11ण्1 भूमिका सन् 1887 में वैद्युतचुंबकीय किरणों की उत्पिा एवं संसूचना पर विद्युत चुंबकत्व के मैक्सवेल समीकरण तथा हटर््श के प्रयोगों ने प्रकाश की तरंगीय प्रवृफति को अभूतपूवर् रूप से स्थापित किया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में विसजर्न - नलिका में गैसों में कम दाब पर विद्युत - चालन ;विद्युत - विसजर्नद्ध पर प्रायोगिक अन्वेषणों से कइर् ऐतिहासिक खोजें हुईं। रूंटगेन के द्वारा 1895 में ग्.किरणों की खोज तथा जे. जे. टाॅमसन के द्वारा 1897 में की गइर् इलेक्ट्राॅन की खोज परमाणु - संरचना को समझने में मील का पत्थर थीं। लगभग 0ण्001 उउ पारे के स्तंभ के अत्यंत कम दाब पर यह पाया गया कि ऐसे दो इलेक्ट्रोडों के बीच, जिनके द्वारा विसजर्न - नलिका में गैस पर विद्युत क्षेत्रा स्थापित किया जाता है, एक विसजर्न होता है। वैफथोड के सम्मुख काँच पर प्रतिदीप्त उत्पन्न होती है। दीप्त का रंग काँच की प्रकृति पर निभर्र करता है, जैसे - सोडा - काँच के लिए पीत - हरा रंग का। इस प्रतिदीप्ित का कारण उस विकिरण को माना गया जो वैफथोड से आ रहा था। ये वैफथोड किरणें 1870 में विलियम व्रुफक्स के द्वारा खोजी गइर् थीं, जिसने बाद में 1879 में यह सुझाया कि ये किरणें तीव्रता से चलने वाली )ण - आवेशी कणों की धारा से बनी हैं। बि्रटिश भौतिक शास्त्राी जे.जे. टाॅमसन ;1856 दृ 1940द्ध ने इस परिकल्पना की पुष्िट की। जे.जे. टाॅमसन ने पहली बार विसजर्न - नलिका के आर - पार परस्पर लंबवत विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्रों को स्थापित कर प्रायोगिक तौर पर वैफथोड - किरण कणों के वेग तथा आपेक्ष्िाक आवेश ¹अथार्त आवेश और द्रव्यमान का अनुपात ;मध्उद्धह् ज्ञात किया। यह पाया गया कि ये कण प्रकाश के वेग ;3 ×108 उध्ेद्ध के लगभग उसी समय, 1887 में, यह पाया गया कि जब वुफछ निश्िचत धातुओं को पराबैंगनी प्रकाश द्वारा किरण्िात करते हैं तो कम वेग वाले )ण - आवेश्िात कण उत्सजिर्त होते हैं। इसी प्रकार, जब वुफछ निश्िचत धातुओं को उच्च ताप तक गरम किया जाता है तो ये )ण - आवेश्िात कण उत्सजिर्त करते हैं। इन कणों के लिए मध्उ का मान उतना ही पाया गया जितना कि वैफथोड किरण कणों का था। इस प्रकार इन प्रेक्षणों ने यह स्थापित कर दिया कि ये सभी कण, यद्यपि भ्िान्न दशाओं में उत्पन्न हुए थे, प्रकृति में समान थे। जे.जे. टाॅमसन ने, 1897 में, इन कणों को इलेक्ट्राॅन नाम दिया और सुझाया कि ये द्रव्य के मौलिक सावर्त्रिाक अवयव हैं। गैसों में विद्युत के संवहन पर उनके सै(ांतिक तथा प्रायोगिक प्रेक्षणों के द्वारा इलेक्ट्राॅन की इस युगांतकारी खोज के लिए उन्हें 1906 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1913 में अमेरिकी भौतिकविज्ञानी आर.ए. मिलिकन ;1868दृ 1953द्ध ने इलेक्ट्राॅन पर आवेश के परिशु( मापन के लिए तेल - बूँद का पथ प्रदशर्क प्रयोग किया। उन्होंने यह पाया कि तेल - बिंदुक पर आवेश सदैव एक मूल आवेश, 1ण्602 × 10दृ19 ब् का पूणर् गुणांक है। मिलिकन के प्रयोग ने यह प्रस्थापित कर दिया कि वैद्युतआवेश क्वांटीकृत है। आवेश ;मद्ध तथा आपेक्ष्िात आवेश ;मध्उद्ध के मान से, इलेक्ट्राॅन का द्रव्यमान ;उद्ध ज्ञात किया जा सका। 11ण्2 इलेक्ट्राॅन उत्सजर्न हम जानते हैं कि धातुओं में मुक्त इलेक्ट्राॅन ;)ण आवेश्िात कणद्ध होते हैं जो उनकी चालकता के लिए उत्तरदायी होते हैं। तथापि, मुक्त इलेक्ट्राॅन सामान्यतः धातु - पृष्ठ से बाहर नहीं निकल सकते। यदि इलेक्ट्राॅन धातु से बाहर आते हैं तो इसका पृष्ठ धन आवेश प्राप्त कर लेता है और इलेक्ट्राॅनों को वापस धातु पर आकष्िार्त कर लेता है। इस प्रकार मुक्त इलेक्ट्राॅन धातु के भीतर आयनों के आकषर्ण बलों के द्वारा रोककर रखे गए होते हैं। परिणामस्वरूप सिप़्ार्फ वे इलेक्ट्राॅन जिसकी ऊजार् इस आकषर्ण को अभ्िाभूत कर सके, धतु पृष्ठ से बाहर आ पाते हैं। अतः इलेक्ट्राॅनों को धातु पृष्ठ से बाहर निकालने के लिए एक निश्िचत न्यूनतम ऊजार् की आवश्यकता होती है। इस न्यूनतम ऊजार् को धातु का कायर् - पफलन कहते हैं। इसे साधारणतया φο के द्वारा व्यक्त करते हैं और मट ;इलेक्ट्राॅन वोल्टद्ध में मापते हैं। एक इलेक्ट्राॅन वोल्ट किसी इलेक्ट्राॅन को 1 वोल्ट विभवांतर के द्वारा त्वरित कराने पर प्राप्त उफजार् का मान है। अतः 1 मट त्र 1ण्602 × 10दृ19 श्र साधारणतया ऊजार् की इस इकाइर् का प्रयोग परमाणु तथा नाभ्िाकीय भौतिकी में किया जाता है। कायर् - पफलन ;φ0द्ध धातु के गुणों और इसके पृष्ठ की प्रकृति पर निभर्र करता है। वुफछ धातुओं के कायर् - पफलन के मान सारणी 11ण्1 में दिए गए हैं। ये मान अनुमानित हैं क्योंकि इनके मान पृष्ठीय अपद्रव्यों पर बहुत अध्िक निभर्र करते हैं। सारणी 11ण्1 से यह ध्यान किया जा सकता है कि प्लैटिनम का कायर् - पफलन उच्चतम ;φ0 त्र 5ण्65 मटद्ध है जबकि सीिायम का न्यूनतम ;φ0 त्र 2ण्14 मटद्ध है। धातु के पृष्ठ से इलेक्ट्राॅन उत्सजर्न के लिए मुक्त इलेक्ट्राॅनों को न्यूनतम आवश्यक ऊजार् निम्न किसी भी एक भौतिक वििा के द्वारा दी जा सकती है: ;पद्ध तापायनिक उत्सजर्न: उपयुक्त तापन के द्वारा मुक्त इलेक्ट्राॅनों को पयार्प्त तापीय ऊजार् दी जा सकती है जिससे कि वे धातु से बाहर आ सवेंफ। 389 भौतिकी धतु कायर् - पफलन धतु कायर् - पफलन φ ο;मटद्ध φ ο;मटद्ध ब्े 2ण्14 ।स 4ण्28 ज्ञ 2ण्30 भ्ह 4ण्49 छं 2ण्75 ब्न 4ण्65 ब्ं 3ण्20 ।ह 4ण्70 डव 4ण्17 छप 5ण्15 च्इ 4ण्25 च्ज 5ण्65 ;पपद्ध क्षेत्रा उत्सजर्न: किसी धातु पर लगाया गया एक प्रबल विद्युत क्षेत्रा ;108 ट उदृ1 की कोटि काद्ध इलेक्ट्राॅनों को धातु - पृष्ठ के बाहर ला सकता है, जैसा कि किसी स्पावर्फ प्लग में। ;पपपद्ध प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न: उपयुक्त आवृिा का प्रकाश जब किसी धातु - पृष्ठ पर पड़ता है तो इलेक्ट्राॅनों का उत्सजर्न होता है। ये प्रकाशजनित इलेक्ट्राॅन प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन ;चीवजवमसमबजतवदद्ध कहलाते हैं। 11ण्3 प्रकाश - विद्युत प्रभाव 11ण्3ण्1 हट्र्श के परीक्षण प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न की परिघटना की खोज हेनरिच हट्र्ज़्ा ;1857.1894द्ध के द्वारा 1887 में वैद्युतचुंबकीय तरंगों के प्रयोगांे के समय की गइर् थी। स्पुफ¯लग - विसजर्न ;ेचंता कपेबींतहमद्ध के द्वारा वैद्युतचुंबकीय तरंगों की उत्पिा के अपने प्रायोगिक अन्वेषण में हटर््श ने यह प्रेक्ष्िात किया कि वैफथोड को किसी आवर्फ लैंप से पराबैंगनी प्रकाश के द्वारा प्रदीप्त करने पर धातु - इलेक्ट्रोडों के पार उच्च वोल्टता स्पुफ¯लग अध्िक हो जाता है। धतु - पृष्ठ पर चमकने वाला प्रकाश मुक्त आवेश्िात कणों जिन्हें अब हम इलेक्ट्राॅन कहते हैं, को स्वतंत्रा करने में सहायता प्रदान करता है। जब धतु - पृष्ठ पर प्रकाश पड़ता है तो पृष्ठ के समीप इलेक्ट्राॅन आपतित विकिरण से पदाथर् के पृष्ठ में ध्नात्मक आयनों के आकषर्ण को पार करने के लिए ऊजार् अवशोष्िात कर लेते हैं। आपतित प्रकाश से आवश्यक ऊजार् प्राप्त करने के पश्चात, इलेक्ट्राॅन धतु - पृष्ठ से बाहर परिवेश में आ जाते हैं। 11ण्3ण्2 हालवाॅक्स तथा लीनाडर् के प्रेक्षण विलहेल्म हालवाॅक्स तथा पिफलिप लीनाडर् ने 1886.1902 के बीच प्रकाशविद्युत उत्सजर्न की परिघटना का अन्वेषण किया। दो इलेक्ट्रोडों ;धतु पिðकाओंद्ध वाली किसी निवार्तित काँच की नली में उत्सजर्क पिðका पर पराबैंगनी विकिरणों को आपतित करने पर लीनाडर् ;1862.1947द्ध ने पाया कि परिपथ में धरा प्रवाह होता है ;चित्रा 11ण्1द्ध। जैसे ही पराबैंगनी विकिरणों को रोका गया, वैसे ही धरा प्रवाह भी रुक गया। इन परीक्षणों से ज्ञात होता है कि जब पराबैंगनी विकिरण उत्सजर्क पिðका ब् पर आपतित होते हैं, इलेक्ट्राॅन पिðका से बाहर आ जाते हैं तथा विद्युत क्षेत्रा द्वारा ध्नात्मक संग्राहक पिðका । की ओर आक£षत हो जाते हैं। निवार्तित काँच की नली में इलेक्ट्राॅनों के प्रवाह के कारण धराप्रवाह होती है। इस प्रकार से, उत्सजर्क के पृष्ठ पर प्रकाश पड़ने के कारण बाह्य परिपथ में धाराप्रवाह होती है। हालवाॅक्स तथा लीनाडर् ने संग्राहक पिðका के विभव, आपतित प्रकाश की आवृिा तथा तीव्रता के साथ प्रकाश धरा में परिवतर्न का अध्ययन किया। हालवाॅक्स ने 1888 में इस अध्ययन को आगे बढ़ाया और एक )णावेश्िात ¯जक पिðका को एक विद्युतदशीर् से जोड़ दिया। उसने पे्रक्ष्िात किया कि जब पिðका को पराबैंगनी प्रकाश से किरण्िात किया गया तो इसने अपना आवेश खो दिया। इसके अतिरिक्त जब एक अनावेश्िात ¯जक पिðका को पराबैंगनी प्रकाश से किरण्िात किया गया तो यह ध्नावेश्िात हो गइर्। ¯जक पिðका को पराबैंगनी प्रकाश से पुनः किरण्िात करने पर, इस पिðका पर ध्नआवेश और अध्िक हो गया। इन प्रेक्षणों से उसने यह निष्कषर् निकाला कि पराबैंगनी प्रकाश के प्रभाव से ¯जक पिðका से )णावेश्िात कण उत्स£जत होते हैं। 1897 में इलेक्ट्राॅन की खोज के पश्चात यह निश्िचत हो गया कि उत्सजर्क पिðका से इलेक्ट्राॅनों के उत्सजर्न का कारक आपतित प्रकाश है। )ण आवेश के कारण उत्स£जत इलेक्ट्राॅन विद्युत क्षेत्रा द्वारा संग्राहक पिðका की ओर ध्केले जाते हैं। हालवाॅक्स तथा लीनाडर् ने यह भी प्रेक्ष्िात किया कि जब उत्सजर्क पिðका पर एक नियत न्यूनतम मान से कम आवृिा का पराबैंगनी प्रकाश पड़ता है तो कोइर् भी इलेक्ट्राॅन उत्स£जत नहीं होता। इस नियत न्यूनतम आवृिा को देहली आवृिा ;जीतमेीवसक तिमुनमदबलद्ध कहते हैं तथा इसका मान उत्सजर्क पिðका के पदाथर् की प्रवृफति पर निभर्र करता है। यह पाया गया कि ¯जक, वैफडमियम, मैग्नीश्िायम जैसी वुफछ धतुओं में यह प्रभाव केवल कम तरंगदैघ्यर् की पराबैंगनी तरंगों के लिए होता है। तथापि लीथ्िायम, सोडियम, पोटेश्िायम, सीजियम तथा रूबीडियम जैसी क्षार धतुएँ दृश्य प्रकाश के द्वारा भी यह प्रभाव दशार्ती हंै। जब इन प्रकाश - संवेदी पदाथो± को प्रकाश से प्रदीप्त किया जाता है तो ये इलेक्ट्राॅन उत्सजिर्त करते हैं। इलेक्ट्राॅन की खोज के पश्चात् इन इलेक्ट्राॅनों को प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन नाम दिया गया। यह परिघटना प्रकाश - विद्युत प्रभाव कहलाती है। 11ण्4 प्रकाश - विद्युत प्रभाव का प्रायोगिक अध्ययन चित्रा 11ण्1 में प्रकाश - विद्युत प्रभाव के प्रायोगिक अध्ययन के लिए उपयोग में लाइर् गइर् व्यवस्था को दशार्या गया है। इसमें एक निवार्तित काँच/क्वाटर्श की नली है जिसमें एक प्रकाश - संवेदी पिðका ब् और दूसरी धातु पिðका । है। ड्डोत ै से प्रकाश, गवाक्ष ;ूपदकवूद्ध ॅ से पार होता है और प्रकाश - संवेदी पिðका ;उत्सजर्कद्ध ब् पर पड़ता है। पारदशीर् क्वाटर््श गवाक्ष ;काँच - नली पर मुदि्रतद्ध से पराबैंगनी विकिरण पार हो जाता है और प्रकाश - संवेदी पिðका ब् को किरण्िात करता है। पिðका ब् से इलेक्ट्राॅन उत्स£जत होते हैं जो पिðका । ;संग्राहकद्ध पर बैटरी द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्रा द्वारा एकत्रा कर लिए जाते हैं। ब् तथा । पिðकाओं के बीच विभवांतर को बैटरी द्वारा बनाए रखा जाता है तथा इसे परिवतिर्त किया जा सकता है। प्लेट ब् तथा । के ध््रुव दिशा दिव्फपरिवतर्क ;ब्वउउनजंजवतद्ध के द्वारा बदले जा सकते हैं। इस प्रकार उत्सजर्क पिðका ब् की तुलना में पिðका । को इच्छानुसार धन अथवा )ण विभव पर रखा जा सकता है। जब संग्राहक पिðका ।ए उत्सजर्क पिðका ब् की तुलना में ध्नात्मक होगी तब इलेक्ट्राॅन इसकी ओर आक£षत होंगे। इलेक्ट्राॅनों के उत्सजर्न के कारण विद्युत परिपथ में एक प्रवाह उत्पन्न होता है जिससे परिपथ में एक विद्युत धारा स्थापित हो जाती है। 391 प्रकाश - विद्युत प्रभाव का अनुकरणीजजचरूध्ध्ूूूणबअेण्बंध्ेपजमध्चतवरमबजेध्चीलेपबेण्ीजउस भौतिकी इलेक्ट्रोडों के बीच के विभवांतर को एक वोल्टमीटर के द्वारा और परिणामस्वरूप परिपथ में प्रवाहित होने वाली प्रकाश्िाक धारा को माइक्रोऐमीटर के द्वारा मापते हैं। प्रकाश्िाक विद्युत धारा को संग्राहक पिðका । का विभव उत्सजर्क पिðका ब् के सापेक्ष परिव£तत करके बढ़ाया अथवा घटाया जा सकता है। आपतित प्रकाश की तीव्रता तथा आवृिा को भी परिवतिर्त किया जा सकता है जैसे कि उत्सजर्क ब् और संग्राहक । के बीच विभवांतर ट को परिवतिर्त किया जाता है। हम चित्रा 11ण्1 की प्रायोगिक व्यवस्था का उपयोग प्रकाश्िाक धारा के ;ंद्ध विकिरण की तीव्रता, ;इद्ध आपतित विकिरण की आवृिा, ;बद्ध प‘िकाओं । तथा ब् के बीच के विभवांतर, तथा ;कद्ध प‘िका ब् के पदाथर् की प्रकृति के साथ परिवतर्न के अध्ययन के लिए कर सकते हैं। उत्सजर्क ब् पर पड़ने वाले प्रकाश के मागर् में उपयुक्त पिफल्टर अथवा रंगीन काँच रखकर भ्िान्न तरंगदैघ्यर् के प्रकाश का उपयोग कर सकते हैं। प्रकाश ड्डोत की उत्सजर्क से दूरी को बदलते हुए प्रकाश की तीव्रता को परिवतिर्त किया जा सकता है। 11ण्4ण्1 प्रकाश - विद्युत धरा पर प्रकाश की तीव्रता का प्रभाव संग्राहक । को उत्सजर्क ब् की तुलना में एक धन विभव पर रखा जाता है जिससे ब् से उत्सजिर्त इलेक्ट्राॅन संग्राहक । की ओर आकष्िार्त होते हैं। आपतित विकिरण की आवृिा तथा त्वरक विभव को स्िथर रखते हुए, प्रकाश की तीव्रता को परिवतिर्त किया जाता है और परिणामी प्रकाश - विद्युत धारा को प्रत्येक बार मापा जाता है। यह पाया जाता है कि प्रकाश्िाक धारा आपतित प्रकाश की तीव्रता के साथ रैख्िाकतः बढ़ती है जैसा कि चित्रा 11ण्2 में ग्रापफीय रूप में दशार्या गया है। प्रकाश्िाक धारा उत्सजिर्त होने वाले प्रति सेवंफड इलेक्ट्राॅनों की संख्या के अनुक्रमानुपाती है, अतः उत्सजिर्त होने वाले प्रति सेवंफड प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की संख्या आपतित विकिरण की तीव्रता के समानुपाती है। 11ण्4ण्2 प्रकाश - विद्युत धरा पर विभव का प्रभाव हम पहले पिðका । को पिðका ब् की तुलना में किसी धन त्वरक विभव पर रखते हैं और पिðका ब् को निश्िचत आवृिा ν तथा निश्िचत तीव्रता प्1 के प्रकाश से प्रदीप्त करते हैं। पिफर हम पिðका । के धन विभव को धीरे - धीरे परिवतिर्त करते हैं और प्रत्येक बार परिणामी प्रकाश - विद्युत धारा को मापते हैं। यह पाया जाता है कि प्रकाश - विद्युत धारा त्वरक ;धनद्ध विभव के साथ बढ़ती है। पिðका । के एक निश्िचत धन विभव के लिए एक ऐसी स्िथति आ जाती है जिस पर सभी उत्स£जत इलेक्ट्राॅन पिðका । पर संग्रहीत हो जाते हैं तथा प्रकाश - विद्युत धारा उच्चतम हो जाती है अथार्त संतृप्त हो जाती है। यदि हम विद्युत पिðका । के त्वरक विभव को और अिाक बढ़ाते हैं तो प्रकाश - विद्युत धरा नहीं बढ़ती। प्रकाश - विद्युत धारा के इस उच्चतम मान को संतृप्त धारा कहते हैं। संतृप्त धारा उस स्िथति के संगत है जब उत्सजर्क पिðका ब् के द्वारा उत्सजिर्त सभी प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन संग्राहक पिðका । पर पहुँच जाते हैं। 392 अब हम पिðका । पर पिðका ब् की तुलना में एक )ण ;मंदकद्ध विभव लगाते हैं और इसे धीरे - धीरे अिाक )णात्मक करते जाते हैं। जब पिðकाओं की ध््रुवता बदली जाती है तो इलेक्ट्राॅन प्रतिक£षत होते हैं तथा केवल वुफछ अति ऊजार् वाले इलेक्ट्राॅन ही संग्राहक । तक पहुँच पाते हैं। यह पाया गया कि प्रकाश्िाक - धारा तेशी से कम होती जाती है जब तक कि यह पिðका । पर )ण विभव ट0 के किसी निश्िचत तीक्ष्ण और स्पष्ट क्रांतिक मान पर शून्य नहीं हो जाती। आपतित विकिरण की एक निश्िचत आवृिा के लिए पिðका । पर दिया गया निम्नतम )ण ;मंदकद्ध विभव ट0 जिस पर प्रकाश्िाक - धारा शून्य हो जाती है, अंतक ;ब्नज.वद्धििअथवा निरोधी विभव ;ैजवचचपदह चवजमदजपंसद्ध कहलाता है। मंदक विभव संग्राही पिðका विभवप्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन के द्वारा प्रेक्षण की व्याख्या सीधी है। धातु से उत्सजिर्त सभी प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन समान ऊजार् चित्रा 11ण्3 आपतित विकिरण की विभ्िान्न तीव्रताओं के लिएवाले नहीं होते। प्रकाश - विद्युत धारा तब शून्य होती है जब प्रकाश्िाक - धारा तथा पिðका विभव के बीच आलेख।निरोधी विभव अध्िकतम ऊजार् वाले प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों, जिनकी उच्चतम गतिज ऊजार् ;ज्ञउच्चद्ध है, को प्रतिक£षत करने की अवस्था में हो। अथार्त ज्ञउच्च त्र म ट0 ;11ण्1द्ध अब हम इस प्रयोग को आपतित विकिरण की एकसमान आवृिा परंतु उच्च तीव्रता प्2 तथा प्3 ;प्3 झ प्2 झ प्1द्ध के लिए दोहरा सकते हैं। हम यह नोट करते हैं कि अब संतृप्त धाराओं के मान बढ़ जाते हैं। इससे ज्ञात होता है कि आपतित विकिरण की तीव्रता के अनुपात में प्रति सेवंफड अध्िक इलेक्ट्राॅन उत्स£जत होते हैं। परंतु निरोधी विभव उतना ही रहता है जितना कि प्1 तीव्रता के आपतित विकिरण के लिए होता है, जैसा कि चित्रा 11ण्3 में ग्रापफ के द्वारा दशार्या गया है। इस प्रकार, आपतित विकिरण की एक निश्िचत आवृिा के लिए निरोधी विभव इसकी तीव्रता से स्वतंत्रा होता है। दूसरे शब्दों में, प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन की उच्चतम गतिज ऊजार्, आपतित विकिरण की तीव्रता पर निभर्र नहीं करती है। 11ण्4ण्3 निरोध्ी विभव पर आपतित विकिरण की आवृिा का प्रभाव अब हम आपतित विकिरण की आवृिा ν और निरोधी विभव ट0 के मध्य संबंध का अध्ययन करेंगे। हम प्रकाश विकिरण की विभ्िान्न आवृिायों पर उपयुक्त प्रकार से एक ही तीव्रता को समायोजित करते हैं और संग्राही पिðका विभव के साथ प्रकाश - विद्युत धारा के परिवतर्न का अध्ययन करते हैं। परिणामी परिवतर्न को चित्रा 11ण्4 में दशार्या गया है। हमें आपतित विकिरण की भ्िान्न आवृिायों के लिए निरोधी विभव के भ्िान्न मान परंतु संतृप्त धारा का एक ही मान प्राप्त होता है। उत्स£जत इलेक्ट्राॅनों की ऊजार् आपतित विकिरणों की आवृिा पर निभर्र चित्रा 11ण्4 आपतित विकिरण की विभ्िान्न आवृिायों के लिएहै। आपतित विकिरण की उच्चतर आवृिा के लिए निरोधी पिðका विभव तथा प्रकाश - विद्युत धरा के बीच आलेख।विभव का मान अिाक )णात्मक होता है। चित्रा 11ण्4 से यह ज्ञात होता है कि यदि आवृिायाँ ν3 झ ν2 झ ν1 के क्रम में हों 393 भौतिकी तो निरोधी विभवों का क्रम ट03 झ ट02 झ ट01 होता है। इसमें यह अंत£नहित है कि आपतित प्रकाश की आवृिा जितनी अिाक निरोध्ी होगी, प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम गतिज ऊजार् उतनी ही अिाक होगी। पफलस्वरूप, इन्हें पूणर् रूप से रोकने के लिए अिाक निरोधी विभव की आवश्यकता होगी। यदि हम भ्िान्न धातुओं के लिए आपतित विकिरण की आवृिा और संबंिात निरोधी विभव के बीच ग्राप़फ खीचें तो हमें एक सीधी रेखा प्राप्त होती है जैसा कि चित्रा 11ण्5 में दशार्या गया है।आपतित विकिरण की आवृिा ग्राप़फ यह दशार्ता है कि ;पद्ध निरोधी विभव ट0 एक दिए हुए प्रकाश - संवेदी पदाथर् केचित्रा 11ण्5 एक दिए हुए प्रकाश संवेदी पदाथर् के लिए लिए, आपतित विकिरण की आवृिा के साथ रैख्िाकतःआपतित विकिरण की आवृिा ν के साथ निरोध्ी विभव ट0 का परिवतिर्त होता है।परिवतर्न। ;पपद्ध एक निश्िचत निम्नतम अंतक आवृिा ν0 होती है जिसके लिए निरोधी विभव शून्य होता है। इन प्रेक्षणों में दो तथ्य अंतनिर्हित हैं: ;पद्ध प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम गतिज ऊजार् आपतित विकिरण की आवृिा के साथ रैख्िाकतः परिवतिर्त होती है जबकि यह इसकी तीव्रता पर निभर्र नहीं होती। ;पपद्ध आपतित विकिरण की आवृिा ν के लिए, जबकि इसका मान अंतक आवृिा ν0 से कम है, कोइर् प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न संभव नहीं है ;तीव्रता अिाक होने की स्िथति में भीद्ध। इस न्यूनतम अंतक आवृिा ν0 को देहली आवृिा कहते हैं। यह भ्िान्न धातुओं के लिए भ्िान्न होती है। भ्िान्न प्रकाश - संवेदी पदाथर् प्रकाश के लिए विभ्िान्न अनुियाएँ दशार्ते हैं। सेलिनियम, ¯जक अथवा काॅपर की तुलना में अध्िक संवेदी है। एक ही प्रकाश - संवेदी पदाथर् विभ्िान्न तरंगदैघ्यर् के प्रकाश के लिए भ्िान्न अनुिया दशार्ता है। उदाहरण के लिए, काॅपर में पराबैंगनी प्रकाश से प्रकाश - विद्युत प्रभाव होता है जबकि हरे अथवा लाल रंग के प्रकाश से यह प्रभाव नहीं होता। ध्यान दें कि ऊपर के सभी प्रयोगों में यह पाया गया है कि यदि आपतित विकिरण की आवृिा देहली आवृिा से अिाक हो जाती है तो बिना किसी काल - पश्चता के तत्काल प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न प्रारंभ हो जाता है, तब भी जब आपतित विकिरण बहुत मंद हो। अब यह ज्ञात है कि 10दृ 9े की कोटि के या इससे कम समय में उत्सजर्न प्रारंभ हो जाता है। अब हम इस अनुभाग में वणर्न किए गए प्रायोगिक लक्षणों एवं प्रेक्षणों का यहाँ सारांश देंगे: ;पद्ध किसी दिए गए प्रकाश - संवेदी पदाथर् और आपतित विकिरण की आवृिा ;देहली आवृिा से अिाकद्ध के लिए, प्रकाश - विद्युत धारा आपतित प्रकाश की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है ;चित्रा 11ण्2द्ध। ;पपद्ध किसी दिए गए प्रकाश - संवेदी पदाथर् और आपतित विकिरण की आवृिा के लिए, संतृप्त धारा आपतित विकिरण की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती पाइर् जाती है जबकि निरोधी विभव तीव्रता पर निभर्र नहीं होता है ;चित्रा 11ण्3द्ध। ;पपपद्ध किसी दिए गए प्रकाश - संवेदी पदाथर् के लिए, एक निश्िचत न्यूनतम अंतक - आवृिा होती है जिसे देहली आवृिा कहते हैं, जिसके नीचे प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों का कोइर् उत्सजर्न नहीं होता चाहे आपतित प्रकाश कितना भी तीव्र क्यों न हो। देहली आवृिा के ऊपर, निरोधी विभव अथवा तुल्यतः उत्सजिर्त प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम गतिज ऊजार् आपतित विकिरण की आवृिा के साथ रैख्िाकतः बढ़ती है परंतु यह इसकी तीव्रता से स्वतंत्रा होती है ;चित्रा 11ण्5द्ध। ;पअद्ध प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न बिना किसी काल - पश्चता के ;∼10दृ 9े अथवा कमद्ध एक तात्क्षण्िाक प्रिया है, तब भी जब आपतित विकिरण को अत्यिाक मंद कर दिया जाता है। 11ण्5 प्रकाश - विद्युत प्रभाव तथा प्रकाश का तरंग सि(ांत प्रकाश की तरंग प्रकृति उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक अच्छी तरह स्थापित हो गइर् थी। प्रकाश के तरंग - चित्रा के द्वारा व्यतिकरण, विवतर्न तथा धु्रवण की घटनाओं की स्वाभाविक एवं संतोषजनक रूप में व्याख्या की जा चुकी थी। इस चित्रा के अनुसार, प्रकाश एक वैद्युतचुंबकीय तरंग है, जो विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्रा से मिलकर बनी होती है तथा जिस आकाशीय क्षेत्रा में पैफली होती है, वहाँ ऊजार् का संतत वितरण होता है। अब हम यह देखेंगे कि क्या प्रकाश का यह तरंग - चित्राण पिछले अनुभाग में दिए गए प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न संबंधी प्रेक्षणों की व्याख्या कर सकता है। प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न के तरंग - चित्राण के अनुसार धातु के पृष्ठ ;जहाँ विकिरण की किरण - पुंज पड़ती हैद्ध पर स्वतंत्रा इलेक्ट्राॅन विकिरित ऊजार् को संतत रूप में अवशोष्िात करते हैं। जितनी अिाक प्रकाश की तीव्रता होगी उतने ही अिाक वैद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों के आयाम होंगे। परिणामस्वरूप, तीव्रता जितनी अिाक होगी उतना ही अिाक प्रत्येक इलेक्ट्राॅन के द्वारा ऊजार् - अवशोषण होना चाहिए। इस चित्राण के अनुसार, प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन की उच्चतम गतिज ऊजार् तीव्रता में वृि के साथ बढ़नी चाहिए। साथ ही, चाहे प्रकाश की आवृिा वुफछ भी हो, एक पयार्प्त तीव्र विकिरण किरण - पुंज ;पयार्प्त समय मेंद्ध इलेक्ट्राॅनों को इतनी पयार्प्त ऊजार् देने में समथर् होगा जो इनके धातु - पृष्ठ से बाहर निकलने के लिए आवश्यक निम्नतम ऊजार् से अिाक होगी। इसलिए, एक देहली आवृिा का अस्ितत्व नहीं होना चाहिए। तरंग सि(ांत की इन प्रागुक्ितयों से अनुभाग 11ण्4ण्3 में दिए गए प्रेक्षणों ;पद्धए ;पपद्ध तथा ;पपपद्ध का सीधे विरोध होता है। आगे हमें ध्यान रखना होगा कि तरंग - चित्राण में, इलेक्ट्राॅन द्वारा ऊजार् का संतत अवशोषण विकिरण के पूरे तरंगाग्र पर होता है। चूँकि एक बड़ी संख्या में इलेक्ट्राॅन ऊजार् अवशोष्िात करते हैं, अतः प्रति इलेक्ट्राॅन प्रति इकाइर् समय में अवशोष्िात ऊजार् बहुत कम होगी। स्पष्ट गणना से यह आकलन किया जा सकता है कि एकल इलेक्ट्राॅन के लिए कायर् - पफलन को पार कर धातु से बाहर निकल आने के लिए पयार्प्त ऊजार् जुटाने में कइर् घंटे अथवा और भी अिाक समय लग सकता है। यह निष्कषर् भी प्रेक्षण ;पअद्धए जिसके अनुसार प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न ;लगभगद्ध तात्क्षण्िाक होता है, के बिलवुफल विपरीत है। संक्षेप में, तरंग - चित्राण के द्वारा प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न के अत्यंत मूल लक्षणों की व्याख्या नहीं हो सकती। 11ण्6 आइंस्टाइन का प्रकाश - विद्युत समीकरण: विकिरण का ऊजार् क्वांटम सन्् 1905 में अल्बटर् आइंसटाइन ;1879 दृ 1955द्ध ने प्रकाश - विद्युत प्रभाव की व्याख्या के लिए वैद्युतचुंबकीय विकिरण का एक मौलिक रूप से नया चित्राण प्रस्तावित किया। इस चित्राण में, प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न विकिरण से संतत ऊजार् - अवशोषण के द्वारा नहीं होता। विकिरण ऊजार् विविक्त इकाइयों से बनी होती है - जो विकिरण की ऊजार् के क्वांटा कहलाते हैं। विकिरण ऊजार् के प्रत्येक क्वांटम की ऊजार् ीν होती है, जहाँ ी प्लांक स्िथरांक है और ν प्रकाश की आवृिा। प्रकाश - विद्युत प्रभाव में, एक इलेक्ट्राॅन विकिरण के एक क्वांटम की ऊजार् ;ीνद्ध अवशोष्िात करता है। यदि ऊजार् का यह अवशोष्िात क्वांटम इलेक्ट्राॅन के लिए धातु की सतह से बाहर निकल आने 395 भौतिकी अल्बटर् आइंस्टाइन ;1879 दृ 1955द्ध सन् 1879 में जमर्नी में उल्म नामक स्थान पर जन्मे अल्बटर् आइंसटाइन आज तक के विश्व के भौतिकविदों में सवार्ध्िक महान भौतिकविद के रूप में जाने जाते हंै। उनका विस्मयकारी वैज्ञानिक जीवन उनके सन् 1905 में प्रकाश्िात तीन क्रांतिकारी शोध्पत्रों से आरंभ हुआ। उन्होंने अपने प्रथम शोध्पत्रा में प्रकाश क्वांटा ;अब प़फोटाॅन कहा जाता हैद्ध की धरणा को प्रस्तुत किया और प्रकाश - वैद्युत प्रभाव के उस लक्षण की व्याख्या की जिसे विकिरण का चिरप्रतिष्िठत तरंग सि(ांत नहीं समझा सका। अपने दूसरे शोध्पत्रा में उन्होंने ब्राउनी गति का सि(ांत विकसित किया जिसकी वुफछ वषो± बाद प्रयोगात्मक पुष्िट हुइर् और जिसने द्रव्य के आण्िवक चित्राण का विश्वासोत्पादक साक्ष्य उपलब्ध् कराया। उनके तृतीय शोध्पत्रा ने आपेक्ष्िाकता के विश्िाष्ट सि(ांत को जन्म दिया। सन् 1916 में उन्होंने आपेक्ष्िाकता के व्यापक सि(ांत को प्रकाश्िात किया। आइंस्टाइन के वुफछ अन्य महत्वपूणर् योगदान हैं: उद्दीपित उत्सजर्न की धरणा जो प्लांक कृष्िणका विकिरण नियम के एक वैकल्िपक व्युत्पन्न में प्रस्तुत की गइर् है, विश्व का स्थैतिक प्रतिरूप जिसने आध्ुनिक ब्र“मांडिकी का आरंभ किया, किसी गैस के स्थूल बोसाॅन की क्वांटम - सांख्ियकी तथा क्वांटम - यांत्रिाकी की संस्थापना का आलोचनात्मक विश्लेषण। सै(ांतिक भौतिकी में उनके योगदान तथा प्रकाश - विद्युत प्रभाव के लिए 1921 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। के लिए निम्नतम आवश्यक ऊजार् से अिाक होता है ;कायर् - पफलन, φ0द्ध तब उत्सजिर्त इलेक्ट्राॅन की अध्िकतम गतिज ऊजार् होगी: ज्ञउच्च त्र ीν दृ φ0 ;11ण्2द्ध अध्िक दृढ़ता से आब( इलेक्ट्राॅनों के उत्स£जत होने पर उनकी गतिज ऊजार् अपने अध्िकतम मान से कम होती है। ध्यान दें कि किसी आवृिा के प्रकाश की तीव्रता, प्रति सेवंफड आपतित प़फोटाॅनों की संख्या द्वारा निधर्रित होती है। तीव्रता बढ़ाने पर प्रति सेवंफड उत्स£जत इलेक्ट्राॅनों की संख्या बढ़ती है। तथापि, उत्स£जत प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की अध्िकतम गतिज ऊजार् प्रत्येक प़फोटाॅन की ऊजार् द्वारा निधर्रित होती है। समीकरण ;11ण्2द्ध को आइंस्टाइन का प्रकाश - विद्युत समीकरण कहते हैं। अब हम यह देख सकते हैं कि किस प्रकार यह समीकरण अनुभाग 11ण्4ण्3 में दिए प्रकाश - विद्युत प्रभाव से संबंिात सभी प्रेक्षणों को एक सरल एवं परिष्कृत ढंग से प्रस्तुत करता है। ऽ समीकरण ;11ण्2द्ध के अनुसार, प्रेक्षण के अनुरूप, ज्ञउच्च आवृिा ν पर रैख्िाकतः निभर्र करती है और विकिरण की तीव्रता पर निभर्र नहीं करती है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि आइंस्टाइन के चित्राण में, प्रकाश - विद्युत प्रभाव एकल इलेक्ट्राॅन द्वारा विकिरण के एकल क्वांटम के अवशोषण से उत्पन्न होता है। विकिरण की तीव्रता ;जो ऊजार् क्वांटमों की संख्या प्रति इकाइर् क्षेत्रापफल प्रति इकाइर् समय के अनुक्रमानुपाती हैद्ध इस मूल प्रिया के लिए असंगत है। ऽ क्योंकि ज्ञउच्च )ण राश्िा नहीं होगी, समीकरण ;11ण्2द्ध में यह अंतनिर्हित है कि प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न तभी संभव है जब ी ν झ φ0 अथवा ν झ ν0ए जहाँ φ ν0 त्र 0 ;11ण्3द्धी समीकरण ;11ण्3द्ध के अनुसार, कायर् - पफलन φ0 के अध्िक मान के लिए, प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन उत्स£जत करने के लिए आवश्यक न्यूनतम अथवा देहली आवृिा ν0 का मान अध्िक होगा। इस प्रकार, एक देहली आवृिा ν0 ;त्र φ0ध्ीद्ध अस्ितत्व में होती है जिससे कम आवृिा पर कोइर् प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न संभव नहीं है, चाहे विकिरण की तीव्रता वुफछ भी क्यों न हो अथवा वह पृष्ठ पर कितनी भी देर क्यों न पड़े। ऽ इस चित्राण में, विकिरण की तीव्रता, जैसा ऊपर परिलक्ष्िात है, ऊजार् क्वांटा की संख्या प्रति इकाइर् क्षेत्रापफल प्रति इकाइर् समय के अनुक्रमानुपाती होती है। जितनी अिाक संख्या में ऊजार् क्वांटा उपलब्ध होंगे, उतनी ही अिाक संख्या में इलेक्ट्राॅन ऊजार् क्वांटा का अवशोषण करेंगे और इसलिए ;ν झ ν0 के लिएद्ध धातु से बाहर आने वाले इलेक्ट्राॅनों की संख्या उतनी ही अिाक होगी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि क्यों ν झ ν0 के लिए प्रकाश - विद्युत धारा तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है। ऽ आइंस्टाइन के चित्राण में, प्रकाश - विद्युत प्रभाव में एक इलेक्ट्राॅन के द्वारा प्रकाश के एक क्वांटम का अवशोषण मूल प्राथमिक प्रिया होती है। यह प्रिया तात्क्षण्िाक होती है। इस प्रकार, तीव्रता अथार्त विकिरण क्वांटा की संख्या चाहे जितनी भी हो, प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न तात्क्षण्िाक ही होगा। कम तीव्रता से उत्सजर्न में विलंब नहीं होगा क्योंकि मूल प्राथमिक प्रिया वही रहेगी। तीव्रता से केवल यह निधार्रित होता है कि कितने इलेक्ट्राॅन इस प्राथमिक प्रिया ;एक एकल इलेक्ट्राॅन द्वारा एक प्रकाश क्वांटम का अवशोषणद्ध में भाग ले सकने वाले इलेक्ट्राॅनों की संख्या से ही प्रकाश - विद्युत धरा के परिमाण का निधर्रण होता है। समीकरण ;11ण्1द्ध का उपयोग कर, प्रकाश - विद्युत समीकरण ;11ण्2द्ध को इस प्रकार लिखा जा सकता है मट0 त्र ी ν दृ φ 0 य के लिए ν ≥ν0 अथवा ट0 त्र ी ν−φ0 ;11ण्4द्ध मम यह एक महत्वपूणर् परिणाम है। इससे यह प्रागुक्ित होती है कि ट0 के विरु( ν का वक्र एक सरल रेखा है, जिसका ढलान त्र ;ीध्मद्धए जो कि पदाथर् की प्रवृफति पर निभर्र नहीं करता। 1906 - 1916 के मध्य, मिलिकन ने आइंस्टाइन के प्रकाश - विद्युत समीकरण को असत्यापित करने के लिए प्रकाश - वैद्युत प्रभाव पर प्रयोगों की शृंखला की। चित्रा 11.5 में दशार्ए अनुसार, उसने सोडियम के लिए प्राप्त सरल रेखा का ढलान मापा। म के ज्ञात मान का उपयोग कर उसने प्लांक स्िथरांक ी का मान निधार्रित किया था। यह मान प्लांक स्िथरांक के उस मान ;त्र 6ण्626 × 10दृ 34श्र ेद्ध के निकट था जिसे बिलवुफल ही भ्िान्न संदभर् में ज्ञात किया गया था। इस प्रकार से 1916 में मिलिकन ने आइंस्टाइन के प्रकाश - विद्युत समीकरण को असत्यापित करने के स्थान पर उसकी सत्यता को स्थापित किया। प्रकाश क्वांटा की परिकल्पना एवं ी तथा φ 0 के मान ;जो अन्य प्रयोगों से प्राप्त मान से मेल रखते हैंद्ध के निधार्रण के उपयोग से प्रकाश - विद्युत प्रभाव के आइंस्टाइन के चित्राण को स्वीकारा गया। मिलिकन ने प्रकाश - विद्युत समीकरण को बड़ी परिशु(ता से कइर् क्षारीय धातुओं के लिए विकिरण - आवृिायों के विस्तृत परास के लिए सत्यापित किया। 11ण्7 प्रकाश की कणीय प्रवृफति: प़्ाफोटाॅन प्रकाश - विद्युत प्रभाव ने इस विलक्षण तथ्य को प्रमाण्िात किया कि प्रकाश किसी द्रव्य के साथ अन्योन्य िया में इस प्रकार व्यवहार करता है जैसे यह क्वांटा अथवा ऊजार् के पैकेट ;जिनमें प्रत्येक की ऊजार् ी ν हैद्ध का बना हो। क्या प्रकाश ऊजार् के क्वांटम को किसी कण से संब( किया जा सकता है? आइंसटाइन एक महत्वपूणर् परिणाम पर पहुँचे कि प्रकाश क्वांटम को संवेग ;ी νध्बद्ध से संब( किया जा सकता है। ऊजार् के साथ - साथ संवेग का निश्िचत मान इसका प्रबल सूचक है कि प्रकाश क्वांटम को कण से संब( किया जा सकता है। इस कण को बाद में प़फोटाॅन नाम दिया गया। प्रकाश के कण जैसे व्यवहार को ए. एच. कांपटन ;1892.1962द्ध के इलेक्ट्राॅन के द्वारा ग्.किरणों के प्रकीणर्न के प्रयोग से सन् 1924 में पुनः पुष्ट किया गया। सै(ांतिक भौतिकी में योगदान तथा प्रकाश - विद्युत प्रभाव के अपने कायर् के लिए आइंस्टाइन को 1921 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। विद्युत के मूल आवेश तथा प्रकाश - विद्युत प्रभाव पर किए गए कायर् के लिए सन् 1923 में मिलिकन को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। हम वैद्युतचुंबकीय विकिरण के प़फोटाॅन चित्राण का सारांश निम्नानुसार दे सकते हैं: 397 भौतिकी ;पद्ध विकिरण के द्रव्य के साथ अन्योन्य िया में, विकिरण इस प्रकार व्यवहार करता है मानो यह ऐसे कणों से बना हो जिन्हें प़फोटाॅन कहते हैं। ;पपद्ध प्रत्येक प़फोटाॅन की ऊजार् म् ;त्रीνद्ध होती है और संवेग च ;त्र ी νध्बद्ध तथा चाल ब होती है। जहाँ ब प्रकाश की चाल है। ;पपपद्ध एक निश्िचत आवृिा νए अथवा तरंगदैघ्यर् λए के सभी प़फोटाॅनों की ऊजार् म् ;त्रीν त्र ीबध्λद्ध और संवेग च ;त्र ीνध्बत्र ीध्λद्धए एकसमान होते हैं ;विकिरण की तीव्रता चाहे जो भी होद्ध। किसी दी गइर् तरंगदैघ्यर् के प्रकाश की तीव्रता बढ़ाने पर केवल किसी दिए गए क्षेत्रा से गुशरने वाले प्रति सेवंफड पफोटाॅनों की संख्या ही बढ़ती है ;सभी पफोटाॅनों की ऊजार् एकसमान होती हैद्ध। अतः प़फोटाॅन की ऊजार् विकिरण की तीव्रता पर निभर्र नहीं करती। ;पअद्ध प़फोटाॅन विद्युत उदासीन होते हैं और विद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों के द्वारा विक्षेपित नहीं होते। ;अद्ध प़फोटाॅन - कण संघट्टð ;जैसे कि पफोटाॅन - इलेक्ट्राॅन संघट्टðद्ध में वुफल ऊजार् तथा वुफल संवेग संरक्ष्िात रहते हैं। तथापि, किसी संघट्टð में प़फोटाॅनों की संख्या भी संरक्ष्िात नहीं रह सकती है। प़फोटाॅन अवशोष्िात हो सकता है अथवा एक नया प़फोटाॅन सृजित हो सकता है। उदाहरण 11ण्1 6ण्0 ×1014 भ््र आवृिा का एकवणीर् प्रकाश किसी लेसर के द्वारा उत्पन्न किया जाता है। उत्सजर्न क्षमता 2ण्0 ×10दृ3 ॅ है। ;ंद्ध प्रकाश किरण - पुंज में किसी प़फोटाॅन की ऊजार् कितनी है? ;इद्ध स्रोत के द्वारा औसत तौर पर प्रति सेवंफड कितने प़फोटाॅन उत्स£जत होते हैं? हल ;ंद्ध प्रत्येक प़फोटाॅन की ऊजार् होगी म् त्र ी ν त्र ; 6ण्63 ×10दृ34 श्र ेद्ध ;6ण्0 ×1014 भ््रद्ध त्र 3ण्98 × 10दृ19 श्र ;इद्ध यदि ड्डोत के द्वारा प्रति सेवंफड उत्सजिर्त प़फोटाॅनों की संख्या छ है तो किरण - पुंज में संचरित क्षमता च् प्रति प़फोटाॅन ऊजार् म् के छ गुना होगी जिससे कि च् त्र छ म् । तब च् 2ण्0 ×10−3ॅ छ त्र त्र म् 3ण्98 ×10−19 श्र त्र 5ण्0 ×1015 प़फोटाॅन प्रति सेवंफड उदाहरण 11ण्2 यदि सीिायम का कायर् - पफलन 2ण्14 मट है तो परिकलन कीजिए: ;ंद्ध सीिायम की देहली आवृिा तथा ;इद्ध आपतित प्रकाश का तरंगदैघ्यर्, यदि प्रकाश्िाक धारा को 0ण्60 ट का एक निरोधी विभव लगाकर शून्य किया जाए। हल ;ंद्ध अंतक अथवा देहली आवृिा के लिए, आपतित विकिरण की ऊजार् ी ν0 कायर् पफलन φ0 के समान होती है। अतः φ 2ण्14मट ν0 त्र 0 त्र ी 6ण्63 ×10 −34 श्रे 2ण्14 ×1ण्6 ×10 −19 श्र त्र त्र 5ण्16 ×10 14 भ््र 6ण्63 ×10 −34 श्र े इस प्रकार ν0 त्र 5ण्16 × 1014 भ््र से कम आवृिायों के लिए, कोइर् प्रकाश्िाकइलेक्ट्राॅन मुक्त नहीं होता है। ;इद्ध उत्सजिर्त प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम गतिज ऊजार् मट0 स्िथतिज ऊजार् ;मंदन - विभव ट0 के द्वाराद्ध के समान होने की स्िथति में प्रकाश्िाक धारा शून्य हो जाती है। आइंस्टाइन का प्रकाश - विद्युत समीकरण निम्न है: ीब मट0 त्र ीν दृ φ 0त्र दृ φ 0λअथवा λ त्र ीबध्;मटव ़ φ0द्ध −34 8;6ण्63 × 10 श्रेद्ध × ;3 × 10 उध्ेद्ध त्र ;0ण्60मट ़ 2ण्14मटद्ध 19ण्89 ×10 −26 श्र उ त्र ;2ण्74मटद्ध 19ण्89 × 10 −26 श्र उ λत्र त्र 454 दउ 2ण्74 × 1ण्6 × 10 −19 श्र उदाहरण 11ण्3 दृश्य क्षेत्रा में बैंगनी रंग, पीले - हरे रंग तथा लाल रंग के प्रकाश की तरंगदैघ्यर् क्रमशः लगभग 390 दउए लगभग 550 दउ ;औसत तरंगदैघ्यर्द्ध तथा लगभग 760 दउ है। ;ंद्ध दृश्य क्षेत्रा के निम्न प्रकाश के लिए प़फोटाॅन की ऊजार् ;मटद्ध क्या होगीः ;पद्ध बैंगनी सिराऋ ;पपद्ध पीले - हरे रंग की औसत तरंगदैघ्यर्ऋ तथा ;पपपद्ध लाल सिरा ;ी त्र 6ण्63×10दृ34 श्र े तथा 1 मट त्र 1ण्6×10 दृ19श्रद्ध ;इद्ध प्रकाश - संवेदी पदाथो± के लिए सारणी 11ण्1 में दिए गए कायर् - पफलनों के मान तथा ;ंद्ध प्रश्न के ;पद्धए ;पपद्ध तथा ;पपपद्ध भागों के परिणामों को उपयोग में लाते हुए क्या आप दृश्य प्रकाश के साथ कायर् कर सकने वाली प्रकाश विद्युत युक्ित का सृजन कर सकते हैं? हल ;ंद्ध आपतित प़फोटाॅन की ऊजार् म् त्र ीν त्र ीबध्λ म्त्र ;6ण्63×10दृ34श्र ेद्ध ;3×108 उध्ेद्धध्λ 1ण्989 ×10 दृ25 श्रउ त्र λ ;पद्ध बैंगनी प्रकाश के लिए λ1 त्र 390 दउ ;निम्न तरंगदैघ्यर् सिराद्ध 1ण्989 × 10 दृ25 श्र उ आपतित प़फोटाॅन ऊजार्, म्1 त्र दृ9 390×10 उ त्र 5ण्10 × 10दृ19श्र 5ण्10 10 दृ19 श्र त्र 1ण्6×10 दृ19 श्रध्मट त्र 3ण्19 मट ;पपद्ध पीले - हरे प्रकाश के लिए, λ2 त्र 550 दउ ;औसत तरंगदैघ्यर्द्ध 1ण्989 × 10 दृ25 श्र उ आपतित प़फोटाॅन ऊजार्, म्2 त्र दृ9 550×10 उ त्र 3ण्62×10दृ19 श्र त्र 2ण्26 मट ;पपपद्ध लाल प्रकाश के लिए, λ3 त्र 760 दउ ;उच्च तरंगदैघ्यर् सिराद्ध 1ण्989 ×10 दृ25 श्र उ आपतित प़फोटाॅन ऊजार्, म्3 त्र दृ9 760×10 उ त्र 2ण्62×10दृ19 श्र त्र 1ण्64 मट ;इद्ध किसी प्रकाश - विद्युत युक्ित के कायर् के लिए आपतित प्रकाश ऊजार् म् का मान प्रयुक्त पदाथर् के कायर् - पफलन के मान के समान या अध्िक होना चाहिए। अतः बैंगनी प्रकाश ;म् त्र 3ण्19 मटद्ध के लिए कायर् कर सकने वाली प्रकाश - विद्युत युक्ित के प्रकाश - संवेदी पदाथर्, छं ;कायर् पफलन φ0 त्र 2ण्75 मटद्धए ज्ञ ;कायर् - पफलन φ0 त्र 2ण्30 मटद्ध तथा ब्े ;कायर् - पफलन φ0 त्र 2ण्14 मटद्ध हो सकते हैं। यह युक्ित पीले - हरे प्रकाश ;म् त्र 2ण्26 मटद्ध के लिए प्रकाश - संवेदी पदाथर् ब्े ;कायर् - पफलन φ0 त्र 2ण्14 मटद्धए के उपयोग से ही कायर् कर सकती है। तथापि, यह युक्ित लाल प्रकाश ;म् त्र 1ण्64 मटद्ध के लिए उपरोक्त तीनों में से किसी प्रकाश - संवेदी पदाथर् के उपयोग से कायर् नहीं कर सकेगी। 399 भौतिकी 11ण्8 द्रव्य की तरंग प्रवृफति प्रकाश ;व्यापक तौर पर वैद्युतचुंबकीय विकिरणद्ध की द्वैत प्रकृति ;तरंग - कणद्ध, वतर्मान तथा पूवर् अध्यायों में किए गए अध्ययन द्वारा, स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। प्रकाश की तरंग प्रकृति व्यतिकरण, विवतर्न तथा धु्रवण की परिघटनाओं में दृष्िटगोचर होती है। दूसरी ओर, प्रकाश - विद्युत प्रभाव तथा काॅम्पटन प्रभाव जिनमें ऊजार् और संवेग का अंतरण होता है, विकिरण इस प्रकार व्यवहार करता है कि मानो यह कणों के गुच्छ अथार्त प़फोटाॅनों से बना हो। कण अथवा तरंग - चित्राण में से कौन किसी प्रयोग को समझने में सवार्िाक उपयुक्त है, यह प्रयोग की प्रकृति पर निभर्र है। उदाहरण के लिए, अपने नेत्रों से किसी वस्तु को देखने की सुपरिचित घटना में दोनों ही चित्राण महत्वपूणर् हैं। नेत्रा लेंस द्वारा प्रकाश को एकत्रा कर प़फोकस करने की प्रिया को तरंग - चित्राण से भली - भाँति विवेचित किया गया है। परंतु इसका शलाकाओं तथा शंवुफओं ;रेटिना केद्ध द्वारा अवशोषण में पफोटाॅन चित्राण की आवश्यकता होती है। एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि यदि विकिरण की द्वैत प्रकृति ;तरंग तथा कणद्ध है तो क्या प्रकृति के कण ;इलेक्ट्राॅन, प्रोटाॅन आदिद्ध भी तरंग - जैसा लक्षण प्रद£शत करते हैं? सन् 1924 में एक प्रफांसीसी भौतिकवैज्ञानिक लुइस विक्टर दे ब्राॅग्ली ;प्रेंफच उच्चारण में इसे लुइर् विक्टर दे ब्राए पुकारा जाता हैद्ध ;1892 दृ 1987द्ध ने एक निभीर्क परिकल्पना को प्रस्तुत किया कि पदाथर् के गतिमान कण उपयुक्त परिस्िथतियों में तरंग सदृश गुण प्रदश्िार्त कर सकते हैं। उसने यह तवर्फ दिया कि प्रकृति सममित है और दो मूल भौतिक सत्ताओं, द्रव्य एवं ऊजार्, का भी सममित लक्षण होना चाहिए। यदि विकिरण का द्वैत लक्षण है तो द्रव्य का भी होना चाहिए। दे ब्राॅग्ली ने प्रस्तावित किया कि संवेग च के कण के साथ जुड़ी तरंगदैघ्यर् λ निम्न प्रकार दशार्यी जा सकती है: ीी λ त्र त्र ;11ण्5द्ध च उअ जहाँ उ कण का द्रव्यमान तथा अ इसकी चाल है। समीकरण ;11ण्5द्ध को दे ब्राॅग्ली का संबंध और द्रव्य - तरंग के तरंगदैघ्यर् λ को दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् कहते हैं। द्रव्य का द्वैत स्वरूप दे ब्राॅग्ली के संबंध में स्पष्ट है। समीकरण ;11ण्5द्ध की बाईं ओर, λ तरंग का लक्षण है जबकि दाईं ओर संवेग च कण का विश्िाष्ट लक्षण है। प्लांक स्िथरांक ी दोनों लक्षणों को संयोजित करता है। समीकरण ;11ण्5द्ध एक पदाथर् - कण के लिए मूलतः एक परिकल्पना है जिसकी तवर्फसंगति केवल प्रयोग के द्वारा ही परखी जा सकती है। तथापि, यह देखना रोचक है कि यह एक प़फोटाॅन के द्वारा भी संतुष्ट होता है। एक प़फोटाॅन के लिए, जैसा कि हमने देखा है, च त्र ीν ध्ब ;11ण्6द्ध इसलिए, ीब त्र त्रλ ;11ण्7द्धच ν अथार्त, एक पफोटाॅन का दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् जो समीकरण ;11ण्5द्ध द्वारा दिया गया है उस वैद्युतचुंबकीय विकिरण के तरंगदैघ्यर् के समान होता है तथा पफोटाॅन विकिरण की ऊजार् तथा संवेग का एक क्वांटम है। स्पष्टतः समीकरण ;11ण्5द्ध के द्वारा, λ एक श्यादा भारी कण ;बड़ा उद्ध अथवा अिाक ऊजर्स्वी कण ;बड़े अद्ध के लिए छोटा होगा। उदाहरण के लिए, एक 0ण्12 ाह द्रव्यमान की गेंद जो 20 उ ेदृ1 की चाल से चल रही है, की दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् का सरलता से परिकलन किया जा सकता है। विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रवृफति प़्ाफोटो सेल पफोटो सेल ;प्रकाश सेलद्ध प्रकाश - विद्युत प्रभाव का एक श्िाल्प प्रौद्योगिकीय अनुप्रयोग है। यह एक ऐसी युक्ित है जो प्रकाश - ऊजार् ़को वैद्युत - ऊजार् में बदल देती है। इसे कभी - कभी विद्युत नेत्रा भी कहते हैं। एक प़्ाफोटो सेल में एक अधर् - बेलनाकार प्रकाश - संवेदी धातु पिðका ब् ;उत्सजर्कद्ध होती है और एक तार का पाश ;लूपद्ध । ;संग्राहकद्ध एक निवार्तित काँच या क्वाटर्श बल्ब में लगे होते हैं। इसे चित्रा में दशार्ए अनुसार किसी बाह्य परिपथ में एक उच्च - विभव बैटरी ठ तथा माइक्रोऐमीटर ; - ।द्ध के साथ संयोजित किया जाता है, कभी - कभी पिðका ब् के स्थान पर, प्रकाश - संवेदी पदाथर् ;बद्ध की एक पतली परत बल्ब की भीतरी सतह पर चिपका दी जाती है। बल्ब के एक भाग को सापफ छोड़ दिया जाता है जिससे कि प्रकाश़इसमें प्रवेश कर सके। जब उपयुक्त तरंगदैघ्यर् का प्रकाश उत्सजर्क ब् पर पड़ता है तो इलेक्ट्राॅन उत्सजिर्त होते हैं। ये प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन संग्राहक पर आकष्िार्त हो जाते हैं। किसी प्रकाश सेल से वुफछ माइक्रोऐम्िपयर की कोटि की प्रकाश्िाक धारा प्राप्त की जाती है। एक प्रकाश सेल प्रदीप्त - तीव्रता में परिवतर्न कर प्रकाश्िाक धारा में परिवतर्न कर सकता है। यह धारा नियंत्राण तंत्रा के चालन और प्रकाश मापक युक्ितयों में उपयोग में लाइर् जा सकती है। अवरक्त विकिरण के लिए संवेदी लेड सल्प़फाइड के प्रकाश सेलों का उपयोग इलेक्ट्राॅनिक प्रज्वलन परिपथों में किया जाता है। वैज्ञानिक कायो± में, प्रकाश की तीव्रता को मापने के सभी अनुप्रयोगों में प्रकाश सेलों का उपयोग किया जाता है। प़फोटोग्रापफी वैफमरों में प्रकाश मापक प्रकाश सेल का उपयोग आपतित प्रकाश की तीव्रता मापने में करते हैं। स्वचालित द्वार नियंत्राक में प्रकाश सेल का प्रयोग द्वार - प्रकाश विद्युत परिपथ में होता है। द्वार की ओर बढ़ते हुए व्यक्ित द्वारा प्रकाश सेल पर पड़ने वाले प्रकाश पुंज बाध्ित हो सकते हैं। प्रकाश्िाक धरा में अचानक होने वाले बदलाव का उपयोग द्वार खोलने के लिए मोटर को प़्ाफोटो सेलप्रारंभ करने में या अलामर् बजाने में किया जा सकता है। इनका उपयोग उस गणना युक्ित के नियंत्राण में भी किया जाता है जो प्रकाश किरण - पुंज की प्रत्येक रुकावट, जो किरण - पुंज के पार किसी व्यक्ित अथवा वस्तु के जाने के कारण उत्पन्न होती है, को अंकित करता है। इसलिए, प्रकाश सेल किसी प्रेक्षागृह में प्रवेश करने वाले व्यक्ितयों की गणना करने में सहायता करता है, यदि वे विशाल कक्ष में एक - एक करके प्रवेश करते हों। इनका उपयोग यातायात नियम तोड़ने वालों की पहचान के लिए किया जाता है। जब भी विकिरण के एक किरण - पुंज को अवरोिात किया जाता है तो एक एलामर् बजाया जा सकता है। चोर एलामर् में, पराबैंगनी प्रकाश ;अदृश्यद्ध को संतत प्रवेश - द्वार पर स्थापित प्रकाश सेल पर डाला जाता है। कोइर् व्यक्ित जो द्वार में प्रवेश करता है वह प्रकाश सेल पर पड़ने वाले किरण - पुंज को अवरोिात करता है। प्रकाशक विद्युत - धारा में आकस्िमक परिवतर्न का उपयोग एक विद्युत घंटी के बजने से प्रारंभ किया जाता है। अग्िन - एलामर् में, भवन में उपयुक्त स्थानों पर कइर् प्रकाश सेल स्थापित कर दिए जाते हैं। आग लगने पर प्रकाश विकिरण प्रकाश सेल पर पड़ते हैं। इससे एक विद्युत घंटी अथवा एक भोंपू से होकर जाने वाला परिपथ पूणर् हो जाता है और यह एक चेतावनी - संकेत के रूप में कायर् करना प्रारंभ कर देता है। प्रकाश सेलों का उपयोग चल चित्राण में ध्वनि के पुनरुत्पादन तथा टेलीविशन वैफमरे में दृश्य के क्रमवीक्षण ;ेबंददपदहद्ध तथा टेलिविशन प्रसारण ;जमसमबंेजपदहद्ध में किया जाता है। इनका प्रयोग उद्योगों में धतु की चादरों में छोटी त्राुटियों तथा छिद्रों को खोजने में भी किया जाता है। च त्र उ अ त्र 0ण्12 ाह × 20 उ ेदृ1 त्र 2ण्40 ाह उ ेदृ1 ी 6ण्63 ×10 −34 श्र े λ त्र त्र −1 त्र 2ण्76 × 10दृ34 उ2ण्40ाह उे च401 भौतिकी यह तरंगदैघ्यर् इतनी छोटी है कि यह किसी मापन की सीमा से बाहर है। यही कारण है कि स्थूल वस्तुएँ हमारे दैनिक जीवन में तरंग - सदृश गुण नहीं दशार्तीं। दूसरी ओर, अव - परमाण्िवक डोमेन ;ैनइ.ंजवउपब कवउंपदद्ध में, कणों का तरंग लक्षण महत्वपूणर् है तथा मापने योग्य है। एक इलेक्ट्राॅन ;द्रव्यमान उए आवेश मद्ध जिसे विरामावस्था से एक विभव ट द्वारा त्वरित किया जाता है, का विचार करें। इलेक्ट्राॅन की गतिज ऊजार् ज्ञ इस पर विद्युत क्षेत्रा द्वारा किए गए कायर् ;ट मद्ध के बराबर होगी: ज्ञ त्र म ट ;11ण्8द्ध 1 च 2 यहाँ ज्ञ त्र 2 उ अ 2 त्र ए जिससे 2उच त्र ;11ण्9द्धलुइर्स विक्टर दे ब्राॅग्ली ;1892 दृ 1987द्ध प्रफांसीसी भौतिकविद, जिन्होंने तब इलेक्ट्राॅन का दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् λ होगा द्रव्य की तरंग प्रकृति का क्रांतिकारी ीी ी λ त्र त्र त्र ;11ण्10द्धविचार प्रस्तुत किया। यह विचार इरविन च 2 उज्ञ 2 उ मट श्रो¯डगर द्वारा क्वांटम - यांत्रिाकी के एक ीए उ तथा म के सांख्ियक मान को स्थानापन्न करने पर हम निम्न मानसंपूणर् सि(ांत के रूप में विकसित किया पाते हैंगया, जिसे सामान्यतः तरंग - यांत्रिाकी कहते हैं। इलेक्ट्राॅनों की तरंग प्रकृति की खोज 1ण्227 λत्र दउ ;11ण्11द्धके लिए इन्हें सन्् 1929 में नोबेल पुरस्कार ट से सम्मानित किया गया। जहाँ ट त्वरक विभव का वोल्ट में मान है। एक 120 ट त्वरक विभव के लिए, समीकरण ;11ण्11द्ध से λ त्र 0ण्112 दउ प्राप्त होता है। यह तरंगदैघ्यर् उसी कोटि की है जितनी दूरी िस्टलों में परमाण्वीय तलों के बीच होती है। इससे यह संकेत मिलता है कि एक इलेक्ट्राॅन से जुड़ी पदाथर् तरंग को ग्.किरण विवतर्न जैसे िस्टल विवतर्न प्रयोगों से परखा जा सकता है। हम अगले अनुभाग में दे ब्राॅग्ली की परिकल्पना के प्रायोगिक परीक्षण का वणर्न करेंगे। इलेक्ट्राॅन की तरंगीय प्रवृफति की खोज के लिए दे ब्राॅग्ली को 1929 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। द्रव्य - तरंग चित्राण ने हाइशनबगर् के अनिश्िचतता सि(ांत को परिष्कृत रूप में समाविष्ट किया। इस सि(ांत के अनुसार, एक ही समय पर किसी इलेक्ट्राॅन ;अथवा कोइर् और कणद्ध की स्िथति एवं संवेग दोनों को परिशु( रूप से मापना असंभव है। हमेशा ही वुफछ अनिश्िचतता ;Δगद्ध स्िथति के विनिदेर्श और वुफछ अनिश्िचतता ;Δचद्ध संवेग के विनिदेर्श में होती है। Δग तथा Δच के गुणनपफल की एक निम्नतर सीमा होती है, जो ħ’ ;जहाँ ħ त्र ीध्2πद्ध की कोटि की होती है, अथार्त् Δग Δच ≈ ħ ;11ण्12द्ध समीकरण ;11ण्12द्ध इस संभावना की अनुमति देता है कि Δग शून्य होऋ परंतु तब Δ च को अनंत होना चाहिए जिससे कि गुणनपफल शून्य न हो। इसी प्रकार यदि Δच शून्य होता है, तब Δग अनंत होगा। सामान्यतया, दोनों Δग तथा Δच शून्य नहीं होते जिससे कि उनका गुणनपफल ħ कोटि का हो। अब यदि एक इलेक्ट्राॅन निश्िचत संवेग च ; अथार्त Δच त्र 0द्ध हो, तब दे ब्राॅग्ली संबंध के द्वारा, ’ एक अिाक परिशु( विवेचन से Δग Δच ≥ ħध्2 प्राप्त होता है। इसका तरंगदैघ्यर् ;λद्ध निश्िचत होगा। एक निश्िचत ;एकलद्ध तरंगदैघ्यर् की तरंग का विस्तार संपूणर् स्थान में होता है। बाॅनर् की प्रायिकता व्याख्या से इसका अथर् यह हुआ कि इलेक्ट्राॅन स्थान के किसी निश्िचत क्षेत्रा में स्थानीयित नहीं होगा। अथार्त्, इसकी स्िथति अनिश्िचतता अनंत होगी ;Δग → ∞द्ध जो अनिश्िचतता के सि(ांत के साथ संगत है। सामान्यतः इलेक्ट्राॅन के साथ जुड़ी पदाथर् - तरंग संपूणर् आकाश में विस्तृत नहीं होती। यह एक तरंग - पैकेट के रूप में आकाश में एक निश्िचत क्षेत्रा में विस्तृत होता है। उस स्िथति में Δग अनंत नहीं होता है बल्िक तरंग - पैकेट के विस्तार पर निभर्र इसका कोइर् परिमित मान होता है। आपको यह भी जानना चाहिए कि परिमित विस्तार की किसी तरंग - पैकेट का तरंगदैघ्यर् एकल नहीं होता। यह किसी केंद्रीय तरंगदैघ्यर् के आसपास विस्तृत तरंगदैघ्यर् से बनी होती है। तब, दे ब्राॅग्ली के संबंध के द्वारा, इलेक्ट्राॅन के संवेग का भी एक विस्तार होगा - Δच की अनिश्िचतता। यह अनिश्िचतता के संबंध से अपेक्ष्िात है। गण्िातीय ढंग ;उपपिा छोड़ दी गइर् हैद्ध से यह दशार्या जा सकता है कि तरंग - पैकेट विवरण दे ब्राॅग्ली संबंध तथा बाॅनर् - प्रायिकता व्याख्या के साथ हाइजेनबगर् अनिश्िचतता - संबंध का परिशु( रूप में पुनरुत्पन्न करता है। अध्याय 12 में, दे ब्राॅग्ली संबंध को किसी परमाणु में इलेक्ट्राॅन के कोणीय संवेग के क्वांटमीकरण पर बोर की परिकल्पना की समथर्ता को दशार्ते हुए पाएँगे। चित्रा 11ण्6;ंद्ध में एक स्थानीयित तरंग - पैकेट तथा चित्रा 11ण्6;इद्ध में निश्िचत तरंगदैघ्यर् के लिए विस्तृत तरंग का व्यवस्था - चित्रा दशार्या गया है। चित्रा 11ण्6 ;ंद्ध एक इलेक्ट्राॅन का तरंग - पैकेट विवरण। किसी बिंदु के आयाम के वगर् को उस बिंदु पर इलेक्ट्राॅन की प्रायिकता घनत्व के साथ संबंिात किया गया है। तरंग - पैकेट किसी केंद्रीय तरंगदैघ्यर् के आसपास तरंगदैघ्यर् के विस्तार ;और इस प्रकार दे ब्राॅग्ली संबंध के द्वारा, संवेग के विस्तारद्ध के साथ मेल रखता है। परिणामतः, यह स्िथति में अनिश्िचतता ;Δगद्ध और संवेग में अनिश्िचतता ;Δचद्ध से जुड़ा है। ;इद्ध किसी इलेक्ट्राॅन के निश्िचत संवेग से मेल खाती द्रव्य - तरंग संपूणर् आकाश में विस्तृत होती है। इस उदाहरण में Δ च त्र 0 और Δ ग→∞। उदाहरण 11ण्4 ;ंद्ध एक इलेक्ट्राॅन जो 5ण्4×106 उध्े की चाल से गति कर रहा है, ;इद्ध 150 ह द्रव्यमान की एक गेंद जो 30ण्0 उध्े की चाल से गति कर रही है, से जुड़ी दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् क्या होगी? हल ;ंद्ध इलेक्ट्राॅन के लिए द्रव्यमान उ त्र 9ण्11 × 10दृ31 ाहए वेग अ त्र 5ण्4×106 उध्े तब संवेग च त्र उ अ त्र 9ण्11×10दृ31 ;ाहद्ध × 5ण्4 × 106 ;उध्ेद्धच त्र 4ण्92 × 10दृ24 ाह उध्े दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर्, λ त्र ीध्चदृ34 6 63 10 × श्रे ण् त्र 4 92 10 × दृ24 ाह उध्ेण् λ त्र 0ण्135 दउ ;इद्ध गेंद के लिए द्रव्यमान उश् त्र 0ण्150 ाहए वेग अश् त्र 30ण्0 उध्े तब संवेग चश् त्र उश् अश् त्र 0ण्150 ;ाहद्ध × 30ण्0 ;उध्ेद्ध चश् त्र 4ण्50 ाह उध्े दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् λश् त्र ीध्चश् 403 भौतिकी दृ34 ण् ×663 10 श्रे त्र 4 50 × ाह उ ध् े ण् λ श् त्र 1ण्47 ×10दृ34 उ इलेक्ट्राॅन के लिए दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् ग्.किरण तरंगदैघ्यर् के समान है। परंतु गेंद के लिए यह प्रोटाॅन के आकार के लगभग 10दृ19 गुना है जो प्रायोगिक मापन की सीमा के बिलवुफल बाहर है। उदाहरण 11ण्5 एक इलेक्ट्राॅन, एक α.कण तथा एक प्रोटाॅन की गतिज ऊजार् समान हैं। इनमें से किस कण की दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् न्यूनतम होगी? हल किसी कण के लिए, दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् λ त्र ीध्च है। 2गतिज ऊजार् ज्ञ त्र च ध्2उ अतःए λत्र ी ध्2उज्ञ समान गतिज ऊजार् ज्ञ के लिए किसी कण से संब( दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् उसके द्रव्यमान के वगर्मूल के व्युत्क्रमानुपाती है। प्रोटाॅन ;1भ्द्ध इलेक्ट्राॅन से 1836 गुना भारी है तथा α.कण ; 4भ्म द्ध प्रोटाॅन12 से चार गुना भारी है। अतः α दृ कण की दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् न्यूनतम होगी। उदाहरण 11ण्6 एक कण, इलेक्ट्राॅन की अपेक्षा तीन गुना अध्िक चाल से गति कर रहा है। इस कणकी दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् का इलेक्ट्राॅन की दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् से अनुपात 1ण्813 × 10दृ4 है। कणके द्रव्यमान का परिकलन कीजिए तथा कण को पहचानिए। हल गति करते हुए कण ;द्रव्यमान उ तथा वेग अद्ध की दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर्ीी λत्र त्र च उअ द्रव्यमान उ त्र ीध्λअ इलेक्ट्राॅन का द्रव्यमान उम त्र ीध्λ म अम हमें ज्ञात है कि अध्अम त्र 3 तथा λध्λ म त्र 1ण्813 × 10दृ4 λ अ कण का द्रव्यमान, उ त्र उमम म λ अ उ त्र ;9ण्11×10दृ31 ाहद्ध × ;1ध्3द्ध × ;1ध्1ण्813 × 10दृ4द्ध उ त्र 1ण्675 × 10दृ27 ाह इस द्रव्यमान का कण प्रोटाॅन या न्यूट्राॅन हो सकता है। उदाहरण 11ण्7 100 ट के विभवांतर द्वारा त्वरित किसी इलेक्ट्राॅन से संबंध्ित दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् का परिकलन कीजिए। हल त्वरक विभव ट त्र 100 ट दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् λ होगी 1227ण् λ त्र ी ध्च त्र दउ ट1ण्227 दउ त्र 0ण्123 दउ 100 इलेक्ट्राॅन से संबंध्ित दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् ग्.किरण तरंगदैघ्यो± की कोटि की है। λत्र 11ण्9 डेविसन तथा जमर्र प्रयोग इलेक्ट्राॅन की तरंग प्रकृति प्रायोगिक तौर पर सवर्प्रथम सी.जे. डेविसन तथा एल.एच. जमर्र के द्वारा 1927 में तथा स्वतंत्रा रूप से जी.पी. टाॅमसन के द्वारा 1928 में सत्यापित की गइर् थी। इन वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्राॅनों के किरण - पुंज का िस्टलों से प्रकीणर्न के द्वारा विवतर्न प्रभाव का प्रेक्षण किया था। सी.जे. डेविसन ;1881.1958द्ध और जी.पी. टाॅमसन ;1892.1975द्ध ने िस्टल के द्वारा इलेक्ट्राॅनों के विवतर्न की प्रायोगिक खोज के लिए 1937 में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। डेविसन तथा जमर्र की प्रायोगिक व्यवस्था चित्रा 11ण्7 में दशार्यी गइर् है। इसमें एक ‘इलेक्ट्राॅन गन’ होती है जो एक टंगस्टन तंतु थ् की बनी होती है, जिस पर बेरियम आॅक्साइड का लेप होता है। इसे कम विभव ;स्ण्ज्ण् बैटरीद्ध से गमर् किया जाता है। किसी उच्च वोल्टता ऊजार् स्रोत चित्रा 11ण्7 डेविसन - जमर्र इलेक्ट्राॅन विवतर्न व्यवस्था। 405भौतिकी इलेक्ट्राॅन - सूक्ष्मदशीर् का विकासीजजचरूध्ध्ूूूण्दवइमसचतप्रमण्वतहध्दवइमसऋचतप्रमेध्चीलेपबेध्संनतमंजमेध्1986ध्चतमेमदजंजपवद.ेचममबीण्ीजउस के अनुप्रयोग से तंतु द्वारा उत्स£जत इलेक्ट्राॅनों को ऐच्िछक वेग तक त्वरित किया जाता है। इन्हें एक बेलन जिसमें इसके अक्ष के समांतर पतले छिद्र होते हैं, से पारित करके एक पतले किरण - पुंज के रूप में समांतरित कर लिया जाता है। इस किरण - पुंज को एक निकिल िस्टल के पृष्ठ पर डाला जाता है। िस्टल के परमाणुओं के द्वारा इलेक्ट्राॅन सभी दिशाओं में प्रकीण्िार्त होते हैं। किसी दिशा में प्रकीण्िार्त इलेक्ट्राॅन किरण - पुंज की तीव्रता को इलेक्ट्राॅन संसूचक ;संग्राहकद्ध के द्वारा मापा जाता है। संसूचक को वृत्ताकार मापनी पर घुमाया जा सकता है और एक सुग्राही गैल्वेनोमीटर के साथ संयोजित कर दिया जाता है, जो धारा को अंकित करता है। गैल्वेनोमीटर में विक्षेप संग्राहक में प्रवेश करने वाले इलेक्ट्राॅन किरण - पुंज की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होता है। इस उपकरण को एक निवार्तित कोष्ठ में परिब( कर देते हैं। संसूचक को वृत्ताकार मापनी पर विभ्िान्न स्िथतियों में घुमाकर, प्रकीण्िार्त इलेक्ट्राॅन किरण - पुंज की तीव्रता को विभ्िान्न अक्षांश कोण के मान के लिए ;अथवा प्रकीणर्न के कोणद्ध θ को मापते हैं, जो कि आपतित और प्रकीण्िार्त इलेक्ट्राॅन किरण पुंजों के बीच का कोण होता है। प्रकीण्िार्त इलेक्ट्राॅनों की तीव्रता ;प् द्ध में प्रकीणर्न कोण θ के साथ परिवतर्न को विभ्िान्न त्वरण विभवों के लिए प्राप्त किया जाता है। त्वरक विभव के 44 ट से 68 ट के परास के लिए इस प्रयोग को संपन्न किया गया डेविसन - जमर्र प्रयोग के परिणामों को दशार्या गया है। यह पाया गया कि एक तीक्ष्ण विवतर्न उच्िचष्ठ के संगत एक प्रबल श्िाखर, त्वरक विभव 54 ट तथा प्रकीणर्न कोण θ त्र 50व पर इलेक्ट्राॅन वितरण में, प्रकट होती है। एक विश्िाष्ट दिशा में श्िाखर का यह प्रकटन िस्टल के परमाणुओं के समान अंतराल की परतों से इलेक्ट्राॅनों के संपोषी व्यतिकरण के कारण होता है। इलेक्ट्रॅान विवतर्न मापन से द्रव्य - तरंग का तरंगदैघ्यर् 0ण्165 दउ प्राप्त किया गया। दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् λ ¹समीकरण ;11ण्11द्ध के उपयोग सेह् ट त्र 54 ट के लिए इलेक्ट्राॅन का मान निम्न होगा: 1 227 ण्λ त्र ी ध्च त्र दउ ट 1 227 ण् λत्र दउ त्र 0ण्167 दउ 54 अतः दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् के सै(ांतिक तथा प्रयोग द्वारा प्राप्त मानों में उत्तम सहमति है। डेविसन - जमर्र प्रयोग इस प्रकार प्रभावशाली रूप से इलेक्ट्राॅनों की तरंग प्रकृति तथा दे ब्राॅग्ली संबंध की पुष्िट करता है। प्रकाश की तरंग.प्रकृति के लिए किए गए द्विझिरी प्रयोग के समरूप इलेक्ट्राॅन पुंज की तरंग - प्रकृति को सन्् 1989 में प्रायोगिक रूप से प्रदश्िार्त किया गया। सन् 1994 में भी आयोडीन अणुओं ;जो इलेक्ट्राॅनों की तुलना में लगभग दस लाख गुना भारी हैंद्ध के साथ व्यतिकरण ¯प्रफजें प्राप्त की जा चुकी हैं। दे ब्राॅग्ली की परिकल्पना आधुनिक क्वांटम यांत्रिाकी के विकास में आधार रही है। इसने इलेक्ट्राॅन - प्रकाश्िाकी विषय को भी विकसित किया है। इलेक्ट्राॅन के तरंगीय गुणों का उपयोग इलेक्ट्राॅन - सूक्ष्मदशीर् के निमार्ण में किया गया है, जो प्रकाश - सूक्ष्मदशीर् की तुलना में उच्चतर विभेदन के कारण एक बहुत बड़ा सुधार है। सारांश 1ण् किसी इलेक्ट्राॅन को धातु से बाहर निकालने के लिए न्यूनतम ऊजार् को धातु का कायर् - पफलन कहते हैं। धातु - पृष्ठ से इलेक्ट्राॅन - उत्सजर्न के लिए आवश्यक ऊजार् ;कायर् - पफलन φο से अिाकद्ध को उपयुक्त तापन अथवा प्रबल विद्युत क्षेत्रा अथवा उपयुक्त आवृिा के प्रकाश द्वारा विकिरित करने से दी जा सकती है। 2ण् प्रकाश.विद्युत प्रभाव धातुओं से उपयुक्त आवृिा के प्रकाश से प्रदीप्त करने पर इलेक्ट्राॅनों के उत्सजर्न की परिघटना है। वुफछ धातु पराबैंगनी प्रकाश से प्रतििया करते हैं जबकि दूसरे दृश्य - प्रकाश के लिए भी सुग्राही हैं। प्रकाश - विद्युत प्रभाव में प्रकाश ऊजार् का वैद्युत ऊजार् में रूपांतरण होता है। यह ऊजार् के संरक्षण के नियम का पालन करता है। प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न एक तात्क्षण्िाक प्रिया है और इसके वुफछ विश्िाष्ट लक्षण होते हैं। 3ण् प्रकाश - विद्युत धारा ;पद्ध आपतित प्रकाश की तीव्रता, ;पपद्ध दो इलेक्ट्रोडों के बीच लगाया गया विभवांतर, और ;पपपद्ध उत्सजर्क के पदाथर् की प्रकृति पर निभर्र करती है। 4ण् रोधक विभव ;ट वद्ध ;पद्ध आपतित प्रकाश की आवृिा और ;पपद्ध उत्सजर्क पदाथर् की प्रकृति पर निभर्र करता है। आपतित प्रकाश की किसी दी हुइर् आवृिा के लिए, यह इसकी तीव्रता पर निभर्र नहीं करता है। रोधक विभव का उत्सजिर्त इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम गतिज ऊजार् से संबंिात हैः1 2म ट त्र उ अ त्र ज्ञ02 उच्चउच्च 5ण् एक निश्िचत आवृिा ;देहली आवृिाद्ध ν 0 के नीचे जो धातु का अभ्िालक्षण है, कोइर् प्रकाश - विद्युत उत्सजिर्त नहीं होता चाहे आपतित प्रकाश की तीव्रता कितनी भी अध्िक क्यों न हो। 6ण् क्लासिकी तरंग - सि(ांत प्रकाश - विद्युत प्रभाव के मुख्य लक्षणों की व्याख्या नहीं कर सका। इसका विकिरण से ऊजार् का संतत अवशोषण का चित्राण ज्ञ उच्चकी तीव्रता से स्वतंत्राता, ν व के अस्ितत्व और इस प्रिया की तात्क्षण्िाक प्रकृति की व्याख्या नहीं कर सका। आइंस्टाइन ने इन लक्षणों की व्याख्या प्रकाश के प़फोटाॅन - चित्राण के आधार पर की। इसके अनुसार प्रकाश, उफजार् के विविक्त पैकेटों से बना है, जिन्हें क्वांटा अथवा प़फोटाॅन कहते हैं। प्रत्येक पफोटाॅन की ऊजार् म् ;त्र ी νद्ध और संवेग च ;त्र ीध्λद्ध होता है, जो कि आपतित प्रकाश की आवृिा ;ν द्ध पर निभर्र करते हैं परंतु इसकी तीव्रता पर निभर्र नहीं करते। धातु के पृष्ठ से प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न एक इलेक्ट्राॅन के द्वारा प़फोटाॅन के अवशोषण से होता है। ़7ण् आइंस्टाइन का प्रकाश.विद्युत समीकरण उफजार् संरक्षण नियम के संगत है जैसा कि धातु में एक 2इलेक्ट्राॅन के द्वारा पफोटाॅन अवशोषण में लागू होता है। उच्चतम गतिज उफजार् ;1 उ अउच्चद्ध2 प़फोटाॅन - उफजार् ;ीν द्ध तथा लक्ष्य धातु कायर् - पफलन φ0 ;त्र ीν 0 द्ध के अंतर के बराबर होती है। 1 उ अ2 त्र टम त्र ीν दृ φत्र ी ;ν दृ ν द्ध2 उच्च00 0 इस प्रकाश - विद्युत समीकरण से प्रकाश.विद्युत प्रभाव के सभी लक्षणों की व्याख्या होती है। मिलिकन के प्रथम परिशु( प्रकाश - विद्युत मापनों ने आइंस्टाइन के प्रकाश - विद्युत समीकरण को संपुष्ट किया और प्लैंक - स्िथरांक ;ीद्ध के यथाथर् मान को प्राप्त किया। इससे आइंस्टाइन द्वारा प्रवतिर्त वैद्युतचुंबकीय विकिरण का कण अथवा प़फोटाॅन वणर्न ;प्रकृतिद्ध स्वीकृत हुआ। 8ण् विकिरण की द्वैत प्रकृति होती है: तरंग तथा कण। प्रयोग के स्वरूप पर यह निधार्रित होता है कि तरंग अथवा कण के रूप में वणर्न प्रयोग के परिणाम को समझने के लिए सवार्िाक उपयुक्त है। इस तवर्फ के साथ कि विकिरण तथा पदाथर् प्रकृति में सममित हैं, लुइस दे ब्राॅग्ली के पदाथर् ;पदाथर् कणोंद्ध को तरंग जैसा लक्षण प्रदान किया। गतिमान पदाथर् - कणों से जुड़ी तरंगों को पदाथर् तरंग अथवा दे ब्राॅग्ली तरंग कहते हैं। 407 भौतिकी 9ण् गतिमान कण से संबंिात दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् ;λद्ध इसके संवेग च से इस प्रकार संबंिात है: λ त्र ीध्च । पदाथर् का द्वैत दे ब्राॅग्ली संबंध, जिसमें तरंग संकल्पना ;λद्ध और कण संकल्पना ;चद्ध सम्िमलित हैं, में अंतनिर्ष्ठ है। दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् पदाथर् - कण के आवेश तथा इसकी प्रकृति से स्वतंत्रा है। यह साथर्कताः केवल उप - परमाण्िवक कणों, जैसे - इलेक्ट्राॅन, प्रोटाॅन आदि ;इनके द्रव्यमान अथार्त संवेग की लघुता के कारणद्ध के लिए ही परिमेय ;िस्टलों में परमाण्वीय समतलों के बीच की दूरी की कोटि काद्ध है। तथापि यह वास्तव में उन स्थूल वस्तुओं के लिए जो सामान्यतः प्रतिदिन जीवन में मिलती हैं और मापन की सीमा के बिलवुफल बाहर है, बहुत छोटा है। 10ण् डेविसन - जमर्र के तथा जी. पी. टाॅमसन के द्वारा इलेक्ट्राॅन विवतर्न प्रयोगों तथा बाद के कइर् प्रयोगों ने इलेक्ट्राॅन की तरंग - प्रकृति को सत्यापित तथा पुष्ट किया है। पदाथर् तरंग की दे ब्राॅग्ली परिकल्पना, बोहर की स्थायी कक्षा की संकल्पना का समथर्न करती है। ी ख्डस्2 ज् दृ1, श्र े म् त्र ीν ट0 ख्डस्2 ज् दृ3।दृ1, ट म ट व त्र ज्ञ उच्च φ 0 ख्डस्2 ज् दृ2, श्रय मट ज्ञ उच्च त्र म् दृφ 0 ν 0 ख्ज् दृ1, भ््र ν 0 त्र φ 0 ध्ी λ ख्स्, उ λत्र ीध्च विचारणीय विषय 1ण् किसी धातु में मुक्त इलेक्ट्राॅन इस अथर् में मुक्त हैं कि वे धातु के भीतर एक स्िथर विभव के अंतगर्त गतिमान होते हैं ;यह केवल एक सन्िनकटन हैद्ध। वे धातु के बाहर निकलने के लिए मुक्त नहीं होते हैं। उन्हें धातु से बाहर जाने के लिए अतिरिक्त उफजार् की आवश्यकता होती है। 2ण् किसी धातु में सभी मुक्त इलेक्ट्राॅनों की उफजार् समान नहीं होती। किसी गैस जार में अणुओं के जैसे, एक दिए गए ताप पर इलेक्ट्राॅनों का एक निश्िचत ऊजार् वितरण होता है। यह वितरण उस सामान्य मैक्सवेल वितरण से भ्िान्न होता है जिसे आप गैसों के गतिज सि(ांत के अध्ययन में पढ़ चुके हैं। इसके विषय में आप बाद के पाठ्यक्रमों में जानेंगे, परंतु भ्िान्नता का संबंध इस तथ्य से है कि इलेक्ट्राॅन पाॅली के अपवजर्न के सि(ांत का अनुसरण करते हैं। 3ण् किसी धातु में मुक्त इलेक्ट्राॅनों के उफजार् वितरण के कारण, धातु से बाहर आने के लिए इलेक्ट्राॅन के द्वारा अपेक्ष्िात ऊजार् भ्िान्न इलेक्ट्राॅनों के लिए भ्िान्न होती है। उच्चतर ऊजार् वाले इलेक्ट्राॅनों की धातु से बाहर आने के लिए कम उफजार् वाले इलेक्ट्राॅनों की तुलना में कम अतिरिक्त उफजार् की आवश्यकता होती है। कायर् - पफलन धातु से बाहर निकलने के लिए किसी इलेक्ट्राॅन के द्वारा अपेक्ष्िात न्यूनतम उफजार् है। 4ण् प्रकाश - विद्युत प्रभाव से संबंिात प्रयोगों में केवल यही अंतनिर्हित है कि द्रव्य के साथ प्रकाश की अन्योन्य िया में उफजार् का अवशोषण ीν की विविक्त इकाइयों में होता है। यह बिलवुफल ही ऐसा कहने के समान नहीं है कि प्रकाश ऐसे कणों से बना है जिनमें प्रत्येक की उफजार् ीν है। 5ण् निरोधी विभव पर प्रेक्षण ;इसकी तीव्रता पर अनिभर्रता और आवृिा पर निभर्रताद्ध प्रकाश - विद्युत प्रभाव के तरंग - चित्राण और प़फोटाॅन - चित्राण के बीच निणार्यक विभेदकारक है। ी6ण् सूत्रा λत्र के द्वारा दिया गया पदाथर् - तरंग का तरंगदैघ्यर् का भौतिकीय महत्त्व है, इसके चकला - वेग अच का कोइर् भौतिकीय महत्त्व नहीं होता है। तथापि, पदाथर् - तरंग का समूह - वेग भौतिकतया अथर्पूणर् है और कण के वेग के बराबर होता है। अभ्यास 11ण्1 30 ाट इलेक्ट्राॅनों के द्वारा उत्पन्न ग्.किरणों की ;ंद्ध उच्चतम आवृिा तथा ;इद्ध निम्नतम तरंगदैघ्यर् प्राप्त कीजिए। 11ण्2 सीिायम धातु का कायर् - पफलन 2ण्14 मट है। जब 6 ×1014 भ््र आवृिा का प्रकाश धातु - पृष्ठ पर आपतित होता है, इलेक्ट्राॅनों का प्रकाश्िाक उत्सजर्न होता है। ;ंद्ध उत्सजिर्त इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम गतिज उफजार्, ;इद्ध निरोधी विभव, और ;बद्ध उत्सजिर्त प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम चाल कितनी है? 11ण्3 एक विश्िाष्ट प्रयोग में प्रकाश.विद्युत प्रभाव की अंतक वोल्टता 1ण्5 ट है। उत्सजिर्त प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों की उच्चतम गतिज ऊजार् कितनी है? 11ण्4 632ण्8 दउ तरंगदैघ्यर् का एकवणीर् प्रकाश एक हीलियम - नियाॅन लेसर के द्वारा उत्पन्न किया जाता है। उत्सजिर्त शक्ित 9ण्42 उॅ है। ;ंद्ध प्रकाश के किरण - पुंज में प्रत्येक प़फोटाॅन की उफजार् तथा संवेग प्राप्त कीजिए, ;इद्ध इस किरण - पुंज के द्वारा विकिरित किसी लक्ष्य पर औसतन कितने प़फोटाॅन प्रति सेवंफड पहुँचेंगे? ;यह मान लीजिए कि किरण - पुंज की अनुप्रस्थ काट एकसमान है जो लक्ष्य के क्षेत्रापफल से कम हैद्ध, तथा ;बद्ध एक हाइड्रोजन परमाणु को प़फोटाॅन के बराबर संवेग प्राप्त करने के लिए कितनी तेश चाल से चलना होगा? 11ण्5 पृथ्वी के पृष्ठ पर पहुँचने वाला सूयर् - प्रकाश का उफजार्.अभ्िावाह ;फ्रलक्सद्ध 1ण्388 × 103 ॅध्उ2 है। लगभग कितने प़फोटाॅन प्रति वगर् मीटर प्रति सेवंफड पृथ्वी पर आपतित होते हैं? यह मान लें कि सूयर् - प्रकाश में प़फोटाॅन का औसत तरंगदैघ्यर् 550 दउ है। 11ण्6 प्रकाश - विद्युत प्रभाव के एक प्रयोग में, प्रकाश आवृिा के विरु( अंतक वोल्टता की ढलान 4ण्12 × 10दृ15 ट े प्राप्त होती है। प्लांक स्िथरांक का मान परिकलित कीजिए। 11ण्7 एक 100 ॅ सोडियम बल्ब ;लैंपद्ध सभी दिशाओं में एकसमान उफजार् विकिरित करता है। लैंप को एक ऐसे बड़े गोले के केंद्र पर रखा गया है जो इस पर आपतित सोडियम के संपूणर् प्रकाश को अवशोष्िात करता है। सोडियम प्रकाश का तरंगदैघ्यर् 589 दउ है। ;ंद्ध सोडियम प्रकाश से जुड़े प्रति प़फोटाॅन की ऊजार् कितनी है? ;इद्ध गोले को किस दर से प़फोटाॅन प्रदान किए जा रहे हैं? 409 भौतिकी 11ण्8 किसी धातु की देहली आवृिा 3ण्3 × 1014 भ््र है। यदि 8ण्2 × 1014 भ््र आवृिा का प्रकाश धातु पर आपतित हो, तो प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न के लिए अंतक वोल्टता ज्ञात कीजिए। 11ण्9 किसी धातु के लिए कायर् - पफलन 4ण्2 मट है। क्या यह धातु 330 दउ तरंगदैघ्यर् के आपतित विकिरण के लिए प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न देगा? 11ण्10 7ण्21 × 1014 भ््र आवृिा का प्रकाश एक धातु - पृष्ठ पर आपतित है। इस पृष्ठ से 6ण्0 × 105 उध्े की उच्चतम गति से इलेक्ट्राॅन उत्सजिर्त हो रहे हैं। इलेक्ट्राॅनों के प्रकाश उत्सजर्न के लिए देहली आवृिा क्या है? 11ण्11 488 दउ तरंगदैघ्यर् का प्रकाश एक आॅगर्न लेसर से उत्पन्न किया जाता है, जिसे प्रकाश - विद्युत प्रभाव के उपयोग में लाया जाता है। जब इस स्पेक्ट्रमी - रेखा के प्रकाश को उत्सजर्क पर आपतित किया जाता है तब प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों का निरोधी ;अंतकद्ध विभव 0ण्38 ट है। उत्सजर्क के पदाथर् का कायर् - पफलन ज्ञात करें। 11ण्12 56 ट विभवांतर के द्वारा त्वरित इलेक्ट्राॅनों का ;ंद्ध संवेग, और ;इद्ध दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् परिकलित कीजिए। 11ण्13 एक इलेक्ट्राॅन जिसकी गतिज ऊजार् 120 मट है, उसका ;ंद्ध संवेग, ;इद्ध चाल और ;बद्ध दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् क्या है? 11ण्14 सोडियम के स्पेक्ट्रमी उत्सजर्न रेखा के प्रकाश का तरंगदैघ्यर् 589 दउ है। वह गतिज ऊजार् ज्ञात कीजिए जिस पर ;ंद्ध एक इलेक्ट्राॅन, और ;इद्ध एक न्यूट्राॅन का दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् समान होगा। 11ण्15 ;ंद्ध एक 0ण्040 ाह द्रव्यमान का बुलेट जो 1ण्0 ाउध्े की चाल से चल रहा है, ;इद्ध एक 0ण्060 ाह द्रव्यमान की गेंद जो 1ण्0 ाउध्े की चाल से चल रही है, और ;बद्ध एक धूल - कण जिसका द्रव्यमान 1ण्0 × 10दृ9 ाह और जो 2ण्2 उध्े की चाल से अनुगमित हो रहा है, का दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् कितना होगा? 11ण्16 एक इलेक्ट्राॅन और एक प़फोटाॅन प्रत्येक का तरंगदैघ्यर् 1ण्00 दउ है। ;ंद्ध इनका संवेग, ;इद्ध पफोटाॅन की उफजार्, और ;बद्ध इलेक्ट्राॅन की गतिज उफजार् ज्ञात कीजिए। 11ण्17 ;ंद्ध न्यूट्राॅन की किस गतिज उफजार् के लिए दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् 1ण्40 × 10दृ10 उ होगा? ;इद्ध एक न्यूट्राॅन, जो पदाथर् के साथ तापीय साम्य में है और जिसकी 300 ज्ञ पर औसत गतिज 3 उफजार् 2 ा ज् है, का भी दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् ज्ञात कीजिए। 11ण्18 यह दशार्इए कि वैद्युतचुंबकीय विकिरण का तरंगदैघ्यर् इसके क्वांटम ;प़फोटाॅनद्ध के तरंगदैघ्यर् के बराबर है। 11ण्19 वायु में 300 ज्ञ ताप पर एक नाइट्रोजन अणु का दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् कितना होगा? यह मानें कि अणु इस ताप पर अणुओं के चाल वगर् माध्य से गतिमान है। ;नाइट्रोजन का परमाणु द्रव्यमान त्र 14ण्0076 नद्ध अतिरिक्त अभ्यास 11ण्20 ;ंद्ध एक निवार्त नली के तापित वैफथोड से उत्सजिर्त इलेक्ट्राॅनों की उस चाल का आकलन कीजिए जिससे वे उत्सजर्क की तुलना में 500 ट के विभवांतर पर रखे गए एनोड से टकराते हैं। इलेक्ट्राॅनों के लघु प्रारंभ्िाक चालों की उपेक्षा कर दें। इलेक्ट्राॅन का आपेक्ष्िाक आवेश अथार्त मध्उ 1ण्76 × 1011 ब् ाहदृ1 है। ;इद्ध संग्राहक विभव 10 डट के लिए इलेक्ट्राॅन की चाल ज्ञात करने के लिए उसी सूत्रा का प्रयोग करें, जो ;ंद्ध में काम में लाया गया है। क्या आप इस सूत्रा को गलत पाते हैं? इस सूत्रा को 410 किस प्रकार सुधारा जा सकता है? 11ण्21 ;ंद्ध एक समोजीर् इलेक्ट्राॅन किरण - पुंज जिसमें इलेक्ट्राॅन की चाल 5ण्20 × 106 उ ेदृ1 है, पर एक चुंबकीय क्षेत्रा 1ण्30 × 10दृ4 ज् किरण - पुंज की चाल के लंबवत लगाया जाता है। किरण - पुंज द्वारा आरेख्िात वृत्त की त्रिाज्या कितनी होगी, यदि इलेक्ट्राॅन के मध्उ का मान 1ण्76 × 1011 ब् ाहदृ1 है। ;इद्ध क्या जिस सूत्रा को ;ंद्ध में उपयोग में लाया गया है वह यहाँ भी एक 20 डमट इलेक्ट्राॅन किरण - पुंज की त्रिाज्या परिकलित करने के लिए युक्ितपरक है? यदि नहीं तो किस प्रकार इसमें संशोधन किया जा सकता है? ¹नोट: अभ्यास 11ण्20 ;इद्ध तथा 11ण्21 ;इद्ध आपको आपेक्ष्िाकीय यांत्रिाकी तक ले जाते हैं जो इस पुस्तक के विषय के बाहर है। यहाँ पर इन्हें इस बिंदु पर बल देने के लिए सम्िमलित किया गया है कि जिन सूत्रों को आप ;ंद्ध में उपयोग में लाते हैं वे बहुत उच्च चालों अथवा उफजार्ओं पर युक्ितपरक नहीें होते। यह जानने के लिए कि ‘बहुत उच्च चाल अथवा उफजार्’ का क्या अथर् है? अंत में दिए गए उत्तरों को देखेंह् 11ण्22 एक इलेक्ट्राॅन गन जिसका संग्राहक 100 ट विभव पर है, एक कम दाब ;∼10दृ2 उउ भ्हद्ध पर हाइड्रोजन से भरे गोलाकार बल्ब में इलेक्ट्राॅन छोड़ती है। एक चुंबकीय क्षेत्रा जिसका मान 2ण्83 × 10दृ4 ज् है, इलेक्ट्राॅन के मागर् को 12ण्0 बउ त्रिाज्या के वृत्तीय कक्षा में वित कर देता है। ;इस मागर् को देखा जा सकता है क्योंकि मागर् में गैस आयन किरण - पुंज को इलेक्ट्राॅनों को आकष्िार्त करके और इलेक्ट्राॅन प्रग्रहण के द्वारा प्रकाश उत्सजर्न करके प़फोकस करते हैंऋ इस वििा को ‘परिष्कृत किरण - पुंज नली’ वििा कहते हैं।द्ध आँकड़ों से मध्उ का मान निधार्रित कीजिए। 11ण्23 ;ंद्ध एक ग्.किरण नली विकिरण का एक संतत स्पेक्ट्रम जिसका लघु तरंगदैघ्यर् सिरा 0ण्45 ऊ पर है, उत्पन्न करता है। विकिरण में किसी प़फोटाॅन की उच्चतम उफजार् कितनी है? ;इद्ध अपने ;ंद्ध के उत्तर से अनुमान लगाइए कि किस कोटि की त्वरक वोल्टता ;इलेक्ट्राॅन के लिएद्ध की इस नली में आवश्यकता है? 11ण्24 एक त्वरित्रा ;ंबबमसमतंजवतद्ध प्रयोग में पािाट्राॅनों ;म़द्ध के साथ इलेक्ट्राॅनों के उच्च - उफजार् संघट्टðन पर, एक विश्िाष्ट घटना की व्याख्या वुफल उफजार् 10ण्2 ठमट के इलेक्ट्राॅन - पािाट्राॅन युग्म के बराबर उफजार् की दो γ.किरणों में विलोपन के रूप में की जाती है। प्रत्येक γ.किरण से संबंिात तरंगदैघ्यो± के मान क्या होंगे? ;1ठमट त्र 109 मटद्ध 11ण्25 आगे आने वाली दो संख्याओं का आकलन रोचक हो सकता है। पहली संख्या यह बताएगी कि रेडियो अभ्िायांत्रिाक प़्ाफोटाॅन की अिाक चिंता क्यों नहीं करते। दूसरी संख्या आपको यह बताएगी कि हमारे नेत्रा ‘प़फोटाॅनों की गिनती’ क्यों नहीं कर सकते, भले ही प्रकाश साप़फ - साप़फ संसूचन योग्य हो। ;ंद्ध एक मध्य तरंग ;उमकपनउ ूंअमद्ध 10 ाॅ सामथ्यर् के प्रेषी, जो 500 उ तरंगदैघ्यर् की रेडियो तरंग उत्सजिर्त करता है, के द्वारा प्रति सेवंफड उत्सजिर्त प़फोटाॅनों की संख्या। ;इद्ध निम्नतम तीव्रता का श्वेत प्रकाश जिसे हम देख सकते हैं ;∼10दृ10 ॅ उदृ2द्ध के संगत पफोटाॅनों की संख्या जो प्रति सेवंफड हमारे नेत्रों की पुतली में प्रवेश करती है। पुतली का क्षेत्रापफल लगभग 0ण्4 बउ2 और श्वेत प्रकाश की औसत आवृिा को लगभग 6 × 1014 भ््र मानिए। 11ण्26 एक 100 ॅ पारद ;डमतबनतलद्ध ड्डोत से उत्पन्न 2271 ऊ तरंगदैघ्यर् का पराबैंगनी प्रकाश एक मालिब्डेनम धातु से निमिर्त प्रकाश सेल को विकिरित करता है। यदि निरोधी विभव दृ1ण्3 ट हो, तो धातु के कायर् - पफलन का आकलन कीजिए। एक भ्म.छम लेसर द्वारा उत्पन्न 6328 ऊ के उच्च तीव्रता ;∼105 ॅ उदृ2द्ध के लाल प्रकाश के साथ प्रकाश सेल किस प्रकार अनुिया करेगा? 411 भौतिकी 11ण्27 11ण्28 11ण्29 11ण्30 11ण्31 11ण्32 11ण्33 11ण्34 एक नियाॅन लैंप से उत्पन्न 640ण्2 दउ ;1दउ त्र 10दृ9उद्ध तरंगदैघ्यर् का एकवणीर् विकिरण टंगस्टन पर सीिायम से निमिर्त प्रकाश - संवेदी पदाथर् को विकिरित करता है। निरोधी वोल्टता 0ण्54 ट मापी जाती है। ड्डोत को एक लौह - ड्डोत से बदल दिया जाता है। इसकी 427ण्2 दउ वणर् - रेखा उसी प्रकाश सेल को विकिरित करती है। नयी निरोधी वोल्टता ज्ञात कीजिए। एक पारद लैंप, प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न की आवृिा निभर्रता के अध्ययन के लिए एक सुविधाजनक ड्डोत है, क्योंकि यह दृश्य - स्पेक्ट्रम के पराबैंगनी ;न्टद्ध से लाल छोर तक कइर् वणर् - रेखाएँ उत्सजिर्त करता है। रूबीडियम प्रकाश सेल के हमारे प्रयोग में, पारद ;डमतबनतलद्ध ड्डोत की निम्न वणर् - रेखाओं का प्रयोग किया गया: λ1 त्र 3650 ऊए λ2त्र 4047 ऊए λ3त्र 4358 ऊए λ4त्र 5461 ऊए λ5त्र 6907 ऊए निरोधी वोल्टताएँ, क्रमशः निम्न मापी गईं: ट त्र 1ण्28 टए ट त्र 0ण्95 टए ट त्र 0ण्74 टए ट त्र 0ण्16 टए ट त्र 0ट 0102030405;ंद्ध प्लैंक स्िथरांक ी का मान ज्ञात कीजिए। ;इद्ध धातु के लिए देहली आवृिा तथा कायर् - पफलन का आकलन कीजिए। ¹नोट: उपयर्ुक्त आँकड़ों से ी का मान ज्ञात करने के लिए आपको म त्र 1ण्6 × 10दृ19ब् की आवश्यकता होगी। इस प्रकार के प्रयोग छंए स्पए ज्ञ आदि के लिए मिलिकन ने किए थे। मिलिकन ने अपने तेल - बूँद प्रयोग से प्राप्त म के मान का उपयोग कर आइंस्टाइन के प्रकाश - विद्युत समीकरण को सत्यापित किया तथा इन्हीं प्रेक्षणों से ी के मान के लिए पृथव्फ अनुमान लगाया।ह् निम्न धातुओं के कायर् - पफलन निम्न प्रकार दिए गए हैं: छंरू 2ण्75 मटय ज्ञरू 2ण्30 मटय डवरू 4ण्17 मटय छपरू 5ण्15 मट । इनमें धातुओं में से कौन प्रकाश सेल से 1 उ दूर रखे गए भ्म.ब्क लेसर से उत्पन्न 3300 ऊ तरंगदैघ्यर् के विकिरण के लिए प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न नहीं देगा? लेसर को सेल के निकट 50 बउ दूरी पर रखने पर क्या होगा? 10दृ5 ॅउदृ2 तीव्रता का प्रकाश एक सोडियम प्रकाश सेल के 2 बउ2 क्षेत्रापफल के पृष्ठ पर पड़ता है। यह मान लें कि ऊपर की सोडियम की पाँच परतें आपतित ऊजार् को अवशोष्िात करती हैं, तो विकिरण के तरंग - चित्राण में प्रकाश - विद्युत उत्सजर्न के लिए आवश्यक समय का आकलन कीजिए। धतु के लिए कायर् - पफलन लगभग 2 मट दिया गया है। आपके उत्तर का क्या निहिताथर् है। ग्.किरणों के प्रयोग अथवा उपयुक्त वोल्टता से त्वरित इलेक्ट्रानों से िस्टल - विवतर्न प्रयोग किए जा सकते हैं। कौन - सी जाँच अिाक उफजार् संब( है? ;परिमाण्िाक तुलना के लिए, जाँच के लिए तरंगदैघ्यर् को 1 ऊ लीजिए, जो कि जालक ;लेटिसद्ध में अंतर - परमाणु अंतरण की कोटि का हैद्ध ;उ मत्र9ण्11 × 10दृ31 ाहद्ध। ;ंद्ध एक न्यूट्राॅन, जिसकी गतिज उफजार् 150 मट है, का दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् प्राप्त कीजिए। जैसा कि आपने अभ्यास 11ण्31 में देखा है, इतनी उफजार् का इलेक्ट्राॅन किरण - पुंज िस्टल विवतर्न प्रयोग के लिए उपयुक्त है। क्या समान उफजार् का एक न्यूट्राॅन किरण - पुंज इस प्रयोग के लिए समान रूप में उपयुक्त होगा? स्पष्ट कीजिए। ;उ द त्र 1ण्675 × 10दृ27 ाह द्ध ;इद्ध कमरे के सामान्य ताप ;27 °ब्द्ध पर ऊष्मीय न्यूट्राॅन से जुड़े दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् ज्ञात कीजिए। इस प्रकार स्पष्ट कीजिए कि क्यों एक तीव्रगामी न्यूट्राॅन को न्यूट्राॅन - विवतर्न प्रयोग में उपयोग में लाने से पहले वातावरण के साथ तापीकृत किया जाता है। एक इलेक्ट्राॅन सूक्ष्मदशीर् में 50 ाट वोल्टता के द्वारा त्वरित इलेक्ट्राॅनों का उपयोग किया जाता है। इन इलेक्ट्राॅनों से जुड़े दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् ज्ञात कीजिए। यदि अन्य बातों ;जैसे कि संख्यात्मक द्वारक, आदिद्ध को लगभग समान लिया जाए, इलेक्ट्राॅन सूक्ष्मदशीर् की विभेदन क्षमता की तुलना पीले प्रकाश का प्रयोग करने वाले प्रकाश सूक्ष्मदशीर् से किस प्रकार होती है? किसी जाँच की तरंगदैघ्यर् उसके द्वारा वुफछ विस्तार में जाँच की जा सकने वाली संरचना के आकार की लगभग आमाप है। प्रोटाॅनों तथा न्यूट्राॅनों की क्वावर्फ ;ुनंताद्ध संरचना 10दृ15 उ या इससे भी कम लंबाइर् के लघु पैमाने की है। इस संरचना को सवर्प्रथम 1970 दशक के प्रारंभ में, एक रेखीय त्वरित्रा ;स्पदमंत ंबबमसमतंजवतद्ध से उत्पन्न उच्च उफजार् इलेक्ट्राॅनों के किरण - पुंजों के उपयोग द्वारा, स्टैनप़फोडर्, संयुक्त राज्य अमेरिका में जाँचा गया था। इन इलेक्ट्राॅन किरण - पुंजों की उफजार् की कोटि का अनुमान लगाइए। ;इलेक्ट्राॅन की विराम द्रव्यमान उफजार् 0ण्511 डमट है।द्ध 11ण्35 कमरे के ताप ;27 °ब्द्ध और 1 ंजउ दाब पर भ्म परमाणु से जुड़े प्रारूपी दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् ज्ञात कीजिए और इन परिस्िथतियों में इसकी तुलना दो परमाणुओं के बीच औसत दूरी से कीजिए। 11ण्36 किसी धातु में ;27 °ब्द्ध पर एक इलेक्ट्राॅन का प्रारूपी दे ब्राॅग्ली तरंगदैघ्यर् परिकलित कीजिए और इसकी तुलना धातु में दो इलेक्ट्राॅनों के बीच औसत पृथक्य से कीजिए जो लगभग 2 × 10दृ10उ दिया गया है। ¹नोट: अभ्यास 11ण्35 और 11ण्36 प्रदश्िार्त करते हैं कि जहाँ सामान्य परिस्िथतियों में गैसीय अणुओं से जुड़े तरंग पैकेट अ - अतिव्यापी हैंऋ किसी धातु में इलेक्ट्राॅन तरंग पैकेट प्रबल रूप से एक - दूसरे से अतिव्यापी हैं। यह सुझाता है कि जहाँ किसी सामान्य गैस में अणुओं की अलग पहचान हो सकती है, किसी धातु में इलेक्ट्राॅन की एक - दूसरे से अलग पहचान नहीं हो सकती। इस अप्रभेद्यता के कइर् मूल निहिताथर्ताएँ हैं जिन्हें आप भौतिकी के अिाक उच्च पाठ्यक्रमों में जानेंगे।ह् 11ण्37 निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिए: ;ंद्ध ऐसा विचार किया गया है कि प्रोटाॅन और न्यूट्राॅन के भीतर क्वावर्फ पर आंश्िाक आवेश होते हैं ख्;़2ध्3द्धम य ;दृ1ध्3द्धम,। यह मिलिकन तेल - बूँद प्रयोग में क्यों नहीं प्रकट होते? ;इद्ध मध्उ संयोग की क्या विश्िाष्टता है? हम म तथा उ के विषय में अलग - अलग विचार क्यों नहीं करते? ;बद्ध गैसें सामान्य दाब पर वुफचालक होती हैं परंतु बहुत कम दाब पर चालन प्रारंभ कर देती हैं। क्यों? ;कद्ध प्रत्येक धातु का एक निश्िचत कायर् - पफलन होता है। यदि आपतित विकिरण एकवणीर् हो तो सभी प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅन समान उफजार् के साथ बाहर क्यों नहीं आते हैं? प्रकाश्िाक इलेक्ट्राॅनों का एक उफजार् वितरण क्यों होता है? ;मद्ध एक इलेक्ट्राॅन की उफजार् तथा इसका संवेग इससे जुड़े पदाथर् - तरंग की आवृिा तथा इसके तरंगदैघ्यर् के साथ निम्न प्रकार संबंिात होते हैं: ी म् त्र ीνए च त्र λ परंतु λ का मान जहाँ भौतिक महत्त्व का है, ν के मान ;और इसलिए कला चाल ν λ का मानद्ध का कोइर् भौतिक महत्त्व नहीं है। क्यों? 413 भौतिकी परिश्िाष्ट 11.1 तरंग तथा कण के उलट - पलट का इतिहास प्रकाश क्या है? यह प्रश्न मानव जाति को लंबे समय तक परेशान करता रहा है। लगभग चार शताब्दी पहले, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक युग के प्रारंभ के समय से ही वैज्ञानिकों द्वारा क्रमब( प्रयोग किए गए। लगभग उसी समय, प्रकाश क्या है, इस संबंध में सै(ांतिक माॅडल विकसित किए गए। विज्ञान की किसी भी शाखा में कोइर् माॅडल विकसित करते समय यह देखना आवश्यक है कि यह उस समय विद्यमान सभी प्रायोगिक प्रेक्षणों की व्याख्या कर सके। इसलिए, सत्राहवीं शताब्दी में प्रकाश के विषय में ज्ञात वुफछ प्रेक्षणों का संक्षेपण उपयुक्त रहेगा। उस समय ज्ञात प्रकाश के गुणों में सम्िमलित थे - ;ंद्ध प्रकाश का सरल रेखीय पथ पर गमन, ;इद्ध समतल तथा गोलीय पृष्ठों से परावतर्न, ;बद्ध दो माध्यमों के अंतरापृष्ठ पर अपवतर्न, ;कद्ध विभ्िान्न वणो± में प्रकाश का विक्षेपण, ;मद्ध उच्च चाल। पहली चार परिघटनाओं के लिए उचित नियमों को प्रतिपादित किया गया। उदाहरण के लिए, स्नेल ने सन् 1621 में अपवतर्न के नियमों को सूत्राब( किया। गैलिलियो के समय से ही अनेक वैज्ञानिकों ने प्रकाश की चाल को मापने का प्रयत्न किया। लेकिन वे ऐसा करने में असमथर् रहे। वे केवल यह निष्कषर् निकाल पाए कि प्रकाश की चाल उनकी माप की सीमा से अिाक है। सत्राहवीं शताब्दी में प्रकाश के दो माॅडल प्रस्तुत किए गए। सत्राहवीं शताब्दी के प्रारंभ्िाक दशकों में दकातेर् ने प्रतिपादित किया कि प्रकाश कणों से बना है, जबकि सन् 1650 - 60 के आस पास हाइगेंस ने प्रस्तुत किया कि प्रकाश तरंगों से बना है। दकातेर् का प्रस्ताव मात्रा एक दाशर्निक माॅडल था जिसमें प्रयोगों अथवा वैज्ञानिक तको± का अभाव था। शीघ्र ही, लगभग 1660 - 70 के आस पास न्यूटन ने दकातेर् के कण्िाका सि(ांत का वैज्ञानिक सि(ांत के रूप में विस्तार किया तथा इसकी सहायता से प्रकाश के अनेक गुणों की व्याख्या की गइर्। तरंगों के रूप में तथा कणों के रूप में प्रस्तुत करने वाले ये माॅडल एक दूसरे के बिलवुफल विपरीत हैं। लेकिन दोनों ही माॅडल प्रकाश के सभी ज्ञात गुणों की व्याख्या करने में सक्षम थे। इन दोनों में से किसी को भी छाँटना कठिन था। आगामी वुफछ शताब्िदयों में इन माॅडलों के विकास का इतिहास मनोरंजक है। सन् 1669 में, बारथोलिनस ने वुफछ िस्टलों में प्रकाश के द्विअपवतर्न की खोज की तथा शीघ्र ही सन् 1678 में हाइगेन्स ने अपने तरंग सि(ांत के आधार पर इसकी व्याख्या की। इसके बावजूद, एक सौ वषर् से भी अिाक समय तक न्यूटन का कण्िाका माॅडल अिाक विश्वसनीय माना जाता रहा तथा तरंग माॅडल की अपेक्षा अिाक पसंद किया जाता रहा। इसका एक अंशतः कारण तो इस माॅडल की सरलता थी तथा अंशतः उस समय के समकालीन भौतिकशस्ित्रायों पर न्यूटन का प्रभाव था। सन् 1801 में यंग ने अपने द्विझिरी प्रयोग द्वारा व्यतिकरण पि्रंफजों का प्रेक्षण किया। इस परिघटना की व्याख्या केवल तरंग सि(ांत द्वारा ही की जा सकती है। यह भी अनुभव किया गया कि विवतर्न एक अन्य परिघटना है जिसकी व्याख्या केवल तरंग सि(ांत द्वारा ही की जा सकती है। वास्तव में यह प्रकाश के पथ में प्रत्येक बिंदु से निगर्मन होने वाली हाइगेंस के द्वितीयक तरंगिका का स्वाभाविक निष्कषर् है। इन प्रयोगों की प्रकाश के कण्िाका सि(ांत द्वारा व्याख्या नहीं की जा सकती। लगभग सन् 1810 में ध््रुवण की परिघटना की खोज हुइर्। इस परिघटना की व्याख्या भी तरंग सि(ांत द्वारा ही स्वाभाविक रूप से की जा सकती है। इस प्रकार हाइगेंस का तरंग सि(ांत अग्रभाग में आ गया तथा न्यूटन का कण्िाका सि(ांत पृष्ठभूमि में चला गया। यह स्िथति पुनः लगभग एक शताब्दी तक चलती रही। उन्नीसवीं शताब्दी में प्रकाश की चाल ज्ञात करने के लिए वुफछ अच्छे प्रयोग किए गए। अिाक परिशु( प्रयोग द्वारा निवार्त में प्रकाश की चाल का मान 3×108 उध्े ज्ञात किया गया। लगभग सन् 1860 में, मैक्सवेल ने वैद्युतचुंबकत्व के लिए अपनी समीकरणें प्रस्तुत कीं तथा यह अनुभव किया गया कि उस समय ज्ञात सभी वैद्युतचुंबकीय परिघटनाओं की मैक्सवेल की चार समीकरणों द्वारा व्याख्या की जा सकती है। शीघ्र ही मैक्सवेल ने दशार्या कि विद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रा, वैद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में रिक्त आकाश ;निवार्तद्ध में संचारित किए जा सकते हैं। उसने इन तरंगों की चाल परिकलित की तथा इनके सै(ांतिक मान 2.998 ×108 उध्े प्राप्त किए। इस मान की प्रायोगिक मान से निकटता यह दशार्ती है कि प्रकाश वैद्युतचुंबकीय तरंगों से बना है। सन् 1887 में हट्र्श ने इन तरंगों की उत्पिा तथा संसूचन को प्रदश्िार्त किया। इसने प्रकाश के तरंग सि(ांत को एक दृढ़ आधार प्रदान किया। हम कह सकते हैं कि अठारहवीं शताब्दी प्रकाश के कण्िाका माॅडल की तथा उन्नीसवीं शताब्दी प्रकाश के तरंग सि(ांत की थी। सन् 1850 - 1900 के समय के बीच भौतिकी एक बिलवुफल भ्िान्न क्षेत्रा, ऊष्मा तथा उससे संबंिात परिघटनाओं पर बड़ी संख्या में प्रयोग किए गए। अणुगति सि(ांत तथा ऊष्मागतिकी जैसे सि(ांत तथा माॅडल विकसित किए गए जिन्होंने सपफलता पूवर्क, केवल एक को छोड़कर अनेक परिघटनाओं की व्याख्या की। परिश्िाष्ट प्रत्येक वस्तु, किसी भी ताप पर सभी तरंगदैघ्यो± के विकिरण उत्सजिर्त करती है। यह अपने ऊपर पड़ने वाले विकिरणों को अवशोष्िात भी करती है। कोइर् वस्तु जो अपने ऊपर पड़ने वाले सभी विकिरणों को अवशोष्िात कर लेती है, उसे कृष्िणका कहते हैं। भौतिकी में यह बिंदु द्रव्यमान अथवा एकसमान गति की अवधारणाओं की भाँति ही एक आदशर् अवधारणा है। किसी वस्तु द्वारा उत्सजिर्त विकिरण की तीव्रता तथा इसकी तरंगदैघ्यर् के बीच खींचे गए ग्रापफ को कृष्िणका स्पेक्ट्रम कहते हैं। उन दिनों में कोइर् भी सि(ांत कृष्िणका स्पेक्ट्रम की पूरी तरह व्याख्या नहीं कर पाया। सन् 1900 में, प्लैंक को एक नया विचार सूझा। उन्होंने कहा, यदि हम मान लें कि विकिरण तरंगों के रूप में संतत चलने की बजाय ऊजार् के पैकेट के रूप में उत्सजिर्त होते हैं, तो हम कृष्िणका स्पेक्ट्रम की व्याख्या कर सकते हैं। प्लैंक ने स्वयं इन क्वांटा अथवा पैकेट को प्रकाश की बजाय उत्सजर्न तथा अवशोषण का गुण माना। उन्होंने एक सूत्रा व्युत्पन्न किया जो समस्त स्पेक्ट्रम के लिए सम्मत है। यह तरंग तथा कण चित्राण का एक उलझन - भरा मिश्रण है जिसके अनुसार विकिरण एक कण की भाँति उत्सजिर्त होता है, यह एक तरंग की भाँति गमन करता है, तथा पिफर से एक कण की भांति अवशोष्िात होता है। इसके अतिरिक्त, इसने भौतिकविज्ञानियों को दुविधा में डाल दिया। क्या केवल एक परिघटना की व्याख्या करने के लिए हम पुनः प्रकाश के कण चित्राण को स्वीकार कर लें? तब व्यतिकरण तथा विवतर्न की परिघटनाओं का क्या होगा, जिनकी व्याख्या कण्िाका माॅडल द्वारा नहीं की जा सकती। लेकिन शीघ्र ही सन् 1905 में आइंसटाइन ने प्रकाश - विद्युत प्रभाव की व्याख्या प्रकाश के कण्िाका चित्राण द्वारा की। डिबाइर् ने िस्टलीय ठोस में जालक वंफपनों के लिए कण चित्राण का उपयोग करके ठोसों में निम्न ताप विश्िाष्ट ऊष्माओं की व्याख्या की। भौतिकी के व्यापक विविध क्षेत्रों से जुड़े होने पर भी इन दोनों परिघटनाओं की व्याख्या तरंग माॅडल से न होकर केवल कण माॅडल द्वारा ही की जा सकती है। सन् 1923 में काॅम्पटन के परमाणुओं से ग् - किरण प्रकीणर्न प्रयोग भी कण - चित्राण के पक्ष में ही गए। इसने वैज्ञानिकों की दुविधा को और बढ़ा दिया। इस प्रकार 1923 तक भौतिकविज्ञानी निम्न स्िथतियों का सामना कर रहे थे - ;ंद्ध प्रकाश का )जुरेखीय संचरण, परावतर्न तथा अपवतर्न जैसी परिघटनाएँ जिनकी व्याख्या कण्िाका माॅडल अथवा तरंग माॅडल दोनों से ही की जा सकती है। ;इद्ध व्यतिकरण तथा विवतर्न जैसी वुफछ ऐसी परिघटनाएँ थीं जिनकी व्याख्या कण्िाका माॅडल द्वारा नहीं की जा सकतीं, इन्हें केवल तरंग माॅडल द्वारा ही समझा जा सकता है। ;बद्ध कृष्िणका विकिरण, प्रकाश विद्युत प्रभाव, तथा काॅम्पटन प्रकीणर्न जैसी वुफछ परिघटनाओं की व्याख्या तरंग माॅडल द्वारा नहीं की जा सकतीं, इनकी व्याख्या केवल कण्िाका माॅडल द्वारा ही की जा सकतीं है। उन दिनों में किसी ने ठीक ही टिप्पणी की, कि सोमवार, बुध्वार तथा शुक्रवार के दिनों में प्रकाश कण की भाँति व्यवहार करता है तथा मंगलवार, बृहस्पतिवार तथा शनिवार के दिनों में यह तरंग की भाँति व्यवहार करता है तथा रविवारों को हम प्रकाश की बात ही नहीं करते। सन् 1924 में दे ब्राग्ली ने अपने तरंग - कण के द्वैत सि(ांत को प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने कहा कि केवल प्रकाश के पफोटाॅन ही नहीं लेकिन द्रव्य के कणों जैसे इलेक्ट्राॅन तथा परमाणुओं के भी द्वैत लक्षण होते हैं, कभी ये कण की भांति व्यवहार करते हैं और कभी तरंग की भाँति। उन्होंने उनके द्रव्यमान, वेग, संवेग ;कण के लक्षणोंद्ध को उनकी तरंगदैघ्यर् तथा आवृिा ;तरंग के विश्िाष्ट लक्षणोंद्ध से जोड़ने वाला एक सूत्रा स्थापित किया। सन् 1927 में, टाॅमसन तथा डेविसन और जमर्र ने अलग - अलग प्रयोगों द्वारा दशार्या कि इलेक्ट्राॅन तरंग की भाँति व्यवहार करता है जिसकी तरंगदैघ्यर् दे ब्राॅग्ली के संबंध द्वारा प्राप्त मान से सहमति रखती है। उनका प्रयोग िस्टलीय ठोसों द्वारा इलेक्ट्राॅन के विवतर्न पर आधारित था जिसमें परमाणुओं के नियमित प्रबंध ने एक ग्रेटिंग की भाँति कायर् किया। शीघ्र ही अन्य कणों जैसे न्यूट्राॅन तथा प्रोटाॅन के साथ विवतर्न प्रयोग किए गए तथा इनसे भी दे ब्राॅग्ली के सूत्रा की पुष्िट हुइर्। इसने तरंग - कण की द्वैतता को भौतिकी के स्थापित सि(ांत के रूप में पुष्िट की। इस सि(ांत से केवल प्रकाश संबंधी उपरोक्त परिघटनाओं की ही व्याख्या नहीं की जाती बल्िक इससे कणों से संबंिात परिघटनाओं की व्याख्या भी संभव है। लेकिन तरंग - कण द्वैतवाद का कोइर् सै(ांतिक आधार नहीं है। दे ब्राॅग्ली का प्रस्ताव केवल एक गुणात्मक तवर्फ है तथा प्रकृति की सममिति पर आधारित है। तरंग - कण द्वैतवाद अिाक से अिाक एक नियम था, किसी ठोस मूलभूत सि(ांत का निष्कषर् नहीं था। यह सच है कि जो भी प्रयोग किए गए उनकी दे ब्राॅग्ली के सूत्रा से सहमति थी। लेकिन भौतिकी में इस प्रकार से कायर् नहीं होता। एक ओर इसे प्रायोगिक पुष्िट की आवश्यकता होती है, जबकि दूसरी ओर प्रस्तावित माॅडल के लिए ठोस सै(ांतिक आधार की भी आवश्यकता है। इसे अगले दो दशकों में विकसित किया गया। लगभग 1928 में डिरैक ने अपने विकिरण के सि(ांत को विकसित किया तथा हाइशनबगर् तथा पाॅली ने 1930 तक इसे दृढ़ आधार प्रदान किया। 1940 के उत्तराधर् में आॅमोनागा, श्िवन्जर तथा पफाइनमैन ने इसका और अिाक परिष्करण किया तथा सि(ान्त में जो भी असंगतियाँ देखी गईं, उन्हें स्पष्ट किया। इन सभी सि(ांतों ने मुख्य रूप से तरंग - कण द्वैतवाद को एक सै(ांतिक आधार प्रदान किया। यद्यपि कहानी अभी समाप्त नहीं हुइर्, यह और अिाक जटिल होती जा रही है तथा इस टिप्पणी के कायर्क्षेत्रा से परे है। लेकिन अब हमें जो घटित हुआ है उसकी मूलभूत संरचना ज्ञात है और हमें इस समय इससे संतुष्िट भी हो जानी चाहिए। अब भौतिकी के वतर्मान सि(ांतों के स्वाभाविक निष्कषर् के पफलस्वरूप हम यह मान सकते हैं कि विभ्िान्न प्रयोगों में तथा कभी उसी प्रयोग के विभ्िान्न भागों में, वैद्युतचुंबकीय विकिरण तथा द्रव्य के कण, तरंग तथा कण दोनों ही गुण प्रदश्िार्त करते हैं।

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