अध्याय 14 अध्र्चालक इलेक्ट्राॅनिकी - पदाथर्, युक्ितयाँ तथा सरल परिपथ 14ण्1 भूमिका ऐसी युक्ितयाँ जिनमें इलेक्ट्राॅनों का नियंत्रिात प्रवाह प्राप्त किया जा सके, सभी इलेक्ट्राॅनिक परिपथों की मूलभूत रचना खंड होती हैं। सन् 1948 में ट्रांजिस्टर की खोज से पहले ऐसी युक्ितयाँ अिाकांशतः निवार्त नलिकाएँ ;या वाल्वद्ध थीं, जैसे निवार्त डायोड जिसमें दो इलेक्ट्रोडऋ एनोड ;प्लेटद्ध तथा वैफथोड होते हैंऋ ट्रायोड जिसमें तीन इलेक्ट्रोड - वैफथोड, प्लेट तथा गि्रड होते हैंऋ टेट्रोड तथा पेंटोड ;क्रमशः 4 तथा 5 इलेक्ट्रोडों के साथद्ध। किसी निवार्त नलिका में इलेक्ट्राॅनों की आपूतिर् एक तप्त वैफथोड द्वारा की जाती है तथा इसके विभ्िान्न इलेक्ट्रोडों के बीच वोल्टता को परिवतिर्त करके निवार्त में इन इलेक्ट्राॅनों का नियंत्रिात प्रवाह प्राप्त किया जाता है। अंतरा - इलेक्ट्रोडी स्थान ;पदजमत.मसमबजतवकम ेचंबमद्ध में इलेक्ट्राॅनों के प्रवाह के लिए निवार्त आवश्यक होता है, अन्यथा गतिमान इलेक्ट्राॅन अपने पथ में वायु के अणुओं से टकराकर अपनी उफजार् खो सकते हैं। इन युक्ितयों में इलेक्ट्राॅन केवल वैफथोड से एनोड की ओर प्रवाहित कर सकते हैं ;अथार्त इलेक्ट्राॅन केवल एक ही दिशा में प्रवाहित हो सकते हैंद्ध। यही कारण है कि ऐसी युक्ितयों को साधरणतया वाल्व कहते हैं। निवार्त नलिकाओं से बनी युक्ितयाँ आकार में बड़ी होती हंै, अध्िक शक्ित का उपभोग करती हैं तथा प्रचालन में सामान्यतः उच्च वोल्टता ;्100 टद्ध की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इनका जीवनकाल अपेक्षावृफत कम तथा विश्वसनीयता भी कम होती है। आधुनिक ठोस - अवस्था अधर्चालक इलेक्ट्राॅनिकी ;ैवसपक ैजंजम ेमउप.बवदकनबजवत मसमबजतवदपबेद्ध का प्रादुभार्व सन् 1930 में इस आभास से किया गया कि वुफछ ठोस अवस्था अधर्चालक तथा उनकी संिायों में यह संभावना होती है कि उनमें आवेश वाहकों की संख्या तथा उनके प्रवाह की दिशा को नियंत्रिात किया जा सकता है। प्रकाश, उफष्मा तथा अल्प अनुप्रयुक्त वोल्टता जैसे उत्तेजक किसी अध्र्चालक भौतिकी में गतिमान आवेशों की संख्या परिव£तत कर सकते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अध्र्चालक युक्ितयों में आवेश वाहकों की आपू£त तथा प्रवाह स्वयं ठोस के भीतर ही होता है, जबकि पहले प्रयोग होने वाली निवार्त नलिकाओं/वाल्वों में गतिमान इलेक्ट्राॅनों को तप्त वैफथोड से प्राप्त किया जाता था तथा निवार्तित स्थानों अथवा निवार्त में प्रवाहित कराया जाता था। अध्र्चालक युक्ितयों में बाहरी तापन अथवा अध्िक निवार्तित स्थान की आवश्यकता नहीं होती है। यह आकार में छोटी होती हैं, कम शक्ित का उपभोग करती हैं, कम वोल्टता पर काम करती हैं, इनका जीवन लंबा होता है और इनकी विश्वसनीयता अच्छी होती है। आध्ुनिक युक्ितयों में तो निवार्तित नलिकाओं के सि(ांत पर कायर् करने वाली वैफथोड किरण ट्यूबों ;ब्त्ज्द्ध जिनका उपयोग टेलीविशन सेटों तथा वंफप्यूटर माॅनीटरों में किया जाता है, ठोसावस्था इलेक्ट्राॅनिकी ;ैवसपक ैजंजम मसमबजतवदेद्ध परिपथों के साथ संलग्न लिक्वड िस्टल डिसप्ले ;स्ब्क्ए द्रव िस्टल प्रदशर्द्ध माॅनीटरों द्वारा प्रतिस्थापित की जा रही हैं। अधर्चालक युक्ितयों को औपचारिक रूप से समझे जाने से भी बहुत पहले प्रवृफति में पाए जाने वाले गैलेना ;लैड सल्पफाइड च्इैद्ध के एक िस्टल जिसके साथ धतु का एक संपवर्फ ¯बदु संयोजित था, का उपयोग रेडियो तरंगों के संसूचक के रूप में किया जा चुका था। निम्नलिख्िात अनुभागों में हम अध्र्चालक भौतिकी की वुफछ मूल अवधरणाओं से परिचय कराएँगे तथा संध्ि डायोड ;श्रनदबजपवद कपवकमद्ध ;2.इलेक्ट्रोडों की युक्ितद्ध तथा द्विध्ु्रवीय संध्ि ;ठपचवसंत रनदबजपवदद्ध ट्रांजिस्टर ;3.इलेक्ट्रोडों की युक्ितद्ध जैसी वुफछ अध्र्चालक युक्ितयों की चचार् करेंगे। इन युक्ितयों के अनुप्रयोगों को दशार्ने वाले वुफछ परिपथों का वणर्न भी करंेगे। 14ण्2 धतुओं, चालकों तथा अध्र्चालकों का वगीर्करण चालकता के आधर पर विद्युत चालकता ;σद्ध अथवा प्रतिरोधकता ;ρ त्र 1ध्σद्ध के सापेक्ष मान के आधार पर ठोस पदाथो± का निम्न प्रकार से वगीर्करण किया जाता है: ;पद्ध धातु: इनकी प्रतिरोधकता बहुत कम ;अथवा चालकता बहुत अिाकद्ध होती है। ρ ् 10दृ2 दृ 10दृ8 Ω उ σ ् 102 दृ 108 ै उदृ1 ;पपद्ध अधर्चालक: इनकी प्रतिरोधकता या चालकता धातुओं तथा विद्युतरोधी पदाथो± के बीच की होती है। ρ ् 10दृ5 दृ 106 Ω उ σ ् 105 दृ 10दृ6 ै उदृ1 ;पपपद्ध विद्युतरोधी: इनकी प्रतिरोधकता बहुत अिाक ;अथवा चालकता बहुत कमद्ध होती है। ρ ् 1011 दृ 1019 Ω उ σ ् 10दृ11 दृ 10दृ19 ै उदृ1 ऊपर दिए गए ρ तथा σ के मान केवल कोटि मान के सूचक हैं और दिए गए परिसर के बाहर भी जा सकते हैं। धातु, विद्युतरोधी पदाथर् तथा अधर्चालकों के बीच भेद करने के लिए प्रतिरोधकता का सापेक्ष मान ही मात्रा एक मापदंड नहीं है। वुफछ दूसरे अंतर भी हैं, जो जैसे - जैसे हम इस अध्याय में आगे बढ़ेंगे, स्पष्ट होते जाएँगे। इस अध्याय में हमारी रुचि अधर्चालकों के अध्ययन में है जो कइर् प्रकार के हो सकते हैं। ;पद्ध तात्िवक अध्र्चालक ;म्समउमदजंस ेमउपबवदकनबजवतेद्ध - ैप और ळम ;पपद्ध यौगिक अध्र्चालक - उदाहरण हैं: ऽ अकाबर्निक - ब्कैए ळं।ेए ब्कैमए प्दच्ए आदि। ऽ काबर्निक - एंथ्रासीन, मादित ;क्वचमकद्ध थैलोस्यानीस, आदि। काबर्निक बहुलक ;व्तहंदपब चवसलउमतेद्ध - पाॅलीपाइरोल, पाॅलीऐनिलीन, पाॅलीथायोपफीऩऽ आदि। आजकल उपलब्ध् अिाकांश अधर्चालक युक्ितयाँ तात्िवक अधर्चालक ैप या ळम और यौगिक अकाबर्निक अधर्चालकों पर ही आधारित हैं। परंतु सन् 1990 के बाद काबर्निक अधर्चालक और अधर्चालकी बहुलकों का उपयोग करके वुफछ अधर्चालकी युक्ितयों का विकास हुआ जिससे भविष्य के लिए बहुलक इलेक्ट्राॅनिकी तथा आण्िवक इलेक्ट्राॅनिकी की प्रौद्योगिकी के प्रादुभार्व के संकेत मिलते हैं। इस अध्याय में हम केवल अकाबर्निक अधर्चालक, विशेषकर तात्िवक अध्र्चालकों ैप तथा ळम के अध्ययन तक ही सीमित रहेंगे। तात्िवक अध्र्चालकों की विवेचना के लिए यहाँ जिन सामान्य अवधरणाओं को प्रस्तावित किया गया है वे किसी - न - किसी रूप में अध्िकांश यौगिक अधर्चालकों पर लागू होती हैं। ऊजार् बैंड के आधर पर बोर परमाणु माॅडल के अनुसार किसी वियुक्त परमाणु में उसके किसी इलेक्ट्राॅन की ऊजार् उस इलेक्ट्राॅन की परिभ्रमण कक्षा पर निभर्र करती है। परंतु जब परमाणु एक - दूसरे के निकट आकर कोइर् ठोस बना लेते हंै तो वे एक - दूसरे के अत्यध्िक निकट हो जाते हैं। अतः निकटस्थ परमाणुओं के इलेक्ट्राॅनों की बाह्य कक्षाएँ अत्यध्िक पास - पास आ जाती हैं और यहाँ तक कि एक - दूसरे को ढक लेती हैं। इसके परिणामस्वरूप किसी ठोस में इलेक्ट्राॅन की गति की प्रवृफति किसी वियुक्त परमाणु के इलेक्ट्राॅन की गति से अत्यध्िक भ्िान्न हो जाती है। किसी िस्टल के भीतर प्रत्येक इलेक्ट्राॅन की अपनी अद्वितीय स्िथति होती है तथा किन्हीं दो इलेक्ट्राॅनों के चारों ओर के आवेशों का पैटनर् यथाथर् रूप में एक जैसा नहीं होता। यही कारण है कि प्रत्येक इलेक्ट्राॅन के ऊजार् स्तर भ्िान्न होते हैं। ये भ्िान्न ऊजार् स्तर जिनमें ऊजार् का संतत परिवतर्न होता रहता है ऊजार् बैंडों का निमार्ण करते हैं। वह ऊजार् स्तर जिसमें संयोजकता इलेक्ट्राॅनों के ऊजार् स्तर समाविष्ट हैं, संयोजकता बैंड ;टंसंदबम इंदकद्ध कहलाता है। संयोजकता बैंड के ऊपर स्िथत बैंड को चालन बैंड ;ब्वदकनबजपवद इंदकद्ध कहते हैं। बिना किसी अतिरिक्त ऊजार् के, सभी संयोजकता इलेक्ट्राॅन संयोजकता बैंड में रहते हैं। यदि चालन बैंड में निम्नतम स्तर चालन बैंड के उच्चतम स्तर से भी नीचे है तो संयोजकता बैंड के इलेक्ट्राॅन आसानी से चालन बैंड में गमन कर सकते हैं। सामान्यतः चालन बैंड रिक्त होता है। परंतु जब यह बैंड संयोजकता बैंड को अतिव्यापित ;ढकताद्ध करता है तो इलेक्ट्राॅन स्वतंत्रातापूवर्क इसके भीतर जा सकते हैं। ऐसा धत्िवक चालकों में होता है। यदि चालन बैंड तथा संयोजकता बैंड के बीच कोइर् रिक्ित ;अंतरालद्ध है, तो संयोजकता बैंड के सभी इलेक्ट्राॅन परिब( होते हैं तथा चालन बैंड में कोइर् मुक्त इलेक्ट्राॅन उपलब्ध् नहीं होता। यह पदाथर् को विद्युतरोध्ी बना देता है। परंतु संयोजकता बैंड के वुफछ इलेक्ट्राॅन बाह्य ऊजार् प्राप्त करके संयोजकता बैंड तथा चालन बैंड के बीच की रिक्ित को पार कर सकते हैं। तब ये इलेक्ट्राॅन चालन बैंड में पहुँच जाते हैं तथा संयोजकता बैंड में रिक्त ऊजार् स्तर उत्पन्न कर देते हैं जिनमें अन्य इलेक्ट्राॅन जा सकते हैं। इस प्रकार यह प्रिया चालन बैंड में इलेक्ट्राॅनों तथा संयोजकता बैंड में रिक्ितकाएँ होने के कारण चालन की संभावना उत्पन्न करती है। आइए, अब हम यह विचार करें कि छ परमाणुओं वाले ैप अथवा ळम िस्टल के प्रकरण में क्या होता है। ैप में बाह्यतम कक्षा, तीसरी कक्षा ;द त्र 3द्ध होती है, जबकि ळम में बाह्यतम कक्षा चैथी कक्षा ;द त्र 4द्ध होती है। इनकी बाह्यतम कक्षा में 4 इलेक्ट्राॅन ;2े और 2च इलेक्ट्राॅनद्ध होते हैं। अतः इस िस्टल में बाह्य इलेक्ट्राॅनों की वुफल संख्या 4छ हुइर्। किसी बाह्यतम कक्षा में अध्िकतम इलेक्ट्राॅनों की संख्या 8 ;2े ़ 6च इलेक्ट्राॅनद्ध होती है। अतः 4छ संयोजकता इलेक्ट्राॅनों के लिए उपलब्ध् ऊजार् स्तर 8छ है। ये 8छ विविक्त ऊजार् स्तर या तो कोइर् संतत बैंड बना सकते हैं अथवा इनका भ्िान्न बैंडों में समूहन हो सकता है, जो िस्टल में परमाणुओं के बीच दूरियों पर निभर्र करता है ¹‘ठोसों का बैंड सि(ांत’ - बाॅक्स देख्िाएह्। ैप तथा ळम के िस्टल जालकों में परमाणुओं के बीच की दूरियों पर, इन 8छ स्तरों का ऊजार् बैंड दो भागों में टूट जाता है, जिनके बीच ऊजार् अंतराल म् ह ;चित्रा 14ण्1द्ध का पृथकन होता है। भौतिकी तापक्रम के परम शून्य पर 4छ संयोजकता इलेक्ट्राॅनों से पूणर्तः घ्िारा निम्न बैंड संयोजकता बैंड होता है। अन्य बैंड जिनमें 4छ ऊजार् स्तर होते हैं उन्हें चालन बैंड कहते हैं, तथा यह परम शून्य पर पूणर्तः रिक्त होता है। चित्रा 14ण्1 देख्िाए। इसमें चालन बैंड में निम्नतम ऊजार् स्तर को म्ब् के रूप में तथा संयोजकता बैंड में उच्चतम ऊजार् स्तर को म्ट के रूप में दशार्या गया है। म्ब् के ऊपर तथा म्ट के नीचे इसमें एक - दूसरे के अत्यध्िक निकट बहुत से ऊजार् स्तर दशार्ए गए हैं। संयोजकता बैंड के शीषर् तथा चालन बैंड की तली के बीच के अंतराल को ऊजार् बैंड अंतराल ;अथवा ऊजार् अंतराल, म्ह द्ध कहते हैं। यह अंतराल पदाथर् की प्रवृफति पर निभर्र करता है। यह अध्िक, कम अथवा शून्य हो सकता है। इन विभ्िान्न स्िथतियों को चित्रा 14ण्2 में दशार्या गया है तथा नीचे इनकी विवेचना की गइर् है। प्रकरण प् रू यह चित्रा 14ण्2;ंद्ध में दशार्यी गइर् चित्रा 14ण्1 0 ज्ञ पर किसी अध्र्चालक में ऊजार् बैंड की स्िथतियाँ,स्िथति के संदभर् में है। यह एक धतु की स्िथति है ऊपरी बैंड जिसे चालन बैंड कहते हैं, में अनंततः विशाल संख्या में,जिसमें चालन बैंड आंश्िाक रूप से भरा है तथा संयोजकता अत्यिाक निकट ऊजार् अवस्थाएँ होती हैं। निचला बैंड जिसे संयोजकताबैंड आंश्िाक रूप से रिक्त है अथवा चालन बैंड तथा बैंड कहते हैं, में अत्यध्िक निकट पूणर्तः भरी ऊजार् अवस्थाएँ होती हैं। संयोजकता बैंड अतिव्याप्त हंै। जब अतिव्यापन होता है तो संयोजकता बैंड से इलेक्ट्राॅन सरलता से चालन बैंड में जा सकते हैं। यह स्िथति विद्युत चालन के लिए अत्यध्िक संख्या में इलेक्ट्राॅन उपलब्ध् करा देती है। जब संयोजकता बैंड आंश्िाक रूप से रिक्त होता है तो इलेक्ट्राॅन इसके निम्न स्तर से उच्च स्तर तक गति करके विद्युत चालन को संभव बना देते हैं। इसीलिए इस प्रकार के पदाथो± का प्रतिरोध् कम अथवा चालकता उच्च होती है। चित्रा 14ण्2 ;ंद्ध धतुओं, ;इद्ध विद्युतरोध्ी तथा ;बद्ध अध्र्चालकों के ऊजार् बैंडों के बीच अंतर। भौतिकी प्रकरण प्प्: इस प्रकरण में जैसा कि चित्रा 14ण्2;इद्ध में दशार्या गया है, इस स्िथति में बैंड अंतराल म्ह अध्िक होता है ;म्ह झ 3 मटद्ध । चालन बैंड में कोइर् इलेक्ट्राॅन नहीं होते। अतः कोइर् विद्युत चालन संभव नहीं होता। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऊजार् अंतराल इतना अध्िक होता है कि किसी भी तापीय उत्तेजन से इलेक्ट्राॅनों को संयोजकता बैंड से चालन बैंड की ओर उत्तेजित नहीं किया जा सकता। यह विद्युतरोध्ी पदाथो± का उदाहरण है। प्रकरण प्प्प्: यह स्िथति 14ण्2;बद्ध में दशार्यी गइर् है। इसमें एक परिमित परंतु लघु बैंड अंतराल ;म्ह ढ 3 मटद्ध होता है। लघु बैंड अंतराल होने के कारण, कमरे के ताप पर, वुफछ इलेक्ट्राॅन संयोजकता बैंड में इतनी ऊजार् अ£जत कर लेते हैं कि ऊजार् अंतराल को पार करके चालन बैंड में पहुँच सकते हैं। ये इलेक्ट्राॅन ;यद्यपि संख्या में कम होते हैंद्ध चालन बैंड में गति कर सकते हैं। अतः अध्र्चालकों का प्रतिरोध् उतना अध्िक नहीं होता जितना विद्युतरोध्ी पदाथो± का होता है। इस अनुभाग में हमने धतुओं, चालकों तथा अध्र्चालकों का व्यापक वगीर्करण किया है। अगले अनुभाग में हम अध्र्चालकों में चालन प्रिया के विषय में सीखेंगे। 14ण्3 नैज अध्र्चालक हम ळम और ैप का सबसे साधारण उदाहरण लेंगे जिनकी जालक ;स्ंजजपबमद्ध रचना चित्रा 14ण्3 में दिखाइर् गइर् है। इन रचनाओं को हीरे जैसी रचना कहते हैं। प्रत्येक परमाणु चार अन्य निकटतम परमाणुओं द्वारा घ्िारा होता है। हम जानते हैं कि ैप और ळम में चार संयोजकता इलेक्ट्राॅन होते हैं। इसकी िस्टलीय रचना में प्रत्येक ैप या ळम परमाणु अपने चार संयोजकता इलेक्ट्राॅनों में से एक - एक इलेक्ट्राॅन को अपने चार निकटतम परमाणुओं के साथ सहभागिता कराने की प्रवृिा रखता है तथा ऐसे प्रत्येक निकटवतीर् परमाणु के एक इलेक्ट्राॅन का सहभाग भी करता है। यही सहभागी इलेक्ट्राॅन युगल सहसंयोजी बंध ;ब्वअंसमदज इवदकद्ध या संयोजकता आबंध ;टंसमदबम इवदकद्ध कहलाते हैं। ऐसा माना जा सकता है कि दोनों सहभाजित इलेक्ट्राॅन उन संबंिात परमाणुओं के बीच आगे - पीछे गति करते रहते हैं, जिससे वे दृढ़ता से बँधे होते हैं। चित्रा 14ण्3 में दिखाइर् गइर् ैप या ळम की संरचना का 2.विमीय निरूपण चित्रा 14ण्4 में व्यवस्थात्मक रूप से दिखाया गया है, जो सहसंयोजी बंध पर अत्यिाक बल देता है। चित्रा 14ण्4 एक आदशर् चित्राण है जिसमें बँध टूटे नहीं हैं ;सभी बँध बने हुए हैंद्ध। ऐसी स्िथति निम्न ताप पर ही बनती है। जैसे - जैसे ताप बढ़ता है, इन इलेक्ट्राॅनों को और उफष्मीय उफजार् प्राप्त होने लगती है जिससे इनमें से वुफछ इलेक्ट्राॅन टूट कर अलग हो सकते हैं ;मुक्त इलेक्ट्राॅन बनकर चालन में योगदान करते हैंद्ध। उफष्मीय उफजार् िस्टलीय जालक के वुफछ परमाणुओं को प्रभावी रूप से आयनीकृत कर देती है तथा बँध में एक रिक्त स्थान बना देती है, जैसा चित्रा 14ण्5 ;ंद्ध में दिखाया गया है। मुक्त इलेक्ट्राॅन ;आवेश दृ ुद्ध जहाँ से निकलकर आया है, वहाँ वह प्रभावी आवेश ;़ ुद्ध का एक रिक्त स्थान छोड़ देता है। प्रभावी धनात्मक आवेश वाला यह रिक्त स्थान एक होल ;ीवसमद्ध कहलाता है। होल प्रभावी धनात्मक आवेश वाले एक आभासी मुक्त कण की तरह व्यवहार करता है। नैज अध्र्चालकों ;प्दजतपदेपब ेमउपबवदकनबजवतद्ध में मुक्त इलेक्ट्राॅनों की संख्या दम होलों की संख्या, दी के बराबर होती है, अथार्त दम त्र दी त्र दप ;14ण्1द्ध यहाँ दप को नैज वाहक सांद्रता कहते हैं। अधर्चालकों में यह अद्वितीय गुण होता है कि उनमें इलेक्ट्राॅनों के साथ - साथ होल भी गति करते हैं। मान लें कि स्थान 1 पर एक होल है जैसा चित्रा 14ण्5 ;ंद्ध में दिखाया गया है। होलों की गति को चित्रा 14ण्5 ;इद्ध में दिखाए ढंग से दृष्िटत किया जा सकता है। नीचे वाले बाईं ओर के सहसंयोजी बंध स्थान 2 से एक इलेक्ट्राॅन रिक्त स्थान 1 ;होलद्ध में वूफद कर जा सकता है। इस प्रकार, ऐसी एक वूफद के बाद, होल स्थान 2 पर हो गया तथा स्थान 1 में एक इलेक्ट्राॅन आ गया। इसलिए आभासी रूप में तो होल स्थान 1 से स्थान 2 पर चला गया। ध्यान दीजिए कि जो इलेक्ट्राॅन प्रारंभ में मुक्त हुआ था ख्चित्रा 14ण्5 ;ंद्ध देख्िाए ,, वह होल की गति की इस िया में सम्िमलित नहीं है। मुक्त इलेक्ट्राॅन पूणर्तः स्वतंत्रातापूवर्क चालन इलेक्ट्राॅन के रूप में गति करता है और एक विद्युत क्षेत्रा लगाने पर एक इलेक्ट्राॅन धारा ;प् मद्ध देता है। स्मरण रहे कि जब कभी िस्टल में कहीं भी एक अपूरित बंध होगा तब बंिात इलेक्ट्राॅनों की वास्तविक गति होगी और इसका वणर्न करने के लिए होलों चित्रा 14ण्4 ैप या ळम की संरचना का दो - विमीय व्यवस्थात्मककी गति केवल एक सहज उपाय है। किसी वास्तविक िस्टल निरूपण जिसमें निम्न ताप पर सहसंयोजी आबंध् दिखाए गए हैंमें विद्युत क्षेत्रा की िया के पफलस्वरूप यह होल )णात्मक ;सभी बंध् बने हुए, कोइर् टूटा बंध् नहींद्ध। ़4 चिÉ ैप या ळम की विभव की ओर गति करते हैं। इस प्रकार एक होल धारा प्ी भीतरी क्रोड़ को इंगित करता है। मिलती है। उफष्मा से उत्पन्न चालन इलेक्ट्राॅनों के कारण इलेक्ट्राॅन धारा प् म तथा होल धारा प्ी का योग संपूणर् धारा प् होगी - प् त्र प्म ़ प्ी ;14ण्2द्ध यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि चालन इलेक्ट्राॅनों तथा होलों के उत्पन्न होने के साथ - साथ पुनःसंयोजन का प्रक्रम होता है जिसमें इलेक्ट्राॅन होल के साथ पुनःसंयोजित होते हैं। साम्यावस्था में आवेश वाहकों के उत्पन्न होने की दर उनके पुनःसंयोजन की दर के बराबर होती है। इस पुनःसंयोजन का कारण इलेक्ट्राॅनों का होलों से संघ‘ करना है। ैप अथवा ळम;इद्ध;ंद्ध चित्रा 14ण्5 ;ंद्ध मध्यम ताप पर ऊष्मीय ऊजार् के कारण स्थान 1 पर होल तथा चालन इलेक्ट्राॅन के उत्पन्न होने का व्यवस्थापक प्रारूप। ;इद्ध किसी होल की संभावित ऊष्मीय गति का सरलीवृफत निरूपण। नीचे वाले बाएँ हाथ के सहसंयोजी बंध् ;स्थान 2द्ध से एक इलेक्ट्राॅन प्रारंभ्िाक होल स्थान 1 पर चला जाता है और अपने स्थान पर एक होल छोड़ता है। 475इस प्रकार स्थान 1 से स्थान 2 तक होल का आभासी स्थानांतरण इंगित होता है। भौतिकी चित्रा 14ण्6;ंद्ध में दशार्ए अनुसार म्ब् म्ब् ज् त्र 0 ज्ञ पर कोइर् नैज अध्र्चालक किसी विद्युतरोधी की भाँति व्यवहार करता है। म्म् हह यह तापीय ऊजार् ही है जिसके कारण उच्च तापों ;ज् झ 0 ज्ञद्ध पर वुफछ इलेक्ट्राॅन म्ट म्ट उत्तेजित होकर संयोजी बैंड से चालन बैंड में पहँुचते हैं। ज् झ 0 ज्ञ पर तापीय उत्तेजित इलेक्ट्राॅन चालन बैंड में आंश्िाक रूप से स्थान ग्रहण कर लेते हैं। इसीलिए किसी ;ंद्ध ;इद्ध नैज अध्र्चालक का ऊजार् बैंड आरेख चित्रा 14ण्6 ;ंद्ध ज् त्र 0 ज्ञ पर कोइर् नैज अध्र्चालक विद्युतरोध्ी की भाँति व्यवहार चित्रा 14ण्6;इद्ध में दशार्ए अनुसार होता है। करता है। ;इद्ध ज् झ 0 ज्ञ पर चार तापीय उत्पन्न इलेक्ट्राॅन - होल युगल भरे वृत्त ;द्ध इसमें वुफछ इलेक्ट्राॅन चालन बैंड में दशार्ए इलेक्ट्राॅनों को निरूपित करते हैं तथा रिक्त क्षेत्रा ;द्ध होलों को निरूपित करते हैं। गए हैं। ये यहाँ पर संयोजी बैंड से आए हैं तथा समान संख्या में वहाँ होल छोड़ आए हैं। उदाहरण 14ण्1 ब्ए ैप तथा ळम की जालक ;स्ंजजपबमद्ध संरचना समान होती है। पिफर भी क्यों ब् विद्युतरोध्ी है जबकि ैप व ळम नैज अध्र्चालक ;पदजतपदेपब ेमउपबवदकनबजवतद्ध हैं? हल ब्ए ैप तथाळम के परमाणुओं के चार बंध्ित इलेक्ट्राॅन क्रमशः द्वितीय, तृतीय तथा चतुथर् कक्षा में होते हैं। अतः इन परमाणुओं से एक इलेक्ट्राॅन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊजार् ;आयनिक ऊजार् म्हद्ध सबसे कम ळम के लिए, इससे अध्िक ैप के लिए और सबसे अध्िक ब् के लिए होगी। इस प्रकार ळम व ैप में विद्युत चालन के लिए स्वतंत्रा इलेक्ट्राॅनों की संख्या साथर्क होती है जबकि ब् में यह नगण्य होती है। 14ण्4 अपद्रव्यी अध्र्चालक किसी नैज अध्र्चालक की चालकता उसके ताप पर निभर्र करती है, परंतु कक्ष - ताप पर इसकी चालकता बहुत कम होती है। इसी रूप में, कोइर् भी महत्वपूणर् इलेक्ट्राॅनिक युक्ित उन अध्र्चालकों द्वारा विकसित नहीं की जा सकती है। अतः इनकी चालकता में सुधर करना आवश्यक होता है। यह उन अध्र्चालकों में अशुियों का उपयोग करके किया जाता है। जब किसी शु( अध्र्चालक में कोइर् उपयुक्त अशुि अत्यल्प मात्रा में जैसे वुफछ भाग प्रति मिलियन ;चचउद्ध में मिलाइर् जाती है तो उसकी चालकता में कइर् गुना वृि हो जाती है। इस प्रकार के पदाथो± को अपद्रव्यी अध्र्चालक ;म्गजतपदेपब ेमउपबवदकनबजवतद्ध अथवा अशुि अध्र्चालक ;प्उचनतपजल ेमउपबवदकनबजवतद्ध कहते हैं। वांछित अशुि को सावधानीपूवर्क मिश्रित करना मादन ;क्वचपदहद्ध या अपमिश्रण कहलाता है तथा अशुि परमाणु अपमिश्रक ;क्वचंदजेद्ध कहलाते हैं। इस प्रकार के पदाथर् को मादित ;क्वचमकद्ध अध्र्चालक कहते हैं। अपमिश्रक ऐसा होना चाहिए जो मूल अध्र्चालक पदाथर् के जालक को विवृफत न करे। उसे केवल िस्टल में बहुत कम मूल अधर्चालक परमाणु स्िथतियों को ही घेरना चाहिए। इसे प्राप्त करने के लिए एक आवश्यक शतर् यह है कि अपमिश्रक के अणु तथा अध्र्चालक पदाथर् के अणुओं का साइश लगभग समान हो। चतुः संयोजक ैप अथवा ळम के मादन के लिए दो प्रकार के अपमिश्रक उपयोग किए जाते हैं। ;पद्ध पंच संयोजक ;संयोजकता 5द्धऋ जैसे आसेर्निक ;।ेद्धए ऐंटीमनी ;ैइद्धए पफाॅस्पफोरस़ ;च्द्धए आदि। ;पपद्ध त्रिा संयोजक ;संयोजकता 3द्धऋ जैसे इंडियम ;प्दद्धए बोराॅन ;ठद्धए ऐलुमिनियम ;।सद्धए आदि। अब हम यह विवेचना करेंगे कि अपमिश्रण द्वारा किस प्रकार अध्र्चालकों में आवेश वाहकों की संख्या में परिवतर्न होता है जिसके कारण उस अध्र्चालक की चालकता परिव£तत हो जाती है। ैप अथवा ळम आवतर् सारणी के चतुथर् समूह ;वगर्द्ध के सदस्य हैं इसीलिए हम अपमिश्रण के लिए निकट के तीसरे अथवा पाँचवें वगर् के तत्व का चयन यह अपेक्षा करते हुए तथा सावधनी बरतते हुए करते हैं कि अपमिश्रण किए जाने वाले तत्व के परमाणु का साइश ैप अथवा ळम के परमाणु के साइश के लगभग बराबर है। रोचक तथ्य यह है कि मादन के लिए उपयोग होने वाले त्रिासंयोजक तथा पंचसंयोजक तत्व अपमिश्रण के पश्चात एक - दूसरे से पूणर्तः भ्िान्न प्रकार के दो अध्र्चालक पदाथो± का निमार्ण करते हैं जिनका वणर्न नीचे दिया गया है। ;पद्ध द.प्रकार का अध्र्चालक मान लीजिए कि हम ैप या ळम ;संयोजकता 4द्ध को एक पंचसंयोजक ;संयोजकता 5द्ध तत्व से अपमिश्रित करें जैसा चित्रा 14ण्7 में दिखाया गया है। जब ़5 संयोजकता वाला तत्व ैप के एक परमाणु को प्रतिस्थापित करके अपना स्थान ग्रहण करता है तो इसके इलेक्ट्राॅनों में से चार, निकटवतीर् चार सिलिकाॅन परमाणुओं से बंध् बनाते हैं, जबकि पाँचवाँ इलेक्ट्राॅन जनक परमाणु से दुबर्ल बंध् द्वारा जुड़ा रहता है। ऐसा इसलिए चित्रा 14ण्7 ;ंद्ध चतुथर् संयोजी ैप या ळम में पंचसंयोजी दाता परमाणुहै कि पाँचवें इलेक्ट्राॅन के लिए बंध् में भाग लेने वाले चारों ;।ेए ैइए च्ए आदिद्ध के अपमिश्रण से बना द.अध्र्चालक।इलेक्ट्राॅन परमाणु के प्रभावी क्रोड़ के भाग हैं। इसके ;इद्ध द.प्रकार के पदाथर् का साधरणतया प्रयुक्त व्यवस्थात्मकपरिणामस्वरूप इस इलेक्ट्राॅन को मुक्त करने के लिए आवश्यक निरूपण जिसमें प्रतिस्थापी दाता के स्िथर क्रोड़ को केवल एकआयनन ऊजार् बहुत कम होती है और सामान्य कक्ष ताप पर अतिरिक्त प्रभावी ध्नात्मक आवेश और इससे संब( इलेक्ट्राॅन केयह अधर्चालक के जालक में मुक्त गति करने के लिए मुक्त साथ दिखाया गया है। होता है। उदाहरण के लिए, इस इलेक्ट्राॅन को परमाणु से मुक्त करने के लिए जमर्ेनियम में ् 0ण्01 मट तथा सिलिकाॅन में लगभग 0ण्05 मट ऊजार् चाहिए। इसके विपरीत किसी नैज अध्र्चालक में कक्ष ताप पर किसी इलेक्ट्राॅन को व£जत बैंड से स्थानांतरण के लिए ;जमेर्नियम में लगभग 0ण्72 मट तथा सिलिकाॅन में लगभग 1ण्1 मटद्ध ऊजार् चाहिए। इस प्रकार पंचसंयोजक अपमिश्रक विद्युत चालन के लिए एक अतिरिक्त इलेक्ट्राॅन प्रदान करता है और इसीलिए इसे दाता अशुि ;कवदवत पउचनतपजलद्ध कहते हैं। अपमिश्रक परमाणु द्वारा विद्युत चालन के लिए उपलब्ध् कराए गए इलेक्ट्राॅन की संख्या प्रबल रूप से अपमिश्रण पर निभर्र करती है। यह आसपास के ताप पर निभर्र नहीं करती। इसके विपरीत ैप परमाणु द्वारा उत्पन्न मुक्त इलेक्ट्राॅनों की संख्या ;समान संख्या में होलों के साथद्ध में ताप के साथ बहुत कम वृि होती है। किसी अपमिश्रित अध्र्चालक में चालक इलेक्ट्राॅनों की वुफल संख्या दम दाताओं के योगदान तथा निजी कारणों ;ऊष्मा द्वाराद्ध से उत्पन्न इलेक्ट्राॅनों के कारण तथा होलों की वुफल संख्या दी केवल निजी स्रोत द्वारा उत्पन्न होलों के कारण होती है। परंतु होलों के पुनःसंयोजन की दर में वृि इलेक्ट्राॅनों की संख्या में वृि के कारण हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप होलों की संख्या में और कमी हो जाती है। इस प्रकार अपमिश्रण के उचित स्तर से चालक इलेक्ट्राॅनों की संख्या में होलों की संख्या की 477 भौतिकी तुलना में वृि की जा सकती है। अतः पंचसंयोजक अपमिश्रक के साथ अपमिश्रण होने पर किसी नैज अध्र्चालक में इलेक्ट्राॅन बहुसंख्यक आवेश वाहक तथा होल अल्पांश आवेश वाहक बन जाते हैं। इसीलिए इस प्रकार के अध्र्चालकों को द.प्रकार के अधर्चालक कहते हैं। किसी द.प्रकार के अध्र्चालक के लिए दम झझ दी ;14ण्3द्ध ;पपद्ध च.प्रकार के अध्र्चालक च.प्रकार का अध्र्चालक तब बनता है जब ैप या ळम ;चतुथर्संयोजीद्ध में ग्रुप.प्प्प् की त्रिासंयोजी अशुियाँऋ जैसे - ।सए ठए प्द आदि अपमिश्रित की जाती हैं, जैसा चित्रा 14ण्8 में दिखाया गया है। अपमिश्रक में ैप या ळम की अपेक्षा एक बाहरी इलेक्ट्राॅन कम होता है और इसलिए यह परमाणु तीन ओर से ैप परमाणुओं से बंध बना सकता है, लेकिन चैथी ओर बंध बनाने के लिए आवश्यक इलेक्ट्राॅन उपलब्ध् न होने के कारण चैथा बंध् बनाने में सपफल नहीं हो पाता। अतः त्रिासंयोजक परमाणु तथा चैथे निकटस्थ परमाणु के बीच बंध् में एक रिक्ित अथवा होल होता है जिसे चित्रा 14ण्8 में दशार्या गया है। क्योंकि जालक में पड़ोसी ैप परमाणु होल के स्थान पर एक इलेक्ट्राॅन चाहता है, निकट के परमाणु के बाह्य कक्ष का कोइर् इलेक्ट्राॅन इस रिक्ित को भरने के लिए वूफदान भर सकता है जिससे उसके अपने स्थान पर एक होल बन जाता है। यही होल चालन के लिए उपलब्ध् रहता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि, त्रिासंयोजी विजातीय परमाणु पड़ोसी ैप परमाणु के साथ इलेक्ट्राॅन की साझेदारी करके प्रभावतः )णात्मक आवेश्िात हो जाता है, तथा इसके सभी संयोजी बंध पूरे हो जाते हैं। इसलिए साधारण भाषा में प्रायः च दृपदाथर् के अपमिश्रक परमाणु को अपने संब( होल के साथ एक )णात्मक आवेश का क्रोड़ कहा जाता है, जैसा चित्रा 14ण्8;इद्ध चित्रा 14ण्8 ;ंद्ध चतुथर्संयोजी ैप या में दिखाया गया है। यह स्पष्ट है कि एक ग्राही परमाणु ;छ।द्ध एक होल देता है। यहळम के जालक में त्रिासंयोजी ग्राही होल नैज जनित होलों के अतिरिक्त है जबकि चालन इलेक्ट्राॅनों का ड्डोत केवल नैज परमाणु ;प्दए ।सए ठ आदिद्ध के जनन ही है। इस प्रकार, ऐसे पदाथर् के लिए, होल बहुसंख्यक वाहक तथा इलेक्ट्राॅन अपमिश्रण से बना च .प्रकार का अल्पसंख्यक वाहक हैं। इसीलिए त्रिासंयोजक अशुि से अपमिश्रित नैज अध्र्चालक अधर्चालक। ;इद्ध च .प्रकार के पदाथर् का साधारणतया प्रयुक्त होने वाला च.प्रकार के अध्र्चालक कहलाते हैं। च.प्रकार के अध्र्चालकों में पुनःसंयोजन प्रिया, व्यवस्थात्मक निरूपण जो एक प्रभावी नैज जनित इलेक्ट्राॅनों की संख्या दप घट कर दम हो जाती है। अतः च.प्रकार के अतिरिक्त )णात्मक आवेश के साथ अधर्चालकों के लिए प्रतिस्थापी ग्राही परमाणु की स्िथर क्रोड़ दझझ द ;14ण्4द्धीम तथा उससे संब( होल को दिखाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि िस्टल एक समग्र )णात्मक उदासीनता बनाए रखता है क्योंकि अतिरिक्त आवेश वाहकों पर आवेश की मात्रा जालक में आयनीवृफत क्रोड़ों पर आवेश की मात्रा के ही समान एवं विपरीत होती है। अपद्रव्यी अध्र्चालकों में बहुसंख्यक धरा वाहकों की प्रचुरता के कारण तापन द्वारा उत्पन्न अल्पांश वाहकों के लिए बहुसंख्यक वाहकों से मिलने के अध्िक अवसर होते हैं और इस प्रकार वे नष्ट हो जाते हैं। इसीलिए अपमिश्रक एक प्रकार के अध्िक धरा वाहकों को मिलाने से, जो बहुसंख्यक वाहक बन जाते हैं, अप्रत्यक्ष रूप में अल्पांश वाहकों की नैज सांद्रता को घटाने में सहायता करते हैं। अपमिश्रण द्वारा अध्र्चालकों की ऊजार् बैंड संरचना प्रभावित होती है। बाह्य अध्र्चालकों के प्रकरण में दाता अशुियों के कारण अतिरिक्त ऊजार् अवस्था ;म्क्द्ध तथा ग्राही अशुियों के कारण अतिरिक्त ऊजार् अवस्था ;म्।द्ध भी होती है।द.प्रकार केैप अध्र्चालकों के ऊजार् बैंड आरेख में दाता ऊजार् स्तर म्क् चालक बैंड की तली म्से वुफछ नीचे होता है तथा इस स्तर से वुफछ इलेक्ट्राॅन बहुत478 ब् कम ऊजार् की आपू£त होने पर चालन बैंड में प्रवेश कर जाते हैं। कक्ष ताप पर अध्िकांश दाता परमाणु आयनीवृफत हो जाते हैं, परंतुैप के अति अल्प ;्10दृ12द्ध परमाणु ही आयनीवृफत होते हैं। अतः चित्रा 14ण्9;ंद्ध में दशार्ए अनुसार चालन बैंड में अध्िकांश इलेक्ट्राॅन दाता अशुियों से ही आते हैं। इसी प्रकार च.प्रकार के अध्र्चालकों में ग्राही ऊजार् स्तर म्। संयोजी बैंड के शीषर् से वुफछ ऊपर होता है ख्चित्रा 14ण्9;इद्ध देख्िाए ,। बहुत कम ऊजार् आपू£त होने पर भी संयोजी बैंड से कोइर् इलेक्ट्राॅन म्। के स्तर पर वूफदान भर लेता है और उसे ग्राही को )णात्मक आयनित कर देता है। ¹विकल्प के रूप में हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि बहुत कम ऊजार् की आपू£त से होल ऊजार् स्तर म्से संयोजी बैंड में गमन कर सकता है। ऊजार् प्राप्त करने पर इलेक्ट्राॅन ऊपर की ओर आते हैं जबकि । होल नीचे की ओर आते हैं।ह् सामान्य कक्ष ताप पर अध्िकांश ग्राही परमाणु आयनीवृफत हो जाते हैं तथा संयोजी बैंड में होल बच जाते हैं। इस प्रकार कक्ष ताप पर संयोजी बैंड में होलों का घनत्व प्रमुख रूप में अपद्रव्यी अध्र्चालकों में अशुि के कारण होता है। तापीय साम्य में अध्र्चालकों में इलेक्ट्राॅनों तथा होलों की सांद्रता इस प्रकार व्यक्त की जाती है ददत्र द2 ;14ण्5द्धमी प यद्यपि उपरोक्त विवरण समग्र रूप से सन्िनकट तथा परिकल्िपत है परंतु यह सरल ढंग से धातुओं, विद्युतरोध्ियों तथा अध्र्चालकों ;नैज तथा अपद्रव्यीद्ध में अंतर को समझने में सहायक है। ब्ए ैप तथा ळम की प्रतिरोध्कताओं में अंतर इनके चालन तथा संयोजी बैंडों के बीच ऊजार् अंतराल पर निभर्र करता है। काबर्न ;डायमंडद्ध, ैप तथा ळम के लिए ऊजार् अंतराल क्रमशः 5ण्4 मटए 1ण्1 मट तथा 0ण्7 मट है। ैद भी चैथे ग्रुप का तत्व है परंतु यह धतु है क्योंकि इसके प्रकरण में ऊजार् अंतराल 0 मट है। तथा दाता परमाणुओं के 9 इलेक्ट्राॅन चित्रा 14ण्9 ज् झ 0 ज्ञ पर ;ंद्ध द.प्रकार के अध्र्चालक तथा ;इद्ध च.प्रकार के अध्र्चालक का ऊजार् बैंड। उदाहरण 14ण्2 मान लीजिए किसी शु( ैप िस्टल में 5 × 1028 परमाणु उदृ3 है। इसे पंचसंयोजी ।े से 1 चचउ सांद्रता पर अपमिश्रित किया जाता है। इलेक्ट्राॅनों तथा होलों की संख्या परिकलित कीजिए, दिया है कि दप त्र1ण्5 × 1016 उदृ3। हल ध्यान दीजिए, यहाँ तापीय जनित की उफष्मा से उत्पन्न इलेक्ट्राॅन ;दप ्1016 उदृ3द्ध अपमिश्रण से उत्पन्न इलेक्ट्राॅनों की तुलना में नगण्य हैं। इसलिएए दम ≈ छक् चूँकि ददत्र द2ए इसलिए होलों की संख्यामी प दी त्र ;2ण्25 × 1032द्धध्;5 ×1022द्ध् 4ण्5 × 109 उदृ3 भौतिकी 14ण्5 च.द संध्ि च.द संध्ि ;च.द रनदबजपवदद्ध बहुत सी अध्र्चालक युक्ितयों जैसे डायोड, ट्रांजिस्टर आदि की मूल इकाइर् है। अन्य अधर्चालक युक्ितयों के विश्लेषण के लिए संध्ि के व्यवहार को समझना अत्यंत महत्वपूणर् है। अब हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किसी संध्ि का निमार्ण वैफसे होता है तथा बाह्य अनुप्रयुक्त वोल्टताओं ;जिन्हें बायस भी कहते हैंद्ध के प्रभाव में कोइर् संध्ि किस प्रकार व्यवहार करती है। 14ण्5ण्1 च.द संध्ि का निमार्ण च.प्रकार के सिलिकाॅन ;च.ैपद्ध अध्र्चालक की पतली पटलिका ;वेप़्ाफरद्ध पर विचार कीजिए। परिशु( रूप में पंचसंयोजक अशुि की अल्प मात्रा मिलाकर किसी च.ैप पटलिका के वुफछ भाग को द.ैप में परिव£तत किया जा सकता है। किसी अध्र्चालक का निमार्ण करने की बहुत - सी प्रियाएँ हैं। अब पटलिका मेंच.क्षेत्रा एवं द.क्षेत्रा तथा च.तथा द.क्षेत्रों के बीच एक धतुकमीर् संिा है। किसी च.द संध्ि के निमार्ण के समय दो महत्वपूणर् प्रियाएँ होती हैं - विसरण ;क्पनििेपवदद्ध तथा अपवाह ;क्तपजिद्ध। हम यह जानते हैं कि किसी द.प्रकार के अध्र्चालक में इलेक्ट्राॅनों की सांद्रता ;प्रति एकांक आयतन में इलेक्ट्राॅनों की संख्याद्ध होलों की सांद्रता की तुलना में अध्िक होती है। इसी प्रकार च.प्रकार के अध्र्चालक में होलों की सांद्रता इलेक्ट्राॅनों की सांद्रता की तुलना में अध्िक होती है। च.द संध्ि के निमार्ण के समय, तथा च.एवं द.पफलकों के सिरों पर सांद्रता प्रवणता ;ब्वदबमदजतंजपवद हतंकपमदजद्ध के कारण होल च.पफलक सेद.पफलक ;च → दद्ध को विसरित होते हैं तथा इलेक्ट्राॅन द.पफलक से च.पफलक ;द → चद्ध की ओर विसरित होते हैं। आवेश वाहकों की इस गति के कारण संध्ि से एक विसरण धरा प्रवाहित होती है। जब कोइर् इलेक्ट्राॅन च से द की ओर विसरित होता है तो वह अपने पीछे एक आयनित दाता द.पफलक पर छोड़ देता है। यह आयनित दाता ;ध्न आवेशद्ध चारों ओर के परमाणुओं द्वारा बँध होने के कारण निश्चल होता है। जैसे - जैसे इलेक्ट्राॅन द → च की ओर विसरित होते जाते हैं, संध्ि के दपफलक पर ध्नावेश की ;या ध्नात्मक स्पेस - चाशर् क्षेत्राद्ध एक परत विकसित हो जाती है। इसी प्रकार, जब कोइर् होल सांद्रता प्रवणता के कारण च → द की ओर विसरित होता है तो वह अपने पीछे एक आयनित ग्राही ;)णात्मक आवेशद्ध छोड़ देता है जो निश्चल होता है। जैसे - जैसे होल विसरित होते हैं, )णात्मक आवेश ;)णात्मक स्पेस - चाशर् क्षेत्राद्ध की एक परत संध्ि के च.पफलक पर विकसित होती जाती है। संध्ि के दोनों पफलकों पर विकसित इस स्पेस - चाशर् क्षेत्रा को ”ासी क्षेत्रा ;क्मचसमजपवद तमहपवदद्ध कहते हैं। यह इसलिए है क्योंकि इलेक्ट्राॅन तथा होल जो संध्ि के आर - पार आरंभ्िाक गति में भाग लेते हैं वे इसके मुक्त आवेशों के क्षेत्रा का ”ास कर देते हैं ;चित्रा 14ण्10द्ध। इस ”ासी क्षेत्रा की मोटाइर् माइक्रोमीटर के दसवें भाग की कोटि की होती है। संध्ि के द.पफलक पर ध्नात्मक स्पेस - चाशर् क्षेत्रा तथा चपफलक पर )णात्मक स्पेस - चाजर् क्षेत्रा होने के कारण संध्ि पर ध्नात्मक आवेश से )णात्मक आवेश की ओर एक विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न हो जाता है। इस क्षेत्रा के कारण संध्ि के च.पफलक का इलेक्ट्राॅन द.पफलक की ओर तथा संध्ि के द.पफलक का होल च.पफलक की ओर गति करता है। इस विद्युत क्षेत्रा के कारण आवेश वाहकों की इस गति को अपवाह कहते हैं। इस प्रकार एक अपवाह धारा जो कि विसरण धरा के विपरीत होती है, चित्रा 14ण्10 च.द संध्ि बनने की प्रिया प्रवाहित होना आरंभ कर देती है ;चित्रा 14ण्10द्ध। आरंभ में, विसरण धरा उच्च होती है तथा अपवाह धरा निम्न होती च.द संिा डायोड का निमार्ण तथा कायर्ीजजचरूध्ध्ीलचमतचीलेपबेण्चील.ंेजतण्हेनण्मकनध्ीइंेमध्ेवसपकेध्चदरनदण्ीजउस है। जैसे - जैसे विसरण प्रिया होती जाती है, संध्ि के दोनों पफलकों पर अंतराकाशी आवेश क्षेत्रा विस्तारित होते जाते हैं। इससे विद्युत क्षेत्रा की तीव्रता में वृि होती है जिसके पफलस्वरूप अपवाह धरा में भी वृि होती है। यह प्रक्रम उस समय तक चलता रहता है जब तक कि ये दोनों धराएँ ;विसरण धरा तथा अपवाह धराद्ध परिमाण में समान नहीं हो जातीं। इस प्रकार एक च.द संध्ि बन जाती है। साम्यवास्था में च.द संध्ि पर कोइर् नेट विद्युत धरा नहीं होती। द.क्षेत्रा से इलेक्ट्राॅनों की हानि तथा च.क्षेत्रा में होलों की प्राप्ित के कारण दोनों क्षेत्रों की संध्ि के आर - पार एक विभवांतर उत्पन्न हो जाता है। इस विभव की ध््रुवता इस प्रकार होती है कि यह आवेश वाहकों के और प्रवाह का विरोध् करता है जिसके पफलस्वरूप साम्यावस्था की स्िथति उत्पन्न हो जाती है। चित्रा 14ण्11 में संध्ि को साम्यावस्था में तथा इसके सिरों के बीच विभवांतर दशार्या गया है। द.पदाथर् ने इलेक्ट्राॅन खोए हैं तथा च.पदाथर् ने इलेक्ट्राॅन अ£जत किए हैं। इस प्रकार च.पदाथर् के सापेक्ष द.पदाथर् ध्नात्मक है। चूँकि विभव द.क्षेत्रा से च.क्षेत्रा की ओर इलेक्ट्राॅनों की गति चित्रा 14ण्11 ;ंद्ध डायोड साम्य में को रोकने का प्रयास करता है अतः इस विभव को प्रायः रोध्िका विभव ;ठंततपमत ;ट त्र 0द्धए ;इद्ध बिना किसी बायस के संध्ि चवजमदजपंसद्ध कहते हैं। का विभव। उदाहरण 14ण्3 क्या च.द संिा बनाने के लिए हम च.प्रकार के अधर्चालक की एक पट्टðी को ददृप्रकार के अधर्चालक से भौतिक रूप से संयोजित कर च.द संध्ि प्राप्त कर सकते हैं? हल नहीं! कोइर् भी प‘ी, चाहे कितनी ही समतल हो, अंतर.परमाण्वीय िस्टल अंतराल ;् 2 से 3 ऊद्ध से कहीं श्यादा खुरदरी होगी और इसलिए परमाण्वीय स्तर पर अविच्िछन्न संपवर्फ ;अथवा संतत संपवर्फद्ध संभव नहीं होगा। प्रवाहित होने वाले आवेश वाहकों के लिए संिा एक विच्िछन्नता की तरह व्यवहार करेगी। 14ण्6 अध्र्चालक डायोड अध्र्चालक डायोड ¹चित्रा 14ण्12;ंद्धह् मूल रूप में एक च.द संध्ि होती है जिसके सिरों पर धत्िवक संपवर्फ जुड़े होते हैं ताकि इस संिा पर कोइर् बाह्य वोल्टता अनुप्रयुक्त की जा सके। इस युक्ित के दो टमिर्नल होते हैं। अध्र्चालक डायोड को प्रतीकात्मक रूप में चित्रा 14ण्12;इद्ध में निरूपित किया गया है। तीरों की दिशा परिपाटी के अनुसार विद्युत धरा की दिशा साम्या रोध्िका ;म्ुनपसपइतपनउ इंततपमतद्ध को दशार्ती है। ;जबकि डायोड अग्रदिश्िाक बायसित ;थ्वतूंतक इपंेद्ध हैद्ध विभव को डायोड के चित्रा 14ण्12 ;ंद्ध अध्र्चालक डायोड, ;इद्ध च.द संध्िसिरों पर बाह्य वोल्टता ट अनुप्रयुक्त करके परिव£तत किया जा सकता है। डायोड का प्रतीक।च.द संध्ि डायोड की बिना किसी बायस के साम्यावस्था में स्िथति चित्रा 14ण्11;ंद्ध तथा ;इद्ध में दशार्यी गइर् है। 14ण्6ण्1 अग्रदिश्िाक बायस में च.द संध्ि डायोड जब किसी अध्र्चालक डायोड के दो सिरों के बीच कोइर् बाह्य वोल्टता ट इस प्रकार अनुप्रयुक्त की जाती है कि बैटरी का ध्न ट£मनल च.पफलक से तथा )ण ट£मनल द.पफलक से संयोजित करते हैं ¹चित्रा 14ण्13;ंद्ध तथा ;इद्धह् तो इसे अग्रदिश्िाक बायसित कहते हैं। अनुप्रयुक्त अध्िकांश वोल्टता पात अध्र्चालक डायोड के ”ासी क्षेत्रा के सिरों पर होता है तथा संध्ि के च.पफलक तथा द.पफलक पर विभवपात नगण्य होता है ;इसका कारण यह है कि ”ासी भौतिकी चित्रा 14ण्13 ;ंद्ध अग्रदिश्िाक बायस में च.द जंक्शन डायोड, ;इद्ध रोधक विभव ;1द्ध बिना बैटरी में, ;2द्ध निम्न बैटरी वोल्टता के लिए, तथा ;3द्ध उच्च बैटरी वोल्टता के लिए। क्षेत्रा, वह क्षेत्रा जहाँ कोइर् आवेश नहीं है, का प्रतिरोध् द.पफलक अथवा च.पफलक के प्रतिरोधें की तुलना में अत्यध्िक होता हैद्ध। अनुप्रयुक्त वोल्टता ;टद्ध की दिशा अंतःनिमिर्त ;इनपसज.पदद्ध विभव ट0 के विपरीत होती है। इसके परिणामस्वरूप, ”ासी स्तर की मोटाइर् घट जाती है तथा रोिाका ऊँचाइर् कम हो जाती है ख्चित्रा 14ण्13;इद्ध,। अग्रदिश्िाक बायस में प्रभावी रोध्िका ऊँचाइर् ;ट0 दृ टद्ध होती है। यदि अनुप्रयुक्त वोल्टता लघु है तो रोध्िका विभव साम्य मान से केवल वुफछ कम हो जाएगा, तथा केवल वे ही आवेश वाहक जो उच्चतम ऊजार् स्तर पर थे, बहुत कम संख्या में संध्ि को पार करने के लिए आवश्यक ऊजार् प्राप्त कर पाएँगे, अतः कम विद्युत धारा प्रवाहित होगी। यदि हम अनुप्रयुक्त वोल्टता में काप़्ाफी वृि कर दें तो रोिाका ऊँचाइर् काप़्ाफी घट जाएगी तथा अध्िक संख्या में वाहकों को संध्ि पार करने के लिए आवश्यक ऊजार् प्राप्त हो जाएगी। इस प्रकार विद्युत धरा में वृि हो जाएगी। अनुप्रयुक्त वोल्टता के कारण, इलेक्ट्राॅन द.पफलक ”ासी क्षेत्रा को पार कर च.पफलक पर पहुँचते हैं ;जहाँ वे अल्पांश वाहक हैंद्ध। इसी प्रकार च.पफलक के होल संध्ि को पार करके द.पफलक पर पहुँचते हैं ;जहाँ वे अल्पांश वाहक हैंद्ध। अग्रदिश्िाक बायस में होने वाले इस प्रक्रम को अल्पांश वाहक अंतःक्षेपण ;डपदवतपजल बंततपमत पदरमबजपवदद्ध कहते हैं। संध्ि की सीमा पर हर पफलक पर, संध्ि से दूर अवस्िथत अल्पांश वाहकों की सांद्रता की तुलना में, अल्पांश वाहक सांद्रता में महत्वपूणर् वृि हो जाती है। इस सांद्रता प्रवणता के कारण च.पफलक की संध्ि के किनारे विसरित होकर च.पफलक के दूसरे किनारे पर पहुँच जाते हंै। इसी प्रकार द.पफलक की संध्ि के किनारे से विसरित होकर द.पफलक के दूसरे सिरे पर पहुँचते हैं ;चित्रा 14ण्14द्ध। दोनों पफलकों पर आवेश वाहकों की इस गति के कारण विद्युत धरा प्रवाहित होने लगती है। वुफल अग्रदिश्िाक डायोड धरा का मान होल विसरण धरा तथा इलेक्ट्राॅन विसरण के कारण पारंपरिक धरा का योग होता है। इस धरा का परिमाण प्रायः मिलीऐम्िपयर में होता है। 14ण्6ण्2 पश्चदिश्िाक बायस में च.द संध्ि डायोड जब किसी अध्र्चालक डायोड के दो सिरों के बीच कोइर् बाह्य वोल्टता ;ट द्ध इस प्रकार अनुप्रयुक्त करते हैं कि बैटरी के ध्न टमिर्नल को द.पफलक से तथा )ण टमिर्नल को च.पफलक से जोड़ते हैं ख्चित्रा 14ण्15;ंद्ध,, तो डायोड को पश्चदिश्िाक बायसित ;त्मअमतेम इपंेद्ध कहते हैं। अनुप्रयुक्त वोल्टता का अध्िकांश विभवपात अध्र्चालक के ”ासी क्षेत्रा के सिरों पर होता है। यहाँ अनुप्रयुक्त वोल्टता की दिशा रोध्िका विभव की दिशा के समान होती है। इसके परिणामस्वरूप रोध्िका की ऊँचाइर् बढ़ जाती है तथा ”ासी क्षेत्रा की चैड़ाइर् में विद्युत में परिवतर्न होने के कारण वृि हो जाती है। पश्चदिश्िाक बायसन् में प्रभावी रोध्िका ऊँचाइर् ;ट0 ़ टद्ध होती है ख्चित्रा 14ण्15;इद्ध,। यह द → च की ओर इलेक्ट्राॅनों के प्रवाह तथा च → द की ओर होलों के प्रवाह का दमन करती है। इस प्रकार, डायोड के अग्रदिश्िाक बायसन् की तुलना में इस स्िथति में विसरण धरा अत्यध्िक कम हो जाती है। संध्ि के विद्युत क्षेत्रा की दिशा ऐसी होती है कि यदि च.पफलक पर इलेक्ट्राॅन अथवा द.पफलक पर होल अपनी यादृच्िछक गति करते समय संध्ि के निकट आ जाएँ, तो उन्हें उनके बहुसंख्यक क्षेत्रा में भेज दिया जाएगा। आवेश वाहकों के इस अपवाह के कारण विद्युत धरा उत्पन्न होगी। यह अपवाह धरा वुफछ - । कोटि की होती है। इसके अत्यल्प मान होने का कारण यह है कि आवेश वाहकों की गति उनके अल्पांश पफलक से संध्ि के दूसरी ओर बहुसंख्यक पफलक की ओर होती है। अग्रदिश्िाक बायसन् में अपवाह धरा ;सामान्यतः - । मेंद्ध भी होती है परंतु यह अंतःक्ष्िाप्त वाहकों के कारण धरा ;उ। मेंद्ध, की तुलना में नगण्य होती है। डायोड प्रतीप धरा ;त्मअमतेम बनततमदजद्ध अनुप्रयुक्त वोल्टता पर अत्यध्िक निभर्र नहीं होती। अल्पांश वाहकों को संध्ि के एक पफलक से दूसरे पफलक तक पहुँचाने के लिए लघु वोल्टता ही पयार्प्त होती है। धरा अनुप्रयुक्त वोल्टता के परिणाम द्वारा सीमित नहीं होती परंतु यह संध्ि के दोनों पफलकों पर अल्पांश वाहकों की सांद्रता के कारण सीमित होती है। पश्चदिश्िाक बायस में किसी क्रांतिक पश्चदिश्िाक ;ब्तपजपबंस तमअमतेमद्ध वोल्टता तक विद्युतधरा सारभूत रूप में वोल्टता पर निभर्र नहीं करती है। इस वोल्टता को भंजन वोल्टता;ठतमंाकवूद अवसजंहमए टइतद्ध कहते हैं। जब ट त्र टइत तब डायोड पश्चदिश्िाक धरा में तेशी से वृि होती है। यहाँ तक कि बायस वोल्टता में अल्प वृि करने पर भी धरा में अत्यध्िक परिवतर्न हो जाता है। यदि पश्चदिश्िाक धरा को किसी बाह्य परिपथ द्वारा अनुमत मान ;जिसे उत्पादक द्वारा निदिर्ष्ट किया गया हैद्ध से नीचे सीमित न किया जाए तो च.द संध्ि नष्ट हो जाएगी। यदि एक बार भी यह अनुमत मान से अिाक हो जाए तो अतितप्त होने के कारण डायोड नष्ट हो जाता है। ऐसा तब भी हो सकता है, जब डायोड अग्रदिश्िाक बायसित होता है तथा अग्रदिश्िाक धरा अनुमत मान से अध्िक हो। किसी डायोड के ट.प् अभ्िालाक्षण्िाक ;अनुप्रयुक्त की गइर् वोल्टता के पफलन के चित्रा 14ण्15 ;ंद्ध पश्चदिश्िाक बायसरूप में धारा का विचरणद्ध का अध्ययन करने के लिए परिपथ आरेख चित्रा 14ण्16 ;ंद्ध में डायोड ;इद्ध पश्चदिश्िाक बायस मेंतथा ;इद्ध में दिखाया गया है। डायोड से वोल्टता को एक पोटंेश्िायोमीटर ;या धारा रोध्िका विभव।नियंत्राकद्ध से होकर जोड़ा जाता है जिससे डायोड पर अनुप्रयुक्त की गइर् वोल्टता को परिवतिर्त किया जा सकता है। वोल्टता के विभ्िान्न मानों के लिए धारा का मान नोट किया जाता है। ट और प् के बीच एक ग्रापफ, जैसा चित्रा ़14ण्16;बद्ध में दिखाया गया है, प्राप्त होता है। ध्यान दीजिए, अग्रदिश्िाक बायस मापन के लिए हम मिलीमीटर का उपयोग करते हैं क्योंकि ;जैसा पिछले अनुभाग में समझाया गया थाद्ध अपेक्ष्िात धारा अिाक है जबकि विपरीत बायस में कम धारा को नापने के लिए एक माइक्रोऐमीटर का उपयोग किया जाता है। आप चित्रा प् ;उ।द्ध स्िवच ट ;टद्ध स्िवच ़;इद्ध ;बद्ध चित्रा 14ण्16 किसी च.द संध्ि डायोड का ;ंद्ध अग्रदिश्िाक बायस, ;इद्ध पश्चदिश्िाक बायस में ट.प् अभ्िालाक्षण्िाक के अध्ययन के प्रयोगिक परिपथ, ;बद्ध किसी सिलिकाॅन डायोड के प्रतिरूपी ट.प् अभ्िालाक्षण्िाक। 483 भौतिकी ;14ण्16द्ध में देख सकते हैं कि अग्रदिश्िाक बायस में आरंभ में धरा उस समय तक बहुत धीरे - धीरे, लगभग नगण्य, बढ़ती है जब तक कि डायोड पर वोल्टता एक निश्िचत मान से अिाक न हो जाए। इस अभ्िालाक्षण्िाक वोल्टता के बाद डायोड बायस वोल्टता में बहुत थोड़ी - सी ही वृि करने से डायोड धारा में साथर्क ;चरघातांकीद्ध वृि हो जाती है। यह वोल्टता देहली वोल्टता ;ज्ीतमेीवसक अवसजंहमद्ध या कट - इन वोल्टता कहलाती है। इस वोल्टता का मान जरमेनियम डायोड के लिए ् 0ण्2 वोल्ट तथा सिलिकाॅन डायोड के लिए ् 0ण्7 वोल्ट है। पश्चदिश्िाक बायस में डायोड के लिए धारा बहुत कम ;् - ।द्ध होती है तथा बायस में परिवतर्न के साथ लगभग स्िथर बनी रहती है। इसे प्रतीप संतृप्त धारा ;त्मअमतेम ेंजनतंजपवद बनततमदजद्ध कहते है। परंतु वुफछ विशेष प्रकरणों में, बहुत अिाक पश्चदिश्िाक बायस ;भंजन वोल्टताद्ध पर धारा में अचानक वृि हो जाती है। डायोड की इस विशेष िया की विवेचना आगे अनुभाग 14ण्8 में की गइर् है। साधारण उद्देश्य वाले डायोड प्रतीप संतृप्त धारा क्षेत्रा के आगे उपयोग नहीं किए जाते हैं। उफपर दी गइर् विवेचना यह दिखाती है कि च.द डायोड मूल रूप से धारा के प्रवाह को केवल एक ही दिशा में ;अग्रदिश्िाक बायसद्ध प्रतिबंिात करता है। पश्चदिश्िाक बायस प्रतिरोध की तुलना में अग्रदिश्िाक बायस प्रतिरोध कम होता है। इस गुण का उपयोग प्रत्यावतीर् ;ंबद्ध वोल्टता के दिष्टकरण के लिए किया गया है, जिसे अगले अनुभाग में समझाया गया है। डायोडों के लिए हम एक अन्य भौतिक राश्िा जिसे गतिक प्रतिरोध् कहते हैं, को ‘‘वोल्टता में लघु परिवतर्न Δट तथा विद्युत धरा में लघु परिवतर्न Δप् के अनुपात’’ के रूप में परिभाष्िात करते हैंः Δट तक त्र ;14ण्6द्धΔप् 14ण्7 संध्ि डायोड का दिष्टकारी के रूप में अनुप्रयोग किसी संध्ि डायोड के ट.प् अभ्िालाक्षण्िाक में हम यह देखते हैं कि वह केवल तभी विद्युत धरा प्रवाहित होने देता है जब वह अग्रदिश्िाक बायसित होता है। अतः यदि किसी डायोड के सिरों पर कोइर् प्रत्यावतीर् वोल्टता अनुप्रयुक्त की जाए तो चक्र के केवल उसी भाग में परिपथ में धरा प्रवाहित होगी जब डायोड अग्रदिश्िाक बायसित है। डायोड के इस गुण का उपयोग प्रत्यावतीर् वोल्टता का दिष्टकरण करने में किया जाता है तथा इस कायर् के लिए जिस परिपथ का उपयोग करते हैं उसे दिष्टकारी कहते हैं। यदि डायोड के सिरों पर कोइर् प्रत्यावतीर् ;ंबद्ध वोल्टता श्रेणीक्रम में संयोजित लोड प्रतिरोध् त्स् के साथ अनुप्रयुक्त की जाए तो लोड के सिरों पर केवल ंब निवेश के उस अध्र्चक्र में जिसमें डायोड अग्रदिश्िाक बायसित है, एक स्पंदमान वोल्टता दृष्िटगोचर होगी। इस प्रकार का विद्युत परिपथ चित्रा 14ण्18 के विद्युत परिपथ में दशार्या गया है जिसे अध्र् - तरंग दिष्टकारी परिपथ कहते हैं। ट्रांसप़्ाफामर्र की द्वितीयक वुंफडली टमिर्नल । तथा ठ पर वांछित ंब वोल्टता की आपूतिर् करती है। जब । पर वोल्टता ध्नात्मक होती है तो डायोड अग्रदिश्िाक बायसित होता है तथा यह विद्युत धरा का चालन करता है। जब । पर वोल्टता )णात्मक होती है तो डायोड पश्चदिश्िाक बायसित होता है और वह विद्युत चालन नहीं करता। पश्चदिश्िाक बायस में डायोड की संतृप्त प्रतीप धरा नगण्य होती है तथा इसे व्यावहारिक कायो± के लिए शून्य माना जा सकता है। ;डायोड की त्स्ट्रांसपफामर्र । प्राथमिक द्वितीयक त्स् ल्ठ ;ंद्ध ज ;इद्ध प्रतीप भंजन वोल्टता का मान ट्रांसप़्ाफामर्र की द्वितीयक वुंफडली पर चित्रा 14ण्18 ;ंद्ध अधर्तरंग दिष्टकारी परिपथ, ;इद्ध दिष्टकारीश्िाखर ंब वोल्टता की तुलना में काप़्ाफी अध्िक होना चाहिए ताकि परिपथ से निवेशी ंब और निगर्त वोल्टता केडायोड प्रतीप भंजन से सुरक्ष्िात रह सके।द्ध तरंग रूप।इसलिए ंब वोल्टता के ध्नात्मक अध्र्चक्र में लोड प्रतिरोध् त्स् से विद्युत धरा प्रवाहित होगी और हमें चित्रा 14ण्18;इद्ध में दशार्ए अनुसार निगर्त वोल्टता प्राप्त होगी। परंतु )णात्मक अधर्चक्र में विद्युत धरा प्राप्त नहीं होगी। अगले ध्नात्मक अध्र्चक्र में हमें पिफर निगर्त वोल्टता प्राप्त होगी। इस प्रकार, निगर्त वोल्टता यद्यपि अभी भी परिवतर्नीय है परंतु यह केवल एक ही दिशा में प्रतिबंिात होने के कारण दिष्टकारी कहलाती है। चूँकि हमें ंब तरंग के केवल एक ही अध्र्चक्र में निगर्त वोल्टता प्राप्त हो रही है, अतः इस परिपथ को अध्र् - तरंग दिष्टकारी कहते हैं। चित्रा 14ण्19;ंद्ध में दशार्ए गए परिपथ में दो डायोडों का उपयोग करके एक ऐसी परिपथ व्यवस्था की गइर् है जिससे ंब चक्र के ध्नात्मक एवं )णात्मक दोनों ही अध्र्चक्रों में तदनुरूपी दिष्टकृत निगर्त वोल्टता प्राप्त होती है। इसीलिए इस परिपथ को पूणर् तरंग दिष्टकारी कहते हैं। इसमें दोनों डायोडों के द.पफलकों को एक साथ संयोजित कर देते हैं तथा निगर्त को डायोडों के इस उभयनिष्ठ ¯बदु तथा ट्रांसपफामर्र की द्वितीयक वुंफडली के मध्य ¯बदु के बीच प्राप्त किया जाता है।़अतः किसी पूणर् तरंग दिष्टकारी के लिए ट्रांसपफार्मर की द्वितीयक वुंफडली के मध्य में एक अंशनिष्कासी ¯बदु ;ज्ंचचपदह चवपदजद्ध प्रदान किया जाता है और इसीलिए इस ट्रांसपफामर्र को़मध्य ़निष्कासी ट्रांसपफामर्र ;बमदजतम.जंच जतंदेवितउमतद्ध कहते हैं। जैसा कि चित्रा 14ण्19;बद्ध से स्पष्ट है कि प्रत्येक डायोड द्वारा दिष्टकृत वोल्टता वुफल द्वितीयक वुंफडली से प्राप्त वोल्टता की केवल आध्ी ही है। प्रत्येक डायोड केवल आध्े चक्र का दिष्टकरण करता है, परंतु दो डायोड प्रत्यावतीर् चक्रों का दिष्टकरण करते हैं। इस प्रकार डायोडांे के उभयनिष्ठ ¯बदु तथा मध्य निष्कासी ट्रांसपफामर्ऱके अंश निष्कासी ¯बदु के बीच प्राप्त निगर्त वोल्टता पूणर् तरंग दिष्टकारी वोल्टता होती है। ;ध्यान भौतिकी दीजिए कि पूणर् तरंग दिष्टकारी के लिए एक अन्य परिपथ भी ाफामर्र की आवश्यकता नहीं होगी परंतु उसे चार डायोड चाहिएद्ध। मान लीजिए किसी क्षण मध्य निष्कासी के । पर निवेश वोल्टता ध्नात्मक है। यह स्पष्ट है कि इस क्षण पर कला असंगत होने के कारण ठ पर वोल्टता )णात्मक होती है जैसा कि चित्रा 14ण्19;इद्ध में दशार्या गया है। अतः डायोड क्1 अग्रदिश्िाक बायस होकर विद्युत चालन करता है ;जबकि क्2 पश्चदिश्िाक बायस होने के कारण चालन नहीं करताद्ध। अतः इस ध्नात्मक अध्र्चक्र में हमें चित्रा 14ण्19;बद्ध में दशार्ए अनुसार एक निगर्त धरा ;तथा लोड प्रतिरोध् त्स् के सिरों पर निगर्त वोल्टताद्ध प्राप्त होती है। इसी प्रकार किसी अन्य क्षण पर, जब । पर वोल्टता )णात्मक हो जाती है तब ठ पर वोल्टता धनात्मक होगी। इसलिए डायोड चालन नहीं करता, लेकिन डायोड क् चालन करता है।क्12इस प्रकार निवेशी ंब के )णात्मक अधर् चक्र में भी निगर्त धारा ;तथा त्स् पर निगर्त वोल्टताद्ध मिलती है। इस प्रकार, हमें धनात्मक तथा )णात्मक दोनों ही अधर् चक्र में ;अथार्त, दूसरे शब्दों में, पूणर् तरंग के समय मेंद्ध निगर्त वोल्टता मिलती है। स्पष्टतया, दिष्ट वोल्टता या धारा प्राप्त करने के लिए यह अधर् तरंग दिष्टकारी से अिाक दक्ष परिपथ है। इस प्रकार प्राप्त दिष्टकृत वोल्टता अध्र् ज्यावक्रीय ;भ्ंस िेपदनेवपकद्ध आकृति की होती है। यद्यपि यह एकदिश्िाक होती है परंतु इसका मान स्थायी नहीं होता। स्पंदमान वोल्टता से कब निगर्त प्राप्त करने के लिए निगर्त टमिर्नलों के सिरों पर ;त्स् के पाश्वर् मेंद्ध सामान्यतः कोइर् संधारित्रा संयोजित कर देते हैं। इसी कायर् को करने के लिए लोड प्रतिरोध् त्स् के श्रेणीक्रम में कोइर् प्रेरक भी संयोजित किया जा सकता है। चूँकि ये अतिरिक्त ंब चित्रा 14ण्19 ;ंद्ध पूणर् तरंग दिष्टकारी परिपथऋ ;इद्ध । पर उमिर्काओं को बाहर पिफल्टरन करके शु( कब वोल्टता प्रदान डायोड क्1 के और ठ पर डायोड क्2 के करते प्रतीत होते हैं, अतः इन्हें पिफल्टर कहते हैं। दिए गए निवेश के तरंग रूपऋ ;बद्ध पूणर् तरंग अब हम पिफल्टरन में संधरित्रा की भूमिका की विवेचना दिष्टकारी परिपथ में जोड़े गए लोड त् पर करेंगे। जब संधरित्रा के सिरों पर वोल्टता में वृि हो रही होतीस्निगर्त वोल्टता का तरंगरूप। है तो वह आवेश्िात हो जाता है। यदि परिपथ में कोइर् बाह्य लोड नहीं है तो यह दिष्टकृत निगर्त की श्िाखर वोल्टता तक आवेश्िात रहता है। यदि परिपथ में कोइर् लोड है तो यह लोड से होकर विसजिर्त होने लगता है तथा इसके सिरों पर वोल्टता कम होने लगती है। दिष्टकृत निगर्त के अगले अध्र् चक्र में यह पिफर अपनी श्िाखर वोल्टता तक आवेश्िात होता है ;चित्रा 14ण्20द्ध। संधरित्रा के सिरों पर वोल्टता में कमी होने की दर संधरित्रा की धरिता ब् तथा परिपथ में लगे प्रभावी प्रतिरोध्क त्स् के प्रतिरोध् गुणनपफल जिसे कालांक कहते हैं, पर निभर्र करता है। कालांक का मान अध्िक होने के लिए ब् का मान अिाक होना चाहिए। अतः संधरित्रा निवेश पिफल्टरों का उपयोग करने पर प्राप्त निगर्त वोल्टता दिष्टकृत वोल्टता के श्िाखर मान के निकट होती है। विद्युत प्रदायों में व्यापक रूप में इसी प्रकार के पिफल्टर उपयोग किए जाते हैं। होता है जिसके लिए मध्य निष्कासी ट्रांसप़्ंब निवेश वोल्टताकबंब संधरित्रा निवेश पिफल्टर के साथ निगर्त वोल्टता ;इद्ध चित्रा 14ण्20 ;ंद्ध संधरित्रा पिफल्टर के साथ पूणर् तंरग दिष्टकारी, ;इद्ध में दिष्टकारी की निवेश तथा निगर्त वोल्टता। 14ण्8 विश्िाष्ट प्रयोजन च.द संध्ि डायोड इस अनुभाग में हम वुफछ ऐसी युक्ितयों की विवेचना करेंगे जो मूल रूप से संध्ि डायोड हैं परंतु उनका विकास विभ्िान्न अनुप्रयोगों के लिए किया गया है। 14ण्8ण्1 शेनर डायोड यह एक विश्िाष्ट प्रयोजन अध्र्चालक डायोड है जिसका नाम उसके आविष्कारक सी.शेनर के नाम पर रखा गया है। इसे भंजन क्षेत्रा में पश्चदिश्िाक बायस में प्रचालित करने के लिए डिशाइन किया गया है तथा इसका उपयोग वोल्टता नियंत्राक के रूप में किया जाता है। शेनर डायोड का प्रतीक चित्रा 14ण्21;ंद्ध में दशार्या गया है। शेनर डायोड संध्ि के च.तथा द.दोनों पफलकों को अत्यध्िक अपमिश्रित ;भ्मंअपसल कवचमकद्ध कर विकसित किया जाता है। इसके कारण बनने वाला ”ासी क्षेत्रा अत्यध्िक पतला ;ढ10दृ6 उद्ध होता है तथा संध्ि का विद्युत क्षेत्रा लगभग 5ट तक के लघु पश्चदिश्िाक बायस होने पर भी अति उच्च ;्5×106 टध्उद्ध होता है। किसी शेनर डायोड का प्.ट अभ्िालाक्षण्िाक चित्रा 14ण्21;इद्ध में दशार्या गया है। इसमें यह दशार्या गया है कि जब अनुप्रयुक्त पश्चदिश्िाक बायस वोल्टता ;टद्ध शेनर डायोड की भंजन वोल्टता ;ट्रद्ध के समान हो जाती है, तो परिपथ में विद्युत धरा में बहुत अध्िक परिवतर्न होता जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि भंजन वोल्टता ट ्र के पश्चात, पश्चदिश्िाक वोल्टता में कोइर् साथर्क परिवतर्न किए बिना ही अत्यिाक धरा उत्पन्न की जा सकती है। दूसरे शब्दों में, शेनर डायोड से प्रवाहित होने वाली धरा में अत्यध्िक परिवतर्न होने पर भी शेनर वोल्टता नियत रहती है। शेनर डायोड के इस गुण का उपयोग विद्युत आपूतिर्यों की वोल्टताओं को नियंत्रिात करने में किया जाता है तथा आपूतिर्यों से नियत वोल्टता पर विद्युत प्राप्त होती है। आइए अब यह समझने का प्रयास करे कि भंजन वोल्टता पर विद्युत धरा अचानक वैफसे बढ़ जाती है। हम जानते हैं कि प्रतीप धरा इलेक्ट्राॅनों ;अल्पांश आवेश वाहकोंद्ध के च → द तथा होलों के द → च ओर प्रवाह के कारण होती है। जैसे ही पश्चदिश्िाक बायस में वृि होती है, संध्ि पर विद्युत क्षेत्रा महत्वपूणर् हो जाता है। जब पश्चदिश्िाक बायस वोल्टता ट त्र ट ्र है तो विद्युत क्षेत्रा तीव्रता च.पफलक पर आथ्िातेय परमाणुओं से उन संयोजकता इलेक्ट्राॅनों को जो द.पफलक की ओर त्वरित थे, खींचने के लिए पयार्प्त होती है। यही इलेक्ट्राॅन भंजन के समय प्रेक्ष्िात उच्च धरा के लिए चित्रा 14ण्21 ;ंद्ध किसी जे़नर डायोड उत्तरदायी होते हैं। उच्च विद्युत क्षेत्रा के कारण आथ्िातेय परमाणुओं से इलेक्ट्राॅनों का का प्रतीकात्मक निरूपण तथा ;इद्ध किसी उत्सजिर्त होना आंतरिक क्षेत्राीय उत्सजर्न अथवा क्षेत्राीय आयनन कहलाता है। क्षेत्राीय ज़ेनर डायोड का प्.ट अभ्िालाक्षण्िाक वक्र। आयनन के लिए आवश्यक विद्युत क्षेत्रा 106 टध्उ कोटि का होता है। 487 भौतिकी वोल्टता नियंत्राक के रूप में शेनर डायोड हम जानते हैं कि किसी दिष्टकारी की निवेश वोल्टता में घट - बढ़ होती है तो उसकी दिष्टकृत वोल्टता में भी घट - बढ़ होती है। किसी दिष्टकारी के निगर्त से प्राप्त अनियंत्रिाक कब वोल्टता से स्थायी ;नियतद्ध कब वोल्टता प्राप्त करने के लिए हम शेनर डायोड का उपयोग करते हैं। शेनर डायोड का उपयोग करके बनाए गए वोल्टता नियंत्राक का विद्युत परिपथ आरेख चित्रा 14ण्22 में दशार्या गया है। किसी अनियंत्रिात कब वोल्टता ;दिष्टकारी का पिफल्टरित निगर्तद्ध को श्रेणी क्रम में संयोजित प्रतिरोध् त्े से होते हुए शेनर डायोड से इस प्रकार संयोजित करते हैं कि शेनर डायोड पश्चदिश्िाक बायस हो। यदि निवेशी त्ै वोल्टता में वृि होती है तो त्े तथा शेनर डायोड से प्रवाहित विद्युत धरा में भी वृि हो जाती है। इससे शेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता में कोइर् अनियंत्रिात वोल्टता ;ट द्धभी परिवतर्न हुए बिना ही त्े के सिरों पर वोल्टता में वृि हो जाती है।स् प्स् नियंत्रिातलोड इसका कारण यह है कि भंजन क्षेत्रा में शेनर वोल्टता नियत रहती है, यद्यपि वोल्टता त्स्;ट ्रद्धशेनर डायोड से प्रवाहित धरा में परिवतर्न होता है। इसी प्रकार यदि निवेशी वोल्टता घटती है तो त्े तथा शेनर डायोड से प्रवाहित विद्युत धरा भी घट जाती है। शेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता में कोइर् परिवतर्न हुए बिना त्ेचित्रा 14ण्22 वोल्टता नियंत्राक के रूप में जे़नर के सिरों पर विभवपात घट जाता है। इस प्रकार निवेशी वोल्टता में होने वालीडायोड। किसी भी कमी अथवा वृि के कारण, शेनर डायोड के सिरों पर वोल्टता में बिना कोइर् परिवतर्न हुए, त्े के सिरों पर तदनुरूपी कमी अथवा वृि हो जाती है। इस प्रकार शेनर डायोड एक वोल्टता नियंत्राक की भाँति कायर् करता है। हमें आवश्यक निगर्त वोल्टता के अनुसार ही शेनर डायोड तथा श्रेणी प्रतिरोध्क त्े का चयन करना होता है। उदाहरण 14ण्5 किसी शेनर नियंत्रिात विद्युत आपूतिर् में नियंत्राण के लिए टर् त्र 6ण्0 ट के साथ शेनर डायोड का उपयोग किया जाता है। लोड धरा का मान 4ण्0 उ। रखा जाना है तथा अनियंत्रिात निवेश वोल्टता 10ण्0 ट है। श्रेणी प्रतिरोध्क त्ै का मान क्या होना चाहिएघ् हल श्रेणी प्रतिरोध्क त्ै का मान इस प्रकार होना चाहिए कि शेनर डायोड से प्रवाहित धरा लोड धारा की तुलना में काप़्ाफी अध्िक हो। ऐसा अच्छे लोड नियंत्राण के लिए किया जाता है। शेनर धारा का चयन लोड धरा का पाँच गुना करना चाहिए, अथार्त प्र् त्र 20 उ।। अतः त्ै से प्रवाहित वुफल धरा 24 उ। है। त्ै के सिरों पर विभवपात त्र10ण्0 दृ 6ण्0 त्र 4ण्0 ट । इससे हमें प्राप्त होता है त्ै त्र 4ण्0टध्;24 × 10दृ3द्ध । त्र 167 Ω। काबर्न प्रतिरोध्क का उसके निकटतम मान 150 Ω है। अतः, इसके लिए 150 Ω का श्रेणी प्रतिरोध्क उपयुक्त होगा। ध्यान दीजिए, यहाँ प्रतिरोधक के मान में थोड़ा बहुत परिवतर्न इसमें महत्व नहीं रखता, यहाँ यह सबसे अध्िक महत्वपूणर् है कि धरा प्र् का मान सदैव ही प्स् ़से कापफी अध्िक होना चाहिए। 14ण्8ण्2 आॅप्टोइलेक्ट्राॅनिक संध्ि युक्ितयाँ हमने अब तक यह देखा है कि अनुप्रयुक्त वैद्युत निवेशों के साथ अध्र्चालक डायोड किस प्रकार व्यवहार करते हैं। इस अनुभाग में, हम ऐसे अध्र्चालक डायोडों के विषय में अध्ययन करेंगे जिनमें आवेश वाहकों की उत्पिा पफोटाॅनों ;प्रकाश्िाक उत्तेजनद्ध द्वारा होती है। इस प्रकार की सभी युक्ितयांें को आॅप्टोइलेक्ट्राॅनिक युक्ितयाँ कहते हैं। हम निम्नलिख्िात आॅप्टोइलेक्ट्राॅनिक युक्ितयों की कायर्वििा का अध्ययन करेंगे। ;पद्ध प्रकाश चालकीय डायोड ;पफोटोडायोडद्ध जिनका उपयोग प्रकाश्िात संकेतों ;सिग्नलोंद्ध के संसूचन में ;प्रकाश संसूचकद्ध होता है। ;पपद्ध प्रकाश उत्सजर्क डायोड ;स्म्क्द्ध जो विद्युत ऊजार् को प्रकाश ऊजार् में रूपांतरित करते हैं। ;पपपद्ध पफोटोवोल्टीय युक्ितयाँ,़ जो प्रकाश्िाक विकिरणों को विद्युत में रूपांतरित ;सौर सेलद्ध करती हैं। पफोटोडायोड भी एक विश्िाष्ट प्रयोजऩच.द संध्ि डायोड है जिसमें एक पारदशीर् ख्िाड़की होती है, जिससे प्रकाश - किरणें डायोड पर । ;पद्ध प्पड़ सकती हैं। यह पश्चदिश्िाक बायस में प्रचालित होता है। जब प्ाफोटोडायोड ;ीνद्ध ऊजार्, जो कि अध्र्चालक के ऊजार् अंतराल ;म्हद्ध ़़ाफोटाॅनों ;प्रकाशद्ध द्वारा प्रदीप्त होता है तो पफोटाॅनोंसे अध्िक है, के प्के अवशोषण के कारण इलेक्ट्राॅन - होल के युगल उत्पन्न होते हैं। डायोड इस प्रकार बनाए जाते हैं कि म.ी युगलों का जनन डायोड के ”ासी क्षेत्रा में या इसके समीप होता है। संध्ि के विद्युत क्षेत्रा के उ। कारण इलेक्ट्राॅन तथा होल पुनःसंयोजन से पूवर् पृथक हो जाते हैं। विद्युत क्षेत्रा की दिशा इस प्रकार होती है कि इलेक्ट्राॅन द.पफलक पर तथा होल च.पफलक पर पहुँचते हैं, जिसके कारण एक मउ िउत्पन्न होता है। जब इसके साथ कोइर् बाह्य लोड संयोजित कर देते हैं तो वोल्ट विद्युत धरा प्रवाहित होने लगती है। इस प्रकाश विद्युत धरा का प्1 परिमाण आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निभर्र करता है ;प्रकाश प्2 प्विद्युत धरा आपतित प्रकाश की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती हैद्ध। प्4 । यह आसानी से प्रेक्षण किया जा सकता है कि यदि पश्चदिश्िाक प् झ प् झ प् झ प्4321 बायस है तो प्रकाश की तीव्रता में परिवतर्न के साथ विद्युत धरा में ;इद्ध किस प्रकार परिवतर्न होता है। इस प्रकार किसी प़्ाफोटोडायोड का चित्रा 14ण्23 ;ंद्ध पश्चदिश्िाक बायस में प्रदीप्त पफोटोडायोड़उपयोग प्रकाश्िाक सिग्नलों के संसूचन के लिए प्रकाश संसूचक ;इद्ध विभ्िान्न प्रदीप्त तीव्रताओं प् झ प् झ प् झ प् के लिए4 3 21;पफोटोसंसूचकद्ध की भाँति किया जा सकता है। चित्रा 14ण्23 में पश्चदिश्िाक बायस धाराएँ।किसी प़्ाफोटोडायोड का प्.ट अभ्िालाक्षण्िाक की माप के लिए विद्युत परिपथ आरेख दशार्या गया है। उदाहरण 14ण्6 यह ज्ञात है कि पश्चदिश्िाक बायस की धारा ;् माइक्रो ऐम्िपयरद्ध की तुलना में अग्रदिश्िाक बायस की धारा ;् मिली ऐम्िपयरद्ध अिाक होती है तो पिफर पफोटोडायोड को पश्चदिश्िाक बायस में प्रचालित करने का क्या कारण है? हल द.प्रकार के अध्र्चालक पर विचार करें। स्पष्टतया, बहुसंख्यक वाहकों का घनत्व ;दद्ध अल्पांश होल घनत्व च से बहुत अिाक है ;द झझ चद्ध। मान लीजिए प्रदीप्त करने पर, दोनों प्रकार के वाहकों की संख्या में वृि क्रमशः Δद तथा Δच है, तब द′ त्र द ़ Δद च′ त्र च ़ Δच यहाँ पर द′ तथा च′ क्रमशः किसी विश्िाष्ट प्रदीप्त पर इलेक्ट्राॅन तथा होल सांद्रताएँ हैं तथा द व च उस समय की वाहक सांद्रताएँ हैं जब कोइर् प्रदीप्त नहीं है। ’ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कोइर् म.ी युगल उत्पन्न करने के लिए हमें वुफछ ऊजार् ;प्रकाश्िाक उत्तेजन, ऊष्मीय उत्तेजन आदिद्ध खचर् करनी पड़ती है। अतः, जब कोइर् इलेक्ट्राॅन तथा होल पुनयोर्जित होते हैं, तो प्रकाश ;विकिरणी पुनयोर्जनद्ध अथवा ऊष्मा ;अविकिरणी पुनयोर्जनद्ध के रूप में ऊजार् मुक्त होती है। यह अध्र्चालक तथा च.द संध्ि के निमार्ण की विध्ि पर निभर्र करती है। स्म्क्े अध्र्चालकों के भौतिकी याद रखें कि Δद त्र Δच और द झझ च । इसलिए बहुसंख्यक वाहकों में भ्िान्नात्मक अंतर ;Δदध्दद्ध अल्पांश वाहकों ;Δचध्चद्ध की तुलना में बहुत कम होगा। आमतौर पर हम यह कह सकते हैं कि प्रकाश - प्रभावों के कारण अल्पांश वाहकों द्वारा पश्चदिश्िाक बायस धारा में भ्िान्नात्मक अंतर, अग्रदिश्िाक बायस धारा के भ्िान्नात्मक अंतर की अपेक्षा अिाक आसानी से नापा जा सकता है। इसलिए, प्रकाश की तीव्रता नापने के लिए पफोटोडायोड को वरीयता से पश्चदिश्िाक बायस स्िथति में उपयोग किया जाता है। ;पपद्ध प्रकाश उत्सजर्क डायोड यह एक अत्यध्िक अपमिश्रित च.द संध्ि डायोड होता है जो अग्रदिश्िाक बायस में स्वतः विकिरणों का उत्सजर्न करता है। यह डायोड पारदशीर् आवरण में बंद होता है ताकि इसके द्वारा उत्सजिर्त विकिरण ;प्रकाशद्ध बाहर आ सके। जब डायोड अग्रदिश्िाक बायसित होता है तो इलेक्ट्राॅन द → च की ओर ;जहाँ वे अल्पांश वाहक हैंद्ध तथा होल च → द की ओर ;जहाँ वे अल्पांश वाहक हैंद्ध भेजे जाते हैं। संध्ि की सीमा पर अल्पांश वाहकों की सांद्रता साम्यावस्था की सांद्रता ;अथार्त जब कोइर् बायस नहीं हैद्ध की तुलना में अिाक हो जाती है। इस प्रकार संध्ि सीमा के दोनों पफलकों, अल्पांश वाहकों की अध्िकता हो जाती है जो संध्ि के निकट वाहकों के साथ पुनयोर्जित हो जाते हैं। पुनयोर्जित होने पर पफोटाॅनों के रूप में ऊजार् मुक्त होती है। उत्सजिर्त पफोटाॅनों की ऊजार् बैड अन्तराल के बराबर अथवा इससे वुफछ कम होती है। जब डायोड की अग्रदिश्िाक धरा अल्प होती है तो उत्सजिर्त प्रकाश की तीव्रता कम होती है। जैसे - जैसे अग्रदिश्िाक धरा में वृि होती जाती है, प्रकाश की तीव्रता में भी वृि होती जाती है और यह अध्िकतम हो जाती है। इसके आगे अग्रदिश्िाक धरा में अध्िक वृि होने पर प्रकाश की तीव्रता घटने लगती है। प्रकाश उत्सजर्क डायोडों ;स्म्क्द्ध को इस प्रकार बायसित किया जाता है कि इनकी प्रकाश उत्सजर्न दक्षता अध्िकतम हो। स्म्क् का ट.प् अभ्िालाक्षण्िाक सिलिकाॅन संध्ि डायोड के अभ्िालाक्षण्िाक के समान होता है। परंतु इनकी देहली वोल्टता तुलना में कहीं अध्िक तथा प्रत्येक वणर् के लिए थोड़ी भ्िान्न होती है। स्म्क् की पश्च भंजन वोल्टता बहुत कम, प्रतीकात्मक रूप में लगभग 5ट होती है। अतः यह सावधानी बरतनी चाहिए कि इनके पार उच्च पश्चदिश्िाक वोल्टताएँ न हों। ऐसे स्म्क्े जो लाल, पीला, नारंगी, हरा तथा नीला प्रकाश उत्सजिर्त कर सकते हैं, बाशारों में उपलब्ध् हैं। जिन अध्र्चालकों का उपयोग दृश्य स्म्क् के निमार्ण में होता है उनका बैंड अंतराल कम - से - कम 1ण्8 मट होना चाहिए ;दृश्य प्रकाश का स्पेक्ट्रमी परिसर लगभग 0ण्4 - उ से0ण्7 - उ ाफोस्पफाइड ;ळं।ेच् द्ध का उपयोग विभ्िान्न वणो± के स्म्क् के निमार्ण में होता है। ळं।े च्1दृगग0ण्60ण्4 ;म्ह ् 1ण्9 मटद्ध का उपयोग लाल स्म्क् बनाने में होता है। ळं।े ;म्ह ् 1ण्4 मटद्ध का उपयोग अवरक्त स्म्क् बनाने में होता है। इन स्म्क् का बृहत रूप में उपयोग सुदूर नियंत्राण, चोर घंटी संयंत्रों, प्रकाश्िाक संचार आदि में किया जाता है। श्वेत स्म्क् विकसित करने के लिए विस्तारित अनुसंधान किए जा रहे हैं। ये स्म्क् तापदीप्त लैंपों को प्रतिस्थापित कर सकते हैं। स्म्क् के कम शक्ित पारंपरिक तापदीप्त लैंपों की तुलना में निम्नलिख्िात लाभ हंै - ;पद्ध निम्न प्रचालन वोल्टता तथा अपेक्षाकृत कम शक्ित। ;पपद्ध शीघ्र िया, गरम होने के लिए कोइर् समय नहीं चाहिए। ;पपपद्ध उत्सजिर्त प्रकाश की बैंड चैड़ाइर् 100 ऊ से 500 ऊए अथवा दूसरे शब्दों में यह लगभग ;परंतु यथाथर् रूप में नहींद्ध एक - वणीर् प्रकाश उत्सजिर्त करता है। ;पअद्ध अध्िक आयु तथा सुदृढ़ ;अद्ध तीव्र ‘आॅन - आॅप़्ाफ’ होने की क्षमता ;पपपद्ध सौर सेल है अथार्त लगभग 3 मट से 1ण्8 मट तक होता हैद्ध। यौगिक अध्र्चालक गैलियम आसेर्नाइड - प़़्उत्पन्न करती है। यह पफोटोडायोड के सि(ांत ;प़्ाफोटोवोल्टीय प्रभावद्ध ़पर ही कायर् करता है। केवल इतना ही अंतर है कि कोइर् बाह्य बायस अनुप्रयुक्त नहीं की जाती तथा संध्ि का क्षेत्रापफल सौर विकिरणों के आपतन के लिए काप़्ाफी अध्िक रखा जाता है, इसका कारण यह है कि हमारी रुचि अध्िक शक्ित प्राप्त करने में होती है। चित्रा 14ण्24 में एक सरल च.द संध्ि सौर सेल दशार्या गया है। लगभग 300 - उ मोटी च.ैप पटलिका ली जाती है जिसके एक पफलक पर द.ैप की एक पतली ;्0ण्3 - उद्ध परत विसरण प्रिया द्वारा व£ध्त की जाती है। च.ैप के दूसरे पफलक पर कोइर् धतु का लेपन ;पश्च स्पशर्द्ध किया जाता है। द.ैप सतह के शीषर् पर धातु ¯पफगर इलेक्ट्रोड ;डमजंससपेमक पिदहमत मसमबजतवकम अथवा घात्िवक गि्रडद्ध निक्षेपित करते हैं। यह अग्र संपवर्फ की भाँति कायर् करता है। घात्िवक गि्रड सेल के क्षेत्रापफल का बहुत थोड़ा भाग ;ढ15ःद्ध घेरती चित्रा 14ण्24 ;ंद्ध एक प्रतिरूपी च.द संिा सौर सेल, है ताकि सेल पर प्रकाश शीषर् से आपतित हो सके। ;इद्ध सौर सेल का परिच्छेद दृश्य। प्रकाश पड़ने पर सौर सेल द्वारा मउ िउत्पन्न होना निम्नलिख्िात तीन मूल प्रियाओं के कारण है, ये तीन प्रियाएँ हैं - जनन, पृथकन तथा संग्रह - ;पद्ध संध्ि के निकट प्रकाश ;ीν झ म्ह के साथद्ध के कारण इलेक्ट्राॅन होल ;म.ीद्ध युगलों का जननऋ ;पपद्ध ”ासी क्षेत्रा के विद्युत क्षेत्रा के कारण इलेक्ट्राॅनों व होलों का पृथकन। प्रकाश जनित इलेक्ट्राॅन द.पफलक की ओर तथा होल च.पफलक की ओर चलते हैंऋ ;पपपद्ध द.पफलक पर पहुँचने वाले इलेक्ट्राॅन अग्र संपवर्फ द्वारा संग्रह किए जाते हैं तथा च.पफलक पर पहुँचने वाले होल पश्च संपवर्फ द्वारा संग्रह किए जाते हैं। इस प्रकार च.पफलक ध्नात्मक तथा द.पफलक )णात्मक हो जाता है जिसके पफलस्वरूप पफोटोवोल्टता़ प्राप्त ;उत्पन्नद्ध होती है। जब चित्रा 14ण्25;ंद्ध में दशार्ए अनुसार कोइर् बाह्य लोड संयोजित किया जाता है तो लोड से एक प्रकाश धरा प्स् प्रवाहित होती है। चित्रा 14ण्25;इद्ध में किसी सौर सेल का प्रतिरूपी प्दृट अभ्िालाक्षण्िाक वक्र दशार्या गया है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सौर सेल के प्दृट अभ्िालाक्षण्िाक को निदेर्शांक अक्षों के चैथे चतुथा±श में खींचा गया है। इसका कारण यह है कि सौर सेल कोइर् विद्युत धरा नहीं लेता वरन यह लोड को विद्युत धरा की आपूतिर् करता है। सौर सेलों के निमार्ण के लिए आदशर् पदाथर् के रूप में उन अधर्चालकों को लेते हैं जिनका बैंड अंतराल 1ण्5 मट के निकट होता है। सौर सैलों के निमार्ण के लिए प्रयुक्त होने वाले अध्र्चालक पदाथर् जैसे ैप ;म्ह त्र 1ण्1 मटद्धए ळं।े ;म्ह त्र 1ण्43 मटद्धए ब्कज्म ;म्ह त्र 1ण्45 मटद्धए ब्नप्दैम2 ;म्ह त्र 1ण्04 मटद्ध आदि हैं। सौर सैलों के निमार्ण के लिए पदाथो± के चयन के लिए मुख्य कसौटियाँ हैं: ;पद्ध बैंड अंतराल ;्1ण्0 से1ण्8 मटद्धए ;पपद्ध अिाक प्रकाश अवशोषण क्षमता ;्104 बउदृ1द्धए ;पपपद्ध वैद्युत चालकताए ;पअद्ध कच्चे चित्रा 14ण्25 ;ंद्ध एक प्रतिरूपी प्रदीप्त च.द संिा, ;इद्धपदाथर् की उपलब्ध्ता, तथा ;अद्ध लागत। ध्यान दीजिए, सौर सेलों को सदैव सौर सेल का ट.प् अभ्िालाक्षण्िाक वक्र।ही तेज सूयर् के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। कोइर् भी प्रकाश जिसकी ऊजार् बैंड अंतराल से अध्िक हो, उपयोगी हो सकता है। सौर सेलों का उपयोग उपग्रहों में उपयोग होने वाली इलेक्ट्राॅनिक युक्ितयों, अंतरिक्ष यानों तथा वुफछ वैफलवुफलेटरों की विद्युत आपूतिर् के लिए भी किया जाता है। बृहत पैमाने पर सौर ऊजार् का उपयोग करने के लिए कम लागत के पफोटोवोल्टीय सेलों का उत्पादन अनुसंधन का विषय है। ़भौतिकी 14ण्9 संध्ि ट्रांिास्टर सन् 1947 में ट्रांिास्टर के आविष्कार का श्रेय बेल टेलीप़्ाफोन प्रयोगशाला न्ण्ैण्।ण् के जे. बारडीन तथा डब्ल्यू.एच. ब्रेटन को जाता है। यह ट्रांिास्टर एक ¯बदु सम्पवर्फ ट्रांिास्टर था। पहले संध्ि ट्रांिास्टर का आविष्कार 1951 में विलियम शाॅकले ने दो च.द संध्ियों को एक - दूसरे के पश्च पफलकों को जोड़कर किया था। जब तक केवल संध्ि ट्रांिास्टर ज्ञात था, इसे केवल ट्रांिास्टर कहकर जाना जाता था। परंतु समय के साथ नए - नए ट्रांिास्टरों का आविष्कार हुआ तथा नए ट्रांिास्टर को पुरानों से भेद करने आज जब कोइर् भ्रांति नहीं है तब भी प्रायः ठश्रज् को ट्रांिास्टर ही कहते हैं। चूँकि हमारा अध्ययन केवल ठश्रज् तक ही सीमित है, इसलिए हम बिना किसी संदिग्ध्ता के ठश्रज् के लिए ट्रांिास्टर शब्द का ही उपयोग करेंगे। 14ण्9ण्1 ट्रांिास्टर: संरचना तथा िया किसी ट्रांिास्टर में तीन अपमिश्रित क्षेत्रा होते हैं जो मिलकर अपने बीच में दो च.द संध्ियाँ बनाते हैं। अतः स्पष्ट है कि ट्रांिास्टर चित्रा 14ण्27 में दशार्ए अनुसार दो प्रकार के होते हैं। ;पद्धद.च.द ट्रांिास्टर दृ इसमें द.प्रकार के अध्र्चालक के दो खंड ;उत्सजर्क तथा संग्राहकद्ध च.प्रकार के अध्र्चालक के एक खंड ;आधरद्ध द्वारा पृथक किए जाते हैं। ;पपद्ध च.द.च ट्रांिास्टर दृ इसमें च.प्रकार के अध्र्चालक के दो खंड ;उत्सजर्क तथा संग्राहकद्ध द.प्रकार के अध्र्चालक के एक खंड ;आधरद्ध द्वारा पृथक किए जाते हैं। चित्रा 14ण्27;ंद्ध में किसी च.द.च तथा द.च.द विन्यास के व्यवस्थात्मक निरूपण दशार्ए गए हैं। किसी ट्रांिास्टर के तीनों खंडों की मोटाइर् भ्िान्न - भ्िान्न होती है। उनके अपमिश्रण स्तर भी भ्िान्न होते हैं। च.द.च तथा द.च.द ट्रांिास्टरों को निरूपित करने वाले व्यवस्थात्मक प्रतीकों में ख्चित्रा 14ण्27;इद्ध, तीर के चिÉ ट्रांिास्टर में प्रवाहित रूढ़ धरा की दिशा दशार्ते हैं। इन ट्रांिास्टरों के संक्ष्िाप्त वणर्न नीचे दिए गए हैं: ऽ उत्सजर्क ;म्उपजजमतद्ध दृ यह चित्रा14ण्27;ंद्ध में दशार्ए अनुसार ट्रांिास्टर की एक ओर का खंड होता है। यह मध्यम साइश का परंतु अत्यध्िक अपमिश्रित होता है। यह ट्रांिास्टर में प्रवाहित धारा के लिए बहुसंख्यक आवेश वाहक की अत्यध्िक मात्रा में आपूतिर् करता है। ऽ आधर ;ठंेमद्ध - यह वेंफद्रीय खंड होता है। यह अत्यंत पतला तथा कम अपमिश्रित होता है। ऽ संग्राहक ;ब्वससमबजवतद्ध - यह खंड उत्सजर्क द्वारा प्रदान किए गए बहुसंख्यक आवेश वाहकों के अध्िकांश भाग का संग्रहण करता है। संग्राहक पफलक साधरण अपमिश्रित होता है परंतु साइश में यह उत्सजर्क से बड़ा होता है। हम पहले यह देख चुके हैं कि किसी च.द संध्ि के प्रकरण में संध्ि के आर - पार एक ”ासी क्षेत्रा बन जाता है। किसी ट्रांिास्टर में उत्सजर्क - आधर संध्ि तथा आधर - संग्राहक संध्ि पर ”ासी क्षेत्रा बनते हैं। किसी ट्रांिास्टर की कायर् प्रणाली को समझने के लिए हमें इन संिायों पर बने ”ासी क्षेत्रों की प्रकृति को जानना होगा। जब किसी ट्रांिास्टर के ट£मनलों पर उचित वोल्टता अनुप्रयुक्त की जाती है तो ट्रांिास्टर के विभ्िान्न क्षेत्रों में आवेश वाहक गति करते हैं। ट्रांिास्टर का बायसन् भ्िान्न - भ्िान्न प्रयोजनों के लिए भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार से किया जाता है। ट्रांिास्टर का उपयोग स्पष्ट रूप से दो प्रकार से किया जा सकता है। मूल रूप से इसका आविष्कार प्रवध्र्क की भाँति कायर् करने के लिए किया गया था जो किसी सिग्नल की आविार्त प्रति उत्पन्न करता है। परंतु शनैः - शनैः इसका स्िवच के रूप में भी समान उपयोग किया जाने लगा। हम इन दोनों ही प्रकायो± के विषय में अध्ययन करके यह सीखेंगे कि किस प्रकार ट्रांिास्टर को बायसित करके ये पारस्परिक एकांतरिक प्रकायर् कायार्न्िवत किए जाते हैं। सवर्प्रथम हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि ट्रांिास्टरों को प्रवध्र्न क्षमताएँ कौन प्रदान करता है। ट्रांिास्टर अपने उत्सजर्क - आधर संध्ि के अग्रदिश्िाक बायसन्, तथा आधर - संग्राहक संध्ि के पश्चदिश्िाक बायसन् में प्रवध्र्क की भाँति कायर् करता है। इस स्िथति में चित्रा 14ण्28 में इन बायसों को क्रमशः टतथा टद्वारा उत्पन्न करते हुए दशार्या गया है। जब ट्रांिास्टर को इसब्ब् म्म् ढंग से बायसित किया जाता है तो इसे इसकी सिय अवस्था कहते हैं। हम उत्सजर्क तथा आधार के बीच वोल्टता को टम्ठ तथा संग्राहक तथा आधर के बीच की वोल्टता को टब्ठ द्वारा निरूपित उत्सजर्क आधर संग्राहक म् चदद ठ ;पद्ध उत्सजर्क आधर संग्राहक म् चचद ठ ;पपद्ध ;ंद्ध उत्सजर्क संग्राहक आधर ;पद्ध उत्सजर्क संग्राहक आधर ;पपद्ध ;इद्ध चित्रा 14ण्27 ;ंद्ध द.च.द ट्रांिास्टर तथा च.द.च ट्रांिास्टर का व्यवस्थात्मक निरूपण और ;इद्ध द.च.द तथा च.द.च ट्रांिास्टर के लिए संकेत। भौतिकी द.आधर करते हैं। चित्रा 14ण्28 में दोनों विद्युत प्रदाय उभयनिष्ठ टमिर्नलच.उत्सजर्क क्षेत्रा च.संग्राहक द्वद्वद्व प्म् आधार से संयोजित हैं, जबकि इनके अन्य टमिर्नल क्रमशः उत्सजिर्क तथा संग्राहक से संयोजित हैं। अतः इन दो विद्युत प्रदायों को क्रमशः टतथा टद्वारा निरूपित करते हैं। उन परिपथों जिनमें उत्सजर्कम्म् ब्ब् उभयनिष्ठ टमिर्नल होता है, उनमें आधर तथा उत्सजर्क के बीच संयोजित विद्युत प्रदाय को टठठ तथा संग्राहक उत्सजर्क के बीच संयोजित विद्युत प्रदाय को टब्ब् द्वारा निरूपित किया जाता है। आइए अब हम ट्रांिास्टर में धरा वाहकों के पथों के विषय में प्ब् जानकारी प्राप्त करें जो उत्सजर्क - आधर संध्ि पर अग्रदिश्िाक वायसित तथा आधर - संग्राहक संध्ि पर पश्चदिश्िाक बायसित है। अत्यध्िक अपमिश्रित उत्सजर्क में बहुसंख्यक वाहकों की उच्च सांद्रता होती है, जिसमें होल च.द.च ट्रांिास्टरों में तथा इलेक्ट्राॅन द.च.द ट्रांिास्टरों में बहुसंख्यक वाहक होते हैं। ये बहुसंख्यक वाहक आधर क्षेत्रा में अत्यध्िक संख्या में प्रवेश करते हैं। आधर अत्यध्िक पतला तथा कम मात्रा में अपमिश्रित होता है। अतः वहाँ पर बहुसंख्यक वाहकों की संख्या कम होती है। च.द.च ट्रांिास्टर में, आधर में क्योंकि यह द.प्रकार का अध्र्चालक है, अतः बहुसंख्यक वाहक इलेक्ट्राॅन होते हैं। उत्सजर्क से आधर में प्रवेश करने वाले अिाकांश होल वहाँ उपस्िथत इलेक्ट्राॅन की कम संख्या को अपने में समा लेते हैं। चूँकि आधर - संग्राहक संध्ि पश्चदिश्िाक बायस होती है, प्म् इलेक्ट्राॅन होल ये होल, जो इस संध्ि पर अल्पांश वाहक के रूप में प्रतीत होते हैं,प्ब्टम्ठ प्ठ टब्ठ संध्ि को आसानी से पार करके संग्राहक में पहुँच जाते हैं। आधर में उपस्िथत होल या तो बाहर से आने वाले इलेक्ट्राॅनों से संयोग करने के लिए आधर टमिर्नल की ओर गति करते हैं अथवा संग्राहक में प्रवेश करने के लिए संध्ि को पार करके संग्राहक टमिर्नल पर पहुँच जाते हैं। आधर को इसलिए पतला बनाया जाता है ताकि होल स्वयं चित्रा 14ण्28 बायस वोल्टता का अनुप्रयोग रू ;ंद्ध च.द.च को पश्चदिश्िाक बायसित आधर संग्राहक संध्ि के निकट पाकरट्रांजिस्टर तथा ;इद्ध द.च.द ट्रांजिस्टर। आधर टमिर्नल पर न जाकर संध्ि को पार कर लें। यहाँ ध्यान देने योग्य रोचक बात यह है कि अग्रदिश्िाक बायस होने के कारण एक बृहत धारा उत्सजर्क - आधर संध्ि में प्रवेश करती है, परंतु उसके अध्िकांश भाग को संलग्न पश्चदिश्िाक बायसित आधर - संग्राहिक संध्ि की ओर मोड़ दिया जाता है तथा आधर से आने वाली धरा संध्ि में प्रवेश करने वाली धरा का एक बहुत छोटा अंश ही होती है। यदि हम अग्रदिश्िाक बायस संध्ि को पार करने वाली होल धरा तथा इलेक्ट्राॅन धरा को क्रमशऋ प्ी तथा प्म से निरूपित करें तो अग्रदिश्िाक बायस डायोड में प्रवाहित वुफल धरा का योग प्ी ़ प्म होगा। हम यह पाते हैं कि उत्सजर्क धरा प्म् त्र प् ़ प् परंतु आधर धराप्ठ ढढ प् ़ प् क्योंकि प् का अध्िकांश भागी म ीमम आधर टमिर्नल से बाहर आने की बजाय संग्राहक में चला जाता है। अतः आधर धरा उत्सजर्क धारा का एक बहुत छोटा अंश होती है। बाहर से उत्सजर्क में प्रवेश करने वाली धरा उत्सजर्क धरा प्म् के बराबर होती है। इसी प्रकार आधर ट£मनल से निगर्त धराप्ठ है तथा संग्राहक टमिर्नल से निगर्त धरा प्ब् है। अतः ऊपर दिए गए तवर्फ से स्पष्ट है ख्तथा चित्रा 14ण्28;ंद्ध में किरखोपफ नियम के संध्ि अनुप्रयोग द्वारा भी़, कि उत्सजर्क धरा प्म्ए संग्राहक धरा प् ब तथा आधर धरा प्ठ का योग है। अथार्तदृ प्म् त्र प्ब् ़ प्ठ ;14ण्7द्ध हम यह भी पाते हैं कि प्ब् ≈ प्म् यहाँ पर होलों की गति की दिशा का विवरण रूढ़ धरा की दिशा के सवर्सम है। परंतु इलेक्ट्राॅनों की गति की दिशा धरा की दिशा के ठीक विपरीत है। इस प्रकार किसी च.द.च ट्रांिास्टर में धारा उत्सजर्क से आधर में प्रवेश करती है जबकि द.च.द ट्रांिास्टर में धरा आधर से उत्सजर्क में प्रवेश करती है। उत्सजर्क में तीरशीषर् रूढ़ धरा की दिशा को दशार्ते हैं। किसी द.च.द ट्रांिास्टर में बहुसंख्यक तथा अल्पांश वाहकों द्वारा अपनाए गए पथों के विवरण च.द.च ट्रांिास्टर के समान ही हैं। परंतु चित्रा 14ण्28 में दशार्ए अनुसार धरा के पथ एक - दूसरे के ठीक विपरीत है। चित्रा 14ण्28;इद्ध इलेक्ट्राॅन बहुसंख्यक वाहक हैं जिनकी आपूतिर् द.प्रकार के क्षेत्रा द्वारा की जाती है। ये पतले च.प्रकार के आधर क्षेत्रा को पार करते हैं और संग्राहक पर पहुँच कर संग्राहक धरा प्ब् देते हैं। उपरोक्त विवरण से हम यह निष्कषर् निकाल सकते हैं कि ट्रांिास्टर की सिय अवस्था में उत्सजर्क आधर संध्ि एक कम प्रतिरोध् के रूप में कायर् करती है जबकि आधर - संग्राहक संध्ि उच्च प्रतिरोध् के रूप में कायर् करती है। 14ण्9ण्2 मूल ट्रांिास्टर परिपथ विन्यास तथा ट्रांिास्टर अभ्िालाक्षण्िाक किसी ट्रांिास्टर में केवल तीन टमिर्नल उपलब्ध् होते हैं - उत्सजर्क ;म्द्धए आधर ;ठद्ध तथा संग्राहक ;ब्द्ध। अतः किसी परिपथ में निवेश/निगर्त संयोजन इस प्रकार के होने चाहिए कि इनमें से कोइर् एक ;म्ए या ठ या ब्द्ध निवेश तथा निगर्त में उभनिष्ठ हो। इसलिए किसी ट्रांिास्टर को निम्नलिख्िात तीन विन्यासों में से किसी एक विन्यास में संयोजित किया जा सकता है। उभयनिष्ठ उत्सजर्क ;ब्म्द्धए उभयनिष्ठ आधर ;ब्ठद्धए तथा उभयनष्िठ संग्राहक ;ब्ब्द्ध ट्रांिास्टरों का अध्िक व्यापक उपयोग उभयनिष्ठ उत्सजर्क ब्म् विन्यास में किया जाता है अतः हम अपनी चचार् को केवल इसी विन्यास तक ही सीमित रखेंगे। चूँकि द.च.द सिलिकाॅन ट्रांिास्टरों का उपयोग अध्िक सामान्य है। हम अपनी चचार् इसी ट्रांिास्टर तक ही सीमित रखेंगे। च.द.च ट्रांिास्टर से व्यवहार करते समय बाह्य विद्युत आपूतिर् की ध्ु्रवता उत्क्रमित करनी होती है। उभयनिष्ठ उत्सजर्क ट्रांिास्टर अभ्िालाक्षण्िाक जब ट्रांिास्टर का उपयोग ब्म् विन्यास में करते हैं तो निवेश आधर तथा उत्सजर्क के बीच तथा निगर्त संग्राहक तथा उत्सजर्क के बीच होता है। आधार उत्सजर्क वोल्टता में टठम् परिवतर्न के साथ आधर धरा प्ठ में परिवतर्न होना निवेश अभ्िालाक्षण्िाक कहलाता है। इसी प्रकार संग्राहक - उत्सजर्क वोल्टता टब्म् में परिवतर्न के साथ संग्राहक धरा प्ब् में परिवतर्न होना निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक कहलाता है। आप यह देखेंगे कि निगर्त अभ्िालाक्षण्िाकों को निवेश अभ्िालाक्षण्िाक नियंत्रिात करते हैं। इससे यह ध्वनित होता है कि आधार धरा के साथ संग्राहक धरा में भी परिवतर्न होता है। चित्रा 14ण्29 में दशार्ए गए परिपथ का उपयोग करके किसी द.च.द ट्रांिास्टर के निवेश अभ्िालाक्षण्िाक तथा निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक का अध्ययन किया जा सकता है। ब्अभ्िाविन्यास में निवेश अभ्िालाक्षण्िाक का अध्ययन करने के लिएम् 495 भौतिकी आधर धरा प्ठ तथा आधर - उत्सजर्क वोल्टता टठम् के बीच ग्राप़्ाफ ;एक वक्रद्ध खींचा जाता है। टठम् पर प्ठ की निभर्रता का अध्ययन करने के लिए संग्राहक उत्सजर्क - वोल्टता टब्म् को नियत रखा जाता है। हमारी रुचि उस समय निवेश अभ्िालाक्षण्िाक प्राप्त करने में होती है जब ट्रांिास्टर सिय अवस्था में हो। अतः संग्राहक - उत्सजर्क वोल्टता टब्म् को इतना अध्िक रखा जाता है कि आधर संग्राहक संध्ि पश्चदिश्िाक बायसित रहे। चूँकि टब्म् त्र टब्ठ ़ टठम् तथा ैप ट्रांिास्टर के लिए टठम् का मान 0ण्6 से 0ण्7 ट होता है। अतः टब्म् ए 0ण्7 ट से काप़्ाफी अध्िक होना चाहिए। चूँकि टब्म् के बड़े परिसर में ट्रांिास्टर का प्रचालन प्रवधर्क रूप में किया जाता है, अतः अध्िकांश समय तक आधार - संग्राहक संध्ि उच्च पश्चदिश्िाक बायसित रहती है। अतः टब्म् के मान लगभग 3 ट से 20 ट के परास में रखकर निवेश अभ्िालाक्षण्िाक प्राप्त किए जा सकते हैं। चूँकि टमें वृि टब्म् ब्ठ में वृि के रूप में प्रतीत होती है, इसका प्ठ पर प्रभाव नगण्य है। इसके परिणामस्वरूप, टब्म् के विभ्िान्न मानों के लिए निवेश अभ्िालाक्षण्िाकों के वक्र लगभग सवर्सम होते हैं। अतः केवल एक निवेश अभ्िालाक्षण्िाक निधर्रित ;खींचनाद्ध ही पयार्प्त होता है। चित्रा 14ण्30;ंद्ध में किसी ट्रांिास्टर का प्रारूपी निवेश अभ्िालाक्षण्िाक दशार्या गया है। प्को नियत रखकर टमें परिवतर्न के साथ प्में परिवतर्नठब्म् ब् का प्रेक्षण करने पर निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक प्राप्त किया जा सकता है। यह स्पष्ट है कि जब टठम् में लघु वृि करते हैं तो उत्सजर्क क्षेत्रा से होल धरा तथा आधर क्षेत्रा से इलेक्ट्राॅन धरा दोनों में वृि चित्रा 14ण्30 ;ंद्ध प्ररूपी निवेश अभ्िालाक्षण्िाक तथा होती है। इसके परिणामस्वरूप प्ठ तथा प्ब् दोनों में आनुपातिक रूप ;इद्ध प्ररूपी निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक। में वृि होती है। इससे यह प्रदश्िार्त होता है कि जब प्ठ में वृि होती है तो प्में भी वृि होती है। प्के विभ्िान्न नियत मानों पर प्तथा टके बीच खींचे गएब् ठ ब् ब्म् वक्रों से हमें निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक प्राप्त होते हैं। अतः चित्रा 14ण्30;इद्ध में दशार्ए अनुसार आधर धारा प्ठ के विभ्िान्न मानों के लिए भ्िान्न - भ्िान्न निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक होते हैं। इन दोनों - निवेश तथा निगर्त अभ्िालाक्षण्िाकों के रैख्िाक खंडों का उपयोग ट्रांिास्टरों के वुफछ महत्वपूणर् ंब प्राचलों के परिकलन में नीचे दिए अनुसार किया जा सकता है। ;पद्ध निवेश प्रतिरोध् ;तपद्ध रू इसे इस प्रकार परिभाष्िात किया जाता है, नियत संग्राहक - उत्सजर्क वोल्टता ;टब्म्द्ध पर आधर - उत्सजर्क वोल्टता में परिवतर्न ;Δटठम्द्ध के परिणामस्वरूप आधर धारा में परिणामी अंतर ;Δप्ठद्ध के अनुपात को निवेश प्रतिरोध् कहते हैं। यह परिवतर्नात्मक ;ंब प्रतिरोधद्ध है तथा इसे निवेश अभ्िालाक्षण्िाक द्वारा पता भी लगाया जा सकता है कि इसका मान ट्रांिास्टर की प्रचालन धरा के साथ परिवतिर्त होता है। Δट तप त्र ठम् ;14ण्8द्धΔप्ठ टब्म् 496 तप का मान वुफछ सैकड़ों से वुफछ हशारों ओम तक वुफछ भी हो सकता है। ;पपद्ध निगर्त प्रतिरोध् ;तवद्ध रू इसे इस प्रकार परिभाष्िात किया जाता है, नियत आधर धरा प्ठ पर संग्राहक - उत्सजर्न वोल्टता में अंतर ;Δटब्म्द्ध तथा संग्राहक धरा में परिणामी अंतर ;Δप्ब्द्ध के अनुपात को निगर्त प्रतिरोध् ;त वद्ध कहते हैं। Δटब्म् त त्र व ;14ण्9द्धΔप्ब् प्ठ निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक यह दशार्ते हैं कि आरम्भ में टब्म् के अति लघु मानों के लिए प्ब् में लगभग रैख्िाकतः वृि होती है। इसका कारण यह है कि आधर - संग्राहक संध्ि पश्चदिश्िाक बायसित नहीं है तथा ट्रांिास्टर सिय अवस्था में नहीं है। वास्तव में, ट्रांिास्टर संतृप्त अवस्था में है तथा अभ्िालाक्षण्िाक के इस भाग में, धरा को आपू£त वोल्टता ट;त्रटद्ध द्वारा नियंत्रिात किया जाता है।ब्ब् ब्म्जब टब्म् का मान आधर - संग्राहक संध्ि को पश्चदिश्िाक बायसित करने के लिए आवश्यक वोल्टता से अध्िक होता है तो टब्म् में परिवतर्न के साथ प्ब् में बहुत कम वृि होती है। निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक के रैख्िाक भाग के ढलान का प्रतिलोम निगर्त प्रतिरोध् त व प्रदान करता है। ट्रांिास्टर के निगर्त प्रतिरोध् को मुख्यतः आधर - संग्राहक संध्ि के बायस द्वारा नियंत्रिात किया जाता है। निगर्र्त प्रतिरोध् के उच्च परिमाण ;100 ाΩ कोटि काद्ध होने का कारण इस डायोड का पश्चदिश्िाक बायसित होना है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक के आरम्िभक भाग पर जबकि ट्रांिास्टर संतृप्त अवस्था में है, प्रतिरोध् बहुत कम क्यों होता है। ;पपपद्ध धरा प्रवध्र्क गुणांक ;β द्ध रू इसे इस प्रकार परिभाष्िात किया जाता है, नियत संग्राहक - उत्सजर्क वोल्टता ;टब्म्द्ध पर संग्राहक धरा में परिवतर्न ;Δप्ब्द्ध और आधर धरा में परिणामी परिवतर्न ;Δप्ठद्ध के अनुपात को धरा प्रवध्र्क गुणांक ;βद्ध कहते हैं। Δप्ब्β ंब त्र ;14ण्10द्धΔप्ठ टब्म् इसे लघु सिग्नल धरा लब्िध् भी कहते हैं तथा इसका मान अत्यध्िक होता है। यदि हम केवल तथा प्ठ का अनुपात ज्ञात करें तो हमें ट्रांिास्टर का कब β प्राप्त होता है। अतःप्ब् प् βत्र ब् कब ;14ण्11द्धप्ठ चूँकि प्में प्के साथ लगभग रैख्िाकतः वृि होती है तथा जब प्त्र 0 है तो प्त्र 0 होता है, βब् ठ ठब्कब तथा β के मान लगभग बराबर होते हैं। अतः अध्िकांश परिकलनों के लिए βका उपयोग कियांब कब जा सकता है। टतथा प्;या प्द्धमें परिवतर्न के साथ β तथा βदोनों में थोड़ा परिवतर्नब्म्ठ ब्ंब कब होता है। उदाहरण 14ण्8 चित्रा 14ण्30;इद्ध में दशार्ए गए निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक से किसी ट्रांिास्टर के β ंब तथा βके मान परिकलित कीजिए जबकि ट त्र 10 ट है तथा प् त्र 4ण्0 उ। है।कब ब्म्ब्हल Δप्ब्प्β ंब त्र βत्र ब् य कबΔप्ठ प्टठब्म् टतथा प् के दिए गए मानों पर β तथा βके मानों को ज्ञात करने के लिए हम इस प्रकारब्म्ब्ंबकब आगे बढ़ सकते हैं। प्ब् के दिए गए मान से वुफछ कम तथा वुफछ अध्िक प्ठ के दो मानों के लिए किन्हीं दो अभ्िालाक्षण्िाकों पर विचार करते हैं। यहाँ प्ब् त्र 4ण्0 उ।ण् ;प्ठत्र 30 तथा 20 - । के लिए अभ्िालाक्षण्िाकों का चयन कीजिएद्ध टब्म् त्र 10 ट पर हम ग्रापफ से़प्ब् के दो मान प्राप्त करते हैं। भौतिकी तब Δप्ठ त्र ;30 दृ 20द्ध - । त्र 10 - ।ए Δप्ब् त्र ;4ण्5 दृ 3ण्0द्ध उ। त्र 1ण्5 उ। अतःए β ंब त्र 1ण्5 उ।ध् 10 - । त्र 150 βकबए का मान ज्ञात करने के लिए या तो टब्म् त्र 10 ट पर प्ब् त्र 4ण्0 उ। के तदनुरूपी प्ठ के मान का अनुमान लगाइए अथवा चयन किए गए दो अभ्िालाक्षण्िाकों के लिए βकब के दो मान परिकलित कीजिए तथा इनका औसत ज्ञात कीजिए। अतःए प्ब् त्र 4ण्5 उ। और प्ठ त्र 30 - । के लिए त्र 4ण्5 उ।ध् 30 - । त्र 150βकब तथा प्ब् त्र 3ण्0 उ। तथा प्ठ त्र 20 - । के लिए त्र3ण्0 उ। ध् 20 - । त्र 150βकब इस प्रकार βकब त्र;150 ़ 150द्ध ध्2 त्र 150 14ण्9ण्3 ट्रांिास्टर एक युक्ित के रूप में उपयोग किए जाने वाले विन्यास ;जैसे ब्ठए ब्ब् तथा ब्म्द्धए म्.ठ तथाठ.ब् संध्ियों के बायस तथा प्रचालन क्षेत्रा जैसे अंतक, सिय क्षेत्रा तथा संतृप्त के आधर पर ट्रांिास्टर का उपयोग एक युक्ित के रूप में किया जा सकता है। जैसा कि हम पहले ही वणर्न कर चुके हैं हम केवल ब्म् विन्यास तक ही सीमित रहेंगे तथा किसी युक्ित की कायर् प्रणाली को समझने के लिए उस युक्ित के प्रचालन क्षेत्रा तथा बायसन तक ही अपना ध्यान वेंफित रखेंगे। जब ट्रांिास्टर का उपयोग अंतक अथवा संतृप्त अवस्था में किया जाता है तो यह एक स्िवच की भाँति कायर् करता है। इसके विपरीत किसी ट्रांिास्टर को एक प्रवध्र्क के रूप में उपयोग करने के लिए इसे सिय क्षेत्रा में प्रचालित करना होगा। ;पद्ध ट्रांिास्टर स्िवच के रूप में हम चित्रा 14ण्31;ंद्ध में दशार्ए ब्म् विन्यास में आधर बायसित ट्रांिास्टर के व्यवहार का विश्लेषण करके ट्रांिास्टर का स्िवच के रूप में प्रचालन समझने का प्रयास करेंगे। इस परिपथ के निवेश तथा निगर्त पक्षों पर किरख़ोपफ वोल्टता नियम का अनुप्रयोग करने पर हमें प्राप्त होता है ट त्र प्त् ़ ट;14ण्12द्धठठठठठम् तथा ट त्र ट दृ प्त्;14ण्13द्धब्म्ब्ब्ब्ब्ण् यहाँ हम टको कब निवेश वोल्टता टतथा टठठ पब्म् को कब निगर्त वोल्टता टसमझेंगे। अतःव् टत्र प्त् ़ टतथाप ठठठम् ट त्र ट दृ प्त्ण् वब्ब्ब्ब्आइए यह देखें कि टप के शून्य से आगे बढ़ने पर टव् में क्या परिवतर्न होते हैं। सिलिकाॅन ट्रांिास्टरों में जब तक टप का मान 0ण्6 ट से कम होता है ट्रांिास्टर अंतक चित्रा 14ण्31 ;ंद्ध ब्म् विन्यास में आधर बायसित ट्रांजिस्टर अवस्था में रहता है तथा प्ब् शून्य होती है। ;इद्ध अंतरण अभ्िालक्षण। अतः टव् त्र टब्ब् निगर्त में वुफछ धरा प्होती है। तथा पद प्त्का मान बढ़ने पर निगर्त वोल्टता ट घटती है। टब् ब्ब् वप में वृि होने पर प्ब् में लगभग रैख्िाकतः वृि होती है और इसीलिए ट व का मान रैख्िाकतः उस समय तक घटता जाता है जब तक कि मान लगभग 1ण्0 ट से कम नहीं हो जाता। इससे आगे, परिवतर्न अरैख्िात हो जाता है तथा ट्रांिास्टर संतृप्त अवस्था में पहुँच जाता है। टप के मान में और वृि करने पर निगर्त वोल्टता में और कमी होती है तथा यह शून्य की ओर बढ़ने लगती है। तथापि यह शून्य कभी नहीं होती। यदि हम टव तथा टप के बीच ग्राप़्ाफ खींचे, ख्जिसे ‘आधर बायसित ट्रांिास्टर का अंतरण अभ्िालक्षण’ भी कहते हैं ख्चित्रा 14ण्31;इद्ध, तो हम यह पाते हैं कि अंतक अवस्था तथा सिय अवस्था के बीच और संिय अवस्था तथा संतृप्त अवस्था के बीच भी ऐसे क्षेत्रा होते हैं जहाँ पर परिवतर्न में रैख्िाकता नहीं होती जो यह दशार्ता है कि अंतक अवस्था से सिय अवस्था में तथा संिय अवस्था से संतृप्त अवस्था में संक्रमण बहुत स्पष्ट नहीं होते। आइए, अब हम यह देखें कि ट्रांिास्टर स्िवच की भाँति वैफसे कायर् करता है। जब तक टप का मान कम होता है और यह ट्रांिास्टर को अग्रदिश्िाक बायसित नहीं करता, टव का मान अध्िक ;टब्ब् परद्ध होता है। यदि टप का मान इतना अध्िक है कि यह ट्रांिास्टर को संतृप्त स्िथति में प्रचालित करने के लिए पयार्प्त हो तो टव का मान बहुत कम, शून्य के अति निकट होता है। जब ट्रांिास्टर चालन करने की अवस्था में नहीं होता तो इसे ‘स्िवच आॅप़्ाफ’ की स्िथति में कहते हैं तथा जब यह संतृप्त स्िथति में चला जाता है तो इसे ‘स्िवच आॅन’ में कहा जाता है। इससे यह प्रकट होता है कि यदि हम लघु ;कमद्ध या उच्च ;अध्िकद्ध अवस्था को ट्रांिास्टर की अंतक तथा संतृप्त अवस्था के तदनुरूपी स्तरों की किसी निश्िचत वोल्टता से नीचे अथवा ऊपर के रूप में परिभाष्िात करें, तो हम यह कह सकते हैं कि कोइर् लघु निवेश ट्रांिास्टर का स्िवच आॅप़्ाफ कर देता है जबकि उच्च निवेश ट्रांिास्टर का ‘स्िवच आॅन’ कर देता है। अन्य शब्दों में हम इसे इस प्रकार से भी कह सकते हैं कि ट्रांिास्टर को दिया गया लघु निवेश उच्च निगर्त प्रदान करता है जबकि ट्रांिास्टर को दिया गया उच्च निवेश लघु निगर्त प्रदान करता है। ट्रांिास्टर के स्िवच परिपथ इस प्रकार डिजाइन किए जाते हैं कि ट्रांिास्टर कभी भी सिय अवस्था में नहीं रहता। ;पपद्ध ट्रांिास्टर प्रवध्र्क के रूप में ट्रांिास्टर को प्रवध्र्क की भाँति उपयोग में लाने के लिए हम टव तथा टप के बीच ग्राप़्ाफ के सिय क्षेत्रा का उपयोग करेंगे। इस वक्र के रैख्िाक भाग की प्रवणता निवेश में परिवतर्न के साथ निगर्त में परिवतर्न की दर को निरूपित करती है। यह )णात्मक होती है क्योंकि निगर्त का मान टब्ब् दृ प्ब्त्ब् है प्ब्त्ब् नहीं है। यही कारण है कि जैसे - जैसे किसी ब्म् प्रवध्र्क की निवेश वोल्टता में वृि होती है इसकी निगर्त वोल्टता में कमी होती जाती है तथा निगर्त को निवेश की कला से बाहर कहा जाता है। यदि हम यह मानें कि Δटव तथा Δटप निगर्त तथा निवेश वोल्टताओं में अल्प परिवतर्न हैं तब Δटवध्Δटप को प्रवध्र्क की लघु सिग्नल वोल्टता लब्िध् ।ट कहते हैं। यदि सिय क्षेत्रा के मध्य ¯बदु के तदनुरूपी वोल्टता टठठ का कोइर् नियत मान है, तो परिपथ Δटवध् Δटप वोल्टता लब्िध् के ब्म् प्रवध्र्क की भाँति व्यवहार करेगा। हम ट्रांजिस्टर की वोल्टता लब्िध् ।ट को परिपथ के प्रतिरोध्कों के पदों में तथा धरा लब्िध् को नीचे दशार्ए अनुसार व्यक्त कर सकते हैं: हमें ज्ञात है कि निगर्त वोल्टता ट त्र ट दृ प्त्अतःए Δट त्र 0 दृ त्Δ प्व ब्ब्ब्ब् व ब् ब् इसी प्रकार टत्र प्त़् टसेप ठठ ठम् Δट त्र त् Δप् ़ Δटपठठठम् परंतु, Δटका मान Δप्त्के मान की तुलना में नगण्य के समान है, अतः इस ब्म् प्रवध्र्कठम् ठठ ;चित्रा 14ण्32द्ध की वोल्टता लब्िध् को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं। ।ट त्र दृ त्ब् Δ प्ब् ध् त्ठ Δप्ठत्र दृβ ंब;त्ब् ध्त्ठ द्ध ;14ण्14द्ध भौतिकी यहाँ β त्र Δ प्ध्Δप्¹समीकरण ;14ण्10द्ध सेह्। इस प्रकार प्रवध्र्क के रूप में उपयोग करने केंब ब्ठ लिए ट्रांिास्टर के सिय क्षेत्रा के रैख्िाक भाग का उपयोग किया जा सकता है। ट्रांिास्टर को एक प्रवधर्क ;ब्म् - विन्यासद्ध के रूप में अगले अनुभाग में विस्तार से चचार् किया जाएगा। 14ण्9ण्4 ट्रांिास्टर - प्रवध्र्क के रूप में ;ब्म्.विन्यासद्ध ट्रांिास्टर को प्रवध्र्क के रूप में प्रचालित करने के लिए यह आवश्यक है कि हम इसके प्रचालन ¯बदु को इसके सिय क्षेत्रा के मध्य में कहीं पर नियत करें। यदि हम अंतरण वक्र के रैख्िाक भाग के मध्य के ¯बदु के तदनुरूपी टठठ का मान नियत करें तब कब आधर धरा प्ठ नियत होगी तथा तदनुरूपी संग्राहक धरा प्भी नियत हो जाएगी। कब वोल्टता ट त्र ट दृ प्त्भी नियत रहेगी।ब् ब्म्ब्ब्ब्ब् टब्म् तथा प्ठ के प्रचालन मान प्रवध्र्क के प्रचालन ¯बदु को निधर्रित करते हैं। यदि आपूतिर् टठठ के साथ श्रेणीक्रम में किसी सिग्नल के स्रोत को संयोजित करके अे आयाम की कोइर् लघु ज्यावक्रीय वोल्टता कब आधर बायस पर अध्यारोपित करें तो आधर - धारा में संग्राहक धरा प्ठ के मान पर ज्यावक्रीय परिवतर्न अध्यारोपित हो जाएँगे। इसके परिणामस्वरूप संग्राहक धरा प्ब् पर भी ज्यावक्रीय परिवतर्न अध्यारोपित हो जाएँगे जो निगर्त वोल्टता टव् के मान में भी तदनुरूपी परिवतर्न उत्पन्न करेंगे। बड़े संधारित्रों द्वारा कब वोल्टताओं को अवरु( करके हम निवेश तथा निगर्त के सिरों पर ंब परिवतर्नों को माप सकते हैं। चित्रा 14ण्32 ब्म् ट्रांजिस्टर प्रवध्र्क का एक सरल परिपथ प्रवध्र्क के उपरोक्त विवरण में हमने किसी ंब सिग्नल पर विचार नहीं किया है। व्यापक रूप में प्रवध्र्कों का उपयोग प्रत्यावतीर् सिग्नलों को प्रवध्िर्त करने के लिए किया जाता है। मान लीजिए चित्रा 14ण्32 में दशार्ए अनुसार हम किसी ंब निवेश सिग्नल अप ;जिसे प्रवध्िर्त करना हैद्ध को बायस टठठ ;कबद्ध पर अध्यारोपित करते हैं। निगर्त को संग्राहक तथा भूमि के बीच प्राप्त किया जाता है। किसी भी प्रवध्र्क की ियाविध्ि को सरलता से समझने के लिए पहले हम यह मानते हैं कि अप त्र 0 । तब निगर्त पाश पर किरख़ोपफ नियम का अनुप्रयोग करने पर, हमें प्राप्त होता है। ट त्र ट ़ प्त्बब ब्म्बस् इसी प्रकार निवेश पाश के लिए टत्र ट़ प्त्ठठ ठम् ठठ जब अप शून्य नहीं है, तो ट़ अ त्र ट ़ प् त् ़ Δप् ;त् ़ तद्धठम् पठम्ठठठठप टमें परिवतर्न को निवेश प्रतिरोध् ;तद्ध ख्समीकरण ;14ण्8द्ध देख्िाए, तथा प्ठम्पठ संब( किया जा सकता है। इस प्रकार अप त्र Δप्ठ ;त्ठ ़ तपद्धत्र त Δप्ठ ;14ण्15द्ध ;14ण्16द्ध में परिवतर्न से प्में परिवतर्न से प् में भी परिवतर्न होता है। हम समीकरण ;14ण्11द्ध में परिभाष्िात प्राचल βठब कब की ही भाँति प्राचल β ंब को इस प्रकार परिभाष्िात करते हैंः Δप्प β ंब त्र ब त्र ब ;14ण्17द्धΔप्ठ पइ इसे ंब धरा लब्िध् ;।पद्ध भी कहते हैं। प्रायः निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक के रैख्िाक क्षेत्रा में β ंब का मान βकब के निकट होता है। चूँकि टका मान नियत है प्के कारण प्में परिवतर्न टतथा प्रतिरोध्क त्के सिरों परब्ब् ठब् ब्म् स् विभवपात में परिवतर्न उत्पन्न करता है। इन परिवतर्नों को समीकरण ;14ण्15द्ध द्वारा इस प्रकार दशार्या जा सकता है। Δट त्र Δट ़ त्Δप् त्र 0ब्ब्ब्म्स् ब्अथवा Δट त्र दृत्Δप्ब्म्स् ब् टब्म् में परिवतर्न निगर्त वोल्टता अ0 है। समीकरण ;14ण्10द्ध से हमें प्राप्त होता है अ त्र Δट त्र दृβ त्Δप्0ब्म्ंब स् ठ प्रवध्र्क की वोल्टता लब्िध् है अ Δट0 ब्म् । त्रत्र अअप त Δप्ठ त्र दृ β ंब त्स् ;14ण्18द्ध त )णात्मक चिÉ यह निरूपित करता है कि निगर्त वोल्टता कला में निवेश वोल्टता के विपरीत है। ट्रांिास्टर अभ्िालाक्षण्िाक की उपरोक्त व्याख्या में हमने यह पाया कि ब्म् विन्यास में धरा लब्िध् β होती है। इसमें हमने वोल्टता लब्िध् । भी देखी। अतः हम शक्ित लब्िध् । को धरांब अच लब्िध् तथा वोल्टता लब्िध् के गुणनपफल के रूप में व्यक्त कर सकते हैं। गण्िातीय रूप में ।च त्र β ंब ×।अ ;14ण्19द्ध चूँकि β ंब तथा ।अ के मान 1 से अध्िक हैं, अतः हमें ंब शक्ित लब्िध् प्राप्त होती है। तथापि हमें यह बोध् होना चाहिए कि ट्रांिास्टर कोइर् शक्ित जनन युक्ित नहीं है। निगर्त पर उच्च ंब शक्ित के लिए आवश्यक ऊजार् बैटरी द्वारा प्रदान की जाती है। उदाहरण 14ण्9 चित्रा 14ण्31;ंद्ध में विद्युत आपूतिर् टठठ में 0ट से 5ण्0 ट तक परिवतर्न किया जा सकता है। ैप ट्राजिस्टर के लिए βकब त्र 250 तथा त्ठ त्र 100 ाΩय त्ब् त्र 1 ज्ञΩ है तथा टब्ब् त्र 5ण्0ट है। यह मानते हुए कि जब ट्रांिास्टर संतृप्त अवस्था में है, तो टब्म् त्र 0ट तथा टठम् त्र 0ण्8टए ;ंद्ध वह न्यूनतम आधर धरा परिकलित कीजिए जिस पर ट्रांिास्टर संतृप्त अवस्था में पहुँच जाएगा। ;इद्ध इस प्रकार ट1 का वह मान जिसमें ट्रांिास्टर ‘स्िवच आॅन’ की भाँति कायर् करेगा। ;बद्ध ट1 का वह परिसर ज्ञात कीजिए जिसका ट्रांिास्टर ‘स्िवच आॅप़्ाफ’ तथा ‘स्िवच आॅन’ की स्िथति में रहता है। हल दिया हुआ है कि संतृप्तता पर टब्म् त्र 0टए टठम् त्र 0ण्8ट ट त्र ट दृ प्त्ब्म्ब्ब्ब्ब् प्त्र टध्त् त्र 5ण्0टध्1ण्0ाΩ त्र 5ण्0 उ।ब् ब्ब्ब्इसलिए प्ठ त्र प्ब्ध्β त्र 5ण्0 उ।ध्250 त्र 20 - । वह निवेश वोल्टता जिस पर ट्रांिास्टर संतृप्तता ग्रहण करता है ट त्र ट त्र प्त् ़टप्भ्ठठठठठम् त्र 20 - । × 100 ाΩ ़ 0ण्8ट त्र 2ण्8ट वह निवेश वोल्टता जिससे नीचे ट्रांिास्टर अंतक स्िथति में रहता है। टप्स् त्र 0ण्6टए टप्भ् त्र 2ण्8ट 0ण्0ट तथा0ण्6टए के बीच ट्रांिास्टर ‘स्िवच आॅपफ’ अवस्था में रहेगा। 2ण्8ट तथा 5ण्0ट के बीच यह ‘स्िवच आॅन’ अवस्था में रहेगा। ध्यान दीजिए, जब प्ठ का मान 0ण्0उ। से 20उ। के बीच परिवतिर्त होता है, तो ट्रांिास्टर सिय अवस्था में होता है। इस परिसर में, प्ब् त्र βप्ठ मान्य होता है। संतृप्तता परिसर में प्ब् ≤β प्ठ भौतिकी उदाहरण 14ण्10 किसी ब्म्.ट्रांिास्टर प्रवध्र् के लिए 2ण्0 ाΩ के उत्सजर्क प्रतिरोध्क के लिए सिरों पर 2ण्0 ट है। मान लीजिए ट्रांिास्टर का धरा प्रवध्र्क 100 है। यदि कब का आधर धरा का मान सिग्नल धरा का 10 गुना होता है, तो 2ण्0 ट की आपूतिर् टठठ श्रेणीक्रम में संयोजित प्रतिरोध्क त्ठ का क्या मान होना चाहिए। संग्राहक प्रतिरोध् के सिरों पर कब विभवपात भी परिकलित कीजिए। ;चित्रा 14ण्32द्ध। हल निगर्त कब वोल्टता 2ण्0 ट अतः ंब संग्राहक धरा पब् त्र 2ण्0ध्2000 त्र 1ण्0 उ। अतः आधार से गुजरने वाली सिग्नल धरा पठ त्र पब् ध्β त्र 1ण्0 उ।ध्100 त्र 0ण्010 उ। कब आधर धरा त्र 10× 0ण्010 त्र 0ण्10 उ। समीकरण 14ण्16ए त्ठ त्र ;टठठ .टठम् द्ध ध्प्ठण् यह मानते हुए कि टठम् त्र 0ण्6 टए त्ठ त्र ;2ण्0 दृ 0ण्6 द्धध्0ण्10 त्र 14 ाΩ कब संग्राहक धरा प्ब् त्र 100×0ण्10 त्र 10 उ। 14ण्9ण्5 पुनभर्रण प्रवध्र्क तथा ट्रांिास्टर दोलित्रा हमने देखा है कि जब किसी प्रवधर्क में एक ज्यावक्रीय निवेश सिग्नल निवेश्िात किया जाता है तो वह प्रविार्त सिग्नल के रूप में निगर्त होता है। इसका अथर् यह है कि प्रवधर्क के निगर्त में ंब सिग्नल पाने के लिए एक बाहरी निवेश सिग्नल आवश्यक है। किसी दोलित्रा में बाहरी निवेश सिग्नल लगाए बिना ही हमें ंब निगर्त मिलता है। दूसरे शब्दों में, दोलित्रा का निगर्त सिग्नल स्वतः प्रतिपालित होता है। ऐसा पाने के लिए एक प्रवधर्क ही लिया जाता है। निगर्त सिग्नल का एक भाग प्रारंभ्िाक सिग्नल की कला में ही निवेश को वापस पुनभर्रित ;प़्ाफीडबैकद्ध कर दिया जाता है। इस प्रिया को धनात्मक पुनभर्रण कहते हैं, जैसा चित्रा 14ण्33 ;ंद्ध में दिखाया गया है। पुनभर्रण प्रेरकीय युग्मन ;अन्योन्य प्रेरकत्व के द्वाराद्ध या स्ब् या त्ब् परिपथों के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के दोलित्रों से निगर्त को निवेश से युग्िमत करने के लिए भ्िान्न - भ्िान्न विध्ियों ;पुनभर्रण परिपथद्ध का उपयोग करते हैं। इसके अलावा किसी निश्िचत आवृिा पर दोलन प्राप्त करने के लिए उपयुक्त अनुनादी परिपथ उपयोग किया जाता है। दोलित्रा की िया को समझने के लिए आइए चित्रा 14ण्33;इद्ध में दिखाए गए परिपथ पर विचार करें। एक वुंफडली ;ज्1द्ध से दूसरी वुंफडली ;ज्2द्ध में प्रेरकीय युग्मन द्वारा पुनभर्रण पूरा किया जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ वुंफडलियाँ ज्1 तथा ज्2 एक ही क्रोड़ पर लपेटी हुइर् हैं और इसलिए अपने अन्योन्य प्रेरकत्व द्वारा प्रेरकीय - युग्िमत हैं। एक प्रवधर्क की भाँति ही, आधार - उत्सजर्क संिा अग्रदिश्िाक बायस में रहती है जबकि आधार - संग्राहक संिा पश्चदिश्िाक बायस में रहती है। सरलता की दृष्िट से जो विस्तृत बायस परिपथ वास्तव में उपयोग में लाए जाते हैं उन्हें यहाँ नहींचित्रा 14ण्33 ;ंद्ध धनात्मक पुनभर्रण वाले एक स्वतः प्रतिपालित ट्रांजिस्टर दशार्या गया है।प्रवधर्क का दोलित्रा के रूप में िया करने का सि(ांतऋ अब हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि दोलनों ;इद्ध एक सरल स्ब् दोलित्रा ;संग्राहक स्वरित्राद्धऋ तथा ;बद्ध का गठन किस प्रकार से होता है। मान लें कि स्िवच प्रेरकीय युग्मन के कारण धारा पब और पम का उत्थान एवं502 ै को आॅन करे जिससे सवर्प्रथम बायस अनुप्रयुक्त होनीपतन ;या निमार्णद्ध। 1आरंभ हो सके। स्पष्टतया, ट्रांिास्टर में संग्राहक धारा का एक महो£म ;ैनतहमद्ध प्रवाहित होगा। यह धारा वुंफडली ज्2 से होकर जाती है जिसके सिरों को चित्रा 14ण्33 ;इद्ध में संख्या 3 और 4 दी गइर् है। यह धारा अपने पूरे आयाम पर तत्क्षण नहीं पहुँच पाती, बल्िक ग् से ल् तक धीरे - धीरे बढ़ती है, जैसा चित्रा 14ण्33 ;बद्ध ;पद्ध में दिखाया गया है। वुंफडली ज्2 तथा वुंफडली ज्1 के बीच प्रेरकीय युग्मन के कारण उत्सजर्क परिपथ में एक धारा बहने लगती है ;ध्यान दें कि वास्तव में यही निवेश से निगर्त को पुनभर्रण हैद्ध। धनात्मक पुनभर्रण के कारण ज्1 में यह धारा ;उत्सजर्क धाराद्ध भी ग्′ से ल्′ तक बढ़ती है ख्;चित्रा 14ण्33 ;बद्ध ;पपद्ध देखें ,। संग्राहक परिपथ में जुड़ी हुइर् वुफंडली ज्2 में धारा ;संग्राहक धाराद्ध ल् मान पर पहुँचती है तो ट्रांिास्टर संतृप्त हो जाता है। इसका अथर् यह है कि इस समय संग्राहक धारा अपने अिाकतम मान पर है, तथा अब और अध्िक नहीं बढ़ सकती। चूँकि अब संग्राहक धारा में और परिवतर्न नहीं हो रहा है, इसलिए ज्2 के निकट चुंबकीय क्षेत्रा बढ़ना बंद हो जाता है। जैसे ही क्षेत्रा स्िथर हो जाएगा, वैसे ही ज्2 से ज्1 में पुनभर्रण रुक जाएगा। पुनभर्रण बंद होने पर उत्सजर्क धारा कम होनी शुरू हो जाती है। पफलस्वरूप, संग्राहक धारा ल् से र् की ओर घटती है ख्चित्रा 14ण्33 ;बद्ध ;पद्ध,। परंतु, संग्राही धारा के घटने के कारण वुंफडली ज्2 के निकट चुंबकीय क्षेत्रा का क्षय शुरू हो जाता है। इस प्रकार ज्1 को ज्2 में एक घटता हुआ क्षेत्रा दिखता है ;प्रारंभ्िाक स्टाटर् िया के समय जब क्षेत्रा बढ़ रहा था, से यह िया ठीक विपरीत हैद्ध। इसके कारण उत्सजर्क धरा उस समय तक और घटती है जब तक यह र्श् पर न पहुँच जाए और ट्रांिास्टर कट - आॅप़्ाफ ;विच्छेदद्ध हो जाए। इसका अथर् है कि प्म् तथा प्ब् दोनों धराओं का प्रवाह रुक जाता है। इसलिए ट्रांिास्टर अपनी प्रारंभ्िाक अवस्था ;जब शक्ित प्रथम बार आॅन की गइर् थीद्ध में वापस लौट आता है। इसके बाद पूरी प्रिया स्वयं स्वतः दोहराती है। अथार्त, ट्रांिास्टर पहले संतृप्त अवस्था में जाता है, पिफर कट - आॅप़्ाफ में और पिफर वापस संतृप्त अवस्था में लौट आता है। संतृप्त अवस्था से कट - आॅप़्ाफ और पिफर वापस आने तक की िया में लगा समय टैंक - परिपथ या समस्वरित परिपथ ;वुंफडली ज्2 का प्रेरकत्व स् तथा संधारित्रा ब् पाश्वर्क्रम में संयोजित हैंद्ध के स्िथरांकों पर निभर्र करता है। इस समस्वरित परिपथ की अनुनादी आवृिा ; νद्ध ही वह आवृिा है जो निधार्रित करती है कि दोलन किस आवृिा पर दोलित होगा 1 νत्र ;14ण्20द्ध2π स्ब् चित्रा 14ण्33 ;इद्ध के परिपथ में टैंक या समस्वरित परिपथ संग्राहक की ओर जोड़ा गया है। इसलिए इसे समस्वरित संग्राहक दोलित्रा कहते हैं। यदि समस्वरित परिपथ आधार की ओर हो तो इसे समस्वरित आधार दोलित्रा कहेंगे। कइर् दूसरे प्रकार के टैंक परिपथ ;जैसे त्ब्द्ध या पुनभर्रण परिपथ भी होते हैं जिनसे विभ्िान्न प्रकार के दोलित्रा बनते हैं जैसे काॅलपिट दोलित्रा, हाटर्ले दोलित्रा, त्ब्दोलित्रा आदि। 14ण्10 अंकक इलेक्ट्राॅनिकी तथा तवर्फ ;लाॅजिकद्ध गेट पिछले अनुभागों में जिन प्रवध्र्कों, दोलित्रों जैसे इलेक्ट्राॅनिक परिपथों से आपका परिचय कराया गया था उनमें वोल्टता अथवा विद्युतधराओं के सिग्नल सतत काल परिवतर्नीय वोल्टताओं अथवा धराओं के रूप में थे। इस प्रकार के सिग्नलों को संतत अथवा अनुरूप सिग्नल कहते हैं। चित्रा 14ण्34;ंद्ध में एक ऐसा ही प्रारूपिक अनुरूप सिग्नल दशार्या गया है। चित्रा 14ण्34;इद्ध में एक स्पंद तरंग रूप दशार्या गया है जिसमें वोल्टता के केवल विविक्त मान ही संभव हैं। इस प्रकार के सिग्नलों को निरूपित करने के लिए द्विआधरी अंकों का उपयोग सरल होता है। द्विआधरी अंकन प्रणाली में केवल दो ही अंक ष्0ष् ;जैसेए 0 टद्ध तथा ष्1ष् ;जैसेए 5 टद्ध होते हैं। अंकक इलेक्ट्राॅनिकी में हम केवल, चित्रा 14ण्34;इद्ध में दशार्ए अनुसार, इन्हीं दो वोल्टता स्तरों का उपयोग करते हैं। इन सिग्नलों को अंकीय सिग्नल कहते हैं। अंकीय परिपथों में निवेशी तथा निगर्त वोल्टताओं के केवल दो मान ही ;जिन्हें 0 तथा 1 से निरूपित किया जाता हैद्ध अनुमेय हैं। भौतिकी इस अनुभाग का उद्देश्य अंकक इलेक्ट्राॅनिकी को समझने के लिए प्रथम चरण प्रदान करना है। यहाँ हम अपने अध्ययन को अंकक इलेक्ट्राॅनिकी के वुफछ मूलभूत रचनाखंडों ;जिन्हें लाॅिाक गेट कहते हैंद्ध तक ही सीमित रखेंगे। ये रचनाखंड विश्िाष्ट ढंग से अंकीय सिग्नलों को संसािात करते हैं। लाॅजिक गेटों का उपयोग वैफलवुफलेटरों, अंकीय घडि़यों, वंफप्यूटरों, रोबोटों, औद्योगिक नियंत्राण प्रणालियों तथा दूरसंचारों में किया जाता है। अंकीय परिपथ के रूप में हम अपने घरों में उपयोग होने वाले स्िवचों का उदाहरण ले सकते हैं। स्िवच की स्िथति के अनुसार प्रकाश ‘आॅन’ अथवा ‘आॅप़्ाफ’ पर निभर्र करता है। जब प्रकाश ‘आॅन’ होता है तो निगर्त मान ष्1ष् होता है तथा जब प्रकाश ‘आॅप़्ाफ’ होता है, तो निगर्त मान ष्0ष् होता है। निवेश प्रकाश स्िवच की स्िथतियाँ हैं। प्रकाश को ियाशील बनाने के लिए स्िवच को या तो ‘आॅन’ अथवा ‘आॅप़्ाफ’ की स्िथतियों में रखते हैं। ़ स्तर 1 जसमय स्तर 0 ज समय दृ ;ंद्ध ;इद्ध चित्रा 14ण्34 ;ंद्ध अनुरूप सिग्नल ;इद्ध अंकीय सिग्नल। 14ण्10ण्1 लाॅिाक गेट गेट एक ऐसा अंकीय परिपथ ;क्पहपजंस बपतबनपजद्ध होता है जो निवेशी तथा निगर्त वोल्टताओं के बीच किसी निश्िचत ताविर्फक संबंध् का पालन करता है। इसीलिए व्यापक रूप में इन्हें लाॅजिक गेट कहते हैं। गेट कहने का कारण यह है कि ये सूचना के प्रवाह को नियंत्रिात करते हैं। व्यापक निवेश निगर्त । ल् 0 1 1 0 रूप में उपयोग किए जाने वाले पाँच लाॅजिक गेट छव्ज्ए ।छक्ए व्त्ए छ।छक् तथा छव्त् हैं। प्रत्येक लाॅजिक गेट को किसी प्रतीक द्वारा इंगित करते हैं तथा इसके प्रकायर् को एक सत्यमान सारणी द्वारा परिभाष्िात किया जाता है जो सभी संभव निवेशी तवर्फ स्तर संयोजनों तथा उनके अपने - अपने निगर्त तवर्फ स्तरों को दशार्ती है। सत्यमान सारणी लाॅजिक गेटों के व्यवहार को समझने में सहायता करती है। इन लाॅजिक गेटों को अधर्चालक युक्ितयों का उपयोग करके बनाया जा सकता है। ;पद्ध छव्ज् गेट ;इद्ध चित्रा 14ण्35 छव्ज् गेट की ;ंद्ध तवर्फ प्रतीक ;इद्ध सत्यमान सारणी। यह सवार्ध्िक मूलभूत गेट है जिसमें केवल एक निवेश तथा एक निगर्त होता है। यह यदि निवेश ष्0ष् है तो ष्1ष् निगर्त उत्पन्न करता है तथा यदि निवेश ष्1ष् है तो ष्0ष् निगर्त उत्पन्न करता है। अथार्त यह किसी निवेश का अपने निगर्त पर व्युत्क्रमित रूपांतर उत्पन्न करता है। यही कारण है कि इसे उत्क्रमक या प्रतिलोमक भी कहते हैं। चित्रा 14ण्35 में इस द्वार का व्यापक रूप में उपयोग होने वाला प्रतीक तथा उसकी सत्यमान सारणी दी गयी है। ;पपद्ध व्त् गेट किसी व्त् गेट के एक निगर्त के साथ दो या अध्िक निवेश होते हैं। चित्रा 14ण्36 में इस द्वार का तवर्फ प्रतीक तथा सत्यमान सारणी दशार्यी गयी है। इसमें निगर्त ल् ष्1ष् है जब या तो निवेश । अथवा निवेश ठ 1 हैं, या दोनों 1 हैं अथार्त यदि कोइर् भी निवेश उच्च है तो निगर्त उच्च होता है। निवेश निगर्त । ठ ल् 0 0 0 0 1 1 1 0 1 1 1 1 भौतिकी ;पअद्ध छ।छक् गेट यह एक ।छक् गेट है जिसका छव्ज् द्वार अनुगमन करता है। यदि निवेश । तथा ठ दोनों ष्1ष् हैं तो निगर्त ष्1ष् नहीं होता। इस गेट को यह नाम इसके छव्ज् ।छक् व्यवहार के कारण दिया गया है। चित्रा 14ण्40 में छ।छक् गेट का तवर्फ प्रतीक तथा सत्यमान सारणी दशार्यी गइर् है। छ।छक् गेटों को सावर्त्रिाक गेट या सावर् प्रयोजक गेट भी कहते हैं, क्योंकि इन गेटों के प्रयोग से आप अन्य मूलभूत गेट जैसे व्त्ए ।छक् तथा छव्ज् प्राप्त कर सकते हैं ;अभ्यास 14ण्16 तथा 14ण्17 देख्िाएद्ध। निवेश निगर्त । ठ ल् 0 0 1 0 1 1 1 0 1 1 1 0 ;इद्ध चित्रा 14ण्40 छ।छक् गेट का ;ंद्ध तवर्फ प्रतीक तथा ;इद्ध सत्यमान सारणी। ;अद्ध छव्त् गेट इसके दो या अध्िक निवेश तथा एक निगर्त होता है। व्त् गेट के पश्चात एक छव्ज् संिया अनुप्रयुक्त करने से छव्ज्.व्त् गेट ;अथवा केवल छव्त् गेटद्ध प्राप्त होता है। जब दोनों निवेश । तथा ठ ष्0ष् होते हैं तो निगर्त ल् केवल ष्1ष् होता है, अथार्त न तो एक निवेश और न ही अन्य निवेश ष्1ष् है। चित्रा 14ण्41 में छव्त् गेट का तवर्फ प्रतीक तथा सत्यमान सारणी दशार्यी गयी है। निवेश निगर्त । ठ ल् 0 0 1 0 1 0 1 0 0 1 1 0 ;इद्ध चित्रा 14ण्42 छव्त् द्वार का ;ंद्ध तवर्फ प्रतीक तथा ;इद्ध सत्यमान सारणी। छव्त् द्वारांे को सावर्त्रिाक द्वार अथवा सावर् प्रयोजक द्वार माना जाता है। क्योंकि केवल छव्त् गेटों के उपयोग से आप सभी गेटों जैसे ।छक्ए व्त्ए तथा छव्ज् प्राप्त कर सकते हंै ;अभ्यास 14ण्18 तथा 14ण्19 देख्िाएद्ध 14ण्11 एकीकृत परिपथ परिपथों को बनाने की परंपरागत वििा इस प्रकार है: डायोड, ट्रांिास्टर, त्ए स्ए ब् आदि घटकों को चुनकर उन्हें वांछित ढंग से तारों द्वारा सोल्डर करके जोड़ा जाता है। ट्रांिास्टर के आविष्कार के बाद जो लघुरूपण लाया जा सका उसका अनुप्रयोग करने पर भी ऐसे परिपथ स्थूल होते थे। इसके अतिरिक्त ऐसे परिपथ कम विश्वसनीय तथा कम प्रघात - रोधी होते थे। एक संपूणर् परिपथ ;जिसमें बहुत से अिय घटक जैसे त् और ब् तथा सिय युक्ितयाँ जैसे डायोड और ट्रांिास्टर होंद्ध को अ(र्चालक के किसी छोटे एकल ब्लाॅक ;या चिपद्ध के उफपर निमिर्त करने की धारणा ने इलेक्ट्राॅनिक प्रौद्योगिकी में क्रांति ला दी है। ऐसे परिपथ को एकीकृत परिपथ ;इंटीग्रेटेड स£कट - प्ब्द्ध कहते हैं। सबसे विस्तृत रूप से प्रयोग की जाने वाली प्रौद्योगिकी, मोनोलिथ्िाक एकीकृत परिपथ है। मोनोलिथ्िाक शब्द दो ग्रीक शब्दों का संयोजन है, मोनोस ;उवदवेद्ध का अथर् भौतिकी होता है एकल और लिथोस ;सपजीवेद्ध का अथर् होता है पत्थर। प्रभावतः इसका यह अथर् है कि संपूणर् परिपथ किसी एकल सिलिकाॅन िस्टल ;या चिपद्ध पर निमिर्त है। चिप की विमाएँ बहुत छोटी, लगभग 1 उउ × 1 उउ या इससे भी छोटी हो सकती हैं। चित्रा 14ण्43 में ऐसी ही एक चिप अपने संरक्षी प्लास्िटक आवरण में दशार्यी गइर् है। इसके वुफछ भाग से प्लास्िटक आवरण हटा दिया गया है ताकि चिप से बाहर पिन तक आने वाले संयोजन को दशार्या जा सके। इन पिनों से ही बाह्य संयोजन बनाते हैं। निवेश सिग्नलांे की प्रकृति के आधर पर एकीकृत परिपथों को दोचित्रा14ण्43 ष्चिपष् का आवरण तथा उसके संयोजन वणो± में बाँटा जा सकता हैः ;ंद्ध रैख्िाक अथवा अनुरूप एकीकृत परिपथ तथा ;इद्ध आंकिक एकीकृत परिपथ। रैख्िाक एकीकृत परिपथ अनुरूप सिग्नलों को संसाध्ित करके अध्िकतम तथा न्यूनतम मानों के परिसर में परिवतिर्त कर उन्हें निबार्ध् तथा संतत बना देते हैं। निगर्त वुफछ अंश तक निवेश के अनुक्रमानुपाती होता है, अथार्त वह निवेश के साथ रैख्िाकतः परिवतिर्त होता है। रैख्िाक एकीकृत परिपथों में सबसे अध्िक उपयोगी संियात्मक प्रवध्र्क ;व्चमतंजपवदंस ंउचसपपिमतद्ध है।ण् आंकिक एकीकृत परिपथ उन सिग्नलों का संसाध्न करते हैं जिनके केवल दो मान होते हैं। इनमें लाॅिाक गेटों जैसे परिपथ होते हैं। एकीकरण के स्तर ;अथार्त एकीकृत परिपथ में परिपथ अवयवों या लाॅिाक गेटों की संख्याद्ध के आधार पर एकीकृत परिपथों का नामकरण किया जाता है। जैसे वुफछ प्ब् को स्माल स्केल इंटीग्रेशन, ैैप् ;लाॅिाक गेटों की संख्या ≤ 10द्धकहते हैं तो वुफछ अन्य मीडियम स्केल इंटीग्रेशन, डैप् ;लाॅिाक गेटों की संख्या ≤ 100द्ध, लाजर् स्केल इंटीग्रेशन, स्ैप् ;लाॅिाक गेटों की संख्या ≤ 1000द्ध तथा वेरी लाजर् स्केल इंटीग्रेशन, टस्ैप् ;लाॅिाक गेटों की संख्या झ 1000द्ध। एकीकृत परिपथों के निमार्ण की प्रौद्योगिकी बहुत जटिल है परंतु बृहत स्तर पर औद्योगिक उत्पादन होने से ये अत्यध्िक सस्ते हो गए हैं। सारांश 1ण् अधर्चालक वतर्मान ठोस अवस्था अधर्चालक इलेक्ट्राॅनिक युक्ितयोंऋ जैसे - डायोड, ट्रांिास्टर, एकीकृत परिपथ इत्यादि में प्रयुक्त मूल पदाथर् हैं। 2ण् अवयव तत्वों की जालक संरचना एवं परमाणु संरचना सुनिश्िचत करती है कि दिया गया विशेष पदाथर् विद्युतरोधी, धातु अथवा अधर्चालक होगा। 3ण् धातुओं की प्रतिरोधकता बहुत कम ;10दृ2 से 10दृ8 Ωउद्ध है, विद्युतरोधी पदाथो± की प्रतिरोधकता बहुत अिाक ;झ108 Ωउदृ1द्ध है, जबकि अधर्चालकों की प्रतिरोधकता धातुओं और विद्युतरोधी पदाथो± के मध्य होती है। 4ण् अधर्चालक तात्िवक ;ैपए ळमद्ध साथ ही साथ यौगिक ;ळं।ेए ब्कै इत्यादिद्ध हैं। 5ण् शु( अधर्चालक ‘नैज अधर्चालक’ कहलाते हैं। आवेश वाहकों ;इलेक्ट्राॅन और होलद्ध की उपस्िथति पदाथर् का ‘नैज’ गुण है और ये उफष्मीय उत्तेजन के परिणामस्वरूप प्राप्त होते हैं। नैज अधर्चालकों में इलेक्ट्राॅनों की संख्या ;द मद्ध होलों की संख्या दी समान होती है। होल आवश्यक रूप से प्रभावी धनावेश युक्त इलेक्ट्राॅन रिक्ितयाँ हैं। 6ण् शु( अधर्चालकों में उपयुक्त अपद्रव्य के ‘अपमिश्रण’ से आवेश वाहकों की संख्या परिवतिर्त की जा सकती है। ऐसे अधर्चालकों को अपद्रव्यी अधर्चालक कहते हैं। ये दो प्रकार ;द.प्रकार और च.प्रकारद्ध के होते हैं। 7ण् द.प्रकार के अधर्चालक में द झझ द जबकि च.प्रकार के अधर्चालक में दझझ द मी ी म होता है। 8ण् द.प्रकार के अधर्चालक में ैप अथवा ळम को पंचसंयोजी परमाणु ;दाताद्ध जैसे ।ेए ैइए च् इत्यादि के साथ अपमिश्रण से प्राप्त किया जाता है, जबकि च.प्रकार का अधर्चालक ैप अथवा ळम को त्रिासंयोजी परमाणु ;ग्राहीद्ध जैसे ठए ।सए प्द इत्यादि के अपमिश्रण से प्राप्त किया जाता है। 9ण् सभी दशाओं में द म द द त्र दप 2। इसके अतिरिक्त पदाथर् पूणर्तया विद्युत उदासीन होता है। 10ण् पदाथर् के दो भ्िान्न उफजार् बैंड ;संयोजकता बैंड और चालन बैंडद्ध होते हैं, जिनमें इलेक्ट्राॅन रहते हैं। संयोजकता बैंड की उफजार् चालन बैंड की उफजार् की अपेक्षा कम है। संयोजकता बैंड में सभी उफजार् स्तर पूणर् हैं जबकि चालन बैंड पूणर्तया रिक्त अथवा आंश्िाक रूप से पूरित हो सकते हैं। किसी ठोस के चालन बैंड में इलेक्ट्राॅन गति करने के लिए मुक्त होते हैं और चालकता के लिए उत्तरदायी होते हैं। चालकता की सीमा संयोजकता बैंड ;म् अद्ध के शीषर् और चालन बैंड ;म् बद्ध के तल के मध्य उफजार् - अंतराल म् ह पर निभर्र करती है। संयोजकता बैंड से इलेक्ट्राॅन उफष्मा, प्रकाश अथवा विद्युत उफजार् द्वारा चालन बैंड में उत्तेजित किए जा सकते हैं, जो अधर्चालक में प्रवाहित धारा में परिवतर्न उत्पन्न करते हैं। 11ण् विद्युत - रोधी हेतु म् ह झ 3 मट, अधर्चालक हेतु म् ह त्र 0ण्2 मट से 3 मटए जबकि धातुओं के लिए म् ह ≈ 0 है। 12ण् च.द संिा सभी अधर्चालक युक्ितयों की मूल है। जब ऐसी संिा बनती है तो इलेक्ट्राॅन अथवा होल रहित अचल आयन क्रोड़ की एक ‘”ासी स्तर’ बन जाता है जो ‘संिा विभव रोध्क’ हेतु उत्तरदायी है। 13ण् बाह्य अनुप्रयुक्त वोल्टता को परिवतिर्त करके संिा विभव रोध्क को परिवतिर्त किया जा सकता है। अग्रदिश्िाक बायस ;द.पफलक बैटरी के )णात्मक सिरे से और च.पफलक बैटरी के धनात्मक सिरे से संब( हैद्ध में रोिाका कम हो जाती है, जबकि पश्चदिश्िाक बायस में वृि हो जाती है। अतः किसी च.द संिा डायोड में अग्रदिश्िाक बायस धारा का मान अिाक ;उ। मेंद्ध होता है जबकि पश्चदिश्िाक बायस धारा का मान बहुत कम ; - । मेंद्ध होता है। भौतिकी ाफोटोडायोड, जिसमें प़्ाफोटाॅन है। ;ंद्ध प़़्सेल प्लेसर जिनमें बायस वोल्टता द्वारा इलेक्ट्राॅन उत्तेजन के कारण प्रकाश का उत्पादन होता है। 18ण् ट्रांिास्टर एक द.च.द अथवा च.द.च संिा युक्ित है। मध्य ट्रांिास्टर ब्लाॅक ;पतला और अल्प मादितद्ध ‘आधार’ जबकि अन्य दूसरे इलेक्ट्रोड ‘उत्सजर्क’ और ‘संग्राहक’ कहलाते हैं। उत्सजर्क - आधार संिा, अग्रदिश्िाक बायसित, जबकि संग्राहक - आधार संिा पश्चदिश्िाक बायसित होता है। 19ण् ट्रांिास्टर इस प्रकार से संयोजित किया जाता है कि ब् अथवा म् अथवा ठ निवेश और निगर्त दोनों के उभयनिष्ठ हो सकता है। अतः, ट्रांिास्टर तीन विन्यासों में प्रयुक्त किया जा सकता है - उभयनिष्ठ उत्सजर्क ;ब्म्द्धए उभयनिष्ठ संग्राहक ;ब्ब्द्ध और उभयनिष्ठ आधार ;ब्ठद्ध। नियत प् के लिए प् और ट के मध्य आलेख निगर्त अभ्िालाक्षण्िाक कहलाता है, जबकि नियत टठब्ब्म् ब्म् के लिए प्ठ और टठम् के मध्य आलेख निवेशी अभ्िालाक्षण्िाक कहलाता है। ब्म् - विन्यास हेतु महत्वपूणर् ट्रांिास्टर प्राचल हैंः ⎛ Δटठम् ⎞ निवेशी प्रतिरोध, त त्र ⎜⎟ प ⎜⎟Δप्⎝ ठ ⎠टब्म् ⎛ Δट ⎞ निगर्त प्रतिरोध, तव त्र ⎜⎜ ब्म् ⎟⎟Δप्⎝ ब् ⎠प्ठ ⎛ Δप् ⎞ धारा प्रवधर्न गुणक, βत्र ⎜ ब् ⎟⎜ ⎟⎝ Δप्ठ ⎠टब्म् 20ण् ट्रांिास्टर को एक प्रवधर्क और दोलित्रा की भाँति प्रयोग किया जा सकता है। वास्तव में, दोलित्रा को एक ऐसे स्वपोषी प्रवधर्क की भाँति भी माना जा सकता है जिसमें निगर्त के अंश किसी को निवेश में समान कला ;धनात्मक पुनभर्रणद्ध में पुनभर्रण किया जाता है। उभयनिष्ठ उत्सजर्क ⎛अ ⎞ त्विन्यास में ट्रांिास्टर प्रवधर्क की वोल्टता लब्िध है: । त्र ⎜ व ⎟ त्रβ ब् ए जहाँ त् और त्अ ⎜⎟ब्ठ अत्⎝ प ⎠ ठ क्रमशः परिपथ के संग्राहक और आधार की ओर के प्रतिरोध हैं। 21ण् जब ट्रांिास्टर का उपयोग अंतक अथवा संतृप्त अवस्था में करते हैं तो वह स्िवच की भाँति कायर् करता है। 22ण् वुफछ विशेष परिपथ हैं जो 0 और 1 स्तर से बने हुए अंकीय डाटा का संचालन करते हैं। यह अंकीय इलेक्ट्राॅनिक के विषय का सृजन करता है। 23ण् विशेष तवर्फ संिया पालन करने वाले महत्वपूणर् अंकीय परिपथ तवर्फ द्वार ;स्वहपब हंजमेद्ध कहलाते हैं। ये व्त्ए ।छक्ए छव्ज्ए छ।छक् और छव्त् गेट हैं। 24ण् आधुनिक युग के परिपथ में, कइर् तवर्फसंगत गेट अथवा परिपथों को एक एकल ‘चिप’ में एकीकृत करते हैं, जिन्हें एकीकृत परिपथ ;प्ब्द्ध कहते हैं। 14ण् डायोड को प्रत्यावतीर् ;ंबद्ध वोल्टता के दिष्टकरण ;प्रत्यावतीर् धारा को एक दिशा में प्रतिबंिात करनेद्ध हेतु प्रयोग में लाया जा सकता है। संधारित्रा अथवा उपयुक्त पिफल्टर के प्रयोग से दिष्ट धारा कब वोल्टता प्राप्त की जा सकती है। 15ण् वुफछ विश्िाष्ट प्रयोजन डायोड भी होते हैं। 16ण् जे़नर डायोड एक ऐसा ही विश्िाष्ट प्रयोजन डायोड है। शेनर डायोड में, पश्चदिश्िाक बायस में एक निश्िचत वोल्टता के पश्चात धारा एकाएक बढ़ती है ;भंजन वोल्टताद्ध। जेनर डायोड का यह गुण वोल्टता नियंत्राक के रूप में प्रयोग किया जाता है। 17ण् च.द संिा को बहुत सी प़्ाफोटाॅनी अथवा प्रकाश इलेक्ट्राॅनिक युक्ितयाँ प्राप्त करने हेतु भी प्रयोग किया गया है, जहाँ भाग लेने वाले तत्त्वों में से एक तत्त्व प्ाफोटाॅन उत्तेजन ़का परिणाम प्रतीप संतृप्त धारा परिवतर्न है, प्रकाश की तीव्रता मापन में सहायक होता है। ;इद्ध सौर ाफोटाॅन उफजार् को विद्युत - उफजार् में परिवतिर्त करता है। ;बद्ध प्रकाश उत्सजर्क डायोड और डायोड विचारणीय विषय 1ण् अधर्चालकों में उफजार् बैंड ;म्ब् अथवा म्टद्ध दिव्फविस्थानित हैं, जिसका तात्पयर् है कि ये ठोस में किसी विश्िाष्ट स्थान में स्िथत नहीं हैं। उफजार्एँ समग्र माध्य हैं। जब आप एक चित्रा देखते हैं जिसमें म्ब् अथवा म्ट सरल रेखाएँ खींची गइर् हैं तब उन्हें क्रमशः चालन बैंड उफजार् स्तर के तल पर और संयोजकता बैंड उफजार् स्तर के शीषर् पर लेना चाहिए। 2ण् तात्िवक अधर्चालकों ;ैप अथवा ळमद्ध में और च.अधर्चालकों में अपमिश्रकों को दोष के रूप में सन्िनविष्ट करके प्राप्त करते हैं। यौगिक अधर्चालकों में सापेक्ष रससमीकरणमितीय अनुपात में परिवतर्न अधर्चालक के प्रकार में भी परिवतर्न कर सकता है। उदाहरणाथर्, आदशर् ळं।े में ळं और ।े का अनुपात 1 रू 1 है, परंतु ळं।े में ळं - प्रचुर वाला अथवा ।े.प्रचुर वाला क्रमशः ळं ।े अथवा ळं ।े हो सकता है। सामान्यतः दोषों की उपस्िथति अधर्चालकों के1ण्10ण्90ण्91ण्1गुणों को कइर् प्रकार से नियंत्रिात करती है। 3ण् ट्रांिास्टर में आधार क्षेत्रा बारीक और अल्प मादित होता है, अन्यथा निवेश की ओर से आने वाले इलेक्ट्राॅन अथवा होल ;मान लीजिए ब्म् - विन्यास में उत्सजर्कद्ध संग्राहक तक पहुँच नहीं सकते। 4ण् हमने दोलित्रा का एक धनात्मक पुनभर्रण प्रवधर्क के रूप में उल्लेख किया है। स्थायी दोलनों हेतु, निगर्म वोल्टता ;टव्द्ध से वोल्टता पुनभर्रण ;टइिद्ध इस प्रकार होना चाहिए कि प्रवधर्न ;।द्ध के पश्चात यह पुनः टव् हो जाना चाहिए। यदि कोइर् अंश β′ का पुनभर्रण हो तब टइि त्र टव्ण् β′ और प्रवधर्न के पश्चात इसका मान ।;अ वण्β′द्ध के बराबर होना चाहिए। इसका अथर् है कि स्थायी दोलनों के प्रतिपालन हेतु कसौटी । β′ त्र 1 है। यह बावर्फहाउशेन कसौटी कहलाती है। 5ण् दोलित्रा में पुनभर्रण समान कला ;धनात्मक पुनभर्रणद्ध में है। यदि पुनभर्रण वोल्टता विपरीत कला ;)णात्मक पुनभर्रणद्ध में है, तो लब्िध 1 से कम है और यह कभी भी दोलित्रा की भाँति कायर् नहीं कर सकता है। अपितु यह एक कम लब्िध वाला प्रवधर्क होगा। यद्यपि, )णात्मक पुनभर्रण प्रवधर्क में नाॅयज ;रवद्ध और विरूपण को भी कम करता है, जो एक लाभदायक लक्षण है। अभ्यास 14ण्1 किसी द.प्रकार के सिलिकाॅन में निम्नलिख्िात में से कौन - सा प्रकथन सत्य है ? ;ंद्ध इलेक्ट्राॅन बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिासंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। ;इद्ध इलेक्ट्राॅन अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। ;बद्ध होल ;विवरद्ध अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। ;कद्ध होल ;विवरद्ध बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिासंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं। 14ण्2 अभ्यास 14ण्1 में दिए गए कथनों में से कौन - सा च.प्रकार के अधर्चालकों के लिए सत्य है? 14ण्3 काबर्न, सिलिकाॅन और जमेर्नियम, प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्राॅन हैं। इनकी विशेषता उफजार् बैंड अंतराल द्वारा पृथक्कृत संयोजकता और चालन बैंड द्वारा दी गइर् हैं, जो क्रमशः ;म् द्धए ;म् द्धहब्हैप तथा ;म् हद्धळम के बराबर हैं। निम्नलिख्िात में से कौन - सा प्रकथन सत्य है? ;ंद्ध ;म् ढ ;म् ढ ;म् हद्धैप हद्धळमहद्धब् ;इद्ध ;म् द्धब् ढ ;म् झ ;म् हहद्धळमहद्धैप ;बद्ध ;म् झ ;म् झ ;म् हद्धब्हद्धैपहद्धळम ;कद्ध ;म् त्र ;म् त्र ;म् हद्धब्हद्धैपहद्धळम 14ण्4 बिना बायस च.द संिा से, होल च.क्षेत्रा में द.क्षेत्रा की ओर विसरित होते हैं, क्योंकि ;ंद्ध द.क्षेत्रा में मुक्त इलेक्ट्राॅन उन्हें आकष्िार्त करते हैं। ;इद्ध ये विभवांतर के कारण संिा के पार गति करते हैं। ;बद्ध च.क्षेत्रा में होल - संाद्रता, द.क्षेत्रा में इनकी सांद्रता से अिाक है। ;कद्ध उपरोक्त सभी। भौतिकी 14ण्5 जब च.द संिा पर अग्रदिश्िाक बायस अनुप्रयुक्त किया जाता है, तब यह ;ंद्ध विभव रोध्क बढ़ाता है। ;इद्ध बहुसंख्यक वाहक धारा को शून्य कर देता है। ;बद्ध विभव रोध्क को कम कर देता है। ;कद्ध उपरोक्त में से कोइर् नहीं। 14ण्6 ट्रांिास्टर की िया हेतु निम्नलिख्िात में से कौन - से कथन सही हैं - ;ंद्ध आधार, उत्सजर्क और संग्राहक क्षेत्रों की आमाप और अपमिश्रण सांद्रता समान होनी चाहिए। ;इद्ध आधार क्षेत्रा बहुत बारीक और कम अपमिश्रित होना चाहिए। ;बद्ध उत्सजर्क संिा अग्रदिश्िाक बायस है और संग्राहक संिा पश्चदिश्िाक बायस है। ;कद्ध उत्सजर्क संिा और संग्राहक संिा दोनों ही अग्रदिश्िाक बायस हैं। 14ण्7 किसी ट्रांिास्टर प्रवधर्क के लिए वोल्टता लब्िध ;ंद्ध सभी आवृिायों के लिए समान रहती है। ;इद्ध उच्च और निम्न आवृिायों पर उच्च होती है तथा मध्य आवृिा परिसर में अचर रहती है। ;बद्ध उच्च और निम्न आवृिायों पर कम होती है और मध्य आवृिायों पर अचर रहती है। ;कद्ध उपरोक्त में से कोइर् नहीं। 14ण्8 अधर् - तरंगी दिष्टकरण में, यदि निवेश आवृिा 50 भ््र है तो निगर्म आवृिा क्या है? समान निवेश आवृिा हेतु पूणर् तरंग दिष्टकारी की निगर्म आवृिा क्या है? 14ण्9 ब्म् - ट्रांिास्टर प्रवधर्क हेतु, 2 ाΩ के संग्राहक प्रतिरोध के सिरों पर ध्वनि वोल्टता 2 ट है। मान लीजिए कि ट्रांिास्टर का धारा प्रवधर्न गुणक 100 है। यदि आधार प्रतिरोध 1 ाΩ है तो निवेश संकेत ;ेपहदंसद्ध वोल्टता और आधार धारा परिकलित कीजिए। 14ण्10 एक के पश्चात एक श्रेणीक्रम सोपानित में दो प्रवधर्क संयोजित किए गए हैं। प्रथम प्रवधर्क की वोल्टता लब्िध 10 और द्वितीय की वोल्टता लब्िध 20 है। यदि निवेश संकेत 0ण्01 वोल्ट है तो निगर्म प्रत्यावतीर् संकेत का परिकलन कीजिए। 14ण्11 कोइर् च.द पफोटोडायोड ़2ण्8 मट बैंड अंतराल वाले अधर्चालक से संविरचित है। क्या यह 6000 दउ की तरंगदैध्यर् का संसूचन कर सकता है? अतिरिक्त अभ्यास 14ण्12 सिलिकाॅन परमाणुओं की संख्या 5 × 1028 प्रति उ3 है। यह साथ ही साथ आसेर्निक के 5 × 1022 परमाणु प्रति उ3 और इडियम के 5 × 1020 परमाणु प्रति उ3 से अपमिश्रित किया गया है। इलेक्ट्राॅन और होल की संख्या का परिकलन कीजिए। दिया है कि दप त्र 1ण्5 × 1016 उदृ3। दिया गया पदाथर् द.प्रकार का है या च.प्रकार का? 14ण्13 किसी नैज अध्र्चालक में ऊजार् अंतराल म्ह का मान1ण्2मट है। इसकी होल गतिशीलता इलेक्ट्राॅन गतिशीलता की तुलना में कापफी कम है तथा ताप पर निभर्र नहीं है। इसकी ़600 ज्ञ तथा 300 ज्ञ पर चालकताओं का क्या अनुपात है? यह मानिए कि नैज वाहक सांद्रता दप की ताप निभर्रता इस प्रकार व्यक्त होती है - म् दप त्र द0 मगच दृ ह 2ाज् ठ जहाँ द0 एक स्िथरांक है। 14ण्14 किसी च.द संध्ि डायोड में धरा प् को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है प् त्र प्0 मगच 2 मट ठ दृ1 ाज् ;ंद्ध 0ण्6 ट अग्रदिश्िाक वोल्टता के लिए अग्रदिश्िाक धरा क्या होगीघ् ;इद्ध यदि डायोड के सिरों पर वोल्टता को बढ़ाकर 0ण्7 ट कर दें तो धरा में कितनी वृि हो जाएगीघ् ;बद्ध गतिक प्रतिरोध् कितना हैघ् ;कद्ध यदि पश्चदिश्िाक वोल्टता को 1 ट से 2 ट कर दें तो धरा का मान क्या होगाघ् 14ण्15 आपको चित्रा 14ण्44 में दो परिपथ दिए गए हैंै। यह दशार्इए कि परिपथ ;ंद्ध व्त् गेट की भाँति व्यवहार करता है जबकि परिपथ ;इद्ध ।छक् गेट की भाँति कायर् करता है। चित्रा 14ण्44 14ण्16 नीचे दिए गए चित्रा 14ण्45 में संयोजित छ।छक् गेट संयोजित परिपथ की सत्यमान सारणी बनाइए। चित्रा 14ण्45 अतः इस परिपथ द्वारा की जाने वाली यथाथर् तवर्फ संिया का अभ्िानिधार्रण कीजिए। 14ण्17 आपको निम्न चित्रा 14ण्46 में दशार्ए अनुसार परिपथ दिए गए हैं जिनमें छ।छक् गेट जुड़े हैं। इन दोनों परिपथों द्वारा की जाने वाली तवर्फ संियाओं का अभ्िानिधार्रण कीजिए। चित्रा 14ण्46 14ण्18 चित्रा 14ण्47 में दिए गए छव्त् गेट युक्त परिपथ की सत्यमान सारणी लिख्िाए और इस परिपथ द्वारा अनुपालित तवर्फ संियाओं ;व्त्ए ।छक्ए छव्ज्द्ध को अभ्िानिधार्रित कीजिए। ;संकेत - । त्र 0ए ठ त्र 1 तब दूसरे छव्त् गेट के निवेश । और ठए 0 होंगे और इस प्रकार ल् त्र 1 होगा। इसी प्रकार । और ठ के दूसरे संयोजनों के लिए ल् के मान प्राप्त कीजिए। व्त्ए ।छक्ए छव्ज् द्वारों की सत्यमान सारणी से तुलना कीजिए और सही विकल्प प्राप्त कीजिए।द्ध चित्रा 14ण्47 भौतिकी 14ण्19 चित्रा 14ण्48 में दशार्ए गए केवल छव्त् गेटों से बने परिपथ की सत्यमान सारणी बनाइए। दोनों परिपथों द्वारा अनुपालित तवर्फ संियाओं ;व्त्ए ।छक्ए छव्ज्द्ध को अभ्िानिधार्रित कीजिए। चित्रा 14ण्48

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