जीवन की चुनौतियों का सामना इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप दबाव की प्रकृति, प्रकार एवं ड्डोतों को जीवन की चुनौतियों के रूप में समझ सवेंफगे, मनोवैज्ञानिक प्रकायो± पर दबाव के प्रभाव की व्याख्या कर सवेंफगे, दबाव का सामना करने के तरीके सीख सवेंफगे, उन जीवन कौशलों के बारे में जान सवेंफगे जो लोगों को स्वस्थ रहने में सहायता करते हैं, तथा उन कारकों को समझ सवेंफगे जो सकारात्मक स्वास्थ्य तथा वुफशल क्षेम को उन्नत करते हैं। राज अपनी अंतिम परीक्षा, जो कल सवेरे होने वाली है, के लिए अध्ययन कर रहा है। उसने रात में एक बजे तक पढ़ाइर् की पिफर जब वह अपने ध्यान को एकाग्र करने में असमथर् होने लगा तो उसने प्रातः छह बजे का अलामर् लगाया और सोने का प्रयास करने लगा। चूँकि वह बेहद तनावग्रस्त है अतः वह बिस्तर पर करवटें बदलता रह जाता है। उसके मन में इस प्रकार के विचार कौंधते हैं कि वह अपनी पसंद के विषय में उतने अंक पाने में असमथर् हो गया है जितने कि उस विषय को आगे चुनने के लिए आवश्यक हैं। वह अपने आपको मित्रों के साथ मौज - मस्ती करने तथा परीक्षा के लिए पूरी तैयारी न करने के लिए दोषी ठहराता है। प्रातःकाल वह भारी सर लिए उठता है, नाश्ता भी नहीं कर पाता और किसी तरह परीक्षा के समय तक स्वूफल पहुँचता है। वह प्रश्नपत्रा को खोलता है तो उसका हृदय जोर से धड़क रहा होता है, हाथ पसीने से गीले होते हैं और उसे लगता है कि उसका मन पूणर्तया खाली हो गया है। आपमें से वुुफछ लोगों ने राज के समान कभी - न - कभी अनुभव किया होगा। परीक्षा की चुनौती सभीविद्याथ्िार्यों के लिए एक समान होती है। संभवतः आप अभी से ही अपनी जीवन - वृिा के संबंध में विचार कर रहे हों। यदि वह आपकी अपनी पसंद की न हो तो क्या होगा? क्या आप हार मान लेंगे? जीवन के हर मोड़ पर चुनौतियाँ होती हैं। उस बालक के बारे में सोचिए जिसके माता - पिता की मृत्यु बहुत कम उम्र में ही हो गइर् हो और उसका पालन - पोषण करने वाला कोइर् न होऋ वह युवती जिसके पति की मृत्यु किसी कार दुघर्टना में हो गइर् होऋ वे माता - पिता जो शारीरिक या मानसिक रूप से चुनौतीग्रस्त बच्चों को पाल - पोसकर बड़ा करते हैंऋ वे लड़के - लड़कियाँ जो काॅल सेंटर में लंबी रात व्यतीत करने के बाद दिन में अपनी नींद पूरी करने का प्रयास करते हैं। अपने आस - पास दृष्िट डालिए तो आप पाएँगे की जीवन एक बड़ी चुनौती है। हम सब इन चुनौतियों से अपने - अपने तरीके से निपटते हैं। हममें से वुफछ ऐसा करने में सपफल होते हैं ¯कतु वुुुुफछ लोग उन दबावों के सामने परास्त हो जाते हैं। जीवन की चुनौतियाँ अनिवायर् रूप से दबाव उत्पन्न करने वाली नहीं होती हैं। बहुत वुुुफछ इस पर निभर्र करता है कि उस चुनौती का अवलोकन किस प्रकार किया जाता है। िकेट की टीम में ग्यारहवें नंबर का बल्लेबाश एक तेश गेंदबाज की गेंद का मुकाबला करते हुए उसकी गेंद का अवलोकन, पारी की शुरुआत करने वाले बल्लेबाज से भ्िान्न तरह से करेगा जो कि इस तरह की चुनौती की उत्सुकता से प्रतीक्षा करेगा। यहकहावत है कि चुनौती के सामने ही किसी की सवोर्त्तम क्षमता का पता चलता है। इस अध्याय में हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि वैफसे कोइर् जीवन दशा एक चुनौती अथवा दबाव का एक कारण बन जाती है। हम यह भी देखेंगे कि लोग जीवन की विभ्िान्न चुनौतियों एवं दबावपूणर् परिस्िथतियों के प्रति वैफसी प्रतिियाएँ करते हैं। सारे संसाधनों और अवलंब व्यवस्था को भी संघटित कर देते हैं।दबाव की प्रवृफति, प्रकार एवं ड्डोत सभी चुनौतियाँ, समस्याएँ तथा कठिन परिस्िथतियाँ हमें दबाव सोमवार की व्यस्त सुबह को जब आप सड़क पार करने के ;ेजतमेेद्ध में डालती हैं। अतः यदि दबाव का ठीक से प्रबंधन लिए प्रतीक्षा कर रहें हों तो वुफछ देर के लिए आप दबाव का किया जाए तो वह व्यक्ित की अतिजीविता की संभावना मेंअनुभव कर सकते हैं। लेकिन चूँकि आप खतरे के प्रति वृि करता है। दबाव विद्युत की भाँति होते हैं। दबाव ऊजार् सतवर्फ, सावधान तथा जागरूक होते हैं, इसलिए आप सड़क प्रदान करते हंै, मानव भाव - प्रबोधन में वृि करते हैं तथा सुरक्ष्िात पार कर लेते हैं। किसी चुनौती के सामने होने पर हम निष्पादन को प्रभावित करते हैं। तथापि, यदि विद्युत धारा अत्यंतअिाक प्रयास करते हैं तथा चुनौती से निपटने के लिए अपने तीव्र हो तो वह बल्ब की बत्ती को गला सकती है, विद्युत उपकरणों को खराब कर सकती है इत्यादि। उच्च दबाव भी अप्रीतिकर प्रभाव उत्पन्न कर सकता है तथा हमारे खराब निष्पादन का कारण बन सकता है। इसके विपरीत, बहुत कम दबाव के कारण व्यक्ित उदासीन तथा निम्न स्तर की अभ्िाप्रेरणा का अनुभव कर सकता है, जिसके कारण वह कम दक्षतापूवर्क तथा धीमी गति से कायर् निष्पादन कर पाता है। यह याद रखना महत्वपूणर् है कि प्रत्येक दबाव खराब या विनाशकारी नहीं होता। दबाव के उस स्तर, जो आपके लिए लाभकर है तथा चोटी के निष्पादन स्तर की उपलब्िध एवंछोटे संकटों के प्रबंधन के लिए व्यक्ित के सवोर्त्तम गुणों में से एक है, को वण्िार्त करने के लिए ‘यूस्ट्रेस’ ;मनेजतमेेद्ध पद का उपयोग किया जाता है। पिफर भी, यूस्ट्रेस के व्यथा ;कपेजतमेेद्ध में परिवतिर्त हो जाने की संभावना रहती हैै। दबाव की यह अवरोक्त या पिछली अभ्िाव्यक्ित ही हमारे शरीर के जीणर् होने का कारण होती है। अतः दबाव का वणर्न किसी जीव द्वारा उद्दीपक घटना के प्रति की जाने वाली अनुियाओं के प्रतिरूप के रूप में किया जा सकता है जो उसकी साम्यावस्था में व्यवधान उत्पन्न करता है तथा उसके सामना करने की क्षमता से कहीं अिाक होता है। दबाव की प्रवृफति दबाव के अंग्रेजी भाषा के शब्द स्ट्रेस ;ेजतमेेद्ध की व्युत्पिा, लैटिन शब्द ‘स्िट्रक्टस’ ;ेजतपबजनेद्ध जिसका अथर् है तंग या संकीणर् तथा ‘स्िट्रन्गर’ ;ेजतपदहमतद्ध जो ियापद है, जिसका अथर् है कसना, से हुइर् है। यह मूल शब्द अनेक व्यक्ितयों द्वारा दबाव अवस्था में वण्िार्त मांसपेश्िायों तथा श्वसन की कसावट तथा संवुुुुुफचन की आंतरिक भावनाओं को प्रति¯बबित करता है। प्रायः दबाव को पयार्वरण की उन विशेषताओं के द्वारा भी समझाया जाता है जो व्यक्ित के लिए विघटनकारी होती हैं। दबावकारक ;ेजतमेेवतद्ध वे घटनाएँ हैं जो हमारे शरीर में दबाव उत्पन्न करती हैं। ये शोर, भीड़, खराब संबंध,या रोश स्वूफल अथवा दफ्रतर जाने की घटनाएँ हो सकती हैं। बाह्य प्र्रतिबलक के प्रति प्रतििया को तनाव ;ेजतंपदद्ध कहते हैं ;चित्रा 3ण्1 देखेंद्ध। दबाव कारण तथा प्रभाव दोनों से संब( हो गया है तथापि दबाव का यह दृष्िटकोण भ्रांति उत्पन्न कर सकता है। हैंस सेल्ये ;भ्ंदे ैमसलमद्ध, जो आधुनिक दबाव शोध के जनक कहे जाते हैं, ने दबाव को इस प्रकार परिभाष्िात किया है कि यह फ्किसी भी माँग के प्रति शरीर की अविश्िाष्ट अनुिया हैय्, अथार्त खतरे का कारण चाहे जो भी हो व्यक्ित प्रतिियाओं के समान शरीरियात्मक प्रतिरूप से अनुिया करेगा। अनेक शोधकतार् इस परिभाषा से सहमत नहीं हैं क्योंकि उनका अनुभव है कि दबाव के प्रति अनुिया उतनी सामान्य तथा अविश्िाष्ट नहीं होती है जितना सेल्ये का मत है। भ्िान्न - भ्िान्न दबावकारक दबाव प्रतििया के भ्िान्न - भ्िान्न प्रतिरूप उत्पन्न कर सकते हैं एवं भ्िान्न व्यक्ितयों की अनुियाएँ विश्िाष्ट प्रकार की हो सकती हैं। आप खेल का प्रारंभ करने वाले आरंभ्िाक बल्लेबाज का दृष्टांत याद कर सकते हैं, जिसका उल्लेख पहले हुआ था। हममें से प्रत्येक व्यक्ित परिस्िथति को अपनी दृष्िट से देखेगा और माँगों तथा उनका सामना करने की हमारी क्षमता का प्रत्यक्षण ही यह निधार्रित करेगा कि हम दबाव महसूस कर रहे हैं अथवा नहीं। दबाव कोइर् ऐसा घटक नहीं है जो व्यक्ित के भीतर या पयार्वरण में पाया जाता है। इसके बजाय, यह एक सततचलने वाली प्रिया में सिहित है जिसके अंतगर्त व्यक्ितअपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक पयार्वरणों में कायर् - संपादन करता है, इन संघषो± का मूल्यांकन करता है तथा उनसे उत्पन्न चित्रा 3ण्1 दबाव का मनोवैज्ञानिक अथर् होने वाली विभ्िान्न समस्याओं का सामना करने का प्रयास करता है। दबाव एक गत्यात्मक मानसिक/संज्ञानात्मक अवस्था है। वह समस्िथति को विघटित करता है या एक ऐसा असंतुलन उत्पन्न करता है जिसके कारण उस असंतुलन के समाधान अथवा समस्िथति को पुनःस्थापित करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। दबाव का प्रत्यक्षण व्यक्ित द्वारा घटनाओं के संज्ञानात्मक मूल्यांकन तथा उनसे निपटने के लिए उपलब्ध संसाधनों पर निभर्र करता है। लेजारस ;स्ं्रंतनेद्ध एवं उनके सहयोगियों द्वारा प्रतिपादित दबाव के संज्ञानात्मक सि(ांत पर आधारित दबाव प्रिया को चित्रा 3ण्2 में प्रदश्िार्त किया गया है। दबावपूणर् परिस्िथति के प्रति एक व्यक्ित की अनुिया बहुत सीमा तक घटनाओं के प्रत्यक्षण तथा उनकी व्याख्या या मूल्यांकन पर निभर्र करती है। लेजारस ने दो प्रकार के मूल्यांकन में भेद किया है, जो हैं - प्राथमिक एवं द्वितीयक। प्राथमिक मूल्यांकन ;चतपउंतल ंचचतंपेंसद्ध का संबंध एक नए या चुनौतीपूणर् पयार्वरण का उसके सकारात्मक, तटस्थ अथवा नकारात्मक परिणामों के रूप में प्रत्यक्षण से है। नकारात्मक घटनाओं का मूल्यांकन उनके द्वारा संभावित नुकसान, खतरा या चुनौती के लिए किया जाता है। किसी घटना के द्वारा अब तक की जा चुकी क्षति का मूल्यांकन ही नुकसान है। भविष्य में उस घटना द्वारा संभावित क्षति का मूल्यांकन ही खतरा है। घटना के चुनौतीपूणर् होने का मूल्यांकन उस दबावपूणर् घटना का सामना करने की योग्यता की प्रत्याशा से संब( है कि उस पर विजय पाना संभव है तथा उससे लाभ भी उठाया जा सकता है। जब हम किसी घटना का प्रत्यक्षण दबावपूणर् घटना के रूप में करते हैं तो प्रायः हम उसका द्वितीयक मूल्यांकन ;ेमबवदकंतल ंचचतंपेंसद्ध करते हैं, जो व्यक्ित की अपनी सामना करने की योग्यता तथा संसाधनों का मूल्यांकन होता है कि क्या वे उस घटना द्वारा उत्पन्न नुकसान, खतरे या चुनौती से निपटने के लिए पयार्प्त हैं। ये संसाधन मानसिक, शारीरिक, वैयक्ितक अथवा सामाजिक हो सकते हैं। यदि कोइर् व्यक्ित समझता है कि संकट से निपटने के लिए उसकोसकारात्मक अभ्िावृिा, स्वास्थ्य, कौशल तथा सामाजिक अवलंब चित्रा 3ण्2 दबावकारक की प्रिया का एक सामान्य माॅडल उपलब्ध है तो वह कम दबाव का अनुभव करेगा। मूल्यांकन का यह द्विस्तरीय प्रक्रम न केवल हमारी संज्ञानात्मक तथा व्यवहारात्मक अनुियाएँ निधार्रित करता है बल्िक बाह्य घटनाओं के प्रति हमारी सांवेगिक एवं शरीरियात्मक अनुियाओं को भी निधार्रित करता है। ये मूल्यांकन अत्यंत आत्मनिष्ठ होते हैं तथा अनेक कारकों पर निभर्र करते हैं। एक कारक, इस प्रकार की दबावपूणर् परिस्िथतियों से निपटने का पूवर् अनुभव ;चंेज मगचमतपमदबमद्ध है। यदि कोइर् व्यक्ित इसके पूवर् समान परिस्िथतियों से सपफलतापूवर्क निपट चुका हो तो वह परिस्िथतियाँ उसके लिए कम खतरनाक होंगी। एक अन्य कारक यह है कि क्या दबाव उत्पन्न करने वाली घटना नियंत्राणीय ;बवदजतवससंइसमद्ध है, अथार्त क्या परिस्िथति पर व्यक्ित का नियंत्राण है या प्रभुत्व है। एक व्यक्ित जो यह विश्वास करता है कि वह किसी नकारात्मक परिस्िथति के प्रारंभ होने या उसके प्रतिवूफल परिणामों को नियंत्रिात कर सकता है तो वह, उस व्यक्ित की अपेक्षा जिसे वैयक्ितक नियंत्राण का कोइर् बोध न हो, कम दबाव का अनुभव करेगा। उदाहरण के लिए, आत्म - विश्वास या सक्षमता की भावना यह निधार्रित कर सकती है कि व्यक्ित किसी परिस्िथति का मूल्यांकन एक खतरा या एक चुनौती के रूप में करेगा। इस प्रकार किसी दबावकारक के अनुभव तथा परिणाम एक व्यक्ित से दूसरे व्यक्ित में भ्िान्न हो सकते हैं। दबाव का पद उन सभी पयार्वरणी तथा वैयक्ितक घटनाओं को समाहित करता है जो किसी व्यक्ित के वुफशल - क्षेम या कल्याण के लिए चुनौती या खतरा होते हैं। ये दबावकारक बाह्य हो सकते हैं, जैसे - पयार्वरणी ;शोर, वायु प्रदूषणद्ध, सामाजिक ;किसी मित्रा से संबंध टूट जाना, अकेलापनद्ध या मनोवैज्ञानिक ;द्वंद्व, वुंफठाद्ध जो व्यक्ित के भीतर हो सकते हैं। प्रायः इन दबावकारकों के परिणामस्वरूप अनेकानेक दबाव - प्रतिियाएँ जो शरीरियात्मक, व्यवहारात्मक, संवेगात्मक, तथा संज्ञानात्मक ;चित्रा 3ण्2 देखेंद्ध हो सकती हैं। शरीरियात्मक स्तर पर दबाव संबंधी व्यवहारों में भाव - प्रबोधन एक अत्यंत महत्वपूणर् भूमिका निभाता है। हाइपोथैलेमस ;ीलचवजींसंउनेद्ध दो पथों के माध्यम से िया प्रारंभकरता है। प्रथम पथ के अंतगर्त स्वायत्त तंत्रिाका तंत्रा सम्िमलित है। अिावृक्क ;एड्रीनलद्ध ग्रंथ्िा रुिार में बड़ी मात्रा में वैफटेकोलामाइन्स ;एपिनेपफरीन तथा नाॅरएपिनेपफरीनद्ध छोड़ देती है। इसी के पफलस्वरूप वह शरीरियात्मक परिवतर्न होते हैं जो संघषर् - या - पलायन जैसी अनुिया में परिलक्ष्िात होते हैं। द्वितीय पथ के अंतगर्त पीयूष या पिट्युइटरी ग्रंथ्िा सम्िमलित है, जो काॅटिर्कोस्टीरायड;काॅटिर्सोलद्ध का ड्डाव करती है तथा जो ऊजार् प्रदान करती है। दबाव के प्रति जो संवेगात्मक प्रतिियाएँ होती हैं उनमें नकारात्मक संवेग जैसे - भय, दु¯श्चता, उलझन, क्रोध, अवसाद, या यहाँ तक कि नकार भी सम्िमलित होते हैं।व्यवहारात्मक अनुियाएँ तो दबावपूणर् घटना की प्रकृति के आधार पर लगभग असंख्य ही हैं। दबावकारक का मुकाबला ;संघषर्द्ध या खतरनाक घटना से पीछे हट जाना ;पलायनद्ध, व्यवहारात्मक अनुियाओं की दो सामान्य श्रेण्िायाँ हैं। संज्ञानात्मक अनुियाओं के अंतगर्त, कोइर् घटना कितना नुकसान पहुँचा सकती है या कितनी खतरनाक है तथा उसे वैफसे नियंत्रिात किया जा सकता है, इससे संबंिात विश्वास आते हैं। इनके अंतगर्त ऐसी अनुियाएँ जैसे - ध्यान वेंफदि्रत न कर पाना तथा अंतवेर्धी, पुनरावतीर् या दूष्िात विचार आते हैं। जैसा कि चित्रा 3ण्2 में दशार्या गया है, व्यक्ित जिन दबावों का अनुभव करते हैं, वे तीव्रता ;पदजमदेपजलद्ध ;कम बनाम अिाक तीव्रद्ध, अविा ;कनतंजपवदद्ध ;अल्पकालिक बनाम दीघर्कालिकद्ध, जटिलता ;बवउचसमगपजलद्ध ;कम बनाम अिाक जटिलद्ध तथा भविष्यकथनीयता ;चतमकपबजंइपसपजलद्ध ;अप्रत्याश्िात बनाम पूवार्नुमेयद्ध में भी भ्िान्न हो सकते हैं। किसी दबाव का परिणाम इस पर भी निभर्र करता है कि उपरोक्त आयामोें पर किसी विश्िाष्ट दबावपूणर् अनुभव का स्थान क्या है। प्रायः वे दबाव, जो अिाक तीव्र, दीघर्कालिक या पुराने, जटिल तथा अप्रत्याश्िात होते हैं, वे अिाक नकारात्मक परिणाम उत्पन्न करते हैं, बजाय उनके जो कम तीव्र, अल्पकालिक, कम जटिल तथा प्रत्याश्िात होते हैं। किसी व्यक्ित द्वारा दबाव का अनुभव करना उसके शरीरियात्मक बल पर भी निभर्र करता है। अतः, वे व्यक्ित जिनका शारीरिक स्वास्थ्य खराब है तथा दुबर्ल शारीरिक गठन के हैं, उन व्यक्ितयों की अपेक्षा, जो अच्छे स्वास्थ्य तथा बलिष्ठ शारीरिक गठन वाले हैं, दबाव के समक्ष अिाक असुरक्ष्िात होंगे। वुफछ मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ, जैसे - मानसिक स्वास्थ्य, स्वभाव तथा स्व - संप्रत्यय भी दबाव के अनुभव के लिए प्रासंगिक हैं। वह सांस्कृतिक संदभर् जिसमें हम जीवन - यापन करते हैं किसी भी घटना के अथर् का निधार्रण करता है तथा यह भी निधार्रित करता है कि विभ्िान्न परिस्िथतियों में किस प्रकार की अनुियाएँ अपेक्ष्िात होती हैं। अंततः, दबाव के अनुभव, किसी व्यक्ित के पास उपलब्ध संसाधन, जैसे - धन, सामाजिक कौशल, सामना करने की शैली, अवलंब का नेटववर्फ इत्यादि, द्वारा निधार्रित होते हैं। ये सारे कारक निधार्रित करते हैं कि किसी विश्िाष्ट दबावपूणर् परिस्िथति का मूल्यांकन वैफसे होगा। दबाव के संकेत और लक्षण हर व्यक्ित की दबाव के प्रति अनुिया उसके व्यक्ितत्व पालन - पोषण तथा जीवन के अनुभवों के आधार पर भ्िान्न - भ्िान्न होती है। प्रत्येक व्यक्ित के दबाव अनुियाओं के अलग - अलग प्रतिरूप होते हैं। अतः चेतावनी देने वाले संकेत तथा उनकी तीव्रता भी भ्िान्न - भ्िान्न होती है। हममें से वुफछ व्यक्ित अपनी दबाव अनुियाओं को पहचानते हैं तथा अपने लक्षणों कीगंभीरता तथा प्रकृति के आधार पर अथवा व्यवहार में परिवतर्न के आधार पर समस्या की गहनता का आकलन कर लेते हैं। दबाव के ये लक्षण शारीरिक, संवेगात्मक तथा व्यवहारात्मक होते हैं। कोइर् भी लक्षण दबाव की प्रबलता को ज्ञापित कर सकता है, जिसका यदि निराकरण न किया जाए तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। दबाव के प्रकार चित्रा 3ण्2 में तीन प्रमुख प्रकार के दबाव, अथार्त भौतिक एवं पयार्वरणी, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक बताए गए हैं। यह समझना महत्वपूणर् है कि दबाव के ये सभी प्रकार परस्पर संब( हैं। भौतिक एवं पयार्वरणी दबाव भौतिक दबाव वे माँगें हैं, जिसके कारण हमारी शारीरिक दशा में परिवतर्न उत्पन्न हो जाता है। हम तनाव का अनुभव करते हैं जब हम शारीरिक रूप से अिाक परिश्रम करते हैं, पौष्िटक भोजन की कमी हो जाती है, कोइर् चोट लग जाती है, या निद्रा की कमी हो जाती है। पयार्वरणी दबाव हमारे परिवेश की वैसी दशाएँ होती हैं जो प्रायः अपरिहायर् होती हैं, जैसे - वायु प्रदूषण, भीड़, शोर, ग्रीष्मकाल की गमीर्, शीतकाल की सदीर्, इत्यादि। एक अन्य प्रकार के पयार्वरणीदबाव प्राकृतिक विपदाएँ तथा विपाती घटनाएँ हैं, जैसे - आग, भूवंफप, बाढ़, इत्यादि। मनोवैज्ञानिक दबाव यह वे दबाव हैं जिन्हें हम अपने मन में उत्पन्न करते हैं। ये दबाव अनुभव करने वाले व्यक्ित के लिए विश्िाष्ट होते हैंतथा दबाव के आंतरिक ड्डोत होते हैं। हम समस्याओं के बारे में परेशान होते हैं, दु¯श्चता करते हैं या अवसादग्रस्त हो जाते हैं। ये सभी केवल दबाव के लक्षण ही नहीं हैं बल्िक यह हमारे लिए दबाव को बढ़ाते भी हैं। मनोवैज्ञानिक दबाव केवुफछ प्रमुख ड्डोत वुंफठा, द्वंद्व, आंतरिक एवं सामाजिक दबाव इत्यादि हैं। जब कोइर् व्यक्ित या परिस्िथति हमारी आवश्यकताओं तथा अभ्िाप्रेरकों को अवरु( करती है, जो हमारे इष्ट लक्ष्य की प्राप्ित में बाधा डालती है तो वुुंफठा ;तिनेजतंजपवदद्ध उत्पन्न होती है। वुंफठा के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे - सामाजिक भेदभाव, अंतवैर्यक्ितक क्षति, स्वूफल में कम अंक प्राप्त करना इत्यादि। दो या दो से अिाक असंगत आवश्यकताओं तथा अभ्िाप्रेरकों में द्वंद्व ;बवदसिपबजद्ध हो सकता है, जैसे - क्या नृत्य का अध्ययन किया जाए या मनोविज्ञान का। आप अध्ययन को जारी भी रखना चाह सकते हैं या कोइर् नौकरी भी करना चाह सकते हैं। आपके मूल्यों में भी तब द्वंद्व होसकता है जब आपके ऊपर किसी ऐसे कायर् को करने के अध्याय 3 ऽ जीवन की चुनौतियों का सामना लिए दबाव डाला जाए जो आपके अपने जीवन मूल्यों के विपरीत हो। आंतरिक दबाव ;पदजमतदंस चतमेेनतमद्ध हमारे अपने उन विश्वासों के कारण उत्पन्न होते हैं जो हमारी ही वुफछ प्रत्याशाओं पर आधारित होते हैं, जैसे कि ‘मुझे हरकायर् में सवोर्त्तम होना चाहिए’। इस प्रकार की प्रत्याशाएँ केवल निराश ही करती हैं। हममें से अनेक अपने लक्ष्य तथा अवास्तविक अत्यंत उच्च स्तर को प्राप्त करने के लिए निदर्यता से स्वयं को प्रेरित करते रहते हैं। सामाजिक दबाव ;ेवबपंस चतमेेनतमद्ध उन व्यक्ितयों द्वारा उत्पन्न किए जासकते हैं जो हमारे ऊपर अत्यिाक माँगें थोप देते हैं। यह दबाव तब और भी बढ़ जाता है जब हमें इस तरह के लोगों के साथ काम करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त वुफछ ऐसे व्यक्ित हो सकते हैं जिनके साथ हमें अंतवैर्यक्ितक कठिनाइर् होती है, एक प्रकार से ‘व्यक्ितत्वों की टकराहट’। सामाजिक दबाव ये बाह्य जनित होते हैं तथा दूसरे लोगों के साथ हमारी अंतःियाओं के कारण उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार की सामाजिक घटनाएँ, जैसे - परिवार में किसी की मृत्यु या बीमारी, तनावपूणर् संबंध, पड़ोसियों से परेशानी, सामाजिक दबाव के वुफछ उदाहरण हैं। यह सामाजिक दबाव व्यक्ित - व्यक्ित में बहुत भ्िान्न होते हैं। एक व्यक्ित जो अपने घर में शाम को शांतिपूवर्क बिताना चाहता है उसके लिए उत्सव या पाटीर् में जाना दबावपूणर् हो सकता है, जबकि किसी बहुत मिलनसार व्यक्ित के लिए शाम को घर में बैठे रहना दबावपूणर् हो सकता है। दबाव के ड्डोत उन घटनाओं तथा दशाओं का प्रसार बहुत विस्तृत है जो दबाव को उत्पन्न करती हैं। इनमें से सबसे महत्वपूणर् जीवन में घटने वाली ये प्रमुख दबावपूणर् घटनाएँ हैं, जैसे - किसी पि्रयजन की मृत्यु या व्यक्ितगत चोट, खीझ उत्पन्न करने वाली दैनिक जीवनकी परेशानियाँ, जो बहुत आवृिा के साथ घटित होती हैं तथा अभ्िाघातज घटनाएँ जो हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं। जीवन घटनाएँ जब से हम पैदा होते हैं, तभी से बड़े और छोटे, एकाएक उत्पन्न होने वाले और धीरे - धीरे घटित होने वाले परिवतर्न हमारे जीवन को प्रभावित करते रहते हैं। हम छोटे तथा दैनिक होने वाले परिवतर्नों का सामना करना तो सीख लेते हैं ¯कतु जीवन की महत्वपूणर् घटनाएँ दबावपूणर् हो सकती हैं क्योंकि वे हमारी दिनचयार् को बािात करती हैं और उथल - पुथल मचा देती हैं। यदि इस प्रकार की कइर् घटनाएँ चाहे वे योजनाब( हों ;जैसे - घर बदलकर नए घर में जानाद्ध, या पूवार्नुमानित न हों ;जैसे - किसी दीघर्कालिक संबंध का टूट जानाद्ध कम समय अविा में घटित होती हैं, तो हमें उनका सामना करने में कठिनाइर् होती है तथा हम दबाव के लक्षणों के प्रति अिाक प्रवण होते हैं। परेशान करने वाली घटनाएँ इस प्रकार के दबावों की प्रवृफति व्यक्ितगत होती है, जो अपने दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाओं के कारण बनी रहती है। कोलाहलपूणर् परिवेश, प्रतिदिन का आना - जाना, झगड़ालू पड़ोसी, बिजली - पानी की कमी, यातायात की भीड़ - भाड़ इत्यादि ऐसी कष्टप्रद घटनाएँ हैं। एक गृहस्वामिनी को भी अनेक ऐसी आकस्िमक कष्टप्रद घटनाओं का अनुभव करना पड़ता है। वुफछ व्यवसायों में ऐसी परेशान करने वाली घटनाओं का सामना बारंबार करना पड़ता है। कभी - कभी ऐसी परेशानियों का बहुत तबाहीपूणर् परिणाम उस व्यक्ित के लिए होता है जो उन घटनाओं का सामना अकेले करता है क्योंकि बाहरी दूसरे व्यक्ितयों को इन परेशानियों की जानकारी भी नहीं होती। जो व्यक्ित इन परेशानियों के कारण जितना ही अिाक दबाव अनुभव करता है उतना ही अिाक उसका मनोवैज्ञानिक वुफशल - क्षेम निम्न स्तर का होता है। अभ्िाघातज घटनाएँ इनके अंतगर्त विभ्िान्न प्रकार की गंभीर घटनाएँ, जैसे - अग्िनकांड, रेलगाड़ी या सड़क दुघर्टना, लूट, भूवंफप, सुनामी इत्यादि सम्िमलित होती हैं। इस प्रकार की घटनाओं का प्रभाव वुफछ समय बीत जाने के बाद दिखाइर् देता है तथा कभी - कभी ये प्रभाव दु¯श्चता, अतीतावलोकन, स्वप्न तथा अंतवेर्धी विचार इत्यादि के रूप में सतत रूप से बने रहते हैं। तीव्र अभ्िाघातों के कारण संबंधों में भी तनाव उत्पन्न हो जाते हैं। इनका सामना करने के लिए विशेषज्ञों की सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है, विशेष रूप से तब जब वे घटना के पश्चात महीनों तक सतत रूप से बने रहें। मनोवैज्ञानिक प्रकायर् तथा स्वास्थ्य पर दबाव का प्रभाव दबाव के प्रभाव क्या हैं? अनेक प्रभावों की प्रकृति शरीरियात्मक होती है, विंफतु व्यक्ितयों के भीतर अन्य परिवतर्न भी होते हैं। दबावपूणर् स्िथति के साथ चार प्रमुख दबाव के प्रभाव संब( हैं, जैसे - संवेगात्मक ;मउवजपवदंसद्ध, शरीरियात्मक ;चीलेपवसवहपबंसद्ध, संज्ञानात्मक ;बवहदपजपअमद्ध, तथा व्यवहारात्मक ;इमींअपवनतंसद्ध। संवेगात्मक प्रभाव - वे व्यक्ित जो दबावग्रस्त होते हैं प्रायः आकस्िमक मनःस्िथति परिवतर्न का अनुभव करते हैं तथा सनकी की तरह व्यवहार करते हैं, जिसके कारण वे परिवार तथा मित्रों से विमुख हो जाते हैं। वुफछ स्िथतियों में इसके कारण एक दुश्चक्र प्रारंभ होता है जिससे विश्वास में कमी होती है तथा जिसके कारण पिफर और भी गंभीर संवेगात्मक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिए, दु¯श्चता तथा अवसाद की भावनाएँ, शारीरिक तनाव में वृि, मनोवैज्ञानिक तनाव में वृि तथा आकस्िमक मनःस्िथति परिवतर्न। बाॅक्स 3ण्2 में ‘परीक्षा दु¯श्चता’ के गोचर का वणर्न किया गया है। शरीरियात्मक प्रभाव - जब शारीरिक या मनोवैज्ञानिक दबाव मनुष्य के शरीर पर ियाशील होते हैं तो शरीर में वुफछहामोर्न, जैसे - एडिªनलीन तथा काॅ£टसोल का ड्डाव बढ़ जाता है। ये हामोर्न हृदयगति, रक्तचाप स्तर, चयापचय तथा शारीरिक िया में विश्िाष्ट परिवतर्न कर देते हैं। जब हम थोड़े समय के लिए दबावग्रस्त हों तो ये शारीरिक प्रतिियाएँ वुफशलतापूवर्क कायर् करने में सहायता करती हैं, ¯कतु दीघर्कालिक रूप से यह शरीर को अत्यिाक नुकसान पहुँचा सकती हैं। एपिनेपफरीन तथा नाॅरएपिनेपफरीन छोड़ना, पाचक तंत्रा की धीमी गति, पेफपफड़ों में वायुमागर् का विस्तार, हृदयगति में वृि तथा रक्त - वाहिकाओं का सिवुफड़ना, इस प्रकार के शरीरियात्मक प्रभावों के उदाहरण हैं। संज्ञानात्मक प्रभाव - यदि दबाव के कारण दाब ;प्रेशरद्ध निरंतर रूप से बना रहता है तो व्यक्ित मानसिक अतिभार से ग्रस्त हो जाता है। उच्च दबाव के कारण उत्पन्न यह पीड़ा, व्यक्ित में ठोस निणर्य लेने की क्षमता को तेशी से घटा सकती है। घर में, जीविका में, अथवा कायर् स्थान में लिएगए गलत निणर्यों के द्वारा तवर्फ - वितवर्फ, असपफलता, वित्तीय घाटा, यहाँ तक कि नौकरी की क्षति भी इसके परिणामस्वरूपहो सकती है। एकाग्रता में कमी तथा न्यूनीकृत अल्पकालिक स्मृति क्षमता भी दबाव के संज्ञानात्मक प्रभाव हो सकते हैं। व्यवहारात्मक प्रभाव - दबाव का प्रभाव हमारे व्यवहार परकम पौष्िटक भोजन करने, उत्तेजित करने वाले पदाथो±, जैसे वैफप.फीन का अिाक सेवन करने एवं सिगरेट, मद्य तथा अन्य औषिायों, जैसे - उपशामकों इत्यादि के अत्यिाक सेवन करने में परिलक्ष्िात होता है। उपशामक औषिायाँ व्यसन बन सकती हैं तथा उनके अन्य प्रभाव भी हो सकते हैं जैसे - एकाग्रता में कठिनाइर्, समन्वय में कमी तथा घूण्िार् या चक्कर आ जाना। दबाव के वुफछ ठेठ या प्ररूपी व्यवहारात्मक प्रभाव, निद्रा - प्रतिरूपों मंे व्याघात, अनुपस्िथतता में वृि, तथा कायर् निष्पादन में ”ास हैं। दबाव तथा स्वास्थ्य आपने अवश्य प्रेक्षण किया होगा कि आपके अनेक मित्रा ;हो सकता है आप भी उसमें सम्िमलित हों!द्ध परीक्षा - काल में बीमार पड़ जाते हैं। उन्हें पेट में खराबी, शरीर में ददर्, वमन, अतिसार और बुखार इत्यादि की पीड़ा झेलनी पड़ जाती है। आपने यह भी ध्यान दिया होगा कि वे व्यक्ित जो अपने निजी जीवन में अप्रसन्न या दुखी होते हैं, वे उन दूसरे व्यक्ितयों की अपेक्षा जो खुश हैं तथा जीवन का आनंद लेते हैं, बारंबार बीमार पड़ते हैं। दीघर्कालिक दैनिक दबाव किसी व्यक्ित का ध्यान अपनी देखभाल करने से हटा सकता है। जब दबाव दीघर्कालिक हो तो वह व्यक्ित के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है तथा मनोवैज्ञानिक प्रकायो± को भी दुबर्ल करता है। जब पयार्वरण की माँगों के कारण दबाव और बाध्यताएँ अति तीव्र हों तथा परिवार और मित्रों सेसहायता कम हो तो व्यक्ित परिश्रांति और अभ्िावृिाक समस्याओं का अनुभव करता है। दीघर्कालिक थकावट, कमशोरी औरऊजार् की कमी के संकेत शारीरिक परिश्रांति में प्रकट होते हैं।मानसिक परिश्रांति उत्तेजनशीलता, दु¯श्चता, असहायता तथा निराशा की भावनाओं के रूप में प्रकट होती है। शारीरिक, संवेगात्मक तथा मनोवैज्ञानिक परिश्रांति की इस अवस्था को बनर्आउट ;इनतदवनजद्ध कहते हैं। अब ऐसे विश्वासप्रद साक्ष्य उपलब्ध हैं जो यह प्रद£शत करते हैं कि दबाव के कारण प्रतिरक्षक तंत्रा में परिवतर्न उत्पन्न हो सकते हैं तथा किसी के भी बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है। हृदयवाहिका विकार, उच्च रक्तचाप तथा मनोदैहिक विकारों, जैसे - अल्सर, दमा, एलजीर् तथा सरददर् के विकास में दबाव की लिप्तता बताइर् जाती है। शोधकतार्ओं के आकलन के अनुसार समस्त शारीरिक बीमारियों में 50 से 70 प्रतिशत तक में दबाव की महत्वपूणर् भूमिका होती है। अध्ययन यह भी प्रद£शत करते हैं कि चिकित्सक से मिलने के लगभग साठ प्रतिशत मामले प्रमुखतः दबाव संब( लक्षणों के कारण ही होते हैं। सामान्य अनुवूफलन संलक्षण जब दबाव सतत रूप से दीघर्काल तक बना रहता है तो शरीर में क्या घटित होता है? सेल्ये ने इस प्रश्न पर अध्ययन किया। अध्ययन के दौरान पशुओं को, विभ्िान्न दबावकारक जैसे - उच्च तापमान, एक्स - रे तथा इंसुलिन की सुइर् लगाकर प्रयोगशाला में लंबे समय तक रखा गया। उन्होंने विभ्िान्न चोटों तथा बीमारियों से पीडि़त रोगियों का अस्पतालों में जाकर प्रेक्षण भी किया। सेल्ये ने सभी में समान प्रतिरूप वाली शारीरिक अनुियाएँ पाईं। सेल्ये ने इस प्रतिरूप को सामान्य अनुवूफलन संलक्षण ;हमदमतंस ंकंचजंजपवद ेलदकतवउमद्ध या जी.ए.एस.;ळ।ैद्ध का नाम दिया। उनके अनुसार, जी.एएस. के अंतगर्त तीन चरण होते हैं - सचेत प्रतििया ;ंसंतउ तमंबजपवदद्ध, प्रतिरोध ;तमेपेजंदबमद्ध तथा परिश्रांति ;मगींनेजपवदद्ध ;देखें चित्रा 3ण्3द्ध। 1ण् सचेत प्रतििया चरण - किसी हानिकर उद्दीपक या दबावकारक की उपस्िथति के कारण एड्रीनल - पीयूष - कोटेर्क्स तंत्रा का सियण हो जाता है। यह उन अंतःड्डावों को छोड़ने के लिए प्रेरित करता है जिससे दबाव अनुिया होती है। अब व्यक्ित संघषर् या पलायन के लिए तैयार हो जाता है। 2ण् प्रतिरोध चरण - यदि दबाव दीघर्कालिक होता है तो प्रतिरोध चरण प्रारंभ होता है। परानुवंफपी तंत्रिाका तंत्रा, शरीर के संसाधनों का अिाक सावधानीपूणर् उपयोग करने को उ(त करता है। जीव खतरे का सामना करने के लिए मुकाबला करने का प्रयास करता है। 3ण् परिश्रांति चरण - एक ही दबावकारक अथवा अन्य दबावकारकों के समक्ष दीघर्कालिक उद्भाषण से शरीर के संसाधन निष्कासित हो जाते हैं, जिसके कारण परिश्रांति का तृतीय चरण आता है। सचेत प्रतििया तथा प्रतिरोध चरण में कायर्रत शरीरियात्मक तंत्रा अप्रभावी हो जाते हैं तथा दबाव - संब( रोगों, जैसे - उच्च रक्तचाप की संभावना बढ़ जाती है। सेल्ये के माॅडल की आलोचना इसलिए की गइर् है कि उसमें दबाव में मनोवैज्ञानिक कारकों की बहुत सीमित भूमिका बताइर् गइर् है। शोधकतार्ओं के अनुसार, घटनाओं का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन दबाव के निधार्रण के लिए अत्यंत महत्वपूणर् है। व्यक्ित दबाव के प्रति क्या अनुिया करेगा, यह बहुत सीमा तक उसके प्रत्यक्षण, व्यक्ितत्व तथा जैविक संरचना से प्रभावित होता ह।ैदबाव तथा प्रतिरक्षक तंत्रा दबाव के कारण प्रतिरक्षक तंत्रा की कायर्प्रणाली दुबर्ल हो जाती है जिसके कारण बीमारी उत्पन्न हो सकती है। प्रतिरक्षक तंत्रा शरीर के भीतर तथा बाहर से होने वाले हमलों से शरीर की रक्षा करता है। मनस्तंत्रिाका प्रतिरक्षा विज्ञान ;चेलबीवदमनतवपउउनदवसवहलद्धमन, मस्ितष्क और प्रतिरक्षक तंत्रा के बीच संबंधों पर ध्यान वेंफदि्रत करता है। यह प्रतिरक्षक तंत्रा पर दबाव के प्रभाव का अध्ययन करता है। प्रतिरक्षक तंत्रा वैफसे काम करता है? प्रतिरक्षक तंत्रा में श्वेत रक्त कोश्िाकाएँ या श्वेताणु ;समनबवबलजमद्ध बाह्य तत्वों ;एंटीजेनद्ध, जैसे वाइरस, को पहचान कर नष्ट करता है। इनके द्वारा रोगप्रतिकारकों ;ंदजपइवकपमेद्ध का निमार्ण भी होता है। प्रतिरक्षक तंत्रा में ही टी - कोश्िाकाएँ, बी - कोश्िाकाएँ तथा प्रावृफतिक रूप से नष्ट करने वाली कोश्िाकाओं सहित कइर् प्रकार के श्वेताणु होते हैं। टी - कोश्िाकाएँ हमला करने वालों को नष्ट करती हैं तथा टी - सहायक कोश्िाकाएँ प्रतिरक्षात्मक ियाओं में वृि करती हैं। इन्हीं टी - सहायक कोश्िाकाओं पर “यूमन इम्यूनो डेपिफश्िाएंसी वाइरस ;एच.आइर्.वी.द्ध हमला करते हैं, जो कि एक्वायडर् इम्यूनो डेपिफश्िाएंसी सिन्ड्रोम ;एड्सद्ध के कारक हैं। बी - कोश्िाकाएँ रोगप्रतिकारकों का निमाणर् करती हैं। प्रावृफतिक रूप से नष्ट करने वाली कोश्िाकाएँ, वाइरस तथा अबुर्द या टयूमर दोनों के विरु( लड़ाइर् करती हैं। दबाव के कारण प्रावृफतिक रूप से नष्ट करने वाली कोश्िाकाओं की कोश्िाका - विषाक्तता प्रभावित हो सकती है, जो प्रमुख संक्रमणों तथा वैंफसर से रक्षा में अत्यिाक महत्वपूणर् होती है। अत्यिाक उच्च दबाव से ग्रस्त व्यक्ितयों में, प्रावृफतिक रूप से नष्ट करने वाली कोश्िाकाओं की कोश्िाका - विषाक्तता में भारी कमी पाइर् गइर् है। यह उन विद्या£थयों जो महत्वपूणर् परीक्षाओं में बैठने जा रहे हैं, शोकसंतप्त व्यक्ितयों तथा जो गंभीर रूप से अवसादग्रस्त हैं, में भी पाइर् गइर् है। अध्ययन यह प्रद£शत करते हैं कि प्रतिरक्षक तंत्रा की ियाशीलता उन व्यक्ितयों में बेहतर पाइर् जाती है जिन्हें सामाजिक अवलंब उपलब्ध रहता है। इसके अतिरिक्त प्रतिरक्षक तंत्रा में परिवतर्न उन व्यक्ितयों के स्वास्थ्य को अिाक प्रभावित करता है जिनका प्रतिरक्षक तंत्रा पहले से चित्रा 3ण्4 दबाव का बीमारी से संबंध ही दुबर्ल हो चुका है। नकारात्मक संवेगों सहित, दबाव हामोर्नका ड्डाव होना जिनके द्वारा प्रतिरक्षक तंत्रा दुबर्ल होता है, जिसके परिणामस्वरूप मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं, इसका संपूणर् अनुक्रम चित्रा 3.4 में दशार्या गया है। मनोवैज्ञानिक दबाव के साथ नकारात्मक संवेग तथा संब( व्यवहार, जैसे - अवसाद, शत्राुता, क्रोध तथा आक्रामकता भी अनुषंगी होते हैं। स्वास्थ्य पर दबाव के प्रभाव का अध्ययन करते समय नकारात्मक सांवेगिक स्िथतियाँ विशेष सरोकार रखती हैं। दीघर्कालिक दबाव में वृि होते रहने से मनोवैज्ञानिक विकारों, जैसे - आतंक ;पैनिकद्ध दौरे तथा मनोग्रस्त व्यवहार बढ़ जाते हैं। आवुफलता से परेशानी इस सीमा तक बढ़ सकती है जो दिल के दौरे तक का भ्रम उत्पन्न कर सकती है। दीघर्कालिक दबाव के दाब में व्यक्ित, अविवेकी भय, मनःस्िथति में आकस्िमक परिवतर्न एवं दुभीर्ति के प्रति अिाक प्रवण होते हैं तथा वे अवसाद, क्रोधतथा उत्तेजनशीलता के दौरे का अनुभव कर सकते हैं। यह नकारात्मक संवेग, प्रतिरक्षक तंत्रा के प्रकायो± से संब( प्रतीत होता है। अपने संसार की व्याख्या करने की योग्यता तथा उस व्याख्या को अपने वैयक्ितक अथर् तथा संवेगों से जोड़ने का हमारे शरीर पर प्रत्यक्ष एवं प्रबल प्रभाव पड़ता है। नकारात्मक मनःस्िथति दुबर्ल स्वास्थ्य परिणामों से संब( पाइर् गइर् है। निराशा की भावनाओं का संबंध रोगों के और बिगड़ने से, चोट के जोख्िाम में वृि तथा विभ्िान्न कारणों से मृत्यु से संब( होता है। जीवन शैली दबाव के कारण अस्वास्थ्यकर जीवन शैली या स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले व्यवहार उत्पन्न हो सकते हैं। व्यक्ित के निणर्यों तथा व्यवहारों का वह समग्र प्रतिरूप जीवन शैलीकहलाता है जो व्यक्ित के स्वास्थ्य तथा जीवन की गुणवत्ता को निधार्रित करता है। दबाव से ग्रस्त व्यक्ित रोगजनकों ;चंजीवहमदेद्ध, जो कि शारीरिक रोग उत्पन्न करने के अभ्िाकतार् होते हैं, के समक्ष अिाक अरक्ष्िात रहते हैं। दबाव से ग्रस्त व्यक्ितयों की पौष्िटक भोजन की आदत कम होती है, वे सोते भी कम हैं, तथा वे स्वास्थ्य के लिए जोख्िाम वाले व्यवहार, जैसे - धूम्रपान तथा मद्य दुरुपयोग भी अिाक करते हैं। स्वास्थ्य को क्षति पहुँचाने वाले ये व्यवहार धीरे - धीरे विकसित होते हैं तथा अस्थायी रूप से आनंददायक अनुभवों से संब( होते हैं। अपितु, हम उनके दीघर्कालिक नुकसानों की अनदेखी करते हैं तथा उनके कारण हमारे जीवन में उत्पन्न होनेवाले जोख्िाम को कम महत्त्व देते हैं। अध्ययन यह प्रदश्िार्त करते हैं कि स्वास्थ्यवधर्क व्यवहार जैसे - संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पारिवारिक अवलंब आदि अच्छे स्वास्थ्य में बहुत महत्वपूणर् भूमिका निभाते हैं। जीवन शैली से जुड़ाव जिसमें सम्िमलित हैं, संतुलित निम्न वसायुक्त आहार, नियमित व्यायाम और सकारात्मक चिंतन के साथ सतत ियाकलाप दीघर् आयु और अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ाते हैं। आधुनिक जीवन शैली में खाने, पीने और तथाकथ्िाततेश रफ्रतार वाले अच्छे जीवन की अिाकता ने हममें से वुफछ में स्वास्थ्य के मूल सि(ांतों का उल्लंघन किया है कि हम क्या खाते हैं, क्या सोचते हैं और अपने जीवन के साथ क्या करते हैं। दबाव का सामना करना पिछले वषो± में यह धारणा प्रबल हुइर् है कि हम दबाव का सामना वैफसे करते हैं वही हमारे मनोवैज्ञानिक वुफशल - क्षेम को, हमारे सामाजिक प्रकायो± को तथा हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, न कि दबाव का अनुभव। सामना करना ;बवचपदहद्ध दबाव के प्रति एक गत्यात्मक स्िथति - विश्िाष्ट प्रतििया है। यह दबावपूणर् स्िथतियों या घटनाओं के प्रति वुफछ निश्िचत मूतर् अनुियाओं का समुच्चय होता है, जिनका उद्देश्य समस्या का समाधान करना तथा दबाव को कम करना होता है। हम जिस प्रकार दबाव का सामना करते हैं वह प्रायः हमारे स्थायी, गहरी जड़ों पर आधारित विश्वासों पर निभर्र करता है जो हमारे अनुभव पर आधारित हैं, जैसे यदि हम किसी यातायात जाम में पँफस जाते हैं तो क्रोिात होते हैं क्योंकि हम विश्वास करते हैं कि यातायात को शीघ्रता से चलते रहना ही ‘चाहिए’। दबाव का प्रबंधन करने के लिए हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम अपने सोचने के तरीके का पुनः मूल्यांकन करें तथा दबाव का सामना करने की युक्ितयों या कौशलों को सीखें। जिन व्यक्ितयों की दबाव का सामना करने की क्षमता कमशोर होती है उनकी प्रतिरक्षक अनुियाएँ भी दुबर्ल होती हैं तथा प्रावृफतिक रूप से नष्ट करने वाली कोश्िाकाओं की सियता भी उनमें कम होती है। व्यक्ित दबावपूणर् स्िथतियों का सामना करने की युक्ितयों समझाउँफ कि यह सब वुफछ मेेरे साथ घटित नहीं हो रहा है, के उपयोग में व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ प्रद£शत करते हैं जिनमें लंबे समय तक संगति पाइर् जाती है। इनके अंतगर्त प्रकट तथा अप्रकट दोनों प्रकार की ियाएँ सम्िमलित हैं। एंडलर ;म्दकसमतद्ध तथा पावर्फर ;च्ंतामतद्ध द्वारा व£णत दबाव का सामना करने की तीन युक्ितयाँ या कौशल निम्नलिख्िात हैं - कृत्य - अभ्िाविन्यस्त युक्ित - दबावपूणर् स्िथति के संबंध में सूचनाएँ एकत्रिात करना, उनके प्रति क्या - क्या वैकल्िपक ियाएँ हो सकती हैं तथा उनके संभावित परिणाम क्या हो सकते हैं - यह सब इनके अंतगर्त आते हैं। इसके अंतगर्त प्राथमिकताओं तथा ियाओं के संबंध में निणर्य करना भी सम्िमलित होता है ताकि दबावपूणर् स्िथति का प्रत्यक्ष रूप से सामना किया जा सके। उदाहरण के लिए, मैं अपने लिए या पिफर मैं यही ¯चता करूँपरिहार - अभ्िाविन्यस्त युक्ित - इसके अंतगर्त स्िथति की गंभीरता को नकारना या कम समझना सम्िमलित होते हैंऋ इसमें दबावपूणर् विचारों का सचेतन दमन तथा उनके स्थान पर आत्म - रक्ष्िात विचारों का प्रतिस्थापन भी सम्िमलित होता है। लेशारस ;स्ं्रंतनेद्ध तथा पफोकमैन ;थ्वसाउंदद्ध ने दबाव का सामना करने का संकल्पना - निधार्रण एक गत्यात्मक प्रिया के रूप में संकल्िपत किया है, न कि किसी व्यक्ितगत विशेषक के रूप में। किसी दबावपूणर् कायर् के संपादन में जो आंतरिक या बाह्य माँगें होती हैं, उन पर विजय पाने के लिए, उन्हें कम करने के लिए अथवा सहन करने के लिए निरंतर कि मुझे क्या करना है। बेहतर समय सारणी बनाउँफ या विचार करूँसमस्याओं का समाधान मैंने वैफसे किया था। संवेग - अभ्िाविन्यस्त युक्ित - इसके अंतगर्त मन में आशा बनाए रखने के प्रयास तथा अपने संवेगों पर नियंत्राण सम्िमलित हो सकते हैंऋ वुंफठा तथा क्रोध की भावनाओं को अभ्िाव्यक्त करना या पिफर यह निणर्य करना कि परिस्िथति को बदलने के लिए वुफछ भी नहीं किया जा सकता है, भी इसके अंतगर्त सम्िमलित हो सकते हैं, उदाहरण के लिए, मैं अपने मन को कि इसके समान परिव£तत होते रहने वाले संज्ञानात्मक तथा व्यवहारात्मक प्रयासों से ही दबाव का सामना करना संद£भत होता है। दबाव का सामना करने से किसी समस्या का प्रबंध या परिवतर्न करने तथा उसके प्रति संवेगात्मक अनुियाओं का नियमन करने की व्यक्ित को छूट मिलती है। उनके अनुसार, सामना करने की ये अनुियाएँ दो प्रकार की होती हैं, समस्या - वेंफदि्रत ;चतवइसमउ.विबनेमकद्ध तथा संवेग - वंेफदि्रत ;मउवजपवदविबनेमकद्ध। समस्या - वेंफदि्रत युक्ितयाँ समस्या पर ही हमला करती हैं, ऐसा वे उन व्यवहारों द्वारा करती हैं जो सूचनाएँ एकत्रिात करने, घटनाओं को परिव£तत करने, तथा विश्वास और प्रतिब(ता को परिव£तत करने के लिए होते हैं। वे व्यक्ित की जागरूकता में वृि करती हैं, ज्ञान के स्तर को बढ़ाती हैं, तथा दबाव का सामना करने के संज्ञानात्मक एवं व्यवहारात्मक विकल्पों में वृि करती हैं। घटना से उत्पन्न खतरे की अनुभूति को भी घटाने का कायर् वे करती हैं। उदाहरण के लिए, फ्मैंने कायर् करने के लिए एक योजना का निमार्ण किया तथा उसका ियान्वयन कियाय्। संवेग - वेंफदि्रत युक्ितयाँ प्रमुखतया मनोवैज्ञानिक परिवतर्न लाने हेतु उपयोग की जाती हैं जिससे घटना में परिवतर्न लाने का अल्पतम प्रयास करते हुए उसके कारण उत्पन्न होने वाले संवेगात्मक विघटन के प्रभावों को सीमित किया जा सके। उदाहरण के लिए, फ्मैंने वुफछ कायर् इसलिए किए कि मेरे भीतर से वह निकल जाएय्। यद्यपि जब व्यक्ित के समक्ष दबावपूणर् स्िथति उत्पन्न होती है तो समस्या - वेंफदि्रत तथा संवेग - वेंफदि्रत दोनों ही सामना करने की युक्ितयों का उपयोग आवश्यक होता है मगर शोध प्रद£शत करते हैं कि व्यक्ित प्रथम प्रकार की युक्ितयों का अपेक्षावृफत अिाक बार उपयोग करते हैं। दबाव प्रबंधन तकनीवेंफ दबाव एक मूक हत्यारे के समान है। यह अनुमानित है कि वह शारीरिक रोग और अस्वस्थता में महत्वपूणर् भूमिका निभाता है। उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अल्सर, मधुमेह और यहाँ तक कि वैंफसर भी कड़े दबाव से संब( होते हैं। जीवन शैली में परिवतर्नों के कारण दबाव में निरंतर वृि हो रहीहै। अतः विद्यालय, दूसरी संस्थाएँ, दफ्रतर एवं समुदाय उन तकनीकों को जानने के लिए उत्सुक हैं जिनके द्वारा दबाव का प्रबंधन किया जा सके। इनमें से वुफछ तकनीवेंफ निम्नलिख्िात हैं - विश्रांति की तकनीवेंफ - यह वे सिय कौशल हैं जिनके द्वारा दबाव के लक्षणों तथा बीमारियों, जैसे - उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोग, के प्रभावों में कमी की जा सकती है। प्रायः विश्रांति शरीर के निचले भाग से प्रारंभ होती है तथा मुख पेश्िायों तक इस प्रकार लाइर् जाती है जिससे संपूणर् शरीर विश्राम अवस्था में आ जाए। मन को शांत तथा शरीर को विश्राम अवस्था में लाने के लिए गहन श्वसन के साथ पेशी - श्िाथ्िालन का उपयोग किया जाता है। ध्यान प्रियाएँ - योग वििा में ध्यान लगाने की प्रिया में वुफछ अिागत प्रवििायाँ एक निश्िचत अनुक्रम में उपयोग में लाइर् जाती हैं जिससे ध्यान को पुनः वेंफदि्रत कर चेतना की परिव£तत स्िथति उत्पन्न की जा सके। इसमें एकाग्रता को इतना पूणर्रूप से वेंफदि्रत किया जाता है कि ध्यानस्थ व्यक्ित किसी बाह्य उद्दीपन के प्रति अवभ्िाज्ञ हो जाता है तथा वह चेतना की एक भ्िान्न स्िथति में पहुँच जाता है। जैवप्रतिप्राप्ित या बायोपफीडबैक - यह वह प्रिया है जिसके द्वारा दबाव के शरीरियात्मक पक्षों का परिवीक्षण कर उन्हें कम करने के लिए पफीडबैक दिया जाता है कि व्यक्ित में वतर्मानकालिक शरीरियाएँ क्या हो रही हैं। प्रायः इसके साथ विश्रांति प्रश्िाक्षण का भी उपयोग किया जाता है। जैवप्रतिप्राप्ित प्रश्िाक्षण में तीन अवस्थाएँ होती हैं - किसी विश्िाष्ट शरीरियात्मक अनुिया जैसे - हृदय गति के प्रति जागरूकता विकसित करना, उस शरीरियात्मक अनुिया को शांत व्यवस्था में नियंत्रिात करने के उपाय सीखना तथा उस नियंत्राण को सामान्य दैनिक जीवन में अंतरित करना। सजर्नात्मक मानस - प्रत्यक्षीकरण - दबाव से निपटने के लिए यह एक प्रभावी तकनीक है। सजर्नात्मक मानस - प्रत्यक्षीकरण एक आत्मनिष्ठ अनुभव है जिसमें प्रतिमा तथा कल्पना का उपयोग किया जाता है। मानस - प्रत्यक्षीकरण के पूवर् व्यक्ित को वास्तविकता के अनुवूफल एक लक्ष्य निधार्रित कर लेना चाहिए, यह आत्म - विश्वास के निमार्ण में सहायक होता है। यदि व्यक्ित का मन शांत हो, शरीर विश्राम अवस्था में हो तथा आँखें बंद हों तो मानस - प्रत्यक्षीकरण सरल होता है। ऐसा करने से अवांछित विचारों के हस्तक्षेप में कमी आतीहै तथा व्यक्ित को वह सजर्नात्मक ऊजार् प्राप्त होती है जिससे कि काल्पनिक दृश्य को वास्तविकता में परिव£तत किया जा सके। संज्ञानात्मक व्यवहारात्मक तकनीवेंफ - इन तकनीकों का उद्देश्य व्यक्ित को दबाव के विरु( संचारित करना होता है। मीचेनबाॅम ;डमपबीमदइंनउद्ध ने दबाव संचारण प्रश्िाक्षण ;ेजतमेे पदवबनसंजपवद जतंपदपदहद्ध की एक प्रभावी वििा विकसित की है। इस उपागम का सार यह है कि व्यक्ित के नकारात्मक तथा अविवेकी विचारों के स्थान पर सकारात्मक तथा सविवेक विचार प्रतिस्थापित कर दिए जाएँ। इसके तीन प्रमुख चरण हैं - मूल्यांकन, दबाव न्यूनीकरण तकनीवेंफ तथा अनुप्रयोग एवं अनुवतीर् कारर्वाइर्। मूल्यांकन के अंतगर्त समस्या की प्रवृफति पर परिचचार् करना तथा उसे व्यक्ित/सेवाथीर् के दृष्िटकोण से देखना सम्िमलित होते हैं। दबाव न्यूनीकरण के अंतगर्त दबाव कम करने वाली तकनीकों जैसे - विश्रांति तथा आत्म - अनुदेशन को सीखना सम्िमलित होते हैं। व्यायाम - दबाव के प्रति अनुिया के बाद अनुभव किए गए शरीरियात्मक भाव - प्रबोधन के लिए व्यायाम एक सिय निगर्म - मागर् प्रदान कर सकता है। नियमित व्यायाम के द्वारा हृदय की दक्षता में सुधार होता है, पेफपफड़ों के प्रकायो± में वृि होती है, रक्तचाप में कमी होती है, रक्त में वसा की मात्रा घटती है तथा शरीर के प्रतिरक्षक तंत्रा में सुधार होता है। तैरना, टहलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, रस्सी वूफदना इत्यादि दबाव को कम करने में सहायक होते हैं। प्रत्येक व्यक्ित को सप्ताह में कम से कम चार दिन एक साथ 30 मिनट तक इनमें से किसी व्यायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्रत्येक सत्रा में गरमाना, व्यायाम तथा ठंडा या सामान्य होने के चरण अवश्य होने चाहिए। सकारात्मक स्वास्थ्य तथा वुफशल - क्षेम का उन्नयन अपने जीवन को हम बिना ऐसे व्यक्ितगत संकटों का अनुभव किए जो वुफछ समय के लिए तीव्र दबाव उत्पन्न करते हैं, पूरा कर लें, यह संभव नहीं है। अनेक व्यक्ित जीवन चलाते जाते हैं तथा अत्यंत सकारात्मक रूप से जीवन का पुन£नमार्ण कर लेते हैं। इसकी संभावना अिाक होती है कि प्रायः ऐसेव्यक्ितयों में रचनात्मक अभ्िावृिायाँ होती हैं तथा उन्हें विविध प्रकार के संवेगात्मक तथा सामाजिक अवलंब उपलब्ध होते हैं। जब हम इन दबावों का प्रबंधन सीख लेते हैं तथा ऐसी स्िथतिसे वुफछ सकारात्मक रचना करने के लिए ऊजार् का उपयोग करसकते हैं, तब समझिए हमने अिाक स्वास्थ्यकर उत्तरजीविता सीख ली है तथा इसके परिणामस्वरूप हम भविष्य में आने वाले संकटों के समक्ष दबाव का सामना करने के लिए अिाक योग्य हो सवेंफगे। यह अस्वास्थ्यकर दबाव के खतरे के विरु( प्रतिरक्षण के समान होता है। दबाव प्रतिरोधी व्यक्ितत्व - कोबासा ;ज्ञवइंेंद्ध द्वारा किए गए आधुनिक अध्ययन यह प्रदश्िार्त करते हैं कि वे व्यक्ित जिनमें उच्च स्तर के दबाव ¯कतु निम्न स्तर के रोग होते हैं, उनमें तीन विशेषताएँ सामान्य रूप से पाइर् जाती हैं, जिन्हें दृढ़ता ;ींतकपदमेेद्ध नामक व्यक्ितत्व विशेषक के नाम से जाना जाता है। ये तीनों ही अंग्रेजी भाषा के ‘सी’ अक्षर से प्रारंभ होते हैं, अथार्त प्रतिब(ता ;बवउउपजउमदजद्ध, नियंत्राण ;बवदजतवसद्ध तथा चुनौती ;बींससमदहमद्ध। ‘दृढ़ता’ अपने बारे में, संसार के बारे में तथा उनके बीच अंतःिया के विषय में वुफछ विश्वासों का एक समुच्चय होता है। इसका निमार्ण जो कायर् हम कर रहे हैं उसके प्रति व्यक्ितगत प्रतिब(ता, अपने जीवन पर नियंत्राण का बोध तथा चुनौतियों की भावना, से होता है। दबाव प्रतिरोधी व्यक्ितत्व में, नियंत्राण अथार्त जीवन में उद्देश्य तथा दिशा की भावना होती हैऋ कायर्, परिवार, अपनी रुचियों तथा सामाजिक जीवन के प्रति प्रतिब(ता होती हैऋ तथा चुनौती होती है अथार्त वे जीवन में परिवतर्नों को सामान्य तथा सकारात्मक समझते हैं, न कि कोइर् खतरा। प्रत्येक व्यक्ित में इस प्रकार की विशेषताएँ नहीं होती हैं, हममें से अनेक व्यक्ितयों को सविवेक चिंतन तथा आग्रहिता जैसे क्षेत्रों में विश्िाष्ट जीवन कौशलों को पुनः सीखना होता है, ताकि हम दैनिक जीवन की माँगों का बेहतर ढंग से सामना कर सवेंफ। जीवन कौशल जीवन कौशल, अनुवूफली तथा सकारात्मक व्यवहार की वे योग्यताएँ हैं जो व्यक्ितयों को दैनिक जीवन की माँगों और चुनौतियों से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए सक्षम बनाती हैं। दबाव का सामना करने की हमारी योग्यता इस बात पर निभर्र करती है कि हम दैनिक जीवन की माँगों के प्रति संतुलन करने तथा उनके संबंध में व्यवहार करने के लिए कितने तैयार हैं तथा अपने जीवन में साम्यावस्था बनाए रखने के लिए कितने तैयार हैं। ये जीवन कौशल सीखे जा सकते हैं तथा उनमें सुधार भी किया जा सकता है। आग्रहिता, समय प्रबंधन, सविवेक ¯चतन, संबंधों में सुधार, स्वयं की देखभाल के साथ - साथ ऐसी असहायक आदतों, जैसे - पूणर्तावादी होना, विलंबन या टालना इत्यादि से मुक्ित, वुफछ ऐसे जीवन कौशल हैं जिनसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी। आग्रहिता ;ंेेमतजपअमदमेेद्ध - आग्रहित एक ऐसा व्यवहार या कौशल है जो हमारी भावनाओं, आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा विचारों के सुस्पष्ट तथा विश्वासपूणर् संप्रेषण में सहायक होता है। यह ऐसी योग्यता है जिसके द्वारा किसी के निवेदन को अस्वीकार करना, किसी विषय पर बिना आत्मचेतन के अपने मत को अभ्िाव्यक्त करना, या पिफर खुल कर ऐसे संवेगों, जैसे - प्रेम, क्रोध इत्यादि को अभ्िाव्यक्त करना संभव होता है। यदि आप आग्रही हैं तो आपमें उच्च आत्म - विश्वास एवं आत्म - सम्मान तथा अपनी अस्िमता की एक अटूट भावना होती है। समय प्रबंधन - आप अपना समय जैसे व्यतीत करते हैं वहआपके जीवन की गुणवत्ता को निधार्रित करता है। समय का प्रबंधन तथा प्रत्यायोजित करना सीखने से, दबाव - मुक्त होने में सहायता मिल सकती है। समय दबाव कम करने का एक प्रमुख तरीका, समय के प्रत्यक्षण में परिवतर्न लाना है। समयप्रबंधन का प्रमुख नियम यह है कि आप जिन कायो± को महत्त्व देते हैं, उनका परिपालन करने में समय लगाएँ या उन कायो± को करने में जो आपके लक्ष्यप्राप्ित में सहायक हों। आपको अपनी जानकारियों की वास्तविकता का बोध हो, तथा कायर् को निश्िचत समयाविा में करें। यह स्पष्ट होना चाहिए कि आप क्या करना चाहते हैं तथा आप अपने जीवन में इन दोनों बातों में सामंजस्य स्थापित कर सवंेफ, इन पर समय प्रबंधन निभर्र करता है। सविवेक चिंतन - दबाव संबंधी अनेक समस्याएँ विकृत चिंतन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती हैं। आपके चिंतन और अनुभव करने के तरीकों में घनिष्ठ संबंध होता है। जब हम दबाव का अनुभव करते हैं तो हमें अंतःनिमिर्त वणार्त्मक अभ्िानति होती है जिससे हमारा ध्यान भूतकाल के नकारात्मक विचारों तथा प्रतिमाओं पर वेंफदि्रत हो जाता है, जो हमारे वतर्मान तथा भविष्य के प्रत्यक्षण को प्रभावित करता है। सविवेकचिंतन के वुफछ नियम इस प्रकार हैं - अपने विकृत चिंतन तथा अविवेकी विश्वासों को चुनौती देना, संभावित अंतवेर्धी नकारात्मकदुश्िंचता - उत्तेजक विचारों को मन से निकालना तथा सकारात्मक कथन करना। संबंधों में सुधार - संप्रेषण सुदृढ़ और स्थायी संबंधों की वुंफजी है। इसके अंतगर्त तीन अत्यावश्यक कौशल निहित हैं - सुनना कि दूसरा व्यक्ित क्या कह रहा है, अभ्िाव्यक्त करना कि आप वैफसा सोचते हैं और महसूस करते हैं तथा दूसरों की भावनाओं और मतों को स्वीकारना चाहे वे स्वयं आपके अपने से भ्िान्न हों। इसमें हमें अनुचित इर्ष्यार् और नाराशगीयुक्त व्यवहार से दूर रहने की शरूरत होती है। स्वयं की देखभाल - यदि हम स्वयं को स्वस्थ, दुरुस्त तथा विश्रांत रखते हैं तो हम दैनिक जीवन के दबावों का सामना करने के लिए शारीरिक एवं सांवेगिक रूप से और अच्छी तरह तैयार रहते हैं। हमारे श्वसन का प्रतिरूप हमारी मानसिक तथा सांवेगिक स्िथति को परिलक्ष्िात करता है। जब हम दबावग्रस्त अथवा दुश्िंचतित होते हैं तो हमारा श्वसन और तेश हो जाता है, जिसके बीच - बीच में अक्सर आहें भी निकलती रहती हैं। सबसे अिाक विश्रांत श्वसन मंद, मध्यपट या डायाप्रफाम, अथार्त सीना और उदर गुहिका के बीच एवं गुंबदाकार पेशी, से उदर - वेंफदि्रत श्वसन होता है। पयार्वरणी दबाव, जैसे - शोर, प्रदूषण, दिव्फ, प्रकाश, वणर् इत्यादि सब हमारी मनःस्िथति को प्रभावित कर सकते हैं। इनका निश्िचत प्रभाव दबाव का सामना करने की हमारी क्षमता तथा वुफशल - क्षेम पर पड़ता है। असहायक आदतों पर विजयी होना - असहायक आदतें जैसे - पूणर्तावाद, परिहार, विलंबन या टालना इत्यादि ऐसी युक्ितयाँ हैं जो अल्पकाल तक तो सामना करने में सहायक हो सकती हैं ¯कतु वे व्यक्ित को दबाव के समक्ष अिाक असुरक्ष्िात बना देती हैं। पूणर्तावादी वे व्यक्ित होते हैं जिन्हें सब वुफछ बिल्वुफल सही चाहिए। उन्हें इस प्रकार के कारकों जैसे - उपलब्ध समय, कायर् बंद न करने के परिणामों तथा प्रयास जो अपेक्ष्िात हैं, के स्तरों को परिवतिर्त करने में कठिनाइर् होती है। उनके तनावग्रस्त होने की संभावना अिाक होती है तथा वे विश्राम करने में कठिनाइर् अनुभव करते हैं, स्वयं अपनी तथा दूसरों की आलोचना करते रहते हैं तथा चुनौतियों का परिहार करने की ओर उनका झुकाव होता है। परिहार का अथर् है, समस्या को स्वीकार या सामना करने से नकारना तथा उसे जैसे, कालीन के नीचे समेट देना। विलंबन का अथर् है, जो शरूरी कायर् हमें करना ही है उसमें विलंब करते जाना। हम सभी यह कहने के दोषी हैं, फ्मैं इसे बाद में करूँगा/करूँगी।य् वे व्यक्ित जो स्वभावतः कायो± को टालते हैं, वे जानबूझकरअपने असपफलता भय या अस्वीकृति का सामना करने से परिहार करते हैं। अनेक ऐसे कारकों की पहचान की गइर् है जो सकारात्मक स्वास्थ्य ;चवेपजपअम ीमंसजीद्ध के विकास को सुकर या सुसाध्य बनाते हैं। पूणर् शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्िमक वुफशल - क्षेम की अवस्था ही स्वास्थ्य है, न कि केवल रोग अथवा अशक्तता का अभाव। सकारात्मक स्वास्थ्य के अंतगर्त निम्नलिख्िात नि£मतियाँ आती हैं - फ्स्वस्थ शरीरऋउच्च गुणवत्ता वाले व्यक्ितगत संबंधऋ जीवन में उद्देश्य काबोध, आत्ममान, जीवन के कृत्यों में प्रवीणताऋ दबाव, अभ्िाघात एवं परिवतर्न के प्रति स्िथति स्थापनय्। बाॅक्स 33 में स्िथति स्थापन तथा स्वास्थ्य के बीच संबंध वण्िार्त है। विशेष रूप से जो कारक दबाव के प्रतिरोधक का कायर् करते हैं तथा सकारात्मक स्वास्थ्य को सुकर बनाते हैं, वे हैं आहार,व्यायाम, सकारात्मक अभ्िावृिा, सकारात्मक चिंतन तथा सामाजिक अवलंब। आहार - संतुलित आहार व्यक्ित की मनःस्िथति को ठीककर सकता है, ऊजार् प्रदान कर सकता है, पेश्िायों का पोषण कर सकता है, परिसंचरण को समुन्नत कर सकता है, रोगों से रक्षा कर सकता है, प्रतिरक्षक तंत्रा को सशक्त बना सकता है तथा व्यक्ित को अिाक अच्छा अनुभव करा सकता है जिससे वह जीवन में दबावों का सामना और अच्छी तरह से कर सके। स्वास्थ्यकर जीवन की वुंफजी है, दिन में तीन बार संतुलित और विविध आहार का सेवन करना। किसी व्यक्ित को कितने पोषण की आवश्यकता है, यह व्यक्ित कीसियता स्तर, आनुवंश्िाक प्रकृति, जलवायु तथा स्वास्थ्य के इतिहास पर निभर्र करता है। कोइर् व्यक्ित क्या भोजन करता है तथा उसका वशन कितना है, इसमें व्यवहारात्मक प्रियाएँ निहित होती हैं। वुफछ व्यक्ित पौष्िटक आहार तथा वशन का रख - रखाव सपफलतापूवर्क कर पाते हैं ¯कतु वुफछ अन्य व्यक्ित मोटापे के श्िाकार हो जाते हैं। जब हम दबावग्रस्त होते हैं तो हम ‘आराम देने वाले भोजन’ जिनमें प्रायः अिाक वसा, नमक तथा चीनी होती है, का सेवन करना चाहते हैं। व्यायाम - बड़ी संख्या में किए गए अध्ययन शारीरिक स्वस्थता एवं स्वास्थ्य के बीच सुसंगत सकारात्मक संबंधों की पुष्िट करते हैं। इसके अतिरिक्त, कोइर् व्यक्ित स्वास्थ्य की समुन्नति के लिए जो उपाय कर सकता है उसमें व्यायाम जीवन शैली में वह परिवतर्न है जिसे व्यापक रूप से लोकपि्रय अनुमोदन प्राप्त है। नियमित व्यायाम वशन तथा दबाव के प्रबंधन में महत्वपूणर् भूमिका निभाता है तथा तनाव, दु¯श्चता एवं अवसाद को घटाने में सकारात्मक प्रभाव प्रदश्िार्त करता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए जो व्यायाम आवश्यक हैं, उनमें तनन या ख्िांचाव वाले व्यायाम, जैसे - योग के आसन तथा वायुजीवी व्यायाम, जैसे - दौड़ना, तैरना, साइकिल चलाना इत्यादि आते हैं। जहाँ ¯खचाव वाले व्यायाम शांतिदायक प्रभाव डालते हैं, वहाँ वायुजीवी व्यायाम शरीर के भाव - प्रबोधन स्तर को बढ़ाते हैं। व्यायाम के स्वास्थ्य संबंधी प.फायदे दबाव प्रतिरोधक के रूप में कायर् करते हैं। अध्ययन प्रदश्िार्त करते हैं कि शारीरिक स्वस्थता, व्यक्ितयों को सामान्य मानसिक तथा शारीरिक वुफशल - क्षेम का अनुभव कराती है उस समय भी जब जीवन में नकारात्मक घटनाएँ घट रही हों। सकारात्मक अभ्िावृिा - सकारात्मक स्वास्थ्य तथा वुफशल - क्षेमसकारात्मक अभ्िावृिा के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।सकारात्मक अभ्िावृिा की ओर ले जाने वाले वुफछ कारक इस प्रकार हैं - वास्तविकता का सही प्रत्यक्षणऋ जीवन में उद्देश्यतथा उत्तरदायित्व की भावना का होनाऋ दूसरे व्यक्ितयों के भ्िान्नदृष्िटकोणों के प्रति स्वीकृति एवं सहिष्णुता का होना तथा सपफलता के लिए श्रेय एवं असपफलता के लिए दोष भी स्वीकार करना। अंत में, नए विचारों के लिए खुलापन तथाविनोदी स्वभाव, जिससे व्यक्ित स्वयं अपने ऊपर भी हँस सके, हमें ध्यान वेंफदि्रत करने तथा चीशों को सही परिप्रेक्ष्य में देख सकने में सहायता करते हैं। सकारात्मक चिंतन - सकारात्मक चिंतन की शक्ित, दबाव का सामना करने तथा उसे कम करने में अिाकािाक मानी जा रही है। आशावादए जो कि जीवन में अनुवूफल परिणामों की प्रत्याशा करने के प्रति झुकाव है, को मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक वुफशल - क्षेम से संबंिात किया गया है। व्यक्ित जिस प्रकार दबाव का सामना करते हैं, उसमें भ्िान्नता होती है।उदाहरण के लिए, आशावादी यह मानते हैं कि विपिा का सपफलतापूवर्क सामना किया जा सकता है जबकि निराशावादी घोर संकट या अनथर् की ही प्रत्याशा करते हैं। आशावादी समस्या - वेंफदि्रत सामना करने की युक्ितयों का अिाक उपयोग करते हैं तथा दूसरों से सलाह और सहायता माँगते हैं।निराशावादी समस्या या दबाव के ड्डोतों की उपेक्षा करते हैं और इस प्रकार युक्ितयों का उपयोग करते हैं, जैसे - उस लक्ष्य को ही त्याग देना जिसमें दबाव के कारण बाधा पड़ रही है या यह नकारना कि दबाव विद्यमान भी है। सामाजिक अवलंब - ऐसे व्यक्ितयों का अस्ितत्व तथा उपलब्धता जिन पर हम विश्वास रख सकते हैं, जो यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें हमारी परवाह है, जिनके लिए हम मूल्यवान हैं तथा जो हमें प्यार करते हैं, यही सामाजिक अवलंब की परिभाषा है। कोइर् व्यक्ित जो यह विश्वास करता/करती है कि वह संप्रेषण और पारस्परिक आभार के एक सामाजिक जालक्रम का भाग है, वह सामाजिक अवलंब का अनुभव करता/करती है। प्रत्यक्ष्िात अवलंब, अथार्त सामाजिक अवलंबकी गुणवत्ता स्वास्थ्य तथा वुफशल - क्षेम से सकारात्मक रूप से संब( है, जबकि सामाजिक जालक्रम, अथार्त सामाजिक अवलंब की मात्रा वुफशल - क्षेम से संब( नहीं हैं क्योंकि एक बड़े सामाजिक जालक्रम को बनाए रखना अत्यिाक समय लेने वाला तथा व्यक्ित पर माँगों का दाब डालने वाला होता है। अध्ययन प्रदश्िार्त करते हैं कि वे महिलाएँ जो दबावपूणर् जीवन घटनाओं का अनुभव करती हैं, उनका यदि कोइर् अंतरंग मित्रा था तो गभार्वस्था के दौरान वे कम अवसादग्रस्त थीं तथा उन्हें कम चिकित्सा - जटिलताओं का सामना करना पड़ा। सामाजिक अवलंब दबाव के विरु( संरक्षण प्रदान करता है। वे व्यक्ित जिन्हें परिवार तथा मित्रों से अिाक सामाजिक अवलंब उपलब्ध होता है, दबाव का अनुभव होने पर, कम तनाव महसूस करते हैं तथा वे दबाव का सामना अिाक सपफलतापूवर्क कर सकते हैं। सामाजिक अवलंब, मूतर् अवलंब ;जंदहपइसम ेनचचवतजद्ध के रूप में अथार्त महत्वपूणर् साधनों, जैसे - धन, वस्तु, सेवा इत्यादि की सहायता के द्वारा हो सकता है। उदाहरण के लिए, कोइर् बालक अपने मित्रा को अपनी कक्षा के नोट्स इसलिए दे देता है क्योंकि वह बीमारी के कारण विद्यालय से अनुपस्िथत था। परिवार तथा मित्रा दबावपूणर् घटनाओं के बारे में सूचनात्मक अवलंब ;पदवितउंजपवदंस ेनचचवतजद्ध भी प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, एक विद्याथीर्, जिसे बोडर् की एक कठिन परीक्षा देनी है, जो एक दबावपूणर् घटना है, को यदि उसका कोइर् मित्रा जो इस प्रकार की परीक्षा दे चुका है, उसे परीक्षा संबंधी सूचनाएँ देता है, तो वह न केवल उसमें निहित बिल्वुफल ठीक प्रिया को जान लेगा बल्िक वह उसे यह निधार्रित करने में भी सहायता करेगा कि इस परीक्षा मेंसपफलतापूवर्क उत्तीणर् होने के लिए कौन - कौन से संसाधन एवं सामना करने के लिए कौन - सी युक्ितयाँ उपयोगी होंगी। दबाव के समय कोइर् व्यक्ित दुख, दुश्िंचता तथा आत्म - सम्मान में क्षति का अनुभव कर सकता है। ऐसे समय में सहायक मित्रा तथा परिवार सांवेगिक अवलंब ;मउवजपवदंस ेनचचवतजद्ध उपलब्ध करा सकते हैं यदि वे उसे आश्वस्त करा सवंेफ कि वह उनका पि्रय है, उनके लिए मूल्यवान है तथा उसकी उन्हें परवाह है। शोध अध्ययन यह प्रदश्िार्त करते हैं कि दबाव के समय में सामाजिक अवलंब मनोवैज्ञानिक व्यथा, जैसे - अवसाद या दु¯श्चता को प्रभावी तरीके से घटा देती है। ऐसे प्रमाणों में निरंतर वृि हो रही है कि सामाजिक अवलंब मनोवैज्ञानिक वुफशल - क्षेम से संब( है। सामान्यतः सामाजिक अवलंब के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी प.फायदे सहायता देने वाले तथा प्राप्त करने वाले दोनों पक्षों को ही प्राप्त होते हैं। प्रमुख पद सचेत प्रतििया, मूल्यांकन, सामना करना, परिश्रांति, सामान्य अनुवूफलन संलक्षण ;जी.ए.एस.द्ध, दृढ़ता, समस्िथति, जीवन कौशल, आशावाद, सकारात्मक स्वास्थ्य, मनस्तंत्रिाका प्रतिरक्षा विज्ञान, स्िथति स्थापन, सामाजिक अवलंब, दबाव, दबावकारक। ऽ दबाव जीवन का एक अंग है। दबाव न तो एक उद्दीपक है और न ही एक अनुिया बल्िक व्यक्ित तथा पयार्वरण के मध्य एक सतत संव्यवहार प्रिया है। ऽ दबाव प्रमुखतया तीन प्रकार के होते हैं - भौतिक तथा पयार्वरणी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक। दबाव के ड्डोत हैं μ जीवन घटनाएँ, प्रतिदिन की उलझनें तथा अभ्िाघातज घटनाएँ। दबाव के प्रति संवेगात्मक, शरीरियात्मक, संज्ञानात्मक तथा व्यवहारात्मक अनुियाएँ होती हैं। ऽ सामना करना, दबाव के प्रति एक गत्यात्मक स्िथति - विशेष वैयक्ितक प्रतििया होती है। दबाव का सामना करने के तीन प्रमुख प्रकार हैं - कृत्य - अभ्िाविन्यस्त, संवेग - अभ्िाविन्यस्त तथा परिहार - अभ्िाविन्यस्त युक्ितयाँ। दबाव का सामना करने की अनुिया समस्या - वेंफदि्रत अथवा संवेग - वेंफदि्रत हो सकती है। समस्या - वेंफदि्रत अनुिया पयार्वरण को परिव£तत करने पर वेंफदि्रत होती है तथा घटना के संकट - मूल्य को कम करने का कायर् करती है। संवेग - वेंफदि्रत अनुियाएँ, संवेगों को परिव£तत करने की युक्ितयाँ हैं तथा उनका उद्देश्य घटना के कारण उत्पन्न सांवेगिक विघटन की मात्रा को सीमित करना होता है। ऽ दबाव से निपटने तथा सपफल सामना करने के लिए स्वस्थ जीवन शैली आवश्यक है। आग्रहिता, समय प्रबंधन, सविवेक चिंतन, संबंधों को सुधारना, स्वयं की देखभाल तथा असहायक आदतों पर विजयी होना वे जीवन कौशल हैं जो हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सहायता करते हैं। ऽ सकारात्मक स्वास्थ्य तथा वुफशल क्षेम, संतुलित आहार, व्यायाम, सकारात्मक अभ्िावृिा, सकारात्मक आशावादी चिंतन तथा सामाजिक अवलंब के द्वारा विकसित होते हैं। इसके साथ ही समाज में चतुदिर्क सामंजस्य या समरसता स्थापित करने की भी आवश्यकता है। हमारे लिए ऐसे अस्वास्थ्यकर पलायन वाले मागो±, जैसे - धूम्रपान, मद्य, मादक द्रव्यों तथा अन्य हानिकर व्यवहारों का परिहार करना भी आवश्यक है। 1ण् दबाव के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए। दैनिक जीवन से उदाहरण दीजिए। 2ण् दबाव के लक्षणों तथा ड्डोतों का वणर्न कीजिए। 3ण् जी.ए.एस. माॅडल का वणर्न कीजिए तथा इस माॅडल की प्रासंगिकता को एक उदाहरण की सहायता से स्पष्ट कीजिए। 4ण् दबाव का सामना करने के विभ्िान्न उपायों की गणना कीजिए। 5ण् मनोवैज्ञानिक प्रकायो± पर दबाव के प्रभाव की व्याख्या कीजिए। 6ण् जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए जीवन कौशल वैफसे उपयोगी हो सकते हैं, वणर्न कीजिए। 7ण् उन कारकों का विवेचन कीजिए जो सकारात्मक स्वास्थ्य तथा वुफशल - क्षेम की ओर ले जाते हैं। 8ण् प्रतिरक्षक तंत्रा को दबाव वैफसे प्रभावित करता है? 9ण् किसी ऐसी जीवन घटना का उदाहरण दीजिए जो दबावपूणर् हो सकती है। उन तथ्यों पर प्रकाश डालिए जिनके कारण वह घटना अनुभव करने वाले व्यक्ित के लिए भ्िान्न - भ्िान्न मात्रा में दबाव उत्पन्न कर सकती है। 10ण् दबाव का सामना करने वाली युक्ितयों की अपनी जानकारी के आधार पर आप अपने मित्रों को दैनिक जीवन में दबाव का परिहार करने के लिए क्या सुझाव देंगे? 11ण् उन पयार्वरणी कारकों का वणर्न कीजिए जो ;अद्ध हमारे ऊपर सकारात्मक प्रभाव तथा ;बद्ध नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। 12ण् हम यह जानते हैं कि वुफछ जीवन शैली के कारक दबाव उत्पन्न कर सकते हैं तथा वैंफसर एवं हृदयरोग जैसी बीमारियों को भी जन्म दे सकते हैं पिफर भी हम अपने व्यवहारों में परिवतर्न क्यों नहीं ला पाते? व्याख्या कीजिए। वेब¯लक्स ीजजचरूध्ध्ूूूण्दसउण्दपीण्हवअध्उमकसपदमचसनेध्ेजतमेेण्ीजउस ीजजचरूध्ध्ूूूण्जमंबीीमंसजीण्बवउ ीजजचरूध्ध्ूूूण्सपमिचवेपजपअमण्बवउध्ेजतमेेण्ीजउस शैक्ष्िाक संकेत 1ण् विद्या£थयों को यह समझाना आवश्यक है कि दबाव जीवन का एक अभ्िान्न अंग है। इसलिए उन्हें स्वयं अपने तथा दूसरों में दबाव के लक्षणों को पहचानने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। 2ण् विद्या£थयों को विभ्िान्न प्रकार के प्रतिबलकों का सामना करने के संभव उपायों पर विचाराविमशर् करना चाहिए। 3ण् विद्या£थयों के जीवन से उदाहरण लेते हुए उन्हें शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर दबाव के हानिकर प्रभावों को समझाना चाहिए। 4ण् विद्या£थयों को इसके लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे समाचारपत्रों, पत्रिाकाओं, इंटरनेट इत्यादि के माध्यम से ऐसे साहित्य की खोज करें जिनमें दबाव का सामना करने के उपाय संबंधी सुझाव हों। उसके बाद इस विषय को लेकर कक्षा में परिचचार् आयोजित की जा सकती है।

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