4ण्1 भूमिका 2000 वषर् से भी पहले विद्युत तथा चुंबकत्व दोनों ही के बारे में लोगों को ज्ञान था। पिफर भी लगभग 200 वषर् पूवर्, 1820 में’ यह स्पष्ट अनुभव किया गया कि इन दोनों में अटूट संबंध् है। 1820 की ग्रीष्म )तु में, डच भौतिकविज्ञानी हैंस िश्िचयन आॅस्टेर्ड ने, अपने एक भाषण के दौरान प्रयोग प्रद£शत करते हुए देखा कि एक सीध्े तार में विद्युत धरा प्रवाहित करने पर पास रखी हुइर् चुंबकीय सुइर् में सुस्पष्ट विक्षेप प्राप्त होता है। उन्होंने इस परिघटना पर शोध् आरंभ किया। उन्होंने पाया कि चुंबकीय सुइर् तार के अभ्िालंबवत तल में तार की स्िथति के वेंफद्रतः वृत्त की स्पशर् रेखा के समांतर संरेख्िात होती है। इस स्िथति को चित्रा 4ण्1;ंद्ध में दशार्या गया है। पर यह देखने के लिए तार में पयार्प्त धरा प्रवाहित होनी चाहिए और चुंबकीय सुइर् तार के कापफी निकट रखी होनी चाहिए ताकि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रा की उपेक्षा की जा सके। यदि तार में धरा की दिशा विपरीत कर दी जाए तो चुंबकीय सुइर् भी घूम कर विपरीत दिशा में संरेख्िात हो जाती है ¹चित्रा 4ण्1;इद्ध देख्िाएह्। तार में धरा का परिमाण बढ़ाने या सुइर् को तार के निकट लाने से चुंबकीय सुइर् का विक्षेप बढ़ जाता है। तार के चारों ओर यदि लौह चूणर् छिड़वेंफ तो इसके कण तार के चारों ओर संवेंफद्री वृत्तों में व्यवस्िथत हो जाते हैं ¹चित्रा 4ण्1;बद्ध देख्िाएह्। इस परिघटना से आॅस्टेर्ड ने निष्कषर् निकाला कि गतिमान आवेश ;धराद्ध अपने चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात प्रयोगों की गति तीव्र हो गइर्। सन 1864 में विद्युत तथा चुंबकत्व के सवर्मान्य नियमों को जेम्स मैक्सवेल ने एकीवृफत करके नए नियम बनाए और यह स्पष्ट अनुभव किया कि ’ अध्याय - 1 में पृष्ठ 3 पर बाॅक्स देख्िाए। क्रमशः इन दो स्िथतियों के तदनुरूपी हैं। 4ण्2 चुंबकीय बल 4ण्2ण्1 स्रोत और क्षेत्रा किसी चुंबकीय क्षेत्रा ठ की अभ्िाधरणा को प्रस्तावित करने से पहले हम संक्षेप में यह दोहराएँगे कि हमने अध्याय 1 के अंतगर्त विद्युत क्षेत्रा म् के विषय में क्या सीखा है। हमने यह देखा है कि दो आवेशों के बीच अन्योन्य िया पर दो चरणों में विचार किया जा सकता है। आवेश फ जोकि विद्युत क्षेत्रा का स्रोत है, एक विद्युत क्षेत्रा म् उत्पन्न करता है - हैंस िश्िचयन आॅस्टेर्ड ;1777दृ 1851द्ध डेनमावर्फ के भौतिकविज्ञानी एवं रसायनज्ञ, काॅपेनहेगन में प्रोप़ेफसर थे। उन्होंने यह देखा कि किसी चुंबकीय सुइर् को जब एक ऐसे तार के पास रखा जाता है जिसमें विद्युत धरा प्रवाहित हो रही हो तो उसमें विक्षेप होता है। इस खोज ने वैद्युत एवं चुंबकीय प्रक्रमों के बीच संबंध् का पहला आनुभविक प्रमाण प्रस्तुत किया। ’ कोइर् डाट ;¯बदुद्ध आपकी ओर संकेत करते तीर की नोंक जैसा प्रतीत होता है तथा क्राॅस किसी तीर की पंखयुक्त पूँछ जैसा प्रतीत होता है। भौतिकी हेंडिªक ऐंटून लोरेंज़्ा ;1853 दृ 1928द्ध लोरेंज़्ा डेनमावर्फ के सै(ांतिक भौतिकविज्ञानी, लिडेन में प्रोप़ेफसर थे। उन्होंने विद्युत, चुंबकत्व तथा यांत्रिाकी में संबंध् की खोज की। प्रकाश उत्सजर्कों पर चंुबकीय क्षेत्रा के प्रेक्ष्िात प्रभावों ;जीमान प्रभावद्ध की व्याख्या करने के लिए इन्होंने परमाणु में वैद्युत आवेशों के अस्ितत्व होने को अभ्िागृहीत किया। इसके लिए इन्हें 1902 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इन्होंने वुफछ जटिल उलझन भरे गण्िातीय तको± के आधर पर वुफछ रूपांतरण समीकरणों का एक समुच्चय व्युत्पन्न किया जिसे उनके सम्मान में लोरेंश रूपांतरण समीकरण कहते हैं। समीकरणों को व्युत्पन्न करते समय इन्हें इस तथ्य के बारे में यह ज्ञात नहीं था कि ये समीकरण काल तथा दिव्फस्थान की नयी अभ्िाधारणा पर अवलंबित हैं। म् त्र फ ध् ;4πε0द्धत 2 ;4ण्1द्ध यहाँ त६ए त के अनुदिश एकांक सदिश है तथा क्षेत्रा म् एक सदिश क्षेत्रा है। कोइर् आवेश ु इस क्षेत्रा से अन्योन्य िया करके एक बल थ् का अनुभव करता है थ् त्र ु म् त्र ु फ त६ ध् ;4πε0द्ध त 2 ;4ण्2द्ध जैसा कि अध्याय 1 में नि£दष्ट किया जा चुका है कि विद्युत क्षेत्रा म् मात्रा श्िाल्प तथ्य ही नहीं है, परंतु इसकी भौतिक भूमिका भी है। यह ऊजार् तथा संवेग संप्रेष्िात कर सकता है तथा यह तत्क्षण ही स्थापित नहीं हो जाता वरन इसके पैफलने में परिमित समय लगता है। क्षेत्रा की अभ्िाधरणा को पैफराडे द्वारा विशेष महत्त्व दिया गया तथा मैक्सवेल ने विद्युत तथा चुंबकत्व को एकीवृफत करने में इस अभ्िाधरणा को समावेश्िात किया। दिव्फस्थान में प्रत्येक ¯बदु पर निभर्र होने के साथ - साथ यह समय के साथ भी परिव£तत हो सकता है, अथार्त यह समय का पफलन है। इस अध्याय में हम अपनी चचार् में, यह मानेंगे कि समय के साथ क्षेत्रा में परिवतर्न नहीं होता। किसी विशेष ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा एक अथवा अध्िक आवेशों के कारण हो सकता है। यदि एक से अध्िक आवेश हैं तो उनके कारण उत्पन्न क्षेत्रा सदिश रूप से संयोजित हो जाते हैं। आप पहले अध्याय में यह सीख ही चुके हैं कि इसे अध्यारोपण का सि(ांत कहते हैं। एक बार यदि क्षेत्रा ज्ञात है तो परीक्षण आवेश पर बल को समीकरण ;4ण्2द्ध द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। जिस प्रकार स्िथर आवेश विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न करते हैं, विद्युत धराएँ अथवा गतिमान आवेश ;विद्युत क्षेत्रा के साथ - साथद्ध चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करते हैं जिसे ठ ;तद्ध द्वारा नि£दष्ट किया जाता है तथा यह भी एक सदिश क्षेत्रा है। इसके विद्युत क्षेत्रा के समरूप बहुत से मूल गुण हैं। इसे दिव्फस्थान के हर ¯बदु पर परिभाष्िात किया जाता है ;और साथ ही समय पर निभर्र कर सकता हैद्ध। प्रयोगों द्वारा यह पाया गया है कि यह अध्यारोपण के सि(ांत का पालन करता है। अध्यारोपण का सि(ांत इस प्रकार है - बहुत से स्रोतों का चंुबकीय क्षेत्रा प्रत्येक व्यष्िटगत स्रोत के चुंबकीय क्षेत्रों का सदिश योग होता है। 4ण्2ण्2 चुंबकीय क्षेत्रा, लोरेंज बल मान लीजिए विद्युत क्षेत्रा म् ;तद्ध तथा चुंबकीय क्षेत्रा ठ ;तद्ध दोनों की उपस्िथति में कोइर् ¯बदु आवेश ु ;वेग अ से गतिमान तथा किसी दिए गए समय ज पर त पर स्िथतद्ध विद्यमान है। किसी आवेश ु पर इन दोनों क्षेत्रों द्वारा आरोपित बल को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है - थ् त्र ु ख् म् ;तद्ध ़ अ ×ठ ;तद्ध, त्र थ् ़थ्;4ण्3द्धविद्युतचंुबकीय इस बल को सवर्प्रथम एच.ए. लोरेंज ने ऐम्िपयर तथा अन्य वैज्ञानिकों द्वारा विस्तृत पैमाने पर किए गए प्रयोगों के आधर पर व्यक्त किया था। इस बल को अब लोरेंज बल कहते हैं। विद्युत क्षेत्रा के कारण लगने वाले बल के बारे में तो आप विस्तार से अध्ययन कर ही चुके हैं। यदि हम चंुबकीय क्षेत्रा के साथ अन्योन्य िया पर ध्यान दें तो हमें निम्नलिख्िात विशेषताएँ मिलती हैं - ;पद्ध यह ुए अ तथा ठ ;कण के आवेश, वेग तथा चुंबकीय क्षेत्राद्ध पर निभर्र करता है। )णावेश पर लगने वाला बल ध्नावेश पर लगने वाले बल के विपरीत होता है। गतिमान आवेश और चुंबकत्व ;पपद्ध चुंबकीय बलु ख् अ ×ठ , वेग तथा चुंबकीय क्षेत्रा का एक सदिश गुणनपफल होता है। सदिश गुणनपफल चुंबकीय क्षेत्रा के कारण बल को समाप्त ;शून्यद्ध कर देता है। यह तब होता है जब बल, वेग तथा चंुबकीय क्षेत्रा दोनों के लंबवत होता है ;किसी दिशा मेंद्ध। जब वेग तथा चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा एक दूसरे के समांतर या प्रतिसमांतर होती है। इसकी दिशा सदिश गुणनपफल ;क्रास गुणनपफलद्ध के लिए चित्रा 4ण्2 में दशार्ए अनुसार पेंच नियम अथवा दक्ष्िाण हस्त नियम द्वारा प्राप्त होती है। ;पपपद्ध यदि आवेश गतिमान नहीं है ;तब द्यअद्यत्र 0द्ध तो चुंबकीय बल शून्य होता है। केवल गतिमान आवेश ही बल का चित्रा 4ण्2आवेश्िात कण पर लगे बल की दिशा ;ंद्ध चुंबकीय क्षेत्राअनुभव करता है। ठसेθकोण बनाते हुएअवेग से गतिमान कोइर् ध्नावेश्िात कण चुंबकीय क्षेत्रा के लिए व्यंजक चुंबकीय क्षेत्रा के मात्राक की बल का अनुभव करता है जिसकी दिशा दक्ष्िाण हस्त नियम द्वारा परिभाषा देने में हमारी सहायता करता है। यदि बल के समीकरण प्राप्त होती है। ;इद्ध चुंबकीय क्षेत्रा की उपस्िथति में गतिशील में हल ुए थ्तथाअ सभी का मान एकांक मानें तोथ् त्र ु आवेश्िात कण के विक्षेपुकी दिशादृुके विक्षेप की दिशा के ख्अ × ठ, त्रु अ ठ ेपद θ द६ए यहाँθ वेग अतथा चुंबकीय क्षेत्रा विपरीत होती है। ठ के बीच का कोण है ¹चित्रा 4ण्2 ;ंद्ध देख्िाएह्। चुंबकीय क्षेत्रा ठका परिमाण 1 ैप् मात्राक होता है, जबकि किसी एकांक आवेश ;1 ब्द्धए जो किठ के लंबवत 1उध्े वेग अ से गतिमान है, पर लगा बल 1 न्यूटन हो। विमीय रीति से हम जानते हैं कि ख्ठ, त्र ख्थ्ध्ुअ, तथाठ का मात्राक न्यूटन सेवंफड/वूफलाॅम मीटर है। इस मात्राक को टेस्ला ;ज्द्ध कहते हैं जिसे निकोला टेस्ला ;1856 - 1943द्ध के नाम पर रखा गया है। टेस्ला एक बड़ा मात्राक है। अतः एक अपेक्षावृफत छोटे मात्राक गाउस ;त्र10दृ4टेस्लाद्ध का प्रायः उपयोग किया जाता है। विश्व के चुंबकीय क्षेत्रा के विस्तृत परिसर को सारणी 4ण्1 में दशार्या गया है सारणी4ण्1विविध् भौतिक परिस्िथतियों में चुंबकीय क्षेत्रों के परिमाणों की कोटि भौतिक परिस्िथति ठ का परिमाण ;टेस्लाए ज् मेंद्ध न्यूट्राॅन तारे का पृष्ठ 108 प्रयोगशाला में प्रातिनिध्िक उच्च क्षेत्रा 1 10दृ2छोटे छड़ चुंबक के समीप 10दृ5पृथ्वी के पृष्ठ पर 10दृ10मानव तंत्रिाका तंतु 10दृ12अंतरातारकीय दिव्फस्थान 4ण्2ण्3 विद्युत धरावाही चालक पर चुंबकीय बल हम किसी एकल गतिमान आवेश पर चंुबकीय क्षेत्रा द्वारा आरोपित बल के विश्लेषण का विस्तार विद्युत धरावाही सीध्ी छड़ के लिए कर सकते हैं। लंबाइर्स तथा एकसमान अनुप्रस्थ काट। की किसी छड़ पर विचार करते हैं। हम किसी चालक ;जिसमें इलेक्ट्राॅन गतिशील वाहक हैंद्ध की भाँति एक ही प्रकार के गतिशील वाहक मानेंगे। मान लीजिए इन गतिशील आवेश वाहकों का संख्या घनत्व द है तब चालक में वुफल गतिशील आवेश वाहकों की संख्याद।स हुइर्। इस चालक छड़ में अपरिवतीर् विद्युत धराप्के लिए हम यह मान सकते हैं कि प्रत्येक गतिशील वाहक का अपवाह वेगअकहै 135 भौतिकी ;अध्याय 3 देख्िाएद्ध। किसी बाह्य चुंबकीय क्षेत्रा ठ की उपस्िथति में इन वाहकों पर बल थ् त्र ;द।सद्धु अक × ठ यहाँ ु किसी वाहक के आवेश का मान है। अब यहाँ दुअक विद्युत धारा घनत्व र तथा द्य;दु अकद्धद्य। विद्युत धारा प् है ;विद्युत धरा तथा विद्युत धारा घनत्व पर चचार् के लिए अध्याय 3 देख्िाए।द्ध इस प्रकार थ् त्र ख्;दुअक द्ध।स, × ठ त्र ख् र।स , × ठत्र प्1 ×ठ ;4ण्4द्ध यहाँ स एक सदिश है जिसका परिमाण स है जो कि छड़ की लंबाइर् है, तथा इसकी दिशा विद्युत धारा प् के सवर्सम है। ध्यान दीजिए विद्युत धारा सदिश नहीं है। समीकरण ;4ण्4द्ध के अंतिम चरण में हमने सदिश चिÉ को र से स पर स्थानांतरित कर दिया है। समीकरण ;4ण्4द्ध सीधी छड़ पर लागू होती है। इस समीकरण में ठ बाह्य चुंबकीय क्षेत्रा है। यह विद्युत धारावाही छड़ द्वारा उत्पन्न क्षेत्रा नहीं है। यदि तार की यादृच्िछक आकृति है, तो हम इस पर लाॅरेंज बल का परिकलन, इसे रेख्िाक पिðयों कसर का समूह मानकर तथा संकलन द्वारा कर सकते हैं थ् त्र प्कस ×ठ र र अिाकांश प्रकरणों में संकलन को समाकलन में परिवतिर्त कर लेते हैं। उदाहरण 4ण्1 200 ह द्रव्यमान तथा 1ण्5 उ लंबाइर् के किसी सीधे तार से 2 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। यह किसी एकसमान क्षैतिज ठ चुंबकीय क्षेत्रा द्वारा वायु के बीच में निलंबित है ;चित्रा 4ण्3द्ध। चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण ज्ञात कीजिए। उदाहरण 4ण्1 उदाहरण 4ण्2 चंुबकीय क्षेत्रा में गतिमान आवेश्िात कण - अन्योन्य िया प्रदशर्नीजजचरूध्ध्ूूूण्चीलेण्ींूंपपण्मकनध््जमइध्वचजपबेध्रंअंध्चंतजउंहदध्पदकमगण्ीजउस 4ण्3 चुंबकीय क्षेत्रा में गति अब हम और अध्िक विस्तार से चुंबकीय क्षेत्रा में गतिशील आवेश के विषय में अध्ययन करेंगे। हमने यांत्रिाकी ;कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक का अध्याय 6 देख्िाएद्ध में यह सीखा है कि यदि किसी बल का कण की गति की दिशा में ;अथवा उसके विपरीतद्ध कोइर् अवयव है तो वह बल उस कण भौतिकी पर कायर् करता है। चुंबकीय क्षेत्रा में आवेश की गति के प्रकरण में, चुंबकीय बल कण के वेग की दिशा के लंबवत होता है। अतः कोइर् कायर् नहीं होता तथा वेग के परिमाण में भी कोइर् परिवतर्न नहीं होता ;यद्यपि संवेग की दिशा में परिवतर्न हो सकता है। ख्ध्यान दीजिए, यह विद्युत क्षेत्रा के कारण बल, ु म्एसे भ्िान्न है, जिसका गति के समांतर ;अथवा प्रतिसमांतरद्ध अवयव हो सकता है और इस प्रकार संवेग के साथ - साथ ऊजार् को भी स्थानांतरित कर सकता है।ह् हम किसी एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में आवेश्िात कण की गति पर विचार करेंगे। पहले उस स्िथति पर विचार कीजिए जिसमें वेग अ चुंबकीय क्षेत्रा ठके लंबवत है। लंबवत बल ुअ × ठअभ्िावेंफद्र बल की भाँति कायर् करता है तथा चुंबकीय क्षेत्रा के लंबवत वतुर्ल गति उत्पन्न करता है। यदि अतथाठएक दूसरे के लंबवत हैं, तो कण ;अथार्त किसी वृत्त के अनुदिशद्ध वतुर्ल गति करेगा ;चित्रा 4ण्5द्ध। चित्रा 4ण्5वतुर्ल गति यदि वेग अ का कोइर् अवयव है, ठ के अनुदिश तो यह अवयव अपरिवतिर्त रहता है, क्योंकि चुंबकीय क्षेत्रा के अनुदिश गति को चुंबकीय क्षेत्रा प्रभावित नहीं करेगा। ठ के लंबवत किसी तल में गति, पहले की भाँति, वतुर्ल गति ही है जिससे यह अवयव वुफंडलिनी गति उत्पन्न करता है ;चित्रा 4ण्6द्ध। आपने पिछली कक्षाओं में यह सीख लिया है ;देख्िाए अध्याय 4 कक्षा 11द्ध कि यदि किसी कण के वृत्ताकार पथ की 2त्रिाज्या तहै तो उस कण पर एक बल उ अ ध् तवृत्त के वेंफद्र की ओर तथा पथ के लंबवत कायर् करता है जिसे अभ्िावेंफद्र बल कहते हैं। यदि वेगअचुंबकीय क्षेत्राठके लंबवत है, तो चुंबकीय बल वेगअतथा चुंबकीय क्षेत्रा ठके लंबवत होता है तथा अभ्िावेंफद्र बल की भाँति इसका परिमाण ु अ ठहोता है। दोनों अभ्िावेंफद्र बल के व्यंजकों को समीकरण के रूप में लिखने पर 2चूड़ी अंतराल ;पिचद्ध उ अध्त त्र ु अ ठए त्रिाज्या त त्र उ अ ध् ुठ ;4ण्5द्ध चित्रा 4ण्6वुंफडलिनी गति जितना अध्िक संवेग होगा उतनी ही अध्िक निमिर्त वृत्त की त्रिाज्या होगी तथा नि£मत वृत्त भी बड़ा होगा। यदि कोणीय आवृिा ωहै तो अ त्र ωत अतः ω त्र 2πν त्र ु ठध् उ ख्4ण्6;ंद्ध, कोणीय आवृिा ω वेग अथवा ऊजार् पर निभर्र नहीं करती। यहाँ νघूणर्न की आवृिा है। νके ऊजार् पर निभर्र न करने का साइक्लोट्राॅन के डिशाइन में एक महत्वपूणर् अनुप्रयोग है ;अनुभाग 4ण्4ण्2 देख्िाएद्ध। एक परिक्रमा पूरी करने में लगा समय ज्त्र 2πध्ω ≡ 1ध्νए यदि चुंबकीय क्षेत्रा के समांतर वेग का कोइर् अवयव ;अद्यद्य द्वारा निदिर्ष्टद्ध है, कण का पथ वुंफडलिनी ;सपिर्लाकारद्ध जैसा होगा। एक घूणर्न में कण द्वारा चुंबकीय क्षेत्रा के अनुदिश चली गइर् दूरी को पिच या चूड़ी अंतराल कहते हैं। समीकरण ख्4ण्6 ;ंद्ध, का उपयोग करने पर हमें प्राप्त होता है। च त्र अज् त्र 2πउअ ध् ु ठ ख्4ण्6;इद्ध,द्यद्य द्यद्यगति के वृत्तीय अवयव की त्रिाज्या को वुंफडलिनी की त्रिाज्या कहते हैं। गतिमान आवेश और चुंबकत्वउदाहरण 4ण्3 6 × 10दृ4 ज् के चुंबकीय क्षेत्रा के लंबवत 3 ×107 उध्े की चाल से गतिमान किसी इलेक्ट्राॅन ;द्रव्यमान 9 × 10.31 ाह तथा आवेश 1ण्6 × 10दृ19 ब्द्ध के पथ की त्रिाज्या क्या है? इसकी क्या आवृिा होगी? इसकी ऊजार् ज्ञमट में परिकलित कीजिए। ; 1 मट त्र 1ण्6 × 10दृ19 श्रद्ध हलसमीकरण ;4ण्5द्ध का उपयोग करने पर हम पाते हैं त त्र उ अ ध् ;ुठद्ध त्र 9 ×10दृ31 ाह × 3 × 107 उ ेदृ1 ध् ; 1ण्6 × 10दृ19 ब् × 6 × 10दृ4 ज्द्धत्र 26 × 10दृ2 उ त्र 26 बउ ν त्र अ ध् ;2 πतद्ध त्र 2×106 ेदृ1 त्र 2×106 भ््र त्र2 डभ््रण् म् त्र ;) द्धउअ 2 त्र ;) द्ध 9 × 10दृ31 ाह × 9 × 1014 उ2ध्े2 त्र 40ण्5 ×10दृ17 श्र≈ 4×10दृ16 श्र त्र 2ण्5 ज्ञमट आवेश्िात कणों की वुंफडलिनी गति तथा उत्तर ध््रुवीय ज्योति धु्रवीय क्षेत्रों जैसे अलास्का तथा उत्तरी कनाडा में आकाश में वणो± का अत्यंत वैभवशाली दृश्य दिखाइर् देता है। नृत्य करते हरे गुलाबी प्रकरणों का दृष्िटगोचर होना जितना मनोहारी व चित्ताकषर्क है उतना ही उलझन पूणर् भी है। भौतिकी में अब इस प्राकृतिक परिघटना का स्पष्टीकरण प्राप्त हो गया है जिसका इस अध्याय के अंतगर्त हम अध्ययन कर रहे हैं उससे संबंध रखता है। मान लीजिए द्रव्यमान उतथा आवेश ुका कोइर् कण आरंभ्िाक वेग असे किसी चुंबकीय क्षेत्रा ठ में प्रवेश करता है। मान लीजिए इस वेग का चुंबकीय क्षेत्रा के समांतर अवयव अ चतथा इस क्षेत्रा के अभ्िालंबवत अवयव अ द है। आवेश्िात कण पर चुंबकीय क्षेत्रा के अनुदिश कोइर् बल नहीं है। वेग अ चसे निरंतर चुंबकीय क्षेत्रा के समांतर गतिमान रहता है। कण पर कायर्रत वेग के अभ्िालंबवत अवयव के कारण इस पर लोरेंज बल ;अ द×ठद्ध कायर् करता है जिसकी दिशा अ दतथाठदोनों के लंबवत होती है। जैसा कि अनुभाग 4ण्3ण्1 में देख चुके हैं, इस प्रकार कण में वतुर्ल गति करने की प्रवृिा उत्पन्न हो जाती है तथा वह वतुर्ल गति चुंबकीय क्षेत्रा के लंबवत तल में होती है। जब यह गति चुंबकीय क्षेत्रा के समांतर कण की गति से युग्िमत हो जाती है तो परिणामी प्रक्षेप पथ रेखाओं के चुंबकीय क्षेत्रा के अनुदिश वुंफडलिनी होता है जैसा कि यहाँ चित्रा ;ंद्ध में दशार्या गया है। यदि क्षेत्रा रेखाएँ मुड़ भी जाती हैं तो भी वुंफडलिनी पथ पर गतिशील कण पाश में पँफसकर चुंबकीय क्षेत्रा के चारों ओर गति करने के लिए निदेर्श्िात होता है। चूँकि लोरेंज बल प्रत्येक ¯बदु पर वेग के लंबवत है, क्षेत्रा कण पर कोइर् कायर् नहीं करता तथा वेग का परिमाण समान रहता है। उदाहरण 4ण्3 सौर प्रज्वाल के समय सूयर् से विशाल संख्या में इलेक्ट्राॅन तथा प्रोटाॅन बाहर उत्सजिर्त होते हैं। उनमें से वुफछ पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रा के पाश में पँफस जाते हैं तथा क्षेत्रा रेखाओं के अनुदिश वुंफडलिनी पथ पर गति करते हैं। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रा की क्षेत्रा रेखाएँ चुंबकीय ध्रुवों पर बहुत पास - पास आ जाती हैं ख्देख्िाए चित्रा ;इद्ध, अतः धु्रवों के निकट आवेशों का घनत्व बढ़ जाता है। ये आवेश्िात कण वायुमंडल के अणुओं से तथा परमाणुओं से टकराते हैं। उत्तेजित आॅक्सीजन परमाणु हरा प्रकाश उत्सजिर्त करते हैं तथा उत्तेजित नाइट्रोजन परमाणु गुलाबी प्रकाश उत्सजिर्त करते हैं। भौतिकी में इस परिघटना को उत्तर धु्रवीय ज्योति कहते हैं। भौतिकी 4ण्4 संयुक्त विद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों में गति 4ण्4ण्1 वेग वरणकतार् आप जानते हैं कि विद्युत तथा चुंबकीय दोनों क्षेत्रों की उपस्िथति में अ वेग से गतिमान ु आवेश के कण पर समीकरण ;4ण्3द्ध के अनुसार एक बल कायर् करता है जिसे इस प्रकार व्यक्त करते हैंः थ् त्र ु ;म् ़ अ×ठद्ध त्र थ्म् ़ थ्ठ हम यहाँ चित्रा 4ण्7 में दशार्ए अनुसार एक सरल स्िथति पर विचार करेंगे जिसमें विद्युत क्षेत्रा तथा चुंबकीय क्षेत्रा एक दूसरे के लंबवत हैं तथा कण का वेग इन दोनों क्षेत्रों के लंबवत है। तब ६ ६६६थ् रथ् ;द्धम् त्र ुम् त्र ुम् ए ठ त्र ुअ×ठ ए त्र ुअ प× ठा त्र दृुठ र अतः ;द्ध ६थ् त्र ुम् दृ अठ र चित्रा 4ण्7 साइक्लोट्राॅन अन्योन्यिया प्रदशर्नीजजचरूध्ध्ूूूण्चीलण्दजदनण्मकनण्जूध्दजदनरंअंध्पदकमगण्चीचघ्जवचपबत्र33ण्0 इस प्रकार चित्रा में दशार्ए अनुसार विद्युत बल तथा चुंबकीय बल एक दूसरे के विपरीत दिशा में हैं। मान लीजिए हम म् तथा ठ के मानों को इस प्रकार समायोजित करते हैं कि इन बलों के परिमाण समान हो जाएँ तो आवेश पर वुफल बल शून्य हो जाएगा तथा आवेश इन क्षेत्रों में बिना विक्षेपित हुए गमन करेगा। यह तब होगा जब म् ुम् त्र ुअठ अथवा अ त्र ;4ण्7द्धठ इस शतर् का उपयोग विभ्िान्न गति से गतिमान आवेशों ;चाहे उनके आवेश तथा द्रव्यमान वुफछ भी होंद्ध के पुंज से किसी विशेष वेग के आवेश्िात कणों को चुनने में किया जाता है। अतः क्राॅसित चुंबकीय व विद्युत क्षेत्रा वेग वरणकतार् के समान कायर् करते हैं। केवल म्ध्ठ की चाल वाले कण ही इस क्राॅसित क्षेत्रों वाले स्थान से बिना विक्षेपित हुए गुशरते हैं। इस विध्ि का उपयोग सन 1897 में जे. जे. थामसन ने इलेक्ट्राॅन का आवेश - द्रव्यमान अनुपात ;मध्उद्ध मापने में किया था। इस सि(ांत का उपयोग द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर में भी किया जाता है। यह ऐसी युक्ित है जो आवेश्िात कणों को, प्रायः आयनों, उनके आवेश - द्रव्यमान अनुपात के अनुसार पृथक करती है। 4ण्4ण्2 साइक्लोट्राॅन साइक्लोट्राॅन आवेश्िात कणों अथवा आयनों का उच्च ऊजार्ओं तक त्वरित करने वाला यंत्रा है। इसका आविष्कर नाभ्िाकीय संरचना के अन्वेषण के लिए सन् 1934 में इर्.ओ. लोरेंश तथा एम. एस.लि¯वग्स्टाॅन ने किया था। आवेश्िात कणों की ऊजार् में वृि करने के लिए साइक्लोट्राॅन में संयुक्त रूप में विद्युत क्षेत्रा तथा चुंबकीय क्षेत्रा दोनों का उपयोग किया जाता है। चूँकि ये दोनों क्षेत्रा एक दूसरे के लंबवत लगाए जाते हैं, इन्हें क्राॅसित क्षेत्रा कहते हैं। साइक्लोट्राॅन में इस तथ्य का उपयोग किया जाता है कि फ्चुंबकीय क्षेत्रा में परिक्रमण करने वाले आवेश्िात कणों की परिक्रमण की आवृिा कण की ऊजार् पर निभर्र नहीं करती।य् कण अध्िकांश समय तक दो अध्र्वृत्ताकार चिका जैसे धतु के पात्रों, क्1 तथा क्2 के बीच गति करते हैं। इन धतु के पात्रों को ‘डीज’ ;क्ममेद्ध कहते हैं क्योंकि ये अंग्रेशी के वणर्माला के अक्षर श्क्श् जैसे दिखाइर् देते हैं। चित्रा 4ण्8 में साइक्लोट्राॅन का व्यवस्था आरेख दशार्या गया है। धतु के बाॅक्सों के भीतर कण परिरक्ष्िात रहते हैं तथा इन पर विद्युत क्षेत्रा कायर् नहीं करता। तथापि कण पर चुंबकीय क्षेत्रा कायर् करता है जिसके कारण वह एक ‘डी’ के अंदर वतुर्ल गति करता है। प्रत्येक बार जब कण एक ‘डी’ से दूसरी ‘डी’ में जाता है तो हर बार उस पर विद्युत क्षेत्रा कायर् करता है। प्रत्यावतीर् रूप से विद्युत क्षेत्रा का चिÉ परिवतिर्त होता रहता है तथा इसका कण की वतर्ुल गति के साथ सामंजस्य होता है। इससे यह सुनिश्िचत होता है कि कण सदैव विद्युत क्षेत्रा द्वारा त्वारित होता है। हर बार त्वरण से कण की ऊजार् में वृि होती है। जैसे - जैसे ऊजार् में वृि होती जाती है उसके वृत्ताकार पथ की त्रिाज्या में भी वृि होती है। अतः कण का पथ सपिर्लाकार होता है। इस सारे संयोजन को निवार्तित किया जाता है ताकि आयनों तथा वायु के अणुओं के बीच संघट्टð न्यूनतम हो जाए। डीश पर एक उच्च प्रत्यावतीर् वोल्टता अनुप्रयुक्त की जाती है। चित्रा 4ण्8 में दशार्ए गए आरेख में ध्नायन अथवा धनावेश्िात कण ;कण प्रोटाॅनद्ध वेंफद्र च् पर मुक्त किए जाते हैं। ये किसी एक ‘डी’ में अध्र्वृत्ताकर पथ पर गमन करते हुए ज्ध्2 समय अंतराल में डीश के बीच के रिक्त स्थान में आते हैं। यहाँ ज् परिक्रमण काल है जिसका मान समीकरण ;4ण्6द्ध के अनुसार 12πउ ज् त्रत्र ν ब ुठ ुठ अथवा νत्र ;4ण्8द्धब 2πउ प्रत्यक्ष तको± के आधर पर इस आवृिा को साइक्लोट्राॅन आवृिा कहते हैं तथा इसे ν ब द्वारा निदिर्ष्ट किया जाता है। साइक्लोट्राॅन में अनुप्रयुक्त वोल्टता की आवृिा ν ं को इस प्रकार समायोजित किया जाता है कि जितने समय में आयन अपना आध परिक्रमण पूरा करता है उतने ही समय में डीश की ध््रुवता परिवतिर्त हो जाती है। इसके लिए आवश्यक शतर् ν ं त्र ν ब को अनुनाद की शतर् कहते हैं। स्रोत का कला का समायोजन इस प्रकार किया जाता है कि जब ध्नायन क्1 के छोर पर पहुँचता है तो उस समय क्2 निम्न विभव पर होता है तथा आयन इस रिक्त स्थान में त्वरित होते हैं। डीश के भीतर कण ऐसे क्षेत्रा में गमन करते हैं जहाँ विद्युत क्षेत्रा नहीं होता। हर बार कण एक डी से दूसरी डी पर जाने में कण की ऊजार् में ुट की वृि होती है ;यहाँ ट डीज़्ा के बीच उस समय की वोल्टता है।द्ध समीकरण ;4ण्5द्ध से यह स्पष्ट है कि कणों के पथों की त्रिाज्या में हर बार, गतिज ऊजार्ओं में वृि होने के कारण वृि होती जाती है। आयन डीश के बीच बारंबार उस समय तक त्वरित होते रहते हैं जब तक कि वे लगभग डीश के बराबर त्रिाज्या पाने के लिए आवश्यक ऊजार् प्राप्त नहीं कर लेते। उस समय पिफर से चुंबकीय क्षेत्रा द्वारा विक्षेपित होकर निगर्म झिरी द्वारा निकाय से बाहर निकल जाते हैं। समीकरण ;4ण्5द्ध से, हमें प्राप्त होता है - ुठत् अ त्र ;4ण्9द्ध उ यहाँ त् निगर्म पर प्रक्षेप की त्रिाज्या है तथा यह डीज़्ा की त्रिाज्या के बराबर है। अतः आयनों की गतिज ऊजार् 1 22 2 ुठत् 2 उअ त्र ;4ण्10द्ध22उ चित्रा 4ण्8 साइक्लोट्राॅन का व्यवस्था आरेख। ¯बदु च् परसाइक्लोट्राॅन का प्रचालन इस तथ्य पर आधरित है कि किसी आवेश्िात कणों अथवा आयनों का ड्डोत है। ये आवेश्िात कणआयन के एक परिक्रमण का समय आयन की चाल अथवा कक्षा की या आयन एकसमान लंबवत चुंबकीय क्षेत्रा ठ के कारण क्1त्रिाज्या पर निभर्र नहीं है। साइक्लोट्राॅन का उपयोग इसमें त्वरित तथा क्2 डीज़्ा के भीतर - वृत्ताकार पथ पर गमन करते हैं। एकऊजार्युक्त कणों द्वारा नाभ्िाक पर बमबारी करके परिणामी नाभ्िाकीय प्रत्यावतीर् वोल्टता ड्डोत इन आवेश्िात कणों को उच्च चालोंअभ्िाियाओं का अध्ययन करने के लिए किया जाता है। इसका तक त्वरित करता है। अंततः आवेश्िात कण बाहरी द्वार सेउपयोग ठोसों में आयनों को रोपित करके उनके गुणों में सुधर करने निकाल दिए जाते हैं।और यहाँ तक कि नए पदाथो± को संश्लेष्िात करने में भी किया जाता 141 भौतिकी है। इसका उपयोग रेडियोएक्िटव पदाथो± को उत्पन्न करने में किया जाता है। इन रेडियोएक्िटव पदाथो± को अस्पतालों में रोगी के निदान तथा उपचार में किया जाता है। उदाहरण 4ण्4 साइक्लोट्राॅन की दोलित्रा आवृिा 10 डभ््र है। प्रोटाॅनों को त्वरित करने के लिए प्रचालन चुंबकीय क्षेत्रा का मान कितना होना चाहिए। यदि डीश की त्रिाज्या 60 बउ है तो त्वरक द्वारा उत्पन्न प्रोटाॅन पुंज की गतिज ऊजार् डमट में परिकलित कीजिए। ;म त्र1ण्60 × 10दृ19 ब्ए उ च त्र 1ण्67 × 10दृ27 ाहए 1 डमट त्र 1ण्6 × 10दृ13 श्रद्धण् हल दोलित्रा आवृिा प्रोटाॅन के साइक्लोट्राॅन के बराबर होनी चाहिए। समीकरणों ;4ण्5द्ध तथा ख्4ण्6 ;ंद्ध, का उपयोग करने पर हमें प्राप्त होता है ठ त्र 2π उ νध्ु त्र6ण्3 ×1ण्67 × 10दृ27 × 107 ध् ;1ण्6 × 10दृ19द्ध त्र 0ण्66 ज् प्रोटाॅन का अंतिम वेग अ त्र त × 2π ν त्र 0ण्6 उ × 6ण्3 ×107 त्र 3ण्78 × 107 उध्ेण् म् त्र ) उअ 2 त्र 1ण्67 ×10दृ27 × 14ण्3 × 1014 ध् ;2 × 1ण्6 × 10दृ13द्ध त्र 7 डमट 4ण्5 विद्युत धरा अवयव के कारण चुंबकीय क्षेत्रा, बायो - सावटर् नियम जितने चुंबकीय क्षेत्रा हमें ज्ञात हैं वे सभी विद्युत धराओं ;अथवा गतिशील आवेशोंद्ध तथा कणों के नैज चुंबकीय आघूणो± के कारण उत्पन्न हुए हैं। यहाँ अब हम विद्युत धरा तथा उसके द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्रा के बीच संबंध् के बारे में अध्ययन करेंगे। यह संबंध् बायो सावटर् नियम द्वारा प्राप्त होता है। चित्रा 4ण्9 में एक परिमित विद्युत धरा चालक ग्ल् दशार्या गया है, जिसमें विद्युत धरा प् प्रवाहित हो रही है। चालक के अतिअल्प अवयव कस पर विचार कीजिए। मान लीजिए हमें इस अवयव द्वारा इससे त दूरी पर स्िथत किसी ¯बदु च् पर चुंबकीय क्षेत्रा कठ का मान निधर्रित करना है। मान लीजिए विस्थापन सदिश त तथा कस के बीच θ कोण बनता है। तब बायो - सावटर् नियम के अनुसार चुंबकीय क्षेत्रा कठ का परिमाण विद्युत धरा प्ए लंबाइर् अवयव द्यकसद्यके अनुक्रमानुपाती तथा दूरी त के वगर् के व्युत्क्रमानुपाती है। इस क्षेत्रा की दिशा’कस तथा त के तलों के लंबवत होगी। अतः सदिश संकेत प(ति में प् क स × त कठ ∝ 3 त चित्रा 4ण्9 बायो - सावटर् नियम का निदशर् त्र 0 4 - π 3 प् क त ×स त ख्4ण्11;ंद्ध, चित्रा। विद्युतधरा - अवयव प् कसए त दूरी पर स्िथत बिंदु पर क्षेत्रा कठ उत्पन्न करता है। ⊗ चिÉ यह इंगित करता है कि क्षेत्रा यहाँ - ध्4π अनुक्रमानुपातिक नियतांक है। उपरोक्त समीकरण तब लागू होता है जबकि 0 कागश के तल के अभ्िालंबवत नीचे कीमाध्यम निवार्त होता है। ओर प्रभावी है।इस क्षेत्रा का परिमाण - 0 प् कस ेपद θ कठ त्र ख्4ण्11;इद्ध,4π त 2 यहाँ हमने सदिश - गुणनपफल के गुणध्मर् द्यकस×तद्यत्र कसत ेपदθ का उपयोग किया है। चुंबकीय क्षेत्रा के लिए समीकरण ख्4ण्11;ंद्ध, मूल समीकरण है। अनुक्रमानुपाती नियतांक - 0 का यथाथर् मान है - 4π 0 −7- त्र 10 ज्उध्। ख्4ण्11;बद्ध,4π राश्िा - 0 को मुक्त आकाश ;या निवार्तद्ध की चुंबकशीलता नियतांक कहते हैं। चुंबकीय क्षेत्रा के बायो - सावटर् नियम और स्िथरवैद्युतिकी के वूफलाॅम नियम में वुफछ समानताएँ हैं तथा वुफछ असमानताएँ। इसमें से वुफछ निम्न प्रकार हैं - ;पद्ध दोनों दीघर् - परासी हैं, क्योंकि दोनों ही स्रोत से परीक्षण बिंदु तक की दूरी के वगर् के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। दोनों ही क्षेत्रों पर अध्यारोपण सि(ांत लागू होता है ख्इस संबंध् में यह ध्यान दीजिए कि स्रोत प् कस में चुंबकीय क्षेत्रा रैख्िाक है जैसे कि अपने स्रोत, विद्युत आवेश में स्िथर वैद्युत क्षेत्रा रैख्िाक है।, ’ कस×त की दिशा दक्ष्िाण हस्त पेंच नियम द्वारा भी प्राप्त होती है। कस तथा त के तलों को देख्िाए। कल्पना कीजिए कि आप पहले सदिश से दूसरे सदिश की ओर गमन कर रहे हैं। यदि गति वामावतर् है तो परिणामी आपकी ओर संकेत करेगा। यदि यह दक्ष्िाणावतर् है तो परिणामी आपसे दूर की ओर होगा। भौतिकी ;पपद्ध स्िथरवैद्युत क्षेत्रा आदिश स्रोत, जैसे वैद्युत आवेश, द्वारा उत्पन्न होता है जबकि चुंबकीय क्षेत्रा एक सदिश स्रोत जैसे, प् कस द्वारा उत्पन्न होता है। ;पपपद्ध स्िथरवैद्युत क्षेत्रा स्रोत को क्षेत्रा के ¯बदु से मिलाने वाले विस्थापन सदिश के अनुदिश होता है जबकि चुंबकीय क्षेत्रा विस्थापन सदिश ततथा विद्युत धरा अवयव प् कस दोनों के तलों के लंबवत होता है। ;पअद्ध बायो - सावटर् नियम में कोण पर निभर्रता है जो स्िथर वैद्युत क्षेत्रा में नहीं होती। चित्रा 4ण्9 में, दिशा कस ;डैश युक्त रेखा में किसी भी ¯बदु पर चुंबकीय क्षेत्रा शून्य है। इस दिशा के अनुदिश θ त्र 0ए ेपद θ त्र 0 तथा समीकरण ख्4ण्11;ंद्ध,ए द्यकठद्य त्र 0 मुक्त दिव्फस्थान की विद्युतशीलता, मुक्त दिव्फस्थान की चुंबकशीलता तथा निवार्त में प्रकाश के वेग में एक रोचक संबंध् है। - 01 − 11 ε - त्र;4πεद्ध त्र 10 7 द्धत्र त्र 00 0 ;9 8224π 9 ×10 ;3 ×10 द्ध ब इस संबंध् के विषय में हम विद्युत चुंबकीय तरंगों के अध्याय 8 में चचार् करेंगे। चूँकि निवार्त में प्रकाश का वेग नियत है, गुणनपफल - εपरिमाण में निश्िचत है। εतथा - में से किसी भी एक00 00 मान का चयन करने पर अन्य का मान स्वतः निश्िचत हो जाता है। ैप् मात्राकों में - 0 का एक निश्िचत परिमाण 4π × 10दृ7 है। अगले अनुभाग में हम वृत्ताकार पाश के कारण चुंबकीय क्षेत्रा परिकलित करने के लिए बायो - सावटर् नियम का उपयोग करेंगे। 4ण्6 विद्युत धरावाही वृत्ताकार पाश के अक्ष पर चुंबकीय क्षेत्रा इस अनुभाग में हम विद्युत धरावाही वृत्ताकार पाश के कारण उसके अक्ष के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्रा का मूल्यांकन करेंगे। इस मूल्यांकन में पिछले अनुभाग में वण्िार्त अत्यल्प विद्युत धरा अवयवांे ;प् कसद्ध के प्रभाव को संयोजित किया जाएगा। हम यह मानते हैं कि प्रवाहित विद्युत धरा अपरिवतीर् है तथा मूल्यांकन मुक्त दिव्फस्थान ;निवार्तद्ध में किया गया है। चित्रा 4ण्11 में वृत्ताकार पाश में स्थायी विद्युत धरा प् प्रवाहित होते हुए दशार्इर् गइर् है। पाश को मूल ¯बदु पर ग ल तल में स्िथत दशार्या गया है तथा पाश का त्रिाज्या त् है। ग.अक्ष ही लूप का अक्ष है। हमें इसी अक्ष के ¯बदु च् पर चुंबकीय क्षेत्रा परिकलित करना है, मान लीजिए ¯बदु च् पाश के वेंफद्र से ग दूरी पर स्िथत है। पाश के चालक अवयव कप् पर विचार कीजिए, इसे चित्रा 4ण्11 में दशार्यी गइर् है। कस के कारण चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण बायो - सावटर् नियम ख्समीकरण 4ण्11;ंद्ध, के अनुसार - प् कस×त कठ त्र 0 ;4ण्12द्ध4π त 3 अब त 2 त्र ग 2 ़ त्2। साथ ही, पाश का कोइर् भी अवयव, इस अवयव चित्रा 4ण्11 त्रिाज्या त् विद्युत धरावाही वृत्ताकार पाश से अक्षीय ¯बदु के विस्थापन सदिश के लंबवत होगा। उदाहरण के लिए, के अक्ष पर चुंबकीय क्षेत्रा। इस चित्रा में रेखा अवयव चित्रा 4ण्11 में अवयव कस ल.्र दिशा में है जबकि विस्थापन सदिश त अवयव कस के कारण चुंबकीय क्षेत्रा कठ तथा अक्ष के लंबवत कस से अक्षीय ¯बदु च् तक ग.ल तल में है। अतः द्यकस ×तद्यत्रत कसए इस प्रकार कायर्रत इसके अवयवों को दशार्या गया है। - 0 प्कस कठ त्र 2 2 ;4ण्13द्ध4π ;ग ़ त् द्ध कठ की दिशा चित्रा 4ण्11 में दशार्यी गइर् है। यह कस तथा त द्वारा बने तल के लंबवत है। इसका एक ग.अवयव कठ ग तथा ग.अक्ष के लंबवत अवयव कठ ⊥ है। जब ग.अक्ष के लंबवत अवयवों को संयोजित करते हैं तो वे निरस्त हो जाते हैं तथा हमें शून्य परिणाम प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए, चित्रा 4ण्11 में दशार्ए अनुसार कस के कारण अवयव कठ ⊥ इसके त्रिाज्यतः विपरीत कस अवयव के कारण योगदान द्वारा निरसित हो जाता है। इस प्रकार केवल ग.अवयव ही बच पाता है। ग.दिशा के अनुदिश नेट योगदान पाश के ऊपर कठग त्र कठ बवे θ को समाकलित करके प्राप्त किया जा सकता है। चित्रा 4ण्11 के लिए त् बवे θत्र ग 2 2 1ध्2 द्ध ;4ण्14द्ध; ़त् समीकरणों ;4ण्13द्ध और ;4ण्14द्धए - 0प्कसत् कठ त्र ग 3ध्2 4π 2;ग 2 ़ त् द्ध 145 भौतिकी समस्त पाश पर कस अवयवों का संकलन, 2πत्ए प्राप्त होता है जो पाश की परिध्ि है। इस प्रकार - 0प्त् 2 ६६ठ त्र ठ प त्र प ग 2 2 3ध्2 ;4ण्15द्ध2;ग ़ त् द्ध उपरोक्त परिणाम वफी एक विशेष स्िथति के रूप में हम पाश के वेंफद्र पर चुंबकीय क्षेत्रा प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार यहाँ ग त्र 0ए तथा हमें प्राप्त होता है, - प् ठ0 त्र 0६प ;4ण्16द्ध2त् वृत्ताकार तार के कारण चुंबकीय क्षेत्रा रेखाएँ बंद वृत्ताकार पाश बनाती हंै जिन्हें चित्रा 4ण्12 में दशार्या गया है। चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा ;एक अन्यद्ध दक्ष्िाण हस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा होती है। यह नियम नीचे दिया गया है, वृत्ताकार तार के चारों ओर अपने दाएँ हाथ की हथेली को इस प्रकार मोडि़ए कि उँगलियाँ विद्युत धरा की दिशा की ओर संकेत करें, तब इस हाथ का पैफला हुआ अँगूठा चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा बताता है। चित्रा 4ण्12 किसी विद्युतवाही पाश का चुंबकीय क्षेत्रा। पाठ की विषय वस्तु में वण्िार्त दक्ष्िाण हस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा निधर्रित होती है। पाश के ऊपरी पाश्वर् को उत्तर ध््रुव तथा निचले पाश्वर् को दक्ष्िाण ध्ु्रव माना जा सकता है। हल ;ंद्ध सीध्े खंडों के प्रत्येक अवयव के लिए कस तथा त समांतर हैं। अतः कस×त त्र 0। इस प्रकार सीध्े खंड द्यठद्य को कोइर् योगदान नहीं देते। ;इद्ध अध्र्वृत्ताकार चाप के सभी खंडों के लिए, कस×त सभी एक दूसरे के समांतर हैं ;कागश के तल में भीतर को जाते हुएद्ध। इस प्रकार के सभी योगदान परिमाण में संयोजित हो जाते हैं। अतः अध्र्वृत्ताकार चाप के लिए ठ की दिशा दक्ष्िाण हस्त नियम द्वारा प्राप्त होती है। इसका परिमाण वृत्ताकार पाश के लिए ठ का आध होता है। इस प्रकार ठ का मान 1ण्9 × 10दृ4 ज् है तथा दिशा कागश के तल के अभ्िालंबवत उसके भीतर जाते हुए है। ;बद्ध ठ का परिमाण तो वही है जो ;इद्ध में है पर दिशा विपरीत है। उदाहरण 4ण्7 10 बउ त्रिाज्या की 100 कसकर लपेटे गए पेफरों की किसी ऐसी वुंफडली पर विचार कीजिए जिससे 1 । विद्युत धरा प्रवाहित हो रही है। वुंफडली के वेंफद्र पर चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण क्या है? हल चूँकि वुंफडली कसकर लपेटी गइर् है अतः हम प्रत्येक वृत्ताकार अवयव की त्रिाज्या त् त्र 10 बउ त्र 0ण्1 उ मान सकते हैं। पेफरों की संख्या छ त्र 100 है, अतः चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण - छप् 4π× 10 दृ7 × 10 2 × 1 −4ठ त्र 0 त्र दृ1 त्र 2π×10 −4 ज् त्र 6 28 ×10 ज्ण् ण् 2त् 2 × 10 4ण्7 ऐम्िपयर का परिपथीय नियम बायो - सावटर् नियम को अभ्िाव्यक्त करने का एक अन्य वैकल्िपक तथा रुचिकर उपाय भी है। ऐम्िपयर के परिपथीय नियम में किसी खुले पृष्ठ जिसकी कोइर् सीमा हो, पर विचार किया जाता है। इस पृष्ठ से विद्युत धरा प्रवाहित होती है। हम यह विचार करते हैं कि सीमा रेखा बहुत से अल्प रेखा अवयवों से मिलकर बनी है। ऐसे ही एक रेखा अवयव कस पर विचार कीजिए। हम इस अवयव पर चुंबकीय क्षेत्रा के स्पशर्रेखीय घटक ठ ज का मान लेंगे तथा इसे अवयव कस की लंबाइर् से गुणा करेंगे। ख्ध्यान दीजिए ठ ज कसत्रठण्कस,। इस प्रकार के सभी गुणनपफल एक दूसरे के साथ संयोजित किए जाते हैं। हम सीमा पर विचार करते हैं क्योंकि जैसे - जैसे अवयवों की लंबाइर् घटती है इनकी संख्या बढ़ती है। तब इनका योग एक समाकलन बन जाता है। ऐम्िपयर का नियम यह कहता है कि यह समाकलन पृष्ठ से प्रवाहित होने वाली वुफल विद्युत धरा का - 0 गुना होता है, अथार्त ठक्क् कसत्र - 0प् ख्4ण्17;ंद्ध, यहाँ प् पृष्ठ से गुशरने वाली वुफल विद्युत धरा है। इस समाकलन को पृष्ठ की सीमारेखा ब् के संपाती बंद के ऊपर लिया गया है। उपरोक्त संबंध् में दिशा सम्िमलित है जो दक्ष्िाण हस्त नियम से प्राप्त होती है। अपने दाएँ हाथ की उँगलियों को उस दिशा में मोडि़ए जिस दिशा में पाश समाकल श्ठण्कस में सीमा रेखा मुड़ी है। तब अँगूठे की दिशा उस दिशा को बताती है जिसमें विद्युत धरा को धनात्मक माना गया है। बहुत से अनुप्रयोगों के लिए समीकरण ख्4ण्17 ;ंद्ध, का कहीं अध्िक सरलीकृत रूप पयार्प्त सि( होता है। हम यह मानेंगे कि, इस प्रकार के प्रकरणों में ऐसे पाश ;जिसे ऐम्िपयरीय पाश कहते हैं।द्ध का चयन संभव है जो इस प्रकार का है कि पाश के प्रत्येक ¯बदु पर या तो चित्रा 4ण्14 भौतिकी ;पद्ध ठ पाश के स्पशर्रेखीय है तथा शून्येतर नियतांक ठ है, अथवा ;पपद्ध ठ पाश के अभ्िालंबवत है, अथवा ;पपपद्ध ठ नष्ट हो जाता है। अब मान लीजिए स् पाश की वह लंबाइर् ;भागद्ध है जिसके लिए ठ स्पशर्रेखीय है। मान लीजिए पाश में परिव( विद्युत धरा प्म है। तब समीकरण ;4ण्17द्ध को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं ठस् त्र - 0प्म ख्4ण्17;इद्ध, जब किसी निकाय में इस प्रकार की सममिति हो जैसे कि चित्रा 4ण्15 में सीध्े विद्युत धरावाही अनंत तार के लिए है, तब ऐम्िपयर का नियम हमें चुंबकीय क्षेत्रा का एक सरल मूल्यांकन करने योग्य बनाता है जो ठीक उसी प्रकार है जैसे कि गाउस नियम विद्युत क्षेत्रा को निधर्रित करने में हमारी सहायता करता है। इसे नीचे दिए गए उदाहरण 4ण्9 में दशार्या गया है। पाश की सीमा रेखा का चयन एक वृत्त है तथा चुंबकीय क्षेत्रा वृत्त की परिध्ि के स्पशर्रेखीय है। समीकरण ख्4ण्17 ;इद्ध, के वाम पक्ष के लिए इस नियम से प्राप्त मान ठण् 2πत है। हम यह पाते हैं कि तार के बाहर त दूरी पर चुंबकीय क्षेत्रा स्पशर्रेखीय है तथा इसे इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है। ठ × 2πत त्र - 0 प्ए ठ त्र - 0 प्ध् ;2πतद्ध ;4ण्18द्ध उपरोक्त परिणाम अनंत लंबाइर् के तार के लिए है जो कइर् दृष्िटकोणों से रोचक है - ;पद्ध इसमें यह अंत£नहित है कि त त्रिाज्या के वृत्त के प्रत्येक ¯बदु पर ;तार को अक्ष के अनुदिश रखते हुएद्ध क्षेत्रा का परिमाण समान है। दूसरे शब्दों में चुंबकीय क्षेत्रा में बेलनाकार सममिति है जो क्षेत्रा सामान्यतः तीन निदेर्शांकों पर निभर्र कर सकता है केवल एक ही निदेर्शांक त पर निभर्र है। जहाँ कहीं भी सममिति होती है समस्याओं के हल सरल हो जाते हैं। ;पपद्ध इस वृत्त के किसी भी ¯बदु पर क्षेत्रा की दिशा इसके स्पशर्रेखीय है। इस प्रकार चुंबकीय क्षेत्रा की नियत परिमाण की रेखाएँ संवेंफद्री वृत्त बनाती हैं। अब चित्रा 4ण्1;बद्ध पर ध्यान दीजिए, लौह चूणर् वृत्त संवेंफद्री में व्यवस्िथत हुआ है। ये रेखाएँ जिन्हें हम चुंबकीय क्षेत्रा रेखाएँ कहते है, बंद पाश बनाती हैं। यह स्िथरवैद्युत क्षेत्रा रेखाओं से भ्िान्न हैं। स्िथरवैद्युत क्षेत्रा रेखाएँ धन आवेशों से आरंभ तथा ट्टण आवेशों पर समाप्त होती हैं। सीध्े विद्युत धरावाही चालक के चुंबकीय क्षेत्रा के लिए व्यंजक ओस्टेर्ड प्रयोग का सै(ांतिक स्पष्टीकरण करता है। ;पपपद्ध एक अन्य ध्यान देने योग्य रोचक बात यह है कि यद्यपि तार अनंत लंबाइर् का है, तथापि शून्येतर दूरी पर इसके कारण चुंबकीय क्षेत्रा अनंत नहीं है। यह केवल तार के अत्यध्िक पास आने पर विस्पुफटित होता है। यह क्षेत्रा विद्युत धरा के अनुक्रमानुपाती है तथा विद्युत धरा स्रोत ;अनंत लंबाइर् केद्ध से दूरी के व्युत्क्रमानुपाती है। गतिमान आवेश और चुंबकत्व ;पअद्ध लंबे तार के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा को निधर्रित करने का एक सरल नियम है। इस नियम को दक्ष्िाण हस्त नियम’ कहते हैं। यह इस प्रकार है तार को अपने दाएँ हाथ में इस प्रकार पकडि़ए कि आपका तना हुआ अँगूठा विद्युत धरा की दिशा की ओर संकेत करे। तब आपकी अँगुलियों के मुड़ने की दिशा चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा में होगी। ऐम्िपयर का परिपथीय नियम बायो - सावटर् नियम से भ्िान्न नहीं है। दोनों ही नियम विद्युत ध् ारा तथा चुंबकीय क्षेत्रा में संबंध् व्यक्त करते हैं तथा दोनों ही स्थायी विद्युत धरा के समान भौतिक परिणामों को व्यक्त करते हैं। जो संबंध् ऐम्िपयर के नियम तथा बायो - सावटर् नियम के बीच है ठीक वही संबंध् गाउस नियम तथा वूफलाॅम नियम के बीच में है। ऐम्िपयर का नियम तथा गाउस का नियम दोनों ही परिरेखा अथवा परिपृष्ठ पर किसी भौतिक राश्िा ;चुंबकीय अथवा विद्युत क्षेत्राद्ध का संबंध् किसी अन्य भौतिक राश्िा जैसे अन्तः क्षेत्रा में उपस्िथत स्रोत ;विद्युत धरा अथवा आवेशद्ध के बीच संबंध् व्यक्त करते हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि ऐम्िपयर का परिपथीय नियम केवल उन स्थायी विद्युत धराओं पर लागू होता है जो समय के साथ परिवतिर्त नहीं होतीं। निम्नलिख्िात उदाहरण हमें परिब( विद्युत धरा का अथर् समझने में सहायता करेगा। उदाहरण 4ण्8 चित्रा 4ण्15 में एक लंबा सीध वृत्ताकार अनुप्रस्थ काट का ;जिसकी त्रिाज्या ं हैद्ध विद्युत धरावाही तार जिससे स्थायी विद्युत धरा प् प्रवाहित हो रही हो, दशार्या गया है। स्थायी विद्युत धारा इस अनुप्रस्थ काट पर एकसमान रूप से वितरित है। क्षेत्रों त ढ ं तथा त झ ं में चुंबकीय क्षेत्रा परिकलित कीजिए चित्रा 4ण्15 हल ;ंद्ध प्रकरण त झ ं पर विचार कीजिए। जिस पाश पर 2 अंकित है वह अनुप्रस्थ काट के साथ संवेंफद्री वृत्त के रूप में ऐम्िपयर पाश है। इस पाश के लिए स् त्र 2 π त प्म त्र पाश द्वारा परिब( विद्युत धरा त्र प् यह परिणाम किसी सीध्े लंबे तार के लिए सुपरिचित व्यंजक है। ठ ;2π तद्ध त्र - 0प् - 0प् ठ त्र ख्4ण्19;ंद्ध,2 π त 1 ठ ∝ ;त झ ंद्धत ;इद्ध प्रकरण त ढ ं पर विचार कीजिए। इसके लिए ऐम्िपयर पाश वह वृत्त है जिस पर 1 अंकित है। ’ कृपया ध्यान दीजिए - दो सुस्पष्ट ;पृथकद्ध नियम हंै जिन्हें दक्ष्िाण हस्त नियम कहते हैं। इनमें से एक नियम विद्युत धरा पाश के अक्ष पर चुंबकीय क्षेत्रा ठ की दिशा देता है तथा दूसरा सीध्े विद्युत धरावाही चालक तार के लिए ठ की दिशा है। इन नियमों में अँगूठे तथा अँगुलियों की भ्िान्न भूमिका है। उदाहरण 4ण्8 भौतिकी यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जबकि ऐम्िपयर के परिपथीय नियम को किसी भी पाश पर लागू किया जा सकता है परंतु यह हर प्रकरण में चुंबकीय क्षेत्रा का मूल्यांकन सदैव ही आसान नहीं बनाता। उदाहरण के लिए, अनुभाग 4ण्6 में वणर्न किए गए वृत्ताकार पाश के प्रकरण में, इसे सरल व्यंजक ठ त्र - 0प्ध्2त् ख्समीकरण ;4ण्16द्ध, को, जोकि पाश के वेंफद्र पर चुंबकीय क्षेत्रा के लिए है, प्राप्त करने के लिए लागू नहीं किया जा सकता। तथापि ऐसी बहुत सी परिस्िथतियाँ हैं जिनमें उच्च सममिति होती है तथा इस नियम को सुविधपूवर्क लागू किया जा सकता है। अगले अनुभाग में हम इसका उपयोग दो सामान्यतः उपयोग होने वाले अत्यंत उपयोगी चुंबकीय निकायों - परिनालिका एवं टोराॅइड द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्रों को परिकलित करने में करेंगे। 4ण्8 परिनालिका तथा टोराॅइड परिनालिका तथा टोराॅइड ऐसे दो उपकरण हैं जो चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करते हैं। टेलीविशन में आवश्यक चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करने के लिए परिनालिका का उपयोग होता है। ¯सक्रोट्राॅन में आवश्यक चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करने के लिए इन दोनों का संयुक्त रूप से उपयोग किया जाता है। परिनालिका तथा टोराॅइड दोनों मेें ही हमें उच्च सममिति की ऐसी स्िथति देखने को मिलती है जिनमें ऐम्िपयर - नियम आसानी से लागू किया जा सकता है। 4ण्8ण्1 परिनालिका हम यहाँ एक लंबी परिनालिका के विषय में चचार् करेंगे। लंबी परिनालिका से हमारा तात्पयर् यह है कि परिनालिका की लंबाइर् उसकी त्रिाज्या की तुलना में अध्िक है। परिनालिका में एक लंबा तार स£पल के आकार में लिपटा होता है जिसमें प्रत्येक पेफरा अपने निकट के पेफरे के साथ काप़फी सटा होता है। इस प्रकार पेफरे को एक वृत्ताकार पाश माना जा सकता है। किसी परिनालिका के सभी पेफरों के कारण उत्पन्न वुफल चुंबकीय क्षेत्रा प्रत्येक पेफरे के चंुबकीय क्षेत्रों का सदिश योग होता है। परिनालिका पर लपेटने के लिए इनैमलित तारों का उपयोग किया जाता है ताकि पेफरे एक दूसरे से चित्रा 4ण्17 ;ंद्ध परिनालिका के किसी भाग जिसे स्पष्टता की दृष्िट से बाहर खींचा दशार्या गया है, के कारण चुंबकीय क्षेत्रा। केवल बाह्य अध्र्वृत्ताकार भाग दशार्या गया है। ध्यान से देख्िाए, किस प्रकार पास - पास स्िथत पेफरों के बीच चुंबकीय क्षेत्रा एक दूसरे को निरसित कर देते हैं। ;इद्ध किसी परिमित परिनालिका का चुंबकीय क्षेत्रा। चित्रा 4ण्17 में किसी परिमित परिनालिका का चुंबकीय क्षेत्रा दशार्या गया है। चित्रा 4ण्17 ;ंद्ध में हमने इस परिनालिका के एक खंड को विस्तारित करके दिखाया है। चित्रा 4ण्17 ;इद्ध में वृत्ताकार पाश से यह स्पष्ट है कि दो पास - पास के पेफरों के बीच चुंबकीय क्षेत्रा नष्ट हो जाता है। चित्रा 4ण्17 ;इद्ध में हम यह देखते हैं कि अन्तःभाग के मध्य ¯बदु च् पर चुंबकीय क्षेत्रा एकसमान, प्रबल तथा परिनालिका के अक्ष के अनुदिश है। बाह्य भाग के मध्य ¯बदु फ पर चंुबकीय क्षेत्रा दुबर्ल है और साथ ही यह परिनालिका के अक्ष के अनुदिश है तथा इसका लंबवत अथवा अभ्िालंबवत कोइर् घटक भी नहीं है। जैसे - जैसे परिनालिका की लंबाइर् में वृि होती है वह लंबी बेलनाकार धतु के पटल जैसी दिखाइर् देने लगती है। चित्रा 4ण्18 में यह आदशीर्वृफत चित्राण निरूपित किया गया है। परिनालिका के बाहर चुंबकीय क्षेत्रा शून्य होने लगता है। परिनालिका के भीतर हर ¯बदु पर चुंबकीय क्षेत्रा अक्ष के समांतर होता है। भौतिकी किसी आयताकार ऐम्िपयर - पाश ंइबक पर विचार करिए। जैसा कि उफपर तवर्फ दिया जा चुका है बक के अनुदिश क्षेत्रा शून्य है। अनुप्रस्थ खंडोंइब तथा ंक के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्रा का घटक शून्य है। इस प्रकार ये दोनों खंड चुंबकीय क्षेत्रा में कोइर् योगदान नहीं देते। मान लीजिए ंइ के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्रा ठ है, इस प्रकार, ऐम्िपयर - पाश की प्रासंगिक लंबाइर् स् त्र ी । मान लीजिए प्रति एकांक लंबाइर् पेफरों की संख्या द है, तब पेफरों की वुफल संख्या दी है। इस प्रकार परिब( विद्युत धरा है प्म त्र प् ;द ीद्धए यहाँ प् परिनालिका में प्रवाहित विद्युत धरा है। ऐम्िपयर के परिपथीय नियम के अनुसार ¹समीकरण 4ण्17 ;इद्ध सेह् ठस् त्र - 0प्मए ठ ी त्र - 0प् ;द ीद्ध ठ त्र - 0 द प् ;4ण्20द्ध क्षेत्रा की दिशा दक्ष्िाण हस्त नियम से प्राप्त होती है। परिनालिका का सामान्यतः उपयोग एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अगले अध्याय में हम यह देखेंगे कि परिनालिका में भीतर नमर् लौह क्रोड रखकर विशाल चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करना संभव है। 4ण्8ण्2 टोराॅइड यह एक वृत्ताकार खोखला छल्ला होता है जिस पर किसी तार के अत्यध्िक पेफरे पास - पास सटाकर लपेटे जाते हैं। इसे एक ऐसी परिनालिका के रूप में भी देखा जा सकता है जिसे बंद करने के लिए वृत्ताकार मोड़ दिया गया है। इसे चित्रा 4ण्19 ;ंद्ध में दशार्या गया है। इससे प् विद्युत धरा प्रवाहित हो रही है। हम यह देखेंगे कि टोराॅइड के भीतर खुले दिक्स्थान में ;¯बदु च्द्ध तथा टोराॅइड के बाहर ;¯बदु फद्ध पर चुंबकीय क्षेत्रा शून्य है। किसी आदशर् टोराॅइड जिसके पेफरे सटाकर लिपटे होते हैं, के लिए टोराॅइड के भीतर चुंबकीय क्षेत्रा ठ नियत रहता है। चित्रा 4ण्19 ;इद्ध में टोराॅइड की अनुप्रस्थ काट दशार्यी गइर् है। वृत्ताकार - पाशों के लिए दक्ष्िाण हस्त नियम के अनुसार टोराॅइड के भीतर चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा चाहिए तथा प्रत्येक पाश के लिए इसका परिमाण नियत होना चाहिए। पाश 2 तथा 3 इन दोनों द्वारा घेरे गए वृत्ताकार क्षेत्रा टोराॅइड को काटते हैंऋ इस प्रकार विद्युत धारावाही तार को प्रत्येक पेफरा पाश 2 को एक तथा पाश 3 को दो बार काटता है। मान लीजिए पाश 1 के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण ठ1 है। तब ऐम्िपयर के परिपथीय नियम में ¹समीकरण 4ण्17 ;ंद्धह् स् त्र 2π त1 तथापि, यह पाश कोइर् विद्युत धरा परिब( नहीं करता, अतः प्म त्र 0। इस प्रकार ठ1 ;2 π त1द्ध त्र - 0;0द्धए ठ1 त्र 0 इस प्रकार टोराॅइड के भीतर खुले क्षेत्रा में किसी भी ¯बदु च् पर चंुबकीय क्षेत्रा शून्य होता है। अब हम यह दशार्एँगे कि इसी प्रकार फ पर भी चुंबकीय क्षेत्रा शून्य है। मान लीजिए पाश 3 के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्रा ठ3 है। एक बार पिफर ऐम्िपयर के नियमचित्रा 4ण्19 ;ंद्ध टोराॅइड से विद्युत धरा प् के अनुसार स् त्र 2 π त3, तथापि अनुप्रस्थ काट से हम यह देखते हैं कि कागशप्रवाहित होते हुए ;इद्ध टोराॅइड की अनुप्रस्थ काट के तल से बाहर निकलती विद्युत धरा कागश के तल के भीतर जाती विद्युतका दृश्य। ऐम्िपयर - परिपथीय नियम द्वारा टोराॅइड धारा से ठीक - ठीक निरसित हो जाती है। अतः प् मत्र 0ए तथा ठ3 त्र 0 । मान लीजिएके वेंफद्र व् से किसी यादृच्िछक दूरी त पर चुंबकीय टोराॅइड के भीतर चुंबकीय क्षेत्रा ठ है। अब हम ै पर चुंबकीय क्षेत्रा के बारे मेंक्षेत्रा प्राप्त किया जा सकता है। 1ए 2ए 3 विचार करेंगे। एक बार पिफर हम ऐम्िपयर के नियम का उपयोग ¹समीकरणद्वारा अंकित खंडित रेखाएँ इनके वृत्ताकार ख्4ण्17 ;ंद्धह् के रूप में करते हैं। हम पाते हैं कि स् त्र 2π त ऐम्िपयर - पाश हैं। परिब( विद्युत धरा प् का मान ;टोराॅइडी वुंफडली के छ पेफरों के लिएद्ध 152 छ प् है। म दक्ष्िाणावतर् है। खंडित रेखाएँ जिन पर 1ए 2ए 3 अंकित हैं, इसके तीन ऐम्िपयर - पाश हैं। सममिति के अनुसार चुंबकीय क्षेत्रा इन पाशों में प्रत्येक के स्पशर्रेखीय होना गतिमान आवेश और चुंबकत्व ठ ;2πतद्ध त्र - 0छप् - 0छप् ठ त्र ;4ण्21द्ध2πत हम अब टोराॅइड तथा परिनालिका के लिए प्राप्त इन दो परिणामों की तुलना करेंगे। हम समीकरण ;4ण्21द्ध के व्यंजक की परिनालिका के लिए समीकरण ;4ण्20द्ध में दिए गए व्यंजक से तुलना करने के लिए समीकरण ;4ण्21द्ध को दुबारा नए रूप में व्यक्त करेंगे। मान लीजिए टोराॅइड की औसत त्रिाज्यातहै तथा इसमें प्रति एकांक लंबाइर् पेफरों की संख्या द है, तब छ त्र 2πत द त्र टोराॅइड की ;औसतद्ध परिध्ि× प्रति एकांक लंबाइर् पेफरों की संख्या तथा, इस प्रकार ठ त्र - 0द प्ए ;4ण्22द्ध अथार्त, यही परिणाम हमें परिनालिका के लिए प्राप्त हुआ था। आदशर् टोराॅइड में वुंफडलियाँ पूणर्तः वृत्ताकार होती हैं। वास्तव में टोराॅइड के पेफरे स£पलाकार वुंफडली बनाते हैं तथा इसके बाहर सदैव ही एक क्षीण चुंबकीय क्षेत्रा पाया जाता है। चुंबकीय परिरोध्न हमने अनुभाग 4.3 में यह देखा है ;इस अध्याय के आरंभ में बाॅक्स आवेश्िात कणों की स£पलाकार गति देखेंद्ध कि आवेश्िात कणों की कक्षाएँ स£पलाकार होती हैं। यदि चुंबकीय क्षेत्रा असमान है, परंतु एक वतुर्ल कक्षा में जिसका अध्िक परिवतर्न नहीं होता है तब स£पल की त्रिाज्या प्रबल चुंबकीय क्षेत्रा में प्रवेश करने पर घटेगी तथा दुबर्ल क्षेत्रा में प्रवेश करने पर बढ़ेगी। हम दो परिनालिकाओं पर विचार करते हैं जो एक दूसरे से वुफछ दूरी पर हैं तथा निवार्तित पात्रा में परिब( हैं। ;नीचे दिए गए चित्रा को देखें जिसमें हमने पात्रा को नहीं दशार्या हैद्ध। परिनालिकाओं के मध्य क्षेत्रा में गति करने वाले आवेश्िात कण अपनी अपनी गति छोटी त्रिाज्या से आरंभ करेंगे। जैसे क्षेत्रा कम होगा, त्रिाज्या में वृि होगी तथा त्रिाज्या में पिफर कमी होगी जब परिनालिका 2 के कारण चुंबकीय क्षेत्रा में वृि होगी। परिनालिकाएँ दपर्ण अथवा परावतर्क की भाँति कायर् करती हैं ¹जैसे ही कण परिनालिका 2 की तरप़फ पहुँचता है चित्रा में बल थ्की दिशा देखें। इसका क्षैतिज घटक अग्रदिश गति के विरु( है।ह् जिसके कारण कण दूसरी परिनालिका 2 के पास पहुँचते ही वापस भेज दिया जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था एक चुंबकीय बोतल अथवा चुंबकीय पात्रा की भाँति कायर् करेगी। कण पात्रा के दोनों तरप़फ की सीमाओं को कभी स्पशर् नहीं करेगा। ऐसी चुंबकीय बोतल संलयन प्रयोगों में उच्च ऊजार् ‘प्लाज्मा’ को परिरोध्ित करने में बहुत उपयोगी है। अपने उच्च ताप के कारण ‘प्लाज्मा’ किसी भी पदाथर् की अन्य अवस्था को नष्ट कर देगा। एक अन्य उपयोगी संयोजन टोराॅइड है। टोकामैक में टोराॅइड की प्रमुख भूमिका निभाने की आशा की जाती है। टोकामैक संलयन शक्ित रिएक्टरों में प्लाश्मा परिरोधन के लिए उपयोगी उपकरण है। यहाँ एक अंतरार्ष्ट्रीय सहयोग अंतरार्ष्ट्रीय ताप - नाभ्िाकीय प्रयोगात्मक रिएक्टर ;प्ज्म्त्द्ध नियंत्रिात संलयन प्राप्त करने के लिए प्रफांस में स्थापित हो रहा है जिसका भारत एक सहयोगी राष्ट्र है। प्ज्म्त् से सहयोग एवं परियोजना संबंधी विस्तृत जानकारी के लिए देखें ीजजचरूध्ध्ूूूण्पजमतण्वतहण् भौतिकीउदाहरण 4ण्9 उदाहरण 4ण्9कोइर् परिनालिका जिसकी लंबाइर् 0ण्5 उ तथा त्रिाज्या 1 बउ है, में 500 पेफरे हैं। इसमें 5 । विद्युत धरा प्रवाहित हो रही है। परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण क्या है? हल प्रति एकांक लंबाइर् पेफरों की संख्या 500 द त्रत्र1000 पेफरे प्रति मीटर0ण्5 लंबाइर्स त्र 0ण्5 उ तथा त्रिाज्यात त्र 0ण्01 उ। इस प्रकार,सध्ं त्र 50 अथार्तसझझं अतः हम लंबी परिनालिका का सूत्रा ¹समीकरण ;4ण्20द्धह् का उपयोग कर सकते हैं ठ त्र - 0द प्त्र 4π × 10दृ7 × 103 × 5त्र 6ण्28 × 10दृ3 ज् 4ण्9 दो समांतर विद्युत धराओं के बीच बल - ऐम्िपयर हम यह सीख चुके हैं कि किसी विद्युत धरावाही चालक के कारण चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न होता है तो बायो - सावटर् नियम का पालन करता है। साथ ही हमने यह भी सीखा है कि विद्युत धरावाही चालक पर बाह्य चंुबकीय क्षेत्रा बल आरोपित करता है। यह लोरेंज बल सूत्रा का अनुगमन करता है। अतः यह आशा करना तवर्फसंगत है कि एक - दूसरे के पास स्िथत दो विद्युत धरावाही चालक एक दूसरे पर ;चुंबकीयद्ध बल आरोपित करेंगे। सन् 182025 की अवध्ि में ऐम्िपयर ने इस चुंबकीय बल की प्रवृफति, इसकी विद्युत धारा के परिमाण, चालक की आवृफति तथा आमाप पर निभर्रता के साथ इन चालकों के बीच की दूरी पर निभर्रता का अध्ययन किया। इस अनुभाग में हम दो समांतर विद्युत धरावाही चालकों के सरल उदाहरण पर ही चचार् करेंगे जो कदाचित ऐम्िपयर के श्रम साध्य कायो± के प्रति आभार प्रकट करने में हमारी सहायता करेंगे। चित्रा 4ण्20 में दो लंबे समांतर चालक ं तथा इ दशार्ए गए हैं जिनके बीच पृथकनकहै तथा जिनसे ;समांतरद्ध क्रमशःप् ंतथाप्इविद्युत धराएँ प्रवाहित हो रही हैं। चालक ष्ंष् चालक ष्इष् के अनुदिश प्रत्येक ¯बदु पर समान चुंबकीय चित्रा 4.20 दो लंबे सीधे, समांतर चालक जिनमें क्षेत्राठ ंलगा रहा है। तब दक्ष्िाण हस्त नियम के अनुसार इस चुंबकीय क्षेत्रा की अपरिवतीर् धारा पंएवं पइप्रवाहित हो रही है और दिशा अधेमुखी ;जब चालक क्षैतिजतः रखे होते हैंद्ध है। ऐम्िपयर के परिपथीयजो एक - दूसरे से कदूरी पर रखे हैं। चालक ष्ंष्के नियम अथवा ¹समीकरण ख्4ण्19 ;ंद्धह् के अनुसार इस चुंबकीय क्षेत्रा काकारण चालक ष्इष्पर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्रा ठ ंहै। परिमाण - प् ठ त्र 0 ं ं 2 π क चालक ष्इष् जिससे विद्युत धराप्इप्रवाहित हो रही है ठ ं के कारण पाश्वर्तः एक बल का अनुमान करता है। इस बल की दिशा चालक ष्ंष् की ओर होती है। ;आप इसकी पुष्िट स्वयं कर सकते हैंद्ध हम इस बल कोथ्इं द्वारा नामांकित करते हैं, जोकिष्ंष् के कारण ष्इष् के खंड स् पर लगा बल है। समीकरण ;4ण्4द्ध से इस बल का परिमाण 154 थ् त्र प्स् ठइंइं प्इ- 0 प्ं त्र स् ;4ण्23द्ध2 π क वास्तव में ष्इष् के कारण ष्ंष् पर बल को परिकलित करना संभव है। जिस प्रकार हमने ऊपर विचार किया था उसी प्रकार के विचारों के द्वारा हम ष्इष् में प्रवाहित विद्युत धरा के कारण ष्ंष् के खंड स् पर बल थ्के बराबर तथा ष्इष् की ओर नि£दष्ट ज्ञात कर सकते हैं। यह परिमाण में थ्ंइ इं के बराबर तथा ष्इष् की ओर नि£दष्ट होता है। इस प्रकार थ्इं त्र दृथ्ंइ ;4ण्24द्ध ध्यान दीजिए, यह न्यूटन के तीसरे गति के नियम के अनुरूप है। इस प्रकार हमने समांतर चालकों तथा अपरिवतीर् विद्युत धराओं के लिए यह तो दशार् ही दिया है कि बायो - सावटर् नियम तथा लोरेंज बल द्वारा प्राप्त परिणाम न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुरूप है।’ हमने ऊपर प्राप्त परिणामों से यह पाया कि समान दिशा में प्रवाहित होने वाली विद्युत धराएँ एक दूसरे को आक£षत करती हैं। हम यह भी दशार् सकते हैं कि विपरीत दिशाओं में प्रवाहित होने वाली विद्युत धराएँ एक दूसरे को प्रतिक£षत करती हैं। इस प्रकार समांतर धराएँ आक£षत तथा प्रतिसमांतर धराएँ प्रतिक£षत करती हैं। यह नियम उस नियम के विपरीत है जिसका हमने स्िथरवैद्युतिकी में अध्ययन किया था - फ्सजातीय आवेशों में प्रतिकषर्ण तथा विजातीय आवेशों में आकषर्ण होता है।य् परंतु सजातीय ;समांतरद्ध धराएँ एक दूसरे को आक£षत करती हैं। मान लीजिए बिल थ्के प्रति एकांक लंबाइर् पर आरोपित बल के परिमाण को निरूपितइं इं करता है। तब समीकरण ;4ण्23द्ध से, - प्प् 0 ंइइिं त्र ;4ण्25द्ध2 π क उपरोक्त व्यंजक का उपयोग विद्युत धरा के मात्राक ऐम्िपयर ;।द्ध की परिभाषा को प्राप्त करने में किया जा सकता है। यह सात ैप् मूल मात्राकों में से एक है। एक ऐम्िपयर वह अपरिवतीर् विद्युत धरा है जो दो लंबे, सीध्े उपेक्षणीय अनुप्रस्थ काट के निवार्त में एक दूसरे से 1उ दूरी पर स्िथत समांतर चालकों में प्रवाहित हो, तो इनमें से प्रत्येक चालक की प्रति मीटर लंबाइर् पर 2 × 10दृ7छ का बल उत्पन्न होता है। ‘ऐम्िपयर’ की यह परिभाषा सन् 1946 में अपनायी गइर् थी। यह एक सै(ांतिक परिभाषा है। व्यवहार में हमें पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रा के प्रभाव को विलुप्त करना चाहिए तथा बहुत लंबे तारों के स्थान पर उचित ज्यामिति की बहुपेफरों की वुंफडलियाँ लेनी चाहिए। एक उपकरण, जिसे ‘धारा तुला’ कहते हैं, का उपयोग इस यांत्रिाक बल की माप के लिए किया जाता है। आवेश के ैप् मात्राक, अथार्त वूफलाॅम को अब हम ऐम्िपयर के पदों में परिभाष्िात कर सकते हैं। जब किसी चालक में 1। की अपरिवतीर् विद्युत धरा प्रवाहित होती है तो उसकी अनुप्रस्थ काट से एक सेवंफड में प्रवाहित आवेश की मात्रा एक वूफलाॅम ;1ब्द्ध होती है। ’ इससे यह अथर् निकलता है कि जब हमारे पास समय निभर्र विद्युत धराएँ/अथवा गतिशील आवेश होती हैं तब आवेशों/चालकों के बीच बलों के लिए न्यूटन का तीसरा नियम लागू नहीं होता। न्यूटन के तीसरे नियम का आवश्यक परिणाम यांत्रिाकी में किसी वियुक्त निकाय के संवेग का संरक्षण है। तथापि यह विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों के साथ समय निभर्र स्िथतियों के प्रकरण पर लागू होती है, परंतु इस शतर् के साथ कि क्षेत्रों द्वारा वहन संवेग को भी सम्िमलित किया जाए। भौतिकी समांतर विद्युत धराओं के बीच आकषर्ण के लिए रागेट का स£पल चुंबकीय प्रभाव सामान्यतः विद्युत प्रभावों से कम प्रभावी होते हैं। इसके परिणामस्वरूप विद्युत धराओं के बीच बल, कारक - के अल्पमान के कारण, अल्प परिमाण के होते हैं। इसीलिए विद्युत धराओं के बीच आकषर्ण अथवा प्रतिकषर्ण के बलों को निद£शत करना कठिन है। इस प्रकार प्रत्येक तार से 5 । विद्युत धरा तथा 1 बउ पृथकन के लिए प्रति मीटर बल5 × 10दृ4 छ होता है जो कि लगभग 50 उह भार होता है। यह इस प्रकार होगा जैसे कि किसी घ्िारनी से डोरी द्वारा लटका 50 उह भार उस डोरी से बँध्े तार को खींच रहा हो। इस भार के कारण तार में हुआ विस्थापन लगभग अदृश्य होगा। कोमल कमानी का उपयोग करके हम समांतर विद्युत धराओं की प्रभावी लंबाइर् में वृि कर सकते हैं तथा पारे ;मरकरीद्ध का उपयोग करके हम वुफछ मिलीमीटर के विस्थापनों को भी प्रभावशाली ढंग से प्रेक्षणीय बना सकते हैं। आपको ऐसी विद्युत धरा आपू£त की आवश्यकता भी होगी जो लगभग 5 । की अचर विद्युत धरा प्रदान करे। एक ऐसी कोमल कमानी लीजिए जिसका प्रावृफतिक दोलन काल लगभग 0ण्5 दृ 1 े हो। इसे ऊध्वार्ध्र लटकाकर इसके निचले सिरे पर चित्रा में दशार्ए अनुसार एक नोंक जोडि़ए। प्याली में थोड़ी मरकरी लीजिए तथा कमानी को इस प्रकार समायोजित कीजिए कि इसकी नोक मरकरी के पृष्ठ के ठीक ऊपर हो। दिष्ट विद्युत धरा ;क्ब् स्रोतद्ध स्रोत लेकर इसके एक ट£मनल को कमानी के ऊपरी सिरे से संयोजित कीजिए तथा दूसरे ट£मनल को मरकरी में डुबोइए। यदि कमानी की नोंक मरकरी को स्पशर् करती है तो मरकरी से होते हुए विद्युत परिपथ पूरा हो जाता है। मान लीजिए प्रारंभ में क्ब् स्रोत ‘आॅपफ’ है। मान लीजिए कमानी की नोंक इस प्रकार समायोजित है कि वह मरकरी के पृष्ठ को स्पशर् कर रही है। अब अचर विद्युत धरा स्रोत को ‘आॅन’ कीजिए तथा मंत्रा - मुग्ध् करने वाला परिणाम देख्िाए। कमानी एक झटके के साथ सिवुफड़ती है, नोंक मरकरी से बाहर आ जाती है ;लगभग 1उउद्ध, परिपथ टूट जाता है, विद्युत धरा प्रवाहित होना रुक जाता है, कमानी श्िाथ्िाल हो जाती है तथा अपनी मूल स्िथति में आने का प्रयास करती है, कमानी की नोंक पुनः मरकरी के पृष्ठ को छूती है तथा परिपथ में विद्युत धरा प्रवाहित होने लगती है और यह चक्र टिक, टिक, टिक के साथ चलता रहता है। आरंभ में आपको अच्छा प्रभाव पाने के लिए वुफछ समायोजन की आवश्यकता होती है। क्योंकि मरकरी की वाष्प शहरीली होती है, अतः प्रयोग करते समय अपना चेहरा मरकरी से दूर रख्िाए। काप़फी समय तक मरकरी की वाष्प के पास साँस मत खींचिए। उदाहरण 4ण्10 किसी निधर्रित स्थान पर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्रा का क्षैतिज घटक 3ण्0×10दृ5 ज् है, तथा इस क्षेत्रा की दिशा भौगोलिक दक्ष्िाण से भौगोलिक उत्तर की ओर है। किसी अत्यध्िक लंबे सीध्े चालक से 1। की अपरिवतीर् धरा प्रवाहित हो रही है। जब यह तार किसी क्षैतिज मेश पर रखा है तथा विद्युत धरा के प्रवाह की दिशाएँ ;ंद्ध पूवर् से पश्िचम की ओरऋ ;इद्ध दक्ष्िाण से उत्तर की ओर हैं तो तार की प्रत्येक एकांक लंबाइर् पर बल कितना है? हल थ् त्र प्स ×ठ थ् त्र प्सठ ेपदθ प्रति एकांक लंबाइर् पर बल ित्र थ्ध्स त्र प् ठ ेपदθ ;ंद्ध जब विद्युत धरा पूवर् से पश्िचम की ओर प्रवाहित होती है, तब θ त्र 90° अतः ित्र प् ठत्र 1 × 3 × 10दृ5 त्र 3 × 10दृ5 छ उदृ1उदाहरण 4ण्10 यह ऐम्िपयर की परिभाषा में व£णत बल के मान2×10दृ7 छउदृ1 से बड़ा है। अतः ऐम्िपयर का मानकीकरण करने के लिए पृथ्वी के चंुबकीय क्षेत्रा तथा अन्य भूले - भटके क्षेत्रों के प्रभावों को समाप्त करना महत्वपूणर् है। बल की दिशा अधेमुखी है। इस दिशा को ‘सदिशों के सदिश गुणनपफल’ के दैश्िाक गुण के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। ;इद्ध जब विद्युत धरा के प्रवाह की दिशा दक्ष्िाण से उत्तर की ओर है, तो θ त्र 0व ित्र 0 अतः चालक पर कोइर् बल कायर् नहीं करता। 4ण्10 विद्युत धरा पाश पर बल आघूणर्, चुंबकीय द्विध््रुव 4ण्10ण्1 एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में आयताकार विद्युत धरा पाश पर बल आघूणर् अब हम आपको यह दिखाएँगे कि एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में स्िथत कोइर् आयताकार पाश जिससे अपरिवतीर् विद्युत धरा प् प्रवाहित हो रही है, एक बल आघूणर् का अनुभव करता है। इस पर कोइर् नेट बल आरोपित नहीं होता। यह व्यवहार उस द्विध्ु्रव के व्यवहार के समरूपी है जो यह एकसमान विद्युत क्षेत्रा में दशार्ता है ;अनुभाग 1ण्10 देख्िाएद्ध। घूणर्न अक्ष पहले हम उस सरल प्रकरण पर विचार करते हैं जिसमें आयताकार पाश इस प्रकार स्िथत है कि एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा ठ पाश के तल में है। इसे चित्रा 4ण्21 ;ंद्ध में दशार्या गया है। चुंबकीय क्षेत्रा पाश की दो भुजाओं ।क् तथा ठब् पर कोइर् बल आरोपित नहीं करता। यह पाश की भुजा ।ठ के लंबवत है तथा इस पर बल थ्1 आरोपित करता है जिसकी दिशा पाश के तल में भीतर की ओर है। इस बल का परिमाण है: थ् त्र प् इ ठ1इसी प्रकार, चुंबकीय क्षेत्रा भुजा ब्क् पर एक बल थ्2 आरोपित करता है जो पाश के तल के बाहर की ओर है। इस बल का परिमाण है: थ् त्र प् इ ठ त्र थ्21 इसी प्रकार पाश पर आरोपित नेट बल शून्य है। बलों थ्1 तथा थ्2 के युगल के कारण पाश पर एक बल आघूणर् कायर् करता है। चित्रा 4ण्21 ;इद्ध में ।क् सिरे से पाश का एक दृश्य दिखाया गया है। यह स्पष्ट करता है कि यह बल आघूणर् पाश में वामावतर् घूणर्न की प्रवृिा उत्पन्न करता है। इस बल आघूणर् का परिमाण है: ं τत्र थ्1 ़ थ्222 चित्रा 4ण्21 ;ंद्ध एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में स्िथत ं त्र प्इठ ़ प्इठ त्रप् ंइ ठ कोइर् विद्युत धरावाही आयताकार वुंफडली। चुंबकीय 22 आघूणर् उ अधेमुखी संकेत करता है। बल आघूणर् ; द्ध त्र प्। ठ ;4ण्26द्ध τ अक्ष के अनुदिश है तथा इसकी प्रवृिा वुंफडली कोयहाँ । त्र ंइ आयत का क्षेत्रापफल है। वामावतर् घूणर्न कराने की है। ;इद्ध वंुफडली पर बलअब हम आगे उस प्रकरण पर विचार करेंगे जिसमें पाश का तल युग्म कायर् करते हुए। 157चुंबकीय क्षेत्रा के अनुदिश नहीं है, परंतु इनके बीच कोइर् कोण बनता है। हम भौतिकी चुंबकीय क्षेत्रा ठ तथा वुंफडली पर अभ्िालंब के बीच का कोण θ लेते हैं ;पहला प्रकरण θ त्र πध्2 के तदनुरूपी हैद्ध। चित्रा 4ण्22 में यह व्यापक प्रकरण दशार्या गया है। भुजाओं ठब् तथा क्। पर कायर्रत बल परिमाण में समान दिशा में विपरीत तथा वुंफडली के अक्ष के अनुदिश कायर् करते हैं। ये बल ठब् तथा क्। के संहति वेंफद्रों को संयोजित करते हैं। अक्ष के अनुदिश संरेख्िात होने के कारण ये एक दूसरे को निरस्त करते हैं, परिणामस्वरूप कोइर् नेट बल अथवा बल आघूणर् नहीं है। भुजाओं।ठ तथा ब्क् पर कायर्रत बल थ्1 तथा थ्2 हैं। ये भी परिमाण सहित समान एवं विपरीत हैं। थ् त्र थ् त्र प् इ ठ12परंतु ये संरेख नहीं हैं। इसके परिणामस्वरूप पहले की तरह एक बल युग्म उत्पन्न होता है। तथापि, पिछले प्रकरण जिसमें पाश का तल चुंबकीय क्षेत्रा के अनुदिश था, की तुलना में बल आघूणर् का परिमाण अब कम है। इसका कारण यह है कि बलयुग्म बनाने वाले बलों के बीच की लंबवत दूरी कम हो गइर् है। चित्रा 4ण्22;इद्ध में सिरे ।क् से इस व्यवस्था का दृश्य दिखाया गया है। इसमें यह दशार्या गया है कि ये दो बल एक बलयुग्म बनाते हैं। पाश पर बल आघूणर् का परिमाण है: चित्रा 4ण्22 ;ंद्ध पाश ।ठब्क् का क्षेत्रा सदिश चुंबकीय क्षेत्रा से कोइर् यादृच्िछक कोण θ बनाता है। ;इद्ध पाश का ऊपरी τ त्र 1थ् 2 ं ेपदθ ़ 2थ् 2 ं ेपदθ दृश्य। भुजाओं ।ठ तथा ब्क् पर कायर्रत बल थ्1 तथा थ्2 त्र प् ंइ ठ ेपद θ दशार्ए गए हैं। त्र प् । ठ ेपद θ ;4ण्27द्ध जैसे - जैसे θ 7 0ए बलयुग्म के बलों के बीच लंबवत दूरी भी शून्य की ओर बढ़ती है। इससे बल संरेख बन जाते हैं तथा नेट बल तथा बल आघूणर् शून्य हो जाते हैं। समीकरणों ;4ण्26द्ध तथा ;4ण्27द्ध के बल आघूणो± को वुंफडली के चंुबकीय आघूणर् तथा चुंबकीय क्षेत्रा के सदिश गुणनपफल के रूप में व्यक्त कर सकते हैं। विद्युत धरा पाश के चुंबकीय आघूणर् को हम इस प्रकार परिभाष्िात करते हैं उ त्र प् । ;4ण्28द्ध यहाँ क्षेत्रा सदिश । की दिशा दक्ष्िाण हस्त अंगुष्ठ नियम के अनुसार कागश के तल के भीतर की ओर नि£दष्ट है ;चित्रा 4ण्21 देख्िाएद्ध चूँकि उ तथा ठ के बीच का कोण θ है, समीकरणों ;4ण्26द्ध तथा ;4ण्27द्ध को केवल एक व्यंजक द्वारा व्यक्त किया जा सकता है τत्र उ × ठ ;4ण्29द्ध यह स्िथरवैद्युतिकी के प्रकरण के सदृश है। ¹विद्युत क्षेत्रा म् में द्विध््रुव आघूणर् चम का वैद्युत द्विधु्रवह् जैसा कि समीकरण ;4ण्28द्ध से स्पष्ट है, चंुबकीय क्षेत्रा की विमाएँ ख्।स्2, हैं तथा इसका मात्राक।उ2 है। समीकरण ;4ण्29द्ध से स्पष्ट है कि जबउ चुंबकीय क्षेत्रा ठ के समांतर अथवा प्रतिसमांतर होता है तो बल आघूणर् τ विलुप्त हो जाता है। जब वंुफडली पर बल आघूणर् नहीं होता तो यह साम्यावस्था की ओर इंगित करता है ;यह चुंबकीय आघूणर् उ की किसी वस्तु पर भी लागू होता हैद्ध। जब उ तथा ठ समांतर होते हैं तो साम्यावस्था स्थायी होती है। वुंफडली में कोइर् भी घूणर्न होने पर बल आघूणर् उत्पन्न होता है जो वंुफडली को वापस उसकी मूल स्िथति में ला देता है। जब ये प्रतिसमांतर होते हैं तो साम्यावस्था अस्थायी होती है क्योंकि वंुफडली में कोइर् घूणर्न होने पर एक बल आघूणर् उत्पन्न होता है जो इस घूणर्न में वृि कर देता है। इस बल आघूणर् की उपस्िथति के कारण ही लघु चुंबक अथवा कोइर् चुंबकीय द्विध्ु्रव बाह्य चुंबकीय क्षेत्रा के साथ स्वयं को संरेख्िात कर लेता है। यदि पाश में पास - पास सटे हुए छ पेफरे हैं तो बल आघूणर् के लिए व्यंजक, समीकरण ;4ण्29द्ध अब भी लागू होता है। तब यह व्यंजक इस प्रकार व्यक्त किया जाता है उ त्र छ प् । ;4ण्30द्ध कω - 0छप् ठ त्र त्र उठ 2त्कज भौतिकी θ त्र 0 से θ त्र πध्2 तक समाकलन करने पर, ω2 प्ित्र−उठ बवेθ 0 π ध्2 त्र उ ठ 2 1ध्2 1ध्22उठ 2 × 20 ω ित्रत्र 1 त्र 20 ेदृ1 प् 10− उदाहरण 4ण्12 ;ंद्ध किसी चिकने क्षैतिज तल पर कोइर् विद्युत धरावाही वृत्ताकार पाश रखा है। क्या इस पाश के चारों ओर ऐसा चुंबकीय क्षेत्रा स्थापित किया जा सकता है कि यह पाश अपने अक्ष के चारों ओर स्वयं चक्कर लगाए ;अथार्त ऊध्वार्ध्र अक्ष के चारों ओरद्ध। ;इद्ध कोइर् विद्युत वाही वृत्ताकार पाश किसी एकसमान बाह्य चुंबकीय क्षेत्रा में स्िथत है। यदि यह पाश घूमने के लिए स्वतंत्रा है, तो इसके स्थायी संतुलन का दिव्फविन्यास क्या होगा। यह दशार्इए कि इसमें वुफल क्षेत्रा ;बाह्य क्षेत्रा $ पाश द्वारा उत्पन्न क्षेत्राद्ध का फ्रलक्स अध्िकतम होगा। ;बद्ध अनियमित आवृफति का कोइर् विद्युत धरावाही पाश किसी बाह्य चुंबकीय क्षेत्रा में स्िथत है। यदि तार लचीला है तो यह वृत्ताकार आवृफति क्यों ग्रहण कर लेता है? हल ;ंद्ध नहीं, क्योंकि इसके लिए ऊध्वार्ध्र दिशा में बल आघूणर् τ की आवश्यकता होगी। परंतु τत्र प् । ×ठए और चूँकि क्षैतिज पाश का क्षेत्रापफल सदिश । ऊध्वार्ध्र दिशा में है, τ को ठ के किसी मान के लिए पाश के तल में होना चाहिए। ;इद्ध स्थायी संतुलन वाला दिव्फविन्यास वह है जिसमें पाश का क्षेत्रापफल सदिश । बाह्य चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा में होता है। इस दिव्फविन्यास में पाश द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्रा बाह्य क्षेत्रा की दिशा में ही है। इस प्रकार, दोनों क्षेत्रा पाश के तल के लंबवत होने के कारण वुफल क्षेत्रा का अध्िकतम फ्रलक्स प्रदान करते हैं। ;बद्ध यह क्षेत्रा के लंबवत तल में वृत्ताकार पाश का रूप इसलिए ग्रहण कर लेता है ताकि इससे होकर अध्िकतम फ्रलक्स प्रवाहित हो सके। क्योंकि किसी दी गइर् परिमिति के लिए वृत्त का क्षेत्रापफल किसी भी अन्य आवृफति की तुलना में अध्िकतम होता है। 4ण्10ण्2 वृत्ताकार विद्युत धरा पाश चुंबकीय द्विध््रुव इस अनुभाग में हम मौलिक चुंबकीय तत्व के रूप में किसी विद्युत धरा पाश के विषय में विचार करेंगे। हम यह दशार्एँगे कि वृत्ताकार विद्युत धरा पाश के कारण चुंबकीय क्षेत्रा ;अध्िक दूरियों परद्ध व्यवहार में वैद्युत द्विध्ु्रव के विद्युत क्षेत्रा से बहुत वुफछ समान होता है। अनुभाग 4ण्6 में हमने त् त्रिाज्या के वृत्ताकार पाश जिससे अपरिवतीर् विद्युत धरा प् प्रवाहित हो रही है, के कारण पाश के अक्ष चुंबकीय क्षेत्रा का मूल्यांकन किया था। इस चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण ¹समीकरण ;4ण्15द्धह्, - प्त्2 ठ त्र 0 2;ग 2 ़ त्2 द्ध3ध्2 तथा इसकी दिशा अक्ष के अनुदिश थी जिसे दक्ष्िाण हस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा प्राप्त किया गया था ;चित्रा 4ण्12द्ध। यहाँ पर ग पाश के वेंफद्र से उसके अक्ष के अनुदिश दूरी है। यदि ग झझ त् है, तो हम उपरोक्त व्यंजक के हर से त्2 की उपेक्षा कर सकते हैं। इस प्रकार - त्2 ठ त्र 0 2ग 3 ध्यान दीजिए, पाश का क्षेत्रापफल । त्र πत्2 ए इस प्रकार - 0प्। ठ त्र 2πग 3 जैसा कि पहले हमने चुंबकीय आघूणर् उ के परिमाण की परिभाषा उ त्रप् । के रूप में की थी - उ ठ क् 0 2 π ग 3 - 02उ त्र 3 ख्4ण्31;ंद्ध,4π ग समीकरण ख्4ण्31;ंद्ध, का यह व्यंजक किसी स्िथरवैद्युत द्विध्ु्रव के विद्युत क्षेत्रा के लिए पहले प्राप्त किए जा चुके व्यंजक से काप़फी मेल खाता है। इस समानता को देखने के लिए हम प्रतिस्थापित करते हैं - 0 → 1ध् ε0 उ → चम ;स्िथरवैद्युत द्विध्ु्रवद्ध ठ → म् ;स्िथरवैद्युतीय क्षेत्राद्ध तब हमें प्राप्त होता है, 2चमम् त्र 4 πε0 ग 3 जो कि यथाथर् रूप से किसी वैद्युत द्विध्ु्रव का उसके अक्ष पर विद्युत क्षेत्रा है। इसके विषय में हमने अध्याय 1 अनुभाग 1ण्10 ख्समीकरण ;1ण्20द्ध, में अध्ययन किया था। यह दशार्या जा सकता है कि उपरोक्त सदृशता को आगे भी ले जाया जा सकता है। हमने यह पाया था कि द्विध्ु्रव के लंबवत द्विविभाजक पर विद्युत क्षेत्रा ¹समीकरण ;1ण्21द्ध देख्िाएह् चमम् ≈ 4πε0ग 3 यहाँ ग द्विध्ु्रव से दूरी है। यदि हम उपरोक्त संबंध् में च 7 उ तथा - 0 → 1ध् ε0 से प्रतिस्थापित करें, तो हमें पाश के तल में किसी ¯बदु जिसकी वेंफद्र से दूरी ग है, के लिए ठ के परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। ग झझत् के लिए ठ ≈ - 0 उ 3य ग झझ त् ख्4ण्31;इद्ध,4π ग किसी ¯बदु चुंबकीय द्विध्ु्रव के लिए समीकरणों ख्4ण्31;ंद्ध, तथा ख्4ण्31;इद्ध, द्वारा दिए गए परिणाम यथाथर् बन जाते हैं। उपरोक्त परिणाम किसी भी समतल पाश पर लागू होते दशार्ए जा सकते हैं। समतल विद्युत धारा पाश किसी अक्ष चुंबकीय द्विध्ु्रव के तुल्य होता है जिसका चुंबकीय आघूणर् उ त्र प् । है जो कि वैद्युत द्विध्ु्रव आघूणर् च के सदृश है। ध्यान दीजिए, इतना होते हुए भी एक मूल अंतर यह है कि कोइर् वैद्युत द्विध्ु्रव दो मूल इकाइयों - आवेशों ;अथवा विद्युत एकध््रुवोंद्ध से मिलकर बनता है। जबकि चुंबकत्व में कोइर् चुंबकीय द्विध्ु्रव ;अथवा विद्युत धरा पाशद्ध एक अत्यंत मूल तत्व है। चुंबकत्व में विद्युत आवेशों के समतुल्य अथार्त चुंबकीय एकध्ु्रवों, का अस्ितत्व अब तक अज्ञात है। भौतिकी हमने यह दशार्या कि कोइर् विद्युत धरा पाश ;पद्ध चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करता है ;चित्रा 4.12 देख्िाएद्ध तथा अध्िक दूरियों पर एक चुंबकीय द्विध्ु्रव की तरह व्यवहार करता है तथा ;पपद्ध पर एक बल आघूणर् कायर् करता है जैसे चुंबकीय सुइर्। इसके आधर पर ऐम्िपयर ने यह सुझाव दिया था कि समस्त चुंबकत्व प्रवाहित विद्युत धराओं के कारण है। यह आंश्िाक रूप से सत्य प्रतीत होता है तथा अब तक कोइर् भी चुंबकीय एकध्ु्रव नहीं देखा जा सका है। तथापि मूल कण जैसे इलेक्ट्राॅन अथवा प्रोटाॅन के भी नैज चुंबकीय आघूणर् हैं जो प्रवाहित विद्युत धराओं के कारण नहीं हैं। 4ण्10ण्3 परिक्रमी इलेक्ट्राॅन का चुंबकीय द्विध्ु्रव आघूणर् अध्याय 12 में हम हाइड्रोजन परमाणु के बोर माॅडल के विषय में अध्ययन करेंगे। कदाचित आपने इस माॅडल के बारे में सुना होगा। जिसे डेनमावर्फ के भौतिक विज्ञानी नील बोर ने सन्1911 में प्रस्तावित किया था और जो नए प्रकार की यांत्रिाकी जिसे क्वांटम यांत्रिाकी कहते हैं, के लिए मील का एक पत्थर था। बोर माॅडल में, इलेक्ट्राॅन ;एक )णावेश्िात कणद्ध किसी ध्नावेश्िात नाभ्िाक के चारों ओर ठीक उसी प्रकार - परिक्रमा करता है जिस प्रकार कोइर् ग्रह सूयर् की परिक्रमा करता है। इलेक्ट्राॅन केप प्रकरण में बल स्िथरवैद्युत ;वूफलाॅम बलद्ध होता है जबकि सूयर् ग्रह प्रकरण में यह गुरुत्वाकषर्ण बल होता है। चित्रा 4ण्23 में बोर माॅडल दशार्या गया है। किसी स्िथर भारी नाभ्िाक जिसका आवेश ़र्म है, के चारों ओर;दृमद्ध आवेश का इलेक्ट्राॅन;म त्र ़ 1ण्6 × 10दृ19 ब्द्ध एकसमान वतुर्ल गति करता रहता है। इससेचित्रा 4ण्23हाइड्रोजन जैसे परमाणुओं के बोर विद्युत धराप् बनती है। यहाँमाॅडल में, )णावेश युक्त इलेक्ट्राॅन वेंफद्रस्थ धनावेश युक्त ;़र्मद्ध नाभ्िाक के चारों ओर म प् त्र ;4ण्32द्धएकसमान चाल से घूम रहा है। इलेक्ट्राॅन की ज् एकसमान वतुर्ल गति एक धरा लूप बनाती है। यहाँज् परिक्रमण का आवतर्काल है। यदि इलेक्ट्राॅन की कक्षा की त्रिाज्यात तथा चंुबकीय आघूणो± की दिशा कागश के तल के कक्षीय चाल अ है, तो लंबवत भीतर की ओर है तथा इसे पृथक रूप 2πतचिÉ⊗ द्वारा नि£दष्ट किया गया है। ज् त्र ;4ण्33द्ध अ समीकरण में ज्का मान प्रतिस्थापित करने परप् त्र मअध्2πत इस परिसंचारी विद्युत धरा के साथ एक चुंबकीय आघूणर् संब( होगा जिसे प्रायः - स द्वारा नि£दष्ट करते हैं। समीकरण ;4ण्28द्ध से इसका परिमाण है - स त्र प्πत 2 त्र मअतध्2 चित्रा 4ण्23 में इस चुंबकीय आघूणर् की दिशा कागश के तल में भीतर की ओर है। ¹इस परिणाम पर हमेें पहले वणर्न किए जा चुके दक्ष्िाण हस्त नियम तथा इस तथ्य के आधर पर पहुंचे हैं कि )णावेश्िात इलेक्ट्राॅन वामावतर् गति कर रहा है जिसके पफलस्वरूप विद्युत धरा दक्ष्िाणावतर् है।ह् उपरोक्त व्यंजक के दक्ष्िाण पक्ष को इलेक्ट्राॅन के द्रव्यमानउम से गुणा एवं भाग करने पर हमें प्राप्त होता है म - त्र;उ अत द्धसम2उ म म त्र सख्4ण्34;ंद्ध,2उ म यहाँ,सवेंफद्रीय नाभ्िाक के परितः इलेक्ट्राॅन के कोणीय संवेग का परिमाण है। सदिश रूप में म - त्र− सस ख्4ण्34;इद्ध,162 2उ म यहाँ )णात्मक चिÉ यहाँ यह संकेत देता है कि इलेक्ट्राॅन के कोणीय संवेग की दिशा चुंबकीय आघूणर् की दिशा के विपरीत है। यदि हमने इलेक्ट्राॅन ;जिस पर आवेश दृम हैद्ध के स्थान पर;़ुद्ध आवेश का कोइर् कण लिया होता तो कोणीय संवेग तथा चंुबकीय आघूणर् दोनों की एक ही दिशा होती। अनुपात - स म त्र ;4ण्35द्धस 2उ म इसे घूणर् चुंबकीय अनुपात कहते हैं तथा यह एक नियतांक है। इलेक्ट्राॅन के लिए इस अनुपात का मान 8ण्8 × 1010 ब् धह है जिसे प्रयोगों द्वारा सत्यापित किया जा चुका है। यह तथ्य कि परमाण्िवक स्तर तक भी चुंबकीय आघूणर् विद्यमान है परमाण्िवक आघूणर् संबंधी ऐम्िपयर की साहसपूणर् परिकल्पना की पुष्िट करता है। ऐम्िपयर के अनुसार, यह पदाथो± के चुंबकीय गुणों को भली - भाँति स्पष्ट करने में सहायक है। क्या हम उस परमाणवीय द्विध्ु्रव आघूणर् को कोइर् निश्िचत मान दे सकते हैं? इसका उत्तर है - हाँ। बोर माॅडल की परिध्ि में ऐसा किया जाना संभव है। बोर ने यह परिकल्पना की थी कि कोणीय संवेग एक विविक्त मानांे का समुच्चय ही हो सकता है। अथार्त दी स त्र ;4ण्36द्ध2π यहाँ द एक प्रावृफत संख्या, द त्र 1ए 2ए 3ए ण्ण्ण् है तथा ी एक नियतांक है जिसे वैज्ञानिक मैक्स प्लांक के नाम पर ;प्लांक नियतांकद्ध कहते हैं तथा इसका मान ी त्र 6ण्626 × 10दृ34 श्र े है। कोणीय वेग की विविक्तता संबंध्ी इस शतर् को बोर क्वांटीकरण - शतर् कहते हैं। इसके विषय में हम अध्याय 12 में विस्तार से चचार् करेंगे। यहाँ हमारा उद्देश्य मात्रा प्राथमिक द्विध्ु्रव आघूणर् को परिकलित करने में इसका उपयोग करना है। द त्र 1 लेने पर समीकरण ;4ण्34द्ध से हमें प्राप्त होता है, म ; त्र ी- स द्धउपद 4 πउ म −19 −34 1ण्60 × 10 × 6ण्63 × 10 त्र 4 × 3ण्14 × 9ण्11 ×10 −31 त्र 9ण्27 × 10दृ24 ।उ2 ;4ण्37द्ध यहाँ अधेलिख्िात उपद का उपयोग न्यूनतम के लिए किया गया है। इस न्यूनतम मान को बोर मैग्नेटाॅन कहते हैं। एकसमान वतर्ुल गति करने वाले प्रत्येक आवेश के पास कोइर् चुंबकीय आघूणर् अवश्य ही संब( होता है जिसे समीकरण ;4ण्34द्ध के समान किसी व्यंजक से व्यक्त किया जाता है। इस द्विध्रुव आघूणर् को कक्षीय चुंबकीय आघूणर् कहते हैं। इसीलिए - स में अधोलिख्िात ष्सष् लगा है। कक्षीय चुंबकीय आघूणर् के अतिरिक्त इलेक्ट्राॅन का एक नैज चुंबकीय आघूणर् भी होता है जिसका आंकिक मान वही है जैसा समीकरण ;4ण्37द्ध में दशार्या गया है। इस आघूणर् को चक्रण चुंबकीय आघूणर् कहते हैं। परंतु हम तुरंत ही यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इसका यह अथर् नहीं है कि इलेक्ट्राॅन घूणर्न गति करता है। इलेक्ट्राॅन एक मूल कण है तथा प्रचक्रमान लट्टू अथवा पृथ्वी की भाँति इसका अपना कोइर् घूणर्न अक्ष नहीं है जिस पर यह घूणर्न कर सके। इतना होने पर भी इसका एक नैज चुंबकीय आघूणर् होता है। लोहे तथा अन्य चुंबकीय पदाथो± में चुंबकन की सूक्ष्म जड़ें इसी नैज चक्रण चुंबकीय आघूणर् से निकलती प्रतीत होती हैं। 4ण्11 चल वुंफडली गैल्वेनोमीटर अध्याय 3 के अंतगर्त विद्युत परिपथों में प्रवाहित धराओं तथा वोल्टताओं के विषय में विस्तार से चचार् की जा चुकी है। परंतु हम इन्हें किस प्रकार मापते हैं। हम यह वैफसे कहते हैं कि किसी परिपथ में 1ण्5 । विद्युत धरा प्रवाहित हो रही है अथवा किसी प्रतिरोध्क के सिरों के बीच 1ण्2 ट विभवांतर गैल्वेनोमीटर का ऐमीटर अथवा वोल्टमीटर में रूपांतरणीजजचरूध्ध्ूूूण्बपजलबवससमहपंजमण्बवउध्हंसअंदवउमजमतऋग्प्प्ंण्ीजउ भौतिकी है। चित्रा4ण्24 में इसी उद्देश्य के उपयोग से किया जाने वाला उपयोगी उपकरण दशार्या गया है जिसे चल वुंफडली गैल्वेनोमीटर;उवअपदह बवपस हंसअंदवउमजमत कृ डब्ळद्ध कहते हैं। यह एक ऐसी युक्ित है जिसके सि(ांत को हमारे द्वारा अनुभाग में 4ण्10 में की गइर् चचार् के आधर पर समझा जा सकता है। चल वुंफडली गैल्वेनोमीटर में किसी एकसमान त्रिाज्य ;अरीयद्ध चुंबकीय क्षेत्रा में किसी अक्ष पर घूणर्न करने के लिए अनेक पेफरों वाली एक वुंफडली होती है ;चित्रा 4ण्24द्ध। इस वंुफडली के भीतर एक बेलनाकार नमर् लोह क्रोड जो केवल चुंबकीय क्षेत्रा को त्रिाज्य ही नहीं बनाता वरन चुंबकीय क्षेत्रा की प्रबलता में भी वृि कर देता है। जब इस वुंफडली से कोइर् विद्युत धरा प्रवाहित की जाती है तो इस पर एक बल आघूणर् कायर् करता है। समीकरण ;4ण्26द्ध के अनुसार इस बल आघूणर् τका मान होता है τ त्र छप् ।ठ यहाँ, भौतिक राश्िायों के प्रतीकों के अपने सामान्य अथर् हैं। चूँकि डिशाइन के अनुसार चुंबकीय क्षेत्रा त्रिाज्य है, हमने बल आघूणर् के लिए दिए गए उपरोक्त व्यंजक में ेपद θ त्र 1 लिया है। यह चुंबकीय बल आघूणर्छप्।ठ वुंफडली में घूणर्न की प्रवृिा उत्पन्न करता है जिसके पफलस्वरूप वुंफडली अपने अक्ष पर घूणर्न करती है। वुंफडली से जुड़ी कमानी ैचमें वंुफडली के घूणर्न के विरोध् में बल आघूणर् ाφउत्पन्न हो जाता है जो वुंफडली के बल आघूणर्छप्।ठ को संतुलित करता हैऋ पफलस्वरूप वुंफडली मेंφ कोण का स्थायी कोणीय विक्षेप आ जाता है। साम्यावस्था में ाφ त्र छप् ।ठ यहाँाकमानी का ऐंठन नियतांक है, अथार्त प्रति एकांक ऐंठन प्रत्यानयन बल आघूणर् है। विक्षेपφ का पाठ्यांक कमानी के साथ जुड़े संकेतक द्वारा पैमाने पर लिया जा सकता है। उपरोक्त व्यंजक के अनुसार φका मान है पैमाना छ।ठ φत्र प् ;4ण्38द्धा कोष्ठक की राश्िा का मान किसी दिए गए गैल्वेनोमीटर के लिए एक स्थायी चुंबक नियतांक है। गैल्वेनोमीटर का उपयोग कइर् प्रकार से किया जा सकता है।संकेतन इसका उपयोग एक संसूचक के रूप में यह ज्ञात करने के लिए किया जा वुंफडली सकता है कि परिपथ में कोइर् विद्युत धरा प्रवाहित हो रही है अथवा नहीं। इस प्रकार का उपयोग हमने व्हीटस्टोन सेतु व्यवस्था में किया था। जब गैल्वेनोमीटर का उपयोग संसूचक के रूप में करते हैं तो इसका संकेतक साम्यावस्था ;शून्य विक्षेप स्िथति अथार्त जब वुंुफडली में कोइर् विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होतीद्ध पैमाने के मध्य में होता है न कि बाईं ओर जैसा किध्ुरी चित्रा 4ण्24 में दशार्या गया है। प्रवाहित विद्युत धरा के अनुसार गैल्वेनोमीटर का संकेतक विद्युत धरा की दिशा के अनुरूप बाएँ अथवा दाएँ विक्षेपितनमर् लौह हो जाता है।क्रोड गैल्वेनोमीटर का उपयोग इसी रूप में किसी परिपथ में प्रवाहित विद्युत धारा को मापने के लिए ऐमीटर की भाँति नहीं किया जा सकता। इसके दोएकसमान त्रिाज्य चुंबकीय क्षेत्रा कारण हैं ;पद्ध गैल्वेनोमीटर एक अत्यंत सुग्राही युक्ित है, यह - । कोटि की विद्युत धरा के लिए पूणर् पैमाना विक्षेप देती है। ;पपद्ध विद्युत धरा को मापने केचित्रा 4ण्24चल वुंफडली गैल्वेनोमीटर। इसके अवयवों लिए गैल्वेनोमीटर को परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़ना होता है। क्योंकि इसकाका वणर्न पाठ में किया गया है। आवश्यकतानुसार इस प्रतिरोध् अिाक होता है जो परिपथ में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के मानउपकरण का उपयोग हम धारा का पता लगाने या को परिव£तत कर देता है। इस परेशानी को दूर करने के लिए एक अल्प - मानधारा ;ऐमीटरद्ध, या पिफर वोल्टता ;वोल्टमीटरद्ध का वाला प्रतिरोध् त जिसे शंट कहते हैं, गैल्वेनोमीटर की वुंफडली के पाश्वर्क्रममान ज्ञात करने के लिए करते हैं। े में संयोजित किया जाता है जिससे अध्िकांश विद्युत धारा इस शंट से प्रवाहित हो जाती है। इस प्रकार इस व्यवस्था का प्रतिरोध् हो जाता है - त् तध् ;त् ़ तद्ध ् त यदि त् झझ तळे ळेे ळे यदि परिपथ के प्रतिरोध् त्म की तुलना में ते का मान कम है तो मापक यंत्रा को परिपथ में जोड़ने का प्रभाव भी कम होगा जिसकी उपेक्षा की जा सकती है। इस व्यवस्था का एक योजना आरेख चित्रा 4ण्25 में दिखाया गया है। इस प्रकार बने ऐमीटर के पैमाने का अंशांकन कर दिया जाता है ताकि आसानी से धारा का मान पढ़ा जा सके। ऐमीटर की सुग्राहिता की परिभाषा हम विक्षेप प्रति इकाइर् धारा के रूप में करते हैं। समीकरण ;4ण्38द्ध के अनुसार धारा सुग्राहिता है, φ छ।ठ त्र ;4ण्39द्धप किसी भी उत्पादक के लिए गैल्वेनोमीटर की सुग्राहिता में वृि करने का सरल उपाय यह है कि वह वुंफडली में पेफरों की संख्या छ में वृि कर दे। हम अपने प्रयोग की आवश्यकता के अनुसार गैल्वेनोमीटर का चयन करते हैं। धरामापी का उपयोग परिपथ के किसी अंश के सिरों के बीच विभवांतर ज्ञात करने के लिए वोल्टतामापी के रूप में भी हो सकता है। इस उद्देश्य के लिए इसको परिपथ के उस अंश के पाश्वर्क्रम में लगाना होगा। और पिफर, इसमें से अत्यल्प धरा प्रवाहित होनी चाहिए, अन्यथा, वोल्टता की माप मूल व्यवस्था को अत्यध्िक विक्षुब्ध् कर देगी। प्रायः हम मापक यंत्रों द्वारा उत्पन्न विक्षोभ को एक प्रतिशत से कम रखते हैं। माप की परिशु(ता बनाए रखने के लिए, गैल्वेनोमीटर के श्रेणीक्रम में एक बड़ा प्रतिरोध त् जोड़ा जाता है। इस व्यवस्था का योजना आरेख चित्रा 4ण्26 में दशार्या गया है। ध्यान दीजिए कि अब वोल्टमीटर का वुफल प्रतिरोध, त्ळ ़ त् क् त् रू अथार्त प्रतिरोध् बहुत अध्िक है। वोल्टमीटर के पैमाने को अंशांकित कर दिया जाता है ताकि आसानी से वोल्टता का मान पढ़ा जा सके। किसी वोल्टमापी की वोल्टता सुग्राहिता की परिभाषा हम विक्षेप प्रति एकांक वोल्टता से करते हैं। समीकरण ;4ण्38द्ध से φ छ।ठ प् छ।ठ 1 त्रत्र ;4ण्40द्धट ाट ात् यहाँ एक रोचक तथ्य ध्यान देने योग्य यह है कि धारा सुग्राहिता में वृि करने पर यह आवश्यक नहीं है कि वोल्टता सुग्राहिता में भी वृि हो जाएगी। आइए समीकरण ;4ण्39द्ध पर विचार करें जो धारा सुग्राहिता का माप बताती है। यदि छ → 2छ अथार्त यदि पेफरों की संख्या दोगुनी कर दी जाए, तो φφ → 2 प्प् अथार्त धारा सुग्राहिता भी दोगुनी हो जाती है। विंफतु, गैल्वेनोमीटर का प्रतिरोध भी दो गुना हो जाने की संभावना है क्योंकि यह तार की लंबाइर् के अनुक्रमानुपाती है। समीकरण ;4ण्40द्ध में छ→2छ एवं त्→2त्ए अतः वोल्टता सुग्राहिता, φφ → टट अपरिव£तत रहती है। अतः व्यापक रूप से गैल्वेनोमीटर से ऐमीटर में रूपांतरित करने के लिए जो संशोध्न किए जाते हैं गैल्वेनोमीटर को वोल्टमीटर में परिव£तत करने के लिए इनसे भ्िान्न संशोधन किए जाने चाहिए। उदाहरण 4ण्13 नीचे दिखाए गए परिपथ में धारा का मान क्या है यदि दिखाया गया ऐमीटर, ;ंद्ध त्ळ त्र 60ण्00 Ω प्रतिरोध का गैल्वेनोमीटर है। ;इद्ध भाग ;ंद्ध में बताया गया गैल्वेनोमीटर ही है परंतु इसको ते त्र 0ण्02 Ω का शंट प्रतिरोध लगाकर ऐमीटर में परिव£तत किया गया है। ;बद्ध शून्य प्रतिरोध का एक आदशर् ऐमीटर है। ऐमीटर चित्रा 4ण्25 एक अत्यल्प मान का शंट प्रतिरोध ते पाश्वर्क्रम में लगाकर किसी गैल्वेनोमीटर ;ळद्ध को ऐमीटर ;।द्ध में रूपांतरित करना। वोल्टमीटर चित्रा 4ण्26 श्रेणीक्रम में एक बड़ा प्रतिरोध त् लगाकर गैल्वेनोमीटर ;ळद्ध को वोल्टमीटर ;टद्ध में परिवतिर्त करना। भौतिकी सारांश 1ण् चुंबकीय क्षेत्रा ठ पर विद्युत क्षेत्रा म् की उपस्िथति में अ वेग से गतिमान किसी आवेश ु पर लगने वाले वुफल बल को लोरेंज बल कहते हैं। इसे नीचे दिए गए व्यंजक द्वारा व्यक्त किया जाता है। थ् त्र ु ;अ × ठ ़ म्द्ध चुंबकीय क्षेत्रा ु ;अ ×ठद्धए अ के अभ्िालंबवत है तथा किया गया कायर् शून्य है। 2ण् स लंबाइर् के किसी सीध्े चालक जिससे स्थायी विद्युत धरा प् प्रवाहित हो रही है, किसी एकसमान बाह्य चुंबकीय क्षेत्रा में बल थ् का अनुभव करता है, थ् त्र प् स × ठ यहाँ द्यसद्य त्र स तथा स की दिशा विद्युत धरा की दिशा द्वारा प्रदान की जाती है। 3ण् किसी एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में, कोइर् आवेश ुए ठ के अभ्िालंबवत तल में वृत्ताकार कक्षा में गतिमान है। इसकी एकसमान वतर्ुल गति की आवृिा को साइक्लोट्राॅन आवृिा कहते हैं जिसे इस प्रकार व्यक्त किया जाता है - ुठ νत्र ब 2 π उ यह आवृिा कण की चाल तथा त्रिाज्या पर निभर्र नहीं करती। इस तथ्य का उपयोग साइक्लोट्राॅन नामक मशीन में किया जाता है जो आवेश्िात कणों को त्वरित करने में उपयोगी होता है। 4ण् बायो - सावटर् नियम के अनुसार कस लंबाइर् के किसी अवयव जिससे अपरिवतीर् विद्युत धरा प् प्रवाहित हो रही है, के कारण त सदिश दूरी पर स्िथत किसी ¯बदु च् पर चुंबकीय क्षेत्रा कठ इस प्रकार व्यक्त किया जाता है - - कस × त कठ त्र वप् 4π त 3 च् पर वुफल क्षेत्रा प्राप्त करने के लिए हमें इस सदिश व्यंजक को चालक की समस्त लंबाइर् के लिए समाकलित करना चाहिए। 5ण् त्रिाज्या त् की वृत्ताकार वुंफडली जिससे प् धरा प्रवाहित हो रही है, के कारण वेंफद्र से अक्षीय दूरी ग पर चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण - 0 प्त्2 ठ त्र द्ध3ध्22;ग 2 ़ त्2 वुंफडली के वेंफद्र पर इस क्षेत्रा का परिमाण - 0प् ठ त्र 2त् 6ण् ऐम्िपयर का परिपथीय नियम: मान लीजिए कोइर् खुला पृष्ठ ै किसी पाश ब् द्वारा परिब( है। तब ऐम्िपयर के नियम के अनुसार ठक्कस त्र - 0प् यहाँ प् पृष्ठ ै से प्रवाहित विद्युतक् ब् धारा है। प् का चिÉ दक्ष्िाण हस्त नियम द्वारा निधर्रित किया जाता है। हमने यहाँ इस नियम के सरलीवृफत रूप पर चचार् की है। यदि ठ बंद वक्र की परिध्ि स् के हर ¯बदु पर स्पशीर् के अनुदिश नि£दष्ट है तथा परिध्ि के अनुदिश इसका परिमाण नियत है तो ठस् त्र - 0 प्म यहाँ प्म बंद परिपथ द्वारा परिब( नेट विद्युत धरा है। 7ण् किसी लंबे सीध्े तार जिससे प् विद्युत धरा प्रवाहित हो रही है, से त् दूरी पर स्िथत किसी ¯बदु पर चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण - 0प् ठ त्र 2 π त् क्षेत्रा रेखाएँ तार के साथ संवेंफद्री वृत्त होती हैं। 8ण् किसी लंबी परिनालिका जिससे प् विद्युत धरा प्रवाहित हो रही है, के भीतर चुंबकीय क्षेत्रा ठ का परिमाण ठ त्र - 0दप् यहाँ द परिनालिका की प्रति एकांक लंबाइर् में पेफरों की संख्या है। किसी टोराॅइड के लिए चुंबकीय क्षेत्रा ठ का परिमाण - छप् ठ 0 त्र 2π त यहाँ द पेफरों की वुफल संख्या तथा त औसत त्रिाज्या है। 9ण् समांतर विद्युत धराएँ आक£षत तथा प्रतिसमांतर विद्युत धराएँ प्रतिक£षत करती हैं। 10ण् बहुत पास लिपटे छ पेफरों तथा । क्षेत्रापफल के समतलीय पाश जिससे विद्युत धरा प् में प्रवाहित हो रही है, का एक चुंबकीय आघूणर् उ होता है उ त्र छ प् । तथा उ की दिशा दक्ष्िाण हस्त अंगुष्ठ नियम से निधर्रित होती है। इस नियम के अनुसार, फ्अपने दाएँ हाथ की हथेली को इस प्रकार पाश के अनुदिश मोडि़ए कि उँगलियाँ विद्युत धारा की दिशा में संकेत करें तो, बाहर की ओर ¯खचा अँगूठा उ ;और ।द्ध की दिशा बताता है। जब यह पाश किसी एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा ठ में रखा जाता है तो इस पर आरोपित बल थ् त्र 0 तथा इस पर बल आघूणर् τत्र उ × ठ किसी चल वुंफडली गैल्वेनोमीटर में इस बल आघूणर् को कमानी द्वारा लगाया प्रति बल आघूणर् भौतिकी संतुलित कर लेता है और तब हमें प्राप्त होता है ाφ त्र छप् ।ठ यहाँ φ संतुलन विक्षेप है तथा ा कमानी का ऐंठन नियतांक है। 11ण् वेंफद्रीय नाभ्िाक के चारों ओर गतिमान किसी इलेक्ट्राॅन का एक चुंबकीय आघूणर् - स होता है जिसे इस प्रकार व्यक्त करते हैं: म - स त्र स 2उ यहाँ स वेंफद्रीय नाभ्िाक के परितः परिसंचारी इलेक्ट्राॅन का कोणीय संवेग का परिमाण है। - स के लघुतम मान को बोहर मेग्नेटाॅन - ठ कहते हैं ; - ठ त्र 9ण्27×10दृ24 श्रध्ज्द्ध। 12ण् किसी चल वंुफडली गैल्वेनोमीटर को उसकी वंुफडली के पाश्वर्क्रम में कोइर् अल्प परिमाण का शंट प्रतिरोध् ते संब( करके ऐमीटर में रूपांतरित किया जा सकता है। गैल्वेनोमीटर की वंुफडली के साथ श्रेणीक्रम में अध्िक परिमाण का प्रतिरोध् संब( करके उसे वोल्टमीटर में रूपांतरित किया जा सकता है। ।दृ2मुक्त आकाश की चुंबकशीलता - 0 अदिश ख्डस्ज्दृ2, ज् उ ।दृ1 4π × 10दृ7 ज् उ ।दृ1 ।दृ1चंुबकीय क्षेत्रा ठ सदिश ख्ड ज्दृ2, ज् ;टेस्लाद्ध चंुबकीय आघूणर् उ सदिश ख्स्2।, । उ2 अथवा श्रध्ज् ज्दृ2ऐंठन नियतांक ा अदिश ख्ड स्2, छ उ तंकदृ1 गैल्वेनोमीटर में दृष्िटगोचर विचारणीय विषय 1ण् स्िथरवैद्युत क्षेत्रा रेखाएँ ध्नावेश से आरंभ होकर )णावेश पर समाप्त हो जाती हैं अथवा अनंत पर लुप्त या विलीन हो जाती हैं। चुंबकीय क्षेत्रा रेखाएँ सदैव बंद पाश बनाती हैं। 2ण् इस अध्याय में वण्िार्त विचार केवल अपरिवतीर् विद्युत धराओं ;जो समय के साथ परिव£तत नहीं होतीद्धके लिए ही लागू है। समय के साथ परिवतिर्त होने वाली विद्युत धराओं के लिए न्यूटन का तीसरा नियम वैद्युतचुंबकीय क्षेत्रा के संवेग का संज्ञान करने पर ही वैध होता है। 3ण् लोरेंज बल के समीकरण का स्मरण कीजिए, थ् त्र ु ;अ×ठ ़ म्द्ध वेग निभर्र इस बल ने वुफछ महानतम वैज्ञानिक विचारकों का ध्यान आक£षत किया। यदि कोइर् पे्रेक्षक एक ऐसे प्रेफम में पहुँच जाए जहाँ उसका क्षण्िाक वेेग अ हो तो बल का चुंबकीय भाग शून्य हो जाता है। तब आवेश्िात कण की गति यह मानकर समझाइर् जा सकती है कि इस नए प्रेफम में एक उचित विद्युत क्षेत्रा विद्यमान है। इस यांत्रिाकी के विस्तार में हम नहीं जाएँगे। इसके विषय में आप आगे की कक्षाओं में पढ़ेंगे। लेकिन इस बात पर हम शोर देना चाहेंगे कि इस विरोधभास का समाधन इस तथ्य में निहित है कि विद्युत और चुंबकत्व एक - दूसरे से जुड़े हुए प्रक्रम हैं ;विद्युतचुंबकत्वद्ध और लोरेंज बल का व्यंजक, प्रवृफति में किसी सावर्भौम वरीय संदभर् प्रेफम में अंत£नहित नहीं है। 4ण् ऐम्िपयर का परिपथीय नियम, बायो - सावटर् नियम से अलग नहीं है। यह बायो - सावटर् नियम से व्युत्पन्न किया जा सकता है। इसका बायो - सावटर् नियम से वैसा ही संबंध है जैसा कि गाउस नियम का वूॅफलाम नियम से। अभ्यास 4ण्1 तार की एक वृत्ताकार वुंफडली में 100 पेफरे हैं, प्रत्येक की त्रिाज्या 8ण्0 बउ है और इनमें 0ण्40 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। वुंफडली के वेंफद्र पर चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण क्या है? 4ण्2 एक लंबे, सीधे तार में 35 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। तार से 20 बउ दूरी पर स्िथत किसी ¯बदु पर चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण क्या है? 4ण्3 क्षैतिज तल में रखे एक लंबे सीधे तार में 50 । विद्युत धारा उत्तर से दक्ष्िाण की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के पूवर् में 2ण्5 उ दूरी पर स्िथत किसी ¯बदु पर चुंबकीय क्षेत्रा ठ का परिमाण और उसकी दिशा ज्ञात कीजिए। 4ण्4 व्योमस्थ ¯खचे क्षैतिज बिजली के तार में 90 । विद्युत धारा पूवर् से पश्िचम की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के 1ण्5 उ नीचे विद्युत धारा के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण और दिशा क्या है? 4ण्5 एक तार जिसमें 8 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, 0ण्15 ज् के एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में, क्षेत्रा से 30° का कोण बनाते हुए रखा है। इसकी एकांक लंबाइर् पर लगने वाले बल का परिमाण और इसकी दिशा क्या है? 4ण्6 एक 3ण्0 बउ लंबा तार जिसमें 10 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, एक परिनालिका के भीतर उसके अक्ष के लंबवत रखा है। परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्रा का मान 0ण्27 ज् है। तार पर लगने वाला चुंबकीय बल क्या है। 4ण्7 एक - दूसरे से 4ण्0 बउ की दूरी पर रखे दो लंबे, सीधे, समांतर तारों । एवं ठ से क्रमशः 8ण्0 । एवं 5ण्0 । की विद्युत धाराएँ एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही हैं। तार । के 10 बउ खंड पर बल का आकलन कीजिए। 4ण्8 पास - पास पेफरों वाली एक परिनालिका 80 बउ लंबी है और इसमें 5 परतें हैं जिनमें से प्रत्येक में 400 पेफरे हैं। परिनालिका का व्यास 1ण्8 बउ है। यदि इसमें 8ण्0 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है तो परिनालिका के भीतर वेंफद्र के पास चुंबकीय क्षेत्रा ठ के परिमाण परिकलित कीजिए। 4ण्9 एक वगार्कार वुंफडली जिसकी प्रत्येक भुजा 10 बउ है, में 20 पेफरे हैं और उसमें 12 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। वुंफडली ऊध्वार्ध्रतः लटकी हुइर् है और इसके तल पर खींचा गया अभ्िालंब 0ण्80 ज् के एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा से 30° का एक कोण बनाता है। वुंफडली पर लगने वाले बलयुग्म आघूणर् का परिमाण क्या है? 4ण्10 दो चल वुंफडली गैल्वेनोमीटर मीटरों ड1 एवं ड2 के विवरण नीचे दिए गए हैं: त्1 त्र 10 Ωए छ1 त्र 30ए ।1 त्र 3ण्6 × 10दृ3 उ2ए ठ1 त्र 0ण्25 ज् त्2 त्र 14 Ωए छ2 त्र 42ए ।2 त्र 1ण्8 × 10दृ3 उ2ए ठ2 त्र 0ण्50 ज् ;दोनों मीटरों के लिए ¯स्प्रग नियतांक समान हैंद्ध। ;ंद्ध ड2 एवं ड1 की धारा - सुग्राहिताओं, ;इद्ध ड2 एवं ड1 की वोल्टता - सुग्राहिताओं का अनुपात ज्ञात कीजिए। 4ण्11 एक प्रकोष्ठ में 6ण्5 ळ ;1 ळ त्र 10दृ4 ज्द्ध का एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा बनाए रखा गया है। इस चुंबकीय क्षेत्रा में एक इलेक्ट्राॅन 4ण्8×106 उ े दृ1 के वेग से क्षेत्रा के लंबवत भेजा गया है। व्याख्या कीजिए कि इस इलेक्ट्राॅन का पथ वृत्ताकार क्यों होगा? वृत्ताकार कक्षा की त्रिाज्या ज्ञात कीजिए। ;म त्र 1ण्6 ×10दृ19 ब्ए उम त्र 9ण्1×10दृ31 ाहद्ध भौतिकी 4ण्12 प्रश्न 4ण्11 में, वृत्ताकार कक्षा में इलेक्ट्राॅन की परिक्रमण आवृिा प्राप्त कीजिए। क्या यह उत्तर इलेक्ट्राॅन के वेग पर निभर्र करता है? व्याख्या कीजिए। 4ण्13 ;ंद्ध 30 पेफरों वाली एक वृत्ताकार वुंफडली जिसकी त्रिाज्या 8ण्0 बउ है और जिसमें 6ण्0 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, 1ण्0 ज् के एकसमान क्षैतिज चुंबकीय क्षेत्रा में ऊध्वार्धरतः लटकी है। क्षेत्रा रेखाएँ वुंफडली के अभ्िालंब से 60° का कोण बनाती हैं। वुंफडली को घूमने से रोकने के लिए जो प्रतिआघूणर् लगाया जाना चाहिए उसके परिमाण परिकलित कीजिए। ;इद्ध यदि ;ंद्ध में बतायी गइर् वृत्ताकार वुंफडली को उसी क्षेत्रापफल की अनियमित आवृफति की समतलीय वुंफडली से प्रतिस्थापित कर दिया जाए ;शेष सभी विवरण अपरिवतिर्त रहेंद्ध तो क्या आपका उत्तर परिव£तत हो जाएगा? अतिरिक्त अभ्यास 4ण्14 दो समवेंफिक वृत्ताकार वुंफडलियाँ ग् और ल् जिनकी त्रिाज्याएँ क्रमशः 16 बउ एवं 10 बउ हंै, उत्तर - दक्ष्िाण दिशा में समान ऊध्वार्धर तल में अवस्िथत हैं। वुंफडली ग् में 20 पेफरे हैं और इसमें 16 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, वुंफडली ल् में 25 पेफरे हैं और इसमें 18 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। पश्िचम की ओर मुख करके खड़ा एक प्रेक्षक देखता है कि ग् में धारा प्रवाह वामावतर् है जबकि ल् में दक्ष्िाणावतर् है। वुंफडलियों के वेंफद्र पर, उनमें प्रवाहित विद्युत धाराओं के कारण उत्पन्न वुफल चुंबकीय क्षेत्रा का परिमाण एवं दिशा ज्ञात कीजिए। 4ण्15 10 बउ लंबाइर् और 10दृ3 उ2 अनुप्रस्थ काट के एक क्षेत्रा में 100 ळ ;1 ळ त्र 10दृ4 ज्द्ध का एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा चाहिए। जिस तार से परिनालिका का निमार्ण करना है उसमें अिाकतम 15 । विद्युत धारा प्रवाहित हो सकती है और क्रोड पर अिाकतम 1000 पेफरे प्रति मीटर लपेटे जा सकते हैं। इस उद्देश्य के लिए परिनालिका के निमार्ण का विवरण सुझाइए। यह मान लीजिए कि क्रोड लोह - चुंबकीय नहीं है। 4ण्16 प् धारावाही, छ पेफरों और त् त्रिाज्या वाली वृत्ताकार वुंफडली के लिए, इसके अक्ष पर, वेंफद्र से ग दूरी पर स्िथत किसी ¯बदु पर चुंबकीय क्षेत्रा के लिए निम्न व्यंजक है: - प्त् 2छ ठ त्र 0 2 3ध्222;ग ़ त् द्ध ;ंद्ध स्पष्ट कीजिए, इससे वुंफडली के वेंफद्र पर चुंबकीय क्षेत्रा के लिए सुपरिचित परिणाम वैफसे प्राप्त किया जा सकता है। ;इद्ध बराबर त्रिाज्या त्ए एवं पेफरों की संख्या छए वाली दो वृत्ताकार वुंफडलियाँ एक - दूसरे से त् दूरी पर एक - दूसरे के समांतर, अक्ष मिला कर रखी गइर् हैं। दोनों में समान विद्युत धारा एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही है। दशार्इए कि वुंफडलियों के अक्ष के लगभग मध्य¯बदु पर क्षेत्रा, एक बहुत छोटी दूरी के लिए जो कि त् से कम है, एकसमान है और इस क्षेत्रा का लगभग मान निम्न है: - छप् ठ त्र 0ण्72 0 त् ¹बहुत छोटे से क्षेत्रा पर एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा उत्पन्न करने के लिए बनायी गइर् ऊपर व£णत व्यवस्था हेल्महोल्ट्ज वुंफडलियों के नाम से जानी जाती है।ह् 4ण्17 एक टोराॅइड के ;अलौह चुंबकीयद्ध क्रोड की आंतरिक त्रिाज्या 25 बउ और बाह्य त्रिाज्या 26 बउ है। इसके ऊपर किसी तार के 3500 पेफरे लपेटे गए हैं। यदि तार में प्रवाहित विद्युत धारा 11 । हो तो चुंबकीय क्षेत्रा का मान क्या होगा। ;पद्ध टोराॅइड के बाहर ;पपद्ध टोराॅइड के क्रोड में ;पपपद्ध टोराॅइड द्वारा घ्िारी हुइर् खाली जगह में। 4ण्18 निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर दीजिए: ;ंद्ध किसी प्रकोष्ठ में एक ऐसा चुंबकीय क्षेत्रा स्थापित किया गया है जिसका परिमाण तो एक ¯बदु पर बदलता है, पर दिशा निश्िचत है ;पूवर् से पश्िचमद्ध। इस प्रकोष्ठ में एक आवेश्िात कण प्रवेश करता है और अविचलित एक सरल रेखा में अचर वेग से चलता रहता है। आप कण के प्रारंभ्िाक वेग के बारे में क्या कह सकते हैं। ;इद्ध एक आवेश्िात कण, एक ऐसे शक्ितशाली असमान चुंबकीय क्षेत्रा में प्रवेश करता है जिसका परिमाण एवं दिशा दोनों एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु पर बदलते जाते हैं, एक जटिल पथ पर चलते हुए इसके बाहर आ जाता है। यदि यह मान लें कि चुंबकीय क्षेत्रा में इसका किसी भी दूसरे कण से कोइर् संघट्टðनहीं होता तो क्या इसकी अंतिम चाल, प्रारंभ्िाक चाल के बराबर होगी? ;बद्ध पश्िचम से पूवर् की ओर चलता हुआ एक इलेक्ट्राॅन एक ऐसे प्रकोष्ठ में प्रवेश करता है जिसमें उत्तर से दक्ष्िाण दिशा की ओर एकसमान एक वैद्युत क्षेत्रा है। वह दिशा बताइए जिसमें एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा स्थापित किया जाए ताकि इलेक्ट्राॅन को अपने सरल रेखीय पथ से विचलित होने से रोका जा सके। 4ण्19 ऊष्िमत वैफथोड से उत्सजिर्त और 2ण्0 ाट के विभवांतर पर त्वरित एक इलेक्ट्राॅन, 0ण्15 ज् के एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में प्रवेश करता है। इलेक्ट्राॅन का गमन पथ ज्ञात कीजिए यदि चुंबकीय क्षेत्रा ;ंद्ध प्रारंभ्िाक वेग के लंबवत है ;इद्ध प्रारंभ्िाक वेग की दिशा से 30° का कोण बनाता है। 4ण्20 प्रश्न 4ण्16 में व£णत हेल्महोल्टज वंुफडलियों का उपयोग करके किसी लघुक्षेत्रा में 0ण्75 ज् का एकसमान चंुबकीय क्षेत्रा स्थापित किया है। इसी क्षेत्रा में कोइर् एकसमान स्िथरवैद्युत क्षेत्रा वुंफडलियों के उभयनिष्ठ अक्ष के लंबवत लगाया जाता है। ;एक ही प्रकार केद्ध आवेश्िात कणों का 15 ाट विभवांतर पर त्वरित एक संकीणर् किरण पुंज इस क्षेत्रा में दोनों वंुफडलियों के अक्ष तथा स्िथरवैद्युत क्षेत्रा की लंबवत दिशा के अनुदिश प्रवेश करता है। यदि यह किरण पुंज 9ण्0 × 10दृ5 ट उदृ1 ए स्िथरवैद्युत क्षेत्रा में अविक्षेपित रहता है तो यह अनुमान लगाइए कि किरण पुंज में कौन से कण हैं। यह स्पष्ट कीजिए कि यह उत्तर एकमात्रा उत्तर क्यों नहीं है। 4ण्21 एक सीधी, क्षैतिज चालक छड़ जिसकी लंबाइर् 0ण्45 उ एवं द्रव्यमान 60 ह है इसके सिरों पर जुड़े दो ऊध्वार्धर तारों पर लटकी हुइर् है। तारों से होकर छड़ में 5ण्0 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। ;ंद्ध चालक के लंबवत कितना चुंबकीय क्षेत्रा लगाया जाए कि तारों में तनाव शून्य हो जाए। ;इद्ध चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा यथावत रखते हुए यदि विद्युत धारा की दिशा उत्क्रमित कर दी जाए तो तारों में वुफल तनाव कितना होगा? ;तारों के द्रव्यमान की उपेक्षा कीजिएद्ध ह त्र 9ण्8 उ ेदृ2। 4ण्22 एक स्वचालित वाहन की बैटरी से इसकी चालन मोटर को जोड़ने वाले तारों में 300 । विद्युत धारा ;अल्प काल के लिएद्ध प्रवाहित होती है। तारों के बीच प्रति एकांक लंबाइर् पर कितना बल लगता है यदि इनकी लंबाइर् 70 बउ एवं बीच की दूरी 1ण्5 बउ हो। यह बल आकषर्ण बल है या प्रतिकषर्ण बल? 4ण्23 1ण्5 ज् का एक एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा, 10ण्0 बउ त्रिाज्या के बेलनाकार क्षेत्रा में विद्यमान है। इसकी दिशा अक्ष के समांतर पूवर् से पश्िचम की ओर है। एक तार जिसमें 7ण्0 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है इस क्षेत्रा में होकर उत्तर से दक्ष्िाण की ओर गुशरती है। तार पर लगने वाले बल का परिमाण और दिशा क्या है, यदि ;ंद्ध तार अक्ष को काटता हो, ;इद्ध तार छ.ै दिशा से घुमाकर उत्तर पूवर् - उत्तर पश्िचम दिशा में कर दिया जाए, ;बद्ध छ.ै दिशा में रखते हुए ही तार को अक्ष से 6ण्0 बउ नीचे उतार दिया जाए। 171 भौतिकी 4ण्24 ध्नात्मक ्र.दिशा में 3000 ळ का एक एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा लगाया गया है। एक आयताकार लूप जिसकी भुजाएँ 10 बउ एवं 5 बउ और जिसमें 12 । धारा प्रवाहित हो रही है इस क्षेत्रा में रखा है। चित्रा 4ण्28 में दिखायी गइर् लूप की विभ्िान्न स्िथतियों में इस पर लगने वाला बलयुग्म चित्रा 4ण्28 4ण्25 एक वृत्ताकार वुंफडली जिसमें 20 पेफरे हैं और जिसकी त्रिाज्या 10 बउ है, एकसमान चुंबकीय क्षेत्रा में रखी है जिसका परिमाण 0ण्10 ज् है और जो वुंफडली के तल के लंबवत है। यदि वुंफडली में 5ण्0 । विद्युत धारा प्रवाहित हो रही हो तो, ;ंद्ध वुंफडली पर लगने वाला वुफल बलयुग्म आघूणर् क्या है? ;इद्ध वुंफडली पर लगने वाला वुफल परिणामी बल क्या है? ;बद्ध चुंबकीय क्षेत्रा के कारण वुंफडली के प्रत्येक इलेक्ट्राॅन पर लगने वाला वुफल औसत बल क्या है? ;वुंफडली 10दृ5 उ2 अनुप्रस्थ क्षेत्रा वाले ताँबे के तार से बनी है, और ताँबे में मुक्त इलेक्ट्राॅन घनत्व 1029 उदृ3 दिया गया हैद्ध 4ण्26 एक परिनालिका जो 60 बउ लंबी है, जिसकी त्रिाज्या 4ण्0 बउ है और जिसमें 300 पेफरों वाली 3 परतें लपेटी गइर् हैं। इसके भीतर एक 2ण्0 बउ लंबा, 2ण्5 ह द्रव्यमान का तार इसके ;वेंफद्र के निकटद्ध अक्ष के लंबवत रखा है। तार एवं परिनालिका का अक्ष दोनों क्षैतिज तल में हैं। तार को परिनालिका के समांतर दो वाही संयोजकों द्वारा एक बाह्य बैटरी से जोड़ा गया है जो इसमें 6ण्0 । विद्युत धारा प्रदान करती है। किस मान की विद्युत धारा ;परिवहन की उचित दिशा के साथद्ध इस परिनालिका के पेफरों में प्रवाहित होने पर तार का भार सँभाल सकेगी? ह त्र 9ण्8 उ ेदृ2 4ण्27 किसी गैल्वेनोमीटर की वंुफडली का प्रतिरोध् 12 Ω है। 4 उ। की विद्युत धरा प्रवाहित होने पर यह पूणर्स्केल विक्षेप दशार्ता है। आप इस गैल्वेनोमीटर को 0 से 18 ट परास वाले वोल्टमीटर में वैफसे रूपांतरित करेंगे? 4ण्28 किसी गैल्वेनोमीटर की वुंफडली का प्रतिरोध् 15 Ω है। 4 उ। की विद्युत धरा प्रवाहित होने पर यह पूणर्स्केल विक्षेप दशार्ता है। आप इस गैल्वेनोमीटर को 0 से 6 । परास वाले ऐमीटर में वैफसे 172 रूपांतरित करेंगे?

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