इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप मनश्िचकित्सा की मूल प्रवृफति एवं प्रिया से परिचित हो सवेंफगे, इसका गुणविवेचन कर सवेंफगे कि लोगों की सहायता के लिए विभ्िान्न प्रकार की चिकित्सा होती है, अंतःक्षेप के मनोवैज्ञानिक रूपों के उपयोग को समझ सवेंफगे, तथा मानसिक विकार से ग्रसित लोगों को किस प्रकार पुनःस्थापित किया जा सकता है को जान सवेंफगे। मनश्िचकित्सा की प्रवृफति एवं प्रिया चिकित्सात्मक संबंध चिकित्सा के प्रकार सेवाथीर् के समस्या - निरूपण में अंतनिर्हित चरण ;बाॅक्स 5ण्1द्ध मनोगतिक चिकित्सा व्यवहार चिकित्सा विश्रांति की वििायाँ ;बाॅक्स 5ण्2द्ध संज्ञानात्मक चिकित्सा मानवतावादी - अस्ितत्वपरक चिकित्साविषयवस्तु जैव - आयुविर्ज्ञान चिकित्सा वैकल्िपक चिकित्सा मानसिक रोगियों का पुनःस्थापन प्रमुख पद सारांश समीक्षात्मक प्रश्न परियोजना विचार वेबलिंक्स शैक्ष्िाक संकेत इसके पूवर्वतीर् अध्याय में आप प्रमुख मनोवैज्ञानिक विकारों और उनके द्वारा रोगी एवं अन्य दूसरे लोगों को होने वाले कष्टों के बारे में पढ़ चुके हैं। इस अध्याय में आप रोगी की सहायता के लिए मनश्िचकित्सकों द्वारा प्रयुक्त विभ्िान्न चिकित्सापरक वििायों के बारे में जानेंगे। मनश्िचकित्सा कइर् प्रकार की होती है। वुफछ चिकित्सा आत्म - अवगाहन प्राप्त करने पर ध्यान देती हैऋ अन्य दूसरी चिकित्सा अपेक्षावृफत अिाक िया - अभ्िाविन्यस्त होती है। रोगी को अपनी कमशोर होती हुइर् स्िथति से उबरने में किस प्रकार मदद की जाए, सभी उपागम इसी मूल विषय पर टिके हैं। किसी रोगी के लिए एक चिकित्सा उपागम की प्रभाविता कइर् कारकों पर निभर्र करती है, जैसे - विकार की गंभीरता, दूसरों के द्वारा अनुभव किया जाने वाला कष्ट तथा समय, प्रयास और धन की उपलब्धता इत्यादि।सभी चिकित्सा उपागमों की प्रकृति सहायता करने वाली और सुधार करने वाली होती है। सभी उपागमों में चिकित्सक और रोगी या सेवाथीर् के बीच में अंतवैर्यक्ितक संबंध होता है। वुफछ की प्रवृफति निदेशात्मक होती है, जैसे - मनोगतिक जबकि वुफछ की अनिदेशात्मक, जैसे - व्यक्ित - वेंफदि्रत चिकित्सा। इस अध्याय में हम मनश्िचकित्सा के वुफछ प्रमुख रूपों की संक्षेप में चचार् करेंगे। मनश्िचकित्सा की प्रवृफति एवं प्रिया मनश्िचकित्सा उपचार चाहने वाले या सेवाथीर् तथा उपचार करने वाले या चिकित्सक के बीच में एक ऐच्िछक संबंध है। इस संबंध का उद्देश्य उन मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करना होता है जिनका सामना सेवाथीर् द्वारा किया जा रहा हो। यह संबंध सेवाथीर् के विश्वास को बनाने में सहायक होता है जिससे वह अपनी समस्याओं के बारे में मुक्त होकर चचार् कर सके। मनश्िचकित्सा का उद्देश्य दुरनुवूफलक व्यवहारों को बदलना, वैयक्ितक कष्ट की भावना को कम करना तथा रोगी को अपने पयार्वरण से बेहतर ढंग से अनुवूफलन करने में मदद करना है। अपयार्प्त वैवाहिक, व्यावसायिक तथा सामाजिक समायोजन की यह आवश्यकता होती है कि व्यक्ित के वैयक्ितक पयार्वरण में परिवतर्न किए जाएँ। सभी मनश्िचकित्सात्मक उपागमों में निम्न अभ्िालक्षण पाए जाते हैं - ;1द्ध चिकित्सा के विभ्िान्न सि(ांतों में अंतनिर्हित नियमों का व्यवस्िथत या क्रमब( अनुप्रयोग होता है, ;2द्ध केवल वे व्यक्ित, जिन्होंने वुफशल पयर्वेक्षण में व्यावहारिक प्रश्िाक्षण प्राप्त किया हो, मनश्िचकित्सा कर सकते हैं, हर कोइर् नहीं। एक अप्रश्िाक्ष्िात व्यक्ित अनजाने में लाभ के बजाय हानि अिाक पहँुचा सकता है, ;3द्ध चिकित्सात्मक स्िथतियों में एक चिकित्सक और एक सेवाथीर् होता है जो अपनी संवेगात्मक समस्याओं के लिए सहायता चाहता है और प्राप्त करता है ;चिकित्सात्मक प्रिया में यही व्यक्ित ध्यान का मुख्य वेंफद्र होता हैद्ध तथा ;4द्ध इन दोनों व्यक्ितयों, चिकित्सक एवं सेवाथीर्, के बीच की अंतःिया के परिणामस्वरूप एक चिकित्सात्मक संबंध का निमार्ण एवं उसका सुदृढ़ीकरण होता है। यह एक गोपनीय, अंतवैर्यक्ितक एवं गत्यात्मक संबंध होता है। यही मानवीय संबंध किसी भी मनोवैज्ञानिक चिकित्सा का वेंफद्र होता है तथा यही परिवतर्न का माध्यम बनता है। सभी मनश्िचकित्साओं के उद्देश्य निम्नलिख्िात लक्ष्यों में वुफछ या सब होते हैं - ;1द्ध सेवाथीर् के सुधार के संकल्प को प्रबलित करना। ;2द्ध संवेगात्मक दबाव को कम करना। ;3द्ध सकारात्मक विकास के लिए संभाव्यताओं को प्रकट करना। ;4द्ध आदतों में संशोधन करना। ;5द्ध चिंतन के प्रतिरूपों में परिवतर्न करना। ;5द्ध आत्म - जागरूकता को बढ़ाना। ;6द्ध अंतवैर्यक्ितक संबंधों एवं संप्रेषण में सुधार करना। ;7द्ध निणर्यन को सुकर बनाना। ;8द्ध जीवन में अपने विकल्पों के प्रति जागरूक होना। ;9द्ध अपने सामाजिक पयार्वरण से एक सजर्नात्मक एवं आत्म - जागरूक तरीके से संबंिात होना। चिकित्सात्मक संबंध सेवाथीर् एवं चिकित्सक के बीच एक विशेष संबंध को चिकित्सात्मक संबंध या चिकित्सात्मक मैत्राी कहा जाता है। यह न तो एक क्षण्िाक परिचय होता है और न ही एक स्थायी एवं टिकाऊ संबंध। इस चिकित्सात्मक मैत्राी के दो मुख्य घटकहोते हैं। पहला घटक इस संबंध की संविदात्मक प्रकृति है, जिसमें दो इच्छुक व्यक्ित, सेवाथीर् एवं चिकित्सक, एक ऐसी साझेदारी या भागीदारी में प्रवेश करते हैं जिसका उद्देश्य सेवाथीर् की समस्याओं का निराकरण करने में उसकी मदद करना होता है। चिकित्सात्मक मैत्राी का दूसरा घटक है - चिकित्सा की सीमित अविा। यह मैत्राी तब तक चलती है जब तक सेवाथीर् अपनी समस्याओं का सामना करने में समथर् न हो जाए तथा अपने जीवन का नियंत्राण अपने हाथ में न ले ले। इस संबंध की कइर् अनूठी विश्िाष्टताएँ हैं। यह एक विश्वास तथा भरोसे पर आधारित संबंध है। उच्चस्तरीय विश्वास सेवाथीर् को चिकित्सक के सामने अपना बोझ हलका करने तथा उसके सामने अपनी मनोवैज्ञानिक और व्यक्ितगत समस्याओं को विश्वस्त रूप से बतलाने में समथर् बनाता है। चिकित्सकसेवाथीर् के प्रति अपनी स्वीकृति, तदनुभूति, सच्चाइर् और गमर्जोशी दिखाकर इसे बढ़ावा देता है। चिकित्सक अपने शब्दों और व्यवहारों से यह संप्रेष्िात करता है कि वह सेवाथीर् का मूल्यांकन नहीं कर रहा है तथा वह सेवाथीर् के प्रति अपनी इन सकारात्मक भावनाओं को दिखाता रहेगा चाहे सेवाथीर् उसके प्रति अश्िाष्ट व्यवहार क्यों न करे या पूवर् में की गइर् या सोची गइर् ‘गलत’ बातों को क्यों न बतलाएं। यह अशतर् सकारात्मक आदर ;नदबवदकपजपवदंस चवेपजपअम तमहंतकद्ध की भावना है जो चिकित्सक की सेवाथीर् के प्रति होती है। चिकित्सक की सेवाथीर् के प्रति तदनुभूति होती है। तदनुभूति ;मउचंजीलद्ध सहानुभूति ;ेलउचंजीलद्ध तथा किसी दूसरे व्यक्ित की स्िथति की बौिक समझ से भ्िान्न होती है। सहानुभूति में व्यक्ित को दूसरे के कष्ट के प्रति दया और करुणा तो होती है विंफतु दूसरे व्यक्ित की तरह वह अनुभव नहीं कर सकता। बौिक समझ भावशून्य इस आशय से होती है कि कोइर् व्यक्ित दूसरे व्यक्ित की तरह अनुभव कर पाने में असमथर् होता है और न ही वह सहानुभूति का अनुभव कर पाता है। इसके विपरीत तदनुभूति में एक व्यक्ित दूसरे व्यक्ित की दुदर्शा को समझ सकता है तथा उसी की तरह अनुभव कर सकता है। इसका तात्पयर् यह हुआ कि दूसरे व्यक्ित के परिप्रेक्ष्य से या उसके स्थान पर स्वयं को रखकर बातों को समझना। तदनुभूति चिकित्सात्मक संबंध को समृ( बनाती है तथा इसे एक स्वास्थ्यकर संबंध में परिवतिर्त करती है। चिकित्सात्मक मैत्राी के लिए यह भी आवश्यक है कि चिकित्सक सेवाथीर् द्वारा अभ्िाव्यक्त किए गए अनुभवों, घटनाओं, भावनाओं तथा विचारों के प्रति नियमब( गोपनीयता का अवश्य पालन करे। चिकित्सक को सेवाथीर् के विश्वास और भरोसे का किसी भी प्रकार से कभी भी अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए। अंततः, यह एक व्यावसायिक संबंध है और इसे ऐसा ही रहना चाहिए। चिकित्सा के प्रकार यद्यपि सभी मनश्िचकित्साओं का उद्देश्य मानव कष्टों का निराकरण तथा प्रभावी व्यवहार को बढ़ावा देना होता है तथापि वे संप्रत्ययों, वििायों और तकनीक में एक - दूसरे से बहुत भ्िान्न होते हैं। मनश्िचकित्सा को तीन व्यापक समूहों मेंवगीर्कृत किया जा सकता है, जैसे कि मनोगतिक, व्यवहार तथा अस्ितत्वपरक मनश्िचकित्साएँ। कालानुक्रम रूप से मनोगतिक चिकित्सा का आविभार्व पहले हुआ, तत्पश्चात व्यवहार चिकित्सा जबकि अस्ितत्वपरक चिकित्साओं जिन्हें तीसरी शक्ित भी कहा जाता है का आविभार्व सबसे अंत में हुआ। मनश्िचकित्सा का यह वगीर्करण निम्न प्राचलों ;चंतंउमजमतेद्ध पर आधारित है - 1ण् क्या कारण है, जिसने समस्या को उत्पन्न किया? मनोगतिक चिकित्सा के अनुसार अंतःमनोद्वंद्व, अथार्त व्यक्ित के मानस में विद्यमान द्वंद्व, मनोवैज्ञानिक समस्याओंका ड्डोत होते हैं। व्यवहार चिकित्सा के अनुसार मनोवैज्ञानिक समस्याएँ व्यवहार एवं संज्ञान के दोषपूणर् अिागम के कारण उत्पन्न होती हैं। अस्ितत्वपरक चिकित्सा की अभ्िाधारणा है कि अपने जीवन और अस्ितत्व के अथर् से संबंिात प्रश्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण होते हैं। 2ण् कारण का प्रादुभार्व वैफसे हुआ? मनोगतिक चिकित्सा में बाल्यावस्था की अतृप्त इच्छाएँ तथा बाल्यावस्था के अनसुलझे भय अंतःमनोद्वंद्व को उत्पन्न करते हैं। व्यवहार चिकित्सा की अभ्िाधारणा है कि दोषपूणर् अनुबंधन प्रतिरूप, दोषपूणर् अिागम तथा दोषपूणर् चिंतन एवं विश्वास दुरनुवूफलक व्यवहारों को उत्पन्न करते हैं जो बाद में मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण बनते हैं। अस्ितत्वपरक चिकित्सा वतर्मान कोमहत्त्व देती है। यह व्यक्ित के अकेलेपन, विसंबंधन ;ंसपमदंजपवदद्ध, अपने अस्ितत्व की व्यथर्ता के बोध इत्यादि से जुड़ी वतर्मान भावनाएँ हैं जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण हैं। 3ण् उपचार की मुख्य वििा क्या है? मनोगतिक चिकित्सा मुक्त साहचयर् वििा और स्वप्न को बताने की वििा का उपयोग सेवाथीर् की भावनाओं और विचारों को प्राप्त करने के लिए करती है। इस सामग्री की व्याख्या सेवाथीर् के समक्ष की जाती है ताकि इसकी मदद से वह अपने द्वंद्वों का सामना और समाधान कर अपनी समस्याओं पर विजय पा सके। व्यवहार चिकित्सा दोषपूणर् अनुबंधन प्रतिरूप की पहचान कर वैकल्िपक व्यवहारात्मक प्रासंगिकता ;इमींअपवनतंस बवदजपदहमदबपमेद्ध नियत करती है जिससे व्यवहार में सुधार हो सके। इस प्रकार की चिकित्सा में प्रयुक्त संज्ञानात्मक वििायाँ सेवाथीर् के दोषपूणर् चिंतन प्रतिरूप को चुनौती देकर उसे अपने मनोवैज्ञानिक कष्टों पर विजय पाने में मदद करती हैं। अस्ितत्वपरक चिकित्सा एक चिकित्सात्मक पयार्वरण प्रदान करती है जो सकारात्मक, स्वीकारात्मक तथा अनिणर्यात्मक होता है। सेवाथीर् अपनी समस्याओं के बारे में बात कर सकता है तथाचिकित्सक एक सुकरकत्तार् की तरह कायर् करता है। सेवाथीर् व्यक्ितगत संवृि की प्रिया के माध्यम से समाधान तक पहुँचता है। 4ण् सेवाथीर् और चिकित्सक के बीच चिकित्सात्मक संबंध कीप्रकृति क्या होती है? मनोगतिक चिकित्सा का मानना है कि चिकित्सक सेवाथीर् की अपेक्षा उसके अंतःमनोद्वंद्व को श्यादा अच्छी तरह समझता है इसलिए वह ;चिकित्सकद्ध सेवाथीर् के विचारों और भावनाओं की व्याख्या उसके लिए करता है जिससे वह ;सेवाथीर्द्ध उनको समझ सके। व्यवहार चिकित्सा का मानना है कि चिकित्सक सेवाथीर् के दोषपूणर् व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को पहचानने में समथर् होता है। इसवेफ आगे व्यवहार चिकित्सा का यह भी मानना है कि चिकित्सक उचित व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को जानने में समथर् होता है जो सेवाथीर् के लिए अनुवूफली होगा। मनोगतिक और व्यवहार चिकित्सा दोनों का मानना है कि चिकित्सक सेवाथीर् की समस्याओं के समाधान तक पहुँचने में समथर् होते हैं। इन चिकित्साओं के विपरीत अस्ितत्वपरक चिकित्सा इस बात पर बल देती है कि चिकित्सक केवल एक गमर्जोशी भरा और तदनुभूतिक संबंध प्रदान करता है,जिसमें सेवाथीर् अपनी समस्याओं की प्रकृति और कारण स्वयं अन्वेषण करने में सुरक्ष्िात महसूस करता है। 5ण् सेवाथीर् को मुख्य लाभ क्या है? मनोगतिक चिकित्सा संवेगात्मक अंतदर्ृष्िट को महत्वपूणर् लाभ मानती है जो सेवाथीर् उपचार के द्वारा प्राप्त करता है। संवेगात्मक अंतदृर्ष्िट तब उपस्िथत मानी जाती है जब सेवाथीर् अपने द्वंद्वों को बौिक रूप से समझता हैऋ द्वंद्वों को संवेगात्मक रूप से स्वीकार करने में समथर् होता है और द्वंद्वों की ओर अपने संवेगों को परिवतिर्त करने में समथर् होता है। इस संवेगात्मक अंतदृर्ष्िट के परिणामस्वरूप सेवाथीर् के लक्षण दूर होते हैं तथा कष्ट कम हो जाते हैं। व्यवहार चिकित्सा दोषपूणर् व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को अनुवूफली प्रतिरूपों में बदलने को उपचार का मुख्य लाभ मानती है। अनुवूफली या स्वस्थ व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को स्थापित करने से कष्ट में कमी तथा लक्षणों का दूर होना सुनिश्िचत होता है। मानवतावादी चिकित्सा व्यक्ितगत संवृि को मुख्य लाभ मानती है। व्यक्ितगत संवृि अपने बारे में और अपनी आकांक्षाओं, संवेगों तथा अभ्िाप्रेरकों के बारे में बढ़ती समझ प्राप्त करने की प्रिया है। 6ण् उपचार की अविा क्या है? क्लासिकी मनोविश्लेषण की अविा कइर् वषो± तक की हो सकती है। हालाँकि मनोगतिक चिकित्सा के कइर् आधुनिक रूपांतर 10दृ15 सत्रों में पूरे हो जाते हैं। व्यवहार और संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा तथा अस्ितत्वपरक चिकित्सा संक्ष्िाप्त होती हैं तथा वुफछ महीनों में ही पूरी हो जाती हैं। इस प्रकार विभ्िान्न प्रकार की मनश्िचकित्सा बहुविध प्राचलों पर भ्िान्न होती हैं। तथापि वे सभी मनोवैज्ञानिक कष्टों का उपचार मनोवैज्ञानिक उपायों से प्रदान करने की समान वििा अपनाती हैं। चिकित्सक, चिकित्सात्मक संबंध और चिकित्सा की प्रिया सेवाथीर् में परिवतर्न के कारक बन जाते हैं जिससे मनोवैज्ञानिक कष्ट का उपशमन होता है। मनश्िचकित्सा की प्रिया का प्रारंभ सेवाथीर् की समस्या के निरूपण से होता है। सेवाथीर् के समस्या - निरूपण में अंतनिर्हित चरण बाॅक्स 5ण्1 में दिए गए हैं। आगामी खंडों में पूवर् में उल्िलख्िात मनश्िचकित्सा की तीन प्रमुख व्यवस्थाओं में से प्रत्येक की प्रतिनििा - चिकित्सा के बारे में व्याख्या की गइर् है। मनोगतिक चिकित्सा जैसा कि आप पहले पढ़ चुके हैं मनोगतिक चिकित्साजिसका प्रतिपादन सिगमंड Úायड ;ैपहउनदक थ्तमनकद्ध द्वारा किया गया, मनश्िचकित्सा का सबसे प्राचीन रूप है। उनके घनिष्ठ सहयोगी कालर् युंग ;ब्ंतस श्रनदहद्ध ने इसमें संशोधन किया जिसे वैश्लेष्िाक मनश्िचकित्सा के रूप में जानागया। बाद में Úाॅयड के उत्तरािाकारियों ने जो नव - Úाॅयडवादी के नाम से जाने जाते हैं, क्लासिकी मनोगतिक चिकित्सा के अपने रूपांतर स्थापित किए। मोटे तौर पर, मनोगतिक चिकित्सा ने मानस की संरचना, मानस के विभ्िान्न घटकों के मध्यगतिकी और मनोवैज्ञानिक कष्ट के ड्डोतों का संप्रत्ययीकरण किया है। आप इन संप्रत्ययों को ‘आत्म एवं व्यक्ितत्व’ तथा ‘मनोवैज्ञानिक विकार’ के अध्यायों में पहले ही पढ़ चुके हैं। मनोगतिक चिकित्सा में उपचार की वििा, उपचार के चरण,चिकित्सात्मक संबंध की प्रकृति तथा प्रत्याश्िात परिणाम की व्याख्या नीचे की गइर् ह।ैअंतःमनोद्वंद्व के स्वरूप को बाहर निकालने की वििायाँ चूँकि मनोगतिक उपागम अंतःमनोद्वंद्व को मनोवैज्ञानिक विकारों का मुख्य कारण समझता है अतः उपचार में पहला चरण इसी अंतःमनोद्वंद्व को बाहर निकालना है। मनोविश्लेषण ने अंतःमनोद्वंद्व को बाहर निकालने के लिए दो महत्वपूणर् वििायों मुक्त साहचयर् ;तिमम ंेेवबपंजपवदद्ध वििा तथा स्वप्न व्याख्या ;कतमंउ पदजमतचतमजंजवदद्ध वििा का आविष्कार किया। मुक्त साहचयर् वििा सेवाथीर् की समस्याओं को समझने की प्रमुख वििा है। जब एक बार चिकित्सात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और सेवाथीर् आरामदेह महसूस करने लगता है तब चिकित्सक उससे कहता है कि वह स्तरण पटल ;बवनबीद्ध पर लेट जाए, अपनी आँखों को बंद कर ले और मन में जो वुफछ भी आए उसे बिना किसी अवरोधन या काट - छाँट के बताने को कहता है। सेवाथीर् को एक विचार को दूसरे विचार से मुक्त रूप से संब( करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और इस वििा को मुक्त साहचयर् वििा कहते हैं। जब सेवाथीर् एक आरामदायक और विश्वसनीय वातावरण में मन में जो वुफछ भी आए बोलता है तब नियंत्राक पराहम् तथा सतवर्फ अहं को प्रसुप्तावस्था में रखा जाता है। चूँकि चिकित्सक बीच में हस्तक्षेप नहीं करता इसलिए विचारों का मुक्त प्रवाह, अचेतन मन की इच्छाएँ और द्वंद्व जो अहं द्वारा दमित किए जाते रहे हों वे सचेतन मन में प्रकट होने लगते हैं। सेवाथीर् का यह मुक्त बिना काट - छाँटवाला शाब्िदक वृत्तांत सेवाथीर् के अचेतन मन की एक ख्िाड़की है जिसमें अभ्िागमन का चिकित्सक को अवसर मिलता है। इस तकनीक के साथ ही साथ सेवाथीर् को निद्रा से जागने पर अपने स्वप्नों को लिख लेने को कहा जाता है। मनोविश्लेषक इन स्वप्नों को अचेतन मन में उपस्िथत अतृप्त इच्छाओं के प्रतीक के रूप में देखता है। स्वप्न की प्रतिमाएँ प्रतीक हैं जो अंतःमानसिक शक्ितयों का संकेतक होती हैं। स्वप्न प्रतीकों का उपयोग करते हैं क्योंकि वे अप्रत्यक्ष रूप से अभ्िाव्यक्त होते हैं इसलिए अहं को सतवर्फ नहीं करते। यदि अतृप्त इच्छाएँ प्रत्यक्ष रूप से अभ्िाव्यक्त की जाएँ तो सदैव सतवर्फ अहं उन्हें दमित कर देगा जो पुनः दुश्िंचता का कारण बनेगा। इन प्रतीकों की व्याख्या अनुवाद की एकस्वीकृत परंपरा के अनुसार की जाती है जो अतृप्त इच्छाओं तथा द्वंद्वों के संकेतक होते हैं। उपचार की प्रकारता अन्यारोपण ;जतंदेमितमदबमद्ध तथा व्याख्या या निवर्चन ;पदजमतचतमजंजपवदद्ध रोगी का उपचार करने के उपाय हैं। जैसे ही अचेतन शक्ितयाँ उपरोक्त मुक्त साहचयर् एवं स्वप्न व्याख्या वििायों द्वारा सचेतन जगत में लाइर् जाती हैं, सेवाथीर् चिकित्सक की अपने अतीत सामान्यतः बाल्यावस्था के आप्त व्यक्ितयों के रूप में पहचान करने लगता है। चिकित्सक को एक दंड देने वाले पिता या उपेक्षा करने वाली माँ के रूप में देखा जा सकता है। चिकित्सक एक अनिणर्यात्मक तथापिअनुज्ञापक अभ्िावृिा बनाए रखता है और सेवाथीर् को सांवेगिक पहचान स्थापित करने की इस प्रिया को जारी रखने की अनुमति देता है। यही अन्यारोपण की प्रिया है। चिकित्सक इस प्रिया को प्रोत्साहन देता है क्योंकि इससे उसे सेवाथीर् के अचेतन द्वंद्वों को समझने में मदद मिलती है। सेवाथीर् अपनी वुंफठा, क्रोध, भय और अवसाद, जो उसने अपने अतीत में उस व्यक्ित के प्रति अपने मन में रखे थी लेकिन उस समय उनकी अभ्िाव्यक्ित नहीं कर पाया था, को चिकित्सक के प्रति व्यक्त करने लगता है। चिकित्सक वतर्मान में उस व्यक्ित का स्थानापन्न बन जाता है। इस अवस्था को अन्यारोपण तंत्रिाकाताप ;जतंदेमितमदबम दमनतवेपेद्ध कहते हैं। एक पूणर् विकसित अन्यारोपण तंत्रिाकाताप चिकित्सक को सेवाथीर् के द्वारा सहे जा रहे अंतःमनोद्वंद्व के स्वरूप के प्रति अभ्िाज्ञ बनाता है। सकारात्मक अन्यारोपण ;चवेपजपअम जतंदेमितमदबमद्ध में सेवाथीर् चिकित्सक की पूजा करने लगता है या उससे प्रेम करने लगता है और चिकित्सक का अनुमोदन चाहता है। नकारात्मक अन्यारोपण ;दमहंजपअम जतंदेमितमदबमद्ध तब प्रदश्िार्त होता है जब सेवाथीर् में चिकित्सक के प्रति शत्राुता, क्रोध और अमषर् या अप्रसन्नता की भावना होती है। अन्यारोपण की प्रिया में प्रतिरोध ;तमेपेजंदबमद्ध भी होता है। चूँकि अन्यारोपण की प्रिया अचेतन इच्छाओं और द्वंद्वों को अनावृत करती है, जिससे कष्ट का स्तर बढ़ जाता है इसलिए सेवाथीर् अन्यारोपण का प्रतिरोध करता है। इस प्रतिरोध के कारण अपने आपको अचेतन मन की कष्टकर स्मृतियों के पुनःस्मरण से बचाने के लिए सेवाथीर् चिकित्सा की प्रगति का विरोध करता है। प्रतिरोध सचेतन और अचेतन दोनों हो सकता है। सचेतन प्रतिरोध तब होता है जब सेवाथीर् जान - बूझकर किसी सूचना को छिपाता है। अचेतन प्रतिरोध तब उपस्िथत माना जाता है जब सेवाथीर् चिकित्सा सत्रा के दौरान मूक या चुप हो जाता है, तुच्छ बातों का पुनःस्मरण करता है विंफतु संवेगात्मक बातों का नहीं, नियोजित भेंट में अनुपस्िथत होता है तथा चिकित्सा सत्रा के लिए देर से आता है। चिकित्सक बार - बार इसे सेवाथीर् के सामने रखकर तथा दुश्िंचता, भय, शमर् जैसे संवेगों को उभार कर, जो इस प्रतिरोध के कारण हैं, इस प्रतिरोध पर विजय प्राप्त करता है। निवर्चन मूल युक्ित है जिससे परिवतर्न को प्रभावित किया जाता है। प्रतिरोध ;बवदतिवदजंजपवदद्ध एवं स्पष्टीकरण ;बसंतपपिबंजपवदद्ध निवर्चन की दो विश्लेषणात्मक तकनीक हैं। प्रतिरोध में चिकित्सक सेवाथीर् के किसी एक मानसिक पक्ष की ओर संकेत करता है जिसका सामना सेवाथीर् को अवश्य करना चाहिए। स्पष्टीकरण एक प्रिया है जिसके माध्यम से चिकित्सक किसी अस्पष्ट या भ्रामक घटना को वेंफद्रबिंदु में लाता है। यह घटना के महत्वपूणर् विस्तृत वणर्न को महत्वहीन वणर्न से अलग करके तथा विश्िाष्टता प्रदान करके किया जाता है। निवर्चन एक अिाक सूक्ष्म प्रिया है। यह मनोविश्लेषण का श्िाखर माना जाता है। चिकित्सक मुक्त साहचयर्, स्वप्न व्याख्या, अन्यारोपण तथा प्रतिरोध की प्रिया में अभ्िाव्यक्त अचेतन सामग्री का उपयोग सेवाथीर् को अभ्िाज्ञ बनाने के लिए करता है कि किन मानसिक अंतवर्स्तुओं एवं द्वंद्वों ने वुफछ घटनाओं, लक्षणों तथा द्वंद्वों को उत्पन्न किया है। निवर्चन बाल्यावस्था में भोगे हुए वंचन या अंतःमनोद्वंद्व पर वेंफित हो सकता है। प्रतिरोध, स्पष्टीकरण तथा निवर्चन को प्रयुक्त करनेकी पुनरावृत्त प्रिया को समाकलन कायर् ;ूवतापदह जीतवनहीद्ध कहते हैं। समाकलन कायर् रोगी को अपनेआपको और अपनी समस्या के ड्डोत को समझने में तथा बाहर आइर् सामग्री को अपने अहं में समाकलित करने में सहायता करता है। समाकलन कायर् का परिणाम है अंतदर्ृष्िट ;पदेपहीजद्ध। अंतदृर्ष्िट कोइर् आकस्िमक घटना नहीं है बल्िक एक क्रमिक प्रिया है जहाँ अचेतन स्मृतियाँ लगातार सचेतन अभ्िाज्ञता में समाकलित होती रहती हैंऋ ये अचेतन घटनाएँ तथा स्मृतियाँ अन्यारोपण में पुनःअनुभूत होती हंै और समाकलित की जाती हैं। जैसे यह प्रिया चलती रहती है सेवाथीर् बौिक एवं सांवेगिक स्तर पर अपने आपको बेहतर समझने लगता है और अपनी समस्याओं और द्वंद्वों के बारे में अंतदृर्ष्िट प्राप्त करता है। बौिक समझ बौिक अंतदृर्ष्िट है। सांवेगिक समझ भूतकाल की अप्रीतिकर घटनाओं के प्रति अपनी अविवेकी प्रतििया की स्वीवृफति, सांवेगिक रूप से परिवतर्न की तत्परता तथा परिवतर्न करना सांवेगिक अंतदृर्ष्िट है। अंतदृर्ष्िट चिकित्सा का अंतिम बिंदु है जब सेवाथीर् अपने बारे में एक नइर् समझ प्राप्त कर चुका होता है। बदले में भूतकाल के द्वंद्व, रक्षा युक्ितयाँ और शारीरिक लक्षण भी नहीं रह जाते तथा सेवाथीर् मनोवैज्ञानिक रूप से एक स्वस्थ व्यक्ित हो जाता है। इस अवस्था पर मनोविश्लेषण समाप्त कर दिया जाता है। उपचार की अविा सप्ताह में चार - पाँच दिनों तक रोज एक घंटे के सत्रा के साथ मनोविश्लेषण कइर् वषो± तक चल सकता है। यह एक गहन उपचार है। उपचार में तीन अवस्थाएँ ;जीतमम ेजंहमेद्ध होती हैं। पहली अवस्था प्रारंभ्िाक अवस्था है। सेवाथीर् नित्यकमो± से परिचित हो जाता है, विश्लेषक से एक चिकित्सात्मक संबंध स्थापित करता है तथा अपनी चेतना से भूत और वतर्मान की कष्टप्रद घटनाओं के बारे में सतही सामगि्रयों की संस्मृति प्रिया से वह वुफछ राहत महसूस करता है। दूसरी अवस्था मध्य अवस्था है जो एक लंबी प्रिया है। इसकी विशेषता सेवाथीर् की ओर से अन्यारोपण और प्रतिरोध तथा चिकित्सक के द्वारा प्रतिरोध एवं स्पष्टीकरण अथार्त समाकलन कायर् है। ये सारी प्रियाएँ अंततः अंतदृर्ष्िट की ओर ले जाती हैं। तीसरी अवस्था समाप्ित की अवस्था है जिसमें विश्लेषक के साथ संबंध भंग हो जाता है और सेवाथीर् चिकित्सा छोड़ने की तैयारी कर लेता है। व्यवहार चिकित्सा व्यवहार चिकित्साओं का यह मानना है कि मनोवैज्ञानिक कष्ट दोषपूणर् व्यवहार प्रतिरूपों या विचार प्रतिरूपों के कारण उत्पन्न होते हैं। अतः इनका वेंफद्रबिंदु सेवाथीर् में विद्यमान व्यवहार और विचार होते हैं। उसका अतीत केवल उसकेदोषपूणर् व्यवहार तथा विचार प्रतिरूपों की उत्पिा को समझने के संदभर् में महत्वपूणर् होता है। अतीत को पिफर से सिय नहीं किया जाता। वतर्मान में केवल दोषपूणर् प्रतिरूपों में सुधार किया जाता है। अिागम के सि(ांतों का नैदानिक अनुप्रयोग ही व्यवहार चिकित्सा को गठित करता है। व्यवहार चिकित्सा में विश्िाष्ट तकनीकों एवं सुधारोन्मुख हस्तक्षेपों का एक विशाल समुच्चयहोता है। यह कोइर् एकीकृत सि(ांत नहीं है जिसे क्िलनिकल निदान या विद्यमान लक्षणों को ध्यान में रखे बिना अनुप्रयुक्त किया जा सके। अनुप्रयुक्त किए जाने वाली विश्िाष्ट तकनीकों या सुधारोन्मुख हस्तक्षेपों के चयन में सेवाथीर् के लक्षण तथा क्िलनिकल निदान मागर्दशर्क कारक होते हैं। दुभीर्ति या अत्यिाक और अपंगकारी भय के उपचार के लिए तकनीकों के एक समुच्चय को प्रयुक्त करने की आवश्यकता होगी जबकि क्रोध - प्रस्पफोटन के उपचार के लिए दूसरी। अवसादग्रस्त सेवाथीर् की चिकित्सा दुश्िंचतित सेवाथीर् से भ्िान्न होगी। व्यवहार चिकित्सा का आधार दोषपूणर् या अपियात्मक व्यवहार को निरूपित करना, इन व्यवहारों को प्रबलित तथा संपोष्िात करने वाले कारकों तथा उन वििायों को खोजना है जिनसे उन्हें परिवतिर्त किया जा सके। उपचार की वििा जो सेवाथीर् मनोवैज्ञानिक कष्ट या शारीरिक लक्षणों, जिन्हें शारीरिक बीमारी नहीं माना जा सकता, से ग्रस्त होते हैं, उनका साक्षात्कार इस दृष्िट से किया जाता है जिससे कि उनके व्यवहार प्रतिरूपों का विश्लेषण किया जा सके।अपियात्मक दोषपूणर् अिागम के पूवर्वृत्त व्यवहार और दोषपूणर् अिागम को बनाए रखने वाले कारकों को ढूँढ़ने के लिए व्यवहार विश्लेषण किया जाता है। अपियात्मक व्यवहार वे व्यवहार होते हैं जो सेवाथीर् को कष्ट प्रदान करते हैं। पूवर्वतीर् कारक वे कारण होते हैं जो व्यक्ित को उस व्यवहारमें मग्न हो जाने के लिए पहले ही से प्रवृत्त कर देते हैं। संपोषण कारक वे कारक होते हंै जो दोषपूणर् व्यवहार के स्थायित्व को प्रेरित करते हैं। उदाहरणाथर्, एक नवयुवक ने धूम्रपान का अपियात्मक व्यवहार अजिर्त कर लिया है तथा उससे छुटकारा पाने के लिए सहायता चाहता है। व्यवहार विश्लेषण जब सेवाथीर् तथा उसके परिवार के सदस्यों का साक्षात्कार करने के बाद किया गया है तो पता चला कि उस व्यक्ित ने धूम्रपान तब प्रारंभ किया जब वह वाष्िार्क परीक्षा की तैयारी कर रहा था। उसने बताया कि धूम्रपान से उसे दुश्िंचता से आराम मिला। अतः दु¯श्चता उत्पन्न करने वाली स्िथति प्रेरणाथर्क या पूवर्वतीर् कारक हुइर्। आराम मिलने की भावना धूम्रपान करते रहने के लिए संपोषण कारक बन जाती है। सेवाथीर् ने धूम्रपान की ियाप्रसूत अनुिया अजिर्त कर ली जो दु¯श्चता से आराम दिलाने वाले प्रबलन मूल्य के कारण बनी रहती है। एक बार जब दोषपूणर् व्यवहार जो कष्टकर होते हैं, की पहचान कर ली जाती है तब एक उपचार का पैकेज चुना जाता है। दोषपूणर् व्यवहार का शमन करना या उन्हें समाप्त करना और उन्हें अनुवूफली व्यवहार प्रतिरूपों से प्रतिस्थापित करना उपचार का उद्देश्य होता है। चिकित्सक इसे पूवर्वतीर् संिया ;ंदजमबमकमदज वचमतंजपवदेद्ध तथा अनुवतीर् या परिणामी संिया ;बवदेमुनमदज वचमतंजपवदेद्ध स्थापित करके संपन्न करता है। पूवर्वतीर् संिया उन पहलुओं में परिवतर्न कर जो व्यवहार के पहले घटित होते हैं, ऐसे व्यवहार को नियंत्रिात करती है। यह परिवतर्न किसी विशेष परिणाम के प्रबलन मूल्य को घटाकर या बढ़ाकर किया जा सकता है। इसे स्थापक संिया कहते हैं। उदाहरणाथर्, यदि एक बच्चा रात का भोजन करने में परेशान करता है तो स्थापक संिया यह होगी कि चायकाल के समय खाने की मात्रा को घटा दिया जाए। उससे रात के भोजन के समय भूख बढ़ जाएगी तथा इस प्रकार रात के भोजन के समय खाने का प्रबलन मूल्य बढ़ जाएगा। जब बच्चा ठीक से भोजन करे तो उसकी प्रशंसा करना इस व्यवहार ;खाने के व्यवहारद्ध को प्रोत्साहित करेगा। चायकाल के समय भोजन की मात्रा घटाना पूवर्वतीर् संिया हुइर् तथा अनुवतीर् संिया रात का भोजन करने के लिए बालक की प्रशंसा हुइर्। यह रात का भोजन करने की अनुिया को स्थापित करता है। व्यवहारात्मक तकनीक व्यवहार को परिवतिर्त करने की बहुत - सी तकनीवेंफ उपलब्ध हैं। इन तकनीकों का सि(ांत है सेवाथीर् के भाव - प्रबोधन स्तर को कम करना, प्राचीन अनुबंधन या ियाप्रसूत अनुबधंन द्वारा व्यवहार को बदलना जिसमें प्रबलन की भ्िान्न - भ्िान्न प्रासंगिकता हो, साथ ही यदि आवश्कता हो तो प्रतिस्थानिक ;अपबंतपवनेद्ध अिागम प्रिया का भी उपयोग करना। व्यवहार परिष्करण की दो मुख्य तकनीवेंफ हैं - निषेधात्मक प्रबलन तथा विमुखी अनुबंधन। जैसा कि आप कक्षा 11 में पहले ही पढ़ चुके हैं निषेधात्मक प्रबलन ;दमहंजपअम तमपदवितबमउमदजद्ध का तात्पयर् अवांछित अनुिया के साथ संलग्न एक ऐसे परिणाम से है जो कष्टकर या पसंद न किया जाने वाला हो। उदाहरणाथर्, एक अध्यापक कक्षा में शोर मचाने के लिए एक बालक को पफटकार लगाता है। यह निषेधात्मक प्रबलन है। विमुखी अनुबंधन ;ंअमतेपअम बवदकपजपवदपदहद्ध का संबंध अवांछित अनुिया के विमुखीपरिणाम के साथ पुनरावृत्त साहचयर् से है। उदाहरण के लिए, एक मद्यव्यसनी को बिजली का एक हल्का आघात दियाजाए और मद्य सूँघने को कहा जाए। ऐसे पुनरावृत्त युग्मन से मद्य की गंध उसके लिए अरुचिकर हो जाएगी क्योंकि बिजली के आघात की पीड़ा के साथ इसका साहचयर् स्थापित हो जाएगा और व्यक्ित मद्य छोड़ देगा। यदि कोइर् अनुवूफली व्यवहार कभी - कभी ही घटित होता है तो इस न्यूनता को बढ़ाने के लिए सकारात्मक प्रबलन ;चवेपजपअम तमपदवितबमउमदजद्ध दिया जाता है। उदाहरण के लिए यदि एक बालक गृह कायर् नियमित रूप से नहीं करता तो उसकी माँ नियत समय गृह कायर् करने के लिए सकारात्मक प्रबलन के रूप में बच्चे का मनपसंद पकवान बनाकर दे सकती है। मनपसंद भोजन का सकारात्मक प्रबलन उसके नियत समय पर गृह कायर् करने के व्यवहार को बढ़ाएगा। व्यवहारात्मक समस्याओं वाले लोगों को कोइर् वांछित व्यवहार करने पर हर बार पुरस्कार के रूप में एक टोकन दिया जा सकता है। ये टोकन संगृहीत किए जाते हैं और किसी पुरस्कार से उनका विनिमय या आदान - प्रदान किया जाता है, जैसे रोगी को बाहर घुमाने ले जाना या बच्चे को बाहर खाना ख्िालाना। इसे टोकन अथर्व्यवस्था ;जवामद मबवदवउलद्ध कहते हैं। विभेदक प्रबलन द्वारा एक साथ अवांछित व्यवहार को घटाया जा सकता है तथा वांछित व्यवहार को बढ़ावा दिया जा सकता है। वांछित व्यवहार के लिए सकारात्मक प्रबलन तथा अवांछित व्यवहार के लिए निषेधात्मक प्रबलन वफा साथ - साथ उपयोग इस प्रकार की एक वििा हो सकती है। दूसरी वििा वांछित व्यवहार को सकारात्मक रूप से प्रबलन देना तथा अवांछित व्यवहार की उपेक्षा करना है। दूसरी वििा कम कष्टकर तथा समान रूप से प्रभावी है। उदाहरण के लिए आइए एक लड़की का मामला लें जो इसलिए रोती और रूठती है कि उसके कहने पर उसे सिनेमा दिखाने नहीं ले जाया जाता। माता - पिता को अनुदेश दिया जाता है कि यदि वह रूठे और रोए नहीं तो उसे सिनेमा ले जाया जाए, मगर यदि वह रूठती और रोती है तो न ले जाया जाए। इसके बाद, उन्हें अनुदेश दिया जाता है कि जब भी लड़की रूठे या रोए तो उसकी उपेक्षा की जाए। इस प्रकार श्िाष्टतापूवर्क सिनेमा ले जाने के लिए कहने का वांछित व्यवहार बढ़ता है तथा रोने और रूठने का अवांछित व्यवहार कम होता है। आपने पिछले अध्याय में दुभीर्ति या अविवेकी भय के बारे में पढ़ा है। दुभीर्ति या अविवेकी भय के उपचार के लिए वोल्प ;ॅवसचमद्ध द्वारा प्रतिपादित क्रमिक विसंवेदनीकरण ;ेलेजमउंजपब कमेमदेपजपेंजपवदद्ध एक तकनीक है। सेवाथीर् का साक्षात्कार भय उत्पन्न करने वाली स्िथतियों को जानने के लिए किया जाता है तथा सेवाथीर् के साथ - साथ चिकित्सक दु¯श्चता उत्पन्न करने वाले उद्दीपकों का एक पदानुक्रम तैयार करता है तथा सबसे कम दु¯श्चता उत्पन्न करने वाले उद्दीपकों को पदानुक्रम में सबसे नीचे रखता है। चिकित्सक सेवाथीर् को विश्रांत करता है और सबसे कम दु¯श्चता उत्पन्न करने वाली स्िथति के बारे में सोचने को कहता है। बाॅक्स 5ण्2 में विश्रांति की वििा के बारे में बताया गया है। सेवाथीर् से कहा जाता है कि शरा - सा भी तनाव महसूस करने पर भयानक स्िथति के बारे में सोचना बंद कर दे। कइर् सत्रों के पश्चात सेवाथीर् विश्रांति की अवस्था बनाए रखते हुए तीव्र भय उत्पन्न करने वाली स्िथतियों के बारे में सोचने में समथर् हो जाता है। इस प्रकार सेवाथीर् क्रमानुसार भय के प्रति विसंवेदनशील हो जाता है। यहाँ अन्योन्य प्रावरोध का सि(ांत ;चतपदबपचसम व ितमबपचतवबंस पदीपइपजपवदद्ध ियाशील होता है। इस सि(ांत के अनुसार दो परस्पर विरोधी शक्ितयों की एक ही समय में उपस्िथति कमशोर शक्ित को अवरु( करती है। अतः पहले विश्रांति की अनुिया विकसित की जाती है तत्पश्चात धीरे - से दु¯श्चता उत्पन्न करने वाले दृश्य की कल्पना की जाती है और विश्रांति से दु¯श्चता पर विजय प्राप्त की जाती है। सेवाथीर् अपनी विश्रांत अवस्था के कारण प्रगामी तीव्रतर दु¯श्चता को सहन करने योग्य हो जाता है। माॅडलिंग या प्रतिरूपण ;उवकमससपदहद्ध की प्रिया में सेवाथीर् एक विशेष प्रकार से व्यवहार करना सीखता है। इसमें वह कोइर् भूमिका - प्रतिरूप ;तवसम उवकमसद्ध या चिकित्सक, जो प्रारंभ में भूमिका - प्रतिरूप की तरह कायर् करता है, के व्यवहार का प्रेक्षण करके उस व्यवहार को करना सीखता ह।ैप्रतिस्थानिक अिागम अथार्त दूसरों का प्रेक्षण करते हुए सीखना, का उपयोग किया जाता है और व्यवहार में आए हुए छोटे - छोटे परिवतर्नोंको भी पुरस्कृत करने की प्रिया से सेवाथीर् धीरे - धीरे माॅडल के व्यवहारों को अजिर्त करना सीख जाता है। व्यवहार चिकित्सा में तकनीकों की बड़ी विविधता है। परिशु( व्यवहार विश्लेषण करना और उचित तकनीकों से उपचार का पैकेज बनाना ही चिकित्सक का कौशल माना जाता है। संज्ञानात्मक चिकित्सा संज्ञानात्मक चिकित्साओं में मनोवैज्ञानिक कष्ट का कारण अविवेकी विचारों और विश्वासों में स्थापित किया जाता है। अल्बटर् एलिस ;।सइमतज म्ससपेद्ध ने संवेग तवर्फ चिकित्सा ;तंजपवदंस मउवजपअम जीमतंचलए त्म्ज्द्ध को प्रतिपादित किया। इस चिकित्सा की वेंफद्रीय धारणा है कि अविवेकी विश्वास पूवर्वतीर् घटनाओं और उनके परिणामों के बीच मध्यस्थता करते हैं। संवेग तवर्फ चिकित्सा में पहला चरण है पूवर्वतीर् - विश्वास - परिणाम ;पू.वि.प.द्ध विश्लेषण। पूवर्वतीर् घटनाओं जिनसेे मनोवैज्ञानिक कष्ट उत्पन्न हुआ, को लिख लिया जाता है। सेवाथीर् के साक्षात्कार द्वारा उसके उन अविवेकी विश्वासों का पता लगाया जाता है जो उसकीवतर्मानकालिक वास्तविकता को विकृत कर रहे हैं। हो सकता है इन अविवेकी विश्वासों को पुष्ट करने वाले आनुभविक प्रमाण पयार्वरण में नहीं भी हों। इन विश्वासों को ‘अनिवायर्’ या ‘चाहिए’ विचार कह सकते हैं, तात्पयर् यह है कि कोइर् भी बात एक विश्िाष्ट तरह से होनी ‘चाहिए’ या ‘अनिवायर्’ है। अविवेकी विश्वासों के उदाहरण हैं, जैसे - फ्किसी को हर एक का प्यार हर समय मिलना चाहिएय्, फ्मनुष्य की तंगहाली बाह्य घटनाओं के कारण होती है जिस पर किसी का नियंत्राण नहीं होताय् इत्यादि। अविवेकी विश्वासोंके कारण पूवर्वतीर् घटना का विकृत प्रत्यक्षण नकारात्मक संवेगों और व्यवहारों के परिणाम का कारण बनता है। अविवेकी विश्वासों का मूल्यांकन प्रश्नावली और साक्षात्कार के द्वारा किया जाता है। संवेग तवर्फ चिकित्सा की प्रकिया में चिकित्सक अनिदेशात्मक प्रश्न करने की प्रिया से अविवेकी विश्वासों का खंडन करता है। प्रश्न करने का स्वरूप सौम्य होता है, निदेशात्मक या जाँच - पड़ताल वाला नहीं। ये प्रश्न सेवाथीर् को अपने जीवन और समस्याओं से संबंिात पूवर्धारणाओं के बारे में गहराइर् से सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। धीरे - धीरे सेवाथीर् अपने जीवन - दशर्न में परिवतर्न लाकर अविवेकी विश्वासों को परिवतिर्त करने में समथर् हो जाता है। तवर्फमूलक विश्वास तंत्रा अविवेकी विश्वास तंत्रा को प्रतिस्थापित करता है और मनोवैज्ञानिक कष्टों में कमी आती है। दूसरी संज्ञानात्मक चिकित्सा आरन बेक ;।ंतवद ठमबाद्ध की है। दुश्िंचता या अवसाद द्वारा अभ्िालक्ष्िात मनोवैज्ञानिक कष्ट संबंधी उनके सि(ांत के अनुसार परिवार और समाज द्वारा दिए गए बाल्यावस्था के अनुभव मूल अन्िवति योजना या मूल स्कीमा ;बवतम ेबीमउंद्ध या तंत्रा के रूप में विकसित हो जाते हैं, जिनमें व्यक्ित के विश्वास और िया के प्रतिरूप सम्िमलित होते हैं। इस प्रकार एक सेवाथीर् जो बाल्यावस्था में अपने माता - पिता द्वारा उपेक्ष्िात था एक ऐसा मूल स्कीमा विकसित कर लेता है, फ्मैं वांछित नहीं हूँय्। जीवनकाल के दौरान कोइर् निणार्यक घटना उसके जीवन में घटित होती है। विद्यालय में सबके सामने अध्यापक के द्वारा उसकी हँसी उड़ाइर् जाती है। यह निणार्यक घटना उसके मूल स्कीमा फ्मैं वांछित नहीं हूँय् को ियाशील कर देती है जो नकारात्मक स्वचालित विचारों को विकसित करती है। नकारात्मक विचार सतत अविवेकी विचार होते हैं, जैसे - ‘कोइर् मुझे प्यार नहीं करता’, ‘मैं वुफरूप हूँ’, ‘मैं मूखर् हूँ’, ‘मैं सपफल नहीं हो सकता/सकती’ इत्यादि। इन नकारात्मकस्वचालित विचारों में संज्ञानात्मक विकृतियाँ भी होती हैं।संज्ञानात्मक विकृतियाँ चिंतन के ऐसे तरीके हैं जो सामान्यप्रकृति के होते हैं ¯कतु वे वास्तविकता को नकारात्मक तरीकेसे विकृत करते हैं। विचारों के इन प्रतिरूपों को अपियात्मक संज्ञानात्मक संरचना ;कलेनिदबजपवदंस बवहदपजपअम ेजतनबजनतमेद्ध कहते हैं। सामाजिक यथाथर् के बारे में ये संज्ञानात्मक त्राुटियाँ उत्पन्न करती हैं। इन विचारों का बार - बार उत्पन्न होना दु¯श्चता और अवसाद की भावनाओं को विकसित करता है। चिकित्सक जो प्रश्न करता है वे सौम्य होते हैं तथा सेवाथीर् के विश्वासों और विचारों के प्रति बिना धमकी वाले विंफतु उनका खंडन करने वाले होते हैं। इन प्रश्नों के उदाहरण वुफछ ऐसे हो सकते हैं, फ्क्यों हर कोइर् तुम्हें प्यार करे?य्, फ्तुम्हारे लिए सपफल होना क्या अथर् रखता है?य् इत्यादि। ये प्रश्न सेवाथीर् को अपने नकारात्मक स्वचालित विचारों की विपरीत दिशा में सोचने को बाध्य करते हैं जिससे वह अपने अपियात्मक स्कीमा के स्वरूप के बारे में अंतदृर्ष्िट प्राप्त करता है तथा अपनी संज्ञानात्मक संरचना को परिवतिर्त करने में समथर् होता है। इस चिकित्सा का लक्ष्य संज्ञानात्मक पुनःसंरचना को प्राप्त करना है जो दु¯श्चता तथा अवसाद को घटाती है। व्यवहार चिकित्सा के सदृश संज्ञानात्मक चिकित्सा भी सेवाथीर् की किसी एक विश्िाष्ट समस्या का समाधान करने पर ध्यान वेंफित करती है। मनोगतिक चिकित्सा के विपरीत संज्ञानात्मक चिकित्सा अिाक मुक्त है अथार्त चिकित्सक इसमें सेवाथीर् के साथ अपनी वििा के बारे में विचार - विमशर् करता है। यह चिकित्सा अल्पकालिक होती है जो 10दृ20 सत्रों तक समाप्त हो जाती है। संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा आजकल सवार्िाक प्रचलित चिकित्सा संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा ;बवहदपजपअम इमींअपवनत जीमतंचलए ब्ठज्द्ध है। मनश्िचकित्सा की प्रभाविता एवं परिणाम पर किए गए अनुसंधान ने निणार्यक रूप से यह प्रमाण्िात किया है कि संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा विभ्िान्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक विकारों, जैसे - दु¯श्चता, अवसाद, आतंक दौरा, सीमावतीर् व्यक्ितत्व इत्यादि के लिए एक संक्ष्िाप्त और प्रभावोत्पादकउपचार है। मनोविकृति की रूपरेखा बताने के लिए संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा जैव - मनोसामाजिक उपागम का उपयोग करती है। यह संज्ञानात्मक चिकित्सा को व्यवहारपरक तकनीकों के साथ संयुक्त करती है। तकार्धार यह है कि सेवाथीर् के कष्टों का मूल या उद्गम स्थान जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक क्षेत्रों में होता है। अतः समस्या के जैविक पक्षों को विश्रांति की वििायों द्वारा, मनोवैज्ञानिक पक्षों को व्यवहार चिकित्सा तथा संज्ञानात्मक चिकित्सा तकनीकों द्वारा और सामाजिक पक्षों को पयार्वरण में परिवतर्न द्वारा संबोिात करने के कारण संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा को एक व्यापक चिकित्सा बनाती है। जिसका उपयोग करना आसान है, यह कइर् प्रकार के विकारों के लिए प्रयुक्त की जा सकती है तथा जिसकी प्रभावोत्पादकता प्रमाण्िात हो चुकी है। मानवतावादी - अस्ितत्वपरक चिकित्सा मानवतावादी - अस्ितत्वपरक चिकित्सा की धारणा है कि मनोवैज्ञानिक कष्ट व्यक्ित के अकेलापन, विसंबंधन तथा जीवन का अथर् समझने और यथाथर् संतुष्िट प्राप्त करने में अयोग्यता की भावनाओं के कारण उत्पन्न होते हैं। मनुष्य व्यक्ितगत संवृि एवं आत्मसिि ;ेमस.िंबजनंसपेंजपवदद्ध की इच्छा तथा संवेगात्मक रूप से विकसित होने की सहज आवश्यकता से अभ्िाप्रेरित होते हैं। जब समाज और परिवार के द्वारा ये आवश्यकताएँ बािात की जाती हैं तो मनुष्य मनोवैज्ञानिक कष्ट का अनुभव करता है। आत्मसिि को एक सहज शक्ित के रूप में परिभाष्िात किया गया है जो व्यक्ित को अिाक जटिल, संतुलित और समाकलित होने के लिए अथार्त बिना खंडित हुए जटिलता एवं संतुलन प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। समाकलित होने का तात्पयर् है साकल्य - बोध, एक संपूणर् व्यक्ित होना, भ्िान्न - भ्िान्न अनुभवों के होते हुए भी मूल भाव में वही व्यक्ित होना। जिस तरह से भोजन या पानी की कमी कष्ट का कारण होती है, उसी तरह आत्मसिि का वुंफठित होना भी कष्ट का कारण होता है। जब सेवाथीर् अपने जीवन में आत्मसिि की बाधाओं का प्रत्यक्षण कर उनको दूर करने योग्य हो जाता है तब रोगोपचार घटित होता है। आत्मसिि के लिए आवश्यक है संवेगों की मुक्त अभ्िाव्यक्ित। समाज और परिवार संवेगों की इस मुक्त अभ्िाव्यक्ित को नियंत्रिात करते हैं क्योंकि उन्हें भय होता है कि संवेगों की मुक्त अभ्िाव्यक्ित से समाज को क्षति पहुँच सकती है क्योंकि इससे ध्वंसात्मक शक्ितयाँ उन्मुक्त हो सकती हैं। यह नियंत्राण सांवेगिक समाकलन की प्रिया को निष्पफल करके विध्वंसक व्यवहार और नकारात्मक संवेगों का कारण बनता है। इसलिए चिकित्सा के दौरान एकअनुज्ञात्मक, अनिणर्यात्मक तथा स्वीकृतिपूणर् वातावरण तैयार किया जाता है जिसमें सेवाथीर् के संवेगों की मुक्त अभ्िाव्यक्ित हो सके तथा जटिलता, संतुलन और समाकलन प्राप्त किया जा सके। इसमें मूल पूवर्धारणा यह है कि सेवाथीर् को अपने व्यवहारों का नियंत्राण करने की स्वतंत्राता है तथा यह उसकाही उत्तरदायित्व है। चिकित्सक केवल एक सुगमकतार् और मागर्दशर्क होता है। चिकित्सा की सपफलता के लिए सेवाथीर्स्वयं उत्तरदायी होता है। चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य सेवाथीर् की जागरूकता को बढ़ाना है। जैसे - जैसे सेवाथीर् अपने विश्िाष्ट व्यक्ितगत अनुभवों को समझने लगता है वह स्वस्थ होने लगता है। सेवाथीर् आत्म - संवृि की प्रिया को प्रारंभ करता है जिससे वह स्वस्थ हो जाता है। अस्ितत्वपरक चिकित्सा विक्टर प्रेंफकल ;टपबजवत थ्तंदासद्ध नामक एक मनोरोगविज्ञानी और तंत्रिाकाविज्ञानी ने उद्बोधक चिकित्सा ;सवहवजीमतंचलद्ध प्रतिपादित की। लाॅगोस ;सवहवेद्ध आत्मा के लिए ग्रीक भाषा का एक शब्द है और उद्बोधक चिकित्सा का तात्पयर् आत्मा का उपचार है। प्रेंफकल जीवन के प्रति खतरनाक परिस्िथतियों में भी अथर् प्राप्त करने की इस प्रिया को अथर् निमार्ण की प्रिया कहते हैं। इस अथर् निमार्ण की प्रिया का आधार व्यक्ित की अपने अस्ितत्व का आध्यात्िमक सत्य प्राप्त करने की खोज होती है। जैसे एक अचेतन मन होता है, जो मूलप्रवृिायों का भंडार है ;अध्याय 2 देखेंद्ध, उसी तरह एक आध्यात्िमक अचेतन भी होता है जो प्रेम, सौंदयार्त्मक अभ्िाज्ञता, और जीवन मूल्यों का भंडार होता है। जब व्यक्ित के अस्ितत्व के शारीरिक, मनोवैज्ञानिक या आध्यात्िमक पक्षों से जीवन की समस्याएँ जुड़ती हैं तो तंत्रिाकातापी दु¯श्चता उत्पन्न होती है। प्रेंफकल ने निरथर्कता की भावना को उत्पन्न करने में आध्यात्िमक दु¯श्चता की भूमिका पर शोर दिया है और इसीलिए इसे अस्ितत्व दु¯श्चता ;मगपेजमदजपंस ंदगपमजलद्ध अथार्त आध्यात्िमक मूल की तंत्रिाकातापी दु¯श्चता कहा जा सकता है। उद्बोधक चिकित्सा का उद्देश्य अपने जीवन कीपरिस्िथतियों को ध्यान में रखे बिना जीवन में अथर्वत्ता औरउत्तरदायित्व बोध प्राप्त कराने में सेवाथीर् की सहायता करनाहै। चिकित्सक सेवाथीर् के जीवन की विश्िाष्ट प्रकृति पर शोरदेता है और सेवाथीर् को अपने जीवन में अथर्वत्ता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उद्बोधक चिकित्सा में चिकित्सक निष्कपट होता है और अपनी भावनाओं, मूल्यों और अपने अस्ितत्व के बारे में सेवाथीर् से खुल कर बात करता है। इसमें ‘आज और अभी’ पर शोर दिया जाता है और अन्यारोपण को सिय रूप से हतोत्साहित किया जाता है। चिकित्सक सेवाथीर् को वतर्मान की तात्कालिकता का स्मरण कराता है। अपने अस्ितत्व का अथर् प्राप्त करने की प्रिया में सेवाथीर् की मदद करना चिकित्सक का लक्ष्य होता है। सेवाथीर् - वेंफित चिकित्सा सेवाथीर् - वेंफित चिकित्सा कालर् रोशसर् ;ब्ंतस त्वहमतेद्ध द्वारा प्रतिपादित की गइर् है। रोशसर् ने वैज्ञानिक निग्रह कोसेवाथीर् - वेंफित चिकित्सा की व्यष्टीकृत प(ति से संयुक्त किया। रोशसर् ने मनश्िचकित्सा में स्व के संप्रत्यय को प्रस्तुत किया और उनकी चिकित्सा का मानना है कि किसी व्यक्ित के अस्ितत्व का मूल स्वतंत्राता और वरण होते हैं। चिकित्सा एक ऐसा गमर्जोशी का संबंध प्रदान करती है जिससे सेवाथीर् अपनी विघटित भावनाओं के साथ संब( हो सकता है। चिकित्सक तदनुभूति प्रदश्िार्त करता है अथार्त सेवाथीर् के अनुभवों को समझना, जैसे कि वे उसी की हों, उसके प्रति सहृदय होता है तथा अशतर् सकारात्मक आदर रखता है अथार्त सेवाथीर् जैसा है उसी रूप में उसे वह स्वीकार करता है। तदनुभूति चिकित्सक और सेवाथीर् के बीच में एक सांवेगिक अनुनाद की स्िथति बनाती है। अशतर् सकारात्मक आदर यह बताता है कि चिकित्सक की सकारात्मक हादिर्कता सेवाथीर् की उन भावनाओं पर आश्रित नहीं हैं जो वह चिकित्सा सत्रा के दौरान प्रदश्िार्त करता है। यह अनन्य अशतर् हादिर्कता यह सुनिश्िचत करती है कि सेवाथीर् चिकित्सक केऊपर विश्वास कर सकता है तथा स्वयं को सुरक्ष्िात महसूस कर सकता है। सेवाथीर् इतना सुरक्ष्िात महसूस करता है कि वह अपनी भावनाओं का अन्वेषण करने लगता है। चिकित्सक सेवाथीर् की भावनाओं का अनिणर्यात्मक तरीके से परावतर्न करता है। यह परावतर्न सेवाथीर् के कथनों की पुनःअभ्िाव्यक्ित से प्राप्त किया जाता है अथार्त सेवाथीर् के कथनों के अथर् वधर्न के लिए उससे सरल स्पष्टीकरण माँगना। परावतर्न की यह प्रिया सेवाथीर् को समाकलित होने में मदद करती है। समायोजन बढ़ने के साथ ही व्यक्ितगत संबंध भी सुधरते हैं। सार यह है कि यह चिकित्सा सेवाथीर् को अपना वास्तविक स्व होने में मदद करती है जिसमें चिकित्सक एक सुगमकतार् की भूमिका निभाता है। गेस्टाल्ट चिकित्सा जमर्न शब्द ‘गेस्टाल्ट’ का अथर् है ‘समग्र’। यह चिकित्साप्रेफडेरिक ;िट्जद्ध पल्सर् ने अपनी पत्नी लाॅरा पल्सर् के साथ प्रस्तुत की थी। गेस्टाल्ट चिकित्सा का उद्देश्य व्यक्ित कीआत्म - जागरूकता एवं आत्म - स्वीकृति के स्तर को बढ़ाना होता है। सेवाथीर् को शारीरिक प्रियाओं और संवेगों, जो जागरूकता को अवरु( करते हैं, को पहचानना सिखाया जाता है। चिकित्सक इसके लिए सेवाथीर् को अपनी भावनाओं और द्वंद्वों के बारे में उसकी कल्पनाओं की अभ्िाव्यक्ित को प्रोत्साहित करता है। यह चिकित्सा समूहों में भी प्रयुक्त की जा सकती है। जैव - आयुविर्ज्ञान चिकित्सा मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार हेतु दवाएँ निदिर्ष्ट की जा सकती हैं। मानसिक विकारों के उपचार के लिए दवाओं का नुस्खा एक अहर्ताप्राप्त चिकित्सा व्यवसायी, जिसे मनोरोगविज्ञानी कहा जाता है, द्वारा लिखा जाता है। वे चिकित्सापरक डाॅक्टर होते हैं जिन्हें मानसिक विकारों के ज्ञान, निदान और उपचार में विशेषज्ञता प्राप्त होती है। किस प्रकार की दवा उपयोग कीजाएगी यह विकारों की प्रकृति पर निभर्र करता है। तीव्रमानसिक विकृति, जैसे - मनोविदलता और द्विध्रुवीय विकार में मनस्तापी विरोधी औषिायों की आवश्यकता होती है।सामान्य मानसिक विकार, जैसे - सामान्यीकृत दु¯श्चता या प्रतिियात्मक अवसाद में भी मृदुतर औषिायों की आवश्यकता पड़ सकती है। मानसिक विकारों के उपचार के लिए निदिर्ष्ट दवाओं के अनुषंगी प्रभाव भी होते हैं जिन्हें समझने और माॅनीटर करते रहने की शरूरत होती है। इसलिए यह आवश्यक है कि दवाओं को उचित चिकित्सापरक - पयर्वेक्षण में ही दिया जाए। यहाँ तक कि वे दवाएँ जो एक सामान्य व्यक्ित परीक्षा के लिए जागकर पढ़ने के लिए उपयोग करता है या किसीपाटीर् में ‘चरम उत्तेजन’ प्राप्त करने के लिए उपयोग करता है, उनके भी खतरनाक अनुषंगी प्रभाव हो सकते हैं। इन दवाओं की लत पड़ सकती है और ये शरीर तथा मस्ितष्क को क्षति पहुँचा सकती हैं। आपने चलचित्रों में मानसिक समस्याओं से ग्रसित लोगों को बिजली का आघात देते हुए देखा होगा। विद्युत - आक्षेपी चिकित्सा ;मसमबजतव.बवदअनसेपअम जीमतंचलए म्ब्ज्द्ध जैव - आयुविर्ज्ञान चिकित्सा का एक दूसरा प्रकार है। इलेक्ट्रोड द्वारा बिजली के हल्के आघात रोगी के मस्ितष्क में दिए जाते हैं जिससे आक्षेप उत्पन्न हो सके। जब रोगी के सुधार के लिए बिजली के आघात आवश्यक समझे जाते हैं तो ये केवल मनोरोगविज्ञानी के द्वारा ही दिए जाते हैं। विद्युत - आक्षेपी चिकित्सा एक नेमी उपचार नहीं है और यह तभी दिया जाता है जब दवाएँ रोगी के लक्षणों को नियंत्रिात करने में प्रभावी नहीं होती हैं। मनश्िचकित्सा में स्वास्थ्य - लाभ में योगदान देने वाले कारक जैसा कि हम पढ़ चुके हैं मनश्िचकित्सा मानसिक कष्टों के उपचार हेतु है। ऐसे कइर् कारक हैं जो इस स्वास्थ्य - लाभ प्रिया में योगदान देते हैं। इनमें से वुफछ कारक निम्नलिख्िात हैं - 1ण् स्वास्थ्य - लाभ में एक महत्वपूणर् कारक है चिकित्सक द्वारा अपनाइर् गइर् तकनीक तथा रोगी/सेवाथीर् के साथ इन्हीं तकनीकों का परिपालन। यदि दुश्िंचतित सेवाथीर् को स्वस्थ करने के लिए व्यवहार प(ति और संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा शाखा अपनाइर् जाती है तो विश्रांति की वििायाँ और संज्ञानात्मक पुनःसंरचना तकनीक स्वास्थ्य - लाभ में बहुत बड़ा योगदान देती हैं। 2ण् चिकित्सात्मक मैत्राी जो चिकित्सक एवं रोगी/सेवाथीर् के बीच में बनती है, में स्वास्थ्य - लाभ के गुण विद्यमान होते हैं क्योंकि चिकित्सक नियमित रूप से सेवाथीर् से मिलता है तथा उसे तदनुभूति और हादिर्कता प्रदान करता है। 3ण् चिकित्सा के प्रारंभ्िाक सत्रों में जब रोगी/सेवाथीर् कीसमस्याओं की प्रकृति को समझने के लिए उसका साक्षात्कार किया जाता है, तो वह स्वयं द्वारा अनुभव किए जा रहे संवेगात्मक समस्याओं को चिकित्सक के सामने रखता है। संवेगों को बाहर निकालने की इस प्रिया को भाव - विरेचन या वैफथासिर्स कहते हैं और इसमें स्वास्थ्य - लाभ के गुण विद्यमान होते हैं। 4ण् मनश्िचकित्सा से संबंिात अनेक अविश्िाष्ट कारक हैं। इनमें से वुफछ कारक रोगी/सेवाथीर् से संबंिात बताए जाते हैं तथा वुफछ चिकित्सक से। ये कारक अविश्िाष्ट इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ये मनश्िचकित्सा की विभ्िान्न प(तियों, भ्िान्न रोगियों/सेवाथ्िार्यों तथा भ्िान्न मनश्िचकित्सकों के आर - पार घटित होती हैं। रोगियों/ सेवाथ्िार्यों पर लागू होने वाले अविश्िाष्ट कारक हैं - परिवतर्न के लिए अभ्िाप्रेरणा उपचार के कारण सुधार की प्रत्याशा इत्यादि। इन्हें रोगी चर ;चंजपमदज अंतपंइसमेद्ध कहा जाता है। चिकित्सक पर लागू होने वाले अविश्िाष्ट कारक हैं - सकारात्मक स्वभाव, अनसुलझे संवेगात्मक द्वंद्वों की अनुपस्िथति, अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की उपस्िथति इत्यादि। इन्हें चिकित्सक चर ;जीमतंचपेज अंतपंइसमेद्ध कहा जाता है। मनश्िचकित्सा के नैतिक सि(ांत वुफछ नैतिक मानक जिनका व्यवसायी मनश्िचकित्सकों द्वारा प्रयोग किया जाना चाहिए, वे हैं - 1ण् सेवाथीर् से सुविज्ञ सहमति लेनी चाहिए। 2ण् सेवाथीर् की गोपनीयता बनाए रखनी चाहिए। 3ण् व्यक्ितगत कष्ट और व्यथा को कम करना मनश्िचकित्सक के प्रत्येक प्रयासों का लक्ष्य होना चाहिए। 4ण् चिकित्सक - सेवाथीर् संबंध की अखंडता महत्वपूणर् है। 5ण् मानव अिाकार एवं गरिमा के लिए आदर। 6ण् व्यावसायिक सक्षमता एवं कौशल आवश्यक हंै। वैकल्िपक चिकित्सा इन्हें वैकल्िपक चिकित्सा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें पारंपरिक औषध - उपचार या मनश्िचकित्सा की वैकल्िपक उपचार संभावनाएँ होती हैं। अनेक प्रकार की वैकल्िपक चिकित्साएँ हैं, जैसे - योग, ध्यान, ऐक्यूपंक्चर, वनौषिा, उपचार इत्यादि। पिछले 25 वषो± में मनोवैज्ञानिक कष्टों के लिए उपचार कायर्क्रम के रूप में योग एवं ध्यान ने सबसे अिाक लोकपि्रयता प्राप्त की है। योग एक प्राचीन भारतीय प(ति है जिसे पातंजलि के योग सूत्रा के अष्टांग योग में विस्तृत रूप से बताया गया है। योग, जैसा कि सामान्यतः आजकल इसे कहा जाता है, का आशय केवल आसन या शरीर संस्िथति घटक अथवा श्वसन अभ्यास या प्राणायाम अथवा दोनों के संयोग से होता है। ध्यान का संबंध श्वास अथवा किसी वस्तु या विचार या किसी मंत्रा पर ध्यान वेंफित करने के अभ्यास से है। जहाँ ध्यान वेंफदि्रत किया जाता है। विपश्यना ध्यान, जिसे सतवर्फता - आधारित ध्यान के नाम से भी जाना जाता है, में ध्यान को बाँधे रखने के लिए कोइर् नियत वस्तु या विचार नहीं होता है। व्यक्ित निष्िक्रय रूप से विभ्िान्न शारीरिक संवेदनाओं एवं विचारों, जो उसकी चेतना में आते रहते हैं, का प्रेक्षण करता है। तीव्र गति से श्वास लेने की तकनीक, जो अत्यिाक वायु - संचार करती है तथा जो सुदशर्न िया योग में प्रयुक्त की जाती है, लाभदायक, कम खतरे वाली और कम खचर् वालीतकनीक है। यह दबाव, दु¯श्चता, अभ्िाघातज उत्तर दबाव विकारए अवसाद, दबाव - संबंधी चिकित्सा रोग, मादक द्रव्यों का दुरुपयोग तथा अपरािायों के पुनःस्थापन के लिए उपयोग की जाती है। सुदशर्न िया योग का उपयोग सामूहिक विपदा केउत्तरजीवियों में अभ्िाधातज उत्तर दबाव विकास को समाप्त करने के लिए एक लोक - स्वास्थ्य हस्तक्षेप तकनीक के रूप में किया जाता है। योग वििा वुफशल - क्षेम, भावदशा, ध्यान, मानसिक वेंफद्रीयता तथा दबाव सहिष्णुता को बढ़ाती है। एक वुफशल योग श्िाक्षक द्वारा उचित प्रश्िाक्षण तथा प्रतिदिन 30 मिनट तक का अभ्यास इसके लाभ को बढ़ा सकता है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिाकाविज्ञान संस्थान ;छंजपवदंस प्देजपजनजम व िडमदजंस भ्मंसजी ंदक छमनतवेबपमदबमेए छप्डभ्।छैद्ध, भारत में किए गए शोध ने प्रदश्िार्त किया है कि सुदशर्न िया योग अवसाद को कम करता है। इसके अलावा जो मद्यव्यसनी रोगी सुदशर्न िया योग का अभ्यास करते हैं उनके अवसाद एवं दबाव स्तर में कमी पाइर् गइर् है। अनिद्रा का उपचार योग से किया गया है। योग नींद आने की अविा को कम करता है तथानिद्रा की गुणवत्ता को बढ़ाता है। अमेरिका में सिखाया जाने वाला वुंफडलिनी योग मानसिक विकारों के उपचार में प्रभावी पाया गया है। अरैख्िाक विज्ञान संस्थान ;ज्ीम प्देजपजनजम वित छवद.सपदमंत ैबपमदबमद्धए वैफलिपफोनिर्या विश्वविद्यालय, सैन डिएगो, अमेरिका, ने पाया है कि वुंफडलिनी योग मनोग्रहित - बाध्यता विकार के उपचार में प्रभावी है। वुंफडलिनी योग में मंत्रों के उच्चारण के साथ श्वसन तकनीक या प्राणायाम को संयुक्त किया जाता है। अवसाद कीपुनरावृत्त घटना की रोकथाम सतवर्फता - आधारित ध्यान या विपश्यना के द्वारा की जा सकती है। इस प्रकार का ध्यान रोगियों को अपने सांवेगिक उद्दीपकों के बेहतर प्रक्रमण में सहायता करेगा और इसलिए इन उद्दीपकों के प्रक्रमण में पूवार्ग्रहों को रोकेगा। मानसिक रोगियों का पुनःस्थापन मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार के दो घटक होते हैं, अथार्तलक्षणों में कमी आना तथा ियाशीलता या जीवन की गुणवत्ताके स्तर में सुधार लाना। कम तीव्र विकारों, जैसे - सामान्यीकृत दु¯श्चता, प्रतिियात्मक अवसाद या दुभीर्ति के लक्षणों में कमीआना जीवन की गुणवत्ता में सुधार से संबंिात होता है। जबकि मनोविदलता जैसे गंभीर मानसिक विकारों के लक्षणों में कमीआना जीवन की गुणवत्ता में सुधार से संबंिात नहीं हो सकता है। कइर् रोगी नकारात्मक लक्षणों से ग्रसित होते हैं, जैसे - काम करने या दूसरे लोगों के साथ अन्योन्यिया में अनभ्िारुचि तथा अभ्िाप्रेरणा का अभाव। इस तरह के रोगियों को आत्मनिभर्र बनाने के लिए पुनःस्थापना की आवश्यकता होती है। पुनःस्थापना का उद्देश्य रोगी को सशक्त बनाना होता है जिससे जितना संभव हो सके वह समाज का एक उत्पादक सदस्य बन सके। पुनः स्थापना में रोगियों को व्यावसायिक चिकित्सा, सामाजिक कौशल प्रश्िाक्षण तथा व्यावसायिक प्रश्िाक्षण दिया जाता है।व्यावसायिक चिकित्सा में रोगियों को मोमबत्ती बनाना, कागश की थैली बनाना और कपड़ा बुनना सिखाया जाता है जिससे वे एक कायर् अनुशासन बना सवेंफ। भूमिका - निवार्ह, अनुकरण और अनुदेश के माध्यम से रोगियों को सामाजिक कौशल प्रश्िाक्षण दिया जाता है जिससे कि वे अंतवैर्यक्ितक कौशल विकसित कर सवंेफ। इसका उद्देश्य होता है रोगी को सामाजिक समूह में काम करना सिखाना। संज्ञानात्मक पुनःप्रश्िाक्षण मूल संज्ञानात्मक प्रकायो±, जैसे - अवधान, स्मृति और अिाशासी प्रकायो± में सुधार लाने के लिए दिया जाता है। जब रोगी में पयार्प्त सुधार आ जाता है तो उसे व्यावसायिक प्रश्िाक्षण दिया जाता है जिसमें उत्पादक रोशगार प्रारंभ करने के लिए आवश्यक कौशलों के अजर्न में उसकी मदद की जाती ह।ैप्रमुख पद वैकल्िपक चिकित्सा, व्यवहार चिकित्सा, जैव - आयुविर्ज्ञान चिकित्सा, सेवाथीर् - वेंफित चिकित्सा, संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा, तदनुभूति, गेस्टाल्ट चिकित्सा, मानवतावादी चिकित्सा, मनोगतिक चिकित्सा, मनश्िचकित्सा, पुनःस्थापन, प्रतिरोध, आत्मसिि, चिकित्सात्मक मैत्राी, अन्यारोपण, अशतर् सकारात्मक आदर। ऽ मनश्िचकित्सा मनोवैज्ञानिक कष्ट से निवारण के लिए एक उपचार है। यह एक सजातीय उपचार वििा नहीं है। भ्िान्न प्रकार की लगभग 400 मनश्िचकित्साएँ होती हैं। ऽ मनोविश्लेषण, व्यवहारात्मक, संज्ञानात्मक तथा मानवतावादी - अस्ितत्वपरक मनश्िचकित्सा की महत्वपूणर् प(तियाँ हैं। इनमें से प्रत्येक प(ति में कइर् शाखाएँ हैं। ऽ मनश्िचकित्सा के महत्वपूणर् घटक हैं - नैदानिक निरूपण अथार्त सेवाथीर् की समस्या का कथन और एक विशेष चिकित्सा के संदभर् में उसका उपचार। ऽ चिकित्सात्मक मैत्राी चिकित्सक एवं सेवाथीर् के बीच का संबंध है जिसमें सेवाथीर् का चिकित्सक में विश्वास और चिकित्सक की सेवाथीर् के लिए तदनुभूति होती है। ऽ मनोवैज्ञानिक कष्ट से पीडि़त वयस्कों के लिए मनश्िचकित्सा की प्रधान प(ति व्यक्ितगत मनश्िचकित्सा है। मनश्िचकित्सा का अभ्यास करने से पहले चिकित्सक को व्यावसायिक प्रश्िाक्षण की आवश्यकता होती है। ऽ वैकल्िपक चिकित्सा, जैसे - यौगिक और ध्यानस्थ अभ्यास वुफछ मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार में प्रभावी पाए गए हैं। ऽ मानसिक रोगियों के सिय लक्षणों में कमी आने के बाद उनका पुनःस्थापन उनके जीवन की गुणवत्ता को सुधारने के लिए आवश्यक होता है। 1ण् मनश्िचकित्सा की प्रकृति एवं विषय - क्षेत्रा का वणर्न कीजिए। मनश्िचकित्सा में चिकित्सात्मक संबंध के महत्त्व को उजागर कीजिए। 2ण् मनश्िचकित्सा के विभ्िान्न प्रकार कौन - से हैं? किस आधार पर इनका वगीर्करण किया गया है? 3ण् एक चिकित्सक सेवाथीर् से अपने सभी विचार यहाँ तक कि प्रारंभ्िाक बाल्यावस्था के अनुभवों को बताने को कहता है। इसमें उपयोग की गइर् तकनीक और चिकित्सा के प्रकार का वणर्न कीजिए। 4ण् व्यवहार चिकित्सा में प्रयुक्त विभ्िान्न तकनीकों की चचार् कीजिए। 5ण् उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए कि संज्ञानात्मक विकृति किस प्रकार घटित होती है। 6ण् कौन - सी चिकित्सा सेवाथीर् को व्यक्ितगत संवृि चाहने एवं अपनी संभाव्यताओं की सिि के लिए प्रेरित करती है? उन चिकित्साओं की चचार् कीजिए जो इस सि(ांत पर आधारित हैं। 7ण् मनश्िचकित्सा में स्वास्थ्य - लाभ के लिए किन कारकों का योगदान होता है? वुफछ वैकल्िपक चिकित्सा प(तियों की गणना कीजिए। 8ण् मानसिक रोगियों के पुनःस्थापन के लिए कौन - सी तकनीकों का उपयोग किया जाता है? 9ण् छिपकली/तिलचटा के दुभीर्ति भय का सामाजिक अिागम सि(ांतकार किस प्रकार स्पष्टीकरण करेगा? इसी दुभीर्ति का एक मनोविश्लेषक किस प्रकार स्पष्टीकरण करेगा? 10ण् क्या विद्युत - आक्षेपी चिकित्सा मानसिक विकारों के उपचार के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए? 11ण् किस प्रकार की समस्याओं के लिए संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा सबसे उपयुक्त मानी जाती है? वेब¯लक्स ीजजचरूध्ध्ूूूण्ेबपमदबमकपतमबजण्बवउ ीजजचरूध्ध्ंससचेलबीण्बवउ ीजजचरूध्ध्उमदजंसीमंसजीण्बवउ शैक्ष्िाक संकेत 1ण् विद्याथ्िार्यों को स्व और व्यक्ितत्व से संबंिात अध्याय 2 में पढ़े हुए व्यक्ितत्व के वुफछ सि(ांतों को विभ्िान्न चिकित्सा उपागमों से जोड़ने के लिए कहा जा सकता है। 2ण् विद्याथ्िार्यों से संबंिात वुफछ व्यवहारात्मक मुद्दों, जैसे - किसी मित्रा से संबंध का टूटना आदि का भूमिका - निवार्ह एवं नाटकीकरण उनमें अभ्िारुचि उत्पन्न करेगा तथा मनोविज्ञान के अनुप्रयोग पर भी बल देगा। 3ण् चूँकि चिकित्सा एक उच्चस्तरीय वुफशल - प्रिया है जिसमें व्यावसायिक प्रश्िाक्षण की आवश्यकता होती है, इसलिए विद्याथ्िार्यों को इसे हल्के ढंग से विवेचन करने से रोकना चाहिए। 4ण् कोइर् िया/परिचचार् जिसका विद्याथ्िार्यों के मानस पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, उसे अध्यापक की उपस्िथति में उचित ढंग से संचालित किया जाना चाहिए।

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