुलबुले के समान अनेक धानियाँ होती हैं (चित्र 2.10)। अमीबा निरंतर अपनी आकृति एवं स्थिति बदलता रहता है। यह एक अथवा अधिक अँगुली के समान प्रवर्ध निकालता रहता है, जिन्हें पादाभ (अर्थात् कृत्रिम पाँव) कहते हैं, जो इन्हें गति देने एवं भोजन पकड़ने में सहायता करते हैं।

अमीबा कुछ सूक्ष्म जीवों का आहार करता है। जब इसे भोजन का आभास होता है, तो यह खाद्य कण के चारों ओर पादाभ विकसित करके उसे निगल लेता है। खाद्य पदार्थ उसकी खाद्य धानी में फँस जाते हैं (चित्र 2.10)।

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चित्र 2.10 अमीबा

खाद्य धानी में ही पाचक रस स्रावित होते हैं। ये खाद्य पदार्थ पर क्रिया करके उन्हें सरल पदार्थों में बदल देते हैं। पचा हुआ खाद्य धीेरे-धीरे अवशोषित हो जाता है। अवशोषित पदार्थ अमीबा की वृद्धि, रख-रखाव एवं गुणन के लिए उपयोग किए जाते हैं। बिना पचा अपशिष्ट खाद्यधानी द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

भोजन के पाचन का आधारभूत प्रक्रम सभी प्राणियों में समान है, जिसमें खाद्य पदार्थ सरल पदार्थों में परिवर्तित किए जाते हैं एवं ऊर्जा मुक्त होती है। अगले अध्याय में आप आंत्र द्वारा अवशोषित खाद्य पदार्थों का शरीर के अन्य भागों में स्थानांतरण के विषय
में पढ़ेंगे।

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आपने क्या सीखा

 जंतु पोषण में पोषण आवश्यकताएँ, भोजन अंतर्ग्रहण की विधियाँ एवं शरीर में इनका उपयोग सम्मिलित है।

 आहार नाल तथा स्रावी ग्रंथियाँ संयुक्त रूप से मानव के पाचन तंत्र का निर्माण करती हैं। इसमें (i) मुख-गुहिका; (ii) ग्रसिका; (iii) आमाशय; (iv) क्षुद्रांत्र; (v) बृहदांत्र, जो मलाशय में समाप्त होती है तथा (vi) गुदा सम्मिलित हैं। पाचक रस स्रावित करने वाली मुख्य ग्रंथियाँ हैंः (i) लाला-ग्रंथि; (ii) यकृत, एवं (iii) अग्न्याशय। आमाशय की भित्ति एवं क्षुद्रांत्र की भित्ति भी पाचक रस स्रावित करती हैं।

 विभिन्न जीवों में भोजन ग्रहण करने की विधियाँ भी भिन्न हैं।

 पोषण एक जटिल प्रक्रम है, जिसमें (i) अंतर्ग्रहण; (ii) पाचन; (iii) अवशोषण;
(iv) स्वांगीकरण एवं (v) निष्कासन शामिल हैं।

 मंड जैसे कार्बोहाइड्रेट का पाचन मुख में ही प्रारंभ हो जाता है। प्रोटीन का पाचन आमाशय में प्रारंभ होता है। यकृत द्वारा स्रावित पित्त, अग्न्याशय से अग्न्याशयिक स्राव एवं क्षुद्रांत्र भित्ति द्वारा स्रावित पाचक रस की क्रिया से भोजन के सभी घटकों का पाचन क्षुद्रांत्र में पूरा हो जाता है।

 जल एवं कुछ लवण बृहदांत्र में अवशोषित होते हैं। अवशोषित पदार्थ शरीर के विभिन्न भागों को स्थानांतरित कर दिए जाते हैं।

 बिना पचे अपशिष्ट जिनका अवशोषण नहीं होता, मल के रूप में गुदा द्वारा शरीर के बाहर निकाल दिए जाते हैं।

 गाय, भैंस एवं हिरण जैसे घास खाने वाले जंतु रोमंथी (रूमिनैन्ट) कहलाते हैं। वे पत्तियों का अंतर्ग्रहण तीव्रता से करके उन्हें निगल लेते हैं तथा रूमेन में भंडारित कर लेते हैं। कुछ अंतराल के बाद भोजन पुनः मुख में आ जाता है और पशु धीरे-धीरे जुगाली कर उसे चबाते हैं।

 अमीबा में भोजन का अंतर्ग्रहण पादाभ की सहायता से होता है तथा इसका पाचन खाद्य धानी में होता है।

 

अभ्यास

1. उचित शब्द द्वारा रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।

(क) मानव पोषण के मुख्य चरण --------------- , --------------- , ---------------, -------------                 -- एवं --------------- हैं।

(ख) मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि का नाम --------------- है।

(ग) आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं --------------- का स्राव होता है, जो भोजन पर क्रिया करते                 हैं।

(घ) क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति पर अँगुली के समान अनेक प्रवर्ध होते हैं, जो --------------- कहलाते हैं।

(च) अमीबा अपने भोजन का पाचन --------------- में करता है।

2. सत्य एवं असत्य कथनों को चिह्नित कीजिए।

(क) मंड का पाचन आमाशय से प्रारंभ होता है।

(ख) जीभ लाला-ग्रंथि को भोजन के साथ मिलाने में सहायता करती है।

(ग) पित्ताशय में पित्त रस अस्थायी रूप से भंडारित होता है।

(घ) रूमिनैन्ट निगली हुई घास को अपने मुख में वापस लाकर धीरे-धीरे चबाते
रहते हैं।

3. निम्न में से सही विकल्प पर () का चिह्न लगाइए।

(क) वसा का पूर्णरूपेण पाचन जिस अंग में होता है, वह है

(i) आमाशय

(ii) मुख

(iii) क्षुद्रांत्र

(iv) बृहदांत्र

(ख) जल का अवशोषण मुख्यतः जिस अंग द्वारा होता है, वह है

(i) आमाशय

(ii) ग्रसिका

(iii) क्षुद्रांत्र

(iv) बृहदांत्र

4. कॉलम A में दिए गए कथनों का मिलान कॉलम B में दिए गए कथनों से कीजिए।

 कॉलम A             कॉलम B

खाद्य घटक पाचन के उत्पाद

       कार्बोहाइड्रेट्स               वसा अम्ल एवं ग्लिसरॉल

प्रोटीन           शर्करा

   वसा          एेमीनो अम्ल

5. दीर्घरोम क्या हैं? वह कहाँ पाए जाते हैं एवं उनके कार्य क्या हैं?

6. पित्त कहाँ निर्मित होता है? यह भोजन के किस घटक के पाचन में सहायता
करता है?

7. उस कार्बोहाइड्रेट का नाम लिखिए जिनका पाचन रूमिनैन्ट द्वारा किया जाता है परंतु मानव द्वारा नहीं। इसका कारण बताइए।

8. क्या कारण है कि हमें ग्लूकोस से ऊर्जा तुरंत प्राप्त होती है?

9. आहार नाल के कौन-से भाग द्वारा निम्न क्रियाएँ संपादित होती हैं

(i) पचे भोजन का अवशोषण --------------- ।

(ii) भोजन को चबाना --------------- ।

(iii) जीवाणु नष्ट करना --------------- ।

(iv) भोजन का संपूर्ण पाचन --------------- ।

(v) मल का निर्माण --------------- ।

10. मानव एवं अमीबा के पोषण में कोई एक समानता एवं एक अंतर लिखिए।

11. कॉलम A में दिए गए शब्दों का मिलान कॉलम B के उचित कथन से कीजिए।

कॉलम A कॉलम B

(क) लाला-ग्रंथि         (i) पित्त रस का स्रवण

(ख) आमाशय (ii) बिना पचे भोजन का भण्डारण

(ग) यकृत (iii) लाला रस स्रावित करना

(घ) मलाशय (iv) अम्ल का निर्मोचन

(च) क्षुद्रांत्र (v) पाचन का पूरा होना

(छ) बृहदांत्र (vi) जल का अवशोषण
(vii) मल त्याग

12. चित्र 2.11 में दिए हुए पाचन तंत्र के आरेख को नामांकित कीजिए।


चित्र 2.11 मानव पाचन तंत्र के कुछ भाग

13. क्या हम केवल हरी सब्जियों/घास का भोजन कर जीवन निर्वाह कर सकते हैं? चर्चा कीजिए।

विस्तारित अध्ययन-क्रियाकलाप एवं परियोजना कार्य

1. किसी चिकित्सक से मिलकर निम्न के विषय में जानकारी एकत्र कीजिएः

(क) किन परिस्थितियों में किसी रोगी को ग्लूकोस की ड्रिप लगाने की आवश्यकता
होती है?

(ख) रोगी को ग्लूकोस कब तक दिया जाता है?

(ग) रोगी की अवस्था के सुधार में ग्लूकोस का क्या योगदान है?

अपनी नोटबुक में इनके उत्तर लिखिए।

2. पता लगाइए कि विटामिन क्या है? उनके बारे में निम्न जानकारी एकत्र कीजिएः

(क) हमारे आहार में विटामिन की क्या आवश्यकता है?

(ख) विटामिन प्राप्त करने के लिए हमें किन फलों अथवा सब्जियों का नियमित उपयोग करना चाहिए।

अपने द्वारा एकत्र जानकारी के आधार पर एक पृष्ठ की टिप्पणी लिखिए। आप इसके लिए किसी चिकित्सक, डाइटीशियन, अपने अध्यापक अथवा किसी अन्य जानकार व्यक्ति अथवा स्रोत की सहायता से प्राप्त कर सकते हैं।

3. अपने मित्रों, पड़ोसियों एवं सहपाठियों से ‘दूध के दाँत’ संबंधी आँकड़े एकत्र कीजिए।

अपने आँकड़े सारणीबद्ध कीजिए। इसे करने का एक तरीका सारणी में दर्शाया
गया हैः

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कम से कम 20 बच्चों के आँकड़े एकत्र कीजिए तथा पता लगाइए कि दूध के दाँत गिरने की औसत आयु क्या है। आप इसके लिए अपने मित्रों की सहायता भी प्राप्त कर सकते हैं।


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