अध्याय 2 स्िथरवैद्युत विभव तथा धरिता 2ण्1 भूमिका अध्याय 6 तथा 8 ;कक्षा 11द्ध में स्िथतिज ऊजार् की धारणा से आपको परिचित कराया गया था। जब कोइर् बाह्य बल किसी वस्तु को एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु तक, किसी अन्य बलऋ जैसे - स्िंप्रग बल, गुरुत्वीय बल आदि के विरु(, ले जाता है, तो उस बाह्य बल द्वारा किया गया कायर् उस वस्तु में स्िथतिज ऊजार् के रूप में संचित हो जाता है। जब बाह्य बल हटा लिया जाता है तो वस्तु गति करने लगती है और वुफछ गतिज ऊजार् अजिर्त कर लेती है, तथा उस वस्तु की उतनी ही स्िथतिज ऊजार् कम हो जाती है। इस प्रकार वस्तु की स्िथतिज ऊजार् तथा गतिज ऊजार् का योग संरक्ष्िात रहता है। इस प्रकार के बलों को संरक्षी बल कहते हैं। स्िंप्रग बल तथा गुरुत्वाकषर्ण बल संरक्षी बल के उदाहरण हैं। गुरुत्वाकषर्ण बल की भाँति दो स्िथर आवेशों के बीच लगने वाला वूफलाॅम बल भी संरक्षी बल होता है। यह कोइर् आश्चयर् की बात नहीं है, क्योंकि गण्िातीय रूप में यह बल गुरुत्वाकषर्ण बल के समान हैऋ दोनों में दूरी की व्युत्क्रम वगर् निभर्रता है और प्रमुख रूप से आनुपातिकता स्िथरांक में भ्िान्नता है। गुरुत्वाकषर्ण नियम की संहतियाँ वूफलाॅम नियम में आवेशों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती हैं। इस प्रकार, गुरुत्वीय क्षेत्रा में संहतियों की स्िथतिज ऊजार् की ही भाँति हम किसी स्िथरवैद्युत क्षेत्रा में आवेश की स्िथरवैद्युत स्िथतिज ऊजार् को परिभाष्िात कर सकते हैं। आवेश विन्यास के कारण किसी स्िथरवैद्युत क्षेत्रा म् पर विचार कीजिए। सरलता की दृष्िट से पहले मूल ¯बदु पर स्िथत किसी आवेश फ के कारण क्षेत्रा म् पर विचार करते हैं। कल्पना कीजिए कि हम कोइर् परीक्षण आवेश ु को आवेश फ के कारण आवेश ु पर लगे प्रतिकषीर् बल के विरु(, ¯बदु त् से ¯बदु च् तक लाते हैं। चित्रा 2ण्1 के संदभर् में ऐसा तभी होगा जब फ तथा ु दोनों धनात्मक हों अथवा दोनों )णात्मक हों। सुनिश्िचत करने के लिए, हम फए ु झ 0 मानते हैं। भौतिकी चित्रा 2ण्1 एक परीक्षण आवेश ु ;झ0द्ध मूल ¯बदु पर स्िथत आवेश फ ;झ0द्ध के कारण उस पर लगे प्रतिकषीर् बल के विरु( ¯बदु त् से ¯बदु च् तक ले जाया जाता है। यहाँ दो टिप्पण्िायाँ की जा सकती हैं। पहली, हम यह मानते हैं कि परीक्षण आवेश ु इतना छोटा है कि यह मूल विन्यास को विक्षुब्ध नहीं करता, यानी मूल ¯बदु पर स्िथत आवेश फ को विक्षुब्ध नहीं करता ;अन्यथा हम किसी अनिदिर्ष्ट बल द्वारा आवेश फ को मूल ¯बदु पर दृढ़ करेंद्ध। दूसरी, आवेश ु को त् से च् तक लाने के लिए हम एक बाह्य बल थ्मगज आरोपित करते हैं जो प्रतिकषीर् वैद्युत बल थ्म् ;अथार्त थ्मगजत्र दृथ्म्द्ध को यथातथ्य प्रभावहीन कर देता है। इसका अथर् यह हुआ कि जब आवेश ु को त् से च् तक लाते हैं तो उस पर कोइर् नेट बल अथवा त्वरण कायर् नहीं करता - इसे अत्यंत धीमी नियत चाल से लाया जाता है। इस स्िथति में, बाह्य बल द्वारा आवेश पर किया गया कायर् वैद्युत बल द्वारा किए गए कायर् का )णात्मक होता है, तथा पूणर्तः आवेश ु की स्िथतिज ऊजार् के रूप में संचित हो जाता है। यदि च् पर पहुँच कर बाह्य बल को हटा दिया जाए तो वैद्युत बल आवेश ु को फ से दूर भेज देगा - च् पर संचित ऊजार् ;स्िथतिज ऊजार्द्ध आवेश ु को गतिज ऊजार् प्रदान करने में खचर् हो जाती है तथा यह इस ढंग से होता है कि गतिज ऊजार् तथा स्िथतिज ऊजार् का योग संरक्ष्िात रहता है। इस प्रकार बाह्य बल द्वारा किसी आवेश ु को ¯बदु त् से च् तक ले जाने में किया गया कायर् च् ॅत्च् त्र थ्मगज कत त् च् − थ् कतत्र म् ;2ण्1द्ध त् यह कायर् स्िथरवैद्युत प्रतिकषीर् बल के विरु( किया गया है, तथा यह स्िथतिज ऊजार् के रूप में संचित हो जाता हैै। विद्युत क्षेत्रा के प्रत्येक ¯बदु पर ु आवेश के, किसी कण में एक निश्िचत स्िथरवैद्युत स्िथतिज ऊजार् होती है तथा कण पर किया गया यह कायर् इसकी स्िथतिज ऊजार् में इतनी वृि कर देता है जो त् तथा च् ¯बदुओं के बीच स्िथतिज ऊजार् के अंतर के बराबर है। इस प्रकार, स्िथतिज ऊजार् अंतर Δन् त्र न् − न् त्र ॅ ;2ण्2द्धच्त् त्च् ;ध्यान दीजिए, यहाँ पर यह विस्थापन विद्युत बल के विपरीत है, इसलिए विद्युत क्षेत्रा द्वारा किया गया कायर् )णात्मक है, अथार्त दृॅत्च्द्ध अतः, दो ¯बदुओं के बीच स्िथरवैद्युत स्िथतिज ऊजार् अंतर को हम इस प्रकार परिभाष्िात करते हैं - किसी यादृच्िछक आवेश विन्यास के विद्युत बल क्षेत्रा में यह अंतर आवेश ु को एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु तक ;बिना त्वरित किएद्ध ले जाने के लिए आवश्यक बाह्य बल द्वारा किए जाने वाले न्यूनतम कायर् के बराबर होता है। इस घटनाक्रम में दो महत्वपूणर् टिप्पण्िायाँ की जा सकती हैं - ;पद्ध समीकरण ;2ण्2द्ध का दायाँ पक्ष केवल आवेश की आरंभ्िाक तथा अंतिम स्िथतियों पर निभर्र करता है। इसका अथर् यह है कि किसी स्िथरवैद्युत क्षेत्रा द्वारा किसी आवेश को एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु तक ले जाने में किया गया कायर् केवल आरंभ्िाक तथा अंतिम स्िथतियों ;¯बदुओंद्ध पर निभर्र करता है, उस पथ पर निभर्र नहीं करता जिससे होकर वह आवेश एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु तक जाता है ;चित्रा 2ण्2द्ध। यह किसी संरक्षी बल का मूल अभ्िालक्षण है। स्िथतिज ऊजार् की धारणा अथर्पूणर् नहीं रहेगी, यदि किया गया कायर् पथ पर निभर्र हो जाएगा। किसी स्िथरवैद्युत क्षेत्रा द्वारा किए गए कायर् का पथ पर निभर्र न होना वूफलाॅम के नियम द्वारा सि( किया जा 52 सकता है। इसकी उपपिा हम यहाँ छोड़ रहे हैं। ;पपद्ध समीकरण ;2ण्2द्ध स्िथतिज ऊजार् अंतर की परिभाषा भौतिकी के नियमों के अनुसार अथर्पूणर् राश्िा कायर् के पदों में करती है। स्पष्टतः, इस प्रकार परिभाष्िात स्िथतिज ऊजार् किसी योज्यता स्िथरांक के अंतगर्त अनिश्िचत होती है। इसका यह अथर् है कि स्िथतिज ऊजार् का वास्तविक मान भौतिक रूप से महत्वपूणर् नहीं होताऋ केवल स्िथतिज ऊजार् के अंतर का ही महत्त्व होता है। हम सदैव ही कोइर् यादृच्िछक स्िथरांक α हर ¯बदु पर स्िथतिज ऊजार् के साथ जोड़ सकते हैं, क्योंकि इससे स्िथतिज ऊजार् अंतर के मान में कोइर् परिवतर्न नहीं होगा: ;न् ़αद्ध − ;न् ़αद्ध त्र न् − न्च् त्च्त् इसे इस प्रकार से भी व्यक्त कर सकते हैं: स्िथतिज ऊजार् को किस ¯बदु पर शून्य मानें, इस ¯बदु के चयन की स्वतंत्राता होती है। एक सुविधजनक चयन यह है कि हम अनंत पर स्िथरवैद्युत स्िथतिज ऊजार् को शून्य मानें। इस चयन के अनुसार यदि हम ¯बदु त् को अनंत पर लें, तब समीकरण ;2ण्2द्ध से हमें प्राप्त होता है: ॅ त्र न् − न् त्र न् ;2ण्3द्ध∞च्च् ∞ च् चूँकि यहाँ पर ¯बदु च् यादृच्िछक है, समीकरण ;2ण्3द्ध से हमें किसी ¯बदु पर आवेश ु की स्िथतिज ऊजार् की परिभाषा प्राप्त होती है - किसी ¯बदु पर आवेश ु की स्िथतिज ऊजार् ;किसी आवेश विन्यास के कारण क्षेत्रा की उपस्िथति मेंद्ध बाह्य बल ;वैद्युत बल के समान तथा विपरीतद्ध द्वारा आवेश ु को अनंत से उस ¯बदु तक ले जाने में किए गए कायर् के बराबर होती है। 2ण्2 स्िथरवैद्युत विभव किसी व्यापक स्िथर आवेश विन्यास पर विचार कीजिए। हमने किसी परीक्षण आवेश ु पर स्िथतिज ऊजार् को किए गए कायर् के पदों में परिभाष्िात किया था। यह कायर् स्पष्ट रूप से ु के अनुक्रमानुपाती है, चूँकि आवेश ु पर किसी भी ¯बदु पर ु म् बल कायर् करता है, यहाँ म् आवेश विन्यास के कारण उस ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा है। अतः किए गए कायर् को आवेश ु से विभाजित करना सुविधाजनक होता है, क्योंकि परिणामस्वरूप जो राश्िा प्राप्त होती है वह ु पर निभर्र नहीं करती। दूसरे शब्दों में, प्रति एकंाक आवेश पर किया गया कायर् आवेश विन्यास से संब( विद्युत क्षेत्रा का अभ्िालाक्षण्िाक गुण होता है। इससे हमें दिए गए आवेश विन्यास के कारण स्िथरवैद्युत विभव ट की धारणा प्राप्त होती है। समीकरण ;2ण्1द्ध से हमें प्राप्त होता है - बाह्य बल द्वारा किसी एकांक धनावेश को ¯बदु त् से च् तक लाने में किया गया कायर् न् − न्च्त्त्र टदृ टत्र च् त् ु काॅन्ते एलेस्सैंद्रो वोल्टा ;1745 दृ 1827द्ध इटालियन भौतिकीविद, पविया में प्रोप़ेफसर थे। वोल्टा ने यह स्थापित किया कि लुइगी गैल्वनी1737दृ1798ए द्वारा, दो असमान धतुओं के संपवर्फ में लटके मेंढक के मांसपेशीय ऊतकों में देखी गइर् ‘जैव विद्युत’ जैव ऊतकों का कोइर् विश्िाष्ट गुण नहीं है, बल्िक, तब भी उत्पन्न हो जाती है जब कोइर् गीली वस्तु दो असमान धतुओं के बीच रखी जाती है। इससे उन्होंने प्रथम, वोल्टीय पुंज या बैटरी का विकास किया जिसमें धतु की चकतियों ;विद्युदाग्रोंद्ध के बीच गत्ते की नम चकतियाँ ;विद्युत अपघट्यद्ध रखकर एक बड़ा पुंज बनाया था। ;2ण्4द्ध यहाँ टच् तथा टत् क्रमशः ¯बदु च् तथा त् के स्िथरवैद्युत विभव हैं। ध्यान दीजिए, यहाँ भी पहले की भाँति विभव का वास्तविक मान उतना महत्वपूणर् नहीं होता जितना कि भौतिक नियमों के अनुसार विभवांतर महत्वपूणर् होता है। यदि पहले की भाँति, हम अनंत पर विभव को शून्य चुनें ;मानेंद्ध, तब समीकरण ;2ण्4द्ध से यह उपलक्ष्िात होता है कि - बाह्य बल द्वारा किसी एकांक धनावेश को अनंत से किसी ¯बदु तक लाने में किया गया 53कायर् त्र उस ¯बदु पर स्िथरवैद्युत विभव ;टद्ध भौतिकी दूसरे शब्दों में, स्िथरवैद्युत क्षेत्रा के प्रदेश के किसी ¯बदु पर स्िथरवैद्युत विभव ;ट द्ध वह न्यूनतम कायर् है जो किसी एकांक धनावेश को अनंत से उस ¯बदु तक लाने में किया जाता है। स्िथतिज ऊजार् के विषय में पहले की गइर् विशेष टिप्पणी विभव की परिभाषा पर भी लागू होती है। प्रति एकांक परीक्षण आवेश पर किया गया कायर् ज्ञात करने के लिए हमें अत्यल्प परीक्षण आवेश δु लेना होता है, इसे अनंत से उस ¯बदु तक लाने में किया गया कायर् δॅ ज्ञात करके δॅ ध्δु अनुपात का मान निधार्रित करना होता है। साथ ही पथ के प्रत्येक ¯बदु पर बाह्य बल उस ¯बदु पर परीक्षणचित्रा 2ण्2 किसी आवेश विन्यास के कारण स्िथरवैद्युत क्षेत्रा द्वारा परीक्षण आवेश ु पर किया गया कायर् पथ पर निभर्र आवेश पर लगने वाले स्िथरवैद्युत बल के बराबर तथा विपरीत होना नहीं करता, यह केवल अंतिम तथा आरंभ्िाक स्िथतियों पर चाहिए। निभर्र करता है। 2ण्3 ¯बदु आवेश के कारण विभव मूल ¯बदु पर स्िथत किसी ¯बदु आवेश फ पर विचार कीजिए ;चित्रा 2ण्3द्ध। सुस्पष्टता की दृष्िट से फ को धनात्मक लीजिए। हम ¯बदु च् पर मूल ¯बदु से स्िथति सदिश त के साथ विभव निधार्रित करना चाहते हैं। इसके लिए हमें एकांक धनावेश को अनंत से उस ¯बदु तक लाने में किया गया कायर् परिकलित करना चाहिए। फ झ 0 के लिए, परीक्षण आवेश पर प्रतिकषर्ण बल के विरु( किया गया कायर् धनात्मक होता है। चूँकि किया गया कायर् पथ पर निभर्र नहीं करता, हम अनंत से ¯बदु च् तक अरीय दिशा के अनुदिश कोइर् सुगम पथ का चयन करते हैं। पथ के किसी मध्यवतीर् ¯बदु च्′ पर, किसी एकांक धनावेश पर स्िथरवैद्युत बल चित्रा 2ण्3 आवेश फ के कारण ¯बदु च् पर विभव, किसी फ × 1 त६′एकाक धनात्मक परीक्षण आवेश को, आवेशंफ 2 ;2ण्5द्ध4πε त श् ;फ झ 0द्ध के कारण प्रतिकषर्ण बल के विरु(, अनंत से व यहाँ त६श्ए व्च्′ के अनुदिश कोइर् एकांक सदिश है। इस बल के विरु(¯बदु च् तक लाने में किए गए कायर् के बराबर होता है। त ′ से त ′ ़ Δत ′ तक एकांक धनावेश को ले जाने में किया गया कायर् - फΔॅ त्र− Δत ′ 2 ;2ण्6द्ध4πε त श् व यहाँ )णात्मक चिÉ यह दशार्ता है कि Δ त ′ ढ 0ए तथा Δॅ धनात्मक है। समीकरण ;2ण्6द्ध को त ′ त्र ∞ से त ′ त्र त तक समाकलित करने पर बाह्य बल द्वारा किया गया वुफल कायर् ;ॅ द्ध प्राप्त होगा। तफतफ फॅ त्र− कत ′त्र त्र ;2ण्7द्ध∫ 2 ∞ 4πε वत′ 4πε वत ′ ∞ 4πε वत परिभाषा के अनुसार यह आवेश फ के कारण च् पर विभव है अतः फटत ;द्ध त्र54 ;2ण्8द्ध4πε त व समीकरण ;2ण्8द्ध आवेश फ के किसी भी चिÉ के लिए सत्य है यद्यपि हमने इस संबंध की व्युत्पिा के समय फ झ 0 माना था। फ ढ 0ए ट ढ 0 के लिए, अथार्त् अनंत से उस ¯बदु तक एकांक परीक्षण धनावेश को लाने के लिए किया गया कायर् ;बाह्य बल द्वाराद्ध )णात्मक है। यह इस कथन के तुल्य है कि एकांक धनावेश को अनंत से ¯बदु च् तक लाने में स्िथरवैद्युत बल द्वारा किया गया कायर् धनात्मक है ¹यह ऐसा ही है जैसा कि होना चाहिए, चूँकि फ ढ 0 के लिए, एकांक धनावेश पर बल आकषीर् है, अतः स्िथरवैद्युत बल तथा विस्थापन ;अनंत से च् तकद्ध दोनों एक ही दिशा में हैंह्। अंत में यदि चित्रा 2ण्4 किसी ¯बदु आवेश फ के लिए दूरी त में परिवतर्न के साथ विभव में हम समीकरण ;2ण्8द्ध पर ध्यान दें, तो पाते हैं कि परिवतर्न ;फध्4πε0द्ध उदृ1 के मात्राकों में ;नीला वक्रद्ध तथा दूरी त में परिवतर्न यह समीकरण हमारे उस चयन से मेल खाता है के साथ विद्युत क्षेत्रा में परिवतर्न ;फध्4πε0द्ध उदृ2 काला वक्र। जिसमें हमने अनंत पर विभव को शून्य माना था। चित्रा ;2ण्4द्ध में यह दशार्या गया है कि किस प्रकार स्िथरवैद्युत विभव ; ∝ 1ध्तद्ध तथा स्िथरवैद्युत क्षेत्रा ; 1ध्त 2 द्ध दूरी त के साथ परिव£तत होते हैं।∝−71 फ 4 × 10 ब्9 2दृ2 त्रत्र 4πε वत 2ण्4 वैद्युत द्विध्ु्रव के कारण विभव जैसा कि हम पिछले अध्याय में जान ही चुके हैं कि वैद्युत द्विध्रुव दो ¯बदु आवेशों ु तथा −ु से मिलकर बनता है तथा इन आवेशों के बीच ;लघुद्ध पृथकन 2ं होता है। इसका वुफल आवेश शून्य होता है तथा यह द्विध्रुव सदिश च जिसका परिमाण ु× 2ं तथा दिशा दृु से ु के अनुदिश होती है, के अभ्िालाक्षण्िाक गुण द्वारा प्रकट किया जाता है ;चित्रा 2ण्5द्ध। हमने यह भी देखा कि किसी 55¯बदु पर वैद्युत द्विधु्रव का स्िथति सदिश त सहित विद्युत क्षेत्रा मात्रा त के परिमाण पर ही निभर्र नहीं भौतिकी करता वरन् त तथा च के बीच के कोण पर भी निभर्र करता है। साथ ही, वैद्युत क्षेत्रा की तीव्रता, अिाक दूरियों पर, 1ध्त 2 के अनुसार नहीं घटती ;जो एकल आवेश के कारण विद्युत क्षेत्रा के लिए प्ररूपी हैद्ध वरन् 1ध्त 3 के अनुसार घटती है। यहाँ हम किसी द्विध्रुव के कारण वैद्युत विभव का निधार्रण करेंगे तथा इसकी तुलना एक आवेश के कारण विभव से करेंगे। पहले की ही भांति, हम द्विध्रुव के वेंफद्र को मूल ¯बदु पर रखते हैं। अब हम यह जानते हैं कि विद्युत क्षेत्रा अध्यारोपण सि(ांत का पालन करते हैं। चूँकि विभव विद्युत क्षेत्रा द्वारा किए गए कायर् से संबंिात है, स्िथरवैद्युत विभव भी अध्यारोपण सि(ांत का पालन करता है। इस प्रकार किसी वैद्युत द्विध्रुव के कारण विभव आवेशों ु तथा दृु के कारण विभवों का योग होता है।चित्रा 2ण्5 द्विध्रुव के कारण विभव के परिकलन में सम्िमलित राश्िायाँ। 1 ुुट त्र− ;2ण्9द्ध4πε तत व 12 यहाँ त1 तथा त2 ¯बदु च् की क्रमशः ु तथा दृु से दूरियाँ हैं। अब, ज्यामिति द्वारा 222 त1 त्र त ़ ं − 2ंत बवेθ 222 त2 त्र त ़ ं ़2ंत बवेθ ;2ण्10द्ध हम त को ं की तुलना में अत्यिाक बड़ा ;त झझ ंद्ध मानते हैं तथा केवल ंध्त के प्रथम कोटि के पदों को ही सम्िमलित करते हैं: 2 22ं बवे θ ं 2 त त्र त 1 −़12 तत 22ं बवे θ ≅ त 1 − ;2ण्11द्धत इसी प्रकार, 2 22ं बवे θ त2 ≅ त 1़ ;2ण्12द्धत द्विपद समीकरण का उपयोग करके ंध्त के प्रथम कोटि के पदों को सम्िमलित करने पर − 1ध्2 11 2ं बवे θ 1 ं ≅ 1 −≅ 1़ बवे θ ख्2ण्13;ंद्ध,ततत तत1 − 1ध्2 11 2ं बवे θ 1 ं ≅ 1 ़≅ 1 − बवे θ ख्2ण्13;इद्ध,ततत तत2 समीकरणों ;2ण्9द्ध तथा ;2ण्13द्ध तथा च त्र 2ुं का उपयोग करने पर, ु 2ंबवे θ च बवे θ ट त्रत्र 2 2 ;2ण्14द्ध4πε त 4πε त वव 56 अब, च बवेθ त्र यहाँ त६स्िथति सदिश व्च् के अनुदिश एकांक सदिश है। तब किसी द्विध्ु्रव का वैद्युत विभव 1 ६चतट त्र 2य ;त झझ ंद्ध ;2ण्15द्ध4πε त व जैसा कि संकेत दिया गया है, समीकरण ;2ण्15द्ध केवल उन दूरियों के लिए जो द्विधु्रव के आकार की तुलना में अत्यिाक बड़ी हैं, जिसके कारण ंध्त के उच्च कोटि के पदों की नगण्य मानकर उपेक्षा कर दी गइर् है, ही सन्िनकटतः सत्य है। परंतु, किसी ¯बदु द्विध्रुव च के लिए मूल ¯बदु पर समीकरण ;2ण्15द्ध यथाथर् है। समीकरण ;2ण्15द्ध से, द्विध्रुव अक्ष ;θ त्र 0ए πद्ध पर विभव 1 चट त्र± 2 ;2ण्16द्ध4πε त व ;ध्नात्मक चिÉ θ त्र 0 के लिए तथा )णात्मक चिÉ θ त्र π के लिए हैद्ध। निरक्षीय ;विषुवतद्ध समतल ;θ त्र πध्2द्ध में विभव शून्य है। किसी द्विधु्रव के वैद्युत विभव तथा एकल आवेश के वैद्युत विभव के तुलनात्मक महत्वपूणर् लक्षण समीकरणों ;2ण्8द्ध तथा ;2ण्15द्ध से स्पष्ट हैं: ;पद्ध किसी वैद्युत द्विधु्रव के कारण विभव केवल दूरी त पर ही निभर्र नहीं करता, वरन् स्िथति सदिश त तथा द्विध्रुव आघूणर् च के बीच के कोण पर भी निभर्र करता है। ;तथापि यह च के परितः अक्षतः सममित होता है। अतः यदि आप च के परितः स्िथति सदिश त को, कोण θ को नियत रखते हुए, घूणर्न कराएँ, तो ¯बदुच् के सदृश घूणर्न के पफलस्वरूप बने शंवुफ पर ¯बदुओं पर वही विभव होगा जो ¯बदु च् पर है।द्ध ;पपद्ध अिाक दूरियांे पर वैद्युत द्विध्रुव के कारण विभव 1ध्त 2 के अनुपात में घटता है, न कि 1ध्त के अनुपात में, जो कि एकल आवेश के कारण विभव का एक अभ्िालाक्षण्िाक गुण है। ;इसके लिए आप चित्रा 2ण्4 में दशार्ए त व 1ध्त2 तथा 1ध्त व त के बीच वक्रों का उल्लेख कर सकते हैं जिन्हें किसी अन्य संदभर् में खींचा गया हैद्ध। 2ण्5 आवेशों के निकाय के कारण विभव किसी आवेशों ु1ए ु2ए३ए ुद के ऐसे निकाय पर विचार कीजिए जिनके किसी मूल ¯बदु के सापेक्ष स्िथति सदिश क्रमशः त1ए त2ए३ए त द हैं ;चित्रा 2ण्6द्ध। ¯बदु च् पर आवेश ु1 के कारण विभव 1 ु1ट त्र 1 4πε वत1च् यहाँ त1च् ¯बदु च् तथा आवेश ु1 के बीच की दूरी है। इसी प्रकार ¯बदु च् पर आवेश ु2 के कारण विभव ट2 तथा आवेश ु3 के कारण विभव ट3 को भी व्यक्त कर सकते हैं 1 ु21 ु3ट त्र ट त्र 2 ए 34πε त 4πε त व 2च् व 3च् यहाँ ततथा त ¯बदु च् की क्रमशः ु तथा ु से दूरियाँ हैं। इसी2च् 3च् 23प्रकार हम अन्य आवेशों के कारण ¯बदु च् पर विभव व्यक्त कर सकते हैं। अध्यारोपण सि(ांत के अनुसार, समस्त आवेश विन्यास चित्रा 2ण्6 किसी ¯बदु पर आवेशों के निकाय के कारण विभव के कारण ¯बदु च् पर विभव टए विन्यास के व्यष्िटगत आवेशों के उस ¯बदु पर व्यष्िटगत आवेशों के कारण विभवों के योग केविभवों के बीजगण्िातीय योग के बराबर होता है: बराबर होता है। 57ट त्र ट़ ट़ ण्ण्ण् ़ ट ;2ण्17द्ध1 2 दभौतिकी 1 ुु ु12 द त्र ़़ ण्ण्ण्ण्ण्ण् ़ ;2ण्18द्ध4πε तत त व 1च् 2च् दच् यदि हमारे पास आवेश घनत्व ρ के अभ्िालाक्षण्िाक गुण का कोइर् संतत आवेश वितरण है तो पहले की भाँति उसे हम Δअ साइश के ρΔअ आवेशयुक्त लघु आयतन अवयवों में विभाजित कर सकते हैं। तब हम प्रत्येक आयतन अवयव के कारण विभव निधार्रित करके और समस्त योगदानों का योग करके ;सही शब्दों में, समाकलित करकेद्ध समस्त आवेश वितरण के कारण विभव ज्ञात कर सकते हैं। अध्याय 1 में हम अध्ययन कर चुके हैं कि किसी एकसमान आवेश्िात गोलीय खोल के कारण किसी बाहर स्िथत ¯बदु के लिए विद्युत क्षेत्रा इस प्रकार होता है, मानो खोल का समस्त आवेश उसके वेंफद्र पर संवेंफदि्रत हो। अतः खोल के बाहर स्िथत किसी ¯बदु पर आवेश्िात कोश के कारण विभव 1 ुट त्र ;त ≥ त्द्ध ख्2ण्19;ंद्ध,4πε त व यहाँ ु गोलीय खोल पर समस्त आवेश तथा त् गोलीय कोश की त्रिाज्या है। कोश के भीतर विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। इससे यह ध्वनित होता है ;देख्िाए अनुभाग 2ण्6द्ध कि खोल के भीतर विभव नियत रहता है ;क्योंकि खोल के भीतर आवेश को गति कराने से कोइर् कायर् नहीं होताद्ध, और, इसीलिए यह खोल के पृष्ठ के विभव के समान होता है। 1 ुट त्र ख्2ण्19;इद्ध,4πε त् व 58 अथवा ग त्र 45 बउ इस प्रकार, धनावेश से 9 बउ तथा 45 बउ दूर )णावेश की ओर वैद्युत विभव शून्य है। ध्यान दीजिए, यहाँ परिकलनों के लिए वांछित सूत्रा को अनंत पर वैद्युत विभव शून्य मानकर ही व्युत्पन्न किया गया था। वैद्युत विभव, समविभव पृष्ठीजजचरूध्ध्अपकमवण्उपजण्मकनध्ूंजबीध्4.मसमबजतवेजंजपब.चवजमदजपंस.मसमबजतपब.मदमतहल.मअबवदेमतअंजपअम.पिमसक.मुनपचवजमदजपंस.ेनतंिबमे.12584ध् 59 भौतिकी चित्रा 2ण्9 किसी एकल आवेश ु के लिए ;ंद्ध समविभव पृष्ठ संवेंफद्री गोलीय पृष्ठ होते हैं जिनके वेंफद्र पर आवेश स्िथत होता है, तथा ;इद्ध यदि ु झ 0 है, तो क्षेत्रा रेखाएँ आवेश से आरंभ होने वाली अरीय रेखाएँ होती हैं। 2ण्6 समविभव पृष्ठ कोइर् समविभव पृष्ठ ऐसा पृष्ठ होता है जिसके पृष्ठ के हर ¯बदु पर विभव नियत रहता है। किसी एकल आवेश ु के लिए, समीकरण ;2ण्8द्ध द्वारा वैद्युत विभव - 1 ुट त्र 4πε त व इससे यह प्रकट होता है कि यदि त नियत है तो ट नियत रहता है। इस प्रकार किसी एकल आवेश के लिए समविभव पृष्ठ संवेंफद्री गोले होते हैं जिनके वेंफद्र पर वह आवेश स्िथत होता है। अब किसी एकल आवेश ु के लिए विद्युत क्षेत्रा रेखाएँ आवेश से आरंभ होने वाली अथवा उस आवेश पर समाप्त होने वाली ;यह निभर्र करता है कि आवेश ु धनात्मक है अथवा )णात्मकद्ध अरीय रेखाएँ होती हैं। स्पष्ट है, किसी समविभव पृष्ठ के किसी भी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा सदैव ही उस ¯बदु पर अभ्िालंबवत होता है। यह व्यापक रूप से सत्य है: किसी भी आवेश विन्यास के लिए किसी भी ¯बदु से गुजरने वाला समविभव पृष्ठ उस ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा के अभ्िालंबवत होता है। इस प्रकथन की व्युत्पिा सरल है। यदि विद्युत क्षेत्रा समविभव पृष्ठ के अभ्िालंबवत नहीं हैऋ तो इस क्षेत्रा का पृष्ठ के अनुदिश कोइर् शून्येतर घटक होगा। किसी एकांक परीक्षण आवेश का क्षेत्रा के इस घटक की विरु( दिशा में गति कराने के लिए वुफछ कायर् करना आवश्यक होगा। परंतु यह किसी समविभव पृष्ठ की परिभाषा के विरु( है: समविभव पृष्ठ के किन्हीं भी दो ¯बदुओं के बीच कोइर् विभवांतर नहीं होता, तथा इस पृष्ठ पर किसी परीक्षण आवेश को गति कराने के लिए कोइर् कायर् करना आवश्यक नहीं होता। अतः किसी समविभव पृष्ठ के सभी ¯बदुओं पर विद्युत क्षेत्रा पृष्ठ के अभ्िालंबवत होता है। समविभव पृष्ठ किसी आवेश विन्यास के चारों ओर की विद्युत क्षेत्रा रेखाओं के दृश्यों के वैकल्िपक दृश्य प्रस्तुत करते हैं। किसी अक्ष के अनुदिश, मान लीजिए ग.अक्ष के अनुदिश किसी एकसमान विद्युत क्षेत्रा म् के लिए, समविभव पृष्ठ ग.अक्ष के अभ्िालंबवत, अथार्त ल.्र तल के समांतर तल होते हैं ;चित्रा 2ण्10द्ध। चित्रा 2ण्11 में ;ंद्ध किसी वैद्युत द्विध्ु्रव तथा ;इद्ध में दो सवर्सम ध्नावेशों के कारण चित्रा 2ण्11;ंद्ध किसी वैद्युत द्विधु्रव तथा 60 ;इद्ध दो सवर्सम ध्नावेशों के क्षेत्रा के लिए वुफछ समविभव पृष्ठ। 2ण्6ण्1 विद्युत क्षेत्रा तथा वैद्युत विभव में संबंध् एक - दूसरे के पास रखे दो समविभव पृष्ठों । तथा ठ ;चित्रा2ण्12द्ध जिनके विभवों के मान क्रमशः ट तथा ट ़ δट हैं, यहाँ δट विद्युत क्षेत्रा म् की दिशा में ट में परिवतर्न है। मान लीजिए पृष्ठ ठ पर कोइर् ¯बदु च् है। मान लीजिए पृष्ठ । की ¯बदु च् से लंबवत दूरी δस है। यह भी मानिए कि विद्युत क्षेत्रा के विरु( कोइर् एकांक ध्नावेश इस लंब के अनुदिश पृष्ठ ठ से पृष्ठ । पर ले जाया जाता है। इस प्रिया में किया गया कायर् द्यम्द्यδ स है। यह कायर् विभवांतर ट। दृटठ के बराबर है। इस प्रकार द्यम्द्यδ स त्र ट − ;ट ़δट द्धत्र दृδट अथार्तद्यम्द्यत्र ;2ण्20द्ध स्पष्ट है कि δ ट )णात्मक है, δट त्र दृ द्यδटद्य हम समीकरण ;2ण्20द्ध को दुबारा इस प्रकार लिख सकते हैं: चित्रा 2ण्12 विभव से क्षेत्रा पर। δटδट म् त्र− त्ऱ ;2ण्21द्धδस δस δट इस प्रकार हम विद्युत क्षेत्रा तथा वैद्युत विभव से संबंिात दो महत्वपूणर् निष्कषो± पर पहुँचते हैं - δस ;पद्ध विद्युत क्षेत्रा उस दिशा में होता है जहाँ विभव में सवार्िाक ”ास होता है। ;पपद्ध किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा का परिमाण, उस ¯बदु पर समविभव पृष्ठ के अभ्िालंबवत विभव के परिमाण में प्रति एकांक विस्थापन परिवतर्न द्वारा व्यक्त किया जाता है। 2ण्7 आवेशों के निकाय की स्िथतिज ऊजार् पहले हम एक सरल प्रकरण पर विचार करते हैं जिसमें किसी मूल ¯बदु के सापेक्ष त1 तथा त2 स्िथति सदिशों वाले दो आवेश ु1 तथा ु2 हैं। आइए इस विन्यास के निमार्ण में किए गए कायर् ;बाह्यद्ध का परिकलन करें। इसका अथर् यह है कि पहले आरंभ में हम दोनों आवेशों ु1 तथा ु2 को अनंत पर मानें तथा बाद में बाह्य एजेंसी द्वारा उन्हें इनकी वतर्मान स्िथतियों तक लाने में किए गए कायर् का परिकलन करें। मान लीजिए, हम पहले आवेश ु1 को अनंत से ¯बदु त1 तक लाते हैं। चूँकि इस स्िथति में कोइर् बाह्य क्षेत्रा नहीं है, जिसके विरु( कायर् करने की आवश्यकता पड़े, अतःु1 को अनंत से त1 तक लाने में किया गया कायर् शून्य है। यह आवेश दिव्फस्थान में एक विभव ट1 उत्पन्न करता है 1 ु1ट त्र 1 4πε त व 1च् यहाँ त1च् दिव्फस्थान के किसी ¯बदु च् की ु1 की स्िथति से दूरी है। विभव की परिभाषा से, आवेश ु को अनंत से ¯बदु ततक लाने में किया गया कायर् त पर ुद्वारा विभव का ु22 21 2 गुना होता है - 1 ुु पर किया गया कायर् त्र 12 ु2 4πε वत12 61 भौतिकी चित्रा 2ण्13 आवेशों ु1 तथा ु2 के निकाय की स्िथतिज ऊजार् आवेशों के गुणनपफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती है। यहाँ त12 ¯बदु 1 तथा 2 के बीच की दूरी है। चँूकि स्िथरवैद्युत बल संरक्षी है, यह कायर् निकाय की स्िथतिज ऊजार् के रूप में संचित हो जाता है। अतः दो आवेशों ु1 तथा ु2 के निकाय की स्िथतिज ऊजार् 1 ुु न् त्र 1 2 ;2ण्22द्ध4πε वत12 स्पष्ट है, कि यदि पहले ु2 को उसकी वतर्मान स्िथति पर लाया जाता और तत्पश्चात ु1 को लाया जाता, तो भी स्िथतिज ऊजार् न् इतनी ही होती। अिाक व्यापक रूप में, समीकरण ;2ण्22द्ध में दशार्या गया स्िथतिज ऊजार् के लिए व्यंजक, सदैव ही अपरिवतिर्त रहता है, चाहे निदिर्ष्ट स्थानों पर आवेशों को किसी भी प्रकार से लाया जाए। यह स्िथरवैद्युत बलों के लिए कायर् की पथ - स्वतंत्राता के कारण होता है। समीकरण ;2ण्22द्ध ुतथा ु के किसी भी चिÉ के लिए सत्य है। यदि ुु झ 01212है, तो स्िथतिज ऊजार् धनात्मक होती है। यह अपेक्ष्िात भी है, क्योंकि सजातीय आवेशों ;ु1 ु2 झ 0द्ध के लिए, स्िथरवैद्युत बल प्रतिकषीर् होता है तथा आवेशों को अनंत से किसी परिमित दूरी तक इस प्रतिकषीर् बल के विरु( लाने में धनात्मक कायर् करना पड़ता है। इसके विपरीत, विजातीय आवेशों ;ु1 ु2 ढ 0द्ध के लिए स्िथरवैद्युत बल आकषीर् होता है। इस प्रकरण में, आवेशों को उनकी दी गइर् स्िथतियों से अनंत तक इस आकषीर् बल के विरु( ले जाने में धनात्मक कायर् करना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, उत्क्रमित पथ ;अनंत से वतर्मान स्िथतियों तकद्ध के लिए कायर् के )णात्मक परिमाण की आवश्यकता होती है जिसके कारण स्िथतिज ऊजार् )णात्मक होती है। समीकरण ;2ण्22द्ध को आसानी से आवेशों के कितनी भी संख्या के निकाय के लिए व्यापक बनाया जा सकता है। आइए, अब हम तीन आवेशों ु1ए ुतथा ुजो क्रमशः तए त2 3 12 तथा त3 पर स्िथत हैं, के निकाय की स्िथतिज ऊजार् परिकलित करें। पहलेे ु1 को अनंत से त1 तक लाने में कोइर् कायर् नहीं होता। तत्पश्चात हम ु2 को अनंत से त2 तक लाते हैं। पहले की ही भाँति इस चरण में किया गया कायर् 1 ुु ुट ;त द्ध त्र 12 2 1 2 ;2ण्23द्ध4πε वत12 आवेश ु1 तथा ु2 अपने चारों ओर विभव उत्पन्न करते हैं, किसी ¯बदु च् पर यह विभव ट1ए2 आवेश ु31 ु1 ु2 त्ऱ ;2ण्24द्ध4πε तत व 1च् 2च् को अनंत से ¯बदु त तक लाने में किया गया कायर् त पर ट का ु गुना होता है।331ए23चित्रा 2ण्14 चित्रा में दिए गए संकेतों सहित समीकरण ;2ण्26द्ध में तीन आवेशों के निकाय की स्िथतिज ऊजार् दी गइर् है। 62 1 ुु ुु 13 23अतः ुट ;तद्ध त्ऱ ;2ण्25द्ध3 1ए2 3 4πε तत व 13 23 आवेशों को उनकी दी गइर् स्िथतियों पर एकत्रा करने में किया गया वुफल कायर् विभ्िान्न चरणों ¹समीकरण ;2ण्23द्ध तथा समीकरण ;2ण्25द्धह् में किए गए कायो± का योग करने पर प्राप्त होता है। 1 ुु ुु ुु 1213 23न् त्र ़़ ;2ण्26द्ध4πε ततत व 12 13 23 यहाँ पिफर, स्िथरवैद्युत बल की संरक्षी प्रकृति के कारण ;अथवा तुल्य रूप में, कायर् की पथ - स्वतंत्राताद्ध स्िथतिज ऊजार् न् को अंतिम व्यंजक, समीकरण ;2ण्26द्धए विन्यास को किस प्रकार संयोजित किया गया है, उसके क्रम पर निभर्र नहीं करता। स्िथतिज ऊजार् विन्यास की स्िथरवैद्युत विभव तथा धरितावतर्मान अवस्था का अभ्िालाक्षण्िाक गुण होता है, यह इस बात पर निभर्र नहीं करता कि इस विन्यास को किस प्रकार प्राप्त किया गया है। उदाहरण 2ण्4चित्रा 2ण्15 में दशार्ए अनुसार चार आवेश भुजा क वाले किसी वगर् ।ठब्क् के शीषो± पर व्यवस्िथत किए गए हैं। ;ंद्ध इस व्यवस्था को एक साथ बनाने में किया गया कायर् ज्ञात कीजिए। ;इद्ध कोइर् आवेश ु0 वगर् के वेंफद्र म् पर लाया जाता है तथा चारों आवेश अपने शीषो± पर दृढ़ रहते हैं। ऐसा करने के लिए कितना अतिरिक्त कायर् करना पड़ता है? चित्रा 2ण्15 हल ;ंद्ध चूँकि किया गया कायर् आवेशों की अंतिम व्यवस्था पर निभर्र करता है, उन्हें किस प्रकार एक साथ लाया गया है, पर निभर्र नहीं करता, हम आवेशों को ।ए ठए ब्ए तथा क् पर रखने के एक ढंग के लिए आवश्यक कायर् का परिकलन करेंगे। मान लीजिए पहले आवेश ़ु को । पर लाया जाता है, तत्पश्चात आवेशों −ुए ़ुतथा −ुको क्रमशः ठए ब् तथा क् पर लाया जाता है। किए गए वुफल कायो± का परिकलन निम्नलिख्िात चरणों में किया जा सकता है:;पद्ध आवेश ़ुको । पर लाने में किया गया कायर् जब कहीं भी कोइर् आवेश नहीं हैः यह शून्य है। ;पपद्ध आवेश −ुको ठ पर लाने में किया गया कायर् जब ़ुशीषर् । पर है। यह ;ठ पर आवेशद्ध पर स्िथरवैद्युत विभवद्धठके कारण ¯बदुु़पर आवेश।;× 2 ु ु त्र−ु × त्र−4πε वक 4πεवक ;पपपद्ध आवेश ़ुको ब् पर लाने में किया गया कायर् जब ़ुशीषर् । पर तथा −ुशीषर् ठ पर विभवद्धब्पर आवेशों के कारणठतथा।;× पर आवेशद्धब्पर है। यह ; ़ु −ु त्ऱु ़4πεवक 24πε वक −ु 2 1 त्र 1 −4πε वक 2 ;पअद्ध आवेश दृु को क् पर लाने में किया गया कायर् जब ़ुशीषर् । पर, दृु शीषर् ठ पर तथा ़ु शीषर् ब् पर हैं। यह ;क् पर आवेशद्ध ×;।ए ठ तथा ब् पर आवेशों के कारण क् पर विभवद्ध़ु −ुु त्र−ु ़़4πε वक 4πεवक 24πε वक −ु 2 1 त्र 2 − 4πε वक 2 उदाहरण 2ण्4 भौतिकी चारों चरणों ;पद्धए ;पपद्धए ;पपपद्ध एवं ;पअद्ध के कायो± को जोड़ने पर, आवश्यक वुफल कायर् −ु 2 11 त्र ;0द्ध ़ ;1द्ध ़ 1 −़ 2 − 4πε वक 22 −ु 2 त्र;4 − 2द्ध4πε क व यह कायर् केवल आवेशों की व्यवस्था पर निभर्र करता है, इस बात पर निभर्र नहीं करता कि इन्हें वैफसे व्यवस्िथत किया गया है। परिभाषा के अनुसार यह आवेशों की वुफल स्िथरवैद्युत ऊजार् है। ;विद्याथीर् अपनी इच्छानुसार आवेशों को किसी भी अन्य क्रम में लेकर इसी कायर्/ऊजार् को परिकलित करने का प्रयास कर सकते हैं और यह देखकर अपने को संतुष्ट कर सकते हैं कि हर प्रकरण में ऊजार् समान रहती है।द्ध ;इद्ध जबकि चारों आवेश ।ए ठए ब् तथा क् पर हैं, आवेश ु0 को ¯बदु म् पर लाने में किया गया अतिरिक्त कायर् ु0 × ;।ए ठए ब् तथा क् पर हैं आवेशों के कारण म् पर स्िथरवैद्युत विभवद्ध के बराबर है। स्पष्ट रूप से ¯बदु म् पर स्िथरवैद्युत विभव शून्य है, क्योंकि । तथा ब् पर आवेशों के कारण विभव ठ तथा क् द्वारा निरस्त हो जाते हैं। अतः ¯बदु म् तक किसी भी आवेश को लाने में कोइर् कायर् करना नहीं पड़ता है। 2ण्8 बाह्य क्षेत्रा में स्िथतिज ऊजार् 2ण्8ण्1 एकल आवेश की स्िथतिज ऊजार् अनुभाग 2ण्7 में विद्युत क्षेत्रा के ड्डोत का विशेष उल्लेख किया गया - आवेश तथा उनकी स्िथतियाँ - तथा उन आवेशों के निकाय की स्िथतिज ऊजार् निधार्रित की गइर्। इस अनुभाग में हम इससे संबंिात परंतु भ्िान्न प्रश्न पूछते हैं। किसी दिए गए क्षेत्रा में किसी आवेश ु की स्िथतिज ऊजार् क्या होती है? वास्तव में, यह प्रश्न आरंभ ¯बदु था जो हमें स्िथरवैद्युत विभव की धारणा की ओर ले गया था ;देख्िाए अनुभाग 2ण्1 तथा 2ण्2द्ध। परंतु यही प्रश्न हम पिफर दुबारा यह स्पष्ट करने के लिए पूछ रहे हैं कि किस रूप में यह अनुभाग 2ण्7 में की गइर् चचार् से भ्िान्न है। यहाँ प्रमुख अंतर यह है कि अब हम यहाँ पर किसी बाह्य क्षेत्रा मंे आवेश ;अथवा आवेशोंद्ध की स्िथतिज ऊजार् के विषय में चचार् कर रहे हैं। इसमें बाह्य क्षेत्रा म् उन दिए गए आवेशों द्वारा उत्पन्न नहीं किया जाता जिनकी स्िथतिज ऊजार् का हम परिकलन करना चाहते हैं। विद्युत क्षेत्रा म् उस ड्डोत द्वारा उत्पन्न किया जाता है जो दिए गए आवेश ;आवेशोंद्ध की दृष्िट से बाह्य होता है। बाह्य ड्डोत ज्ञात हो सकता है परंतु प्रायः ये ड्डोत अज्ञात अथवा अनिदिर्ष्ट होते हैं, जो वुफछ भी यहाँ निदिर्ष्ट होता है वह है विद्युत क्षेत्रा म् अथवा बाह्य ड्डोतों के कारण स्िथरवैद्युत विभव ट। हम यह मानते हैं कि आवेश ु बाह्य क्षेत्रा उत्पन्न करने वाले ड्डोतों को साथर्क रूप से प्रभावित नहीं करता। यदि ु अत्यिाक छोटा है, तो यह सत्य है अथवा वुफछ अनिदिर्ष्ट बलों के प्रभाव में बाह्य ड्डोतों को दृढ़ रखा जा सकता है। यदि ु परिमित है तो भी इसके बाह्य ड्डोतों पर प्रभाव की उन परिस्िथतियों में उपेक्षा की जा सकती है, जिनमें बहुत दूर अनंत पर स्िथत अत्यिाक प्रबल ड्डोत हमारी रुचि के क्षेत्रा में कोइर् परिमित क्षेत्रा म् उत्पन्न करता है। पिफर ध्यान दीजिए, हमारी रुचि किसी बाह्य क्षेत्रा में, दिए गए आवेश ु ;तत्पश्चात आवेशों के किसी निकायद्ध की स्िथतिज ऊजार् निधार्रित करने में हैऋ हमें बाह्य विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न करने वाले ड्डोत की स्िथतिज ऊजार् में कोइर् रुचि नहीं है। बाह्य विद्युत क्षेत्रा म् तथा तदनुरूपी बाह्य विभव ट का मान एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु पर जाने में परिवतिर्त हो सकता है। परिभाषा के अनुसार, किसी ¯बदु च् पर विभव ट एकांक धनावेश को अनंत से उस ¯बदु च् तक लाने में किए गए कायर् के बराबर होता है ;हम निरंतर ही अनंत पर विभव64 को शून्य मानते रहेंगेद्ध। अतः किसी आवेश ु को अनंत से बाह्य क्षेत्रा के किसी ¯बदु च् तक लाने में किया गया कायर् ु ट होता है। यह कायर् आवेश ु में स्िथतिज ऊजार् के रूप में संचित हो जाता है। यदि ¯बदु च् का किसी मूल ¯बदु के सापेक्ष कोइर् स्िथति सदिश त है, तो हम यह लिख सकते हैं किः किसी बाह्य क्षेत्रा में आवेश ु की त पर स्िथतिज ऊजार् त्र ुट;तद्ध ;2ण्27द्ध यहाँ ट;तद्ध ¯बदु त पर बाह्य विभव है। इस प्रकार, यदि आवेश ु त्र म त्र 1ण्6×10दृ19 ब् का कोइर् इलेक्ट्राॅन किसी विभवान्तर Δट त्र1 वोल्ट द्वारा त्वरित किया जाता है, तो वह ऊजार् ुΔट त्र 1ण्6 ×10दृ19श्र अ£जत करेगा। ऊजार् के इस मात्राक को 1 इलेक्ट्राॅन वोल्ट, अथार्त 1 मटत्र1ण्6 × 10दृ19श्र के रूप में परिभाष्िात करते हैं। मट पर आधरित मात्राकों का सवार्ध्िक उपयोग आण्िवक, नाभ्िाकीय तथा कण भौतिकी में किया जाता है, ;1 ामट त्र 103मट त्र 1ण्6 ×10दृ16श्रए 1 डमट त्र 106मट त्र 1ण्6 ×10दृ13श्रए 1 ळमट त्र 109मट त्र 1ण्6 ×10दृ10श्र तथा 1 ज्मट त्र 1012मट त्र 1ण्6 × 10दृ7श्रद्ध ¹इसे भौतिकी भाग प् कक्षा 11 पृष्ठ 119 सारणी 6ण्1 में पहले ही परिभाष्िात किया जा चुका है।ह् 2ण्8ण्2 किसी बाह्य क्षेत्रा में दो आवेशों के निकाय की स्िथतिज ऊजार् अब हम यह पूछते हैं: किसी बाह्य क्षेत्रा में क्रमशः त तथा त पर स्िथत दो आवेशों ुतथा ु12 1 2 की स्िथतिज ऊजार् क्या होती है? इस विन्यास का निमार्ण करने में किए गए कायर् का परिकलन करने के लिए आइए यह कल्पना करें कि पहले हम आवेश ु1 को अनंत से त1 तक लाते हैं। समीकरण ;2ण्27द्ध के अनुसार, इस चरण में किया गया कायर् ु1 ट ;त1द्ध है। अब हम आवेश ु2 को त2 तक लाने में किए जाने वाले कायर् पर विचार करते हैं। इस चरण में केवल बाह्य क्षेत्रा म् के विरु( ही कायर् नहीं होता, वरन् ु1 के कारण क्षेत्रा के विरु( भी कायर् करना हेाता है। अतः ु2 पर बाह्य क्षेत्रा के विरु( किया गया कायर् त्र ु2 ट ;त2द्ध ु2 पर ु1 के कारण क्षेत्रा के विरु( किया गया कायर् ुु त्र 12 πε त4 व 12 यहाँ त12 आवेशों ु1 तथा ु2 के बीच की दूरी है। ऊपर हमने समीकरण ;2ण्27द्ध तथा ;2ण्22द्ध का उपयोग किया है। क्षेत्रों के लिए अध्यारोपण सि(ांत द्वारा हम ु2 पर दो क्षेत्रों ;म् तथा ु1 के कारण क्षेत्राद्ध के विरु( किए गए कायो± को जोड़ते हैं। अतः ु2 को त2 तक लाने में किया गया कायर् त्र ुट ;त द्ध ़ 12 2 2 ुु ;2ण्28द्ध4πε वत12 इस प्रकार, निकाय की स्िथतिज ऊजार् त्र विन्यास के निमार्ण में किया गया कायर् ुु त्र ुट ;त द्ध ़ ुट ;तद्ध ़ 12 1 1 22 ε त ;2ण्29द्ध4π 0 12 उदाहरण 2ण्5 ;ंद्ध दो आवेशों 7 - ब् तथा दृ2 - ब् जो क्रमशः ;दृ9 बउए 0ए 0द्ध तथा ;9 बउए 0ए 0द्ध पर स्िथत हैं, के ऐसे निकाय, जिस पर कोइर् बाह्य क्षेत्रा आरोपित नहीं है, की स्िथरवैद्युत स्िथतिज की ऊजार् ज्ञात कीजिए। ;इद्ध दोनों आवेशों को एक - दूसरे से अनंत दूरी तक पृथक करने के लिए कितने कायर् की आवश्यकता होगी? 65 भौतिकी ;बद्ध माना कि अब इस आवेश निकाय को किसी बाह्य विद्युत क्षेत्रा म् त्र । ;1ध्त 2द्धय । त्र 9 × 105 ब् उदृ2 में रखा गया है। इस विन्यास की स्िथरवैद्युत ऊजार् का परिकलन करें। हल 1 ुु 7 ×− ×10−12; 2द्ध12 9;ंद्ध न् त्रत्र 9 ×10 × त्र दृ0ण्7 श्र 4πε त 0ण्18 व ;इद्ध ॅ त्र न्2 दृ न्1 त्र0 दृ न् त्र 0 दृ ;दृ0ण्7द्ध त्र 0ण्7 श्र ;बद्ध दो आवेशों की पारस्परिक अन्योन्य ऊजार् अपरिव£तत रहती है। साथ ही यहाँ पर दो आवेशों की बाह्य विद्युत क्षेत्रा के साथ अन्योन्य िया की ऊजार् भी है। अतः हम यह पाते हैं कि 7ब् −2ब् ुट त ़ ुट त त्र । ़ ।;द्ध ;द्ध - - 1 1 22 0ण्09उ 0ण्09उ तथा नेट स्िथरवैद्युत ऊजार् का मान है ुु 7 - ब् −2 - ब् ुट त ़ ुट त ़त्र । ़ । − 0ण्7 श्र;द्ध ;द्ध 12 11 22 0 124πε त 0ण्09उ 0ण्09उ त्र 70 − 20 − 0ण्7 त्र 49ण्3 श्र 2ण्8ण्3 बाह्य क्षेत्रा में द्विध्ु्रव की स्िथतिज ऊजार् चित्रा 2ण्16 मंे दशार्ए अनुसार किसी एकसमान विद्युत क्षेत्रा म् में रखे आवेशों ु1 त्र ़ु तथा ु2 त्र दृु के द्विध्ु्रव पर विचार कीजिए। जैसाकि हमने पिछले अध्याय में देखा, एकसमान विद्युत क्षेत्रा में द्विध्रुव किसी नेट बल का अनुभव नहीं करताऋ परंतु एक बल आघूणर् का अनुभव करता है जो इस प्रकार है: τ त्र च×म् ;2ण्30द्ध यह इसमें घूणर्न की प्रवृिा उत्पन्न करेगा ;जब तक च तथा म् एक - दूसरे के समांतर अथवा प्रतिसमांतर नहीं हैंद्ध। मान लीजिए कोइर् बाह्य बल आघूणर् τबाह्यइस प्रकार लगाया जाता है कि वह इस बल आघूणर् को ठीक - ठीक उदासीन कर देता है और इसे कागश के तल बिना किसी कोणीय त्वरण के अत्यंत सूक्ष्म कोणीय चाल से कोण θ0 से कोण θ1 पर घू£णत कर देता है। इस बाह्य बल आघूणर् द्वारा किया गया कायर् θθ चित्रा 2ण्16 किसी विद्युुत द्विधु्रव की एकसमान ॅ त्र 1τबाह्य;θद्धकθत्र 1 चम् ेपदθकθ बाह्य क्षेत्रा में स्िथतिज ऊजार्। θ0 θ0 त्र चम् ;बवेθ0 − बवेθ1द्ध ;2ण्31द्ध यह कायर् निकाय में स्िथतिज ऊजार् के रूप में संचित हो जाता है। तब हम स्िथतिज ऊजार्न्;θद्ध को द्विध्ु्रव के किसी झुकाव θ से संब( कर सकते हैं। अन्य स्िथतिज ऊजार्ओं की भाँति यहाँ हमें उस कोण के चयन की स्वतंत्राता है जिस पर विभव स्िथतिज ऊजार् न् शून्य माना जाए। प्रावृफतिक चयन के अनुसार θ0 त्र π ध् 2 लिया जाना चाहिए। ;इसका स्पष्टीकरण चचार् के अंत में दिया गया है।द्ध तब हम यह लिख सकते हैं, 66 ;द्ध चम् बवे π− बवेθत्र दृचम् बवेθत्र− ;2ण्32द्धन् θत्र चम्2 वैकल्िपक रूप से इस व्यंजक को समीकरण ;2ण्29द्ध से भी समझा जा सकता है। हम समीकरण ;2ण्29द्ध का प्रयोग दो आवेशों ़ु तथा दृु के वतर्मान निकाय के लिए करते हैं। तब स्िथतिज ऊजार् के व्यंजक को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है: 2 न् ′; द्ध ख् ;त1द्ध− ट ; 2 ;2ण्33द्धθत्र ुट त द्ध, − ु 4πε0 × 2ं यहाँ ततथा तदो आवेशों ़ु तथा दृु के स्िथति सदिशों को दशार्ते हैं। अब ततथा तके12 12 बीच विभवांतर एकांक ध्नावेश को क्षेत्रा के विरु( त2 से त1 तक लाने में किए गए कायर् के बराबर है। बल के समांतर विस्थापन 2ं बवेθ है। इस प्रकार ख्ट;त1द्धदृट ;त2द्ध, त्र दृम्× 2ं बवेθ , इस प्रकार, हमें प्राप्त होता है। चूँकि एक नियतांक स्िथतिज ऊजार् के लिए नगण्य है, हम समीकरण ;2ण्34द्ध में दूसरे पद को छोड़ सकते हैं। तब यह समीकरण ;2ण्32द्ध बन जाता है। 22 ′; द्ध त्र−चम् बवे θ− ु त्र− ु ;2ण्34द्धन् θ चम्− 4πε0 × 2ं 4πε0 × 2ं ध्यान दीजिए किन्′ ;θद्ध तथा न्;θ द्ध में एक राश्िा का अंतर है जो किसी दिए गए द्विध्ु्रव के लिए मात्रा एक नियतांक है। स्िथतिज ऊजार् के लिए नियतांक महत्वपूणर् नहीं है, अतः समीकरण ;2.34द्ध से हम द्वितीय पद को छोड़ सकते हैं। इस प्रकार से यह समीकरण ;2.32द्ध के रूप में आ जाता है। अब हम यह समझ सकते हैं कि हमने θ0त्रπध्2 क्यों लिया था। इस प्रकरण में ़ु तथा दृु को बाह्य क्षेत्रा म् के विरु( लाने में किए जाने वाले कायर् समान तथा विपरीत हैं और निरासित हो जाते हैं, अथार्त ु ख्ट ;त1द्ध दृ ट ;त2द्ध, त्र 0 उदाहरण 2ण्6 एक पदाथर् के अणु में 10दृ29 बउ का स्थायी वैद्युत द्विध्ु्रव आघूणर् है। 106 ट उदृ1 परिमाण के एक शक्ितशाली स्िथरवैद्युत क्षेत्रा को लगाकर इस पदाथर् के एक मोल ;निम्न ताप परद्ध को ध््रुवित किया गया है। अचानक क्षेत्रा की दिशा 60ह् कोण से बदल दी जाती है। क्षेत्रा की नयी दिशा में द्विध्ु्रवों को पंक्ितब( करने में उन्मुक्त ऊष्मा ऊजार् का आकलन कीजिए। सुविध के लिए नमूने का ध््रुवण 100ः माना जा सकता है। हल यहाँ प्रत्येक अणु का द्विध्ु्रव आघूणर् त्र 10दृ29 ब् उ चूँकि किसी पदाथर् के एक मोल में6 × 1023 अणु होते हैं, अतः सारे अणुओं का वुफल द्विध्रुव आघूणर्, च त्र 6 × 1023 × 10दृ29 ब् उ त्र 6 × 10दृ6ब् उ आरंभ्िाक स्िथतिज ऊजार् न्प त्र दृचम् बवे θ त्र दृ6×10दृ6×106 बवे 0° त्र दृ6 श्र अंतिम स्िथतिज ऊजार् ;जब θ त्र 60°द्ध, न् ित्र दृ6 × 10दृ6 × 106 बवे 60° त्र दृ3 श्र स्िथतिज ऊजार् में अंतर त्र दृ3 श्र दृ ;दृ6श्रद्ध त्र 3 श्र अतः, यहाँ ऊजार् की हानि होती है। पदाथर् द्वारा द्विध्ु्रवों को पंक्ितब( करने में ऊष्मा के रूप में यह ऊजार् मुक्त होनी चाहिए। 2ण्9 चालक - स्िथरवैद्युतिकी अध्याय 1 में चालकों तथा विद्युतरोधी पदाथो± का संक्षेप में वणर्न किया गया था। चालकों में गतिशील आवेश वाहक होते हैं। धात्िवक चालकों में ये वाहक इलेक्ट्राॅन होते हैं। धातुओं में, बाह्य ;संयोजीद्ध इलेक्ट्राॅन अपने परमाणु से अलग होकर गति करने के लिए मुक्त होते हैं। ये इलेक्ट्राॅन धतु के अंदर गति करने के लिए मुक्त होते हैं परंतु धतु से मुक्त नहीं हो सकते। ये मुक्त इलेक्ट्राॅन एक प्रकार की ‘गैस’ की भाँति आपस में परस्पर तथा आयनों से टकराते हैं तथा विभ्िान्न दिशाओं में यादृच्िछक गति करते हैं। किसी बाह्य विद्युत क्षेत्रा में, ये क्षेत्रा की दिशा के विपरीत बहते हैं। नाभ्िाकों के इस प्रकार धन आयन तथा परिब( इलेक्ट्राॅन अपनी नियत स्िथतियों पर ही दृढ़ रहते हैं। अपघटनी चालकों में धनायन तथा 67)णायन दोनों ही आवेश वाहक होते हैंऋ परंतु इस प्रकरण में स्िथति अिाक जटिल भौतिकी 68 होती है - आवेश वाहकों की गति बाह्य विद्युत क्षेत्रा के साथ - साथ रासायनिक बलों ;अध्याय 3 देख्िाएद्ध द्वारा भी प्रभावित होती है। यहाँ हम अपनी चचार् ठोस धात्िवक चालकों तक ही सीमित रखेंगे। आइए चालक - स्िथरवैद्युतिकी से संबंिात वुफछ महत्वपूणर् परिणामों पर ध्यान दें। 1ण् चालक के भीतर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा शून्य होता है किसी उदासीन अथवा आवेश्िात चालक पर विचार कीजिए। यहाँ कोइर् बाह्य स्िथरवैद्युत क्षेत्रा भी हो सकता है। स्थैतिक स्िथति में, जब चालक के भीतर अथवा उसके पृष्ठ पर कोइर् विद्युत धारा नहीं होती, तब चालक के भीतर हर स्थान पर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। इस तथ्य को किसी चालक को परिभाष्िात करने के गुण के रूप में माना जा सकता है। चालक में मुक्त इलेक्ट्राॅन होते हैं। जब तक विद्युत क्षेत्रा शून्य नहीं है, मुक्त आवेश वाहक एक बल का अनुभव करेंगे और उनमें बहाव होगा। स्थैतिक स्िथति में मुक्त इलेक्ट्राॅन स्वयं को इस प्रकार वितरित कर लेते हैं कि चालक के भीतर हर स्थान पर विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। किसी चालक के भीतर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। 2ण् आवेश्िात चालक के पृष्ठ पर, पृष्ठ के प्रत्येक ¯बदु पर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा अभ्िालंबवत होना चाहिए यदि म् पृष्ठ के अभ्िालंबवत नहीं है तो उसका पृष्ठ के अनुदिश कोइर् शून्येतर घटक होगा। तब पृष्ठ के मुक्त इलेक्ट्राॅन पृष्ठ पर किसी बल का अनुभव करेंगे और गति करेंगे। अतः, स्थैतिक स्िथति में म् का कोइर् स्पशर् रेखीय घटक नहीं होना चाहिए। इस प्रकार, किसी आवेश्िात चालक के पृष्ठ पर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा पृष्ठ के हर ¯बदु पर पृष्ठ के अभ्िालंबवत होना चाहिए। ;किसी चालक के लिए जिस पर कोइर् पृष्ठीय आवेश घनत्व नहीं है, उसके पृष्ठ तक पर भी क्षेत्रा शून्य होता है।द्ध परिणाम 5 देख्िाए। 3ण् स्थैतिक स्िथति में किसी चालक के अभ्यंतर में कोइर् अतिरिक्त आवेश नहीं हो सकता किसी उदासीन चालक के प्रत्येक लघु आयतन अथवा पृष्ठीय अवयव में धनात्मक तथा )णात्मक आवेश समान मात्रा में होते हैं। जब किसी चालक को आवेश्िात किया जाता है, तो स्थैतिक स्िथति में अतिरिक्त आवेश केवल उसके पृष्ठ पर विद्यमान रहता है। यह गाउस नियम से स्पष्ट है। किसी चालक के भीतर किसी यादृच्िछक आयतन अवयव अ पर विचार कीजिए। आयतन अवयव अ को परिब( करने वाले किसी बंद पृष्ठ ै पर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। इस प्रकार, ै से गुजरने वाला वुफल फ्रलक्स शून्य है। अतः गाउस नियम के अनुसार ै पर परिब( कोइर् नेट आवेश नहीं है। परंतु पृष्ठ ै को आप जितना छोटा चाहें, उतना छोटा बना सकते हैं, अथार्त आयतन अ को अत्यल्प ;लोपी ¯बदु तक छोटाद्ध बनाया जा सकता है। इसका अभ्िाप्राय यह हुआ कि चालक के भीतर कोइर् नेट आवेश नहीं है तथा यदि कोइर् अतिरिक्त आवेश है तो उसे पृष्ठ पर विद्यमान होना चाहिए। 4ण् चालक के समस्त आयतन में स्िथरवैद्युत विभव नियत रहता है तथा इसका मान इसके पृष्ठ पर भी समान ;भीतर के बराबरद्ध होता है यह उपरोक्त परिणाम 1 तथा 2 का अनुवतीर् है। चूँकि किसी चालक के भीतर म् त्र 0 तथा इसका पृष्ठ पर कोइर् स्पशर् रेखीय घटक नहीं होता अतः इसके भीतर अथवा पृष्ठ पर किसी छोटे परीक्षण आवेश को गति कराने में कोइर् कायर् नहीं होता। अथार्त, चालक के भीतर अथवा उसके पृष्ठ पर दो ¯बदुओं के बीच कोइर् विभवांतर नहीं होता। यही वांछित परिणाम है। यदि चालक आवेश्िात है तो चालक के पृष्ठ के अभ्िालंबवत विद्युत क्षेत्रा होता हैऋ इसका यह अभ्िाप्राय है कि चालक के पृष्ठ के किसी ¯बदु का विभव चालक से तुरंत बाहर के ¯बदु के विभव से भ्िान्न होगा। किसी यादृच्िछक आकार, आकृति तथा आवेश विन्यास के चालकों के निकाय में प्रत्येक चालक का अपना एक नियत मान का अभ्िालाक्षण्िाक विभव होगा, परंतु यह नियत मान एक चालक से दूसरे चालक का भ्िान्न हो सकता है। 5ण् आवेश्िात चालक के पृष्ठ पर विद्युत क्षेत्रा σ म् त्रε द६ ;2ण्35द्ध 0 यहाँ σ पृष्ठीय आवेश घनत्व तथा द६ पृष्ठ के अभ्िालंबवत बहिमुर्खी दिशा में एकांक सदिश है। इस परिणाम को व्युत्पन्न करने के लिए, कोइर् डिबिया ;एक छोटा बेलनाकार खोखला बतर्नद्ध चित्रा 2ण्17 में दशार्ए अनुसार, पृष्ठ के किसी ¯बदु च् के परितः गाउसीय पृष्ठ के रूप में चुनिए। इस डिबिया का वुफछ भाग चालक के पृष्ठ के बाहर तथा वुफछ भाग चालक के पृष्ठ के भीतर है। इसकी अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रापफल δै बहुत छोटा तथा इसकी ऊँचाइर् नगण्य है। पृष्ठ के तुरंत भीतर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा शून्य हैऋ पृष्ठ के तुरंत बाहर विद्युत क्षेत्रा पृष्ठ के अभ्िालंबवत है। अतः डिबिया से गुशरने वाला वुफल फ्रलक्स केवल डिबिया की बाहरी ;वृत्तीयद्ध अनुप्रस्थ काट से आता है। यह ± म् δै ;σ झ 0 के लिए ध्नात्मकए σ ढ 0 के लिए )णात्मकद्धके बराबर है, चूँकि चालक के छोटे क्षेत्रा δै पर विद्युत क्षेत्रा म् को नियत माना जा सकता है तथा म् और δै समांतर अथवा प्रतिसमांतर हैं। डिबिया द्वारा परिब(, आवेश σ δै है। गाउस नियम के अनुसार σ δ ै म्δै त्र ε व σ म् त्र ;2ण्36द्धε व इस तथ्य को सम्िमलित करते हुए कि विद्युत क्षेत्रा पृष्ठ के अभ्िालंबवत है, हम समीकरण ;2ण्35द्ध के रूप में सदिश संबंध पाते हैं। ध्यान दीजिए, समीकरण ;2ण्35द्ध आवेश घनत्व σ के दोनों चिÉों के लिए सत्य है। σ झ 0 के लिए, विद्युत क्षेत्रा पृष्ठ के बहिमुर्खी अभ्िालंबवत हैऋ तथा σ ढ 0 के लिए, विद्युत क्षेत्रा पृष्ठ के अंतमुर्खी अभ्िालंबवत है। चित्रा 2ण्17 किसी आवेश्िात चालक के पृष्ठ पर विद्युत 2ण्9ण्1 स्िथरवैद्युत परिरक्षण क्षेत्रा के लिए समीकरण ;2ण्35द्ध व्युत्पन्न करने के लिए, किसी ऐसे चालक के विषय में विचार कीजिए जिसमें कोइर् कोटर चुना गया गाउसीय पृष्ठ ;कोइर् डिबियाद्ध। ;गुहाद्ध हो तथा उस कोटर के भीतर कोइर् आवेश न हो। एक विश्िाष्ट परिणाम यह देखने को मिलेगा कि चाहे कोटर की कोइर् भी आकृति एवं आकार क्यों न हो, तथा चाहे उस चालक पर कितने भी परिमाण का आवेश हो और कितनी भी तीव्रता के बाह्य क्षेत्रा में उसे क्यों न रखा गया हो, कोटर के भीतर विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। इसी परिणाम के एक सरल प्रकरण को हम पहले भी सि( कर चुके हैं: किसी गोलीय कोश के भीतर विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। कोश के लिए परिणाम की व्युत्पिा में हमने कोश की गोलीय सममिति का उपयोग किया था ;अध्याय 1 देख्िाएद्ध। परंतु किसी चालक का ;आवेश मुक्तद्ध कोटर में विद्युत क्षेत्रा का विलोपन, जैसा कि पहले वणर्न किया जा चुका है, एक अत्यिाक व्यापक परिणाम है। इससे संबंिात एक परिणाम यह भी है कि यदि चालक आवेश्िात भी है, अथवा किसी बाह्य विद्युत क्षेत्रा द्वारा उदासीन चालक पर आवेश प्रेरित क्यों न किए गए हों, समस्त आवेश केवल चालक 69पर कोटर सहित उसके बाह्य पृष्ठ पर विद्यमान रहता है। भौतिकीचित्रा2ण्18किसी भी चालक की कोटर ;गुहाद्ध के भीतर विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। चालक का समस्त आवेश कोटर सहित उस चालक के केवल बाह्य पृष्ठ पर ही विद्यमान रहता है ;कोटर के भीतर कोइर् आवेश नहीं रखे गए हैंद्ध। चित्रा 2ण्18 में दिए गए परिणामों की व्युत्पिा को यहाँ हम छोड़ रहे हैं, परंतु हमें इनकी महत्वपूणर् उलझनों का ध्यान है। बाहर चाहे कितना भी आवेश तथा वैफसा भी विद्युत क्षेत्रा विन्यास क्यों न हो, उस चालक में कोइर् भी कोटर बाह्य विद्युत क्षेत्रों के प्रभाव से सदैव परिरक्ष्िात रहती हैऋ कोटर के भीतर विद्युत क्षेत्रा सदैव ही शून्य होता है। इसे स्िथरवैद्युत परिरक्षण कहते हैं। इस प्रभाव का उपयोग संवेदनशील उपकरणों को बाह्य विद्युत प्रभावों से बचाने में किया जाता है। चित्रा 2ण्19 में किसी चालक के महत्वपूणर् स्िथरवैद्युत गुणधमो± का सारांश दिया गया है। चित्रा 2ण्19 किसी चालक के वुफछ महत्वपूणर् स्िथरवैद्युत गुणधमर्। उदाहरण 2ण्7 ;ंद्ध सूखे बालों में कंघा घुमाने के बाद वह कागश के टुकड़ों को आकष्िार्त कर लेता है, क्यों? यदि बाल भीगे हों या वषार् का दिन हो तो क्या होता है? ¹ध्यान रहे कि कागश विद्युत चालक नहीं है।ह् ;इद्ध साधारण रबर विद्युतरोधी है। परंतु वायुयान के विशेष रबर के पहिए हलके चालक बनाए जाते हैं। यह क्यों आवश्यक है? ;बद्ध जो वाहन ज्वलनशील पदाथर् ले जाते हैं उनकी धातु की रस्िसयाँ ;शंजीरेंद्ध वाहन के गतिमय होने पर धरती को छूती रहती हैं, क्यों? ;कद्ध एक चिडि़या एक उच्च शक्ित के खुले ;अरक्ष्िातद्ध बिजली के तार पर बैठी है, और उसको वुफछ नहीं होता। धरती पर खड़ा एक व्यक्ित उसी तार को छूता है और उसे सांघातिक ;घातकद्ध धक्का लगता है, क्यों? हल;ंद्ध इसका कारण यह है कि वंफघा घषर्ण द्वारा आवेश्िात होता है। आवेश्िात वंफघे द्वारा कागश के अणु ध्ु्रवित हो जाते हैं, परिणामस्वरूप एक नेट आकषीर् बल प्राप्त होता है। यदि बालों में नमी है अथवा वषार् का दिन है तो वंफघे और बालों के बीच घषर्ण कम हो जाता है तथा वंफघा 70 आवेश्िात नहीं होता। अतः वह कागश के छोटे टुकड़ों को आक£षत नहीं करता।उदाहरण 2ण्7 स्िथरवैद्युत विभव तथा धरिता;इद्ध जिससे घषर्ण द्वारा उत्पन्न आवेश का भूमि में चालन हो सके। चूँकि स्िथरवैद्युत आवेश अत्यिाक मात्रा में टायरों के पृष्ठ पर संचित होकर चिनगारी ;स्पावर्फद्ध पैदा करता है जिससे आग लग सकती है। ;बद्ध कारण ;इद्ध के समान ही। ;कद्ध विद्युत धरा केवल तब ही प्रवाहित होती है जब विभवांतर होता है। 2ण्10 परावैद्युत तथा ध्ु्रवण परावैद्युत अचालक पदाथर् होते हैं। चालकों की तुलना में इनमें कोइर् आवेश वाहक नहीं ;अथवा नगण्यद्ध होता। अनुभाग ;2ण्9द्ध को याद कीजिए, क्या होता है जब किसी चालक को किसी बाह्य विद्युत क्षेत्रा में रखा जाता है? चालक में मुक्त आवेश वाहक गति करके अपने को इस प्रकार समायोजित कर लेते हैं कि प्रेरित आवेशों के कारण विद्युत क्षेत्रा बाह्य क्षेत्रा का विरोध करता है। यह उस समय तक होता रहता है जब तक कि स्िथर स्िथति में दोनों क्षेत्रा एक.दूसरे का निरसन कर देते हैं तथा चालक के भीतर नेट स्िथरवैद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। किसी परावैद्युत में आवेश की यह मुक्त गति संभव नहीं होती। पिफर भी यह पाया जाता है कि बाह्य क्षेत्रा परावैद्युत के पृष्ठ पर वुफछ आवेश प्रेरित कर देता है जो एक ऐसा क्षेत्रा उत्पन्न करता है जो बाह्य क्षेत्रा का विरोध करता है। परंतु चालक से भ्िान्न, इस प्रकार का प्रेरित विद्युत क्षेत्रा बाह्य क्षेत्रा को यथाथर् रूप में चित्रा2ण्20किसी बाह्य विद्युत क्षेत्रा में किसी चालक तथानिरक्ष्िात नहीं करता। यह केवल क्षेत्रा को घटा देता है। इस प्रभाव की परावैद्युत के व्यवहार में अंतर।सीमा परावैद्युत की प्रकृति पर निभर्र करती है। इस प्रभाव को समझने के लिए हमें किसी परावैद्युत पदाथर् में आण्िवक स्तर पर आवेश वितरण के अध्ययन की आवश्यकता होगी। किसी पदाथर् के अणु ध्रुवी अथवा अध्रुवी हो सकते हैं। किसी अधु्रवी अणु में धनावेश तथा )णावेश के वेंफद्र संपातीअध््रुवी अणु होते हैं। तब अणु का कोइर् स्थायी ;अथवा आंतरिकद्ध द्विध्रुव आघूणर् नहीं होता। आॅक्सीजन ;व्2द्ध तथा हाइड्रोजन ;भ्2द्ध अणु अध्रुवी अणुओं के उदाहरण हैं जिनमें सममिति के कारण कोइर् द्विध्रुव आघूणर् नहीं होता। इसके विपरीत कोइर् धु्रवी अणु वह होता है जिसमें धनावेशों तथा )णावेशों के वेंफद्र पृथक - पृथक ;उस स्िथति में भी जब कोइर् बाह्य क्षेत्रा नहीं हैद्ध होते हैं। ऐसे अणुओं में स्थायी द्विध्रुव आघूणर् होता है। भ्ब्स जैसा आयनी अणु अथवा जल ;भ्2व्द्ध का कोइर् अणु ध्रुवी अणुओं के उदाहरण हैं। ध््रुवी अणु किसी बाह्य विद्युत क्षेत्रा में अधु्रवी अणु के धनावेश तथा )णावेश विपरीत दिशाओं में विस्थापित हो जाते हैं। यह विस्थापन तब रुकता है जब अणु के अवयवी आवेशों पर बाह्य चित्रा 2ण्21 ध्रुवी तथा अध्रुवी अणुओं के वुफछ उदाहरण। बल प्रत्यानयन बल ;अणु में आंतरिक क्षेत्रों के कारणद्ध द्वारा संतुलित हो जाता है। अतः अधु्रवी अणु एक प्रेरित द्विध्रुव आघूणर् विकसित कर लेता है। उस स्िथति में परावैद्युत को बाह्य क्षेत्रा द्वारा धु्रवित कहा जाता है। हम उदाहरण 2ण्7 भौतिकी अध््रुवी अणु ध््रुवी अणु चित्रा 2ण्22 किसी बाह्य विद्युत क्षेत्रा में कोइर् परावैद्युत किस प्रकार एक नेट द्विधु्रव आघूणर् विकसित करता है। ;ंद्ध अधु्रवी अणु, ;इद्ध धु्रवी अणु। केवल उस सरल स्िथति पर ही विचार करेंगे जिसमें प्रेरित द्विध्रुव आघूणर् क्षेत्रा की दिशा में होता है तथा क्षेत्रा की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होता है। ;पदाथर् जिनके लिए यह अभ्िाधरणा सत्य है उन्हें रैख्िाक समदैश्िाक परावैद्युत कहते हैंद्ध विभ्िान्न अणुओं के प्रेरित द्विध्रुव आघूणर् एक.दूसरे से जुड़कर बाह्य क्षेत्रा की उपस्िथति में परावैद्युत का नेट द्विधु्रव आघूणर् प्रदान करते हैं। ध्रुवी अणुओं का कोइर् परावैद्युत किसी बाह्य क्षेत्रा में एक नेट द्विधु्रव आघूणर् भी विकसित कर लेता है, परंतु इसका कारण भ्िान्न होता है। किसी बाह्य क्षेत्रा की अनुपस्िथति में, विभ्िान्न स्थायी द्विध्रुव तापीय विक्षोभ के कारण यादृच्िछक अभ्िाविन्यासित होते हंैऋ अतः वुफल द्विध्रुव आघूणर् शून्य होता है। जब कोइर् बाह्य क्षेत्रा अनुप्रयुक्त किया जाता है तो व्यष्िटगत द्विध्रुव आघूणर् क्षेत्रा के साथ संरेख्िात होने लगते हैं। जब सब अणुओं पर इसका योग किया जाता है, तो बाह्य क्षेत्रा की दिशा में एक नेट द्विधु्रव आघूणर् पाया जाता है, अथार्त, परावैद्युत धु्रवित हो जाता है। धु्रवण की सीमा दो परस्पर विरोधी कारकों की आपेक्ष्िाक तीव्रता पर निभर्र करती है, जो इस प्रकार हैं: विद्युत क्षेत्रा में द्विध्रुव स्िथतिज ऊजार् जो द्विधु्रव को क्षेत्रा के साथ संरेख्िात करने का प्रयास करती है, तथा तापीय उफजार् जो संरेखण को बिगाड़ने का प्रयास करती है। इसके अतिरिक्त अध्रुवी अणुओं की भाँति यहाँ भी प्रेरित द्विध्रुव आघूणर् प्रभाव हो सकता है, परंतु व्यापक रूप में संरेखण प्रभाव धु्रवी अणुओं के लिए अिाक महत्वपूणर् होता है। इस प्रकार दोनों ही प्रकरणों में, चाहे धु्रवी हो अथवा अध्रुवी, परावैद्युत किसी बाह्य क्षेत्रा की उपस्िथति में एक नेट द्विधु्रव आघूणर् विकसित कर लेते हैं। किसी पदाथर् का प्रति एकांक आयतन द्विधु्रव आघूणर् उसका धु्रवण कहलाता है तथा इसे च् द्वारा निदिर्ष्ट किया जाता है। रैख्िाक समदैश्िाक परावैद्युतों के लिए च् त्रχ म म् ;2ण्37द्ध यहाँ χ म परावैद्युत का स्िथर अभ्िालक्षण है जिसे परावैद्युत माध्यम की वैद्युत प्रवृिा ;मसमबजतपब ेनेबमचजपइपसपजलद्ध कहते हैं। इसको ;χ म कोद्ध पदाथर् के आण्िवक गुण से संबंिात करना संभव है, परंतु हम यहाँ इस पर चचार् नहीं करेंगे। अब प्रश्न यह है कि कोइर् ध्रुवित परावैद्युत अपने भीतर किसी मूल बाह्य क्षेत्रा को रूपांतरित वैफसे करता है? सरलता की दृष्िट से हम किसी ऐसे आयताकार परावैद्युत गुटके पर विचार करते हैं जो किसी ऐसे एकसमान बाह्य क्षेत्रा म् व में रखा है, जो गुटके के दो पफलकों के समांतर है। क्षेत्रा के कारण परावैद्युत में एकसमान ध्रुवण च् होता है। इस प्रकार गुटके के प्रत्येक आयतन अल्पांश Δअ का क्षेत्रा की दिशा में एक द्विध्रुव आघूणर् च् Δअ होता 72 है। स्थूल रूप से आयतन अल्पांश Δअ छोटा होता है, परंतु इसमें अत्यध्िक संख्या में स्िथरवैद्युत विभव तथा धरिता आण्िवक द्विध्रुव होते हैं। परावैद्युत के भीतर किसी भी स्थान पर आयतन अल्पांश Δअ पर कोइर् नेट आवेश नहीं होता ;यद्यपि इसका नेट द्विध्रुव आघूणर् होता हैद्ध। इसका कारण यह है कि एक द्विध्रुव के धनावेश अपने से संलग्न द्विध्रुव के )णावेश के निकट होते हैं। परंतु, परावैद्युत के पृष्ठ पर विद्युत क्षेत्रा के अभ्िालंबवत स्पष्ट रूप से एक नेट आवेश घनत्व होता है। जैसा कि चित्रा 2ण्23 में दशार्या गया है, दाएँ पृष्ठ पर द्विध्रुवों के धनात्मक सिरे तथा बाएँ पृष्ठ पर द्विधु्रवों के )णात्मक सिरे अनुदासित रह जाते हैं। असंतुलित आवेश बाह्य क्षेत्रा के कारण प्रेरित आवेश होते हैं। अतः धु्रवित परावैद्युत दो आवेश्िात पृष्ठों के तुल्य होता है, जिनके प्रेरित पृष्ठीय आवेश घनत्व, σ च तथा दृσ च हैं। स्पष्ट है कि इन पृष्ठीय आवेशों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्रा बाह्य क्षेत्रा का विरोध करते हैं। इस प्रकार परावैद्युत में वुफल क्षेत्रा, उस प्रकरण की तुलना में जिसमें कोइर् परावैद्युत नहीं है, कम हो जाता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि, पृष्ठीय आवेश घनत्व ± σ च परावैद्युत में मुक्त आवेशों के कारण नहीं वरन् परिब( आवेशों से उत्पन्न होता है। चित्रा2ण्23कोइर् एकसमान धु्रवित परावैद्युत पृष्ठीय आवेश घनत्व के समान होता है, परंतु 2ण्11 संधरित्रा तथा धरिता किसी आयतनी आवेश घनत्व के नहीं। कोइर् संधारित्रा विद्युतरोधी द्वारा पृथक दो चालकों का एक निकाय होता है ;चित्रा 2ण्24द्ध। चालकों पर आवेश फ1 तथा फ2 तथा उनके विभव क्रमशः ट1तथा ट2 हैं। प्रायः, व्यवहार में, दो चालकों पर आवेश फ तथा −फ होते हैं तथा उनमें विभवांतर ट त्र ट1−ट2 होता है। हम केवल इसी प्रकार के विन्यास के संधारित्रा पर विचार करेंगे। ;एक सरल चालक को भी संधरित्रा की भाँति प्रयोग किया जा सकता है, यदि दूसरे को अनंत पर मानेद्ध दोनों चालकों को किसी बैटरी के दो टमिर्नलों से संयोजित करके आवेश्िात कराया जा सकता है। फको संधारित्रा का आवेश कहते हैं, यद्यपि, वास्तव में यह संधारित्रा के एक चालक पर आवेश होता है - संधारित्रा का वुफल आवेश शून्य होता है। चालकों के बीच के क्षेत्रा में विद्युत क्षेत्रा आवेश फके अनुक्रमानुपाती होता है। अथार्त, यदि संधारित्रा पर आवेश दोगुना कर दिया जाए तो हर ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा दोगुना हो जाएगा। ;यह वूफलाॅम के नियम तथा अध्यारोपण सि(ांत द्वारा अंतनिर्हित विद्युत क्षेत्रा तथा आवेश के बीच अनुक्रमानुपात का अनुगामी है।द्ध अब, विभवांतर टकिसी लघु परीक्षण आवेश को क्षेत्रा के विरु( चालक 2 से 1 तक ले जाने में प्रति एकांक धनावेश द्वारा किए गए कायर् के बराबर होता है। इसके पफलस्वरूप, टभीफके अनुक्रमानुपाती है, तथा अनुपात फध्टएक नियतांक है - फब् ट त्र ;2ण्38द्ध यहाँ ब्एक नियतांक है जिसे संधारित्रा की धारिता कहते हैं। जैसा कि पहले वणर्न किया जा चुका है धारिता ब्आवेश फअथवा विभवांतर टपर निभर्र नहीं करती। धारिता ब् केवल दो चालकों के निकाय के ज्यामितीय विन्यास ;आकार, आकृति, पृथकनद्ध पर निभर्र करती है। ¹जैसा कि हम आगे देखेंगे, यह दोनों चालकों को पृथक करने वाले माध्यम अथार्त विद्युतरोधी ;परावैद्युतद्ध की प्रकृति पर निभर्र चालक 1 चालक 2 करती हैह्। धारिता का ैप् एकांक 1 पैफरड त्र 1 वूफलाॅम प्रति वोल्ट चित्रा2ण्24विद्युतरोधी से पृथक दो चालकों का कोइर् निकाय अथवा 1थ् त्र 1 ब् टदृ1है। नियत धारिता के संधारित्रा का प्रतीक ..द्यद्य.., जबकि परिवतीर् धारिता के संधारित्रा का प्रतीक है। संधारित्रा का निमार्ण करता है। 73 भौतिकी समीकरण ;2ण्38द्ध यह दशार्ती है कि बड़े ब् के लिए यदि फ नियत है तो ट लघु होता है। इसका अथर् यह है कि बड़ा संधारित्रा लघु विभव ट पर अपेक्षाकृत आवेश फ के बड़े परिमाण को परिब( कर सकता है। इसकी व्यावहारिक उपयोगिता है। उच्च विभवांतर में चालक के चारों ओर प्रबल विद्युत क्षेत्रा की उपस्िथति अंतनिर्हित है। कोइर् प्रबल विद्युत क्षेत्रा चारों ओर की वायु को आयनीकृत करके उत्पन्न आवेशों को त्वरित कर सकता है जो विजातीय आवेश्िात पिðकाओं पर पहुँचकर उन्हें आंश्िाक उदासीन कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, संधारित्रा का आवेश दोनों पिकाओं के बीच केð माध्यम की विद्युतरोधी क्षमता में ”ास के कारण क्षरित हो सकता है। वह अिाकतम विद्युत क्षेत्रा जिसे कोइर् परावैद्युत माध्यम बिना भंजन ;उसके विद्युतरोधी गुणधमर्द्ध के सहन कर सकता है, उस माध्यम की परावैद्युत सामथ्यर् कहलाती है। वायु के लिए यह लगभग 3 × 106 ट उदृ1 है। दो चालकों के बीच 1 बउ कोटि के पृथकन के लिए यह क्षेत्रा चालकों के बीच 3 × 104 ट विभवांतर के तदनुरूपी होता है। अतः किसी संधारित्रा के लिए बिना किसी क्षरण के अत्यिाक मात्रा में आवेश को संचित करने के लिए उसकी धारिता को इतना अिाक उच्च अवश्य होना चाहिए कि उनके बीच विभवांतर अथवा विद्युत क्षेत्रा उसकी भंजन सीमा से अिाक न हो। इसे भ्िान्न शब्दों में इस प्रकार भी कह सकते हैं कि किसी दिए गए संधारित्रा की बिना किसी साथर्क क्षरण के आवेश को संचित करने की एक सीमा होती है। व्यवहार में, 1 पैफरड, धारिता का बहुत बड़ा मात्राक है, धारिता के अिाक सामान्य मात्राक, इस मात्राक ;अथार्त पैफरडद्ध के अपवतर्क हैंः 1 - थ् त्र 10−6 थ्ए 1 दथ् त्र 10−9 थ्ए 1 चथ् त्र 10−12 थ् आदि। आवेशों को संचित करने के अतिरिक्त संधारित्रा अिाकांश प्रत्यावतीर् धारा परिपथों ;ंब परिपथोंद्ध में प्रमुख अवयवों के रूप में उपयोग होते हैं। अध्याय 7 में ंब परिपथों में संधारित्रों के महत्वपूणर् प्रकायो± का वणर्न किया गया है। 2ण्12 समांतर प‘िका संधरित्रा किसी समांतर पिðका संधारित्रा में दो बड़ी समतल एक.दूसरे के समांतर चालक पिकाएँ होती हैं,ð जिनके बीच पृथकन कम होता है ;चित्रा 2ण्25द्ध। हम सवर्प्रथम दो पिðकाओं के बीच माध्यम के रूप में निवार्त को लेते हैं। अगले अनुभाग में पिðकाओं के बीच परावैद्युत माध्यम के प्रभाव का वणर्न किया गया है। मान लीजिए प्रत्येक पिðका का क्षेत्रापफल । तथा उनके बीच पृथकन क है। दोनों पिðकाओं पर आवेश फ तथा −फ है। चूँकि पिðकाओं की रैख्िाक विमाओं की तुलना में क बहुत छोटा है ;क2 ढढ ।द्धए हम एकसमान आवेश्िात पृष्ठीय घनत्व σ की अनंत समतल चादर के विद्युत क्षेत्रा के परिणाम का उपयोग कर सकते हैं ;देख्िाए अनुभाग फपृष्ठीय त्र1ण्15द्ध। पिðका 1 का पृष्ठीय आवेश घनत्व σ तथा पिðका ।2 का पृष्ठीय आवेश घनत्व −σ है। विभ्िान्न क्षेत्रों में समीकरण ;1ण्33द्ध का उपयोग करने पर विद्युत क्षेत्रा - बाह्य क्षेत्रा प् ;पिðका 1 के ऊपर का क्षेत्राद्ध σσ म् त्र−त्र 0 ;2ण्39द्ध2ε02ε0 बाह्य क्षेत्रा प्प् ;पिðका 2 के नीचे का क्षेत्राद्ध पृष्ठीय σσ म् त्र−त्र 0 ;2ण्40द्धआवेश घनत्व 2ε02ε0 चित्रा 2ण्25 समांतर पिðका संधारित्रा। पिðकाओं 1 तथा 2 के भीतरी क्षेत्रा में, दो आवेश्िात पिðकाओं के 74 कारण विद्युत क्षेत्रा जुड़ जाते हैं और हमें प्राप्त होता है - σ σσ फम् त्र ़ त्रत्र ;2ण्41द्ध2 εε ।ε0 20 ε00 विद्युत क्षेत्रा की दिशा धनावेश्िात पिðका से )णावेश्िात पिðका की ओर है। इस प्रकार, दो पिðकाओं के बीच विद्युत क्षेत्रा स्थानीकृत हो जाता है तथा यह एक सिरे से दूसरे सिरे तक एकसमान होता है। परिमित क्षेत्रापफल की पिðकाओं के लिए पिðकाओं की बाहरी सीमा के निकट यह लागू नहीं होता। पिðकाओं के किनारों पर क्षेत्रा रेखाएँ बाहर की ओर मुड़ जाती हैं - इस प्रभाव को ‘क्षेत्रा का उपांत प्रभाव’ कहते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि समस्त पिðका पर पृष्ठीय आवेश घनत्व σ यथाथर् रूप से एकसमान नहीं होता ¹म् तथा σ समीकरण ;2ण्35द्ध द्वारा संबंिात हैंह्। तथापि, क2 ढढ । के लिए ये प्रभाव किनारों से कापफी दूर के क्षेत्रों के लिए उपेक्षणीय हैंऋ तथा वहाँ क्षेत्रा समीकरण ;2ण्41द्ध के अनुसार होता है। अब एकसमान विद्युत क्षेत्रों के लिए विभवांतर, विद्युत क्षेत्रा तथा पिðकाओं के बीच की दूरी के गुणनपफल के बराबर होता है। अथार्त 1 फक ट त्र म्क त्र ε । ;2ण्42द्ध 0 तब समांतर पिðका संधारित्रा ब् की धारिता फ ε0 । ब् त्र त्र त्र ;2ण्43द्धटक जो कि, अपेक्षानुसार, निकाय की ज्यामिति पर निभर्र करता है। प्रारूपी मानों, जैसे । त्र 1 उ2ए क त्र 1 उउ के लिए −12 2दृ1 दृ2 28ण्85 × 10 ब्छ उ × 1उ −9ब् त्र−3 त्र 8ण्85 × 10 थ् ;2ण्44द्ध10 उ ¹आप यह जाँच कर सकते हैं कि 1 थ् त्र 1 ब् टदृ1 त्र 1 ब् ;छ ब्−1उद्ध−1 त्र 1ब्2 छ−1 उ−1ह्। इससे प्रकट होता है कि जैसा पहले वणर्न किया जा चुका है कि 1 थ् व्यवहार में धरिता का एक बहुत बड़ा एकांक है। 1 थ् की ‘विशालता’ को देखने का एक ढंग और भी है कि हम यह ज्ञात करें कि 1थ् धारिता के समांतर पिðका संधारित्रा की पिकाओं का क्षेत्रापफल,ð यदि उनके बीच दूरी 1 बउ है, कितना होना चाहिए। अब चूँकि ब्क 1थ् × 10 −2उ 92। त्रत्र त्र 10 उ ε−12 2 दृ1 दृ2 ;2ण्45द्ध 0 8ण्85 × 10 ब्छ उ अथार्त पिका की लंबाइर् व चैड़ाइर् लगभगð 30 ाउ होनी चाहिए! 2ण्13 धरिता पर परावैद्युत का प्रभाव किसी बाह्य क्षेत्रा में परावैद्युतों के व्यवहार के बारे में जानकारी के पश्चात आइए अब हम यह देखें कि किसी समांतर पिðका संधारित्रा की धारिता किसी परावैद्युत की उपस्िथति द्वारा किस प्रकार रूपांतरित होती है। पहले की ही भाँति यहाँ भी हमारे पास दो बड़ी पिðकाएँ, जिनमें प्रत्येक का क्षेत्रापफल । है, एक.दूसरे से क दूरी द्वारा पृथक हैं। पिðकाओं पर आवेश ± फ है, जो कि आवेश घनत्व ± σ ;जहाँ σ त्र फध्।द्ध के तदनुरूपी है। जब दोनों पिðकाओं के बीच निवार्त है, तब σ म् त्र 0 ε0 तथा विभवांतर ट0 है, 75 धरिता, कायर्रत संधरित्रा को प्रभावित करने वाले कारकप्रभावी जावा श्िाक्षकीय सामग्रीीजजचरूध्ध्उपबतवण्उंहदमजण्ेिनण्मकनध्मसमबजतवउंहध्रंअंध्बंचंबपजंदबमध् भौतिकी 76 ट त्र म्क00इस प्रकरण में धारिता ब् व है, फ। ब् त्र त्रε0 0 ;2ण्46द्धटक0 इसके पश्चात हम उस प्रकरण पर विचार करते हैं जिसमें दोनों पिðकाओं के बीच के समस्त क्षेत्रा को किसी परावैद्युत द्वारा भर दिया गया है। क्षेत्रा द्वारा समस्त परावैद्युत ध्रुवित हो जाता है, तथा जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया जा चुका है, यह प्रभाव दो आवेश्िात चादरों ;परावैद्युत के पृष्ठों पर क्षेत्रा के अभ्िालंबवतद्ध के समतुल्य है जिनके पृष्ठीय आवेश घनत्व σ च तथा दृσ च हैं। इस स्िथति में परावैद्युत में विद्युत क्षेत्रा उस प्रकरण के तदनुरूपी होता है जिसमें पिकाओं पर नेट आवेश घनत्वð ± ;σ दृ σ चद्ध होता है। अथार्त σ −σ म् त्र च् ;2ण्47द्धε0 अतः पिकाओं के सिरों पर विभवांतरð σ −σ ट त्र म्क त्र च् क ;2ण्48द्धε0 रैख्िाक परावैद्युतों के लिए, हम अपेक्षा करते हैं कि σ चए म्0 अथार्त σ के अनुक्रमानुपाती हो। इस प्रकार ;σ−σ चद्धए σ के अनुक्रमानुपाती है तथा हम लिख सकते हैं कि - σ σ −σच् त्र ;2ण्49द्धज्ञ यहाँ ज्ञ परावैद्युत का एक स्िथर अभ्िालक्षण है। स्पष्ट है कि ज्ञ झ 1ए तब σक फक ट त्रत्र ;2ण्50द्धε ज्ञ।ε ज्ञ00 पिकाओं के बीच परावैद्युत होने पर, धारिताð ब् फ ε0ज्ञ। ब् त्रत्र ;2ण्51द्धटक गुणनपफल ε0 ज्ञ को माध्यम का परावैद्युतांक कहते हैं तथा इसे ε के द्वारा निदिर्ष्ट किया जाता है। ε त्र ε0 ज्ञ ;2ण्52द्ध निवार्त के लिए ज्ञ त्र 1ए तथा ε त्र ε0य ε0 को निवार्त का परावैद्युतांक कहते हैं। विमाहीन अनुपात ε ज्ञ त्र ε ;2ण्53द्ध 0 को पदाथर् का परावैद्युतांक कहते हैं। जैसी कि पहले टिप्पणी की जा चुकी है, समीकरण ;2ण्49द्ध से, यह स्पष्ट है कि ज्ञ झ 1 अथार्त ज्ञ का मान 1 से अिाक है। समीकरणों ;2ण्46द्ध तथा ;2ण्51द्ध से ब् ज्ञ त्र ;2ण्54द्धब्0 इस प्रकार किसी पदाथर् का परावैद्युतांक एक कारक ;झ 1द्ध है जिसके द्वारा जब किसी संधारित्रा की पिðकाओं के बीच कोइर् परावैद्युत पदाथर् पूणर्तः भर दिया जाता है, तो उसके धारिता के मान में निवार्त के मान से वृि हो जाती है। यद्यपि हम समांतर पिका संधारित्रा केð प्रकरण के लिए समीकरण ;2ण्54द्ध पर पहुँचे हैं, तथापि यह हर प्रकार के संधारित्रों पर लागू होता है तथा वास्तव में इसे व्यापक रूप में किसी पदाथर् के परावैद्युतांक की परिभाषा के रूप में देखा जा सकता है। उदाहरण 2ण्8 ज्ञ परावैद्युतांक के पदाथर् के किसी गुटके का क्षेत्रापफल समांतर पिðका संधारित्रा की पिðकाओं के क्षेत्रापफल के समान है परंतु गुटके की मोटाइर् ;3ध्4द्धक है, यहाँ क पिððकाओं के बीच पृथकन है। पिकाओं के बीच गुटके को रखने पर संधारित्रा की धारिता में क्या परिवतर्न हो जाएगा? हल मान लीजिए जब पिðकाओं के बीच कोइर् परावैद्युत नहीं है तो पिðकाओं के बीच विद्युत क्षेत्रा म्0 त्र ट0ध्क है तथा विभवांतर ट0 है। यदि अब कोइर् परावैद्युत पदाथर् रख दिया जाता है तो परावैद्युत में विद्युत क्षेत्रा म् त्र म्0 ध् ज्ञ होगा। तब विभवांतर होगा 77 भौतिकी 1 म्03 ट त्र म्0; कद्ध ़ ; कद्ध4 ज्ञ 4 13 ज्ञ ़ 3 त्र म्क ; ़ द्ध त्र ट044ज्ञ 04ज्ञ विभवांतर ;ज्ञ ़ 3द्धध्4ज्ञ के गुणज द्वारा कम हो जाता है जबकि पिð0काओं पर आवेश फअपरिवतिर्त रहता है। इस प्रकार संधारित्रा की धारिता में वृि हो जाती है फ04ज्ञफ04ज्ञ ब् त्रत्र त्र ब् टज्ञ ़ 3 ट0 ज्ञ ़ 30 2ण्14 संधरित्रों का संयोजन हम कइर् संधारित्रों जिनकी धारिताएँ ब्1ए ब्2एण्ण्ण्ए ब् द हैं, के संयोजन द्वारा एक प्रभावी धारिता ब् का निकाय प्राप्त कर सकते हैं। यह प्रभावी धारिता व्यष्िटगत संधारित्रों को संयोजित करने के ढंग पर निभर्र करती है। दो संभावित सरल संयोजन इस प्रकार हैं: 2ण्14ण्1 संधरित्रों का श्रेणीक्रम संयोजन चित्रा 2ण्26 में दो संधारित्रा ब्1 तथा ब्2 श्रेणीक्रम में संयोजित दशार्ए गए हैं। ब्1 की बाईं तथा ब्2 की दाईं पिका बैटरी के दो टमिर्नलों से संयोजित हैं तथा उन पर क्रमशःð फ तथा −फ आवेश है। इसका अथर् यह है कि ब्1 की दाईं पिðका पर −फ तथा ब्2 की बाइर्± पिकाð पर आवेश ़फ है। यदि ऐसा नहीं है, तो संधारित्रा की दोनों पिðकाओं पर नेट आवेश शून्य नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप ब्1 तथा ब्2 को संयोजित करने वाले चालक में कोइर् विद्युत क्षेत्रा होगा तथा ब्1 एवं ब्2 में आवेश उस समय तक प्रवाहित होता रहेगा, जब तक कि प्रत्येक संधारित्रा ब्1 तथा ब्2 पर नेट आवेश शून्य नहीं हो जाता तथा ब्1 एवं ब्2 को संयोजित करने वाले चालक में विद्युत क्षेत्रा शून्य नहीं होता। अतः श्रेणीक्रम संयोजन में प्रत्येक संधारित्रा की दोनों पिðकाओं पर आवेश ;±फद्ध समान होता है। संयोजन के सिरों पर विभवपात ट संधारित्रों ब्तथा ब्के सिरों पर क्रमशः विभवपातों टतथा टका12 12 योग होता है - फफ ़ट त्र ट ़ ट त्र ;2ण्55द्धब्ब्चित्रा 2ण्26 दो संधारित्रों का श्रेणीक्रम संयोजन। 1212 ट 11 त्ऱअथार्त, ए ;2ण्56द्धफब्1 ब्2 हम इस संयोजन को एक ऐसा प्रभावी संधारित्रा मान सकते हैं जिस पर आवेश फ तथा जिसके सिरों के बीच विभवांतर ट हो। तब संयोजन की प्रभावी धारिता - फब् त्र ;2ण्57द्धट समीकरण ;2ण्57द्ध की समीकरण ;2ण्56द्ध से तुलना करने पर हमें निम्नलिख्िात संबंध् प्राप्त होता है - 11 1 त्ऱ ;2ण्58द्धचित्रा 2ण्27 द संधारित्रों का श्रेणीक्रम संयोजन। ब्ब्1 ब्2 स्पष्ट है कि इस व्युत्पिा को हम कितने भी संधारित्रा लेकर, उन्हें इसी प्रकार संयोजित करके78 द संधारित्रों के लिए समीकरण ;2ण्55द्ध का व्यापकीकरण कर सकते हैं - फफ फट त्र ट ़ ट ़ ण्ण्ण् ़ ट त्ऱ़ ण्ण्ण् ़12 द ;2ण्59द्धब्ब् ब्12 द जिन चरणों का हमने दो संधारित्रों के प्रकरण में उपयोग किया था, उन्हीं चरणों का उपयोग द संधारित्रों के संयोजन के लिए करके, हम द संधारित्रों के श्रेणीक्रम संयोजन के लिए प्रभावी धारिता का व्यापक सूत्रा प्राप्त कर सकते हैं: 1111 1 त्ऱ़़ ण्ण्ण् ़ ;2ण्60द्धब्ब्ब्ब् ब्123 द 2ण्14ण्2 संधरित्रों का पाश्वर्क्रम संयोजन चित्रा 2ण्28;ंद्ध में दो संधारित्रा पाश्वर्क्रम में संयोजित दशार्ए गए हैं। इस प्रकरण में दोनों संधारित्रों पर समान विभवांतर अनुप्रयुक्त किया गया है। परंतु संधारित्रा 1 की पिकाओं पर आवेशð ;± फ1 द्ध का परिमाण संधारित्रा 2 की पिðकाओं पर आवेश ;± फ2 द्ध के समान होना आवश्यक नहीं है: फ1 त्र ब्1टए फ2 त्र ब्2ट ;2ण्61द्ध यदि इस संयोजन के तुल्य किसी संधारित्रा पर आवेश फ त्र फ1 ़ फ2 ;2ण्62द्ध तथा विभवांतर ट है: फ त्र ब्ट त्र ब्1ट ़ ब्2ट ;2ण्63द्ध तो समीकरण ;2ण्63द्ध से प्रभावी धारिता ब् ब् त्र ब्1 ़ ब्2 ;2ण्64द्ध द संधारित्रों के पाश्वर्क्रम संयोजन के लिए प्रभावी धारिता ब् के लिए व्यापक सूत्रा, इसी प्रकार प्राप्त किया जा सकता है ¹चित्रा 2ण्28;इद्धह्: फ त्र फ1 ़ फ2 ़ ण्ण्ण् ़ फद ;2ण्65द्ध अथार्त, ब्ट त्र ब्1ट ़ ब्2ट ़ ण्ण्ण् ब्दट ;2ण्66द्ध इससे प्राप्त होता है ब् त्र ब्1 ़ ब्2 ़ ण्ण्ण् ब्द ;2ण्67द्ध चित्रा 2ण्28 ;ंद्ध दो संधारित्रों, ;इद्ध द संधारित्रों का पाश्वर्क्रम संयोजन। भौतिकी हल ;ंद्ध दिए गए नेटववर्फ में तीन संधारित्रा ब्1ए ब्2 तथा ब्3 श्रेणीक्रम में संयोजित हैं। इन तीनों संधारित्रों की प्रभावी धारिता ब्श् इस प्रकार व्यक्त की जाती है: 1111 त्ऱ़ ब्′ब्ब्ब् ब्त्र ब्त्र ब्त्र 10 - थ्ए ब्′ त्र ;10ध्3द्ध - थ् 123 1 2 3 नेटववर्फ में ब् 4 को ब्श् के पाश्वर्क्रम में संयोजित किया गया है। अतः, समस्त नेटववर्फ की तुल्य धारिता 10 ब् त्र ब्′ ़ ब्4 त्र ़10 - थ् त्र13ण्3 - थ् 3 ;इद्ध चित्रा से स्पष्ट है कि ब्1ए ब्2 तथा ब्3 प्रत्येक पर आवेश समान है, मान लीजिए यह आवेश फ है। मान लीजिए ब्4 पर आवेश फश् है। अब चूँकि ।ठ के सिरों के बीच विभवांतर फध्ब्1ए ठब् के सिरों पर फध्ब्2 तथा ब्क् के सिरों पर फध्ब्3 है, अतः फफफ ़़त्र500 ट ब्ब्ब् ण् 123 तथा फ′ध्ब्4 त्र 500 ट इससे हमें संधरित्रों की विभ्िान्न धरिताओं के दिए गए मानों के लिए फ त्र 500 ट × 10 - थ् त्र 1ण्7 × 10 −3ब् तथा 3 फ′त्र 500 ट ×10 - थ् त्र 5ण्0 ×10 −3ब् 2ण्15 संधरित्रा में संचित ऊजार् जैसा कि हमने ऊपर चचार् में अध्ययन किया, संधारित्रा दो चालकों का एक ऐसा निकाय होता है जिस पर आवेश फ तथा −फ होते हैं तथा जिनमें वुफछ पृथकन होता है। इस विन्यास में संचित ऊजार् ज्ञात करने के लिए आरंभ में दो अनावेश्िात चालकों 1 तथा 2 पर विचार कीजिए। अब चालक 2 से चालक 1 पर आवेश को छोटे - छोटे टुकड़ों में स्थानांतरित करने की किसी प्रिया की कल्पना कीजिए, ताकि अंत में चालक 1 पर फ आवेश आ जाए। आवेश संरक्षण नियम के अनुसार अंत में चालक 2 पर −फ आवेश होता है ;चित्रा 2ण्30द्ध। आवेश को 2 से 1 पर स्थानांतरित करने में बाह्य कायर् करना होता है, चूँकि हर चरण में चालक 2 की तुलना में चालक 1 अिाक विभव पर होता है। किए गए वुफल कायर् का परिकलन करने के लिए पहले हम छोटे - छोटे चरणों में आवेश की अत्यल्प ;अथार्त लोप ¯बदु तक छोटीद्ध मात्रा को स्थानांतरित करने में किया गया कायर् परिकलित करते हैं। उस माध्य स्िथति पर विचार कीजिए जिसमें चालकों 1 तथा 2 पर क्रमशः आवेश फश् तथा −फश् हैं। इस स्िथति में, चालकों 1 तथा 2 के बीच विभवांतर ट′ त्र फ′ध्ब् होता है, यहाँ ब् निकाय की धारिताचित्रा 2ण्30 ;ंद्ध चालक 1 पर फश् से फश् ़ δफश् है। अब यह कल्पना कीजिए कि लघु आवेश δफश् चालक 2 से 1 मेंतक लघु चरणों में आवेश नि£मत करने में किया गया कायर्। ;इद्ध संधारित्रा को आवेश्िात करने में स्थानांतरित किया जाता है। इस चरण में किया गया कायर् ;δॅश् द्धए किया गया वुफल कायर् का अवलोकन दोनों जिसके परिणामस्वरूप चालक 1 पर आवेश फश् से बढ़कर फश् ़ δफश् पिðहो जाता है, इस प्रकार व्यक्त किया जाता है: काओं के बीच विद्युत क्षेत्रा में संचित ऊजार् के रूप में किया जा सकता है। फ′ 80 δ ॅ त्र ट ′δ फ′त्र δ फ′ ;2ण्68द्धब् चूँकि δफश् को हम जितना चाहें छोटा बना सकते हैं, समीकरण ;2ण्68द्ध को हम इस प्रकार भी लिख सकते हैं 1 22δॅ त्र ख्; फ′़δफ′द्ध − फ′ , ;2ण्69द्ध2ब् समीकरण ;2ण्69द्ध मेंδफश् की द्वितीय कोटि के पद अथार्त δ फ ′2ध्2ब् की δफश् के यादृच्िछक छोटे होने के कारण नगण्य मानकर उपेक्षा की जा सकती है। अतः समीकरण ;2ण्68द्ध तथा ;2ण्69द्ध सवर्सम हैं। वुफल किया गया कायर् ;ॅद्धए आवेश फश् को शून्य से फ तक बढ़ाने में अत्यिाक चरणों में किए गए लघु कायो± ;δॅद्ध का योग होता है - ॅ त्र ∑ δ ॅ सभी चरणांेका यागेत्र ∑ 21 ब् ख्; फ′़δफ′द्ध2 − फ′2, ;2ण्70द्धसभी चरणांेका यागे1 2 22 22त्र ख्क्ष् δ फ′− 0द्व ़ क्ष्;2 δ फ′द्ध −δ फ′ द्व ़क्ष्;3 δ फ′द्ध − ;2 δ फ′द्धद्व ़ ण्ण्ण् 2ब् 22़ क्ष्फ − ;फ −δफद्ध द्व, ;2ण्71द्ध 12फ त्र ख्फ2 − 0, त्र ;2ण्72द्ध2ब् 2ब् यही परिणाम सीधे ही, समीकरण ;2ण्68द्ध से समाकलन द्वारा प्राप्त किया जा सकता हैः फ2फफ श्1 फ श्2 फ ॅ त्रδ फ श् त्र त्र 0 ब्ब् 2 2ब्0 इसमें आश्चयर् की कोइर् बात नहीं है क्योंकि समाकलन बहुत से छोटे पदों का योग ही होता है। अंतिम परिणाम, समीकरण ;2ण्72द्ध, को हम भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं: फ21 21 ॅ त्रत्र ब्ट त्र फट ;2ण्73द्ध2ब् 22 चूँकि स्िथरवैद्युत बल संरक्षी बल है, यह कायर् निकाय में स्िथतिज ऊजार् के रूप में संचित हो जाता है। यही कारण है कि स्िथतिज ऊजार् का अंतिम परिणाम, समीकरण ;2ण्73द्धए जिस ढंग से संधरित्रा का आवेश विन्यास निमिर्त किया गया है, उस ढंग पर निभर्र नहीं करता। जब कोइर् संधारित्रा निरावेश्िात होता है तो उसमें संचित ऊजार् मुक्त हो जाती है। संधारित्रा की पिðकाओं के बीच विद्युत क्षेत्रा में ‘संचित’ हुइर् स्िथतिज ऊजार् के रूप में समझना संभव है। इसे देखने के लिए, सरलता की दृष्िट से, किसी समांतर पिðका ;प्रत्येक का क्षेत्रापफल ।द्ध संधारित्रा जिसकी पिðकाओं के बीच पृथकन क है, पर विचार कीजिए। संधारित्रा में संचित ऊजार् 1 फ2;।σ द्ध2 क त्र त्र× ;2ण्74द्ध2 ब् 2 ε0 । पृष्ठीय आवेश घनत्व σ पिðकाओं के बीच विद्युत क्षेत्रा म् से संबंिात है - σ म् त्र ε ;2ण्75द्ध 0 समीकरणों ;2ण्74द्ध तथा ;2ण्75द्ध से प्राप्त होता है - संधारित्रा में संचित ऊजार् 2 81न् त्र ;1ध्2 द्धε0म् × ।क ;2ण्76द्ध भौतिकी ध्यान दीजिए, ।क दोनों पिðकाओं के बीच के क्षेत्रा का आयतन है ;इसी क्षेत्रा में केवल विद्युत क्षेत्रा होता हैद्ध। यदि हम ऊजार् घनत्व को दिक्स्थान के प्रति एकांक आयतन में संचित ऊजार् के रूप में परिभाष्िात करें तो, समीकरण ;2ण्76द्ध के अनुसार विद्युत क्षेत्रा का ऊजार् घनत्व न त्र;1ध्2द्धε0म्2 ;2ण्77द्ध यद्यपि हमने समीकरण ;2ण्77द्ध समांतर पिðका संधारित्रा के प्रकरण में व्युत्पन्न की है, किसी विद्युत क्षेत्रा का ऊजार् घनत्व से संबंिात परिणाम वास्तव में, अत्यंत व्यापक है तथा यह किसी भी आवेश विन्यास के कारण विद्युत क्षेत्रा पर लागू होता है। 82 2ण्16 वान डे ग्रापफ जनित्रा यह एक ऐसी मशीन है जो वुफछ मिलियन वोल्ट की कोटि की वोल्टता निमिर्त कर सकती है। इन वोल्टताओं के पफलस्वरूप प्राप्त विशाल विद्युत क्षेत्रों का उपयोग आवेश्िात कणों ;इलेक्ट्राॅन, प्रोटाॅन, आयनद्ध को त्वरित करके उनकी ऊजार्ओं में वृि करने में किया जाता है। अत्यिाक उच्च ऊजार् युक्त आवेश्िात कणों की आवश्यकता लघुस्तरीय द्रव्य की संरचना के परीक्षण के लिए किए जाने वाले प्रयोगों में होती है। इस मशीन के कायर् करने के सि(ांत निम्न प्रकार हैं - मान लीजिए हमारे पास त्रिाज्या त् का एक बड़ा गोलीय चालक खोल ;कोशद्ध है जिसे हमने आवेश फ दिया है। यह आवेश स्वयं गोले के समस्त पृष्ठ पर एकसमान रूप से पैफल जाता है। जैसा कि हम अनुभाग 1ण्14 में देख चुके हैं, गोले के बाहर विद्युत क्षेत्रा ठीक ऐसा ही है जैसा कि गोले के वेंफद्र पर ¯बदु आवेश फ के कारण होता है, जबकि गोले के भीतर विद्युत क्षेत्रा लुप्त हो जाता है। अतः गोले के बाहर ¯बदु आवेश का विभव होता हैऋ तथा गोले के भीतर विभव स्िथर होता है, अथार्त विभव का मान त्रिाज्या त् पर विभव के बराबर होता है। अतः आवेश फ वहन करने वाले त् त्रिाज्या के गोलीय चालक खोल के भीतर विभव समान है, इसका मान है 1 फ ;2ण्78द्ध4πε0 त् अब, जैसा कि चित्रा 2.32 में दशार्या गया है, हम यह मानते हैं कि किसी प्रकार से ु आवेश युक्त त त्रिाज्या का छोटा गोला बड़े गोले के भीतर उसके वेंफद्र पर रख देते हैं। तब स्पष्ट रूप से इस नए आवेश ु के कारण चित्रा में दशार्यी गइर् त्रिाज्याओं पर विभवों के निम्नलिख्िात मान होंगे - ु आवेश युक्त त त्रिाज्या के छोटे गोले के कारण विभव 1 ु त्र छोटे गोले के पृष्ठ पर4πε0 त 1 ु त्र त्रिाज्या त् के बड़े खोल पर ;2ण्79द्ध4πε0 त् ु पर फ दोनों आवेशों को ध्यान में रखते हुए हमें वुफल विभव ट तथा विभवांतर के मान इस प्रकार प्राप्त होते हैं - 1 फुटत् ;द्धत्ऱ ए4πε0 त्त् 1 फुटत ;द्ध त्ऱ ए4πε0 त्त ु 11 टत ; द्ध दृ टत् ;द्धत्र दृ ;2ण्80द्ध4πε0 तत् अब यह मानिए कि ु ध्नात्मक है। हम यह जानते हैं कि चाहे बड़े खोल पर कितना भी आवेश संचित क्यों न हो जाए और यदि वह ध्नात्मक भी है, तो भी भीतरी गोला सदैव उच्च विभव पर होता है: ट;तद्ध दृ ट;त्द्ध चित्रा 2ण्32 स्िथरवैद्युत जनित्रा के सि(ांत काअंतर सदैव ध्नात्मक रहता है। फ के कारण विभव त्रिाज्या त् तक स्िथर स्पष्टीकरण। 83रहता है, अतः वह अंतर करते समय निरस्त हो जाता है! वान डे ग्रापफ जनित्रा, सि(ांत व प्रदशर्नीजजचरूध्ध्ूूूण्चीलेपबेण्हसंण्ंबण्नाध््ोामसकवदध्च्नइैबपध्मगीपइपजेध्म्10ध् भौतिकी इसका तात्पयर् यह है कि अब यदि हम छोटे तथा बड़े गोले को तार से संयोजित करें, तो तुरंत ही आवेश छोटे गोले से बड़े गोले में प्रवाहित होगा, यद्यपि आवेश फ का परिमाण कापफी अध्िक है। धनावेश अपनी प्रवृिा के अनुसार उच्च विभव से निम्न विभव की ओर प्रवाहित होता है। इस प्रकार, बशतेर् हम किसी भी प्रकार से छोटे आवेश्िात गोले को बड़े गोले के भीतर रखने में सपफल हो जाएँ, हम इसी ढंग से बड़े गोले पर आवेश का अंबार लगाते रह सकते हैं। समीकरण ;2ण्78द्ध के अनुसार बाहरी गोले का विभव भी बढ़ता जाएगा और इसमें कम - से - कम उस समय तक तो वृि होती ही रहेगी, जब तक वायु के क्षेत्रा को ध्वस्त करने की सीमा तक नहीं पहुँच जाते। यही वान डे ग्रापफ जनित्रा का सि(ांत है। यह एक ऐसी मशीन है जिसके द्वारा कइर् मिलियन वोल्ट का विभवांतर तथा वायु के क्षेत्रा को ध्वस्त कर सकने योग्य, जो कि लगभगचित्रा 2ण्33 वान डे ग्रापफ जनित्रा की संरचना का सि(ांत। 3 × 106 टध्उ है, विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न किया जा सकता है। चित्रा 2ण्33 में वान डे ग्रापफ का व्यवस्था आरेख दशार्या गया है। कइर् मीटर ऊँचा एक विद्युतरोध्ी स्तंभ एक विशाल चालक खोल ;जिसकी त्रिाज्या कइर् मीटर होती हैद्ध को सँभाले रखता है। इसमें दो घ्िारनियाँ लगी होती हैं - जिनमें एक घ्िारनी खोल के वेंफद्र पर तथा दूसरी पफशर् के पास होती है। इन दोनों घ्िारनियों से होकर एक लंबा, पतला, बिना सिरे वाला, विद्युतरोध्ी पदाथर् ;जैसे रबड़ अथवा रेशमद्ध का पट्टðा गुशरता है। इस पट्टðे को निचली घ्िारनी से जुड़े किसी मोटर द्वारा निरंतर घुमाया जाता है। यह पट्टðा निरंतर ही उस आवेश को, जो नीचे लगे बु्रश द्वारा पट्टðे पर छिड़का जाता है, नीचे से ऊपर शीषर् तक ले जाता रहता है। यहाँ यह अपने ध्नावेश को बड़े खोल से संयोजित दूसरे चालक बु्रश को स्थानांतरित कर देता है। इस प्रकार धनावेश खोल पर स्थानांतरित होकर उसके समस्त बाहरी पृष्ठ पर एकसमान रूप से पैफल जाता है। इस प्रकार, इस ढंग से 6 अथवा 8 मिलियन वोल्ट तक की उच्च वोल्टता का अंतर ;भूमि के सापेक्षद्ध बनाए रखा जा सकता है। सारांश 1ण् स्िथरवैद्युत बल एक संरक्षी बल है। किसी बाह्य बल ;स्िथरवैद्युत बल के समान एवं विपरीतद्ध द्वारा आवेश ु को ¯बदु त् से ¯बदु च् तक लाने में किया गया कायर् टच् − टत् होता है, जो कि अंतिम ¯बदु तथा प्रारंभ्िाक ¯बदु के बीच आवेश की स्िथतिज ऊजार्ओं का अंतर होता है। 2ण् किसी ¯बदु पर विभव ;किसी बाह्य एजेंसीद्ध प्रति एकांक धनावेश पर किया गया वह कायर् होता है जो उस आवेश को अनंत से उस ¯बदु तक लाने में किया जाता है। किसी ¯बदु पर विभव किसी योज्यता स्िथरांक के अंतगर्त यादृच्िछक होता है, चूँकि जो राश्िा भौतिक रूप से महत्वपूणर् है वह दो ¯बदुओं के बीच विभवांतर है। यदि अनंत पर किसी आवेश के कारण विभव को शून्य चुनें ;अथवा मानेंद्ध तो मूल ¯बदु पर रखे किसी आवेश फ के कारण स्िथति सदिश त वाले ¯बदु पर वैद्युत विभव 1 फट;द्ध त त्र 4πε त व 3ण् मूल ¯बदु पर स्िथत च द्विध्रुव आघूणर् के ¯बदु द्विध्रुव के कारण स्िथति सदिश त के किसी ¯बदु पर स्िथरवैद्युत विभव 1 ६ ट;द्ध त त्र चत 84 4πε त 2 व यह परिणाम किसी द्विधु्रव ;जिस पर आवेश दृु तथा ु एक.दूसरे से 2ं दूरी पर होंद्ध के लिए त झझ ं शतर् के साथ लागू होता है। 4ण् स्िथति सदिश त1ए त2ए ण्ण्ण्ए त द के आवेशों ु1ए ु2ए ण्ण्ण्ए ुद के आवेश विन्यास का अध्यारोपण सि(ांत द्वारा किसी ¯बदु च् पर विभव 1 ुु ु1 2 दट त्र ; ़़ ण्ण्ण् ़ द्ध4πε तत त व 1च् 2च् दच् यहाँ पर त1च् आवेश ु1 तथा च् के बीच, त2च् आवेश ु2 तथा च् के बीच की दूरी है, तथा अन्य दूरियाँ इसी प्रकार हैं। 5ण् समविभव पृष्ठ एक ऐसा पृष्ठ होता है जिसके सभी ¯बदुओं पर विभव का समान मान होता है। किसी ¯बदु आवेश के लिए, उस आवेश को वेंफद्र मानकर खींचे गए संवेंफद्री गोले समविभव पृष्ठ होते हैं। समविभव पृष्ठ के किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा म् उस ¯बदु से गुशरने वाले अभ्िालंब के अनुदिश होता है। म् की दिशा वही होती है जिस दिशा में वैद्युत विभव तीव्रता से घटता है। 6ण् किसी आवेशों के निकाय में संचित स्िथतिज ऊजार् ;किसी बाह्य बल द्वाराद्ध आवेशों को उनकी स्िथतियों पर लाकर एकत्रा करने में किए जाने वाले कायर् के बराबर होती है। दो आवेशों ु1 तथा ु2 की त1 तथा त2 पर स्िथतिज ऊजार् ुु 1 12न् त्र 4πε व त12 यहाँ त12 दो आवेशों ु1 तथा ु2 के बीच की दूरी है। 7ण् किसी बाह्य विभव ट;तद्ध में आवेश ु की स्िथतिज ऊजार् ुट;तद्ध होती है। एकसमान विद्युत क्षेत्रा म् में किसी द्विधु्रव च की स्िथतिज ऊजार् दृचण्म् होती है। 8ण् किसी चालक के अभ्यंतर में स्िथरवैद्युत क्षेत्रा म् शून्य होता है। किसी आवेश्िात चालक के पृष्ठ के तुरंत बाहर म् पृष्ठ के अभ्िालंबवत् होता है। σ म् त्र ६ ε द, यहाँ द६ बहिमर्ुखी अभ्िालंब के अनुदिश एकांक सदिश तथा σ पृष्ठीय आवेश घनत्व 0 है। किसी चालक के आवेश केवल उसके पृष्ठ पर ही विद्यमान रह सकते हैं। किसी चालक के अंतगर्त ;भीतरद्ध तथा उसके पृष्ठ पर विभव हर ¯बदु पर नियत रहता है। चालक के भीतर किसी आवेशविहीन कोटर ;गुहाद्ध में विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है। 9ण् संधारित्रा दो ऐसे चालकों का निकाय होता है जो किसी विद्युतरोधी द्वारा एक.दूसरे से पृथक रहते हैं। इसकी धारिता ब् को ब् त्र फध्ट द्वारा परिभाष्िात किया जाता है, यहाँ फ तथा −फ इसके दो चालकों के आवेश हैं तथा ट इन दोनों के बीच विभवांतर है। ब् का निधार्रण पूणर्तया संधारित्रा की ज्यामितीय आकृति, आकार, दो चालकों की आपेक्ष्िाक स्िथतियों द्वारा किया जाता है। धारिता का एकांक पैफरड हैः 1 थ् त्र 1 ब् टदृ1 किसी समांतर पिका संधारित्रा ;पिð काओं के बीच निवार्तद्ध के लिएð ब् त्र ε व ।ध्क यहाँ । प्रत्येक पिका का क्षेत्रापफल तथाð क इनके बीच का पृथकन है। 10ण् यदि किसी संधारित्रा की दो पिकाओं के बीच कोइर् विद्युतरोधी पदाथर् ;परावैद्युतद्ध भरा है, तोð आवेश्िात पिकाओं के विद्युत क्षेत्रा के कारण परावैद्युत में नेट द्विधु्रव आघूणर् प्रेरित हो जाता है।ð इस प्रभाव, जिसे धु्रवण कहते हैं, के कारण विपरीत दिशा में एक विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न होता है। इससे परावैद्युत के भीतर नेट विद्युत क्षेत्रा, तथा इसीलिए पिकाओं के बीच विभवांतर घट जाता है।ð परिणामस्वरूप संधारित्रा की धारिता ब्ए ब्0 ;जबकि पिकाओं के बीच कोइर् माध्यम नहीं अथार्तð निवार्त हैद्ध से बढ़ जाती है। ब् त्र ज्ञब्0 जहाँ ज्ञ विद्युतरोधी पदाथर् का परावैद्युतांक है। 11ण् संधारित्रों के श्रेणीक्रम संयोजन के लिए, वुफल धारिता ब् निम्नलिख्िात संबंध द्वारा दशार्इर् जाती है 85 भौतिकी 1 11 1 त्र ़़ ़ ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् ब् ब्ब् ब्1 23 पाश्वर्क्रम संयोजन के लिए वुफल धारिता ब् होती है - ब् त्र ब् ़ ब् ़ ब् ़ ण्ण्ण्ण् 1 23जहाँ ब्1ए ब्2ए ब्3 ण्ण्ण्ण्ण्ण् व्यष्िटगत धारिताएँ हैं। 12ण् आवेश फए वोल्टता ट तथा धारिता ब् के किसी संधारित्रा में संचित ऊजार् म् निम्नलिख्िात संबंधों द्वारा व्यक्त की जाती है - 11 1 फ2 न् त्र फट त्र ब्ट 2 त्र 22 2 ब् किसी विद्युत क्षेत्रा के स्थान पर वैद्युत आवेश घनत्व ;प्रति एकांक आयतन ऊजार्द्ध ;1ध्2द्धε0म्2 होता है। 13ण् वान डे ग्रापफ जनित्रा में एक विशाल गोलीय चालक कोश ;वुफछ मीटर व्यासद्ध होता है। एक गतिशील विद्युतरोधी पट्टðी तथा उचित ब्रुशों के द्वारा कोश को निरंतर आवेश द्वारा स्थानांतरित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप कइर् मिलियन वोल्ट की कोटि का विभवांतर निमिर्त हो जाता है जिसका उपयोग आवेश्िात कणों को त्वरित करने में किया जा सकता है। ख्ड1 स्2 ज्दृ3 ।दृ1,विभव φ अथवा ट ट विभवांतर भौतिक दृष्िट से महत्वपूणर् होता है। ख्डदृ1 स्दृ2 ज्दृ4 ।2,धरिता ब् थ् ध्ु्रवण च् ख्स्दृ2 ।ज्, ब् उ.2 द्विध्ु्रव आघूणर् प्रति एकांक आयतन परावैद्युतांक ज्ञ ¹विमाहीनह् विचारणीय विषय 1ण् स्िथरवैद्युतिकी में स्िथर आवेशों के बीच लगने वाले बलों का अध्ययन किया जाता है। परंतु जब किसी आवेश पर बल आरोपित है तो वह विराम में वैफसे हो सकता है? अतः जब दो आवेशों के बीच लगने वाले स्िथरवैद्युत बल के विषय में चचार् करते हैं, तो यह समझा जाना चाहिए कि प्रत्येक आवेश वुफछ अनिदिर्ष्ट बलों, जो उस आवेश पर लगे नेट वूफलाॅम बल का विरोध करते हैं, के प्रभाव से विराम में है। 2ण् कोइर् संधारित्रा इस प्रकार विन्यासित होता है कि वह विद्युत क्षेत्रा रेखाओं को एक छोटे क्षेत्रा तक ही सीमित किए रखता है। इस प्रकार, यद्यपि विद्युत क्षेत्रा कापफी प्रबल हो सकता है परंतु संधारित्रा की दो पिðकाओं के बीच विभवांतर कम होता है। 3ण् किसी गोलीय आवेश्िात कोश के पृष्ठ के आर - पार विद्युत क्षेत्रा संतत नहीं होता। गोले के भीतर यह शून्य तथा बाहर यह होता है। परंतु वैद्युत विभव पृष्ठ के आर - पार संतत होता है, इसका मान पृष्ठ पर ुध्4πε0त् होता है। 4ण् किसी द्विधु्रव पर लगा बल आघूणर् च × म् इसमें म् के परितः दोलन उत्पन्न करता है। केवल तभी जब प्रिया क्षयकारी है तो दोलन अवमंदित होते हैं तथा द्विधु्रव अंततः म् के संरेख्िात हो 86 जाता है। 5ण् किसी आवेश ु के कारण अपनी स्िथति पर विभव अपरिभाष्िात है - यह अनंत होता है। 6ण् किसी आवेश ु की स्िथतिज ऊजार् के व्यंजक ुट ;तद्ध में, ट ;तद्ध बाह्य आवेशों के कारण विभव है तथा ु के कारण विभव नहीं है। जैसा कि ¯बदु 5 में देखा, यह व्यंजक उस स्िथति में, जबकि स्वयं आवेश ु के कारण विभव को ट ;तद्ध में सम्िमलित कर लें, सही रूप में परिभाष्िात नहीं होगा। 7ण् किसी चालक के भीतर कोटर ;गुहाद्ध बाह्य वैद्युत प्रभावों से परिरक्ष्िात रहता है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि स्िथरवैद्युत परिरक्षण उस परिस्िथति में प्रभावी नहीं रहता जिसमें आप कोटर में भीतर आवेश रख देते हैं, तब तो चालक का बहिभार्ग भीतर के आवेशों के विद्युत क्षेत्रों से परिरक्ष्िात नहीं रहता। अभ्यास 2ण्1 5 × 10−8 ब् तथा दृ3 × 10−8 ब् के दो आवेश 16 बउ दूरी पर स्िथत हैं। दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के किस ¯बदु पर वैद्युत विभव शून्य होगा? अनंत पर विभव शून्य लीजिए। 2ण्2 10 बउ भुजा वाले एक सम - षट्भुज के प्रत्येक शीषर् पर 5 - ब् का आवेश है। षट्भुज के वेंफद्र पर विभव परिकलित कीजिए। 2ण्3 6 बउ की दूरी पर अवस्िथत दो ¯बदुओं । एवं ठ पर दो आवेश 2 - ब् तथा −2 - ब् रखे हैं। ;ंद्ध निकाय के सम विभव पृष्ठ की पहचान कीजिए। ;इद्ध इस पृष्ठ के प्रत्येक ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा की दिशा क्या है? 2ण्4 12 बउ त्रिाज्या वाले एक गोलीय चालक के पृष्ठ पर 1ण्6 × 10−7ब् का आवेश एकसमान रूप से वितरित है। ;ंद्ध गोले के अंदर ;इद्ध गोले के ठीक बाहर ;बद्ध गोले के वेंफद्र से 18 बउ पर अवस्िथत, किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा क्या होगा? 2ण्5 एक समांतर पिका संधारित्रा, जिसकी पिðकाओं के बीच वायु है, की धारिताð 8चथ् ;1चथ् त्र 10दृ12 थ्द्ध है। यदि पिðकाओं के बीच की दूरी को आधा कर दिया जाए और इनके बीच के स्थान में 6 परावैद्युतांक का एक पदाथर् भर दिया जाए तो इसकी धारिता क्या होगी? 2ण्6 9 चथ् धारिता वाले तीन संधारित्रों को श्रेणीक्रम में जोड़ा गया है। ;ंद्ध संयोजन की वुफल धारिता क्या है? ;इद्ध यदि संयोजन को 120 ट के संभरण ;सप्लाइर्द्ध से जोड़ दिया जाए, तो प्रत्येक संधारित्रा पर क्या विभवांतर होगा? 2ण्7 2 चथ्ए 3 चथ् और 4 चथ् धारिता वाले तीन संधारित्रा पाश्वर्क्रम में जोड़े गए हैं। ;ंद्ध संयोजन की वुफल धारिता क्या है? ;इद्ध यदि संयोजन को 100 ट के संभरण से जोड़ दें तो प्रत्येक संधारित्रा पर आवेश ज्ञात कीजिए। 2ण्8 पिðकाओं के बीच वायु वाले एक समांतर पिðका संधारित्रा की प्रत्येक पिका का क्षेत्रापफलð 6 × 10−3 उ2 तथा उनके बीच की दूरी 3 उउ है। संधारित्रा की धारिता को परिकलित कीजिए। यदि इस संधारित्रा को 100 ट के संभरण से जोड़ दिया जाए तो संधारित्रा की प्रत्येक पिðका पर कितना आवेश होगा? 2ण्9 अभ्यास 2ण्8 में दिए गए संधारित्रा की पिðकाओं के बीच यदि 3 उउ मोटी अभ्रक की एक शीट ;पत्तरद्ध ;परावैद्युतांक त्र 6द्ध रख दी जाती है तो स्पष्ट कीजिए कि क्या होगा जब ;ंद्ध विभव ;वोल्टेजद्ध संभरण जुड़ा ही रहेगा। 87;इद्ध संभरण को हटा लिया जाएगा? भौतिकी 2ण्10 12 चथ् का एक संधारित्रा 50 ट की बैटरी से जुड़ा है। संधारित्रा में कितनी स्िथरवैद्युत ऊजार् संचित होगी? 2ण्11 200 ट संभरण ;सप्लाइर्द्ध से एक 600 चथ् के संधारित्रा को आवेश्िात किया जाता है। पिफर इसको संभरण से वियोजित कर देते हैं तथा एक अन्य 600 चथ् वाले अनावेश्िात संधारित्रा से जोड़ देते हैं। इस प्रिया में कितनी ऊजार् का ”ास होता है? अतिरिक्त अभ्यास 2ण्12 मूल ¯बदु पर एक 8 उब् का आवेश अवस्िथत है। −2 ×10−9 ब् के एक छोटे से आवेश को ¯बदु च् ;0ए 0ए 3 बउद्ध से, ¯बदु त् ;0ए 6 बउए 9 बउद्ध से होकर, ¯बदु फ ;0ए 4 बउए 0द्ध तक ले जाने में किया गया कायर् परिकलित कीजिए। 2ण्13 इ भुजा वाले एक घन के प्रत्येक शीषर् पर ु आवेश है। इस आवेश विन्यास के कारण घन के वेंफद्र पर विद्युत विभव तथा विद्युत क्षेत्रा ज्ञात कीजिए। 2ण्14 1ण्5 - ब् और 2ण्5 - ब् आवेश वाले दो सूक्ष्म गोले 30 बउ दूर स्िथत हैं। ;ंद्ध दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के मध्य ¯बदु पर, और ;इद्ध मध्य ¯बदु से होकर जाने वाली रेखा के अभ्िालंब तल में मध्य ¯बदु से 10 बउ दूर स्िथत किसी ¯बदु पर विभव और विद्युत क्षेत्रा ज्ञात कीजिए। 2ण्15 आंतरिक त्रिाज्या त1 तथा बाह्य त्रिाज्या त2 वाले एक गोलीय चालक खोल ;कोशद्ध पर फ आवेश है। ;ंद्ध खोल के वेंफद्र पर एक आवेश ु रखा जाता है। खोल के भीतरी और बाहरी पृष्ठों पर पृष्ठ आवेश घनत्व क्या है? ;इद्ध क्या किसी कोटर ;जो आवेश विहीन हैद्ध में विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है, चाहे खोल गोलीय न होकर किसी भी अनियमित आकार का हो? स्पष्ट कीजिए। 2ण्16 ;ंद्ध दशार्इए कि आवेश्िात पृष्ठ के एक पाश्वर् से दूसरे पाश्वर् पर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा के अभ्िालंब घटक में असांतत्य होता है, जिसे 0 12 ६द्ध; ε σ त्र− दण्म्म् द्वारा व्यक्त किया जाता है। जहाँ द६ एक ¯बदु पर पृष्ठ के अभ्िालंब एकांक सदिश है तथा σ उस ¯बदु पर पृष्ठ आवेश घनत्व है ;द६ की दिशा पाश्वर् 1 से पाश्वर् 2 की ओर है।द्ध। अतः दशार्इए कि चालक के ठीक बाहर विद्युत क्षेत्रा σ द६ ध्ε0 है। ;इद्ध दशार्इए कि आवेश्िात पृष्ठ के एक पाश्वर् से दूसरे पाश्वर् पर स्िथरवैद्युत क्षेत्रा का स्पशीर्य घटक संतत है। ¹संकेतः ;ंद्ध के लिए गाउस - नियम का उपयोग कीजिए। ;इद्ध के लिए इस सत्य का उपयोग करें कि संवृत पाश पर एक स्िथरवैद्युत क्षेत्रा द्वारा किया गया कायर् शून्य होता हैद्ध। 2ण्17 रैख्िाक आवेश घनत्व λ वाला एक लंबा आवेश्िात बेलन एक खोखले समाक्षीय चालक बेलन द्वारा घ्िारा है। दोनों बेलनों के बीच के स्थान में विद्युत क्षेत्रा कितना है? 2ण्18 एक हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्राॅन तथा प्रोटाॅन लगभग 0ण्53 ऊ दूरी पर परिब( हैं: ;ंद्ध निकाय की स्िथतिज ऊजार् का मट में परिकलन कीजिए, जबकि प्रोटाॅन से इलेक्ट्रान के मध्य की अनंत दूरी पर स्िथतिज ऊजार् को शून्य माना गया है। ;इद्ध इलेक्ट्राॅन को स्वतंत्रा करने में कितना न्यूनतम कायर् करना पड़ेगा, यदि यह दिया गया है कि इसकी कक्षा में गतिज ऊजार् ;ंद्ध में प्राप्त स्िथतिज ऊजार् के परिमाण की आधी है? ;बद्ध यदि स्िथतिज ऊजार् को 1ण्06 ऊ पृथक्करण पर शून्य ले लिया जाए तो, उपयुर्क्त ;ंद्ध और ;इद्ध के उत्तर क्या होंगे? 2ण्19 यदि भ्2 अणु के दो में से एक इलेक्ट्राॅन को हटा दिया जाए तो हमें हाइड्रोजन आणविक आयन 88 ;भ् द्ध2 ़ प्राप्त होगा। ;भ् द्ध2 ़ की निम्नतम अवस्था ;हतवनदक ेजंजमद्ध में दो प्रोटाॅन के बीच दूरी लगभग1ण्5ऊ है और इलेक्ट्राॅन प्रत्येक प्रोटाॅन से लगभग 1 ऊ की दूरी पर है। निकाय की स्िथतिज ऊजार् ज्ञात कीजिए। स्िथतिज ऊजार् की शून्य स्िथति के चयन का उल्लेख कीजिए। 2ण्20 ं और इ त्रिाज्याओं वाले दो आवेश्िात चालक गोले एक तार द्वारा एक.दूसरे से जोड़े गए हैं। दोनों गोलों के पृष्ठों पर विद्युत क्षेत्रों में क्या अनुपात है? प्राप्त परिणाम को, यह समझाने में प्रयुक्त कीजिए कि किसी एक चालक के तीक्ष्ण और नुकीले सिरों पर आवेश घनत्व, चपटे भागों की अपेक्षा अिाक क्यों होता है। 2ण्21 ¯बदु ;0ए 0ए −ंद्ध तथा ;0ए 0ए ंद्ध पर दो आवेश क्रमशः −ु और ़ ु स्िथत हैं। ;ंद्ध ¯बदुओं ;0ए 0ए ्रद्ध और ;गए लए 0द्ध पर स्िथरवैद्युत विभव क्या है? ;इद्ध मूल ¯बदु से किसी ¯बदु की दूरी त पर विभव की निभर्रता ज्ञात कीजिए, जबकि तध्ं झझ 1 है। ;बद्ध ग.अक्ष पर ¯बदु ;5ए 0ए 0द्ध से ¯बदु ;−7ए 0ए0द्ध तक एक परीक्षण आवेश को ले जाने में कितना कायर् करना होगा? यदि परीक्षण आवेश के उन्हीं ¯बदुओं के बीच ग.अक्ष से होकर न ले जाएँ तो क्या उत्तर बदल जाएगा? 2ण्22 नीचे दिए गए चित्रा2ण्34 में एक आवेश विन्यास जिसे विद्युत चतुधु्रर्वी कहा जाता है, दशार्या गया है। चतुध्रुर्वी के अक्ष पर स्िथत किसी ¯बदु के लिए त पर विभव की निभर्रता प्राप्त कीजिए जहाँ तध्ं झझ 1। अपने परिणाम की तुलना एक विद्युत द्विध्रुव व विद्युत एकल ध्रुव ;अथार्त् किसी एकल आवेशद्ध के लिए प्राप्त परिणामों से कीजिए। चित्रा 2ण्34 2ण्23 एक वैद्युत टैक्नीश्िायन को 1 ाट विभवांतर के परिपथ में 2 - थ् संधारित्रा की आवश्यकता हैै। 1 - थ् के संधारित्रा उसे प्रचुर संख्या में उपलब्ध हैं जो 400 ट से अिाक का विभवांतर वहन नहीं कर सकते। कोइर् संभव विन्यास सुझाइए जिसमें न्यूनतम संधारित्रों की आवश्यकता हो। 2ण्24 2 थ् वाले एक समांतर पिðका संधारित्रा की पिðका का क्षेत्रापफल क्या है, जबकि पिकाओंð का पृथकन 0ण्5 बउ है? ¹अपने उत्तर से आप यह समझ जाएँगे कि सामान्य संधारित्रा - थ् या कम परिसर के क्यों होते हैं? तथापि विद्युत - अपघटन संधारित्रों ;म्समबजतवसलजपब बंचंबपजवतेद्ध की धारिता कहीं अिाक ;0ण्1 थ्द्ध होती है क्योंकि चालकों के बीच अति सूक्ष्म पृथकन होता हैह्। 2ण्25 चित्रा 2ण्35 के नेटववर्फ ;जालद्ध की तुल्य धारिता प्राप्त कीजिए। 300 ट संभरण ;सप्लाइर्द्ध के साथ प्रत्येक संधारित्रा का आवेश व उसकी वोल्टता ज्ञात कीजिए। 89चित्रा 2ण्35 भौतिकी 2ण्26 किसी समांतर पिðका संधारित्रा की प्रत्येक पिðका का क्षेत्रापफल 90 बउ2 है और उनके बीच पृथकन 2ण्5 उउ है। 400 ट संभरण से संधारित्रा को आवेश्िात किया गया है। ;ंद्ध संधारित्रा कितना स्िथरवैद्युत ऊजार् संचित करता है? ;इद्ध इस ऊजार् को पिðकाओं के बीच स्िथरवैद्युत क्षेत्रा में संचित समझकर प्रति एकांक आयतन ऊजार् न ज्ञात कीजिए। इस प्रकार, पिðकाओं के बीच विद्युत क्षेत्रा म् के परिमाण और न में संबंध स्थापित कीजिए। 2ण्27 एक 4 - थ् के संधारित्रा को 200 ट संभरण ;सप्लाइर्द्ध से आवेश्िात किया गया है। पिफर संभरण से हटाकर इसे एक अन्य अनावेश्िात 2 - थ् के संधारित्रा से जोड़ा जाता है। पहले संधारित्रा की कितनी स्िथरवैद्युत ऊजार् का ऊष्मा और वैद्युत - चुंबकीय विकिरण के रूप में ”ास होता है? 1 2ण्28 दशार्इए कि एक समांतर पिðका संधारित्रा की प्रत्येक पिðका पर बल का परिमाण फम् है,2 जहाँ फ संधारित्रा पर आवेश है और म् पिðकाओं के बीच विद्युत क्षेत्रा का परिमाण है। घटक ) के मूल को समझाइए। 2ण्29 दो संवेंफद्री गोलीय चालकों जिनको उपयुक्त विद्युतरोधी आलंबों से उनकी स्िथति में रोका गया है, से मिलकर एक गोलीय संधारित्रा बना है ;चित्रा 2.36द्ध। दशार्इए कि गोलीय संधारित्रा की धारिता ब् इस प्रकार व्यक्त की जाती है: 4πε तत 0 12 ब् त्र त दृ त12 आवेश आवेश चित्रा 2ण्36 यहाँ त1और त2 क्रमशः बाहरी तथा भीतरी गोलों की त्रिाज्याएँ हैं। 2ण्30 एक गोलीय संधारित्रा के भीतरी गोले की त्रिाज्या 12 बउ तथा बाहरी गोले की त्रिाज्या 13 बउ है। बाहरी गोला भू - संपविर्फत है तथा भीतरी गोले पर 2ण्5 - ब् का आवेश दिया गया है। संवेंफद्री गोलों के बीच के स्थान में 32 परावैद्युतांक का द्रव भरा है। ;ंद्ध संधारित्रा की धारिता ज्ञात कीजिए। ;इद्ध भीतरी गोले का विभव क्या है? ;बद्ध इस संधारित्रा की धारिता की तुलना एक 12 बउ त्रिाज्या वाले किसी वियुक्त गोले की धारिता से कीजिए। व्याख्या कीजिए कि गोले की धारिता इतनी कम क्यों है। 2ण्31 सावधानीपूवर्क उत्तर दीजिएः ;ंद्ध दो बड़े चालक गोले जिन पर आवेश फ1औरफ2 हैं, एक.दूसरे के समीप लाए जाते हैं। क्या इनके बीच स्िथरवैद्युत बल का परिमाण तथ्यतः 90 फ1फ2ध्4πε0 त 2 द्वारा दशार्या जाता है, जहाँ त इनके वेंफद्रों के बीच की दूरी है? ;इद्ध यदि वूफलाॅम के नियम में 1ध्त3 निभर्रता का समावेश ;1ध्त2 के स्थान परद्ध हो तो क्या गाउस का नियम अभी भी सत्य होगा? ;बद्ध स्िथरवैद्युत क्षेत्रा विन्यास में एक छोटा परीक्षण आवेश किसी ¯बदु पर विराम में छोड़ा जाता है। क्या यह उस ¯बदु से होकर जाने वाली क्षेत्रा रेखा के अनुदिश चलेगा? ;कद्ध इलेक्ट्राॅन द्वारा एक वृत्तीय कक्षा पूरी करने में नाभ्िाक के क्षेत्रा द्वारा कितना कायर् किया जाता है? यदि कक्षा दीघर्वृत्ताकार हो तो क्या होगा? ;मद्ध हमें ज्ञात है कि एक आवेश्िात चालक के पृष्ठ के आर - पार विद्युत क्षेत्रा असंतत होता है। क्या वहाँ वैद्युत विभव भी असंतत होगा? ;द्धि किसी एकल चालक की धारिता से आपका क्या अभ्िाप्राय है? ;हद्ध एक संभावित उत्तर की कल्पना कीजिए कि पानी का परावैद्युतांक ;त्र 80द्धए अभ्रक के परावैद्युतांक ;त्र6द्ध से अध्िक क्यों होता है? 2ण्32 एक बेलनाकार संधारित्रा में 15 बउ लंबाइर् एवं त्रिाज्याएँ 1ण्5 बउ तथा 1ण्4 बउ के दो समाक्ष बेलन हैं। बाहरी बेलन भू - संपविर्फत है और भीतरी बेलन को 3ण्5 - ब् का आवेश दिया गया है। निकाय की धारिता और भीतरी बेलन का विभव ज्ञात कीजिए। अंत्य प्रभाव ;अथार्त् सिरों पर क्षेत्रा रेखाओं का मुड़नाद्ध की उपेक्षा कर सकते हैं। 2ण्33 3 परावैद्युतांक तथा 107 ट उ−1 की परावैद्युत सामथ्यर् वाले एक पदाथर् से 1 ाट वोल्टता अनुमतांक के समांतर पिका संधारित्रा की अभ्िाकल्पना करनी है। ¹परावैद्युत सामथ्यर् वहð अिाकतम विद्युत क्षेत्रा है जिसे कोइर् पदाथर् बिना भंग हुए अथार्त् आंश्िाक आयनन द्वारा बिना वैद्युत संचरण आरंभ किए सहन कर सकता हैह् सुरक्षा की दृष्िट से क्षेत्रा को कभी भी परावैद्युत सामथ्यर् के 10ः से अिाक नहीं होना चाहिए। 50 चथ् धारिता के लिए पिकाओं का कितना न्यूनतमð क्षेत्रापफल होना चाहिए? 2ण्34 व्यवस्थात्मकतः निम्नलिख्िात में संगत समविभव पृष्ठ का वणर्न कीजिएः ;ंद्ध ्र.दिशा में अचर विद्युत क्षेत्रा ;इद्ध एक क्षेत्रा जो एकसमान रूप से बढ़ता है, परंतु एक ही दिशा ;मान लीजिए ्र.दिशाद्ध में रहता है। ;बद्ध मूल ¯बदु पर कोइर् एकल धनावेश, और ;कद्ध एक समतल में समान दूरी पर समांतर लंबे आवेश्िात तारों से बने एकसमान जाल। 2ण्35 किसी वान डे ग्रापफ के प्रकार के जनित्रा में एक गोलीय धातु कोश15 × 106 ट का एक इलेक्ट्रोड बनाना है। इलेक्ट्रोड के परिवेश की गैस की परावैद्युत सामथ्यर् 5 × 107 ट उ−1 है। गोलीय कोश की आवश्यक न्यूनतम त्रिाज्या क्या है? ;इस अभ्यास से आपको यह ज्ञान होगा कि एक छोटे गोलीय कोश से आप स्िथरवैद्युत जनित्रा, जिसमें उच्च विभव प्राप्त करने के लिए कम आवेश की आवश्यकता होती है, नहीं बना सकते।द्ध 2ण्36 त1 त्रिाज्या तथा ु1 आवेश वाला एक छोटा गोला, त2 त्रिाज्या और ु2 आवेश के गोलीय खोल ;कोशद्ध से घ्िारा है। दशार्इए यदि ु1 धनात्मक है तो ;जब दोनों को एक तार द्वारा जोड़ दिया जाता हैद्ध आवश्यक रूप से आवेश, गोले से खोल की तरपफ ही प्रवाहित होगा, चाहे खोल पर आवेश ु2 वुफछ भी हो। 2ण्37 निम्न का उत्तर दीजिए: ;ंद्ध पृथ्वी के पृष्ठ के सापेक्ष वायुमंडल की ऊपरी परत लगभग 400 ाट पर है, जिसके संगत विद्युत क्षेत्रा ऊँचाइर् बढ़ने के साथ कम होता है। पृथ्वी के पृष्ठ के समीप विद्युत क्षेत्रा लगभग 100 ट उ−1 है। तब पिफर जब हम घर से बाहर खुले में जाते हैं, तो हमें विद्युत आघात क्यों नहीं लगता? ;घर को लोहे का ¯पजरा मान लीजिए, अतः उसके अंदर कोइर् विद्युत क्षेत्रा नहीं है !द्ध ;इद्ध एक व्यक्ित शाम के समय अपने घर के बाहर 2 उ ऊँचा अवरोधी पट्टð रखता है जिसके श्िाखर पर एक 1 उ2 क्षेत्रापफल की बड़ी ऐलुमिनियम की चादर है। अगली सुबह वह यदि 91 भौतिकी धातु की चादर को छूता है तो क्या उसे विद्युत आघात लगेगा? ;बद्ध वायु की थोड़ी - सी चालकता के कारण सारे संसार में औसतन वायुमंडल में विसजर्न धारा 1800 । मानी जाती है। तब यथासमय वातावरण स्वयं पूणर्तः निरावेश्िात होकर विद्युत उदासीन क्यों नहीं हो जाता? दूसरे शब्दों में, वातावरण को कौन आवेश्िात रखता है? ;कद्ध तडि़त के दौरान वातावरण की विद्युत ऊजार्, ऊजार् के किन रूपों में क्षयित होती है? ¹संकेतः पृष्ठ आवेश घनत्व त्र10−9 ब् उ−2 के अनुरूप पृथ्वी के ;पृष्ठद्ध पर नीचे की दिशा में लगभग 100 ट उ−1 का विद्युत क्षेत्रा होता है। लगभग 50 ाउ ऊँचाइर् तक ;जिसके बाहर यह अच्छा चालक हैद्ध वातावरण की थोड़ी सी चालकता के कारण लगभग ़1800 ब् का आवेश प्रति सेवंफड समग्र रूप से पृथ्वी में पंप होता रहता है। तथापि, पृथ्वी निरावेश्िात नहीं होती, क्योंकि संसार में हर समय लगातार तडि़त तथा तडि़त.झंझा होती रहती है, जो समान मात्रा में )णावेश पृथ्वी में पंप कर देती है।ह् 92

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