13ण्1 भूमिका पिछले अध्याय में हमने पढ़ा है कि प्रत्येक परमाणु का ध्नावेश घनीभूत होकर इसके वेंफद्र में संवेंफित हो जाता है और परमाणु का नाभ्िाक बनाता है। नाभ्िाक का वुफल साइश परमाणु के साइश की तुलना में काप़्ाफी कम होता है। α.कणों के प्रकीणर्न संबंध्ी प्रयोगों ने यह प्रद£शत किया है कि नाभ्िाक की त्रिाज्या, परमाणु की त्रिाज्या की तुलना में 104 गुने से भी कम होनी चाहिए। इसका अथर् है कि नाभ्िाक का आयतन परमाणु के आयतन के 10दृ12 गुने के लगभग है। दूसरे शब्दों में कहें तो परमाणुमें अध्िकांशतः रिक्त स्थान ही है। यदि हम परमाणु का साइश बढ़ाकर कक्षा के कमरे के बराबरकर दें तो नाभ्िाक इसमें एक पिन के शीषर् के साइश का दिखाइर् देगा। तथापि, परमाणु का लगभगसंपूणर् द्रव्यमान ;99ण्9ः से अध्िकद्ध नाभ्िाक में ही समाहित होता है। परमाणु की संरचना के समरूप क्या नाभ्िाक की भी कोइर् संरचना है? यदि ऐसा है तो इसके अवयव क्या - क्या हैं? वे परस्पर किस प्रकार जुड़े हैं? इस अध्याय में हम इस प्रकार के प्रश्नोें केउत्तर खोजने का प्रयास करेंगे। हम नाभ्िाकों के विश्िाष्ट गुणों, जैसेμउनके साइश, द्रव्यमान तथा स्थायित्व की चचार् के साथ इनसे संब( रेडियोऐक्िटवता, विखंडन एवं संलयन जैसी नाभ्िाकीय परिघटनाओं की भी विवेचन करेंगे। 13ण्2 परमाणु द्रव्यमान एवं नाभ्िाक की संरचना परमाणु का द्रव्यमान किलोग्राम की तुलना में बहुत कम होता है। उदाहरण के लिए, काबर्न के परमाणु 12ब् का द्रव्यमान 1ण्992647 × 10दृ26 ाह है। इतनी छोटी राश्िायों को मापने के लिए किलोग्राम बहुत सुविधाजनक मात्राक नहीं है। अतः परमाणु द्रव्यमानों को व्यक्त करने के लिए द्रव्यमान का एक अन्य मात्राक प्रस्तुत किया गया। इस मात्राक को परमाणु द्रव्यमान मात्राक ;नद्ध कहते हैं। इसको 12ब् परमाणु के द्रव्यमान के बारहवें 1ध्12जी भाग से व्यक्त करते हैं। अतः इस परिभाषा के अनुसार 1न त्र 12 ब् परमाणु का दव््रयमान 12 1ण्992647 10 26 ाह 12 1ण्660539 10 27 ाह ;13ण्1द्ध परमाणु द्रव्यमान मात्राक ;नद्ध में व्यक्त करने पर विभ्िान्न तत्वों के परमाणु द्रव्यमान, हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान के पूणर् गुणज के निकट पाए जाते हैं। परंतु इस नियम के अनेक प्रभावशाली अपवाद भी हैं। उदाहरण के लिए, क्लोरीन का परमाणु द्रव्यमान 35ण्46 न है। परमाणु द्रव्यमानों का यथाथर् मापन, द्रव्यमान वणर्क्रममापी ;स्पेक्ट्रोमीटरद्ध द्वारा किया जाता है। परमाणु द्रव्यमानों के मापन से पता चलता है कि एक ही तत्व के विभ्िान्न प्रकार के ऐसे परमाणुओं का अस्ितत्व है जिनके रासायनिक गुण तो समान होते हैं पर इनके द्रव्यमानों में अंतर होता है। एक ही तत्व की ऐसी परमाणु प्रजातियाँ जिनके द्रव्यमानों में अंतर होता है, समस्थानिक कहलाती हैं;यूनानी शब्द आइसोटाॅप का अथर् ¯हदी में समस्थानिक है, यह नाम इन्हें इसलिए दिया गया हैक्योंकि तत्वों की आवतर् सारणी में ये सभी एक ही स्थान पर पाए जाते हैंद्ध। शोध् से पता चला किप्रत्येक तत्व व्यावहारिक रूप से कइर् समस्थानिकों का मिश्रण है। विभ्िान्न समस्थानिकों की सापेक्षबहुलता तत्व बदलने के साथ बदलती है।उदाहरण के लिए, क्लोरीन के दो समस्थानिक हैं जिनके द्रव्यमान क्रमशः 34ण्98 न एवं 36ण्98 न हैं, जो कि हाइड्रोजन परमाणु द्रव्यमान के पूणर् गुणज के सन्िनकट हैं। इन समस्थानिकों की सापेक्ष बहुलता क्रमशः 75ण्4 एवं 24ण्6ः है। इस प्रकार, प्राकृतिक क्लोरीन परमाणु का द्रव्यमान इन समस्थानिकों का भारित - औसत है। अतः, प्राकृतिक क्लोरीन परमाणु का द्रव्यमान, 75ण्4 34ण्98 24ण्6 36ण्98 त्र 100 त्र 35ण्47 न वही मान है जो क्लोरीन का परमाणु द्रव्यमान है। यहाँ तक कि सबसे हलके तत्व हाइड्रोजन के भी तीन समस्थानिक हैं जिनके द्रव्यमान 1ण्0078 नए 2ण्0141 न एवं 3ण्0160 न हैं। सबसे हलके हाइड्रोजन परमाणु जिसकी सापेक्ष बहुलता 99ण्985: है, का नाभ्िाक, प्रोटाॅन कहलाता है। एक प्रोटाॅन का द्रव्यमान है, उच 1ण्00727 न 1ण्67262 10 27 ाह ;13ण्2द्ध यह हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान 1ण्00783 न में से, इसमें विद्यमान एक इलेक्ट्राॅन के द्रव्यमान उ त्र 0ण्00055 न को घटाने से प्राप्त द्रव्यमान के बराबर है। हाइड्रोजन के दूसरे दो समस्थानिकमड्यूटीरियम एवं ट्राइटियम कहलाते हैं। ट्राइटियम नाभ्िाक अस्थायी होने के कारण प्रकृति में नहींपाए जाते और वृफत्रिाम विध्ियों द्वारा प्रयोगशालाओं में निमिर्त किए जाते हैं। नाभ्िाक में ध्न आवेश प्रोटाॅनों का ही होता है। प्रोटाॅन पर एकांक मूल आवेश होता है और यहस्थायी कण है। पहले यह विचार था कि नाभ्िाक में इलेक्ट्राॅन होते हैं पर क्वांटम सि(ांत पर आधारिततको± के कारण इस मान्यता को नकार दिया गया। किसी परमाणु के सभी इलेक्ट्राॅन उसके नाभ्िाक441उसके परमाणु क्रमांक र्ए के बराबर होती है। अतः परमाणु में इलेक्ट्राॅनों का वुफल आवेश ;दृर्मद्ध उसके नाभ्िाक के वुफल आवेश ;़र्मद्ध के बराबर होता है, क्योंकि परमाणु विद्युतीय रूप से उदासीन होता है। इसलिए किसी परमाणु के नाभ्िाक में प्रोटाॅनोें की संख्या, तथ्यतः इसका परमाणु क्रमांक, र् होती है। न्यूट्राॅन की खोज क्योंकि ड्यूटीरियम एवं ट्राइटियम हाइड्रोजन के ही समस्थानिक हैं, इनमें से प्रत्येक के नाभ्िाकमें एक प्रोटाॅन होना चाहिए। लेकिन हाइड्रोजन, ड्यूटीरियम एवं ट्राइटियम के नाभ्िाकों के द्रव्यमानोंमें अनुपात 1 रू 2 रू 3 है। इसलिए ड्यूटीरियम एवं ट्राइटियम के नाभ्िाकों में प्रोटाॅन के अतिरिक्तवुफछ उदासीन द्रव्य भी होना चाहिए। इन समस्थानिकों के नाभ्िाकों में विद्यमान उदासीन अनाविष्टद्रव्य की मात्रा को प्रोटाॅन - द्रव्यमान के मात्राकों में व्यक्त करें तो क्रमशः एक एवं दो मात्राकोंके लगभग होता है। यह तथ्य इंगित करता है कि परमाणुओं के नाभ्िाकों में प्रोटाॅनों के अतिरिक्तविद्यमान रहने वाला यह उदासीन द्रव्य भी एक मूल मात्राक के गुणजों के रूप में ही होताहै। इस परिकल्पना की पुष्िट, 1932 में, जेम्स चैडविक द्वारा की गइर् जिन्होंने देखा कि जबबेरिलियम नाभ्िाकों पर ऐल्प़्ाफा कणों ;ऐल्प़्ाफा कण, हीलियम नाभ्िाक होते हैं जिनके विषयमें हम अगले अनुभाग में चचार् करेंगेद्ध की बौछार की जाती है, तो इनसे वुफछ उदासीन विकिरणउत्सजिर्त होते हैं। यह भी पाया गया कि ये उदासीन विकिरण, हीलियम, काबर्न एवं नाइट्रोजनजैसे हलके नाभ्िाकों से टकराकर उनसे प्रोटाॅन बाहर निकालते हैं। उस समय तक ज्ञात एकमात्रा उदासीन विकिरण पफोटाॅन ;विद्युत चंुबकीय विकिरणद्ध ही थे। ऊजार् एवं संवेग संरक्षणके नियमों का प्रयोग करने पर पता चला कि यदि ये उदासीन विकिरण पफोटाॅनों के बनेहोते तो इनकी ऊजार् उन विकिरणों की तुलना में बहुत अध्िक होती जो बेरिलियम नाभ्िाकोंपर ऐल्प़्ाफा कणों की बौछार से प्राप्त होते हैं। इस समस्या के समाधन का सूत्रा, जिसे चैडविकने संतोषजनक ढंग से हल किया, इस कल्पना में समाहित था कि उदासीन विकिरणों मेंएक नए प्रकार के उदासीन कण होते हैं जिन्हें न्यूट्राॅन कहते हैं। ऊजार् एवं संवेग संरक्षणनियमों का उपयोग कर, उन्होंने इस नए कण का द्रव्यमान ज्ञात करने में सपफलता प्राप्त की,जिसे प्रोटाॅन के द्रव्यमान के लगभग बराबर पाया गया। अब हम न्यूट्राॅन का द्रव्यमान अत्यध्िक यथाथर्ता से जानते हैं। यह है, उ द त्र 1ण्00866 न त्र 1ण्6749×10दृ27 ाह ;13ण्3द्ध न्यूट्राॅन की खोज के लिए चैडविक को 1935 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कियागया। एक मुक्त प्रोटाॅन के विपरीत एक मुक्त न्यूट्राॅन अस्थायी होता है। यह एक प्रोट्राॅन, एकइलेक्ट्राॅन एवं एक प्रतिन्यूटिªनो ;अन्य मूल कणद्ध के रूप में क्षयित हो जाता है। इसकी औसतआयु लगभग 1000 े होती है। तथापि, नाभ्िाक के भीतर यह स्थायी होता है।अब, नाभ्िाक की संरचना निम्नलिख्िात पदों एवं संकेत चिÉों का उपयोग करके समझायीजा सकती है। र् .परमाणु क्रमांक त्र प्रोटाॅनों की संख्या ख्13ण्4;ंद्ध, छ .न्यूट्रान संख्या त्र न्यूट्राॅनों की संख्या ख्13ण्4;इद्ध, । .द्रव्यमान संख्या त्र र् ़ छ त्र न्यूट्राॅनों एवं प्रोटाॅनों की वुफल संख्या ख्13ण्4;बद्ध, प्रोटाॅन एवं न्यूट्राॅन के लिए न्यूक्िलयाॅन शब्द का भी उपयोग किया जा सकता है। अतःकिसी परमाणु में न्यूक्िलयाॅन संख्या उसकी द्रव्यमान संख्या । होती है।किसी नाभ्िाकीय प्रजाति या नाभ्िाक को संकेत चिÉ । ग् द्वारा प्रदश्िार्त किया जाता है।र् जहाँ ग् उस प्रजाति का रासायनिक चिÉ है। उदाहरण के लिए, स्वणर् - नाभ्िाक को संकेत 197 79 ।न द्वारा व्यक्त करते हैं। इसमें 197 न्यूक्िलयाॅन होते हैं जिनमें 79 प्रोटाॅन एवं 118 न्यूट्राॅन होते हैं। अब किसी तत्व के समस्थानिकों की संरचना को सरलता से समझाया जा सकता है। किसी दिए गए तत्व के समस्थानिकों के नाभ्िाकों में प्रोटाॅनों की संख्या तो समान होती है, परंतु वे एक - दूसरे से न्यूट्राॅनों की संख्या की दृष्िट से भ्िान्न होते हैं। ड्यूटीरियम 2भ् जो1 हाइड्रोजन का एक समस्थानिक है, इसमें एक प्रोटाॅन एवं एक न्यूट्राॅन होता है। इसके दूसरेसमस्थानिक ट्राइटियम 3भ् में एक प्रोटाॅन एवं दो न्यूट्राॅन होते हैं। तत्व स्वणर् के 32 समस्थानिक1 होते हैं जिनकी द्रव्यमान संख्याओं का परास । त्र173 से । त्र 204 तक होता है। यह हमपहले ही बता चुके हैं कि तत्वों के रासायनिक गुण उनके इलेक्ट्राॅनिक विन्यास पर निभर्रकरते हैं। चूँकि, समस्थानिक परमाणुओं के इलेक्ट्राॅनिक विन्यास समान होते हैं उनका रासायनिकव्यवहार भी एक जैसा होता है और इसलिए उनको आवतर् सारणी में एक ही स्थान पररखा जाता है।ऐसे सभी नाभ्िाक जिनकी द्रव्यमान संख्या । समान होती है समभारिक कहलाते हैं।उदाहरणाथर्, नाभ्िाक 3भ् एवं 3भ्म समभारिक हैं। ऐसे नाभ्िाक जिनकी न्यूट्राॅन संख्या छ समान12 हो लेकिन परमाणु क्रमांक र् भ्िान्न हो समन्यूट्राॅनिक कहलाते हैं। उदाहरणाथर्, 198 भ्ह एवं80 197 ।न समन्यूट्राॅनिक हैं।79 13ण्3 नाभ्िाक का साइश जैसा हमने अध्याय 12 में देखा है, रदरपफोडर् वह अग्रणी वैज्ञानिक थे जिन्होंने परमाणु नाभ्िाक के अस्ितत्व की परिकल्पना एवं स्थापना की। रदरपफोडर् के सुझाव पर गीगर एवं मासर्डन ने स्वणर् के ववर्फ पर ऐल्प़्ाफा कणों के प्रकीणर्न से संबंध्ित प्रसि( प्रयोग किया। उनके प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि 5ण्5 डमट गतिज ऊजार् के ऐल्प़्ाफा कणों की स्वणर् नाभ्िाकों के निकटस्थ पहुँच की दूरी लगभग 4ण्0 × 10दृ14 उ है। स्वणर् की परत से α .कणों के प्रकीणर्न को रदरपफोडर् ने यह मानकर समझायाकि प्रकीणर्न के लिए केवल कूलाॅम का प्रतिकषर्ण बल ही उत्तरदायी है। चँूकि, ध्नात्मक आवेश नाभ्िाक में निहित होता है, नाभ्िाक का वास्तविक साइश 4ण्0 × 10दृ14 उ से कम होना चाहिए। यदि हम 5ण्5 डमट से अध्िक ऊजार् के α .कण प्रयोग करें तो इनके स्वणर् नाभ्िाकों के निकटस्थ पहुँच की दूरी और कम हो जाएगी और तब प्रकीणर्न अल्प परास नाभ्िाकीय बलों से प्रभावित होने लगेगा और रदरपफोडर् द्वारा किए गए परिकलनों से प्राप्त मान बदल जाएँगे। रदरपफोडर् के परिकलन ऐल्प़्ाफा कणों एवं स्वणर् नाभ्िाकों के ध्नावेश युक्त कणों के बीच लगने वाले शु( कूलाॅम प्रतिकषर्ण बल पर आधरित हैं। उस दूरी के द्वारा जिस पर रदरपफोडर् के परिकलनों में आने वाले अंतर स्पष्ट होने लगते हैं, नाभ्िाकीय साइशों के विषय में निष्कषर् निकाला जा सकता है। ऐसे प्रकीणर्न प्रयोग करके जिनमें α.कणों के स्थान पर तीव्र गति इलेक्ट्राॅनों की विभ्िान्न तत्वोंके ऊपर बौछार की गइर् हो, इन तत्वों के नाभ्िाकीय साइश अत्यंत परिशु(ता से ज्ञात किए गए। यह पाया गया कि । द्रव्यमान संख्या के नाभ्िाक की त्रिाज्या है: ।1ध्3त् त्र त्0 ;13ण्5द्ध जहाँत्0त्र 1ण्2 × 10दृ15 उ। इसका अथर् है कि नाभ्िाक का आयतन ;जो त्3 के अनुक्रमानुपाती हैद्ध द्रव्यमान संख्या । के अनुक्रमानुपाती होता है। अतः नाभ्िाक का घनत्व नियत होता है, अथार्त, सभी नाभ्िाकों के लिए इसका मान । पर निभर्र नहीं करता है। विभ्िान्न नाभ्िाक इस नियत घनत्व के द्रव की बूँद की तरह होते हैं। नाभ्िाकीय द्रव्य का घनत्व 2ण्3 × 1017 ाह उदृ3 के सन्िनकट होता है। सामान्य पदाथो± की तुलना में घनत्व का यह मान बहुत अध्िक होता है, जैसे जल के लिए घनत्व केवल 103 ाह उदृ3 ही होता है। इस तथ्य को आसानी से समझा भी जा सकता है, क्योंकि यह हम पहले ही देख चुके हैं कि परमाणु अध्िकांशतः भीतर से रिक्त होता है। सामान्य परमाणुओं 443 से बने द्रव्य में बड़ी मात्रा में रिक्त स्थान होता है। 13ण्4 द्रव्यमान - उफजार् तथा नाभ्िाकीय बंधन - उफजार् 13ण्4ण्1 द्रव्यमान - ऊजार् आइंस्टाइन ने अपने विश्िाष्ट आपेक्ष्िाकता सि(ांत के आधर पर यह दशार्या कि द्रव्यमान ऊजार् का ही एक दूसरा रूप है। विश्िाष्ट आपेक्ष्िाकता सि(ांत से पहले यह माना जाता था कि किसी अभ्िाियामें द्रव्यमान एवं ऊजार् अलग - अलग संरक्ष्िात होते हैं। परंतु आइंस्टाइन ने यह दशार्या कि द्रव्यमान केवलऊजार् का दूसरा रूप है और हम द्रव्यमान - ऊजार् को ऊजार् के अन्य रूपों, जैसेμगतिज ऊजार् में, परिवतिर्तकर सकते हैं तथा विपरीत प्रक्रम अथार्त ऊजार् को द्रव्यमान में रूपांतरित करना भी संभव है।इसके लिए आइंस्टाइन ने जो प्रसि( द्रव्यमान - ऊजार् समतुल्यता संबंध् दिया वह है: म् त्र उब2 ;13ण्6द्ध यहाँ म्ए द्रव्यमान उ के समतुल्य ऊजार् है एवं ब निवार्त में प्रकाश का वेग है जिसका सन्िनकट मान 3×108 उ ेदृ1 है। उदाहरण 13ण्2 1 ह पदाथर् के समतुल्य ऊजार् को परिकलित कीजिए। हल ऊजार् म् त्र 10दृ3 × ; 3 × 108द्ध2 श्र म् त्र 10दृ3 × 9 × 1016 श्र त्र 9 × 1013 श्र इस प्रकार, यदि एक ग्राम पदाथर् को भी ऊजार् में रूपांतरित किया जाए तो इससे ऊजार् की विशाल मात्रा मुक्त होती है। आइंस्टाइन के द्रव्यमान - ऊजार् संबंध् की प्रायोगिक पुष्िट, न्यूक्िलयाॅनों, नाभ्िाकों, इलेक्ट्राॅनों एवं अन्य हाल ही में खोजे गए कणों के बीच होने वाली नाभ्िाकीय अभ्िाियाओं के अध्ययन में होचुकी है। किसी अभ्िािया में ऊजार् संरक्षण नियम से अभ्िाप्राय है कि यदि द्रव्यमान से संब( ऊजार्को भी परिकलनों में सम्िमलित करें तो प्रारंभ्िाक ऊजार् अंतिम ऊजार् के बराबर होती है। यह संकल्पना, नाभ्िाकों की पारस्परिक अन्योन्य ियाओं एवं नाभ्िाकीय द्रव्यमानों को समझने के लिए महत्वपूणर् है। यही अगले वुफछ अनुभागों की विषय - वस्तु है। 13ण्4ण्2 नाभ्िाकीय बंध्न - ऊजार् अनुभाग 13ण्2 में हमने देखा कि नाभ्िाक न्यूट्राॅन एवं प्रोटाॅन का बना है। अतः यह अपेक्ष्िात है कि नाभ्िाक का द्रव्यमान, इसमें विद्यमान न्यूट्राॅनों एवं प्रोटाॅनों के द्रव्यमानों के वुफल योग Σउ के बराबर होगा। लेकिन, नाभ्िाकीय द्रव्यमान डए सदैव Σउ से कम पाया जाता है। उदाहरण के लिए, आइए16व् को लें। इसमें 8 प्रोटाॅन एवं 8 न्यूट्राॅन हैं। अतः,88 न्यूट्राॅनों का द्रव्यमान त्र 8 × 1ण्00866 न 8 प्रोटाॅनों का द्रव्यमान त्र 8 × 1ण्00727 न 8 इलेक्ट्राॅनों का द्रव्यमान त्र 8 × 0ण्00055 न इसलिए 16व् के नाभ्िाक का अपेक्ष्िात द्रव्यमान त्र 8 × 2ण्01593 न त्र 16ण्12744 न8 द्रव्यमान वणर्क्रममापी के प्रयोगों द्वारा प्राप्त 16व् का परमाणु द्रव्यमान 15ण्99493 न है। इसमें8 से 8 इलेक्ट्राॅनों का द्रव्यमान ;8 × 0ण्00055 नद्ध घटाने पर 16व् के नाभ्िाक का प्रायोगिक मान8 15ण्99053 न है। अतः हम पाते हैं कि आॅक्सीजन 16व् नाभ्िाक का द्रव्यमान, इसके घटकों के वुफल द्रव्यमान8 से 0ण्13691न कम है। नाभ्िाक के द्रव्यमान एवं इसके घटकों के द्रव्यमान के अंतर Δडए को द्रव्यमान क्षति कहते हैं, और इसका मान इस प्रकार व्यक्त किया जाता है: ख्र्उ च ;। र्उद ,ड द्ध ड ;13ण्7द्ध द्रव्यमान - क्षति का अथर् क्या है? यहीं पर आइंस्टाइन का द्रव्यमान - ऊजार् समतुल्यता सि(ांत अपनी भूमिका निभाता है। चूँकि, आॅक्सीजन नाभ्िाक का द्रव्यमान इसके घटकों के द्रव्यमानों के योग ;अबंध्ित अवस्था में 8 प्रोटाॅन एवं 8 न्यूट्राॅन काद्ध से कम होता है, आॅक्सीजन नाभ्िाक की समतुल्यऊजार् इसके घटकों की समतुल्य ऊजार्ओं के योग से कम होती है। यदि आप आॅक्सीजन नाभ्िाक को 8 प्रोटाॅनों एवं 8 न्यूट्राॅनों में विखंडित करना चाहें तो आपको यह अतिरिक्त ऊजार्, Δड ब2ए इस नाभ्िाक को प्रदान करनी होगी। इसके लिए आवश्यक यह ऊजार् म्इए द्रव्यमान क्षति से निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा संबंध्ित होती है: म्इ त्र Δ ड ब2 ;13ण्8द्ध उदाहरण 13ण्3 एक परमाणु द्रव्यमान मात्राक के समतुल्य ऊजार् का मान पहले जूल और पिफर डमट में ज्ञात कीजिए। इसका उपयोग करके 16व् की द्रव्यमान क्षति डमटध्ब2 में व्यक्त कीजिए।8 हल 1न त्र 1ण्6605 × 10दृ27 ाह 2इसको ऊजार् के मात्राकों में परिवतिर्त करने के लिए हम इसको ब से गुणा करते हैं एवं पाते हैं कि इसके समतुल्य ऊजार् त्र 1ण्6605 × 10दृ27 × ;2ण्9979 × 108द्ध2 ाह उ2ध्े2त्र 1ण्4924 × 10.10 श्र1ण्4924 10 10 मटत्र 1ण्602 1019 त्र 0ण्9315 × 109 मट त्र 931ण्5 डमट अथवा 1न त्र 931ण्5 डमटध्ब2 16व् के लिए Δड त्र 0ण्13691 न त्र 0ण्13691×931ण्5 डमटध्ब2 8 त्र 127ण्5 डमटध्ब2 ∴ 16व् को इसके घटकों में विभाजित करने के लिए आवश्यक ऊजार् 127ण्5 डमटध्ब2 है।8 यदि वुफछ न्यूट्राॅनों एवं प्रोटाॅनों को पास - पास लाकर, निश्िचत आवेश एवं द्रव्यमान वाला एक नाभ्िाक बनाया जाए तो इस प्रिया में Δम् उफजार् मुक्त होगी। यह उफजार् Δम् नाभ्िाक की 445इइबंधन - उफजार् कहलाती है। यदि हमें किसी नाभ्िाक के नाभ्िाक - कणों को अलग - अलग करना हो तो हमें इन कणों को वुफल उफजार् म् प्रदान करनी होगी। यद्यपि नाभ्िाक को हम इस प्रकार इतोड़ नहीं सकते, पिफर भी, नाभ्िाक की बंधन - उफजार् यह तो बताती ही है कि किसी नाभ्िाक में न्यूक्िलयाॅन परस्पर कितनी अच्छी तरह से जुड़े हैं। नाभ्िाक के कणों की बंधन शक्ित का एक और अिाक उपयोगी माप बंधन - उफजार् प्रति न्यूक्िलयाॅन, म् हैऋ जो कि नाभ्िाक कीइदबंधन - उफजार्, म् एवं इसमें विद्यमान न्यूक्िलआॅनों की संख्या । का अनुपात है।इΔम्इद त्र Δम्इ ध्। ;13ण्9द्ध हम प्रति न्यूक्िलयाॅन बंधन - उफजार् को ऐसा मान सकते हैं कि यह किसी नाभ्िाक को इसकेन्यूक्िलआॅनों में पृथक्कृत करने के लिए आवश्यक औसत उफजार् है। चित्रा 13ण्1 में बहुत से नाभ्िाकों के 10 लिए प्रति न्यूक्िलयाॅन बंधन उफजार् म् एवंइदद्रव्यमान संख्या । में ग्रापफ दिखाया गया है।8 इस ग्रापफ में हमें निम्नलिख्िात लक्षण पर4भ्म12ब्16व् 32ै 56थ्म 100 डव 127 प् 184 ॅ 197 ।द 238न् 14छ18 व् 6स्प 3भ् 2भ् विशेष दृष्िटगोचर होते हैं μ 6 ;पद्ध मध्यवतीर् द्रव्यमान संख्याओं ; 30 ढ । ढ 170द्ध के लिए, प्रति न्यूक्िलयाॅनबंधन - ऊजार्, म्इदए का मान व्यावहारिक2 4 रूप में नियत रहता है, अथार्त परमाणु क्रमांक के साथ परिवतिर्त नहीं होता है।0 0 50 100 150 200 250 वक्र । त्र 56 के लिए लगभग 8ण्75 द्रव्यमान संख्या ;द्ध। डमट का अध्िकतम मान एवं । त्र चित्रा 13ण्1 द्रव्यमान संख्या के पफलन के रूप में238 के लिए 7ण्6 डमट दशार्ता है।प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्न - ऊजार्। ;पपद्ध हलके नाभ्िाकों ;। ढ 30द्ध एवं भारी नाभ्िाकों ;। झ170द्ध दोनों के लिए ही म्इद का मान मध्यवतीर् परमाणु क्रमांकके नाभ्िाकों की तुलना में अपेक्षाकृत कम होता है। इस प्रकार निम्न निष्कषो± पर पहुँच सकते हैं: ;पद्ध यह बल आकषीर् है तथा प्रति न्यूक्िलयाॅन वुफछ डमट बंध्न उत्पन्न करने के लिए पयार्प्त प्रबल है। ;पपद्ध 30 ढ । ढ 170 के परास में बंध्न - ऊजार् की अचरता इस तथ्य का परिणाम है कि नाभ्िाकीय बल लघु परासी बल होते हैं। बड़े नाभ्िाक के भीतर स्िथत किसी न्यूक्िलयाॅन पर विचार कीजिए।यह अपने पास - पड़ोस के केवल उन न्यूक्िलआॅनों से प्रभावित होगा जो इसके नाभ्िाकीय बलके परिसर में आते हैं। यदि कोइर् अन्य न्यूक्िलयाॅन इस विश्िाष्ट न्यूक्िलयाॅन के नाभ्िाकीय बलके परिसर से अध्िक दूरी पर है, तो यह विचाराध्ीन नाभ्िाक की बंध्न - ऊजार् को तनिक भीप्रभावित नहीं करेगा। यदि किसी नाभ्िाक के नाभ्िाकीय बल के परिसर में अिाकतम च न्यूक्िलयाॅन हो सकते हों, तो इसकी बंध्न - ऊजार् च के अनुक्रमानुपाती होगी। माना कि किसीनाभ्िाक की बंध्न - ऊजार् चा है, जहाँ ा एक नियतांक है जिसकी विमाएँ वही हैं जो ऊजार् कीहोती हैं। अब यदि हम न्यूक्िलयाॅनों की संख्या बढ़ाकर । का मान बढ़ाएँ, तो इससे नाभ्िाक केभीतर न्यूक्िलयाॅनों की बंध्न - ऊजार् प्रभावित नहीं होगी। क्योंकि, किसी भी बड़े नाभ्िाक मेंअिाकांश न्यूक्िलयाॅन इसके भीतर रहते हैं तथा पृष्ठ की अपेक्षा, नाभ्िाक की बंध्न - ऊजार् पर446 । की वृि का वुफल प्रभाव नगण्य रहता है। अतः प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्न - ऊजार् नियत रहती है और इसका सन्िनकट मान चा के बराबर होता है। नाभ्िाकों का वह गुण जिसके कारण कोइर् नाभ्िाक केवल अपने निकट के नाभ्िाकों को ही प्रभावित करता है, नाभ्िाकीय बलों का संतृप्ित गुण कहलाता है। ;पपपद्ध एक अत्यध्िक भारी नाभ्िाक, जैसे । त्र 240ए की प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्न - ऊजार्, । त्र 120 के नाभ्िाक की तुलना में कम होती है। अतः, यदि । त्र 240 का कोइर् नाभ्िाक, । त्र 120 के दो नाभ्िाकों में टूटता है तो, इनमें न्यूक्िलयाॅन अध्िक दृढ़ता से परिब( होंगे। यहइंगित करता है कि इस प्रिया में ऊजार् विमुक्त होगी। यह विखंडन द्वारा ऊजार् विमुक्त होने की महत्वपूणर् संभावना को अभ्िाव्यक्त करता है जिसके विषय में हम अनुभाग 13ण्7ण्1 में चचार् करेंगे। ;पअद्ध कल्पना कीजिए कि दो हलके नाभ्िाक ;। 10द्ध संलयित होकर एक भारी नाभ्िाक बनाते हैं।संलयन द्वारा बने इस भारी नाभ्िाक की प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्न - ऊजार्, हलके नाभ्िाकों की प्रतिन्यूक्िलयाॅन बंधन ऊजार् से अध्िक होती है। इसका अथर् यह हुआ कि अंतिम निकाय में कण प्रारंभ्िाक निकाय की तुलना में अध्िक दृढ़ता से बंध्ित हैं। यहाँ संलयन की इस प्रिया में भी ऊजार् विमुक्तहोगी। यही सूयर् की ऊजार् का स्रोत है जिसके विषय में हम अनुभाग 13ण्7ण्3 में चचार् करेंगे। 13ण्5 नाभ्िाकीय बल वह बल जो परमाणु में इलेक्ट्राॅनों की गति नियंत्रिात करता है हमारा सुपरिचित कूलाॅम बल है। अनुभाग 13ण्4 में हमने देखा कि औसत द्रव्यमान के नाभ्िाक के लिए प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्न - ऊजार् लगभग 8 डमट है जो परमाणु की बंध्न - ऊजार् की तुलना में बहुत अध्िक है। अतः नाभ्िाक में कणों को परस्पर बाँध्े रखने के लिए एक भ्िान्न प्रकार के शक्ितशाली आकषर्ण बल की आवश्यकता है। यह बल इतना अध्िक शक्ितशाली होना चाहिए कि ;ध्नावेश्िातद्ध प्रोटाॅनों के बीच लगे प्रतिकषर्ण बलों से अध्िक प्रभावी होकर प्रोटाॅनों एवं न्यूट्राॅनों दोनों को नाभ्िाक के सूक्ष्म आयतन में बाँध्े रख सके। हम यह पहले ही देख चुके हैं कि प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्नऊजार् की अचरता को इन बलों की लघु परासी प्रकृति से समझा जा सकता है। नाभ्िाकीय बंध्न बलों के वुफछ अभ्िालक्षणों को संक्षेप में नीचे दिया गया है। यह ज्ञान 1930 से 1950 के बीच किए गए विभ्िान्न प्रयोगों द्वारा प्राप्त हुआ है। ;पद्ध नाभ्िाकीय बल, आवेशों के बीच लगने वाले वूफलाॅम बल एवं द्रव्यमानों के बीच लगने वाले गुरुत्वाकषर्ण बल की तुलना में अत्यध्िक शक्ितशाली होता है। नाभ्िाकीय बंध्न बल को, नाभ्िाक के भीतर प्रोटाॅनों के बीच लगने वाले वूफलाॅम प्रतिकषर्ण बल पर आध्िपत्य करना होता है। यह इसीलिए संभव हो पाता है, 0 100 .100 123क्योंकि नाभ्िाकीय बल वूफलाॅम बलों की तुलना में अत्यध्िक प्रबल होते हैं। तव त ;उिद्ध गुरुत्वाकषर्ण बल तो वूफलाॅम बल की तुलना में भी अत्यंत दुबर्ल होता है। चित्रा 13ण्2 एक नाभ्िाकीय युग्म की;पपद्ध न्यूक्िलआॅनों के बीच दूरी बढ़ाकर वुफछ पेफम्टोमीटर से अध्िक करने पर उनके बीच स्िथतिज ऊजार् उनके बीच की दूरी के पफलनलगने वाला नाभ्िाकीय बल तेशी से घटकर शून्य हो जाता है। इस कारण, औसत के रूप में। त0 से अध्िक दूरी होने पर बलअथवा बड़े साइश के नाभ्िाकों में ‘बलों की संतृप्तता’ की स्िथति आ जाती हैआकषर्ण बल होता है एवं त0 से कम दूरीजिसके परिणामस्वरूप प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्न - ऊजार् नियत हो जाती है। दो नाभ्िाकोंपर तीव्र प्रतिकषर्ण बल। आकषर्ण बलकी स्िथतिज ऊजार् और उनके बीच की दूरी में संबंध् दशार्ने वाला एक अपरिष्कृत सवार्ध्िक प्रबल तब होता है जब नाभ्िाकों केआरेख चित्रा 13ण्2 में दशार्या गया है। लगभग 0ण्8 उि की दूरी तपर स्िथतिज0 बीच की दूरी त0 होती है।ऊजार् का मान न्यूनतम होता है। इसका अथर् यह हुआ कि यदि नाभ्िाकों के बीच दूरी 0ण्8 उि से अध्िक होती है तो ये बल आकषर्ण बल होते हैं और 0ण्8 उि से कम दूरियों के लिए ये प्रतिकषर्ण बल होते हैं। 447 ;पपपद्ध न्यूट्राॅन - न्यूट्राॅन, न्यूट्राॅन - प्रोटाॅन एवं प्रोटाॅन - प्रोटाॅन के बीच लगने वाले नाभ्िाकीय बल लगभग समान परिमाण के होते हैं। नाभ्िाकीय बल विद्युत आवेशों पर निभर्र नहीं करते। वूफलाॅम के नियम अथवा न्यूटन के गुरुत्वीय नियम की भाँति नाभ्िाकीय बलों का कोइर् सरल गण्िातीय रूप नहीं है। 13ण्6 रेडियोऐक्िटवता रेडियोऐक्िटवता की खोज ए.एच. बैकेरल ने सन्् 1896 में संयोगवश की। यौगिकों को दृश्य प्रकाश से विकी£णत करके उनकी प्रतिदीप्ित एवं स्पुफरदीप्ित का अध्ययन करते हुए बैकेरल ने एक रोचक परिघटना देखी। यूरेनियम - पोटैश्िायम सल्पेफट के वुफछ टुकड़ों पर दृश्य प्रकाश डालने के बाद उसने उनको काले कागश में लपेट दिया। इस पैकेट और प़़्ाफोटोग्राप्िाफक प्लेट के बीच एक चाँदी का टुकड़ा रखा। इसी प्रकार कइर् घंटे तक रखने के बाद जब पफोटोग्राप्ि़़ाफक प्लेट को डेवेलप किया गया तो यह पाया गया कि यह प्लेट काली पड़ चुकी थी। यह किसी ऐसी चीश के कारण हुआ होगा जो यौगिक से उत्सजिर्त हुइर् होगी तथा काले कागश और चाँदी दोनों को भेद कर प़्ाफोटोग्राप्िाफक प्लेट़तक पहुँच गइर् होगी। बाद में किए गए प्रयोगों ने दशार्या कि रेडियोऐक्िटवता एक नाभ्िाकीय परिघटना है जिसमें अस्थायी नाभ्िाक क्षयित होता है। इसे रेडियोऐक्िटव क्षय कहते हंै। प्रकृति में तीन प्रकार के रेडियोऐक्िटव क्षय होते हैं: ;पद्ध α.क्षय, जिसमें हीलियम नाभ्िाक ; 4भ्मद्ध उत्सजिर्त होते हैं,;पपद्ध β.क्षय, जिसमें इलेक्ट्राॅन अथवा पाॅजीट्राॅन ;ऐसे कण जिसका द्रव्यमान तो इलेक्ट्राॅन के बराबर ही होता है पर आवेश ठीक इलेक्ट्राॅन के विपरीत होता हैद्ध उत्सजिर्त होते हैं। 2 ;पपपद्ध γ.क्षय, जिसमें उच्च ऊजार् ;100 ामट अथवा अध्िकद्ध पफोटाॅन उत्सजिर्त होते हैं। इनमें प्रत्येक प्रकार के क्षय पर आगामी उपअनुभागों में विचार किया जाएगा। 13ण्6ण्1 रेडियोऐक्िटव क्षयता का नियम किसी रेडियोऐक्िटव नमूने में जिसमें αए β अथवा γ.क्षय हो रहा हो, यह पाया जाता है कि एकांक समय में क्षयित होने वाले नाभ्िाकों की संख्या, नमूने में विद्यमान वुफल नाभ्िाकों की संख्या के अनुक्रमानुपाती होती है। यदि दिए गए नमूने में नाभ्िाकों की संख्या छ हो और Δज समय में Δछ नाभ्िाक क्षयित हो रहे हों तो छ छ ज अथवाए Δछध्Δज त्र λछ ;13ण्10द्ध जहाँ λ रेडियोेऐक्िटव क्षय - स्िथरांक अथवा विघटन - स्िथरांक है। Δज समय में दिए गए नमूने’ में नाभ्िाकों की संख्या में हुआ परिवतर्न है कछ त्र दृ Δछ। अतः, ;जब Δज → 0द्ध तो छ में परिवतर्न की दर हैμ कछ दृ छ कज ’ Δछ क्षयित नाभ्िाकों की संख्या है, अतः इसका मान सदैव ध्नात्मक होता है। कछए छ में परिवतर्नहै और इसका कोइर् भी चिÉ हो सकता है। यहाँ यह )णात्मक है क्योंकि, मूल छ नाभ्िाकों में Δछ क्षयित 448 कछअथवाए दृकज छ इस समीकरण का दोनों ओर समाकलन करने पर,छ कछज कज ;13ण्11द्ध छछ ज00 अथवा सद छ − सद छ0 त्र −λ ;ज दृ ज0द्ध ;13ण्12द्ध यहाँ छ0ए किसी यादृच्िछक क्षण ज0 पर रेडियोऐक्िटव नाभ्िाकों की संख्या है। ज0 त्र 0 रखकर समीकरण ;13ण्12द्ध को पुनव्यर्वस्िथत करने पर, छसद ज ;13ण्13द्धछ0 जिससे हमें प्राप्त होता है, छ;जद्ध त्र छ0 म −λज ;13ण्14द्ध ध्यान देने योग्य बात यह है कि विद्युत बल्ब ऐसे किसी चर घातांकी क्षय नियम का पालन नहींकरता। यदि हम 1000 बल्बों की आयु ;वह काल विस्तृति जिसके बाद वे फ्रयूश होंगेद्ध का परीक्षणकरें तो हम यह आशा करेंगे कि ये सभी लगभग एक साथ क्षयित ;फ्रयूशद्ध हो जाएँगे। रेडियोनाभ्िाकों का क्षय एक पूणर्तः भ्िान्न नियम, उस रेडियोऐक्िटव - क्षयता नियम के अनुसार होता है, जो समीकरण ;13ण्14द्ध द्वारा व्यक्त किया गया है। किसी नमूने की क्षयता दर त् प्रति एकांक समय में क्षयित होने वाले नाभ्िाकों की संख्या होतीहै। माना कि कज समयांतराल में क्षयित होने वाले नाभ्िाकों की संख्या Δछ है, तो कछ त्र दृ Δछ। धनात्मक राश्िा त् की निम्न व्याख्या होती हैः कछत् त्र दृ कज समीकरण ;13ण्14द्ध का अवकलन करने पर, कछ त् त्र दृ कज त्र λछ0 म −λज अथवा त् त्र त्0 म दृλज ;13ण्15द्ध यह रेडियोऐक्िटव क्षयता नियम के समान है ख्क्योंकि समी. ;13.15द्ध कासमाकलन करने पर समी. ;13.14द्ध प्राप्त होगा, स्पष्टतः त् त्र λछ0ए ज त्र 0 पर क्षयता दर है। किसी निश्िचत समय ज पर क्षयता दर त्ए उस समय अक्षयित नाभ्िाकों की संख्या छ से निम्न रूप में संबंध्ित होती हैः त् त्र λछ ;13ण्16द्ध 0रेडियोऐक्िटव नाभ्िाकों की संख्या की तुलना में, किसी नमूने की क्षयता दर अध्िक प्रायोगिक मापन राश्िा है तथा इसका एक निश्िचत नाम सियता ;ऐक्िटवताद्ध है। इसका ैप् मात्राक बैकेरल ;प्रतीक ठुद्धहै जो रेडियोऐक्िटवता के अन्वेषक हेनरी बैकेरल की स्मृति में निश्िचत किया गया है। 1 बैकेरल का अथर् 1 क्षय प्रति सेवंफड है। एक दूसरा मात्राक क्यूरी ;प्रतीक ब्पद्ध भी सामान्य प्रचलन में है जो ैप् मात्राक ठु से निम्न रूप चित्रा 13ण्3 रेडियोऐक्िटव प्रजातियों का चरघातांकी से संबंध्ित हैः क्षय। प्रत्येक ज्1ध्2 समय के पश्चात दी गइर् प्रजाति 1 क्यूरी त्र 1 ब्प त्र 3ण्7 × 1010 क्षय प्रति सेवंफड त्र 3ण्7 × 1010 ठु की संख्या आध्ी रह जाती है। विभ्िान्न रेडियो - नाभ्िाकों की क्षयता दर में अध्िक भ्िान्नता होती है। इस गुण को अध्र् - आयु केआधर पर मापा जा सकता है। किसी रेडियो - नाभ्िाक की अध्र् - आयु ;ज्1ध्2द्ध वह समय है, जिसमेंइसकी संख्या, प्रारंभ्िाक संख्या ;माना कि छद्ध की आध्ी ;अथार्त् छध्2द्ध रह जाय। समी00;13.14द्ध में, समय ज त्र ज्तथा छ त्र छध्2 रखने परः1ध्2 0सद2ज् त्र 1ध्2 0ण्693 त्र ;13ण्17द्ध समी. ;13.16द्ध के अनुसार, स्पष्टतः यदि संख्या छ0ए ज्1ध्2 समय में आध्ी हो जाती है तो सियता त्भी इसी समय में आध्ी रह जाएगी।0 एक और संबंध्ित मापदंड औसत - आयु ; द्ध है। इसका मान भी समी;13.14द्ध से प्राप्त किया जा सकता है। किसी समयांतराल ज से ज ़ Δज में क्षयित नाभ्िाक त्;जद्धΔज त्र ;λछ0म दृλजΔजद्ध हैं। इनमें से सभी ज समय तक जीवित रहते हैं। अतः इन सभी नाभ्िाकों का वुफल जीवन ज λछ0म दृλज होगा। यह स्पष्टमैरी स्क्लाडोवका क्यूरी ;1867है कि वुफछ नाभ्िाकों का जीवन काल कम तथा वुफछ नाभ्िाकों का जीवन काल1934द्ध पोलैंड में जन्मी। भौतिकविज्ञानी एवं रसायनज्ञ दोनों रूपों अध्िक होता है। अतः औसत आयु का मान प्राप्त करने के लिए उक्त व्युक्ित में पहचान मिली। 1896 में हेनरी का हमें वुफल समय 0 से तक के लिए योग ;अथवा समाकलनद्ध कर समय बैकेरल द्वारा रेडियोऐक्िटवता की खोज ज त्र 0 पर उपलब्ध् नाभ्िाकों की संख्या छसे भाग देना होगा। अतः0 ने मैरी और उनके पति पियरे क्यूरी को छजम दृ ज कजउनके अनुसंधनों एवं विश्लेषणों के 0 0दृ ज जलिए प्रेरित किया, जिसके पफलस्वरूप जम क छ तत्वोंμ रेडियम एवं पोलोनियमμ का 00 पृथक्करण संभव हुआ। वह प्रथम इस समाकलन को करने पर वैज्ञानिक थीं जिन्हें दो नोबेल पुरस्कार τ त्र 1ध्λ प्राप्त हुए: पहला 1903 में भौतिकी प्राप्त होगा।के लिए और दूसरा 1911 में उपरोक्त परिणामों को हम संक्षेप में इस प्रकार प्रकट कर सकते हैंःरसायनविज्ञान के लिए। सद 2ज्1ध्2 त्र त्र τ सद 2 ;13ण्18द्ध ऐसे रेडियोऐक्िटव तत्व ;जैसे कि ट्राइटियम एवं प्लूटोनियमद्ध जिनकी अध्र् - आयु विश्व की आयु ;लगभग 15 अरब वषर्द्ध की तुलना में बहुत कम है, कापफी समय पहले ही विघटित हो चुकेहैं तथा प्रकृति में उपलब्ध् नहीं हैं। हालाँकि, इनका नाभ्िाकीय अभ्िाियाओं में अप्राकृतिक रूप से उत्पादन किया जा सकता है। उदाहरण 13ण्4 क्षयित हो रहे 238न् की, α - क्षय के लिए अध्र् - आयु 4ण्5 ×109 वषर् है।92238न् के 1 ह नमूने की ऐक्िटवता क्या है?92हल ज्1ध्2 त्र 4ण्5 × 109 ल त्र 4ण्5 × 109 ल × 3ण्16 × 107 ेध्ल 450 238न् 1में परमाणुओं की संख्या, ाउवस × 6ण्025 × 1026 परमाणुधउवस923238 ´10त्र 25ण्3 × 1020 है। ∴ क्षयता दर त् है, त् त्र λछ 0ण्6930ण्693 25ण्31020 1 त्र छ त्र े ज्1ध्2 1ण्421017 त्र 1ण्23 × 104 ेदृ1 त्र 1ण्23 × 104 ठु 13ण्6ण्2 ऐल्प़्ाफा - क्षय 238न् 234ज्ीका में क्षय ऐल्पफा - क्षय का एक प्रचलित उदाहरण है। इस प्रिया में हीलियम़9290नाभ्िाक ;4भ्म द्ध उत्सजिर्त होता हैः2 238 न् → 234 ज्ी ़ 4भ्म ;13ण्19द्ध9290 2 ऐल्पफा - क्षय में, उत्पादित विघटनज नाभ्िाक की द्रव्यमान - संख्या क्षय होने वाले मूल नाभ्िाक की़तुलना में 4 कम होती है तथा परमाणु क्रमांक 2 कम होता है। सामान्यतः किसी मूल नाभ्िाक ।ग्र् के विघटनज नाभ्िाक ।र् 42ल् में रूपांतरण को इस प्रकार व्यक्त करते हैं ।ग् → ।4ल् ़ 4भ्म ;13ण्20द्धर् र्22 आइंस्टाइन के द्रव्यमान - ऊजार् समतुल्यता संबंध् ख्समी. ;13.6द्ध, तथा ऊजार् संरक्षण से यह स्पष्ट है कि ऐसा स्वतः क्षय केवल क्षय उत्पादों का वुफल द्रव्यमान प्रारंभ्िाक नाभ्िाक के द्रव्यमान से कमहोने की स्िथति में ही संभव है। द्रव्यमान में यह अंतर उत्पादों की गतिज ऊजार् के रूप में अवतरित 234ज्ीहोता है। नाभ्िाकीय द्रव्यमानों की सूची से यह ज्ञात किया जा सकता है कि तथा 4भ्म902 का वुफल द्रव्यमान वास्तव में 238न् के द्रव्यमान से कम होता है।92प्रारंभ्िाक द्रव्यमान - ऊजार् एवं क्षय उत्पादों की वुफल द्रव्यमान - ऊजार् का अंतर इस प्रिया का फदृमान अथवा विघटनज ऊजार् कहलाता है। ऐल्प़्ाफा - क्षय में फ त्र ;उदृ उ दृ उद्ध ब2 ;13ण्21द्धग् ल्भ्मऊजार् का यह मान इस प्रिया में जनित वुफल गतिज ऊजार् अथवा उत्पादों की वुफल गतिज ऊजार् ;यदि प्रारंभ्िाक नाभ्िाक ग् स्िथर होद्ध भी है। स्पष्टतः किसी ऊष्माक्षेपी प्रिया ;जैसे कि 451ऐल्पफा - क्षयद्ध के लिए़फ झ 0। उदाहरण 13ण्6 हमें निम्नलिख्िात परमाणु द्रव्यमान दिए गए हैं: 238 4 92 न् त्र 238ण्05079 न 2भ्मत्र 4ण्00260 न 234 1 90 ज्ी त्र 234ण्04363 न 1भ्त्र 1ण्00783 न 237 91 च्ं त्र 237ण्05121 न यहाँ प्रतीक च्ं तत्व प्रोटऐक्िटनियम ;र् त्र 91द्ध तत्व के लिए है। ;ंद्ध 238न् के α - क्षय में उत्सजिर्त उफजार् परिकलित कीजिए।;इद्ध दशार्इए कि 238न् स्वतः प्रोटाॅन उत्सजर्न नहीं कर सकता।9292हल ़;ंद्ध 238न् का ऐल्पफा - क्षय समीकरण ;13ण्20द्ध के अनुसार होता है। इस प्रिया में उत्सजिर्त उफजार्92के लिए सूत्रा है: फ त्र ;ड दृ ड दृ डद्ध ब2 न्ज्ीभ्मप्रश्न में दिए गए आँकड़े उपरोक्त सूत्रा में प्रतिस्थापित करने पर, फ त्र ;238ण्05079 दृ 234ण्04363 दृ 4ण्00260द्धन × ब2त्र ;0ण्00456 नद्ध ब 2त्र ;0ण्00456 नद्ध ;931ण्5 डमटध्नद्धत्र 4ण्25 डमट ;इद्ध यदि 238न् से एक प्रोटाॅन का स्वतः उत्सजर्न होता है तो क्षय - प्रिया इस प्रकार लिखेंगेμ92238 237 न् → च्ं ़ 1भ्9291 1यदि यह प्रिया संभव हो तो इसके लिए, त्र ;डन् दृ डच्ं दृ डभ्द्ध ब 2 त्र ;238ण्05079 दृ 237ण्05121 दृ 1ण्00783द्ध न × ब 2 त्र ;दृ 0ण्00825 नद्ध ब 2 त्र दृ ;0ण्00825 नद्ध;931ण्5 डमटध्नद्ध त्र दृ 7ण्68 डमट यहाँ प्रिया का फए क्योंकि, )णात्मक हैऋ अतः इसका स्वतः क्षयित होना संभव नहीं है। 238 न् नाभ्िाक से एक प्रोटाॅन उत्सजिर्त करने के लिए हमें इसको 7ण्68 डमट ऊजार् प्रदान92 करनी होगी। 13ण्6ण्3 बीटा - क्षय बीटा - क्षय में किसी नाभ्िाक से एक इलेक्ट्राॅन ;βदृμक्षयद्ध अथवा एक पाॅजिट्राॅन ;β़μक्षयद्ध कास्वतः उत्सजर्न होता है। βदृμक्षय तथा β़μक्षय के सामान्य उदाहरण निम्न हैंः 32 32च्ै म ;13ण्22द्ध15 16 22 22छं छं म ;13ण्23द्ध11 10 ये क्षय समी. ;13.14द्ध तथा ;13.15द्ध के अनुसार ही हैं, जिससे कि यह प्रागुक्ित नहीं की जासकती कि कौन सा नाभ्िाक क्षयित होगा। परंतु इस क्षय को अध्र् - आयु ;ज्1ध्2द्ध से दशार्या जा सकताहै। उदाहरण के लिए, उपरोक्त क्षयों के लिए अध्र् - आयु क्रमशः 14.3 दिन तथा 2.6 वषर् हैं। βदृदृक्षय में इलेक्ट्राॅन के उत्सजर्न के साथ ही एक एंटीन्यूटिªनो ; द्ध का भी उत्सजर्न होता है। तथा β़ दृक्षय में पाॅजिट्राॅन के साथ न्यूटिªनो ;νद्ध का उत्सजर्न होता है। न्यूटिªनो इलेक्ट्राॅन की तुलना मेंबहुत कम द्रव्यमान ;संभवतः शून्यद्ध वाले अनावेश्िात कण होते हैं। ये अन्य कणों के साथ केवलक्षीण अन्योन्य िया करते हैं। ये बिना िया किये पदाथर् की बहुत बड़ी मात्रा ;पृथ्वी भीद्ध कोपार कर सकते हैं। यही कारण है कि इनका संसूचन बहुत कठिन है। βदृदृतथा β़दृदोनों ही क्षयों में द्रव्यमान संख्या । नहीं बदलती है। βदृदृक्षय में नाभ्िाक का परमाणुक्रमांक र्ए 1 अध्िक हो जाता है, जबकि β़दृक्षय में 1 कम हो जाता है। βदृदृक्षय में मूल नाभ्िाकीयप्रिया न्यूट्राॅन का प्रोटाॅन में रूपांतरण हैः द → च ़ मदृ ़ ;13ण्24द्ध जबकि β़दृक्षय में प्रोटाॅन का न्यूट्राॅन में रूपांतरण होता हैः च → द ़ म़ ़ ;13ण्25द्ध प्रोटाॅन का द्रव्यमान, न्यूट्राॅन के द्रव्यमान से कम है, अतः प्रोटाॅन का न्यूट्राॅन में क्षय ख्समी. ;13.25द्ध, केवल नाभ्िाक के अंदर ही संभव है,जबकि न्यूट्राॅन का प्रोटाॅन में क्षय मुक्त अवस्था में भी संभव है ख्समी;13ण्24द्ध,। 13ण्6ण्4 गामा - क्षय परमाणु के समान, नाभ्िाक में भी विभ्िान्न ऊजार् स्तर होते हैंμअनउत्तेजित अवस्था तथा उत्तेजित अवस्थाएँ। हालाँकि इनके ऊजार् केमानों में अत्यध्िक विभ्िान्नता होती है। परामाण्िवक ऊजार् स्तरों काकोटिमान मट का होता है, जबकि नाभ्िाकीय ऊजार् स्तरों में ऊजार्ओं का चित्रा 13ण्4 60ब्व नाभ्िाक के बीटा क्षय में उत्सजिर्तअंतर डमट के कोटिमान का होता है। जब कोइर् उत्तेजित नाभ्िाक निम्न27 γ - किरणों के उत्सजर्न को दशार्ने वाला उफजार् स्तर आरेख।उत्तेजित अवस्था अथवा अनुत्तेजित अवस्था में संक्रमित होता है तोनाभ्िाक के दोनों ऊजार् स्तरों के अंतर के समान ऊजार् का पफोटाॅन उत्सजिर्त होता है। यही गामा - क्षयकहलाता है। यह ऊजार् ;डमटद्धए कठोर ग्दृकिरणों के परिसर से कम तंरगदैघ्यर् वाले विकिरणों सेसंबंध्ित होती है। सामान्यतः किसी गामा किरण का उत्सजर्न, ऐल्प़्ाफा अथवा बीटा - क्षय में विघटनज नाभ्िाक काउत्तेजित अवस्था में रहने की अवस्था में होता है। उत्तेजित नाभ्िाक अनुत्तेजित अवस्था में आने की प्रिया में एक पफोटाॅन अथवा एक से अध्िक पफोटाॅनों ;क्रमवार संक्रमण की अवस्था मेंद्ध का उत्सजर्न करते हैं। 1ण्17 डमट तथा 1ण्33 डमट ऊजार्ओं की गामा किरणों के क्रमवार उत्सजर्न का सामान्य उदाहरण 60ब्व नाभ्िाक के βदृदृक्षय द्वारा 60छप नाभ्िाक में क्षयित होने की प्रिया में2728प्रदश्िार्त होता है। 13ण्7 नाभ्िाकीय ऊजार् चित्रा 13ण्1 मंे दशार्ये गए प्रति न्यूक्िलआॅन बंध्न - ऊजार् म्वक्र में । त्र 30 एवं ।त्र 170 के बीचइदएक लंबा सपाट भाग है। इस भाग में प्रति न्यूक्िलआॅन बंध्न - ऊजार् लगभग अचर ;8ण्0डमटद्ध है। हलकेनाभ्िाकों, । झ 30ए वाले भाग एवं भारी नाभ्िाकों, । झ 170ए वाले भाग में, जैसा हम पहले ही देखचुके हैं, प्रति न्यूक्िलआॅन बंध्न - ऊजार् 8ण्0 डमट से कम है। यदि बंध्न - ऊजार् अध्िक हो तो उस बंिातनिकाय जैसे नाभ्िाक का वुफल द्रव्यमान कम होगा। परिणामस्वरूप यदि कोइर् कम वुफल बंधन - ऊजार्वाला नाभ्िाक किसी अिाक बंधन - ऊजार् वाले नाभ्िाक में रूपांतरित हो तो वुफल ऊजार् विमुक्त होगी।किसी भारी नाभ्िाक के दो या दो से अिाक माध्यमिक द्रव्यमान खंडों ;विखंडनद्ध अथवा हलकेनाभ्िाकों का किसी भारी नाभ्िाक में संयोजन ;संलयनद्ध की प्रिया में ऐसा ही होता है।कोयले एवं पेट्रोलियम जैसे पारंपरिक ऊजार् स्रोतों में ऊष्माक्षेपी रासायनिक अभ्िाियाएँ होती हैं।यहाँ विमुक्त होने वाली ऊजार् इलेक्ट्राॅन वोल्ट की कोटि की होती है। जबकि किसी नाभ्िाकीयप्रिया में, डमट कोटि की ऊजार् विमुक्त होती है। अतः द्रव्य की समान मात्रा के लिए, रासायनिकस्रोतों की अपेक्षा नाभ्िाकीय स्रोत लाखों गुना ऊजार् विमुक्त करते हैं। उदाहरण के लिए, 1 ाह यूरेनियम के विखंडन से लगभग 1014श्र ऊजार् प्राप्त होती है, जबकि 1 ाह कोयले के दहन से 107श्र 45313ण्7ण्1 विखंडन प्राकृतिक रेडियोऐक्िटव क्षयों के अलावा नाभ्िाकों पर अन्य नाभ्िाकीय कणों जैसे प्रोटाॅन, न्यूट्राॅन, ऐल्पफा कण आदि के प्रकार से होने वाली नाभ्िाकीय प्रियाओं पर ध्यान देने से नइर् संभावनाएँ बनती हैं। विखंडन एक महत्वपूणर् न्यूट्राॅन - प्रेरक नाभ्िाकीय प्रिया है। विखंडन के उदाहरणतः जब किसी यूरेनियम समस्थानिक 235 न् पर न्यूट्राॅन से प्रहार कराया जाता है तो वह दो माध्यमिक द्रव्यमान वाले92 नाभ्िाकीय खंडों में विखंडित हो जाता है: 1 235 236 144 89 1द न् न् ठं ज्ञत 3द ;13ण्26द्ध092 92 56 36 0 इसी िया में माध्यमिक द्रव्यमान वाले नाभ्िाकों के भ्िान्न युग्म भी उत्पन्न हो सकते हैं: 1 235 236 133 99 1द न् न् ैइ छइ 4द ;13ण्27द्ध092 92 51 41 0 एक अन्य उदाहरण है: 1 235 140 94 1द न् ग्म ैत 2 द ;13ण्28द्ध092 54 38 0 ये विखंडित उत्पाद रेडियोऐक्िटव नाभ्िाक होते हैं और इनमें तब तक β.क्षय का क्रम चलता रहता है जब तक कि अंत में स्थायी खंड प्राप्त न हो जाएँ।यूरेनियम जैसे नाभ्िाक की विखंडन अभ्िािया में निमुर्क्त ऊजार् ;फ .मानद्ध प्रति विखंडित नाभ्िाक 200 डमट की कोटि की होती है। इसका आकलन हम निम्नवत करते हैं: माना कि एक नाभ्िाक का । त्र 240 है और यह । त्र 120 के दो खंडों में विखंडित होता है। तब । त्र 240 नाभ्िाक के लिए म्लगभग 7ण्6 डमट है ;चित्रा 13ण्1 देखेंद्ध।इद । त्र 120 वाले विखंडित नाभ्िाक के लिए म्लगभग 8ण्5 डमट है।इद ∴ प्रति न्यूक्िलयाॅन बंध्न - ऊजार् की लब्िध् लगभग 0ण्9 डमट है।अतः बंध्न - ऊजार् में वुफल लब्िध् 240×0ण्9 अथवा 216 डमट है।विखंडन की घटनाओं की विघटन ऊजार् पहले क्षय - उत्पादों तथा न्यूट्राॅनों की गतिज ऊजार् केरूप में संलग्िनत होती है। अंत में यह आसपास के द्रव्य को हस्तांतरित होकर ऊष्मा के रूप मेंपरिण्िात हो जाती है। नाभ्िाकीय रिएक्टरों में नाभ्िाकीय विखंडन ऊजार् से विद्युत उत्पादन होता है।परमाणु बम में विमुक्त होने वाली बृहत ऊजार् अनियंत्रिात नाभ्िाकीय विखंडन से ही उत्पन्न होती है। अगले अनुभाग में हम वुफछ विस्तार से यह चचार् करेंगे कि नाभ्िाकीय रिएक्टर वैफसे कायर् करता है। 13ण्7ण्2 नाभ्िाकीय रिएक्टर समीकरणों ;13.26द्ध से ;13.28द्ध में वण्िार्त विखंडन से एक अति महत्वपूणर् सत्य प्रतीत होता है।विखंडन िया में एक अतिरिक्त न्यूट्राॅन की उत्पिा होती है। प्रति यूरेनियम विखंडन में औसतन2.5 न्यूट्राॅनों की उत्पिा होती है। यह एक अनुपात है क्योंकि वुफछ विखंडन घटनाओं में 2 न्यूट्राॅनोंतथा वुफछ में 3 न्यूट्राॅनों की उत्पिा होती है। ये अतिरिक्त न्यूट्राॅन अन्य विखंडन ियाओं की शुरुआतकर सकते हैं तथा और भी अिाक न्यूट्राॅनों की उत्पिा हो सकती है। इससे एक शृंखला अभ्िािया की संभावना बनती है। यह विचार सवर्प्रथम एनरिको पफमीर् ने रखा था। यदि इस शृंखला - अभ्िाियाको समुचित रूप से नियंत्रिात किया जाए तो हमें एक स्थायी ऊजार् निगर्त हो सकती है। नाभ्िाकीय रिएक्टर में यही होता है। यदि शृंखला अभ्िािया अनियंत्रिात हो जाये तो इससे विखंडनकारी एवंविनाशकारी ऊजार् निगर्त हो सकती है, जैसा कि किसी नाभ्िाकीय बम में होता है। हालांकि, किसी शृंखला अभ्िािया को पोष्िात करने में एक और दुविधा है, जैसा कि यहाँ वण्िार्त है। प्रयोगों से हमें ज्ञात है कि मंद न्यूट्राॅनों ;तापीय न्यूट्राॅनद्ध द्वारा तीव्र न्यूट्राॅनों की अपेक्षा 235 न् में92विखंडन की ज्यादा प्रायिकता है। विखंडन में निकले तीव्र न्यूट्राॅन अन्य विखंडन प्रिया करने की अपेक्षा बाहर भी निकल सकते हैं। 235 न् के विख्ंाडन में उत्पादित न्यूट्राॅन की औसत ऊजार् 2 डमट होती है। ये न्यूट्राॅन जब तक92 कि इनका मंदन न किया जाए, यूरेनियम नाभ्िाकों से िया किए बिना ही रिएक्टर से बाहर निकलजाते हैं। यूरेनियम नाभ्िाकों से इन तीव्र न्यूट्राॅनों के लिए शृंखला िया ;बींपद तमंबजपवदद्ध को बनाए रखने में प्रयुक्त विखंडनीय पदाथर् की बहुत अध्िक मात्रा की आवश्यकता होती है। तीव्र 455 भारत मेें नाभ्िाकीय शक्ित संयंत्राीजजचरूध्ध्ूूूण्दचबपसण्दपबण्पदध्उंपदध्।ससच्तवरमबजव्चमतंजपवदक्पेचसंलण्ंेचग न्यूट्राॅनों को हलके न्यूट्राॅनों के साथ प्रत्यास्थ संघट्टð द्वारा मंदित किया जाता है। वास्तव में, चैडविकके प्रयोगों ने दशार्या कि हाइड्रोजन के साथ प्रत्यास्थ टक्कर में न्यूट्राॅन लगभग स्िथर हो जाते हैं तथासमस्त ऊजार् प्रोटाॅन द्वारा ले ली जाती है। यह स्िथति वैसी ही है जैसा कि किसी गतिमान काँचकी गोली की अन्य स्िथर समान गोली के साथ आमने - सामने की टक्कर। अतः रिएक्टरों में, तीव्रन्यूट्राॅनों को मंदित करने के लिए विखंडनीय नाभ्िाकों के साथ हलके नाभ्िाकों ¹जिन्हें अवमंदक ;उवकमतंजवतद्ध कहते हैंह् का प्रयोग किया जाता है। प्रायः प्रयुक्त होने वाले अवमंदक जल, भारी जल ;क्2व्द्ध तथा ग्रैपफाइट हैं। भाभा परमाणु अनुसंधन वेंफद्र ;ठ।त्ब्द्ध, मुंबइर् के अप्सरा रिएक्टर मेंअवमंदक के रूप में जल का प्रयोग होता है। शक्ित उत्पादन के लिए प्रयुक्त भारत के अन्य रिएक्टरोंमंे अवमंदक के रूप में भारी जल का उपयोग होता है। अवमंदक के उपयोग के कारण, किसी स्तर पर निकले न्यूट्राॅनों के द्वारा विखंडनों की संख्याका उसके पिछले स्तर पर निकले न्यूट्राॅनों के द्वारा विखंडनों की संख्या के साथ अनुपात, ज्ञ का मान एक से अध्िक हो सकता है। इस अनुपात को गुणन कारक ;उनसजपचसपबंजपवद ंिबजवतद्ध कहतेहैं। यह रिएक्टर में न्यूट्राॅनों की वृि दर को मापता है। ज्ञ त्र 1ए के लिए रिएक्टर की प्रवृिा क्रांतिक कहलाती है जो स्िथर शक्ित उत्पादन की प्रवृिा के लिए ऐच्िछक है। ज्ञ का मान एक से अध्िकहोने पर िया दर तथा रिएक्टर की शक्ित में चरघातांकी ;मगचवदमदजपंससलद्ध क्रम में वृि होतीहै। ज्ञ का मान एक की संख्या के आसपास न होने पर रिएक्टर अतिक्रांतिक हो जायेगा तथा रिएक्टरमें विस्पफोट भी हो सकता है। सन् 1986 में यूव्रेफन के चेनोर्बिल रिएक्टर में हुआ विस्पफोट इस दुखदतथ्य का स्मरण कराता है कि नाभ्िाकीय रिएक्टर में कोइर् दुघर्टना कितनी विनाशकारी हो सकती है। िया दर नियंत्राण वैफडमियम जैसे न्यूट्राॅन - अवशोषक पदाथर् से बनी नियंत्राक छड़ों ;बवदजतवस तवकेद्ध द्वारा किया जाता है। नियंत्राक छड़ों के अतिरिक्त रिएक्टरों में रक्षक छड़ों को भी प्रयुक्त कियाजाता है। इन रक्षक छड़ों को आवश्यकता पड़ने पर रिएक्टर में नि£वष्ट करा कर ज्ञ का मान शीघ्रता से एक से कम किया जा सकता है। प्राकृतिक रूप में पाये जाने वाले यूरेनियम में प्रचुर 238 न् समस्थानिक अ - विखंडनीय होता92है। जब इसमें किसी न्यूट्राॅन का ग्रहण ;बंचजनतमद्ध होता है, तो अत्यंत रेडियोऐक्िटव प्लूटोनियम का उत्पादन निम्न ियाओं से होता हैः 238 239 239 दृऩ्द न् छच़म92 9293 239 239 दृछच च्ऩम ;13ण्29द्ध93 94 प्लूटोनियम में मंद न्यूट्राॅनों के प्रहार से विखंडन हो सकता है। चित्रा 13.5 में तापीय न्यूट्राॅनविखंडन पर आधारित किसी नाभ्िाकीय रिएक्टर का सरलीकृत प्रारूप दशार्या गया है। रिएक्टर की क्रोड नाभ्िाकीय विखंडन का क्षेत्रा है। इसमें उपयुक्त सांचे हुए रूप में ईंधन तत्व रहते हैं। यह ईंधन, प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले यूरेनियम की अपेक्षा 235 न् में प्रचुर बहुल यूरेनियम भी हो सकता92 है। क्रोड में न्यूट्राॅनों को मंद करने के लिए मंदक ;उवकमतंजवतद्ध लगे होते हैं। दरार में से छूटने ;समंांहमद्ध को रोकने के लिए क्रोड एक परावतर्क ;तमसिमबजवतद्ध से घ्िारी होती है। एक समुचितशीतलक द्वारा विखंडन में निकली ऊजार् ;उष्माद्ध को निरंतर हटाया जाता है। विखंडित रेडियोऐक्िटव उत्पादों के पलायन को रोकने के लिए पात्रा लगे होते हैं। इस सारी व्यवस्था से हानिकारक विकिरणों को बाहर न आने देने के लिए एक कवच का उपयोग किया जाता है। न्यूट्राॅनों के अवशोषण की उच्च क्षमता वाली छड़ों ;जैसे कि वैफडमियम की बनीद्ध के उपयोग से रिएक्टर को बंद किया जा सकता है। शीतलक से उष्मा एक कायर्कारी द्रव्य को स्थानान्तरित की जाती है जिससे कि भाप चित्रा 13ण्5 तापीय न्यूट्राॅन विखंडन पर आधारित किसी नाभ्िाकीय रिएक्टर की सरलीकृत रूपरेखा का उत्पादन होता है। इस भाप से टबार्इन को घुमाकर विद्युत उत्पादन होता है। किसी अन्य शक्ित रिएक्टर की भांति ही नाभ्िाकीय रिएक्टर से कापफी मात्रा में निरथर्क उत्पाद निकलते हैं। परन्तु नाभ्िाकीय निरथर्कों के निराकरण में विशेष ध्यान देना होता है क्योंकि ये रेडियोऐक्िटव तथा हानिकारक होते हैं। रिएक्टर के संचालन, उनके रख - रखाव तथा व्ययित ईंधन के लिए विस्तृतसुरक्षा प्रबंध किये जाते हैं। भारतीय परमाणु ऊजार् कायर्क्रम में ये सुरक्षा प्रबंध विश्िाष्ट हैं। रेडियोऐक्िटव अपश्िाष्टों को कम सिय तथा अल्पजीवी द्रव्यों में परिवतिर्त करने की संभावनाओं के अध्ययन के लिए एक समुचित उपयुक्त योजना के विकास पर कायर् चल रहा है। 13ण्7ण्3 नाभ्िाकीय संलयन - तारों में ऊजार् जनन चित्रा 13ण्1 में दशार्या गया बंधन - उफजार् वक्र यह भी दशार्ता है कि यदि दो हलके नाभ्िाक मिलकरएक अपेक्षाकृत बड़ा नाभ्िाक बनाएँ तो उफजार् निमुर्क्त होती है। इस प्रिया को नाभ्िाकीय संलयन कहते हैं। इस तरह की उफजार् विमोचक अभ्िाियाओं के वुफछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं: 112 ़भ्भ् भ़् म ़ ν ़ 0ण्42 डमट ख्13ण्29;ंद्ध, 11 1 22 3भ् 2भ्म ़ द ़ 3ण्27 डमट ख्13ण्29;इद्ध,1भ् 1 22 31भ् भ् भ् भ् ़ 4ण्03 डमट ख्13ण्29;बद्ध,11 11 अभ्िािया 13ण्29 ;ंद्ध में दो प्रोटाॅन मिलकर एक ड्यूट्राॅन एवं एक पाॅजिट्राॅन बनाते हैं और इस प्रिया में 0ण्42 डमट उफजार् निकलती है। अभ्िािया 13ण्29 ;इद्ध में दो ड्यूट्राॅन मिलकर हीलियम का हलका समस्थानिक बनाते हैं। अभ्िािया 13ण्29 ;बद्ध में दो ड्यूट्राॅन मिलकर एक ट्रीटियम एवं एक प्रोटाॅन बनाते हैं। संलयन के लिए दो नाभ्िाकों का इतने अिाक पास आना आवश्यक है जिससे कि उनके बीच आकष्िार्त लघु - परासीय नाभ्िाकीय बल कायर् कर सके। हालाँकि दोनों नाभ्िाक धनात्मक आवेश्िात हैं, अतः उनके बीच वूफलाॅम प्रतिकषर्ण होगा। अतः इनमें वूफलाॅम अवरोध पारकरने के लिए समुचित ऊजार् होनी आवश्यक है। इस वूफलाॅम अवरोध की उफँचाइर् आवेशों एवं अन्योन्यिया गत नाभ्िाकों की त्रिाज्याओं पर निभर्र करती है। उदाहरण के लिए, यह आसानी से दशार्या जा सकता है कि दो प्रोटाॅनों के लिए यह अवरोधतुंगता ;इंततपमत ीमपहीजद्ध लगभग 400 नाभ्िाकीय रिएक्टर का एक सरलीवृफत आॅन - लाइन अनुकारीजजचरूध्ध्में21णमददमेंूण्मकनध्ंबजपअपजपमेध्दनाममदमतहलध्दनामण्ीजउ ामट है। अिाक आवेशधारी नाभ्िाकों के लिए अवरोधतुंगता और भी अिाक होगी। किसी प्रोटाॅनगैस में प्रोटाॅनों द्वारा कूलाॅम अवरोध् को पार करने के लिए पयार्प्त ऊजार् 3×109 ज्ञ ताप पर प्राप्त हो सकती है। इस ताप का परिकलन, सूत्रा ;3ध्2द्धा ज् त्र ज्ञ में ज्ञ का मान 400 ामट रखने पर किया जा सकता है। उफजार् की उपयोगी मात्रा उत्पन्न करने के लिए नाभ्िाकीय संलयन स्थूल - द्रव्य में होना चाहिए। आवश्यकता बस इस बात की है कि द्रव्य का ताप तब तक बढ़ाया जाए जब तक कि इसके कण मात्रा अपनी तापीय गति के कारण, वूफलाॅम अवरोध को पार न कर जाएँ। इस प्रिया को ताप नाभ्िाकीय संलयन कहते हैं। तारों के अंतः पटल में निगर्त ऊजार् का स्रोत ताप नाभ्िाकीय संलयन है। सूयर् के क्रोड का ताप लगभग 1ण्5 ×107 ज्ञ है, जो कि औसत ऊजार् के कणों के संलयन के लिए आवश्यक अनुमानितताप से कापफी कम है। स्पष्टतः सूयर् में होने वाली संलयन प्रियाओं में औसत ऊजार्ओं से बहुतअिाक ऊजार् वाले प्रोटाॅन भाग लेते हैं। अतः ताप नाभ्िाकीय संलयन बहुत उच्च ताप एवं दाब पर ही हो सकता है और ताप एवं दाब की ऐसी स्िथतियाँ केवल तारों के अंतरंग में ही उपलब्ध हैं। तारों में उफजार् जनन ताप - नाभ्िाकीय संलयन के माध्यम से ही होता है। सूयर् में होने वाली संलयन अभ्िािया एक बहुचरण प्रिया है जिसमें हाइड्रोजन हीलियम में बदलती है। अतः सूयर् के क्रोड में हाइड्रोजन ईंधन है। प्रोटाॅन - प्रोटाॅन ;च दृ चद्ध चक्र जिसके द्वारा यह घटित होता है, निम्नलिख्िात अभ्िाियाओं के समुच्चय द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। 112 ़भ्भ् भ़् म ़ ν ़ 0ण्42 डमट ;पद्ध 11 1 म ़ ़ म दृ →γ ़ γ ़ 1ण्02 डमट ;पपद्ध 21 3भ् भ् भ्म ़ γ ़ 5ण्49 डमट ;पपपद्ध 11 2 33 411भ् भ् भ्म भ् भ् ़ 12ण्86 डमट ;पअद्ध ;13ण्30द्ध22 211 चैथी अभ्िािया होने के लिए यह आवश्यक है कि पहली तीन अभ्िाियाएँ दो - दो बार हों और इस प्रकार दो हलके हीलियम नाभ्िाक मिलकर सामान्य हीलियम का एक नाभ्िाक बनाएँ। अगर हम 2;पद्ध ़ 2;पपद्ध ़ 2;पपपद्ध ़;पअद्ध पर विचार करें तो वुफल प्रभाव होगा, 144भ् 2म भ्म 2 6 26ण्7डमट 12 14या ;4भ् 4म द्ध ;भ्म 2म द्ध 2 6 26ण्7 डमट ;13ण्31द्ध12 अतः चार हाइड्रोजन परमाणु मिलकर एक 4भ्म परमाणु बनाते हैं और इस प्रिया में226ण्7 डमट उफजार् निमुर्क्त होती है। किसी तारे के अंतः पटल में केवल हीलियम का ही निमार्ण नहीं होता। जैसे - जैसे क्रोड में हाइड्रोजन ;हीलियम में बदल करद्ध कम होती है, क्रोड ठंडा होने लगता है। इससे तारा अपने गुरुत्व के कारण संवुफचित होता है जिससे क्रोड का ताप बढ़ जाता है। यदि क्रोड का ताप 108ज्ञ तक बढ़ जाये तो संलयन की िया पुनः होने लगेगी, पर इस बार हीलियम काबर्न में परिवतिर्त होगी। इस प्रकार की प्रिया में संलयन द्वारा बड़े द्रव्यमान संख्या वाले तत्वों का जनन हो सकता है। परन्तु बंधन - ऊजार् वक्र ;चित्रा 13.1द्ध के शीषर् पर स्िथत भारी तत्वों का निमार्ण इस प्रिया से नहीं हो सकता। सूयर् की आयु लगभग 5×109 वषर् है तथा यह अनुमान लगाया जाता है कि सूयर् को और 5 अरब वषो± तक बनाये रखने के लिए आवश्यक हाइड्रोजन उपलब्ध है। इसके पश्चात्, हाइड्रोजन का जलना रुक जाएगा तथा सूयर् ठंडा होने लगेगा। इससे सूयर् अपने गुरुत्व के कारण संवुफचित होने लगेगा जिससे सूयर् की क्रोड का ताप बढ़ेगा। इससे सूयर् का बाहरी आवरण पैफलने लगेगा जिससे सूयर् एक लाल दानव ;तमक हपंदजद्ध में परिवतिर्त हो जाएगा। 13ण्7ण्4 नियंत्रिात ताप नाभ्िाकीय संलयन किसी तारे में होने वाली ताप - नाभ्िाकीय प्रिया का रूपांतरण एक ताप - नाभ्िाकीय युक्ित से किया जाता है। किसी नियंत्रिात संलयन रिएक्टर का उद्देश्य नाभ्िाकीय ईंधन को 108ज्ञ ताप के परास में गरम कर स्थायी शक्ित जनन करना होता है। इस ताप पर ईंधन धनात्मक आयनों तथा इलेक्ट्राॅनों ;प्लाज्माद्ध का मिश्रण होता है। चूंकि इस ताप को बनाये रखने के लिए कोइर् वस्तु उपलब्ध नहीं है, अतः इस ताप को बनाये रखना एक चुनौती है। भारत सहित विश्व के कइर् देश इस संबंध में युक्ितयों के विकास में प्रयासरत हैं। इन प्रयासों के सपफल होने पर, संभावना है कि संलयन रिएक्टर समाज को लगभग अनियमित शक्ित प्रदान कर सवेंफगे। उदाहरण 13ण्7 निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर दीजिए: ;ंद्ध क्या नाभ्िाकीय अभ्िाियाओं के समीकरण ;जैसा कि भाग 13ण्7 में दिए हैंद्ध रासायनिक समीकरण ;उदाहरण के लिए 2भ् ़ व्→ 2 भ्व्द्ध के रूप में संतुलित हैं? यदि नहीं तो222किस रूप में दोनों ओर समीकरण संतुलित होंगे। ;इद्ध यदि प्रोटाॅनों और न्यूट्राॅनों की संख्या, प्रत्येक नाभ्िाकीय अभ्िािया में संरक्ष्िात रहती है, किसीनाभ्िाकीय अभ्िािया में किस प्रकार द्रव्यमान, ऊजार् में ;या इसका उलटाद्ध बदलता है? ;बद्ध सामान्य विचार है कि केवल नाभ्िाकीय िया में ही द्रव्यमान - ऊजार् एक दूसरे में बदले जा सकते हैं जबकि रासायनिक िया में यह कभी नहीं होता है। यह कहना असत्य है। समझाइए। हल ;ंद्ध किसी रासायनिक अभ्िािया के संतुलित होने की स्िथति में कि अभ्िािया के समीकरण के दोनों ओर सभी तत्वों के परमाणुओं की संख्या समान होती है। किसी रासायनिक अभ्िािया में परमाणुओं के मूल संयोजन में परिवतर्न मात्रा होता है। परंतु किसी नाभ्िाकीय अभ्िािया में तत्वांतरण भी हो सकता है। अतः नाभ्िाकीय अभ्िािया में प्रत्येक तत्व के परमाणुओं की संख्या का संरक्ष्िात होना आवश्यक नहीं है। हालाँकि, नाभ्िाकीय अभ्िािया में प्रोटाॅनों तथा न्यूट्राॅनोंदोनों की संख्याएँ पृथक रूप से संरक्ष्िात रहती हैं। ¹वास्तव में, अत्यध्िक ऊजार् के परिमंडल में यह कथन भी सुनिश्िचत सत्य नहीं है। वस्तुतः वुफल आवेश तथा वुफल ‘बेरियाॅन संख्या’ संरक्ष्िात रहते हैं। हम इस विषय पर यहाँ आगे और विचार नहीं करेंगे।ह् नाभ्िाकीय अभ्िाियाओं ¹जैसे कि समीकरण ;13ण्26द्धह् में समीकरण के दोनों ओर प्रोटाॅनों की संख्याएँ तथा न्यूट्राॅनों की संख्याएँ पृथक - पृथक रूप में समान हैं। ;इद्ध हम जानते हैं कि नाभ्िाक की बंध्न - ऊजार् का नाभ्िाक के द्रव्यमान में )णात्मक योगदान ;द्रव्यमान क्षतिद्ध होता है। चूँकि किसी नाभ्िाकीय अभ्िािया में प्रोटाॅनों तथा न्यूट्राॅनों दोनों की संख्याएँ संरक्ष्िात रहती हैं, अतः अभ्िािया के दोनों ओर न्यूट्राॅनों तथा प्रोटाॅनों का वुफल विराम द्रव्यमान ;तमेज उंेेद्ध समान होता है। परंतु किसी नाभ्िाकीय अभ्िािया में बायीं ओर केनाभ्िाकों की वुफल बंध्न - ऊजार् अभ्िािया के दायीं ओर के नाभ्िाकों की वुफल बंधन - उफजार् केसमान होना आवश्यक नहीं है। इन बंध्न - ऊजार्ओं का अंतर नाभ्िाकीय अभ्िािया में अवशोष्िातहोने वाली अथवा निकलने वाली ऊजार् के रूप में प्रकट होता है। चूँकि बंध्न - ऊजार् द्रव्यमान में योगदान देती है, अतः हम कहते हैं कि किसी नाभ्िाकीय अभ्िािया में दोनों ओर के वुफलद्रव्यमानों का अंतर ऊजार् के रूप में परिव£तत हो जाता है ;या इसके विपरीत ऊजार् वुफल द्रव्यमान के अंतर के रूप में परिवतिर्त हो जाती है।द्ध। इस रूप में नाभ्िाकीय अभ्िाियाद्रव्यमान - ऊजार् के अंतःरूपांतरण का एक उदाहरण है। ;बद्ध द्रव्यमान - ऊजार् के अंतःरूपांतरण की दृष्िट से, सि(ांततः एक रासायनिक अभ्िािया नाभ्िाकीय अभ्िािया के समरूप है। किसी रासायनिक अभ्िािया में अवशोष्िात अथवा निकलने वालीऊजार् अभ्िािया के दोनों ओर के परमाणुओं तथा अणुओं की रासायनिक ;नाभ्िाकीय नहींद्धबंध्न ऊजार्ओं के अंतर को स्पष्ट करती है। चूँकि रासायनिक बंध्न - ऊजार् भी किसी परमाणु अथवा अणु के वुफल द्रव्यमान में )णात्मक योगदान ;द्रव्यमान - क्षतिद्ध को दशार्ती है, इसलिए हम निष्कषर् निकाल सकते हैं कि किसी रासायनिक अभ्िािया में दोनों ओर के परमाणुओं तथाअणुओं के वुफल द्रव्यमानों का अंतर ऊजार् के रूप में परिव£तत हो जाता है या ऊजार् वुुफल द्रव्यमानों के अंतर के रूप में परिवतिर्त होकर समाविष्ट हो जाती है। हालाँकि, किसी रासायनिक अभ्िािया में संलग्न द्रव्यमान क्षतियों का परिमाण नाभ्िाकीय िया में संलग्न द्रव्यमान क्षतियों की तुलना में कइर् लाख गुना कम होता है। सामान्य रूप में यही धारणा है कि ऐसा प्रतीत होता है ;जो सत्य नहीं हैद्ध कि किसी रासायनिक अभ्िािया में कोइर्द्रव्यमान - ऊजार् का अंतःरूपांतरण नहीं होता। सारांश 1ण् प्रत्येक परमाणु में एक नाभ्िाक होता है। नाभ्िाक ध्नावेश्िात होता है। नाभ्िाक की त्रिाज्या परमाणु की त्रिाज्या से 104 गुना छोटी होती है। परमाणु का 99ण्9ः से अध्िक द्रव्यमान नाभ्िाक में समाहित होता है। 2ण् परमाणुओं के स्तर पर द्रव्यमान, परमाणु द्रव्यमान इकाइयों ;नद्ध में मापे जाते हैं। परिभाषा के अनुसार 1 परमाणु द्रव्यमान इकाइर् ;1नद्धए 12ब् के एक परमाणु के द्रव्यमान के 1ध्12वें भाग के बराबर होती है। 1न त्र 1ण्660563 × 10दृ27 ाह 3ण् नाभ्िाक में एक निरावेश्िात कण होता है जिसे न्यूट्राॅन कहते हैं। इसका द्रव्यमान लगभग उतना ही होता है जितना प्रोटाॅन का। 4ण् किसी तत्व की परमाणु संख्या र् उस तत्व के परमाण्िवक नाभ्िाक में प्रोटाॅनों की संख्या होती है। द्रव्यमान संख्या ।ए परमाण्िवक नाभ्िाक में प्रोटाॅनों एवं न्यूट्राॅनों की वुफल संख्या के बराबर होती हैऋ । त्र र् ़ छय यहाँ छ नाभ्िाक में विद्यमान न्यूट्राॅनों की संख्या निदिर्ष्ट करता है। एक नाभ्िाकीय प्रजाति अथवा एक न्यूक्लाइड ;दनबसपकमद्ध को ।ग् द्वारा व्यक्त करते हैं,र् जहाँ ग् उस रासायनिक प्रजाति का संकेत है। समान परमाणु संख्या र्ए परंतु विभ्िान्न न्यूट्राॅन संख्या छ के न्यूक्लाइड समस्थानिक कहलाते हैं। वे न्यूक्लाइड जिनके लिए द्रव्यमान संख्या । का मान समान हो सममारिक तथा वे जिनके लिए न्यूट्राॅन संख्या छ का मान समान हो समन्युट्राॅनिक कहलाते हैं। अध्िकांश तत्व दो या अध्िक समस्थानिकों के मिश्रण होते हैं। तत्व का परमाणु द्रव्यमान उसके समस्थानिकों के द्रव्यमानों का भारित माध्य होता है। जहाँ भार से तात्पयर् समस्थानिकों की सापेक्ष बहुलता से है। 5ण् नाभ्िाक को गोलाकार मानकर उसकी एक त्रिाज्या निधर्रित की जा सकती है। इलेक्ट्राॅन प्रकीणर्न प्रयोगों के आधर पर नाभ्िाक की त्रिाज्या ज्ञात की जा सकती है। यह पाया गया है कि नाभ्िाकों की त्रिाज्या निम्नलिख्िात सूत्रा से व्यक्त होती है। ।1ध्3त् त्र त्0ए जहाँ त्0 त्र एक नियतांक त्र 1ण्2 उिण् यह दशार्ता है कि नाभ्िाक का घनत्व । पर निभर्र नहीं करता और यह 1017 ाहध्उ3 की कोटि का होता है। 6ण् नाभ्िाक के अंदर न्यूट्राॅन एवं प्रोटाॅन अल्प परासी प्रबल नाभ्िाकीय बल द्वारा बँध्े होते हैं। नाभ्िाकीय बल न्यूट्राॅन एवं प्रोटाॅन में विभेद नहीं करता। 7ण् नाभ्िाकीय द्रव्यमान ड हमेशा अपने अवयवों के वुफल द्रव्यमान Σउ से कम होता है। नाभ्िाक और इसके अवयवों के द्रव्यमानों का अंतर द्रव्यमान क्षति कहलाता है। Δड त्र ;र् उच ़ ;। दृ र्द्धउदद्ध दृ ड आइंसटाइन का द्रव्यमान - उफजार् सि(ांत म् त्र उ ब2 इस द्रव्यमान अंतर को उफजार् के रूप में इस प्रकार व्यक्त करता है: Δम्इ त्र Δड ब2 उफजार् Δम्इ नाभ्िाक की बंधन - उफजार् कहलाती है। । त्र 30 से लेकर । त्र 170 द्रव्यमान संख्या के परास में प्रति न्यूक्िलयाॅन बंधन - उफजार् का मान लगभग नियत है। यह लगभग 8 डमट प्रति न्यूक्िलयाॅन है। 8ण् नाभ्िाकीय प्रियाओं से जुड़ी ऊजार् रासायनिक प्रियाओं की तुलना में लगभग दस लाखगुना अध्िक होती है। 9ण् किसी नाभ्िाकीय प्रिया का फ.मान है: फ त्र अंतिम गतिज ऊजार् दृ प्रारंभ्िाक गतिज ऊजार्द्रव्यमान - ऊजार् संरक्षण के कारण, कह सकते हैं कि फ त्र ;प्रारंभ्िाक द्रव्यमानों का योग दृ अंतिम द्रव्यमानों का योगद्धब2 10ण् रेडियोऐक्िटवता वह परिघटना है जिसमें दी गइर् प्रजाति के नाभ्िाक, α या β या γ किरणें उत्सजिर्त करके रूपांतरित हो जाती हैं, जहाँ α.किरणें हीलियम के नाभ्िाक हंैऋ β.किरणें इलैक्ट्राॅन हैं तथा γ.किरणें ग्.किरणों, से भी छोटी तरंगदैघ्यर् के विद्युत चुंबकीय विकिरण हैं। 11ण् रेडियोऐक्िटव क्षयता का नियम हैः छ ;जद्ध त्र छ;0द्ध मदृλज यहाँ λ क्षयांक अथवा विघटन स्िथरांक है। किसी रेडियोनाभ्िाक की अध्र् - आयु ;ज्1ध्2द्ध वह समय है जिसमें उनकी वुफल संख्या छ उनकी प्रारंभ्िाक मान की आध्ी रह जाती है। औसत आयु τ वह समय है जिसने छ अपने प्रारंभ्िाक मान का मदृ1 गुण शेष रह जाता है। सद2 ज् सद 2 1ध्2 12ण् जब कम दृढ़ता से बंध्ित नाभ्िाक अध्िक दृढ़ता से बंध्ित नाभ्िाक में परिवतिर्त होता है तोऊजार् विमुक्त होती है। विखंडन में एक भारी नाभ्िाक दो छोटे खंडों में विभाजित हो जाता 1 133 99 1है उदाहरणाथर्, 235 ऩ्द ैइ छइ़4द 92051 41 0 13ण् यह तथ्य कि विखंडन में जितने न्यूट्राॅन प्रयुक्त होते हैं उससे अध्िक उत्पन्न होते हैं, शृंखला अभ्िािया की संभावना प्रदान करता है। इस प्रिया में उत्पन्न होने वाला प्रत्येक न्यूट्राॅन, नए विखंडन का प्रारंभ करता है। नाभ्िाकीय बम विस्पफोट में अनियंत्रिात शृंखला अभ्िािया तेजी से होती है। नाभ्िाकीय रिएक्टर में यह नियंत्रिात एवं स्िथर दर पर होती है। रिएक्टर में न्यूट्राॅन वृि गुणांक ा का मान 1 बनाये रखा जाता है। 14ण् संलयन में हलके नाभ्िाक मिलकर एक बड़ा नाभ्िाक बनाते हैं। सूयर् सहित सभी तारों मेंहाइड्रोजन नाभ्िाकों का हीलियम नाभ्िाकों में संलयन ऊजार् का स्रोत है। परमाणु द्रव्यमान इकाइर् ख्ड, न परमाणु या नाभ्िाकीय द्रव्यमानों को व्यक्त करने के लिए द्रव्यमान मात्राक। एक परमाणु द्रव्यमान इकाइर्, 12ब् परमाणु के द्रव्यमान के के 1ध्12वें भाग के बराबर है। विघटन या क्षय नियतांक λ ख्ज् दृ1, े.1 अधार्यु ज्1ध्2 ख्ज्, े वह समय जिसमें रेडियोऐक्िटव नमूने के नाभ्िाकों की संख्या प्रारंभ्िाक संख्या की आधी रह जाती है। रेडियोऐक्िटव नमूने की ऐक्िटवता त् ख्ज्दृ1, ठु एक रेडियोऐक्िटव ड्डोत की ऐक्िटवता की माप। विचारणीय विषय 1ण् नाभ्िाकीय द्रव्य का घनत्व नाभ्िाक के साइश पर निभर्र नहीं करता है। परमाणु द्रव्यमान घनत्व इस नियम का पालन नहीं करता। 2ण् इलेक्ट्राॅन प्रकीणर्न द्वारा ज्ञात की गइर् नाभ्िाक की त्रिाज्या का मान ऐल्पफा कण प्रकीणर्न वेफ़प्रकीणर्न नाभ्िाक के आवेश वितरण से प्रभावित होता है जबकि ऐल्प़्ाफा कण और उस जैसे अन्य कण नाभ्िाकीय द्रव्य से प्रभावित होते हैं। 3ण् आइंस्टाइन द्वारा द्रव्यमान एवं ऊजार् की समतुल्यता म् त्र उब2 प्रदश्िार्त किए जाने के बाद अब हम द्रव्यमान संरक्षण एवं ऊजार् संरक्षण के पृथक नियमों की बात नहीं करते, वरनद्रव्यमान - ऊजार् संरक्षण के एक एकीकृत नियम की बात करते हैं। प्रकृति में यह नियम वस्तुतः प्रभावी है तथा इसका विश्वसनीय प्रमाण नाभ्िाकीय भौतिकी में पाया जाता है। द्रव्यमान एवंऊजार् की समतुल्यता के नियम, नाभ्िाकीय ऊजार् एवं उसके शक्ित स्रोत के रूप में उपयोग का आधर है। इस नियम का उपयोग करके, किसी नाभ्िाकीय प्रिया ;क्षय अथवा अभ्िाियाद्ध के फ.मान को प्रारंभ्िाक एवं अंतिम द्रव्यमानों के पदों में व्यक्त किया जा सकता है। 4ण् ;प्रति न्यूक्िलयाॅनद्ध बंध्न - ऊजार् वक्र की प्रकृति यह दशार्ती है कि ऊष्माक्षेपी नाभ्िाकीय अभ्िाियाएँ संभव हैं जो दो हलके नाभ्िाकों के संलयन से या एक भारी नाभ्िाक के माध्यमिक द्रव्यमान वाले दो नाभ्िाकों के विखंडन में देखी जा सकती हैं। 5ण् संलयन के लिए हलके नाभ्िाकों में पयार्प्त प्रारंभ्िाक ऊजार् होनी चाहिए ताकि वे वूफलाॅम विभव अवरोध् को पार कर सवेंफ। यही कारण है कि संलयन के लिए अत्युच्च ताप की आवश्यकता होती है। 6ण् यद्यपि ;प्रति न्यूक्िलयाॅनद्ध बंध्न - ऊजार् वक्र संतत है और इसमें ध्ीरे - ध्ीरे ही परिवतर्न आता है परंतु इसमें 4भ्मए 16व् आदि न्यूक्लाइडों के लिए श्िाखर होते हैं। यह परमाणु की तरह ही नाभ्िाक में भी शैल संरचना की विद्यमानता का प्रमाण माना जाता है। 7ण् ध्यान दें कि इलेक्ट्राॅन - पाॅजिट्राॅन एक कण - प्रतिकण युग्म है। इनके द्रव्यमान एकसमान हैं।इनके आवेशों के परिमाण समान परंतु विपरीत प्रकृति के होते हैं। ;यह पाया गया है कि जब एक इलेक्ट्राॅन एवं एक पाॅजिट्राॅन एक साथ आते हैं तो एक - दूसरे का विलोपन ;ंददपीपसंजपवदद्ध कर देते हैं और γ.किरण पफोटाॅनों के रूप में ऊजार् प्रदान करते हैं। 8ण् हृ..क्षय ;इलेक्ट्राॅन उत्सजर्नद्ध में इलेक्ट्राॅन के साथ उत्सजिर्त होने वाला कण एंटी - न्यूटिªनो ; द्ध है। इसके विपरीत हृ़.क्षय ;पाॅजिट्राॅन उत्सजर्नद्ध में न्यूटिªनो ;νद्ध उत्स£जत होता है। न्यूटिªनोएवं एंटी - न्यूटिªनो का युग्म कण - प्रतिकण युग्म होता है। प्रकृति में प्रत्येक कण का एक प्रतिकण होता है। तब एंटी - प्रोटाॅन जो प्रोटाॅन का प्रतिकण है, क्या होना चाहिए? दृ9ण् एक मुक्त न्यूट्राॅन अस्थायी होता है ;द च म द्ध। परंतु, इसी तरह से मुक्त प्रोटाॅन का क्षय संभव नहीं है। ऐसा होने का कारण यह है कि प्रोटाॅन का द्रव्यमान न्यूट्राॅन के द्रव्यमान की तुलना में थोड़ा कम होता है। 10ण् प्रायः ऐल्प़्ाफा या बीटा उत्सजर्न के बाद गामा उत्सजर्न होता है। गामा पफोटाॅन उत्स£जत करके कोइर् नाभ्िाक उद्दीपित ;उच्चतरद्ध अवस्था से निम्नतर अवस्था में लौटता है। ऐल्प़्ाफा अथवा बीटा उत्सजर्न के पश्चात कोइर् नाभ्िाक उद्दीपित अवस्था में रह सकता है। एक ही नाभ्िाक से ;जैसे कि चित्रा 13ण्4 में दशार्ये गए 60छप के प्रकरण मेंद्ध गामा किरणों का क्रमवार उत्सजर्न इसबात का स्पष्ट प्रमाण है कि नाभ्िाकों में भी परमाणुओं की ही तरह विविक्त ऊजार् स्तर होते हैं। 11ण् रेडियोऐक्िटवता नाभ्िाक के अस्थायित्व का संसूचन है। हलके नाभ्िाकों में स्थायित्व के लिए न्यूट्राॅनो एवं प्रोट्राॅनों की संख्या का अनुपात लगभग 1रू1 होना चाहिए। भारी नाभ्िाकों के स्थायित्व के लिए यह अनुपात 3रू2 होना चाहिए। ;प्रोटाॅनों के मध्य लगने वाले प्रतिकषर्ण के प्रभाव के निरसन के लिए अिाक न्यूट्राॅनों की आवश्यकता होगी।द्ध इन स्थायित्व अनुपातों को न रखने वाले नाभ्िाक अस्थायी होते हैं। इन नाभ्िाकों में न्यूट्राॅनों अथवा प्रोटाॅनों की अध्िकता होती है। वास्तव में, ;सभी तत्वों केद्ध ज्ञात समस्थानिकों के मात्रा लगभग 10ः ही स्थायी हैं। अन्य नाभ्िाक कृत्रिाम रूप से प्रयोगशाला में बनाये जाते हैं ;ये स्थायी नाभ्िाकीय प्रजातियों पर αए चए कए द अथवा अन्य कणों के प्रघात द्वारा बनाये जाते हैं।द्ध। अस्थायी समस्थानिक विश्व में पदाथो± के खगोलीय प्रेक्षणों में भी अवलोकित किए जाते हैं। अभ्यास अभ्यास के प्रश्न हल करने में निम्नलिख्िात आँकड़े आपके लिए उपयोगी सि( होंगे रू म त्र 1ण्6×10दृ19ब् छ त्र 6ण्023×1023 प्रति मोल 1ध्;4π∈0द्ध त्र 9 × 109 छ उ2ध्ब्2 ा त्र 1ण्381×10दृ23श्र 0ज्ञदृ1 1 डमट त्र 1ण्6×10दृ13श्र 1 न त्र 931ण्5 डमटध्ब2 1 लमंत त्र 3ण्154×107 े उभ् त्र 1ण्007825 न उ द त्र 1ण्008665 न उ;24भ्मद्ध त्र 4ण्002603 न उ म त्र 0ण्000548 न 13ण्1 ;ंद्ध लीथ्िायम के दो स्थायी समस्थानिकों 6स्प एवं 7स्प की बहुलता का प्रतिशत क्रमशः 7ण्53 3 एवं 92ण्5 हंै। इन समस्थानिकों के द्रव्यमान क्रमशः 6ण्01512 न एवं 7ण्01600 न हैं। लीथ्िायम का परमाणु द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। ;इद्ध बोराॅन के दो स्थायी समस्थानिक 10ठ एवं 11ठ है। उनके द्रव्यमान क्रमशः 10ण्01294 न 5 5 एवं 11ण्00931 न एवं बोराॅन का परमाणु भार 10ण्811 न है। 10ठ एवं 11ठ की बहुलता5 5 ज्ञात कीजिए। 13ण्2 नियाॅन के तीन स्थायी समस्थानिकों की बहुलता क्रमशः 90ण्51ःए 0ण्27ः एवं 9ण्22ः है। इन समस्थानिकों के परमाणु द्रव्यमान क्रमशः 19ण्99 नए 20ण्99 न एवं 21ण्99 न हैं। नियाॅन का औसत परमाणु द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। 14 छ13ण्3 नाइट्रोजन नाभ्िाक ;7 द्ध की बंधन - उफजार् डमट में ज्ञात कीजिए उछ त्र14ण्00307 न 56थ्म 209ठप13ण्4 निम्नलिख्िात आँकड़ों के आधार पर एवं नाभ्िाकों की बंधन - उफजार् डमट में ज्ञात2683उ ; 209कीजिए। उ ;56थ्मद्ध त्र 55ण्934939 न ठपद्ध त्र 208ण्980388 न26 83 13ण्5 एक दिए गए सिक्के का द्रव्यमान 3ण्0 ह है। उस उफजार् की गणना कीजिए जो इस सिक्के के सभी न्यूट्राॅनों एवं प्रोटाॅनों को एक - दूसरे से अलग करने के लिए आवश्यक हो। सरलता के लिए मान लीजिए कि सिक्का पूणर्तः 63ब्न परमाणुओं का बना है ;63ब्न का द्रव्यमान त्र 29 2962ण्92960 नद्ध। 13ण्6 निम्नलिख्िात के लिए नाभ्िाकीय समीकरण लिख्िाए: 226 242;पद्ध त्ं का α.क्षय ;पपद्ध च्न का α.क्षय88 94 ;पपपद्ध 32च् का βदृ .क्षय ;पअद्ध 210ठप का βदृ.क्षय15 83 ;अद्ध 11ब्का β़.क्षय ;अपद्ध 97 ज्ब का β़.क्षय6 43 ;अपपद्ध 120 ग्म का इलेक्ट्राॅन अभ्िाग्रहण54 13ण्7 एक रेडियोऐक्िटव समस्थानिक की अधर्यु ज् वषर् है। कितने समय के बाद इसकी ऐक्िटवता, प्रारंभ्िाक ऐक्िटवता की ;ंद्ध 3ण्125ः तथा ;इद्ध 1ः रह जाएगी। 13ण्8 जीवित काबर्नयुक्त द्रव्य की सामान्य ऐक्िटवता, प्रति ग्राम काबर्न के लिए 15 क्षय प्रति मिनट है। यह ऐक्िटवता, स्थायी समस्थानिक 14ब् के साथ - साथ अल्प मात्रा में विद्यमान रेडियोऐक्िटव612ब् के कारण होती है। जीव की मृत्यु होने पर वायुमंडल के साथ इसकी अन्योन्य िया ;जो6उपरोक्त संतुलित ऐक्िटवता को बनाए रखती हैद्ध समाप्त हो जाती है, तथा इसकी ऐक्िटवता कम होनी शुरू हो जाती है। 14ब् की ज्ञात अधार्यु ;5730 वषर्द्ध और नमूने की मापी गइर् ऐक्िटवता6के आधार पर इसकी सन्िनकट आयु की गणना की जा सकती है। यही पुरातत्व विज्ञान में प्रयुक्त होने वाली 14ब् कालनिधार्रण ;कंजपदहद्ध प(ति का सि(ांत है। यह मानकर कि मोहनजोदड़ो6से प्राप्त किसी नमूने की ऐक्िटवता 9 क्षय प्रति मिनट प्रति ग्राम काबर्न है। सिंधु घाटी सभ्यता की464 सन्िनकट आयु का आकलन कीजिए। 13ण्9 8ण्0 उब्प सियता का रेडियोऐक्िटव ड्डोत प्राप्त करने के लिए 60ब्व की कितनी मात्रा की27आवश्यकता होगी? 60ब्व की अधार्यु 5ण्3 वषर् है।2713ण्10 90ैत की अधार्यु 28 वषर् है। इस समस्थानिक के 15 उह की विघटन दर क्या हैघ्38 13ण्11 स्वणर् के समस्थानिक 197 ।न एवं रजत के समस्थानिक 107 ।ह की नाभ्िाकीय त्रिाज्या के अनुपात79 47 का सन्िनकट मान ज्ञात कीजिए। 13ण्12 ;ंद्ध 226त्ं एवं ;इद्ध 220त्द नाभ्िाकों के α.क्षय में उत्सजिर्त α.कणों का फ.मान एवं गतिज88 86 ऊजार् ज्ञात कीजिए। उ ; 222 दिया हैः उ ; 226त्ं द्ध त्र 226ण्02540 नए त्द द्ध त्र 222ण्01750 नए88 86 उ ; 216 उ ;222 त्दद्ध त्र 220ण्01137 नए च्वद्ध त्र 216ण्00189 नण्86 84 13ण्13 रेडियोन्यूक्लाइड 11ब् का क्षय निम्नलिख्िात समीकरण के अनुसार होता है, 1111 ़ब् ठ़ म ़रू ज् त्र20ण्3 उपद 6 5 1ध्2 उत्सजिर्त पाॅजिट्राॅन की अिाकतम उफजार् 0ण्960 डमट है। द्रव्यमानों के निम्नलिख्िात मान दिए गए हैं उ ;11ब्द्ध त्र 11ण्011434 न तथा उ ;11ठ द्ध त्र 11ण्009305 नए6 6 फ.मान की गणना कीजिए एवं उत्सजिर्त पाॅजिट्राॅन की अिाकतम उफजार् के मान से इसकी तुलना कीजिए। 13ण्14 23छम का नाभ्िाक, βदृ उत्सजर्न के साथ क्षयित होता है। इस β.क्षय के लिए समीकरण लिख्िाए10और उत्सजिर्त इलेक्ट्राॅनों की अिाकतम गतिज उफजार् ज्ञात कीजिए।उ ;23छमद्ध त्र 22ण्994466 न 10 नय उ ;23छंद्ध त्र 22ण्089770 नए11 13ण्15 किसी नाभ्िाकीय अभ्िािया । ़ इ → ब् ़ क का फ.मान निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा परिभाष्िात होता है, फ त्र ख् उ। ़ उइ दृ उब् दृ उक,ब2 जहाँ दिए गए द्रव्यमान, नाभ्िाकीय विराम द्रव्यमान ;तमेज उंेेद्ध हैं। दिए गए आँकड़ों के आधार पर बताइए कि निम्नलिख्िात अभ्िाियाएँ उफष्माक्षेपी हैं या उफष्माशोषी। 3 22;पद्ध 1भ़्भ् भ़्भ् 11 11 1220 4;पपद्ध 12ब़् ब् छम़ भ्म 6610 2 दिए गए परमाणु द्रव्यमान इस प्रकार हैं: उ ;12भ्द्ध त्र 2ण्014102 न उ ;13भ्द्ध त्र 3ण्016049 न उ ;12 6 ब् द्ध त्र 12ण्000000 न उ ;20छमद्ध त्र 19ण्992439 न10 13ण्16 माना कि हम 56थ्म नाभ्िाक के दो समान अवयवों 28 ।स में विखंडन पर विचार करें। क्या ऊजार्26 13 की दृष्िट से यह विखंडन संभव है? इस प्रक्रम का फ.मान ज्ञात करके अपना तवर्फ प्रस्तुत करें। दिया है: उ ;56थ्मद्ध त्र 55ण्93494 न एवं उ ; 28 ।स द्ध त्र 27ण्98191 न26 13 239च्न 235न्13ण्17 के विखंडन गुण बहुत वुफछ से मिलते - जुलते हैं। प्रति विखंडन विमुक्त औसत9492239च्नउफजार् 180 डमट है। यदि 1 ाह शु( के सभी परमाणु विखंडित हों तो कितनी डमट94उफजार् विमुक्त होगी? 13ण्18 किसी1000 डॅ विखंडन रिएक्टर के आधे ईंधन का 5ण्00 वषर् में व्यय हो जाता है। प्रारंभ में इसमें कितना 235न् था? मान लीजिए कि रिएक्टर 80ः समय कायर्रत रहता है, इसकी संपूणर्92 235न् 235न्उफजार् के विखंडन से ही उत्पन्न हुइर् हैऋ तथा न्यूक्लाइड केवल विखंडन प्रिया92 92में ही व्यय होता है। 13ण्19 2ण्0 ाह ड्यूटीरियम के संलयन से एक 100 वाट का विद्युत लैंप कितनी देर प्रकाश्िात रखा जा सकता है? संलयन अभ्िािया निम्नवत ली जा सकती है 22 3भ़् भ् भ्म़द़3ण्27 डमट 11 2 13ण्20 दो ड्यूट्राॅनों के आमने - सामने की टक्कर के लिए वूफलाॅम अवरोध् की उफँचाइर् ज्ञात कीजिए।;संकेत - वूफलाॅम अवरोध् की ऊँचाइर् का मान इन ड्यूट्राॅन के बीच लगने वाले उस वूफलाॅम प्रतिकषर्ण बल के बराबर होता है जो एक - दूसरे को संपवर्फ में रखे जाने पर उनके बीच आरोपित होता है। यह मान सकते हैं कि ड्यूट्राॅन 2ण्0 उि प्रभावी त्रिाज्या वाले दृढ़ गोले हैं।द्ध 13ण्21 समीकरण त् त्र त्0।1ध्3 के आधर पर, दशार्इए कि नाभ्िाकीय द्रव्य का घनत्व लगभग अचर है ;अथार्त । पर निभर्र नहीं करता हैद्ध। यहाँ त्0 एक नियतांक है एवं । नाभ्िाक की द्रव्यमान संख्या है। 13ण्22 किसी नाभ्िाक से β़ ;पाॅजिट्राॅनद्ध उत्सजर्न की एक अन्य प्रतियोगी प्रिया है जिसे इलेक्ट्राॅन परिग्रहण ;ब्ंचजनतमद्ध कहते हैं ;इसमें परमाणु की आंतरिक कक्षा, जैसे कि ज्ञ - कक्षा, से नाभ्िाक एक इलेक्ट्राॅन परिगृहीत कर लेता है और एक न्यूटिªनो, अ उत्सजिर्त करता हैद्ध। म ।ग् ।ल्र्र् 1 दशार्इए कि यदि β़ उत्सजर्न उफजार् विचार से अनुमत है तो इलेक्ट्राॅन परिग्रहण भी आवश्यक रूप से अनुमत है, परंतु इसका विलोम अनुमत नहीं है। अतिरिक्त अभ्यास 13ण्23 आवतर् सारणी में मैग्नीश्िायम का औसत परमाणु द्रव्यमान 24ण्312 न दिया गया है। यह औसत मान, पृथ्वी पर इसके समस्थानिकों की सापेक्ष बहुलता के आधार पर दिया गया है। मैग्नीश्िायम के तीनों समस्थानिक तथा उनके द्रव्यमान इस प्रकार हैं μ 24डह;23ण्98504 नद्धए12 25 डह ;24ण्98584द्ध एवं 26डह ;25ण्98259 नद्ध। प्रकृति में प्राप्त मैग्नीश्िायम में 24डह1212 12 की ;द्रव्यमान के अनुसारद्ध बहुलता 78ण्99ः है। अन्य दोनों समस्थानिकों की बहुलता कापरिकलन कीजिए। 13ण्24 न्यूट्राॅन पृथक्करण उफजार् ;ैमचंतंजपवद मदमतहलद्धए परिभाषा के अनुसार, वह उफजार् है जो किसी नाभ्िाक से एक न्यूट्राॅन को निकालने के लिए आवश्यक होती है। नीचे दिए गए आँकड़ों का इस्तेमाल करके 41ब्ं एवं 27।स नाभ्िाकों की न्यूट्राॅन पृथक्करण उफजार् ज्ञात कीजिए।2013उ; 40 20ब्ं द्ध त्र 39ण्962591 न उ; 41 20ब्ं द्ध त्र 40ण्962278 न उ; 26 13 ।स द्ध त्र 25ण्986895 न उ; 27 13 ।स द्ध त्र 26ण्981541 न 13ण्25 किसी ड्डोत में पफाॅस्पफोरस के दो रेडियो न्यूक्लाइड निहित हैं 32च् ;ज् त्र 14ण्3 कद्ध एवं 33च्15 1ध्215 ;ज्1ध्2 त्र 25ण्3 कद्ध। प्रारंभ में 33च् से 10ः क्षय प्राप्त होता है। इससे 90ः क्षय प्राप्त करने15 के लिए कितने समय प्रतीक्षा करनी होगी? 13ण्26 वुफछ विश्िाष्ट परिस्िथतियों में, एक नाभ्िाक, α - कण से अिाक द्रव्यमान वाला एक कण उत्सजिर्त करके क्षयित होता है। निम्नलिख्िात क्षय - प्रियाओं पर विचार कीजिए: 223 209 14त्ं च्इ ब्88 826 223 219 4त्ं त्दभ्म88 862 इन दोनों क्षय प्रियाओं के लिए फ - मान की गणना कीजिए और दशार्इए कि दोनों प्रियाएँ उफजार् की दृष्िट से संभव हैं। 13ण्27 तीव्र न्यूट्राॅनों द्वारा 238न् के विखंडन पर विचार कीजिए। किसी विखंडन प्रिया में प्राथमिक अंशों92 140 44त्न अंतिम उत्पाद प्राप्त होते हैं। विखंडन प्रिया के लिए फ के मान का58ब्म तथा 99 परिकलन कीजिए। आवश्यक आँकड़े इस प्रकार हैं: उ; 238 92न्द्ध त्र238ण्05079 न उ;140 58ब्म द्ध त्र139ण्90543 न उ; 99 44त्नद्ध त्र 98ण्90594 न 13ण्28 क्.ज् अभ्िािया ;ड्यूटीरियम - ट्रीटियम संलयनद्ध, 2भ् 3भ् 4भ्म द पर विचार कीजिए।11 2 ;ंद्ध नीचे दिए गए आँकड़ों के आधार पर अभ्िािया में विमुक्त उफजार् का मान डमट में ज्ञात कीजिए। उ; 21भ् द्ध त्र2ण्014102 न उ; 31भ् द्ध त्र3ण्016049 न ;इद्ध ड्यूटीरियम एवं ट्राइटियम दोनों की त्रिाज्या लगभग 1ण्5 उि मान लीजिए। इस अभ्िािया में, दोनों नाभ्िाकों के मध्य वूफलाॅम प्रतिकषर्ण से पार पाने के लिए कितनी गतिज उफजार् की आवश्यकता है? अभ्िािया प्रारंभ करने के लिए गैसों ;क् तथा ज् गैसेंद्ध को किस ताप तकऊष्िमत किया जाना चाहिए? ;संकेत: किसी संलयन िया के लिए आवश्यक गतिज उफजार् त्र संलयन िया में संलग्न कणों की औसत तापीय गतिज उफजार् त्र 2 ;3ाज्ध्2द्धय ा: बोल्ट्शमान नियतांक तथा ज् त्र परम तापद्ध 13ण्29 नीचे दी गइर् क्षय - योजना में, γ - क्षयों की विकिरण आवृिायाँ एवं β.कणों की अिाकतम गतिज उफजार्एँ ज्ञात कीजिए। दिया है: उ;198।नद्ध त्र 197ण्968233 न उ;198भ्हद्ध त्र197ण्966760 न चित्रा 13ण्6 13ण्30 सूयर् के अभ्यंतर में ;ंद्ध 1 ाह हाइड्रोजन के संलयन के समय विमुक्त ऊजार् का परिकलन कीजिए। ;इद्ध विखंडन रिएक्टर में 1ण्0 ाह 235न् के विखंडन में विमुक्त ऊजार् का परिकलन कीजिए। ;बद्ध तथा ;इद्ध प्रश्नों में विमुक्त ऊजार्ओं की तुलना कीजिए। 13ण्31 मान लीजिए कि भारत का लक्ष्य 2020 तक 200ए000 डॅ विद्युत शक्ित जनन का है। इसका 10ः नाभ्िाकीय शक्ित संयंत्रों से प्राप्त होना है। माना कि रिएक्टर की औसत उपयोग दक्षता ;उफष्मा को विद्युत में परिवतिर्त करने की क्षमताद्ध 25ः है। 2020 के अंत तक हमारे देश को प्रति वषर् कितने विखंडनीय यूरेनियम की आवश्यकता होगी। 235न् प्रति विखंडन उत्सजिर्त उफजार् 200 डमट है।

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