अध्याय 15 संचार व्यवस्था 15ण्1 भूमिका संचार सूचना के संप्रेषण की िया है। इस संसार का प्रत्येक प्राणी, अपने चारों ओर के संसार के अन्य प्राण्िायों से, लगभग निरंतर ही सूचनाओं के आदान - प्रदान की आवश्यकता का अनुभव करता है। किसी सपफल संचार के लिए यह आवश्यक है कि प्रेषक एवं ग्राही दोनों ही किसी सवर्सामान्य भाषा को समझते हों। मानव निरंतर ही यह प्रयत्न करता रहा है कि उसका मानव जाति से संचार गुणता में उन्नत हो। मानव प्रागैतिहासिक काल से आध्ुनिक काल तक, संचार में उपयोग होने वाली नयी - नयी भाषाओं एवं विध्ियों की खोज करने के लिए प्रयत्नशील रहा है, ताकि संचार की गति एवं जटिलताओं के पदों में बढ़ती आवश्यकताओं की पूतिर् हो सके। संचार प्रणाली के विकास को प्रोन्नत करने वाली घटनाओं एवं उपलब्िध्यों के विषय में जानकारी होना लाभप्रद है, जिसे सारणी 15ण्1 में प्रस्तुत किया गया है। आध्ुनिक संचार की जड़ें 19वीं तथा 20वीं शताब्िदयों में सर जगदीश चन्द्र बोस, एपफ.बीमोसर्, जी माकोर्नी तथा अलेक्जंेडर ग्राह्म बेल के कायर् द्वारा डाली गईं। 20 वीं शताब्दी के पहले पचास वषो± के पश्चात इस क्षेत्रा में विकास की गति नाटकीय रूप से बढ़ी प्रतीत होती है। आगामी दशकों में हम बहुत सी अन्य महत्वपूणर् उपलब्िध्याँ देख सकते हैं। इस अध्याय का उद्देश्य संचार की अभ्िाकल्पना, अथार्त संचार के ढंग ;डवकमद्ध, माॅडुलन की आवश्यकता, और आयाम - माॅडुलन के निगमन तथा उत्पादन से परिचित होना है। 15ण्2 संचार व्यवस्था के अवयव संचार सभी सजीव वस्तुओं के जीवन के प्रत्येक चरण में व्याप्त है। चाहे संचार की कोइर् भी प्रकृति हो, प्रत्येक संचार व्यवस्था के तीन आवश्यक तत्व होते हैं - प्रेष्िात्रा, माध्यम/चैनल तथा अभ्िाग्राही। चित्रा 15ण्1 में किसी संचार व्यवस्था के व्यापक रूप को ब्लाॅक आरेख द्वारा दशार्या गया है। वषर् 1565 इर्;लगभगद्ध 1835 1876 1895 1936 1955 1968 घटना बादशाह अकबर को किसी दूरस्थ स्थान से बेगम द्वारा बच्चे को जन्म दिये जाने की सूचना ढोल बजाकर देना सैम्यूल एपफ. बी. मोसर् तथा सर चाल्सर् व्हीटस्टोन द्वारा टेलीग्राप़्ाफ का आविष्कार अलेक्शैंडर ग्राह्म बेल तथा एंटोनियो मेयूस्सी द्वारा टेलीप़्ाफोन का आविष्कार सर जे.सी. बोस तथा जी. माकोर्नी द्वारा बेतार के तार का निदशर्न टेलीविशन प्रसारण ;जाॅन लाॅगी बेयडर्द्ध महाद्वीप के पार पहला रेडियो प़्ौफक्स प्रेष्िात ;अलेक्शैंडर बेनद्ध ।त्च्।छम्ज् पहला इंटरनेट अस्ितत्व में आया ;श्रण्ब्ण्त्ण् लिक्लीडरद्ध टिप्पणी यह माना जाता है कि वशीर बीरबल ने बादशाह और बेगम के विश्राम - स्थलों के बीच निश्िचत संख्या में ढोल बजाने वालों की व्यवस्था का प्रयोग किया था इसके परिणामस्वरूप डाकघरों द्वारा संदेश भेजने में आश्चयर्जनक वृि हुइर् तथा संदेशवाहकों द्वारा स्वयं यात्रा कर संदेश पहुँचाने का कायर् काप़्ाफी कम हो गया कदाचित मानव जाति के इतिहास में सबसे व्यापक उपयोग होने वाला संचार का साध्न यह तार द्वारा संचार के युग से बे - तार द्वारा संचार के युग में एक ऊँची उड़ान थी ठठब् द्वारा प्रथम टेलीविशन प्रसारण अलेक्शैंडर बेन ने पैफक्स की अवधरणा ़1843 में पेटंट कराइर् ।त्च्।छम्ज् परियोजना अमेरिका के रक्षा विभाग द्वारा संचालित की गइर्। इसके अंतगर्त नेटववर्फ से संयोजित एक ़वंफप्यूटर से पफाइल दूसरे वंफप्यूटर में स्थानांतरित की गयी 1975 बेल लेबोरेट्रीश पर तंतु प्रकाश्िाकी विकसित हुइर् पारंपरिक संचार व्यवस्थाओं की तुलना में तंतु प्रकाश्िाक संचार व्यवस्था श्रेष्ठ तथा सस्ती हैं 1989.91 टिम बनर्र - ली ने ॅवतसक ॅपकम ॅमइ का आविष्कार किया। ॅॅॅ को ऐसे विशालकाय विश्वकोष के सदृश माना जा सकता है जिसका ज्ञान सवर्साधरण को हर समय सुलभ रहता है चित्रा 15ण्1 किसी व्यापक संचार व्यवस्था का ब्लाॅक आरेख। किसी संचार व्यवस्था में प्रेष्िात्रा किसी एक स्थान पर अवस्िथत होता है, अभ्िाग्राही किसी अन्य स्थान पर ;पास अथवा दूरद्ध अवस्िथत होता है तथा चैनल एक ऐसा भौतिक माध्यम है जो इन्हें एक दूसरे से संयोजित करता है। चैनल का प्रकार संचार व्यवस्था के प्रकार पर निभर्र करता है। यह प्रेष्िात्रा तथा अभ्िाग्राही को संयोजित करने वाले एक तार अथवा केबल के रूप में हो सकता है अथवा वह बेतार ;वायरलैसद्ध भी हो सकता है। प्रेष्िात्रा का उद्देश्य सूचना स्रोत द्वारा उत्पन्न संदेश सिग्नल को चैनल द्वारा प्रेषण के लिए उपयुक्त रूप में परिवतिर्त करना है। यदि किसी सूचना स्रोत का निगर्त वाव्फ सिग्नल की भाँति अविद्युतीय हो तो कोइर् ट्रांसड्यूसर, इस संदेश को प्रेष्िात्रा में देने से पूवर् विद्युत सिग्नल में रूपांतरित कर देता है। जब कोइर् प्रेष्िात सिग्नल चैनल के अनुदिश संचारित होता है तो यह चैनल में अपूणर्ता के कारण विरूपित हो सकता है। इसके अतिरिक्त प्रेष्िात सिग्नल में नाॅयज ;छवपेमए रवद्ध मिल जाता है, पफलस्वरूप अभ्िाग्राही प्रेष्िात सिग्नल का विकृत रूप प्राप्त करता है। अभ्िाग्राही का कायर् प्राप्त सिग्नल को प्रचालित करना होता है। यह इस सूचना - सिग्नल की पुनः संरचना करके इसे मूल संदेश - सिग्नल को पहचान सकने योग्य रूप में लाता है ताकि संदेश प्राप्तकतार् को पहुँचाया जा सके। संचार के दो मूल ढंग हैंः ¯बदु से ¯बदु तक संचार, तथा प्रसारण। ¯बदु से ¯बदु तक संचार विध्ि में एक एकल प्रेष्िात्रा तथा एक अभ्िाग्राही के बीच के संयोजन ;स्पदांहमद्ध से होकर संचार होता है। इस विध्ि के संचार का एक उदाहरण टेलीप़्ाफोन व्यवस्था है। इसके विपरीत, प्रसारण विध्ि में किसी एकल प्रेष्िात्रा के तदनुरूपी बहुत से अभ्िाग्राही होते हैं। प्रसारण विध्ि द्वारा संचार के उदाहरण रेडियो तथा टेलीविजन हैं। 15ण्3 इलेक्ट्राॅनिक संचार व्यवस्थाओं में उपयोग होने वाली मूल शब्दावली अब तक हम वुफछ पदों ;शब्दोंद्ध जैसे सूचना स्रोत, प्रेष्िात्रा, अभ्िाग्राही, चैनल, नाॅयश ;रवद्ध, आदि से परिचित हो चुके हैं। यदि हम निम्नलिख्िात मूल शब्दावली से परिचित हो जाएँ तो हमें किसी भी संचार व्यवस्था को समझना आसान हो जाएगा। ;पद्ध ट्रान्सड्यूसर रू कोइर् युक्ित जो ऊजार् के एक रूप को किसी दूसरे रूप में परिवतिर्त कर देती है उसे ट्रांसड्यूसर कहते हैं। इलेक्ट्राॅनिक संचार व्यवस्थाओं में हमें प्रायः ऐसी युक्ितयों से व्यवहार करना होता है जिनका या तो निवेश अथवा निगर्त विद्युतीय रूप में होता है। किसी विद्युतीय ट्रांसड्यूसर को इस प्रकार परिभाष्िात किया जाता है - ऐसी युक्ित जो वुफछ भौतिक चरों ;दाब, विस्थापन, बल, जगदीश चंद्र बोस ;1858 दृ 1937द्ध उन्होंने परालघु वैद्युत - चुंबकीय तरंगों के जनन के लिए एक उपकरण बनाया और उसके अ(र् प्रकाशीय गुणों का अध्ययन किया। ऐसा कहा जाता है कि वे गैलेना जैसे अ(र्चालक को वैद्युत - चुंबकीय तरंगों के स्वतः पुनप्रार्प्त संसूचक के रूप में उपयोग करने वाले पहले व्यक्ित थे। बोस ने बि्रटिश पत्रिाका दि इलैक्ट्रीश्िायन के 27 दिसंबर 1995 के अंक में तीन लेख प्रकाश्िात किए। 13 दिसंबर 1901 को माकोर्नी के पहले बेतार के संचार से दो वषर् से भी अध्िक पहले बोस के आविष्कार के बारे में 27 अप्रैल 1899 की राॅयल सोसाइटी की कायर्वाही में भी लेख प्रकाश्िात हो चुका था। बोस ने ऐसे अतिसंवेदी उपकरणों का आविष्कार किया जिनके द्वारा जीवित प्राण्िायों पर बाह्य उद्दीपकों की अतिसूक्ष्म प्रतििया को संसूचित किया जा सकता था। इनके द्वारा उन्होंने जंतु एवं वानस्पतिक ऊतकों में समांतरता स्थापित की। ताप आदिद्ध को अपने निगर्त पर तदनुरूपी विद्युतीय सिग्नल के चरों में रूपांतरित कर देते हैं। ;पपद्ध सिग्नल रू प्रेषण के लिए उपयुक्त वैद्युत रूप में रूपांतरित सूचना को सिग्नल या संकेत कहते हैं। सिग्नल या तो अनुरूप ;।दंसवहद्ध अथवा अंकीय ;क्पहपजंसद्ध हो सकते हैं। अनुरूप सिग्नल वोल्टता अथवा धरा के सतत् विचरण होते हैं। ये अनिवायर्तः समय के एकल मान वाले पफलन होते हैं। ज्या तरंग ;ैपदम ूंअमद्ध एक मूल अनुरूप सिग्नल होती है। सभी अन्य अनुरूप सिग्नलों को इनके ज्या तरंग अवयवों के पदों में पूणर्तः समझा जा सकता है। टेलीविशन के ध्वनि तथा दृश्य सिग्नल प्रकृति में अनुरूप सिग्नल होते हैं। अंकीय सिग्नल वे होते हैं जो क्रमवार विविक्त मान प्राप्त कर सकते हैं। अंकीय इलेक्ट्राॅनिकी में विस्तृत रूप में उपयोग होने वाली द्विआधरी प(ति में किसी सिग्नल के केवल दो स्तर होते हैं। ष्0ष् निम्न वोल्टता धरा स्तर के तदनुरूपी है तो ष्1ष् उच्च वोल्टता - धारा स्तर के तदनुरूपी होता है। अंकीय संचार के लिए उपयोगी बहुत सी कोडन प(तियाँ हैं। इनमें संख्या प्रणालियों के उपयुक्त संयोजनों जैसे द्विआधरी कोडित दशमलव ;ठपदंतल ब्वकमक क्मबपउंस या ठब्क्द्ध’ का उपयोग किया जाता है। संख्याओं, अक्षरों तथा निश्िचत लक्षणों को निरूपित करने वाला सावर्जनिक रूप से लोकपि्रय अंकीय कोड श्।उमतपबंद ैजंदकंतक ब्वकम वित प्दवितउंजपवद प्दजमतबींदहम ;।ैब्प्प्द्ध’’ है। ;पपपद्ध रव: रव से हमारा तात्पयर् उन अवांछनीय सिग्नलों से है जो किसी संचार व्यवस्था में संदेश सिग्नलों के प्रेषण तथा संसाध्न में विक्षोभ का प्रयास करते हैं। रव उत्पन्न करने का स्रोत व्यवस्था के बाहर अथवा भीतर स्िथत हो सकता है। ;पअद्ध प्रेष्िात्रा: प्रेष्िात्रा प्रवेशी संदेश सिग्नल को संसाध्ित करके चैनल से होकर प्रेषण तथा इसके पश्चात अभ्िाग्रहण के लिए उपयुक्त बनाता है। ;अद्ध अभ्िाग्राही: कोइर् अभ्िाग्राही चैनल के निगर्त पर प्राप्त सिग्नल से वांछनीय संदेश सिग्नलों को प्राप्त करता है। ;अपद्ध क्षीणता: माध्यम से संचरण के समय सिग्नल की प्रबलता में क्षति को क्षीणता कहते हैं। ;अपपद्ध प्रवध्र्न: यह किसी इलेक्ट्राॅनिक परिपथ जिसे प्रवध्र्क ;संदभर् अध्याय 14द्ध कहते हैं, के उपयोग से सिग्नल आयाम ;और पफलस्वरूप उसकी तीव्रताद्ध में वृि करने की प्रिया है। संचार व्यवस्था में क्षीणता के कारण होने वाले क्षय की क्षतिपूतिर् के लिए प्रवध्र्न आवश्यक है। अतिरिक्त सिग्नल प्रबलता के लिए आवश्यक ऊजार् क्ब् विद्युत ड्डोत से प्राप्त सिग्नल है। प्रवधर्न, ड्डोत तथा लक्ष्य के बीच उस स्थान पर किया जाता है जहाँ सिग्नल की प्रबलता, अपेक्ष्िात प्रबलता से दुबर्ल हो जाती है। ’ ठब्क् में किसी अंक को प्रायः चार द्विआधरी ;0 या 1द्ध बिटों द्वारा निरूपित किया जाता है। उदाहरण के लिए दशमलव प्रणाली में अंकों 0ए 1ए 2ए 3ए 4 को 0000ए 0001ए 0010ए 0011 तथा 0100ण् 1000 के द्वारा निरूपित करते हैं। 1000 आठ को निरूपित करता है। ;अपपपद्ध परास रू यह स्रोत तथा लक्ष्य के बीच की वह अध्िकतम दूरी है जहाँ तक सिग्नल को उसकी पयार्प्त प्रबलता से प्राप्त किया जाता है। ;पगद्ध बैंड चैड़ाइर् रू बैड चैड़ाइर् से हमारा तात्पयर् उस आवृिा परास से है जिस पर कोइर् उपकरण प्रचालित होता है अथवा स्पेक्ट्रम के उस भाग से होता है जिसमें सिग्नल की सभी आवृिायाँ विद्यमान हैं। ;गद्ध माॅडुलन रू अनुभाग 15ण्7 में दिए गए कारणों के अनुसार निम्न आवृिा के मूल सिग्नलों ;संदेशों / सूचनाओंद्ध को अध्िक दूरियों तक प्रेष्िात नहीं किया जा सकता। इसीलिए प्रेष्िात्रा पर, निम्न आवृिा के संदेश सिग्नलों की सूचनाओं को किसी उच्च आवृिा की तरंग पर अध्यारोपित कराया जाता है जो सूचना के वाहक की भाँति व्यवहार करती है। इस प्रिया को माॅडुलन कहते हैं। जैसा कि आगे चचार् की जाएगी माॅडुलन कइर् प्रकार के होते हैं जिन्हें संक्षेप में ।डए थ्ड तथा च्ड कहते हैं। ;गपद्ध विमाॅडुलन: इस प्रिया को जिसमें अभ्िाग्राही द्वारा वाहक तरंग से सूचना की पुनः प्राप्ित की जाती है, विमाॅडुलन कहते हैं। यह माॅडुलन के विपरीत प्रिया है। ;गपपद्ध पुनरावतर्क ;त्मचमंजमतद्ध: पुनरावतर्क अभ्िाग्राही तथा पे्रष्िात्रा का संयोजन होता है। पुनरावतर्क प्रेष्िात्रा से सिग्नल चयन करता है, उसे प्रवध्िर्त करता है तथा उसे अभ्िाग्राही को पुनः प्रेष्िात कर देता है। कभी - कभी तो वाहक तरंगों की आवृिा में परिवतर्न भी कर देता है। पुनरावतर्कों का उपयोग चित्रा 15ण्2 में दशार्ए अनुसार किसी संचार व्यवस्था का परास विस्तारित करने के लिए किया जाता है। कोइर् संचार उपग्रह वास्तव में अंतरिक्ष में एक चित्रा 15ण्2 संचार के परास में वृि के लिए परावतर्क स्टेशन का उपयोग। 15ण्4 सिग्नलों की बैंड - चैड़ाइर् किसी संचार व्यवस्था में संदेश सिग्नल कोइर् आवाज, संगीत, दृश्य अथवा वंफप्यूटर आँकड़ा हो सकता है। उन सिग्नलों में प्रत्येक के आवृिा परास भ्िान्न होते हैं। किसी दिए गए सिग्नल की संचार प्रिया को जिस प्रकार की संचार व्यवस्था चाहिए वह उस आवृिा बैंड पर निभर्र करती है जो उसके लिए आवश्यक माना जाता है। वाव्फ सिग्नलों के लिए 300 भ््र से 3100 भ््र का आवृिा परास उपयुक्त माना जाता है। अतः वाव्फ सिग्नलों को व्यापारिक टेलीप़्ाफोन संचार के लिए 2800 भ््र ;3100 भ््र दृ 300 भ््रद्ध बैंड चैड़ाइर् चाहिए। संगीत के प्रेषण के लिए वाद्य यंत्रों द्वारा उच्च आवृिायों के स्वर उत्पन्न करने के कारण, लगभग 20 ाभ््र की बैंड चैड़ाइर् की आवश्यकता होती है। आवृिा का श्रव्य परिसर 20 भ््र से 20 ाभ््र तक है। दृश्यों के प्रसारण ;प्रेषणद्ध के लिए वीडियो सिग्नलों को 4ण्2 डभ््र बैंड चैड़ाइर् की आवश्यकता होती है। ज्ट सिग्नलों में दृश्य तथा श्रव्य दोनों अवयव होते हैं तथा उनके प्रेषण के 1ण्5 वोल्टता 1 0ण्5 0 दृ0ण्5 दृ1 दृ1ण्5 पिछले अनुच्छेद में हमने केवल अनुरूप सिग्नलों पर ही विचार किया है। अंकीय सिग्नल चित्रा 15ण्3 में दशार्ए अनुसार आयताकार तरंग की आकृति के होते हैं। यह दशार्या जा सकता है कि आयताकार तरंग का अपघटन ;वियोजनद्ध νए 2νए 3νए4ν ण्ण्ण् दνआवृिायों की ज्यावक्रीय00000 तरंगों के अध्यारोपण के रूप में किया जा सकता है। यहाँ द एक पूणा±क है जिसे अनंत तक विस्तरित किया जा सकता है तथा ν0 त्र 1ध्ज्0 है। इस तथ्य की व्याख्या के लिए एक ही आरेख में मूल आवृिा ;ν0द्धय मूल आवृिा ;ν0द्ध ़ द्वितीय गुणावृिा ;2ν0द्धए मूल आवृिा ;ν0द्ध ़ द्वितीय गुणावृिा ;2ν0द्ध ़ तृतीय गुणावृिा ;3ν0द्ध दशार्यी गइर् हैं। इस आरेख से यह स्पष्ट है कि आयताकार तरंग को यथाथर् रूप में पुनरुत्पादन करने के लिए हमें सभी गुणावृिायों ν0ए 2ν0ए 3ν0ए 4ν0ण्ण्ण्ए आदि को अध्यारोपित करने की आवश्यकता होगी, जिससे यह ध्वनित होता है कि बैंड की चैड़ाइर् अनंत चाहिए। तथापि व्यावहारिक कायो± के लिए उच्च गुणावृिायों के योगदान की उपेक्षा की जा सकती है जिससे बैंड चैड़ाइर् सीमित हो जाएगी। इसके;ंद्ध आयताकार तरंग मूल आवृिा ; परिणामस्वरूप अभ्िाग्रहीत तरंगें प्रेष्िात;इद्ध 0द्ध ;बद्ध मूल आवृिा ; द्ध ़0 तरंगों की तुलना में विरूपित होंगी।द्वितीय गुणावृिा ;2 द्ध 1 ;कद्ध मूल आवृिा ; द्ध ़ 0 यदि बैंड चैड़ाइर् इतनी अध्िक है किद्वितीय गुणावृिा0 ;2 द्ध़0 तृतीय गुणावृिा ;3 द्ध इसमें वुफछ गुणावृिायाँ समायोजित हो0 सकती हैं तो सूचना की कोइर् क्षति नहीं होती है तथा वुफल मिलाकर आयताकार सिग्नल प्राप्त हो जाता है। इसका कारण यह है कि जितनी उच्चचित्रा 15ण्3 मूल ज्या तरंग तथा इसकी गुणावृिायों के पदों में आयताकार तरंग का सन्िनकटन। गुणावृिा होती है तरंग रूप के लिए इसका योगदान उतना ही कम होता है। 15ण्5 प्रेषण माध्यम की बैंड - चैड़ाइर् संदेश सिग्नलों की ही भाँति विभ्िान्न प्रकार के प्रेषण माध्यमों के लिए भ्िान्न - भ्िान्न बैंड - चैड़ाइर् की आवश्यकता होती है। प्रेषण में सामान्यतः उपयोग किए जाने वाले माध्यम - तार, मुक्त आकाश, तथा प्रकाश्िाक - तंतु केबल हैं। समाक्षी केबल व्यापक रूप से उपयोग होने वाला तार माध्यम है जो लगभग 750 डभ््र की बैंड - चैड़ाइर् प्रदान करता है। इस प्रकार का केबल सामान्यतः 18 ळभ््र आवृिा से नीचे प्रचालित होता है। रेडियो तरंगों का उपयोग करके मुक्त आकाश से आवृिायों के एक विस्तृत परिसर ;वुफछ सहड्ड ाभ््र से वुफछ ळभ््र तकद्ध में संचार होता है। इस आवृिा परिसर को तालिका 15ण्2 में दशार्ए अनुसार पिफर से विभाजित कर विविध् सेवाएँ प्रदान करने के लिए आवंटित किया जाता है। तंतुओं का प्रयोग करके प्रकाश्िाक संचार, आवृिा परिसर 1 ज्भ््र से 1000 ज्भ््र तक ;सूक्ष्म तरंगों से पराबैंगनी तकद्ध, संपन्न किया जाता है। एक प्रकाश्िाक तंतु 100 ळभ््र से अध्िक की संचार बंैड - चैड़ाइर् प्रदान कर सकता है। एक अंतरार्ष्ट्रीय समझौते के परिणामस्वरूप, स्पेक्ट्रम की विभ्िान्न बैंड - चैड़ाइयों का आवंटन किया गया है। आवृिा आवंटन की वतर्मान व्यवस्था का संचालन अंतरार्ष्ट्रीय दूरसंचार यूनियन ;प्दजमतदंजपवदंस ज्मसमबवउउनदपबंजपवद न्दपवद या प्ज्न्द्ध करती है। सेवा आवृिा बैंड टिप्पणी 540.1600 ाभ््रमानक ।ड प्रसारण थ्ड प्रसारण 88.108 डभ््र टभ्थ् ;अति उच्च आवृिाद्ध ज्ट 54.72 डभ््रटेलीविशन 76.88 डभ््र न्भ्थ् ;परा उच्च आवृिाद्ध 420.890 डभ््र 174.216 डभ््र ज्ट सेल्यूलर मोबाइल रेडियो मोबाइल से आधर स्टेशन के लिए896.901 डभ््र 840.935 डभ््र आधर स्टेशन से मोबाइल के लिए उपग्रह संचार उपरिलिंक5ण्925.6ण्425 ळभ््र 3ण्7.4ण्2 ळभ््र अधेलिंक 15ण्6 वैद्युतचुंबकीय तरंगों का संचरण रेडियो तरंगों का उपयोग करने वाले संचार में एक सिरे पर प्रेष्िात्रा होता है जिसका ऐंटीना वैद्युत - चुंबकीय तरंगें विकरित करता है, जो अंतरिक्ष में गमन करती हुइर् दूसरे सिरे पर स्िथत अभ्िाग्राही के ऐंटीना पर पहुँचती हैं। जैसे - जैसे वैद्युतचुंबकीय तरंगें प्रेष्िात्रा से दूर होती जाती है वैसे - वैसे इनकी तीव्रता कम होती जाती है। वैद्युतचुंबकीय तरंगों के संचरण तथा गमनपथ को कइर् कारक प्रभावित करते हैं। यहाँ पर पृथ्वी के वातावरण की संरचना को समझना भी महत्त्वपूणर् है क्योंकि वैद्युत - चुंबकीय तरंगों के संचरण में इसकी सिय भूमिका है। सारणी 15ण्3 में वायुमंडल की वुफछ उपयोगी सतहों का संक्ष्िाप्त विवरण दिया गया है। 15ण्6ण्1 भू - तरंगें सिग्नलों को उच्च दक्षता से विकिरित करने के लिए ऐंटीना का साइश सिग्नल की तरंगदैघ्यर् λ के तुलनीय ;कम से कम ् λध्4द्ध होना चाहिए। लंबी तरंगदैघ्यो± ;अथार्त निम्न आवृिायोंद्ध के लिए ऐंटीना के भौतिक साइश बड़े होते हैं तथा उन्हें पृथ्वी के पृष्ठ पर अथवा इसके बहुत पास लगाया जाता है। मानक आयाम - माॅडुलित ;।डद्ध प्रसारण में भू - आधरित ऊध्वार्ध्र स्तंभों ;टाॅवरद्ध का व्यापक उपयोग प्रेषण ऐंटीना की भाँति होता है। इस प्रकार के ऐंटीना से सिग्नल के प्रसारण पर भूमि का प्रबल प्रभाव होता है। संचरण की इस विध्ि को पृष्ठीय तरंग संचरण कहते हैं तथा यह तरंग पृथ्वी की पृष्ठ पर विसपर्ण करती है। यह तरंग पृथ्वी के जिस भाग से गुजरती है उस पर धरा प्रेरित करती है तथा पृथ्वी द्वारा ऊजार् के अवशोषण के कारण तरंग क्षीण होती जाती है। आवृिा में वृि के साथ पृष्ठीय तरंगों की क्षीणता में तीव्रता से वृि होती है। अतः प्रेष्िात की जा सकने वाली आवृिा का अध्िकतम परास प्रेष्िात शक्ित तथा इसकी आवृिा ;वुफछ डभ््र से कमद्ध पर निभर्र करता है। 521 सारणी 15ण्3 वायुमंडल की विभ्िान्न सतहें तथा उनकी संचरित वैद्युतचुंबकीय तरंगों से अन्योन्य िया स्तर ;सतहद्ध का नाम पृथ्वी के पृष्ठ से सन्िनकट तुंगता अस्ितत्व की अवध्ि सवार्ध्िक प्रभावित आवृिायाँ 10 ाउक्षोभ मंडल दिन व रात अति उच्च आवृिा ;कइर् ळभ््र तकद्ध क् ;समताप मंडल 65.75 ाउ केवल दिन निम्न आवृिा परावतिर्तऋ वुफछ अंशआ का भागद्ध तक मध्य आवृिा तथा उच्चय आवृिायाँ अवशोष्िातन म्ए ;समताप मंडल 100 ाउ केवल दिन पृष्ठीय तरंगों का सहायक, उच्च मंका भागद्ध आवृिायाँ परावतिर्त डथ्1 ;मध्यमंडल 170.190 ाउ दिन के समय, उच्च आवृिायों का आंश्िाक लका भागद्ध रात्रिा में थ्2 के अवशोषण करते हुए भी उन्हें थ्2 साथ विलीन तक पहुँचने देनाके भा दिन व रातथ्2 ;थमोर्स्पफीयरद्ध रात्रिा में 300 ाउ दिन के उच्च आवृिा तरंगों का दक्षतापूवर्क ग समय 250.400 ाउ परावतर्न, विशेषकर रात्रिा के समय 15ण्6ण्2 व्योम तरंगें वुफछ डभ््र से 30 से 40 डभ््र के आवृिा परिसर में अध्िक दूरी का संचार, रेडियो तरंगों के आयनमंडली परावतर्न द्वारा पुनः पृथ्वी पर वापस लौटने के कारण संभव हो पाता है। इस प्रकार के संचरण को व्योम तरंग संचरण कहते हैं तथा इसका उपयोग लघुतरंग प्रसारण सेवाओं द्वारा किया जाता हैं। इसे आयनमंडल कहने का कारण यह है कि क्योंकि यहाँ आयन अथवा आवेश्िात कण अत्यिाक संख्या में होते हैं। यह आकाश में पृथ्वी के पृष्ठ से ् 65 ाउ से लगभग 400 ाउ ऊँचाइर् तक पैफला हुआ है। जब सूयर् से उच्च ऊजार्युक्त विकिरण तथा पराबैंगनी किरणें वायु के संपवर्फ में आती हैं तो वायु के अणु आयनित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त आयनमंडल कइर् परतों में विभाजित होता है, जिसे विस्तार से सारणी 15ण्3 में दशार्या गया है। आयनन की मात्रा तंुगता ;ऊँचाइर्द्ध पर निभर्र करती है। वायुमंडल का घनत्व ऊँचाइर् बढ़ने पर घटता है। अध्िक ऊँचाइयों पर सौर विकिरण तीव्र होते हैं परंतु आयनित होने के लिए वुफछ ही अणु उपलब्ध् होते हैं। भू - पृष्ठ के समीप यद्यपि आण्िवक सांद्रता ;घनत्वद्ध कापफी अध्िक होता है, परंतु विकिरणों की तीव्रता कम होने के कारण यहाँ आयनन कम होता है। तथापि, माध्य ऊँचाइयों की वुफछ स्िथतियों पर आयनन घनत्व के उच्च मान पाए जाते हैं। आयनमंडलीय परत, 3 डभ््र से 30 डभ््र परिसर की आवृिायों के लिए परावतर्क की भाँति कायर् करती है। 30 डभ््र से उच्च आवृिा की वैद्युतचुंबकीय तरंगें, आयनमंडल का भेदन करके पलायन कर जाती हैं। यह परिघटना चित्रा 15ण्4 में दशार्यी गइर् है। वैद्युतचुंबकीय तरंगों के बंकन की परिघटना जिसके पफलस्वरूप वे पृथ्वी के पृष्ठ की ओर मोड़ दी जाती है, प्रकाश्िाकी के पूणर् आंतरिक परावतर्न के सदृश ही है।’ 522 ’ मिराज की परिघटना से तुलना करें। कज् त्र 2त्ी ज् थ्2 आयनमंडली थ्1 परतें म् क् चित्रा 15ण्4 व्योम तरंग संचरण। सारणी 15ण्3 में परतों का नामकरण दिया गया है। 15ण्6ण्3 आकाश तरंग आकाश तरंगों द्वारा प्रसारण रेडियो तरंगों के प्रसारण का एक अन्य ढंग है। आकाश - तरंग, प्रेषण - ऐंटीना से अभ्िाग्राही - ऐंटीना तक सरल रेखीय पथ पर गमन करती है। आकाश तरंगों का उपयोग दृष्िटरेखीय रेडियो संचरण ख्सपदम.व.िेपहीज ;स्व्ैद्ध तंकपव बवउउनदपबंजपवद, के साथ ही साथ उपग्रह संचार में भी किया जाता है। 40 डभ््र से अध्िक आवृिायों पर संचार केवल दृष्िटरेखीय ;स्व्ैद्ध रेडियो संचरण द्वारा ही संभव है। इन आवृिायों पर ऐंटीना का साइश अपेक्षाकृत छोटा होता है तथा इसे पृथ्वी के पृष्ठ से कइर् तरंगदैघ्यो± की ऊँचाइर् पर स्थापित किया जा सकता है। स्व्ै प्रकृति का संचार होने के कारण, चित्रा 15ण्5 में दशार्ए अनुसार, पृथ्वी की वक्रता के कारण सीध्ी तरंगंे किसी ¯बदु पर अवरोध्ित हो जाती हैं। यदि सिग्नल को क्ष्िातिज से परे प्राप्त करना है तो अभ्िाग्राही ऐंटीना काप़्ाफी अध्िक ऊँचाइर् पर स्थापित किया जाना चाहिए ताकि वह स्व्ै तरंगों को बीच में रोक सके। चित्रा 15ण्5 आकाश तरंगों द्वारा दृष्िटरेखीय संचार। यदि प्रेषक ऐंटीना ीज् ऊँचाइर् पर है, तो आप यह दशार् सकते हैं कि क्ष्िातिज की दूरी कज् का मान होगा, यहाँ त् पृथ्वी की वक्रता त्रिाज्या ;लगभग 6400 ाउद्ध है। कज् को प्रेषक ऐंटीना का रेडियो क्ष्िातिज भी कहते हैं। चित्रा 15ण्5 के संदभर् में, पृथ्वी के पृष्ठ से ीज् तथा ीत् ऊँचाइर् वाले दो ऐंटीना के बीच की अिाकतम दृष्िटरेखीय दूरी इस प्रकार व्यक्त की जा सकती है - ;15ण्1द्ध टेलीविशन प्रसारण, माइक्रोवेव - ¯लक तथा सेटेलाइट संचार उन संचार प्रणालियों के वुफछ उदाहरण हैं जो आकाश तरंग प्रसारण ढंग का उपयोग करती है। चित्रा 15ण्6 में अब तक तरंग संचरण की वण्िार्त विविध् विध्ियों का सारांश दिया गया है। चित्रा 15ण्6 वैद्युतचुंबकीय तरंगों के संचरण की विविध् विध्ियाँ। उदाहरण 15ण्1 किसी मीनार के शीषर् पर स्थापित प्रेषक ऐंटीना की ऊँचाइर् 32 उ तथा अभ्िाग्राही ऐंटीना की ऊँचाइर् 50 उ है। स्व्ै विध में संतोषजनक संचार के लिए दोनों ऐंटीना के बीच की अध्िकतम दूरी क्या है? ;पृथ्वी की त्रिाज्या त्र 6400 ाउद्ध हल 510 × 50 उ त्र 15ण्7 माडुलन तथा इसकी आवश्यकता जैसा कि पहले वणर्न किया जा चुका है कि किसी संचार व्यवस्था का उद्देश्य सूचना अथवा संदेश सिग्नलों को प्रेष्िात करना है। संदेश सिग्नलों को आधर बैंड सिग्नल भी कहते हैं जो आवश्यक रूप से उस मूल सिग्नल द्वारा निरूपित आवृिा बैंड को निदिर्ष्ट करता है, जिसे सूचना स्रोत द्वारा प्रदान किया गया है। व्यापक रूप से कोइर् भी सिग्नल एकल आवृिा का ज्यावक्र नहीं होता, वरन वह एक आवृिा परिसर, जिसे सिग्नल बैंड चैड़ाइर् कहते हैं, में पैफला होता है। मान लीजिए हम श्रव्य आवृिा ;।नकपव तिमुनमदबल या ।थ्द्ध के किसी इलेक्ट्राॅनिक सिग्नल ;जिसकी आधर बैंड आवृिा 20 ाभ््र से कम है।द्ध को किसी लंबे परास की दूरी पर सीध्े ही प्रेष्िात करना चाहते हैं। आइए, यह ज्ञात करें कि वे कौन - कौन से कारक हैं जो हमें ऐसा करने से रोकते हैं तथा हम उन पर 524 वैफसे पार पाते हैं। 15ण्7ण्1 ऐंटीना अथवा ऐरियल का साइश किसी सिग्नल को प्रेष्िात करने के लिए हमें किसी ऐंटीना या ऐरियल की आवश्यकता होती है। कोइर् ऐंटीना उस सिग्नल में समय के साथ होने वाले परिवतर्न उचित रूप से संवेदन कर सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि उस ऐंटीना का साइश उस सिग्नल से संब( तरंगदैघ्यर् ;λद्ध के तुलनीय हो ;साइश कम से कम λध्4 होद्ध। 20 ाभ््र आवृिा की किसी वैद्युतचुंबकीय तरंग की तरंगदैघ्यर् λ त्र15 ाउ होती है। स्पष्ट है कि इस लंबाइर् के तुलनीय साइश का ऐंटीना निमिर्त करना तथा प्रचालित करना संभव नहीं है। अतः ऐसे आधर - बैंड सिग्नलों का सीध प्रेषण व्यावहारिक नहीं है। यदि प्रेषण आवृिा उच्च ;उदाहरणाथर्, यदि ν त्र1 डभ््र है तो λ त्र 300 उद्ध हो, तो उपयुक्त लंबाइर् के ऐंटीना द्वारा प्रेषण संभव हो सकता है। अतः हमारे न्यून आवृिा आधर बैंड सिग्नल में निहित सूचना को किसी उच्च रेडियो आवृिायों में प्रेषण से पूवर् रूपांतरित ;जतंदेसंजमद्ध करने की आवश्यकता होती है। 15ण्7ण्2 किसी ऐंटीना द्वारा प्रभावी शक्ित विकिरण किसी रेखीय ऐंटीना ;लंबाइर् त्र सद्ध से होने वाले विकिरण का सै(ांतिक अध्ययन यह दशार्ता है कि ऐंटीना द्वारा विकरित शक्ित ;सध्λद्ध2 के अनुक्रमानुपाती होती है। इसका तात्पयर् यह है कि ऐंटीना की समान लंबाइर् के लिए, तरंगदैघ्यर् λ के घटने पर ;अथार्त आवृिा में वृि होने परद्ध विकिरित शक्ित में वृि हो जाती है। अतः किसी लंबी तरंगदैघ्यर् के आधर - बैंड सिग्नल द्वारा प्रभावी शक्ित विकिरण कम होती है। अतः किसी अच्छे प्रेषण के लिए हमें उच्च शक्ित चाहिए और इसीलिए यह तथ्य हमें प्रेषण के लिए उच्च आवृिा के उपयोग की आवश्यकता दशार्ता है। 15ण्7ण्3 विभ्िान्न प्रेष्िात्रों से प्राप्त सिग्नलों का मिश्रण आधर - बैंड संकेतों के सीध्े प्रसारण ;प्रेषणद्ध के विरु( एक अन्य महत्त्वपूणर् तवर्फ अध्िक व्यावहारिक है। मान लीजिए बहुत से व्यक्ित एक ही समय बातचीत कर रहे हैं अथवा एक ही क्षण कइर् प्रेष्िात्रा आधर - बैंड सूचना सिग्नल प्रेष्िात कर रहे हैं। ये सभी सिग्नल एक - दूसरे के साथ मिल जाते हैं तथा इनमें विभेदन करने का कोइर् सरल उपाय नहीं हैं। यह संभावित हल के रूप में उच्च आवृिायों पर एक ऐसे संचार के उपयोग की ओर संकेत करता है, जिसमें प्रत्येक संदेश सिग्नल के प्रेषण के लिए आवृिायों का एक बैंड आवंटित किया जाता है। ;ंद्ध उपरोक्त तवर्फ यह सुझाता है कि न्यून आवृिा के मूल आधर बैंड पल्स ;स्पंदद्ध या सूचना सिग्नल का प्रेषण से पूवर् किसी उच्च आवृिा तरंग में रूपांतरण आवश्यक है। यह रूपांतरण प्रिया इस प्रकार की होनी चाहिए कि रूपांतरित सिग्नल में उन सभी सूचनाओं का समावेश रहे जो मूल सिग्नल में समाहित थी। ऐसा करने के लिए हम किसी उच्च आवृिा सिग्नल, जिसे वाहक तरंग कहते हैं, की सहायता लेते हैं। वह प्रिया जिसके द्वारा वाहक तरंग के साथ सूचना को संलग्न किया ;इद्ध जाता है माॅडुलन कहलाती है। वाहक तरंग सतत ;ज्यावक्रीयद्ध अथवा चित्रा 15ण्7 ;ंद्ध ज्यावक्रीय तथा ;इद्ध स्पंद ;पल्सद्ध स्पंद के रूप में चित्रा 15ण्7 में दशार्ए अनुसार हो सकती है। आकृति सिग्नल। किसी ज्यावक्रीय वाहक तरंग को इस प्रकार निरूपित किया जा सकता है। ब;जद्ध त्र ।ब ेपद ;ω बज ़ φद्ध ;15ण्2द्ध 525यहाँ ब;जद्ध सिग्नल तीव्रता ;वोल्टता अथवा धराद्ध, ।ब आयाम, ω ब ; त्र 2πν बद्ध कोणीय आवृिा तथा φ वाहक तरंग की आरंभ्िाक कला है। माॅडुलन की प्रिया में इन तीनों प्राचलों में से वाहक तरंग के किसी भी एक प्राचल ।ब ए ωब तथा φ को संदेश अथवा सूचना सिग्नल द्वारा नियंत्रिात किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप तीन प्रकार के माॅडुलन होते हैंः ;पद्ध आयाम माॅडुलन ;।डद्धय ;पपद्ध आवृिा माॅडुलन ;थ्डद्धय तथा ;पपपद्ध कला माॅडुलन ;च्डद्ध जैसा कि चित्रा 15ण्8 में दशार्या गया है। चित्रा 15ण्8 किसी वाहक तरंग का माॅडुलनः ;ंद्ध ज्यावक्रीय वाहक तरंग, ;इद्ध माॅडुलक सिग्नल ;बद्ध आयाम माॅडुलन, ;कद्ध आवृिा माॅडुलन तथा ;मद्ध कला माॅडुलन इसी प्रकार किसी स्पंद के तीन महत्वपूणर् लक्षण होते हैंः स्पंद आयाम, स्पंद अवध्ि अथवा स्पंद चैड़ाइर्, तथा स्पंद स्िथति ;जो स्पंद के आयाम में वृि या गिरावट के काल को निदिर्ष्ट करती हैद्ध जिन्हें चित्रा15ण्7;इद्ध में दशार्या गया है। अतः स्पंद माडुलन के विभ्िान्न प्रकार है: ;ंद्ध स्पंद आयाम माडुलन ;च्।डद्धए ;इद्ध स्पंद अवध्ि माडुलन ;च्क्डद्ध अथवा स्पंद चैड़ाइर् माडुलन ;च्ॅडद्धए तथा ;बद्ध स्पंद स्िथति माडुलन ;च्च्डद्ध। इस अध्याय के अंतगर्त हम अपनी चचार् को आयाम माडुलन तक ही सीमित रखेंगे। 15ण्8 आयाम माडुलन आयाम माडुलन में वाहक तरंग के आयाम में सूचना सिग्नल के अनुसार परिवतर्न होता है। यहाँ पर किसी ज्यावक्रीय सिग्नल को माडुलक सिग्नल के रूप में उपयोग करके, हम आयाम माडुलन प्रिया को स्पष्ट करेंगे। मान लीजिए ब;जद्ध त्र ।ेपद ω ज वाहक तरंग को निरूपित करती है, तथा उ;जद्ध त्र ।ेपद ω ज बब उउ माडुलक सिग्नल अथवा संदेश को निरूपित करती है जबकि, ω उ त्र 2πउि संदेश सिग्नल की कोणीय आवृिा है। तब माडुलित सिग्नल बउ ;जद्ध को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है। ब ;जद्ध त्र ;। ़ । ेपद ω जद्ध ेपद ω ज उ बउउब ⎛⎞।⎜ उ ⎟ त्र । 1 ़ ेपद ω ज⎟ ेपद ω ज ब ⎜ उ ⎟ब ;15ण्3द्ध⎜⎟⎝ ।ब ⎠ ध्यान दीजिए, अब संदेश सिग्नल माडुलित सिग्नल में अंत£वष्ट है। इसे चित्रा 15ण्8;बद्ध में भी देखा जा सकता है। समीकरण ;15ण्3द्ध से हम यह लिख सकते हैं, 526 ;द्ध । ेपद ज । ेपद ज ेपद ;15ण्4द्धबज जउबबबउ ब यहाँ - त्र ।उध्।ब माडुलन सूचकांक है। विरूपण से बचाव के लिए व्यवहार में - ≤ 1 रखा जाता है। त्रिाकोणमितीय संबंध् ेपद। ेपदठ त्र ) ख्बवे;। दृ ठद्ध दृ बवे ;। ़ ठ, का उपयोग करके हम समीकरण 15ण्4 के बउ ;जद्ध को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं। - ।ब - ।ब;द्ध त्र । ेपद ω ज ़ बवे; ω −ω द्धज − बवे; ω ़ω द्धबज ज उ बब बउ बउ ;15ण्5द्ध22 यहाँ पर ;ω दृω द्ध तथा ;ω ़ ω द्ध को क्रमशः निम्न पाश्वर् आवृिा तथा उच्च पाश्वर् आवृिा कहतेब उब उहैं। इस प्रकार अब माडुलित सिग्नल में ω ब आवृिा की वाहक तरंग के साथ दो ज्यावक्रीय तरंगें, जिनकी आवृिायाँ से वुफछ भ्िान्न होती हैं, और जिन्हें पाश्वर् बैंड कहते हैं, अंत£वष्ट होती हैं। चित्रा 15ण्9 में माडुलित सिग्नल का आवृिा स्पेक्ट्रम दशार्या गया है। चित्रा 15ण्9 किसी आयाम माडुलित सिग्नल का आयाम व ω के बीच ग्राप़्ाफ। जब तक प्रसारित आवृिायाँ ;वाहक तरंगेंद्ध पयार्प्त दूरियों पर रखी जाती हैं ताकि पाश्वर् बैंड एक दूसरे पर अतिव्यापित न हों, विभ्िान्न स्टेशन एक दूसरे में बिना बाध पहुँचाए प्रचालित हो सकते हैं। उदाहरण 15ण्2 10 ाभ््र आवृिा तथा 10 ट श्िाखर वोल्टता के संदेश सिग्नल का उपयोग किसी 1 डभ््र आवृिा तथा 20 ट श्िाखर वोल्टता की वाहक तरंग को माडुलित करने में किया गया है। ;ंद्ध माडुलन सूचकांक तथा ;इद्ध उत्पन्न पाश्वर् बैंड ज्ञात कीजिए। हल ;ंद्ध माडुलन सूचकांक त्र10ध्20 त्र 0ण्5 ;इद्ध पाश्वर् बैंड ;1000़10द्ध ाभ््र त्र1010 ाभ््र तथा ;1000दृ10 ाभ््रद्ध त्र 990 ाभ््र पर हैं। 15ण्9 आयाम माडुलित तरंग को उत्पन्न करना आयाम माडुलन उत्पन्न करने के विविध् ढंग हो सकते हैं। चित्रा 15ण्10 में ब्लाॅक आरेख में इसकी एक सरल संकल्पनात्मक विध्ि दशार्यी गइर् है। चित्रा 15ण्10 ।ड सिग्नल प्राप्त करने के लिए सरल माडुलक का ब्लाॅक आरेख। यहाँ सिग्नल ग ;जद्ध को उत्पन्न करने के लिए माडुलक सिग्नल । उ ेपद ω उ ज को वाहक सिग्नल । ेपद ω ज में मिलाया जाता है। इस सिग्नल ग ;जद्ध त्र । ेपदω ज ़ । ेपद ω ज को पिफर वगर्बब उ उब ब नियम युक्ित, जो कि एक अरैख्िाक युक्ित है, से गुशारते हैं। इस प्रकार उत्पन्न निगर्त है: ल ;जद्ध त्र ठग ;जद्ध ़ ब्ग2;जद्ध ;15ण्6द्ध यहाँ ठ तथा ब् नियतांक हैं। इस प्रकार ल ;जद्धत्र ठ। ेपद ω ज ़ ठ। ेपद ω ज़ उउ बब ब्ख् ।2 ेपद2ω ज ़ ।2 ेपद2ω ज़2। । ेपदω ज ेपदω ज, ;15ण्7द्धउ उब बउब उ ब त्र ठ। ेपद ω ज ़ ठ। ेपद ω ज उउ बब 22 2ब्। 2 ब्। ब्। उउ ब बउ ब़़ । दृ बवे2 ω ज दृ बवे2 ω ज 22 2 ़ ब्। । बवे ;ω दृ ω द्ध ज दृ ब्। । बवे ;ω ़ ω द्ध ज ;15ण्8द्धउ ब बउउ ब ब उयहाँ पर, त्रिाकोणमितीय संबंधें ेपद2। त्र ;1 दृ बवे2।द्धध्2 तथा ेपद। ेपदठ के लिए संबंध्, जिसे पहले भी उपयोग किया जा चुका है, का उपयोग किया गया है। 22समीकरण ;15ण्8द्ध एक कब पद ब्ध्2 ;। ़ । द्ध तथा आवृिायों ω ए 2ω ए ω ए 2ωωउब उउबबएब दृ ω उएω ब ़ ω उ के ज्यावक्र हैं जैसा कि चित्रा 15ण्10 में दशार्या गया है। इस सिग्नल को बैंड पारक पिफल्टर’ से गुशारते हैं जो कब अवयव तथा आवृिायों ω उ ए 2ω उ तथा 2ω ब के ज्यावक्रों का निराकरण करके ω ए ω दृ ω ए ω ़ ω आवृिायों को प्रतिधरित कर लेता है। इस प्रकार बैंड पारकबब उब उ पिफल्टर का निगर्त का समीकरण ;15ण्5द्ध के समान रूप होता है, अतः यह एक ।ड तरंग होती है। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि माडुलित सिग्नल को ऐसे ही प्रेष्िात नहीं किया जा सकता। माडुलक का अनुगमन एक शक्ित प्रवध्र्क करता है जो सिग्नल को आवश्यक शक्ित प्रदान करता है। इस प्रकार प्राप्त माडुलित सिग्नल का संभरण किसी उपयुक्त साइश के ऐंटीना को किया जाता है जो चित्रा 15ण्11 में दशार्ए अनुसार सिग्नल को विकिरित कर देता है। चित्रा 15ण्11 प्रेष्िात्रा का ब्लाॅक - आरेख। 15ण्10 आयाम माडुलित तरंग का संसूचन चैनल से प्रसारण में प्रेष्िात संदेश क्षीण हो जाता है। अतः अभ्िाग्राही ऐंटीना किसी प्रवधर्क तथा संसूचक का अनुगमन करता है। साथ ही, संसाध्न की सुविध के लिए वाहक आवृिा को प्रायः किसी मध्य आवृिा ;प्थ्द्ध चरण पर संसूचन से पूवर् निम्न आवृिा में परिवतिर्त कर लेते हैं। संसूचित ’ बैंड पारक पिफल्टर न्यून तथा उच्च आवृिायों का निराकरण कर देता है तथा आवृिायों के एक बैंड को 528 गुशरने देता है। सिग्नल इतना प्रबल नहीं होता कि उसका उपयोग किया जा सके, अतः उसे प्रवध्िर्त करने की आवश्यकता होती है। चित्रा 15ण्12 में किसी प्ररूपी अभ्िाग्राही का ब्लाॅक - आरेख दशार्या गया है। चित्रा 15ण्12 अभ्िाग्राही का ब्लाॅक - आरेख। संसूचन वह प्रिया है जिसके द्वारा माडुलित वाहक तरंग से माडुलिक सिग्नल की पुनः प्राप्ित की जाती है। हमने अभी यह देखा था कि माडुलित वाहक तरंग में ω तथा ω ±ω आवृिायाँ होतीब ब उ हैं। इससे आवृिा ω उ वाले कोणीय मूल संदेश सिग्नल उ;जद्ध को प्राप्त करने की एक सरल विध्ि चित्रा 15ण्13 में ब्लाॅक - आरेख के रूप में दशार्यी गइर् है। चित्रा 15ण्13 ।ड सिग्नल के संसूचक का ब्लाॅक - आरेख। ल.अक्ष के लिए भौतिक राश्िा वोल्टता अथवा धारा हो सकती है। माडुलित सिग्नल, जिसका रूप चित्रा 15ण्13;ंद्ध में दशार्या गया है, दिष्टकारी से गुशारा जाता है जिसके पफलस्वरूप ;इद्ध में दशार्ए अनुसार निगर्म प्राप्त होता है। सिग्नल ;इद्ध का यह एन्वेलप ही मूल सिग्नल है। सिग्नल उ;जद्ध की पुनः प्राप्ित के लिए इस संदेश सिग्नल ;इद्ध को एन्वेलप संसूचक ;जो एक सरल त्ब् परिपथ होता हैद्ध से गुशारा जाता है। इस अध्याय में हमने संचार तथा संचार व्यवस्थाओं की वुफछ मूल संकल्पनाओं के विषय में चचार् की है। इसमें हमने एक विश्िाष्ट प्रकार के अनुरूप माडुलन - आयाम माडुलन ;।डद्ध के विषय में भी चचार् की है। माडुलन के अन्य प्रकारों तथा अंकीय संचार व्यवस्था की भी आध्ुनिक संचार में महत्वपूणर् भूमिका है। इस क्षेत्रा में प्रतिदिन अन्य उत्तेजनापूणर् विकास कायर् हो रहे हैं। अब तक हमने अपनी चचार् को वुफछ मूल संचार व्यवस्थाओं तक ही सीमित रखा है। इस अध्याय को समाप्त करने से पहले हम आपको आध्ुनिक समय की वुफछ उन संचार व्यवस्थाओं की झलक दिखाना चाहते हैं जिनसे हमारे दैनिक जीवन में सूचनाओं के आदान - प्रदान के ढंग में आमूलचूल परिवतर्न उत्पन्न हो गया है। सारांश 1ण् इलेक्ट्राॅनिक संचार का तात्पयर् सूचना अथवा संदेशों ;जो वैद्युत वोल्टता या धरा के रूप में उपलब्ध् होते हैंद्ध को एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु तक विश्वसनीय ढंग से स्थानांतरित करना है। 2ण् किसी संचार व्यवस्था के तीन मूल एकक - संप्रेषक, संप्रेषण - चैनल, तथा अभ्िाग्राही होते हैं। 3ण् संचार व्यवस्था के दो महत्वपूणर् प्रकार अनुरूप तथा अंकीय संचार हैं। अनुरूप संचार में प्रसारित की जाने वाली सूचना व्यापक रूप से संतत तरंगवत होती है, जबकि अंकीय संचार में मात्रा विविक्त अथवा क्वांटित स्तर के होते हैं। 4ण् प्रत्येक संदेश सिग्नल का एक आवृिा परिसर होता है। किसी संदेश सिग्नल की बैंड - चैड़ाइर् का तात्पयर् उस आवृिा - बैंड से होता है जो उस संदेश सिग्नल में अंत£वष्ट सूचना संतोषजनक प्रेषण के लिए आवश्यक होता है। इसी प्रकार कोइर् भी व्यावहारिक संचार - व्यवस्था आवृिा के केवल किसी परिसर को ही प्रेषण का अवसर प्रदान करती है और इसी को उस संचार व्यवस्था की बैंड - चैड़ाइर् कहा जाता है। 5ण् निम्न आवृिायों को लंबी दूरी तक संप्रेष्िात नहीं किया जा सकता है। अतः इसे एक विशेष प्रिया जिसे माडुलन कहते हैं, के द्वारा किसी उच्च आवृिा के वाहक सिग्नल पर अध्यारोपित किया जाता है। 6ण् माडुलन में वाहक सिग्नल के वुफछ लक्षण जैसे आयाम, आवृिा अथवा कला, माडुलक अथवा संदेश सिग्नल के अनुरूप परिवतिर्त हो जाते हैं। तदनुसार विभ्िान्न माडुलित तरंगों को आयाम माडुलित ;।डद्धए आवृिा माडुलित ;थ्डद्धए अथवा कला माडुलित ;च्डद्ध तरंग कहते हैं। 7ण् स्पंद माडुलन का वगीर्करण इस प्रकार किया जाता है: स्पंद आयाम माडुलन ;च्।डद्धए स्पंद अवध्ि माडुलन ;च्क्डद्ध अथवा स्पंद चैड़ाइर् माडुलन ;च्ॅडद्धए तथा स्पंद स्िथति माडुलन ;च्च्डद्ध 8ण् लंबी दूरियों तक संप्रेषण के लिए सिग्नलों को आकाश में वुफछ युक्ितयों के द्वारा विकिरित किया जाता है जिन्हें ऐंटीना कहते हैं। ये विकिरित सिग्नल वैद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में प्रसारित होते हैं तथा उनके प्रसारण की विध को पृथ्वी तथा इसका वायुमंडल प्रभावित करता है। पृथ्वी के पृष्ठ के निकट वैद्युतचुंबकीय तरंगें पृष्ठीय तरंगों के रूप में प्रसारित होती हैं। पृष्ठीय प्रसारण वुफछ डभ््र आवृिायों तक ही उपयोगी होता है। 9ण् पृथ्वी के किन्हीं दो ¯बदुओं के बीच लंबी दूरी का संचार आयनमंडल द्वारा वैद्युतचुंबकीय तरंगों के परावतर्न द्वारा संभव हो पाता है। इस प्रकार की तरंगों को व्योम तरंगें कहते हैं। व्योम तरंगों का प्रसारण लगभग 30 डभ््र आवृिा तक ही हो सकता हैं। इस आवृिा से अिाक आवृिा की वैद्युतचुंबकीय तरंगें अनिवायर् रूप से आकाश तरंगों के रूप में प्रसारित होती है। आकाश तरंगों का उपयोग दृष्िटरेखीय संचार तथा उपग्रह संचार में होता है। 10ण् यदि कोइर् ऐंटीना ीज् ऊँचाइर् से वैद्युतचुंबकीय तरंगें विकिरित करता है, तो उसके परिसर कज् को 2त्ी ज् द्वारा व्यक्त किया जाता है, यहाँ त् पृथ्वी की त्रिाज्या है। 11ण् आयाम माडुलित सिग्नल में ;ω दृω द्धए ω ब तथा ;ω ़ω द्धण् आवृिायाँ होती हैं।ब उ बउ 12ण् संदेश सिग्नल तथा वाहक तरंग को किसी अरैख्िाक युक्ित पर अनुप्रयुक्त करके तथा पिफर उसे बैंड पारक पिफल्टर से गुजारकर, आयाम माडुलित सिग्नल प्राप्त किया जाता है। 13ण् ।ड संसूचन किसी ।ड तरंग रूप से माडुलक सिग्नल की पुनः प्राप्ित की वह प्रिया है जिसके संचालन में किसी दिष्टकारी तथा एन्वेलप संसूचक का उपयोग किया जाता है। विचारणीय विषय 1ण् संदेश/सूचना सिग्नल के संप्रेषण तथा अभ्िाग्रहण की प्रिया में सिग्नल के साथ नाॅयज ;रवद्ध जुड़ जाता है। क्या आप इस नाॅयज के वुफछ स्रोत बता सकते हैं? 2ण् माडुलन की प्रिया में नयी आवृिायाँ जिन्हें पाश्वर्बैंड कहते हैं, वाहक तरंग आवृिा के दोनों ओर ;वाहक आवृिा से अध्िक तथा कमद्ध उत्पन्न हो जाते हैं। इनका परिमाण अध्िकतम माडुलक आवृिा के बराबर होता है। क्या ;ंद्ध केवल पाश्वर्बैंडों, ;इद्ध केवल एक पाश्वर्बैंड को प्रेष्िात करके संदेश की पुनःप्राप्ित संभव हो सकती है? 3ण् आयाम माडुलन में माडुलन सूचकांक - ≤ 1 का उपयोग किया जाता है। यदि - झ 1हो तो क्या होगाघ् अभ्यास 15ण्1 व्योम तरंगों के उपयोग द्वारा क्ष्िातिज के पार संचार के लिए निम्नलिख्िात आवृिायों में से कौन सी आवृिा उपयुक्त रहेगी? ;ंद्ध 10 ाभ््र ;इद्ध 10 डभ््र ;बद्ध 1 ळभ््र ;कद्ध 1000 ळभ््र 15ण्2 न्भ्थ् परिसर की आवृिायों का प्रसारण प्रायः किसके द्वारा होता है? ;ंद्ध भू - तरंगें ;इद्ध व्योम तरंगें ;बद्ध पृष्ठीय तरंगें ;कद्ध आकाश तरंगें 15ण्3 अंकीय सिग्नल: ;पद्ध मानों का संतत समुच्चय प्रदान नहीं करते। ;पपद्ध मानों को विविक्त चरणों के रूप में निरूपित करते हैं। ;पपपद्ध द्विआधरी प(ति का उपयोग करते हैं। ;पअद्ध दशमलव के साथ - साथ द्विआधरी प(ति का भी उपयोग करते हैं। उपरोक्त प्रकथनों में कौन से सत्य हैं? ;ंद्ध केवल ;पद्ध तथा ;पपद्ध ;इद्ध केवल ;पपद्ध तथा ;पपपद्ध ए ;बद्ध ;पद्धए ;पपद्ध तथा ;पपपद्ध परन्तु ;पअद्ध नहीं ;कद्ध ;पद्धए ;पपद्धए ;पपपद्ध तथा ;पअद्ध सभी 15ण्4 दृष्िटरेखीय संचार के लिए क्या यह आवश्यक है कि प्रेषक ऐंटीना की ऊँचाइर् अभ्िाग्राही ऐंटीना की ऊँचाइर् के बराबर हो? कोइर् ज्ट प्रेषक ऐंटीना 81 उ ऊँचा है। यदि अभ्िाग्राही ऐंटीना भूस्तर पर है तो यह कितने क्षेत्रा में सेवाएँ प्रदान करेगा? 15ण्5 12 ट श्िाखर वोल्टता की वाहक तरंग का उपयोग किसी संदेश सिग्नल के प्रेषण के लिए किया गया है। माडुलन सूचकांक 75ः के लिए माडुलक सिग्नल की श्िाखर वोल्टता कितनी होनी चाहिए घ् 15ण्6 चित्रा 15ण्14 में दशार्ए अनुसार कोइर् माडुलक सिग्नल वगर् तरंग है। चित्रा 15ण्14 दिया गया है कि वाहक तरंग बज ;द्ध त्र 2ेपद;8 πजद्धट ;पद्ध आयाम माडुलित तंरग रूप आलेख्िात कीजिए। ;पपद्ध माडुलन सूचकांक क्या हैघ् 15ण्7 किसी माडुलित तरंग का अध्िकतम आयाम 10ट तथा न्यूनतम आयाम 2ट पाया जाता है। माडुलन सूचकांक - का मान निश्िचत कीजिए। यदि न्यूनतम आयाम शून्य वोल्ट हो तो माडुलन सूचकांक क्या होगा? 15ण्8 आथ्िार्क कारणों से किसी ।ड तरंग का केवल ऊपरी पाश्वर् बैंड ही प्रेष्िात किया जाता है, परंतु ग्राही स्टेशन पर वाहक तरंग उत्पन्न करने की सुविध होती है। यह दशार्इए कि यदि कोइर् ऐसी युक्ित उपलब्ध् हो जो दो सिग्नलों की गुणा कर सके, तो ग्राही स्टेशन पर माडुलक सिग्नल की पुनःप्राप्ित संभव है।

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