अध्याय 9 किरण प्रकाश्िाकी एवं प्रकाश्िाक यंत्रा 9ण्1 भूमिका प्रकृति ने मानव नेत्रा ;दृष्िट पटलद्ध को वैद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम के एक छोटे परिसर में वैद्युत चुंबकीय तरंगों को सुग्राहिता सहित संसूचित कर सकने योग्य बनाया है। इस वैद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम से संबंिात विकिरणों ;तरंगदैघ्यर् लगभग 400 दउ से 750 दउद्ध को प्रकाश कहते हैं। मुख्य रूप से प्रकाश एवं दृष्िट की संवेदना के कारण ही हम अपने चारों ओर के संसार को समझते एवं उसकी व्याख्या करते हैं। अपने सामान्य अनुभव से हम प्रकाश के विषय में अपनी अंतदृर्ष्िट द्वारा दो बातों का उल्लेख कर सकते हैं। पहली, यह अत्यध्िक तीव्र चाल से गमन करता है तथा, दूसरी, यह सरल रेखा में गमन करता है। इस तथ्य को पूणर् रूप से समझने में लोगों को वुफछ समय लगा कि प्रकाश की चाल ;बद्ध परिमित है तथा इसे मापा जा सकता है। वतर्मान में, इसका निवार्त में मान्य मान ब त्र 2ण्99792458 × 108 उ ेदृ1 है। अनेक प्रयोजनों के लिए, इसका मान ब त्र 3 × 108 उ ेदृ1 पयार्प्त है। निवार्त में प्रकाश की चाल प्रकृति में प्राप्य उच्चतम चाल है। हमारी अंतदर्शीर् धरणा कि प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है, ;जो वुफछ हमने अध्याय 8 में सीखा थाद्ध का खंडन करती प्रतीत होती है क्योंकि वहाँ हमने प्रकाश को वैद्युतचुंबकीय तरंग माना था जिसकी तरंगदैघ्यर् स्पेक्ट्रम के दृश्य भाग में होती है। इन दोनों तथ्यों में सामंजस्य वैफसे स्थापितकिया जाए? इसका उत्तर यह है कि दैनिक जीवन की सामान्य वस्तुओं के साइश ;व्यापक रूप में वुफछ सेंटीमीटर की कोटि अथवा इससे अध्िकद्ध की तुलना में प्रकाश की तरंगदैघ्यर् काप़्ाफी कम होती है। जैसा कि आप अध्याय 10 में सीखेंगे, इस स्िथति में, प्रकाश तरंग को एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु तक किसी सरल रेखा के अनुदिश गमन करते हुए माना जा सकता है। इस पथ को प्रकाश किरण कहते हैं तथा इसी प्रकार की किरणों के समूह से प्रकाश - पुंज बनता है। इस अध्याय में, हम प्रकाश के किरण रूप का उपयोग करते हुए, प्रकाश के परावतर्न, अपवतर्न तथा विक्षेपण की परिघटनाओं के बारे में विचार करेंगे। परावतर्न तथा अपवतर्न के मूल नियमों का उपयोग करते हुए हम समतल तथा गोलीय परावतीर् एवं अपवतीर् पृष्ठों द्वारा प्रतिबिंबों की रचना का अध्ययन करेंगे। तत्पश्चात हम मानव नेत्रा सहित वुफछ महत्वपूणर् प्रकाश्िाक यंत्रों की रचना एवं कायर् विध्ि का वणर्न करेंगे। न्यूटन का प्रकाश से संबंध्ित गहन प्रायोगिक कायर् एवं सै(ांतिक अध्ययन प्रायः उनके गण्िात, यांत्रिाकी तथा गुरुत्वाकषर्ण से संबंध्ित मौलिक योगदानों को ध्ँुध्ला कर देता है। उन्होंने प्रकाश्िाकी के क्षेत्रा में पथ प्रदशर्क योगदान दिया। दकातेर् द्वाराप्रस्तुत कण्िाका माॅडल को उन्होंने और अध्िक विकसित किया। इसमें यह माना गया कि प्रकाश ऊजार् छोटे - छोटे कणों में संवेंफदि्रत होती है, जिसको उन्होंने कण्िाकाएँ कहा। न्यूटन ने प्रतिपादित किया कि प्रकाश ऊजार् इन कण्िाकाओं में संवेंफित होती है। उन्होंने यह भी कल्पना की कि प्रकाश की कण्िाकाएँ द्रव्यमानरहित प्रत्यास्थ कण हैं। अपने यांत्रिाकी के ज्ञान के आधर पर उन्होंने परावतर्न तथा अपवतर्न का सरल माॅडल प्रस्तुत किया। यह एक सामान्य प्रेक्षण है कि जब कोइर् गेंद किसी चिकने समतल पृष्ठ से टकराकर वापस लौटती है तो वह परावतर्न के नियमों का पालन करती है। जब यह टक्कर प्रत्यास्थ होती है तो वेग का परिमाण अपरिवतिर्त रहता है। क्योंकि पृष्ठ चिकना है, पृष्ठ के समांतर कोइर् बल कायर् नहीं करता, अतः संवेग का इस दिशा में घटक भी अपरिवतिर्त रहता है। केवल पृष्ठ के लंबवत घटक, अथार्त संवेग का अभ्िालंबवत घटक ही परावतर्न में उत्क्रमित हो जाता है। न्यूटन ने तवर्फ किया कि दपर्णों जैसे चिकने पृष्ठ कण्िाकाओं को इसी प्रकार परावतिर्त करते हैं। अपवतर्न की परिघटना की व्याख्या करने के लिए, न्यूटन ने अभ्िागृहीत प्रस्तुत किया कि कण्िाकाओं की चाल जल अथवा काँच में, वायु की अपेक्षा अध्िक होती है। तथापि, बाद में यह ज्ञात हुआ कि प्रकाश की चाल जल अथवा काँच में वायु की अपेक्षा कम होती है। प्रकाश्िाकी के क्षेत्रा में, प्रयोगकतार् के रूप में न्यूटन, सि(ांतवादी न्यूटन की तुलना में कहीं अध्िक दक्ष थे। उन्होंने कइर् ऐसी परिघटनाओं का प्रेक्षण किया जिनको कण्िाकाओं के पदों में स्पष्ट कर पाना कठिन है। उदाहरण के लिए, जल के पृष्ठ पर तेल की पतली प्िाफल्म के कारण विभ्िान्न वणो± का प्रेक्षण। प्रकाश के आंश्िाक परावतर्न का गुण ऐसा ही एक अन्य उदाहरण़है। जब भी कोइर् तरण ताल ;ैूपउउपदह चववसद्ध के जल में देखता है, तब वह अपने चेहरे का प्रतिबिंब तो उसमें देखता ही है लेकिन साथ में ताल की पेंदी भी देखता है। न्यूटन ने तवर्फ किया कि जल के पृष्ठ पर आपतित कण्िाकाओं में से वुफछ का परावतर्न होता है तथा वुफछ पारगमित हो जाती हैं। परंतु दो प्रकार की कण्िाकाओं में भेद किस गुणध्मर् के आध् ार पर किया जाए। न्यूटन को वुफछ अप्रागुक्त, सांयोगिक परिघटनाओं की परिकल्पना करनी पड़ी जिनके द्वारा यह निश्िचत किया जा सकता था कि कोइर् कण्िाका परावतिर्त होगी अथवा नहीं। तथापि, अन्य परिघटनाओं की व्याख्या करने के लिए यह मानना पड़ा कि कण्िाकाएँ ऐसे व्यवहार करती हैं जैसे कि वे सवर्सम हों। ऐसी दुविध प्रकाश के तरंग रूप में नहीं होती। कोइर् भी आने वाली तरंग वायु तथा जल की परिसीमा पर दो दुबर्ल तरंगों में बँट सकती है। 9ण्2 गोलीय दपर्णों द्वारा प्रकाश का परावतर्न हम परावतर्न के नियमों से परिचित हैं। परावतर्न कोण ;अथार्त, परावतिर्त किरण तथा परावतर्क पृष्ठ अथवा दपर्ण के आपतन ¯बदु पर अभ्िालंब के बीच का कोणद्ध, आपतन कोण ;आपतित किरण तथा दपर्ण के आपतन ¯बदु अभ्िालंब के बीच का कोणद्ध के बराबर होता है। इसके अतिरिक्त, आपतित किरण, परावतिर्त किरण तथा परावतर्क पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभ्िालंब एक ही समतल में होते हैं ;चित्रा 9ण्1द्ध। ये नियम किसी भी परावतर्क पृष्ठ, चाहे वह समतल हो या वित हो, के प्रत्येक बिंदु के लिए वैध् हैं। तथापि, हम अपने विवेचन को वित पृष्ठों की विशेष स्िथति, अथार्त 312 गोलीय पृष्ठों तक ही सीमित रखेंगे। इस स्िथति में अभ्िालंब खींचने का तात्पयर्, पृष्ठ के आपतन किरण प्रकाश्िाकी एवं प्रकाश्िाक यंत्रा बिंदु पर खींचे गए स्पशीर् पर लंब खींचना है। इसका अथर् यह हुआ अभ्िालंब पराव£तत किरणकि अभ्िालंब वक्रता त्रिाज्या के अनुदिश अथार्त आपतन बिंदु को आपतित किरण दपर्ण के वक्रता वेंफद्र से मिलाने वाली रेखा पर है। हम पहले ही अध्ययन कर चुके हैं कि गोलीय दपर्ण का ज्यामितीय वेंफद्र इसका ध््रुव कहलाता है, जबकि गोलीय लेंस के ज्यामितीय वेंफद्र को प्रकाश्िाक वेंफद्र कहते हैं। गोलीय दपर्ण के ध्ु्रव दपर्णतथा वक्रता वेंफद्र को मिलाने वाली सरल रेखा मुख्य अक्ष कहलाती है। गोलीय लेंसों में जैसा कि आप बाद में देखेंगे, प्रकाश्िाक वेंफद्र को मुख्य पफोकस से मिलाने वाली रेखा मुख्य अक्ष कहलाती है। चित्रा 9ण्1 आपतित किरण, परावतिर्त किरण तथा परावतर्क पृष्ठ के आपतन ¯बदु पर अभ्िालंब एक ही तल में होते हैं।9ण्2ण्1 चिÉ परिपाटी गोलीय दपर्णों द्वारा परावतर्न तथा गोलीय लेंसों द्वारा अपवतर्न के लिए प्रासंगिक सूत्रा व्युत्पन्न करनेके लिए, सवर्प्रथम हमें दूरियाँ मापने के लिए कोइर् चिÉ परिपाटी अपनानी होगी। इस पुस्तक में हमकातीर्य चिÉ परिपाटी ;बंतजमेपंद ेपहद बवदअमदजपवदद्ध का पालन करेंगे। इस परिपाटी के अनुसार वस्तु को दपर्ण/लेंस के बायीं ओर रखते हैं तथा सभी दूरियाँ दपर्ण के ध््रुव अथवा लेंस के प्रकाश्िाक वेंफद्र से मापी जाती हैं। आपतित प्रकाश की दिशा में मापी गइर् दूरियाँ ध्नात्मक मानी जाती हैं तथा जो दूरियाँ आपतित प्रकाश की दिशा के विपरीत बायीं ओर पर वस्तु दपर्ण दिशा में मापी जाती हैं वे )णात्मक मानी जाती हैं आपतित किरण;चित्रा 9ण्2द्ध। ग.अक्ष के सापेक्ष तथा दपर्ण/लेंस के ऊँचाइर् ऊपरकी ओरमुख्य अक्ष ;ग.अक्षद्ध के अभ्िालंबवत, उपरिमुखी मापित ध्नात्मक ग.अक्षऊचाइयाँ ध्नात्मक मानी जाती हैं ;चित्रा9ण्2द्ध। अधोमुखीँमापित ऊँचाइयों को )णात्मक लिया जाता है। आपतित प्रकाश केसामान्य मान्य परिपाटी के साथ हमें गोलीय विपरीत दिशा मेंदपर्णों के लिए एकल सूत्रा तथा गोलीय लेंसों के ऊँचाइर् नीचेदूरियाँ )णात्मककी ओरआपतित प्रकाश की दिशालिए एकल सूत्रा मिल जाते हैं तथा इन सूत्रों द्वारा हम )णात्मक में दूरियाँ ध्नात्मकविभ्िान्न स्िथतियों का निपटान कर सकते हैं। चित्रा 9ण्2 कातीर्य चिÉ परिपाटी। 9ण्2ण्2 गोलीय दपर्णों की पफोकस दूरी चित्रा 9ण्3 में दशार्या गया है कि जब कोइर् समांतर प्रकाश - पुंज किसी ;ंद्ध अवतल दपर्ण तथा ;इद्ध उत्तल दपर्ण, पर आपतित होता है तो क्या होता है। हम यहाँ यह मानते हैं कि किरणें उपाक्षीय ;चंतंगपंसद्ध हैं, अथार्त वे दपर्ण के ध्ु्रव च् के निकट के बिंदुओं पर आपतित हैं तथा मुख्य अक्ष से छोटे कोण बनाती हैं। परावतिर्त किरणें अवतल दपर्ण के मुख्य अक्ष पर बिंदु थ् पर अभ्िासरित होती हैं ख्चित्रा 9ण्3 ;ंद्ध,। उत्तल दपर्ण के लिए, परावतिर्त किरणें इसके मुख्य अक्ष पर बिंदु थ् से अपसरित होती प्रतीत होती हैं ख्चित्रा 9ण्3 ;इद्ध,। बिंदु थ् दपर्ण का मुख्य प़फोकस कहलाता है। यदि समांतर उपाक्षीय प्रकाश - पुंज अक्ष से कोइर् कोण बनाते हुए दपर्ण पर आपतित होता है तो परावतिर्त किरणें मुख्य अक्ष के बिंदु थ् से गुशरने वाले तथा मुख्य अक्ष के अभ्िालंबवत तल के किसी बिंदु पर अभ्िासरित ;अथवा उस बिंदु से अपसरित होती प्रतीतद्ध होंगी। इस तल को दपर्ण का प़फोकस समतल कहते हैं ख्चित्रा 9ण्3 ;बद्ध,। दपर्ण के प़फोकस थ् तथा ध्ु्रव च् के बीच की दूरी दपर्ण की प़फोकस दूरी कहलाती है तथा इसे िद्वारा निदिर्ष्ट किया जाता है। अब हम यह दशार्ते हैं कि ित्र त्ध्2ए यहाँ त् दपर्ण की वक्रता त्रिाज्या है। किसी आपतित प्रकाश किरण के परावतर्न की ज्यामिति चित्रा 9ण्4 में दशार्यी गइर् है। ;बद्ध चित्रा 9ण्3 अवतल तथा उत्तल दपर्ण के पफोकस। मान लीजिए ब् दपर्ण का वक्रता वेंफद्र है। मुख्य अक्ष के समांतर एक प्रकाश किरण पर विचार कीजिए जो दपर्ण से ड पर टकराती है। तब ब्ड बिंदु ड पर दपर्ण पर अभ्िालंब होगा। मान लीजिए θ आपतन कोण है तथा डक् ¯बदु ड से मुख्य अक्ष पर लंब है। तब, ∠डब्च् त्र θ तथा ∠डथ्च् त्र 2θ डक् डक्अब, जंदθ त्र तथा जंद 2θ त्र ;9ण्1द्धब्क् थ्क् θ के लघु मानों के लिए, जो कि उपाक्षीय किरणों के लिए सत्य है, जंदθ ≈ θए जंद 2θ≈ 2θ इसलिए समीकरण ;9ण्1द्ध से प्राप्त होता है डक् डक् थ्क् त्र 2 ब्क् अथवाए थ्क् त्र ब्क् ;9ण्2द्ध 2 अथवाए θ के लघु मान के लिए, बिंदु क् बिंदु च् के बहुत निकट है। इसलिए, थ्क् त्र ितथा ब्क् त्र त् । अतः समीकरण ;9ण्2द्ध से प्राप्त होता है ित्र त्ध्2 ;9ण्3द्ध 9ण्2ण्3 दपर्ण समीकरण यदि किसी बिंदु से आरंभ होकर प्रकाश किरणें परावतर्न तथा/अथवा अपवतर्न केचित्रा 9ण्4 ;ंद्ध अवतल गोलीय दपर्ण, तथा ;इद्ध उत्तल गोलीय दपर्ण, पर किसी आपतित पश्चात किसी अन्य बिंदु पर मिलती हैं तो वह बिंदु पहले बिंदु का प्रतिबिंब कहलाता किरण के परावतर्न की ज्यामिति। है। यदि किरणें वास्तव में इस बिंदु पर अभ्िासरित होती हैं तो प्रतिबिंब वास्तविक होता है। इसके विपरीत, यदि किरणें वास्तव में नहीं मिलतीं, परंतु पीछे की ओर बढ़ाए जाने पर उस बिंदु से अपसरित होती प्रतीत होती हंै तो वह प्रतिबिंब आभासी होता है। इस प्रकार किसी वस्तु का परावतर्न तथा/अथवा अपवतर्न द्वारा स्थापित प्रतिबिंब उस वस्तु का बिंदु - दर - बिंदु314 तदनुरूप होता है। सि(ांत रूप में, हम वस्तु के किसी ¯बदु से निकलने वाली कोइर्दो किरणें ले सकते हैं, उनके पथ अनुरेख्िात करते हैं, उनका प्रतिच्छेदबिंदु ज्ञात करते हैं और इस प्रकार, किसी गोलीय दपर्ण द्वारा परावतर्नके कारण बना किसी बिंदु का प्रतिबिंब प्राप्त करते हैं। तथापि,व्यवहार में निम्नलिख्िात किरणों में से कोइर् सी दो किरणें लेनासुविधाजनक होता है: ;पद्ध किसी बिंदु से आने वाली वह किरण जो मुख्य अक्ष केसमांतर है। परावतिर्त किरण दपर्ण के प़फोकस से गुशरती है। ;पपद्ध वह किरण जो किसी अवतल दपर्ण के वक्रता वेंफद्र से गुशरती है र्ेअथवा उत्तल दपण वफ वक्रता वेंफद्र से जाती प्रतीत होती है।परावतिर्त किरण केवल अपना पथ पुनः अनुरेख्िात करती है। ;पपपद्ध वह किरण जो किसी अवतल दपर्ण के मुख्य प़फोकस सेगुशरती है अथवा उत्तल दपर्ण के मुख्य प़फोकस से गुशरती;की ओर दिष्टद्ध प्रतीत होती है। परावतिर्त किरण मुख्य अक्षके समांतर गमन करती है। ;पअद्ध कोइर् किरण जो ध्ु्रव पर किसी भी कोण पर आपतित होती है।परावतिर्त किरण, परावतर्न के नियमों का पालन करती है। चित्रा 9ण्5 ¯बब के ¯बदु । से निकलने वाली तीन किरणों को ध्यान में रखकर किरण - आरेख दशार्ता है। इसमें अवतल दपर्ण द्वारा बनाया गया बिंब ।ठ का प्रतिबिंब ।′ठ′ ;इस स्िथति में वास्तविकद्ध दशार्या गया है। इसका यह अथर् नहीं है कि बिंदु । से केवल तीन किरणें ही निकलतीहैं। किसी भी स्रोत से सभी दिशाओं में अनंत किरणें निकलती हैं। अतः यदि बिंदु । से निकलने वाली प्रत्येक किरण, अवतल दपर्ण द्वारा परावतर्न के पश्चात ¯बदु ।′ से होकर गुशरती है तो बिंदु ।′ बिंदु । का वास्तविक प्रतिबिंब है।अब हम दपर्ण समीकरण अथवा बिंब दूरी ;नद्धए प्रतिबिंब दूरी ;अद्ध तथा प़फोकस दूरी ; िद्ध के बीचसंबंध् व्युत्पन्न करेंगे। चित्रा 9ण्5 से, दोनों समकोण त्रिाभुज ।′ठ′थ् तथा डच्थ् समरूप हैं। ;उपाक्षीय किरणों के लिए, डच् को सरल रेखा ब्च् के लंबवत माना जा सकता है।द्ध अतः ठ। ठथ् च्ड थ्च् अथवा ठ। ठ। ठथ् थ्च् ;च्ड त्र ।ठद्ध ;9ण्4द्ध क्योंकि ∠ ।च्ठ त्र ∠ ।′च्ठ′ए समकोण त्रिाभुज ।′ठ′च् तथा ।ठच् भी समरूप हैं। अतः ठ। ठच् ;9ण्5द्धठ। ठच् समीकरण ;9ण्4द्ध तथा ;9ण्5द्ध की तुलना करने पर हमें प्राप्त होगा ठथ् ठच्दृथ्च् ठच् ;9ण्6द्धथ्च् थ्च्ठच् समीकरण ;9ण्6द्ध में दूरियों के परिमाण सम्िमलित हैं। अब हम चिÉ परिपाटी को लागू करते हैं। हम नोट करते हैं कि प्रकाश बिंब से दपर्ण डच्छ की ओर गमन करता है। इस प्रकार इस दिशा को ध्नात्मक लिया जाता है। ध्ु्रव च् से बिंब ।ठए प्रतिबिंब ।′ठ′ तथा प़फोकस थ् तक पहुँचने के लिएहमें आपतित प्रकाश की दिशा के विपरीत दिशा में गमन करना पड़ता है। इसलिए, इन तीनों के चिÉ 315 )णात्मक होंगे। अतः ठ′ च् त्र दृअए थ्च् त्र दृएि ठच् त्र दृन समीकरण ;9ण्6द्ध में इनका उपयोग करने पर प्राप्त होता है दृअ िदृ अ दृ िदृन अदृ अि अथवा नि 11 1 ;9ण्7द्धअन ियह संबंध् दपर्ण समीकरण कहलाता है। वस्तु के साइश के सापेक्ष प्रतिबिंब का साइश भी एक महत्वपूणर् विचारणीय राश्िा है। हम किसी दपर्ण के रैख्िाक आवध्र्न ;उद्ध को प्रति¯बब के साइश ;ी′द्ध तथा बिंब के साइश ;ीद्ध के अनुपात के रूप में परिभाष्िात करते हैं। अतः ी उत्र ;9ण्8द्धी ीतथा ी′ को मान्य चिÉ परिपाटी के अनुसार ध्नात्मक अथवा )णात्मक लिया जाएगा। त्रिाभुजों ।′ठ′च् तथा ।ठच्ए में हमें मिलता है, ठ। ठच् ठ। ठच् चिÉ परिपाटी लगाने पर, यह हो जाएगा दृ ी दृ अ ी नदृ इस प्रकार उ त्र ी ी दृ अ न ;9ण्9द्ध यहाँ पर हमने दपर्ण समीकरण ¹समीकरण ;9ण्7द्धह् तथा आवध्र्न सूत्रा ¹समीकरण ;9ण्9द्धह् अवतल दपर्ण द्वारा बने वास्तविक तथा उलटे प्रतिबिंब के लिए व्युत्पन्न किए हैं। परंतु वास्तव मेंउचित चिÉ परिपाटी का उपयोग करने पर, ये संबंध् गोलीय दपर्णों ;अवतल तथा उत्तलद्ध द्वारा परावतर्न के सभी उदाहरणों ;चाहे प्रति¯बब वास्तविक बने या आभासीद्ध पर लागू होते हैं। चित्रा 9ण्6 में अवतल तथा उत्तल दपर्ण द्वारा आभासी प्रतिबिबों की रचना के किरण - आरेख दशार्ए गए हैं। आप स्वयं यह सत्यापित कर सकते हैं कि समीकरण ;9ण्7द्ध तथा ;9ण्9द्ध इन उदाहरणों के लिए भी मान्य हैं। चित्रा 9ण्6 ;ंद्ध अवतल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब की रचना जबकि ¯बब ¯बदु च् तथा थ् के बीच स्िथत है, तथा316 ;इद्ध उत्तल दपर्ण द्वारा प्रतिबिंब की रचना। हलआप सोच सकते हैं कि प्रतिबिंब में बिंब का आध भाग दिखाइर् देगा। परंतु यह मानते हुए कि परावतर्नके नियम दपर्ण के शेष भाग पर भी लागू होते हैं, अतः दपर्ण द्वारा ¯बब का पूणर् प्रति¯बब बनेगा।तथापि, क्योंकि परावतीर् पृष्ठ का क्षेत्रापफल कम हो गया है। इसलिए प्रति¯बब की तीव्रता कम होजाएगी ;इस उदाहरण में आध्ीद्ध। उदाहरण 9ण्3 कोइर् वस्तु 15 बउ वक्रता त्रिाज्या के अवतल दपर्ण से ;पद्ध 10 बउ तथा ;पपद्ध 5 बउ दूरी पर रखी है। प्रत्येक स्िथति में प्रति¯बब की स्िथति, प्रकृति तथा आवध्र्न परिकलित कीजिए। हल पफोकस दूरी ित्र दृ15ध्2 बउ त्र दृ7ण्5 बउ ;पद्ध बिंब दूरी न त्र दृ10 बउ । तब समीकरण ;9ण्7द्ध से प्राप्त होगा 11 1 अ दृ10 दृ 75 ण् 10 ण्75 अथवा अ त्र त्र दृ 30 बउ ण्25 प्रतिबिंब बिंब की दिशा में दपर्ण से 30 बउ दूरी पर बनेगा। अ ; 30द्ध आवध्र्न उ त्र दृदृ दृ3 न ; 10द्ध प्रतिबिंब आवध्िर्त, वास्तविक तथा उलटा है। 317 ;बद्ध19 उए तथा ;कद्ध 9 उ दूर है। हल दपर्ण समीकरण ;9ण्7द्धए से हमें प्राप्त होता है नि अ न िउत्तल दपर्ण के लिए, क्योंकि त् त्र 2 उए ित्र 1 उण् तब ;39द्ध 1 39 न त्र दृ39 उ ए अ उ 391 40 क्योंकि धवक 5 उ ेदृ1 की अपरिवतीर् चाल से चलता है, 1 े के पश्चात ;न त्रदृ39 ़5 त्र दृ34 उद्ध के लिए प्रतिबिंब की स्िथति अ होगी ;34ध्35 द्धउ, अतः 1 े में प्रतिबिंब की स्िथति में विस्थापन होगा 39 136534 1360 5 1 उ 40 35 1400 1400 280 इसलिए जब धवक दपर्ण से 39 उ तथा 34 उ के बीच में है, तो प्रतिबिंब की औसत चाल है ;1ध्280द्ध उ ेदृ1 इसी प्रकार यह देखा जा सकता है कि जब न त्र दृ29 उए दृ19 उ तथा दृ9 उ है तब जिस चालसे प्रतिबिंब गति करता प्रतीत होगा वह क्रमशः 11 1.1.1 .1 उेए उे तथा उे होंगी।150 60 10 यद्यपि धवक एक अपरिवतीर् चाल से गतिमान है तथापि धवक दपर्ण के जैसे - जैसे निकट आएगा उसके प्रति¯बब की चाल में पयार्प्त वृि प्रतीत होती जाएगी। यह परिघटना किसी स्िथर कार अथवास्िथर बस में बैठा कोइर् भी व्यक्ित देख सकता है। यदि पीछे से आने वाला वाहन एक अपरिवतीर् चाल से लगातार पास आ रहा हो तो, चलते हुए वाहनों में इसी प्रकार की परिघटना देखी जा सकती ह।ै9ण्3 अपवतर्न जब किसी पारदशीर् माध्यम में गमन करता कोइर् प्रकाश किरण - पुंज किसी दूसरे पारदशीर् माध्यम से टकराता है, तो प्रकाश का एक भाग पहले माध्यम में वापस परावतिर्त हो जाता है। जबकि शेष भाग दूसरे माध्यम में प्रवेश करता है। हम प्रायः किसी किरण - पंुज को प्रकाश की किरण द्वारा निरूपित 318 करते हैं। जब कोइर् प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में तियर्क आपतित होकर गमन करती है तो दोनों माध्यमों के अंतरापृष्ठ पर इसके संचरण की दिशा परिवतिर्त हो जाती है। इस परिघटना को प्रकाश का अपवतर्न कहते हैं। स्नेल ने प्रयोगों द्वारा अपवतर्न के निम्नलिख्िात नियम प्रतिपादित किए। ;पद्ध आपतित किरण, अपवतिर्त किरण तथा अंतरापृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभ्िालंब, एक ही समतल में होते हैं। ;पपद्ध किन्हीं दो माध्यमों के युगल के लिए, आपतन कोण की ज्या ;ेपदमद्ध तथा अपवतर्न कोण की ज्या का अनुपात एक स्िथरांक होता है। याद रख्िाए, आपतन कोण ;प द्ध तथा अपवतर्न कोण ;त द्ध वे कोण हैं जो आपतित किरण तथा अपवतिर्त किरण क्रमशः अभ्िालंब के साथ बनाती हैं। अतः ेपदप द21 ;9ण्10द्धेपदत ;1द्ध अभ्िालंब यहाँ द21 एक स्िथरांक है, जिसे पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवतर्नांक कहते हैं। समीकरण ;9ण्10द्ध अपवतर्न के स्नेल के नियम के नाम से जानी जाती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि द21 दो माध्यम के युगल का अभ्िालक्षण है ;तथा यह प्रकाश की तरंगदैघ्यर् पर भी निभर्र करता हैद्ध, परंतु यह आपतन कोण पर निभर्र नहीं करता। समीकरण ;9ण्10द्ध से यदि द21 झ 1ए त ढ पए अथार्त अपवतिर्त किरण अभ्िालंब की ओर मुड़ जाती है। इस दशा में माध्यम 2 को माध्यम 1 की तुलना में प्रकाशतः सघन ;अथवा संक्षेप में, सघनद्ध माध्यम कहते हैं। इसके विपरीत यदि द21 ढ1ए त झ पए तो अपवतिर्त किरण अभ्िालंब से दूर मुड़ती है। यह वह स्िथति है जिसमें आपतित किरण किसी सघन माध्यम से गमन करती हुइर् विरल माध्यम में अपवतिर्त होती है। नोट रू प्रकाश्िाक घनत्व तथा द्रव्यमान घनत्व के बीच भ्रम उत्पन्न नहीं होना चाहिए। द्रव्यमान घनत्व एकांक आयतन का द्रव्यमान है। यह संभव है कि किसी प्रकाश्िाक सघन माध्यम का द्रव्यमान घनत्व प्रकाश्िाक विरल माध्यम के द्रव्यमान घनत्व से कम हो ;प्रकाश्िाक घनत्व दो माध्यमों में प्रकाश की चाल का अनुपात हैद्ध। उदाहरण के लिए, तारपीन का तेल तथा जल। तारपीन के तेल का द्रव्यमान घनत्व जल के द्रव्यमान घनत्व से कम होता है। लेकिन इसका प्रकाश्िाक घनत्व अध्िक होता है। यदि द21 माध्यम 2 का माध्यम 1 के सापेक्ष अपवतर्नांक है तथा द12 माध्यम 1 का माध्यम 2 के सापेक्ष अपवतर्नांक है, तब यह स्पष्ट है कि ;1द्ध 1 द12 ;9ण्11द्धद21 यदि द32 माध्यम 3 का माध्यम 2 के सापेक्ष अपवतर्नांक है तो यह भी स्पष्ट है कि द32 त्र द31 × द12ए यहाँ द31 माध्यम 3 का माध्यम 1 के सापेक्ष अपवतर्नांक है। अपवतर्न के नियमों पर आधरित वुफछ प्रारंभ्िाक परिणाम तुरंत प्राप्त किए जा सकते हैं। किसी 319आयताकार स्लैब में, अपवतर्न दो अंतरापृष्ठों पर होता है ;वायु - काँच तथा काँच - वायुद्ध। चित्रा 9ण्9 दशर्क द्वारा यह आसानी से देखा जा सकता है कि त2 त्र प1ए अथार्त निगर्त किरण आपतित किरण के समांतर होती हैμआपतित किरण के सापेक्ष निगर्त किरण में कोइर् विचलन नहीं होता, परंतु इसमें आपतित किरण के सापेक्ष पाश्िर्वक विस्थापन हो जाता है। एक दूसरा सुपरिचित प्रेक्षण यह भी है कि जल सेभरे किसी तालाब की पेंदी ऊपर उठी प्रतीत होती है ;चित्रा 9ण्10द्ध। अभ्िालंबवत दिशा के निकट से देखने पर यह दशार्या जा सकता है कि आभासी गहराइर् ;ी1द्ध वास्तविक गहराइर् ;ी2द्ध को माध्यम ;जलद्ध के अपवतर्नांक से विभाजित करने पर प्राप्त होती है। प्रकाश का वायुमंडलीय अपवतर्न अनेक रोचक परिघटनाएँ दशार्ता है। उदाहरण के लिए, प्रकाश के अपवतर्न के कारण ही सूयर् वास्तविक सूयोर्दय से वुफछ पहले दृष्िटगोचर होने लगता है तथा वास्तविक सूयार्स्त के वुफछ समय पश्चात तक दृष्िटगोचर होता है ;चित्रा 9ण्11द्ध। वास्तविक सूयोर्दय से हमारातात्पयर् है क्ष्िातिज से सूयर् का ऊपर उठना। चित्रा 9ण्11 में चित्रा 9ण्10 ;ंद्ध अभ्िालंबवत, तथा ;इद्ध तियर्क दशर्न के क्ष्िातिज के सापेक्ष सूयर् की वास्तविक एवं आभासी स्िथतियाँलिए आभासी गहराइर्। दशार्यी गइर् हैं। चित्रा में इस प्रभाव को समझने की दृष्िट से आव£ध्त करके दशार्या गया है। निवार्त के सापेक्ष वायु का अपवतर्नांक 1ण्00029 है। इसके कारण सूयर् की दिशा में लगभग आध्े डिग्री ;1ध्2°द्ध का आभासी विस्थापन होता है जिसका वास्तविक सूयार्स्त तथा आभासी सूयार्स्त में तदनुरूपी अंतर लगभग 2 मिनट है। सूयार्स्त तथा सूयोर्दय के समयसूयर् का आभासी चपटापन ;अंडाकार आकृतिद्ध भी इसी परिघटना के कारण ही है। चित्रा 9ण्11 वायुमंडलीय अपवतर्न के कारण वास्तविक समय से पूवर् सूयोर्दय तथा वास्तविक समय के पश्चात सूयार्स्त का प्रतीत होना। उदाहरण 9ण्5 पृथ्वी अपने अक्ष पर एक घूणर्न करने में 24 ी लेती है। सूयर् के सापेक्ष पृथ्वी से देखे जाने पर 1ह् विस्थापित होने में कितना समय लगता है? हल 360° विस्थापित होने के लिए लिया गया समय त्र 24 ी 1° विस्थापित होने के लिए लिया गया समय त्र ;24ध्360द्ध ी त्र 4 उपद320 जब प्रकाश किसी प्रकाशतः सघन माध्यम से प्रकाशतः विरल माध्यम में गमन करता है, तब अंतरापृष्ठ पर वह अंशतः वापस उसी माध्यम में परावतिर्त हो जाता है तथा अंशतः दूसरे माध्यम मेंअपवतिर्त हो जाता है। इस परावतर्न को आंतरिक परावतर्न कहते हैं।जब कोइर् प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है तो यह अभ्िालंब सेदूर मुड़ जाती है, उदाहरणाथर्, चित्रा 9ण्12 में किरण ।व्1ठ आपतित किरण ।व्1 अंशतः परावतिर्त ;व्1ब्द्ध तथा अंशतः पारगमित अथवा अपवतिर्त ;व्1ठद्ध होती है, तथा अपवतर्न कोण ;तद्ध आपतन कोण ;पद्ध से अध्िक होता है। जैसे - जैसे आपतन कोण में वृि होती है, अपवतर्न कोण में भी वृि होतीहै, जब तक कि किरण ।व्3 के लिए अपवतर्न कोण का मान πध्2 ;90°द्ध हो जाए। अपवतिर्त किरणअभ्िालंब से इतनी अध्िक मुड़ जाती है कि वह दोनों माध्यमों के अंतरापृष्ठ को छूने लगती है। इसेचित्रा 9ण्12 में किरण ।व्क् द्वारा दशार्या गया है। यदि आपतन कोण में इससे अध्िक वृि की3जाती है ;उदाहरण के लिए किरण ।व्4द्ध तो अपवतर्न संभव नहीं होता तथा आपतित किरण पूणर्तः परावतिर्त हो जाती है। इसे पूणर् आंतरिक परावतर्न कहते हैं। जब किसी पृष्ठ द्वारा प्रकाश परावतिर्त होता है तो सामान्यतः इसका वुफछ भाग पारगमित हो जाता है। इसलिए परावतर्क पृष्ठ चाहे जितना 321 भी चिकना क्यों न हो, परावतिर्त किरण सदैव आपतित किरण से कम तीव्रता की होती है। दूसरी ओर पूणर् आंतरिक परावतर्न में प्रकाश का कोइर् पारगमन नहीं होता। वह आपतन कोण जिसका तदनुरूपी अपवतर्न कोण 90ह् होता है, जैसे ∠।व्3छए दिए हुए माध्यमों के युगल के लिए क्रांतिक कोण ;प द्ध कहलाता है। स्नेल के नियमबख्समीकरण ;9ण्10द्ध, के अनुसार हम देखते हैं कि यदि आपेक्ष्िाक अपवतर्नांक एक से कम है, तो क्योंकि ेपद त का अध्िकतम मान एक होता है, अतः ेपद प के मान की कोइर् चित्रा 9ण्12 सघन माध्यम ;जलद्ध तथा विरल माध्यम ;वायुद्ध के ऊपरी सीमा है जिस तक यह नियम लागू किया जा सकता अंतरापृष्ठ पर ¯बदु । ;सघन माध्यम मेंद्ध से विभ्िान्न कोणों पर है। यह है प त्र पब इस प्रकार आपतित किरणों का अपवतर्न तथा पूणर् आंतरिक परावतर्न। ेपद प त्र द21 ;9ण्12द्धबप के प से अध्िक मानों के लिए स्नेल के अपवतर्न के नियम को लागू नहीं किया जा सकता,ब अतः कोइर् अपवतर्न संभव नहीं होता। सघन माध्यम 1 का विरल माध्यम 2 के सापेक्ष अपवतर्नांक होगा द12 त्र 1ध्ेपद प । सारणीब9ण्1 में वुफछ प्ररूपी क्रांतिक कोणों को सूचीब( किया गया है। पूणर् आंतरिक परावतर्न के लिए एक प्रदशर्न सभी प्रकाश्िाक परिघटनाओं को आजकल आसानी से उपलब्ध् लेसर टाॅचर् या संकेतक का प्रयोग करके बड़ी सरलता से प्रदश्िार्त किया जा सकता है। एक काँच का बीकर लीजिए जिसमें स्वच्छ जल भरा हो। साबुन के एक टुकड़े से जल को कइर् बार हिलाइए जिससे यह थोड़ा आविलहो जाए। एक लेसर संकेतक लीजिए और इसके किरण - पुंज को आविल जल से गुशारिए। आप देखेंगे कि जल के अंदर किरण - पुंज का पथ चमकीला दिखाइर् देता है।किरण - पुंज को बीकर के नीचे से इस प्रकार डालिए कि यह दूसरे सिरे पर जल के ऊपरी पृष्ठ पर टकराए। क्या आप देख पाते हैं कि इसमें आंश्िाक परावतर्न ;जो मेश के नीचे एक बिंदु के रूप में दिखाइर् देगाद्ध तथा आंश्िाक अपवतर्न ;जो वायु में निकलकर छत पर एक बिंदु के रूप में दिखाइर् देता हैद्ध होता है ख्चित्रा 9ण्13 ;ंद्ध, घ् अब लेसर किरण - पुंज को बीकर के एक ओर सेइस प्रकार डालिए कि यह जल के ऊपरी पृष्ठ पर तियर्वफ टकराए ख्चित्रा 9ण्13 ;इद्ध,। लेसर किरण - पुंज की दिशा को इस प्रकार समायोजित कीजिए कि आपको ऐसा कोण प्राप्त हो जाए जिससे जल के पृष्ठ के उफपर अपवतर्न पूणर् रूप से समाप्त हो जाए तथा किरण - पुंज पूणर् रूप से जल में वापस परावतिर्त हो जाए। यह सरलतम रूप में पूणर् आंतरिक परावतर्न है।322 इस जल को एक लंबी परखनली में उलटिए तथा लेसर प्रकाश को इसके उफपर से डालिएजैसा कि चित्रा 9ण्13 ;बद्ध में दशार्या गया है। लेसर किरण - पुंज की दिशा को इस प्रकार समायोजित कीजिए कि प्रत्येक बार जब यह परखनली की दीवारों से टकराए तो इसका पूणर् आंतरिक परावतर्न हो। यह दृश्य ऐसा ही है जैसा कि प्रकाश्िाक तंतुओं में होता है। ध्यान रख्िाए कि लेसर किरण - पंुज में कभी भी सीध न देखें और न ही इसे किसी के चेहरे पर डालें। 9ण्4ण्1 प्रकृति में पूणर् आंतरिक परावतर्न तथा इसके प्रौद्योगिकीय अनुप्रयोग ;पद्ध मरीचिका: गमिर्यों के गमर् दिनों में पृथ्वी के निकट की वायु अपने से उफपर की वायु की तुलना में अध्िक गमर् हो जाती है। वायु का अपवतर्नांक घनत्व के साथ बढ़ जाता है। गमर् वायुकम सघन होती है तथा उसका अपवतर्नांक ठंडी वायु की तुलना में कम होता है। यदि वायुप्रवाह ध्ीमा है, अथार्त, वायु शांत है तो वायु की विभ्िान्न परतों का प्रकाश्िाक घनत्व ऊँचाइर् केसाथ बढ़ता है। परिणामस्वरूप, किसी ऊँची वस्तु, जैसे किसी पेड़ से आता हुआ प्रकाश ऐसेमाध्यम में गमन करता है जिसका अपवतर्नांक भूमिपृष्ठ की ओर घटता जाता है। अतः इस प्रकारकी वस्तु से आने वाली प्रकाश की किरण उत्तरोत्तर अभ्िालंब से दूर मुड़ती जाती है और यदिभूमिपृष्ठ के पास की वायु के लिए आपतन कोण क्रांतिक कोण से अध्िक हो जाए तो यहपूणर् आंतरिक परावतिर्त होती है। इसे चित्रा 9ण्14 में दशार्या गया है। दूरस्थ प्रेक्षक के लिए,प्रकाश भूमिपृष्ठ के कहीं नीचे से आता हुआ प्रतीत होता है। प्रेक्षक स्वाभाविक रूप से यहीमान लेता है कि यह प्रकाश भूमिपृष्ठ से ही, जैसे, ऊँची वस्तु के समीप जल से भरे किसीतालाब या पोखर से पराव£तत होकर उस तक पहुँच रहा है। किसी दूरस्थ वस्तु का इस प्रकारबना उलटा प्रतिबिंब दृष्िटभ्रम उत्पन्न करता है। इस परिघटना को मरीचिका कहते हैं। इस प्रकार की मरीचिका तप्त मरुस्थलों में अत्यंत सामान्य है। ग£मयों के दिनों में, किसी बस या कार में चलते समय सड़क पर, विशेष रूप से महामागो± पर, सड़क का दूर का कोइर् भाग गीला प्रतीत होता है। लेकिन जब आप उस स्थान पर पहुँचते हैं, तो आपको गीलेपन का कोइर् प्रमाण नहीं मिलता। यह भी मरीचिका के कारण है। ;पपद्ध हीरा रू हीरे अपनी भव्य चमक के लिए प्रसि( हैं। इनकी चमक मुख्य रूप से उनके भीतर प्रकाश के पूणर् आंतरिक परावतर्न के कारण है। हीरे - वायु अंतरापृष्ठ के लिए क्रांतिक कोण ;≅24ण्4°द्ध का मान बहुत कम है। इसलिए यदि एक बार हीरे में प्रकाश प्रवेश कर जाए तो इसके अंदर चित्रा 9ण्13 लेसर किरण - पंुज से जल में पूणर् आंतरिक परावतर्न का प्रेक्षण करना ;काँच का बीकर अत्यंत पतला होने के कारण इसमें होने वाले अपवतर्न को नगण्य माना गया हैद्ध। चित्रा 9ण्14 ;ंद्ध किसी प्रेक्षक को पेड़ का उन परिस्िथतियों में दिखाइर् देना जबकि भूमिपृष्ठ के ऊपर की वायु एकसमान ताप पर है। ;इद्ध जब ध्रती के निकट वायु की परतें परिवतीर् ताप पर होती हैं तथा ध्रती के पास की परत सबसे गरम होती है तो दूरस्थ पेड़ से आने वाले प्रकाश का 323पूणर् आंतरिक परावतर्न होता है। प्रकाश के पूणर् आंतरिक परावतर्न होने की अत्यिाकसंभावनाएँ होती हैं। प्रकृति में पाए जाने वालेविरले हीरे ही अपनी सवर्विदित चमक दशार्ते हंै।हीरे की चमक - दमक हीरा तराशने वाले कारीगरोंकी तकनीकी दक्षता पर निभर्र होती है। किसी हीरे को उचित प्रकार से काटकर उसके भीतर बहुल आंतरिक परावतर्न कराए जा सकते हैं। ;पपपद्ध पि्रश्म रू प्रकाश को 90ह् अथवा 180ह् पर मोड़ने के लिए डिशाइन किए गए पि्रज्मों में पूणर् आंतरिक परावतर्न का उपयोग किया जाता है ख्चित्रा 9ण्15 ;ंद्ध तथा ;इद्ध,। ऐसे पि्रश्म को प्रतिबिंब के साइश में बिना कोइर् परिवतर्न किए उलटने के लिए भी प्रयोग किया जाता हैख्चित्रा 9ण्15 ;बद्ध,। पहली दो स्िथतियों के लिए, पि्रश्म के पदाथर् के क्रांतिक कोण प को 45ह् से कम होना चाहिए। सारणीचित्रा 9ण्15 किरणों को πध्2 तथा π पर मोड़ने के लिए ब या प्रतिबिंब के साइश में परिवतर्न किए बगैर उलटने के लिए डिशाइन 9ण्1 देखने पर हम यह पाते हैं कि दोनों ही प्रकारकिए गए पि्रज्मों में पूणर् आंतरिक परावतर्न का उपयोग किया जाता है। के काँच क्राउन तथा ि़लंट के लिए यह सत्य है। ;पअद्ध प्रकाश्िाक तंतु रू आजकल प्रकाश्िाक तंतुओं का, श्रव्य तथा दृश्य संकेतों को लंबी दूरी तक संचरित करने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। प्रकाश्िाक तंतुओं में भी पूणर् आंतरिक परावतर्न की परिघटना का उपयोग किया जाता है। प्रकाश्िाक तंतु उच्च गुणता के संयुक्त काँच/क्वाट्र्श तंतुओं से रचित किया जाता है। प्रत्येक तंतु में एक क्रोड ;बवतमद्ध तथा आच्छद ;बसंककपदहद्ध होता है। क्रोड के पदाथर् का अपवतर्नांक आच्छद के अपवतर्नांक की तुलना में अध्िक होता है। जब प्रकाश के रूप में कोइर् संकेत उचित कोण पर तंतु के एक सिरे पर दिष्ट होता है तब यह उसकी लंबाइर् के अनुदिश बार - बार पूणर् आंतरिक परावतिर्त होता है तथा अंततः दूसरे सिरे सेबाहर निकल आता है ;चित्रा 9ण्16द्ध। क्योंकि प्रत्येक चरण मेंनिम्न द प्रकाश का पूणर् आंतरिक परावतर्न होता है इसलिए प्रकाश संकेत की तीव्रता में कोइर् विशेष हानि नहीं होती। प्रकाश तंतु इस प्रकार बनाए जाते हैं कि एक ओर के आंतरिक पृष्ठ पर परावतिर्त होने के पश्चात दूसरे पृष्ठ पर प्रकाश क्रांतिक कोण से अध्िक कोण पर आपतित होता है। यहाँ तक कि तंतु मेंउच्च द मुड़ाव होने पर भी प्रकाश तंतु के भीतर उसकी लंबाइर् केचित्रा 9ण्16 जब प्रकाश किसी प्रकाश्िाक तंतु में चलता है तो अनुदिश सरलतापूवर्क गमन कर सकता है। इस प्रकार एक इसका क्रमिक पूणर् आंतरिक परावतर्न होता है। प्रकाश तंतु प्रकाश्िात पाइप ;लाइट पाइपद्ध के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। प्रकाश्िाक तंतुओं के बंडल ;गुच्छद्ध का कइर् प्रकार से उपयोग किया जा सकता है। प्रकाश्िाक तंतुओं का बड़े पैमाने पर वैद्युत संकेतों, जिन्हें उचित ट्रांसड्यूरों द्वारा प्रकाश में परिवतिर्त कर लेते हैं, के प्रेषण तथा अभ्िाग्रहण में उपयोग किया जाता है। स्पष्ट है कि प्रकाश्िाक तंतुओं का उपयोग प्रकाश्िाक संकेत प्रेषण के लिए भी किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, इन्हें आंतरिक अंगोंऋ जैसेμ ग्रसिका, आमाशय तथा आंत्रों के दृश्य अवलोकन के लिए ‘लाइट पाइप’ के रूप में प्रयोग किया जाता है। आपने सामान्य रूप से उपलब्ध् महीन प्लास्िटक तंतुओं से बने सजावटी लैंप देखे324 होंगे। इन प्लास्िटक के तंतुओं के स्वतंत्रा सिरे एक पफव्वारे जैसी संरचना बनाते हैं। इन तंतुओं का दूसरा सिरा एक विद्युत लैंप के ऊपर जुड़ा होता है। जब लैंप के स्िवच को ‘आॅन’ करते हैं, तो प्रकाश प्रत्येक तंतु के नीचे से चलता हुआ इसके स्वतंत्रा सिरे की नोक पर एक प्रकाश बिंदु के रूप में दिखाइर् देता है। इस प्रकार के सजावटी लैंपों के तंतु प्रकाश्िाक तंतु हैं। प्रकाश्िाक तंतुओं के निमार्ण में प्रमुख आवश्यकता यह है कि इनके भीतर लंबी दूरियाँ तय करते समय प्रकाश का अवशोषण बहुत कम होना चाहिए। इसे क्वाट्र्श जैसे पदाथो± के शोध्न तथा विश्िाष्ट विरचन द्वारा बनाया जाता है। सिलिका काँच तंतुओं में 1 ाउ लंबे तंतु में प्रकाश के 95ः से भी अध्िक भाग को संचरित करना संभव है। ;इसकी तुलना 1 ाउ मोटाइर् के ख्िाड़की के काँच के ब्लाॅक में जितने प्रतिशत प्रकाश के संचरण की आप अपेक्षा करते हैं, से कीजिए।द्ध 9ण्5 गोलीय पृष्ठों तथा लेंसों द्वारा अपवतर्न अब तक हमने समतल अंतरापृष्ठों पर अपवतर्न के विषय में विचार किया है। अब हम दो पारदशीर् माध्यमों के गोलीय अंतरापृष्ठों पर अपवतर्न के विषय में विचार करेंगे। किसी गोलीय पृष्ठ के अत्यंत सूक्ष्म भाग को समतलीय माना जा सकता है तथा उसके पृष्ठ के प्रत्येक बिंदु पर समान अपवतर्न के नियमों का अनुप्रयोग किया जा सकता है। गोलीय दपर्ण द्वारा परावतर्न की ही भाँति आपतन बिंदु पर अभ्िालंब पृष्ठ के उस बिंदु पर स्पशीर् तल के लंबवत होता है, तथा वह इसीलिए पृष्ठ के वक्रता वेंफद्र से गुशरता है। हम पहले एकल गोलीय पृष्ठ द्वारा अपवतर्न पर विचार करेंगे तथा इसके पश्चात पतले लेंसों की चचार् करेंगे। कोइर् पतला लेंस दो गोलीय पृष्ठों से घ्िारा पारदशीर् माध्यम होता हैऋ जिसका कम से कम एक पृष्ठ अवश्य गोलीय होना चाहिए। एक गोलीय पृष्ठ द्वारा निमिर्त प्रतिबिंब के लिए सूत्रा का अनुप्रयोग, किसी लेंस के दो पृष्ठों पर, क्रमिक रूप में करके हम पतले लेंसों के लिए लेंस मेकर सूत्रा तथा उसके पश्चात लेंस सूत्रा प्राप्त करेंगे। 9ण्5ण्1 किसी गोलीय पृष्ठ पर अपवतर्न चित्रा 9ण्17 में वक्रता त्रिाज्या त् तथा वक्रता वेंफद्र ब् के गोलीय पृष्ठ के मुख्य अक्ष पर स्िथत किसी वस्तु के बिंदु व् के प्रतिबिंब प् की रचना की ज्यामिति दशार्यी गइर् है। प्रकाश किरणें द1 अपवतर्नांक के किसी माध्यम से आपतित होकर द2 अपवतर्नांक के किसी अन्य माध्यम में जाती हैं। पहले की भाँति, हम पृष्ठ का द्वारक ;अथवा पाश्वर् साइशद्ध अन्य संब( दूरियों की तुलना में काप़्ाफी छोटा लेते हैं ताकि आवश्यकतानुसार लघु कोण सन्िनकटन किया जा सके। विशेष रूप से हम छड को छ से मुख्य अक्ष पर लंब की लंबाइर् के लगभग बराबर लेंगे। यहाँ पर डछ जंद ∠छव्ड त्र व्ड डछ जंद ∠छब्ड त्र डब् डछ जंद ∠छप्ड त्र डप् अब Δछव्ब् के लिए, प बहिकोर्ण है। अतः पृष्ठ पर अपवतर्न। 325प त्र ∠छव्ड ़ ∠छब्ड 326 प त्र डछ व्ड डछ डब् ;9ण्13द्ध इसी प्रकार त त्र ∠छब्ड दृ ∠छप्ड अथार्त त त्र डछ डब् डछ डप् ;9ण्14द्ध अब स्नेल के नियम के अनुसार द1 ेपद प त्र द2 ेपद त अथवा कोणों के छोटे मानों के लिए द1प त्र द2त समीकरणों ;9ण्13द्ध तथा ;9ण्14द्ध से प तथा त के मान रखने पर हमें प्राप्त होता है दद द द12 21 ;9ण्15द्धव्डडप् डब् यहाँ व्डए डप् तथा डब् दूरियों के परिमाणों को निरूपित करते हैं। कातीर्य चिÉ परिपाटी का अनुप्रयोग करने परए व्ड त्र दृनए डप् त्र ़अए डब् त्र ़त् इनका मान समीकरण ;9ण्15द्ध में रखने पर हमें प्राप्त होता है, दद दद21 21 ;9ण्16द्धअ न त् समीकरण ;9ण्16द्ध से हमें बिंब तथा प्रतिबिंब के बीच में माध्यम के अपवतर्नांक तथा गोलीय वित पृष्ठ की वक्रता त्रिाज्या के पदों के रूप में संबंध् प्राप्त होता है। समीकरण ;9ण्16द्ध किसी भी प्रकार के वित गोलीय पृष्ठ के लिए मान्य है। उदाहरण 9ण्6 वायु में रखे किसी बिंदु स्रोत से प्रकाश काँच के किसी गोलीय पृष्ठ पर पड़ता है। ;द त्र 1ण्5 तथा वक्रता त्रिाज्या त्र 20 बउद्ध। प्रकाश स्रोत की काँच के पृष्ठ से दूरी 100 बउ है। प्रतिबिंब कहाँ बनेगा? हल यहाँ पर, समीकरण ;9ण्16द्ध में दिए सूत्रा में न त्र दृ 100 बउए अ त्र घ्ए त् त्र ़ 20 बउए द1 त्र 1ए तथा द2 त्र 1ण्5 रखने पर हमें प्राप्त होता है 1ण्5 1 0ण्5 अ 100 20 अथवा अ त्र ़100 बउ प्रतिबिंब आपतित प्रकाश की दिशा में काँच के पृष्ठ से 100 बउ की दूरी पर बनेगा। 9ण्5ण्2 किसी लेंस द्वारा अपवतर्न चित्रा 9ण्18 ;ंद्ध में किसी उभयोत्तल लेंस द्वारा प्रतिबिंब - रचना की ज्यामिति दशार्यी गइर् है। इस प्रतिबिंब की रचना को दो चरणों में देखा जा सकता है: ;पद्ध पहला अपवतीर् पृष्ठ बिंब व् का प्रतिबिंब प्1 बनाता है ख्चित्रा 9ण्18 ;इद्ध,। प्रतिबिंब प्1 दूसरे पृष्ठ द्वारा प्रतिबिंब प् बनने के लिए आभासी बिंब की भाँति कायर् करता है ख्चित्रा 9ण्18 ;बद्ध,। समीकरण ;9ण्15द्ध का उपयोग पहले अंतरापृष्ठ ।ठब् पर करने पर हमें प्राप्त होता है: द ददद1 221 ;9ण्17द्धव्ठ ठप्1 ठब्1 दूसरे अंतरापृष्ठ’ ।क्ब् के लिए भी समान प्रिया का अनुप्रयोग करने पर हमें प्राप्त होता है: द ददद2 121 ;9ण्18द्धक्प्1 क्प् क्ब्2 ’ नोट कीजिए अब ।क्ब् के दायीं ओर के माध्यम का अपवतर्नांक द1 है जबकि इसके बायीं ओर यह द2 है। इसके अतिरिक्त क्प्1 )णात्मक है क्योंकि दूरी आपतित प्रकाश की दिशा के विपरीत दिशा में मापी गइर् है। 327 किसी पतले लेंस के लिए ठप्1 त्र क्प्1। समीकरणों ;9ण्17द्ध तथा ;9ण्18द्ध को जोड़ने पर हमें प्राप्त होता है: द 11 द11;दद द्ध2 1 ;9ण्19द्धव्ठ क्प् ठब्1 क्ब् 2 मान लीजिए बिंब अनंत पर है तो, व्ठ →∞ तथा क्प् त्र एि तब समीकरण ;9ण्19द्ध से प्राप्त होगा: 1द11;दद द्ध2 1 ;9ण्20द्धिठब्1 क्ब्2 वह बिंदु जहाँ अनंत पर रखे बिंब का प्रतिबिंब बनता है, लेंस का प़फोकस थ् कहलाता है तथा दूरी द्विारा इसकी प़फोकस दूरी प्राप्त होती है। किसी लेंस के इसके दोनों ओर दो प़फोकस होते हैं थ् तथा थ्ष्। चिÉ परिपाटी द्वारा ठब्1 त्र ़ त्¹चित्रा 9ण्18;इद्धह् 1 क्ब्2 त्र दृत्2 ¹चित्रा 9ण्18;बद्धह् इसलिए समीकरण ;9ण्20द्ध को लिखा जा सकता है: द21 1  द21 ;9ण्21द्धत्ित् द12 1 समीकरण ;9ण्21द्ध को लेंस - मेकर सूत्रा के रूप में जाना जाता है। स्पष्ट रूप से यह सूत्रा उचित वक्रता त्रिाज्याओं के पृष्ठों के उपयोग द्वारा वांछित पफोकस दूरी के लेंसों की अभ्िाकल्पना ;डिशाइनद्ध करने में उपयोगी है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यही सूत्रा अवतल लेंसों पर भी समान रूप से लागू होता है। उस स्िथति में त्)णात्मक1चित्रा 9ण्18 ;ंद्ध बिंब की स्िथति तथा उभयोत्तल लेंस द्वारा निमिर्त तथा त्2 ध्नात्मक होता है, इसलिए िणात्मक होता है। प्रतिबिंब ;इद्ध पहले गोलीय पृष्ठ पर अपवतर्न ;बद्ध दूसरे गोलीय पृष्ठ पर समीकरण ;9ण्19द्ध तथा ;9ण्20द्ध से हमें प्राप्त होता है: अपवतर्न। दद द11 1 ;9ण्22द्धव्ठ क्प् िपुनः पतले लेंस - सन्िनकटन में बिंदु ठ तथा क् दोनों ही लेंस के प्रकाश्िाक वेंफद्र के बहुत निकटमाने जाते हैं। चिÉ परिपाटी का उपयोग करने पर ठव् त्र दृ नए क्प् त्र ़अ। इन मानों को ;9ण्22द्ध में रखने पर हमें प्राप्त होता है 111 ;9ण्23द्धअन िसमीकरण ;9ण्23द्ध लेंसों के लिए परिचित पतले लेंस सूत्रा है। यद्यपि यहाँ हमने इसे उत्तल लेंस द्वारा निमिर्त वास्तविक प्रतिबिंब के लिए व्युत्पन्न किया है, तथापि यह सूत्रा दोनों ही लेंसों अथार्त,उत्तल तथा अवतल तथा दोनों ही प्रकार के प्रतिबिंबों, वास्तविक तथा आभासी के लिए मान्य है।यह बताना आवश्यक है कि किसी उभयोत्तल अथवा उभयावतल लेंस के दो प़फोकस थ् तथा थ्′ लेंस के प्रकाश्िाक वेंफद्र से समान दूरी पर हैं। प्रकाश के स्रोत की ओर स्िथत प़फोकस को प्रथम प़फोकस बिंदु कहते हैं जबकि दूसरा द्वितीय प़फोकस बिंदु कहलाता है।328 लेंसों द्वारा बने किसी बिंब के प्रतिबिंब की स्िथति ज्ञात करने के लिए सि(ांत रूप में हम बिंब के किसी बिंदु से आने वाली कोइर् भी दो किरणें लेकर तथा अपवतर्न के नियमों द्वारा उनके पथ अनुरेख्िात करके उस बिंदु की स्िथति ज्ञात करते हैं, जहाँ अपवतिर्त किरणें वास्तव में मिलती हैं ;अथवा मिलती प्रतीत होती हैंद्ध। तथापि, व्यवहार में निम्नलिख्िात में से कोइर् सी दो किरणों का चयन करना कायर् को सहज बना देता है। ;पद्ध बिंब से निकलने वाली वह किरण जो लेंस के मुख्य अक्षके समांतर होती है, अपवतर्न के पश्चात ;उत्तल लेंस मेंद्ध लेंस के दूसरे मुख्य प़फोकस थ्′ से गुशरती है, अथवा;अवतल लेंस मेंद्ध लेंस के प्रथम मुख्य प़फोकस थ् से ;ंद्धअपसरित प्रतीत होती है। ;पपद्ध लेंस के प्रकाश्िाक वेंफद्र से गुशरने वाली प्रकाश किरणअपवतर्न के पश्चात बिना किसी विचलन के निगर्त होती है। ;पपपद्ध लेंस के प्रथम मुख्य प़फोकस से गुशरने वाली प्रकाश किरण;उत्तल लेंस मेंद्ध अथवा इस बिंदु पर आकर मिलती प्रतीतहोने वाली प्रकाश किरण ;अवतल लेंस में द्ध अपवतर्न केपश्चात मुख्य अक्ष के समांतर निगर्त होती है।चित्रा 9ण्19 ;ंद्ध तथा ;इद्ध में इन नियमों को क्रमशः उत्तलतथा अवतल लेंसों के लिए दशार्या गया है। आपको लेंस सेविभ्िान्न दूरियों पर बिंब को रखकर इस प्रकार के किरण आरेखखींचने का अभ्यास करना चाहिए तथा यह भी सत्यापित करनाचित्रा 9ण्19 ;ंद्ध उत्तल लेंस, ;इद्ध अवतल लेंस से गुशरने वालीचाहिए कि लेंस सूत्रा, समीकरण ;9ण्23द्धए सभी उदाहरणों में समान प्रकाश किरणों का अनुरेखण।रूप से लागू होता है।यहाँ पर यह अवश्य याद रखना चाहिए कि किसी बिंब के प्रत्येक बिंदु से अनंत किरणें उत्स£जतहोती हैं। ये सभी किरणें लेंस से अपवतर्न के पश्चात एक ही प्रतिबिंब बिंदु से गुशरती हैं।दपर्ण की भाँति लेंसों के लिए भी, किसी लेंस द्वारा उत्पन्न आवध्र्न ;उद्ध को प्रतिबिंब के साइश ;ी′ द्ध तथा बिंब के साइश ;ीद्ध के अनुपात के रूप में परिभाष्िात किया जाता है। गोलीय दपर्णों की भाँति यहाँ भी किसी लेंस के लिए यह सरलता से देखा जा सकता है कि ीअ उ त्र त्र ;9ण्24द्धीन चिÉ परिपाटी का पालन करने पर हम यह पाते हैं कि उत्तल अथवा अवतल लेंस द्वारा बने सीधे ;तथा आभासीद्ध प्रतिबिंब के लिए उ ध्नात्मक होता है, जबकि किसी उलटे ;तथा वास्तविकद्धप्रतिबिंब के लिए उ )णात्मक होता है। उदाहरण 9ण्7 कोइर् जादूगर खेल दिखाते समय द त्र 1ण्47 अपवतर्नांक के काँच के लेंस को किसीद्रव से भरी द्रोण्िाका में डालकर अदृश्य कर देता है। द्रव का अपवतर्नांक क्या है? क्या यह द्रव जलहो सकता है? हल द्रव में लेंस के अदृश्य होने के लिए द्रव का अपवतर्नांक, लेंस के काँच के अपवतर्नांक के बराबरहोना चाहिएऋ द त्र द। अथार्त द्रव का अपवतर्नांक 1ण्47 है। इस प्रकरण में 1ध् ित्र0 या12ि→∞ प्राप्त होगा। द्रव के अंदर लेंस काँच की एक समतल शीट की भाँति कायर् करेगा। द्रोण्िाकामें भरा द्रव जल ;अपवतर्नांक त्र 1ण्33द्ध नहीं हो सकता। यह द्रव ग्िलसरीन हो सकता है। 9ण्5ण्3 लेंस की क्षमता किसी लंेस की क्षमता उस पर पड़ने वाले प्रकाश को अभ्िासरित अथवा अपसरित करने की कोटिकी माप होती है। स्पष्टतः कम प़फोकस दूरी का कोइर् लेंस आपतित प्रकाश को अध्िक मोड़ता है, 329 उत्तल लेंस में अपवतिर्त किरण अभ्िासरित होती है तथा अवतल लेंस मेंअपवतिर्त किरण अपसरित होती है। किसी लेंस की क्षमता च् को उस कोण की स्पशर्ज्या से परिभाष्िात करते हैं, जिससे यह किसी प्रकाश पंुज को जोप्रकाश्िाक वेंफद्र से एकांक दूरी पर आकर गिरता है, अभ्िासरित या अपसरितकरता है। ;चित्रा 9ण्20द्ध। जंद ी य यदि ी 1 जंद 1 ि िअथवा 1 ;δ के लघु मान के लिएद्ध।िचित्रा 9ण्20 किसी लेंस की क्षमता। 1अतः च् त्र ि;9ण्25द्ध लेंस की क्षमता का ैप् मात्राक डाइआॅप्टर ;क्द्ध रू 1क् त्र 1उदृ1 है। अतः 1उ पफोकस दूरी केलेंस की क्षमता एक डाइआॅप्टर है। अभ्िासारी लेंसों की क्षमता ध्नात्मक तथा अपसारी लंेस की क्षमता)णात्मक होती है। इस प्रकार जब कोइर् नेत्रा चिकित्सक ़ 2ण्5 क् क्षमता का संशोध्क लेंस निधार्रितकरता है, तब ़ 40 बउ प़फोकस दूरी के उत्तल लेंस की आवश्यकता होती है। दृ 4ण्0 क् क्षमताके लेंस से तात्पयर् दृ 25 बउ प़फोकस दूरी का अवतल लेंस होता है। उदाहरण 9ण्8 ;पद्ध यदि ित्र ़0ण्5 उ है तो लेंस की क्षमता क्या है? ;पपद्ध किसी उभयोत्तल लेंस केदो पफलकों की वक्रता त्रिाज्याएँ 10 बउ तथा 15 बउ हैं। उसकी प़फोकस दूरी 12 बउ है। लेंसके काँच का अपवतर्नांक ज्ञात कीजिए। ;पपपद्ध किसी उत्तल लेंस की वायु में प़फोकस दूरी 20 बउ है। जल में इसकी प़फोकस दूरी क्या है? ख्वायु - जल का अपवतर्नांक 1ण्33 तथा वायु - काँच काअपवतर्नांक 1ण्5 है।, हल ;पद्ध लेंस की क्षमता त्र ़2क् ;पपद्ध यहाँ ित्र ़12 बउए त्1 त्र ़10 बउए त् त्र दृ15 बउ2वायु का अपवतर्नांक 1 माना जाता है।समीकरण ;9ण्22द्ध के लेंस सूत्रा का प्रयोग करने के लिए एि त्1 तथा त्2 के लिए चिÉ परिपाटी के अनुसार विभ्िान्न राश्िायों के मान रखने पर हमें 1 11;द 1द्ध 12 1015 द त्र 1ण्5 प्राप्त होगा। ;पपपद्ध वायु में काँच के लेंस के लिए, द2 त्र 1ण्5ए द1 त्र 1ए ित्र ़20 बउ इस प्रकार लेंस सूत्रा से प्राप्त होगा 1 110ण्5 20 त्1 त्2 उसी काँच के लेंस के लिए जल में, द त्र 1ण्5ए द त्र 1ण्33ण् इसलिए211ण्33 11;1ण्5 1ण्33द्ध ;9ण्26द्धित्1 त्2 इन दोनों समीकरणों को संयोजित करने पर हमें मिलेगा ित्र ़ 78ण्2 बउ 9ण्5ण्4 संपवर्फ में रखे पतले लेंसों का संयोजन एक - दूसरे के संपवर्फ में रखे 1ि तथा 2ि प़फोकस दूरियों के दो पतले लेंसों । तथा ठ पर विचार330 कीजिए। मान लीजिए कोइर् बिंब पहले लेंस । के प़फोकस से दूर किसी बिंदु व् पर स्िथत है ;चित्रा 9ण्21द्ध। पहला लेंस ¯बदु प्1 पर प्रतिबिंब बनाता है। क्योंकि प्रतिबिंब प्1 वास्तविक है, अतः यह दूसरे लेंस ठ के लिए आभासी ¯बब की भाँति कायर् करता है तथा अंतिम प्रतिबिंब प् पर बनता है। हमें इस बात को समझ लेना चाहिए कि पहले लेंस से प्रतिबिंब का बनना, केवल अंतिम प्रतिबिंब की स्िथति निधर्रित करने के लिए, माना गया है। वास्तव में पहले लेंस से निकलने वाली किरणों की दिशा, उनके दूसरे लेंस से टकराने वाले कोण के अनुसार परिवतिर्त हो जाती है। चित्रा 9ण्21 संपवर्फ में रखे दो पतले लेंसों द्वारा प्रतिबिंब क्योंकि लेंस पतले हैं, हम दोनों लेंसों के प्रकाश्िाक वेंफद्रों को संपाती बनना। मान सकते हैं। मान लीजिए यह केंद्रीय बिंदु च् द्वारा निदिर्ष्ट होता है। पहले लेंस । द्वारा बने प्रतिबिंब के लिए 111 ;9ण्27द्धअन ि11 दूसरे लेंस ठ द्वारा बने प्रतिबिंब के लिए 11 1 ;9ण्28द्धअअ1 2ि समीकरण ;9ण्27द्ध तथा ;9ण्28द्ध को जोड़ने पर, 111 1 ;9ण्29द्धअन 1ि 2ि इन दो लेंसों के तंत्रा को पि़फोकस दूरी के किसीएकल लेंस के तुल्य मानने पर, 111 अन िअथार्त 11 1 ;9ण्30द्धिि1 2ि यह व्युत्पिा संपवर्फ में रखे कइर् पतले लेंसों के निकाय के लिए भी मान्य है। यदि 1िए 2िए 3िएण्ण्ण् प़फोकस दूरियों के बहुत से लेंस एक - दूसरे के संपवर्फ में रखे हैं, तो इस संयोजन की प्रभावी प़फोकस दूरी होगीः 1 1 1 ि ि 2 1 ि 3 1 ि ३ ;9ण्31द्ध क्षमता के पदों में समीकरण ;9ण्31द्ध को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है च् त्र च्1 ़ च्2 ़ च्3 ़ ३ ;9ण्32द्ध यहाँ च्इस लेंस संयोजन की नेट क्षमता है। ध्यान दीजिए, समीकरण ;9ण्32द्ध में अलग - अलग क्षमताओं का बीजगण्िातीय योग दिया गया है, अथार्त समीकरण के दक्ष्िाण पक्ष में वुफछ पद ध्नात्मक;उत्तल लेंसों के लिएद्ध तथा वुफछ पद )णात्मक ;अवतल लेंसों के लिएद्ध हो सकते हैं। लेंसों के संयोजन हमें व्युत्पन्न आवध्र्न क्षमता के अपसारित अथवा अभ्िासारित लेंस प्राप्त करने में सहायक होते हैं तथा ये प्रतिबिंब की तीक्ष्णता में भी वृि कर देते हैं। क्योंकि पहले लेंस द्वारा बना प्रतिबिंब दूसरे लेंस के लिए बिंब बन जाता है, समीकरण ;9ण्25द्ध में यह अंतनिर्हित है कि संयोजन का वुफल आवध्र्न उएअलग - अलग आवध्र्नों ;उ1ए उ2ए उएण्ण्द्ध के गुणनपफल के बराबर होता है।3331उत्र उ ण्ण्ण् ;9ण्33द्ध1 उ2 उ3इस प्रकार के लेंसों के संयोजन सामान्यतः वैफमरों, सूक्ष्मदश्िार्यों, दूरबीनों तथा अन्य प्रकाश्िाक यंत्रों के लेंसों के डिशाइन में उपयोग किए जाते हैं। 332 चतुभुर्ज ।फछत् में दो कोण ;फ तथा त् शीषो± परद्ध समकोण हैं। इसलिए इस भुजा के अन्य दो कोणों का योग 180ह् है। ∠। ़ ∠फछत् त्र 180ह् त्रिाभुज फछत् से त1 ़ त2 ़ ∠फछत् त्र 180ह् इन दोनों समीकरणों की तुलना करने पर, हमें प्राप्त होगा त1 ़ त2 त्र । ;9ण्34द्ध वुफल विचलन δ दोनों पफलकों पर विचलनों का योग हैः δ त्र ;प दृ त1 द्ध ़ ;म दृ त2 द्ध चित्रा 9ण्23 काँच के त्रिाभुजाकार िश्म से किसी प्रकाश किरण अथार्तए δ त्र प ़ म दृ । ;9ण्35द्ध का गुशरना। इस प्रकार विचलन कोण आपतन कोण पर निभर्र करता है। चित्रा 9ण्24 में आपतन कोण तथा विचलन कोण के बीच ग्राप़फ दशार्या गया है। आप यह देख सकते चित्रा 9ण्24 किसी त्रिाभुजाकार िश्म के लिए आपतन कोण विचलन कोणहैं कि व्यापक रूप से, केवल प त्र म को छोड़कर, प्रत्येक विचलन कोण δ के तदनुरूपी प के तथा इस प्रकार म के दो मान हैं। यह तथ्य समीकरण ;9ण्35द्ध में प तथा म की सममिति से अपेक्ष्िात है, अथार्त, यदि प तथा म को आपस में बदल दिया जाए तो δ अपरिवतिर्त रहता है। भौतिक रूप में यह इस तथ्य से संबंध्ित है कि चित्रा 9ण्23 में प्रकाश किरण के पथ को वापस आरेख्िात करने पर वही विचलन कोण प्राप्त होता है। न्यूनतम विचलन क् पर, पि्रश्म के अंदर अपवतिर्त किरण इसके उ आधर के समांतर हो जाती है। हमें प्राप्त होता है δ त्र क्उए प त्र म जिसका तात्पयर् है कि त1 त्र त2 समीकरण ;9ण्34द्ध से हमें प्राप्त होता है । 2त त्र । अथवा त त्र ;9ण्36द्ध2 इसी प्रकार समीकरण ;9ण्35द्ध से हमें प्राप्त होता है क् उ त्र 2प दृ ।ए अथवा प त्र ;। ़ क् उद्धध्2 ;9ण्37द्ध यदि िश्म के पदाथर् का अपवतर्नांक द21 है तो प ेपदख्;  उ द्धध्2, ेपद ।क् द 21 ;9ण्38द्धेपद त ेपदख् । ध्2, कोण । तथा क् की माप प्रयोग द्वारा की जा सकती है। इस 600 उ आपतन कोणप्रकार समीकरण ;9ण्38द्ध िश्म के पदाथर् के अपवतर्नांक के ;द्धप मापन की विध्ि है। ;पद्ध तथा विचलन कोण ;δ द्ध के बीच एक ग्राप़फ।छोटे कोण के िश्म अथार्त पहले पि्रश्म के लिए क् भी कापफी छोटा होता है तथा हमें प्राप्त होगा़उ ेपदख्; ।क्उ द्धध्2, ।क्उ ध्2 द21  ेपदख् । ध्2, । ध्2 क्उ त्र ;द21दृ1द्ध। इसका तात्पयर् है कि पतले िश्म में प्रकाश का विचलन काप़्ाफी कम होता है। 9ण्7 िश्म द्वारा परिक्षेपण 333हमें यह बहुत पहले से ही ज्ञात है कि जब सूयर् के प्रकाश का कोइर् संकीणर् प्रकाश पुंज जिसे प्रायः श्वेत प्रकाश कहते हैं, किसी काँच के िश्म पर आपतित होता है तो निगर्त प्रकाश में कइर् वणर् देखे जाते हैं। वास्तव में वणो± में सतत परिवतर्न होता है, परंतु मोटे तौर पर विभ्िान्न संघटक वणर् इस क्रम में होते हैं: बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल ;ये परिवणीर् शब्द टप्ठळल्व्त् द्वारा व्यक्त होते हंैद्ध। लाल वणर् का प्रकाश में सबसे कम तथा बैंगनी वणर् का प्रकाश मंे सबसे अध्ि क बंकन होता है ;चित्रा 9ण्25द्ध। प्रकाश के अपने संघटक वणो± में विपाटन ;ेचसपजजपदहद्ध की परिघटना को परिक्षेपण ;कपेचमतेपवदद्ध कहते हैं। प्रकाश के संघटक वणो± के प्रतिरूप को स्पेक्ट्रम कहते हैं। आजकल स्पेक्ट्रम शब्द का उपयोग अध्िक व्यापक रूप में होने लगा है। हमने अध्याय 8 में तरंगदैघ्यर् के बड़े विशाल परिसर में वैद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम की चचार् की थी। जिसमें हमने γ.किरणों से रेडियो तरंगों तक की तरंगदैघ्यो± को सम्िमलित किया है, जिनमें प्रकाश का स्पेक्ट्रम ;दृश्य स्पेक्ट्रमद्ध केवल एक छोटा - सा भाग है। यद्यपि स्पेक्ट्रम का दिखाइर् देना अब एक सामान्य ज्ञान की बात है, परंतु भौतिकी के इतिहास में यह एक बड़े वाद - विवाद का विषय था। क्या िश्म किसी प्रकार स्वयं रंग उत्पन्न करता है अथवा यह केवल श्वेत प्रकाश में पहले से ही उपस्िथत रंगों को पृथक करता है? एक सरल तथा अत्यंत महत्वपूणर् क्लासिकी प्रयोग से आइजक न्यूटन ने इस वाद - विवाद कोसदा के लिए हल कर दिया। उन्होंने उसी िश्म के समान एक अन्य िश्म लिया और उसे उलटाकरके इस प्रकार रखा कि पहले िश्म का निगर्त किरण - पुंज दूसरे िश्म पर आपतित हो ;चित्रा 9ण्26द्ध। इस प्रकार प्राप्त परिणामी निगर्त किरण - पुंज श्वेत प्रकाश का पाया गया। इसकी व्याख्यास्पष्ट थी μ पहले िश्म ने श्वेत प्रकाश को उसके संघटक वणो± में पृथक किया जबकि उलटे रखेिश्म ने इन्हें पुनस±योजित करके श्वेत प्रकाश में परिवतिर्त कर दिया। इस प्रकार, श्वेत प्रकाश स्वयं विभ्िान्न वणो± से मिलकर बनता है, जो िश्म द्वारा पृथक कर दिए जाते हैं।यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि प्रकाश किरण, जैसा कि गण्िात की भाषा में परिभाष्िातकिया जाता है, का कोइर् अस्ितत्व नहीं है। वास्तविक किरण वस्तुतः प्रकाश के अनेक किरणों कापंुज है। काँच के स्लैब में प्रवेश करने पर प्रत्येक किरण इसके संघटक वणो± में विभक्त हो जातीहै। विभ्िान्न वणो± की ये किरणें जब दूसरे पफलक से बाहर निकलतीहैं, तो वे पुनः श्वेत प्रकाश उत्पन्न करती हैं। अब हम जानते हैं कि प्रकाश का वणर् प्रकाश की तरंगदैघ्यर् सेसंब( होता है। दृश्य स्पेक्ट्रम में लाल प्रकाश दीघर् तरंगदैघ्यर् के सिरे ;्750 दउद्ध पर जबकि बैंगनी प्रकाश लघु तरंगदैघ्यर् के सिरे ;् 400 दउद्ध पर होता है। परिक्षेपण का कारण यह है कि किसीमाध्यम का अपवतर्नांक विभ्िान्न तरंगदैघ्यो± ;वणो±द्ध के लिएभ्िान्न - भ्िान्न होता है। उदाहरण के लिए, श्वेत प्रकाश का लाल घटक सबसे कम मुड़ता है जबकि बैंगनी घटक अध्िक मुड़ता है।तुल्य रूप में हम कह सकते हैं कि काँच के िश्म में बंैगनी प्रकाशकी तुलना में लाल प्रकाश अपेक्षाकृत अध्िक चाल से गमन करताहै। सारणी 9ण्2 में विभ्िान्न तरंगदैघ्यो± के लिए क्राउन काँच तथा िलंट काँच के अपवतर्नांक दशार्एगए हैं। मोटे लेंसों को अनेक िश्मों से मिलकर बना हुआ माना जा सकता है, इसलिए मोटे लेंस प्रकाश के परिक्षेपण के कारण वणर् विपथन ;बीतवउंजपब ंइइमतंजपवदद्ध क्लासिकी प्रयोग दशार्ते हैं।334 तरंगदैघ्यर् के साथ अपवतर्नांक में परिवतर्न वुफछ माध्यमों में अन्य माध्यमों की तुलना में अध्िक सुस्पष्ट होता है। वास्तव में निवार्त में प्रकाश की चाल तरंगदैघ्यर् पर निभर्र नहीं करती। अतः निवार्त ;अथवा सन्िनकटतः वायुद्ध एक अपरिक्षेपी माध्यम है जिसमें सभी वणर् समान चाल से गमन करते हैं। यह इस तथ्य से भी सि( होता है कि सूयर् का प्रकाश हमारे पास तक श्वेत प्रकाश के रूप में पहुँचता है, इसके विभ्िान्न संघटकों के रूप में नहीं। इसके विपरीत काँच एक परिक्षेपी माध्यम है। 9ण्8 सूयर् के प्रकाश के कारण वुफछ प्राकृतिक परिघटनाएँ हमारे चारों ओर की वस्तुओं के साथ प्रकाश के खेल हमें बहुत - सी रमणीय परिघटनाएँ देते हैं। हमारे चारों ओर हर समय दिखाइर् देने वाले भव्य रंग सूयर् के प्रकाश के कारण ही संभव हैं। आकाश का नीला प्रतीत होना, श्वेत बादल, सूयोर्दय तथा सूयार्स्त के समय आकाश की लालिमा, इंद्रध्नुष, वुफछ पक्ष्िायों के पंखों, सीपियों, शंखों एवं मोतियों की रंग - बिरंगी चमक वुफछ ऐसे अद्भुत एवंआश्चयर्जनक प्राकृतिक चमत्कार हैं, जिनसे हम भली - भाँति परिचित हैं और उनके अभ्यस्त हो चुके हैं। यहाँ इनमें से वुफछ का हम भौतिकी की दृष्िट से वणर्न करेंगे। 9ण्8ण्1 इंद्रध्नुष इंद्रध्नुष वायुमंडल में उपस्िथत जल की बूँदों के द्वारा प्रकाश के परिक्षेपण का एक उदाहरण है। यह सूयर् के प्रकाश का जल की गोलीय सूक्ष्म बूँदों द्वारा परिक्षेपण, अपवतर्न तथा आंतरिक परावतर्न के संयुक्त प्रभाव की परिघटना है। इंद्रध्नुष देखने के लिए आवश्यक शते± ये हैं कि सूयर् आकाश के किसी एक भाग ;मान लीजिए पश्िचमी क्ष्िातिजद्ध मंे चमक रहा हो जबकि आकाश के विपरीत भाग ;मान लीजिए पूवीर् क्ष्िातिजद्ध में वषार् हो रही हो। इस प्रकार कोइर् भी प्रेक्षक इंद्रध्नुष तभी देख सकता है जब उसकी पीठ सूयर् की ओर हो। इंद्रध्नुषों का बनना समझने के लिए चित्रा 9ण्27;ंद्ध पर विचार करते हैं। सूयर् का प्रकाश सवर्प्रथम वषार् की बूँद में प्रवेश करते समय अपव£तत होता है, जिसके कारण श्वेत प्रकाश की विभ्िान्न तरंगदैघ्यर् ;वणर्द्ध पृथक हो जाते हैं। प्रकाश की उच्च तरंगदैघ्यर् ;लालद्ध सबसे कम मुड़ती है जबकि निम्न तरंगदैघ्यर् ;बैंगनीद्ध सबसे अध्िक मुड़ती है। इसके पश्चात ये संघटक किरणें बूँद के भीतरी पृष्ठ से टकराती हैं और यदि बूँद पृष्ठ पर अभ्िालंब और अपव£तत किरण के बीच का कोण क्रांतिक कोण ;इस प्रकरण में 48ह्द्ध से अध्िक है तो आंतरिकतः पराव£तत हो जाती है। यह पराव£तत प्रकाश, बूँद से बाहर निकलते समय चित्रा में दशार्ए अनुसार पुनः अपव£तत हो जाता है। यह पाया जाता है कि सूयर् से आने वाले प्रकाश के सापेक्ष बैंगनी प्रकाश 40ह् के कोण पर तथा लाल प्रकाश 42ह् के कोण पर निगर्त होता है। अन्य वणो± के लिए कोणों के मान इन दोनों के मध्य 335होते हैं। इंद्रध्नुष का बननाीजजचरूध्ध्ूूूण्मवण्नबंतण्मकनध्तंपदइवूे ीजजचरूध्ध्ूूूण्ंजवचजपबेण्बवण्नाध्इवूेण्ीजउ चित्रा 9ण्27 इंद्रध्नुष ;ंद्ध जल की बूँद पर आपतित सूयर् की किरणों का बूँद द्वारा दो बार अपवतर्न तथा एक बार आंतरिक परावतर्न होता है, ;इद्ध बूँद के अंदर प्रकाश की किरण के आंतरिक परावतर्न तथा अपवतर्न का विव£ध्त दृश्य जिसके कारण प्राथमिक इंद्रध्नुष बनता है तथा ;बद्ध बूँद के अंदर किरणों के दो बार आंतरिक परावतर्न के कारण द्वितीयक इंद्रध्नुष बनता है। चित्रा 9ण्27;इद्ध में प्राथमिक इंद्रध्नुष का बनना समझाया गया है। हम देखते हैं कि बूँद 1 से लाल प्रकाश तथा बूँद 2 से बैंगनी प्रकाश प्रेक्षक की आँखों तक पहुँचता है। बूँद 1 से आने वाला बैंगनी तथा बूँद 2 से आने वाला लाल प्रकाश प्रेक्षक की आँखों से ऊपर अथवा नीचे की ओर दिष्ट होते हैं। इस प्रकार पे्रक्षक इंद्रध्नुष के शीषर् पर लाल वणर् और पैंदी पर बैंगनी वणर् देखता है। इस प्रकार प्राथमिक इंद्रध्नुष तीन चरणीय प्रक्रम अथार्त अपवतर्न, परावतर्न तथा पुनः अपवतर्न का परिणाम है। 336 जब प्रकाश किरणें किसी वषार् की बूँद के भीतर एक बार की बजाय दो बार आंतरिकतः पराव£तत होती हैं तो द्वितीयक इंद्रध्नुष बनता है ¹चित्रा 9ण्27;बद्धह्। यह चार चरणीय प्रक्रम है। द्वितीय परावतर्न के प्रक्रम में प्रकाश की तीव्रता कम हो जाती है। इसलिए द्वितीयक इंद्रध्नुष प्राथमिक इंद्रध्नुष की तुलना में ध्ुँध्ला होता है। इसके साथ ही जैसा कि चित्रा 9ण्27;बद्ध से स्पष्ट है इसमें वणो± का क्रम प्राथमिक इंद्रध्नुष की तुलना में उलटा होता है। 9ण्8ण्2 प्रकाश का प्रकीणर्न जब सूयर् का प्रकाश पृथ्वी के परिमंडल में गमन करता है तो यह वायुमंडल के कणों द्वारा प्रकी£णत होता है। छोटी तरंगदैघ्यर् का प्रकाश बड़ी तरंगदैघ्यो± की तुलना में कहीं अध्िक प्रकीणर् होता है। ;प्रकीणर्न की मात्रा तरंगदैघ्यर् की चतुथर् घात के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसे रैले प्रकीणर्न कहते हैं।द्ध यही कारण है कि स्वच्छ आकाश में नीला वणर् सवार्ध्िक प्रमुखता दशार्ता है, क्योंकि लाल वणर् की अपेक्षा नीले वणर् की तरंगदैघ्यर् कम होती है तथा इसका प्रकीणर्न अध्िक प्रबलता से होता है। वास्तव में बैंगनी वणर् की तरंगदैघ्यर् और भी कम होने के कारण यह नीले वणर् से भी अध्िक प्रबलता से प्रकीणर् होता है। लेकिन हमारी आँखें बैंगनी वणर् की अपेक्षा नीले वणर् के लिए अध्िक सुग्राही हैं, इसलिए हमें आकाश नीला दिखाइर् देता है। वायुमंडल में उपस्िथत बड़े कण जैसे ध्ूल तथा जल की सूक्ष्म बूँदंे भ्िान्न व्यवहार दशार्ते हैं। यहाँ पर इस संदभर् में प्रासंगिक राश्िा, प्रकाश की तरंगदैघ्यर् λ तथा प्रकीणर्क ;मान लीजिए इनका प्रारूपी साइश ं हैद्ध के आपेक्ष्िाक साइश हैं। ं ढढ λ के लिए, रैले प्रकीणर्न होता है जो कि ;1ध्λद्ध4 के अनुक्रमानुपाती होता है। ं झझ λ के लिए, अथार्त बडे़ साइश की प्रकीणर्क वस्तु के लिए ;उदाहरण के लिए वषार् की बूँदों, बड़े आकार के ध्ूल कण अथवा हिम कणद्धऐसा प्रकीणर्न नहीं होताऋ सभी तरंगदैघ्यर् लगभग समान रूप से प्रकी£णत होती हैं। इसीलिए बादल जिनमें ं झझ λ साइश की जल की सूक्ष्म बूँदें होती हैं, सामान्यतः श्वेत प्रतीत होते हैं। सूयोर्दय तथा सूयार्स्त के समय सूयर् की किरणों कोवायुमंडल से होकर अपेक्षाकृत अध्िक दूरियाँ तय करनी पड़ती हैं ;चित्रा 9ण्28द्ध। इस प्रकाश से नीला तथा छोटी तरंगदैघ्यर् का अध्िकांश प्रकाश प्रकीणर्न द्वारा पृथक हो जाता है। अतः प्रकाश का सबसे कम प्रकीण्िार्त भाग जो हमारी आँखों तक पहँुचता है, रक्ताभ प्रतीत होता है। यही चित्रा 9ण्28 सूयार्स्त तथा सूयोर्दय के समय सूयर् का प्रकाश वायुमंडल में अध्िक दूरी गमन करता है।कारण है कि क्ष्िातिज के निकट होने पर सूयर् तथा पूणर् चंद्रमा रक्ताभ प्रतीत होते हैं। 9ण्9 प्रकाश्िाक यंत्रा दपर्णों, लेंसों तथा िश्मों के परावतीर् तथा अपवतीर् गुणों का उपयोग करके अनेक प्रकाश्िाक युक्ितयाँ एवं यंत्रा डिशाइन किए गए हैं। परिदशीर्, बहुमूतिर्दशीर्, द्विनेत्राी, दूरदशर्क, सूक्ष्मदशीर् वुफछ ऐसी प्रकाश्िाक युक्ितयों तथा यंत्रों के उदाहरण हैं जिन्हें हम सामान्य रूप से उपयोग में लातेहैं। वास्तव में हमारे नेत्रा सबसे महत्वपूणर् प्रकाश्िाक युक्ितयों में से एक हंै जिनसे प्रकृति ने हमें संपन्न किया है। नेत्रा से प्रारंभ करके हम सूक्ष्मदशीर् तथा दूरबीन के कायर् करने के सि(ांत का वणर्न करेंगे। 337 338 9ण्9ण्1 नेत्रा चित्रा 9ण्29 ;ंद्ध में नेत्रा दशार्या गया है। प्रकाश, नेत्रा में सामने के वक्रीय पृष्ठ जिसे काॅनिर्या या स्वच्छ पटल कहते हैं, से प्रवेश करता है। तत्पश्चात यह पुतली से जो कि परितारिका में वेंफद्रीय छिद्र होता है, से गुशरता है। पुतली के आकार को पेश्िायाँ नियंत्रिात करती हैं। नेत्रा लेंस इस प्रकाश को और प़फोकसित करके दृष्िटपटल ;रेटिनाद्ध पर प्रतिबिंब बना देता है। दृष्िटपटल तंत्रिाका तंतुओं की एक पतली झिल्ली होती है जो नेत्रा के पीछे के वित पृष्ठ को ढके रखती है। दृष्िटपटल में शलाका और शंवुफ होते हैं जो क्रमशः प्रकाश की तीव्रता तथा वणर् के प्रति संवेदनशील होते हैं तथा दृव्फ तंत्रिाकाओं से होकर विद्युतीय सिगनलों को मस्ितष्क तक प्रेष्िात करते हैं, जो इस सूचना को अंततःसंसाध्ित करता है। पक्ष्माभी पेश्िायों के द्वारा नेत्रा लंेस की आकृति ;वक्रताद्ध और इसलिए प़फोकस दूरी वुफछ - वुफछ आपरिवतिर्त की जा सकती है। उदाहरण के लिए, जब पेश्िायाँ श्िाथ्िाल होती हैं तो नेत्रा लेंस की प़फोकस दूरी लगभग 2ण्5 बउ होती है तथा अनंत दूरी के पिंड दृष्िटपटल पर स्पष्ट प़फोकसित होते हैं। जब वस्तु को नेत्रा के निकट लाया जाता है तो, प्रतिबिंब तथा लेंस के बीच की दूरी ;≅ 2ण्5 बउद्ध वही बनाए रखने के लिए पक्ष्माभी पेश्िायों की िया ;सिवुफड़नेद्ध द्वारा लेंस की प़फोकस दूरी कम हो जाती है। नेत्रा के इस गुण को समंजन क्षमता कहते हैं। यदि वस्तु नेत्रा के बहुत निकट है तो लेंस इतना अध्िक वित नहीं हो पाता कि उस वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिंब दृष्िटपटल पर बना सके, जिसके पफलस्वरूप वस्तु का ध्ुँध्ला प्रति¯बब बनता है। वह कम से कम दूरी जिस पर रखी वस्तु का सामान्य नेत्रा लेंस स्पष्ट प्रतिबिंब दृष्िटपटल पर बना देता है, उसे स्पष्ट दशर्न की अल्पतम दूरी अथवा सामान्य नेत्रा का निकट बिंदु कहते हैं। सामान्य व्यक्ित के लिए इसका मानक मान 25 बउ लिया गया है। ;प्रायः निकट बिंदु को प्रतीक क् द्वारा निदिर्ष्ट किया जाता है।द्ध यह दूरी आयु में वृि के साथ बढ़ती जाती है, क्योंकि आयु में वृि के साथ पक्ष्माभी पेश्िायाँ उतनी प्रभावकारी नहीं रह पातीं तथा साथ ही लंेस का लचीलापन भी घट जाता है। 10 वषर् के बालक के नेत्रा का निकट बिंदु लगभग 7 से 8 बउ तक होता है जबकि 60 वषर् की आयु तक पहुँचने पर यह लगभग 200 बउ तक पहुँच सकता है। अतः यदि कोइर् अध्िक आयु का व्यक्ित पुस्तक को नेत्रा से 25 बउ दूरी पर रखकर पढ़ना चाहे तो उसको प्रति¯बब ध्ुँध्ला प्रतीत होता है। यह अवस्था जरा दूरद£शता ;नेत्रा का दोषद्ध कहलाती है। पढ़ने के लिए अभ्िासारी लेंस का उपयोग करके इसे संशोध्ित किया जाता है। इस प्रकार, नेत्रा हमारे शरीर के अद्भुत अंग हैं, जिनमें वुफछ जटिल प्रक्रमों द्वारा आने वालीवैद्युतचुंबकीय तंरगों को प्रतिबिंबों के रूप में समझने की क्षमता होती है। ये हमारी सबसे बड़ी संपिा हैं तथा इन्हें सुरक्ष्िात रखने के लिए हमें इनकी उचित देखभाल करनी चाहिए। शरा इस संसार की कल्पना बिना ियात्मक नेत्रों के युगल के कीजिए। पिफर भी हममें से अनेक ऐसे हैं जो बहादुरी के साथ इस चुनौती का सामना करते हैं तथा प्रभावशाली ढंग से अपनी सीमाओं पर नियंत्राण करके सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं। वे अपने साहस तथा दृढ़ विश्वास के लिए हमारी प्रशंसा के पात्रा हैं। सभी सावधनियों एवं रक्षात्मक कारर्वाइर् होने पर भी बहुध अनेक कारणों से हमारी आँखों में वुफछ दोष विकसित हो जाते हैं। हम अपनी चचार् को नेत्रों के वुफछ सामान्य प्रकाश्िाक दोषों तक ही सीमित रखेंगे। उदाहरण के लिए, किसी दूरस्थ वस्तु से आने वाले प्रकाश को नेत्रा लेंस दृष्िटपटल से पहले ही किसी ¯बदु पर अभ्िासरित कर सकता है। इस दोष को निकट दृष्िटदोष अथवा मायोपिया कहते हैं। इसका अथर् यह है कि नेत्रा आपतित पुंज को अत्यध्िक अभ्िासरित कर रहा है। इसे प्रतिकारित करने के लिए हम नेत्रा तथा वस्तु के बीच कोइर् ऐसा अवतल लेंस सन्िनविष्ट करते हैं कि जिसके अपसारी प्रभाव के कारण प्रतिबिंब दृष्िटपटल पर सही प़फोकसित हो जाए ख्चित्रा 9ण्29 ;इद्ध,। पुतलीपरितारिका ;कद्ध चित्रा 9ण्29 ;ंद्ध नेत्रा की संरचनाऋ ;इद्ध निकट दृष्िट दोषयुक्त नेत्रा तथा इसका संशोध्नऋ ;बद्ध दीघर् दृष्िट दोषयुक्त नेत्रा तथा इसका संशोध्नऋ तथा ;कद्ध अ¯बदुक नेत्रा तथा इसका संशोध्न। इसी प्रकार, यदि नेत्रा लेंस किसी वस्तु के प्रतिबिंब को दृष्िटपटल के पीछे किसी बिंदु पर प़फोकसित करता है तो इसे प्रतिकारित करने के लिए अभ्िासारी लेंस की आवश्यकता होती है। इस दोष को दीघर् दृष्िटदोष अथवा हाइपरमेट्रोपिया कहते हैं ख्चित्रा 9ण्29 ;बद्ध,। एक अन्य सामान्य दृष्िटदोष अबिंदुकता है। यह दोष तब उत्पन्न होता है जब स्वच्छ पटल कीआकृति गोलीय नहीं होती। उदाहरणाथर्, स्वच्छ पटल की वक्रता त्रिाज्या क्षैतिज तल की अपेक्षाऊध्वार्ध्र तल में ;अथवा विलोमतःद्ध अध्िक हो सकती है। यदि नेत्रा लेंस में इस दोष से युक्त कोइर्व्यक्ित किसी तार की जाली या रेखाओं की जाली को देखेगा तो या तो ऊध्वार्ध्र अथवा क्षैतिज तल में प़फोकसन दूसरे की अपेक्षा स्पष्ट नहीं होगा। अबिंदुकता के कारण किसी एक दिशा की रेखाएँ तो भली - भाँति प़फोकसित हो जाती हैं, जबकि इन रेखाओं के लंबवत दिशा की रेखाएँ भली - भाँति प़फोकसित नहीं हो पातीं ख्चित्रा 9ण्29 ;कद्ध,। अबिंदुकता दोष को संशोध्ित करने के लिए किसी सिलिंडरी अथवा बेलनाकार लेंस का प्रयोग करते हैं। इस लेंस की वक्रता त्रिाज्या तथा अक्ष दिशा का उचित चयन करके इस दोष को संशोध्ित करते हैं। यह दोष निकट दृष्िट दोष अथवा दीघर् दृष्िट दोष के साथ - साथ हो सकता है। उदाहरण 9ण्10 किसी व्यक्ित जिसके लिए क् का मान 50 बउ है, के पढ़ने के लिए चश्मे के लेंस की प़फोकस दूरी क्या होनी चाहिए? हल सामान्य दृष्िट की दूरी 25 बउ है। अतः यदि पुस्तक की नेत्रा से दूरी न त्र दृ25 बउए प्रतिबिंब अ त्र दृ50 बउ दूर बनना चाहिए। अतः वांछित प़फोकस दूरी प्राप्त होगी 111 िअन 11 11 या िदृ50 दृ25 50 अथवा ित्र ़ 50 बउ ;उत्तल लेंसद्ध 339 उदाहरण 9ण्11 ;ंद्ध निकट दृष्िट दोषयुक्त किसी व्यक्ित का दूर बिंदु, नेत्रा के सामने 80 बउ दूर है। उस लेंस की अपेक्ष्िात क्षमता क्या होगी जो इस व्यक्ित को बहुत दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देखने योग्य बना देगा? ;इद्ध संशोध्क लेंस किस प्रकार उपरोक्त व्यक्ित की सहायता करता है? क्या लेंस बहुत दूर कीवस्तुओं को आवध्िर्त करता है? सावधनीपूवर्क उत्तर दीजिए। ;बद्ध उपरोक्त व्यक्ित पु़ेस्तक पढतसमय अपना चश्मा उतारना चाहता है। स्पष्ट कीजिए ऐसा क्यों है? हल ;ंद्ध अवतल लेंस की प़फोकस दूरी त्र दृ 80 बउए क्षमता त्र दृ 1ण्25 डाइआॅप्टर ;इद्ध नहीं। वास्तव में अवतल लेंस किसी वस्तु के आकार को घटा देता है, परंतु दूरस्थ वस्तु द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण प्रतिबिंब द्वारा ;दूर बिंदु परद्ध नेत्रा पर अंतरित कोण के समान होता है। नेत्रा दूरस्थ वस्तु को इसलिए देखने योग्य नहीं हो जाता कि संशोध्क लेंस ने वस्तु को आवध्िर्त कर दिया है, वरन इसलिए देखने योग्य हो जाता है कि यह वस्तु ;अथार्त वस्तु का आभासी प्रतिबिंब बनाकरद्ध को नेत्रा के दूर बिंदु पर ले आता है जिसे नेत्रा लेंस दृष्िटपटल पर प़फोकसित कर देता है। ;बद्ध निकट दृष्िट दोषयुक्त व्यक्ित का सामान्य निकट बिंदु लगभग 25 बउ दूर ;अथवा इससे भी कमद्ध हो सकता है। अपने चश्मे ;दूर की वस्तु को देखने के लिएद्ध के साथ पुस्तक पढ़ने के लिए, उसे पुस्तक को 25 बउ से अध्िक दूरी पर रखना चाहिए, ताकि पुस्तक का अवतल लेंस द्वारा बना प्रतिबिंब 25 बउ से कम दूरी पर न बने। पुस्तक का कोणीय साइश ;अथवा इसके प्रतिबिंबद्ध जब वे 25 बउ से अध्िक दूरी पर स्िथत होते हैं, स्पष्ट रूप से उस साइश से छोटा होता है जब उसे बिना चश्मा लगाए 25 बउ की दूरी पर रखकर देखते हैं। अतः वह व्यक्ित चश्मा उतारकर ही पढ़ना पसंद करता है। उदाहरण 9ण्12 ;ंद्ध दीघर् दृष्िट दोषयुक्त किसी व्यक्ित का निकट बिंदु नेत्रा से 75 बउ दूर है। उस लेंस की आवश्यक क्षमता क्या होगी जो इस व्यक्ित को नेत्रा से 25 बउ की दूरी पर रखीपुस्तक को स्पष्ट पढ़ने योग्य बना देगा? ;इद्ध संशोध्क लेंस किस प्रकार उपरोक्त व्यक्ित की सहायता करता है? क्या लेंस नेत्रा के निकटकी वस्तुओं को आवध्िर्त करता है? ;बद्ध उपरोक्त व्यक्ित आकाश देखते समय अपना चश्मा उतारना चाहता है। स्पष्ट कीजिए ऐसा क्यों है? हल ;ंद्ध न त्र दृ 25 बउए अ त्र दृ 75 बउ 1ध् ित्र 1ध्25 दृ 1ध्75ए अथार्त ित्र 37ण्5 बउ संशोध्क लेंस की अभ्िासारी क्षमता ़2ण्67 डाइआॅप्टर है। ;इद्ध संशोध्क लेंस 25 बउ दूर रखे बिंब का आभासी प्रतिबिंब ;75 बउ परद्ध बनाता है। इस प्रति¯बब का कोणीय साइश बिंब ;वस्तुद्ध के कोणीय साइश के बराबर होता है। इसका यहअथर् है कि लेंस बिंब का आवध्र्न नहीं करता केवल बिंब को निकट ला देता है जिसे नेत्रा अपनेनेत्रा लेंस द्वारा दृष्िटपटल पर प़फोकसित कर लेता है। तथापि, यह कोणीय साइश उस साइश से अिाकहोता है जब बिना चश्मे के उसी बिंब को निकट बिंदु ;75 बउद्ध पर रखकर देखा जाता है। ;बद्ध किसी दीघर् दृष्िट दोषयुक्त नेत्रा का दूरबिंदु सामान्य है, अथार्त इसकी अनंत से आने वाले समांतरप्रकाश - पुंज को पफोकसित कर सकने की अभ्िासरण क्षमता इतनी है कि वह लघुकृत नेत्रा गोलेके दृष्िटपटल पर इस पुंज को पफोकसित कर लेता है। अभ्िासारी लेंसों का चश्मा पहनने पर;निकट की वस्तुओं के देखने के लिएद्ध उसे समांतर किरणों को प़फोकसित करने के लिएजितनी अभ्िासरण क्षमता चाहिए उससे अध्िक हो जाएगी। इसलिए वह व्यक्ित दूर की वस्तुओं340 को देखने के लिए चश्मा लगाना पसंद नहीं करता। 9ण्9ण्2 सूक्ष्मदशीर् सरल आवध्र्क अथवा सरल सूक्ष्मदशीर् कम प़फोकस दूरी का एक अभ्िासारी लेंस होता है ;चित्रा 9ण्30द्ध। इस प्रकार के लेंस को सूक्ष्मदशीर् के रूप में प्रयोग करने के लिए, लेंस को बिंब के निकटउससे एक प़फोकस दूरी अथवा उससे कम दूरी पर रखा जाता है तथालेंस के दूसरी ओर नेत्रा को लेंस से सटाकर रखा जाता है। ऐसा करनेका लक्ष्य है कि बिंब का सीध, आवध्िर्त तथा आभासी प्रतिबिंबकिसी ऐसी दूरी पर बने कि नेत्रा उसे सरलतापूवर्क देख सवेंफ, अथार्तप्रतिबिंब 25 बउ अथवा वुफछ अध्िक दूरी पर बनना चाहिए। यदिबिंब िपर स्िथत है तो उसका प्रतिबिंब अनंत पर बनता है। तथापि,यदि बिंब िसे कम दूरी पर रखा हो, तो प्रतिबिंब आभासी तथा अनंतकी तुलना में कम दूरी पर बनता है। यद्यपि देखने के लिए निकटतमआरामदेह दूरी, निकट बिंदु ;दूरी क् ≅ 25 बउद्ध पर होती है, परंतुइससे नेत्रों पर वुफछ तनाव पड़ता है। इसीलिए, प्रायः अनंत पर बनाप्रतिबिंब श्िाथ्िाल नेत्रों द्वारा देखने के लिए उचित माना जाता है। यहाँ परदोनों स्िथतियाँ दशार्यी गइर् हैं, पहली चित्रा 9ण्30 ;ंद्धए में तथा दूसरी चित्रा 9ण्30 ;इद्ध तथा ;बद्ध में। सरल सूक्ष्मदशीर् द्वारा निकट बिंदु क् पर बने प्रतिबिंब के लिए रैख्िाक आवध्र्न उ का परिकलन निम्न संबंध् द्वारा किया जा सकता है। उ अ अ 11 दृ 1दृ अ न अ ि ि अब हमारी चिÉ परिपाटी के अनुसार अ )णात्मक है तथा परिमाण में क् के बराबर है। अतः आवध्र्न, क् उ 1 ;9ण्39द्धिक्योंकि क् लगभग 25 बउ है। अतः आवध्र्न 6 प्राप्त करने के लिए प़फोकस दूरी ित्र 5 बउ के उत्तल लेंस की आवश्यकता होती है। ध्यान दीजिए, उ त्र ी′ध्ीए यहाँ ी बिंब का साइश तथा ी′ प्रतिबिंब का साइश है। यह प्रतिबिंब द्वारा अंतरित कोण तथा बिंब द्वारा अंतरित कोण का भी अनुपात होता है, जबकि उन्हें आराम से देखने के लिए क् पर रखा जाता है। ;नोट कीजिए कि यह वास्तव में बिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण नहीं है, जिसे ीध्न द्वारा व्यक्त किया गया है।द्ध एकल - लेंस सरल आवध्र्क की उपलब्िध् यह है कि वस्तु को क् की तुलना में कापफी निकट रखकर देखना संभव हो जाता है।़ी क् ;इद्ध ;बद्ध चित्रा 9ण्30 सरल सूक्ष्म दशीर् ;ंद्ध आवध्र्क लेंस इस प्रकार स्िथत है कि प्रतिबिंब निकट बिंदु पर बनता है, ;इद्ध बिंब द्वारा अंतरित कोण, निकट बिंदु पर अंतरित कोण के समान है तथा ;बद्ध बिंब लेंस के प़फोकस बिंदु पर, प्रतिबिंब बहुत दूर है लेकिन अनंत से पास है। अब जब प्रतिबिंब अनंत पर बनता है तो हम आवध्र्न ज्ञात करेंगे। इस स्िथति में हमें कोणीयआवध्र्न का परिकलन करना होगा। मान लीजिए बिंब की ऊँचाइर् ी है। इस बिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित अध्िकतम कोण, जबकि बिंब स्पष्ट भी दिखाइर् देता हो ;बिना किसी लेंस केद्ध, तब होता है जब हम बिंब को निकट अथार्त दूरी क् पर रखते हैं। तब अंतरित कोण प्राप्त होगा जंद 0 ी ≈ θ0 ;9ण्40द्धक् 341 अब हम प्रतिबिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण, जबकि बिंब न पर रखा है, ज्ञात करते हैं। ीअसंबंध् उ से प्रतिबिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोणीन ी ीअी जंद ≈θ य बिंब द्वारा अंतरित कोण, जबकि बिंब अब न त्र दृ िपर हैप अ अन न ी प ;9ण्41द्धिजैसा कि चित्रा 9ण्29 ;बद्ध से स्पष्ट है। अतः कोणीय आवध्र्न ;आवध्र्न क्षमताद्ध है पक् उ ;9ण्42द्ध 0 ियह उस स्िथति के आवध्र्न की तुलना में एक कम है, जिसमें प्रतिबिंब निकट बिंदु पर बनता है, समीकरण ;9ण्39द्धए परंतु प्रतिबिंब देखना अपेक्षाकृत अध्िक आरामदायक होता है तथा आवधर्नमें अंतर भी अपेक्षावृफत कम है। प्रकाश्िाक यंत्रों ;सूक्ष्मदशीर् तथा दूरबीनद्ध से संबंध्ित आगामी चचार्ओंमें हम यह मानेंगे कि प्रतिबिंब अनंत पर बने हैं।वास्तविक प़फोकस दूरियों के लेंसों के लिए किसी सरल सूक्ष्मदशीर् का अध्िकतम आवध्र्न ;≤ 9द्ध होता है। अध्िक आवध्र्न के लिए दो लेंसों का उपयोग किया जाता है, जिनमें एक लेंस दूसरेलेंस के प्रभाव को संयुक्त ;बढ़ाताद्ध करता है। इसे संयुक्त सूक्ष्मदशीर् कहते हैं। चित्रा 9ण्31 में संयुक्तसूक्ष्मदशीर् का व्यवस्था आरेख दशार्या गया है। बिंब के सबसे निकट के लेंस को अभ्िादृश्यक ;वइरमबजपअमद्ध कहते हैं जो बिंब का वास्तविक, उलटा, आवध्िर्त प्रतिबिंब बनाता है। यह प्रतिबिंबदूसरे लेंस के लिए बिंब का कायर् करता है। इस दूसरे लेंस को नेत्रिाका ;मलम.चपमबमद्ध कहते हैं,जो वास्तविक रूप से सरल सूक्ष्मदशीर् अथवा आवध्र्क के रूपमें कायर् करके अंतिम आवध्िर्त आभासी प्रतिबिंब बनाता है। इसप्रकार पहला उलटा प्रतिबिंब नेत्रिाका के पफोकस बिंदु के निकट;प़फोकस पर या इसके अंदरद्ध होता है, यह नेत्रिाका से इतनी दूरीपर होता है जो अंतिम प्रतिबिंब को अनंत पर बनाने के लिएउपयुक्त होती है तथा उस स्िथति के भी कापफी निकट होती है़जिस पर यदि प्रतिबिंब स्िथत हो तो अंतिम निकट बिंदु पर बने।स्पष्टतः, अंतिम प्रतिबिंब मूल बिंब के सापेक्ष उलटा बनता है।अब हम संयुक्त सूक्ष्मदशीर् के कारण आवध्र्न प्राप्त करेंगे। चित्रा 9ण्31 का किरण आरेख यह दशार्ता है कि अभ्िादृश्यक के कारण ;रैख्िाकद्ध आवध्र्न, अथार्त ी′ध्ीए बराबर है ीस् उ0 ;9ण्43द्धचित्रा 9ण्31 संयुक्त सूक्ष्मदशीर् द्वारा प्रतिबिंब बनने का ी0ि किरण आरेख। यहाँ हमने इस परिमाण का उपयोग किया है ीी जंद 0ि स् यहाँ ी′ पहले प्रतिबिंब का साइश है तथा बिंब का साइश ी एवंअभ्िादृश्यक की प़फोकस दूरी 0ि है। पहला प्रतिबिंब नेत्रिाका के प़फोकस बिंदु के निकट बनता है। दूरी स्ए अथार्तए अभ्िादृश्यक के द्वितीय प़फोकस बिंदु तथा नेत्रिाका ;प़फोकस दूरी िद्ध के पहले प़फोकस बिंदु के बीच की दूरी कोम342 संयुक्त सूक्ष्मदशीर् की ट्यूब लंबाइर् कहते हैं। क्योंकि पहला उलटा प्रतिबिंब नेत्रिाका के प़फोकस बिंदु के निकट बनता है, उपरोक्त चचार् से प्राप्त परिणाम का उपयोग हम सरल सूक्ष्मदशीर् के लिए करके इसके कारण ;कोणीयद्ध आवध्र्न उ म प्राप्त करते हैं ख्समीकरण 9ण्39,ए जबकि अंतिम प्रतिबिंब किसी निकट बिंदु पर बनता है। यह है क् उम 1 िख्9ण्44;ंद्ध, म जब प्रतिबिंब अनंत पर बनता है तो नेत्रिाका के कारण कोणीय आवध्र्न ख्समीकरण ;9ण्42द्ध, है उम त्र ;क्ध्मिद्ध ख्9ण्44;इद्ध, अतः वुफल आवध्र्न ख्समीकरण ;9ण्33द्ध के अनुसार,ए जबकि प्रतिबिंब अनंत पर बनता है, है स्क् उ उउ 0 म ;9ण्45द्धि0 मि स्पष्ट है कि किसी छोटी वस्तु का बड़ा आवध्र्न प्राप्त करने के लिए ;इसीलिए सूक्ष्मदशीर् नाम रखा गया हैद्ध अभ्िादृश्यक तथा नेत्रिाका की प़फोकस दूरी कम होनी चाहिए। व्यवहार में,1 बउ से कम प़फोकस दूरी का लेंस बनाना अत्यंत कठिन कायर् है। इसी के साथ स् को बड़ा करने के लिए बड़े लेेंसों की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, किसी त्रि 1ण्0 बउ के अभ्िादृश्यक त्रि 2ण्0 बउ की नेत्रिाका तथा ट्यूबवम लंबाइर् ;स्द्ध त्र 20 बउ के लिए संयुक्त सूक्ष्मदशीर् का आवध्र्न स्क् उ उउ 0 म िि0 म 20 25 250 12 अन्य विभ्िान्न कारक जैसे वस्तु की प्रदीप्ित भी प्रतिबिंब की दृश्यता एवं गुणता में महत्वपूणर् योगदान देते हंै। आध्ुनिक सूक्ष्मदश्िार्यों में, अभ्िादृश्यक तथा नेत्रिाका बहुअवयवी लेंसों द्वारा बनाए जाते हैं, जिनके कारण लेंसों के प्रकाश्िाक विपथनों ;दोषद्ध को कम करके प्रतिबिंबों की गुणता में सुधर किया जाता है। 9ण्9ण्3 दूरदशर्क दूरदशर्क अथवा दूरबीन ;चित्रा 9ण्32द्ध का उपयोग दूर की वस्तुओं को कोणीय आवध्र्न प्रदान करने के लिए किया जाता है। इसमें भी एक अभ्िादृश्यक तथा एक नेत्रिाका होती है। परंतु यहाँ पर, नेत्रिाका की अपेक्षा अभ्िादृश्यक की प़फोकस दूरी अध्िक तथा इसका द्वारक भी कापफी अध्िक होता है। किसी़दूरस्थ बिंब से चलकर प्रकाश अभ्िादृश्यक में प्रवेश करता है तथा ट्यूब के अंदर इसके द्वितीय प़फोकस पर वास्तविक प्रतिबिंब बनता है। नेत्रिाका इस प्रतिबिंब को आवध्िर्त करके अंतिम उलटा प्रतिबिंब बनाती है। आवध्र्न क्षमता उए प्रतिबिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण β तथा बिंब द्वारा नेत्रा पर अथवा लेंस पर अंतरित कोण α के अनुपात द्वारा परिभाष्िात किया जाता है। अतः ी0ि 0िउ ण् ;9ण्46द्धमिी मि इस स्िथति में, दूरदशर्क की ट्यूब की लंबाइर् है ि़ िव म पाथ्िार्व दूरदशर्कों में, इन लेंसों के अतिरिक्त, प्रतिलोमी लेंसों का एक युगल होता है जो अंतिम 343प्रतिबिंब को सीध बना देता है। अपवतीर् दूरदशर्क का उपयोग पाथ्िार्व एवं खगोलीय दोनों प्रकार के संसार की सबसे बड़ी प्रकाश्िाक दूरबीनीजजचरूध्ध्ंेजतवण्दपदमचसंदमजेण्वतहध्इपहमलमेण्ीजउस प्रेक्षणों के लिए किया जा सकता है। उदाहरण केविअभ्िादृश्यक नेत्रिाका लिए, किसी ऐसे दूरदशर्क पर विचार कीजिएमि जिसके अभ्िादृश्यक की प़फोकस दूरी 100 बउ तथा नेत्रिाका की प़फोकस दूरी 1 बउ है। इस दूरबीनठश् की आवधर्न क्षमता उ त्र 100ध्1 त्र 100।श् अब किन्हीं दो तारों के युगल पर विचार कीजिए जिनका वास्तविक पृथकन 1′ ;1 मिनट का चापद्ध है। ये तारे उपरोक्त दूरदशर्क से देखने पर इस प्रकार प्रतीत होते हैं जैसे कि इनके बीच के पृथकन - कोण 100 × 1′ त्र 100′ त्र1ण्67ह् है। चित्रा 9ण्32 परावतीर् दूरदशर्क ;वैफसेग्रेनद्ध का व्यवस्था आरेख किसी खगोलीय दूरदशर्क के बारे में ध्यान देने योग्य मुख्य बातें उसकी प्रकाश संग्रहण क्षमता तथा इसकी विभेदन क्षमता अथवा विभेदन है। प्रकाश संग्रहण क्षमता स्पष्ट रूप से दूरदशर्क के अभ्िादृश्यक के क्षेत्रापफल पर निभर्र करती है। यदि अभ्िादृश्यक का व्यास बड़ा है तो ध्ुँध्ले पिंडांे का भी प्रेक्षण किया जा सकता है। विभेदन क्षमता अथवा एक ही दिशा में दो अत्यध्िक निकट कीवस्तुओं को सुस्पष्टतः भ्िान्न प्रेक्ष्िात करने की योग्यता भी अभ्िादृश्यक के व्यास पर निभर्र करती है। अतः प्रकाश्िाक दूरदशर्क में वांछित उद्देश्य यह होता है। कि अभ्िादृश्यक का व्यास अध्िकतम हो। आजकल उपयोग होने वाले अभ्िादृश्यक लेंस का अध्िकतम व्यास 40 इंच ;्1ण्02 उद्ध है। यह दूरदशर्क यवेर्फज वेध्शाला, विस्काॅनसिन, संयुक्त राज्य अमेरिका मेें है। इतने बड़े लेंस अत्यध्िक भारी होते हैं, अतः इन्हें बनाना तथा किनारों के सहारे टिकाकर रखना कठिन कायर् है। इसके अतिरिक्तइतने बड़े साइश के लेंसों को इस प्रकार बनाना कि प्रतिबिंबों में वणर् विपथन तथा अन्य विरूपणन आएँ, बहुत कठिन तथा मँहगा कायर् है। यही कारण है कि आध्ुनिक दूरदशर्कों में अभ्िादृश्यक के रूप में लेंस के स्थान पर अवतल दपर्ण का उपयोग किया जाता है। ऐसे दूरदशर्कों को जिनमें अभ्िादृश्यक दपर्ण हेाता है, परावतीर् दूरदशर्क ;दूरबीनद्ध कहते हैं। इनके अनेक लाभ हैं। पहला, दपर्ण में कोइर् वणर् विपथन नहीं होता।दूसरा, यदि किसी परवलीय परावतीर् पृष्ठ का चयन किया जाए तो गोलीय विपथन का दोष भीसमाप्त हो जाता है। यांत्रिाक सहारा देने की समस्या भी काप़्ाफी कम होती है क्योंकि लेंस की तुलनामें, तुल्य प्रकाश्िाक गुणता का दपर्ण अपेक्षाकृत कम भारी होताहै तथा दपर्ण को केवल रिम पर ही सहारा देने की बजायउसके समस्त पीछे के पृष्ठ को सहारा प्रदान किया जा सकताहै। परावतीर् दूरबीन की एक सुस्पष्ट समस्या यह होती है किअभ्िादृश्यक दपर्ण दूरदशर्क की नली के भीतर प्रकाश कोप़फोकसित करता है। अतः नेत्रिाका तथा प्रेक्षक को उसी स्थानपर होना चाहिए जिससे प्रकाश के मागर् में अवरोध् के कारणवुफछ प्रकाश कम हो जाता है ;यह अवरोध् प्रेक्षक के बैठने केलिए बनाए गए पिंजरेनुमा कमरे के साइश पर निभर्र करता हैद्ध।ऐसा ही प्रयोग अति विशाल 200 इंच ;्5ण्08 उद्ध व्यास केचित्रा 9ण्33 परावतीर् दूरदशर्क ;वैफसेग्रेनद्ध का व्यवस्था आरेख। माउंट पेलोमर दूरदशर्क, वैफलिप़फोनिर्या में किया गया है। प्रेक्षकएक छोटे पिंजरे में दपर्ण के प़फोकस बिंदु के निकट बैठता है। इस समस्या का एक अन्य समाधानयह है कि पफोकसित होने वाले प्रकाश को किसी अन्य दपर्ण द्वारा विक्षेपित कर दिया जाए। ऐसीही एक व्यवस्था चित्रा 9.33 में दशार्यी गइर् है, जिसमें आपतित प्रकाश को प़फोकसित करने के लिए344 किसी उत्तल द्वितीयक दपर्ण का उपयोग किया जाता है जो अब अभ्िादृश्यक ;प्राथमिक दपर्णद्ध के छिद्र से गुशरता है। इस दूरदशर्क को इसके आविष्कारक के नाम पर वैफसेग्रेन दूरदशर्क ;ब्ंेेमहतंपद जमसमेबवचमद्ध कहते हैं। इसका एक लाभ यह है कि छोटे दूरदशर्क में बड़ी प़फोकस दूरी होती है। भारतवषर् में सबसे बड़ा दूरदशर्क कवलूर, तमिलनाडु में है। यह 2ण्34 उ व्यास की कैसेग्रेन परावतीर् दूरदशर्क है। इसे घष्िार्त किया गया, पिफर पाॅलिश की गइर् और व्यवस्िथत किया गया तथा अब इसे भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, बंगलुरू द्वारा प्रयोग किया जा रहा है। संसार का सबसे बड़ा परावतीर् दूरदशर्क हवाइर्, संयुक्त राज्य अमेरिका में वैफक दूरदशर्कों का युगल है जिसके परावतर्क का व्यास 10 मीटर है। सारांश 1ण् परावतर्न समीकरण ∠प त्र ∠त′ द्वारा तथा अपवतर्न स्नेल के नियम ेपदपध्ेपदत त्र द द्वारा अभ्िानियंत्रिात होता है, जहाही समतल में होते हैं। यहाँ पर कोण पए त ′ तथा तए क्रमशः आपतन कोण, परावतर्न कोण तथा अपवतर्न कोण हैं। 2ण् सघन माध्यम से विरल माध्यम में आपतित किरण के लिए क्रांतिक आपतन कोण प वहब कोण है जिसके लिए अपवतर्न कोण 90°है। प झ प होने पर पूणर् आंतरिक परावतर्न होता है।ब हीरे में बहुगुण्िात आंतरिक परावतर्न ;प ≅ 24ण्4°द्धए पूणर् परावतर्क िश्म तथा मरीचिका, पूणर् ब आंतरिक परावतर्न के वुफछ उदाहरण हैं। प्रकाश्िाक तंतु, काँच के तंतुओं के बने होते हैं जिनपर अपेक्षाकृत कम अपवतर्नांक के पदाथर् की पतली परत का लेपन होता है। प्रकाश्िाक तंतु के किसी एक सिरे पर आपतित प्रकाश, बहुगुण्िात आंतरिक परावतर्न द्वारा दूसरे सिरे से निकलता है, प्रकाश्िाक तंतु के मुड़ा होने पर भी ऐसा होता है। 3ण् कातीर्य चिÉ परिपाटीμ आपतित प्रकाश की दिशा में मापी गइर् दूरियाँ ध्नात्मक तथा इसकेविपरीत दिशा में मापी गइर् दूरियाँ )णात्मक ली जाती हैं। सभी दूरियाँ मुख्य अक्ष पर दपर्णके ध््रुव/लेंस के प्रकाश्िाक वेंफद्र से मापी जाती हैं। ग.अक्ष के उपरिमुखी तथा दपर्ण/लेंस केमुख्य अक्ष के अभ्िालंबवत मापी गइर् ऊँचाइयाँ ध्नात्मक ली जाती हैं। अधेमुखी दिशा में मापीगइर् ऊँचाइयाँ )णात्मक ली जाती हैं। 4ण् दपर्ण समीकरण 11 1 अन ियहाँ न तथा अ क्रमशः बिंब दूरी तथा प्रतिबिंब दूरी हैं तथा िदपर्ण की प़फोकस दूरी है। ि;सन्िनकटतःद्ध वक्रता त्रिाज्या त् की आध्ी होती है। अवतल दपर्ण के लिए ि)णात्मक तथा उत्तल दपर्ण के लिए िध्नात्मक होता है। 5ण् िश्म कोण ।ए अपवतर्नांक द2 के किसी िश्म के लिए जो द1 अपवतर्नांक के किसी माध्यम में रखा है। द ेपद ।क् ध्2 2 उ द21 द1 ेपद । ध्2 यहाँ क् न्यूनतम विचलन कोण है।उ 6ण् किसी गोलीय अंतरापृष्ठ से अपवतर्न ¹माध्यम 1 ;अपवतर्नांक द1द्ध से माध्यम 2 ;अपवतर्नांक द2द्ध की ओरह् द द दद2 1 21 अ न त् पतले लेंस के लिए सूत्रा 11 1 345अन िँआपतित किरण, परावतिर्त किरण, अपवतिर्त किरण तथा अभ्िालंब एक लेंस - मेकर सूत्रा 1 द2 द11 1 िदत्त्1 12 त्तथा त्लेंस के पृष्ठों की वक्रता त्रिाज्याएँ हैं। अभ्िासारी लेंस के लिए िध्नात्मक हैऋ12 अपसारी लेंस के लिए ि)णात्मक है। लेंस की क्षमता च् त्र 1ध् ि। लेंस की क्षमता का ैप् मात्राक डाइआॅप्टर ;क्द्ध हैऋ 1 क् त्र 1 उदृ1। यदि 1िए 2िए 3िएण्ण् प़फोकस दूरी के कइर् पतले लेंस संपवर्फ में रखे हों तो इस संयोजन की प्रभावी प़फोकस दूरी होगी 1 11 1 ३ ि ििि123 अनेक लेंसों के संयोजन की वुफल क्षमता च् त्र च्1 ़ च्2 ़ च्3 ़ ३ 7ण् प्रकाश का परिक्षेपण, प्रकाश का अपने संघटक वणो± में विपाटन ;विघटनद्ध होता है। 8ण् नेत्रा: नेत्रा में लगभग 2ण्5 बउ पफोकस दूरी का एक उत्तल लेंस होता है। इस पफोकस दूरी में परिवतर्न किया जा सकता है जिसके कारण प्रतिबिंब सदैव दृष्िटपटल पर बनता है। नेत्रा की इस क्षमता को समंजन कहते हैं। दोषयुक्त नेत्रा में, यदि प्रतिबिंब दृष्िटपटल से पहले पफोकसित होता है ;निकट दृष्िटदोषद्ध तो किसी अपसारी संशोध्क लेंस की आवश्यकता होती हैऋ यदि प्रतिबिंब दृष्िटपटल से पीछे बनता है ;दीघर् दृष्िटदोषद्ध तो अभ्िासारी संशोध्क लेंस की आवश्यकता होती है। अबिंदुकता का संशोध्न बेलनाकार लेंस द्वारा करते हैं। 9ण् किसी सरल सूक्ष्मदशीर् की आवध्र्न क्षमता के परिमाण उ को उ त्र 1 ़ ;क्ध्द्धि द्वारा व्यक्त किया जाता है, यहाँ क् त्र 25 बउए स्पष्ट दशर्न की अल्पतम दूरी है तथा िउत्तल लेंस की पफोकस दूरी है। यदि प्रतिबिंब अनंत पर बने तब उ त्र क्ध् िहोगा। किसी संयुक्त सूक्ष्मदशीर् के लिए आवध्र्न क्षमता उ को उ त्र उ × उ0 के द्वारा व्यक्त किया जाता है, यहाँमउ त्र 1 ़ ;क्ध्द्धि नेत्रिाका का आवध्र्न तथा उ0 अभ्िादृश्यक द्वारा उत्पन्न आवध्र्न है।ममसन्िनकटतः स्क् उ 0ि मि यहाँ ितथा िक्रमशः अभ्िादृश्यक तथा नेत्रिाका की प़फोकस दूरियाँ हैं तथा स् इन दोनों केव म प़फोकस बिंदुओं के बीच की दूरी है। 10ण् किसी दूरबीन की आवध्र्न क्षमता, प्रतिबिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण β तथा बिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण α का अनुपात होती है। उ0िएमि यहाँ 0ि तथा िक्रमशः अभ्िादृश्यक तथा नेत्रिाका की प़फोकस दूरियाँ हैं। म विचारणीय विषय 1ण् आपतन बिंदु पर परावतर्न तथा अपवतर्न के नियम सभी पृष्ठों तथा माध्यमों के युगलों के लिए मान्य हैं। 2ण् किसी उत्तल लेंस से ितथा 2 िके बीच रखे किसी बिंब के वास्तविक प्रतिबिंब को प्रतिबिंब - स्िथति पर रखे पदेर् पर देखा जा सकता है। यदि पदेर् को हटा दें तो क्या पिफर भी प्रतिबिंब वहाँ रहता है? यह प्रश्न बहुतों को दुविध में डालता है, क्योंकि हमें स्वयं को भी यह समझा पाना कठिन होता है कि कोइर् प्रतिबिंब बिना किसी पदेर् के वायु में निलंबित वैफसे346 रह सकता है। परंतु प्रतिबिंब तो वहाँ रहता ही है। बिंब के किसी बिंदु से निगर्त प्रकाश किरणें दिक्स्थान में किसी प्रतिबिंब बिंदु पर अभ्िासरित होकर अपसरित हो जाती हैं। परदा केवल इन किरणों को विसरित करता है जिनमें से वुफछ किरणें हमारे नेत्रों तक पहुँचती हैं और हम प्रतिबिंब देख पाते हैं। किसी लेशर प्रदशर्न के समय बने प्रतिबिंबों द्वारा इसे देखा जा सकता है। 3ण् प्रतिबिंब बनने के लिए नियमित परावतर्न/अपवतर्न की आवश्यकता होती है। सि(ांत रूप में, किसी बिंदु से निगर्त सभी किरणें एक ही प्रतिबिंब बिंदु पर पहुँचनी चाहिए। यही कारण है कि आप किसी अनियमित परावतीर् पृष्ठ, जैसे किसी पुस्तक के पृष्ठ में अपना प्रतिबिंब नहीं देखते। 4ण् मोटे लेंस परिक्षेपण के कारण रंगीन प्रतिबिंब बनाते हैं। हमारे चारों ओर की वस्तुओं के रंगों में विविध्ता उन पर आपतित प्रकाश के रंगों के संघटकों के कारण होती है। किसी वस्तु को एकवणीर् प्रकाश में देखने पर तथा श्वेत प्रकाश में देखने पर उस वस्तु के विषय में बिलकुल ही अलग बोध् होता है। 5ण् किसी सरल सूक्ष्मदशीर् के लिए बिंब का कोणीय साइश, प्रतिबिंब के कोणीय साइश के बराबर होता है। पिफर भी वह आवध्र्न प्रदान करता है क्योंकि आप सूक्ष्मदशीर् का उपयोग करते समय किसी छोटी वस्तु को अपने नेत्रों के बहुत निकट ;25 बउ से भी कम दूरी परद्ध रख सकते हैं, जिसके पफलस्वरूप वह नेत्रा पर बड़ा कोण अंतरित करता है। प्रतिबिंब, जिसे हम देख सकते हैं, 25 बउ दूरी पर है। बिना सूक्ष्मदशीर् के आपको उस छोटी वस्तु को स्पष्ट देख पाने के लिए 25 बउ दूरी पर रखना होगा और तब वह आपके नेत्रा पर बहुत छोटा कोण अंतरित करेगा। अभ्यास 9ण्1 2ण्5 बउ साइश की कोइर् छोटी मोमबत्ती 36 बउ वक्रता त्रिाज्या के किसी अवतल दपर्ण से 27 बउ दूरी पर रखी है। दपर्ण से किसी परदे को कितनी दूरी पर रखा जाए कि उसका सुस्पष्टप्रतिबिंब परदे पर बने। प्रतिबिंब की प्रकृति और साइश का वणर्न कीजिए। यदि मोमबत्ती को दपर्ण की ओर ले जाएँ, तो परदे को किस ओर हटाना पडे़गा? 9ण्2 4ण्5 बउ साइश की कोइर् सुइर् 15 बउ पफोकस दूरी के किसी उत्तल दपर्ण से 12 बउ दूर रखी है। प्रतिबिंब की स्िथति तथा आवधर्न लिख्िाए। क्या होता है जब सुइर् को दपर्ण से दूर ले जाते हैं? वणर्न कीजिए। 9ण्3 कोइर् टैंक 12ण्5 बउ ऊँचाइर् तक जल से भरा है। किसी सूक्ष्मदशीर् द्वारा बीकर की तली पर पड़ी किसी सुइर् की आभासी गहराइर् 9ण्4 बउ मापी जाती है। जल का अपवतर्नांक क्या है? बीकरमें उसी ऊँचाइर् तक जल के स्थान पर किसी 1ण्63 अपवतर्नांक के अन्य द्रव से प्रतिस्थापन करने पर सुइर् को पुनः प़फोकसित करने के लिए सूक्ष्मदशीर् को कितना ऊपर/नीचे ले जाना होगा? 9ण्4 चित्रा 9ण्34 ;ंद्ध तथा ;इद्ध में किसी आपतित किरण का अपवतर्न दशार्या गया है जो वायु में क्रमशः काँच - वायु तथा जल - वायु अंतरापृष्ठ के अभ्िालंब से 60व का कोण बनाती है। उस ;ंद्ध ;इद्ध ;बद्ध चित्रा 9ण्34 347 आपतित किरण का अपवतर्न कोण ज्ञात कीजिए, जो जल में जल - काँच अंतरापृष्ठ के अभ्िालंब से 45व का कोण बनाती है ¹चित्रा 9ण्34 ;बद्धह्। 9ण्5 जल से भरे 80 बउ गहराइर् के किसी टैंक की तली पर कोइर् छोटा बल्ब रखा गया है। जल के पृष्ठ का वह क्षेत्रा ज्ञात कीजिए जिससे बल्ब का प्रकाश निगर्त हो सकता है। जल का अपवतर्नांक 1ण्33 है। ;बल्ब को ¯बदु प्रकाश स्रोत मानिए।द्ध 9ण्6 कोइर् पि्रश्म अज्ञात अपवतर्नांक के काँच का बना है। कोइर् समांतर प्रकाश - पुंज इस पि्रश्म के किसी पफलक पर आपतित होता है। पि्रश्म का न्यूनतम विचलन कोण 40व मापा गया। पि्रश्म के पदाथर् का अपवतर्नांक क्या है? पि्रश्म का अपवतर्न कोण 60व है। यदि पि्रश्म को जल ;अपवतर्नांक 1ण्33द्ध में रख दिया जाए तो प्रकाश के समांतर पुंज के लिए नए न्यूनतम विचलन कोण का परिकलन कीजिए। 9ण्7 अपवतर्नांक 1ण्55 के काँच से दोनों पफलकों की समान वक्रता त्रिाज्या के उभयोत्तल लेंस निमिर्त करने हैं। यदि 20 बउ प़फोकस दूरी के लेंस निमिर्त करने हैं तो अपेक्ष्िात वक्रता त्रिाज्या क्या होगी? 9ण्8 कोइर् प्रकाश - पुंज किसी ¯बदु च् पर अभ्िासरित होता है। कोइर् लेंस इस अभ्िासारी पुंज के पथ में ¯बदु च् से 12 बउ दूर रखा जाता है। यदि यह ;ंद्ध 20 बउ प़फोकस दूरी का उत्तल लेंस है, ;इद्ध 16 बउ प़फोकस दूरी का अवतल लेंस है, तो प्रकाश - पुंज किस ¯बदु पर अभ्िासरित होगा? 9ण्9 3ण्0 बउ ऊँची कोइर् ¯बब 21 बउ प़फोकस दूरी के अवतल लेंस के सामने 14 बउ दूरी पर रखी है। लेंस द्वारा निमिर्त प्रतिबिंब का वणर्न कीजिए। क्या होता है जब ¯बब लेंस से दूर हटती जाती है? 9ण्10 किसी 30 बउ प़फोकस दूरी के उत्तल लेंस के संपवर्फ में रखे 20 बउ प़फोकस दूरी के अवतल लेंस के संयोजन से बने संयुक्त लेंस ;निकायद्ध की प़फोकस दूरी क्या है? यह तंत्रा अभ्िासारी लेंस है अथवा अपसारी? लेंसों की मोटाइर् की उपेक्षा कीजिए। 9ण्11 किसी संयुक्त सूक्ष्मदशीर् में 2ण्0 बउ प़फोकस दूरी का अभ्िादृश्यक लेंस तथा 6ण्25 बउ प़फोकस दूरी का नेत्रिाका लेंस एक.दूसरे से 15 बउ दूरी पर लगे हैं। किसी ¯बब को अभ्िादृश्यक से कितनी दूरी पर रखा जाए कि अंतिम प्रतिबिंब ;ंद्ध स्पष्ट दशर्न की अल्पतम दूरी ;25 बउद्ध तथा ;इद्ध अनंत पर बने? दोनों स्िथतियों में सूक्ष्मदशीर् की आवधर्न क्षमता ज्ञात कीजिए। 9ण्12 25 बउ के सामान्य निकट ¯बदु का कोइर् व्यक्ित ऐसे संयुक्त सूक्ष्मदशीर् जिसका अभ्िादृश्यक 8ण्0 उउ प़फोकस दूरी तथा नेत्रिाका 2ण्5 बउ प़फोकस दूरी की है, का उपयोग करके अभ्िादृश्यक से 9ण्0 उउ दूरी पर रखे ¯बब को सुस्पष्ट प़फोकसित कर लेता है। दोनों लेंसों के बीच पृथकन दूरी क्या है? सूक्ष्मदशीर् की आवधर्न क्षमता क्या है? 9ण्13 किसी छोटी दूरबीन के अभ्िादृश्यक की प़फोकस दूरी 144 बउ तथा नेत्रिाका की प़फोकस दूरी 6ण्0 बउ है। दूरबीन की आवधर्न क्षमता कितनी है? अभ्िादृश्यक तथा नेत्रिाका के बीच पृथकन दूरी क्या है? 9ण्14 ;ंद्ध किसी वेधशाला की विशाल दूरबीन के अभ्िादृश्यक की प़फोकस दूरी 15 उ है। यदि 1ण्0 बउ प़फोकस दूरी की नेत्रिाका प्रयुक्त की गयी है, तो दूरबीन का कोणीय आवधर्न क्या है? ;इद्ध यदि इस दूरबीन का उपयोग चंद्रमा का अवलोकन करने में किया जाए तो अभ्िादृश्यक लेंस द्वारा निमिर्त चंद्रमा के प्रतिबिंब का व्यास क्या है? चंद्रमा का व्यास 3ण्48 × 106 उ तथा चंद्रमा की कक्षा की त्रिाज्या 3ण्8 × 108 उ है। 9ण्15 दपर्ण - सूत्रा का उपयोग यह व्युत्पन्न करने के लिए कीजिए कि ;ंद्ध किसी अवतल दपर्ण के ितथा 2 िके बीच रखे ¯बब का वास्तविक प्रतिबिंब 2 िसे दूर बनता है। ;इद्ध उत्तल दपर्ण द्वारा सदैव आभासी प्रतिबिंब बनता है जो ¯बब की स्िथति पर निभर्र नहीं करता। ;बद्ध उत्तल दपर्ण द्वारा सदैव आकार में छोटा प्रतिबिंब, दपर्ण के ध्रुव व प़फोकस के बीच 348 बनता है। ;कद्ध अवतल दपर्ण के ध्रुव तथा प़फोकस के बीच रखे ¯बब का आभासी तथा बड़ा प्रति¯बब बनता है। ;नोट: यह अभ्यास आपकी बीजगण्िातीय वििा द्वारा उन प्रतिबिंबों के गुण व्युत्पन्न करने में सहायता करेगा जिन्हें हम किरण आरेखों द्वारा प्राप्त करते हैं।द्ध 9ण्16 किसी मेज के ऊपरी पृष्ठ पर जड़ी एक छोटी पिन को 50 बउ ऊँचाइर् से देखा जाता है। 15 बउ मोटे आयताकार काँच के गुटके को मेश के पृष्ठ के समांतर पिन व नेत्रा के बीच रखकर उसी ¯बदु से देखने पर पिन नेत्रा से कितनी दूर दिखाइर् देगी? काँच का अपवतर्नांक 1ण्5 है। क्याउत्तर गुटके की अवस्िथति पर निभर्र करता है? 9ण्17 निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लिख्िाए: ;ंद्ध चित्रा 9ण्35 में अपवतर्नांक 1ण्68 के तंतु काँच से बनी किसी ‘प्रकाश नलिका’ ;लाइट पाइपद्ध का अनुप्रस्थ परिच्छेद दशार्या गया है। नलिका का बाह्य आवरण 1ण्44 अपवतर्नांक के पदाथर् का बना है। नलिका के अक्ष से आपतित किरणों के कोणों का परिसर, जिनके लिए चित्रा में दशार्ए अनुसार नलिका के भीतर पूणर् परावतर्न होते हैं, ज्ञात कीजिए। ;इद्ध यदि पाइप पर बाह्य आवरण न हो तो क्या उत्तर होगा? चित्रा 9ण्35 9ण्18 निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर लिख्िाए: ;ंद्ध आपने सीखा है कि समतल तथा उत्तल दपर्ण सदैव आभासी प्रतिबिंब बनाते हैं। क्या ये दपर्ण किन्हीं परिस्िथतियों में वास्तविक प्रतिबिंब बना सकते हैं? स्पष्ट कीजिए। ;इद्ध हम सदैव कहते हैं कि आभासी प्रति¯बब को परदे पर वेंफदि्रत नहीं किया जा सकता। यद्यपि जब हम किसी आभासी प्रति¯बब को देखते हैं तो हम इसे स्वाभाविक रूप में अपनी आँख की स्क्रीन ;अथार्त रेटिनाद्ध पर लाते हैं। क्या इसमें कोइर् विरोधभास है? ;बद्ध किसी झील के तट पर खड़ा मछुआरा झील के भीतर किसी गोताखोर द्वारा तिरछा देखने पर अपनी वास्तविक लंबाइर् की तुलना में वैफसा प्रतीत होगाμछोटा अथवा लंबा? ;कद्ध क्या तिरछा देखने पर किसी जल के टैंक की आभासी गहराइर् परिवतिर्त हो जाती है? यदि हाँ, तो आभासी गहराइर् घटती है अथवा बढ़ जाती है? ;मद्ध सामान्य काँच की तुलना में हीरे का अपवतर्नांक काप़्ाफी अिाक होता है? क्या हीरे को तराशने वालों के लिए इस तथ्य का कोइर् उपयोग होता है? 9ण्19 किसी कमरे की एक दीवार पर लगे विद्युत बल्ब का किसी बड़े आकार के उत्तल लेंस द्वारा 3 उ दूरी पर स्िथत सामने की दीवार पर प्रति¯बब प्राप्त करना है। इसके लिए उत्तल लेंस की अिाकतम प़फोकस दूरी क्या होनी चाहिए? 9ण्20 किसी परदे को ¯बब से 90 बउ दूर रखा गया है। परदे पर किसी उत्तल लेंस द्वारा उसे एक - दूसरे से 20 बउ दूर स्िथतियों पर रखकर, दो प्रति¯बब बनाए जाते हैं। लेंस की प़फोकस दूरी ज्ञात कीजिए। 9ण्21 ;ंद्ध प्रश्न 9ण्10 के दो लेंसों के संयोजन की प्रभावी प़फोकस दूरी उस स्िथति में ज्ञात कीजिए जब उनके मुख्य अक्ष संपाती हैं, तथा ये एक.दूसरे से 8 बउ दूरी पर रखे हैं। क्या उत्तर आपतित समांतर प्रकाश पुंज की दिशा पर निभर्र करेगा? क्या इस तंत्रा के लिए प्रभावी प़फोवफस दूरी किसी भी रूप में उपयोगी है? 349 ;इद्ध उपरोक्त व्यवस्था ;ंद्ध में 1ण्5 बउ ऊँचा कोइर् ¯बब उत्तल लेंस की ओर रखा है। ¯बब कीउत्तल लेंस से दूरी 40 बउ है। दो लेंसों के तंत्रा द्वारा उत्पन्न आवधर्न तथा प्रतिबिंब का आकार ज्ञात कीजिए। 9ण्22 60ह् अपवतर्न कोण के पि्रश्म के पफलक पर किसी प्रकाश किरण को किस कोण पर आपतित कराया जाए कि इसका दूसरे पफलक से केवल पूणर् आंतरिक परावतर्न ही हो? पि्रश्म के पदाथर् का अपवतर्नांक 1ण्524 है। 9ण्23 आपको विविध् कोणों के क्राउन काँच व ि़लंट कांच के पि्रश्म दिए गए हैं। पि्रश्मों का कोइर् ऐसा संयोजन सुझाइए जोμ ;ंद्ध श्वेत प्रकाश के संकीणर् पुंज को बिना अध्िक परिक्षेपित किए विचलित कर दे। ;इद्ध श्वेत प्रकाश के संकीणर् पुंज को अध्िक विचलित किए बिना परिक्षेपित ;तथा विस्थापितद्ध कर दे। 9ण्24 सामान्य नेत्रा के लिए दूर ¯बदु अनंत पर तथा स्पष्ट दशर्न का निकट ¯बदु, नेत्रा के सामने लगभग 25 बउ पर होता है। नेत्रा का स्वच्छ मंडल ;काॅ£नयाद्ध लगभग 40 डाइआॅप्टर की अभ्िासारण क्षमता प्रदान करता है तथा स्वच्छ मंडल के पीछे नेत्रा लेंस की अल्पतम अभ्िासारण क्षमता लगभग 20 डाइआॅप्टर होती है। इस स्थूल आँकड़े से सामान्य नेत्रा के परास ;अथार्त नेत्रा लेंस की अभ्िासरण क्षमता का परिसरद्ध का अनुमान लगाइए। 9ण्25 क्या निकट दृष्िटदोष अथवा दीघर् दृष्िटदोष द्वारा आवश्यक रूप से यह ध्वनित होता है कि नेत्रा ने अपनी समंजन क्षमता आंश्िाक रूप से खो दी है? यदि नहीं, तो इन दृष्िटदोषों का क्या कारण हो सकता है? 9ण्26 निकट दृष्िटदोष का कोइर् व्यक्ित दूर दृष्िट के लिए दृ1ण्0 क् क्षमता का चश्मा उपयोग कर रहा है। अिाक आयु होने पर उसे पुस्तक पढ़ने के लिए अलग से ़2ण्0 क् क्षमता के चश्मे की आवश्यकता होती है। स्पष्ट कीजिए ऐसा क्यों हुआ? 9ण्27 कोइर् व्यक्ित ऊध्वार्ध्र तथा क्षैतिज धरियों की कमीश पहने किसी दूसरे व्यक्ित को देखता है। वहक्षैतिज धरियों की तुलना में ऊध्वार्ध्र धरियों को अध्िक स्पष्ट देख पाता है। ऐसा किस दृष्िटकोण के कारण होता है? इस दृष्िटदोष का संशोध्न वैफसे किया जाता है? 9ण्28 कोइर् सामान्य निकट ¯बदु ;25 बउद्ध का व्यक्ित छोटे अक्षरों में छपी वस्तु को 5 बउ प़फोकस दूरी के पतले उत्तल लेंस के आवधर्क लेंस का उपयोग करके पढ़ता है। ;ंद्ध वह निकटतम तथा अिाकतम दूरियाँ ज्ञात कीजिए जहाँ वह उस पुस्तक को आवधर्क लेंस द्वारा पढ़ सकता है। ;इद्ध उपरोक्त सरल सूक्ष्मदशीर् के उपयोग द्वारा संभावित अिाकतम तथा न्यूनतम कोणीय आवधर्न ;आवधर्न क्षमताद्ध क्या है? 9ण्29 कोइर् काडर् शीट जिसे 1 उउ2 साइश के वगो± में विभाजित किया गया है, को 9 बउ दूरी पर रखकर किसी आवधर्क लेंस ;9 बउ प़फोकस दूरी का अभ्िासारी लेंसद्ध द्वारा उसे नेत्रा के निकट रखकर देखा जाता है। ;ंद्ध लेंस द्वारा उत्पन्न आवधर्न ;प्रति¯बब - साइश/वस्तु - साइशद्ध क्या है? आभासी प्रति¯बब में प्रत्येक वगर् का क्षेत्रापफल क्या है? ;इद्ध लेंस का कोणीय आवधर्न ;आवधर्न क्षमताद्ध क्या है? ;बद्ध क्या ;ंद्ध में आवधर्न क्षमता ;इद्ध में आवधर्न के बराबर है? स्पष्ट कीजिए। 9ण्30 ;ंद्ध अभ्यास 9ण्29 में लेंस को चित्रा से कितनी दूरी पर रखा जाए ताकि वगो± को अिाकतम संभव आवधर्न क्षमता के साथ सुस्पष्ट देखा जा सके? 350 ;इद्ध इस उदाहरण में आवधर्न ;प्रति¯बब - साइश/वस्तु - साइशद्ध क्या है? ;बद्ध क्या इस प्रक्रम में आवधर्न, आवधर्न क्षमता के बराबर है? स्पष्ट कीजिए। 9ण्31 अभ्यास 9ण्30 में वस्तु तथा आवधर्क लेंस के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए ताकि आभासी प्रतिबिंब में प्रत्येक वगर् 6ण्25 उउ2 क्षेत्रापफल का प्रतीत हो? क्या आप आवधर्क लेंस को नेत्रा के अत्यिाक निकट रखकर इन वगो± को सुस्पष्ट देख सकेंगे? ¹नोट μ अभ्यास 9ण्29 से 9ण्31 आपको निरपेक्ष साइश में आवधर्न तथा किसी यंत्रा की आवधर्न क्षमता ;कोणीय आवधर्नद्ध के बीच अंतर को स्पष्टतः समझने में सहायता करेंगे।ह् 9ण्32 निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर दीजिएμ ;ंद्ध किसी वस्तु द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण आवधर्क लेंस द्वारा उत्पन्न आभासी प्रतिबिंब द्वारा नेत्रा पर अंतरित कोण के बराबर होता है। तब पिफर किन अथोर्ं में कोइर् आवधर्क लेंस कोणीय आवधर्न प्रदान करता है? ;इद्ध किसी आवधर्क लेंस से देखते समय प्रेक्षक अपने नेत्रा को लेंस से अत्यिाक सटाकर रखता है। यदि प्रेक्षक अपने नेत्रा को पीछे ले जाए तो क्या कोणीय आवधर्न परिवतिर्त हो जाएगा? ;बद्ध किसी सरल सूक्ष्मदशीर् की आवधर्न क्षमता उसकी प़फोकस दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती है। तब हमें अिाकािाक आवधर्न क्षमता प्राप्त करने के लिए कम से कम प़फोकस दूरी के उत्तल लेंस का उपयोग करने से कौन रोकता है? ;कद्ध किसी संयुक्त सूक्ष्मदशीर् के अभ्िादृश्यक लेंस तथा नेत्रिाका लेंस दोनों ही की प़फोकस दूरी कम क्यों होनी चाहिए? ;मद्ध संयुक्त सूक्ष्मदशीर् द्वारा देखते समय सवोर्त्तम दशर्न के लिए हमारे नेत्रा, नेत्रिाका पर स्िथत न होकर उससे वुफछ दूरी पर होने चाहिए। क्यों? नेत्रा तथा नेत्रिाका के बीच की यह अल्प दूरी कितनी होनी चाहिए? 9ण्33 1ण्25 बउ पफोकस दूरी का अभ्िादृश्यक तथा 5 बउ प़फोकस दूरी की नेत्रिाका का उपयोग करके वांछित कोणीय आवधर्न ;आवधर्न क्षमताद्ध 30 ग् होता है। आप संयुक्त सूक्ष्मदशीर् का समायोजन वैफसे करेंगे? 9ण्34 किसी दूरबीन के अभ्िादृश्यक की पफोकस दूरी 140 बउ तथा नेत्रिाका की पफोकस दूरी 5ण्0 बउ है। दूर की वस्तुओं को देखने के लिए दूरबीन की आवधर्न क्षमता क्या होगी जबμ ;ंद्ध दूरबीन का समायोजन सामान्य है ;अथार्त अंतिम प्रतिबिंब अनंत पर बनता हैद्ध। ;इद्ध अंतिम प्रतिबिंब स्पष्ट दशर्न की अल्पतम दूरी ;25 बउद्ध पर बनता है। 9ण्35 ;ंद्ध अभ्यास 9ण्34;ंद्ध में व£णत दूरबीन के लिए अभ्िादृश्यक लेंस तथा नेत्रिाका के बीच पृथकन दूरी क्या है? ;इद्ध यदि इस दूरबीन का उपयोग 3 ाउ दूर स्िथत 100 उ ऊँची मीनार को देखने के लिए किया जाता है तो अभ्िादृश्यक द्वारा बने मीनार के प्रतिबिंब की ऊँचाइर् क्या है? ;बद्ध यदि अंतिम प्रतिबिंब 25 बउ दूर बनता है तो अंतिम प्रतिबिंब में मीनार की ऊँचाइर् क्या है? 9ण्36 किसी वैफसेग्रेन दूरबीन में चित्रा 9ण्33 में दशार्ए अनुसार दो दपर्णों का प्रयोग किया गया है। इस दूरबीन में दोनों दपर्ण एक - दूसरे से 20 उउ दूर रखे गए हैं। यदि बड़े दपर्ण की वक्रता त्रिाज्या 220 उउ हो तथा छोटे दपर्ण की वक्रता त्रिाज्या 140 उउ हो तो अनंत पर रखे किसी ¯बब का अंतिम प्रति¯बब कहाँ बनेगा? 9ण्37 किसी गैल्वेनोमीटर की वुुंफडली से जुड़े समतल दपर्ण पर लंबवत आपतित प्रकाश ;चित्रा 9.36द्ध, दपर्ण से टकराकर अपना पथ पुनः अनुरेख्िात करता है। गैल्वेनोमीटर की वुंफडली में प्रवाहित कोइर् धरा दपर्ण में 3ण्5ह् का परिक्षेपण उत्पन्न करती हैं। दपर्ण के सामने 1ण्5 उ दूरी पर रखे परदे पर प्रकाश के परावतीर् चिÉ में कितना विस्थापन होगा? 351 चित्रा 9ण्36 9ण्38 चित्रा 9ण्37 में कोइर् समोत्तल लेंस ;अपवतर्नांक 1.50द्ध किसी समतल दपर्ण के पफलक पर किसी द्रव की परत के संपवफर् में दशार्या गया है। कोइर् छोटी सुइर् जिसकी नोंक मुख्य अक्ष पर है, अक्षके अनुदिश ऊपर - नीचे गति कराकर इस प्रकार समायोजित की जाती है कि सुइर् की नोंक का उलटा प्रति¯बब सुइर् की स्िथति पर ही बने। इस स्िथति में सुइर् की लेंस से दूरी 45ण्0 बउ है। द्रव को हटाकर प्रयोग को दोहराया जाता है। नयी दूरी 30ण्0 बउ मापी जाती है। द्रव का अपवतर्नांक क्या है? चित्रा 9ण्37 352

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