आप पिछले अध्याय में पढ़ चुके हैं कि आंकड़ों का संगठन तथा प्रस्तुतीकरण उन्हें बोध्गम्य बनाता है। इससे आंकड़ों का प्रक्रमण सरल हो जाता हैं। आंकड़ों के विश्लेषण के लिए अनेक विध्ियों को उपयोग किया जाता है। इस अध्याय में आप निम्नलिख्िात सांख्ियकीय विध्ियाँ सीखेंगे: 1ण् वेंफद्रीय प्रवृिा के माप 2ण् प्रकीणर्न के माप 3ण् संबंध् के मापजहाँ वेंफद्रीय प्रवृिा के माप पयर्वेक्षणों के समूह का आदशर् प्रतिनिध्िकारी मूल्य प्रस्तुत करते हैं, वहीं प्रकीणर्नके माप आंकड़ों की आंतरिक विषमताओं का ब्यौरा देते हैं, जो अक्सर वेंफद्रीय प्रवृिा के माप के संदभर् में होते हैं। दूसरी ओर संबंध् के माप दो या दो से अध्िक घटनाओं जैसे वषार् तथा बाढ़ की घटना अथवा उवर्रकों का उपभोग तथा पफसलों की उपज के मध्य साहचयर् की गहनता प्रस्तुत करते हैं।़वेंफद्रीय प्रवृिा के माप मापनीय विशेषताएँ जैसे वषार्, ऊँचाइर्, जनसंख्या का घनत्व, उपलब्िध्यों के स्तर अथवा आयु वगर् में विभ्िान्नताएँ पाइर् जाती हैं। यदि हमें उनको समझना है, तो हमें क्या करना होगा? उसके लिए हमें कदाचितएक मूल्य या मान की आवश्यकता होगी जो पयर्वेक्षणों के समूह का सवोर्त्तम प्रतिनिध्ित्व करता हो। यह एकल मान सामान्यतः वितरण के किसी भी छोर पर होने की बजाय उसके वेंफद्र के निकट स्िथत होता है। वितरण का वेंफद्र ज्ञात करने वाली सांख्ियकीय विध्ियों को वेंफद्रीय प्रवृिा के माप के नाम से जाना जाता है। वेंफद्रीयप्रवृिा की द्योतक संख्या सारे आंकड़ों के समूह की प्रतिनिध्ि संख्या होती है क्योंकि यह उस ¯बदु की प्रतीकहोती है जिसके निकट इकाइयों के समूहन की प्रवृिा होती है।वेंफद्रीय प्रवृिा के मापों को सांख्ियकीय औसत के नाम से भी जाना जाता है। वेंफद्रीय प्रवृिा के कइर् माप हैं जिनमें माध्य, माियका तथा बहुलक सबसे महत्वपूणर् हैं। माध्य माध्य वह मान है जो सभी मूल्यों के योग को वुफल प्रेक्षणों की संख्या से विभाजित करने पर प्राप्त होता है। माियका माियका उस कोटि का मान होता है जो व्यवस्िथत श्रेणी को दो बराबर संख्याओं में विभाजित करता है। यह मान वास्तविक मूल्यों से स्वतंत्रा होता है। आंकड़ों को बढ़ते अथवा घटते क्रम में व्यवस्िथत करना माध्यम की गणना में सबसे अध्िक महत्वपूणर् हैं। सम संख्याए होने पर दो मध्यस्थ कोटि मानों का औसत माियका होगा। बहुलक किसी ¯बदु या मान की अध्िकतम पुनरावृिा अथवा आवृिा बहुलक होती है। आपने देखा होगा कि इनमें से प्रत्येक भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के आंकड़ों के समूह के लिए उपयुक्त एकल प्रतिनिध्ि संख्या निधार्रित करने की अलग विध्ि है। माध्य किसी चर के विभ्िान्न मूल्यों का साधरण अंकगण्िातीय औसत माध्य कहलाता है। अवगीर्कृत तथा वगीर्कृत आंकड़ों के लिए माध्य ज्ञात करने की विध्ियाँ निश्िचत ही भ्िान्न हैं। वगीर्कृत व अवगीर्कृत दोनों प्रकार के आंकड़ों के लिए माध्य प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष विध्ियों के द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। अवगीर्वृफत आंकड़ों से माध्य की गणना प्रत्यक्ष विध्ि अवगीर्कृत आंकड़ों से प्रत्यक्ष विध्ि द्वारा माध्य की गणना करने के लिए पयर्वेक्षण के सभी मूल्यों को जोड़ कर घटनाओं/पदों की वुफल संख्या से भाग देते हैं। इस प्रकार माध्य की गणना निम्नांकित सूत्रा के उपयोग द्वारा की जाती है। ० ग ग् त्र सारणी 2ण्1 रू माध्य वषार् की गणनाछ जिसमें ग् त्र माध्य ० त्र मापों के सभी मूल्यों का योग ग त्र मापों की किसी श्रेणी में एक अपरिष्वृफत समंक ० ग त्र मापों की किसी श्रेणी में एक अपरिष्वृफत समंक छ त्र श्रेणी के पदों की संख्या उदाहरण 2ण्1 रू मध्य प्रदेश में मालवा पठार के विभ्िान्न िालों की, तालिका - 2ण्1 में दी गइर् वषार् के मालवा के पठार के जिले सामान्य वषार् ;मि.मी. मेंद्ध अप्रत्यक्ष विध्ि प्रत्यक्ष विध्ि ग कत्र ग.800’ इंदौर देवास धररतलामउज्जैन मंदसौरशाजापुर 979 1083 833 896 891 825 977 179 283 33 96 91 25 177 ० ग ंदक ० क 6484 884 छ ग० ंदक छ क० 926ण्29 126ण्29 आधार पर उस क्षेत्रा की माध्य वषार् ’ जिसमें 800 कल्िपत माध्य हैऋ क कल्िपत माध्य से विचलन है।की गणना कीजिए। तालिका 2.1 में दिए आंकड़ों के लिए माध्य की गणना निम्न विध्ि से की जाएगीμ ० ग ग् त्र छ 6484 एत्र 7 त्र 926 29ण् माध्य की गणना से यह समझा जा सकता है कि वषार् के अपरिष्कृत आंकड़ों का सीध योग कर लिया गया है तथा उस योग को वुफल पदों की संख्या अथार्त् ;िालों की संख्याद्ध से विभाजित किया गया है। अतः इसे प्रत्यक्ष विध्ि कहते हैं। अप्रत्यक्ष विध्ि श्रेणी में जहाँ प्रेक्षणों की संख्याएँ बहुत अध्िक होती हैं, वहाँ सामान्यतः अप्रत्यक्ष विध्ि से माध्य की गणनाकी जाती है। इस विध्ि में एक स्िथरांक को सभी मूल्यों से घटाने पर प्रेक्षणों की संख्या विस्तार कम हो जाती है। उदाहरण के लिए जैसा तालिका 2.1 में दशार्या गया है, वषार् के मान 800 से 1100 मिलीमीटरतक हैं। एक ‘कल्िपत माध्य’ मानकर हम इन संख्याओं के विस्तार को कम कर सकते हैं। इस उदाहरण में हमने कल्िपत माध्य 800 माना है। इस िया को ‘वूफट प(ति’ कहते हैं। इसके पश्चात् घटाए हुए मूल्योंके आधर पर माध्य की गणना कर ली जाती है ;तालिका - 2.1 में स्तंभ - 3द्ध। अप्रत्यक्ष विध्ि से माध्य की गणना निम्न सूत्रा से की जाती हैμ क०ग् त्र । ़ छ जिसमें, । त्र घटाया हुआ स्िथरांक ० क त्र स्िथरांक घटाए हुए मूल्यों का योग छ त्र उक्त श्रेणी में एकल प्रेक्षणों की संख्या तालिका - 2.1 में दिए गए आंकड़ों के लिए अप्रत्यक्ष विध्ि द्वारा माध्य की गणना निम्नविध्ि से की जा सकती हैμ 884ग् त्र 800 ़ 7 884 त्र 800 ़ 7 ग् त्र 926 29 ण् मि.मीयहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि चाहे किसी भी विध्ि से माध्य की गणना की गइर् हो, उसका मान समान ही आता है। वगीर्वृफत आंकड़ों से माध्य की गणना वगीर्कृत आंकड़ों से भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विध्ियों से माध्य की गणना की जाती है। प्रत्यक्ष विध्ि जब आवृिा वितरण के रूप में आँकड़े वगीर्कृत हों तो उसमें एकाकी मूल्य अपनी पहचान खो देते हैं। इन सभी मूल्यों का प्रतिनिध्ित्व वगर् अंतराल के मध्य ¯बदुओं द्वारा होता है, जहाँ वे स्िथत हैं। प्रत्यक्ष विध्ि सेवगीर्कृत आंकड़ों के लिए माध्य की गणना करते समय प्रत्येक वगर् के मध्य ¯बदुओं से संबंध्ित आवृिा ; िद्धय को गुणा किया जाता हैऋ गि ;इसमें ग् मध्य ¯बदु हैद्ध के सभी मानों को जोड़कर प्राप्त ० गि में पदों की संख्या ;छद्ध से भाग दिया जाता है। अतः निम्नलिख्िात सूत्रा द्वारा माध्य ज्ञात किया जाता हैμ ० गि ग् त्र छ जिसमें, ग् िग त्र त्र त्र माध्य आवृिा वगर् अंतराल के मध्य ¯बदु छ त्र पदों की संख्या ;इसको ० ि भी कहा जाता हैद्ध उदाहरण 2ण्2 रू तालिका - 2.2 में दिए गए आंकड़ों के प्रयोग से पैफक्ट्री में काम करने वालों की माध्य मजदूरी दर की गणना कीजिए तालिका 2ण्2 रू पैफक्ट्री श्रमिकों की मजदूरी दर मजदूरी ;रु./दिनद्ध श्रमिकों की संख्या ;द्धि वगर् ि 50.70 10 70.90 20 90.110 25 110.130 35 130.150 9 तालिका 2ण्3 रू माध्य की गणना 50.70 10 60 600 .40 .400 .2 .20 70.90 20 80 1ए600 .20 .400 .1 .20 90.110 25 100 2ए500 0 0 0 0 110.130 35 120 4ए200 20 700 1 35 130.150 9 140 1ए260 40 360 2 18 ० गि तथा ० ित्र99 ० गि त्र ० कि त्र ० नि त्र ० गि 10ए160 260 13 जिसमें, छ त्र ० ित्र 99 तालिका - 2.3 में वगीर्कृत आंकड़ों के लिए माध्य की गणना करने की विध्ि दी गइर् है। दिए हुए आवृिा वितरण में 99 मजदूरों को पारिश्रमिक दर के पाँच वगो± में बाँटा गया है। इन वगर् विस्तारों के मध्य ¯बदु तृतीय स्तंभ में दिए गए हैं। माध्य ज्ञात करने के लिए प्रत्येक मध्य ¯बदु ;गद्ध को उससे संबंध्ित आवृिा ; िद्ध से गुणा करके ;गिद्ध गुणनपफल के योग को ; ० गि द्ध पदों की संख्या ;छद्ध से विभाजित किया गया है। इस प्रकार माध्य की गणना निम्न सूत्रा के द्वारा ज्ञात की जा सकती है। गि ग् त्र० छ 10ए160 त्र 99त्र 102ण्6 अप्रत्यक्ष विध्ि वगीर्कृत आंकड़ों से अप्रत्यक्ष विध्ि द्वारा निम्न सूत्रा से माध्य ज्ञात किया जा सकता है। इस वििा से माध्यकी गणना के सि(ांत वही हैं जो अवगीर्कृत आंकड़ों के लिए अप्रत्यक्ष विध्ि द्वारा माध्य की गणना में दिए गए थे। इसे निम्न प्रकार से अभ्िाव्यक्त किया जाता हैμ ० कि तालिका - 2.3 में अप्रत्यक्ष विध्ि द्वारा माध्य की गणना करने से संबंध्ित निम्नलिख्िात चरण स्पष्ट हैंμ ग त्र । ± छ जिसमें, । त्र कल्िपत माध्य वाले वगर् का मध्य ¯बदु ;तालिका - 2ण्3 में 90.110 कल्िपत माध्य वाला वगर् माना गया है, जिसका मध्य ि त्र 100 है।द्धआवृिा क त्र कल्िपत माध्य वाले वगर् ;।द्ध से विचलन छ त्र वुफल पदों की संख्या अथवा ० ि प त्र वगर् अंतराल ;इस उदाहरण में यह 20 हैद्ध ;पद्ध कल्िपत माध्य 90 - 110 वाले वगर् में माना गया है। कल्िपत माध्य जहाँ तक संभव हो, वितरण श्रेणी के मध्य में माना जाता है। इस प्रिया से गणना का परिमाण न्यूनतम होता है। तालिका 2.3 में । ;कल्िपत माध्यद्ध 100 है, जो कि 90 - 110 वाले वगर् का मध्य ¯बदु है। ;पपद्ध पाँचवें स्तंभ ;नद्ध में प्रत्येक वगर् के मध्य ¯बदुओं का कल्िपत माध्य वाले ;90 दृ 110द्ध के मध्य ¯बदु से विचलन दिया गया है। ;पपपद्ध छठे स्तंभ मेंकि प्राप्त करने के लिए प्रत्येक आवृिा;द्धिको उससे संबंध्ितक के मान से गुणा किया गया है। तत्पश्चात् कि के ध्नात्मक व )णात्मक मानों को अलग - अलग जोड़कर उनका निरपेक्ष अंतर ; ० कि द्ध ज्ञात कर लिया जाता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि ० कि से संलग्न चिÉ को सूत्रा में ।ए के बाद दिए गए चिÉ ± के स्थान पर उपयोग करते हुए माध्य की गणना निम्नानुसार की जाती है: ० कि ग त्र । ± छ 260 त्र 100 ़ 99 त्र 100 ़ 2ण्6 त्र 102ण्6 टिप्पणी: अप्रत्यक्ष विध्ि समान व असमान दोनों ही वगर् अंतरालों वाले वितरणों के लिए प्रभावी होती है। माियका माियका स्िथतिक औसत है। इसे फ्वितरण में ऐसे ¯बदु जिसके दोनों ओर बराबर संख्या में पदीय मान होंय् वेफ रूप में परिभाष्िात किया जा सकता है। माियका को प्रतीवफ ड के द्वारा अभ्िाव्यक्त किया जाता है। अवगीर्वृफत आंकड़ों के लिए माियका की गणना आँकड़े अवगीर्कृत होने पर उन्हें बढ़ते या घटते क्रम में व्यवस्िथत कर लिया जाता है। इस व्यवस्िथत श्रेणी में मध्यवतीर् पद के मान की स्िथति ज्ञात करके माियका प्राप्त की जा सकती है। बढ़ते या घटते क्रम में व्यवस्िथत श्रेणी के किसी भी सिरे से मध्यवतीर् मान की स्िथति निधर्रित की जा सकती है। माियका की गणना करने के लिए निम्नलिख्िात सूत्रा का उपयोग किया जाता हैμ द्रछ ़ 1öप्रझ्प्रझ्झ् वाले पद का मानध् 2 ø उदाहरण 2ण्3 रू निम्नांकित ऊँचाइर्यों का उपयोग करते हुए हिमालय की पवर्तीय - चोटियों की माियकाऊँचाइर् की गणना कीजिएμ 8ए126 मी.ए 8ए611मी.ए 7ए817 मी.ए 8ए172 मी.ए 8ए076 मी.ए 8ए848 मी.ए 8ए598 मीण् गणना रू माियका ड की गणना निम्न चरणों में की जा सकती हैμ ;पद्ध दिए हुए आंकड़ों को बढ़ते अथवा घटते क्रम में व्यवस्िथत कीजिए। ;पपद्ध श्रेणी में मध्यवतीर् मूल्य का मान जानने के लिए सूत्रा का उपयोग कीजिए। इस प्रकारμ द्रछ ़ 1ö प्र प्रझ्झ् वाले पद का मानध् 2 ø द्र7 ़ 1ö त्रप्रप्रझ्झ् वाले पद का मानध् 2 ø द्र8ö त्र प्रप्र झ्झ् वाले पद का मानध्2ø अथार्त् व्यवस्िथत श्रेणी में चैथे पद का मान माियका होगी। आंकड़ों का बढ़ते क्रम में व्यवस्थापनμ 7ए817य 8ए076य 8ए126य 8ए172य 8ए598य 8ए611य 8ए848 चैथे पद का मान अतः ड त्र 8ए172 मीटर वगीर्कृत आंकड़ों से माियका की गणना आँकड़े वगीर्कृत होने पर हमें उस ¯बदु का मान ज्ञात करना होता है, जहाँ कोइर् व्यक्ित प्रेक्षण किसी वगर् के माध्य में स्िथत होता है। इसकी गणना निम्न सूत्रा से की जा सकती हैμ प द्रछ öड त्र स ़ प्र.बझ्प्रझ् िध्2 ø जिसमें, डत्र वगीर्कृत आंकड़ों के लिए माियका स त्र माियका वगर् की निम्न सीमा प त्र वगर् अंतराल ित्र माियका वगर् की आवृिाछ त्र आवृिा का वुफल योग अथवा प्रेक्षणों की संख्याब त्र माियका वगर् से पहले वाले वगर् की संचयी आवृिा। उदाहरण - 2ण्4 रू निम्न वितरण के लिए माियका की गणना कीजिएतालिका - 2ण्4 रू माियका की गणना 10 त्र 80़ ;25 . 21द्ध 16 5 त्र 80 ़´ 4 8 5त्र 80 ़ 2 त्र 80 ़ 2ण्5 डत्र 82ण्5 बहुलक किसी श्रेणी में जिस मान की सवार्ध्िक पुनरावृिा होती है। वह मान बहुलक कहलाता है इसके संकेताक्षर र् अथवा डव् हैं। माध्य तथा माियका की तुलना में बहुलक का उपयोग कम प्रचलित है। किसी श्रेणी में एक से अध्िक बहुलक भी हो सकते हैं। अवगीर्कृत आंकड़ों के लिए बहुलक की गणना दिए हुए आंकड़ों के समूह से बहुलक की गणना करने के लिए पहले सभी मापों को बढ़ते या घटते क्रममें व्यवस्िथत कर लिया जाता है। इससे सवार्ध्िक पुनरावृिा वाले मान की पहचान करने में आसानी रहती है। उदाहरण 2ण्5 रू निम्नांकित दस विद्याथ्िार्यों के भूगोल की परीक्षा में प्राप्तांकों के लिए बहुलक की गणना कीजिए।61ए 10ए 88ए 37ए 61ए 72ए 55ए 61ए 46ए 22 गणना रू बहुलक ज्ञात करने के लिए निम्नानुसार सभी प्राप्तांकों को बढ़ते क्रम में व्यवस्िथत कर लिया जाता है - 10ए 22ए 37ए 46ए 55ए 61ए 61ए 61ए 72ए 88 दिए हुए आंकड़ों में तीन बार की पुनरावृिा वाला मान 61, दी हुइर् श्रेणी का बहुलक है। चूँकि इस श्रेणी में अन्य किसी संख्या के मान में ऐसी विशेषता नहीं है, अतः यह, इस श्रेणी में एक - बहुलक है। उदाहरण 2ण्6 रू दस विद्याथ्िार्यों के एक अन्य प्रतिदशर् के लिए निम्नांकित प्राप्तांकों के आधर पर बहुलक ज्ञात कीजिएμ 82ए 11ए 57ए 82ए 08ए 11ए 82ए 95ए 41ए 11 गणना रू निम्नानुसार सभी दिए गए प्राप्तांको को बढ़ते क्रम में व्यवस्िथत कीजिए - 08ए 11ए 11ए 11ए 41ए 57ए 82ए 82ए 82ए 95 उपरोक्त व्यवस्िथत श्रेणी में आसानी से देखा जा सकता है कि 11 तथा 82, दोनों मानों के वितरण मेंतीन बार पुनरावृिा हुइर् है। अतः आंकड़ों के इस समूह का स्वरूप द्वि - बहुलक है। यदि किसी श्रेणी में तीनमानों की पुनरावृिा समान तथा सबसे अिाक बार होती है तो उस श्रेणी को त्रिा - बहुलक श्रेणी कहते हैं। ऐसेही कइर् मानों की समान बार पुनरावृिा होने पर बहु - बहुलक श्रेणी बन जाती है तथापि किसी श्रेणी में एकभी मान की पुनरावृिा न होने पर वह बहुलक - रहित श्रेणी कहलाती है। माध्य, माियका तथा बहुलक की तुलना सामान्य वितरण वक्र की सहायता से वेंफद्रीय प्रवृति के तीनों मापों की तुलना आसानी से की जा सकती है।सामान्य वक्र आवृिायों का ऐसा वितरण होता है जिसको प्रदश्िार्त करने वाला रेखाचित्रा घंटाकार वक्र कहलाता है। बौिकता, व्यक्ितत्व, समंक तथा विद्याथ्िार्यों की उपलब्िध् के समंक जैसी अनेक मानवीय विशेषताओं चित्रा 2ण्5 रू )णात्मक विषमता प्रकीणर्न के माप केवल वेंफद्रीय प्रवृिा माप ही वितरण का समुचित रूप से वणर्न नहीं करते हंै क्योंकि वे केवल वितरण कावंेफद्र ही चिित करते हैं तथा उसे यह ज्ञात नहीं होता कि विभ्िान्न मूल्य अथवा माप वंेफद्र के परिप्रेक्ष्य मेंकिस प्रकार प्रकीण्िार्त हैं। वंेफद्रीय प्रवृिा के माप की इन सीमाओं को समझने के लिए तालिका - 2.5 तथा 2.6 में दिए गए आंकड़ों का उपयोग करते हैं। तालिका 2ण्5 रू व्यक्ितयों के तालिका 2ण्6 रू व्यक्ितयों के प्राप्तांक प्राप्तांक इकाइ प्राप्तांक ग्1 52 ग्2 55 ग्3 50 ग्4 48 ग्5 45 इकाइ प्राप्तांक ग्1 28 ग्2 00 ग्3 98 ग्4 55 ग्5 69 दोनों ही श्रेण्िायों के लिए ग् त्र 50 है। स्पष्ट है कि आंकड़ों के दोनों समूहों से प्राप्त किया गया माध्य एक समान अथार्त् 50 है। तालिका - 2.5 में दिए गए आंकड़ों में उच्चतम व निम्नतम मान क्रमशः 55 तथा 45 हैं। तालिका - 2.6 में दिए गए वितरण में ये अध्िकतम तथा न्यूनतम मान क्रमशः 98 तथा 00 ;शून्यद्ध हैं। यद्यपि दोनों वितरणों का माध्य समान है, तथापि द्वितीय वितरण जो कि अध्िक अस्िथर अथवा विषम है की अपेक्षा प्रथम वितरण स्िथर तथा समरूप है। इससे यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या माध्य वितरण की सभी विशेषताओं का पयार्प्त संकेतक है। ये उदाहरण ठोस प्रमाण देते हैं कि ऐसा नहीं है। अतः वितरण का श्रेष्ठतर प्रतिबिंब प्राप्त करने के लिए हमें वेंफद्रीयता की प्रवृिा के माप तथा प्रकीणर्न या विषमता के माप की भी आवश्यकता होती है। प्रकीणर्न से तात्पयर् वंेफद्रीय प्रवृिा के माप से, इकाइयों के बिखराव से लगाया जाता है। यह माप औसत मूल्य से किसी इकाइर् अथवा संख्यात्मक मान की विषमता या बिखराव की प्रवृिा का मापन करता है। इस प्रकार प्रकीणर्न वंेफद्रीय मान से विभ्िान्न मूल्यों के बिखराव अथवा विषमता की मात्रा है। प्रकीणर्न निम्नलिख्िात दो आधरभूत उद्देश्यों की पूतिर् करता है: ;पद्ध इससे हमें वितरण या श्रेणी के संघटन की प्रकृति का ज्ञान होता है तथा ;पपद्ध इसकी सहायता से दिए हुए वितरण की तुलना स्िथरता अथवा समरूपता के आधर पर हो जाती है। प्रकीणर्न के मापन की विध्ियाँ प्रकीणर्न के मापन की निम्नलिख्िात वििायाँ हैं: 1ण् विस्तार 2ण् चतुथर्क विचलन 3ण् माध्य विचलन 4ण् मानक विचलन ;ैक्द्ध तथा विचरण गुणांक ;ब्टद्ध 5ण् लाॅरेंश वक्र इनमें से प्रत्येक विध्ि के अपने विशेष गुण एवं सीमाएँ हैं। अतः इनमें से किसी भी विध्ि का उपयोगसावधनीपूवर्क करने की आवश्यकता है। विस्तार के साथ - साथ प्रकीणर्न के सापेक्ष माप के रूप में मानक विचलन तथा प्रकीणर्न के सापेक्ष्िाक माप के रूप में विचरण गुणांक ;ब्टद्धए प्रकीणर्न के सबसे अध्िक प्रचलित माप हैं। हम इन सभी मापों की गणना विध्ियों का विवेचन करेंगे। विस्तार किसी श्रेणी में अध्िकतम व न्यूनतम मूल्यों के अंतर को विस्तार ;त्द्ध कहते हैं। इस प्रकार यह किसी श्रेणी में सबसे छोटे से लेकर सबसे बड़े माप की दूरी है। इसे उच्चतम मान में न्यूनतम मान के घटाए हुए परिणाम के रूप में परिभाष्िात किया जा सकता है। अवगीर्वृफत आंकड़ों के लिए विस्तार की गणना उदाहरण 2ण्7 रू निम्नांकित दैनिक मजदूरी के वितरण के लिए विस्तार की गणना कीजिए रु.40ए 42ए 45ए 48ए 50ए 52ए 55ए 58ए 60ए 100 विस्तार की गणना त् की गणना निम्नलिख्िात सूत्रा की सहायता से हो सकती है - त्रत् स्ै जिसमें, ष्त्ष् त्र विस्तार ष्स्ष् तथा ष्ैष् क्रमशः अध्िकतम तथा न्यूनतम मान के प्रतीक हैं। अतः त् त्र स् दृ ै त्र 100 दृ 40 त्र 60 यदि हम उपरोक्त वितरण में से दसवें मूल्य को हटा दें तो त् का मान 20 ;60 - 40द्ध रह जाएगा। श्रेणी में से केवल एक मूल्य को हटा देने पर त् का मान घटकर केवल एक - तिहाइर् रह गया है। इससे स्पष्ट है कि प्रकीणर्न के माप के रूप त् के साथ कठिनाइर् है कि इसका मान पूणर्तः दो चरम मूल्यों पर आधरित होता है। इस प्रकार प्रकीणर्न के माप के रूप में त् का ियात्मक रूप ठीक वैसा ही जैसा वंेफद्रीय की प्रवृिा के माप में बहुलक का है। दोनों ही माप अत्यध्िक अस्िथर हैं। मानक विचलन प्रकीणर्न के माप के रूप में मानक विचलन ;ैक्द्ध सबसे अध्िक प्रचलित माप है। इसे विचलनों के वगर् के औसत के वगर्मूल के रूप में परिभाष्िात किया जाता है। इसकी गणना हमेशा माध्य के परिप्रेक्ष्य में की जाती है। मानक विचलन प्रकीणर्न का सवार्िाक स्िथर माप है जिसका अन्य सांख्ियकीय गणनाओं में उपयोगकिया जाता है। ग्रीक अक्षर σ इसका संकेताक्षर है। ैक् ज्ञात करने के लिए किसी श्रेणी के माध्य से प्रत्येक मूल्य के विचलन ;गद्ध का वगर् ;ग2द्ध किया जाता है। यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि इस चरण के कारण विचलनों के सभी )णात्मक मान धनात्मक हो जाते हैं। यह प्रिया मानक विचलन को औसत विचलन की एक बड़ी आलोचना से बचा लेते हैं जो मापांक ग का उपयोग करता है। इसके पश्चात् विचलनों के सभी वगो± को जोड़ लिया जाता है ;∑ग2द्ध। इसमें यह सावधनी रखनी होती है कि विचलनों को पहले जोड़कर पिफर वगर् नहीं किया जाता। इस वगर् विचलनोंके योग को पदों की संख्या से विभाजित करके उसका वगर्मूल निकाला जाता है। इसलिए मानक विचलन को वगर्मूल माध्य वगर् विचलन के रूप में परिभाष्िात किया जाता है। दिए हुए आंकड़ों के लिए इसकी गणना निम्न सूत्रा के उपयोग के द्वारा की जाती हैμ े त्र गणना के पदों में वगर्मूल निकालने से पहले एक पारिभाष्िाक शब्द आता है। इसे प्रसरण कहा जाता है।प्रसरण का उपयोग अगि्रम सांख्ियकीय गणनाओं में किया जाता है। इसका वगर्मूल ही मानक विचलन होता है। इसी प्रकार इसका विपरीत भी सत्य है अथार्त् मानक विचलन ;ैक्द्ध का वगर् ही प्रसरण है। अवगीर्वृफत आंकड़ों के लिए मानक विचलन की गणना उदाहरण 2ण्7 रू निम्नांकित मूल्यों के लिए मानक विचलन ज्ञात कीजिए तालिका 2ण्7 रू मानक विचलन की गणना 01ए 03ए 05ए 07ए 09 ० ग 2 े त्र 1 छ 3 540 7त्र 5 9 ० ग् त्र 25त्र 8 त्र 2 828 ण् छ त्र5 त्र 2ण्83 ∴त्र 5 उपरोक्त गणनाओं के पदों के सारांश निम्नानुसार हैं: ;पद्ध सभी मूल्यों को ग् द्वारा चिित स्तंभ में रखा गया है। दृ4 16 दृ2ध्दृ6 4 0 0 2 4 6.।चत 16 ;पपद्ध सभी मूल्यों को जोड़कर उसमें वुफल पदों का भाग देकर माध्य ज्ञात किया गया है। ;पपपद्ध प्रत्येक मूल्य का विचलन ;गद्ध वास्तविक मूल्य से माध्य को घटाकर प्राप्त किया गया है। इसकी शु(ता की जाँच विचलनों के योग से की जा सकती है, जो कि सदैव शून्य होता है। इस अभ्यास में भी यह तथ्य देखा जा सकता है। ;पअद्ध विचलन ;गद्ध को वगर् करके उसका योग किया गया है। ;अद्ध सभी वगर् विचलनों के योग को पदों की संख्या से विभाजित किया गया है। पुनस्मर्रण कीजिए कि इससे प्रसरण ज्ञात हो जाता है। ;अपद्ध इसका वगर्मूल निकालने से मानक विचलन प्राप्त हो जाता है। ;1द्ध वगर् ;2द्ध ि ;3द्ध ग´ ;4द्ध गि´ ;5द्ध गि´2 120 . 130 130 . 140 140 . 150 150 . 160 160 . 170 170 . 180 2 4 6 12 10 6 दृ3 दृ2 दृ1 0 1 2 दृ6 दृ8 6 20 ..0 10 12 22 18 16 6 0 10 24 छत्र40 ० त्र 2गि´ 2० गि´ त्र74 ेब्ट त्र´ 100 ग् इस प्रकार तालिका - 2.7 में दिए गए आंकड़ों के लिए ब्ट निम्नानुसार होगा: ब्ट त्र े ´ 100 ग् 283 ण्ब्टत्र´ 1005 ब्ट त्र 56ः इसी सूत्रा से वगीर्वृफत आंकड़ों का विचरण गुणांक ज्ञात किया जा सकता है। कोटि सहसंबंध् अभी तक जितनी सांख्ियकीय विध्ियों की विवेचना की गइर् है, उन सभी का संबंध् एक ही चर से था। अब हम दो चरों के मध्य साहचयर् के अन्वेषण करने वाली वििायों की व्याख्या करेंगे तथा यह भी देखेंगे कि इस साहचयर् की अभ्िाव्यक्ित संख्यात्मक रूप से वैफसे की जा सकती है? दो या दो से अध्िक चरों के बारेमें चचार् होने पर यह जिज्ञासा उठती है कि क्या किसी एक चर में परिवतर्न का प्रभाव दूसरे चर में किसी प्रकार के परिवतर्न पर पड़ता है।बहुध हमारी रुचि दो या दो से अध्िक चरों के मध्य साहचयर् अथवा पारस्परिक निभर्रता की प्रकृति जानने में रहती है। ऐसा समझा जाता है कि सहसंबंध् इस उद्देश्य से उपयोगी है। आधरभूत रूप से यह दो या दोसे अध्िक चरों के मध्य साहचयर् का माप है। चूँकि हम इसके अंतगर्त यह अध्ययन करते हैं कि संबंध्ित घटक एक - दूसरे के साथ किस प्रकार विचरण करते हैं अतः इन्हें चर कहा जाता है। इस प्रकार पारिभाष्िाकशब्दावली के रूप में सहसंबंध् से तात्पयर् दो चरों के मध्य अनुरूपता अथवा साहचयर् की प्रकृति एवं गहनता से है। इस परिभाषा में सम्िमलित पारिभाष्िाक शब्दावली के रूप में प्रकृति तथा गहनता का आशय दिशा एवं मात्रा से है, जिसके अनुरूप दो चर परस्पर विचरण करते हैं। सहसंबंध् की दिशा यह हमारा सामान्य अनुभव है कि वुफछ प्राप्ित के लिए निवेश किया जाता है। इससे तीन संभावनाएँ रहती हैं: 1ण् निवेश में वृि से प्राप्ित में भी वृि हो। 2ण् निवेश में वृि से प्राप्ित में कमी हो। 3ण् निवेश की मात्रा में परिवतर्न से प्राप्ित की मात्रा में कोइर् परिवतर्न न हो।प्रथम स्िथति में निवेश तथा प्राप्ित में साहचयर् की दिशा एक ही है। इस स्िथति में ऐसा कहा जाता है कि दोनों के मध्य धनात्मक सहसंबंध् है।द्वितीय स्िथति में निवेश व प्राप्ित के मध्य परिवतर्न की दिशा एक - दूसरे के विपरीत है, अतः कहा जाता है कि दोनों के मध्य )णात्मक सहसंबंध् है।तृतीय स्िथति में निवेश व प्राप्ित के मध्य कोइर् साहचयर् विद्यमान नहीं है। अतः यह कहा जाता है कि दोनों के मध्य कोइर् महत्वपूणर् सांख्ियकीय सहसंबंध् नहीं है।आइए अब हम चित्रा 2.7 देखें जो चित्रा 2.6 से एकदम विपरीत है। उसमें रेखाचित्रा पर अंकित मानांे कीदिशा ऊपर बाएँ से नीचे दाईं ओर है। यह भी ध्यान दीजिए कि ग्.अक्ष पर प्रत्येक एक इकाइर् वृि केसाथ - साथ ल्.अक्ष पर दो इकाइयों की कमी हो जाती है। यह )णात्मक सहसंबंध् का उदाहरण है। इसकाअथर् यह है कि दोनों चरों में एक - दूसरे के विपरीत गति करने की प्रवृिा है, अथार्त् यदि एक चर में वृि हैं। यह रेखा प्रकीणर् आरेख के ऊपरी बाएँ भाग से इनके निचले दाएँं भाग की ओर विस्तारित है। यह पूणर् )णात्मक सहसंबंध् ;जिसका मान दृ1ण्00 हैद्ध का उदाहरण है। सहसंबंध् का अभाव ;अथवा शून्य सहसंबंध्द्ध तब होता जबकि युग्म के दोनों एक - दूसरे में परिवतर्न का कोइर् प्रत्युत्तर नहीं देते। इस स्िथति में दोनों चरों के मध्य कोइर् सहसंबंध् नहीं होता, अतः इसे सहसंबंध् के अभाव अथवा शून्य सहसंबंध् की स्िथति कहते हैं। इसे चित्रा 2ण्9 में दशार्या गया है। ग्.चर में परिवतर्न का ल्.चर द्वारा प्रत्युत्तर नहीं दिए जाने के कारण उत्पन्न शून्य सहसंबंध् को प्रकीणर् अंकन - । द्वारा दशार्या गया है। इसी प्रकार प्रकीणर् अंकन दृ ठ में भी शून्य सहसंबंध् की स्िथति है, जो कि ल्.चर में परिवतर्न पर ग्.चर द्वारा कोइर् प्रत्युत्तर नहीं दिए जाने के कारण उत्पन्न हुइर् है। चित्रा 2ण्9रू शून्य सहसंबंध् को दशार्ने वाला प्रकीणर् आरेख अन्य सहसंबंध् पूणर् सहसंबंधें ;़1द्ध व शून्य सहसंबंध् के मध्य में साहचयर् की सामान्य परिस्िथतियाँ पाइर् जाती हैं जिन्हें कमजोर, मध्यम तथा गहन सहसंबंध् के नाम से जाना जाता है। इन तीनों परिस्िथतियों को क्रमशः चित्रा 2ण्10ए 2ण्11 तथा 2ण्12 में स्पष्ट रूप से दशार्या गया है। इनमें अंकित ¯बदुओं के बिखराव अथवा प्रकीणर्न के स्वरूप तथा उनको दिए गए विश्िाष्ट नाम, यथा कमशोर, मध्यम तथा गहन की ओर ध्यान दीजिए ;ये परिस्िथतियाँ सामान्य विशेषण हैं, जिनकी कोइर् विश्िाष्ट सीमाएँ निधर्रित नहीं हैंद्ध बिखराव जितना अध्िक होगा, सहसंबंध् उतना ही कमशोर होगा। प्रकीणर्न जितना कम होगा, सहसंबंध् उतना ही गहन होगा, तथा अंकित ¯बदुओं के एक सरल रेखा पर स्िथत हो जाने पर पूणर् सहसंबंध् होगा ;चित्रा 2ण्6 तथा 2ण्7द्ध। चित्रा 2ण्10 रू चित्रा 2ण्11 रू चित्रा 2ण्12 रू कमशोर )णात्मक सहसंबंध् मध्यम धनात्मक सहसंबंध् गहन ध्नात्मक सहसंबंध् सहसंबंध् की गणना करने की विध्ियाँ सहसंबंध् की गणना करने की अनेक विध्ियाँ हैं ¯कतु समय व स्थान की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए यहाँ हम केवल स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध् की व्याख्या करेंगे। स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध् स्पीयरमैन ने कोटियों के आधर पर सहसंबंध् की गणना विध्ि की युक्ित प्रदान की। प्रचलित रूप से इसे स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध् के नाम से जाना जाता है जिसका सांख्ियकी में संकेताक्षर त जिसका उच्चारण है रो .तीवद्ध है। इसकी गणना विध्ि आसान होने के कारण स्पीयरमैन के सहसंबंध् का उपयोग अध्िक प्रचलित है। इस संबंध् की गणना निम्न चरणों में की जाती है: ;पद्ध अभ्यास में दिए गए ग् तथा ल् चरों के आंकड़ों को तालिका के क्रमशः प्रथम व द्वितीय स्तंभों में उतार लिया जाता है। ;पपद्ध दोनों चरों की अलग - अलग कोटियाँ निधर्रित की जाती हैं। ग्.चर की कोटियों को तृतीय स्तंभ में अंकित किया जाता है जिसका शीषर्क ;ग्त्द्ध ;ग्.चर की कोटियाँद्ध है। इसी प्रकार ल्.चर की कोटियों ;ल्त्द्ध चतुथर् स्तंभ में अंकित किया जाता है। आंकड़ों में उच्चतम मान को कोटि एक, दूसरे सवोर्च्च मान को कोटि दो तथा इसी प्रकार अन्य कोटियों का आवंटन किया जाता है। मान लीजिए ग्.चर के आँकड़े 4ए 8ए 2ए 10ए 1ए 9ए 7ए 3ए 0 तथा 5 हैं तो ग्त् क्रमशः 6ए 3ए 8ए 1ए 9ए 2ए 4ए 7ए 10 व 5 होंगी। ध्यान दीजिए कि अंतिम कोटि ;इस उदाहरण में 10द्ध श्रेणी में वुफल इकाइयों की संख्या के बराबर होती है। इसी प्रकार ल्त् का भी निधर्रण किया जाता है। ;पपपद्ध ग्त् तथा ल्त् के निधर्रण के पश्चात् दोनों कोटियों में अंतर ज्ञात किया जाता है ;जिसमें धनात्मक या )णात्मक चिÉों का ध्यान नहीं रखतेद्ध। इस अंतर का अभ्िालेखन पाँचवें स्तंभ में लिखा जाता है। चूँकि अगले चरण में इन अंतरों का वगर् निकाला जाता है, इसलिए इन अंतरों के साथ जुड़े )णात्मक अथवा ध्नात्मक चिÉों का कोइर् महत्त्व नहीं है। ;पअद्ध प्रत्येक अंतर का वगर् ज्ञात करके उनका योग कर लिया जाता है। ये मान छठे स्तं;अद्ध इसके पश्चात् कोटि सहसंबंध् की गणना निम्न सूत्रा के आधर पर की जाती हैμ 6 क्2 त 1 ० त्रछछ2 .1द्ध; जिसमें, त त्र कोटि सहसंबंध् ०क्2 त्र दोनों कोटियों के अंतर के वगर् का योग छ त्र ग्.ल् युग्मों की संख्या उदाहरण 2ण्8 रू निम्नांकित आंकड़ों के लिए स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध् की गणना कीजिएμ तालिका 2ण्8 रू स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध् की गणना ;1द्ध ग् ;2द्ध ल् ;3द्ध ग्त् ;4द्ध ल्त् ;5द्ध क् ;6द्ध क्2 2 8 0 20 12 16 6 18 9 10 4 12 6 24 16 18 8 20 9 10 9 7 10 1 4 3 8 2 6 5 10 5 9 1 4 3 8 2 7 6 1 2 1 0 0 0 0 0 1 1 1 4 1 0 0 0 0 0 1 1 छत्र10 क्2त्र8 गणना: जब त कोटि सहसंबंध्क् दोनों चरों ग्तथा ल्की कोटियों का अंतर तथा छ दोनों चरों अथार्त् ग दृ ल युग्मों की संख्या हो तो 68´ त्र1210 10 .1 48 ;द्ध1त्र ;10 100 . द्ध1 1त्र ;द्ध 48 10 99 1त्र ;द्ध 48 990 1005त्र.ण् 095 त्रण् जब आंकड़ों के अंतगर्त दी हुइर् इकाइयों की संख्या कम हो तो अन्य प्रकार के सहसंबंधें की तुलना में‘रो’ अध्िक उत्तम स्थानापन्न होता है। इकाइयों की संख्या अध्िक होने पर यह लगभग अनुपयोगी हो जाता है क्योंकि जब तक सभी युग्मों की कोटियों की गणना की जाती है तब तक अन्य प्रकार के सहसंबंध् की गणना की जा सकती है। अभ्यास 1ण् निम्नांकित चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए: ;पद्ध वंेफद्रीय प्रवृिा का जो माप चरम मूल्यों से प्रभावित नहीं होता है वह है: ;कद्ध माध्य ;खद्ध माध्य तथा बहुलक ;गद्ध बहुलक ;घद्ध माियका ;पपद्ध वंेफद्रीय प्रवृिा का वह माप जो किसी वितरण के उभरे भाग से हमेशा संपाती होगा वह है: ;कद्ध माियका ;खद्ध माध्य तथा बहुलक ;गद्ध माध्य ;घद्ध बहुलक ;पपपद्ध )णात्मक सहसंबंध् वाले प्रकीणर् अंकन में अंकित मानों के वितरण की दिशा होगी: ;कद्ध ऊपर बाएँ से नीचे दाएँ ;खद्ध नीचे बाएँ से ऊपर दाएँ ;गद्ध बाएँ से दाएँ ;घद्ध ऊपर दाएँ से नीचे बाएँ 2ण् निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध माध्य को परिभाष्िात कीजिए। ;पपद्ध बहुलक के उपयोग के क्या लाभ हैं? ;पपपद्ध अपकिरण किसे कहते हैं? ;पअद्ध सहसंबंध् को परिभाष्िात कीजिए। ;अद्ध पूणर् सहसंबंध् किसे कहते हैं? ;अपद्ध सहसंबंध् की अध्िकतम सीमाएँ क्या हैं? 3ण् निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए: ;पद्ध आरेखों की सहायता से सामान्य तथा विषम वितरणों में माध्य, माियका तथा बहुलक की सापेक्ष्िाक स्िथतियों की व्याख्या कीजिए। ;पपद्ध माध्य, माियका तथा बहुलक की उपयोगिता पर टिप्पणी कीजिए ;संकेत: उनके गुण तथा दोषों सेद्ध। ;पपपद्ध एक काल्पनिक उदाहरण की सहायता से मानक विचलन के गणना की प्रिया समझाइए। ;पअद्ध प्रकीणर्न का कौन - सा माप सबसे अध्िक अस्िथर है तथा क्यों? ;अद्ध सहसंबंध् की गहनता पर एक विस्तृत टिप्पणी लिख्िाए। ;अपद्ध कोटि सहसंबंध् की गणना के विभ्िान्न चरण कौन - से हैं? ियाकलाप 1ण् भौगोलिक विश्लेषण के लिए प्रयुक्त कोइर् काल्पनिक उदाहरण लीजिए तथा अवगीर्कृत आंकड़ों की गणना करने की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष विध्ियों को समझाइए। 2ण् विभ्िान्न प्रकार के पूणर् सहसंबंध् दशार्ने के लिए प्रकीणर् आरेख बनाइए।

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