इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप आत्म के संप्रत्यय का वणर्न कर सवेंफगे एवं व्यवहार के आत्म - नियमन के वुफछ तरीकों को सीख सवेंफगे, व्यक्ितत्वके संप्रत्यय की व्याख्या कर सवेंफगे, व्यक्ितत्वके अध्ययन के विभ्िान्न उपागमों के मध्य विभेद कर सवेंफगे, स्वस्थ व्यक्ितत्व के विकास के संदभर् में अंतदर्ृष्िट विकसित कर सवेंफगे तथा व्यक्ितत्व - मूल्यांकन के लिए वुफछ तकनीकों का वणर्न कर सवेंफगे। परिचयआत्म एवं व्यक्ितत्व आत्म का संप्रत्यय आत्म के संज्ञानात्मक एवं व्यवहारात्मक पक्षआत्म - सम्मान, आत्म - सक्षमता एवं आत्म - नियमनसंस्कृति एवं आत्म व्यक्ितत्व का संप्रत्यय व्यक्ितत्व से संबंिात शब्द ;बाॅक्स 2ण्1द्धव्यक्ितत्व के अध्ययन के प्रमुख उपागमप्ररूप उपागम विशेषक उपागमविषयवस्तु व्यक्ितत्व का पंच - कारक माॅडल ;बाॅक्स 2ण्2द्धमनोगतिक उमागम व्यवहारवादी उपागमप्रमुख पदसांस्कृतिक उपागम सारांशमानवतावादी उपागम समीक्षात्मक प्रश्नस्वस्थ व्यक्ित कौन है?;बाॅक्स 2ण्3द्ध परियोजना विचारव्यक्ितत्व का मूल्यांकन वेबलिंक्सआत्म - प्रतिवेदन माप शैक्ष्िाक संकेतप्रक्षेपी तकनीकव्यवहारपरक विश्लेषण प्रायः आपने अपने आपको स्वयं के और दूसरों के व्यवहारों को जानने एवं उनका मूल्यांकन करने में प्रवृत्त पाया होगा। आपने निश्िचत ही ध्यान दिया होगा कि वुफछ विशेष स्िथतियों में आप वैफसे दूसरों से भ्िान्न प्रकार की प्रतििया एवं व्यवहार करते हैं? दूसरों से अपने संबंधों को लेकर भी आपके समक्ष प्रश्नउपस्िथत हुए होंगे। इनमें से वुफछ प्रश्नों का उत्तर देने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने आत्म या स्व की अवधारणा का उपयोग किया है। इसी प्रकार से जब हम ऐसे प्रश्न पूछते हैं कि क्यों लोग भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के होते हैं, वैफसे वे घटनाओं का अलग - अलग अथर् निकालते हैं और वैफसे समान स्िथतियों में वे भ्िान्न प्रकार से अनुभव करते और प्रतििया देते हैं ;ये प्रश्न व्यवहार वैभ्िान्य से संबंिात हैंद्ध, तब व्यक्ितत्व की अवधारणा सिय हो जाती है। आत्म और व्यक्ितत्व, ये दोनों ही संप्रत्यय घनिष्ठ रूप से संबंिात हैं। वास्तव में आत्म व्यक्ितत्व के मूल रूप में स्िथत होता है। आत्म एवं व्यक्ितत्व का अध्ययन न केवल यह समझने में कि हम कौन हैं अपितु हमारी अनन्यता और दूसरों से हमारी समानताओं को भी समझने में हमारी सहायता करता है। आत्म एवं व्यक्ितत्व की समझ के द्वारा हम स्वयं के और दूसरों के व्यवहारों को भ्िान्न परिस्िथतियों में समझ सकते हैं। अनेक विचारकों ने आत्म एवं व्यक्ितत्व की संरचना एवं प्रकायर् का विश्लेषण किया है। परिणामस्वरूप आज हमें आत्म एवं व्यक्ितत्व के भ्िान्न - भ्िान्न सै(ांतिक परिप्रेक्ष्य उपलब्ध हैं। यह अध्याय आपको आत्म एवं व्यक्ितत्व के वुफछ आधारभूत पक्षों से परिचित कराएगा साथ ही, आप आत्म एवं व्यक्ितत्व के वुफछ महत्वपूणर् सै(ांतिक उपागमों और व्यक्ितत्व - मूल्यांकन की वुफछ वििायों को भी सीख सवेंफगे। आत्म एवं व्यक्ितत्व आत्म एवं व्यक्ितत्व का तात्पयर् उन विश्िाष्ट तरीकों से है जिनके आधार पर हम अपने अस्ितत्व को परिभाष्िात करते हैं। ये ऐसे तरीकों को भी इंगित करते हैं जिसमें हमारे अनुभव संगठित एवं व्यवहार में अभ्िाव्यक्त होते हैं। सामान्य प्रेक्षणों के आधार पर हम जानते हैं कि विभ्िान्न प्रकार के लोग अपने बारे में अलग - अलग प्रकार के विचार रखते हैं। ये विचार व्यक्ित के आत्म का प्रतिनििात्व करते हैं। हम यह भी जानते हैं कि स्िथति विशेष में लोग भ्िान्न तरीके से व्यवहार करते हैं विंफतु एक व्यक्ित - विशेष का व्यवहार एक स्िथति से दूसरी स्िथति में सामान्यतया पयार्प्त रूप से स्िथर होता है। व्यक्ित केव्यवहार का यही अपेक्षाकृत स्िथर स्वरूप उस व्यक्ित के ‘व्यक्ितत्व’ का प्रतिनििात्व करता है। इसलिए विभ्िान्न प्रकार के व्यक्ित भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के व्यक्ितत्व वाले प्रतीत होते हैं। ये व्यक्ितत्व व्यक्ितयों के विविध व्यवहारों में प्रतिबिंबित होते हैं। आत्म का संप्रत्यय बाल्यावस्था से ही आपने इस बारे में कि आप कौन हैं और आप किस प्रकार दूसरों से भ्िान्न है, पयार्प्त मात्रा में विचार किया होगा। यद्यपि आप इस संदभर् में जागरूक नहीं रहे होंगे पिफर भी आपने अब तक अपने बारे में वुफछ धारणा विकसित कर ली होगी। आइए अब हम ियाकलाप 2ण्1 को पूरा करके अपने आत्म के बारे में ;अथार्त हम कौन हैं?द्ध वुफछ प्राथमिक विचार प्रतिपादित करने का प्रयास करें। ियाकलाप 2ण्1 के वाक्यों को पूरा करना आपके लिए कितना सरल था? इस कायर् को पूरा करने में आपने कितना समय लिया? संभवतः यह ियाकलाप आपके लिए उतना सरल नहीं रहा होगा जितना सरल पहले आपने इसे समझा होगा। यह ियाकलाप पूरा करते हुए आप अपने ‘आत्म’ का वणर्न कर रहे थे। जिस प्रकार आप अपने चतुदिर्क परिवेश की विविध वस्तुओं के प्रति जागरूक होते हैं, जैसे कि आपके कमरे में एक मेश है या एक वुफसीर्, उसी प्रकार आप अपने आत्म के प्रति भी जागरूक होते हैं। एक प्रिया में सिय रूप से संलग्न रहता है। वस्तुगत ;परिणामीद्ध रूप में आत्म प्रेक्ष्िात होता है और जान लिए जाने वाले वस्तु के रूप में होता है। आत्म की यह द्वैध स्िथति सदैव ध्यातव्य है। आत्म के प्रकार आत्म के विभ्िान्न प्रकार या रूप होते हैं। आत्म के इन विभ्िान्नरूपों का निमार्ण भौतिक एवं समाज - सांस्कृतिक पयार्वरणों से होने वाली हमारी अंतःियाओं के परिणामस्वरूप होता है।आत्म के मूलतत्व पर उस समय ध्यान आकृष्ट होता है जब एक नवजात श्िाशु भूखा होने पर दूध के लिए चीखता - चिल्लाता है। यद्यपि बालक की यह चीख प्रतिवतर् पर आधारित होती है तथापि यही प्रतिवतर् आगे चल कर इस जागरूकता के विकास के रूप में कि ‘मैं भूखा हूँ’ परिवतिर्त हो जाता है।समाज - सांस्कृतिक पयार्वरण में यह जैविक आत्म स्वयं को रूपांतरित करता है। आप जबकि एक चाॅकलेट के लिए भूख का अनुभव कर सकते हैं, एक एस्िकमो को ऐसा अनुभव नहीं हो सकता है। ‘व्यक्ितगत’ आत्म एवं ‘सामाजिक’ आत्म के बीच भेद किया गया है। व्यक्ितगत आत्म ;चमतेवदंस ेमसद्धि में एक ऐसा अभ्िाविन्यास होता है जिसमें व्यक्ित मुख्य रूप से अपने बारे में ही संब( होने का अनुभव करता है। अभी हम लोगों ने देखा कि वैफसे जैविक आवश्यकताएँ ‘जैविक आत्म’ को विकसित करती हैं। ¯कतु शीघ्र ही बच्चे की उसके पयार्वरण में मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आवश्यकताएँ उसके व्यक्ितगत आत्म के अन्य अवयवों को उत्पन्न करने लगती हैं। विंफतु इस विस्तार में जीवन के उन पक्षों पर ही बल होता है जो संबंिात व्यक्ित से जुड़ी हुइर् होती हैं, जैसे - व्यक्ितगतस्वतंत्राता, व्यक्ितगत उत्तरदायित्व, व्यक्ितगत उपलब्िध, व्यक्ितगत सुख - सुविधाएँ इत्यादि। सामाजिक आत्म ;ेवबपंस ेमसद्धि का प्रकटीकरण दूसरों के संबंध में होता है जिसमें सहयोग, एकता, संबंधन, त्याग, समथर्न अथवा भागीदारी जैसे जीवन के पक्षों पर बल दिया जाता है। इस प्रकार का आत्म परिवारऔर सामाजिक संबंधों को महत्त्व देता है। इसलिए इस आत्म को पारिवारिक ;ंिउपसपंसद्ध अथवा संबंधात्मक आत्म ;तमसंजपवदंस ेमसद्धि के रूप में भी जाना जाता है। आत्म के संज्ञानात्मक एवं व्यवहारात्मक पक्ष विश्व के सभी भागों के मनोवैज्ञानिकों ने आत्म के अध्ययन में अभ्िारुचि प्रदश्िार्त की है। इन अध्ययनों द्वारा व्यवहार के कइर् ऐसे पक्ष सामने लाए गए हैं जिनका संबंध आत्म से होता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि हम सभी के अंदर यह जानने का बोध होता है कि हम कौन हैं और क्या हमको अन्य दूसरों से भ्िान्न बनाता है। हम अपनी व्यक्ितगत और सामाजिक अनन्यताओं से जुड़े रहते हैं और इस ज्ञान से कि ये अनन्यताएँ आजीवन स्िथर रहेंगी, हम सुरक्ष्िात अनुभव करते हैं। जिस प्रकार से हम अपने आपका प्रत्यक्षण करते हैं तथा अपनी क्षमताओं और गुणों के बारे में जो विचार रखते हैं, उसी को आत्म - संप्रत्यय या आत्म - धारणा ;ेमसबिवदबमचजद्ध कहा जाता है। अति सामान्य स्तर पर अपने बारे में इस प्रकार की धारणा समग्र रूप से या तो सकारात्मक होती है या नकारात्मक। इससे अिाक विश्िाष्ट स्तर पर एक व्यक्ित अपने शैक्ष्िाक प्रतिभा की अपेक्षा अपने खेलवूफद की बहादुरी के प्रति सकारात्मक धारणा रख सकता है या अपने गण्िातीय कौशलों की अपेक्षा अपनी पठन - योग्यता के प्रति सकारात्मक आत्म - संप्रत्यय रख सकता है। किसी व्यक्ित के आत्म - संप्रत्यय के बारे में जानकारी प्राप्त करना सरल नहीं होता है। इसके लिए सवार्िाक उपयोग में लाइर् जाने वाली वििा के अंतगर्त व्यक्ित से उसके बारे में पूछा जाता है। आत्म - सम्मान आत्म - सम्मान हमारे आत्म का एक महत्वपूणर् पक्ष है। व्यक्ित के रूप में हम सदैव अपने मूल्य या मान और अपनी योग्यता के बारे में निणर्य या आकलन करते रहते हैं। व्यक्ित का अपने बारे में यह मूल्य - निणर्य ही आत्म - सम्मान ;ेमस.िमेजममउद्ध कहा जाता है। वुफछ लोगों में आत्म - सम्मान उच्च स्तर का जबकि वुफछ अन्य लोगों में आत्म - सम्मान निम्न स्तर का पाया जाता है। किसी व्यक्ित के आत्म - सम्मान का मूल्यांकन करने के लिए उस व्यक्ित के समक्ष विविध प्रकार के कथन प्रस्तुत किए जाते हैं और उस व्यक्ित से पूछा जाता है कि किस सीमा तक वे कथन उसके संदभर् में सही हैं, यह बताएँ। उदाहरण के लिए, किसी बालक/बालिका से यह पूछा जा सकता है, फ्मैं गृह कायर् करने में अच्छा हूँय् अथवा फ्मुझे अक्सर विभ्िान्न खेलों में भाग लेने के लिए चुना जाता हैय् अथवा फ्मेरे सहपाठियों द्वारा मुझे बहुत पसंद किया जाता हैय् जैसे कथन उसके संदभर् में किस सीमा तक सही हैं। यदि बालक/ बालिका यह बताता/बताती है कि ये कथन उसके संदभर् में सही हैं तो उसका आत्म - सम्मान उस दूसरे बालक/बालिका की तुलना में अिाक होगा जो यह बताता/बताती है कि ये कथन उसके बारे में सही नहीं हैं। अध्ययनों से यह जानकारी प्राप्त हुइर् है कि छः से सात वषर् तक के बच्चों में आत्म - सम्मान चार क्षेत्रों में निमिर्त हो जाता है - शैक्ष्िाक क्षमता, सामाजिक क्षमता, शारीरिक/ खेलवूफद संबंिात क्षमता और शारीरिकरूप जो आयु केबढ़ने के साथ - साथ और अिाक परिष्कृत होता जाता है।अपनी स्िथर प्रवृिायों के रूप में अपने प्रति धारणा बनाने की क्षमता हमें भ्िान्न - भ्िान्न आत्म - मूल्यांकनों को जोड़कर अपने बारे में एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रतिमा निमिर्त करने का अवसर प्रदान करती है। इसी को हम आत्म - सम्मान की समग्र भावना के रूप में जानते हैं। आत्म - सम्मान हमारे दैनिक जीवन के व्यवहारों से अपना घनिष्ठ संबंध प्रदश्िार्त करता है। उदाहरण के लिए जिन बच्चों में उच्च शैक्ष्िाक आत्म - सम्मान होता है उनका निष्पादन विद्यालयों में निम्न आत्म - सम्मान रखने वाले बच्चों की तुलना में अिाक होता है और जिन बच्चों में उच्च सामाजिक आत्म - सम्मान होता है उनको निम्न सामाजिक आत्म - सम्मान रखने वाले बच्चों की तुलना में सहपाठियों द्वारा अिाक पसंद किया जाता है। दूसरी तरपफ, जिन बच्चों ़में सभी क्षेत्रों में निम्न आत्म - सम्मान होता है उनमें दुश्िंचता, अवसाद और समाजविरोधी व्यवहार पाया जाता है। अध्ययनों द्वारा प्रदश्िार्त किया गया है कि जिन माता - पिता द्वारा स्नेह के साथ सकारात्मक ढंग से बच्चों का पालन - पोषण किया जाता है ऐसे बालकों में उच्च आत्म - सम्मान विकसित होता है क्योंकि ऐसा होने पर बच्चे अपने आपको सक्षम और योग्य व्यक्ित के रूप में स्वीकार करते हैं। जो माता - पिता बच्चों द्वारा सहायता न माँगने पर भी यदि उनके निणर्य स्वयं लेते हैं तो ऐसे बच्चों में निम्न आत्म - सम्मान पाया जाता है। आत्म - सक्षमता आत्म - सक्षमता ;ेमस.िमपििबंबलद्ध हमारे आत्म का एक अन्य महत्वपूणर् पक्ष है। लोग एक - दूसरे से इस बात में भी भ्िान्न होते हैं कि उनका विश्वास इसमें है कि वे अपने जीवन के परिणामों को स्वयं नियंत्रिात कर सकते हैं अथवा इसमें कि उनके जीवन के परिणाम भाग्य, नियति अथवा अन्य स्िथतिपरककारकों द्वारा नियंत्रिात होते हैं उदाहरणाथर् - परीक्षा में उत्तीणर् होना। एक व्यक्ित यदि ऐसा विश्वास रखता है कि किसी स्िथति विशेष की माँगों के अनुसार उसमें योग्यता है या व्यवहार करने की क्षमता है तो उसमें उच्च आत्म - समक्षता होती है। आत्म - सक्षमता की अवधारणा बंदूरा ;ठंदकनतंद्ध के सामाजिक अिागम सि(ांत पर आधारित है। बंदूरा के आरंभ्िाक अध्ययन इस बात को प्रदश्िार्त करते हैं कि बच्चे और वयस्क दूसरों का प्रेक्षण एवं अनुकरण कर व्यवहारों को सीखते हैं। लोगों की अपनी प्रवीणता और उपलब्िध की प्रत्याशाओं एवं स्वयं अपनी प्रभाविता के प्रति दृढ़ विश्वास से भी यहनिधार्रित होता है कि वे किस तरह के व्यवहारों में प्रवृत्त होंगे और व्यवहार विशेष को संपादित करने में कितना जोख्िाम उठाएँगे। आत्म - सक्षमता की प्रबल भावना लोगों को अपने जीवन की परिस्िथतियों का चयन करने, उनको प्रभावित करने एवं यहाँ तक कि उनका निमार्ण करने को भी प्रेरित करती है। आत्म - सक्षमता की प्रबल भावना रखने वाले लोगों में भय का अनुभव भी कम होता है। आत्म - सक्षमता को विकसित किया जा सकता है। देखा गया है कि उच्च आत्म - सक्षमता रखने वाले लोग ध्रूमपान न करने का निणर्य लेने के बाद तत्काल इस पर अमल कर लेते हैं। बच्चों के आरंभ्िाक वषो± में सकारात्मक प्रतिरूपों या माॅडलों को प्रस्तुत कर हमारा समाज, हमारे माता - पिता और हमारे अपने सकारात्मक अनुभव आत्म - सक्षमता की प्रबल भावना के विकास में सहायक हो सकते हैं। आत्म - नियमन आत्म - नियमन ;ेमस.ितमहनसंजपवदद्ध का तात्पयर् हमारे अपने व्यवहार को संगठित और परिवीक्षण या माॅनीटर करने की योग्यता से है। जिन लोगों में बाह्य पयार्वरण की माँगों के अनुसार अपने व्यवहार को परिवतिर्त करने की क्षमता होती है, वे आत्म - परिवीक्षण में उच्च होते हैं। जीवन की कइर् स्िथतियों में स्िथतिपरक दबावों के प्रति लोगों द्वारा उपयोग में लाइर् जाती हैं और आत्म - नियमन तथा ±प्रतिरोध और स्वयं पर नियंत्राण की आवश्यकता होती है। आत्म - नियंत्राण के संदभर् में अत्यंत प्रभावी पाइर् गइहैं। यह संभव होता है उस चीश के द्वारा जिसे हम सामान्यतया ‘संकल्प शक्ित’ के रूप में जानते हैं। मनुष्य रूप में हम जिस तरह भी चाहें अपने व्यवहार को नियंत्रिात कर सकते हैं। हम प्रायः अपनी वुफछ आवश्यकताओं की संतुष्िट को विलंबित अथवा आस्थगित कर देते हैं। आवश्यकताओं के परितोषण को विलंबित अथवा आस्थगित करने के व्यवहार को सीखना ही आत्म - नियंत्राण ;ेमस.िबवदजतवसद्ध कहा जाता है। दीघार्विा लक्ष्यों की संप्राप्ित में आत्म - नियंत्राण एकमहत्वपूणर् भूमिका निभाता है। भारतीय सांस्कृतिक परंपराएँ हमें वुफछ ऐसे प्रभावी उपाय प्रदान करती हैं जिनसे आत्म - नियंत्राण का विकास होता है ;उदाहरणाथर्, व्रत अथवा रोशा में उपवास करना और सांसारिक वस्तुओं के प्रति अनासक्ित का भाव रखनाद्ध। आत्म - नियंत्राण के लिए अनेक मनोवैज्ञानिक तकनीवेंफ सुझाईं गइर् हैं। अपने व्यवहार का प्रेक्षण ;वइेमतअंजपवद व िवूद इमींअपवनतद्ध एक तकनीक है जिसके द्वारा आत्म के विभ्िान्न पक्षों को परिवतिर्त, परिमा£जत अथवा सशक्त करने के लिए आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त होती हंै। आत्म - अनुदेश ;ेमस.िपदेजतनबजपवदद्ध एक अन्य महत्वपूणर् तकनीक है। हम प्रायः अपने आपको वुफछ करने तथा मनोवांछित तरीके से व्यवहार करने के लिए अनुदेश देते हैं। ऐसे अनुदेश आत्म - नियमन में प्रभावी होते हैं। आत्म - प्रबलन ;ेमस.ितमपदवितबमउमदजद्ध एक तीसरी तकनीक है। इसके अंतगर्त ऐसे व्यवहार पुरस्कृत होते हैं जिनके परिणाम सुखद होते हैं। उदाहरणाथर्, यदि आपने अपनी परीक्षा में अच्छा निष्पादन किया है तो आप अपने मित्रों के साथ पिफल्म देखने जा सकते हैं। ये तकनीवेंफ संस्कृति एवं आत्म आत्म के अनेक पक्ष संस्कृति के उन विश्िाष्ट रूपों से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं जिनमें एक व्यक्ित अपना जीवनयापनकरता है। भारतीय सांस्कृतिक संदभर् में आत्म का विश्लेषण अनेक महत्वपूणर् पक्षों को स्पष्ट करता है जो पाश्चात्यसांस्कृतिक संदभर् में पाए जाने वाले पक्षों से भ्िान्न होते हैं। भारतीय और पाश्चात्य अवधारणाओं के मध्य एक महत्वपूणर् अंतर इस तथ्य को लेकर है कि आत्म और दूसरे अन्य के बीच किस प्रकार से सीमा रेखा निधार्रित की गइर् है। पाश्चात्यअवधारणा में यह सीमा रेखा अपेेक्षाकृत स्िथर और दृढ़ प्रतीत होती है। दूसरी तरप़्ाफ, भारतीय अवधारणा में आत्म और अन्य केमध्य सीमा रेखा स्िथर न होकर परिवतर्नीय प्रकृति की बताइर् गइर् है। इस प्रकार एक क्षण में व्यक्ित का आत्म अन्य सब वुफछ को अपने में अंतनिर्हित करता हुआ समूचे ब्रह्मांड में विलीन होता हुआ प्रतीत होता है। विंफतु दूसरे क्षण में आत्म अन्य सबसे पूणर्तया विनिवतिर्त होकर व्यक्ितगत आत्म ;उदाहरणाथर्, हमारी व्यक्ितगत आवश्यकताएँ एवं लक्ष्यद्ध पर वेंफदि्रत होता हुआ प्रतीत होता है। पाश्चात्य अवधारणा आत्म और अन्य मनुष्य औरप्रकृति तथा आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ के मध्य स्पष्ट द्विभाजन करती हुइर् प्रतीत होती है। भारतीय अवधारणा इस प्रकार का कोइर् स्पष्ट द्विभाजन नहीं करती है। चित्रा 2ण्1 में इस संबंध को प्रदश्िार्त किया गया है।पाश्चात्य संस्कृति में आत्म और समूह को स्पष्ट रूप से परिभाष्िात सीमा रेखाओं के साथ दो भ्िान्न इकाइयों के रूप चित्रा 2ण्1 भारतीय तथा पाश्चात्य सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों में आत्म एवं समूह की सीमा रेखाएँ में स्वीकार किया गया है। व्यक्ित समूह का सदस्य होते हुएभी अपनी वैयक्ितकता बनाए रखता है। भारतीय संस्कृति में आत्म को व्यक्ित के अपने समूह से पृथक नहीं किया जाता हैऋ बल्िक दोनों सामंजस्यपूणर् सह - अस्ितत्व के साथ बने रहते हैं। दूसरी तरपफ, पाश्चात्य संस्कृति मेें दोनों के बीच़एक दूरी बनी रहती है। यही कारण है कि अनेक पाश्चात्यसंस्कृतियों का व्यक्ितवादी और अनेक एश्िायाइर् संस्कृतियों का सामूहिकतावादी संस्कृति के रूप में विशेषीकरण किया जाता है। व्यक्ितत्व का संप्रत्यय ‘व्यक्ितत्व’ शब्द प्रायः हमारी दैनंदिन चचार् अथवा बातचीत में प्रकट हाता रहता है। व्यक्ितत्व का शाब्िदक अथर् लैटिन ेशब्द परसोना ;चमतेवदंद्ध से लिया गया है। परसोना उस मुखौटे को कहते हैं जिसे अपनी मुख - रूपसज्जा को बदलने के लिए रोमन नाटकों में अभ्िानेता उपयोग में लाते थे। जिस मुखौटे को अभ्िानेता अपनाता था उसी के अनुरूप दशर्क उससे एक विश्िाष्ट भूमिका के निष्पादन की प्रत्याशा करते थे। इससे ये तात्पयर् बिल्वुफल नहीं था कि किसी भूमिका को जो व्यक्ित अभ्िाव्यक्त कर रहा है वह वास्तव में उन गुणों को रखता है। एक सामान्य जन के लिए, व्यक्ितत्व का तात्पयर् सामान्यतया व्यक्ित के शारीरिक एवं बाह्य रूप से होता है। उदाहरण के लिए जब कोइर् व्यक्ित सुंदर दिखाइर् देता है तो हम ये मान लेते हैं कि वह व्यक्ित सौम्य व्यक्ितत्व वाला है। व्यक्ितत्व की यह अवधारणा सतही प्रभावांकनों पर आधारित होती है जो सही नहीं होती है। मनोवैज्ञानिक शब्दों में व्यक्ितत्व ;चमतेवदंसपजलद्ध से तात्पयर् उन विश्िाष्ट तरीकों से है जिनके द्वारा व्यक्ितयों और स्िथतियों के प्रति अनुिया की जाती है। लोग सरलता से इस बात का वणर्न कर सकते हैं कि वे किस तरीके से विभ्िान्न स्िथतियों के प्रति अनुिया करते हैं। वुफछ सूचक शब्दों ;जैसे - शमीर्ला, संवेदनशील, शांत, गंभीर, स्पूफतर् आदिद्ध का उपयोग प्रायः व्यक्ितत्व का वणर्न करने के लिए किया जाता है। ये शब्द व्यक्ितत्व के विभ्िान्न घटकों को इंगित करते हैं। इस अथर् में व्यक्ितत्व से तात्पयर् उन अनन्य एवं सापेक्ष रूप से स्िथर गुणों से है जो एक समयाविा में विभ्िान्न स्िथतियों में व्यक्ित के व्यवहार को विश्िाष्टता प्रदान करते हैं। यदि आप ध्यानपूवर्क देखें तो पाएँगे कि लोग अपने व्यवहार में भ्िान्नताएँ प्रदश्िार्त करते हैं। कोइर् एक व्यक्ित सदैव सावधान अथवा आवेगी, शमीर्ला अथवा मित्रावत् नहीं होता है। व्यक्ितत्व व्यक्ितयों की उन विशेषताओं को कहते हैं जो अिाकांश परिस्िथतियों में प्रकट होती हैं। विभ्िान्न परिस्िथतियों तथा समयों पर किसी व्यक्ित के व्यवहार, चिंतन और संवेग में संगति उसके व्यक्ितत्व की विशेषता होती है। उदाहरण के लिए यदि कोइर् व्यक्ित इर्मानदार है तो कोइर् भी परिस्िथति या किसी भी समय पर वह इर्मानदार बना रहेगा। व्यवहार में स्िथतिपरक भ्िान्नताएँ भी घटित होती हैं क्योंकि वे पयार्वरणी परिस्िथतियों के प्रति व्यक्ितयों के अनुवूफलन में सहायक होती हैं। संक्षेप में व्यक्ितत्व को अधोलिख्िात विशेषताओं के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है कृ 1ण् इसके अंतगर्त शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही घटक होते हैं। 2ण् किसी व्यक्ित विशेष में व्यवहार के रूप में इसकी अभ्िाव्यक्ित पयार्प्त रूप से अनन्य होती है। 3ण् इसकी प्रमुख विशेषताएँ साधारणतया समय के साथ परिवतिर्त नहीं होती हैं। 4ण् यह इस अथर् में गत्यात्मक होता है कि इसकी वुफछ विशेषताएँ आंतरिक अथवा बाह्य स्िथतिपरक माँगों के कारण परिवतिर्त हो सकती हैं। इस प्रकार व्यक्ितत्व स्िथतियों के प्रति अनुवूफलनशील होता है। एक बार जब हम किसी के व्यक्ितत्व की विशेषताओं को बताने में समथर् हो जाते हैं तो हम इस बात की भविष्यवाणी भी कर सकते हैं कि वह व्यक्ित विभ्िान्न परिस्िथतियों में किस तरह का व्यवहार करेगा। व्यक्ितत्व की समझ हमें यथाथर्वादी तथा स्वीकायर् तरीके से लोगों के साथ व्यवहार करने में सहायता करती है। उदाहरण के लिए, यदि आप यह पाते हैं कि कोइर् बच्चा आदेशों को पसंद नहीं करता है तो उस बच्चे से व्यवहार करने का सबसे अिाक प्रभावी तरीका यह होगा कि उसे आदेश न दिया जाए विंफतु उसके समक्ष स्वीकायर् विभ्िान्न विकल्प प्रस्तुत किए जाएँ जिनमें से बच्चा किसी एक विकल्प का चयन कर सके। इसी प्रकार एक बच्चा जिसमें हीनता की भावना है, उससे बरताव या व्यवहार उस बच्चे से, जिसमें आत्म - विश्वास है, भ्िान्न तरीके से किया जाना चाहिए। व्यक्ितयों की व्यवहारपरक विशेषताओं को बताने के लिए अनेक दूसरे शब्दों का उपयोग किया गया है। प्रायः इनका व्यक्ितत्व के समानाथीर् शब्दों के रूप में उपयोग किया जाता है। इनमें से वुफछ शब्द बाॅक्स 2ण्1 में उनको परिभाष्िात करने वाली विशेषताओं के साथ दिए गए हैं। आप उनको ध्यानपूवर्क यह देखने के लिए पढ़ सकते हैं कि वह किस तरह से व्यक्ितत्व की अवधारणा से भ्िान्न है। व्यक्ितत्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम व्यक्ितत्व के अध्ययन में अभ्िारुचि रखने वाले मनोवैज्ञानिकोंने व्यक्ितत्व में व्यक्ितगत भ्िान्नताओं की प्रकृति एवं उत्पिा के बारे में वुफछ प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास किया है। आपने देखा होगा कि एक ही परिवार में दो बच्चों के व्यक्ितत्व का विकास आश्चयर्जनक रूप से भ्िान्न प्रकार का होता है। न केवल वे बच्चे शारीरिक दृष्िट से भ्िान्न होते हैं अपितु विभ्िान्न स्िथतियों में वे भ्िान्न प्रकार का व्यवहार भी प्रदश्िार्त करते हैं। इस प्रकार के प्रेक्षण प्रायः वुफतूहल या जिज्ञासा उत्पन्न कर हमें यह प्रश्न पूछने पर बाध्य करते हैं कि फ्क्यों ऐसा होता है कि वुफछ लोग किसी स्िथति विशेष में अन्य दूसरे लोगों से भ्िान्न प्रतििया करते हैं? क्यों ऐसा होता है कि वुफछ लोग साहसिक कायो± में आनंद का अनुभव करते हैं जबकि वुफछ दूसरे लोग पढ़ना, टेलीविशन देखना अथवा ताश खेलना पसंद करते हैं? क्या इस प्रकार की भ्िान्नताएँ जीवन भर स्िथर रूप से बनी रहती हैं अथवा ये मात्रा अल्पकालिक और स्िथति - विश्िाष्ट होती हैं? व्यक्ितयों के व्यवहारों में पाइर् जाने वाली भ्िान्नता तथा संगति को समझने के लिए और उसकी व्याख्या करने के लिए अनेक उपागम एवं सि(ांत विकसित किए गए हैं। ये सि(ांत मानव व्यवहार के विभ्िान्न माॅडलों पर आधारित हैं। प्रत्येक सि(ांत व्यक्ितत्व के वुफछ पक्षों पर ही प्रकाश डालता है, सभी पक्षों पर नहीं। मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ितत्व के प्रैाष्क;शीलगुणद्ध रूप आर विश्ेाउपागमों वेफ मध्य विभेद किया है। प्ररूप उपागम ;जलचम ंचचतवंबीद्ध व्यक्ित के प्रेक्ष्िात व्यवहारपरक विशेषताओं के वुफछ व्यापक स्वरूपों का परीक्षण कर मानव व्यक्ितत्व को समझने का प्रयास करता है। प्रत्येक व्यवहारपरक स्वरूप व्यक्ितत्व के किसी एक प्रकार को इंगित करता है जिसके अंतगर्त उस स्वरूप की व्यवहारपरक विशेषता की समानता के आधार पर व्यक्ितयों को रखा जाता है। इसके विपरीत, विशेषक उपागम ;जतंपज ंचचतवंबीद्ध विश्िाष्ट मनोवैज्ञानिक गुणों पर बल देता है जिसके आधार पर व्यक्ित संगत और स्िथर रूपों में भ्िान्न होते हैं। उदाहरणाथर्, एक व्यक्ित कम शमीर्ला हो सकता है जबकि दूसरा अिाकऋ एक व्यक्ित अिाक मैत्राीपूणर् व्यवहार कर सकता है और दूसरा कम। यहाँ फ्शमीर्लापनय् और ‘‘मैत्राीपूणर् व्यवहार’’ विशेषकों का प्रतिनििात्व करते हैं जिसके आधार पर व्यक्ितयों में संबंिात व्यवहारपरक गुणों या विशेषकों की उपस्िथति या अनुपस्िथति की मात्रा का मूल्यांकन किया जा सकता है। अंतःियात्मक उपागम ;पदजमतंबजपवदंस ंचचतवंबीद्ध के अनुसार स्िथतिपरक विशेषताएँ हमारे व्यवहारों को निधार्रित करने में महत्वपूणर् भूमिका निभाती हैं। लोग स्वतंत्रा अथवा आश्रित प्रकार का व्यवहार करेंगे यह उनके आंतरिक व्यक्ितत्व विशेषक पर निभर्र नहीं करता है बल्िक इस पर निभर्र करता है कि किसी विश्िाष्ट स्िथति में बाह्य पुरस्कार अथवा खतरा उपलब्ध है कि नहीं। भ्िान्न - भ्िान्न स्िथतियों में विशेषकों को लेकर संगति अत्यंत निम्न पाइर् जाती है। बाशार में, न्यायालय में अथवा पूजास्थलों पर लोगों के व्यवहारों का प्रेक्षण कर स्िथतियों के अप्रतिरोध्य प्रभाव को देखा जा सकता है। प्ररूप उपागम जैसा कि हमने ऊपर स्पष्ट किया है कि व्यक्ितत्व के प्ररूप ;टाइपद्ध समानताओं पर आधारित प्रत्याश्िात व्यवहारों के एक समुच्चय का प्रतिनििात्व करते हैं। प्राचीन काल से ही लोगों को व्यक्ितत्व के प्ररूपों में वगीर्वृफत करने का प्रयास किया गया है। ग्रीक चिकित्सक हिप्पोेवे्रफट्स ;भ्पचचवबतंजमेद्ध ने एक व्यक्ितत्व का प्ररूपविज्ञान प्रस्तावित किया जो फ्रलूइड ;सिनपकद्ध अथवा “यूमर ;ीनउवनतद्ध पर आधारित है। उन्होंने लोगों को चार प्ररूपों में वगीर्वृफत किया है ;जैसे - उत्साही, श्लैष्िमक, विवादी तथा कोपशीलद्ध। प्रत्येक प्ररूप विश्िाष्ट व्यवहारपरक विशेषताओं वाला होता है। भारत में भी एक प्रसि( आयुवेर्दिक ग्रन्थ चरक संहिता ने लोगों को वात, पित्त एवं कपफ इन तीन वगो± में तीन “यूमरल तत्वों, जिन्हें त्रिादोष कहते हैं, के आधार पर वगीर्वृफत किया है।इनमें से प्रत्येक प्ररूप मनुष्य के स्वभाव अथवा उसकी प्रकृति को बताता है। इसके अतिरिक्त त्रिागुण ;अथार्त सत्व, रजस तथा तमसद्ध के आधार पर भी एक व्यक्ितत्व प्ररूपविज्ञान प्रतिपादित किया गया है। सत्व गुण के अंतगर्त स्वच्छता, सत्यवादिता, कतर्व्यनिष्ठा, अनासक्ित या विलग्नता, अनुशासन आदि गुण आते हैं। रजस गुण के अंतगर्त तीव्र िया, इंदि्रय - तुष्िट की इच्छा, असंतोष, दूसरों के प्रति असूया ;इर्ष्याद्ध और भौतिकवादी मानसिकता आदि गुण आते हैं। तमस गुण के अंतगर्त क्रोध, घमंड, अवसाद, आलस्य, असहायता की भावना आदि गुण आते हैं। ये तीनों ही गुण प्रत्येक व्यक्ित में भ्िान्न - भ्िान्न मात्रा में विद्यमान रहते हैं। इनमें से किसी भी एक अथवा दूसरे गुण की प्रभाविता एक विश्िाष्ट प्रकार के व्यवहार को प्रेरित करती है। मनोविज्ञान में शेल्डन ;ैीमसकवदद्ध द्वारा प्रतिपादित व्यक्ितत्व के प्ररूप सवर्विदित हैं। शारीरिक बनावट औरस्वभाव को आधार बनाते हुए शेल्डन ने गोलाकृतिक ;मदकवउवतचीपबद्ध आयताकृतिक ;उमेवउवतचीपबद्ध औरलंबाकृतिक ;मबजवउवतचीपबद्ध जैसे व्यक्ितत्व वेफ प्ररूप को प्रस्तावित किया है। गोलाकृतिक प्ररूप वाले व्यक्ित मोटे मृदुल और गोल होते है। स्वभाव से वे लोग श्िाथ्िाल और सामाजिकया मिलनसार होते हैं। आयताकृतिक प्ररूप वाले लोग मशबूत पेशीसमूह एवं सुगठित शरीर वाले होते हैं जो देखने में आयताकार होते हैं, ऐसे व्यक्ित उफजर्स्वी एवं साहसी होते हैं।लंबाकृतिक प्ररूप वाले पतले, लंबे और सुवुफमार होते हैं। ऐसे व्यक्ित वुफशाग्रबुि वाले, कलात्मक और अंतमुर्खी होते हैं। यहाँ ध्यातव्य है कि व्यक्ितत्व के ये शारीरिक प्ररूप सरल विंफतु व्यक्ितयों के व्यवहारों की भविष्यवाणी करने में सीमित उपयोगिता वाले हैं। वस्तुतः व्यक्ितत्व के ये प्ररूप रूढ़धारणाओं की तरह हैं जो लोग उपयोग करते ह।ंैयुंग ;श्रनदहद्ध ने व्यक्ितत्व का एक अन्य प्ररूपविज्ञान प्रस्तावित किया है जिसमें लोगों को उन्होंने अंतमुर्खी एवं बहिमुर्खी दो वगो± में वगीर्वृफत किया है। यह प्ररूप व्यापक रूप से स्वीकार किए गए हैं। इसके अनुसार अंतमुर्खी वह लोग होते हैं जो अकेले रहना पसंद करते हैं, दूसरों से बचते हैं, सांवेगिक द्वंद्वांे से पलायन करते हैं और शमीर्ले होते हैं। दूसरी ओर, बहिमुर्खी वह लोग होते हैं जो सामाजिक तथा बहिगार्मी होते हैं और ऐसे व्यवसायों का चयन करते हैं जिसमें लोगों से वे प्रत्यक्ष रूप से संपवर्फ बनाए रख सवेंफ। लोगों के बीच में रहते हुए तथा सामाजिक कायो± को करते हुए वे दबावों के प्रति प्रतििया करते हैं।हाल के वषो± में Úीडमैन ;थ्तपमकउंदद्ध एवं रोजेनमैन ;त्वेमदउंदद्ध ने टाइप ‘ए’ तथा टाइप ‘बी’, इन दो प्रकार के व्यक्ितत्वों में लोगों का वगीर्करण किया है। इन दोनों शोधकतार्ओं ने मनोसामाजिक जोख्िाम वाले कारकों का अध्ययन करते हुए इन प्ररूपों की खोज की। टाइप ‘ए’ ;ज्लचम.।द्ध व्यक्ितत्व वाले लोगों में उच्चस्तरीय अभ्िाप्रेरणा, धैयर् की कमी, समय की कमी का अनुभव करना, उतावलापन और कायर् के बोझ से हमेशा लदे रहने का अनुभव करना पाया जाता है। ऐसे लोग निश्िंचत होकर मंदगति से कायर् करने में कठिनाइर् का अनुभव करते हैं। टाइप ‘ए’ व्यक्ितत्व वाले लोग अतिरक्तदान और काॅरोनरी हृदय रोग ;बवतवदंतल ीमंतज कपेमंेमए ब्भ्क्द्ध के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। इस प्रकार के लोगों में कभी - कभी सी.एच.डी. के विकसित होने का खतरा, उच्च रक्तदाब, उच्च कोलेस्ट्राॅल स्तर और ध्रूमपान से उत्पन्न होने वाले खतरों की अपेक्षा अिाक होता है। इसके विपरीत, टाइप ‘बी’ ;ज्लचम.ठद्ध व्यक्ितत्व को टाइप ‘ए’ व्यक्ितत्व की विशेषताओं के अभाव के रूप में समझा जा सकता है। व्यक्ितत्व के इस प्ररूपविज्ञान को आगे भी विस्तार प्राप्त हुआ है। माॅरिस ;डवततपेद्ध ने एक टाइप ‘सी’ ;ज्लचम.ब्द्ध व्यक्ितत्व को सुझाया है जो वैंफसर जैसे रोग के प्रति संवेदनशील होता है। इस प्रकार के व्यक्ितत्व वाले लोग सहयोगशील, विनीत और धैयर्वान होते हैं। ऐसे व्यक्ित अपने निषेधात्मक संवेगांे;जैसे - क्रोधद्ध का दमन करने वाले और आप्त व्यक्ितयों के प्रति आज्ञापालन का प्रदशर्न करने वाले होते हैं। हाल ही में एक टाइप ‘डी’ ;ज्लचम.क्द्ध व्यक्ितत्व का सुझाव भी दिया गया है और इस व्यक्ितत्व वाले लोगों में अवसाद के प्रति प्रवणता पाइर् जाती है। उपयर्ुक्त व्यक्ितत्व के प्ररूप सामान्यतया आकष्िार्त करनेवाले हैं विंफतु वे अत्यंत सरलीकृत हैं। मानव व्यवहार अत्यिाक जटिल और परिवतर्नशील होता है। लोगों कोकिसी एक विश्िाष्ट व्यक्ितत्व प्ररूप में वगीर्कृत करना कठिन होता है। उपयर्ुक्त सरल वगीर्करण योजना में स्पष्टताके साथ लोगों को वगीर्कृत करना पूरी तरह संभव नहीं है। विशेषक उपागम ये सि(ांत मुख्यतः व्यक्ितत्व के आधारभूत घटकों के वणर्न अथवा विशेषीकरण से संबंिात होते हैं। ये सि(ांत व्यक्ितत्व का निमार्ण करने वाले मूल तत्वों की खोज करते हैं। मनुष्य व्यापक रूप से मनोवैज्ञानिक गुणों में भ्िान्नताओं का प्रदशर्न करते हैं, पिफर भी उनको व्यक्ितत्व विशेषकों के लघु समूह में सम्िमलित किया जा सकता है। विशेषक उपागम हमारे दैनिक जीवन के सामान्य अनुभव के बहुत समान है। उदाहरण के लिए, जब हम यह जान लेते हैं कि कोइर् व्यक्ित सामाजिक है तब हम यह मान लेते हैं कि वह व्यक्ित न केवल सहयोग, मित्राता और सहायता करने वाला होगा बल्िक वह अन्य सामाजिक घटकों से युक्त व्यवहार प्रदश्िार्त करने मेंभी प्रवृत्त होगा। इस प्रकार, विशेषक उपागम लोगों की प्राथमिक विशेषताओं की पहचान करने का प्रयास करता है।एक विशेषक अपेक्षाकृत एक स्थायी गुण माना जाता है जिस पर एक व्यक्ित दूसरों से भ्िान्न होता है। इसमें संभव व्यवहारों की एक शंृखला अंतनिर्हित होती है जिसको स्िथति की माँगों के द्वारा सियता प्राप्त होती है। सारांश रूप में कहा जा सकता है किμ ;अद्ध विशेषक समय की विमा पर अपेक्षाकृत स्िथर होते हैं, ;बद्ध विभ्िान्न स्िथतियों में उनमें सामान्यतया संगति होती है और ;सद्ध उनकी शक्ित और उनका संयोजन एक व्यक्ित से दूसरे व्यक्ित में भ्िान्न पाया जाता है जिसके कारण व्यक्ितत्व में व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं। अपने सि(ांतों का प्रतिपादन करने के लिए अनेक मनोवैज्ञानिकों ने विशेषकों का उपयोग किया है। हम वुफछ महत्वपूणर् सि(ांतों का वणर्न करेंगे। आॅलपोटर् का विशेषक सि(ांत गाॅडर्न आॅलपोटर् ;ळवतकवद ।ससचवतजद्ध को विशेषक उपागम का अग्रणी माना जाता है। उन्होंने प्रस्तावित किया है किव्यक्ित में अनेक विशेषक होते हैं जिनकी प्रकृति गत्यात्मक होती है। ये विशेषक व्यवहारों का निधार्रण इस रूप में करते हैं कि व्यक्ित विभ्िान्न स्िथतियों में समान योजनाओं के साथ ियाशील होता है। विशेषक उद्दीपकों और अनुियाओं को समाकलित करते हैं अन्यथा वे असमान दिखाइर् देते हैं। आॅलपोटर् ने यह तवर्फ प्रस्तुत किया है कि लोग स्वयं का तथा दूसरों का वणर्न करने के लिए जिन शब्दों का उपयोग करते हैं वे शब्द मानव व्यक्ितत्व को समझने का आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने अंग्रेशी भाषा के शब्दों का विश्लेषण विशेषकों का पता लगाने के लिए किया है जो किसी व्यक्ित का वणर्न है। इसके आधार पर आॅलपोटर् ने विशेषकों का तीन वगो± में वगीर्करण कियाकृप्रमुख विशेषक, वेंफद्रीय विशेषक तथा गौण विशेषक। प्रमुख विशेषक ;बंतकपदंस जतंपजेद्ध अत्यंत सामान्यीकृत प्रवृिायाँ होती हैं। ये उस लक्ष्य को इंगित करती हैं जिसके चतुदिर्क व्यक्ित का पूरा जीवन व्यतीत होता है। महात्मा गांधी की अहिंसा और हिटलर का नाशीवाद प्रमुख विशेषक के उदाहरण हैं। ये विशेषक व्यक्ित के नाम के साथ इस तरह घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं कि उनकी पहचान ही व्यक्ित के नाम के साथ हो जाती है, जैसे - ‘गांधीवादी’ अथवा ‘हिटलरवादी’ विशेषक। प्रभाव मेंकम व्यापक विंफतु पिफर भी सामान्यीकृत प्रवृिायाँ ही वेंफद्रीय विशेषक ;ब्मदजतंस जतंपजेद्ध के रूप में जानी जाती हैं। ये विशेषक ;उदाहरणाथर्, स्पूफतर्, निष्कपट, मेहनती आदिद्ध प्रायः लोगों के शंसापत्रों में अथवा नौकरी की संस्तुतियों में किसी व्यक्ित के लिए लिखे जाते हैं। व्यक्ित की सबसे कमसामान्यीकृत विश्िाष्टताओं के रूप में गौण विशेषक ;ैमबवदकंतल जतंपजेद्ध जाने जाते हैं। ऐसे विशेषकों के उदाहरण इन वाक्यों में, जैसे - मुभेफ आम पसंद हैं’ अथवा ‘मुभेफ संजातीय वस्त्रा पहनना पसंद है’ देखेे जा सकते हैं। यद्यपि आॅलपोटर् ने व्यवहार पर स्िथतियों के प्रभाव को स्वीकार किया है पिफर भी उनका मानना है कि स्िथति विशेष में व्यक्ित जिस प्रकार प्रतििया करता है वह उसके विशेषकों पर निभर्र करता है। लोग समान विशेषकों को रखते हुए भी उनको भ्िान्न तरीकों से व्यक्त कर सकते हैं। आॅलपोटर् ने विशेषकों को मध्यवतीर् परिवत्यो± की तरह अिाक माना है जो उद्दीपक स्िथति एवं व्यक्ित की अनुिया के मध्य घटित होते हैं। इसका तात्पयर् यह हुआ कि विशेषकों में किसी भी प्रकार की भ्िान्नता के कारण समान स्िथति में अथवा समान परिस्िथति के प्रति भ्िान्न प्रकार की अनुिया उत्पन्न होती है। वैेफटल - व्यक्ितत्व कारक रेमंड वैफटेल ;त्ंलउवदक ब्ंजजमससद्ध का यह विश्वास था कि एक सामान्य संरचना होती है जिसे लेकर व्यक्ित एक - दूसरे से भ्िान्न होते हैं। यह संरचना इंियानुभविक रीति से निधार्रित की जा सकती है। उन्होंने भाषा में उपलब्ध वणर्नात्मक विशेषणों के विशाल समुच्चय में से प्राथमिक विशेषकों की पहचान करने का प्रयास किया है। सामान्य संरचनाओं का पता लगाने के लिए उन्होंने कारक विश्लेषण ;थ्ंबजवत ंदंसलेपेद्ध नामक सांख्ियकीय तकनीक का उपयोग किया है। इसके आधार पर उन्होंने 16 प्राथमिक अथवा मूल विशेषकों की जानकारी प्राप्त की है। मूल विशेषक ;ेवनतबम जतंपजेद्ध स्िथर होते हैं और व्यक्ितत्व का निमार्ण करने वाले मूल तत्वों के रूप में जाने जाते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक सतही या पृष्ठ विशेषक ;ेनतंिबम जतंपजेद्ध भी होते हैं जो मूल विशेषकों की अंतःिया के परिणाम - स्वरूप उत्पन्न होते हैं। वैफटेल ने मूल विशेषकों कावणर्न विपरीताथीर् या विलोमी प्रवृिायों के रूप में किया है। उन्होंने व्यक्ितत्व के मूल्यांकन के लिए एक परीक्षण विकसित किया जिसे सोलह व्यक्ितत्व कारक प्रश्नावली ;ैपगजममद च्मतेवदंसपजल थ्ंबजवत फनमेजपवददंपतमए 16च्थ्द्ध के नाम से जाना जाता है। इस परीक्षण का मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग किया गया है। आइजेंक का सि(ांत एच. जे.आइजेंक ;भ्ण्श्रण् म्लमेमदबाद्ध ने व्यक्ितत्व को दो व्यापक आयामों के रूप में प्रस्तावित किया है। इन आयामों का आधार जैविक एवं आनुवंश्िाक है। प्रत्येक आयाम में अनेक विश्िाष्ट विशेषकों को सम्िमलित किया गया है। ये आयाम निम्न प्रकार के हैं - ;1द्ध तंत्रिाकातापिता बनाम सांवेगिक स्िथरता - इससे तात्पयर् है कि लोगों में किस मात्रा तक अपनी भावनाओं पर नियंत्राण होता है। इस आयाम के एक छोर पर तंत्रिाकाताप से ग्रस्त लोग होते है। ऐसे लोगों में दु¯श्चता, चिड़चिड़ापन, अतिसंवेदनशीलता, बेचैनी और नियंत्राण का अभाव पाया जाता है। दूसरे छोर पर वे लोग होते हैं जो शांत, संयत स्वभाव वाले विश्वसनीय और स्वयं पर नियंत्राण रखने वाले होते हैं। ;2द्ध बहिमुर्खता बनाम अंतमुर्खता - इससे तात्पयर् है कि किस मात्रा तक लोगों में सामाजिक - उन्मुखता अथवा सामाजिक - विमुखता पाइर् जाती है। इस आयाम के एक छोर पर वे लोग होते हैं जिनमें सियता, यूथचारिता, आवेग और रोमांच के प्रति पसंदगी पाइर् जाती है। दूसरे छोर पर वे लोग होते हैं जो निष्िक्रय, शांत, सतवर्फ और आत्म - वेंफित होते हैं। आइजेंक ने इसके पश्चात किए गए अनुसंधान कायो± के आधार पर एक तीसरा आयाम - मनस्तापिता बनाम सामाजिकता भी प्रस्तावित किया जो उपयुर्क्त दोनों आयामों से अंतःिया करता हुआ माना गया है। एक व्यक्ित जो मनस्तापिता के आयाम पर उच्च अंक प्राप्त करता है तो उसमें आक्रामक,अहं - वेंफित और समाजविरोधी होने की प्रवृिा पाइर् जाती है। आइजेंक व्यक्ितत्व प्रश्नावली ;म्लेमदबा च्मतेवदंसपजल फनमेजपवददंपतमद्ध एक परीक्षण है जिसका उपयोग व्यक्ितत्व के इन आयामों का अध्ययन करने के लिए किया गया है। विशेषक उपागम एक बहुत लोकपि्रय उपागम है जिसके संदभर् में अनेक प्रकार की प्रगति हो रही है। इनका उल्लेख आपके अध्ययन क्षेत्रा के परे है। व्यक्ितत्व के संदभर् में एक नए प्रकार का निरूपण सामने आया है जो विशेषकों को संगठित करने के लिए एक नइर् प्रकार की योजना प्रस्तुत करता है। यह नए प्रकार का निरूपण बाॅक्स 2.2 में दिया गया है। मनोविज्ञान मनोगतिक उपागम व्यक्ितत्व का अध्ययन करने के लिए यह एक अत्यंतलोकपि्रय उपागम है। यह विचारधारा सिगमंड Úायड ;ैपहउनदक थ्तमनकद्ध के योगदानों की )णी है। Úायड एक चिकित्सक थे और उन्होंने अपना सि(ांत अपने नैदानिक पेशे के दौरान विकसित किया। अपने पेशे के आरंभ्िाक दौर में उन्होंने शारीरिक और सांवेगिक समस्याओं से ग्रस्त लोगों का उपचार सम्मोहन ;ीलचदवेपेद्ध वििा के माध्यम से किया। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया कि उनके अिाकांश रोगी अपनी समस्याओं के बारे में बात करने की आवश्यकता अनुभव करते थे और बात कर लेने के बाद वे प्रायः अपनेको अच्छा महसूस करते थे। Úायड ने मन के आंतरिक प्रकायो± को समझने के लिए मुक्त साहचयर् ;एक वििा जिसमें व्यक्ित अपने मन में आने वाले सभी विचारों, भावनाओं और ¯चतनों को मुक्त भाव से व्यक्त करता हैद्ध, स्वप्न विश्लेषण और त्राुटियों के विश्लेषण का उपयोग किया है। चेतना के स्तर Úायड के सि(ांत में सांवेगिक द्वंद्वों के ड्डोतों एवं परिणामों पर तथा इनके प्रति लोगों द्वारा की जाने वाली प्रतििया पर विचार किया गया है। ऐसा विचार करते हुए यह सि(ांत मानव मन चेतना के तीन स्तरों ;जीतमम समअमसे व िबवदेबपवनेदमेेद्ध के रूप में देखता है। प्रथम स्तर चेतन ;बवदेबपवनेद्ध है जिसके अंतगर्त वे चिंतन, भावनाएँ और ियाएँ आती हैं जिनके प्रति लोग जागरूक रहते हैं। दूसरा स्तर पूवर्चेतना ;चतमबवदेबपवनेद्ध है जिसके अंतगर्त वे मानसिक ियाएँ आती हैं जिनके प्रति लोग तभी जागरूक होते हैं जब वे उन पर सावधानीपूवर्क ध्यान वेंफित करते हैं। चेतना का तीसरा स्तर अचेतन ;नदबवदेबपवनेद्ध है जिसके अंतगर्त ऐसी मानसिक ियाएँ आती हैं जिनके प्रति लोग जागरूक नहीं होते हैं।Úायड के अनुसार अचेतन मूलप्रवृिाक और पाशविक अंतनोर्दों का भंडार होता है। इसके अंतगर्त वे सभी इच्छाएँ और विचार भी होते हैं जो चेतन रूप से जागरूक स्िथति से छिपे हुए होते हैं क्योंकि वे मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों को उत्पन्न करते हैं। इनमें से अिाकांश कामेच्छाओं से उत्पन्न होते हैं जिनको प्रकट रूप से अभ्िाव्यक्त नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनका दमन कर दिया जाता है। अचेतन आवगोंकी अभ्िाव्यक्ित के वुफछ सामाजिक रूप से स्वीकायर् तरीकों को खोजने के लिए हैं अथवा उन आवेगों को अभ्िाव्यक्त होने से बचाने के लिए निरंतर संघषर् करते रहते हैं। द्वंद्वों के संदभर् में असपफल निणर्य लेने के परिणामस्वरूप अपसामान्य व्यवहार उत्पन्न होते हैं। विस्मरण, अशु( उच्चारण, मशाक एवं स्वप्नों के विश्लेषण हमें अचेतन तक पहुँचने के लिए साधन प्रदानकरते हैं। Úायड ने एक चिकित्सा प्रिया विकसित की जिसे मनोविश्लेषण ;चेलबीवंदंसलेपेद्ध के रूप में जाना जाता है। मनोविश्लेषण - चिकित्सा का आधारभूत लक्ष्य दमित अचेतन सामगि्रयों को चेतना के स्तर पर ले आना है जिससे कि लोग और अिाक आत्म - जागरूक और समाकलित तरीके से अपना जीवन व्यतीत कर सके। ंव्यक्ितत्व की संरचना Úायड के सि(ांत के अनुसार व्यक्ितत्व के प्राथमिक संरचनात्मक तत्व तीन हैं - इदम् या इड ;पकद्ध, अहं ;महवद्ध और पराहम् ;ेनचमतमहवद्ध। ये तत्व अचेतन में ऊजार् के रूप में होते हैं और इनके बारे में लागों द्वारा किए गए व्यवहार के तरीकों से अनुमान लगाया जा सकता है ;चित्रा 2ण्2 देखेंद्ध। यहाँ स्मरणीय है कि इड, अहं और पराहम् संप्रत्यय हैं न कि वास्तविक भौतिक संरचनाएँ। हम इनकी थोड़े विस्तार के साथ विवेचना करेंगे। और आक्रामक आवेगों की तात्कालिक तुष्िट से होता है। यह सुखेप्सा - सि(ांत ;चसमंेनतम चतपदबपचसमद्ध पर कायर् करता है जिसका यह अभ्िाग्रह होता है कि लोग सुख कीतलाश करते हैं और कष्ट का परिहार करते हैं। Úायड केअनुसार मनुष्य की अिाकांश मूलप्रवृिाक उफजार् कामुक होती है और शेष उफजार् आक्रामक होती है। इड को नैतिक मूल्यों, समाज और दूसरे लोगों की कोइर् परवाह नहीं होती है। अहं .इसका विकास इड से होता है और यह व्यक्ित कीमूलप्रवृिाक आवश्यकताओं की संतुष्िट वास्तविकता के धरातल पर करता है। व्यक्ितत्व की यह संरचना वास्तविकता - सि(ांत ;तमंसपजल चतपदबपचसमद्ध से संचालित होती है और प्रायः इड को व्यवहार करने के उपयुक्त तरीकों की तरपफ निदिर्ष्ट करता है। उदाहरण के लिए, एक बालक का ़इड जो आइसक्रीम खाना चाहता है उससे कहता है कि आइसक्रीम झटक कर खा ले। उसका अहं उससे कहता है कि दुकानदार से पूछे बिना यदि आइसक्रीम लेकर वह खा लेता है तो वह दंड का भागी हो सकता है। वास्तविकता - सि(ांत पर कायर् करते हुए बालक जानता है कि अनुमति लेने के बाद ही आइसक्रीम खाने की इच्छा को संतुष्ट करना सवार्िाक उपयुक्त होगा। इस प्रकार इड की माँग अवास्तविक और सुखेप्सा - सि(ांत से संचालित होती है, अहं धैयर्वान, तवर्फसंगत तथा वास्तविकता - सि(ांत से संचालित होता है। पराहम् .पराहम् को समझने का और इसकी विशेषता बताने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसको मानसिक प्रकायो± की नैतिक शाखा के रूप में जाना जाए। पराहम् इड और अहं को बताता है कि किसी विश्िाष्ट अवसर पर इच्छा विशेष की संतुष्िट नैतिक है अथवा नहीं। समाजीकरण की प्रिया में पैतृक प्रािाकार के आंतरिकीकरण द्वारा पराहम् इड को नियंत्रिात करने में सहायता प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, यदि कोइर् बालक आइसक्रीम देखकर उसे खाना चाहता है, तो वह इसके लिए अपनी माँ से पूछता है। उसका पराहम् संकेत देता है कि उसका यह व्यवहार नैतिक दृष्िट से सही है। इस तरह के व्यवहार के माध्यम से आइसक्रीम को प्राप्त करने पर बालक में कोइर् अपराध - बोध, भय अथवा दुश्िंचता नहीं होगी।इस प्रकार व्यक्ित के प्रकायो± के रूप में Úायड का विचार था कि मनुष्य का अचेतन तीन प्रतिस्पधीर् शक्ितयों अथवा ऊजार्ओं से निमिर्त हुआ है। वुफछ लोगों में इड पराहम् से अिाक प्रबल होता है तो वुफछ अन्य लोगों में पराहम् इड से अिाक प्रबल होता है। इड, अहं और पराहम् की सापेक्ष शक्ित प्रत्येक व्यक्ित की स्िथरता कानिधार्रण करती है। Úायड के अनुसार इड को दो प्रकार कीमूलप्रवृिाक शक्ितयों से ऊजार् प्राप्त होती है जिन्हें जीवन - प्रवृिा ;सपमि.पदेजपदबजद्ध एवं मुमूषार् या मृत्यु - प्रवृिा ;कमंजी पदेजपदबजद्ध के नाम से जाना जाता है। उन्होंनेमृत्यु - प्रवृिा के स्थान पर जीवन - प्रवृिा ;अथवा, कामद्धको वेंफद्र में रखते हुए अिाक महत्त्व दिया है। मूलप्रवृिाकजीवन - शक्ित जो इड को ऊजार् प्रदान करती है कामशक्ित या लिबिडो ;सपइपकवद्ध कहलाती है। लिबिडो सुखेप्सा - सि(ांत के आधार पर कायर् करता है और तात्कालिक संतुष्िट चाहता है। अहं रक्षा युक्ितयाँ Úायड के अनुसार मनुष्य के अिाकांश व्यवहार दु¯श्चता के प्रति उपयुक्त समायोजन अथवा पलायन को प्रतिबिंबित करते हैं। अतः किसी दुश्िंचताजनक स्िथति का अहं किस ढंग से सामना करता है, यही व्यापक रूप से निधार्रित करता है किलोग किस प्रकार से व्यवहार करेंगे। Úायड का विश्वास था कि लोग दुश्िंचता का परिहार मुख्यतः रक्षा युक्ितयाँ विकसितकरके करते हैं। ये रक्षा युक्ितयाँ अहं को मूलप्रवृिाक आवश्यकताओं के प्रति जागरूकता से रक्षा करती हैं। इस प्रकार रक्षा युक्ितयाँ ;कममिदबम उमबींदपेउेद्ध वास्तविकता को विकृत कर दुश्िंचता को कम करने का एक तरीका है। यद्यपि दुश्िंचता के प्रति की जाने वाली वुफछ रक्षा युक्ितयाँ सामान्य एवं अनुवूफली होती हैं तथापि ऐसे लोग जो इन युक्ितयों का उपयोग इस सीमा तक करते हैं कि वास्तविकतावास्तव में विकृत हो जाती है तो वे विभ्िान्न प्रकार के वुफसमायोजक व्यवहार विकसित कर लेते हैं।Úायड ने विभ्िान्न प्रकार की रक्षा युक्ितयों का वणर्न किया है। इसमें सवार्िाक महत्वपूणर् दमन ;तमचतमेेपवदद्ध है जिसमें दुश्िंचता उत्पन्न करने वाले व्यवहार और विचार पूरी तरह चेतना के स्तर से विलुप्त कर दिए जाते हैं। जब लोग किसी भावना अथवा इच्छा का दमन करते हैं तो वे उस भावना अथवा इच्छा के प्रति बिल्वुफल ही जागरूक नहीं होते हैं। इस प्रकार जब कोइर् व्यक्ित कहता है, फ्मैं नहीं जानता हूँ कि मैंने यह क्यों किया है’’, तो उसका यह कथन किसी दमित भावना अथवा इच्छा को अभ्िाव्यक्त करता है। अन्य प्रमुख रक्षा युक्ितयों में प्रक्षेपण, अस्वीकरण, प्रतििया निमार्ण और युक्ितकरण आते हैं। प्रक्षेपण ;चतवरमबजपवदद्ध में लोग अपने विशेषकों को दूसरों पर आरोपित करते हैं।एक व्यक्ित जिसमें प्रबल आक्रामक प्रवृिायाँ हैं वह दूसरे लोगों में अत्यिाक रूप से अपने प्रति होने वाले व्यवहारों को आक्रामक देखता है। अस्वीकरण ;कमदपंसद्ध में एक व्यक्ित पूरी तरह से वास्तविकता को स्वीकार करना नकार देता है। उदाहरण के लिए एच.आइर्.वी. / एड्स से ग्रस्त रोगी पूरी तरह से अपने रोग को नकार सकता है। प्रतििया निमार्ण ;तमंबजपवद वितउंजपवदद्ध में व्यक्ित अपनी वास्तविक भावनाओं और इच्छाओं के ठीक विपरीत प्रकार का व्यवहार अपना कर अपनी दुश्िंचता से रक्षा करने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए प्रबल कामेच्छा से ग्रस्तकोइर् व्यक्ित यदि अपनी ऊजार् को धामिर्क ियाकलापों में लगाते हुए ब्रह्मचयर् का पालन करता है तो ऐसा व्यवहार प्रतििया निमार्ण का उदाहरण होगा। युक्ितकरण ;तंजपवदंसपेंजपवदद्ध में एक व्यक्ित अपनी तवर्फहीन भावनाओं और व्यवहारों को तवर्फयुक्त और स्वीकायर् बनाने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए यदि कोइर् विद्याथीर् परीक्षा में निम्नस्तरीय निष्पादन के बाद वुफछ नए कलम खरीदता है तो इस युक्ितकरण का उपयोग करता है कि ‘‘वह आगे की परीक्षा में नए कलम के साथ उच्च स्तर का निष्पादन प्रदश्िार्त करेगा’’। जो लोग रक्षा युक्ितयों का उपयोग करते हैं वे प्रायः इसके प्रति जागरूक नहीं होते हैं अथवा इससे अनभ्िाज्ञ होते हैं। प्रत्येक रक्षा युक्ित दुश्िंचता द्वारा उत्पन्न असुविधाजनक भावनाओं से अहं के बरताव करने का एक तरीका है। रक्षायुक्ितयों की भूमिका के बारे में Úायड के विचारों के समक्षअनेक प्रश्न उत्पन्न किए गए हैं। उदाहरण के लिए Úायड का यह दावा कि प्रक्षेपण के उपयोग से दुश्िंचता और दबाव कम होता है अनेक अध्ययनों के परिणामों द्वारा समथ्िार्त नहीं है। व्यक्ितत्व - विकास की अवस्थाएँ Úायड का यह दावा है कि व्यक्ितत्व के आंतरिक पक्ष आरंभ में ही स्थापित हो जाते हैं और जीवन - पय±त स्िथर बने रहते हैं। इनमें परिवतर्न लाना अत्यंत कठिन होता है। उन्होंने व्यक्ितत्व - विकास का एक पंच अवस्था सि(ांत ;पिअम.ेजंहम जीमवतलद्ध प्रस्तावित किया जिसे मनोलैंगिक विकास के नाम से भी जाना जाता है। विकास की इन पाँच अवस्थाओं में से किसी भी अवस्था पर समस्याओं के आने से विकास बािात हो जाता है और जिसका मनुष्य के जीवन पर दीघर्कालिक प्रभाव हो सकता है। इन विभ्िान पाँच अवस्थाओं का संक्ष्िाप्त विवरण नीचे दिया जा रहा है। मौख्िाक अवस्था - एक नवजात श्िाशु की मूल प्रवृिायाँ मुख पर वेंफित होती है। यह श्िाशु का प्राथमिक सुख प्राप्ित का वेंफद्र होता है। यह मुख ही होता है जिसके माध्यम से ही श्िाशु भोजन ग्रहण करता है और अपनी भूख को शांत करता है। श्िाशु मौख्िाक संतुष्िट भोजन ग्रहण, अँया श्िाश्नलोप किए जाने का भय भी बालक में कायर् करता है ;इडिपस एक ग्रीक राजा था जिसने अनजान में अपने पिता की हत्या कर अपनी माता से विवाह कर लिया थाद्ध। इस अवस्था की एक प्रमुख विकासात्मक उपलब्िध यह है कि बालक अपनी इस मनोग्रंथ्िा का समाधान कर लेता है। ऐसा वह अपनी माता के प्रति पिता के संबंधों को स्वीकार करके उन्हीं की तरह का व्यवहार करता है। बालिकाओं में यह इडिपस ग्रंथ्िा थोड़े भ्िान्न रूप में घटित होती है। बालिकाओं में इसे इलेक्ट्रा मनोग्रंथ्िा ;म्समबजतं ब्वउचसमगद्ध कहते हैं। इलेक्ट्रा एक ग्रीक चरित्रा थी जिसने अपने भाइर् द्वारा अपनी माता की हत्या करवाइर्। इस मनोग्रंथ्िा में बालिका अपने पिता को प्रेम करती है और प्रतीकात्मक रूप में उससे विवाह करना चाहती है। जब उसको यहगूठा चूसने, काटने और बलबलाने के माध्यम से प्राप्त करता है। जन्म के बाद आरंभ्िाक वुफछ महीनों की अविा में श्िाशुओं में अपने चतुदिर्क जगत के बारे में आधारभूत अनुभव और भावनाएँविकसित हो जाती हंै। अतः Úायड के अनुसार एक वयस्क जो इस संसार को कटु स्थान मानता है। संभवतः उसके विकास की मौख्िाक अवस्था में कठिनाइर् रही होगी। गुदीय अवस्था - ऐसा पाया गया है कि दो - तीन वषर् की आयु में बच्चा समाज की वुफछ माँगों के प्रति अनुिया करना सीखता है। इनमें से एक प्रमुख माँग माता - पिता की यह होती है कि बालक मूत्रात्याग एवं मलत्याग जैसे शारीरिक प्रकायो± को सीखे। अिाकांश बच्चे इस आयु में इन ियाओं को करने में आनंद का अनुभव करते हैं। शरीर का गुदीय क्षेत्रा वुफछ सुखदायक भावनाओं का वेंफद्र हो जाता है। इस अवस्था में इड और अहं के बीच द्वंद्व का आधार स्थापित हो जाता है। साथ ही शैशवावस्था की सुख की इच्छा एवं वयस्क रूप में नियंत्रिात व्यवहार की माँग के बीच भी द्वंद्व का आधार स्थापित हो जाता है। लैंगिक अवस्था .यह अवस्था जननांगों पर बल देती है। चार - पाँच वषर् की आयु में बच्चे पुरुषों एवं महिलाओं के बीच का भेद अनुभव करने लगते हैं। बच्चे कामुकता के प्रति एवं अपने माता - पिता के बीच काम संबंधों के प्रति जागरूक हो जाते हैं। इसी अवस्था में बालक इडिपस मनोग्रंथ्िा ;वमकपचने बवउचसमगद्ध का अनुभव करता है जिसमें अपनी माता के प्रति प्रेम और पिता के प्रति आक्रामकता सन्िनहित होती है तथा इसके परिणामस्वरूप पिता द्वारा दंडित अनुभव होता है कि यह संभव नहीं है तो वह अपनी माता का अनुकरण कर उसके व्यवहारों को अपनाती है। ऐसा वह अपने पिता का स्नेह प्राप्त करने के लिए करती है। उपयुर्क्त दोनों मनोग्रंथ्िायों के समाधान में क्रांतिक घटक समान लिंग के माता - पिता के साथ तदात्मीकरण स्थापित करना है। दूसरे शब्दों में, बालक अपनी माता के प्रति लैंगिक भावनाओं का त्याग कर देते हैं तथा अपने पिता को प्रतिद्वंद्वी की बजाय भूमिका - प्रतिरूप मानने लगते हैंऋ बालिकाएँ अपने पिता के प्रति लैंगिक इच्छाओं का त्याग कर देती हैं और अपनी माता से तादात्मय स्थापित करती हैं। कामप्रसुप्ित अवस्था .यह अवस्था सात वषर् की आयु से आरंभ होकर यौवनारंभ तक बनी रहती है। इस अविा में बालक का विकास शारीरिक दृष्िट से होता रहता है ¯कतु उसकी कामेच्छाएँ सापेक्ष रूप से निष्िक्रय होती हैं। बालककी अिाकांश ऊजार् सामाजिक अथवा उपलब्िध - संबंधी ियाओं में व्यय होती है। जननांगीय अवस्था - इस अवस्था में व्यक्ित मनोलैंगिक विकास में परिपक्वता प्राप्त करता है। पूवर् की अवस्थाओं की कामेच्छाएँ, भय और दमित भावनाएँ पुनः अभ्िाव्यक्त होने लगती हैं। लोग इस अवस्था में विपरीत लिंग के सदस्यों से परिपक्व तरीके से सामाजिक और काम संबंधी आचरण करना सीख लेते हैं। यदि इस अवस्था की विकास यात्रा में व्यक्ित को अत्यिाक दबाव अथवा अत्यासक्ित का अनुभव होता है तो इसके कारण विकास की किसी आरंभ्िाक अवस्था पर उसका स्िथरण हो सकता ह।ैÚायड के सि(ांत का एक यह अभ्िाग्रह भी है कि बच्चा जब विकास की एक अवस्था से दूसरी अवस्था की तरपफ बढ़ता है तो वह जगत के प्रति अपने दृष्िटकोण को समायोजित कर लेता है। किसी एक अवस्था में असपफल विकास के कारण उस अवस्था पर बच्चे का स्िथरण ;पिगंजपवदद्ध हो जाता है। इस स्िथति में बच्चे का विकास एक आरंभ्िाक अवस्था तक ही सीमित रह जाता है। उदाहरण के लिए एक बच्चा अपने विकास में लैंगिक अवस्था को सपफलतापूवर्क पूरा नहीं कर पाता है तो वह इडिपस मनोगं्रथ्िा का समाधान करने में निष्पफल हो जाता है और उसके बाद भी समान लिंग के माता - पिता के प्रति आक्रामकता का अनुभव करता रहता है। इस प्रकार की असपफलता के गंभीर परिणाम बच्चे को अपने जीवन में भोगने पड़ते हैं। ऐसा बालक यह विचार बना सकता है कि पुरुष सामान्यतया आक्रामक होते हैं और वह निभर्रता के रूप में महिलाओं से संबंध होने की इच्छा को विकसित कर सकता है। इस प्रकार की स्िथतियों में प्रतिगमन ;तमहतमेेपवदद्ध भी एक संभावित परिणाम हो सकता है जिसमें व्यक्ित पहले की किसी अवस्था में वापस चला जाता है या लौट जाता है। प्रतिगमन उस स्िथति में घटित होता है जब विकास की किसी अवस्था में व्यक्ित द्वारा किया गया समस्याओं का समाधान पयार्प्त नहीं होता है। इस प्रकार की स्िथति में व्यक्ित द्वारा प्रदश्िार्त व्यवहार उस कम परिपक्व विकास की अवस्था का कोइर् विश्िाष्ट व्यवहार होता है। पश्च - Úायडवादी उपागम Úायड का अनुसरण करते हुए बाद में कइर् सि(ांतकारों ने अपने विचार प्रतिपादित किए। इनमें से वुफछ सि(ांतकारोंने आरंभ में Úायड के साथ मिलकर काम किया विंफतु आगे चलकर उन्होंने मनोविश्लेषणात्मक सि(ांत की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की। इन सि(ांतकारों को नव - विश्लेषणवादी अथवा पश्च - Úायडवादी कहा गया जिससे कि इन्हें Úायड से भ्िान्न समझा जा सके। इन सि(ांतों की विशेषता यह हैकि इनमें इड की लैंगिक और आक्रामक प्रवृिायों की भूमिकाओं और अहं के संप्रत्यय के विस्तार को कममहत्त्व दिया गया है। इनके स्थान पर सजर्नात्मकता, क्षमता और समस्या - समाधान योग्यता जैसे मानवीय गुणों पर बल दिया गया है। इसमें से वुफछ सि(ांतों का संक्षेप में नीचे वणर्न किया गया है। कालर् युंग - उद्देश्य एवं आकांक्षाएँ आरंभ में युंग ;श्रनदहद्ध ने Úायड के साथ मिलकर कामकिया विंफतु बाद में Úायड से वह अलग हो गए। युंग ने यह देखा कि मनुष्य काम - भावना और आक्रामकता के स्थान पर उद्देश्यों और आकांक्षाओं से अिाक निदेर्श्िात होते हंै। उन्होंने व्यक्ितत्व का अपना एक सि(ांत प्रतिपादित किया जिसे विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान ;ंदंसलजपबंस चेलबीवसवहलद्ध कहते हैं। इन सि(ांतों का आधारभूत अभ्िाग्रह यह है कि व्यक्ित के व्यक्ितत्व में प्रतिस्पधीर् शक्ितयाँ एवं संरचनाएँ ;जिनका संतुलित होना आवश्यक हैद्ध कायर् करती हैंऋ न कि व्यक्ित और समाज की माँगों अथवा वास्तविकता के बीच कोइर् द्वंद्व होता है। युंग ने ये दावा किया है कि एक प्रकार का सामूहिक अचेतन ;बवससमबजपअम नदबवदेबपवनेद्ध होता है जिसमें आद्य प्ररूप ;ंतबीमजलचमद्ध अथवा आद्य प्रतिमाएँ होती हैं। ये व्यक्ितगत स्तर पर अजिर्त नहीं की जाती हैं, बल्िक वंशागत होती हैं। इर्श्वर अथवा धरती माता आद्य प्ररूप के अच्छे उदाहरण हैं। आद्य प्ररूप मिथकों, स्वप्नों और मानव जाति की सभी कलाओं में पाए जाते हैं। युंग का यह विचार था कि आत्म एकता और एकात्मकता के लिए प्रयास करता है। यह एक आद्य प्ररूप है जिसे विभ्िान्न तरीकों से अभ्िाव्यक्त किया गया है। विभ्िान्न परंपराओं में ऐसी अभ्िाव्यक्ितयों का अध्ययन करने के लिए युंग ने काप़्ाफी प्रयास किया। उनके अनुसार, एकत्व और संपूणर्ता को प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ित कोउत्तरोत्तर अपने व्यक्ितगत और सामूहिक अचेतन में उपलब्ध प्रज्ञान के प्रति जागरूक होना चाहिए और इसके साथ संगत भाव से रहना सीखना चाहिए। वैफरेन हानीर् - आशावाद हानीर् ;भ्वतदमलद्ध Úायड की एक अन्य अनुयायी थींजिन्होंने Úायड के आधारभूत सि(ांतों से भ्िान्न एक सि(ांत विकसित किया। उन्होंने मानव संवृि और आत्मसिि पर बल देते हुए मानव जीवन के एक आशावादी दृष्िटकोण को प्रस्तुत किया।हानीर् का प्रमुख योगदान इस बात में है कि उन्होंने Úायड के इस विचार को कि महिलाएँ हीन होती हैं, चुनौती दी है। उनके अनुसार, प्रत्येक लिंग के व्यक्ितयों में गुण होते हैं जिसकी प्रशंसा विपरीत लिंग के व्यक्ितयों को करनी चाहिए तथा किसी भी लिंग के व्यक्ितयों को श्रेष्ठ अथवा हीन नहीं समझा जाना चाहिए। प्रतिरोध स्वरूप उनका यह विचार था कि महिलाएँ जैविक कारकों की तुलना में सामाजिक एवंसांस्कृतिक कारकों से अिाक प्रभावित होती हैं। उन्होंने यह तवर्फ प्रस्तुत किया कि मनोवैज्ञानिक विकार बाल्यावस्था की अविा में विक्षुब्ध अंतवैर्यक्ितक संबंधों ;कपेजनतइमक पदजमतचमतेवदंस तमसंजपवदेीपचद्ध के कारण उत्पन्न होते हैं। यदि माता - पिता का अपने बच्चे के प्रति व्यवहार उदासीन, हतोत्साहित करने वाला और अनियमित होता है तो बच्चा असुरक्ष्िात महसूस करता है जिसके परिणामस्वरूप एक ऐसी भावना जिसे मूल दुश्िंचता ;इंेपब ंदगपमजलद्ध कहते हैं, उत्पन्न होती है। इस दुश्िंचता के कारण माता - पिता के प्रति बच्चे में एक गहन अमषर् और मूल आक्रामकता घटित होती है। अत्यिाक प्रभुत्व अथवा उदासीनता का प्रदशर्न कर एवं अत्यिाक अथवा अत्यंत कम अनुमोदन प्रदान कर माता - पिता बच्चों में एकाकीपन और असहायता की भावनाएँ उत्पन्न करते हैं जो उनके स्वस्थ विकास में बाधक होते हैं। अल्प्रेफड एडलर - जीवन शैली एवं सामाजिक अभ्िारुचि एडलर ;।कसमतद्ध के सि(ांत को व्यष्िट या वैयक्ितक मनोविज्ञान ;पदकपअपकनंस चेलबीवसवहलद्ध के रूप में जाना जाता है। उनका आधारभूत अभ्िाग्रह यह है कि व्यक्ित का व्यवहार उद्देश्यपूणर् एवं लक्ष्योन्मुख होता है। हममें से प्रत्येक में चयन करने एवं सजर्न करने की क्षमता होती है। हमारे व्यक्ितगत लक्ष्य ;चमतेवदंस हवंसेद्ध ही हमारीअभ्िाप्रेरणा के ड्डोत होते हैं। जो लक्ष्य हमें सुरक्षा प्रदान करते हैं और हमारी अपयार्प्तता की भावना पर विजय प्राप्त करने में हमारी सहायता करते हैं, वे हमारे व्यक्ितत्व के विकास में महत्वपूणर् भूमिका निभाते हैं। एडलर के विचार से प्रत्येक व्यक्ित अपयार्प्तता और अपराध की भावनाओं से ग्रसित होता है। इसे हम हीनता मनोग्रंथ्िा ;पदमितपवतपजल बवउचसमगद्ध के नाम से जानते हैं जो बाल्यावस्था में उत्पन्न होती है। इस मनोग्रंथ्िा पर विजय प्राप्त करना इष्टतम व्यक्ितत्व - विकास के लिए आवश्यक है। एरिक Úाॅॅम - मानवीय महत्त्व Úायड के सि(ांत की जैविक उन्मुखता की तुलना में Úाॅम ;थ्तवउउद्ध ने अपना सि(ांत सामाजिक उन्मुखता के संदभर् में विकसित किया। उन्होंने मनुष्य को मूल रूप से सामाजिक प्राणी ;ेवबपंस इमपदहद्ध माना है जिसको दूसरे लोगों से उसके संबंधों के आधार पर समझा जा सकता है। उन्होंने यह तवर्फ दिया कि संवृि और क्षमताओं की उपलब्िध जैसे मनोवैज्ञानिक गुण स्वतंत्राता की इच्छा ;कमेपतम वित तिममकवउद्ध और न्याय तथा सत्य के लिए संघषर् ;ेजतपअपदह वित रनेजपबम ंदक जतनजीद्ध के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं।Úाॅम का विचार है कि चरित्रा विशेषक ;व्यक्ितत्वद्ध दूसरों के साथ हमारे होने वाले अनुभवों से विकसित होते हैं। एक समाज विशेष में जिस प्रकार की रीतियाँ और प्रथाएँअस्ितत्व में होती हैं, वही समाज की संस्कृति को स्वरूप प्रदान करती हैं। किसी समाज विशेष में लोगों के प्रभावीचरित्रा विशेषक सामाजिक प्रक्रमों एवं संस्कृति को स्वरूपप्रदान करने में महत्वपूणर् भूमिका निभाते हैं। Úाॅम ने व्यक्ितत्व के विकास में कोमलता एवं प्रेम जैसे विध्यात्मक गुणों कोमहत्त्व दिया है। एरिक एरिक्सन - अनन्यता की खोज एरिक्सन ;म्तपोवदद्ध का सि(ांत व्यक्ितत्व - विकास में तवर्फयुक्त, सचेतन अहं की प्रियाओं पर बल देता है। उनके सि(ांत में विकास को एक जीवनपय±त चलने वाली प्रिया और अहं अनन्यता का इस प्रिया में केन्द्रीय स्थान माना गया है। किशोरावस्था के अनन्यता संकट ;पकमदजपजल बतपेपेद्ध के उनके संप्रत्यय ने व्यापक रूप से ध्यान आवृफष्ट किया है। एरिक्सन का मत है कि युवकों को अपने लिए एक वेंफद्रीय परिप्रेक्ष्य और एक दिशा निधार्रित करनी चाहिए जो उन्हें एकत्व और उद्देश्य का साथर्क अनुभव करा सके। मनोगतिक सि(ांतों की अनेक दृष्िटकोणों से आलोचना की गइर् है। प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिख्िात प्रकार की हैं - 1ण् ये सि(ांत अिाकांशतः व्यक्ित अध्ययनों;बंेम ेजनकपमेद्ध पर आधारित हैं जिसमें परिशु(, वैज्ञानिक आधार का अभाव है। 2ण् इनमें कम संख्या में विश्िाष्ट व्यक्ितयों का सामान्यीकरण के लिए प्रतिदशर् के रूप में उपयोग किया गया है। 3ण् संप्रत्यय उचित ढंग से परिभाष्िात नहीं किए गए हैं और वैज्ञानिक परीक्षण के लिए उनको प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। 4ण् Úायड ने मात्रा पुरुषों का मानव व्यक्ितत्व के विकास के आदि प्ररूप ;चतवजवजलचमद्ध के रूप में उपयोग किया है। उन्होंने महिलाओं के अनुभवों एवं परिप्रेक्ष्यों पर ध्यान नहीं दिया है। व्यवहारवादी उपागम यह उपागम व्यवहार की आंतरिक गतिकी को महत्त्व नहीं देताहै। व्यवहारवादी परिभाष्य, प्रेक्षणीय एवं मापन योग्य प्रदत्तों मेंही विश्वास करते हैं या उनको महत्त्व देते हैं। इस प्रकार वे उद्दीपक - अनुिया संयोजनों के अिागम और उनके प्रबलन पर ही बल देते हैं। उनके अनुसार पयार्वरण के प्रति की गइर्व्यक्ित की अनुिया के रूप में ही व्यक्ितत्व को सवोर्त्तम प्रकार से समझा जा सकता है। अनुिया की विशेषताओं में परिवतर्न के रूप में ही प्रायः वे विकास को समझते हैं अथार्त कोइर् व्यक्ित नए पयार्वरण तथा उद्दीपकों के प्रति की गइर् अनुियाओं द्वारा ही नया व्यवहार सीखता ह।ैअिाकांश व्यवहारवादियों के लिए व्यक्ितत्व की संरचनात्मक इकाइर् अनुिया ;तमेचवदेमद्ध है। प्रत्येक अनुिया एक व्यवहार है जो किसी विश्िाष्ट आवश्यकता को संतुष्ट करने के लिए प्रकट की जाती है। जैसा कि आप जानते हैं कि हम भोजन इसलिए करते हैं क्योंकि हमें भूख लगी रहती है, किंतु भोजन के संदभर् में हम बहुत चयनात्मक भी होते हैं। उदाहरण के लिए, बच्चे अनेक प्रकार की सब्िजयाँ खाना पसंद नहीं करते हैं ;जैसे - पालक, लौकी, करेला इत्यादिद्ध किंतु धीरे - धीरे वे इनको खाना सीख लेते हैं। ऐसा व्यवहार वे क्यों करते हैं? व्यवहारवादी उपागम के अनुसार बच्चे आरंभ में इन सब्िजयों को अपने माता - पिता से प्रशंसा ;प्रबलनद्ध पाने के लिए बाद में वे अंततः इन सब्िजयांे को खाना सीख लेते हैं, केवल इस कारण से ही नहीं कि उनके माता - पिता इस व्यवहार से प्रसन्न हैं बल्िक इस कारण से भी कि उन्हें इन सब्िजयों का स्वाद लग गया है और वे इन सब्िजयों को अच्छा समझते हैं। अतएवव्यवहार को संगठित करने वाली वेंफद्रीय प्रवृिा जैविक अथवा सामाजिक आवश्यकताओं में कमी है जो व्यवहार को उफजिर्त या उत्पे्ररित करती है। यह स्िथति तब उत्पन्न होती है जब अनुियाएँ ;व्यवहारद्ध प्रबलित होती हैं। कक्षा 11 में किए गए अपने अध्ययन से आप स्मरण कर सकते हैं कि विभ्िान्न अिागम सि(ांत उद्दीपक, अनुिया और प्रबलन के विभ्िान्न तरीकों से उपयोग को सन्िनहित। प्राचीन अनुबंधन ;पावलवद्ध, नैमििाक अनुबंधन ;स्िकनरद्ध और पे्रक्षणात्मक अिागम ;बंदूराद्ध के सि(ांतों से आप भली - भाँति परिचित हैं। इन सि(ांतों में अिागम और व्यवहार के संपोषण का विभ्िान्न दृष्िटकोणों से विचार किया गया है। इन सि(ांतों के नियमों का व्यक्ितत्व - सि(ांतों के विकास में व्यापक रूप से उपयोग किया गया है। उदाहरण के लिए प्रेक्षणात्मक अिागम सि(ांत अिागम में चिंतन प्रियाओं कोअत्यिाक महत्त्व देता है किंतु प्राचीन एवं नैमििाक अनुबंधन सि(ांतों में चिंतन प्रियाओं को प्रायः कोइर् स्थान नहीं दिया गया है। इसी प्रकार प्रेक्षणात्मक अिागम सि(ांत सामाजिक अिागम ;प्रेक्षण एवं दूसरों के अनुकरण पर आधारितद्ध और आत्म - नियमन पर बल देता है जो अन्य सि(ांतों में अनुपस्िथत हैं। सांस्कृतिक उपागम यह उपागम पारिस्िथतिक और सांस्कृतिक पयार्वरण की विशेषताओं के संदभर् में व्यक्ितत्व को समझने का प्रयास करता है। इसमें यह प्रस्तावित किया गया है कि किसी समूहकी ‘आथ्िार्क अनुरक्षण प्रणाली’ सांस्कृतिक और व्यवहारपरकभ्िान्नताओं की उत्पिा में एक महत्वपूणर् भूमिका का निवार्ह करती है। जलवायु - संबंधी दशाएँ, वासस्थान के भू - भाग कीप्रकृति और इसमें भोजन ;वनस्पति और जीवजंतुद्ध की उपलब्धता न केवल लोगों की आथ्िार्क गतिवििायों को निधार्रित करती है बल्िक उनके व्यवस्थापन के संरूपों, सामाजिक संरचनाओं, श्रम विभाजन और अन्य पक्षों, जैसे - बाल - पोषण रीतियों को भी निधार्रित करती है। सम्िमलित रूप से ये सारे तत्व किसी बच्चे के समग्र अिागम वातावरण का निमार्ण करते हैं। लोगों के कौशल, योग्यताएँ, व्यवहार - शैलियाँ और मूल्य प्राथमिकताएँ इन विशेषताओं से घनिष्ठ रूप से संबंिात होते हैं। अनुष्ठान, उत्सव, धामिर्क ियाकलाप, कला, मनोरंजन और खेल - वूफद वे साधन हैं जिनके माध्यम सेलोगों का व्यक्ितत्व किसी संस्कृति में प्रक्षेपित होता है। लोग विभ्िान्न प्रकार के व्यक्ितत्व ;व्यवहारपरकद्ध गुणों का विकासकिसी समूह के जीवन की पारिस्िथतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के प्रति अनुवूफलन करने के प्रयास में करते हैं। इसप्रकार सांस्कृतिक उपागम पारिस्िथतिकी और संस्कृति की माँगों के प्रति व्यक्ितयों या समूहों के अनुवूफलन के रूप में व्यक्ितत्व को स्वीकार करता है।सांस्कृतिक उपागम के इन पक्षों को एक मूतर् उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है। जैसा कि आप जानते हैं कि विश्व की जनसंख्या का एक बड़ा भाग आज भी वन और पवर्तीय क्षेत्रों में रहता है जिनकी जीविका आधारभूत साधन श्िाकार और संग्रहण ;आथ्िार्क गतिवििायाँद्ध होते हैं। झारखंड के बिरहोर ;एक जनजाति समूहद्ध इसी प्रकार की जनसंख्या का प्रतिनििात्व करते हैं। इनमें से अिाकांश खानाबदोश का जीवन व्यतीत करते हैं। छोटी टोलियों में ये एक वन से दूसरे वन तक सतत भ्रमण करते रहते हैं और पफलों, वंफदों,वुफवुफरमुत्तों एवं शहद आदि वन उत्पादों का संग्रह और उपयोग करते हैं। बिरहोर समाज में बच्चों को आरंभ्िाक वषो± से ही वनों में घूमने तथा श्िाकार करने और वन - उत्पादों का संग्रह करने के कौशलों को सीखने की पयार्प्त स्वतंत्राता दे दी जाती है। उनवफी बाल - समाजीकरण रीतियों में बच्चों को स्वतंत्रा ;बड़ों की सहायता के बिना भी अनेक कायो± कोकरनाद्ध, स्वायत्त ;अपने लिए अनेक निणर्यों को लेनाद्ध और उपलब्िध - उन्मुख ;श्िाकार जैसे कायो± में अंतनिर्हित शोख्िामों और चुनौतियों को स्वीकार करनाद्ध बनाना जीवन के आरंभ्िाक वषो± से ही शुरू हो जाता है।कृषक समाजों में बच्चों का समाजीकरण बड़ों के प्रति आज्ञापालन, छोटों के प्रति पोषण का भाव और अपनेकतर्व्यों के प्रति उत्तरदायित्व विकसित करने के लिए होता है। चूँकि व्यवहार के ये गुण वृफषक समाजों में लोगों को अिाक उपयोगी बनाते हैं इसलिए ये गुण लोगों के व्यक्ितत्व की प्रभावी विशेषताएँ हो जाते हैं। ये विशेषताएँ श्िाकार - संग्रह करने वाले समाजों में अिाक उपयोगी ;और इसलिए अत्यिाकसम्मानित समझे जाने वालेद्ध स्वतंत्राता, स्वायत्तता और उपलब्िध जैसे गुणों से भ्िान्न होती हैं। विभ्िान्न आथ्िार्क अनुसरणों औरसांस्कृतिक माँगों के कारण श्िाकार - संग्रह करने वाले तथा वृफषक समाजों के बच्चे भ्िान्न प्रकार के व्यक्ितत्व - प्रतिरूप विकसित एवं प्रदश्िार्त करते हैं। मानवतावादी उपागम मानवतावादी सि(ांत मुख्यतः Úायड के सि(ांत के प्रत्युत्तर में विकसित हुए। व्यक्ितत्व के संदभर् में मानवतावादी परिप्रेक्ष्य के विकास में कालर् रोजसर् ;ब्ंतस त्वहमतेद्ध और अब्राहम मैस्लो ;।इतंींउ डंेसवूद्ध ने विशेष रूप से योगदान किया है। हम उनके सि(ांतों का संक्षेप में उल्लेख करेंगे। रोजसर् द्वारा प्रस्तावित सवार्िाक महत्वपूणर् विचार एक पूणर्तः प्रकायर्शील व्यक्ित ;निससल निदबजपवदपदह चमतेवदद्ध का है। उनका विश्वास है कि व्यक्ितत्व के विकास के लिए संतुष्िट अभ्िापे्ररक शक्ित है। लोग अपनीक्षमताओं, संभाव्यताओं और प्रतिभाओं को संभव सवोर्त्कृष्ट तरीके से अभ्िाव्यक्त करने का प्रयास करते हैं। व्यक्ितयों मेंएक सहज प्रवृिा होती है जो उन्हें अपने वंशागत प्रकृति की सिि या प्राप्ित के लिए निदिर्ष्ट करती है। मानव व्यवहार के बारे में रोजसर् ने दो आधारभूत अभ्िाग्रह निमिर्त किए हैं। एक यह कि व्यवहार लक्ष्योन्मुख और साथर्क होता है और दूसरा यह कि लोग ;जो सहज रूप से अच्छे होते हैंद्ध सदैव अनुवूफली तथा आत्मसिि वाले व्यवहार का चयन करेंगे। रोजसर् का सि(ांत उनके निदानशाला में रोगियों को सुनने से प्राप्त अनुभवों से विकसित हुआ है। उन्होंने यह ध्यान दिया चित्रा2ण्3 समायोजन एवं आत्म - संप्रत्यय का प्रतिरूप कि उनके सेवाथ्िार्यों के अनुभव में आत्म एक महत्वपूणर् तत्व था। इस प्रकार, उनका सि(ांत आत्म के संप्रत्यय के चतुदिर्क संरचित है। उनके सि(ांत का अभ्िाग्रह है कि लोग सतत अपने वास्तविक आत्म की सिि या प्राप्ित की प्रिया में लगे रहते हैं। रोजसर् ने सुझाव दिया है कि प्रत्येक व्यक्ित के पास आदशर् अहं या आत्म का एक संप्रत्यय होता है। एक आदशर् आत्म वह आत्म होता है जो कि एक व्यक्ित बनना अथवा होना चाहता है। जब वास्तविक आत्म और आदशर् आत्म के बीच समरूपता होती है तो व्यक्ित सामान्यतया प्रसन्न रहता है। विंफतु दोनों प्रकार के आत्म के बीच विसंगति के कारण प्रायः अप्रसन्नता और असंतोष की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। रोजसर् का एक आधारभूत सि(ांत है कि लोगों में आत्मसिि के माध्यम से आत्म - संप्रत्यय को अिाकतम सीमा तक विकसित करने की प्रवृिा होती है। इस प्रिया में आत्म विकसित, विस्तारित और अिाक सामाजिक हो जाता है। रोजसर् व्यक्ितत्व - विकास को एक सतत प्रिया के रूप में देखते हैं। इसमें अपने आपका मूल्यांकन करने का अिागम और आत्मसिि की प्रिया में प्रवीणता सन्िनहित होती है। उन्होंने आत्म - संप्रत्यय के विकास में सामाजिक प्रभावों की भूमिका को स्वीकार किया है। जब सामाजिक दशाएँ अनुवूफल होती हैं, तब आत्म - संप्रत्यय और आत्म - सम्मान उच्च होता है। इसके विपरीत, जब सामाजिक दशाएँ प्रतिवूफल होती हैं, तब आत्म - संप्रत्यय और आत्म - सम्मान निम्न होता है। उच्च आत्म - संप्रत्यय और उच्च आत्म - सम्मान रखने वाले लोग सामान्यतया नम्य एवं नए अनुभवों के प्रति मुक्त भाव से ग्रहणशील होते हैं ताकि वे अपने सतत विकास और आत्मसिि में लगे रह सवेंफ। यह स्िथति अपेक्षा रखती है कि अशतर् सकारात्मक आदर ;नदबवदकपजपवदंस चवेपजपअम तमहंतकद्ध का वातावरण अवश्य निमिर्त किया जाए ताकि लोगों के आत्म - संप्रत्यय की वृि को सुनिश्िचत किया जा सके। सेवाथीर् - वेंफदि्रत चिकित्सा ;बसपमदज.बमदजतमक जीमतंचलद्ध, जिसे रोजसर् ने विकसित किया, मूल रूप से इस प्रकार की स्िथति को उत्पन्न करने का प्रयास करती है। आप पहले से ही कक्षा 11 में अभ्िाप्रेरणा के अध्ययन के संदभर् में मैस्लो द्वारा प्रतिपादित आवश्यकताओं के पदानुक्रम से परिचित हैं। मैस्लो ने आत्मसिि ;ेमस.िंबजनंसपेंजपवदद्ध की लब्िध या प्राप्ित के रूप में मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ लोगों की एक विस्तृत व्याख्या दी है। आत्मसिि वह अवस्था होती है जिसमें लोग अपनी संपूणर् संभाव्यताओं को विकसित कर चुके होते हैं। मैस्लो ने मनुष्यों का एक आशावादी और सकारात्मक दृष्िटकोण विकसित किया है जिसके अंतगर्त मानव मंे प्रेम, हषर् और सजर्नात्मक कायो± को करने की संभाव्यता होती है। मनुष्य अपने जीवन को स्वरूप देने में और आत्मसिि को प्राप्त करने में स्वतंत्रा माने गए हैं। अभ्िापे्ररणाओं, जो हमारे जीवन को नियमित करती हैं, के विश्लेषण के द्वारा आत्मसिि को संभव बनाया जा सकता है। हम जानते हैं कि जैविक, सुरक्षा और आत्मीयता की आवश्यकताएँ ;उत्तरजीविता आवश्यकताएँद्ध पशुओं और मनुष्यों दोनों में पाइर् जाती हैं। अतएव किसी व्यक्ित का मात्रा इन आवश्यकताओं की संतुष्िट में संलग्न होना उसे पशुओं के स्तर पर ले आता है। मानव जीवन की वास्तविक यात्रा आत्म - सम्मान और आत्मसिि जैसी आवश्यकताओं के अनुसरण से आरंभ होती है। मानवतावादी उपागम जीवन के सकारात्मकपक्षों के महत्त्व पर बल देता है ;बाॅक्स 2ण्3 देखेंद्ध। व्यक्ितत्व का मूल्यांकन लोगों को जानने, समझने और उनका वणर्न करने का कायर् ऐसा है जिससे दैनंदिन जीवन में प्रत्येक व्यक्ित संब( होता है। जब हम नए लोगों से मिलते हैं तो हम उनको समझने का प्रयास करते हैं और साथ ही उनसे अंतःिया करने के पहले ही हम ये भविष्यकथन भी करते हैं कि वे क्या कर सकते हैं। हम अपने व्यक्ितगत जीवन में अपने पूवार्नुभवों, प्रेक्षणों, वातार्लापों और दूसरे लोगों से प्राप्त सूचनाओं पर विश्वास करते हैं। इस उपागम के आधार पर दूसरों को समझना अनेक कारकों से प्रभावित हो सकता है जो हमारे निणर्यों को अतिरंजित कर वस्तुनिष्ठता को कम कर सकते हैं। इसलिए व्यक्ितत्वों का विश्लेषण करने के लिए हमें अपने प्रयासों को अिाक औपचारिक रूप से संगठित करने की आवश्यकता होती है। किसी व्यक्ित के व्यक्ितत्व की समझ के लिए सोद्देश्य औपचारिक प्रयास को व्यक्ितत्व - मूल्यांकन ;चमतेवदंसपजल ंेेमेेउमदजद्ध कहा जाता है। मूल्यांकन का तात्पयर् उन प्रियाओं से है जिनका उपयोग वुफछ विशेषताओं के आधार पर लोगों के मूल्यांकन या उनके मध्य विभेदन के लिए किया जाता है। मूल्यांकन का लक्ष्य लोगों के व्यवहारों को न्यूनतम त्राुटि और अिाकतम परिशु(ता के साथ समझना और उनकी भविष्यवाणी करना होता है। मूल्यांकन में किसी स्िथति विशेष में व्यक्ित सामान्यतया कौन - सा व्यवहार करता है और वैफसे करता है हम यह समझने का प्रयास करते हैं। हमारी समझ को उन्नत करने के अतिरिक्त, मूल्यांकन निदान, प्रश्िाक्षण, स्थानन, परामशर् और अन्य उद्देश्यों के लिए भी बहुत उपयोगी है। मनोवैज्ञानिकों ने विभ्िान्न तरीकों से व्यक्ितत्व का मूल्यांकन करने का प्रयास किया है। सामान्यतः सबसे अिाक उपयोग की जाने वाली तकनीकों के अंतगर्त मनोमितिक परीक्षण ;चेलबीवउमजतपब जमेजेद्ध, आत्म - प्रतिवेदन माप ;ेमस.ितमचवतज उमंेनतमेद्ध, प्रक्षेपी तकनीवंेफ ;चतवरमबजपअम जमबीदपुनमेद्ध और व्यवहारपरक विश्लेषण ;इमींअपवनतंस ंदंसलेपेद्ध आते हैं। इन तकनीकों के मूल विभ्िान्न सै(ांतिक उन्मुखताओं में हैं इसलिए ये तकनीक व्यक्ितत्व के विभ्िान्न पक्षों पर प्रकाश डालती हैं। पहले के अध्याय में आपने मनोमितिक परीक्षणों के बारे में पढ़ा होगा। हम यहाँ वुफछ अन्य वििायों की चचार् करेंगे। आत्म - प्रतिवेदन माप आॅलपोटर् ने सुझाव दिया है कि किसी व्यक्ित के बारे मेंमूल्यांकन करने की सवोर्त्तम वििा है उससे उसके बारे में पूछना। उनका यह दृष्िटकोण आत्म - प्रतिवेदन मापों के उपयोग का कारण बना। ये माप उचित रूप से संरचित होते हैं और प्रायः ऐसे सि(ांतों पर आधारित होते हैं जिसमें प्रयोज्यों को किसी प्रकार की निधार्रण मापनी पर शाब्िदक अनुियाएँ देनी होती हैं। इस वििा में प्रयोज्य को विभ्िान्न कथनों के संदभर् में अपनी भावनाओं के बारे में वस्तुनिष्ठ रूप से प्रतिवेदन देना अपेक्ष्िात होता है। इन अनुियाओं को उनके मूल रूप ;अविंफत मूल्यद्ध में स्वीकार कर लिया जाता है। इन अनुियाओं को मात्रात्मक रूप में अंक दिए जाते हैं और परीक्षण के लिए विकसित मानकों के आधार पर उनकी व्याख्या की जाती है। वुफछ प्रसि( आत्म - प्रतिवेदन मापों का संक्ष्िाप्त विवरण नीचे दिया गया है। मिनेसोटा बहुपक्षीय व्यक्ितत्व सूची ;एम.एम.पी.आइर्.द्ध यह सूची एक परीक्षण के रूप में व्यक्ितत्व - मूल्यांकन में व्यापक रूप से उपयोग की गइर् है। हाथवे ;भ्ंजींूंलद्ध एवं मैकिन्ले ;डबापदसमलद्ध ने मनोरोग - निदान के लिए इस परीक्षण का एक सहायक उपकरण के रूप में विकास किया था विंफतु यह परीक्षण विभ्िान्न मनोविकारों की पहचान करने के लिए अत्यंत प्रभावी पाया गया है। इसका परिशोिात एम.एम.पी.आइर् - 2 के रूप में उपलब्ध है। इसमें 567 कथन हैं। प्रयोज्य को अपने लिए प्रत्येक कथन के ‘सही’ अथवा ‘गलत’ होने के बारे में निणर्य लेना होता है। यह परीक्षण 10 उपमापनियों में विभाजित है जो स्वकायदुश्िंचता रोग, अवसाद, हिस्टीरिया, मनोविवृफत विसामान्य, पुरुषत्व - स्त्राीत्व, व्यामोह, मनोदौबर्ल्य, मनोविदलता, उन्माद और सामाजिक अंतमुर्खता के निदान करने का प्रयत्न करता है। भारत में मल्िलक ;डंससपबाद्ध एवं जोशी ;श्रवेीपद्ध ने जोधपुर बहुपक्षीय व्यक्ितत्व सूची ;जे.एम.पीआइर्.द्ध एम.एम.पी.आइर्. की तरह ही विकसित की है। आइजेंक व्यक्ितत्व प्रश्नावली ;इर्.पी.क्यू.द्ध आइजेंक द्वारा विकसित इस परीक्षण ने आरंभ में व्यक्ितत्व के दो आयामों - अंतमुर्खता - बहिमर्ुखता ;पदजतवअमतजमकमगजतंअमतजमकद्ध और सांवेगिक स्िथरता - अस्िथरता ;मउवजपवदंससल ेजंइसम.मउवजपवदंससल नदेजंइसमद्ध - का मूल्यांकन किया। 32 व्यक्ितत्व विशेषक इन आयामों की विशेषता के रूप में बताए गए हैं। बाद में चलकर आइजेंक ने एक तीसरा आयाम मनस्तापिता ;चेलबीवजपबपेउद्ध इस परीक्षण में जोड़ा। यह मनोविकारों से संबंिात है जो दूसरों के लिए भावनाओं में कमी, लोगों के साथ अंतःिया करने का एक कठोर तरीका और सामाजिक परंपराओं की अवज्ञाकरने की प्रवृिा का प्रतिनििात्व करता है। इस आयाम पर उच्च अंक प्राप्त करने वाले व्यक्ित आक्रामक, अहंवेंफदि्रक और समाजविरोधी होते हैं। इस परीक्षण का भी व्यापक रूप से उपयोग किया गया है। सोलह व्यक्ितत्व कारक प्रश्नावली ;16 पी.एपफ.द्ध यह परीक्षण वैफटेल के द्वारा विकसित किया गया है। अपने अध्ययनों के आधार पर उन्होंने व्यक्ितत्व का वणर्न करने वाले कारकों के एक बृहत् समुच्चय की पहचान की और बाद में मूल व्यक्ितत्व संरचना की पहचान के लिए कारक विश्लेषण का उपयोग किया। आप इस सांख्ियकीय तकनीक के बारे में बाद में सीखेंगे। इस परीक्षण में घोषणात्मक कथन दिए गए हैं और प्रयोज्य इसके विश्िाष्ट स्िथति के प्रति दिए गए विकल्पों के समुच्चय से किसी एक विकल्प का चयन कर अनुिया देता है। इस परीक्षण का उपयोग उच्च विद्यालय स्तर के विद्याथ्िार्यों एवं वयस्कों के लिए किया जा सकता है। यह परीक्षण व्यावसायिक निदेर्शन, व्यावसायिक अन्वेषण एवं व्यावसायिक परीक्षण में अत्यंत उपयोगी पाया गया है। वुफछ लोकपि्रय परीक्षणों के अतिरिक्त जो आत्म - प्रतिवेदनतकनीक का उपयोग करते हैं, जिनका वणर्न ऊपर किया जा चुका है, वुफछ दूसरे परीक्षण भी हैं जो व्यक्ितत्व के विश्िाष्टआयामों ;जैसे - सत्तावाद, नियंत्राण - स्थान, आशावाद इत्यादिद्ध का मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं। आगे मनोविज्ञान का अध्ययन करने पर आप इनके बारे में और अिाक जानकारी प्राप्त करेंगे। आत्म - प्रतिवेदन मापों में अनेक समस्याएँ या न्यूनताएँ पाइर् जाती हैं। सामाजिक वांछनीयता ;ेवबपंस कमेपतंइपसपजलद्ध उनमें से एक है। उत्तरदाता में सामाजिक दृष्िट से वांछनीयतरीके से ही एकांशों के प्रति अनुिया देने की प्रवृिा पाइर् जाती है। दूसरी समस्या है अनुमनन ;ंबुनपमेबमदबमद्ध। प्रयोज्य में एक प्रवृिा यह भी पाइर् जाती है कि वह एकांशों अथवा प्रश्नों की विषयवस्तु से निरपेक्ष होकर उससे सहमत हो जाता है। यह प्रायः देखा जा सकता है जब प्रयोज्य, एकांशोंके प्रति ‘हाँ’ की अनुिया देता है। इन प्रवृिायों से व्यक्ितत्व के मूल्यांकन की विश्वसनीयता कम हो जाती है। यहाँ इस चरण पर आवश्यक है कि एक सावधानी के प्रति आपका ध्यान आकष्िार्त किया जाए। यह याद रखें कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण और व्यक्ितत्व की समझ के लिए उच्चस्तरीय कौशल और प्रश्िाक्षण की आवश्यकता होती है। जब तक आप किसी विशेषज्ञ के सचेत पयर्वेक्षण में इष्टतम स्तर तक इन कौशलों को अजिर्त न कर लें तब तक आपको अपने उन मित्रों जो मनोविज्ञान का अध्ययन नहीं करते हैं, के व्यक्ितत्व का परीक्षण और उसकी व्याख्या करने का जोख्िाम नहीं उठाना चाहिए। प्रक्षेपी तकनीक अब तक व्यक्ितत्व के मूल्यांकन की जिन तकनीकों का वणर्न किया गया है वे सब प्रत्यक्ष तकनीवेंफ हैं जिनमें व्यक्ित से सीधे उसके बारे में सूचनाएँ प्राप्त करके उसके व्यक्ितत्व के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है और वह व्यक्ित स्पष्ट रूप से जानता है कि उसके व्यक्ितत्व का मूल्यांकन किया जा रहा है। इन स्िथतियों में लोग प्रायः आत्मचेतन का अनुभव करते हैं और अपनी निजी या अंतरंग भावनाओं, विचारों और अभ्िाप्रेरणाओं को व्यक्त करने में हिचकिचाते हैं। वे जब भी ऐसा करते हैं तो प्रायः सामाजिक दृष्िट से वांछनीय तरीके के अनुरूप व्यवहार करने का प्रयास करते हैं। मनोविश्लेषनात्मक सि(ांत के अनुसार मानव व्यवहार का एक बड़ा भाग अचेतन अभ्िाप्रेरणाओं द्वारा नियमित होता है। व्यक्ितत्व - मूल्यांकन की प्रत्यक्ष वििायों द्वारा हमारे व्यवहार के अचेतन पक्ष को उद्घाटित नहीं किया जा सकता है। इसलिए ये वििायाँ किसी व्यक्ित के व्यक्ितत्व का वास्तविक वणर्न करने में असपफल हो जाती हैं। मूल्यांकन की अप्रत्यक्ष वििायों का उपयोग करके इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। प्रक्षेपी तकनीवेंफ इसी वगर् की वििायों के अंतगर्त आती हैं। प्रक्षेपी तकनीकों का विकास अचेतन अभ्िाप्रेरणाओं और भावनाओं का मूल्यांकन करने के लिए किया गया है। ये तकनीवेंफ इस अभ्िाग्रह पर आधारित हंै कि कम संरचित अथवा असंरचित उद्दीपक अथवा स्िथति व्यक्ितयों को उस स्िथति पर अपनी भावनाओं, इच्छाओं और आवश्यकताओं को प्रक्षेपन करने का अवसर प्रदान करता है। विशेषज्ञों द्वारा इन प्रक्षेपणों की व्याख्या की जाती है। विभ्िान्न प्रकार की प्रक्षेपी तकनीवंेफ विकसित की गइर् हंै जिनमें व्यक्ितत्व के मूल्यांकन के लिए विभ्िान्न प्रकार की उद्दीपक सामगि्रयों और स्िथतियों का उपयोग किया जाता है। इनमें से वुफछ तकनीकों में उद्दीपकों ;जैसे - शब्द, मसिलक्ष्म या स्याही - धब्बाद्ध के साथ प्रयोज्य को अपने साहचयो± को बताने की आवश्यकता होती है, वुफछ में चित्रों को देखकर कहानी लिखनी होती है, वुफछ में वाक्यों को पूरा करने की आवश्यकता होती है, वुफछ में आरेखों द्वारा अभ्िाव्यक्ित अपेक्ष्िात होती है और वुफछ में उद्दीपकों के एक बृहत् समुच्चय में से उद्दीपकों का वरण करने के लिए कहा जाता है। यद्यपि इन तकनीकों में प्रयुक्त उद्दीपकों और अनुियाओंकी प्रकृति में पयार्प्त भ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं पिफर भी इन सभी में अधोलिख्िात विशेषताएँ समान रूप से पाइर् जाती हैं - 1ण् उद्दीपक सापेक्ष रूप से अथवा पूणर्तः असंरचित और अनुपयुक्त ढंग से परिभाष्िात होते हैं। 2ण् जिस व्यक्ित का मूल्यांकन किया जाता है उसे साधारणतया मूल्यांकन के उद्देश्य, अंक प्रदान करने की वििा और व्याख्या के बारे में नहीं बताया जाता है। 3ण् व्यक्ित को यह सूचना दे दी जाती है कि कोइर् भी अनुिया सही या गलत नहीं होती है। 4ण् प्रत्येक अनुिया व्यक्ितत्व के एक महत्वपूणर् पक्ष को प्रकट करने वाली समझी जाती है। 5ण् अंक प्रदान करना और व्याख्या करना लंबा ;अिाक समय लेने वालाद्ध और कभी - कभी आत्मनिष्ठ होता है। प्रक्षेपी तकनीवेंफ मनोमितिक परीक्षणों से अनेक प्रकार से भ्िान्न होती है। वस्तुनिष्ठ ढंग से प्रक्षेपी तकनीकों में अंक प्रदान नहीं किये जा सकते हैं। इनमें प्रायः गुणात्मक विश्लेषणों की आवश्यकता होती है जिसके लिए कठिन प्रश्िाक्षण अपेक्ष्िात है। आगे वुफछ प्रसि( प्रक्षेपी तकनीकों का संक्ष्िाप्त विवेचन किया जा रहा है। रोशार् मसिलक्ष्म परीक्षण यह परीक्षण हमर्न रोशार् ;भ्मतउंदद त्ंतेबींबीद्ध द्वारा विकसित किया गया है। इस परीक्षण में 10 मसिलक्ष्म या स्याही - धब्बे होते हैं। उनमें से पाँच काली और सपेफद रंगों के हैं, दो वुफछ लाल स्याही के साथ हैं और बाकी तीन पेस्टल रंगों के हैं। धब्बे एक विश्िाष्ट आवृफति या आकार के साथ सममितीय रूप में दिए गए हैं। प्रत्येक धब्बा 7श्ˆ10श् के आकार के एक सपेफद काडर् बोडर् के वंेफद्र में मुदि्रत ;छपा हुआद्ध है। ये धब्बे मूलतः एक कागश के पन्ने पर स्याही गिरा - कर पिफर उसे आधे पर से मोड़कर बनाए गए थे ;इसलिए इन्हें मसिलक्ष्म परीक्षण कहा जाता हैद्ध। इन काडो± को व्यक्ितगत रूप से प्रयोज्यों को दो चरणों में दिखाया जाता है। पहले चरण को निष्पादन मुख्य अथवा उपयुक्त ;चमतवितउंदबम चतवचमतद्ध कहते हैं जिसमें प्रयोज्यों को काडर् दिखाए जाते हैं और उनसे पूछा जाता है कि प्रत्येक काडर् में वे क्या देख रहे हैं। दूसरे चरण को पूछताछ ;पदुनपतलद्ध कहा जाता है जिसमें प्रयोज्य से यह पूछकर कि कहाँ, वैफसे और किस आधार पर कोइर् विश्िाष्ट अनुिया उनके द्वारा की गइर् है, इस आधार पर उनकी अनुियाओं का एक विस्तृत विवरण तैयार किया जाता है। प्रयोज्य की अनुियाओं को एक साथर्क संदभर् में रखने के लिए बिल्वुफल ठीक या सटीक निणर्य आवश्यक है। इस परीक्षण के उपयोग और व्याख्या के लिए विस्तृत प्रश्िाक्षण आवश्यकहोती है। प्रदत्तों की व्याख्या के लिए वंफप्यूटर तकनीकों को भी विकसित किया गया है। रोशार् मसिलक्ष्म का एक उदाहरण चित्रा 2ण्4 में दिया गया है। थोड़ा अिाक संरचित परीक्षण है। इस परीक्षण में 30 काली और सपेफद रंगों के सचित्रा काडर् और एक काडर् खाली ;सादाद्ध होते है। प्रत्येक सचित्रा काडर् एक या अिाक लोगों को विभ्िान्न स्िथतियों में चित्रिात करता है। प्रत्येक चित्रा को एक काडर् पर मुदि्रत किया गया है। वुफछ काडो± का उपयोग वयस्क पुरुषों या महिलाओं पर होता है। अन्य काडो± का उपयोग बालकों या बालिकाओं पर तथा वुफछ का संयुक्त रूप से उपयोग होता है। एक प्रयोज्य के लिए 20 काडर् उपयुक्त होते हैं, हालाँकि इससे कम संख्या में भी काडर् ;यहाँ तक कि पाँचद्ध का उपयोग सपफलतापूवर्क किया गया है। काडो± को एक - एक करके प्रयोज्य के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और प्रयोज्य को चित्रा में प्रस्तुत स्िथति का एक कहानी द्वारा वणर्न करने के लिए कहा जाता है - किस कारण से यह स्िथति उत्पन्न हुइर्, इस क्षण क्या घटित हो रहा है, भविष्य में क्या घटित होगा और चित्रा में प्रस्तुत विभ्िान्न पात्रा क्या अनुभव और चिंतन कर रहे हैं? टी.ए.टी. पर प्राप्त अनुियाओं को अंक प्रदान करने की एक मानक प्रिया उपलब्ध है। बच्चों के लिए और वृ(ों के लिए इस परीक्षण को रूपांतरित किया गया है। उमा चैधरी ;न्उं ब्ींनकींतलद्ध द्वारा किया गया टी.ए.टी. का भारतीय अनुवूफलन भी उपलब्ध है। एक टी.ए.टी. काडर् का उदाहरण चित्रा 2ण्5 में दिया गया है। रोजेनज्िवग का चित्रागत वुंफठा अध्ययन ;पी. - एपफ. अध्ययनद्ध यह परीक्षण रोजेनज्िवग ;त्वेमद्रूमपहद्ध द्वारा यह जानकारी प्राप्त करने के लिए विकसित किया गया कि वंुफठा उत्पन्न करने वाली स्िथति में लोग वैफसे आक्रामक व्यवहार अभ्िाव्यक्त करते हैं। यह परीक्षण व्यंग्य चित्रों की सहायता से विभ्िान्न स्िथतियों को प्रदश्िार्त करता है जिसमें एक व्यक्ित किसी दूसरे व्यक्ित को वुंफठित करते हुए अथवा किसी वुंफठात्मक दशा के प्रति दूसरे व्यक्ित का ध्यान आकष्िार्त करते हुए दिखाया जाता है। प्रयोज्य से यह पूछा जाता है कि दूसरा व्यक्ित ;वंुफठितद्ध क्या कहेगा अथवा क्या करेगा। अनुियाओं का विश्लेषण आक्रामकता के प्रकार एवं दिशा के आधार पर किया जाता है। इस बात की जाँच करने का प्रयास किया जाता है कि क्या बल वुंफठा उत्पन्न करने वाली वस्तु अथवा वुंफठित व्यक्ित के संरक्षण अथवा समस्या के रचनात्मक समाधान पर दिया गया है। आक्रामकता की दिशा पयार्वरण के प्रति अथवा स्वयं के प्रति हो सकती है। यह भी संभवहै कि स्िथति को टाल देने अथवा उसके महत्त्व को घटा देने के प्रयास में आक्रामकता की स्िथति समाप्त भी हो सकती है। पारीक ;च्ंतममाद्ध ने भारतीय जनसंख्या पर उपयोग के लिए इस परीक्षण को रूपांतरित किया है। वाक्य - समापन परीक्षण इस परीक्षण में अनेक अपूणर् वाक्यों का उपयोग किया जाता है। वाक्य का आरंभ्िाक भाग पहले प्रयोज्य के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और उसके बाद प्रयोज्य को वाक्य के अंतिम भाग को समाप्त करना होता है। ऐसा अभ्िागृहीत है कि वाक्य के अंतिम भाग को प्रयोज्य जिस तरह समाप्त करताहै, वह उसकी अभ्िावृिायों, अभ्िाप्रेरणाओं और द्वंद्वों को प्रतिबिंबित करता है। यह परीक्षण प्रयोज्यों को अनेक ऐसे अवसर प्रदान करता है कि वे अपनी अंतनिर्हित अचेतन अभ्िाप्रेरणाओं को अभ्िाव्यक्त कर सवेंफ। वाक्य - समापन परीक्षण के वुफछ प्रतिदशर् एकांशों को नीचे दिया गया है - 1ण् मेरे पिता कृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृ। 2ण् मुझे सबसे अिाक भय कृकृकृकृकृकृकृकृकृ। 3ण् मेरी माँ के बारे में सबसे अच्छी बात है कि कृकृ। 4ण् मुझे इस बात पर गवर् है कि कृकृकृकृकृकृ। व्यक्तंकन परीक्षण यह एक सरल परीक्षण है जिसमें प्रयोज्य को एक कागश के पन्ने पर किसी व्यक्ित का चित्रांकन करने के लिए कहा जाता है। चित्राण को सुकर बनाने के लिए प्रयोज्य को एक पेन्िसल और रबड़ ;मिटाने काद्ध प्रदान किया जाता है। चित्रांकन के समापन के बाद प्रयोज्य से एक विपरीत लिंग के व्यक्ित का चित्रांकन करने के लिए कहा जाता है। अंततः प्रयोज्य से उस व्यक्ित के बारे में एक कहानी लिखने को कहा जाता है मानो वह किसी उपन्यास या नाटक का एक पात्रा हो। व्याख्याओं के वुफछ उदाहरण निम्नलिख्िात प्रकार के होते हैं - 1ण् मुखावृफति का लोप यह संकेत करता है कि व्यक्ित किसी उच्चस्तरीय द्वंद्व से अभ्िाभूत अंतवैर्यक्ितक संबंध को टालने का प्रयास कर रहा है। 2ण् गरदन पर आलेखीय बल देना आवेगों के नियंत्राण के अभाव का संकेत करता है। 3ण् अनानुपातिक रूप से बड़ा सिर आंगिक रूप से मस्ितष्क रोग और सरददर् के प्रति दुश्िंचता को सूचित करता है। प्रक्षेपी तकनीकों की सहायता से व्यक्ितत्व का विश्लेषण अत्यंत रोचक प्रतीत होता है। यह हमें किसी व्यक्ित की अचेतन अभ्िाप्रेरणाओं, गहन द्वंद्वों और संवेगात्मक मनोग्रंथ्िायों को समझने में सहायता करता है। यद्यपि इन तकनीकों में अनुियाओं की व्याख्या के लिए परिष्वृफत कौशलों और विश्िाष्ट प्रश्िाक्षण की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त अंक प्रदान करने की विश्वसनीयता और व्याख्याओं की वैधता से संबंिात वुफछ समस्याएँ भी होती हैं। विंफतु व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों ने इन तकनीकों को नितांत उपयोगी पाया है। व्यवहारपरक विश्लेषण विभ्िान्न स्िथतियों में व्यक्ित का व्यवहार हमें उसके व्यक्ितत्व के बारे में साथर्क सूचनाएँ प्रदान कर सकता है। व्यवहार का प्रेक्षण व्यवहारपरक विश्लेषण के आधार का काम करता है।एक प्रेक्षक की रिपोटर् में जो प्रदत्त होते हैं, वे साक्षात्कार ;पदजमतअपमूद्ध, प्रेक्षण ;वइेमतअंजपवदद्ध, निधार्रण ;तंजपदहद्ध, नाम निदेर्शन ;दवउपदंजपवदद्ध और स्िथतिपरक परीक्षणों ;ेपजनंजपवदंस जमेजेद्ध से प्राप्त होते हैं। हम इन विभ्िान्न प्रियाओं की वुफछ विस्तार से जाँच करेंगे। साक्षात्कार व्यक्ितत्व के मूल्यांकन के लिए साक्षात्कार एक सामान्यतः प्रयुक्त होने वाली वििा है। इसमें मूल्यांकन किए जाने वाले व्यक्ित से बातचीत की जाती है और उससे वुफछ विश्िाष्ट प्रश्न पूछे जाते हैं। नैदानिक साक्षात्कारों में साधारणतया गहन रूप से साक्षात्कार किए जाते हैं जिसमें प्रयोज्यों द्वारा दिएजाने वाले उत्तरों के परे भी दृष्िट रखी जाती है। मूल्यांकन के उद्देश्य अथवा लक्ष्य के आधार पर साक्षात्कार संरचित अथवा असंरचित हो सकते हैं। असंरचित साक्षात्कारों;नदेजतनबजनतमक पदजमतअपमूेद्ध में साक्षात्कारकतार् अनेक प्रश्नों को किसी व्यक्ित से पूछ कर उसके बारे में एक छवि विकसित करने का प्रयत्न करता है। एक व्यक्ित जिस प्रकार अपने आपको प्रस्तुत करता है औरप्रश्नों का उत्तर देता है उसमें उसके व्यक्ितत्व को उद्घाटित करने के लिए पयार्प्त संभाव्यता होती है। संरचित साक्षात्कारों ;ेजतनबजनतमक पदजमतअपमूेद्ध में अत्यंत विश्िाष्ट प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं और एक निश्िचत या नियत प्रिया का पालन किया जाता है। ऐसा प्रायः साक्षात्कार किए जाने वाले व्यक्ितयों ;साक्षात्कारदाताओंद्ध की वस्तुनिष्ठ तुलना करने के लिए किया जाता है। निधार्रण मापनियों का उपयोग मूल्यांकनों की वस्तुनिष्ठता में और अिाक वृि कर सकता है। प्रेक्षण व्यवहारपरक प्रेक्षण एक अन्य वििा है जिसका व्यक्ितत्व के मूल्यांकन के लिए बहुत अिाक उपयोग किया जाता है। यद्यपि हम लोगों को ध्यानपूवर्क देखते हैं और उनके व्यक्ितत्व के प्रति छवि निमार्ण करते हैं तथापि व्यक्ितत्व मूल्यांकन केलिए प्रेक्षण वििा का उपयोग एक अत्यंत परिष्कृत प्रिया है जिसको अप्रश्िाक्ष्िात लोगों के द्वारा उपयोग में नहीं लाया जा सकता है। इसमें प्रेक्षक का विश्िाष्ट प्रश्िाक्षण और किसी व्यक्ित विशेष के व्यक्ितत्व के मूल्यांकन के लिए व्यवहारों के विश्लेषण के बारे में विस्तृत मागर्दशीर् सि(ांत भी अपेक्ष्िात होते हैं। उदाहरण के लिए, एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक अपने सेवाथीर् की उसके परिवार के सदस्यों और गृहवीक्षकों या अतिथ्िायों वेंतःियाओं का प्रेक्षण कर फ साथ होने वाली असकता है। सावधानी से अभ्िाकल्िपत प्रेक्षण के साथ एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक अपने सेवाथीर् के व्यक्ितत्व के बारे में पयार्प्त अंतदर्ृष्िट विकसित कर सकता है। बारंबार और व्यापक उपयोग के बावजूद भी प्रेक्षण और साक्षात्कार वििायों में निम्नलिख्िात सीमाएँ पाइर् जाती हैंμ 1ण् इन वििायों द्वारा उपयोगी प्रदत्त के संग्रह के लिए अपेक्ष्िात व्यावसायिक प्रश्िाक्षण कठिन और समयसाध्य होता है। 2ण् इन तकनीकों द्वारा वैध प्रदत्त प्राप्त करने के लिए मनोवैज्ञानिक में भी परिपक्वता आवश्यक होती है। 3ण् प्रेक्षक की उपस्िथति मात्रा परिणामों को दूष्िात कर सकती है। एक अपरिचित के रूप में प्रेक्षक प्रेक्षण किए जाने वाले व्यक्ित के व्यवहार को प्रभावित कर सकता हैजिसके कारण प्राप्त प्रदत्त अनुपयोगी हो सकते हैं। व्यवहारपरक निधार्रण शैक्ष्िाक एवं औद्योगिक वातावरण में व्यक्ितत्व के मूल्यांकन के लिए प्रायः व्यवहारपरक निधार्रण का उपयोग किया जाता है। व्यवहारपरक निधार्रण सामान्यतया उन लोगों से लिए जाते हैं जो निधार्रण किए जाने वाले व्यक्ित को घनिष्ठ रूप से जानते हैं और उनके साथ लंबी समयाविा तक अंतःिया कर चुके होते हैं अथवा जिनको पे्रक्षण करने का अवसर उन्हें प्राप्त हो चुका होता है। इस वििा मंे योग्यता निधार्रक व्यक्ितयों को उनके व्यवहारपरक गुणों के आधार पर वुफछ संवगो± में रखने का प्रयास करते हैं। इन संवगो± में विभ्िान्न संख्याएँ या वणर्नात्मक शब्द हो सकते हैं। यह पाया गया है कि संख्याओं अथवा सामान्य वणर्नात्मक विशेषणों का निधार्रण मापनियों में उपयोग प्रायः योग्यता निधार्रक लिए भ्रम उत्पन्न करता है। प्रभावी ढंग से निधार्रणों का उपयोग करने के लिए आवश्यक है कि विशेषकों को सावधानीपूवर्क लिखे गए व्यवहारपरक स्िथरकों के आधार पर स्पष्ट रूप से परिभाष्िात होना चाहिए। निधार्रण वििा की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिख्िात हैं - 1ण् योग्यता निधार्रक प्रायः वुफछ अभ्िानतियों को प्रदश्िार्त करते हैं जो विभ्िान्न विशेषकों के बारे में उनके निणर्य को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, हममें से अिाकांश लोग किसी एक अनुवूफल अथवा प्रतिवूफल विशेषक से अत्यिाक प्रभावित हो जाते हैं। इसी के आधार पर प्रायः योग्यता निधार्रक किसी व्यक्ित के बारे में अपनासमग्र निणर्य दे देता है। इस प्रवृिा को परिवेश प्रभाव ;ींसव ममििबजद्ध कहते हैं। 2ण् योग्यता निधार्रक में एक यह प्रवृिा भी पाइर् जाती है कि वह व्यक्ितयों को या तो छोर की स्िथतियों का परिहार कर मापनी के मध्य में रखता है ;मध्य संवगर् अभ्िानतिद्ध या पिफर मापनी के मध्य संवगो± का परिहार कर ;आत्यंतिक अनुिया अभ्िानतिद्ध छोर की स्िथतियों में रखता है। योग्यता निधार्रकों के उपयुक्त प्रश्िाक्षण और ऐसी मापनियों के विकास जिसमें अनुिया अभ्िानतियों की संभावना कम हो,इनके द्वारा उपयुर्क्त प्रवृिायों को समाप्त किया जा सकता है। नाम निदेर्शन इस वििा का उपयोग प्रायः समकक्षी मूल्यांकन प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग उन व्यक्ितयों के साथ किया जा सकता है जिनमें दीघर्कालिक अंतःिया होती रही हो और जो एक - दूसरे को अच्छी तरह से जानते हों। नाम निदेर्शन वििा के उपयोग में प्रत्येक व्यक्ित से समूह के एक अथवा एक से अिाक व्यक्ितयों का वरण या चयन करने के लिए कहा जाता है जिसके अथवा जिनके साथ वह कायर् करना, पढ़ना, खेलना अथवा किसी अन्य िया में सहभागी होना पसंद करेगा/ करेगी। व्यक्ित से चुने गए व्यक्ितयों के वरण के विश्िाष्ट कारणों के बारे में भी पूछा जा सकता है। इस प्रकार व्यक्ित के व्यक्ितत्व और व्यवहारपरक गुणों को समझने के लिए प्राप्त नाम निदेर्शनों का विश्लेषण किया जा सकता है। यह तकनीक अत्यंत विश्वसनीय पाइर् गइर् है, यद्यपि यह व्यक्ितगत अभ्िानतियों से प्रभावित हो सकती है। स्िथतिपरक परीक्षण व्यक्ितत्व का मूल्यांकन करने के लिए विभ्िान्न प्रकार के स्िथतिपरक परीक्षण निमिर्त किए गए हैं। सबसे अिाक प्रयुक्त किया जाने वाला इस प्रकार का एक परीक्षण स्िथतिपरक दबाव परीक्षण ;ेपजनंजपवदंस ेजतमेे जमेजद्ध है। कोइर् व्यक्ित दबावमय स्िथतियों में किस प्रकार व्यवहार करता है, इसके बारे में हमें सूचनाएँ प्रदान करता है। इस परीक्षण में एक व्यक्ित को एक दिए गए वृफत्य पर निष्पादन वुफछ ऐसे दूसरे लोगों के साथ करना होता है, जिनको उस व्यक्ित के साथ असहयोग करने और उसके निष्पादन में हस्तक्षेप करने का अनुदेश दिया गया होता है। इस परीक्षण में शाब्िदक प्रतिवेदन भी प्राप्त किया जाता है। स्िथति वास्तविक एक प्रकार का भूमिका - निवार्ह सम्िमलित होता है जो उस भी हो सकती है अथवा इसे एक वीडियो खेल के द्वारा उत्पन्न व्यक्ित से करने के लिए कहा जाता है, उसके बारे में एक भी किया जा सकता है। प्रमुख पद गुदीय अवस्था, आद्य प्ररूप, प्रमुख विशेषक, वेंफद्रीय विशेषक, सेवाथीर् - वेंफदि्रत चिकित्सा, सामूहिक अचेतन, रक्षा युक्ितयाँ, अहं, बहिमर्ुखता, मानवतावादी उपागम, इदम् ;इडद्ध, आदशर् अहं या आत्म, हीनता मनोग्रंथ्िा, अंतमर्ुखता, कामप्रसुप्ित काल, लिबिडो, इडिपस मनोग्रंथ्िा, व्यक्ितगत अनन्यता, लैंगिक अवस्था, प्रक्षेपी तकनीवेंफ, मनोगतिक उपागम, प्रक्षेपण, युक्ितकरण, प्रतििया निमार्ण, प्रतिगमन, दमन, आत्म - सक्षमता, आत्म - सम्मान, आत्म - नियमन, सामाजिक अनन्यता, पराहम्, विशेषक उपागम, प्ररूप उपागम, अचेतन। ऽ आत्म और व्यक्ितत्व का अध्ययन अपने आपको और दूसरों को समझने में हमारी सहायता करता है। एक व्यक्ित का आत्म महत्वपूणर् दूसरों के साथ सामाजिक अंतःिया के द्वारा विकसित होता है। ऽ आत्म विभ्िान्न प्रकार के होते हैं, जैसे - व्यक्ितगत आत्म, सामाजिक आत्म और संबंधात्मक आत्म। आत्म - सम्मानऔर आत्म - सक्षमता व्यवहार के दो ऐसे अत्यंत महत्वपूणर् पक्ष हैं जिनका हमारे जीवन में व्यापक महत्त्व होता ह।ैऽ आत्म - नियमन की मनोवैज्ञानिक तकनीकों में किसी व्यक्ित के व्यवहार का व्यवस्िथत पे्रक्षण, आत्म - प्रबलन और आत्म - अनुदेश सम्िमलित होते हैं। ऽ व्यक्ितत्व से तात्पयर् व्यक्ित की मनोदैहिक विशेषताओं से है जो विभ्िान्न स्िथतियों और समयों में सापेक्ष रूप से स्िथर होते हैं और उसे अनन्य बनाते हैं। चूँकि व्यक्ितत्व हमारे जीवन में विभ्िान्न प्रकार की स्िथतियों के प्रति अनुवूफलन करने में सहायक होता है इसलिए बाह्य अथवा आंतरिक शक्ितयों के परिणामस्वरूप इसमें परिवतर्न संभव है। ऽ व्यक्ितत्व का अध्ययन विभ्िान्न उपागमों द्वारा किया गया है। इनमें सबसे अिाक प्रमुख उपागम प्रारूपिक, मनोगतिक, व्यवहारवादी, सांस्वृफतिक और मानवतावादी उपागम हैं। ऽ प्रारूपिक उपागम व्यक्ितत्व का वणर्न वुफछ प्ररूपों के आधार पर करने का प्रयास करता है, जिसमें विशेषकों के एक गुच्छ पर बल दिया जाता है। आॅलपोटर्, वैफटेल और आइजेंक ने व्यक्ितत्व के प्ररूप उपागम का समथर्न किया जो किसी व्यक्ित का एक एकीवृफत दृष्िटकोण प्रस्तुत करता है। ऽ Úायड ने मनोगतिक उपागम विकसित किया और इड, अहं और पराहम् जैसी हमारी आंतरिक शक्ितयों के बीच सतत द्वंद्वों के रूप में व्यक्ितत्व का विवेचन किया है। प्रफायड के विचार से अचेतन द्वंद्व मनोलैगिंक विकास की प्रिया में सन्िनहित होता है जो मौख्िाक, गुदीय, लैंगिक, कामप्रसुप्ित में घटित होता है। ऽ पश्च - Úायडवादी सि(ांतकारों ने अंतवैर्यक्ितक शक्ितयों और व्यक्ित के जीवन की समकालीन परिस्िथतियों परबल दिया है। युंग, Úाॅम, एडलर, हानीर् और एरिक्सन ने व्यक्ितत्व में अहं और सामाजिक शक्ितयों की भूमिका को महत्वपूणर् बताया है। ऽ व्यवहारवादी उपागम व्यक्ितत्व को पयार्वरण के प्रति किसी व्यक्ित की अनुिया के रूप में समझता है। व्यवहारवादी अनुिया को व्यक्ितत्व की एक संरचनात्मक इकाइर् के रूप में स्वीकार करते हैं जो किसी विश्िाष्ट आवश्यकता की संतुष्िट के लिए प्रकट किया जाता है। ऽ सांस्वृफतिक उपागम व्यक्ितत्व को प्रचलित आथ्िार्क अनुरक्षण प्रणालियों और लोगों के एक समूह की परिणामी सांस्वृफतिक विशेषताओं के प्रति व्यक्ितयों के अनुवूफलन के रूप में समझने का प्रयास करता है। ऽ मानवतावादी उपागम व्यक्ितयों के आत्मनिष्ठ अनुभवों और उनके वरणों पर बल देता है। रोजसर् ने ‘वास्तविक आत्म’ और ‘आदशर् आत्म’ के मध्य संबंध पर बल दिया है। इन दोनों प्रकार के आत्म के बीच समरूपता होने पर व्यक्ित पूणर्तः प्रकायर्शील होता है। मैस्लो ने लोगों को अभ्िाप्रेरित करने वाली आवश्यकताओं के पारस्परिक प्रभाव के रूप में व्यक्ितत्व का विवेचन किया है। आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में निम्न - कोटि ;उत्तरजीविता संबंधीद्ध आवश्यकताओं से उच्च - कोटि ;विकास संबंधीद्ध आवश्यकताओं तक व्यवस्िथत किया जा सकता है। ऽ व्यक्ितत्व मूल्यांकन से तात्पयर् उस प्रिया से है जिसके द्वारा वुफछ मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के रूप में लोगों का विश्लेषण और मूल्यांकन किया जाता है। इसमें व्यक्ित के व्यवहार की उच्चस्तरीय परिशु(ता के साथ भविष्यवाणी करना प्रमुख लक्ष्य होता है। ऽ किसी व्यक्ित के व्यक्ितत्व का मूल्यांकन प्रेक्षक के प्रतिवेदनों, प्रक्षेपी तकनीकों और आत्म - प्रतिवेदन मापों द्वारा किया जा सकता है। प्रेक्षक के प्रतिवेदनों में साक्षात्कार, प्रेक्षण, निधार्रण, नाम निदेर्शन और स्िथतिपरक परीक्षण आते हैं। रोशार् मसिलक्ष्म या स्याही - धब्बा परीक्षण और कथानक संप्रत्यक्षण परीक्षण व्यक्ितत्व की व्यापक रूप से प्रयुक्त की जाने वाली प्रक्षेपी तकनीकें हैं। आत्म - प्रतिवेदन माप स्पष्ट रूप से संरचित परीक्षणों के उपयोग द्वारा व्यक्ितत्व का मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं।ण् 1ण् आत्म क्या है? आत्म की भारतीय अवधारणा पाश्चात्य अवधारणा से किस प्रकार भ्िान्न हैै? 2ण् परितोषण के विलंब से क्या तात्पयर् है? इसे क्यों वयस्कों के विकास के लिए महत्वपूणर् समझा जाता है? 3ण् व्यक्ितत्व को आप किस प्रकार परिभाष्िात करते हैं? व्यक्ितत्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम कौन - से हैं? 4ण् व्यक्ितत्व का विशेषक उपागम क्या है? यह कैसे प्ररूप उपागम से भ्िान्न है? 5ण् Úायड ने व्यक्ितत्व की संरचना की व्याख्या कैसे की है? 6ण् हानीर् की अवसाद की व्याख्या अल्प्रेफड एडलर की व्याख्या से किस प्रकार भ्िान्न है? 7ण् व्यक्ितत्व के मानवतावादी उपागम की प्रमुख प्रतिज्ञप्ित क्या है? आत्मसिि से मैस्लो का क्या तात्पयर् था? 8ण् व्यक्ितत्व - मूल्यांकन में प्रयुक्त की जाने वाली प्रमुख प्रेक्षण वििायों का विवेचन करें। इन वििायों के उपयोग में हमें किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है? 9ण् संरचित व्यक्ितत्व परीक्षणों से क्या तात्पयर् है? व्यापक रूप से उपयोग किए गए दो संरचित व्यक्ितत्व परीक्षण कौन - से हैं? 10ण् व्याख्या कीजिए कि प्रक्षेपी तकनीक किस प्रकार व्यक्ितत्व का मूल्यांकन करती है? कौन - से व्यक्ितत्व के प्रक्षेपी परीक्षण मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग में लाए गए हैं? 11ण् अरिहन्त एक गायक बनना चाहता है, इसके बावजूद कि वह चिकित्सकों के एक परिवार से संबंध रखता है।यद्यपि उसके परिवार के सदस्य दावा करते हैं कि वे उसको प्रेम करते हैं किंतु वे उसकी जीवनवृिा को दृढ़ता से अस्वीकार कर देते हैं। कालर् रोजसर् की शब्दावली का उपयोग करते हुए अरिहन्त के परिवार द्वारा प्रदश्िार्तअभ्िावृिायों का वणर्न कीजिए। वेब¯लक्स ूूूण्ेीपचण्मकनध््बहइवमतममध्चमतेबवदजमदजेण्ीजउस मदण्ूपापचमकपंण्वतहध्ूपापध्चतवरमबजपअमऋजमेज शैक्ष्िाक संकेत 1ण् विद्याथ्िार्यों को आत्म का संप्रत्यय समझाने के लिए वुफछ ियाकलापों को आयोजित किया जा सकता है, जैसे - किसी विद्याथीर् को अपने बारे में बताने के लिए कहा जा सकता है। 2ण् संप्रत्ययों को समझाने के लिए अनुक्रम या प्रवाह चाटर्/आरेखों को तैयार कीजिए। अध्याय में दिए गए संप्रत्ययों से संबंिात चाटर्/आरेखों को तैयार करने में विद्याथ्िार्यों की सहायता कीजिए। 3ण् जीवन के विविध क्षेत्रों में विभ्िान्न व्यक्ितत्व - मूल्यांकनकी तकनीकों के महत्त्व पर बल दीजिए। 4ण् व्यक्ितत्व के विभ्िान्न परीक्षणों के प्रतिदशर् एकांशों को विद्याथ्िार्यों में अभ्िारुचि उत्पन्न करने के लिए दिखाया जा सकता है। उनको व्यक्ितत्व के विभ्िान्न मापों में सम्िमलित परीक्षण एकांशों की तुलना करने के लिए कहा जा सकता है।

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