मनोवैज्ञानिक कौशलों का विकास इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप मनोवैज्ञानिकों में कौशलों के विकास की आवश्यकता को समझ सवेंफगे, प्रेक्षण वफौशलों के आधरभूत पक्षों का वणर्न कर सवेंफगे, संप्रेषण वफौशलों के विकास की साथर्कता जान सवेंफगे,वैयक्ितक मूल्यांकन में मनोवैज्ञानिक परीक्षण कौशलों के महत्त्व को समझ सवेंफगे, तथा परामशर् के स्वरूप एवं प्रिया की व्याख्या कर सवेंफगे। जैसा कि आप पिछली कक्षा में पढ़ चुके हैं कि मनोविज्ञान का प्रारंभ एक अनुप्रयोग या उपादेय - उन्मुखविद्याशाखा के रूप में हुआ। मनोवैज्ञानिक परीक्षण मनोविज्ञान की व्यावहारिकता का सवोर्त्तम उदाहरण है। मनोविज्ञान हमारे जीवन से संबंिात अनेक प्रश्नों के लिए प्रासंगिक है। उदाहरण के लिए एक सपफल व्यक्ित बनने के लिए किस प्रकार के व्यक्ितत्व बनावट की आवश्यकता है? या कक्षा 12 में पढ़ने वाले किसी छात्रा के लिए कौन - सा व्यवसाय सवार्िाक उपयुक्त होगा? इसी प्रकार, लोगों के बारे में अनेक प्रश्नऔर जिज्ञासाएँ होती हैं जिनका उत्तर मनोवैज्ञानिकों से अपेक्ष्िात होता है। मनोविज्ञान की अनुप्रयोग - संबंधी दो प्रकार की छवियाँ हैं - पहली, एक सेवा - उन्मुख विद्याशाखा के रूप में एवं दूसरा, एक वैज्ञानिक विध्ि - प्रेरित अनुसंधन विद्याशाखा के रूप में। ये दोनों छवियाँ एक - दूसरे से संब( हैं जिनको अलग करके देखना संभव नहीं है। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि वुफछ ऐसे कारक हैं जो मनोविज्ञान को अनुप्रयोग - उन्मुख बनाने में अपना योगदान देते हैं। प्रथम, मनोवैज्ञानिकों ने यह पाया कि अतीत एवं वतर्मान दोनों में व्यक्ित, समूह, समाज एवं संगठनों द्वारा अनुभव की जाने वाली अनेक समस्याओं के समाधान के लिए वुफछ मनोवैज्ञानिक सि(ांतों को समझना आवश्यक है। जैसे - जैसे समाज एवं व्यक्ितयों के द्वारा अनुभव की जाने वाली समस्याओं की तीव्रता और गंभीरता बढ़ी है, वैसे ही मनोवैज्ञानिकों ने उनके समाधान के ठोस उपाय भी प्रस्तुत किए हैं। उदाहरण के लिए किशोरों मेंआत्महत्या तथा अवसाद की बढ़ती प्रवृिा एक ऐसी ही समस्या है जिसमें किशोरावस्था के विकास संबंधी मनोवैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग इस घटना को समझने में किया जाता है तथा वुफछ युक्ितयों का विकास किया गया है ताकि जीवन के आरंभ्िाक वषो± में इससे ग्रसित किशोरों की सहायता की जा सके। दूसरा कारण यह है कि मनोवैज्ञानिकों की विशेषज्ञता को अत्यंत महत्वपूणर् समझा जाने लगा है। पिछले वुफछ वषो± मेंमनोविज्ञान की माँग और स्वीकृति समाज में एक व्यवसाय के रूप में अच्छे से स्थापित हो रही है। समाजके अनेक वगो± में मनोवैज्ञानिक ज्ञान को अपने अनेक मूल ियाकलापों में समाकलित करने की प्रवृिा बढ़ रही है। इसको प्रमुखता से सेना में, श्िाक्षा के क्षेत्रा में, जहाँ वुफछ राज्यों के विद्यालयों में प्रश्िाक्ष्िात परामशर्द ;परामशर्दाताद्ध रखना अनिवायर् कर दिया गया है, इसी प्रकार प्रबंधन के क्षेत्रा में मनोवैज्ञानिकों की मदद ली जा रही है, कमर्चारी भतीर्, में कमर्चारी व्यवहार, मूल्यांकन में तथा कायर् संबंिात दबाव के प्रबंधन में, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रबंधन में और हाल में इनको खेल के क्षेत्रा में भी प्रयुक्त किया जा रहा है। ये सिप़्ार्फ वुफछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं हैं बल्िक जीवन के समस्त क्षेत्रों में मनोवैज्ञानिकों की मदद की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान के सभी क्षेत्रों में मानव स्वभाव एवं सेवाथीर् कोइर् विशेष पद है जिसका उपयोग नैदानिक या विभ्िान्न स्िथतियों में मनोवैज्ञानिकों की भूमिका के बारे में परामशर् की स्िथतियों में किया जाता है। मनोविज्ञान में सेवाथीर् आधारभूत मान्यताएँ समान हैं। सामान्यतः यह माना जाता है ;बसपमदजद्ध वह व्यक्ित/समूह/संगठन है जो स्वयं ही अपनी कि मनोवैज्ञानिवफों की अभ्िारुचि लोगों के स्वभाव, उनकी किसी समस्या के समाधान में मनोवैज्ञानिक से मदद, निदेर्शन योग्यताओं और व्यवहार में होती है। किसी भी क्षेत्रा के या हस्तक्षेप प्राप्त करना चाहता है। मनोवैज्ञानिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह दूसरे लोगों कौशल ;ेापससद्ध पद को प्रवीणता, दक्षता या निपुणता में अभ्िारुचि लेगा एवं अपने विषय से प्राप्त ज्ञान का उपयोग के रूप में परिभाष्िात किया जा सकता है जिसका अजर्न या उनकी मदद करने में करेगा। एक मनोवैज्ञानिक सेवाथीर् केविकास प्रश्िाक्षण अनुभव के द्वारा किया जा सकता है । इतिवृत को प्राप्त करने में, उसके समाज - सांस्कृतिक परिवेश वेब्सटर शब्दकोश ने इसके फ्उन गुणों को स्वायत्तीकरण के में, उसके व्यक्ितत्व - मूल्यांकन तथा अन्य महत्वपूणर् विमाओं में रूप में परिभाष्िात किया है जिससे वुुफछ किया जाता है या सिय अभ्िारुचि लेता है। यहाँ आप सोच सकते हैं कि दूसरों से करवाया जाता है।य् अमरीकी मनोवैज्ञानिक संघ ;1973द्ध ने एक कायर्दल गठित किया जिसका उद्देश्य था उन कौशलों की पहचान करना जो व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक हांे। इस कायर्दल ने कौशलों के तीन समुच्चयों की संस्तुति या अनुशंसा की। ये हैं - व्यक्ितगत भ्िान्नताओं का मूल्यांकन, व्यवहार परिष्करण कौशल तथा परामशर् एवं निदेर्शन कौशल। इन्हीं कौशलों और सक्षमताओं की पहचान एवं उपयोग ने अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान के अभ्यास की नींव को सकारात्मक मशबूती प्रदान की। कोइर् व्यक्ित एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक के रूप में वैफसे विकसित हो सकता है? एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक के रूप में विकास अिाकतर लोग सोचते हैं कि वे किसी न किसी प्रकार के मनोवैज्ञानिक हैं। हम अक्सर, बुि, हीनता मनोग्रंथ्िा, अनन्यतासंकट, मानसिक बाधाओं, अभ्िावृिा, दबाव, संप्रेषण बाधाओं के बारे में बात करते हैं। सामान्यतः इन पदों का परिचय लोगों के लोकिय लेखन तथा जन संचार के माध्यमों से होता है। मानव व्यवहार के बारे में कइर् प्रकार के सामान्य बुि के पद लोग अपने जीवन से जुड़ी प्रियाओं से सीख लेते हैं। मानव व्यवहार से जुड़ी वुफछ नियमितताओं के अनुभव के आधार पर उनके बारे में सामान्यीकरण किया जाता है। इस प्रकार का दैनिक अव्यवसायी ;शौकियाद्ध मनोविज्ञान अक्सर उलटा असर डालता है, कभी - कभी तो अत्यंत भयावह हो सकता है। अभी भी यह प्रश्न बना हुआ है कि एक वूफट मनोवैज्ञानिक को वास्तविक मनोवैज्ञानिक से वैफसे अलग करें?इसका उत्तर वुफछ इस प्रकार के प्रश्न पूछकर तैयार किया जा सकता है, जैसेμउसका व्यावसायिक प्रश्िाक्षण, शैक्ष्िाक पृष्ठभूमि, संस्थागत संबंधन तथा उसका सेवा देने संबंधी अनुभव आदि। यहाँ पर यह महत्वपूणर् है कि उस मनोवैज्ञानिक का प्रश्िाक्षण एक शोध्कतार् के रूप में वैफसे हुआ है और उसमें व्यावसायिक मूल्यों का आंतरिकीकरण कितना हुआ है। अब इस बात को माना जा रहा है कि मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयुक्त उपकरणों का ज्ञान, उनसे जुड़ी वििायाँ एवं सि(ांत मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर करता है। वे अपनी समस्याओं को प्रयोगशालाया क्षेत्रा में ले जाकर परीक्षण करके उत्तर प्राप्त करने का प्रयासकरते हैं। वे अपने प्रश्नों का उत्तर गण्िातीय प्रसंभाव्यताओं के आधार पर प्राप्त करते हैं। उसके बाद ही वह किसी विश्वसनीय मनोवैज्ञानिक सि(ांत या नियम पर पहुँचते हंै। यहाँ पर एक और अंतर स्थापित करना चाहिए। वुफछ मनोवैज्ञानिक शोध के माध्यम से सै(ांतिक निरूपणों की खोज करते हैं जबकि वुफछ अन्य हमारे प्रतिदिन की ियाओं और व्यवहारों से संबंिात रहते हैं। हमें दोनों प्रकार के मनोवैज्ञानिकों की शरूरत है। हमें वुफछ ऐसे वैज्ञानिक चाहिए जो सि(ांतों का विकास करें जबकि वुफछ दूसरे उनका उपयोग मानव समस्याओं के समाधान के लिए करें। यहाँ यह जानना महत्वपूणर् है कि शोध कौशलों के अलावा एक मनोवैज्ञानिक के लिए वे कौन - सी सक्षमताएँ हैं जो आवश्यक हंै। वुफछ दशाएँ और सक्षमताएँ ऐसी हैं जो मनोवैज्ञानिकों के लिए अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक मानी जा रही हैं। इसके अंतगर्त ज्ञान के वे क्षेत्रा आते हैं, जिसको श्िाक्षा और प्रश्िाक्षण पूरा करने के बाद व्यवसाय में आने से पूवर् किसी मनोवैज्ञानिक को जानना चाहिए। ये श्िाक्षकों, अभ्यास करने वाले एवं शोध करने वाले सभी के लिए शरूरी हैं जोछात्रों से, व्यापार से, उद्योगों से और बृहत्तर समुदायों के साथ परामशर्न की भूमिकाओं में होते हंै। यह माना जा रहा है कि मनोविज्ञान में सक्षमताओं को विकसित करना, उनको अमल में लाना और उनका मापन करना कठिन है, क्योंकि विश्िाष्ट पहचान और मूल्यांकन की कसौटियों पर आम सहमति नहीं बन पाइर् है। आधारभूत कौशल या सक्षमता जिनको मनोवैज्ञानिकों ने पहचाना है और जो एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए आवश्यक हंै, उनको तीन श्रेण्िायों में बाँटा जा सकता है μ ;अद्ध सामान्य कौशल ;हमदमतंस ेापससेद्धए ;बद्ध प्रेक्षण कौशल ;वइेमतअंजपवदंस ेापससेद्ध एवं ;सद्ध विश्िाष्ट कौशल ;ेचमबपपिब ेापससेद्ध। इनकी चचार् यहाँ विस्तार से की जा रही है। सामान्य कौशल ये कौशल मूलतः सामान्य स्वरूप के हैं और इनकी आवश्यकता सभी प्रकार के मनोवैज्ञानिकों को होती है चाहे उनकी विशेषज्ञता का क्षेत्रा कोइर् भी हो। ये कौशल सभी व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक हैं, चाहे वे नैदानिक एवं स्वास्थ्य मनोविज्ञान के क्षेत्रा के हों, औद्योगिक/संगठनात्मक, सामाजिक या पयार्वरणी मनोविज्ञान से संबंध्ित हों या सलाहकार के रूप में कायर्रत हों। इन कौशलों में वैयक्ितक तथा बौिक अध्याय9 ऽ मनोवैज्ञानिक कौशलों का विकास कौशल दोनों शामिल होते हैं। यह अपेक्षा की जाती है कि प्रश्िाक्षण प्राप्त कर लेने के बाद ही किसी विश्िाष्ट क्षेत्रा में किसी भी प्रकार का व्यावसायिक प्रश्िाक्षण ;चाहे नैदानिक या विश्िाष्ट प्रश्िाक्षण देकर उन कौशलों का अगि्रम विकास किया संगठनात्मक होद्ध उन विद्याथ्िार्यों को नहीं दिया जाना चाहिए, जा सकता है। इन कौशलों के वुफछ उदाहरण बाॅक्स 9ण्1 में जिनमें इन कौशलों का अभाव हो। एक बार इन कौशलों का दिए गए हैं। इस वषर् हम प्रेक्षण कौशलों के विकास संबंध्ी पक्षों पर अिाकप्रेक्षण कौशल ध्यान देंगे। मनोवैज्ञानिक चाहे शोध कर रहे हों या क्षेत्रा में व्यवसाय कर एक मनोवैज्ञानिक अपने परिवेश - जिनमें घटनाएँ एवं रहे हों, वे श्यादातर समय सावधनीपूवर्क सुनने, ध्यान देने और व्यक्ित दोनों शामिल हैं, के विभ्िान्न पहलुओं के बारे में प्रेक्षणप्रेक्षण करने का काम करते हैं। वे अपनी समस्त संवेदनाओं का करता है। प्रारंभ में, एक मनोवैज्ञानिक अपने चारों ओर के उपयोग देखने, सुेघ्नन, सँू ेेान, स्वाद लने या स्पशर् करने में करते हैं। वातावरण का सावधानीपूवर्क निरीक्षण करता है तथा भौतिक ़परिवेश की समस्त सूचनाओं का अवशोषण कर लेता है। आप या छत की बनावट, ख्िाड़कियों/दरवाशों के आकार, प्रकाश प्रेक्षण के बारे में पहले ही कक्षा 11 में पढ़ चुके हैं - इसलिए की व्यवस्था, कला चित्रा, पेंटिंग या मूतिर्श्िाल्प पर भी ध्यान इस प्रकार मनोवैज्ञानिक एक उस उपकरण की तरह है जो अपने स्िथतियों को जानने की चेष्टा करता है। जैसे, वह पफशर् के रंग देते हैं। ये छोटे, सूक्ष्म तथा अप्रासंगिक से दिखने वाले संकेत मानव व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसी कारण मनोवैज्ञानिक परिवेश के इन संकेतों पर ध्यान देता है। भौतिक परिवेश के इन पहलुओं के अलावा एक मनोवैज्ञानिक व्यक्ितयों एवं उनके व्यवहारों का भी प्रेक्षण करता है। इसमें उसकी जनांकिकीय विशेषताएँ ;जैसे μ आयु, लिंग, कद इत्यादिद्ध, दूसरों से व्यवहार करने या संबंध स्थापित करने के तरीके, दूसरों की उपस्िथति में व्यवहार का स्वरूप आदि शामिल हो सकते हैं। इन सभी पक्षों का मनोवैज्ञानिक एक अभ्िालेख या रिकाॅडर् तैयार करता है जिससे प्रेक्षण की प्रिया में वुफछ महत्वपूणर् एवं साथर्क पक्षों को समझा जा सके। ऽ धैयर्पूवर्क प्रेक्षण करनाऋ ऽ अपने भौतिक परिवेश को निकट से देखना μ जिससे क्या, कौन, वैफसे, कहाँ और कब को समझा जा सकेऋ ऽ लोगों की प्रतिियाओं, संवेगों और अभ्िाप्रेरणाओं के प्रति जागरूक रहनाऋ ऽ उन प्रश्नों को पूछना जिनका उत्तर प्रेक्षण करते समय पाया जा सकेऋ ऽ स्वयं को उपस्िथत रखना μ अपने बारे में सूचना देना, यदि पूछा जाएऋ ऽ एक आशावादी वुफतूहल या जिज्ञासा से प्रेक्षण करेेंऋ और ऽ नैतिक आचरण करें μ प्रेक्षण के दौरान लोगों की निजता के मानकों का पालन करेंऋ उनसे प्राप्त सूचनाओं को किसी को भी न बताएँ, इसका ध्यान रखें। आप प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागमों से पहले ही परिचित हो चुके हैं। ये हैं μ प्रकृतिवादी प्रेक्षण तथा सहभागी प्रेक्षण। आइए इनवेों कैेंैफ बर माशल विकसित करन कीजानकारी लेते ह। प्रकृतिवादी प्रेक्षण ;दंजनतंसपेजपब वइेमतअंजपवदद्ध एक प्राथमिक तरीका है जिससे हम सीखते हैं कि लोग भ्िान्न स्िथतियों में वैफसे व्यवहार करते हैं। मान लीजिए, आप जानना चाहते हैं कि जब कोइर् वंफपनी अपने उत्पाद में भारी छूट की घोषणा करती है तो उसकी प्रतिियास्वरूप लोग शाॅ¯पग माॅल जाने पर वैफसा व्यवहार करते हैं। इसके लिए आप एक शाॅपिंग माॅल में जा सकते हैं जहाँ इन छूट वाली वस्तुओं को प्रदश्िार्त किया गया है, क्रमब( ढंग से आप प्रेक्षण कर सकते हैं कि लोग खरीदारी से पहले या बाद में क्या कहते या करते हैं। उनके तुलनात्मक अध्ययन से, वहाँ क्या हो रहा है, इस बारे में रुचिकर सूझ बन सकती है। सहभागी प्रेक्षण ;चंतजपबपचंदज वइेमतअंजपवदद्ध प्रकृतिवादी प्रेक्षण का ही एक प्रकार है। इसमें प्रेक्षक प्रेेक्षण की प्रिया में एक सिय सदस्य के रूप से संलग्न होता है। इसके लिए वह उस स्िथति में स्वयं भी सम्िमलित हो सकताहै जहाँ प्रेक्षण करना है। उदाहरण के लिए, ऊपर दी गइर् समस्या में, एक प्रेक्षणकतार् उसी शाॅपिंग माॅल की दुकान में अंशकालिक नौकरी लेकर अंदर का व्यक्ित बनकर ग्राहकों के व्यवहार में विभ्िान्नताओं का प्रेक्षण कर सकता है। इस तकनीक का मानवशास्त्राी बहुतायत से उपयोग करते हैं जिनका उद्देश्य होता है कि उस सामाजिक व्यवस्था का प्रथमतया दृष्िट से एक परिप्रेक्ष्य विकसित कर सवेंफ जो एक बाहरी व्यक्ित को सामान्यतया उपलब्ध नहीं होता है। प्रेक्षण के लाभ एवं हानि ऽ इसका प्रमख लाभ यह ह कि यह प्राकृतिक या स्वाभाविक ुैस्िथति में व्यवहार को देखने और अध्ययन करने का अवसर देता है। ऽ बाहर के लोगों को या उस स्िथति में रहने वाले लोगों को प्रेक्षण के लिए प्रश्िाक्षण दिया जा सकता है। ऽ इसकी एक कमी यह है कि प्रेक्षण करने में अभ्िानति या पूवर्ग्रह की भावना आ जाती है क्योंकि प्रेक्षक या प्रेक्ष्िात की भावनाएँ इसको प्रभावित कर देती हैं। ऽ किसी दी गइर् परिस्िथति में दैनंदिन ियाएँ नित्यकमर् ;रूटीनद्ध की तरह होती हैं जो अक्सर प्रेक्षक की दृष्िट से चूक जाती हैं। ऽ दूसरी संभाव्य कमी यह है कि वास्तविक व्यवहार और दूसरों की अनुियाएँ प्रेक्षक की उपस्िथति से प्रभावित हो सकती हैं, इस प्रकार प्रेक्षण का उद्देश्य पराजित हो सकता है। विश्िाष्ट कौशल ये कौशल मनोवैज्ञानिक सेवाओं के क्षेत्रा के मूल/आधारभूत कौशल हैं। उदाहरण के लिए, नैदानिक स्िथतियों में कायर् करने वाले मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक है कि वे चिकित्सापरक हस्तक्षेप की तकनीकों, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन एवं परामशर् में प्रश्िाक्षण प्राप्त करें। इसी प्रकार, संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक, जो संगठन के क्षेत्रा में काम करते हैं, उनको भी शोध कौशलों के अलावा मूल्यांकन, सुगमीकरण, परामशर्न एवं व्यवहारपरक कौशलों की आवश्यकता होती है जिससे वे व्यक्ित, समूहों, टीमों और संगठनों के विकास की प्रिया को समझ सवेंफ या समझने में मदद कर सवेंफ। यद्यपि विश्िाष्ट कौशलों और सक्षमताओं की आवश्यकता विश्िाष्ट व्यावसायिक प्रकायो±ें के लिए होती है, पिफर भी इन कौशलों मंे एक प्रकार का अतिव्यापन होता है, अथार्त ये काश्ैाल एक - दूसरे से जुड़े होते हैं। ये किसी क्षेत्रा के लिए अनन्य नहीं होते। प्रासंगिक विश्िाष्ट कौशलों औरसक्षमताओं को निम्न रूप में वगीर्कृत किया जा सकता है - ;अद्ध संप्रेषण कौशल ऽ वाचन ऽ सिय श्रवण ऽ शरीर भाषा या अवाचिक कौशल ;बद्ध मनोवैज्ञानिक परीक्षण कौशल ;सद्ध साक्षात्कार कौशल ;दद्ध परामशर् कौशल ऽ तदनुभूति ऽ सकारात्मक आदर ऽ प्रामाण्िाकता संप्रेषण कौशल हम जिन कौशलों की चचार् करने जा रहे हैं वे शायद अमूतर् लगें लेकिन जब आप इससे जुड़ी एक िया को करेंगे तो आप इसको आसानी से समझ जाएँगे। आइए संप्रेषण प्रिया के मूल तत्व को समझंे और देखें कि वैफसे यह व्यक्ितगत संबंधों एवं व्यक्ितगत प्रभाविता में भूमिका निवार्ह करता है। प्रभावी संप्रेषक सीखना मात्रा एक अकादमिक िया नहीं है। यह जीवन में सपफलता पाने के लिए सवार्िाक महत्वपूणर् कौशल है। इस कक्षा में भी आपकी सपफलता आपकी संप्रेषण योग्यता पर निभर्र करती है। उदाहरण के लिए, अच्छा करनेके लिए आपको प्रश्न पूछना आना चाहिए, उत्तर देना आना चाहिए, विचारों का सारांश बनाना आना चाहिए, तथ्यों को मतों ;वचपदपवदेद्ध से अलग करना आना चाहिए तथा अपने समकक्ष्िायों एवं अध्यापकों से प्रभावी ढंग से अंतःिया करना आना चाहिए। इसके लिए, आपको श्रवण कौशल की आवश्यकता भी होगी ताकि कक्षा में प्रस्तुत सूचनाओं को समग्र रूप से - वाचिक एवं अवाचिक दोनों रूप में समझ सवेंफ। आपका प्रस्तुतीकरण कौशल अच्छा होना चाहिए ताकि आप कक्षा में दी गइर् परियोजना संबंधी रिपोटर् को अच्छी तरह प्रस्तुत कर सवेंफ। संप्रेषण प्रिया से हमारा तात्पयर् क्या है? यह कहा जा सकता है कि संप्रेषण एक सचेतन या अचेतन, साभ्िाप्राय या अनभ्िाप्रेत प्रिया है जिसमें भावनाओं तथा विचारों को वाचिक या अवाचिक संदेश के रूप में भेजा, ग्रहण किया और समझा जाता है। संप्रेषण की विशेषताआंे को बाॅक्स 9ण्2 में रेखांकित किया गया है - हमारी संप्रेषण प्रिया आकस्िमक ;बिना किसी आशय केद्ध, अभ्िाव्यक्ितपरक ;व्यक्ित की सांवेगिक स्िथति से जुड़ीद्ध या वाव्फपटुता ;संप्रेषक के विश्िाष्ट लक्ष्यों से जुड़ीद्ध हो सकती है। मानव संप्रेषण अंतरावैयक्ितक, अंतवैर्यक्ितक अथवा सावर्जनिक स्तरों पर हो सकता है। अंतरावैयक्ितक संप्रेषण ;पदजतंचमतेवदंस बवउउनदपबंजपवदद्ध का संबंध व्यक्ित की स्वयं से संवाद करने की िया को कहते हैं। इसमें विचार - प्रक्रम, वैयक्ितक निणर्यन तथा स्वयं पर वेंफित विचार शामिल होते हैं। अंतवैर्यक्ितक संप्रेषण;पदजमतचमतेवदंस बवउउनदपबंजपवदद्ध का तात्पयर् उस संप्रेषण से है जो दो या दो से अिाक व्यक्ितयों से संबंिात होता है, जो एक संप्रेषणपरक संबंध स्थापित करते हैं। अंतवैर्यक्ितक संपे्रषण के अनेक प्रकारों में मुखोन्मुख या मध्यस्थ आधारित वातार्लाप, साक्षात्कार एवं लघु समूह परिचचार् आते ह।ंैसावर्जनिक संप्रेषण ;चनइसपब बवउउनदपबंजपवदद्ध में वक्ता अपनी बातों या संदेशों को श्रोताओं तक पहुँचाता है। यह प्रत्यक्ष, जैसे - कोइर् वक्ता मुखोन्मुख जनसभा में भाषण देता है या अप्रत्यक्ष, जैसे - जहाँ वक्ता रेडियो या टेलीविजन के माध्यम से बात करता है। मानव संपे्रषण के घटक जब हम संप्रेषण करते हैं तब हमारा संप्रेषण चयनात्मक होता हैै। इसका अथर् है, हमारे पास उपलब्ध शब्दों एवं व्यवहारों के एक विशाल संग्रह में से हम उन शब्दों एवं ियाओं को चुनते हैं जिसके बारे में हमारा भरोसा रहता है कि वे हमारे विचारों की अभ्िाव्यक्ित के लिए उपयुक्त हैं। जब हम संप्रेषण करते हैं, तब हम वूफट संकेतन ;मदबवकमद्ध ;विचार लेना, उनको अथर् देना और उनको संदेश के रूप में बदल देनाद्ध करते हैं और पिफर उसको संप्रेषक सरणी या पथ में डाल देते हैं। यह हमारी प्राथमिक संकेतक प्रणाली का अंग है जो हमारी ज्ञानेंदि्रयों से जुड़ी होती है ;देखना, सुनना, सूँघना, स्वाद लेना या स्पशर् करनाद्ध। इस संदेश को उस तक भेजा जाता है जो अपनी प्राथमिक संकेत प्रणाली से इसको ग्रहण करता है। वह संग्रहण का विसंकेतन ;कमबवकमद्ध ;समझने योग्य रूप में संदेश का अनुवाद करनाद्ध करता है। उदाहरण के लिए जैसे आपने कहा कि आपने घंटी की आवाज सुनी या यह बेहद नरम वस्तु है। ये वाचिक या भाषायी संप्रेषण के उदाहरण हंै जो बताते हैं कि आपकी ज्ञानेंदि्रयों ने संकेतों को वैफसे ग्रहण किया। आप अवाचिक या भाषेतर स्तर पर भी अनुिया दे सकते हैं। जैसे आपने गरम स्टोव को छुआ तो आपकी अंगुलियाँ एकदम से दूर हो गईं और आपकी आँखों से आँसू आ गए। अंगुलियों का खींचना और आँखों में आँसू आना ये दोनों किसी भी देखने वाले को यह बता देंगे कि आपका ददर् कितना था। चित्रा 9ण्1 में दिया गया माॅडल संप्रेषण प्रिया की विभ्िान्न अवस्थाओं को प्रदश्िार्त करता है। जैसा कि आप देख सकते हैं कि किसी भी संप्रेषण प्रिया के प्रभावी होने की मात्रा इस बात पर निभर्र करती है कि संप्रेषण में प्रयुक्त होने वाले संकेतों या वूफटों, जिनका उपयोग संदेश को प्रेष्िात करने और उसको ग्रहण करने के लिए किया गया है, के प्रति संपे्रषण करने वाले संपे्रषकों की आपसी समझ कितनी है। मान लीजिए आप कोइर् परीक्षा देने वाले हैं कि अचानक आपको पता चलता है कि आप कक्षा में कलम लेकर नही आए हैं। आप अपने किसी दोस्त से कहते हैं, ‘क्या तुम्हारे पास कोइर् अतिरिक्त कलम है जो तुम मुझे दे सकते हो’? वह कहती है ‘‘हाँ’’ और आपको कलम दे देती है। अभी आपने एक प्रभावी संप्रेषण प्रिया में भाग लिया है। आपने ;संप्रेषक अद्ध एक संदेश ;आपको कलम की आवश्यकता हैद्ध का वूफट संकेतन किया है एवं एक सरणी ;अपनी आवाश की ध्वनिद्ध का उपयोग करके अपने दोस्त ;संप्रेषक बद्ध को संदेश प्रेष्िात किया है। आपकी दोस्त ज्ञानेंदि्रय ;कानद्ध का उपयोग एवं विसंकेतन करके संदेश को ग्रहण करती है ;वह समझती है कि आपको कलम चाहिएद्ध। आपकी दोस्त का पफीडबैक ;‘हाँ’ कहना और आपको कलम देने का व्यवहार करनाद्ध इन सबका मतलब है कि संदेश को सपफलतापूवर्क ग्रहण किया गया तथा विसंकेतन किया गया। यद्यपि संप्रेषण उस अवस्था में भी सपफल होता, अगर आपकी दोस्त ने यह कहा होता ‘मापफ करना, मैं नहीं दे सकती, क्योंकि मैं आज एक ही कलम लेकर आइर् हूँ’। आप यह याद रखना चाहेंगे कि भाषण स्वयं में कोइर् संप्रेषण नहीं है। भाषण सिपर्फ एक जैविक िया हैऋ ध्वनि की उक्ित या उच्चार, भाषा का उपयोग करते हुए। संप्रेषण काबृहत्तर अथर् है μ इसमें दो या उससे अिाक व्यक्ितयों के बीच एक संबंध होता है जिसमें वे अथर् निरूपण की हिस्सेदारी में शामिल होते हैं जिससे संदेश के भेजने एवं ग्रहण करने में एक समानता बनी रहती है। वाचन ;संभाषणद्ध संप्रेषण का एक महत्वपूणर् घटक है भाषा का उपयोग करके बोलना ;संभाषणद्ध। भाषा में प्रतीकों का उपयोग किया जाता है जिसमें अथर् बंधे हुए होते हैं। प्रभावी होने के लिए यह आवश्यक है कि संप्रेषक भाषा का सही उपयोग करना जानता हो क्योंकि भाषा प्रतीकात्मक होती है, इसलिए जहाँ तक संभव हो शब्दों का उपयोग स्पष्ट एवं परिशु( होना चाहिए। संप्रेषण किसी संदभर् के अंतगर्त घटित होता है। इसलिए दूसरे के संदभर् आधार को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता होती है। इसका अथर् है प्रेषक जिस संदभर् से संदेश प्रेष्िात कर रहा है, उसके प्रति जानकारी होनी चाहिए। साथ ही उस संदभर् की व्याख्या की हिस्सेदारी आवश्यक है। अगर नहीं तो अपनी शब्दावली स्तर एवं शब्दों के चयन को सुनने वाले के अनुरूप स्तर परलाना पड़ता है। याद रहे, किसी संस्कृति - विश्िाष्ट या क्षेत्रा अनुरूप अपभाषा तथा शब्दों की अभ्िाव्यक्ित कभी - कभी संप्रेषण की प्रभाविता में बाधा बन जाती है। श्रवण श्रवण एक महत्वपूणर् कौशल है जिसका उपयोग हम प्रतिदिन करते हैं। आपकी शैक्षण्िाक सपफलता, नौकरी की उपलब्िध एवं व्यक्ितगत प्रसन्नता काप़्ाफी हद तक आपके प्रभावी ढंग से सुनने की योग्यता पर निभर्र करती है। प्रथमतया, श्रवण आपको एक निष्िक्रय व्यवहार लग सकता है क्योंकि इसमें चुप्पी होती है लेकिन निष्िक्रयता की यह छवि सच्चाइर् से दूर है। श्रवण में एक प्रकार की ध्यान सियता होती है। सुनने वाले को धैयर्वान तथा अनिणर्यात्मक होने के साथ विश्लेषण करते रहना पड़ता है ताकि सही अनुिया दी जा सके। चित्रा 9ण्1 मूल संप्रेषण प्रिया सुनना ;ीमंतपदहद्ध एवं श्रवण ;सपेजमदपदहद्ध वास्तव में एक नहीं हैं। सुनना एक जैविक िया है जिसमें संवेदी सरण्िायों के द्वारा संदेश का अभ्िाग्रहण शामिल होता है। यह श्रवण का एक आंश्िाक पक्ष है, इसमें अभ्िाग्रहण, ध्यान, अथर् का आरोपण तथा श्रवणकतार् की संदेश के प्रति अनुिया आदि शामिल होते हैं। अभ्िाग्रहण श्रवण प्रिया का प्रारंभ्िाक चरण है उद्दीपक या संदेश का अभ्िाग्रहण करना। ये संदेश श्रव्य ;श्रवणयोग्यद्ध और दृश्य ;दिखाइर् देने योग्यद्ध हो सकते हैं। श्रवण प्रिया वुफछ जटिल शारीरिक अंतःियाओं पर आधारित होती है जिसमें कान तथा मस्ितष्क की भूमिका होती है। श्रवण तंत्रा के अलावा वुफछ लोग अपनी दृष्िट प्रणाली से भी श्रवण करते हैं। वे किसी व्यक्ित की मुखीय अभ्िाव्यक्ित, भंगिमा ;मुद्राद्ध, गति एवं रूप - रंग का प्रेक्षण करते हैं, जिससे अत्यंत महत्वपूणर् संकेत प्राप्त होते हैं और जिनको मात्रा संदेश के वाचिक अंश के श्रवण से नहीं समझा जा सकता है। ध्यान एक बार जब उद्दीपक, जैसे - एक शब्द या दृष्िट संकेत या दोनों, ग्रहण किए जाते हैं तो वे मानव प्रक्रमण तंत्रा की ध्यान अवस्था पर पहुँचते हैं। इस अवस्था में अन्य उद्दीपक पश्चगमन की अवस्था में आ जाते हैं ताकि हम विश्िाष्ट शब्दों या दृश्य प्रतीकों पर पूरा ध्यान दे सवेंफ। सामान्यतया हमारा ध्यान हम जो सुन रहे हैं और समझ रहे हैं उनके बीच बँटा रहता है या हमारे आस - पास जो वुफछ घटित हो रहा है उसमें उलझा रहता है। मान लीजिए कि आप कोइर् सिनेमा देख रहे हैं। आपके सामने बैठा व्यक्ित अपने बगल में बैठे व्यक्ित के साथ लगातार कानापूफसी कर रहा है। सिनेमाघर का ध्वनि यंत्रा भी खड़खड़ा रहा है। साथ ही, आपको आगे आने वाली परीक्षा के बारे में भी चिंता है। इस तरह से आपका ध्यान अनेक दिशाओं में बँटा रहता है। विभक्त ध्यान किसी संदेश या संकेत को ग्रहण करना कठिन बना देता है। पुनवार्क्यविन्यास आपको वैफसे पता चलेगा कि कोइर् श्रवण कर रहा है कि नहीं? आप उससे पूछिए कि आपने जो कहा वह उसको पिफर से कहे। ऐसा करने वाला व्यक्ित आपके शब्दों को एकदम से नहीं दोहरा सकता है। वह मूलतः अपनी समझ से आपकी बातों या विचारों को पुनवर्फथ्िात करता है - वही जो उसकी समझ में आया होता है। इसी को पुनवार्क्यविन्यास ;चंतंचीतंेपदहद्ध कहते हैं। इसके द्वारा आपको यह समझ में आ जाता है कि आपने जो कहा वह कितना समझा या सुना गया है। अगर कोइर् कही हुइर् बात को संक्षेप में दुबारा दोहरा नहीं सकता तब यह इसका साक्ष्य है कि उसने पूरा संदेश ठीक से ग्रहण नहीं किया है अथार्त या तो सुना नहीं है या समझा नहीं है। हम जब कक्षा में अध्यापक या किसी दूसरे व्यक्ित को सुन रहे हों तब भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्या हम उनकी बात दोहरा सकते हैं या नहीं? सुनी हुइर् बात का पुनवार्क्यविन्यास करने का प्रयास करें और यदि आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तब संभव होने पर तत्काल स्पष्टीकरण करें। अगली बार जब आप किसी तीव्रतम बातचीत में संलग्न हों तो वाचिक रूप से पुनवार्क्यविन्यास करने का प्रयास करें, जैसे - जब कोइर् आपको निदेश ;आदेशद्ध दे रहा हो या किसी मित्रा के साथ आप एक द्वंद्व स्िथति ;जैसे - वादविवादद्ध में उलझे हुए हों। आप अपने मित्रा की कही हुइर् बात को दोहरा कर बताएँ यह देखने के लिए कि जो कहा जा रहा है आप वही सुन रहे हैं या नहीं। इससे पता चलेगा कि आपका ग्रहण करना और समझना एक ही धरातल पर चल रहा है। आपको यह जानकर आश्चयर् होगा कि कितनी बार वादविवाद गलत संप्रेषण की वजह से होता है। अथर् का आरोपण किसी भी उद्दीपक को ग्रहण करने के बाद उसको हम एक पूवर्निधार्रित श्रेणी में रखते हैं, उस श्रेणी का विकास भाषा के सीखने के साथ ही जुड़ा रहता है। हम उन मानसिक श्रेण्िायों को विकसित करते हैं जिनके द्वारा प्राप्त संदेश की व्याख्या की जाती है। उदाहरण के लिए, हमारी श्रेणीकरण प्रणाली ने ‘पनीर’ शब्द को एक दुग्ध उत्पाद के रूप में श्रेणीब( कर रखा है, जिसका एक खास स्वाद है, रंग है, जिसके द्वारा हम ‘पनीर’ शब्द का उपयोग सही अथर् में कर पाते हैं। श्रवण में संस्कृति की भूमिका मस्ितष्क की तरह, हम जिस संस्कृति में पलते - बढ़ते हैं वह भी हमारी श्रवण एवं सीखने की योग्यताआंे को प्रभावित करती है। एश्िायाइर् संस्कृति, जैसे कि भारत, में जब बड़े या वरिष्ठ लोग संदेश देते हैं तब उसको शांत संप्रेषक की तरह ग्रहण किया जाता है। वुफछ संस्वृफतियों में ध्यान को नियंत्रिात करने पर ध्यान दिया जाता है। उदाहरण के लिए बौ( दशर्न में एक संप्रत्यय होता है जिसको ‘मनोयोग’ कहते हैं। इसका अथर् है कि आप जो भी करें उस पर अपना संपूणर् ध्यान वेंफित रखें। बाल्यावस्था में ‘मनोयोग’ का प्रश्िाक्षण देने से ध्यान वेंफित करने की योग्यता का विस्तार हो जाता है और इससे श्रवण की क्षमता बेहतर हो जाती है। व्यक्ित में इससे सहानुभूतिक श्रवण कीयोग्यता भी बढ़ती है। पिफर भी अनेक संस्कृतियों में श्रवण कौशलों में बढ़ोतरी से जुड़े संप्रत्ययों का अभाव है। बाॅक्स 9ण्3 में श्रवण कौशलों को सुधारने के वुफछ संकेत दिए गए हैं। शरीर भाषा क्या आप मानते हैं कि जब आप दूसरों से संवाद करते हैं तब आपके शब्द आपके संदेश का पूणर् अथर् संप्रेष्िात कर पाते हैं?अगर आपका उत्तर ‘हाँ’ में है तब आप गलत हैं। हम सभी जानते हैं कि संप्रेषण का एक बड़ा भाग वाचिक भाषा का उपयोग किए बिना भी हो सकता है। हमें पता है कि अवाचिक ियाएँ प्रतीकात्मक होती हैं और किसी भी बातचीत की िया से गहराइर् से जुड़ी रहती हैं। इन्हीं अवाचिक ियाओं के अंश को शरीर भाषा ;इवकल संदहनंहमद्ध कहते हैं। शरीर भाषा में वे सारे संदेश शामिल होते हैं जो शब्दों के अलावा लोग बातचीत के दौरान उपयोग करते हैं। शरीर भाषा पढ़ते समय इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि कोइर् भी एक अवाचिक संकेत अपने आप में संपूणर् अथर् नहीं रखता है। इसमें हावभाव, भंगिमा, शरीर की बनावट, नेत्रा संपवर्फ शरीर की गति, पोशाक शैली जैसे कारक शामिल होते हैं और इसको एक गुच्छ ;बसनेजमतद्ध के रूप में समझना पड़ता है। साथ ही, वाचिक संप्रेषण में अवाचिक संकेतों के अनेक अथर् हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सीने पर एक - दूसरे पर रखी गइर् बाहुओं या भुजाओं का अथर् होता है कि व्यक्ित स्वयं को अलग रखना चाहता है। परंतु अगर सीधी मुद्रा में सीने पर भुजाएँ बंधी हों, शरीर की मांसपेश्िायाँ तनी हों, जबड़ों की मांसपेश्िायों में जकड़न और आँखों की मांसपेश्िायों में संवुफचन हो तो यह संभवतः क्रोध का संप्रेषण करता है। जब हम शरीर भाषा का विश्लेषण कर रहे हैं तब उस व्यक्ित की पृष्ठभूमि और अतीत में उसके व्यवहार के स्वरूप को भी ध्यान में रखना चाहिए। संप्रेषण में वतर्मान व्यवहार और अतीत के व्यवहार के बीच एकरूपता तथा वाचिक एवं अवाचिक व्यवहार के बीच सुमेल को संगति ;बवदहतनमदबलद्ध कहते हैं। अगर आप अपने मित्रा को कहते हैं कि ‘‘आज तुम ठीक नहीं लग रहे हो’’ तब आपके कहने का आधार यह होता है कि उसका हावभाव और रूप - रंग जो आज दिखाइर् पड़ रहा है शायद वह अतीत के अनुभवों से अलग है। दूसरे शब्दों में, वुुफछ बदल गया है और आपको अंतर दिखाइर् पड़ रहा है। अगर आपके पास अतीत का अनुभव नहीं होता तब आपको शायद परिवतर्न नहीं महसूस होता। याद करें कि किसी बातचीत को प्रोत्साहित या हतोत्साहित करने के लिए हम किस हद तक शरीर भाषा का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए हम हाथ हिलाकर रेस्तराँ में वेटर या मित्रों का ध्यान अपनी ओर आक£षत करते हैं। हालाँकि बातचीत में हमारी शरीर भाषा बगैर हमारे सचेतन बोध के अभ्िाव्यक्त होती रहती है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण कौशल अगला कौशलों ;सक्षमताओंद्ध का समुच्चय जिसकी मनोवैज्ञानिकों को आवश्यकता होती है, का संबंध मनोविज्ञान के ज्ञान के आधार से है। इसके अंतगर्त मनोवैज्ञानिक मापन, मूल्यांकन तथा व्यक्ितयों और समूहों, संगठनों तथा समुदायों की समस्या समाधान के कौशल आते हैं। मनोवैज्ञानिक सदैव से - उन्नीसवीं सदी में गाल्टन ;ळंसजवदद्ध के समय से - व्यक्ितगत भ्िान्नताओं को समझने में अभ्िारुचि रखते आए हैं। मनोवैज्ञानिक परीक्षण बनाए गए जिनका उपयोग प्रमुखतः सामान्य बुि, व्यक्ितत्व, विभेदक अभ्िाक्षमताओं, शैक्ष्िाक उपलब्िधयांे, व्यावसायिक उपयुक्तता या अभ्िारुचियों, सामाजिकअभ्िावृिायों तथा विभ्िान्न अबौिक विशेषताओं के विश्लेषण एवं निधार्रण में किया जाता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग व्यक्ितयों की विभ्िान्नताओं का अध्ययन करने के अलावा समूहों के मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए भी किया जाता है। मनोवैज्ञानिक इन परीक्षणों का उपयोग व्यवसाय,आयु, लिंग, श्िाक्षा, संस्कृति आदि जैसे कारकों के आधर पर उत्पन्न अंतरों के अध्ययन में करते हैं। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करते समय वस्तुनिष्ठता ;वइरमबजपअपजलद्ध, वैज्ञानिक उन्मुखता ;ेबपमदजपपिब वतपमदजंजपवदद्ध तथा मानकीवृफत व्याख्या ;ेजंदकंतकपेमक पदजमतचतमजंजपवदद्ध के प्रति सजगता रखना आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए उद्योगों और व्यवसाय में, संगठनात्मक एवं कामिर्क ;कमर्चारीद्ध कायो± में जहाँ विश्िाष्ट पदों के लिए विशेषीवृफत परीक्षणों द्वारा चयन का कायर् करना है, यह आवश्यक है कि परीक्षण की वैधता स्थापित करने के लिए वास्तविक निष्पादन अभ्िालेख या निधर्रण को मानदंड के रूप में लिया जाए। मान लीजिए कि किसी संगठन का कामिर्क विभाग यह जानना चाहता है कि कोइर् मनोवैज्ञानिक परीक्षण संभावित रूप से सवर्श्रेष्ठ स्टेनोग्रापफर की पहचान करने में मदद कर पाएगा या नहीं, इसके लिए जरूरी है कि परीक्षण स्टेनोग्रापफर के विभ्िान्न निष्पादन स्तरों के बीच अंतर कर पाए। इसके साथ ही, यह भी पता लगाना चाहिए कि हाल में नियुक्त किए गए कमर्चारी, जिसका परीक्षण के आधार पर चयन किया गया है, का निष्पादन परीक्षण प्राप्तांक के साथ मेल करता है कि नहीं। बाॅक्स 9ण्4 में मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कौशलों के मूल तत्व का विवरण दिया गया है। साक्षात्कार कौशल एक साक्षात्कार दो या अिाक व्यक्ितयों के बीच एकउद्देश्यपूणर् वातार्लाप है जिसमें प्रश्न - उत्तर प्रारूप या पफामेर्ट का अनुसरण किया जाता है। साक्षात्कार अन्य प्रकार के वातार्लापों की तुलना में अिाक औपचारिक होता है क्योंकि इसका एक पूूवर्निधार्रित उद्देश्य होता है तथा उसकी संरचना वेंफदि्रत होती है। अनेक प्रकार के साक्षात्कार होते हैं। उनमें से एक रोशगार साक्षात्कार है जिसका अनुभव आप में से अिाकांश लोग करेंगे। अन्य प्रारूपों में सूचना संग्रह संबंधी साक्षात्कार, परामशीर् साक्षात्कार, पूछताछ संबंध्ी साक्षात्कार, रेडियो - टेलीविशन के साक्षात्कार तथा शोध साक्षात्कार आते हैं। साक्षात्कार प्रारूप एक बार साक्षात्कार के उद्देश्य स्थापित हो जाने पर साक्षात्कारकतार् एक प्रारूप तैयार करता है। इसका आधारभूत प्रारूप, साक्षात्कार का उद्देश्य चाहे जो हो, तीन अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है। इसको प्रारंभ, मुख्य भाग एवं समापन की संज्ञा दी जा सकती है। अब हम इन तीनों अवस्थाओं का संक्षेप में वणर्न करेंगे। साक्षात्कार का प्रारंभ साक्षात्कार के प्रारंभ में दो संप्रेषकों के बीच सौहादर् स्थापित करना शामिल होता है। उसका उद्देश्य यह होता है कि साक्षात्कार देने वाला आराम की स्िथति में आ जाए। सामान्यतः साक्षात्कारकतार् बातचीत की शुरूआत करता है और प्रारंभ्िाक समय में ज्यादा बात करता है। इससे दो उद्देश्य पूरे होते हैं, इससे साक्षात्कार का उद्देश्य स्थापित होता है तथा साक्षात्कार देने वाले को स्िथति एवं प्रश्न पूछने वाले के प्रति सहज होने का समय मिल जाता है। साक्षात्कार का मुख्य भाग साक्षात्कार का मुख्य भाग इस प्रिया का वेंफद्र है। इस अवस्थामें साक्षात्कारकत्तार् सूचना और प्रदत्त प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रश्न पूछने का प्रयास करता है जिसके लिए साक्षात्कार का आयोजन किया गया है। प्रश्नों का अनुक्रम एक साक्षात्कार के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए साक्षात्कारकतार् प्रश्नों की एक सूची तैयार करता है जिसको प्रश्न अनुसूची ;ेबीमकनसमद्ध भी कहा जाता है, इस अनुसूची में विभ्िान्न क्षेत्रों या श्रेण्िायों से, जो वह जानना चाहता है, प्रश्न होते हैं।इसके लिए आवश्यक है कि साक्षात्कारकत्तार् उन क्षेत्रों या श्रेण्िायों को निधार्रित करे जिनके बारे में उसे प्रश्न पूछना है। उदाहरण के लिए बाॅक्स 9.5 में दिए गए प्रश्नों का उपयोग नौकरी के साक्षात्कार के लिए किया गया। इसमें साक्षात्कारकतार् ने अनेक श्रेण्िायों का चयन किया, जैसे - पिछले संगठन में किए गए काम का स्वरूप, पिछली नौकरी से संतुष्िट, उत्पादों पर विचार ;दृष्िटकोणद्ध आदि। इन श्रेण्िायों से जुड़े प्रश्नों को निमिर्त किया गया तथा उनको सरलता से कठिनता के अनुक्रम में व्यवस्िथत कर लिया गया। प्रश्नों का उपयोग तथ्यों की जानकारी का मूल्यांकन करने के अलावा व्यक्ितपरक मूल्यांकन के लिए भी किया जा सकता है। साक्षात्कार का समापन साक्षात्कार का समापन करते समय साक्षात्कारकतार् ने जो संग्रह किया है उसे उसका सारांश बताना चाहिए। साक्षात्कार का अंत आगे लिए जाने वाले कदम पर चचार् के साथ होना चाहिए।जब साक्षात्कार समाप्त हो रहा हो तब साक्षात्कारकत्तार् को साक्षात्कार देने वाले को भी प्रश्न पूछने का अवसर देना चाहिए या टिप्पणी करने का मौका देना चाहिए। परामशर् कौशल एक मनोवैज्ञानिक के रूप में विकसित होने के लिए आवश्यक है कि परामशर् एवं निदेर्शन के क्षेत्रा में भी सक्षमता हो। इन सक्षमताओं को विकसित करने के लिए मनोवैज्ञानिकों को उचित श्िाक्षा और प्रश्िाक्षण वुफशल पयर्वेक्षण में दिया जाना चाहिए। गलत व्यवसाय में जाने के परिणाम काप.फी गंभीर हो सकते हैं। मान लीजिए कि कोइर् व्यक्ित किसी ऐसे काम में चला जाता है जिसके लिए उसके पास अपेक्ष्िात अभ्िाक्षमता ;ंचजपजनकमद्ध का अभाव है, तब उसके सामने समायोजन की या निषेधात्मक संवेगों की गंभीर समस्या विकसित हो सकती है, वह हीनता मनोग्रंथ्िा से भी ग्रसित हो सकता है। इन कठिनाइयों को वह दूसरे माध्यमों से प्रक्षेपित कर सकता है। इसके विपरीत, अगर कोइर् ऐसा व्यवसाय चुनता है जिसके लिए उसमें पयार्प्त अनुवूफलनशीलता है तब उसको अपने काम से संतुष्िट होगी। इससे उत्पन्न सकारात्मक भावनाएँ उसके समग्र जीवन समायोजन पर अच्छा प्रभाव डालेंगी। परामशर् भी एक ऐसा ही क्षेत्रा है जहाँ एक व्यक्ित को प्रवेश करने के लिए आत्म - निरीक्षण की आवश्यकता पड़ती है, जिसमंे वह अपनी अनुवूफलता और अपने आधारभूत कौशलों का मूल्यांकन करके देख सके कि वह इस व्यवसाय के लिए प्रभावी है या नहीं। परामशर् का अथर् एवं स्वरूप साक्षात्कार की योजना, सेवाथीर् एवं परामशर्दाता के व्यवहार का विश्लेषण तथा सेवाथीर् के उफपर पड़ने वाले विकासात्मक प्रभाव के निधार्रण के लिए परामशर् एक प्रणाली प्रस्तुत करता है। इस भाग में हम परामशर् से जुड़े संप्रत्ययों, वििायों एवं कौशलों का विवेचन करेंगे, जिसका उद्देश्य है कि वुफछ मूतर् योग्यताओं का विकास किया जा सके। एक परामशर्दाता इस बात में अभ्िारुचि रखता है कि वह सेवाथीर् की समस्याओं को उसके दृष्िटकोण और भावनाओं को ध्यान में रखकर समझ सके। इसमें समस्या से जुड़े वास्तविक तथ्य या वस्तुनिष्ठ तथ्य कम महत्वपूणर् होते हैं और यह अिाक महत्वपूणर् होता है कि सेवाथीर् द्वारा स्वीकार की गइर् भावनाएँ वेैफसी हैं, उनको लेकर काम किया जाए। इसमें व्यक्ित तथा वह समस्या को किस प्रकार परिभाष्िात करता है, इसको ध्यान में रखा जाता है। परामशर् में सहायतापरक संबंध होता है जिसमें सम्िमलित होता है वह जो मदद चाह रहा है, जो मदद दे रहा है या देने का इच्छुक है, जो मदद देने में सक्षम हो या प्रश्िाक्ष्िात हो और उस स्िथति में हो जहाँ मदद लेना और देना सहज हो ;चित्रा 9ण्2 देखेंद्ध। परामशर् के निम्नलिख्िात तत्व उसके सभी प्रमुख सै(ांतिक उपागमों में समान होते हैं - 1ण् परामशर् में सेवाथीर् के विचारों, भावनाओं एवं ियाओं के प्रति अनुिया करना सम्िमलित होता है। 2ण् परामशर्न में सेवाथीर् के प्रत्यक्षण एवं भावनाओं कीआधारभूत स्वीकृति होती है, बिना किसी मूल्यांकन मानकों के। 3ण् गोपनीयता एवं निजता परामशर् स्िथति के अत्यावश्यक संघटक हैं। वे भौतिक स्िथतियाँ जो इसकी गुणवता का संरक्षण करती हैं, महत्वपूणर् हंै। 4ण् परामशर् स्वैच्िछक होता है। यह तभी होता है जब कोइर् सेवाथीर् किसी परामशर्दाता के पास जाता है। एक परामशर्दाता सूचना प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार का बलप्रयोग नहीं करता है। 5ण् परामशर्दाता और सेवाथीर् दोनों इस प्रिया में वाचिक तथा अवाचिक संदेशों का आदान - प्रदान करते हैं। इसी कारण, चित्रा 9ण्2 परामशर् प्रिया के आवश्यक तत्व किसी परामशर्दाता की प्रभाविता के लिए संदेशों के प्रति अभ्िाज्ञता ;जानकारीद्ध और संवेदनशीलता अनिवायर् घटक हैं। परामशर् के मिथकों का खंडन ऽ परामशर् का तात्पयर् केवल सूचना देना नहीं होता है। ऽ परामशर् केवल सलाह देना नहीं होता है। ऽ किसी नौकरी या पाठ्यक्रम में चयन या स्थानन परामशर् देना नहीं होता है। ऽ परामशर् और साक्षात्कार समान नहीं हैं यद्यपि परामशर् में साक्षात्कार प्रिया का उपयोग किया जा सकता है। ऽ परामशर् के अंतगर्त अभ्िावृिायों, विश्वासों और व्यवहारों को अनुनय करके, भत्सर्ना करके, धमकी देकर या विवश करके प्रभावित करना नहीं आता है। प्रभावी संबंधों को विकसित करना अिाकतर लोग जो परामशर्दाता से मदद लेते हैं, उनके प्रभावी या संतोषजनक संबंध बेहद कम होते हैं या उनका पूरी तरह अभाव होता है। चूँकि व्यवहार में परिवतर्न अक्सर सामाजिक अवलंब या समथर्न के एक नेटववर्फ से आता है, इसके लिए जरूरी है कि सेवाथीर् दूसरे व्यक्ितयों से अच्छा संबंध विकसित करने पर ध्यान दें। परामशर् संबंध वह माध्यम है जिससे इसका प्रारंभ किया जा सकता है। हम सभी की तरह परामशर्दाता भी पूणर् नहीं होते हैं, लेकिन दूसरों की तुलना में स्वस्थ एवं सहायक संबंधों का विकास करने की विशेषताओं में प्रश्िाक्षण प्राप्त होते हैं। संक्षेप में, परामशर् में सेवाथीर् के लिए एक से अिाक परिणामों की अपेक्षा होती है, जो एक साथ ही घटित होते हैं। सेवाथीर् में होने वाले प्रभावी व्यवहार परिवतर्न बहुपक्षीय होते हैं। इसको इस रूप में देखा जा सकता है कि सेवाथीर् अिाक जिम्मेदारी ले, नइर् अंतदृर्ष्िट विकसित करे, विभ्िान्न प्रकार के व्यवहार करे तथा अिाक प्रभावी संबंध विकसित करने का प्रयास करे। प्रभावी सहायक की विशेषताएँ प्रश्िाक्ष्िात सहायक होने के कारण परामशर्दाता की जिम्मेदारी बनती है कि वह सुनिश्िचत करे कि उसके परामशर् से सेवाथीर् को लाभ हो तथा उसके चिकित्सापरक उद्देश्य हासिल हो सके। ज्यादातर स्िथतियों में, परामशर् प्रिया की सपफलता परामशर्दाता की योग्यता, कौशल, अभ्िावृति, व्यक्ितगत गुणों एवं उसके व्यवहार पर निभर्र करती है। इनमें से कोइर् भी या सभी परामशर् की प्रभाविता को बढ़ा सकते हैं या सहायता प्रक्रम को अप्रभावी बना सकते हैं। इस भाग में हम उन चार गुणों की चचार् करंेगे जो प्रभावी परामशर्दाता के साथ संबंिात होते हैं। इसमें सम्िमलित हैं - ;1द्ध प्रामाण्िाकता, ;2द्ध दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर, ;3द्ध तदनुभूति की योग्यता तथा ;4द्ध पुनवार्क्यविन्यास आइए इन गुणों को संक्षेप में देखें - ;1द्ध प्रामाण्िाकता - आपका अपने बारे में प्रत्यक्षण या अपनी छवि आपके ‘‘मैं’’ को बनाती है। यह स्व - प्रत्यक्ष्िात ‘मैं’ आपके विचारों, शब्दों, ियाओं, पोशाक और जीवन शैली के माध्यम से अभ्िाव्यक्त होता है। ये सभी आपके ‘मैं’ को दूसरों तक संप्रेष्िात करते हैं। जो आपके निकट अध्याय9 ऽ मनोवैज्ञानिक कौशलों का विकास संपवर्फ मंे आते हैं वे अपने लिए आपके बारे में अलग छवि या धारणा बनाते हंै और वे कभी - कभी इस छवि को आप तक पहुँचाते भी हैं। उदाहरण के लिए मित्रा आपको बताते हैं कि वे आपके बारे में क्या पसंद या नापसंद करते हैं। आपके माता - पिता या अध्यापक आपकी प्रशंसा या आलोचना करते हैं। आप जिनका सम्मान करते हैं वे भी आपका मूल्यांकन करते हैं। ये सामूहिक निणर्य, उन लोगों के द्वारा जिनका आप सम्मान करते हैं, इनको ‘दूसरे महत्वपूणर्’ भी कहा जा सकता है, एक ‘हम’ का विकास करते हैं। इस ‘हम’ में वह प्रत्यक्षण सम्िमलित है जो दूसरे हमारे बारे में बताते हैं। यह प्रत्यक्षण आपके स्व - प्रत्यक्ष्िात ‘मैं’ जैसा भी हो सकता है या उससे भ्िान्न भी हो सकता है। जहाँ तक आप अपने स्वयं के बारे में अपने प्रत्यक्षण तथा दूसरों के अपने बारे में प्रत्यक्षण के प्रति जितने जानकार एवं सजग हैं, इससे आपकी आत्म - जागरूकता का पता चलता है। प्रामाण्िाकता का अथर् है कि आपके व्यवहार की अभ्िाव्यक्ित आपके मूल्यों, भावनाओं एवं आंतरिक आत्मबिंब या आत्म - छवि ;ेमस.िपउंहमद्ध के साथ संगत होती है। ;2द्ध दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर - एक उपबोध्य ;बवनदेमसममद्ध - परामशर्दाता संबंध में एक अच्छा संबंध अभ्िाव्यक्ित की स्वतंत्राता को प्रोत्साहित करता है। यह इसस्वीकृति को परावतिर्त करता है कि दोनों की भावनाएँ महत्वपूणर् हंै। हमें याद रखना चाहिए कि जब हम नए संबंध बनाते हैं तब हम एक अनिश्िचतता की भावना एवं दुश्िंचता का अनुभव करते हैं। इन भावनाओं को कम किया जा सकता है अगर परामशर्दाता सेवाथीर् जैसा महसूस कर रहा हो उसके बारे में एक सकारात्मक आदर का भाव प्रदश्िार्त करता है। दूसरांे के प्रति सकारात्मक आदर का भाव दिखाने के लिए निम्नलिख्िात दिशा - निदेर्शों को ध्यान में रखना चाहिए - ;कद्ध जब आप बोल रहे हों तब ‘मैं’ संदेश का उपयोग की आदत बनाए न कि ‘तुम’ संदेश की। इसका एक उदाहरण होगा, ‘मैं समझता हँू’ न कि ‘‘आपको/ तुमको नहीं चाहिए’’। ;खद्ध दूसरे व्यक्ित को अनुिया तभी दंे जब आप उसकी कही हुइर् बात को समझ लें। मनोविज्ञान ;गद्ध दूसरे व्यक्ित को यह स्वतंत्राता दें ताकि वह जैसा महसूस करता है वैसा बता सके। उसको टोके या बािात न करें। ;घद्ध यह मानकर न चलंे कि दूसरा यह जानता है कि आप क्या सोच रहे हैं। अपने को निदेर्श आधार के अनुसार ही व्यक्त करंे, अथार्त उस संदभर् के अनुसार जिसमें बातचीत चल रही है। ;ड.द्ध स्वयं या दूसरांे के ऊपर कोइर् लेबल न लगाएँ ;उदारहणाथर्, फ्तुम एक अंतमुर्खी व्यक्ित होय् इत्यादिद्ध। ;3द्ध तदनुभूति - यह एक सवार्िाक महत्वपूणर् कौशल है जो परामशर्दाता के पास होना चाहिए। जैसा कि आप अध्याय 5 में पढ़ चुके हैं कि तदनुभूति एक परामशर्दाता की वह योग्यता है जिसके द्वारा वह सेवाथीर् की भावनाओं को उसके ही परिप्रेक्ष्य से समझता है। यह दूसरे के जूते में पैर डालने जैसा है, जिसके द्वारा आप दूसरों की तकलीपफ़परामशर् के कौशलों को सीखते हुए आपके लिए यह एवं पीड़ा को महसूस करके समझ सकते हैं। सहानुभूति एवं तदनुभूति में अंतर होता है। सहानुभूति में आप रक्षक की भूमिका निभाते हैं। आपको लगता है कि आपकी दया की किसी को शरूरत है। ;4द्ध पुनवार्क्यविन्यास - इस कौशल की चचार् संप्रेषण वाले भाग में पहले ही की जा चुकी है। आपको याद होगा कि इसमें परामशर्दाता उस योग्यता का परिचय देता है कि वैफसे सेवाथीर् की कही हुइर् बातों को या भावनाओं को विभ्िान्न शब्दों का उपयोग करते हुए कहा जा सकता है। परामशर् के नैतिक सि(ांत हाल के वषो± में, परामशर्दाताओं ने अपनी व्यावसायिक अनन्यता या पहचान विकसित करने के लिए वुफछ महत्वपूणर् कदम उठाए हैं। किसी भी व्यावसायिक समूह के लिए यह महत्वपूणर् मानदंड है कि वह अपने काम के लिए आवश्यक नैतिक मानकों को विकसित करे। सामाजिक कायर्कतार्, वैवाहिक परामशर्दाता, परिवारपरक चिकित्सक और मनोवैज्ञानिकों की वुफछ नीति संहिताएँ हैं। इन नैतिक मानकों एवं संहिताओं के प्रति जागरूकता अत्यंत महत्वपूणर् है क्योंकि परामशर् सेवा क्षेत्रा ;सेक्टरद्ध का महत्वपूणर् अंश है। इन नैतिक मानकों का पालन न करने की वििाक उपादेयताएँ होती हैं। प्रमुख पद जानना आवश्यक है कि सेवाथीर् - परामशर्दाता संबंध नैतिक आधारों पर ही निमिर्त होते हैं। अमरीकी मनोवैज्ञानिक संघ ;ए.पी.ए.द्ध ने वास्तविक नैदानिक स्िथतियों में व्यवहार एवं निणर्यन को नियमित करने के लिए नैतिक आचरण - संहिता बनाइर् है। परामशर् के अभ्यास से जुड़े वांछित परिणामों को पाने के लिए इन नैतिक दिशा - निदेर्शों का व्यावहारिक ज्ञान मददगार साबित होगा। अमरीकी मनोवैज्ञानिक संघ के अभ्यास संबंधी दिशा - निदेर्श निम्नलिख्िात हैं - ऽ नैतिक/व्यावसायिक आचरण - संहिता, मानक तथा दिशा - निदेर्शों का ज्ञानऋ संवििायों, नियमों एवं अिानियमों की जानकारी के साथ मनोविज्ञान के लिए शरूरी कानूनों की जानकारी भी आवश्यक है। ऽ विभ्िान्न नैदानिक स्िथतियों में नैतिक एवं वििाक मुद्दों को पहचानना और उनका विश्लेषण करना। ऽ नैदानिक स्िथतियों में अपनी अभ्िावृिायों एवं व्यवहार के नैतिक विमाओं को पहचानना और समझना। ऽ जब भी नैतिक मुद्दों का सामना हो तब उपयुक्त सूचनाओं एवं सलाह को प्राप्त करना। ऽ नैतिक मुद्दों से संबंिात उपयुक्त व्यावसायिक आग्रहिता का अभ्यास करना। अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान, मूल्यांकन कौशल, संज्ञानात्मक कौशल, सक्षमता, परामशर्, नैतिक पे्रक्षण, अंतरावैयक्ितक जागरूकता, अंतरावेशन एवं परामशर् कौशल, वस्तुनिष्ठता, मुक्त मानसिकता, समस्या समाधान कौशल, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, मनोवैज्ञानिक परीक्षण, परावतीर् या मननात्मक कौशल, आत्म - जागरूकता, संवेदनशीलता, विश्वासपरकशीलता। ऽ सामान्य एवं विश्िाष्ट कौशलों से मनोवैज्ञानिकों के लिए उन मूल सक्षमताओं के आधार निमिर्त होते हैं जिससे वे दायित्वयुक्त नैतिक व्यवहार करते हैं। किसी भी व्यावसायिक क्षेत्रा में प्रवेश करने के पूवर् मनोवैज्ञानिकों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे स्वयं को इन अपरिहायर् सक्षमताओं में प्रवीण करें। ऽ सामान्य कौशलों में बौिक एवं वैयक्ितक कौशल दोनों शामिल होते हैं। ये दोनों कौशल सभी व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक हैं, चाहे वे नैदानिक एवं स्वास्थ्य मनोविज्ञान के क्षेत्रा के हों, औद्योगिक/संगठनात्मक, सामाजिक, शैक्ष्िाक या पयार्वरणी मनोविज्ञान से संबंिात हों या एक सलाहकार की तरह कायर् कर रहे हों। ऽ विश्िाष्ट कौशल मनोवैज्ञानिक सेवाओं के क्षेत्रा के लिए मूल/आधारभूत कौशल हैं। उदाहरण के लिए नैदानिक स्िथतियों में कायर् करने वाले मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक है कि वे चिकित्सापरक हस्तक्षेप की विभ्िान्न तकनीकों, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन एवं परामशर् में प्रश्िाक्षण प्राप्त करेें। ऽ प्रभावी मनोवैज्ञानिक के रूप में विकसित होने के लिए, मनोवैज्ञानिक में सक्षमता, अखंडता, व्यावसायिक एवंवैज्ञानिक उत्तरदायित्व, लोगों के अिाकारों तथा मयार्दा के प्रति सम्मान की भावना आदि का होना आवश्यक है। ऽ प्रेक्षण कौशल भी आधारभूत कौशल हैं जिनका उपयोग मनोवैज्ञानिक व्यवहार के बारे में अंतदर्ृष्िट विकसित करनेके लिए एक प्रारंभ बिंदु के रूप में करते हैं। प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागमों में हैं - प्रकृतिवादी प्रेक्षण और सहभागी प्रेक्षण। ऽ संप्रेषण वह प्रिया है जिसके द्वारा अथर् का संचरण एक व्यक्ित से दूसरे व्यक्ित तक किया जाता है। अंतवैर्यक्ितक संप्रेषण के लिए वाचन और श्रवण दोनों वेंफद्रीय भूमिका रखते हैं। ऽ भाषा संप्रेषण के लिए आवश्यक है कि इसका उपयोग श्रोताओं की विशेषताओं को ध्यान में रखकर करना चाहिए। अवाचिक संकेत, जैसे - हावभाव, भंगिमाएँ, हाथों की गति आदि का भी उपयोग कर विचारों का संप्रेषण किया जाता है। ऽ एक उचित संदेश की रचना करना, पयार्वरणीय शोर को नियंत्रिात करना तथा प्रतिप्राप्ित देना वुफछ तरीके हैं जिनकेद्वारा प्रभावी संप्रेषण में होने वाली विकृतियों को कम किया जा सकता है। ऽ साक्षात्कार मुखोन्मुख ;आमने - सामने केद्ध वातार्लाप की प्रिया है। यह तीन अवस्थाओं में आगे बढ़ती है - प्रारंभ्िाक तैयारी, प्रश्न एवं उत्तर तथा समापन अवस्था। ऽ मनोवैज्ञानिक परीक्षण के कौशल विकसित करना अत्यंत महत्वपूणर् है क्योंकि परीक्षण में व्यक्ितयों एवं समूहों का मूल्यांकन अनेक उद्देश्यों से किया जाता है। इसके संचालन, अंकन तथा व्याख्या के लिए प्रश्िाक्षण आवश्यक है। ऽ परामशर् में सहायतापरक संबंध होता है, जिसमें सम्िमलित होता है वह जो मदद चाह रहा है तथा वह जो मदद देने का इच्छुक है। प्रभावी परामशर्दाता के लिए आवश्यक गुणों में ;1द्ध प्रामाण्िाकता सम्िमलित होते, ;2द्ध दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर, ;3द्ध तदनुभूति की योग्यता, तथा ;4द्ध पुनवार्क्यविन्यास हैं। 1ण् एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए कौन - कौन सी सक्षमताएँ आवश्यक होती हैं? 2ण् कौन - से सामान्य कौशल सभी मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक होते हैं? 3ण् संप्रेषण को परिभाष्िात कीजिए। संप्रेषण प्रिया का कौन - सा घटक सबसे महत्वपूणर् है? अपने उत्तर को प्रासंगिक उदाहरणों से पुष्ट कीजिए। 4ण् उन सक्षमताओं के समुच्चय का वणर्न कीजिए जिनको एक मनोवैज्ञानिक परीक्षण का संचालन करते समय अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। 5ण् परामशीर् साक्षात्कार का विश्िाष्ट प्रारूप क्या है? 6ण् परामशर् से आप क्या समझते हैं? एक प्रभावी परामशर्दाता की विशेषताओं का वणर्न कीजिए। 7ण् क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि एक प्रभावी परामशर्दाता होने के लिए उसका व्यावसायिक रूप से प्रश्िाक्ष्िात होना अनिवायर् है? अपने तको± के समथर्न में कारण प्रस्तुत कीजिए। 8ण् एक सेवाथीर् - परामशर्दाता संबंधों के नैतिक मानदंड क्या हंै? 9ण् अपने एक मित्रा के व्यक्ितगत जीवन के एक ऐसे पक्ष की पहचान कीजिए जिसेे वह बदलना चाहता है। अपने मित्रा की सहायता करने के लिए, मनोविज्ञान के एक विद्याथीर् के रूप में विचार करके उसकी समस्या के समाधान या निराकरण के लिए एक कायर्क्रम को प्रस्तावित कीजिए। वेब¯लक्स ूूूण्ंससचेलबीण्बवउ ूूूण्सपइतंतलण्नदपेंण्मकनण्ंनध्तमेवनतबमेध्ेनइरमबजध्बवनदेमसण्ंेच शैक्ष्िाक संकेत 1ण् अध्याय का प्रारंभ करते समय विद्याथ्िार्यों से जीवन के विभ्िान्न क्षेत्रों/पक्षों में मनोविज्ञान के बढ़ते अनुप्रयोगों ;उपयोगिताओंद्ध के बारे में पूछिए। 2ण् विभ्िान्न क्षेत्रों में कायर् कर रहे मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक कौशलों और सक्षमताओं पर विद्याथ्िार्यों को विचारावेश ;खुली बहसद्ध करने के लिए कहा जा सकता है। 3ण् अध्यापक वुफछ नवाचारी वििायों, जैसे - व्यक्ितवृतवृत्तांत तथा भूमिका - निवार्ह का उपयोग करके संप्रेषण कौशल, प्रभावी श्रवण एवं पुनवार्क्यविन्यास आदि का निदशर्न कर सकते हैं, विशेष रूप से इनको समझने में सहायक होगा।

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