इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप जिनमें लोग एक दूसरे से भ्िान्न होते हैं उन मनोवैज्ञानिक गुणों को समझ सवेंफगे, मनोवैज्ञानिक गुणों के मूल्यांकन के लिए प्रयुक्त विभ्िान्न विध्ियों को सीख सवेंफगे,व्याख्या कर लेंगे कि बुिमत्तापूणर् व्यवहार किसे कहते हैं, मानसिक रूप से चुनौतीग्रस्त तथा प्रतिभाशाली व्यक्ितयों की पहचान के लिए मनोवैज्ञानिक बुि का मूल्यांकन किस प्रकार करते हैं, जान सवेंफगे,भ्िान्न - भ्िान्न संस्कृतियों में किस प्रकार बुि का अथर् भी भ्िान्न - भ्िान्न होता है, जान सवेंफगे, तथा बुि तथा अभ्िाक्षमता के विभेद को समझ सवेंफगे। परिचय मानव प्रकायो± में व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ मनोवैज्ञानिक गुणों का मूल्यांकन बुि बुि के सि(ांत बहु - बुि का सि(ांत बुि का त्रिाचापीय सि(ांत बुि की योजना, अवधन - भाव प्रबोधन तथा सहकालिक - आनुक्रमिक माॅडल बुि में व्यक्ितगत भ्िान्नताएँविषयवस्तु बुि में विचलन बुि परीक्षणों के वुफछ दुरुपयोग ;बाॅक्स 1ण्1द्धसंस्कृति तथा बुि सांवेगिक बुि प्रमुख पद संवेगतः बुिमान व्यक्ितयों की विशेषताएँ ;बाॅक्स 1ण्2द्ध सारांश विश्िाष्ट योग्यताएँ समीक्षात्मक प्रश्न अभ्िाक्षमता - स्वरूप एवं मापन परियोजना विचार सजर्नात्मकता वेबलिंक्स शैक्ष्िाक संकेत यदि आप अपने मित्रों, सहपाठियों या संबंिायों का प्रेक्षण करें तो आप पाएँगे कि उनके प्रत्यक्षण करने,सीखने और चिंतन करने के साथ - साथ विभ्िान्न कृत्यों को निष्पादित करने के उनके ढंग में अनेक भ्िान्नताएँ हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्रा में ऐसी व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ देखी जा सकती हैं। इस तरह यह स्पष्ट है कि सभी व्यक्ित एक दूसरे से भ्िान्न होते हैं। कक्षा 11 में आपने उन मनोवैज्ञानिक सि(ांतों को पढ़ा है जो मानव व्यवहार को समझने में अनुप्रयुक्त होते हैं। हमें यह भी जानने की आवश्यकता है कि किस तरह लोग भ्िान्न होते हैं, ये भ्िान्नताएँ वैफसे उत्पन्न होती हैं और वैफसे इन भ्िान्नताओं का मूल्यांकन किया जा सकता है। आपको स्मरण होगा कि वैफसे गाल्टन ;ळंसजवदद्ध के समय से ही व्यक्ितगत भ्िान्नताओं का अध्ययन आधुनिक मनोविज्ञान का मुख्य अध्ययन क्षेत्रा रहा है। इस अध्याय के माध्यम से व्यक्ितगत भ्िान्नताओं की वुफछ मूल बातों से आप परिचित होंगे। मनोवैज्ञानिकों के लिए रुचिकर प्रमुख मनोवैज्ञानिक गुणों में से एक बुि है। लोग एक दूसरे से जटिल विचारों को समझने, पयार्वरण से अनुवूफलन करने, अनुभव से सीखने, विविध प्रकार की तवर्फनाओं में व्यस्त होने तथा विविध बाधाओं पर विजय प्राप्त करने की योग्यता में एक दूसरे से भ्िान्न होते हैं। इस अध्याय में आप बुि का स्वरूप, बुि संप्रत्यय की बदलती परिभाषाएँ, बुि मेंसांस्कृतिक भ्िान्नताएँ, लोगों की बौिक सक्षमताओं की सीमा और उनमें विचलन तथा विश्िाष्टयोग्यताओं या अभ्िाक्षमताओं की प्रकृति के बारे में पढ़ेंगे। मानव प्रकायो± में व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ विभ्िान्न प्रजाति के प्राण्िायों में तथा किसी एक ही प्रजाति के प्राण्िायों में भी समान ढंग की वैयक्ितक भ्िान्नताएँ पाइर्जाती हैं। भ्िान्नताओं के कारण ही प्रकृति में आकषर्ण तथा सौंदयर् होता है। एक क्षण के लिए अपने चतुदिर्व्फ ऐसे जगत की कल्पना करें जिसमें जरा सोचें कि सभी वस्तुएँ एक ही रंग की, लाल या नीली अथवा हरी हों तो दुनिया वैफसी लगेगी। निश्िचत ही वह सुंदर नहीं होगी। पूरी संभावना हैकि आपका उत्तर नहीं होगा और न आप ऐसे संसार में रहना ही चाहेंगे। वस्तुओं की तरह ही मनुष्यों में भी विविधता पाइर् जाती है। प्रत्येक व्यक्ित में भ्िान्न - भ्िान्न विशेषकों का सम्िमश्रण होता है।विचलनशीलता या विभ्िान्नता एक प्राकृतिक तथ्य है और व्यक्ित इसके अपवाद नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ित एक दूसरे से शारीरिक विशेषताओं जैसे - उँफचाइर्, वशन, शक्ित, बालों का रंग आदि में भ्िान्न होता है। उनमें मनोवैज्ञानिक विशेषताओं में भी भ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं। वे अिाक या कम बुिमान हो सकते हैं, प्रभावी या विनम्र हो सकते हैं, उच्च मात्रा में सजर्नशील या बिल्वुफल भी सजर्नशील नहीं हो सकते हैं तथा जावक या विनिवतिर्त हो सकते हैं। विभ्िान्नताओं की सूची बहुत लंबी हो सकती है। किसी एक व्यक्ित में भ्िान्न - भ्िान्न विशेषकों की भ्िान्न - भ्िान्न मात्राएँ हो सकती हैं। इस प्रकार हममें से प्रत्येक व्यक्ित अद्वितीय होता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ित विभ्िान्न विशेषकों के विश्िाष्ट सम्िमश्रण को अभ्िाव्यक्त करता है। आप प्रश्न कर सकते हैं कि प्रत्येक व्यक्ित क्यों और वैफसे एक दूसरे से भ्िान्न हो जाता है। वस्तुतः इस प्रश्न से संबंिात विषयवस्तु ही व्यक्ितगत भ्िान्नताओं ;पदकपअपकनंस कपमिितमदबमेद्ध का अध्ययन कहा जाता है। मनोवैज्ञानिकों के लिए व्यक्ितगत भ्िान्नता का अथर् है व्यक्ितयों की विशेषताओं तथा व्यवहार के स्वरूपों में पाया जाने वाला वैश्िाष्ट्य तथा विचलनशीलता। वुफछ मनोवैज्ञानिक यह विश्वास करते हैं कि हमारे व्यवहार हमारे व्यक्ितगत विशेषकों से प्रभावित होते हैं जबकि वुफछ दूसरे मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि हमारे व्यवहार स्िथतिपरक कारकों से अिाक निधार्रित होते हैं। यह दूसरा मत स्िथतिवाद ;ेपजनंजपवदपेउद्ध कहा जाता है जिसमें यह मान्यता है कि किसी व्यक्ित का व्यवहार उसकी परिस्िथति या वतर्मान दशाओं से प्रभावित होता है। एक व्यक्ित जो सामान्यतः आक्रामक प्रवृति का है, अपने सवोर्च्च अिाकारी की उपस्िथति में बहुत विनम्र व्यवहार करता है। कभी - कभी स्िथतियों का प्रभाव इतना शक्ितशाली होता है कि व्यक्ितत्व के भ्िान्न - भ्िान्न विशेषकों को रखने वाले लोगों का व्यवहार लगभग समान होता है। स्िथतिवादी परिप्रेक्ष्य बाह्यकारकों के प्रभाव को मनुष्य के व्यवहार के लिए अपेक्षाकृत अध्िक प्रभावकारी मानता है। मनोवैज्ञानिक गुणों का मूल्यांकन व्यक्ित के मनोवैज्ञानिक गुणों का संबंध बहुत सरल घटना, जसैे - किसी उद्दीपक के प्रति अनुिया करने में लगने वाला समय अथार्त प्रतििया काल से भी होता है और बहुत अिाक व्यापक संप्रत्यय, जैसे - प्रसन्नता से भी होता है। मापन करने योग्य समस्त मनोवैज्ञानिक गुणों को परिभाष्िात करना और उनकी सूची बना पाना एक कठिन कायर् है। किसी मनोवैज्ञानिक गुण को समझने का पहला चरण उसका मूल्यांकन ;ंेेमेेउमदजद्ध करना है। मूल्यांकन करने का अथर् व्यक्ित के मनोवैज्ञानिक गुणों का मापन करने से है। मापन के अंतगर्त व्यक्ितयों के गुणों की तुलना करने की अनेक मानक वििायाँ अपनाइर् जा सकती हैं। किसी व्यक्ित में किसी गुण की उपस्िथति तभी स्वीकार की जाती है जब उस गुण का किसी वैज्ञानिक वििा से मापन किया जा सके। उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं कि ‘हरीश एक प्रभावी व्यक्ित है’ तो हम हरीश में ‘प्रभाविता’ होने की मात्रा का संकेत करते हैं। हरीश के बारे में हमारा यह कथन उसमें ‘प्रभाविता’ होने के गुण का हमारे द्वारा किए गए मूल्यंाकन का परिणाम है। किसी गुण का मूल्यंाकन अनौपचारिक अथवा औपचारिक हो सकता है।औपचारिक मूल्यंाकन वस्तुनिष्ठ, मानकीकृत तथा व्यवस्िथत रूप में किया जाता है। दूसरी ओर अनौपचारिक मूल्यंाकन जिन व्यक्ितयों का किया जाना है उनके बदल जाने से तथा मूल्यंाकन करने वाले व्यक्ितयों के बदल जाने से परिवतिर्त होता रहता है जिससे प्राप्त परिणाम या मूल्यांकन की व्यक्ितनिष्ठ व्याख्या होने लगती है। मनोवैज्ञानिक गुणों के औपचारिक मूल्यंाकन के लिए मनोवैज्ञानिकों को प्रश्िाक्ष्िात किया जाता है। मूल्यांकन कर लेने के पश्चात प्राप्त सूचना के आधार पर हम हरीश द्वारा भविष्य में किए जाने वाले व्यवहारों का पूवर्कथन कर सकते हैं। हम यह पूवर्कथन कर सकते हैं कि यदि भविष्य में हरीश को किसी दल का नेतृत्व करने काअवसर दिया गया तो उसके एक सत्तावादी नेता होने की संभावना अिाक होगी। यदि हमें यह पूवर्कथन के अनुसार उत्पन्न स्िथति ग्राह्य नहीं है तो हम इसमें हस्तक्षेप करते हुए हरीश के व्यवहारों में परिवतर्न लाने का प्रयास कर सकते हैं। मूल्यंाकन किए जाने के लिए किसी गुण का चयन हमारे उद्देश्यों पर निभर्र करता है। यदि हम किसी कमशोर विद्याथीर् द्वारा परीक्षा में अच्छा निष्पादन करने में सहायता करना चाहते हैं तो हमें उसकी बौिक शक्ित तथा कमशोरियों का मूल्यंाकन करना होगा। यदि कोइर् व्यक्ित अपने परिवार तथा पड़ोस के सदस्यों के साथ समायोजन नहीं कर पा रहा है तो हम उसके व्यक्ितत्व विशेषकों के मूल्यंाकन पर विचार कर सकते हैं। यदि किसी व्यक्ित में अभ्िाप्रेरणा की मात्रा बहुत कम है तो हम उसकी अभ्िारुचियों तथा वरीयताओं का मूल्यांकन कर सकते हैं। व्यक्ितयों की योग्यताओं, व्यवहारों, और व्यक्ितगत गुणों के मनोवैज्ञानिक मापन में व्यवस्िथत परीक्षण की वििायों का उपयोग किया जाता है। मनोवैज्ञानिक गुणों के वुफछ क्षेत्रा मनोवैज्ञानिक गुण रेखीय अथवा एकविमीय नहीं होते। वे जटिल होते हैं और उन्हें कइर् विमाओं द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। कोइर् एक रेखा बहुत से बिंदुओं का एक समूह होती है और बिंदु कोइर् स्थान नहीं घेरता। परंतु एक डिब्बे के बारे में सोचें तो यह स्थान घेरता है। डिब्बे का वणर्न इसकी तीन विमाओं की सहायता से किया जा सकता है। ये तीन विमाएं हैं - इसकी लंबाइर्, चैड़ाइर् तथा उँफचाइर्। यही स्िथति मनोवैज्ञानिक गुणों की भी होती है। ये गुण सामान्यतया बहुविमात्मक या बहुपक्षीय होते हैं। यदि आप किसी व्यक्ित का पूणर् मूल्यांकन करना चाहते हैं तो आपको यह मूल्यांकन करना होगा कि वह विभ्िान्न क्षेत्रों, जैसे - संज्ञानात्मक, सांवेगिक, सामाजिक आदि में वैफसा व्यवहार या निष्पादन करता है। इस अध्याय में हम मनोवैज्ञानिकों की अभ्िारुचि के वुफछ महत्वपूणर् गुणों का वणर्न करेंगे। इन गुणों का संवगीर्करण मनोवैज्ञानिक साहित्य में उल्िलख्िात अनेक प्रकार के मनोवैज्ञानिक परीक्षणों पर आधारित है। 1.बुि ;पदजमससपहमदबमद्ध का आशय पयार्वरण को समझने, सविवेक चिंतन करने तथा किसी चुनौती के सामने होने पर उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की व्यापक क्षमता से है। बुि परीक्षणों से व्यक्ित की व्यापक सामान्य संज्ञानात्मक सक्षमता तथा विद्यालयीय श्िाक्षा से लाभ उठाने की योग्यता का ज्ञान होता है। सामान्यतया कम बुि रखने वाले विद्याथीर् विद्यालय की परीक्षाओं में उतना अच्छा निष्पादन करने की संभावना नहीं रखते परंतु जीवन के अन्य क्षेत्रों में उनकी सपफलता की प्राप्ित का संबंध मात्रा बुि परीक्षणों पर उनके प्राप्तांकों से नहीं होता। 2.अभ्िाक्षमता ;ंचजपजनकमद्ध का अथर् किसी व्यक्ित की कौशलों के अजर्न के लिए अंतनिर्हित संभाव्यता से है। अभ्िाक्षमता परीक्षणों का उपयोग यह पूवर्कथन करने में किया जाता है कि व्यक्ित उपयुक्त पयार्वरण और प्रश्िाक्षण प्रदान करने पर वैफसा निष्पादन कर सकेगा। एक उच्च यांत्रिाक अभ्िाक्षमता वाला व्यक्ित उपयुक्त प्रश्िाक्षण का अिाक लाभ उठाकर एक अभ्िायंता के रूप में अच्छा कायर् कर सकता है। इसी प्रकार भाषा की उच्च अभ्िाक्षमता वाले एक व्यक्ित को प्रश्िाक्षण देकर एक अच्छा लेखक बनाया जा सकता है। 3.अभ्िारुचि ;पदजमतमेजद्ध का अथर् किसी व्यक्ित द्वारा दूसरी ियाओं की अपेक्षा किसी एक अथवा एक से अिाक विश्िाष्ट ियाओं में स्वयं को अिाक व्यस्त रखने की वरीयता से ह।ै विद्याथ्िार्यों की अभ्िारुचि के मूल्यंाकन से हमें यह निणर्य लेने में सहायता मिल सकती है कि वे किन विषयों या पाठ्यक्रमों का प्रसन्नता के साथ अध्ययन कर सकते हैं। अभ्िारुचि का ज्ञान हमें विकल्पों के निधार्रण मंेसहायता करता है जो जीवन में संतुष्िट के साथ - साथ कायर् निष्पादन को उन्नत करता है। 4.व्यक्ितत्व ;चमतेवदंसपजलद्ध का अथर् व्यक्ित की अपेक्षाकृत स्थायी प्रकार की उन विशेषताओं से है जो उसे अन्य व्यक्ितयों से भ्िान्न बनाती हैं। व्यक्ितत्व परीक्षण व्यक्ित की अद्वितीय विशेषताओं, जैसे - व्यक्ित प्रभावी है या विनम्र, जावक है या विनिवतिर्त, संवेगतः स्िथर है या तुनक - मिशाज आदि का मूल्यंाकन करने का प्रयास करता है। व्यक्ितत्व - मूल्यांकन हमें किसी व्यक्ित के व्यवहारों की व्याख्या करने में सहायता प्रदान करने के साथ - साथ यह पूवर्कथन करने की क्षमता प्रदान करता है कि व्यक्ित भविष्य में वैफसा व्यवहार करेगा। 5.मूल्य ;अंसनमद्ध आदशर् व्यवहारों के संबंध में व्यक्ित के स्थायी विश्वास होते हैं। व्यक्ित के मूल्य उसके जीवन में व्यवहारों के लिए एक मानक निधार्रित करते हैं और उन्हें निदेर्श्िात करते हैं। मूल्यों द्वारा ही व्यक्ित दूसरे व्यक्ितयों के व्यवहारों के औचित्य का मूल्यांकन करता है। मूल्यों के मूल्यंाकन में हम किसी व्यक्ित में प्रभावी मूल्यों का निधार्रण करते हैं। उदाहरण के लिए मूल्यंाकन द्वारा हम यह जानना चाहते हैं कि किसी व्यक्ित में राजनीतिक, धामिर्क, सामाजिक, आथ्िार्क आदि मूल्यों में से कौन - सा मूल्य उसके व्यवहार को निदेर्श्िात करने हेतु प्रभावी रहता है। मूल्यांकन की वििायाँ मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए अनेक वििायाँ प्रयुक्त की जाती हैं। इनमें से वुफछ वििायों के बारे में आप कक्षा 11 में पढ़ चुके हैं। आइए हम पिफर उनकी प्रमुख विशेषताओं का पुनःस्मरण करें। ऽ मनोवैज्ञानिक परीक्षण ;चेलबीवसवहपबंस जमेजद्ध व्यक्ित की मानसिक तथा व्यवहारपरक विशेषताओं कावस्तुनिष्ठ तथा मानकीकृत मापक होता है। ऊपर बताइर् गइर् सभी मनोवैज्ञानिक विशेषताओं ;उदाहरणाथर् बुि, अभ्िाक्षमता आदिद्ध की सभी विमाओं के मापन के लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षण विकसित किए जा चुके हैं। क्िलनिकल निदान, निदेर्शन, कामिर्क चयन, स्थानन तथा प्रश्िाक्षण आदि कायो± में इन परीक्षणों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिकों ने विशेष रूप से व्यक्ितत्व के मूल्यांकन के लिए वुफछ प्रक्षेपी परीक्षणों का भी निमार्ण किया है। इनके बारे में आप अध्याय 2 में पढ़ेंगे। ऽ साक्षात्कार ;पदजमतअपमूद्ध की वििा में परीक्षणकतार् व्यक्ित से वातार्लाप करके सूचनाएँ एकत्रा करता है। आप इसे प्रयुक्त होते हुए देख सकते हैं जब कोइर् परामशर्द किसी सेवाथीर् से अंतःिया करता है, एक विव्रेफता घर - घर जाकर किसी विश्िाष्ट उत्पाद की उपयोगिता के संबंध में सवेर्क्षण करता है, कोइर् नियोक्ता अपने संगठन के लिए कमर्चारियों का चयन करता हैअथवा कोइर् पत्राकार राष्ट्रीय एवं अंतरार्ष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर महत्वपूणर् व्यक्ितयों का साक्षात्कार करता है। ऽ व्यक्ित अध्ययन ;बंेम ेजनकलद्ध वििा में किसी व्यक्ित के मनोवैज्ञानिक गुणों तथा उसके मनोसामाजिक और भौतिक पयार्वरण के संदभर् में उसके मनोवैज्ञानिक इतिहास आदि का गहनता से अध्ययन किया जाता है। नैदानिक मनोवैज्ञानिक इस वििा का व्यापक रूप से उपयोग करते हैं। इच्छुक व्यक्ित महान व्यक्ितयों के जीवन के केस विश्लेषणों द्वारा उन महान व्यक्ितयों के जीवन अनुभवों से सीख प्राप्त कर सकता है। व्यक्ित अध्ययन में विभ्िान्न वििायों, जैसे - साक्षात्कार, प्रेक्षण, प्रश्नावली, मनोवैज्ञानिक परीक्षण आदि के उपयोग सेप्रदत्त या आँकड़े एकत्रा किए जाते हैं। ऽ प्रेक्षण ;वइेमतअंजपवदद्ध में व्यक्ित की नैसगिर्क या स्वाभाविक दशा में घटित होने वाली तात्क्षण्िाक व्यवहारपरक घटनाओं का व्यवस्िथत, संगठित तथा वस्तुनिष्ठ ढंग से अभ्िालेख तैयार किया जाता है। वुफछ गोचर, जैसे - ‘मातृ - श्िाशु अंतःिया’ का अध्ययन प्रेक्षण - प्रणाली द्वारा सरलता से किया जा सकता है। प्रेक्षण - प्रणाली की एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें स्िथति पर प्रेक्षक का बहुत कम नियंत्राण होता है और प्रेक्षण से प्राप्त विवरण की प्रेक्षक द्वारा व्यक्ितनिष्ठ व्याख्या की जा सकती है। ऽ आत्म - प्रतिवेदन ;ेमस.ितमचवतजद्ध वह वििा है जिसमें व्यक्ित स्वयं अपने विश्वासों, मतों आदि के बारे में तथ्यात्मक सूचनाएँ प्रदान करता है। ऐसी सूचनाएँ किसी साक्षात्कार अनुसूची अथवा प्रश्नावली, किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षण अथवा वैयक्ितक डायरी का उपयोग करके प्राप्त की जा सकती हंै। बुि व्यक्ितयों की पारस्परिक भ्िान्नता जानने में बुि एक मुख्य निमिर्ति है। किसी व्यक्ित की बुि जानने से यह भी ज्ञात होता है कि वह अपने पयार्वरण के अनुरूप अपने व्यवहार को किस प्रकार अनुवूफलित करता है। इस खंड में आप बुि तथा उसके विभ्िान्न स्वरूपों के बारे में पढ़ेंगे। सामान्यजन बुि के स्वरूप के बारे में जो समझते हैं, मनोवैज्ञानिकों द्वारा उससे बिल्वुफल भ्िान्न ढंग से इसे समझा जाता है। यदि आप किसी बुिमान व्यक्ित के व्यवहारों का प्रेक्षण करें तो आप पाएँगे कि उसमें मानसिक सतवर्फता, हािारशवाबी, शीघ्र सीख लेने की योग्यता और संबंधों को समझ लेने की योग्यता जैसे अनेक गुण होते हैं। आॅक्सपफोडर् शब्दकोश ने बुि को प्रत्यक्षण करने ;चमतबमपअपदहद्ध, सीखने ;समंतदपदहद्ध, समझने ;नदकमतेजंदकपदहद्ध और जानने ;ादवूपदहद्ध की योग्यता के रूप में परिभाष्िात किया है। बुि के प्रारंभ्िाक सि(ांतकारों ने भी इन्हीं गुणों द्वारा बुि को परिभाष्िात किया था। अल्प्रेफड बिने ;।सतिमक ठपदमजद्ध बुि के विषय पर शोधकायर् करने वाले पहले मनोवैज्ञानिकों में से एक थे। उन्होंने बुि को अच्छा निणर्य लेने की योग्यता, अच्छा बोध करने की योग्यता और अच्छा तवर्फ प्रस्तुत करने की योग्यता के रूप में परिभाष्िात किया। वेश्लर ;ॅमबीेसमतद्ध, जिनका बनाया गया बुि परीक्षण बहुत व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, ने बुि को उसकी प्रकायार्त्मकता के रूप में समझा अथार्त उन्होंने पयार्वरण के प्रति अनुवूफलित होने में बुि के मूल्य कोमहत्त्व प्रदान किया। वेश्लर के अनुसार बुि व्यक्ित की वह समग्र क्षमता है जिसके द्वारा व्यक्ित सविवेक चिंतन करने, सोद्देश्य व्यवहार करने तथा अपने पयार्वरण से प्रभावी रूप से निपटने में समथर् होैता ह। वुफछ अन्य मनोवैज्ञानिकों, जैसे - गाडर्नर ;ळंतकदमतद्ध और स्टनर्बगर् ;ैजमतदइमतहद्ध का सुझाव है कि एक बुिमान व्यक्ित न केवल अपने पयार्वरण से अनुवूफलन करता है बल्िक उसमें सियता से परिवतर्न और परिमाजर्न भी करता है। आपको बुि का संप्रत्यय और उसका क्रमविकास बुि के वुफछ महत्वपूणर् सि(ांतों की विवेचना किए जाने के उपरांत समझ में आ जाएगा। बुि के सि(ांत मनोवैज्ञानिकों ने बुि के अनेक सि(ांतों का प्रतिपादन किया है। इन सि(ांतों को मोटे तौर पर मनोमितिक/संरचनात्मक उपागम अथवा सूचना प्रक्रमण उपागम का प्रतिनििात्व करनेवाले दो संवगो± में वगीर्कृत किया जा सकता हैμ मनोमितिक उपागम ;चेलबीवउमजतपब ंचचतवंबीद्ध में बुि को अनेक प्रकार की योग्यताओं का एक समुच्चय माना जाता है। यह व्यक्ित द्वारा किए जाने वाले निष्पादन को उसकी संज्ञानात्मक योग्यताओं के एक सूचकांक के रूप में व्यक्त करता है। दूसरी ओर, सूचना प्रक्रमण उपागम ;पदवितउंजपवद.चतवबमेेपदह ंचचतवंबीद्ध में बौिक तवर्फना तथा समस्या समाधान में व्यक्ितयों द्वारा उपयोग की जाने वाली प्रियाओं का वणर्न किया जाता है। इस उपागम का प्रमुख वेंफद्रबिंदु एक बुिमान व्यक्ित द्वारा की जाने वाली विभ्िान्न ियाओं पर होता है। बुि की संरचना तथा उसमें अंतनिर्हित विभ्िान्न विमाओं पर अिाक ध्यान न देकरसूचना प्रक्रमण उपागम बुिमत्तापूणर् व्यवहारों में अंतनिर्हित संज्ञानात्मक प्रियाओं के अध्ययन पर अिाक बल देता है। अब हम इन दो उपागमों के वुफछ प्रतिनििा सि(ांतों का वणर्न प्रस्तुत करेंगे। हम पहले बता चुके हैं कि बुि के संप्रत्यय को मानसिक संियाओं के रूप में औपचारिक बनाने का प्रयास करने वालों में अल्प्रेफड बिने प्रथम मनोवैज्ञानिक थे। बिने के पहले, बुि के संबंध में साधारण वणर्न भ्िान्न - भ्िान्नसांस्कृतिक परंपराओं में उपलब्ध अनेक दाशर्निक निबंधों में मिलता है। बिने द्वारा दिया गया बुि का सि(ांत बहुत हीसरल प्रकार का है क्योंकि इस सि(ांत की उत्पिा अिाक बुिमान और कम बुिमान व्यक्ितयों की अलग - अलग पहचान करने के प्रयासों के अंतगर्त हुइर् थी। इसलिए बिने ने बुि को योग्यताओं का एक समुच्चय माना जिसका उपयोग व्यक्ित के पयार्वरण में स्िथत किसी एक अथवा समस्त समस्याओं का समाधान करने में किया जा सकता है। उनका सि(ांत बुि के एक - कारक सि(ांत ;वदमंिबजवत जीमवतलद्ध के रूप में जाना जाता है। जब मनोवैज्ञानिकों ने बिने द्वारा निमिर्त किए गए बुि परीक्षणों द्वारा व्यक्ितयों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण करना प्रारंभ किया तो यह सि(ांत विवादग्रस्त हो गया। 1927 में चाल्सर् स्पीयरमैन ;ब्ींतसमे ैचमंतउंदद्ध ने बुि का द्वि - कारक सि(ांत ;जूव.ंिबजवत जीमवतलद्ध प्रस्तावित किया। यह सि(ांत कारक विश्लेषण की सांख्ियकीय वििा पर आधारित था। उन्होंने प्रदश्िार्त किया कि बुि के अंतगर्त एक सामान्य कारक ;सा - कारकद्ध ;ह.ंिबजवतद्ध तथा वुफछ विश्िाष्ट कारक ;वि - कारकद्ध ;े.ंिबजवतेद्ध होते हैं। सा - कारक के अंतगर्त वे सभी मानसिक संियाएँ होती हैं जो प्राथमिक हैं और जिनका प्रभाव सभी प्रकार के कायो± के निष्पादन पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक व्यक्ित में सा - कारक के साथ - साथ कइर् विश्िाष्ट योग्यताएँ भी होती हैं। इन विश्िाष्ट योग्यताओं को उन्होंने वि - कारक कहा। श्रेष्ठ गायक, वास्तुकार, वैज्ञानिक तथा ख्िालाड़ी आदि सा - कारक में उच्च स्तर के हो सकते हैं परंतु उनमें विश्िाष्ट क्षेत्रों से संबंिात विश्िाष्ट योग्यताएँ भी होती हैं जिनके कारण वे अपने - अपने क्षेत्रा में श्रेष्ठ हो जाते हैं। स्पीयरमैन के सि(ांत के बाद लुइर्स थसर््टन ;स्वनपे ज्ीनतेजवदमद्ध ने प्राथमिक मानसिक योग्यताओं का सि(ांत ;जीमवतल व िचतपउंतल उमदजंस ंइपसपजपमेद्ध प्रस्तुत किया। इसमें कहा गया कि बुि के अंतगर्त सात प्राथमिक मानसिकयोग्यताएँ होती हैं जो एक दूसरे से अपेक्षाकृत स्वतंत्रा होकर कायर् करती हैं। ये योग्यताएँ हैं - ;1द्ध वाचिक बोध ;शब्दों, संप्रत्ययों तथा विचारों के अथर् को समझनाद्ध, ;2द्ध संख्यात्मक योग्यताएँ ;संख्यात्मक तथा अभ्िाकलनात्मक कायो± को गति एवं परिशु(ता से करने का कौशलद्ध, ;3द्ध देश्िाक संबंध ;प्रतिरूपों तथा रचनाओं का मानस - प्रत्यक्षीकरण कर लेनाद्ध, ;4द्धप्रात्यक्ष्िाक गति ;विस्तृत प्रत्यक्षीकरण करने की गतिद्ध, ;5द्धशब्द प्रवाह ;शब्दों का प्रवाह तथा नम्यता के साथ उपयोग कर लेनाद्ध, ;6द्ध स्मृति ;सूचनाओं के पुनःस्मरण में परिशु(ताद्ध तथा ;7द्ध आगमनात्मक तवर्फना ;दिए गए तथ्यों से सामान्य नियमों को व्युत्पन्न करनाद्ध। आथर्र जेन्सेन ;।तजीनत श्रमदेमदद्ध ने बुि का एक पदानुक्रमिक माॅडल प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने कहा कि योग्यताएँ दो स्तरों - प्रथम स्तर ;स्मअमस प्द्ध तथा द्वितीय स्तर ;स्मअमस प्प्द्ध पर कायर् करती हैं। प्रथम स्तर साहचयार्त्मक अिागम का होता है जिसमें आगत तथा निगर्त लगभग समान होते हैं ;उदाहरण के लिए रट कर किया जाने वाला अिागम तथा स्मृतिद्ध। द्वितीय स्तर संज्ञानात्मक सक्षमताओं का होता है जिसमें उच्च स्तरीय कौशल होते हैं जो आगत को एक प्रभावी निगर्त में परिवतिर्त करते हैं। जे.पी. गिलपफोडर् ;श्रण्च्ण् ळनपसवितकद्ध ने बुि - संरचना माॅडल ;ेजतनबजनतम.व.िपदजमससमबज उवकमसद्ध प्रस्तुत कियाजिसमें बौिक विशेषताओं को तीन विमाओं में वगीर्कृत किया गया है - संियाएँ, विषयवस्तु तथा उत्पाद। संियाओं से तात्पयर् बुि द्वारा की जाने वाली ियाओं से है। इसमें संज्ञान, स्मृति अभ्िालेखन, स्मृति प्रतिधारण, अपसारी उत्पादन, अभ्िासारी उत्पादन तथा मूल्यांकन की ियाएँ होती हैं। विषय - वस्तु का संबंध उस सामग्री या सूचना के स्वरूप से होता है जिस पर व्यक्ित को बौिक ियाएँ करनी होती हैं। इसमें चाक्षुष, श्रवणात्मक, प्रतीकात्मक ;जैसे - अक्षर तथा संख्याएँद्ध, अथर्विषयक ;जैसे - शब्दद्ध तथा व्यवहारात्मक;व्यक्ितयों के व्यवहार, अभ्िावृिायों, आवश्यकताओं आदि से संबंिात सूचनाएँद्ध। उत्पाद का अथर् उस स्वरूप से होता है जिसमें व्यक्ित सूचनाओं का प्रक्रमण करता है। उत्पादों को इकाइर्, वगर्, संबंध, व्यवस्था, रूपांतरण तथा निहिताथर् मेंवगीर्कृत किया जाता है। चूँकि इस वगीर्करण ;गिलपफोडर्, 1988द्ध में 6´5´6 वगर् बनते हैं इसलिए इस माॅडल में 180 प्रकोष्ठ होते हैं। प्रत्येक प्रकोष्ठ में योग्यता के कम से कमएक कारक के सÂ( होने की प्रत्याशा की जाती है, वुफछ प्रकोष्ठों में एक से अिाक कारक भी हो सकते हैं। प्रत्येक कारक का वणर्न तीनों विमाओं के द्वारा किया जाता है। बुि के उपयुर्क्त सि(ांत मनोमितिक उपागम द्वाराबुिमत्तापूणर् व्यवहारों को समझने के लिए दिए गए सि(ांतों के प्रतिनििा सि(ांत हैं। बहु - बुि का सि(ांत बहु - बुि का सि(ांत हावडर् गाडर्नर ;भ्वूंतक ळंतकदमतद्ध द्वारा प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, बुि कोइर् एक तत्व नहीं है बल्िक कइर् भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की बुियों का अस्ितत्व होता है। प्रत्येक बुि एक दूसरे से स्वतंत्रा रहकर कायर् करती है। इसका अथर् यह है कि यदि किसी व्यक्ित में किसी एक बुि की मात्रा अिाक है तो यह अनिवायर् रूप से इसका संकेत नहीं करता कि उस व्यक्ित में किसी अन्य प्रकार की बुि अिाक होगी, कम होगी या कितनी होगी। गाडर्नर ने यह भी बताया कि किसी समस्या का समाधान खोजने के लिए भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की बुियाँ आपस में अंतःिया करते हुए साथ - साथ कायर् करती हैं। अपने - अपने क्षेत्रों में असाधारण योग्यताओं का प्रदशर्न करने वाले अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ितयों का गाडर्नर ने अध्ययन किया और इसके आधार पर आठ प्रकार की बुियों का वणर्न किया। ये निम्नलिख्िात हैं - भाषागत ;सपदहनपेजपबद्ध ;भाषा के उत्पादन और उपयोग के कौशलद्ध - यह अपने विचारों को प्रकट करने तथा दूसरे व्यक्ितयों के विचारों को समझने हेतु प्रवाह तथा नम्यता के साथ भाषा का उपयोग करने की क्षमता है। जिन व्यक्ितयों में यह बुि अिाक होती है वे ‘शब्द - वुफशल’ होते हैं। ऐसे व्यक्ित शब्दों के भ्िान्न - भ्िान्न अथो± के प्रति संवेदनशील होते हैं, अपने मन में भाषा के बिंबों का निमार्ण कर सकते हैं और स्पष्ट तथा परिशु( भाषा का उपयोग करते हैं। लेखकों तथा कवियांे में यह बुि अिाक मात्रा में होती है। ताविर्फक - गण्िातीय ;सवहपबंस.उंजीमउंजपबंसद्ध ;वैज्ञानिक चिंतन तथा समस्या समाधान के कौशलद्ध - इस प्रकार की बुि की अिाक मात्रा रखने वाले व्यक्ित ताविर्फक तथा आलोचनात्मक चिंतन कर सकते हैं। वे अमूतर् तवर्फना कर लेते हैं और गण्िातीय समस्याओं के हल के लिए प्रतीकों का प्रहस्तन अच्छी प्रकार से कर लेते हैं। वैज्ञानिकों तथा नोबेल पुरस्कार विजेताओं में इस प्रकार की बुि अिाक पाइर् जाने की संभावना रहती है। देश्िाक ;ेचंजपंसद्ध ;दृश्य बिंब तथा प्रतिरूप निमार्ण के कौशलद्ध - यह मानसिक बिंबों को बनाने, उनका उपयोग करने तथा उनमें मानसिक धरातल पर परिमाजर्न करने की योग्यता है। इस बुि को अिाक मात्रा में रखने वाला व्यक्ित सरलता से देश्िाक सूचनाओं को अपने मस्ितष्क में रख सकता है। विमान - चालक, नाविक, मूतिर्कार, चित्राकार, वास्तुकार, आंतरिक साज - सज्जा के विशेषज्ञ, शल्य - चिकित्सक आदि में इस बुि के अिाक पाए जाने की संभावना होती है। संगीतात्मक ;उनेपबंसद्ध ;सांगीतिक लय तथा अभ्िा - रचनाओं के प्रति संवेदनशीलताद्ध - सांगीतिक अभ्िारचनाओं को उत्पन्न करने, उनका सजर्न तथा प्रहस्तन करने की क्षमता सांगीतिक योग्यता कहलाती है। इस बुि की उच्च मात्रा रखने वाले लोग ध्वनियों और स्पंदनों तथा ध्वनियों की नइर् अभ्िारचनाओं के सजर्न के प्रति अिाक संवेदनशील होते हैं। शारीरिक - गतिसंवेदी ;इवकपसल.ापदंमेजीमजपबद्ध ;संपूणर् शरीर अथवा उसके किसी अंग की लोच का उपयोग करना तथा उसमें सजर्नात्मकता प्रदश्िार्त करनाद्ध - किसी वस्तु अथवा उत्पाद के निमार्ण के लिए अथवा मात्रा शारीरिक प्रदशर्न के लिए संपूणर् शरीर अथवा उसके किसी एक अथवा एक से अिाक अंग की लोच तथा पेशीय कौशल की योग्यता शारीरिक - गतिसंवेदी योग्यता कही जाती है। धावकों, नतर्कों, अभ्िानेताओं/अभ्िानेत्रिायों, ख्िालाडि़यों, जिमनास्टों तथा शल्य - चिकित्सकों में इस बुि की अिाक मात्रा पाइर् जाती है। अंतवैर्यक्ितक ;पदजमतचमतेवदंसद्ध ;दूसरे व्यक्ितयों के सूक्ष्म व्यवहारों के प्रति संवेदनशीलताद्ध - इस योग्यता द्वारा व्यक्ित दूसरे व्यक्ितयों की अभ्िापे्ररणाओं या उद्देश्यों, भावनाओं तथा व्यवहारों का सही बोध करते हुए उनके साथ मधुर संबंध स्थापित करता है। मनोवैज्ञानिक, परामशर्द, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कायर्कतार् तथा धामिर्क नेता आदि में उच्च अंतवैर्यक्ितक बुि पाए जाने की संभावना होती है। अंतःव्यक्ित ;पदजतंचमतेवदंसद्ध ;अपनी निजी भावनाओं, अभ्िाप्रेरणाओं तथा इच्छाओं की अभ्िाज्ञताद्ध - इस योग्यता के अंतगर्त व्यक्ित को अपनी शक्ित तथा कमशोरियों का ज्ञान और उस ज्ञान का दूसरे व्यक्ितयों के साथ सामाजिक अंतःिया में उपयोग करने का ऐसा कौशल सम्िमलित है जिससे वह अन्य व्यक्ितयों से प्रभावी संबंध स्थापित करता है। इस बुि की अिाक मात्रा रखने वाले व्यक्ित अपनी अनन्यता या पहचान, मानव अस्ितत्व और जीवन के अथा±े को समझने में अति संवेदनशील होते हैं। दाशर्निक तथा आध्यात्िमक नेता आदि में इस प्रकार की उच्च बुि देखी जा सकती है।प्रकृतिवादी ;दंजनतंसपेजपबद्ध ;पयार्वरण के प्राकृतिक पक्ष की विशेषताओं के प्रति संवेदनशीलताद्ध - इस बुि कातात्पयर् प्राकृतिक पयार्वरण से हमारे संबंधों की पूणर् अभ्िाज्ञता से है। विभ्िान्न पशु - पक्ष्िायों तथा वनस्पतियों के सौंदयर् काबोध करने में तथा प्राकृतिक पयार्वरण में सूक्ष्म विभेद करने में यह बुि सहायक होती है। श्िाकारी, किसान, पयर्टक, वनस्पतिविज्ञानी, प्राणीविज्ञानी और पक्षीविज्ञानी आदि मेंप्रकृतिवादी बुि अिाक मात्रा में होती है। बुि का त्रिाचापीय सि(ांत राबटर् स्टनर्बगर् ;1985द्ध ने बुि का त्रिाचापीय सि(ांत प्रस्तुत किया। स्टनर्बगर् के अनुसार फ्बुि वह योग्यता है जिससे व्यक्ित अपने पयार्वरण के प्रति अनुवूफलित होता है, अपने चित्रा 1.1 बुि के त्रिाचापीय सि(ांत के तत्व तथा अपने समाज और संस्कृति के उद्देश्यों की पूतिर् हेतु पयार्वरण के वुफछ पक्षों का चयन करता है और उन्हें परिवतिर्त करता हैय्। इस सि(ांत के अनुसार मूल रूप से बुि तीन प्रकार की होती है - घटकीय, आनुभविक तथा सांदभ्िार्क। बुि के त्रिाचापीय सि(ांत के तत्व चित्रा 1.1 में प्रदश्िार्त किए गए हैं। घटकीय बुि ;बवउचवदमदजपंस पदजमससपहमदबमद्ध - घटकीय या विश्लेषणात्मक बुि द्वारा व्यक्ित किसी समस्या का समाधान करने के लिए प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करता है। इस बुि की अिाक मात्रा रखने वाले लोग विश्लेषणात्मक तथा आलोचनात्मक ढंग से सोचते हैं और विद्यालय में सपफलता प्राप्त करते हैं। इस बुि के भी तीन अलग - अलग घटक होते हैं जो अलग - अलग कायर् करते हैं। पहला घटक ज्ञानाजर्न से संबंिात होता है जिसके द्वारा व्यक्ित अिागम करता है तथा विभ्िान्न कायो± को करने की वििा का ज्ञान प्राप्त करता है। दूसरा घटक अिा या एक उच्च स्तरीय घटक होता है जिसके द्वारा व्यक्ित योजनाएँ बनाता है कि उसको क्या करना है और वैफसे करना है। तीसरा घटक निष्पादन से संबंिात होता है। इस बुि द्वारा व्यक्ित किसी कायर् का वास्तव में निष्पादन करता है। आनुभविक बुि ;मगचमतपमदजपंस पदजमससपहमदबमद्ध - आनुभविक या सजर्नात्मक बुि वह बुि है जिसके द्वारा व्यक्ित किसी नइर् समस्या के समाधान हेतु अपने पूवर् अनुभवों का सजर्नात्मक रूप से उपयोग करता है। यह बुि सजर्नात्मक निष्पादन में प्रदश्िार्त होती है। इस बुि की उच्च मात्रा रखने वाले लोग विगत अनुभवों को मौलिक रूप में समाकलित करते हैं तथा समस्या के मौलिक समाधान खोजते हुए आविष्कार करते हैं। किसी विशेष स्िथति में वे तुरंत समझ जाते हैं कि कौन - सी सूचना अिाक निणार्यक होगी। सांदभ्िार्क बुि ;बवदजमगजनंस पदजमससपहमदबमद्ध - सांदभ्िार्क या व्यावहारिक बुि वह बुि है जिसके द्वारा व्यक्ित अपने दिन - प्रतिदिन के जीवन में आने वाली पयार्वरणी माँगों से निपटता है। इसे आप व्यावहारिक बुि या व्यावसायिक समझ कह सकते हैं। इस बुि की अिाक मात्रा रखने वाले व्यक्ित अपने वतर्मान पयार्वरण से शीघ्र अनुवूफलित हो जाते हैं या पिफर वतर्मान पयार्वरण की अपेक्षा अिाक अनुवूफल पयार्वरण का चयन कर लेते हैं या पिफर अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पयार्वरण में वांछित परिवतर्न कर लेे । इस ैतहंप्रकार ऐसे व्यक्ित अपने जीवन में सपफल होते हैं। स्टनर्बगर् का त्रिाचापीय सि(ांत बुि को समझने के लिए सूचना प्रक्रमण उपागम के अंतगर्त आने वाले सि(ांतों का एक प्रतिनििा सि(ांत है। बुि की योजना, अवधान - भाव प्रबोधन तथा सहकालिक - आनुक्रमिक माॅडल बुि के इस माॅडल को जे.पी. दास ;श्रण्च्ण् क्ंेद्ध, जैक नागलीरी ;श्रंबा छंहसपमतपद्ध तथा किबीर् ;ज्ञपतइलद्ध ;1994द्ध ने विकसित किया। संक्षेप में यह माॅडल ष्च्।ैैष् ;चसंददपदहए ंजजमदजपवदए ेपउनसजंदमवने ंदक ेनबबमेेपअमद्ध के नाम से जाना जाता है। इस माॅडल के अनुसार बौिक ियाएँ अन्योन्याश्रित तीन तंत्रिाकीय या स्नायुविक तंत्रों की ियाओं द्वारा संपादित होती हैं। इन तीन तंत्रों को मस्ितष्क की तीन प्रकायार्त्मक इकाइर्याँ कहा जाता है। ये तीन इकाइयाँ क्रमशः भाव प्रबोधन/अवधान, वूफट संकेतन या प्रक्रमण और योजना - निमार्ण का कायर् करती हैं। भाव प्रबोधन/अवधान ;ंतवनेंसध्ंजजमदजपवदद्ध - भाव प्रबोधन की दशा किसी भी व्यवहार के मूल में होती है क्योंकि यही किसी उद्दीपक की ओर हमारा ध्यान आकष्िार्त कराती है। भाव प्रबोधन तथा अवधान ही व्यक्ित को सूचना का प्रक्रमण करने के योग्य बनाता है। भाव प्रबोधन के इष्टतम स्तर के कारण हमारा ध्यान किसी समस्या के प्रासंगिक पक्षोंकी ओर आकृष्ट होता है। भाव प्रबोधन का बहुत अिाक होना अथवा बहुत कम होना अवधान को बािात करता है। उदाहरण के लिए जब आपके अध्यापक कहते हैं कि अमुक दिन आप सबकी एक परीक्षा ली जाएगी तो आपका भाव प्रबोधन बढ़ जाता है और आप विश्िाष्ट अध्यायों पर अिाक ध्यान देने लगते हैं। आपका भाव प्रबोधन आपके ध्यान को प्रासंगिक अध्यायों की विषय - वस्तुओं को पढ़ने, दोहराने तथा सीखने के लिए अभ्िाप्रेरित करता है। सहकालिक तथा आनुक्रमिक प्रक्रमण ;ेपउनसजंदमवने ंदक ेनबबमेेपअम चतवबमेेपदहद्ध - आप अपने ज्ञान भंडार में सूचनाओं का समाकलन सहकालिक अथवा आनुक्रमिक रूप से कर सकते हैं। विभ्िान्न संप्रत्ययों को समझने के लिए उनके पारस्परिक संबंधों का प्रत्यक्षण करते हुए उनको एक साथर्क प्रतिरूप में समाकलित करते समय सहकालिक प्रक्रमण होता है। उदाहरण के लिए रैवेन्स प्रोग्रेसिव मैटिªसेस ;आर.पी.एम.द्ध परीक्षण में परीक्षाथीर् को एक अपूणर् अभ्िाकल्प या डिशाइन दिखाया जाता है और उसे दिए गए छः विकल्पों में से उस विकल्प को चुनना होता है जिससे अपूणर् अभ्िाकल्प पूरा हो सके। सहकालिक प्रक्रमण द्वारा दिए गए अमूतर् चित्रों के पारस्परिक संबंधों को समझने में सहायता मिलती है। आनुक्रमिक प्रक्रमण उस समय होता है जब सूचनाओं को एक के बाद एक क्रम से याद रखना होता है ताकि एक सूचना का पुनःस्मरण ही अपने बाद वाली सूचना का पुनःस्मरण करा देता है। गिनती सीखना, वणर्माला सीखना, गुणन सारण्िायों को सीखना आदि आनुक्रमिक प्रक्रमण के उदाहरण हैं। योजना ;चसंददपदहद्ध - योजना बुि का एक आवश्यक अभ्िालक्षण है। जब किसी सूचना की प्राप्ित और उसके पश्चात् उसका प्रक्रमण हो जाता है तो योजना सिय हो जाती है। योजना के कारण हम ियाओं के समस्त संभावित विकल्पों के बारे में सोचने लगते हैं, लक्ष्य की प्राप्ित हेतु योजना को कायार्न्िवत करते हैं तथा कायार्न्वयन से उत्पन्न परिणामों की प्रभाविता का मूल्यांकन करते हैं। यदि कोइर् योजना इष्ट पफलदायक नहीं होती तो हम कायर् या स्िथति की माँग के अनुरूप उसमें संशोधन करते हैं। उदाहरण के लिए यदि आपके अध्यापक आपकी परीक्षा लेने वाले हैं तो आपको इसकी योजना बनाते हुए लक्ष्य निधार्रित करना होता है। आप पढ़ने के लिए एक समय सारणी बना लेते हैं। अध्याय में कोइर् समस्या आने पर उसका स्पष्टीकरण कराते हैं। पिफर यदि आपको परीक्षा के लिए नियत अध्याय को समझने में कठिनाइर् आती है तो आप अन्य मागर् खोजने लगते हैं। संभव है कि आप अपने अध्ययन का समय बढ़ाकर या किसी मित्रा के साथ अध्ययन करके अपने लक्ष्य को पाने का प्रयास करने लगंे। उपयुर्क्त तीनों पास ;च्।ैैद्ध प्रियाएँ औपचारिक रूप से ;पढ़ने, लिखने तथा प्रयोग करनेद्ध अथवा पयार्वरण से अनौपचारिक रूप से संकलित ज्ञान के भंडार पर कायर् करती हैं। इन प्रियाओं का स्वरूप अंतःियात्मक तथा गतिशील होता है। इसके बावजूद इनके अपने स्वतंत्रा अस्ितत्व तथा विश्िाष्ट प्रकायर् होते हैं। दास तथा नागलीरी ने एक परीक्षण माला भी विकसित की है जिसे संज्ञानात्मक मूल्यांकन प्रणाली ;बवहदपजपअम ंेेमेेउमदज ेलेजमउद्ध के नाम से जाना जाता है। विद्यालयीय श्िाक्षा से अप्रभावित मूल संज्ञानात्मक प्रियाओं के मापन के लिए इस परीक्षण मालामें वाचिक तथा अवाचिक दोनों ही प्रकार के कृत्य रखे गए हैं। यह परीक्षण माला 5 से 18 वषर् तक के व्यक्ितयों की संज्ञानात्मक प्रियाओं का मापन कर सकती है। मापन से प्राप्त परिणामों का उपयोग बच्चों में संज्ञानात्मक न्यूनता या उनकी अिागम संबंिात कठिनाइयों को दूर करने में किया जा सकता है। यह माॅडल बुि के सूचना प्रक्रमण उपागम का प्रतिनििात्व करता है। बुि में व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ वुफछ लोग दूसरों की तुलना में अिाक बुिमान क्यों होते हैं? ऐसा उनकी आनुवंश्िाकता के कारण होता है अथवा यह पयार्वरणी कारकों के प्रभाव से होता है। किसी व्यक्ित के विकास में इन कारकों के प्रभाव के बारे में आप कक्षा 11 में पहले ही पढ़ चुके हैं। बुि - आनुवंश्िाकता तथा पयार्वरण की अंतःिया बुि पर आनुवंश्िाकता के प्रभावों के प्रमाण मुख्य रूप सेयमज या जुड़वाँ तथा दत्तक बच्चों के अध्ययन से प्राप्त होते हैं। साथ - साथ पाले गए समरूप जुड़वाँ बच्चों की बुि में 0.90 सहसंबंध पाया गया है। बाल्यावस्था में अलग - अलग करके पाले गए जुड़वाँ बच्चों की बौिक, व्यक्ितत्व तथा व्यवहारपरक विशेषताओं में पयार्प्त समानता दिखाइर् देती है। अलग - अलग पयार्वरण में पाले गए समरूप जुँड़वा बच्चों की बुि में 0.72 सहसंबंध है, साथ - साथ पाले गए भ्रातृ जुड़वाँ बच्चों की बुि में लगभग 0.60 सहसंबंध, साथ - साथ पाले गए भाइर् - बहनों की बुि में 0.50 सहसंबंध तथा अलग - अलग पाले गए सहोदरों की बुि में 0.25 सहसंबंधपाया गया है। इस संबंध में अन्य प्रमाण दत्तक बच्चों के उन अध्ययनों से प्राप्त हुए हैं जिनमें यह पाया गया है कि बच्चों की बुि गोद लेने वाले माता - पिता की अपेक्षा जन्म देने वाले माता - पिता के अिाक समान होती है। बुि पर पयार्वरण के प्रभावों के संबंध में किए गए अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जैसे - जैसे बच्चों की आयु बढ़ती जाती है उनका बौिक स्तर गोद लेने वाले माता - पिता की बुि के स्तर के निकट पहुँचता जाता है। सुविधावंचित परिस्िथतियों वाले घरों के जिन बच्चों को उच्च सामाजिक - आथ्िार्क स्िथति के परिवारों द्वारा गोद ले लिया जाता है उनकी बुि प्राप्तांकों में अिाक वृि दिखाइर् देती है। यह इस बात का प्रमाण है कि पयार्वरणी वंचन बुि के विकास को घटा देता है जबकि प्रचुर एवं समृ( पोषण, अच्छीपारिवारिक पृष्ठभूमि तथा गुणवत्तायुक्त श्िाक्षा - दीक्षा बुि में वृि कर देती है। सामान्यतया सभी मनोवैज्ञानिकों की इस तथ्य पर सहमति है कि बुि आनुवंश्िाकता ;प्रकृतिद्ध तथा पयार्वरण ;पोषणद्ध की जटिल अंतःिया का परिणाम होती है। आनुवंश्िाकता द्वारा किसी व्यक्ित की बुि की परिसीमाएँ तय हो जाती हंै और बुि का विकास उस परिसीमन के अंतगर्त पयार्वरण में उपलभ्य अवलंबों और अवसरों द्वारा निधार्रित होता है। बुि का मूल्यांकन सवर्प्रथम 1905 में अल्प्रेफड बिने तथा थ्िायोडोर साइमन ;ज्ीमवकवतम ैपउवदद्ध ने औपचारिक रूप से बुि के मापन का सपफल प्रयास किया। 1908 में अपनी मापनी का संशोधन करते समय उन्होंने मानसिक आयु ;उमदजंस ंहमए ड।द्ध का संप्रत्यय दिया। मानसिक आयु के माप का अथर् है कि किसी व्यक्ित का बौिक विकास अपनी आयु वगर् के अन्य व्यक्ितयों की तुलना में कितना हुआ है। यदि किसी बच्चे की मानसिक आयु 5 वषर् है तो इसका अथर् है कि किसी बुि परीक्षण पर उस बच्चे का निष्पादन 5 वषर् के बच्चों के औसत निष्पादन के बराबर है। बच्चे की कालानुक्रमिक आयु ;बीतवदवसवहपबंस ंहमए ब्।द्ध जन्म लेने के बाद बीत चुकी अविा के बराबर होती है। एक तीव्रबुि बच्चे की मानसिक आयु उसकी कालानुक्रमिक आयु से अिाक होती है जबकि एक मंदबुि बच्चे की मानसिक आयु उसकी कालानुक्रमिक आयु से कम होती है। यदि किसी बच्चे की मानसिक आयु उसकी कालानुक्रमिक आयु से 2 वषर् कम हो तो बिने तथा साइमन ने इसे बौिक मंदता के रूप में परिभाष्िात किया। 1912 में एक जमर्न मनोवैज्ञानिक विलियम स्टनर् ;ॅपससपंउ ैजमतदद्ध ने बुि लब्िध ;पदजमससपहमदबम ुनवजपमदजए प्फद्ध का संप्रत्यय विकसित किया। किसी व्यक्ित की मानसिक आयु को उसकी कालानुक्रमिक आयु से भाग देने के बाद उसको 100 से गुणा करने से उसकी बुि लब्िध प्राप्त हो जाती है। मानसिक आयुबुि लब्िध = ´ 100 कालानुक्रमिक आयु गुणा करने में 100 की संख्या का उपयोग दशमलव बिंदु समाप्त करने के लिए किया जाता है। यदि किसी व्यक्ित की मानसिक आयु तथा कालानुक्रमिक आयु बराबर हो तो उसकी बुि लब्िध 100 प्राप्त होती है। यदि मानसिक आयु कालानुक्रमिक आयु से अिाक हो तो बुि लब्िध 100 से अिाक प्राप्त होती है। बुि लब्िध 100 से कम उस दशा में प्राप्त होती है जब मानसिक आयु कालानुक्रमिक आयु से कम हो। उदाहरण के लिए एक 10 वषर् के बच्चे की मानसिक आयु यदि 12 वषर् हो तो उसकी बुि लब्िध 120 ;12/10 ´ 100द्ध होगी। परंतु उसी बच्चे की मानसिक आयु यदि 7 वषर् होती तो उसकी बुि लब्िध 70 ;7/10 ´ 100द्ध होती। प्रत्येक आयु स्तर पर व्यक्ितयों की समष्िट की औसत बुि लब्िध 100 होती है। जनसंख्या में बुि लब्िध प्राप्तांक इस प्रकार वितरित होते हैं कि अिाकांश लोगों के प्राप्तांक वितरण के मध्य क्षेत्रा में रहते हैं। बहुत कम लोगों के प्राप्तांक बहुत अिाक या बहुत कम होते हैं। बुि लब्िध प्राप्तांकों का यदि एकआवृिा वितरण वक्र बनाया जाए तो यह लगभग एक घंटाकार वक्र के सदृश होता है। इस वक्र को सामान्य वक्र ;दवतउंस बनतअमद्ध कहा जाता है। ऐसा वक्र अपने वेंफद्रीय मूल्य या माध्य के दोनों ओर सममित आकार का होता है। एक सामान्य वितरण के रूप में बुि लब्िध प्राप्तांकों के वितरण को चित्रा 1.2 में प्रदश्िार्त किया गया है। किसी जनसंख्या की बुि लब्िध प्राप्तांक का माध्य 100 होता है। जिन व्यक्ितयों की बुि लब्िध प्राप्तांक 90 से 110 के बीच होती है उन्हें सामान्य बुि वाला कहा जाता है। जिनकी बुि लब्िध 70 से भी कम होती है वे मानसिक मंदन से प्रभावित समझे जाते हंै और जिनकी बुि लब्िध 130 से अिाक होती है वे असाधारण रूप से प्रतिभाशाली समझे जाते हैं। किसी व्यक्ित के बुि लब्िध प्राप्तांक की व्याख्या तालिका 1.1 की सहायता से की जा सकती है। सभी व्यक्ितयों की बौिक क्षमता एक समान नहीं होती। वुफछ व्यक्ित असाधारण रूप से तीव्रबुि वाले होते हैं तथा वुफछ औसत से कम बुि वाले। बुि परीक्षणों का एक व्यावहारिक उपयोग यह है कि इनसे बहुत अिाक तथा बहुत कम बुि वाले व्यक्ितयों की पहचान की जा सकती है। यदि आप तालिका 1.1 को देखें तो आप पाएँगे कि जनसंख्या के लगभग 2 प्रतिशत व्यक्ितयों की बुि लब्िध 130 से अिाक होती है और उतने ही प्रतिशत व्यक्ितयों की बुि लब्िध 70 से कम होती है। पहले वगर् के लोगों को बौिक रूप से प्रतिभाशाली ;पदजमससमबजनंससल हपजिमकद्ध कहा जाता है जबकि दूसरे वगर् के लोगों को मानसिक रूप से चुनौतीग्रस्त ;उमदजंससल बींससमदहमकद्ध या मानसिक रूप से मंदित ;उमदजंससल तमजंतकमकद्ध कहा जाता है। ये दोनों वगर् अपनी संज्ञानात्मक, संवेगात्मक तथा अभ्िाप्रेरणात्मक विशेषताओं में सामान्य लोगों की अपेक्षा पयार्प्त भ्िान्न होते हैं। तालिका 1.1 बुि लब्िध के आधार पर व्यक्ितयों का वगीर्करण बुि लब्िध वगर् वणर्नात्मक वगर्नाम जनसंख्या प्रतिशत 130 से अिाक अतिश्रेष्ठ 2.2 120 - 130 श्रेष्ठ 6.7 110 - 119 उच्च औसत 16.1 90 - 109 औसत 50.0 80 - 89 निम्न औसत 16.1 70 - 79 सीमावतीर् 6.7 70 से कम मानसिक रूप से 2.2 चुनौतीग्रस्त/मंदित बुि में विचलन बौिक न्यूनता किसी जनसंख्या में एक ओर तो प्रतिभाशाली तथा सजर्नात्मकव्यक्ित होते हैं जिनका वणर्न हम ऊपर कर चुके हैं, वहीं दूसरी ओर वुफछ ऐसे बच्चे भी होते हैं जिन्हें बहुत साधारण कौशलों को सीखने में भी बहुत कठिनाइर् होती है। ऐसे बच्चों को जिनमें बौिक न्यूनता होती है उन्हें ‘मानसिक रूप से चुनौतीग्रस्त’ या ‘मानसिक रूप से मंदित’ कहा जाता है। बौिक न्यूनता या मानसिक मंदन वाले बच्चों की बुि लब्िध में भी व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं। अमेरिकन एसोसिएशन आॅपफ मेंटल डिपि.फशॅन्सि ;ए.ए.एम.डी.द्ध के अनुसार मानसिक मंदन से तात्पयर् ‘उस अवसामान्य साधारण बौिक प्रकायार्त्मकता से है जो व्यक्ित की विकासात्मक अवस्थाओं में प्रकट होती है तथा उसके अनुवूफलित व्यवहार में न्यूनता से संबंिात होती है’। इस परिभाषा की तीन मूल विशेषताएँ हैं। पहली, किसी व्यक्ित को मानसिक रूप से मंदित कहलाने के लिए आवश्यक है कि उसकी बौिक प्रकायार्त्मकता सामान्य स्तर से पयार्प्त कम हो। जिन व्यक्ितयों की बुि लब्िध 70 से कम होती है उनकी बौिक प्रकायार्त्मकता सामान्य से पयार्प्त कम समझी जाती है। दूसरी विशेषता का संबंध अनुवूफलित व्यवहार में न्यूनता से है। अनुवूफलित व्यवहार का अथर् व्यक्ित की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह आत्मनिभर्र बनता है और अपने पयार्वरण से प्रभावी ढंग से अपना समायोजन करता है। तीसरी विशेषता यह है कि मानसिक मंदन व्यक्ित की विकासात्मक अवस्थाओं ;0 से 18 वषर् की आयु के मध्यद्ध में ही दिखाइर् पड़ जाना चाहिए। जिन व्यक्ितयों को मानसिक रूप से मंदित के समूह मेंवगीर्कृत किया जाता है उनकी योग्यताओं में भी पयार्प्त भ्िान्नताएँ दिखाइर् पड़ती हैं। उनमें से वुफछ व्यक्ितयों को तो विशेष ध्यान देकर साधारण प्रकार के कायर् करना सिखाया जा सकता है परंतु वुफछ ऐसे भी व्यक्ित होते हैं जिन्हें कोइर् प्रश्िाक्षण नहीं दिया जा सकता और उन्हें जीवन भर संस्थागत देखभाल की आवश्यकता पड़ती है। आप पहले ही सीख चुके हैं कि किसी जनसंख्या की बुि लब्िध प्राप्तांक का माध्य 100 होता है। बुि लब्िध की संख्याएँ मानसिक रूप से मंदित व्यक्ितयों के भ्िान्न - भ्िान्न वगो± को समझने में सहायक होती हैं। मानसिक मंदन के विभ्िान्न वगर् इस प्रकार होते हैं - निम्न मंदन ;उपसक तमजंतकंजपवदद्ध ;बुि लब्िध 55 से 69 के बीचद्ध, सामान्य मंदन ;उवकमतंजम तमजंतकंजपवदद्ध ;बुि लब्िध 40 से 54 के बीचद्ध, तीव्र मंदन ;ेमअमतम तमजंतकंजपवदद्ध ;बुि लब्िध 25 से 39 के बीचद्ध तथा अतिगंभीर मंदन ;चतवविनदक तमजंतकंजपवदद्ध ;बुि लब्िध 25 से कमद्ध। निम्न मंदन वाले व्यक्ितयों का विकास यद्यपि अपने समान आयु वाले व्यक्ितयों की अपेक्षा धीमा होता है वे स्वतंत्रा होकर अपने सभी कायर् कर लेते हैं, कोइर् नौकरी भी कर सकते हैं और अपने परिवार की देखभाल भी कर सकते हैं। मंदन की मात्रा जैसे - जैसे बढ़ती जाती है कठिनाइयाँ अिाक स्पष्ट रूप से दिखाइर् पड़ने लगती हैं। सामान्य मंदन वाले व्यक्ित अपने साथ के लोगों से भाषा के उपयोग तथा अन्य पेशीय कौशलों को सीखने में पीछे रह जाते हैं। इन्हें अपनी दैनिक देखभाल करने और सरल प्रकार के सामाजिक तथा संप्रेषण कौशलों के लिए प्रश्िाक्ष्िात किया जा सकता है। परंतु अपने दिन - प्रतिदिन के कायो± को करने के लिए उन्हें सामान्य पयर्वेक्षण की आवश्यकता पड़ती है। तीव्र मंदन और अतिगंभीर मंदन वाले व्यक्ित अपना जीवनयापन करने में अक्षम होते हैं और जीवन भर उनकी लगातार देखभाल करते रहने की आवश्यकता होती है। मानसिक रूप से मंदित/चुनौतीग्रस्त व्यक्ितयों की अन्य विशेषताओं के बारे में आप अध्याय 4 में वुफछ और तथ्य पढ़ेंगे। बौिक प्रतिभाशालिता अपनी उत्कृष्ट संभाव्यताओं के कारण बौिक रूप से प्रतिभाशाली व्यक्ियों का निष्पादन श्रेष्ठ प्रकार का होता है। प्रतिभाशाली व्यक्ितयों के अध्ययन 1925 में उस समय प्रारंभ हुए जब लेविस टमर्न ;स्मूपे ज्मतउंदद्ध ने 130 या उससे भी अिाक बुि लब्िध वाले 1500 बच्चों के जीवन का अभ्िालेख यह जानने के लिए रखना प्रारंभ किया कि बुि व्यावसायिक सपफलता और जीवन में समायोजन के साथ किस प्रकार संबंिात होती है। यद्यपि ‘प्रवीणता’ ;जंसमदजद्ध तथा ‘प्रतिभा’ ;हपजिमकदमेेद्ध शब्दों का समान अथो± में उपयोग किया जाता है परंतु इन दोनों के अथर् में भ्िान्नता होती है। प्रतिभा का अथर् उस असाधारण सामान्य प्रकार की योग्यता से है जो विस्तृत क्षेत्रा के कायो± में किए गए श्रेष्ठ निष्पादन में दिखाइर् पड़ती है। जबकि प्रवीणता का अथर् किसी विश्िाष्ट अथवा संवुफचित क्षेत्रा ;जैसे - आध्यात्िमक, सामाजिक, सौंदयर्परक आदिद्ध में श्रेष्ठ योग्यता से होता है। अिाक प्रवीण व्यक्ितयों को कभी - कभी ‘अद्भुत - प्रतिभाशाली’ भी कहा जाता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अध्यापकों के दृष्िटकोण से किसी व्यक्ित की प्रतिभाशालिता उसकी उच्च योग्यता ;ीपही ंइपसपजलद्ध, उच्च सजर्नात्मकता ;ीपही बतमंजपअपजलद्ध तथा उच्च प्रतिब(ता ;ीपही बवउउपजउमदजद्ध जैसे गुणों के संयोजन पर निभर्र करती है। प्रतिभाशाली बच्चों में उनकी बौिक श्रेष्ठता के लक्षण बहुत पहले ही दिखाइर् पड़ जाते हैं। शैशवकाल तथा पूवर् - बाल्यावस्था में ही उनमें अिाक अवधान विस्तृति, अच्छी प्रत्यभ्िाज्ञान स्मृति, नवीनता के प्रति रुझान, पयार्वरणी परिवतर्नों के प्रति उच्च संवेदनशीलता तथा भाषा - कौशल का शीघ्र प्रकटीकरण दिखाइर् देने लगता है। प्रतिभाशालिता तथा बहुत अच्छे शैक्ष्िाक या अकादमिक निष्पादन को एक समझना सही नहीं है। बहुत श्रेष्ठ मनोगतिक योग्यता प्रदश्िार्त करने वाले ख्िालाड़ी भी प्रतिभाशाली कहे जाएँगे। प्रत्येक प्रतिभाशाली विद्याथीर् के पास भ्िान्न - भ्िान्न क्षमताएँ, व्यक्ितत्व तथा विशेषताएँ होती हैं। प्रतिभाशाली बच्चों की वुफछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिख्िात हैं - ऽ उन्नत ताविर्फक चिंतन, प्रश्न करने की प्रवृिा तथा समस्या समाधान की अिाक योग्यता। ऽ सूचना प्रक्रमण की उच्च गति। ऽ सामान्यीकरण तथा विभेदन करने की श्रेष्ठ योग्यता। ऽ मौलिक तथा सजर्नात्मक चिंतन का उच्च स्तर। ऽ अंतभूर्त अभ्िाप्रेरणा तथा आत्म - सम्मान का उच्च स्तर। ऽ स्वतंत्रा एवं अननुरूप प्रकार का चिंतन। ऽ लंबी अविा तक अकेला रहकर अध्ययन करने को वरीयता देना। प्रतिभाशाली व्यक्ित की पहचान के लिए किसी बुि परीक्षण पर किया गया निष्पादन ही एकमात्रा माप नहीं है।सूचनाओं के बहुत से अन्य ड्डोतों, जैसे - अध्यापकों द्वारा किया गया निणर्य, विद्यालय में उपलब्िध के अभ्िालेख, बच्चों के माता - पिता के साक्षात्कार, समकक्ष्िायों तथा स्वयं द्वारा किए गए निधार्रण आदि का भी उपयोग बौिक मूल्यांकन के साथ - साथ किया जा सकता है। अपने पूणर् संभाव्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिभाशाली बालकों को सामान्य बालकों को नियमित कक्षाओं में दी जाने वाली श्िाक्षा के साथ - साथ विशेष ध्यान तथा भ्िान्न प्रकार के शैक्ष्िाक कायर्क्रमों की आवश्यकता होती है। इस श्िाक्षा में जीवन - समृि से संबंिात कायर्क्रम हो सकते हैं जो बालकों के पफलद चिंतन, योजना - निमार्ण, निणर्यन और संप्रेषण के कौशलों में अभ्िावृि कर सकते हैं। बुि परीक्षणों के प्रकार बुि परीक्षण कइर् प्रकार के होते हैं। परीक्षणों को देने की प्रिया के आधार पर उन्हें वैयक्ितक परीक्षण तथा समूहपरीक्षण में वगीर्कृत किया जा सकता है। परीक्षण के एकांशों के स्वरूप के आधार पर भी उन्हें शाब्िदक या वाचिकपरीक्षण तथा निष्पादन परीक्षण में वगीर्कृत किया जासकता है। इसके अतिरिक्त उन्हें संस्कृति - निष्पक्ष तथासंस्कृति - अभ्िानत में इस आधार पर वगीर्कृत किया जासकता है कि परीक्षण किस सीमा तक एक संस्कृति कीअपेक्षा किसी दूसरी संस्कृति का पक्ष ले रहा है। अपने उपयोग के उद्देश्य के आधार पर आप किसी परीक्षण को चुन सकते हैं। वैयक्ितक तथा समूह बुि परीक्षण वैयक्ितक बुि परीक्षण वह परीक्षण होता है जिसके द्वारा एक समय में एक ही व्यक्ित का बुि परीक्षण किया जा सकता है। समूह बुि परीक्षण को एक साथ बहुत से व्यक्ितयों को समूह में दिया जा सकता है। वैयक्ितक परीक्षण में आवश्यक होता है कि परीक्षणकतार् परीक्षाथीर् से सौहादर् स्थापित करे और परीक्षण सत्रा के समय उसकी भावनाओं, भावदशाओं और अभ्िाव्यक्ितयों के प्रति संवेदनशील रहे। समूह परीक्षण में परीक्षणकतार् को परीक्षाथ्िार्यों की निजी भावनाओं से परिचित होने का अवसर नहीं मिलता। वैयक्ितक परीक्षणों में परीक्षाथीर् पूछे गए प्रश्नों का मौख्िाक अथवालिख्िात रूप में भी उत्तर दे सकता है अथवा परीक्षणकतार् के अनुदेशानुसार वस्तुओं का प्रहस्तन भी कर सकता है। समूहपरीक्षण में परीक्षाथीर् सामान्यतः लिख्िात उत्तर देता है और प्रश्न भी प्रायः बहुविकल्पी स्वरूप के होते हैं। शाब्िदक, अशाब्िदक तथा निष्पादन परीक्षण एक बुि परीक्षण पूणर्तः शाब्िदक, पूणर्तः अशाब्िदक या अवाचिक अथवा पूणर्तः निष्पादन परीक्षण हो सकता है। इसके अतिरिक्त कोइर् बुि परीक्षण इन तीनों प्रकार के परीक्षणों के एकांशों का मिश्रित रूप भी हो सकता है। शाब्िदक परीक्षणों में परीक्षाथीर् को मौख्िाक अथवा लिख्िात रूप में शाब्िदक अनुियाएँ करनी होती हंै। इसलिए शाब्िदक परीक्षण केवल साक्षर व्यक्ितयों को ही दिया जा सकता है। अशाब्िदक परीक्षणों में एकांशों के रूप में चित्रों अथवा चित्रानिरूपणों का उपयोग किया जाता है। अशाब्िदक परीक्षणों का एक उदाहरण रैवेंस प्रोग्रेसिव मैटिªसेस ;आर.पी.एम.द्ध है जिसमें परीक्षाथीर् को एक अपूणर् प्रतिरूप दिखाया जाता है और उसे दिए गए अनेक वैकल्िपक प्रतिरूपों में से उस विकल्प को चुनना होता है जिससे अपूणर् प्रतिरूप पूरा हो सके। इस परीक्षण के एक एकांश को उदाहरणस्वरूप चित्रा 1.3 में प्रदश्िार्त किया गया है। चित्रा 1.3 रैवेंस प्रोग्रेसिव मैटिªसेस परीक्षण का एक एकांश निष्पादन परीक्षण में परीक्षाथीर् को कोइर् कायर् संपादित करने के लिए वुफछ वस्तुओं या अन्य सामगि्रयों का प्रहस्तनकरना होता है। एकांशों का उत्तर देने के लिए लिख्िात भाषा के उपयोग की आवश्यकता नहीं होती। उदाहरण के लिए कोह ;ज्ञवीेद्ध के ब्लाॅक - डिशाइन परीक्षण ;इसवबा कमेपहद जमेजद्ध में लकड़ी के कइर् घनाकार गुटके होते हैं। परीक्षाथीर् को दिए गए समय के अंतगर्त गुटकों को इस प्रकार बिछाना होता है कि उनसे दिया गया डिशाइन बन जाए। निष्पादनपरीक्षणों का एक लाभ यह हैं कि उन्हें भ्िान्न - भ्िान्न संस्कृतियों के व्यक्ितयों को आसानी से दिया जा सकता है। संस्कृति - निष्पक्ष तथा संस्कृति - अभ्िानत परीक्षण बुि परीक्षण संस्कृति - निष्पक्ष अथवा संस्कृति - अभ्िानत होसकते हैं। बहुत से बुि परीक्षण उस संस्कृति के प्रति अभ्िानति प्रदश्िार्त करते हैं जिसमें वे बुि परीक्षण विकसित किए जाते हैं। अमेरिका तथा यूरोप में विकसित किए गएबुि परीक्षण नगरीय तथा मध्यवगीर्य सांस्कृतिक लोकाचार का प्रतिनििात्व करते हैं। इसलिए इन परीक्षणों पर उस देश के श्िाक्ष्िात मध्यवगीर्य श्वेत व्यक्ित सामान्यतः अच्छा निष्पादन कर लेते हैं। इन परीक्षणों के एकांश या प्रश्न एश्िाया याअप्रफीका के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य का ध्यान नहीं रखते। इनपरीक्षणों के मानकों का निमार्ण भी पश्िचमी संस्कृति के व्यक्ितयों के समूहों से किया जाता है। आप परीक्षणों के मानक के विषय में पहले ही कक्षा 11 में पढ़ चुके हैं। किसी ऐसे परीक्षण का निमार्ण करना लगभग असंभवकायर् है जो सभी संस्कृतियों के लोगों पर एक समान साथर्क रूप से अनुप्रयुक्त किया जा सके। मनोवैज्ञानिकों ने ऐसे परीक्षणों का निमार्ण करने का प्रयास किया है जोसंस्कृति - निष्पक्ष हों या सभी संस्कृति - उपयुक्त हों अथार्त जोभ्िान्न - भ्िान्न संस्कृतियों के व्यक्ितयों में भेदभाव न करें। ऐसे परीक्षणों में एकांशों की रचना इस प्रकार की जाती है कि वेसभी संस्कृतियों में सवर्निष्ठ रूप से होने वाले अनुभवों का मूल्यांकन करें या उस परीक्षण में ऐसे प्रश्न रखे जाएँ जिनमें भाषा का उपयोग न हो। शाब्िदक परीक्षणों मे पाइर् जाने वालीसांस्कृतिक अभ्िानति अशाब्िदक तथा निष्पादन परीक्षण में कम हो जाती है। भारत में बुि परीक्षण 1930 में एस.एम. मोहसिन ;ैण्डण् डवीेपदद्ध ने हिन्दी भाषा में बुि परीक्षण के निमार्ण का प्रयास करके एक पथप्रदशर्क कायर् किया। सी.एच. राइस ;ब्ण्भ्ण् त्पबमद्ध ने बिने के बुि परीक्षण को उदूर् तथा पंजाबी भाषा में मानकीकृत करने का प्रयास किया। लगभग उसी समय महलानोबिस ;डंींसंदवइपेद्ध ने बिने के परीक्षण को बंगाली भाषा मेंमानकीकृत करने का प्रयास किया। भारतीय शोधकतार्ओं ने पश्िचमी देशों में बने वुफछ बुि परीक्षणों, जैसे - रैवेन्स प्रोग्रेसिव मैटिªसेस ;त्च्डद्ध, वेश्लर एडल्ट इंटेलिजेंस स्केल ;ॅ।प्ैद्ध, एलेक्जेंडर का पासएलांग ;च्ंेेंसवदहद्ध परीक्षण, घन रचना ;बनइम बवदेजतनबजपवदद्ध परीक्षण तथा कोह का ब्लाॅक - डिशाइन परीक्षण आदि का भारतीय मानक विकसित करने का प्रयास किया। लांग ;स्वदहद्ध तथा मेहता ;डमीजंद्ध ने एक मानसिक मापन पुस्ितका प्रकाश्िात की जिसमें भारत की विभ्िान्न भाषाओं में उपलब्ध 103 बुि परीक्षणों की सूची है। उसके बाद से बहुत से नए बुि परीक्षण या तोविकसित किए गए या पिफर पश्िचमी संस्कृतियों में निमिर्तपरीक्षणों का भारतीय संस्कृति के लिए उपयुक्त अनुवूफलन किया गया। राष्ट्रीय शैक्ष्िाक अनुसंधान और प्रश्िाक्षण परिषद् ;एन.सी.इर्.आर.टी.द्ध के शैक्ष्िाक तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के राष्ट्रीय पुस्तकालय ;एन.एल.इर्.पी.टी.द्ध ने भारतीय परीक्षणों के प्रलेखन के बाद अभ्िालेख तैयार किया है। भारतीय परीक्षणों के आलोचनात्मक पुनरीक्षण पुस्ितका के रूप में प्रकाश्िात हैं। एन.एल.इर्.पी.टी. ने बुि, अभ्िाक्षमता, व्यक्ितत्व, तालिका 1.2 भारत में विकसित वुफछ परीक्षण शाब्िदक निष्पादन ऽ उदय शंकर द्वारा विकसित सी.आइर्.इर्. शाब्िदक समूह बुि ऽ सी.आइर्.इर्. अशाब्िदक समूह बुि परीक्षण परीक्षण ऽ भाटिया द्वारा निमिर्त निष्पादन परीक्षणमाला ऽ एस. जलोटा द्वारा निमिर्त सामान्य मानसिक योग्यता का ऽ प्रमिला पाठक का ‘ड्राॅ ए मैन’ परीक्षण समूह परीक्षण ऽ आर. रामलिंगस्वामी द्वारा वेश्लर एडल्ट परपफारमेन्स इंटेलिजेंस ऽ प्रयाग मेहता द्वारा निमिर्त समूह बुि परीक्षण टेस्ट का भारतीय अनुवूफलन ऽ एस.एम. मोहसिन द्वारा निमिर्त बिहार टेस्ट आॅपफ इंटेलिजेंस ऽ मनोविज्ञान ब्यूरो, इलाहाबाद द्वारा निमिर्त समूह बुि परीक्षण ऽ एस.के. वुफलश्रेष्ठ द्वारा स्टैनपफोडर् - बिने परीक्षण ;तृतीय संस्करणद्ध का भारतीय अनुवूफलन ऽ एम.सी. जोशी द्वारा निमिर्त सामान्य मानसिक योग्यता ;हिन्दीद्ध परीक्षण अभ्िावृिा और अभ्िारुचि आदि के परीक्षणों की एक पुस्ितका प्रकाश्िात की है। भारत में विकसित वुफछ परीक्षणों की एक सूची तालिका 1.2 में प्रस्तुत की गइर् है जिसमें से भाटिया की निष्पादन परीक्षणमाला काप.फी प्रचलित है। संस्कृति तथा बुि बुि की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह पयार्वरण से अनुवूफलित होने में व्यक्ित की सहायता करती है। व्यक्ित कासांस्कृतिक पयार्वरण बुि के विकसित होने में एक संदभर् प्रदान करता है। एक रूसी मनोवैज्ञानिक वाइगाॅट्सकी ;टलहवजेालद्ध ने कहा कि संस्कृति एक ऐसा सामाजिक संदभर् प्रदान करती है जिसमें व्यक्ित रहता है, विकसित होता है और अपने आस - पास के जगत को समझता है। उदाहरण के लिए तकनीकी रूप से कम विकसित समाज में सामाजिक अंतवैर्यक्ितक संबंधों को बनाने वाले सामाजिक तथा सांवेगिककौशलों को अिाक महत्त्व प्रदान किया जाता है जबकि तकनीकी रूप से विकसित समाज में तवर्फना तथा निणर्य लेने की योग्यताओं पर आधारित निजी उपलब्िधयों को बुि समझा जाता है। अपने पहले के अध्ययनों से आप जानते होंगे किसंस्कृति रीति - रिवाजों, विश्वासों, अभ्िावृिायों तथा कला और साहित्य में उपलब्िधयों की एक सामूहिक व्यवस्था को कहते हैं। इन सांस्कृतिक प्राचालों के अनुरूप ही किसी व्यक्ित की बुि के ढलने की संभावना होती है। अनेक सि(ांतकार बुि को व्यक्ित की विशेषता समझते हैं औरव्यक्ित की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की उपेक्षा कर देते हैं। परंतुअब बुि के सि(ांतों में संस्कृति की अनन्य विशेषताओं को भी स्थान मिलने लगा है। स्टनर्बगर् के सांदभ्िार्क अथवाव्यावहारिक बुि का अथर् यह है कि बुि संस्कृति का उत्पाद होती है। वाइगाॅट्स्की का भी विश्वास था कि व्यक्ितकी तरह संस्कृति का भी अपना एक जीवन होता है, संस्कृति का भी विकास होता है और उसमें परिवतर्न होता है। इसीप्रिया में संस्कृति ही यह निधार्रित करती है कि अंततः किसी व्यक्ित का बौिक विकास किस प्रकार का होगा। वाइगाॅट्स्की के अनुसार, वुफछ प्रारंभ्िाक मानसिक प्रियाएँ ;जैसे - रोना, माता की आवाश की ओर ध्यान देना, सूँघना, चलना, दौड़ना आदिद्ध सवर्व्यापी होती हैं, परंतु उच्च मानसिक प्रियाएँ, जैसे - समस्या का समाधान करने तथा चिंतनकरने आदि की शैलियाँ मुख्यतः संस्कृति का प्रतिपफल होती हैं। तकनीकी रूप से विकसित समाज के व्यक्ित ऐसी बाल - पोषण रीतियाँ अपनाते हैं जिससे बच्चों में सामान्यीकरण तथा अमूतर्करण, गति, न्यूनतम प्रयास करने तथा मानसिक स्तर पर वस्तुओं का प्रहस्तन करने की क्षमता विकसित हो सके। ऐसे समाज बच्चों में एक विशेष प्रकार के व्यवहार के विकास को बढ़ावा देते हैं जिसे आप तकनीकी - बुि ;जमबीदवसवहपबंस पदजमससपहमदबमद्ध कह सकते हैं। ऐसे समाजों में व्यक्ित अवधान देने, प्रेक्षण करने, विश्लेषण करने, अच्छा निष्पादन करने, तेज काम करने तथा उपलब्िध की ओर उन्मुख रहने आदि कौशलों में दक्ष होते हंै। पश्िचमीसंस्कृतियों में निमिर्त किए गए बुि परीक्षणों में विशु( रूप से व्यक्ित के इन्हीं कौशलों की परीक्षा की जाती है। एश्िाया तथा अप्रफीका के अनेक समाजों में तकनीकी बुि को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता। एश्िाया तथा अप्रफीकाकी संस्कृतियों में पश्िचमी देशों की अपेक्षा पूणर्तः भ्िान्न गुणों तथा कौशलों को बुि का परिचायक माना जाता है।गैर - पश्िचमी संस्कृतियों में व्यक्ित की अपनी संज्ञानात्मक सक्षमता के साथ - साथ उसमें समाज के दूसरे व्यक्ितयों के साथ सामाजिक संबंध बनाने के कौशलों को भी बुि का लक्षण माना जाता है। वुफछ गैर - पश्िचमी समाजों में समाज - वेंफदि्रत तथा सामूहिक उन्मुखता पर बल दिया जाता है जबकि पश्िचमी समाजों में निजी उपलब्िधयों तथा व्यक्ितपरक उन्मुखता को अिाक महत्वपूणर् माना जाता है। यद्यपि पश्िचमके सांस्कृतिक प्रभावों के कारण अब यह भ्िान्नता धीरे - धीरे समाप्त हो रही है। भारतीय परंपरा में बुि तकनीकी बुि के संप्रत्यय के विपरीत भारतीय परंपरा में बुि को जिस प्रकार समझा गया है उसे समाकलित बुि ;पदजमहतंस पदजमससपहमदबमद्ध कहा जा सकता है जिसमें समाज तथा सम्पूणर् वैश्िवक पयार्वरण से व्यक्ित के संबंधोंको अिाक महत्त्व प्रदान किया गया है। भारतीय विचारकों ने बुि को उसकी समग्रता के परिप्रेक्ष्य में देखा है जिसमें संज्ञानात्मक तथा असंज्ञानात्मक दोनों प्रकार की प्रियाओं तथा उनके समाकलन पर समान रूप से बल दिया गया है। अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘इंटेलिजेंस’ के स्थान पर संस्कृत भाषा के जिस ‘बुि’ शब्द का उपयोग किया जाता है उसका अथर् ‘इंटेलिजेंस’ शब्द के अथर् से बहुत अिाक व्यापक है। जे.पी. दास के अनुसार बुि के अंतगर्त मानसिक प्रयास, दृढ़ निश्चय के साथ की जानेवाली ियाएँ, अनुभूतियाँ तथा मत के साथ - साथ ज्ञान, विभेदन करने की योग्यता तथा समझ जैसी संज्ञानात्मक क्षमताएँ भी आती हैं। वुफछ अन्य विशेषताओं के साथ - साथ अंतविर्वेक, संकल्प एवं अभ्िालाषाओं के आधार पर आत्मज्ञान भी बुि का ही अंश होता है। अतः बुि के अंतगर्त संज्ञानात्मक घटक के साथ - साथ अभ्िाप्रेरणात्मक तथा भावात्मक घटक भी होते हैं। पश्िचमी विचारक बुि के अंतगर्त मात्रा संज्ञानात्मक कौशलों को हीप्राथमिक महत्त्व का स्वीकार करते हैं। परंतु इसके विपरीत भारतीय परंपरा में अधोलिख्िात क्षमताएँ बुि के अंतगर्त स्वीकार की जाती हैं - ऽ संज्ञानात्मक क्षमता ;बवहदपजपअम बंचंबपजलद्ध ;संदभर् के प्रति संवेदनशीलता, समझ, विभेदन क्षमता, समस्या समाधान की योग्यता तथा प्रभावी संप्रेषण की योग्यताद्ध। ऽ सामाजिक क्षमता ;ेवबपंस बवउचमजमदबमद्ध ;सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान, अपने से बड़ों, छोटों तथा वंचित व्यक्ितयों के प्रति प्रतिब(ता, दूसरों की चिंता, दूसरे व्यक्ितयों के परिप्रेक्ष्य का सम्मानद्ध। ऽ सांवेगिक क्षमता ;मउवजपवदंस बवउचमजमदबमद्ध ;अपने संवेगों पर आत्म - नियमन तथा आत्म - परिवीक्षण, इर्मानदारी, श्िाष्टता, अच्छा आचरण तथा आत्म - मूल्यांकन। ऽ उद्यमी क्षमता ;मदजतमचतमदमनतपंस बवउचमजमदबमद्ध ;प्रतिब(ता, अध्यवसाय, धैयर्, कठिन परिश्रम, सतवर्फता तथा लक्ष्यनिदेर्श्िात व्यवहारद्ध। सांवेगिक बुि सांवेगिक बुि का संप्रत्यय बुि के संप्रत्यय को उसके बौिक क्षेत्रा से अिाक विस्तार देता है और संवेगों को भी बुि के अंतगर्त सम्िमलित करता है। सांवेगिक बुि का संप्रत्यय सामान्य बुि की भारतीय परंपरा की अवधारणा से निमिर्त हुआ है। सांवेगिक बुि ;मउवजपवदंस पदजमससपहमदबमद्ध अनेक कौशलों, जैसे - अपने तथा दूसरे व्यक्ितयों के संवेगों का परिशु( मूल्यांकन, प्रकटीकरण तथा संवेगों का नियमन आदि का एक समुच्चय है। यह बुि का भावात्मक पक्ष है। जीवन में सपफल होने के लिए उच्च बुि लब्िध तथा विद्यालयीय परीक्षाओं में अच्छा निष्पादन ही पयार्प्त नहीं है। आप अनेक ऐसे व्यक्ित पाएँगे जो उच्च शैक्ष्िाक प्रतिभा वाले तो हैं परंतु अपने जीवन में सपफल नहीं हो पाते। परिवार में तथा कायर् स्थान पर उनको अनेक समस्याएँ रहती हैं। वे अच्छा अंतवैर्यक्ितक संबंध नहीं बना पाते। ऐसे व्यक्ितयों में कौन सी कमी होती है? वुफछ मनोवैज्ञानिकों का विश्वास है कि उनकी समस्याएँ उनकी सांवेगिक बुि की कमी के कारण उत्पन्न होती हैं। सांवेगिक बुि के संप्रत्यय को सवर्प्रथम सैलोवी ;ैंसवअमलद्ध तथा मेयर ;डमलमतद्ध ने प्रस्तुत किया था। इन लोगों के अनुसार फ्अपने तथा दूसरे व्यक्ितयों के संवेगों का परिवीक्षण करने और उनमें विभेदन करने की योग्यता तथा प्राप्त सूचना के अनुसार अपने चिंतन तथा व्यवहारों को निदेर्श्िात करने की योग्यता ही सांवेगिक बुि हैय्। सांवेगिक लब्िध ;मउवजपवदंस ुनवजपमदजए म्फद्ध का उपयोग किसी व्यक्ित की सांवेगिक बुि की मात्रा बताने में उसी प्रकार किया जाता है जिस प्रकार बुि लब्िध ;आइर्.क्यू.द्ध का उपयोग बुि की मात्रा बताने में किया जाता है। साधारण शब्दों में सांवेगिक सूचनाओं की परिशु(ता तथा वुफशलता के साथ प्रक्रमण करने की योग्यता ही सांवेगिक बुि है। किसी उच्च सांवेगिक बुि वाले व्यक्ित की विशेषताएँ जानने के लिए बाॅक्स 1.2 को देखें। बाह्य जगत के दबावों तथा चुनौतियों से प्रभावित विद्याथ्िार्यों से संबंध रखने में श्िाक्षकों का ध्यान उनकी सांवेगिक बुिपर उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। विद्याथ्िार्यों की सांवेगिक बुि में अभ्िावृि करने वाले कायर्क्रमों से उनकी शैक्ष्िाक उपलब्िधयों पर लाभप्रद प्रभाव पड़ता है। इससे उनके सहयोगी व्यवहार को प्रोत्साहन मिलता है तथा समाज विरोधी गतिवििायाँ कम हो जाती हैं। ऐसे कायर्क्रम/योजनाएँ विद्याथ्िार्यों को कक्षा के बाहर की दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में बहुत उपयोगी होती हैं। विश्िाष्ट योग्यताएँ अभ्िाक्षमता - स्वरूप एवं मापन अब तक आप बुि के बारे में पयार्प्त रूप से समझ गए होंगे। आपको याद होगा कि बुि परीक्षण एक प्रकार की सामान्य मानसिक योग्यता का मापन करते हैं। अभ्िाक्षमता ;ंचजपजनकमद्ध ियाओं के किसी विशेष क्षेत्रा की विशेष योग्यता को कहते हैं। अभ्िाक्षमता विशेषताओं का ऐसा संयोजन है जो व्यक्ित द्वारा प्रश्िाक्षण के उपरांत किसी विशेष क्षेत्रा के ज्ञान अथवा कौशल के अजर्न की क्षमता को प्रदश्िार्त करता है। अभ्िाक्षमताओं का मापन वुफछ विश्िाष्ट परीक्षणों द्वारा किया जाता है। किसी व्यक्ित की अभ्िाक्षमता के मापन से हमें उसके द्वारा भविष्य में किए जाने वाले निष्पादन का पूवर्कथन करने में सहायता मिलती है। बुि का मापन करने की प्रिया में मनोवैज्ञानिकों को बहुधा यह ज्ञात होता है कि समान बुि रखने वाले व्यक्ित भी किसी विशेष क्षेत्रा के ज्ञान अथवा कौशलों को भ्िान्न - भ्िान्न दक्षता के साथ अजिर्त करते हैं। आप अपनी कक्षा में ही देख सकते हैं कि वुफछ बुिमान विद्याथीर् भी वुफछ विषयों में अच्छा निष्पादन नहीं कर पाते। जब आपको गण्िात में कोइर् समस्या आती है तो आप अमन से सहायता चाहते हैं परंतु जब आपको कविता समझने में कठिनाइर् आती है तो आप अविनाश के पास जाते हैं। इसी प्रकार जब आपको विद्यालय के वाष्िार्क समारोह में कोइर् गीत गाना होता है तो आप शबनम की सहायता लेते हैं परंतु जब आपके स्वूफटर के स्टाटर् होने में समस्या होती है तो आप जाॅन को याद करते हैं। भ्िान्न - भ्िान्न क्षेत्रों की ये विश्िाष्ट योग्यताएँ तथा कौशल ही अभ्िाक्षमताएँ कहलाती हैं। उचित प्रश्िाक्षण देकर इन योग्यताओं में पयार्प्त अभ्िावृि की जा सकती है। किसी विशेष क्षेत्रा में सपफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ित में अभ्िाक्षमता के साथ - साथ अभ्िारुचि ;पदजमतमेजद्ध का होना भी आवश्यक है। अभ्िारुचि किसी विशेष कायर् को करने की वरीयता या तरशीह को कहते हैं जबकि अभ्िाक्षमता उस कायर् को करने की संभाव्यता या विभवता को कहते हैं। किसी व्यक्ित में किसी कायर् को करने की अभ्िारुचि हो सकती है परंतु हो सकता है कि उसे करने की अभ्िाक्षमता उसमें न हो। इसी प्रकार यह भी संभव है कि किसी व्यक्ित में किसी कायर् को करने की अभ्िाक्षमता हो परंतु उसमें उसकी अभ्िारुचि न हो। इन दोनों ही दशाओं में उसका निष्पादन संतोषजनक नहीं होगा। एक ऐसे विद्याथीर् की सपफल यांत्रिाक अभ्िायंता बनने की अिाक संभावना है जिसमें उच्च यांत्रिाक अभ्िाक्षमता हो और अभ्िायांत्रिाकी में उसकी अभ्िारुचि भी हो। अभ्िाक्षमता परीक्षण दो रूपों में प्राप्त होते हैं - स्वतंत्रा;विशेषीकृतद्ध अभ्िाक्षमता परीक्षण तथा बहुल ;सामान्यीकृतद्ध अभ्िाक्षमता परीक्षण। लिपिकीय अभ्िाक्षमता, यांत्रिाक अभ्िाक्षमता, आंकिक अभ्िाक्षमता तथा टंकण अभ्िाक्षमता आदि के परीक्षण स्वतंत्रा अभ्िाक्षमता परीक्षण हैं। बहुल अभ्िाक्षमता परीक्षणों में एक परीक्षणमाला होती है जिससे अनेक भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार की परंतु समजातीय क्षेत्रों में अभ्िाक्षमता का मापन किया जाता है। विभेदक अभ्िाक्षमता परीक्षण ;डी.ए.टी.द्ध, सामान्य अभ्िाक्षमता परीक्षणमाला ;जी.ए.टी.बी.द्ध तथा आम्डर् सविर्सेस व्यावसायिक अभ्िाक्षमता परीक्षणमाला ;ए.एस.वी.ए.बी.द्ध आदि प्रसि( अभ्िाक्षमता परीक्षण मालाएँ हैं। इनमें से शैक्ष्िाक पयार्वरण में विभेदक अभ्िाक्षमता परीक्षण का सवार्िाक उपयोग किया जाता है। इस परीक्षण में 8 स्वतंत्रा उप - परीक्षण हैं - 1. शाब्िदक तवर्फना, 2. आंकिक तवर्फना, 3. अमूतर् तवर्फना, 4. लिपिकीय गति एवं परिशु(ता, 5. यांत्रिाक तवर्फना, 6. देश्िाक या स्थानिक संबंध, 7. वतर्नी तथा 8. भाषा का उपयोग। जे.एम. ओझा ;श्रण्डण् व्रींद्ध ने इस परीक्षण का भारतीय अनुवूफलन विकसित किया है। भारत में वैज्ञानिक, शैक्ष्िाक, साहित्ियक, लिपिकीय तथा अध्यापन अभ्िाक्षमता आदि का मापन करने के लिए अन्य अभ्िाक्षमता परीक्षणों का भी निमार्ण किया गया है। सजर्नात्मकता अभी तक आपने पढ़ा कि बुि, अभ्िाक्षमता, व्यक्ितत्व जैसे मनोवैज्ञानिक गुणों में वैयक्ितक भ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं। अब हम आपको बताएँगे कि सजर्नात्मक संभाव्यता में तथा इस संभाव्यता के अभ्िाव्यक्त होने की रीति में भी व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं। वुफछ व्यक्ितयों में सजर्नात्मकता बहुत अिाक मात्रा में होती है और वुफछ व्यक्ितयों में उतनी अिाक नहीं होती। वुफछ व्यक्ितयों की सजर्नात्मकता लेखन कायर् में अभ्िाव्यक्त होती है और वुफछ की नृत्य, संगीत, कविता, विज्ञान अथवा किसी अन्य क्षेत्रा में अभ्िाव्यक्त होती है। किसी समस्या का नए प्रकार का समाधान खोजने, आविष्कार करने, कविता लिखने, चित्रा बनाने, किसी नइर् रासायनिक िया को खोजने, कानून के क्षेत्रा में वुफछ नया विचार देने, किसी बीमारी की चिकित्सा अथवा रोकथाम को नइर् दिशा देने या इसी प्रकार के किसी अन्य क्षेत्रा में सजर्नात्मकता की अभ्िाव्यक्ित का प्रेक्षण किया जा सकता है। प्रत्येक क्षेत्रा में सजर्नात्मक चिंतन में भ्िान्नता होने के बावजूद एक तत्व सवर्निष्ठ होता है कि सभी मेें वुफछ नया और अनोखा तथ्य उत्पन्न किया जाता है। जब हम सजर्नात्मकता के बारे में सोचते समय वुफछ सजर्नशील व्यक्ितयों का नाम याद करते हैं तो रवींद्रनाथ टैगोर, आइंसटीन, सी.वी. रमन, रामानुजन आदि का नाम यादआता है। इन लोगों ने भ्िान्न - भ्िान्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान दिया है। हाल के वषो± में सजर्नात्मकता के संबंध में हमारी समझ विस्तृत हो गइर् है। सजर्न की प्रतिभा वुफछ कलाकारों, वैज्ञानिकों, कवियों या आविष्कारकों तक ही सीमित नहीं होती। एक ऐसा सामान्य व्यक्ित भी सजर्नशील हो सकता है जो मिट्टðी के बतर्न बनाने, बढ़इर्गिरी या भोजन बनाने जैसे साधारण पेशे से जुड़ा हुआ है। यद्यपि इस दशा में उनकी सजर्नात्मकता का वह स्तर नहीं होता जो एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक या लेखक में होता है। अतः हम कह सकते हैं कि व्यक्ितयों द्वारा सजर्नात्मकता की अभ्िाव्यक्ित के क्षेत्रों तथा स्तरों के आधार पर भ्िान्नता पाइर् जाती है और सभी व्यक्ित एक ही स्तर पर सजर्नात्मकता की अभ्िाव्यक्ित नहीं करते। आइंसटीन का सापेक्षता का सि(ांत उच्चतम स्तर की सजर्नात्मकता का एक उदाहरण है जिसमें उन्होंने पूणर्तया नए विचार, नए तथ्य, सि(ांत अथवा एक उत्पाद प्रस्तुत किया। सजर्नात्मकता का एक अन्य स्तर यह भी है जिसमें व्यक्ित पहले से स्थापित विचारों या वस्तुओं को किसी नए परिपे्रक्ष्य में रखकर या उसकी नइर् उपयोगिता प्रस्तुत करके उसमें परिवतर्न या रूपांतर करता है। इस संबंध में शोध साहित्य यह बताते हैं कि बच्चे बाल्यावस्था के प्रारंभ्िाक वषो± में अपनी कल्पनाशक्ित का विकास करने लगते हैं परंतु वे अपनी सजर्नात्मकता की अभ्िाव्यक्ित मुख्य रूप से शारीरिक तथा अवाचिक ियाओं के माध्यम से करते हैं। जब उनमें भाषा तथा बौिक प्रकायो± का पूणर् विकास हो जाता है और उनकी स्मृति में पयार्प्त ज्ञान का भंडारण हो जाता है तब उनकी सजर्नात्मकता की अभ्िाव्यक्ित शाब्िदक रूप से भी होने लगती है। जिन व्यक्ितयों में सजर्नात्मकता अिाक मात्रा में होती है वे अपने द्वारा चुनी गइर् ियाओं द्वारा यह संकेत प्रदान कर सकते हैं कि उनकी सजर्नात्मकता की दिशा क्या है। वुफछ व्यक्ितयों के लिए आवश्यक होता है कि उन्हें ऐसे अवसर प्रदान किए जाएँ जिनमें वे अपनी अदृश्य या प्रच्छन्न सजर्नात्मक संभाव्यता अभ्िाव्यक्ित प्राप्त कर सवंेफ। हम सजर्नात्मकता की संभाव्यता में पाइर् जाने वाली भ्िान्नता की व्याख्या किस प्रकार कर सकते हैं? जिस प्रकार हम अन्य शारीरिक तथा मानसिक विशेषताओं की व्याख्या आनुवंश्िाकता तथा पयार्वरण की जटिल अंतःिया के माध्यम से करते हैं, उसी प्रकार सजर्नात्मकता में पाइर् जाने वाली व्यक्ितगत भ्िान्नताओं की व्याख्या भी करते हैं। इस विषय पर कोइर् असहमति नहीं है कि सजर्नात्मकता आनुवंश्िाकता तथा पयार्वरण दोनों द्वारा निधार्रित होती है। सजर्नात्मक संभाव्यता की सीमाएं व्यक्ित की आनुवंश्िाकता द्वारा नियत हो जाती हैं तथा पयार्वरणी कारक सजर्नात्मकता के विकास को उद्दीप्त करते हैं। किसी व्यक्ित में सजर्नात्मक संभाव्यता का कितना विकास होगा, किस आयु में होगा तथा उसका रूप और दिशा क्या होगी - यह मुख्य रूप से पयार्वरणी कारकों, जैसे - अभ्िाप्रेरणा, प्रतिब(ता, पारिवारिक अवलंब या समथर्न, समकक्ष्िायों का प्रभाव, प्रश्िाक्षण प्राप्त करने के अवसर आदि द्वारा निधार्रित होता है। यद्यपि एक सामान्य व्यक्ित को चाहे जितना प्रश्िाक्षण दिया जाए वह टैगोर या शेक्सपीयर नहीं बन सकता परंतु यह भी सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ित अपनी सजर्नात्मक संभाव्यता के वतर्मान स्तर को उससे उँफचे स्तर तक बढ़ा सकता है। इस संदभर् में आप कक्षा 11 में सजर्नात्मकता को बढ़ाने वाली युक्ितयों या उपायों के विषय में पढ़ चुके हैं। सजर्नात्मकता तथा बुि सजर्नात्मकता में पाइर् जाने वाली व्यक्ितगत भ्िान्नताओं को समझने में उत्पन्न वाद - विवाद का एक महत्वपूणर् कारण बुि तथा सजर्नात्मकता के संबंधों का स्वरूप है। हम कक्षा के दो विद्याथ्िार्यों का उदाहरण देते हैं। सुनीता को उसके अध्यापक एक श्रेष्ठ छात्रा समझते हैं। वह अपने काम को समय से पूरा करती है, अपनी कक्षा में उच्चतम श्रेणी या ग्रेड प्राप्त करती है, अध्यापकों के अनुदेशों को ध्यान से सुनती है और तुरंत समझ जाती है। वह अिागत पाठ्य सामगि्रयों का परिशु(ता से पुनःप्रस्तुति करती है परंतु शायद ही कभी कोइर् ऐसा विचार रखती है जो उसका अपना हो। रीता एक अन्य छात्रा है जो अध्ययन में औसत स्तर की है और विभ्िान्न परीक्षाओं में लगातार उच्च श्रेणी भी नहीं प्राप्त की है। वह अपने आप चीशों के सीखने को वरीयता देती है। वह घर में अपनी माँ की सहायता करने के लिएकाम करने के तरीकों में सुधार करती है तथा अपने दत्तकायर् करने के नए - नए तरीके खोज लेती है। इस दशा में हम सुनीता को अिाक बुिमान तथा रीता को अिाक सजर्नशील कहेंगे। अतः एक व्यक्ित जो तीव्रगति से सीखने की योग्यता रखता है और अिागत विषयवस्तु का परिशु(ता से पुनःप्रस्तुति करता है - अिाक सजर्नशील की अपेक्षा अिाक बुिमान कहा जाएगा। यदि वह सीखने में तथा अन्य कायो± के संपादन में नए तरीकों की खोज भी करने लगे तभी वह अिाक सजर्नशील भी कहा जाएगा। टमर्न ;ज्मतउंदद्ध ने 1920 में पाया कि यह आवश्यक नहीं है कि अिाक बुिमान व्यक्ित सजर्नशील भी हो। साथ ही, सजर्नात्मक विचार उस व्यक्ित में भी उत्पन्न हो सकते हैं जिसकी बुि लब्िध अत्यिाक न हो। वुफछ शोधकतार्ओं ने यह भी प्रदश्िार्त किया है कि जिन बच्चों की पहचान प्रतिभाशाली के रूप में की गइर् थी उनमें से शायद ही किसी एक ने भी जीवन में किसी क्षेत्रा में अपनी सजर्नात्मकता के कारण प्रसिि प्राप्त की हो। शोधकतार्ओं ने यह भी पाया है कि दोनों प्रकार केμ अिाक बुिमान तथा सामान्य बुि वाले बच्चों में उच्च तथा निम्न स्तर की सजर्नात्मकता पाइर् जा सकती है। इसलिए एक व्यक्ित सजर्नशील तथा बुिमान दोनों हो सकता है परंतु यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक बुिमान व्यक्ित सजर्नशील ही हो। यहाँ बुिमान शब्द का मंतव्य उसके परंपरागत अथर् से है। अतः अिाक बुिमान हो जाना यह निश्िचत नहीं करता कि व्यक्ित सजर्नशील भी होगा। शोधकतार्ओं ने पाया है कि सजर्नात्मकता तथा बुि में सकारात्मक संबंध होता है। प्रत्येक सजर्नात्मक कायर् के लिए ज्ञान प्राप्त करने के लिए तथा समस्या को समझने, सूचनाओं को भंडारित करने तथा आवश्यकता पड़ने पर उनकी पुनःप्राप्ित करने के लिए एक न्यूनतम स्तर की योग्यता तथा क्षमता की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए सजर्नशील लेखकों को भाषा के उपयोग में दक्षता की आवश्यकता होती है। एक चित्राकार के लिए यह जानना आवश्यक है कि चित्रा बनाने की उसकी एक विशेष तकनीक का दशर्क पर वैफसा प्रभाव उत्पन्न होगा, एक वैज्ञानिक को तवर्फना में वुफशल होना चाहिए आदि। अतः सजर्नात्मकता के लिए एक विशेष मात्रा में बुि का होना आवश्यक है परंतु उस विशेष मात्रा से अिाक बुि का सजर्नात्मकता से सहसंबंध नहीं होता। निष्कषर् यह है कि सजर्नात्मकता के कइर् रूप और सम्िमश्रण होते हैं। वुफछ व्यक्ितयों में बौिक गुण अिाक मात्रा में होते हैं और वुफछ व्यक्ितयों में सजर्नात्मकता से संब( विशेषताएँ अिाक मात्रा में होती हैं। परंतु, एक सजर्नशील व्यक्ित में कौन से गुण होते हैं? आप जानना चाहेंगे कि वे कौन से गुण हैं जो सभी सजर्नशील व्यक्ितयों में पाए जाते हैं। सजर्नात्मकता परीक्षणों का निमार्ण बुि से भ्िान्न सजर्नात्मकता की संभाव्यता में पाइर् जाने वाली व्यक्ितगत भ्िान्नताओं के मूल्यांकन के लिए किया गया था। अिाकांश सजर्नात्मकता परीक्षणों की एक सामान्य विशेषता यह होती है कि वे मुक्त - अंत वाले होते हैं। इसका अथर् यह है कि इन परीक्षणों में व्यक्ित को स्वतंत्राता होती है कि वह किसी प्रश्न या समस्या के संबंध में अपने अनुभवों केआधार पर उसके विभ्िान्न उत्तरों के बारे में मुक्त होकर जिस प्रकार से चाहे सोचे। सजर्नात्मकता परीक्षणों में पूछे गए प्रश्नों या दी गइर् समस्याओं का कोइर् निश्िचत उत्तर नहीं होता। अतः व्यक्ित को यह स्वतंत्राता रहती है कि वह अपनी कल्पनाशक्ित का पूरा उपयोग करे तथा उसकी मौलिक अभ्िाव्यक्ित करे। सजर्नात्मकता परीक्षणों में अपसारी चिंतन का उपयोग करना होता है और इन परीक्षणों द्वारा भाँति - भाँति के विचारों अथार्त नए तथा अछूते विचारों को उत्पन्न करने की योग्यता, असंब( प्रतीत होने वाली वस्तुओं में नए संबंधों की परिकल्पना कर लेने की योग्यता, कारणों और परिणामों का अनुमान लगाने की योग्यता, वस्तुओं और विचारों को एक नए संदभर् में रखने की योग्यता आदि का मूल्यांकन किया जाता है। ये परीक्षण बुि परीक्षणों से इस तरह भ्िान्न होते हैं कि बुि परीक्षणों में मुख्य रूप से अभ्िासारी चिंतन का उपयोग होता है। बुि परीक्षणों में व्यक्ित को किसीप्रश्न का सही उत्तर खोजना होता है या किसी समस्या का सही समाधान खोजना होता है और व्यक्ित की स्मृति, ताविर्फक योग्यता, परिशु(ता, प्रत्यक्षज्ञान - योग्यता और स्पष्ट चिंतन जैसी योग्यताओं का मूल्यांकन करना इन परीक्षणों का उद्देश्य होता है। इन परीक्षणों में स्वतःस्पूफतिर्, मौलिकता तथा कल्पनाशक्ित का उपयोग करने का कम ही अवसर होता है। सजर्नात्मकता परीक्षणों में अभ्िाव्यक्ियों की विविधता पाइर् जाती है इसलिए इन परीक्षणों के निमार्ण में विभ्िान्न प्रकार के उद्दीपकों, जैसे - शब्दों, चित्रों, ियाओं तथा ध्वनियों का उपयोग किया जाता है। ये परीक्षण व्यक्ित की सामान्य सजर्नात्मक चिंतन योग्यताओं, जैसे - किसी दी गइर् स्िथति या विषय पर विभ्िान्न प्रकार के विचारों को उत्पन्न करने की योग्यता, वस्तुओं को विभ्िान्न दृष्िटकोणों से देखने की योग्यता, समस्याओं के भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के समाधान निकालने की योग्यता, कारणों तथा परिणामों के बारे में अनुमान लगाने की योग्यता, प्रचलित वस्तुओं के उपयोग तथा उसमें सुधार के विकल्पों के बारे में मौलिक विचार करने की योग्यता तथा असामान्य प्रकार के प्रश्न करना आदि का मापन किया जाता है। वुफछ शोधकतार्ओं ने सजर्नात्मकता के भ्िान्न - भ्िान्न क्षेत्रों, जैसे - साहित्ियक सजर्नात्मकता, वैज्ञानिक सजर्नात्मकता, गण्िातीय सजर्नात्मकता आदि में सजर्नात्मकता परीक्षण विकसित किए हैं। सजर्नात्मकता परीक्षणों का निमार्ण करने वाले मनोवैज्ञानिकों में गिलपफोडर् ;ळनपसवितकद्ध, टोरेंस ;ज्वततंदबमद्ध, खटेना ;ज्ञींजमदंद्ध, वालाश ;ॅंससंबीद्ध तथा कोगन ;ज्ञवहंदद्ध, परमेश ;च्ंतंउमेीद्ध, बाकर मेंहदी ;ठंुमत डमीकपद्ध तथा पासी ;च्ंेेपद्ध आदि के नाम प्रमुख हैं। प्रत्येक परीक्षणकी एक मानकीकृत वििा होती है, उसकी एक वििापुस्ितका होती है और परिणामों की व्याख्या हेतु एक संदश्िार्का भी होती है। परीक्षण प्रशासन और परीक्षण प्राप्तांकों की व्याख्या के विस्तृत प्रश्िाक्षण के उपरांत ही इनका उपयोग किया जा सकता है। प्रमुख पद अभ्िाक्षमता, अभ्िाक्षमता परीक्षण, व्यक्ित अध्ययन, संज्ञानात्मक मूल्यांकन प्रणाली, घटकीय बुि, सांदभ्िार्क बुि, सजर्नात्मकता, संस्कृति - निष्पक्ष परीक्षण, सांवेगिक बुि, आनुभविक बुि, सा - कारक, व्यक्ितगत भ्िान्नताएँ, बौिक प्रतिभाशालिता, बुि, बुि परीक्षण, बुि लब्िध ;आइर्.क्यू.द्ध, अभ्िारुचि, साक्षात्कार, मानसिक आयु, मानसिक मंदन, प्रेक्षण प्रणाली, योजना या नियोजन, मनोवैज्ञानिक परीक्षण, सहकालिक प्रक्रमण, स्िथतिवाद, आनुक्रमिक प्रक्रमण, मूल्य। ऽ व्यक्ित शारीरिक और मनोवैज्ञानिक गुणों या अभ्िालक्षणों में भ्िान्न होते हैं। व्यक्ितगत भ्िान्नताओं का तात्पयर् व्यक्ितयों के अभ्िालक्षणों और व्यवहार के स्वरूपों के वैश्िाष्ट्य तथा उनमें भ्िान्नताओं से होता है। ऽ विविध वैयक्ितक गुणों, जैसे - बुि, अभ्िाक्षमता, अभ्िारुचि, व्यक्ितत्व और मूल्य का मूल्यांकन किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण, साक्षात्कार, व्यक्ित अध्ययन, प्रेक्षण और आत्म - प्रतिवेदन जैसी वििायों द्वारा मनोवैज्ञानिक इन गुणों का मूल्यांकन करते हैं। ऽ ‘बुि’ शब्द का तात्पयर् किसी व्यक्ित की अपने परिवेश को समझने की क्षमता से, विवेकपूणर् चिंतन करने से और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए उपलभ्य संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने से है।बौिक विकास आनुवंश्िाक कारकों ;प्रकृतिद्ध तथा पयार्वरणी दशाओं ;पोषणद्ध के मध्य एक जटिल अंतःिया का परिणाम होता है। ऽ बुि के मनोमितिक उपागम योग्यताओं के एक समूह के रूप में, जिनको परिमाणात्मक शब्दों, जैसे - बुिलब्िध में व्यक्त किया जाता है, बुि के अध्ययन को महत्त्व देते हैं। इसके विपरीत, बुि के सूचना प्रक्रमणउपागम के प्रतिनििा सि(ांत, जैसे - स्टनर्बगर् का त्रिाचापीय सि(ांत तथा दास का पास माॅडल, बुिमत्तापूणर् व्यवहारों में अंतनिर्हित प्रियाओं की व्याख्या करते हैं। हावडर् गाडर्नर ने अपने बहु - बुि के सि(ांत में बुि के आठ विभ्िान्न प्रकारों का वणर्न किया है। ऽ बुि का मूल्यांकन विशेष रूप से निमिर्त परीक्षणों की सहायता से किया जाता है। बुि परीक्षण शाब्िदक या निष्पादन प्रकार के हो सकते हैं, उनको व्यक्ितगत रूप से या समूहों में दिया जा सकता है और वेसंस्कृति - अभ्िानत या संस्कृति - निष्पक्ष हो सकते हैं। बुि की दो चरमसीमाओं पर एक ओर बौिक न्यूनता वाले व्यक्ित और दूसरी ओर बौिक प्रतिभाशाली होते हैं। ऽ संस्कृति बौिक विकास के लिए एक संदभर् प्रदान करती है। पश्िचमी संस्कृति विश्लेषण, निष्पादन, गति और उपलब्िध् - प्रवणता जैसे कौशलों पर आधरित ‘तकनीकी बुि’ को बढ़ावा देती है। इसके विपरीत, गैर - पश्िचमीसंस्कृतियाँ आत्म - परावतर्न, सामाजिक और सांवेगिक सक्षमता को बुिमत्तापूणर् व्यवहार के लक्षणों के रूप मेंमहत्त्व देती हैं। भारतीय संस्कृति ‘समाकलित बुि’ को बढ़ावा देती है जो दूसरे लोगों तथा व्यापक सामाजिक संसारसे व्यक्ित के संबंधों को महत्त्व देती है। ऽ सांवेगिक बुि में अपनी तथा दूसरों की भावनाओं और संवेगों को जानने तथा नियंत्रिात करने, स्वयं को अभ्िाप्रेरित करने तथा अपने आवेगों को नियंत्रिात रखने तथा अंतवैर्यक्ितक संबंधों को प्रभावी ढंग से प्रबंध करने की योग्यताएँ सम्िमलित होती हैं। ऽ अभ्िाक्षमता का तात्पयर् किसी व्यक्ित की वुफछ विश्िाष्ट कौशलों को अजिर्त करने की संभाव्यता से होता है। अभ्िाक्षमता परीक्षण पूवर्कथन करते हैं कि कोइर् व्यक्ित उचित प्रश्िाक्षण और पयार्वरण दिए जाने के बाद क्या कर पाएगा। ऽ सजर्नात्मकता नूतन, उपयुक्त और उपयोगी विचारों, वस्तुओं या समस्या समाधनों को उत्पन्न करने की योग्यता है। सजर्नशील होने के लिए एक निश्िचत स्तर की बुि का होना आवश्यक है परंतु किसी व्यक्ित की उच्चस्तरीय बुि पिफर भी यह सुनिश्िचत नहीं करती है कि वह अवश्य ही सजर्नशील होगा। 1ण् किस प्रकार मनोवैज्ञानिक बुि का लक्षण वणर्न और उसे परिभाष्िात करते हैं? 2ण् किस सीमा तक हमारी बुि आनुवंश्िाकता ;प्रकृतिद्ध और पयार्वरण ;पोषणद्ध का परिणाम है? विवेचना कीजिए। 3ण् गाडनर्र के द्वारा पहचान की गइर् बहु - बुि की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। 4ण् किस प्रकार त्रिाचापीय सि(ांत बुि को समझने में हमारी सहायता करता है? 5ण् फ्प्रत्येक बौिक िया तीन तंत्रिाकीय तंत्रों के स्वतंत्रा प्रकायो± को सम्िमलित करती है।य् पास माॅडल के संदभर् में उक्त कथन की व्याख्या कीजिए। 6ण् क्या बुि के संप्रत्ययीकरण में वुफछ सांस्कृतिक भ्िान्नताएँ होती हैं? 7ण् बुि लब्िध क्या है? किस प्रकार मनोवैज्ञानिक बुि लब्िध प्राप्तांकों के आधार पर लोगों को वगीर्कृत करते हैं? 8ण् किस प्रकार आप शाब्िदक और निष्पादन बुि परीक्षणों में भेद कर सकते हैं? 9ण् सभी व्यक्ितयों में समान बौिक क्षमता नहीं होती। वैफसे अपनी बौिक योग्यताओं में लोग एक - दूसरे से भ्िान्न होते हैं? व्याख्या कीजिए। 10ण् आपके विचार से बुि लब्िध और सांवेगिक लब्िध में से कौन - सी जीवन में सपफलता से श्यादा संबंिात होगी और क्यों? 11ण् ‘अभ्िाक्षमता’ ‘अभ्िारुचि और बुि’ से वैफसे भ्िान्न है? अभ्िाक्षमता का मापन वैफसे किया जाता है? 12ण् किस प्रकार सजर्नात्मकता बुि से संबंिात होती है? वेब¯लक्स ीजजचरूध्ध्ूूूण्पदकपंदंण्मकनध््पदजमससध्ंदंेजंेपण्ेीजउस ीजजचरूध्ध्ूूूण्बीपतवदण्अंसकवेजंण्मकनध्ूीनपजजध्बवसध्बवहेलेध्पदजमससण्ीजउस ीजजचरूध्ध्ूूूण्ीनउंदकपउमदेपवदेण्वतहध्मउवजपवदण्ीजउ ीजजचरूध्ध्ूूूण्मउवजपवदंसपुण्बवउध्ळकमंिनसजण्ीजउ ीजजचरूध्ध्मकूमइण्हेदण्वतहध्मकतमण्िउपण्पदजतवण्ीजउस ीजजचरूध्ध्ूूूण्जंसमदजेउंतजण्बवउ ीजजचरूध्ध्ूूूणमदजण्ंबण्नाध्बंतममतध्चेलबीवजमेजेण्बवउ शैक्ष्िाक संकेत 1ण् इस अध्याय की विषयवस्तु से परिचित कराने के लिए अध्यापक मानसिक निमिर्तियों, जैसे - बुि, व्यक्ितत्व, अभ्िाक्षमता, मूल्य आदि पर परिचचार् प्रारंभ कर सकते हैं। इससे इन निमिर्तियों की एकल, सावर्भौमिक व्याख्या से संबंिात कठिनाइर्यों की ओर ध्यान दिलाने में सहायता मिलेगी। 2ण् अध्यापक को विद्याथ्िार्यों के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए इस अध्याय में वण्िार्त विभ्िान्न मनोवैज्ञानिक गुणों से परिचय करवाना चाहिए। 3ण् विद्याथ्िार्यों की अभ्िारुचि को उत्पन्न करने के लिए विभ्िान्न बुि परीक्षणों के प्रतिदशर् या नमूना एकांशों ;जो अध्यापक द्वारा एकत्रा किए जाएँगेद्ध को उन्हें दिया जा सकता है। 4ण् विद्याथ्िार्यों को अध्याय में दिए गए ियाकलापों को पूरा करने तथा उन्हें व्यक्ितगत रूप से या समूहों में ियाकलापों को स्वयं अभ्िाकल्प करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। ियाकलापों को पूरा करने के बाद विद्याथ्िार्यों द्वारा किए गए प्रेक्षणों पर कक्षा में परिचचार् प्रारंभ करें। 5ण् विद्याथ्िार्यों को अध्याय में वण्िार्त संप्रत्ययों को अपने वास्तविक जीवन - अनुभवों से संब( करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

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