अध्याय 1 वैद्युत आवेश तथा क्षेत्रा 1ण्1 भूमिका हम सभी को, विशेषकर शुष्क मौसम में, स्वेटर अथवा संश्िलष्ट वस्त्रों को शरीर से उतारते समय चट - चट की ध्वनि सुनने अथवा चिनगारियाँ देखने का अनुभव होगा। महिलाओें के वस्त्रों जैसे पाॅलिएस्टर साड़ी के साथ तो ऐसी घटना होना प्रायः अनिवायर् होता है। क्या आपने कभी इस परिघटना का स्पष्टीकरण खोजने का प्रयास किया है? विद्युत विसजर्न का एक अन्य सामान्य उदाहरण आकाश में गजर्न के समय तडि़त दिखाइर् देना है। विद्युत झटके के संवेदन का अनुभव हमें उस समय भी होता है जब हम किसी कार का दरवाज्ाा खोलते हैं अथवा जब हम अपनी बस की सीट पर ख्िासकने के पश्चात उसमें लगी लोहे की छड़ को पकड़ते हैं। इन अनुभवों के होने के कारण हमारे शरीर में से होकर उन वैद्युत आवेशों का विस£जत होना है जो विद्युतरोध्ी पृष्ठों पर रगड़ के कारण एकत्रा हो जाते हैं। आपने यह भी सुना होगा कि यह वैद्युत आवेश ;स्िथरवैद्युतद्ध के उत्पन्न होने के कारण है। इस अध्याय तथा अगले अध्याय में भी हम इसी विषय पर चचार् करेंगे। स्िथर से तात्पयर् है वह सब वुफछ जो समय के साथ परिव£तत अथवा गतिमय नहीं होता। स्िथरवैद्युतिकी के अंतगर्त हम स्िथर आवेशों द्वारा उत्पन्न बलों, क्षेत्रों तथा विभवों के विषय में अध्ययन करते हैं। 1ण्2 वैद्युत आवेश इतिहास के अनुसार लगभग 600 इर्. पूवर् हुइर् इस तथ्य की खोज का श्रेय, कि ऊन अथवा रेशमी - वस्त्रा से रगड़ा गया ऐम्बर हलकी वस्तुओं को आक£षत करता है, ग्रीस देश के मिलेटस के निवासी थेल्स को जाता है। ‘इलेक्िट्रसिटी’ शब्द भी ग्रीस की भाषा के शब्द इलेक्ट्राॅन से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अथर् ऐम्बर है। उस समय पदाथो± के ऐसे बहुत से युगल ज्ञात थे जो परस्पर रगड़े ़भौतिकी जाने पर भूसे के तिनकों, सरवंफडे की गोलियों, कागज़्ा के छोटे टुकड़ों आदि हलकी वस्तुओं को आक£षत कर लेते थे। आप इस प्रकार के प्रभाव का अनुभव अपने घर पर निम्नलिख्िात ियाकलाप द्वारा कर सकते हैं। सप़ेफद कागज की लंबी पतली पिðयाँ काटकर उन पर ध्ीरे से़इस्तरी कीजिए। इन पिðयों को टेलीविशन के पदेर् अथवा वंफप्यूटर के माॅनिटर के निकट लाइए। आप देखेंगे कि पिðयाँ पदेर् की ओर आक£षत हो जाती हैं। वास्तव में वे वुफछ क्षण तक पदेर् से चिपकी रहती हैं। यह भी प्रेक्ष्िात किया गया कि यदि ऊन अथवा रेशम के कपड़े से रगड़ी हुइर् दो काँच की छड़ों को एक - दूसरे के निकट लाएँ तो वे एक - दूसरे को प्रतिक£षत करती हैं ¹चित्रा 1ण्1;ंद्धह्। ऊन की वे लडि़याँ अथवा चित्रा 1ण्1 छड़ें तथा सरवंफडे की गोलियाँः सजातीय आवेश एक - दूसरे रेशम के कपड़े के वे टुकड़े जिनसे इन छड़ों को रगड़ा को प्रतिक£षत तथा विजातीय आवेश एक - दूसरे को आक£षत करते हैं। गया था, वे भी परस्पर एक - दूसरे को प्रतिक£षत करते हैं परंतु काँच की छड़ तथा ऊन एक - दूसरे को आक£षत करते हैं। इसी प्रकार, बिल्ली की समूर से रगड़ी हुइर् दो प्लास्िटक की छड़ें एक - दूसरे को प्रतिक£षत करती हैं ¹चित्रा 1ण्1;इद्धह् परंतु समूर को आक£षत करती हैं। इसके विपरीत, प्लास्िटक की छड़ें काँच की छड़ों को आक£षत करती हैं ¹चित्रा 1ण्1;बद्धह् तथा सिल्क अथवा ऊन जिससे काँच की छड़ों को रगड़ा गया था, को प्रतिक£षत करती हैं। काँच की छड़ समूर को प्रतिक£षत करती है। यदि समूर से रगड़ी हुइर् किसी प्लास्िटक की छड़ को रेशम अथवा नायलाॅन के धगों से लटकी हुइर् दो छोटी सरवंफडे की गोलियों ;आजकल हम पाॅलिएस्टरीन की गोलियाँ भी उपयोग कर सकते हैंद्ध से स्पशर् करा दें, तो ये गोलियाँ एक - दूसरे को प्रतिक£षत करती हैं ¹चित्रा 1ण्1;कद्धह् तथा स्वयं छड़ से भी प्रतिक£षत होती हैं। यही प्रभाव उस समय भी दिखाइर् देता है जब सरवंफडे की गोलियों को रेशम से रगड़ी काँच की छड़ से स्पशर् कराते हैं ¹चित्रा 1ण्1;मद्धह्। यह एक नाटकीय प्रेक्षण है कि काँच की छड़ से स्पशर् की हुइर् सरवंफडे की गोली दूसरी प्लास्िटक छड़ से स्पशर् की गइर् सरवंफडे की गोली को आक£षत करती है ¹चित्रा 1ण्1;द्धिह्। वषो± के प्रयास तथा सावधनीपूवर्क किए गए प्रयोगों एवं उनके विश्लेषणों द्वारा सरल प्रतीत होने वाले ये तथ्य स्थापित हो पाए हैं। विभ्िान्न वैज्ञानिकों द्वारा किए गए बहुत से सावधनीपूणर् अध्ययनों के पश्चात यह निष्कषर् निकाला गया है कि एक राश्िा होती है, जिसे वैद्युत आवेश कहते हैं और यह केवल दो प्रकार के ही हो सकते हैं। वैद्युत आवेश कहलाने वाली राश्िा के केवल दो प्रकार ही होते हैं। हम कहते हैं कि प्लास्िटक एवं काँच की छड़, रेशम, समूर, सरवंफडे की गोलियाँ आदि ¯पड विद्युन्मय हो गए हैं। रगड़ने पर ये वैद्युत आवेश अ£जत कर लेते हैं। सरवंफडे की गोलियों पर किए गए ये प्रयोग यह सुझाते हैं कि आवेश दो प्रकार के होते हैं तथा हम यह पाते हैं कि ;पद्ध सजातीय आवेश एक - दूसरे को प्रतिक£षत तथा ;पपद्ध विजातीय आवेश एक - दूसरे को आक£षत करते हैं। ये प्रयोग यह भी प्रद£शत करते हैं कि स्पशर् करने पर, आवेश छड़ से सरवंफडे की गोली में स्थानांतरित हो जाते हैं। यह कहा जाता है कि सरवंफडे की गोलियाँ स्पशर् द्वारा विद्युन्मय अथवा आवेश्िात ;आविष्टद्ध होती हैं। वह गुण जो दो प्रकार के आवेशों में भेद करता है, आवेश की ध्ु्रवता कहलाता है। जब काँच की छड़ को रेशम से रगड़ते हैं तो छड़ एक प्रकार का आवेश अ£जत करती है तथा रेशम दूसरे प्रकार का आवेश अ£जत करता है। यह उन सभी वस्तुओं के युगल के लिए सत्य है जो विद्युन्मय होने के लिए परस्पर रगड़े जाते हैं। अब यदि विद्युन्मय काँच की छड़ को उस रेशम के संपवर्फ में लाते हैं जिससे उसे रगड़ा गया था, तो वे अब एक - दूसरे को आक£षत नहीं करते। ये अब अन्य हलकी वस्तुओं को भी आक£षत अथवा प्रतिक£षत नहीं करते जैसा कि ये विद्युन्मय होने पर कर रहे थे। सरल स्िथर वैद्युतकीय प्रयोगों से संबंध्ित प्रभावी सजीव चित्राणीजजचरूध्ध्ूूूण्चीलेपबेण्नबसंण्मकनध्जतंअवसजंहमध्भ्ज्डस्ध्ेजंजपबम्समबजतपबपजलण्ीजउ इस प्रकार, रगड़ने के पश्चात वस्तुओं द्वारा अ£जत आवेश आवेश्िात वस्तुओं को एक - दूसरे के संपवर्फ में लाने पर लुप्त हो जाता है। इन प्रेक्षणों से आप क्या निष्कषर् निकाल सकते हैं? यह तो केवल इतना बताता है कि वस्तुओं द्वारा अ£जत विजातीय आवेश एक - दूसरे के प्रभाव को निष्पफल कर देते हैं। इसीलिए अमेरिकी वैज्ञानिक बेंजामिन प्रेंफकलिन ने आवेशों को ध्नात्मक तथा )णात्मक कहा। हम जानते हैं कि जब हम किसी ध्नात्मक संख्या को उसी परिमाण की )णात्मक संख्या से जोड़ते हैं तो योगपफल शून्य होता है। आवेशों को ध्नात्मक तथा )णात्मक नाम देने के पीछे भी यही तवर्फ रहा होगा। परिपाटी के अनुसार काँच की छड़ अथवा बिल्ली के समूर पर आवेश ध्नात्मक कहलाता है तथा प्लास्िटक - छड़ अथवा रेशम पर आवेश )णात्मक कहलाता है। जब किसी वस्तु पर कोइर् आवेश होता है तो वह वस्तु विद्युन्मय अथवा आवेश्िात ;आविष्टद्ध कही जाती है। जब उस पर कोइर् आवेश नहीं होता तब उसे अनावेश्िात कहते हैं। आवेशों की उपस्िथति के संसूचन के लिए एक सरल उपकरण स्वणर् पत्रा विद्युतदशीर् है ¹चित्रा 1ण्2 ;ंद्धह्। इसमें एक बाॅक्स में धतु की एक छड़ ऊध्वार्धरतः लगी होती है जिसके निचले सिरे पर सोने के ववर्फ की दो पिðयाँ बँध्ी होती हैं। जब कोइर् आवेश्िात वस्तु छड़ के ऊपरी सिरे को छूती है तो छड़ में होता हुआ आवेश सोने के वको± पर आ जाता है और वे एक - दूसरे से दूर हट जाते हैं। आवेश जितना अध्िक होता है, वको± के निचले सिरों के बीच उतनी ही अध्िक दूरी हो जाती है। भौतिकी विद्याथीर् नीचे बताए अनुसार सरल विद्युतदशीर् बना सकते हैं ¹चित्रा 1ण्2;इद्ध,। परदे लटकाने वाली ऐलुमिनियम की ऐसी बारीक छड़ लीजिए जिसके दोनों सिरों पर गोले जुड़े हों। इसका लगभग 20 बउ लंबा एक टुकड़ा इस प्रकार काटिए जिससे छड़ का एक सिरा चपटा तथा दूसरा सिरा गोले वाला बन जाए। एक इतनी बड़ी बोतल लीजिए जिसके मंुँह पर काॅवर्फ लगाकर उस काॅवर्फ में छेद करके चित्रा में दशार्ए अनुसार इस छड़ को पिफट किया जा सके। छड़ का गोले वाला सिरा बोतल के बाहर तथा कटा सिरा बोतल के भीतर रखना चाहिए। लंबा पतला ऐलुमिनियम पत्रा ;लगभग 6 बउद्ध लेकर इसे बीच में मोडि़ए और इसे छड़ के चपटे सिरे पर सेल्युलोस - टेप के साथ जोड़ दीजिए। इस प्रकार आपके विद्युतदशीर् के पत्रा बन जाते हैं। अब काॅवर्फ को बोतल में इस प्रकार पिफट करिए कि छड़ का गोले वाला सिरा काॅवर्फ से लगभग 5 बउ बाहर निकला रहे। बोतल के भीतर एक कागश का पैमाना पहले से ही पत्रों की पृथकता को मापने के लिए लगाया जा सकता है। पत्रों की पृथकता विद्युतदशीर् पर आवेश की मात्रा की एक माप होती है। यह समझने के लिए कि विद्युतदशीर् किस प्रकार कायर् करता है सप़ेफद कागश की वह पिðयाँ लीजिए जिनका उपयोग हमने आवेश्िात वस्तुओं द्वारा आकषर्ण देखने के लिए किया था। पट्टðी को आध मोडि़ए ताकि पट्टðी पर मोड़ का निशान बन जाए। पट्टðी को खोलिए तथा इस चित्रा 1ण्2 विद्युतदशीर् ;ंद्ध स्वणर् पत्रा विद्युतदशीर् पर चित्रा 1ण्3 में दशार्ए अनुसार, पवर्तीय मोड़ बनाकर हलकी इस्तरी ;इद्ध सरल विद्युतदशीर् की रूपरेखा। कीजिए। इसे मोड़ पर चुटकी भरकर पकडि़ए। आप यह पाएँगे कि दोनों चित्रा 1ण्3 कागश - पट्टðी प्रयोग। अध्र्भाग एक - दूसरे से दूर जाते हैं। यह दशार्ता है कि इस्तरी करने पर पट्टðी आवेश अ£जत कर लेती है। जब आप पट्टðी को आध मोड़ते हैं तो दोनों अध्र्भागों पर सजातीय आवेश होता है, अतः वे एक - दूसरे को प्रतिक£षत करते हैं। पत्रा विद्युतदशीर् में भी यही प्रभाव दिखाइर् देता है। परदे की छड़ के गोले को विद्युन्मय वस्तु से स्पशर् कराने पर परदे की छड़ पर आवेश स्थानांतरित होकर उसके दूसरे सिरे पर जुड़े ऐलुमिनियम पत्रों पर पहुँच जाता है। पत्रा के दोनों अधर्भाग सजातीय आवेश अ£जत करने के कारण एक - दूसरे को प्रतिक£षत करते हैं। पत्रों की अपसारिता द्वारा उन पर आवेश की मात्रा सुनिश्िचत की जाती है। आइए, अब पहले यह समझें कि द्रव्य से बनी वस्तुएँ क्यों आवेश को अ£जत करती हैं। सभी पदाथर् परमाणुओं और/अथवा अणुओं से बने हैं। यद्यपि वस्तुएँ सामान्यतः वैद्युत उदासीन होती हैं, उनमें आवेश तो होते हैं परंतु उनके ये आवेश ठीक - ठीक संतुलित होते हैं। अणुओं को सँभालने वाला रासायनिक बल, ठोसों में परमाणुओं को एकसाथ थामे रखने वाले बल, गोंद का आसंजक बल, पृष्ठ तनाव से संब( बल - इन सभी बलों की मूल प्रवृफति वैद्युतीय है, और ये आवेश्िात कणों के बीच लगने वाले विद्युत बलों से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार, वैद्युतचुंबकीय बल सवर्व्यापी है और यह हमारे जीवन से संब( प्रत्येक क्षेत्रा में सम्िमलित है। अतः यह आवश्यक है कि हम इस प्रकार के बल के विषय में अध्िक जानकारी प्राप्त करें। किसी उदासीन वस्तु को आवेश्िात करने के लिए हमें उससे एक प्रकार के आवेश को जोड़ने अथवा हटाने की आवश्यकता होती है। जब हम यह कहते हैं कि कोइर् वस्तु आवेश्िात है तो हम सदैव ही इस आवेश के आध्िक्य अथवा अभाव का उल्लेख करते हैं। ठोसों में वुफछ इलेक्ट्राॅन परमाणु में कम कसकर आब( होने के कारण, वे आवेश होते हैं जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित हो जाते हैं। इस प्रकार कोइर् वस्तु अपने वुफछ इलेक्ट्राॅन खोकर ध्नावेश्िात हो सकती है। इसी प्रकार किसी वस्तु को इलेक्ट्राॅन देकर )णावेश्िात भी बनाया जा सकता है। जब हम काँच की छड़ को रेशम से रगड़ते हैं तो छड़ के वुफछ इलेक्ट्राॅन रेशम के कपड़े में स्थानांतरित हो जाते हैं। इस प्रकार छड़ ध्नावेश्िात तथा रेशम )णावेश्िात हो जाता है। रगड़ने की प्रिया में कोइर् नया आवेश उत्पन्न नहीं होता। साथ ही स्थानांतरित होने वाले इलेक्ट्राॅनों की संख्या वस्तु में उपस्िथत इलेक्ट्राॅनों की संख्या की तुलना में एक बहुत छोटा अंश होती है। और केवल वस्तु के कम कसकर आब( इलेक्ट्राॅन ही रगड़कर एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित किए जा सकते हैं। इसीलिए, जब किसी वस्तु को किसी अन्य वस्तु से रगड़ा जाता है, तो वस्तुएँ आवेश्िात हो जाती हैं और यही कारण है कि रगड़ द्वारा वस्तुओं पर आए आवेश को दशार्ने के लिए हमें पदाथो± के वुफछ निश्िचत युगलों तक ही अटके रहना पड़ता है। 1ण्3 चालक तथा विद्युतरोध्ी हाथ में पकड़ी धतु की छड़ ऊन से रगड़े जाने पर आवेश्िात होने का कोइर् संकेत नहीं दशार्ती। परंतु, यदि धतु की छड़ पर लकड़ी अथवा प्लास्िटक का हंैडिल लगा है और उसके धातु के भाग को स्पशर् नहीं किया गया है, तो वह आवेश्िात होने का संकेत दे देती है। मान लीजिए हम किसी ताँबे के तार के एक सिरे को उदासीन सरवंफडे की गोली से जोड़ देते हैं तथा दूसरे सिरे को )णावेश्िात प्लास्िटक - छड़ से जोड़ देते हैं तो हम यह पाते हैं कि सरवंफडे की गोली )णावेश्िात हो जाती है। यदि इसी प्रयोग को नाॅयलोन के धगे अथवा रबर के छल्ले के साथ दोहराएँ तो प्लास्िटक - छड़ से सरवंफडे की गोली में कोइर् आवेश स्थानांतरित नहीं होता। छड़ से गोली में आवेश के स्थानांतरित न होने का क्या कारण है? वुफछ पदाथर् तुरंत ही अपने में से होकर विद्युत को प्रवाहित होने देते हैं जबकि वुफछ अन्य ऐसा नहीं करते। जो पदाथर् आसानी से अपने में से होकर विद्युत को प्रवाहित होने देते हैं उन्हें चालक कहते हैं। उनमें ऐसे वैद्युत आवेश ;इलेक्ट्राॅनद्ध होते हैं जो पदाथर् के भीतर गति के लिए अपेक्षावृफत स्वतंत्रा होते हैं। धतुएँ, मानव तथा जंतु शरीर और पृथ्वी चालक हैं। काँच, पाॅसर्ेलेन, प्लास्िटक, नाॅयलोन, लकड़ी जैसी अध्िकांश अधतुएँ अपने से होकर प्रवाहित होने वाली विद्युत पर उच्च प्रतिरोध् लगाती हैं। इन्हें विद्युतरोध्ी कहते हैं। अध्िकांश पदाथर् ऊपर व£णत इन दो वगो± में से किसी एक में आते हैं।’ जब वुफछ आवेश किसी चालक पर स्थानांतरित होता है तो वह तुरंत ही उस चालक के समस्त पृष्ठ पर पैफल जाता है। इसके विपरीत यदि वुफछ आवेश किसी विद्युतरोध्ी को दें तो वह वहीं पर रहता है। ऐसा क्यों होता है, यह आप अगले अध्याय में सीखेंगे। पदाथो± का यह गुण हमंे बताता है कि सूखे बालों में वंफघी करने अथवा रगड़ने पर नाॅयलोन या प्लास्िटक की वंफघी क्यों आवेश्िात हो जाती है, परंतु धतु की वस्तुएँ जैसे चम्मच आवेश्िात क्यों नहीं होती? धतुओं से आवेश का क्षरण हमारे शरीर से होकर ध्रती में हो जाता है, ऐसा होने का कारण यह है कि धतु तथा हमारा शरीर दोनों ही विद्युत के अच्छे चालक हैं। जब हम किसी आवेश्िात वस्तु को पृथ्वी के संपवर्फ में लाते हैं तो उसका अतिरिक्त आवेश जोड़ने वाले चालक ;जैसे हमारा शरीरद्ध में से होते हुए क्षण्िाक विद्युत धरा उत्पन्न करके भूमि में चला जाता है। आवेशों के भूमि के साथ बंटन की इस प्रिया को भूसंपवर्फण ;भूसंप£कत करनाद्ध कहते हैं। भूसंपवर्फण विद्युत परिपथों एवं अनुप्रयुक्ितयों की सुरक्षा के लिए की गइर् एक व्यवस्था है। धतु की एक मोटी प्लेट को भूमि में गहराइर् तक गाड़ा जाता है तथा इस प्लेट से मोटे तारों को निकालकर भवनों में इन तारों का उपयोग मुख्य आपू£त के निकट भूसंपवर्फण के लिए किया जाता ’ एक तीसरी श्रेणी जिसे अध्र्चालक कहते हैं, आवेशों की गति में अवरोध् उत्पन्न करती है। इस अवरोध् का परिमााण चालकों तथा विद्युतरोध्ियों के मध्यवतीर् होता है। भौतिकी चित्रा 1ण्4 दो गोलों के साथ प्रेरण द्वारा आवेशन। है। हमारे घरों में विद्युत की आपू£त के लिए तीन तार उपयोग किए जाते हैं: विद्युन्मय तार, उदासीन तार तथा भूसंपवर्फ तार। इनमें से पहले दो तार विद्युत धरा को शक्ित स्टेशन से युक्ितयों तक ले जाते हैं तथा तीसरा तार भूमि में गड़ी धतु की प्लेट से जोड़ा जाता है। विद्युत अनुप्रयुक्ितयोंऋ जैसे - विद्युत इस्तरी, रेपि्रफजरेटर, टेलीविशन के धातु के आवरण भूसंपवर्फ तार से जुड़े होते हैं। परिपथ में कोइर् त्राुटि होने पर अथवा विद्युन्मय तार का धतु के आवरण से स्पशर् होने पर आवेश भूमि में प्रवाहित हो जाता है। इन अनुप्रयुक्ितयों को कोइर् हानि नहीं होती तथा मनुष्यों को कोइर् क्षति भी नहीं होतीऋ यदि भूसंपवर्फ तार न हो तो क्षति पहुँचना/दुघर्टना होना अपरिहायर् हो जाएगा, क्योंकि मानव शरीर विद्युत का अच्छा चालक है। 1ण्4 प्रेरण द्वारा आवेशन जब हम किसी सरवंफडे की गोली से किसी आवेश्िात प्लास्िटक - छड़ को स्पशर् कराते हैं तो छड़ का वुफछ आवेश सरवंफडे की गोली पर स्थानांतरित हो जाता है और वह आवेश्िात हो जाती है। इस प्रकार सरवंफडे की गोली संपवर्फ द्वारा आवेश्िात होती है। तब यह प्लास्िटक - छड़ से प्रतिक£षत होती है तथा काँच की छड़ जो विजातीय आवेश्िात है, की ओर आक£षत होती है। परंतु, कोइर् विद्युन्मय छड़ हलकी वस्तुओं को क्यों आक£षत करती है, इस प्रश्न का उत्तर अभी भी नहीं मिल पाया है। आइए, हम यह समझने का प्रयास करें कि निम्नलिख्िात प्रयोग को करने पर क्या हो सकता है। ;पद्ध विद्युतरोध्ी स्टैंडों पर रखे दो धतु के गोलों । एवं ठ को चित्रा 1ण्4 ;ंद्ध में दशार्ए अनुसार एक दूसरे के संपवर्फ में लाइए। ;पपद्ध एक ध्नावेश्िात छड़ इन गोलों में किसी एक ;माना ।द्ध के निकट लाइए तथा यह सावधनी बरतिए कि छड़ गोले से स्पशर् न करे। गोले के मुक्त इलेक्ट्राॅन छड़ की ओर आक£षत होते हैं। गोले ठ के पिछले पृष्ठ पर ध्नावेश का आध्िक्य हो जाता है। दोनों प्रकार के आवेश धतु के गोलों में आब( रहते हैं, पलायन नहीं कर पाते। अतः वे पृष्ठों पर ही चित्रा 1ण्4;इद्ध में दशार्ए अनुसार रहते हैं। गोले । के बाएँ पृष्ठ पर )णावेश का आध्िक्य तथा गोले के दाएँ पृष्ठ पर ध्नात्मक आवेश का आध्िक्य होता है। तथापि गोले के सारे इलेक्ट्राॅन गोले । के बाएँ पृष्ठ पर संचित नहीं होते। जैसे ही गोले । के बाएँ पृष्ठ पर इलेक्ट्राॅन एकत्रा होने शुरू होते हैं अन्य इलेक्ट्राॅन इनके द्वारा प्रतिक£षत हो जाते हैं। वुफछ ही क्षण में छड़ के आकषर्ण के कारण िया तथा संचित आवेशों के कारण प्रतिकषर्ण के बीच साम्य स्थापित हो जाता है। चित्रा 1ण्4;इद्ध साम्यावस्था को दशार्ता है। इस प्रिया को आवेश का प्रेरण कहते हैं तथा यह लगभग तात्कालिक है। जब तक काँच की छड़ गोले के निकट रहती है तब तक चित्रा में दशार्ए अनुसार संचित आवेश पृष्ठ पर रहता है। यदि छड़ को हटा लेते हैं तो आवेशों पर कोइर् बाह्य बल कायर् नहीं करता तथा वे अपनी उदासीन अवस्था में वापस लौट जाते हैं। ;पपपद्ध चित्रा 1ण्4;बद्ध में दशार्ए अनुसार काँच की छड़ को बाएँ गोले के निकट रखते हुए दोनों गोलों को एक - दूसरे से वुफछ पृथवफ कीजिए। ऐसा करने पर दोनों गोले विजातीय आवेशों द्वारा आवेश्िात होकर एक - दूसरे को आक£षत करते हैं। ;पअद्ध छड़ को हटा लीजिए। गोलों पर आवेश चित्रा 1ण्4;कद्ध में दशार्ए अनुसार स्वयं को पुनव्यर्वस्िथत कर लेते हैं। अब दोनों गोलों के बीच पृथकन अध्िक कीजिए। ऐसा करने पर चित्रा 1ण्4;मद्ध में दशार्ए अनुसार आवेश गोलों पर एकसमान रूप से वितरित हो जाता है। इस प्रिया में धतु के गोले आवेश्िात हो जाते हैं। ध्नावेश्िात काँच की छड़ के आवेश की कोइर् क्षति नहीं होती, जो संपवर्फ द्वारा आवेश्िात करने की प्रिया के विपरीत है। जब किसी विद्युन्मय छड़ को हलकी वस्तुओं के निकट लाते हैं तो यही प्रभाव होता है। छड़ वस्तुओं के पास वाले पृष्ठ पर विजातीय आवेश प्रेरित करती है तथा सजातीय आवेश वस्तुओं के दूर वाले भाग पर पहुँच जाता है ¹ऐसा तब भी होता है जब हलकी वस्तु चालक नहीं होती। यह प्रिया किस प्रकार होती है इसका स्पष्टीकरण बाद में अनुच्छेद 1ण्10 तथा 2ण्10 में किया गया है ,। दोनों प्रकार के आवेशों के वेंफद्रों में वुफछ पृथकन होता है। हम जानते हैं कि सजातीय आवेशों में प्रतिकषर्ण तथा विजातीय आवेशों में आकषर्ण होता है। तथापि, बल का परिमाण आवेशों के बीच दूरी पर निभर्र करने के कारण आकषर्ण बल प्रतिकषर्ण बल की तुलना में अध्िक होता है। पफलस्वरूप कागज के टुकड़े, सरवंफडे की गोली आदि हलके होने के कारण छड़ की ओर ¯खच़आते हैं। भौतिकीउदाहरण 1ण्1 आप किसी धतु के गोले को स्पशर् किए बिना वैफसे ध्नावेश्िात कर सकते हैं? हल चित्रा 1ण्5;ंद्ध में किसी विद्युतरोध्ी धतु के स्टैंड पर कोइर् अनावेश्िात धतु का गोला रखा दशार्या गया है। चित्रा 1ण्5;इद्ध में दशार्ए अनुसार इस गोले के निकट कोइर् )णावेश्िात छड़ लाइए। गोले के मुक्त इलेक्ट्राॅन प्रतिकषर्ण के कारण दूर जाकर दूरस्थ सिरे पर एकत्रा हो जाते हैं। पास का सिरा इलेक्ट्राॅनों की कमी के कारण ध्नावेश्िात हो जाता है। जब गोले की धतु के मुक्त इलेक्ट्राॅनों पर लगने वाला नेट बल शून्य हो जाता है तो आवेशों के वितरण की यह प्रिया बंद हो जाती है। किसी चालक तार द्वारा गोले को भूसंप£कत कीजिए। इलेक्ट्राॅन भूमि में प्रवाहित हो जाएँगे जबकि पास के सिरे का ध्नावेश, छड़ के )णावेश के आकषर्ण बल के कारण चित्रा 1ण्5;बद्ध में दशार्ए अनुसार ब( रहेगा। गोले का भूसंपवर्फ तोड़ दीजिए। पास के सिरे पर ध्नावेश की ब(ता बनी रहती है ¹चित्रा1ण्5;कद्धह्। विद्युन्मय छड़ को हटा लीजिए। चित्रा 1ण्5;मद्ध में दशार्ए अनुसार ध्नावेश गोले के पृष्ठ पर एकसमान रूप से पैफल जाता है। प्रेरण द्वारा दो गोलों के निकाय के आवेशन संबंध्ी प्रभावी सजीव चित्राणीजजचरूध्ध्ूूूण्चीलेपबेबसंेेतववउण्बवउध्उउमकपंध्मेजंजपबेध्मेजंजपबध्पेितण्बउि उदाहरण 1ण्1 चित्रा 1ण्5 इस प्रयोग में धतु का गोला प्रेरण की प्रिया द्वारा आवेश्िात हो जाता है तथा छड़ अपना कोइर् आवेश नहीं खोती। प्रेरण द्वारा धतु के गोले को )णावेश्िात करने की प्रिया के भी ये ही चरण होते हैं, इसमें ध्नावेश्िात छड़ गोले के समीप लाइर् जाती है। इस प्रकरण में इलेक्ट्राॅन भूमि से गोले में उस समय स्थानांतरित ;प्रवाहितद्ध होते हैं जब तार द्वारा गोले को भूसंप£कत किया जाता है। क्या आप इसका कारण स्पष्ट कर सकते हैं? भौतिकी 1ण्5 वैद्युत आवेश के मूल गुण हमने यह देखा है कि दो प्रकार के आवेश होते हैं - ध्नावेश तथा )णावेश तथा इनमें एक - दूसरे के प्रभाव को निरस्त करने की प्रवृिा होती है। अब, हम यहाँ वैद्युत आवेश के अन्य गुणों का वणर्न करेंगे। यदि आवेश्िात वस्तुओं का साइश उनके बीच की दूरी की तुलना में बहुत कम होता है तो हम उन्हें ¯बदु आवेश मानते हैं। यह मान लिया जाता है कि वस्तु का संपूणर् आवेश आकाश में एक ¯बदु पर संवेंफदि्रत है। 1ण्5ण्1 आवेशों की योज्यता अब तक हमने आवेश की परिमाणात्मक परिभाषा नहीं दी हैऋ इसे हम अगले अनुभाग में समझेंगे। अंतरिम रूप में हम यह मानेंगे कि ऐसा किया जा सकता है और पिफर आगे बढ़ेंगे। यदि किसी निकाय में दो ¯बदु आवेश ुतथा ुहैं तो निकाय का वुफल आवेश ुतथा ु को बीजगण्िातीय रीति से12 12 जोड़ने पर प्राप्त होता है, अथार्त आवेशों को वास्तविक संख्याओं की भाँति जोड़ा जा सकता है अथवा आवेश द्रव्यमान की भाँति अदिश राश्िा है। यदि किसी निकाय में द आवेश ु1ए ु2 एु3ण्ण्ण् ुदए हैं तो निकाय का वुफल आवेश ु ़ ु़ ु़ ३़ ुहै। आवेश का द्रव्यमान की भाँति ही परिमाण होता12 3 द है दिशा नहीं होती। तथापि आवेश तथा द्रव्यमान में एक अंतर है। किसी वस्तु का द्रव्यमान सदैव ध्नात्मक होता है जबकि कोइर् आवेश या तो ध्नात्मक हो सकता है अथवा )णात्मक। किसी निकाय के आवेश का योग करते समय उसके उपयुक्त चिÉ का उपयोग करना होता है। उदाहरणाथर्, किसी निकाय में किसी यादृच्िछक मात्राक में मापे गए पाँच आवेश ़1ए ़2ए दृ3ए ़4 तथा दृ5 हैं, तब उसी मात्राक में निकाय का वुफल आवेश त्र ;़1द्ध ़ ;़2द्ध ़ ;दृ3द्ध ़ ;़4द्ध ़ ;दृ5द्ध त्र दृ1 है। 1ण्5ण्2 वैद्युत आवेश संरक्ष्िात है हम इस तथ्य की ओर पहले ही संकेत दे चुके हैं कि जब वस्तुएँ रगड़ने पर आवेश्िात होती हैं तो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में इलेक्ट्राॅनों का स्थानांतरण होता है, कोइर् नया आवेश उत्पन्न नहीं होता है, और न ही आवेश नष्ट होता है। वैद्युत आवेशयुक्त कणों को दृष्िट में लाएँ तो हमें आवेश के संरक्षण की धरणा समझ में आएगी। जब हम दो वस्तुओं को परस्पर रगड़ते हैं तो एक वस्तु जितना आवेश प्राप्त करती है, दूसरी वस्तु उतना आवेश खोती है। बहुत सी आवेश्िात वस्तुओं के किसी वियुक्त निकाय के भीतर, वस्तुओं में अन्योन्य िया के कारण, आवेश पुनः वितरित हो सकते हैं, परंतु यह पाया गया है कि वियुक्त निकाय का वुफल आवेश सदैव संरक्ष्िात रहता है। आवेश - संरक्षण को प्रायोगिक रूप से स्थापित किया जा चुका है। यद्यपि किसी प्रिया में आवेशवाही कण उत्पन्न अथवा नष्ट किए जा सकते हैं, परंतु किसी वियुक्त निकाय के नेट आवेश को उत्पन्न करना अथवा नष्ट करना संभव नहीं है। कभी - कभी प्रवृफति आवेश्िात कण उत्पन्न करती है: कोइर् न्यूट्राॅन एक प्रोटाॅन तथा एक इलेक्ट्राॅन में रूपांतरित हो जाता है। इस प्रकार उत्पन्न प्रोटाॅन तथा इलेक्ट्राॅन पर, परिमाण में समान एवं विजातीय ;विपरीतद्ध आवेश उत्पन्न होते हैं तथा इस रचना से पूवर् और रचना के पश्चात का वुफल आवेश शून्य रहता है। 1ण्5ण्3 वैद्युत आवेश का क्वांटमीकरण प्रायोगिक रूप से यह स्थापित किया गया है कि सभी मुक्त आवेश परिमाण में आवेश की मूल इकाइर्, जिसे म द्वारा दशार्या जाता है, के पूणा±की गुणज हैं। इस प्रकार, किसी वस्तु के आवेश ु को सदैव इस प्रकार दशार्या जाता है - ु त्र दम यहाँ द कोइर् ध्नात्मक अथवा )णात्मक पूणा±क है। आवेश की यह मूल इकाइर् इलेक्ट्राॅन अथवा प्रोटाॅन के आवेश का परिमाण है। परिपाटी के अनुसार, इलेक्ट्राॅन के आवेश को )णात्मक मानते हैंऋ इसीलिए किसी इलेक्ट्राॅन पर आवेश दृम तथा प्रोटाॅन पर आवेश ़म द्वारा व्यक्त करते हैं। वैद्युत आवेश सदैव म का पूणा±क गुणज होता है। इस तथ्य को आवेश का क्वांटमीकरण कहते हैं। भौतिकी में ऐसी बहुत सी अवस्िथतियाँ हैं जहाँ वुफछ भौतिक राश्िायाँ क्वांटीवृफत हैं। आवेश के क्वांटमीकरण का सुझाव सवर्प्रथम अंग्रेश प्रयोगकतार् पैफराडे द्वारा खोजे गए विद्युत अपघटन के प्रायोगिक नियमों से प्राप्त हुआ था। सन् 1912 में मिलिकन ने इसे वास्तव में प्रायोगिक रूप से निद£शत किया था। मात्राकों की अंतरार्ष्ट्रीय प्रणाली;ैप्द्ध में आवेश का मात्राक वूफलाॅम है, जिसका प्रतीक ब् है। एक वूफलाॅम को विद्युत धरा के मात्राक के पदों में परिभाष्िात किया जाता है जिसके विषय में आप अगले अध्याय में सीखेंगे। इस परिभाषा के अनुसार, एक वूफलाॅम वह आवेश है जो किसी तार में 1 । ;ऐेम्िपयरद्ध धरा 1 सेवंफड तक प्रवाहित करता है ¹भौतिकी की पाठ्यपुस्तक कक्षा 11, भाग 1 का अध्याय 2 देख्िाएह्। इस प्रणाली में, आवेश की मूल इकाइर् म त्र 1ण्602192 × 10दृ19 ब् इस प्रकार, दृ1ब् आवेश में लगभग6 × 1018 इलेक्ट्राॅन होते हैं। स्िथरवैद्युतिकी में इतने विशाल परिमाण के आवेशों से यदा - कदा ही सामना होता है और इसीलिए हम इसके छोटे मात्राकों 1 - ब् ;माइक्रोवूफलाॅमद्ध त्र 10दृ6 ब् अथवा 1 उब् ;मिलीवूफलाॅमद्ध त्र 10दृ3 ब् का उपयोग करते हैं। यदि केवल इलेक्ट्राॅन तथा प्रोटाॅन ही विश्व में आवेश के मूल मात्राक हैं तो सभी प्रेक्ष्िात आवेशों को म का पूणा±क गुणज होना चाहिए। इस प्रकार यदि किसी वस्तु में द1 इलेक्ट्राॅन तथा द2 प्रोटाॅन हैं तो उस वस्तु पर वुफल आवेश द × म ़ द × ;दृमद्ध त्र ;द2 दृ दद्ध म है। चूँकि दतथा दपूणा±क21112 हैं, इनका अंतर भी एक पूणा±क है। अतः किसी वस्तु पर आवेश सदैव म का पूणा±क गुणज होता है जिसे म के चरणों में ही घटाया अथवा बढ़ाया जा सकता है। ¯कतु, मूल मात्राक म का साइश बहुत छोटा होता है और स्थूल स्तर पर हम वुफछ - ब् के आवेशों को व्यवहार में लाते हैं, इस पैमाने पर यह तथ्य दृष्िटगोचर नहीं होता कि किसी वस्तु का आवेश म के मात्राकों में घट अथवा बढ़ सकता है। आवेश की कण्िाकीय प्रवृफति लुप्त हो जाती है और यह सतत प्रतीत होता है। इस स्िथति की तुलना ¯बदु तथा रेखा की ज्यामितीय परिकल्पनाओं से की जा सकती है। दूर से देखने पर कोइर् ¯बदुकित रेखा हमें सतत प्रतीत होती है परंतु वह वास्तव में सतत नहीं होती। जिस प्रकार एक - दूसरे के अत्यध्िक निकट के बहुत से ¯बदु हमें सतत रेखा का आभास देते हैं, उसी प्रकार एक साथ लेने पर बहुत से छोटे आवेशों का संकलन भी सतत आवेश वितरण जैसा दिखाइर् देता है। स्थूल स्तर पर हम ऐसे आवेशों से व्यवहार करते हैं जो इलेक्ट्राॅन म के आवेश की तुलना में परिमाण में अत्यध्िक विशाल होते हैं। चूँकि म त्र 1ण्6 × 10दृ19 ब्ए परिमाण में 1 - ब् आवेश में एक इलेक्ट्राॅन के आवेश का लगभग 1013 गुना आवेश होता है। इस पैमाने पर, यह तथ्य कि किसी वस्तु में आवेश की कमी अथवा वृि केवल म के मात्राकों में हीे हो सकती है, इस कथन से सवर्था भ्िान्न नहीं है कि आवेश सतत मान ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार, स्थूल स्तर पर आवेश के क्वांटीकरण का कोइर् व्यावहारिक महत्त्व नहीं है तथा इसकी उपेक्षा की जा सकती है। सूक्ष्म स्तर पर जहाँ आवेश के परिमाण म के वुफछ दशक अथवा वुफछ शतक कोटि के होते हैं अथार्त जिनकी गणना की जा भौतिकी सकती है, वहाँ पर आवेश विविक्त प्रतीत होते हैं तथा आवेश के क्वांटमीकरण की उपेक्षा नहीं की जा सकती। अतः यह जानना बहुत महत्वपूणर् है कि किस परिमाण के आवेश की बात हो रही है। उदाहरण 1ण्2 यदि किसी पिंड से एक सेवंफड में 109 इलेक्ट्राॅन किसी अन्य पिंड में स्थानांतरित होते हैं तो 1ब् आवेश के स्थानांतरण में कितना समय लगेगा? हल 1सेवंफड में ¯पड से 109 इलेक्ट्राॅन निकलते हैं, अतः ¯पड द्वारा 1े में दिया जाने वाला आवेश 1ण्6 × 10दृ19 × 109 ब् त्र 1ण्6 × 10दृ10 ब् तब 1 ब् आवेश के संचित होने के समय का आकलन 1 ब् झ् ;1ण्6 × 10दृ10 ब्ध्ेद्ध त्र 6ण्25 × 109 े त्र 6ण्25 × 109 झ् ;365 × 24 × 3600द्ध वषर् त्र 198 वषर्। इस प्रकार जिस पिंड से 109 इलेक्ट्राॅन प्रति सेवंफड की दर से उत्सजर्न हो रहा है, उससे 1 ब् आवेश संचित करने में लगभग 200 वषर् लगेंगे। अतः बहुत से व्यावहारिक कायो± की दृष्िट से एक वूफलाॅम आवेश का एक अति विशाल मात्राक है। तथापि यह जानना भी अति महत्वपूणर् है कि किसी पदाथर् के 1 घन सेंटीमीटर टुकड़े में लगभग कितने इलेक्ट्राॅन होते हैं। 1 बउ भुजा के ताँबे के घन में लगभग 2ण्5 × 1024 इलेक्ट्राॅन होते हैं। उदाहरण 1ण्3 एक कप जल में कितने ध्न तथा )ण आवेश होते हैं? हल मान लीजिए कि एक कप जल का द्रव्यमान 250 ह है। जल का अणु द्रव्यमान 18 ह है। इस प्रकार एक मोल ;त्र 6ण्02 × 1023 अणुद्ध जल का द्रव्यमान 18 ह है। अतः एक कप जल में अणुओं की संख्या त्र ;250ध्18द्ध × 6ण्02 × 1023 । जल के प्रत्येक अणु में दो हाइड्रोजन परमाणु तथा एक आॅक्सीजन परमाणु होता है, अथार्त, 10 इलेक्ट्राॅन तथा 10 प्रोटाॅन होते हैं। अतः वुफल ध्न तथा वुफल )ण आवेश परिमाण में समान होते हैं। आवेश का यह परिमाण त्र ;250ध्18द्ध × 6ण्02 × 1023 × 10 × 1ण्6 × 10दृ19 ब् त्र 1ण्34 × 107 ब् 1ण्6 वूफलाॅम नियम वूफलाॅम नियम दो ¯बदु आवेशों के बीच लगे बल के विषय में एक मात्रात्मक प्रकथन है। जब आवेश्िात वस्तुओं के साइश उनको पृथक करने वाली दूरी की तुलना में बहुत कम होते हैं तो ऐसी आवेश्िात वस्तुओं के साइशों की उपेक्षा की जा सकती है और उन्हें ¯बदु आवेश माना जा सकता है। वूफलाॅम ने दो ¯बदु आवेशों के बीच लगे बल की माप की और यह पाया कि यह बल दोनों आवेशों के परिमाणों के गुणनपफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वगर् के व्युत्क्रमानुपाती है तथा यह दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कायर् करता है। इस प्रकार यदि दो ¯बदु आवेशों ु1 तथा ु2 के बीच निवार्त में पृथकन त है, तो इनके बीच लगे बल ;थ्द्ध का परिमाण है थ् त्र ा ु1 2 ु2 ;1ण्1द्ध त अपने प्रयोगों से किस प्रकार वूफलाॅम इस नियम तक पहुँचे? वूफलाॅम ने धतु के दो आवेश्िात गोलों के बीच लगे बल की माप के लिए ऐंठन तुला’ का उपयोग किया। जब दो गोलों के बीच पृथकन प्रत्येक गोले की त्रिाज्या की तुलना में बहुत अध्िक होता है तो प्रत्येक आवेश्िात गोले को ¯बदु आवेश मान सकते हैं। तथापि आरंभ करते समय गोलों पर आवेश अज्ञात थे। तब वह किस प्रकार ’ ऐंठन तुला बल मापने की एक सुग्राही युक्ित है। इस तुला का उपयोग बाद में वैफवेंडिश ने दो पिंडों के बीच लगे गुरुत्वाकषर्ण बल की माप के लिए भी करके न्यूटन के गुरुत्वाकषर्ण नियम को सत्यापित किया। समीकरण ;1ण्1द्ध जैसे संबंध् को खोज पाए? वूफलाॅम ने निम्नलिख्िात सरल उपाय सोचा - मान लीजिए धतु के गोले पर आवेश ु है। यदि इस गोले को इसके सवर्सम किसी अन्य अनावेश्िात गोले के संपवर्फ में रख दें तो आवेश ु दोनों गोलों पर पैफल जाएगा। सममिति के अनुसार, प्रत्येक गोले पर ुध्2’ आवेश होगा। इस प्रिया को दोहराकर हमुध्2ए ुध्4 आदि आवेश प्राप्त कर सकते हैं। वूफलाॅम ने आवेशों के नियत युगल के लिए दूरियों में परिवतर्न करके विभ्िान्न दूरियों के लिए बल की माप की। तत्पश्चात उन्होंने प्रत्येक युगल के लिए दूरी नियत रखकर युगलों में आवेशों में परिवतर्न किया। विभ्िान्न दूरियों पर आवेशों के विभ्िान्न युगलों के लिए बलों की तुलना करके वूफलाॅम समीकरण;1ण्1द्ध के संबंध् पर पहुँच गए। वूफलाॅम नियम जो कि एक सरल गण्िातीय कथन है, उस तक आरंभ में, ऊपर व£णत प्रयोगों के आधर पर पहुँचा गया। यद्यपि इन मूल प्रयोगों ने इसे स्थूल स्तर पर स्थापित किया, अवपरमाणुक स्तर ;त ् 10दृ10 उद्ध तक भी इसे स्थापित किया जा चुका है। वूफलाॅम ने अपने नियम की खोज बिना आवेशों के परिमाणों के सही संज्ञान के, की थी। वास्तव में, इसे विपरीत अनुप्रयोग के लिए उपयोग में लाया जा सकता है - वूफलाॅम के नियम का उपयोग अब हम आवेश के मात्राक को परिभाष्िात करने के लिए कर सकते हैं। समीकरण ;1ण्1द्ध के संबंध् में अब तक ा का मान यादृच्िछक है। हम ा के लिए किसी भी ध्नात्मक मान का चयन कर सकते हैं। ा का चयन आवेश के मात्राक का साइश निधर्रित करता है। ैप् मात्राकों में ा का मान लगभग 9 × 109 है। इस चयन के पफलस्वरूप आवेश का जो मात्राक प्राप्त होता है उसे वूफलाॅम कहते हैं जिसकी परिभाषा हमने पहले अनुच्छेद 1ण्4 में दे दी है। समीकरण ;1ण्1द्ध में ा का यह मान रखने पर हम यह पाते हैं कि ु1 त्र ु2 त्र 1 ब् तथा त त्र 1 उ के लिए थ् त्र 9 × 109 छ अथार्त 1 ब् वह आवेश है जो निवार्त में 1 उ दूरी पर रखे इसी परिमाण के किसी अन्य सजातीय आवेश को9 × 109 न्यूटन बल से प्रतिक£षत करे। स्पष्ट रूप से, 1 ब् व्यावहारिक कायो± के लिए आवेश का बहुत बड़ा मात्राक है। स्िथरवैद्युतिकी में, व्यवहार में इसके छोटे मात्राकों जैसे 1उब् तथा 1 - ब् का उपयोग किया जाता है। बाद की सुविध के लिए समीकरण ;1ण्1द्ध के नियतांक ा को प्रायः ा त्र 1ध्4πε0 लिखते हैं, जिससे वूफलाॅम नियम को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है ुु 1 12थ् त्र ;1ण्2द्ध4 πε0 त 2 चाल्सर् आॅगस्िटन डे वूफलाॅम ;1736 दृ 1806द्ध प्रफांसीसी भौतिकविद वूफलाॅम ने वेस्टइंडीज में एक पफौजी इंजीनियर के रूप में अपना वैफरियर आरंभ किया। सन् 1776 में वे पेरिस लौट आए तथा एक छोटी सी संपिा बनाकर एकांत में अपना शोध् कायर् करने लगे। बल के परिमाण को मापने के लिए इन्होंने एक ऐंठन तुला का आविष्कार किया और इसका उपयोग इन्होंने छोटे आवेश्िात गोलों के बीच लगने वाले आकषर्ण अथवा प्रतिकषर्ण बलों को ज्ञात करने में किया। इस प्रकार, सन् 1785 में ये व्युत्क्रम वगर् नियम को खोज पाए जिसे आज वूफलाॅम का नियम कहते हैं। इस नियम का पूवर् अनुमान पि्रस्टले तथा वैफवेंडिश ने लगा लिया था परंतु वैफवेेंडिश ने अपने परिणाम कभी प्रकाश्िात नहीं किए। वूफलाॅम ने सजातीय तथा विजातीय चुंबकीय ध्ु्रवों के बीच लगने वाले व्युत्क्रम वगर् नियम का भी पता लगाया। ε0 को मुक्त आकाश या निवार्त की विद्युतशीलता अथवा परावैद्युतांक कहते हैं। ैप् मात्राकों में ε0 का मान छदृ1दृ2ε 0 त्र 8ण्854 × 10दृ12 ब्2उबल एक सदिश है, अतः वूफलाॅम नियम को सदिश संकेतन में लिखना उत्तम होता है। मान लीजिए ुतथा ुआवेशों के स्िथति सदिश क्रमशः ततथा तहैं ¹चित्रा 1ण्6;ंद्ध देख्िाएह्। हम ु12 122 ’ इसमें आवेशों की योज्यशीलता तथा आवेशों के संरक्षण की अवधरणाएँ अंत£नहित हैं। दो आवेशों ;प्रत्येक 11ुध्2द्ध के संयोजन से वुफल आवेश ु बनता है। भौतिकी के द्वारा ु1 पर आरोपित बल को थ्12 तथा ु1 के द्वारा ु2 पर आरोपित बल को थ्21 द्वारा व्यक्त करते हैं। दो ¯बदु आवेशों ु1 तथा ु2 को सुविध के लिए 1 तथा2 अंक द्वारा व्यक्त किया गया है। साथ ही 1 से 2 की ओर जाते सदिश को द्वारा व्यक्त किया गया है - त21 त त्र त दृ त2121 इसी प्रकार 2 से 1 की ओर जाते सदिश को त12 द्वारा व्यक्त किया जाता है - त12 त्र त1 दृ त2 त्र दृ त21 सदिशों ततथा तके परिमाणों का संकेतन क्रमशः तएवं2112 21 द्वारा होता है ;तद21 त्र तद12द्ध। किसी सदिश की दिशा का विशेषत12 उल्लेख उस सदिश के अनुदिश एकांक सदिश द्वारा किया जाता है। ¯बदु 1 से 2 की ओर ;अथवा 2 से 1 की ओरद्ध इंगित करने वाले एकांक सदिश की परिभाषा हम इस प्रकार करते हैं: तत21 12 त६ त्र त६ त्र ए त६ त्र त६चित्रा 1ण्6 ;ंद्ध ज्यामिति तथा 21 ए 12 21 12 तत21 12 ;इद्ध आवेशों के बीच आरोपित बल। त1 तथा त2 पर अवस्िथत ¯बदु आवेशों ु1 तथा ु2 के बीच लगे वूफलाॅम बल नियम को तब इस प्रकार व्यक्त किया जाता है 1 ुु त्र 12 तथ् ६21 2 21 ;1ण्3द्ध4 πε वत21 समीकरण ;1ण्3द्ध के संबंध् में वुफछ टिप्पण्िायाँ प्रासंगिक हैं: ऽ समीकरण ;1ण्3द्ध ु1 तथा ु2 के किसी भी चिÉ, ध्नात्मक अथवा )णात्मक के लिए मान्य है। यदि ु1 तथा ु2 समान चिÉ के हैं ;या तो दोनों ही ध्नात्मक अथवा दोनों ही )णात्मक हैंद्ध तब थ्21ए ६के अनुदिश है, जो प्रतिकषर्ण को प्रद£शत करता है जैसा सजातीय आवेशोंत 21 के लिए होना ही चाहिए। यदि ुतथा ुके विपरीत चिÉ हैं तब थ्ए दृ ६के अनुदिश है,12 21त 21 जो आकषर्ण को प्रद£शत करता है तथा विजातीय आवेशों के लिए हम इसी की आशा करते हैं। इस प्रकार हमें सजातीय तथा विजातीय आवेशों के प्रकरणों के लिए पृथक - पृथक समीकरण लिखने की आवश्यकता नहीं है। समीकरण ;1ण्3द्ध दोनों ही प्रकरणों को सही - सही प्रकट कर देती है ¹चित्रा 1ण्6;इद्ध देख्िाएह्। ऽ ु2 के कारण ु1 पर आरोपित बल थ्12 को समीकरण ;1ण्3द्ध में 1 तथा 2 में सरल अंतपर्रिवतर्न करके प्राप्त किया जा सकता है, अथार्त 1 ुु1 2६थ् त्र त त्र−थ्12 212 21 4 πε0 त12 इस प्रकार, वूफलाॅम नियम न्यूटन के गति के तृतीय नियम के अनुरूप ही है। ऽ वूफलाॅम नियम ;समीकरण 1ण्3द्ध से निवार्त में स्िथत दो आवेशों ु1 तथा ु2 के बीच आरोपित बल प्राप्त होता है। यदि आवेश किसी द्रव्य में स्िथत हैं अथवा दोनों आवेशों के बीच के रिक्त स्थान में कोइर् द्रव्य भरा है, तब इस द्रव्य के आवेश्िात अवयवों के कारण स्िथति जटिल बन 12 जाती है। अगले अध्याय में हम द्रव्य में स्िथरवैद्युतिकी पर विचार करेंगे। उदाहरण 1ण्4 दो वैद्युत आवेशों के बीच स्िथर वैद्युत बल के लिए वूफलाॅम नियम तथा दो स्िथर ¯बदु द्रव्यमानों के बीच गुरुत्वाकषर्ण बल के लिए न्यूटन का नियम दोनों में ही बल आवेशों/द्रव्यमानों के बीच की दूरी के वगर् के व्युत्क्रमानुपाती होता है। ;ंद्ध इन दोनों बलों के परिमाण ज्ञात करके इनकी प्रबलताओं की तुलना की जाए ;पद्ध एक इलेक्ट्राॅन तथा एक प्रोटाॅन के लिए, ;पपद्ध दो प्रोटाॅनों के लिए। ;इद्ध इलेक्ट्राॅन तथा प्रोटाॅन में पारस्परिक आकषर्ण के वैद्युत बल के कारण इलेक्ट्राॅन तथा प्रोटाॅन के त्वरण आकलित कीजिए जबकि इनके बीच की दूरी 1 ऊ ;त्र 10.10 उद्ध है। ;उच त्र 1ण्67 × 10दृ27 ज्ञए उम त्र 9ण्11 × 10दृ31 ाहद्ध हल ;ंद्ध ;पद्ध एक इलेक्ट्राॅन तथा एक प्रोटाॅन के बीच वैद्युत बल जबकि इनके बीच की दूरी त है: 1 म 2 थ् त्र− म 4πε0 त 2 यहाँ पर )णात्मक चिÉ आकषर्ण बल को इंगित करता है। इसके तदनुरूपी गुरुत्वाकषर्ण बल ;जो सदैव ध्नात्मक हैद्ध: उउ थ्ळ त्र−ळच 2 म त यहाँ उच तथा उम क्रमशः प्रोटाॅन तथा इलेक्ट्राॅन के द्रव्यमान हैं। 2थ् म म त्रत्र 2ण्4 × 10 39 4πε ळउ उ थ्ळ 0 चम ;पपद्ध इसी प्रकार त दूरी पर स्िथत दो प्रोटाॅनों के बीच वैद्युत बल तथा गुरुत्वाकषर्ण बल के परिमाणों का अनुपात - 2थ् म म त्रत्र 1ण्3 × 1036 4πε ळउ उ थ्ळ 0 चच तथापि यहाँ यह उल्लेख करना महत्वपूणर् है कि यहाँ पर दो बलों के चिÉों में अंतर है। दो प्रोटाॅनों के लिए गुरुत्वाकषर्ण बल आकषीर् है तथा वूफलाॅम बल प्रतिकषीर् है। नाभ्िाक के भीतर इन बलों के वास्तविक मान ;नाभ्िाक के भीतर दो प्रोटाॅनों के बीच की दूरी् 10.15 उ हैद्धः थ् म ् 230 छ है जबकि थ्ळ ् 1ण्9 × 10दृ34 छ हैं। इन दोनों बलों का ;विमाहीनद्ध अनुपात यह दशार्ता है कि गुरुत्वाकषर्ण बल की तुलना में वैद्युत बल अत्यंत प्रबल होते हैं।;इद्ध एक प्रोटाॅन द्वारा एक इलेक्ट्राॅन पर आरोपित वैद्युत बल थ् परिमाण में एक इलेक्ट्राॅन द्वारा एक प्रोटाॅन पर आरोपित बल समान हैऋ तथापि इलेक्ट्राॅन तथा प्रोटाॅन के द्रव्यमान भ्िान्न होते हैं। इस प्रकार बल का परिमाण है 1 म 2 द्यथ्द्य त्र 2 त्र 8ण्987 × 109 छउ2ध्ब्2 × ;1ण्6 ×10दृ19ब्द्ध2 ध् ;10दृ10उद्ध24πε 0 त त्र 2ण्3 × 10दृ8 छ न्यूटन के गति के दूसरे नियम थ् त्र उं के अनुसार इलेक्ट्राॅन में उत्पन्न त्वरण ं त्र 2ण्3×10दृ8 छ ध् 9ण्11 ×10दृ31 ाह त्र 2ण्5 × 1022 उध्े2 इसकी गुरुत्वीय त्वरण से तुलना करने पर हम यह निष्कषर् निकाल सकते हैं कि इलेक्ट्राॅन की गति पर गुरुत्वीय क्षेत्रा का प्रभाव नगण्य है तथा किसी प्रोटाॅन द्वारा इलेक्ट्राॅन पर आरोपित वूफलाॅम बल की िया के अध्ीन इलेक्ट्राॅन में उत्पन्न त्वरण अत्यध्िक है। प्रोटाॅन के लिए त्वरण का मान 2ण्3 × 10दृ8 छ ध् 1ण्67 × 10दृ27 ाह त्र 1ण्4 × 1019 उध्े2 है। वूफलाॅम के नियम का प्रभावी सजीव चित्राणीजजचरूध्ध्ूमइचीलेपबेण्कंअपकेवदण्मकनध्चीलेसमजऋतमेवनतबमेध्इनऋेमउमेजमत2ध्उमदनऋेमउमेजमत2ण्ीजउस भौतिकीउदाहरण 1ण्5धतु का आवेश्िात गोला । नाइलाॅन के धगे से निलंबित है। विद्युतरोध्ी हत्थी द्वारा किसी अन्य धतु के आवेश्िात गोले ठ को । के इतने निकट लाया जाता है कि चित्रा 1ण्7;ंद्ध में दशार्ए अनुसार इनके वेंफद्रों के बीच की दूरी 10 बउ है। गोले । के परिणामी प्रतिकषर्ण को नोट किया जाता है ;उदाहरणाथर् - गोले पर चमकीला प्रकाश पुंज डालकर तथा अंशांकित पदेर् पर बनी इसकी छाया का विक्षेपण मापकरद्ध। । तथा ठ गोलों को चित्रा 1ण्7;इद्ध में दशार्ए अनुसार, क्रमशः अनावेश्िात गोलों ब् तथा क् से स्पशर् कराया जाता है। तत्पश्चात चित्रा 1ण्7;बद्ध में दशार्ए अनुसार ब् तथा क् को हटाकर ठ को । के इतना निकट लाया जाता है कि इनके वंेफद्रों के बीच की दूरी 5ण्0 बउ हो जाती है। वूफलाॅम नियम के अनुसार । का कितना अपेक्ष्िात प्रतिकषर्ण है? गोले । तथा ब् एवं गोले ठ तथा क् के साइश सवर्सम हैं। । तथा ठ के वेंफद्रों के पृथकन की तुलना में इनके साइशों की उपेक्षा कीजिए। उदाहरण 1ण्5 चित्रा 1ण्7 के बीच दूरी त पर, प्रत्येक पर लगे स्िथर वैद्युत बल का परिमाण 1 ुु ′ थ् त्र 4πε0 त 2 यहाँ त की तुलना में गोलों । तथा ठ के साइश नगण्य हैं। जब कोइर् सवर्सम परंतु अनावेश्िात गोला ब् गोले । को स्पशर् करता है तो । तथा ब् पर आवेश का पुन£वतरण होता है और सममिति द्वारा प्रत्येक गोले पर आवेश ;ुध्2द्ध होता है। इसी प्रकार, ठ तथा क् के स्पशर् के पश्चात इनमें प्रत्येक पर पुन£वतरित आवेश ;ु′ध्2द्ध होता है। अब यदि । तथा ठ का पृथकन आध रह जाए तो प्रत्येक पर स्िथरवैद्युत बल 1 ; ध्2द्ध; ु ध्2द्ध 1 ुु द्धु ′ ; ′ थ् ′त्र त्रत्र थ् 4πε0;ध्2द्ध 2 40 2 त πε त इस प्रकार ठ के कारण । पर स्िथरवैद्युत बल अपरिव£तत रहता है। 1ण्7 बहुल आवेशों के बीच बल दो आवेशों के बीच पारस्परिक वैद्युत बल वूफलाॅम नियम द्वारा प्राप्त होता है। उस स्िथति में किसी आवेश पर आरोपित बल का परिकलन वैफसे करें, जहाँ उसके निकट एक आवेश न होकर उसे बहुत से आवेश चारों ओर से घेरे हों? निवार्त में स्िथत द स्िथर आवेशोंु1ए ु2ए ु3ए ण्ण्ण्ए ुद के निकाय पर विचार कीजिए। ु1 पर ु2ए ु3ए ण्ण्ण्ए ुद के कारण कितना बल लगता है? इसका उत्तर देने के लिए वूफलाॅम नियम पयार्प्त नहीं है। याद कीजिए, यांत्रिाक मूल के बलों का संयोजन सदिशों के संयोजन के समांतर चतुभुर्ज नियम द्वारा किया जाता है। क्या यही स्िथरवैद्युत मूल के बलों पर भी लागू होता है? प्रयोगों द्वारा यह सत्यापित हो चुका है कि किसी आवेश पर कइर् अन्य आवेशों के कारण बल उस आवेश पर लगे उन सभी बलों के सदिश योग के बराबर होता है जो इन आवेशों द्वारा इस आवेश पर एक - एक कर लगाया जाता है। किसी एक आवेश द्वारा लगाया गया विश्िाष्ट बल अन्य आवेशों की उपस्िथति के कारण प्रभावित नहीं होता। इसे अध्यारोपण का सि(ांत कहते हैं। इस अवधरणा को भलीभाँति समझने के लिए तीन आवेशों ु1ए ु2 तथा ु3 के निकाय, जिसे चित्रा 1ण्8;ंद्ध में दशार्या गया है, पर विचार कीजिए। किसी एक आवेश, जैसे ुपर अन्य दो आवेशों ुतथा ुके1 2 3 कारण बल को इनमें से प्रत्येक आवेश के कारण लगे बलों का सदिश संयोजन करके प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार यदि ु2 के कारण ु1 पर बल कोथ्द्वारा नि£दष्ट किया जाता है, तोथ्को समीकरण;1ण्3द्ध द्वारा 12 12 अन्य आवेशों की उपस्िथति होते हुए भी इस प्रकार व्यक्त किया जाता है: 1 ुु थ्त्र 12 त६12 212 4πε0 त12 इसी प्रकार ुके कारण ुपर लगा वूफलाॅम बल जिसे थ्द्वारा31 13 चित्रा 1ण्8 ;ंद्ध तीन आवेशों ;इद्ध बहुल आवेशों केनि£दष्ट करते हैं तथा जिसे लिख सकते हैं निकाय। 1 ुु थ् त्र 13 त६13 13 2 154πε0 त13 भौतिकी यह भी ु3 के कारण ु1 पर लगा वूफलाॅम बल ही है, जबकि अन्य आवेश ु2 उपस्िथत हैं। इस प्रकार ुपर दो आवेशों ुतथा ुके कारण वुफल बल थ्है1 2 3 1 1 ुु 1 ुु 12 13थ् त्र थ् ़ थ् त्र त६ ़ त६1 12 13 212 213 ;1ण्4द्ध4πε0 त 4πε0 त12 13 चित्रा 1ण्8;इद्ध में दशार्ए अनुसार तीन से अध्िक आवेशों के निकाय के लिए उपरोक्त परिकलन का व्यापकीकरण किया जा सकता है। अध्यारोपण के सि(ांत के अनुसार आवेशांे ु1ए ु2ए ण्ण्ण्ए ुद के किसी निकाय में आवेश ु1 पर ु2 द्वारा लगा बल वूफलाॅम नियम द्वारा लगे बल के समान होता है, अथार्त यह अन्य आवेशों ु3ए ु4ए ण्ण्ण्ए ुकी उपस्िथति से प्रभावित नहीं होता। आवेश ुपर सभी आवेशों द्वारा लगा वुफल बल थ्द 11 तब थ्12ए थ्13ए ण्ण्ण्ए थ्1द का सदिश योग होगा। अतः 1 ुु ुु ुु 1213 1 दथ् त्र थ् ़ थ् ़ ण्ण्ण़् थ् त्र त६ ़ त६ ़ ण्ण्ण् ़ त६1 12 13 1द 212 213 21द4πε तत त012 13 1द ु दु त्र 1 प त६21प ;1ण्5द्ध4πε त0 पत्र21प सदिशों के संयोजन की सामान्य विध्ि, समांतर चतुभुर्ज के नियम द्वारा सदिश योग प्राप्त किया जाता है। वास्तव में मूल रूप से समस्त स्िथरवैद्युतिकी वूफलाॅम नियम तथा अध्यारोपण के सि(ांत का एक परिणाम है। उदाहरण 1ण्6 तीन आवेशों ु1ए ु2ए ु3 पर विचार कीजिए जिनमें प्रत्येक ु के बराबर है तथा स भुजा वाले समबाहु त्रिाभुज के शीषो± पर स्िथत है। त्रिाभुज के वंेफद्रक पर चित्रा 1ण्9 में दशार्ए अनुसार स्िथत आवेश फ ;जो ु का सजातीयद्ध पर कितना परिणामी बल लग रहा है? उदाहरण 1ण्6 चित्रा 1ण्9 हल दिए गए स भुजा के समबाहु त्रिाभुज ।ठब् में यदि हम भुजा ठब् पर ।क् लंब खींचें तो ।क् त्र ।ब् बवे 30ह् त्र ; 3ध्2 द्ध स तथा । से वेंफद्रक की दूरी ।क् त्र ;2ध्3द्ध ।क् त्र ;1ध् 3द्धस सममिति से ।व् त्र ठव् त्र ब्व् इस प्रकार 3 फु । पर स्िथत आवेश ु के कारण फ पर बल, थ्1 त्र 2 ।व् के अनुदिश4πε0 स 3 फु ठ पर स्िथत आवेश ु के कारण फ पर बल, थ्2 त्र 2 ठव् के अनुदिश4πε0 स 3 फु ब् पर स्िथत आवेश ु के कारण फ पर बल, थ्त्र 2 ब्व् के अनुदिश3 4πε0 स 3 फु बलों थ्तथा थ्का परिणामी समांतर चतुभुर्ज नियम द्वारा व्। के अनुदिश है।223 4πε0 स 3 फु इसीलिए, फ पर वुफल बल त्र 2 ;त६ − त६द्ध त्र 0 यहाँ त६ए व्। के अनुदिश एकांक सदिश है।4πε0 स सममिति द्वारा भी यह स्पष्ट है कि उन तीनों बलों का योग शून्य होगा। मान लीजिए परिणामी बल शून्येतर था परंतु किसी दिशा में था। विचार कीजिए कि क्या हुआ होता यदि इस निकाय को व् के गिदर् ;परितःद्ध 60ह् पर घूणर्न कराया जाता। भौतिकी चित्रा 1ण्11 ;ंद्ध आवेश फ के कारण विद्युत क्षेत्रा, ;इद्ध आवेश दृफ के कारण विद्युत क्षेत्रा। इसी प्रकार, ब् पर स्िथत आवेश दृु पर वुफल बल थ्3 त्र 3 थ् द६है। यहाँ द६एकांक सदिश है जिसकी दिशा ∠ठब्। को समद्विभाजित करने वाली रेखा के अनुदिश है। यहाँ रोचक बात यह है कि तीनों आवेशों पर लगे बलों का योग शून्य है, अथार्त थ्1 ़ थ्2 ़ थ्3 त्र 0 यह परिणाम चैंकाने वाला नहीं है। यह इस तथ्य का अनुसरण करता है कि वूफलाॅम नियम तथा न्यूटन के तृतीय नियम के बीच सामंजस्य है। इस कथन की निष्पिा आपके अभ्यास के लिए छोड़ी जा रही है। 1ण्8 विद्युत क्षेत्रा माना निवार्त में एक ¯बदु आवेश फ मूल ¯बदु व् पर रखा है। यदि एक अन्य ¯बदु आवेश ुए ¯बदु च् पर रखा जाए, जहाँ व्च् त्र तए तो आवेश फए ु पर वूफलाॅम के नियमानुसार बल लगाएगा। हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं: यदि आवेश ु को हटा लें तो फ के परिवेश में क्या बचेगा? क्या वुफछ भी नहीं बचेगा? यदि ऐसा है तो च् पर आवेश ु रखने पर इस पर बल वैफसे लगता है? इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रारंभ्िाक वैज्ञानिकों ने क्षेत्रा की अवधरणा प्रस्तुत की। इसके अनुसार हम कहते हैं कि आवेश फ अपने चारों ओर विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न करता है जब इसमें कोइर् अन्य आवेश ु ¯बदु च् पर लाया जाता है तो क्षेत्रा इस पर बल आरोपित करता है। किसी ¯बदु त पर आवेश फ द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्रा 1 फ 1 फम्त ; द्धत्र 2 त६ त्र 2 त६ ;1ण्6द्ध4πε0 त 4πε0 त यहाँ त६ त्र तध्त ए मूल ¯बदु से ¯बदु त तक मात्राक सदिश है। इस प्रकार, समीकरण ;1ण्6द्ध स्िथति सदिश त के प्रत्येक मान के लिए विद्युत क्षेत्रा का संगत मान बताती है। शब्द ‘क्षेत्रा’ यह बताता है कि किस प्रकार कोइर् वितरित राश्िा ;जो सदिश अथवा अदिश हो सकती हैद्ध स्िथति के साथ परिव£तत होती है। आवेश के प्रभाव को विद्युत क्षेत्रा के अस्ितत्व में समाविष्ट किया गया है। आवेश फ द्वारा आवेश ु पर आरोपित बल थ् को हम इस प्रकार प्राप्त करते हैं: 1 फु त६थ् त्र 2 ;1ण्7द्ध4πε0 त ध्यान दीजिए आवेश ु भी आवेश फ पर परिमाण में समान परंतु दिशा में विपरीत बल आरोपित करता है। फ तथा ु आवेशों के बीच स्िथरवैद्युत बल को हम आवेश ु तथा फ के विद्युत क्षेत्रा के बीच अन्योन्य िया अथवा विलोमतः के रूप में समझ सकते हैं। यदि हम आवेश ु की स्िथति को सदिश त द्वारा नि£दष्ट करें, तो यह ु की अवस्िथति पर एक बल थ् का अनुभव करता है जो आवेश ु तथा विद्युत क्षेत्रा म् के गुणनपफल के बराबर है। इस प्रकार थ्;तद्ध त्र ु म्;तद्ध ;1ण्8द्ध समीकरण ;1ण्8द्ध विद्युत क्षेत्रा के ैप् मात्राक को छध्ब्’ के रूप में परिभाष्िात करती है। यहाँ वुफछ महत्वपूणर् टिप्पण्िायाँ की जा सकती हैंः ;पद्ध समीकरण ;1ण्8द्ध से यह निष्कषर् निकाला जा सकता है कि यदि ु एकांक है तो आवेश फ के कारण विद्युत क्षेत्रा का आंकिक मान इसके द्वारा आरोपित बल के बराबर होता है। इस प्रकार दिव्फस्थान में किसी ¯बदु पर आवेश फ के कारण विद्युत क्षेत्रा को उस बल के रूप में पारिभाष्िात किया जा सकता है जिसे कोइर् एकांक ध्नावेश उस ¯बदु पर रखे जाने पर अनुभव करता है। ’ अगले अध्याय में विद्युत क्षेत्रा के लिए एक अन्य वैकल्िपक मात्राक टध्उ पर विचार किया जाएगा। वह आवेश फ जो विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न कर रहा है स्रोत आवेश कहलाता है तथा आवेश ु जो स्रोत आवेश के प्रभाव का परीक्षण करता है, को परीक्षण आवेश कहते हैं। ध्यान दीजिए स्रोत आवेश को अपनी मूल अवस्िथति पर ही रहना चाहिए। तथापि, यदि किसी आवेश ु को फ के चारों ओर कहीं लाया जाता है, तो फ स्वयं भी आवेश ु के कारण वैद्युत बल का अनुभव करने के लिए बाध्य है और उसमें गति करने की प्रवृिा होगी। इससे मुक्ित का केवल एक ही उपाय है कि हम ु को उपेक्षणीय छोटा बनाएँ, तब बल थ् उपेक्षणीय छोटा होता है परंतु अनुपात थ्ध्ु एक परिमित राश्िा होती है तथा विद्युत क्षेत्रा को पारिभाष्िात करती है: म् त्र सपउ थ् ;1ण्9द्ध ु→0 ु इस समस्या ;आवेश फ को आवेश ु की उपस्िथति के कारण विक्षुब्ध् न होने देनाद्ध से मुक्ित का एक व्यावहारिक उपाय यह है कि आवेश फ की किन्हीं अनि£दष्ट बलों द्वारा अपनी अवस्िथति पर बाँध्े रखा जाए। यह विलक्षण प्रतीत हो सकता है, परंतु व्यवहार में ऐसा ही होता है। जब हम आवेश्िात की समतल चादर के कारण परीक्षण आवेश ु पर लगे वैद्युत बल पर विचार करते हैं ;अनुच्छेद 1ण्15द्ध, तब चादर पर आवेश, चादर के भीतर अनि£दष्ट आवेश्िात अवयवों द्वारा लगे बलों के कारण अपनी अवस्िथतियों पर ही बँध्े रहते हैं। ;पपद्ध ध्यान दीजिए, आवेश फ के कारण विद्युत क्षेत्रा म् की परिभाषा यद्यपि प्रभावी रूप से परीक्षण आवेश ु के पदों में की जाती है, तथापि यह ु पर निभर्र नहीं करती है। इसका कारण यह है कि बल थ् आवेश ु के अनुक्रमानुपाती है, इसलिए अनुपात थ्ध्ु आवेश ु पर निभर्र नहीं करता है। फ के कारण ु पर बल आवेश ु की किसी विशेष अवस्िथति से आवेश फ के चारों ओर के दिव्फस्थान में कहीं भी हो सकती है। इस प्रकार फ के कारण विद्युत क्षेत्रा म् दिव्फस्थान निदेर्शांक त पर भी निभर्र करता है। सारे दिव्फस्थान में आवेश की विभ्िान्न स्िथतियों के लिए हमें विद्युत क्षेत्रा म् के भ्िान्न मान प्राप्त होते हैं। विद्युत क्षेत्रा का अस्ितत्व त्रिाविमीय दिव्फस्थान के प्रत्येक ¯बदु पर होता है। ;पपपद्ध ध्नावेश के कारण विद्युत क्षेत्रा आवेश से बाहर की ओर उन्मुख त्रिाज्यीय होता है। इसके विपरीत, यदि स्रोत आवेश )णात्मक है तो विद्युत क्षेत्रा सदिश, हर ¯बदु पर त्रिाज्यीय, ¯कतु अंदर की ओर उन्मुख होता है। ;पअद्ध चूँकि आवेश फ के कारण आवेश ु पर लगे बल थ् का परिमाण केवल आवेश फ से आवेश ु के बीच की दूरी त पर निभर्र करता है, विद्युत क्षेत्रा म् का परिमाण भी केवल दूरी त पर निभर्र करता है। इस प्रकार, आवेश फ से समान दूरियों पर इसके कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्रा म् का परिमाण समान होता है। इस प्रकार किसी गोले के वेंफद्र पर स्िथत ¯बदु आवेश के कारण विद्युत क्षेत्रा म् का परिमाण उसके पृष्ठ के हर ¯बदु पर समान होता हैऋ दूसरे शब्दों में, वह क्षेत्रा गोलीय रूप से सममित होता है। 1ण्8ण्1 आवेशों के निकाय के कारण विद्युत क्षेत्रा आइए, ु1ए ु2ए ण्ण्ण्ए ुद आवेशों के एक निकाय पर विचार करते हैं जिनके किसी मूल ¯बदु व् के सापेक्ष स्िथति सदिश क्रमशः त1ए त2ए ण्ण्ण्ए त द हैं। किसी एकल आवेश के कारण दिव्फस्थान के किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा की ही भाँति आवेशों के निकाय के कारण दिव्फस्थान के किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा को उस ¯बदु पर रखे किसी एकांक ध्नावेश द्वारा अनुभव किए जाने वाले बल द्वारा परिभाष्िात किया जाता है। यहाँ यह माना जाता है कि एकांक आवेश के कारण ु1ए ु2ए ण्ण्ण्ए ुद आवेशों की मूल स्िथतियाँ विक्षुब्ध् नहीं होतीं। ¯बदु च्ए जिसे स्िथति सदिश त द्वारा नि£दष्ट किया जाता है, पर विद्युत क्षेत्रा को निधार्रित करने के लिए हम वूफलाॅम नियम तथा अध्यारोपण के सि(ांत का उपयोग करते हैं। भौतिकी त1 पर स्िथत आवेश ु1 के कारण अवस्िथति त पर विद्युत क्षेत्रा म्1 इस प्रकार व्यक्त किया जाता है। 1 ु1म्1 त्र त६1च् 4πε0 त1च् यहाँ त६1च्आवेश ु1 से च् की दिशा में एकांक सदिश है तथा आवेश ु1 तथात1च् च् के बीच की दूरी है। इसी प्रकार त2 पर स्िथत आवेश ु2 के कारण अवस्िथति त पर विद्युत क्षेत्रा म्2 को इस प्रकार व्यक्त करते हैं 1 ु2म्2 त्र त६2च् 4πε0 त2च् यहाँ त६2च्आवेश ु2 सेच् की दिशा में एकांक सदिश है तथा त2च् आवेश ु2 तथा चित्रा 1ण्12 आवेशों के निकाय के कारण किसी च् के बीच की दूरी है। इसी प्रकार के व्यंजक ु3ए ु4ए ण्ण्ण्ए ुद आवेशों के ¯बदु पर वैद्युत क्षेत्रा पृथक - पृथक आवेशों के कारण विद्युत क्षेत्रों म्3ए म्4ए ण्ण्ण्ए म् द लिखे जा सकते हैं। अध्यारोपण सि(ांत द्वारा उस ¯बदु पर वैद्युत क्षेत्रों के सदिश योग के बराबर आवेशों के निकाय के कारण त पर विद्युत क्षेत्रा ;चित्रा 1ण्12 में दशार्ए अनुसारद्ध होता है। इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है - म्;तद्ध त्र म्1 ;तद्ध ़ म्2 ;तद्ध ़ ३ ़ म् द;तद्ध1 ु 1 ुु1 12 दत्र त६ ़ त६ ़ ण्ण्ण् ़ त६21च् 22च् 2 दच्4πε0 त1च् 4πε0 त 4πε0 तदच्2च् 1 दुम्;तद्ध त्र 2 प त६प च् ;1ण्10द्ध4πε त0 प त्र1 प च् म् एक सदिश राश्िा है जिसका मान दिव्फस्थान में एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु पर जाने पर परिव£तत हो जाता है तथा यह स्रोत आवेशों की स्िथतियों से निधर्रित होता है। 1ण्8ण्2 विद्युत क्षेत्रा का भौतिक अभ्िाप्राय आपको आश्चयर् हो सकता है कि हमें यहाँ विद्युत क्षेत्रा की धरणा से परिचित क्यों कराया जा रहा है। वैसे भी, आवेशों के किसी भी निकाय के लिए मापने योग्य राश्िा किसी आवेश पर लगा बल है जिसे सीध्े ही वूफलाॅम नियम तथा अध्यारोपण सि(ांत द्वारा ;समीकरण 1ण्5द्ध निधर्रित किया जा सकता है। पिफर विद्युत क्षेत्रा नामक इस मध्यवतीर् राश्िा को प्रस्तावित क्यों किया जा रहा है? स्िथरवैद्युतिकी के लिए विद्युत क्षेत्रा की अभ्िाधरणा सुगम तो है पर वास्तव में आवश्यक नहीं है। विद्युत क्षेत्रा आवेशों के किसी निकाय के वैद्युत पयार्वरण को अभ्िालक्ष्िात करने का सुरुचि संपन्न उपाय है। आवेशों के निकाय के चारों ओर के दिव्फस्थान में किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा आपको यह बताता है कि निकाय को विक्षुब्ध् किए बिना यदि इस ¯बदु पर कोइर् एकांक ध्नात्मक परीक्षण आवेश रखे तो वह कितना बल अनुभव करेगा। विद्युत क्षेत्रा आवेशों के निकाय का एक अभ्िालक्षण है तथा विद्युत क्षेत्रा के निधर्रण के लिए आपके द्वारा उस ¯बदु पर रखे जाने वाले परीक्षण आवेश पर निभर्र नहीं करता। भौतिकी में क्षेत्रा शब्द का उपयोग व्यापक रूप से उस राश्िा को नि£दष्ट करने के लिए किया जाता है, जो दिव्फस्थान के प्रत्येक ¯बदु पर पारिभाष्िात की जा सके तथा एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु पर परिव£तत होती हो। चूँकि बल सदिश राश्िा है, अतः विद्युत क्षेत्रा एक सदिश राश्िा है। तथापि विद्युत क्षेत्रा की अभ्िाधरणा की वास्तविक भौतिक साथर्कता तभी प्रकट होती है जब हम स्िथरवैद्युतिकी से बाहर निकलकर कालाश्रित वैद्युतचुंबकीय परिघटनाओं से व्यवहार करते हैं। मान लीजिए हम त्वरित गति से गतिमान दो दूरस्थ आवेशों ु1 तथा ु2 के बीच लगे बल पर विचार 20 करते हैं। अब, वह अध्िकतम चाल जिससे कोइर् संकेत अथवा सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकती है, वह प्रकाश की चाल ब है। इस प्रकार, ु2 पर ु1 की किसी गति का प्रभाव तात्क्षण्िाक उत्पन्न नहीं हो सकता। कारण ;ु1 की गतिद्ध तथा प्रभाव ;ु2 पर बलद्ध के बीच वुफछ न वुफछ काल विलंब अवश्य होता है। यहीं पर साथर्क रूप में विद्युत क्षेत्रा ;सही अथो± में वैद्युतचुंबकीय क्षेत्राद्ध की अवधरणा स्वाभाविक एवं अति उपयोगी है। क्षेत्रा का चित्राण इस प्रकार हैः आवेश ु1 की त्वरित गति वैद्युतचुंबकीय तरंगें उत्पन्न करती है जो पिफर प्रकाश की चाल से पैफलकर ु2 तक पहुँचती है तथा ु2 पर बल लगाती है। क्षेत्रा की अवधरणा काल विलंब का सुचारु रूप से स्पष्टीकरण करती है। इस प्रकार, यद्यपि वैद्युत तथा चुंबकीय बलों की संसूचना केवल आवेशों पर इनके प्रभावों ;बलोंद्ध द्वारा ही की जा सकती है, उन्हें भौतिक सत्व माना जाता है, ये मात्रा गण्िातीय रचनाएँ ही नहीं हैं। इनकी अपनी स्वतंत्रा गतिकी है, अथार्त ये अपने नियमों के अनुसार विकसित होते हैं। ये ऊजार् का परिवहन भी कर सकते हैं। इस प्रकार, कालाश्रित वैद्युतचुंबकीय क्षेत्रों का कोइर् स्रोत जिसे संक्षेप में खोला तथा बंद किया जा सकता है, ऊजार् परिवहन करने वाले वैद्युतचुंबकीय क्षेत्रों को पीछे छोड़ देता है। क्षेत्रा की अवधरणा सवर्प्रथम पैफराडे ने प्रस्तावित की थी जो भौतिकी की प्रमुख अवधरणाओं में स्थान रखती है। भौतिकी 2ी 2ीउ च दृ7 गया समय जच त्र त्र त्र 13 ×10 ण् े ं मम् च इस प्रकार, समान दूरी गिरने में भारी कण ;प्रोटाॅनद्ध अध्िक समय लेता है। ‘गुरुत्व के अधीन मुक्त पतन’ और इस पतन में यही मूल विषमता है क्योंकि गुरुत्व के अध्ीन पतन में समय वस्तु के द्रव्यमान पर निभर्र नहीं करता। ध्यान दीजिए यहाँ हमने पतन का समय परिकलित करते समय गुरुत्वीय त्वरण की उपेक्षा की है। यह देखने के लिए कि क्या यह न्यायसंगत है, आइए दिए गए विद्युत क्षेत्रा में प्रोटाॅन का त्वरण परिकलित करते हैं: मम् ं त्र च उ च −19 4 −1;1 6 × 10 ब्द्ध × ;2 0 ण् × 10 छब् ण् द्ध त्र 1 67 × 10 −27 ण् ाह 12 दृ2 ण् उे यह त्वरण गुरुत्वीय त्वरण ;9ण्8 उ ेदृ2द्ध की तुलना में अत्यंत विशाल है। इलेक्ट्राॅन का त्वरण तो इस त्वरण से भी अध्िक है। इस प्रकार, इस उदाहरण में गुरुत्वीय त्वरण के प्रभाव की उपेक्षा की जा सकती है। 9 2दृ2 −8;9 ×10छउब् द्ध × ;10 ब्द्ध म्1ठ त्र 2 त्र 3ण्6 × 104 छ ब्दृ1 ;0ण्05 उद्ध )णावेश ु2 के कारण ठ पर विद्युत क्षेत्रा सदिश म्2ठ दाईं ओर नि£दष्ट है तथा इसका परिमाण 9 2दृ2 −8;9 × 10छउब् द्ध × ;10 ब्द्ध म्2ठ त्र 2 त्र 4 × 103 छ ब्दृ1 ;0ण्15उद्ध ठ पर वुफल विद्युत क्षेत्रा का परिमाण दृ त्र 3ण्2 × 104 छ ब्दृ1 ;यह बाईं ओर नि£दष्ट हैद्धम्ठत्र म्1ठम्2ठतथा ु2 में प्रत्येक के कारण ¯बदु ब् पर विद्युत क्षेत्रा सदिश का परिमाण समान है, अतःु1 9 2दृ2 −8;9 × 10छउब् द्ध × ;10 ब्द्ध म् त्र म् त्र त्र 9 × 103 छ ब्दृ1 1ब् 2ब् ;0ण्10 उद्ध 2 इन दोनों सदिशों की दिशाएँ चित्रा 1ण्14 में दशार्यी गइर् हैं। इन दो सदिशों के परिणामी सदिश का परिमाण म्ब् त्र म्1 बवे π़ म्2 बवे π त्र 9 × 103 छ ब्दृ1 33 म्ब दाईं ओर नि£दष्ट है। 1ण्9 विद्युत क्षेत्रा रेखाएँ पिछले अनुभाग में हमने विद्युत क्षेत्रा का अध्ययन किया। यह एक सदिश राश्िा है तथा इसे हम सदिशों की भाँति ही निरूपित कर सकते हैं। आइए किसी ¯बदु आवेश के कारण म् को चित्रात्मक निरूपित करने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए ¯बदु आवेश मूल ¯बदु पर स्िथत है। प्रत्येक ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा की दिशा के अनुदिश संकेत करते हुए क्षेत्रा की तीव्रता की आनुपातिक लंबाइर् के सदिश खींचिए। चूँकि किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा का परिमाण आवेश से उस ¯बदु की दूरी के वगर् के व्युत्क्रमानुसार घटता है, मूल ¯बदु से दूर जाने पर सदिश की लंबाइर् निरंतर घटती जाती है तथा इसकी दिशा सदैव बहिमुर्खी अरीय संकेत करती है। चित्रा 1ण्15 इसी चित्राण को दशार्ता है। इस चित्राण में प्रत्येक तीर विद्युत क्षेत्रा अथार्त उस तीर के पुच्छ पर स्िथत इकाइर् ध्न आवेश पर लगने वाला बल दशार्ता है। एक दिशा में संकेत करने वाले तीरों को मिलाने पर प्राप्त परिणामी चित्रा क्षेत्रा रेखा को निरूपित करता है। इस प्रकार हमें बहुत सी क्षेत्रा रेखाएँ प्राप्त होती हैं जिनमें सभी ¯बदु आवेश से बाहर की ओर संकेत करती हैं। क्या अब हमने विद्युत क्षेत्रा की तीव्रता अथवा परिमाण के विषय में जानकारी नष्ट कर दी है, क्योंकि वह तो तीर की लंबाइर् में समाइर् हुइर् थी? नहीं। अब, क्षेत्रा के परिमाण को क्षेत्रा रेखाओं के घनत्व द्वारा निरूपित किया जाता है। आवेश के निकट म् प्रबल होता है। अतः आवेश के निकट क्षेत्रा रेखाओं का घनत्व अध्िक होता है तथा क्षेत्रा रेखाएँ सघन होती हैं। आवेश से दूर जाने पर क्षेत्रा दुबर्ल होता जाता है तथा क्षेत्रा रेखाओं का घनत्व कम होता है परिणामस्वरूप रेखाएँ भी दूर - दूर होती हैं। चित्रा 1ण्15 ¯बदु आवेश का क्षेत्रा। कोइर् व्यक्ित अध्िक रेखाएँ खींच सकता है। परंतु रेखाओं की संख्या महत्वपूणर् नहीं है। वास्तव में किसी क्षेत्रा में असंख्य रेखाएँ खींची जा सकती हैं। अतः महत्वपूणर् यह है कि विभ्िान्न क्षेत्रों में 23रेखाओं का आपेक्ष्िाक घनत्व क्या है? भौतिकी हम कागज़्ा के पृष्ठ पर चित्रा खींचते हैं अथार्त हम द्विविमीय चित्रा खींचते हैं, परंतु हम तीन विमाओं में रहते हैं। अतः यदि हमें क्षेत्रा रेखाओं के घनत्व का आकलन करना है तो हमें इन रेखाओं के लंबवत अनुप्रस्थ काट के प्रति एकांक क्षेत्रापफल में क्षेत्रा रेखाओं की संख्या पर विचार करना होता है। चूँकि किसी ¯बदु आवेश से दूरी के वगर् के अनुसार विद्युत क्षेत्रा कम होता जाता है तथा आवेश को परिब( करने वाला क्षेत्रा दूरी के वगर् के अनुसार बढ़ता जाता है, परिब( क्षेत्रा से गुजरने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्या सदैव नियत रहती है, चाहे आवेश से उस क्षेत्रा की दूरी वुफछ भी हो। हमने आरंभ में यह कहा था कि क्षेत्रा रेखाएँ दिव्फस्थान के विभ्िान्न ¯बदुओं पर विद्युत क्षेत्रा की दिशा के विषय में सूचनाएँ पहुँचाती हैं। वुफछ क्षेत्रा रेखाओं का समुच्चय खींचने पर विभ्िान्न ¯बदुओं पर क्षेत्रा रेखाओं का आपेक्ष्िाक संख्या घनत्व ;अथार्त अत्यध्िक निकटताद्ध उन ¯बदुओं पर विद्युत क्षेत्रा की आपेक्ष्िाक प्रबलता चित्रा 1ण्16 विद्युत क्षेत्रा प्रबलता की दूरी पर इंगित करता है। जहाँ क्षेत्रा रेखाएँ सघन होती हैं वहाँ क्षेत्रा प्रबल होता है तथा जहाँ निभर्रता तथा इसका क्षेत्रा रेखाओं की संख्या से दूर - दूर होती हैं वहाँ दुबर्ल होता है। चित्रा 1ण्16 में क्षेत्रा रेखाओं का समुच्चय दशार्या संबंध्। गया है। हम ¯बदुओं त् तथा ै पर वहाँ की क्षेत्रा रेखाओं के अभ्िालंबवत दो समान तथा छोटे क्षेत्रा अवयवों की कल्पना कर सकते हैं। हमारे चित्राण में इन क्षेत्रा अवयवों को काटने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्या इन ¯बदुओं पर विद्युत क्षेत्रों के परिमाणों के अनुक्रमानुपाती है। चित्राण यह दशार्ता है कि ¯बदु त् पर क्षेत्रा, ¯बदु ै पर क्षेत्रा की तुलना में अिाक प्रबल है। क्षेत्रापफल पर अथवा क्षेत्रा अवयव द्वारा अंतरित घन कोण’ पर, क्षेत्रा रेखाओं की निभर्रता को समझने के लिए आइए हम क्षेत्रापफल और घन कोण ;जो कोण का तीन विमाओं में व्यापकीकरण हैद्ध के बीच संबंध् स्थापित करने का प्रयास करते हैं। याद कीजिए दो विमाओं में किसी ;समतलद्ध कोण की परिभाषा किस प्रकार की जाती है। मान लीजिए कोइर् छोटा अनुप्रस्थ रेखा अवयव Δस ¯बदु व् से त दूरी पर रखा जाता है। तब व् पर Δस द्वारा अंतरित कोण का सन्िनकटन Δθ त्र Δसध्त के रूप में किया जा सकता है। इसी प्रकार, तीन विमाओं में किसी छोटे लंबवत क्षेत्रा Δै द्वारा दूरी त पर अंतरित घन कोण’ को ΔΩ त्र Δैध्त 2 व्यक्त किया जा सकता है। हम जानते हैं कि किसी दिए गए घन कोण में अरीय क्षेत्रा रेखाओं की संख्या समान होती है। चित्रा 1ण्16 में आवेश से त1 तथा त2 दूरियों पर स्िथत दो ¯बदुओं च्1 तथा च्2 के लिए घन कोण ΔΩ द्वारा च्1 पर अंतरित क्षेत्रा अवयव 2 ΔΩ तथा च्पर अंतरित क्षेत्रा अवयव 2 ΔΩ है। इन क्षेत्रा अवयवों को काटने वाली रेखाओं कीत12 त2 संख्या ;मान लीजिए दद्ध समान है। अतः एकांक क्षेत्रा अवयव को काटने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्या च्पर दध्; 2 ΔΩद्ध तथा च्पर दध्; 2 ΔΩद्ध है। इस प्रकार स्पष्ट है कि क्षेत्रा रेखाओं की1 त12 त2 संख्या और इसीलिए क्षेत्रा - प्रबलता स्पष्ट रूप से 1ध्त 2 पर निभर्र है। क्षेत्रा रेखाओं के चित्राण की खोज पैफराडे ने आवेश्िात विन्यासों के चारों ओर विद्युत क्षेत्रा का मानस प्रत्यक्षीकरण करने के एक अंतदर्शीर् अगण्िातीय उपाय को विकसित करने के लिए की थी। पैफराडे ने इन्हें बल रेखाएँ कहा था। यह पद विशेषकर चुंबकीय क्षेत्रों के प्रकरण के लिए वुफछ भ्रामक है। इनके लिए अध्िक उचित पद क्षेत्रा रेखाएँ ;वैद्युत अथवा चुंबकीयद्ध है जिसे हमने इस पुस्तक में अपनाया है। इस प्रकार विद्युत क्षेत्रा रेखाएँ आवेशों के अभ्िाविन्यास के चारों ओर विद्युत क्षेत्रा के चित्रात्मक निरूपण का एक उपाय है। व्यापक रूप में, विद्युत क्षेत्रा रेखा एक ऐसा वक्र होती है जिसके किसी भी ¯बदु पर खींचा गया स्पशीर् उस ¯बदु पर लगे नेट बल की दिशा को निरूपित करता है। इस वक्र के किसी ¯बदु पर, स्पष्ट रूप से, स्पशीर् द्वारा विद्युत क्षेत्रा की दो संभावित दिशाओं में से कोइर् एक ’ घन कोण शंवुफ की एक माप है। त् त्रिाज्या के गोले वाले दिए गए शंवुफ के परिच्छेद पर विचार कीजिए। शंवुफ के घन कोण ΔΩ की परिभाषा इसे Δैध्त् 2 के बराबर मानकर करते हैं, यहाँ Δै शंवुफ द्वारा गोले पर24 काटा गया क्षेत्रापफल है। दिशा दशार्ने के लिए वक्र पर तीर का चिÉ अंकित करना आवश्यक है। क्षेत्रा रेखा एक दिव्फस्थान वक्र अथार्त तीन दिशाओं में वक्र होती है। चित्रा 1ण्17 में वुफछ सरल आवेश विन्यासों के चारों ओर क्षेत्रा रेखाएँ दशार्यी गइर् हैं। जैसा कि पहले वणर्न किया जा चुका है, ये क्षेत्रा रेखाएँ तीन विमीय दिव्फस्थान में हैं यद्यपि चित्रा में इन्हें केवल एक तल में दशार्या गया है। एकल ध्नावेश के कारण क्षेत्रा रेखाएँ त्रिाज्यतः ;अरीयद्ध बहिमुर्खी होती हैं जबकि एकल )णावेश के कारण क्षेत्रा रेखाएँ त्रिाज्यतः अंतमुर्खी होती हैं। दो ध्नावेशों ;ुए ुद्ध के निकाय के चारों ओर की क्षेत्रा रेखाएँ पारस्परिक प्रतिकषर्ण का एक सजीव चित्राण प्रस्तुत करती हैं जबकि परिमाण में समान दो विजातीय आवेशों ;ुए दृुद्ध के निकाय, अथार्त किसी द्विध्ु्रव के चारों ओर क्षेत्रा रेखाएँ आवेशों के बीच स्पष्ट पारस्परिक आकषर्ण दशार्ती हैं। क्षेत्रा रेखाएँ वुफछ महत्वपूणर् सामान्य गुणों का पालन करती हैं - ;पद्ध क्षेत्रा रेखाएँ ध्नावेश से आरंभ होकर )णावेश पर समाप्त होती हैं। यदि आवेश एकल है तो ये अनंत से आरंभ अथवा अनंत पर समाप्त हो सकती हैं। ;पपद्ध किसी आवेश मुक्त क्षेत्रा में, क्षेत्रा रेखाओं को ऐसे संतत वक्र माना जा सकता है जो कहीं नहीं टूटते। ;पपपद्ध दो क्षेत्रा रेखाएँ एक - दूसरे को कदापि नहीं काटतीं। ;यदि वे ऐसा करें तो प्रतिच्छेदन ¯बदु पर क्षेत्रा की केवल एक दिशा नहीं होगी, जो निरथर्क है। ;पअद्ध स्िथरवैद्युत क्षेत्रा रेखाएँ बंद लूप नहीं बनातीं। यह विद्युत क्षेत्रा की संरक्षणात्मक प्रवृफति से अनुशासित है ;अध्याय 2 देख्िाएद्ध। 1ण्10 वैद्युत फ्रलक्स किसी कै क्षेत्रापफल के छोटे पृष्ठ से उसके अभ्िालंबवत अ वेग से प्रवाहित होने वाले किसी द्रव के प्रवाह पर विचार कीजिए। द्रव के प्रवाह की दर इस क्षेत्रा से प्रति एकांक समय में गुजरने वाले आयतन अ कै द्वारा प्राप्त होती है तथा यह उस तल से गुजरने वाले द्रव के फ्रलक्स को निरूपित करती है। यदि इस तल ;पृष्ठद्ध पर अभ्िालंब द्रव के प्रवाह की दिशा अथार्त अ के समांतर नहीं है, और इनके बीच θ कोण बनता है तो अ के लंबवत तल में प्रक्षेपित क्षेत्रापफल अ कै बवे θ होगा। अतः पृष्ठ कै से बाहर जाने वाला फ्रलक्स अण् द६कै होता है। विद्युत क्षेत्रा के प्रकरण के लिए, हम एक समतुल्य राश्िा को परिभाष्िात करते हैं और इसे वैद्युत फ्रलक्स कहते हैं। तथापि हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि द्रव - प्रवाह के प्रकरण के विपरीत यहाँ प्रावृफतिक नियमों के अनुसार प्रेक्षण योग्य राश्िा का कोइर् प्रवाह नहीं है। उपरोक्त व£णत विद्युत क्षेत्रा रेखाओं के चित्राण में हमने देखा कि किसी ¯बदु पर क्षेत्रा के अभ्िालंबवत रखे एकांक क्षेत्रापफल से गुजरने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्या उस ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा प्रबलता की माप होती है। इसका तात्पयर् यह है कि यदि हम किसी ¯बदु पर म् के अभ्िालंबवत कोइर् Δै क्षेत्रापफल का छोटा समतलीय अवयव रखें तो इससे गुजरने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्या म् Δै के अनुक्रमानुपाती’ है। अब मान लीजिए हम क्षेत्रापफल अवयव को किसी ’ यह कहना उचित नहीं है कि क्षेत्रा रेखाओं की संख्या म्Δै के बराबर है। वास्तव में चित्रा 1ण्17 विभ्िान्न आवेश वितरणों के कारणक्षेत्रा रेखाओं की संख्या ऐसा विषय है जो हम कितनी क्षेत्रा रेखाएँ खींचने का चयन करते क्षेत्रा रेखाएँ।हैं, पर निभर्र है। अतः विभ्िान्न ¯बदुओं पर दिए गए क्षेत्रापफल से गुजरने वाली क्षेत्रा रेखाओं 25की आपेक्ष्िाक संख्या के ज्ञात होने में ही इनकी भौतिक साथर्कता है। भौतिकी कोणθ पर झुका देते हैं। स्पष्ट है अब इस क्षेत्रापफल अवयव से गुजरने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्या घट जाएगी। चूँकिम् के अभ्िालंबवत क्षेत्रापफल अवयवΔैका प्रक्षेपΔै बवेθ है, अतः Δै से गुजरने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्याम् Δै बवेθ के अनुक्रमानुपाती है। जबθ त्र 90° होता है तो क्षेत्रा रेखाएँΔैके समांतर हो जाती हैं और इससे कोइर् भी क्षेत्रा रेखा नहीं गुजरती ;चित्रा 1ण्18 देख्िाएद्ध। बहुत से संदभो± में क्षेत्रापफल अवयव के परिमाण के साथ - साथ उसका दिव्फविन्यास भी महत्वपूणर् होता है। उदाहरण के लिए, किसी जल - प्रवाह में किसी ¯रग से गुजरने वाले जल का परिमाण स्वाभाविक रूप से इस बात पर निभर्र करता है कि आप जल धरा में इसे किस प्रकार पकड़े हुए हैं। यदि आप इसे जल - प्रवाह के अभ्िालंबवत रखते हैं तो अन्य सभी दिव्फविन्यासों की तुलना में इस विन्यास में ¯रग से अध्िकतम जल गुजरेगा।चित्रा 1ण्18म्तथा द६के बीच झुकाव θपर इससे यह निष्कषर् निकलता है कि क्षेत्रापफल - अवयव को सदिशफ्रलक्स की निभर्रता। चित्रा 1ण्19 अभ्िालंब द६तथाΔै को परिभाष्िात करने की परिपाटी। के समान मानना चाहिए। इसमें परिमाण के साथ दिशा भी होती है। समतलीय क्षेत्रा की दिशा वैफसे नि£दष्ट की जाए? स्पष्ट रूप से तल पर अभ्िालंब तल का दिव्फविन्यास नि£दष्ट करता है। इस प्रकार समतलीय क्षेत्रा सदिश की दिशा इसके अभ्िालंब के अनुदिश होती है। किसी वित पृष्ठ के क्षेत्रापफल को किसी सदिश से वैफसे संब( किया जाता है? हम यह कल्पना करते हैं कि वित पृष्ठ बहुत से छोटे - छोटे क्षेत्रापफल अवयवों में विभाजित है। इनमें से प्रत्येक छोटा क्षेत्रापफल अवयव समतलीय माना जा सकता है और पहले स्पष्टीकरण के अनुसार इससे सदिश संब( किया जा सकता है। यहाँ एक संदिग्ध्ता पर ध्यान दीजिए। किसी क्षेत्रापफल अवयव की दिशा उसके अभ्िालंब के अनुदिश होती है। परंतु अभ्िालंब दो दिशाएँ संकेत कर सकता है। किसी क्षेत्रापफल अवयव से संब( सदिश की दिशा का चयन किस प्रकार किया जाता है? इस समस्या का समाधन इस संदभर् में उचित वुफछ परिपाटियों के निधर्रण द्वारा किया गया है। बंद पृष्ठों के प्रकरणों के लिए यह परिपाटी अति सरल है। किसी बंद पृष्ठ के प्रत्येक क्षेत्रापफल अवयव से संब( सदिश की दिशा बहिमुर्खी अभ्िालंब की दिशा मानी जाती है। इसी परिपाटी का उपयोग चित्रा 1.19 में किया गया है। इस प्रकार, किसी बंद पृष्ठ के किसी ¯बदु पर क्षेत्रापफल अवयव सदिश Δै का मान Δैद६ होता है, यहाँ Δै क्षेत्रापफल सदिश का परिमाण तथा द६ इस ¯बदु पर बहिमुर्खी अभ्िालंब की दिशा में एकांक सदिश है। अब हम वैद्युत फ्रलक्स की परिभाषा पर आते हैं। किसी क्षेत्रापफल अवयव Δैसे गुजरने वाले वैद्युत फ्रलक्सΔφकी परिभाषा इस प्रकार करते हैं: Δφ त्र म्ण्Δै त्र म् Δै बवेθ ;1ण्11द्ध जो पहले की भाँति इस क्षेत्रापफल अवयव को काटने वाली क्षेत्रा रेखाओं की संख्या के अनुक्रमानुपाती है। यहाँθक्षेत्रा अवयव Δै तथाम्के बीच का कोण है। पूवोर्क्त परिपाटी के अनुसार बंद पृष्ठ के लिएθक्षेत्रा - अवयव पर बहिमुर्खी अभ्िालंब तथाम्के बीच का कोण है। ध्यान दीजिए, हम व्यंजक म्Δै बवेθ पर दो ढंग से विचार कर सकते हैंः म् ;Δै बवेθद्ध अथार्तम्पर क्षेत्रा - अभ्िालंब के प्रक्षेप काम् गुना, अथवाम्⊥Δै अथार्त क्षेत्रा - अवयव पर अभ्िालंब के अनुदिशम्का अवयव गुना क्षेत्रा - अवयव का परिमाण। वैद्युत फ्रलक्स का मात्राक छ ब्दृ1 उ2 है। समीकरण ;1ण्11द्ध से प्राप्त वैद्युत फ्रलक्स की मूल परिभाषा को सै(ांतिक रूप में, किसी दिए गए पृष्ठ से गुजरने वाले वुफल फ्रलक्स को परिकलित करने में उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए हमें यह करना होता है कि हम पहले पृष्ठ को छोटे - छोटे क्षेत्रापफल अवयवों में विभाजित करते हैं और पिफर प्रत्येक अवयव के लिए फ्रलक्स परिकलित करके उन्हें जोड़कर वुफल फ्रलक्स प्राप्त कर लेते हैं। अतः पृष्ठ ै से गुजरने वाला वुफल फ्रलक्स φ है φ ् Σ म्ण्Δै ;1ण्12द्ध यहाँ सन्िनकटन चिÉ लगाने का कारण यह है कि हमने छोटे क्षेत्रापफल अवयव पर विद्युत क्षेत्रा म् को नियत माना है। गण्िातीय रूप से यह केवल तभी यथाथर् है जब आप सीमा Δै → 0 लें तथा समीकरण ;1ण्12द्ध में योग को समाकलन के रूप में व्यक्त करें। 1ण्11 वैद्युत द्विध्ु्रव परिमाण में समान एवं विजातीय ¯बदु आवेशों ु तथा दृु का कोइर् युगल जिनके बीच पृथकन 2ं है, वैद्युत द्विध्ु्रव कहलाता है। दोनों आवेशों को संयोजित करने वाली रेखा दिव्फस्थान में किसी दिशा को परिभाष्िात करती है। परिपाटी के अनुसार दृु से ु की दिशा द्विध्ु्रव की दिशा कहलाती है। दृु तथा ु की अवस्िथतियों का मध्य ¯बदु द्विध्ु्रव का वेंफद्र कहलाता है। प्रत्यक्ष रूप से वैद्युत द्विध््रुव का वुफल आवेश शून्य होता है। परंतु इसका यह अथर् नहीं है कि द्विध्ु्रव का विद्युत क्षेत्रा शून्य है। चूँकि आवेश ु तथा दृु में वुफछ पृथकन है, इनके कारण विद्युत क्षेत्रा जब जोड़े जाते हैं तब ये एक - दूसरे को यथाथर् रूप से निरस्त नहीं करते। परंतु यदि द्विध्ु्रव बनाने वाले आवेशों के पृथकन की तुलना में दूरी अध्िक ;त झझ 2ंद्ध है, तो ु एवंदृु के कारण क्षेत्रा लगभग निरस्त हो जाते हैं। अतः अध्िक दूरियों पर किसी वैद्युत द्विध्ु्रव के कारण विद्युत क्षेत्रा 1ध्त 2 ;एकल आवेश ु के कारण विद्युत क्षेत्रा की त पर निभर्रताद्ध से भी अध्िक गति से मंद होता जाता है। यह गुणात्मक धरणा नीचे दिए गए सुस्पष्ट परिकलन से उत्पन्न हुइर् हैः 1ण्11ण्1 वैद्युत द्विध्ु्रव के कारण क्षेत्रा आवेशों के युगल ;दृु तथा ुद्ध के कारण दिव्फस्थान में किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा वूफलाॅम नियम तथा अध्यारोपण सि(ांत से ज्ञात किया जा सकता है। निम्नलिख्िात दो प्रकरणों के परिणाम सरल हैंः ;पद्ध जब ¯बदु द्विध्ु्रव के अक्ष पर है, ;पपद्ध जब ¯बदु द्विध््रुव के विषुवतीय तल, अथार्त द्विध्ु्रव अक्ष के वेंफद्र से गुजरने वाले द्विध्ु्रव अक्ष के लंबवत तल में है। किसी व्यापक ¯बदु च् पर विद्युत क्षेत्रा, आवेश दृु के कारण च् पर विद्युत क्षेत्रा म् दृु तथा आवेश ़ु के कारण च् पर विद्युत क्षेत्रा म् ़ु को सदिशों के समांतर चतुभुर्ज नियम द्वारा संयोजित करके प्राप्त किया जाता हैै। ;पद्ध अक्ष पर स्िथत ¯बदुओं के लिए मान लीजिए ¯बदु च् द्विध्ु्रव के वेंफद्र से ु की ओर चित्रा ;1ण्20ंद्ध में दशार्ए अनुसार त दूरी पर है, तब ुम्− चु त्र− 2 ६ ख्1ण्13;ंद्ध,4πε0;त ़ ंद्ध यहाँ च६द्विध्ु्रव अक्ष ;दृु से ु की ओरद्ध के अनुदिश एकांक सदिश है। साथ ही ुम़्ु 2 ६ ख्1ण्13;इद्ध,त्र 4 πε0;त − ंद्ध च च् पर वुफल विद्युत क्षेत्रा है भौतिकी ु 11 म् त्र म् ़ म् त्र− च६ ़ु −ु 224 πε0;त − ंद्ध;त ़ ंद्ध ु 4 ंत ६त्र 2 22 च ;1ण्14द्ध4 πε व ; त − ं द्ध त झझ ं के लिए 4 ुं म् त्र च६3;त झझ ंद्ध ;1ण्15द्ध4πε 0त ;पपद्ध विषुवतीय तल पर स्िथत ¯बदुओं के लिए दो आवेशों ़ु तथा दृु के कारण विद्युत क्षेत्रों के परिमाण ु 1 त्रम़्ु 2 2 ख्1ण्16;ंद्ध,4πε0 त ़ ं ु 1 म्दृु त्र 2 2 ख्1ण्16;इद्ध,4πε0 त ़ ं समान हैं। म्तथा म् की दिशाएँ चित्रा 1ण्20;इद्ध में दशार्यी गइर् हैं। स्पष्ट है किचित्रा 1ण्20 ;ंद्ध अक्ष पर स्िथत किसी ¯बदु, ;इद्ध द्विध््रुव ़ु दृु द्विध्ु्रव अक्ष के अभ्िालंबवत अवयव एक - दूसरे को निरस्त कर देते हैं। द्विध्रुवके विषुवतीय तल पर स्िथत किसी ¯बदु पर द्विध्ु्रव का विद्युत क्षेत्रा। द्विध्ु्रव आघूणर् च सदिश है जिसका परिमाण अक्ष के अनुदिश अवयव संयोजित हो जाते हैं। वुफल विद्युत क्षेत्रा च६के च त्र ु × 2ं है तथा दिशा विपरीत होता है। अतः दृु से ु की ओर है। म् त्र दृ ;म् ़ु ़ म् दृु द्ध बवेθ च६2ुं त्र− च६2 2 3ध्2 ;1ण्17द्ध4 πε व ;त ़ ं द्ध अध्िक दूरियों ;त झझ ंद्ध पर 2 ुं म् त्र− च६;त झझ ंद्ध3 ;1ण्18द्ध4 πε त व समीकरणों ;1ण्15द्ध तथा ;1ण्18द्ध से स्पष्ट है कि अध्िक दूरियों पर द्विध्ु्रव क्षेत्रा में ु तथा ं पृथक रूप से सम्िमलित नहीं होतेऋ यह इनके संयुक्त गुणनपफल ुं पर निभर्र करता है। इससे द्विध्ु्रव आघूणर् की परिभाषा का संकेत मिलता है। किसी वैद्युत द्विध्ु्रव के द्विध्ु्रव आघूणर् सदिश च की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती हैः च त्र ु × 2ं च६;1ण्19द्ध अथार्त यह एक सदिश है जिसका परिमाण आवेश ु तथा पृथकन 2ं ;आवेशों ुए दृु के युगल के बीच की दूरीद्ध तथा दिशा दृु से ु की ओर होती है। च के पदों में, किसी द्विध्ु्रव का विद्युत क्षेत्रा अिाक दूरियों पर एक सरल रूप ले लेता है। द्विध्ु्रव अक्ष के किसी ¯बदु पर 2 चम् त्र 3 ;त झझ ंद्ध ;1ण्20द्ध4πε त व विषुवतीय तल के किसी ¯बदु पर म् त्र− च ;त झझ ंद्ध ;1ण्21द्ध4πε त 3 व इस महत्वपूणर् तथ्य पर ध्यान दीजिए कि द्विध्ु्रव क्षेत्रा अध्िक दूरियों पर 1ध्त 2 के रूप में नहीं वरन्1ध्त 3 के रूप में मंद होता है। इसके अतिरिक्त द्विध्ु्रव क्षेत्रा का परिमाण तथा दिशा केवल दूरी त पर ही निभर्र नही ंहै वरन् ये सदिश त तथा द्विध्ु्रव आघूणर् च के बीच के कोण पर भी निभर्र करते है। हम उसके बारे में सोच सकते हैं - जब द्विध््रुव आमाप 2ं शून्य की ओर अग्रसर होता जाता है, तब आवेश ु अनंत की ओर अग्रसर इस प्रकार होता जाता है कि गुणनपफल च त्र ु× 2ं एक नियत परिमित संख्या होती है। इस प्रकार के द्विध्ु्रव को ¯बदु द्विध्ु्रव कहते हैं। किसी ¯बदु द्विध्ु्रव के लिए समीकरण ;1ण्20द्ध तथा ;1ण्21द्ध त के सभी मानों के लिए सत्य तथा यथाथर् हैं। 1ण्11ण्2 द्विध्ु्रवों की भौतिक साथर्कता अध्िकांश अणुओं में ध्नावेशों तथा )णावेशों’ के वंेफद्र एक ही स्थान पर होते हैं। इसीलिए इनके द्विध््रुव आघूणर् शून्य होते हैं।ब्व्2 तथा ब्भ्4 अणु इसी प्रकार के हैं। विद्युत क्षेत्रा आरोपित किए जाने पर ये द्विध्ु्रव आघूणर् विकसित कर लेते हैं परंतु वुफछ अणुओं मंे ध्नावेशों तथा )णावेशों के वेंफद्र संपाती नहीं होते। अतः विद्युत क्षेत्रा की अनुपस्िथति में भी इनका अपना स्थायी द्विध्ु्रव आघूणर् होता है। इस प्रकार के अणुओं को ध्ु्रवित अणु कहते हैं। जल का अणु, भ्2व्ए इस प्रकार के अणुओं का एक उदाहरण है। विविध् पदाथर् विद्युत क्षेत्रा की उपस्िथति अथवा अनुपस्िथति में रोचक गुण तथा महत्वपूणर् अनुप्रयोग प्रस्तुत करते हैं। ’ ध्नात्मक ¯बदु आवेशों के संग्रह को वेंफद्र की परिभाषा संहति वेंफद्र की ही भाँति की जाती है जिसके अनुसार ु तपपप ण्त त्र ु प भौतिकी 10 −5ब् 1 ×त्र −12 2 −1 −22 −424π ;8ण्854 ×10 ब्छउद्ध ;15 − 0ण्25द्ध ×10 उ त्र 4ण्13 × 106 छ ब्दृ1 ठच् के अनुदिश ¯बदु च् पर आवेश दृ10 - ब् के कारण क्षेत्रा 10 दृ5 ब् 1 त्र× −12 2 −1 −22 −424π ;8ण्854 ×10 ब्छउद्ध ;15 ़ 0ण्25द्ध ×10 उ त्र 3ण्86 × 106 छ ब्दृ1 च्। के अनुदिश । तथा ठ पर स्िथत दो आवेशों के कारण च् पर परिणामी विद्युत क्षेत्रा त्र 2ण्7 × 105 छ ब्दृ1 ठच् के अनुदिश है। इस उदाहरण में अनुपात व्च्ध्व्ठ कापफी अध्िक ;त्र60द्ध है। अतः, किसी द्विध्ु्रव के अक्ष पर अत्यिाक दूरी पर स्िथत किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा ज्ञात करने के लिए सीध्े ही सूत्रा के उपयोग द्वारा हम इसी के सन्िनकट परिणाम की आशा कर सकते हैं। 2ं पृथकन के ± ु आवेशों से बने द्विधु्रव के लिए द्विध्ु्रव के अक्ष के वंेफद्र से त दूरी पर विद्युत क्षेत्रा का परिमाण 2चम् त्र 3;तध्ं झझ 1द्ध4πε0त यहाँ च त्र 2ं ु द्विध््रुव आघूणर् का परिमाण है। द्विध््रु्रव अक्ष पर विद्युत क्षेत्रा की दिशा सदैव द्विध्ु्रव आघूणर् सदिश के अनुदिश ;अथार्त दृु से ु की ओरद्ध होती है। यहाँ, च त्र10दृ5 ब् × 5 × 10दृ3 उ त्र 5 × 10दृ8 ब् उ अतः 2 × 5 ×10 −8ब्उ 1 ×म् त्र −12 2 −1 −23 −6 3 त्र 2ण्6 × 105 छ ब्दृ1 4π ;8ण्854 ×10 ब्छ उद्ध ;15द्ध ×10 उ द्विध्ु्रव आघूणर् की दिशा ।ठ के अनुदिश है, तथा यह परिणाम पूवर् परिणाम के कापफी निकट है। ;इद्ध ¯बदु ठ पर स्िथत ़ 10 - ब् आवेश के कारण ¯बदु फ पर विद्युत क्षेत्रा −5110 ब् ×त्र −12 2 −1 −22 2 −424 π ;8ण्854 × 10 ब्छउद्ध ख्15 ़ ;0ण्25द्ध , × 10 उ त्र 3ण्99 × 106 छ ब्दृ1 ठफ के अनुदिश ¯बदु । पर स्िथत दृ10 - ब् आवेश के कारण फ पर विद्युत क्षेत्रा 10 −5ब् 1 ×त्र −12 2 −1 −2 22 −424 π ;8ण्854 ×10 ब्छ उद्ध ख्15 ़ ;0ण्25द्ध , ×10 उ त्र 3ण्99 × 106 छ ब्दृ1 फ। के अनुदिश स्पष्ट है कि इन दो समान परिमाण के बलों के व्फ दिशा के अनुदिश घटक एक - दूसरे को निरस्त करते हैं परंतु ठ। के समांतर दिशा के अनुदिश घटक संयोजित हो जाते हैं। अतः । तथा ठ पर स्िथत दो आवेशों के कारण फ पर परिणामी विद्युत क्षेत्रा 0ण्25 × 3ण्99 × 10छब् ठ। के अनुदिश15 2 ़ ;0ण्25द्ध 2त्र 2 × 6दृ1 त्र 1ण्33 × 105 छ ब्दृ1 ठ। के अनुदिश ;ंद्ध की ही भाँति द्विध्ु्रव के अक्ष के अभ्िालंबवत किसी ¯बदु पर द्विध्ु्रव विद्युत क्षेत्रा के लिए सीध्े ही सूत्रा के उपयोग द्वारा हम इसी परिणाम की अपेक्षा कर सकते हैं - म् त्र च 3;तध्ं झझ 1द्ध4 π ε0 त 5 ×10−8ब्उ 1 त्र× −12 2दृ1 दृ2 3 −634 π ;8ण्854 ×10 ब्छ उद्ध ;15द्ध × 10 उ त्र 1ण्33 × 105 छ ब्दृ1ण् इस प्रकरण में विद्युत क्षेत्रा की दिशा आघूणर् सदिश की दिशा के विपरीत है। तथापि प्राप्त परिणाम पहले प्राप्त हुए परिणाम के अनुरूप हैं। 1ण्12 एकसमान बाह्य क्षेत्रा में द्विध््रुव चित्रा 1ण्22 में दशार्ए अनुसार एकसमान विद्युत क्षेत्रा म् में रखे द्विध्ु्रव आघूणर् च के स्थायी द्विधु्रव ;स्थायी द्विधु्रव से हमारा तात्पयर् यह है कि च का म् से स्वतंत्रा अस्ितत्व हैऋ यह म् द्वारा प्रेरित नहीं हुआ है।द्ध पर विचार कीजिए। यहाँ आवेश ु पर ुम् तथा दृु पर दृुम् बल लग रहे हैं। चूँकि म् एकसमान है अतः द्विध््रुव पर नेट बल शून्य है। परंतु आवेशों में पृथकन है, अतः बल भ्िान्न ¯बदु पर लगे हैं, जिसके परिणामस्वरूप द्विध्ु्रव पर बल आघूणर् कायर् करता है। जब नेट बल शून्य है तो बल आघूणर् ;बल युग्मद्ध मूल ¯बदु पर निभर्र नहीं होता। इसका परिमाण प्रत्येक बल के परिमाण चित्रा 1ण्22 एकसमान विद्युत क्षेत्रा तथा बलयुग्म की भुजा ;दो प्रतिसमांतर बलों के बीच लंबवत दूरीद्ध के गुणनपफल के बराबर में द्विध्ु्रव। होता है। बल आघूणर् का परिमाण त्र ु म् × 2 ं ेपदθ त्र 2 ु ं म् ेपदθ इसकी दिशा कागज़्ा के तल के अभ्िालंबवत इससे बाहर की ओर है। च×म् का परिमाण भी चम् ेपदθ है तथा इसकी दिशा कागज़्ा के पृष्ठ के अभ्िालंबवत बाहर की ओर है। अतः τत्र च×म् ;1ण्22द्ध यह बल आघूणर् द्विध्ु्रव को क्षेत्रा म् के साथ संरेख्िात करने की प्रवृिा रखेगा। जब च क्षेत्रा म् के साथ संरेख्िात हो जाता है तो बल आघूणर् शून्य होता है। जब क्षेत्रा एकसमान नहीं होता तब क्या होता है? स्पष्ट है, उस प्रकरण में नेट बल शून्येतर हो सकता है। इसके अतिरिक्त, व्यापक रूप से निकाय पर पहले की ही भाँति एक बल आघूणर् कायर् करेगा। यहाँ व्यापक प्रकरण अंतग्रर्स्त है, अतः आइए ऐसी सरल स्िथति पर विचार करते हैं जिसमें च क्षेत्रा म् के समांतर अथवा प्रतिसमांतर है। दोनों ही प्रकरणों में नेट बल आघूणर् तो शून्य होता है परंतु यदि म् एकसमान नहीं है तो द्विध्ु्रव पर एक नेट बल लगता है। चित्रा 1ण्23 स्वतः स्पष्टीकरण करता है। इसे आसानी से देखा जा सकता है कि जब च क्षेत्रा म् के समांतर है तो द्विध््रुव पर बढ़ते क्षेत्रा की दिशा में एक नेट बल कायर् करता है। जब च क्षेत्रा के म् प्रतिसमांतर होता है तो द्विध्ु्रव पर घटते क्षेत्रा की दिशा में एक नेट बल कायर् करता है। व्यापक रूप में, बल म् के सापेक्ष च के दिव्फविन्यास पर निभर्र करता है। इससे हमारा ध्यान घषर्ण विद्युत के सामान्य प्रेक्षणों पर जाता है। शुष्क बालों चित्रा 1ण्23 द्विध्ु्रव पर वैद्युत बल ;ंद्ध च क्षेत्रामें पेफरी गइर् वंफघी कागश के छोटे टुकड़ों को आक£षत करती है। जैसाकि हम म् के समांतर ;इद्ध च क्षेत्रा म् के प्रतिसमांतर।जानते हैं कि वंफघी घषर्ण द्वारा आवेश अ£जत करती है। परंतु कागश आवेश्िात नहीं है तो पिफर इस आकषर्क बल का स्पष्टीकरण वैफसे करें? पिछली चचार् से संकेत भौतिकी चित्रा 1ण्24 रैख्िाक, पृष्ठीय, आयतनी घनत्वों की परिभाषा। प्रत्येक प्रकरण में चुने गए अवयव ;Δसए Δैए Δटद्ध स्थूलदशीर्य स्तर पर छोटे हैं परंतु इनमें सूक्ष्मदशीर्य स्तर के अवयवों की एक विशाल संख्या समाहित होती है। पाकर हम कह सकते हैं कि आवेश्िात वंफघी कागश के टुकड़ों को ध्ु्रवित कर देती है, अथार्त कागश के टुकड़ों में क्षेत्रा की दिशा में नेट द्विध्ु्रव आघूणर् प्रेरित कर देती है। इसके अतिरिक्त वंफघी के कारण विद्युत क्षेत्रा एकसमान नहीं है। इस स्िथति में यह आसानी से देखा जा सकता है कि कागश के टुकड़े वंफघी की दिशा में गति करते हैं। 1ण्13 संतत आवेश वितरण अब तक हमने विविक्त आवेशों ु1ए ु2ए ण्ण्ण्ए ुद के आवेश विन्यास के विषय में चचार् की है। इसका कारण यह है कि ऐसे विन्यासों के लिए गण्िातीय परिकलन सरल होते हैं जिनमें कलन ;वैफलवुफलसद्ध की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही, बहुत से कायो± के लिए विविक्त आवेशों के पदों में कायर् करना व्यावहारिक नहीं होता और हमें संतत आवेश वितरण की आवश्यकता होती है। उदाहरणाथर्, किसी आवेश्िात चालक के पृष्ठ पर सूक्ष्म आवेश्िात अवयवों की अवस्िथतियों के पदों में आवेश वितरण का विशेष रूप से उल्लेख करना व्यावहारिक नहीं है। चालक के पृष्ठ पर किसी क्षेत्रापफल अवयव Δै ;जो स्थूल स्तर पर बहुत छोटा परंतु इलेक्ट्राॅनों की विशाल संख्या को सम्िमलित करने के लिए पयार्प्त है, देख्िाए चित्रा 1ण्24द्ध के विषय में विचार करके उस अवयव पर आवेश Δफ का पृथक - पृथक उल्लेख करना अध्िक उपयुक्त है। इसके बाद हम क्षेत्रापफल अवयव पर पृष्ठीय आवेश घनत्व σ की परिभाषा इस प्रकार करते हैं - Δफσत्र ;1ण्23द्धΔै ऐसा हम चालक के पृष्ठ के विभ्िान्न ¯बदुओं पर कर सकते हैं और इस प्रकार एक संतत पफलन σ ;जिसे पृष्ठीय आवेश घनत्व कहते हैंद्ध पर पहुँचते हैं। इस रूप में व£णत पृष्ठीय आवेश घनत्व σ आवेश की क्वांटमता तथा सूक्ष्मदशीर्य स्तर’ पर आवेश की असंतता वितरण की उपेक्षा करता है। σ स्थूलदशीर्य रूप में पृष्ठीय आवेश घनत्व है जो एक प्रकार से, सूक्ष्मदशीर्य रूप में बड़े परंतु स्थूलदशीर्य रूप में छोटे क्षेत्रा अवयव Δै पर सूक्ष्मदशीर्य आवेश घनत्व है। σ का मात्राक ब्ध्उ2 है। इसी प्रकार के दृष्िटकोण रैख्िाक आवेश वितरणों तथा आयतनी आवेश वितरणों पर भी लागू होते हैं। किसी तार का रैख्िाक आवेश घनत्व λ की परिभाषा Δफλ त्र ;1ण्24द्धΔस द्वारा की जाती है। यहाँ Δस सूक्ष्म स्तर पर तार का रैख्िाक अवयव है। तथापि सूक्ष्म आवेश्िात अवयवों की एक विशाल संख्या इसमें सम्िमलित है तथा Δफ इस रैख्िाक अवयव में समाए आवेश हैं। λ का मात्राक ब्ध्उ है। इसी प्रकार से आयतनी आवेश घनत्व ;सरल शब्दों में जिसे आवेश घनत्व भी कहा जाता हैद्ध की परिभाषा भी Δफρत्र ;1ण्25द्धΔट द्वारा की जाती है। यहाँ Δफ स्थूल रूप में छोटे आयतन अवयव Δट में समाए वे आवेश हैं जो सूक्ष्म आवेश्िात अवयवों की विशाल संख्या को सम्िमलित करते हैं। ρ का मात्राक ब्ध्उ3 है। यहाँ संतत आवेश वितरण की हमारी धरणा यांत्रिाकी में हमारे द्वारा अपनाइर् गइर् संतत संहति वितरण की धरणा के ही समान है। जब हम किसी द्रव के घनत्व का उल्लेख करते हैं तो उस ’ सूक्ष्मदशीर्य स्तर पर, आवेश वितरण असंतत होता है। पृथक आवेश एक आवेशरहित मध्यवतीर् स्थान से पृथवृफत होते हैं। समय वास्तव में हम उसके स्थूल घनत्व का ही उल्लेख कर रहे होते हैं। हम द्रव को एक संतत तरल मान लेते हैं तथा उसकी विविक्त आणविक रचना की उपेक्षा कर देते हैं। विविक्त आवेशों के निकाय के कारण विद्युत क्षेत्रा प्राप्त करने ¹समीकरण ;1ण्10द्धह् की ही भाँति लगभग इसी ढंग से संतत आवेश वितरण के कारण विद्युत क्षेत्रा प्राप्त किया जा सकता है। मान लीजिए किसी दिव्फस्थान में संतत आवेश वितरण का आवेश घनत्वρ है। कोइर् सुविधजनक मूल ¯बदु व् चुनिए तथा मान लीजिए आवेश वितरण में किसी ¯बदु का स्िथति सदिशत है। आवेश घनत्व ρ एक ¯बदु से दूसरे ¯बदु पर भ्िान्न हो सकता है, अथार्त यह त का पफलन है। आवेश वितरण को Δट आमाप के छोटे आयतन अवयवों में विभाजित कीजिए। आयतन अवयवΔटमें आवेश का परिमाणρΔट है। अब स्िथति सदिशत्के साथ किसी भी व्यापक ¯बदु च् ;आवेश वितरण के भीतर अथवा बाहरद्ध पर विचार कीजिए ;चित्रा 1ण्24द्ध। वूफलाॅम नियम द्वारा आवेशρΔटके कारण विद्युत क्षेत्रा 1 ρΔट Δम् त्र त६श् 2 ;1ण्26द्ध4πε0 तश् यहाँत′आवेश अवयव तथा च् के बीच की दूरी है, तथा त६′आवेश अवयव से च् की दिशा में एकांक सदिश है। अध्यारोपण सि(ांत द्वारा आवेश वितरण के कारण वुफल विद्युत क्षेत्रा विभ्िान्न आयतन - अवयवों के कारण विद्युत क्षेत्रों का योग करने पर प्राप्त होता है। 1 ρΔट म् ≅Σ त६श् 2 ;1ण्27द्धसभी Δट4πε0 तश् ध्यान दीजिएρए त′ए त६′सभी के मान एक ¯बदु से दूसरे पर परिव£तत हो सकते हैं। यथाथर् गण्िातीय विध्ि में हमेंΔट→0 लेना चाहिए और पिफर यह योग एक समाकल बन जाता है। परंतु सरलता की दृष्िट से इस चचार् को हम यही छोड़ रहे हैं। संक्षेप में वूफलाॅम नियम तथा अध्यारोपण सि(ांत के उपयोग द्वारा किसी भी आवेश वितरण के लिए चाहे वह विविक्त हो अथवा संतत, अथवा अंशतः विविक्त और अंशतः संतत हो, विद्युत क्षेत्रा ज्ञात किया जा सकता है। 1ण्14 गाउस नियम वैद्युत फ्रलक्स की अवधरणा के सरल अनुप्रयोग के रूप में आइए किसीत त्रिाज्या के ऐसे गोले जिसके वेंफद्र पर कोइर् ¯बदु आवेशुपरिब( है, से गुजरने वाले वुफल फ्रलक्स पर विचार करें। चित्रा 1ण्25 में दशार्ए अनुसार इस गोले को छोटे क्षेत्रापफल अवयवों में विभाजित करते हैं। क्षेत्रापफल अवयवΔैसे गुजरने वाला फ्रलक्स ुΔφ त्र म् Δ ै त्र त६ Δै2 ;1ण्28द्ध4πε0 त यहाँ हमने एकल आवेशु के कारण विद्युत क्षेत्रा के लिए वूफलाॅम नियम का उपयोग किया है। एकांक सदिश त६वेंफद्र से क्षेत्रा अवयव की ओर ध््रुवांतर रेखा के अनुदिश है। अब, चूँकि गोले के पृष्ठ के किसी भी ¯बदु पर अभ्िालंब उस ¯बदु पर ध्ु्रवांतर रेखा के अनुदिश होता है, क्षेत्रा अवयवΔैतथा त६ दोनों एक ही दिशा में होते हैं। इसीलिए, φत्र ΔैΔ ु ;1ण्29द्ध4πε0 त 2 चूँकि एकांक सदिश त का परिमाण 1 है। गोले से गुजरने वाला वुफल फ्रलस्क सभी क्षेत्रा - अवयवों से गुजरने वाले फ्रलक्सों का योग करने पर प्राप्त होता है चित्रा 1ण्25उस गोले से गुजरने वाला फ्रलक्स जिसके वेंफद्र पर ¯बदु आवेशु परिब( है। भौतिकी ुφत्रΣ Δै सभी Δै 4 πε त 2 0 चूँकि गोले का प्रत्येक क्षेत्रा अवयव आवेश से समान दूरी त पर है, अतः ुुφत्र ΣΔै त्र ैचित्रा 1ण्26 सिलिंडर के पृष्ठ से गुजरने वाले 2 सभी Δै 24πε वत 4πε0 त एकसमान विद्युत क्षेत्रा के फ्रलक्स का परिकलन। अब, चूँकि गोले का वुफल पृष्ठीय क्षेत्रा ै त्र 4πत 2 है, अतः ुुφत्र 2 × 4πत 2 त्र ;1ण्30द्ध4πε0 त ε0 समीकरण ;1ण्30द्ध स्िथरवैद्युतिकी के व्यापक परिणाम, जिसे गाउस नियम कहते हैं, का एक सरल दृष्टांत है। हम बिना उपपिा के गाउस नियम का इस प्रकार उल्लेख करते हैं - किसी बंद पृष्ठ ै से गुजरने वाला वैद्युत फ्रलक्स त्र ुध्ε0 ;1ण्31द्ध यहाँ ु पृष्ठ ै द्वारा परिब( वुफल आवेश है। इस नियम से यह उपलक्ष्िात होता है कि यदि किसी बंद पृष्ठ द्वारा कोइर् आवेश परिब( नहीं किया गया है तो उस पृष्ठ से गुजरने वाला वुफल फ्रलक्स शून्य होता है। इसे हम चित्रा 1ण्26 की सरल अवस्िथति में सुस्पष्ट देख सकते हैं। यहाँ विद्युत क्षेत्रा एकसमान है तथा हम एक ऐसे बंद बेलनाकार पृष्ठ के विषय में विचार कर रहे हैं जिसमें बेलन का अक्ष एकसमान क्षेत्रा म् के समांतर है। इसके पृष्ठ से गुजरने वाला वुफल फ्रलक्स φ हैै। φ त्र φ1 ़ φ2 ़ φ3 यहाँ φ1 तथा φ2 सिलिंडर के पृष्ठ 1 तथा 2 ;वृत्ताकार अनुप्रस्थ परिच्छेद केद्ध से गुजरने वाले फ्रलक्स को निरूपित करते हैं तथा φ3 बंद पृष्ठ के वित सिलिंडरी भाग से गुजरने वाले फ्रलक्स को निरूपित करता है। चूँकि पृष्ठ 3 के प्रत्येक ¯बदु पर अभ्िालंब म् के लंबवत है, अतः फ्रलक्स की परिभाषा के अनुसार φ3 त्र 0 । इसके अतिरिक्त पृष्ठ 2 पर बहिमुर्खी अभ्िालंब म् के अनुदिश है तथा पृष्ठ 1 पर बहिमुर्खी अभ्िालंब म् की दिशा के विपरीत है। अतः φ1 त्र दृम्ै1ए φ2 त्र ़म्ै2 ै त्र ै त्र ै12यहाँ ै वृत्ताकार अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रापफल है। इस प्रकार वुफल फ्रलक्स शून्य है, जैसा कि गाउस नियम से संभावित था। इस प्रकार जब आप पाएँ कि एक बंद पृष्ठ के अंदर नेट वैद्युत फ्रलक्स शून्य है तो हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि बंद पृष्ठ के अंत£वष्ट वुफल आवेश शून्य है। गाउस नियम समीकरण ;1ण्31द्ध का अत्यध्िक महत्व इस कारण से भी है कि यह व्यापक रूप से सत्य है, तथा केवल उन्हीं सरल प्रकरणों जिन पर हमने ऊपर विचार किया था, लागू नहीं होता है, वरन् सभी प्रकरणों में इसका प्रयोग किया जा सकता है। इस नियम के बारे में, आइए वुफछ महत्वपूणर् तथ्यों पर ध्यान दें - ;पद्ध गाउस नियम प्रत्येक बंद पृष्ठ, चाहे उसकी आवृफति तथा आमाप वुफछ भी हो, के लिए सत्य है। ;पपद्ध गाउस नियम समीकरण ;1ण्31द्ध के दक्ष्िाण पक्ष के पद ु में पृष्ठ द्वारा परिब( सभी आवेशों का योग सम्िमलित है। ये आवेश पृष्ठ के भीतर कहीं भी अवस्िथत हो सकते हैं। ;पपपद्ध उन परिस्िथतियों जिनमें ऐसे पृष्ठ का चयन किया जाता है कि वुफछ आवेश पृष्ठ के भीतर तथा वुफछ पृष्ठ के बाहर होते हैं, विद्युत क्षेत्रा ख्जिसका फ्रलक्स समीकरण ;1ण्31द्ध के वाम पक्ष में दृष्िटगोचर होता हैह् ै के भीतर तथा बाहर स्िथत सभी आवेशों के कारण है। तथापि, गाउस नियम के समीकरण के दक्ष्िाण पक्ष में पद ु केवल ै के भीतर के वुफल आवेशों को निरूपित करता है। ;पअद्ध गाउस नियम के अनुप्रयोग के लिए चयन किए जाने वाले पृष्ठ को गाउसीय पृष्ठ कहते हैं। आप किसी भी गाउसीय पृष्ठ का चयन करके गाउस नियम लागू कर सकते हैं। तथापि, सावधान रहिए गाउसीय पृष्ठ को किसी भी विविक्त आवेश से नहीं गुजरना चाहिए। इसका कारण यह है कि विविक्त आवेशों के निकाय के कारण विद्युत क्षेत्रा को किसी भी आवेश की अवस्िथति पर भलीभाँति परिभाष्िात नहीं किया गया है। ;जैसे ही आप किसी आवेश के निकट जाते हैं, विद्युत क्षेत्रा सभी मयार्दाओं से बाहर विकसित होता जाता हैद्ध परंतु गाउसीय पृष्ठ संतत आवेश वितरण से गुजर सकता है। ;अद्ध जब निकाय में वुफछ सममिति होती है तो विद्युत क्षेत्रा के परिकलन को अध्िक आसान बनाने के लिए गाउस नियम प्रायः उपयोगी होता है। उचित गाउसीय पृष्ठ का चयन इसे सुविधाजनक बना देता है। ;अपद्ध अंत में, गाउस नियम वूफलाॅम नियम में अंत£नहित दूरी पर व्युत्क्रम वगर् निभर्रता पर आधरित है। गाउस नियम का कोइर् उल्लंघन व्युत्क्रम वगर् नियम से विचलन को संकेत करेगा। भौतिकी 221ध्2,त्र φ़ φ त्र म्ं दृ म्ं त्र ं 2 ;म् दृ म्द्ध त्र αं 2 ख्;2ंद्ध1ध्2 दृ ंत् स्त्स्त्स्त्र αं5ध्2 ; 2 दृ 1द्ध त्र 800 ;0ण्1द्ध5ध्2 ; 2 दृ 1द्ध त्र 1ण्05 छ उ2 ब्दृ1 ;इद्ध हम घन के भीतर वुफल आवेश ु को ज्ञात करने के लिए गाउस नियम का उपयोग कर सकते हैं। हम जानते हैं कि φ त्र ुध्ε0 अथवा ु त्र φε0 इसलिए ु त्र 1ण्05 × 8ण्854 × 10दृ12 ब् त्र 9ण्27 × 10दृ12 ब् 1ण्15 गाउस नियम के अनुप्रयोग जैसी कि हम ऊपर चचार् कर चुके हैं कि किसी व्यापक आवेश वितरण के कारण विद्युत क्षेत्रा समीकरण ;1ण्27द्ध द्वारा व्यक्त किया जाता है। वुफछ विश्िाष्ट प्रकरणों को छोड़कर, व्यवहार में, इस समीकरण में सम्िमलित संकलन ;अथवा समाकलनद्ध की प्रिया दिव्फस्थान के सभी ¯बदुओं पर विद्युत क्षेत्रा प्राप्त करने के लिए कायार्न्िवत नहीं की जा सकती। तथापि, वुफछ सममित आवेश विन्यासों के लिए गाउस नियम का उपयोग करके विद्युत क्षेत्रा को सरल ढंग से प्राप्त करना संभव है। वुफछ उदाहरणों से इसे आसानी से समझा जा सकता है। 1ण्15ण्1 अनंत लंबाइर् के एकसमान आवेश्िात सीध्े तार के कारण विद्युत क्षेत्रा किसी अनंत लंबाइर् के एकसमान रैख्िाक आवेश घनत्वλ के सीध्े पतले तार पर विचार कीजिए। स्पष्ट रूप से यह तार एक सममित अक्ष है। मान लीजिए हम व् से च् की दिशा में ध्रुवांतर ;त्रिाज्य सदिशद्ध लेकर इसे तार के चारों ओर घूणर्न कराते हैं। इस प्रकार प्राप्त ¯बदु च्ए च्′ए च्′′आवेश्िात तार के संदभर् में संपूणर् रूप से तुल्य हैं। इससे यह उपलक्ष्िात होता है कि इन ¯बदुओं पर विद्युत क्षेत्रा का परिमाण समान होना चाहिए। प्रत्येक ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा की दिशा अरीय ;त्रिाज्यीयद्ध होनी चाहिए ;यदिλ झ 0, तो बहिमुर्खी तथा यदिλ ढ 0, तो अंतमुर्खीद्ध। यह चित्रा 1ण्29 से स्पष्ट है। दशार्ए अनुसार तार के रैख्िाक अवयवों च्1तथा च्2के युगल पर विचार करें। इस युगल के दो अवयवों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्रों को संकलित करने पर प्राप्त परिणामी विद्युत क्षेत्रा अरीय होता है ¹ध्रुवांतर के अभ्िालंबवत अवयव एक - दूसरे को निरस्त कर देते हैंह्। यह इस प्रकार के सभी युगलों के लिए सत्य है। अतः किसी भी ¯बदु च् पर वुफल विद्युत क्षेत्रा अरीय है। अंत में, चूँकि तार अनंत है, तार की लंबाइर् के अनुदिश विद्युत क्षेत्रा ¯बदु च् की स्िथति पर निभर्र नहीं करता। संक्षेप में, तार को अभ्िालंबवत काटने वाले तल में विद्युत क्षेत्रा हर स्थान पर अरीय है तथा इसका परिमाण केवल त्रिाज्य दूरीत पर निभर्र करता है। विद्युत क्षेत्रा परिकलित करने के लिए चित्रा 1ण्29;इद्ध में दशार्ए अनुसार किसी बेलनाकार गाउसीय पृष्ठ की कल्पना कीजिए। चूँकि विद्युत क्षेत्रा हर स्थान पर अरीय है, बेलनाकार गाउसीय पृष्ठ के दो सिरों से गुजरने वाला फ्रलक्स शून्य है। चित्रा 1ण्29 ;ंद्ध अनंत लंबाइर् के एकसमान आवेश्िात पतले सीधे पृष्ठ के बेलनाकार भाग पर विद्युत क्षेत्राम्पृष्ठ के हर ¯बदु पर तार के कारण विद्युत क्षेत्रा अरीय ;त्रिाज्यीयद्ध होता है। अभ्िालंबवत है तथा केवलत पर निभर्र होने के कारण इसका ;इद्ध एकसमान रैख्िाक आवेश घनत्व के लंबे पतले तार के लिए परिमाण नियत है। वित भाग का पृष्ठीय क्षेत्रापफल 2πतस है, गाउसीय पृष्ठ। यहाँससिलिंडर की लंबाइर् है। भौतिकी गाउसीय पृष्ठ से गुशरने वाला फ्रलक्स त्र पृष्ठ के वित बेलनाकार भाग से गुशरने वाला फ्रलक्स त्र म् × 2πतस पृष्ठ में λ स के बराबर आवेश सम्िमलित है। तब गाउस नियम से प्राप्त होता है म् × 2πतस त्र λसध्ε0 λ अथार्त म् त्र 2πε0त सदिश रूप में किसी भी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा म् इस प्रकार व्यक्त किया जाता है λ म् त्र द६ ;1ण्32द्ध2πε0त यहाँ द६तार के किसी ¯बदु के अभ्िालंबवत गुजरने वाले तल में त्रिाज्य एकांक सदिश है। जब λ धनात्मक होता है तो म् बहिमुर्खी होता है और जब λ )णात्मक होता है, यह अंतमुर्खी होता है। ध्यान दीजिए, जब हम सदिश । को एकांक सदिश से गुण्िात अदिश के रूप में, अथार्त । त्र । ं६के रूप में लिखते हैं तो अदिश । एक बीजगण्िातीय संख्या होती है। यह ध्नात्मक भी हो सकती है और )णात्मक भी। यदि । झ 0 है तो । की दिशा एकांक सदिश ं६के समान होगी तथा यदि । ढ 0 है तो । की दिशा ं६की दिशा के विपरीत होगी। जब हम )णेतर मानों तक सीमित रखना चाहते हैं तो हम प्रतीक । का उपयोग करते हैं तथा इसे । का माड्यूल्स ;मापांकद्ध कहते हैं। इस प्रकार । ≥ 0 होता है। यह भी ध्यान दीजिए कि उपरोक्त चचार् में यद्यपि पृष्ठ ;λसद्ध द्वारा परिब( आवेश को ही केवल सम्िमलित किया गया था, परंतु विद्युत क्षेत्रा म् समस्त तार पर आवेश के कारण है। साथ ही यह कल्पना कर लेना कि तार की लंबाइर् अनंत है इस कल्पना के बिना हम विद्युत क्षेत्रा म् को बेलनाकार गाउसीय पृष्ठ के अभ्िालंबवत नहीं ले सकते। तथापि, लंबे तार के बेलनाकार भागों के चारों ओर जहाँ अंत्य प्रभाव ;मदक ममििबजेद्ध की उपेक्षा की जा सकती है, विद्युत क्षेत्रा के लिए समीकरण ;1ण्32द्ध सन्िनकटतः सही है। 1ण्15ण्2 एकसमान आवेश्िात अनंत समतल चादर के कारण विद्युत क्षेत्रा मान लीजिए किसी अनंत समतल चादर ;चित्रा 1ण्30द्ध का एकसमान पृष्ठीय आवेश घनत्व σ है। हम ग.अक्ष को दिए गए तल के अभ्िालंबवत मानते हैं। सममिति के अनुसार विद्युत क्षेत्रा ल तथा ्र निदेर्शांकों पर निभर्र नहीं करेगा तथा इसकी प्रत्येक ¯बदु पर दिशा ग.दिशा के समांतर होनी चाहिए। हम गाउसीय पृष्ठ को चित्रा में दशार्ए अनुसार । अनुप्रस्थकाट क्षेत्रापफल के आयताकार समांतर षट्पफलक जैसा ले सकते हैं ;वैसे तो बेलनाकार पृष्ठ से भी यह कायर् हो सकता हैद्ध। जैसा चित्रा से दृष्िटगोचर होता है, केवल दो पफलक 1 तथा 2 ही फ्रलक्स में योगदान देंगेऋ विद्युत क्षेत्रा रेखाएँ अन्य पफलकों के समांतर हैं और वे इसीलिए वुफल फ्रलक्स में योगदान नहीं देतीं। पृष्ठ 1 के अभ्िालंबवत एकांक सदिश दृग दिशा में है जबकि पृष्ठ 2 के अभ्िालंबवत एकांक सदिश ़ग दिशा में है। अतः, दोनों पृष्ठों से गुजरने वाले फ्रलक्स म्ण्Δै बराबर हैं और संयोजित हो जाते हैं। इसीलिए गाउसीय पृष्ठ से गुजरने वाला नेट फ्रलक्स 2 म्। है। पृष्ठ द्वाराचित्रा 1ण्30 एकसमान आवेश्िात अनंत आवेश चादर के परिब( आवेश σ। है। इसीलिए गाउस नियम द्वारा हमें यह संबंध् प्राप्तलिए गाउसीय पृष्ठ। 2 म्। त्र σ।ध्ε0 अथवा म् त्र σध्2ε0 सदिश रूप में σ म् त्र द६ ;1ण्33द्ध2ε0 यहाँ द६तल के अभ्िालंबवत इससे दूर जाता हुआ एकांक सदिश है। यदि σ ध्नात्मक है तो म् तल से बहिमर्ुखी तथा यदि σ )णात्मक है तो म् तल से अंतमुर्खी होता है। ध्यान दीजिए गाउस नियम के अनुप्रयोग से हमें एक अतिरिक्त तथ्य यह प्राप्त होता है कि म्ए ग पर भी निभर्र नहीं है। किसी परिमित बड़ी समतलीय चादर के लिए समीकरण ;1ण्33द्धए सिरों से दूर समतलीय चादर के मध्यवतीर् क्षेत्रों में सन्िनकटतः सत्य है। 1ण्15ण्3 एकसमान आवेश्िात पतले गोलीय खोल के कारण विद्युत क्षेत्रा मान लीजिए त् त्रिाज्या के पतले गोलीय खोल का एकसमान पृष्ठीय आवेश घनत्व σ है ;चित्रा 1ण्31द्ध। स्पष्ट रूप से इस स्िथति में गोलीय सममिति है। किसी बिंदु च् पर चाहे वह भीतर है अथवा बाहर, विद्युत क्षेत्रा केवल त पर निभर्र कर सकता है ;यहाँ त खोल के वेंफद्र से उस बिंदु तक की त्रिाज्य दूरी है।द्धतथा इस क्षेत्रा को अरीय ;अथार्त ध्रुवांतर के अनुदिशद्ध होना चाहिए। ;पद्ध खोल के बाहर विद्युत क्षेत्रा - खोल के बाहर ध््रुवांतर त के किसी बिंदु च् पर विचार कीजिए। बिंदु च् पर म् का परिकलन करने के लिए हम वेंफद्र व् तथा त्रिाज्या त के बिंदु च् से गुजरने वाले गोले को गाउसीय पृष्ठ मानते हैं। दिए गए आवेश विन्यास के सापेक्ष इस गोले पर स्िथत प्रत्येक बिंदु समतुल्य है। ;गोलीय सममिति से हमारा यही अभ्िाप्राय है।द्ध इसीलिए गाउसीय पृष्ठ के प्रत्येक बिंदु पर विद्युत क्षेत्रा का समान परिमाण म् है तथा प्रत्येक बिंदु पर ध््रुवांतर के अनुदिश है। इस प्रकार प्रत्येक बिंदु पर म् तथा Δै समांतर हैं तथा प्रत्येक अवयव से गुशरने वाला फ्रलक्स म् Δै है। सभी Δै का संकलन करने पर गाउसीय पृष्ठ से गुशरने वाला फ्रलक्स म् × 4 π त 2 है। परिब( आवेश σ × 4 π त्2 है। गाउस नियम से σ 4 π त्2 म् × 4 π त 2 त्र ε0 σ त्2 ुअथवा म् त्र 2 त्र 2ε0 त 4πε0 त यहाँ ु त्र 4 π त्2 σ गोलीय खोल पर वुफल आवेश है। ुसदिश रूप में, म् त्र 2 त६ ;1ण्34द्ध चित्रा 1ण्31 किसी ¯बदु के लिए जो4πε त0 ;ंद्ध त झ त्ए ;इद्ध त ढ त् पर है, गाउसीययदि ु झ 0 है तो विद्युत क्षेत्रा बहिमुर्खी होता है तथा यदि ु ढ 0 है तो विद्युत क्षेत्रा पृष्ठ। अंतमुर्खी होता है। तथापि, यह खोल के वेंफद्र व् पर स्िथत आवेश ु द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्रा है। अतः खोल के बाहर स्िथत बिंदुओं पर एकसमान आवेश्िात गोलीय खोल के कारण विद्युत क्षेत्रा इस प्रकार का होता है, जैसे कि खोल का समस्त आवेश उसके वेंफद्र पर स्िथत है। ;पपद्ध खोल के भीतर विद्युत क्षेत्रा - चित्रा 1ण्31;इद्ध में बिंदु च् खोल के भीतर है। इस प्रकरण में भी गाउसीय पृष्ठ च् से गुशरने वाला वह गोला है जिसका वेंफद्र व् है। पहले किए गए भौतिकी परिकलनों की ही भाँति गाउसीय पृष्ठ से गुजरने वाला फ्रलक्स म् × 4 π त 2 है। तथापि इस प्रकरण में, गाउसीय पृष्ठ में कोइर् आवेश परिब( नहीं है। तब गाउस नियम के अनुसार म् × 4 π त 2 त्र 0 अथार्त म् त्र 0 ;त ढ त् द्ध ;1ण्35द्ध अथार्त एकसमान आवेश्िात पतले गोलीय खोल’ के कारण उसके भीतर स्िथत सभी बिंदुओं पर विद्युत क्षेत्रा शून्य है। यह महत्वपूणर् परिणाम गाउस नियम का प्रत्यक्ष निष्कषर् है जो कूलाॅम नियम से प्राप्त हुआ है। इस नियम का प्रायोगिक सत्यापन कूलाॅम नियम में 1ध्त 2 की निभर्रता की पुष्िट करता है। ’ इसकी तुलना भौतिकी पाठ्यपुस्तक कक्षा 11 के अनुभाग 8.5 में वण्िार्त एकसमान द्रव्यमान खोल से कीजिए। यहाँ गाउसीय पृष्ठ द्वारा परिब( आवेश ु ध्नात्मक नाभ्िाकीय आवेश तथा त त्रिाज्या के गोले में विद्यमान )णात्मक आवेश है 4 π त 3 अथार्त ु त्र र्म ़ρ 3 पहले प्राप्त आवेश घनत्व ρ का मान प्रतिस्थापित करने पर हमें प्राप्त होता है। 3 त ु त्र र्म − र्म 3त् तब गाउस नियम से हमें प्राप्त होता है। र्म 1 त म्त ;द्ध त्र− य त ढ त् 4 πε0 त 2 त्3 यहाँ विद्युत क्षेत्रा त्रिाज्यतः बहिमुर्खी निदश्िार्त है। ;पपद्ध त झ त् रू इस प्रकरण में, चूँकि परमाणु उदासीन है, गोलीय गाउसीय पृष्ठ द्वारा परिब( आवेश शून्य है। इस प्रकार, गाउस नियम से म् ;तद्ध × 4 π त 2 त्र 0 अथवा ;तद्ध त्र 0य त झ त् त त्र त्ए पर दोनों प्रकरणों से समान परिणाम, म् त्र 0 प्राप्त होता है। भौतिकी सारांश 1ण् विद्युत तथा चुंबकीय बल परमाणुओं, अणुओं तथा स्थूल द्रव्य के गुणधमो± का निधार्रण करते हैं। 2ण् घषर्ण विद्युत के सरल प्रयोगों के आधार पर यह निष्कषर् निकाला जा सकता है कि प्रकृति में दो प्रकार के आवेश होते हैं। सजातीय आवेशों में प्रतिकषर्ण तथा विजातीय आवेशों में आकषर्ण होता है। परिपाटी के अनुसार, रेशम से रगड़ने पर काँच की छड़ पर धनावेश होता हैऋ तथा पफर से रगड़ने पर प्लास्िटक की छड़ पर )णावेश होता है। 3ण् चालक अपने में से होकर सरलता से वैद्युत आवेश की गति होने देते हैं जबकि विद्युतरोधी ऐसा नहीं करते। धातुओं में गतिशील आवेश इलेक्ट्राॅन होते हैंऋ वैद्युत अपघट्यों में धनायन तथा )णायन दोनों ही गति करते हैं। 4ण् वैद्युत आवेशों के तीन गुणधमर् होते हैं: क्वांटमीकरण, योज्यता तथा संरक्षण। वैद्युत आवेश के क्वांटमीकरण से तात्पयर् है कि किसी वस्तु का वुफल आवेश ;ुद्ध सदैव ही आवेश के एक मूल क्वांटम ;मद्ध के पूणा±की गुणज अथार्त ु त्र द म होता है, जहाँ द त्र 0ए ±1ए ±2ए ±3ए ण्ण्ण्ण् है। प्रोटाॅन तथा इलेक्ट्राॅन पर क्रमशः ़म तथा दृम आवेश होते हैं। स्थूल आवेशों जिनके लिए द एक अत्यिाक बड़ी संख्या होती है, में आवेश के क्वांटमीकरण की उपेक्षा की जा सकती है। वैद्युत आवेशों की योज्यता से हमारा तात्पयर् यह है कि किसी निकाय का वुफल आवेश उस निकाय के सभी एकाकी आवेशों का बीजगण्िातीय योग ;अथार्त योग करते समय उनके चिÉों को ध्यान में रखकरद्ध होता है। वैद्युत आवेशों के संरक्षण से हमारा तात्पयर् यह है कि किसी वियुक्त निकाय ;पेवसंजमक ेलेजमउद्ध का वुफल आवेश समय के साथ अपरिवतिर्त रहता है। इसका अथर् यह है कि जब घषर्ण द्वारा वस्तुएँ आवेश्िात की जाती हैं तो आवेशों का एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरण होता है, परंतु इस प्रिया में न तो कोइर् आवेश उत्पन्न होता है और न ही नष्ट होता है। 5ण् वूफलाॅम नियम: दो ¯बदु आवेशों ु1 तथा ु2 के बीच पारस्परिक स्िथर वैद्युत बल, आवेशों के गुणनपफल ुुके अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी तके वगर् के व्युत्क्रमानुपाती12 21 होता है। गण्िातीय रूप में ा;ुु द्धथ् त्र ुपर ुके कारण लगने वाला बल त्र 12 त६21 2121 2 त21 यहाँ त६21 आवेश ु से ुकी दिशा में एकंाक सदिश है तथा ा त्र 1 आनुपातिकता12 4πε0 स्िथरांक है। ैप् मात्राकों में, आवेश का मात्राक वूफलाॅम है। नियतांक ε0 का प्रायोगिक मान है ε0 त्र 8ण्854 × 10दृ12 ब्2 छदृ1 उदृ2 ा का सन्िनकट मान ा त्र 9 × 109 छ उ2 ब्दृ2 होता है। 6ण् किसी प्रोटाॅन तथा किसी इलेक्ट्राॅन के बीच वैद्युत बल तथा गुरुत्वाकषर्ण बल का अनुपात है, ाम 2 ≅ 2ण्4 × 10 39 ळउ उ मच 7ण् अध्यारोपण सि(ांत: यह सि(ांत इस गुणधमर् पर आधारित है कि दो आवेशों के बीच लगने वाले आकषीर् अथवा प्रतिकषीर् बल किसी तीसरे ;अथवा अिाकद्ध अतिरिक्त आवेश की उपस्िथति से प्रभावित नहीं होते। आवेशों ु1ए ु2ए ु3ण्ण्ण् के किसी समूह के लिए किसी आवेश ;जैसे ु1द्ध पर बल, ु1 पर ु2 के कारण बल, ु1 पर ु3 के कारण बल आदि - आदि के सदिश योग के बराबर होता है। प्रत्येक युगल के लिए यह बल पहले वण्िार्त दो आवेशों के लिए वूफलाॅम के नियम द्वारा ही व्यक्त किया जाता है। 8ण् किसी आवेश विन्यास के कारण किसी ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा म् किसी छोटे धनात्मक परीक्षण आवेश ;जमेज बींतहमद्ध ु को उस ¯बदु पर रखने पर उसके द्वारा अनुभव किए जाने वाले बल को उस आवेश के परिमाण द्वारा विभाजित करने पर प्राप्त होता है। किसी ¯बदु आवेश ु के कारण विद्युत क्षेत्रा का कोइर् परिमाण ुध्4πε0 त 2 होता हैऋ यदि ु धनात्मक है तो यह क्षेत्रा अरीय ;त्रिाज्यीयद्ध बहिमुर्खी होता है तथा यदि ु )णात्मक है तो अरीय ;त्रिाज्यीयद्ध अंतमुर्खी होता है। वूफलाॅम बल की भाँति विद्युत क्षेत्रा भी अध्यारोपण सि(ांत को संतुष्ट करता है। 9ण् विद्युत क्षेत्रा रेखा ऐसा वक्र है जिसके किसी भी ¯बदु पर खींचा गया स्पशीर्, वक्र के उस ¯बदु पर विद्युत क्षेत्रा की दिशा बताता है। क्षेत्रा रेखाओं की सापेक्ष्िाक संकुलता विभ्िान्न बिंदुओं पर विद्युत क्षेत्रा की सापेक्ष्िाक तीव्रता को इंगित करती है। प्रबल विद्युत क्षेत्रा में रेखाएँ पास - पास तथा दुबर्ल क्षेत्रा में ये एक.दूसरे से कापफी दूर होती हैं। एकसमान ;अथवा नियतद्ध विद्युत क्षेत्रा में क्षेत्रा रेखाएँ एक.दूसरे से एकसमान दूरी पर समांतर सरल रेखाएँ होती हैं। 10ण् क्षेत्रा रेखाओं की वुफछ महत्वपूणर् विशेषताएँ इस प्रकार हैं - ;ंद्ध आवेशमुक्त दिव्फस्थान में क्षेत्रा रेखाएँ संतत वक्र होती हैं जो कहीं नहीं टूटतीं। ;इद्ध दो क्षेत्रा रेखाएँ एक - दूसरे को कदापि नहीं काट सकतीं। ;बद्ध स्िथरवैद्युत क्षेत्रा रेखाएँ धनावेश से आरंभ होकर )णावेश पर समाप्त हो जाती हैं - ये संवृत पाश ;बंद लूपद्ध नहीं बना सकतीं। 11ण् वैद्युत द्विध्रुव परिमाण में समान विजातीय दो आवेशों ु तथा दृुए जिनके बीच पृथकन 2ं हो, का युग्म होता है। इसके द्विध्रुव आघूणर् सदिश च का परिमाण 2ुं होता है तथा यह द्विध्रुव अक्ष दृु से ु की दिशा में होता है। 12ण् किसी वैद्युत द्विध्रुव का इसके निरक्षीय/विषुवतीय समतल ;अथार्त इसके अक्ष के लंबवत तथा इसके केंद्र से गुजरने वाले समतलद्ध पर इसके केंद्र से त दूरी पर विद्युत क्षेत्रा - − च 1 म् त्र 2 2 3ध्24πε व ;ं ़ त द्ध −च≅ ए ;त झझ ं के लिएद्ध4πε त 3 व द्विध्रुव अक्ष पर केंद्र से त दूरी पर द्विध्रुव विद्युत क्षेत्रा 2च त म् त्र 2 224πε0;त − ं द्ध 2च≅ ;त झझ ं के लिएद्ध4πε0त 3 इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि किसी द्विध्ु्रव का विद्युत क्षेत्रा 1ध्त 3 पर निभर्र होता है, जबकि किसी ¯बदु आवेश के कारण विद्युत क्षेत्रा 1ध्त 2 पर निभर्र होता है। 13ण् किसी एकसमान विद्युत क्षेत्रा म् में कोइर् वैद्युत द्विध्रुव एक बल आघूणर् τका अनुभव करता है। τत्र च × म् परंतु किसी नेट बल का अनुभव नहीं करता। 14ण् विद्युत क्षेत्रा म् का किसी लघु क्षेत्रापफल - अवयव Δै से गुजरने वाला फ्रलक्स Δφ त्र म्ण् Δै सदिश क्षेत्रापफल - अवयव Δै त्र Δै द६ यहाँ Δै क्षेत्रापफल - अवयव का परिमाण तथा द६ क्षेत्रापफल - अवयव के लंबवत त्रिाज्य एकंाक सदिश है जिसे कापफी छोटे क्षेत्रा के लिए समतलीय माना जा सकता है। किसी बंद पृष्ठ के भौतिकी क्षेत्रापफल - अवयव के लिए, द६ को परिपाटी के अनुसार बहिमर्ुखी अभ्िालंब की दिशा माना जा सकता है। 15ण् गाउस नियम:किसी बंद पृष्ठ ै से होकर गुशरने वाले किसी विद्युत क्षेत्रा का फ्रलक्स उस पृष्ठ ै द्वारा परिब( वुफल आवेश का 1ध्ε0 गुना होता है। यह नियम विद्युत क्षेत्रा के निधार्रण में विशेष रूप से तब उपयोगी होता है जबकि आवेश वितरण में सरल सममिति हो। ;पद्ध एकसमान रैख्िाक आवेश घनत्व λ का पतला अनंत लंबाइर् का सीधा तार λ म् त्र द६ 2πε0 त यहाँ त ¯बदु की तार से लंबवत दूरी है तथा द$उस ¯बदु से गुशरने वाले तार के अभ्िालंबवत तल में त्रिाज्य एकंाक सदिश है। ;पपद्ध एकसमान पृष्ठीय आवेश घनत्व σ की पतली अनंत समतल चादर σ म् त्र द६ 2ε0 यहाँ द६ समतल के अभ्िालंबवत पाश्वर् के दोनों ओर बहिमर्ुखी एकंाक सदिश है। ;पपपद्ध एकसमान पृष्ठीय आवेश घनत्व σ के पतले गोलीय खोल ;या कोशद्ध ुम् त्र त६;त ≥ त्द्ध4πε0 त 2 म् त्र 0 ;त ढ त्द्ध यहाँ त गोलीय खोल के केंद्र से ¯बदु की दूरी तथा त् खोल की त्रिाज्या है। खोल का वुफल आवेश ु है। जहाँ ु त्र 4πत्2σ है। खोल के बाहर किसी ¯बदु पर आवेश्िात खोल के कारण विद्युत क्षेत्रा इस प्रकार होता है जैसे कि समस्त आवेश खोल के केंद्र पर ही वेंफदि्रत है। यही परिणाम किसी एकसमान आयतन आवेश घनत्व के ठोस गोले के लिए भी सत्य होता है। खोल के अंदर सभी ¯बदुओं पर विद्युत क्षेत्रा शून्य होता है।सदिश क्षेत्रापफल.अवयव Δ ै ख्स्2, उ2 Δै त्र Δै द६ विद्युत क्षेत्रा म् ख्डस्ज्दृ3।दृ1, ट उदृ1 वैद्युत फ्रलक्स φ ख्डस्3 ज्दृ3।दृ1, ट उ Δφ त्र म्ण्Δै द्विध््रुव आघूणर् च ख्स्ज् ।, ब् उ )णावेश से ध्नावेश की ओर निदिर्ष्ट सदिश आवेश घनत्व रैख्िाक λ ख्स्दृ1 ज् ।, ब् उदृ1 आवेश/लंबाइर् पृष्ठीय σ ख्स्दृ2 ज् ।, ब् उदृ2 आवेश/क्षेत्रापफल आयतन ρ ख्स्दृ3 ज् ।, ब् उदृ3 आवेश/आयतन विचारणीय विषय 1.आपको यह आश्चयर् हो सकता है कि नाभ्िाक में प्रोटाॅन जिन पर ध्नावेश है, सभी एक साथ कसे रहकर कैसे समाए हुए हैं। वे एक - दूसरे से दूर क्यों नहीं उड़ जाते? आप यह सीखेंगे कि एक तीसरे प्रकार का मूल बल भी है जिसे प्रबल बल कहते हैं और यही बल प्रोटाॅनों को एक साथ बाँध्े रखता है। परंतु दूरी का वह परिसर जिसमें यह बल प्रभावी होता है, बहुत छोटा ् 10.14 उ है। यथायर् रूप में यही नाभ्िाक का साइश है। साथ ही क्वांटम यांत्रिाकी के नियमों के अनुसार इलेक्ट्राॅनों को प्रोटाॅनों के शीषर् पर अथार्त नाभ्िाक के भीतर बैठने की अनुमति भी नहीं है। इसी से परमाणुओं को उनकी रचना प्राप्त है और उनका प्रकृति में अस्ितत्व है। 2ण् वूफलाॅम बल तथा गुरुत्वाकषर्ण बल समान व्युत्क्रम वगर् नियम का पालन करते हैं। परंतु गुरुत्वाकषर्ण बल का केवल एक ही चिÉ ;सदैव आकषीर्द्ध होता है, जबकि वूफलाॅम बल के दोनों चिÉ ;आकषीर् तथा प्रतिकषीर्द्ध हो सकते हैं, जिससे विद्युत बलों का निरसन हो सकता है। यही कारण है कि अत्यंत दुबर्ल बल होने पर भी गुरुत्व बल प्रकृति में एक प्रबल तथा अध्िक व्यापक बल हो सकता है। 3ण् यदि आवेश के मात्राक को वूफलाॅम के नियम द्वारा परिभाष्िात करना है तो वूफलाॅम के नियम में आनुपातिकता स्िथरांक ा एक चयन का विषय है। परंतु ैप् मात्राकों में विद्युत धारा के मात्राक ऐम्िपयर ;।द्ध को उसी के चुंबकीय प्रभाव ;ऐम्िपयर नियमद्ध द्वारा परिभाष्िात किया जाता है तथा आवेश के मात्राक ;वूफलाॅमद्ध को केवल ;1ब् त्र 1। ेद्ध द्वारा परिभाष्िात किया जाता है। इस प्रकरण में ा का मान स्वैच्िछक नहीं हैऋ यह लगभग 9 × 109 छ उ2 ब्−2 है। 4ण् स्िथरांक ा का अत्यिाक बड़ा मान, अथार्त विद्युत प्रभाव की दृष्िट से आवेश के मात्राक ;1ब्द्ध का बड़ा आकार ;मानद्ध इस कारण से है क्योंकि ;जैसा कि ¯बदु 3 में उल्लेख किया जा चुका हैद्ध आवेश के मात्राक को चुंबकीय बलों ;विद्युतवाही तारों पर लगे बलोंद्ध के पदों में परिभाष्िात किया गया है जो कि व्यापक रूप से वैद्युत बलों की तुलना में बहुत दुबर्ल होते हैं। यही कारण है कि, 1 ऐम्िपयर चुंबकीय प्रभावों के लिए युक्ितसंगत मात्राक है, 1 ब् त्र 1 । े वैद्युत प्रभावों के लिए एक अत्यिाक बड़ा मात्राक है। 5ण् आवेश का योज्यता गुणधमर् कोइर् सुस्पष्ट गुणधमर् नहीं है। यह इस तथ्य से संबंिात है कि वैद्युत आवेश से कोइर् दिशा संब( नहीं होती, आवेश एक अदिश राश्िा है। 6ण् आवेश केवल घूणर्न के अंतगर्त ही अदिश ;अथवा अचर/अपरिवतर्नीयद्ध नहीं हैऋ यह आपेक्ष्िाक गति में भी निदेर्श पे्रफमों के लिए अचर है। यह कथन प्रत्येक अदिश के लिए सदैव सत्य नहीं है। उदाहरणाथर्, गतिज उफजार् घूणर्न के अंतगर्त अदिश है, परंतु यह आपेक्ष्िाक गतियों में निदेर्श प्रेफमों के लिए अचर नहीं है, अथवा इस दृष्िट से तो द्रव्यमान भी अचर नहीं है। 7ण् किसी वियुक्त निकाय के वुफल आवेश का संरक्षण एक ऐसा गुणधमर् है जो ¯बदु 6 के अंतगर्त आवेश की अदिश प्रकृति पर निभर्र नहीं करता। संरक्षण किसी दिए गए निदेर्श प्रेफम में समय की अपरिवतर्नीयता की ओर संकेत करता है। कोइर् राश्िा अदिश होते हुए भी संरक्ष्िात नहीं हो सकती ;किसी अप्रत्यास्थ संघ‘ में गतिज ऊजार् की भाँतिद्ध। इसके विपरीत, सदिश राश्िा का संरक्षण भी हो सकता है ;उदाहरण के लिए किसी वियुक्त निकाय का कोणीय संवेग संरक्षणद्ध। 8ण् वैद्युत आवेश का क्वांटमीकरण प्रकृति का मूल नियम है जिसकी अभी तक व्याख्या नहीं की जा सकी है। रोचक तथ्य यह है कि संहति के क्वांटमीकरण का कोइर् सदृश ;अनुरूपद्ध नियम नहीं है। 9ण् अध्यारोपण सि(ांत को सुस्पष्ट नहीं मानना चाहिए अथवा इसे सदिशों के योग के नियम के समान नहीं मानना चाहिए। यह सि(ांत दो बातें बताता हैः किसी आवेश पर दूसरे आवेश के कारण बल किन्हीं अन्य आवेशों की उपस्िथति के कारण प्रभावित नहीं होता तथा यहाँ भौतिकी कोइर् अतिरिक्त त्रिा - पिंड, चतुः - पिंड आदि बल नहीं होते जो केवल तभी उत्पन्न होते हैं जब दो से अिाक आवेश हों। 10ण् किसी विविक्त आवेश विन्यास के कारण विविक्त आवेशों की अवस्िथति पर विद्युत क्षेत्रा परिभाष्िात नहीं है। संतत आयतन आवेश वितरण के लिए यह वितरण में किसी भी ¯बदु पर परिभाष्िात होता है। किसी पृष्ठीय आवेश वितरण के लिए विद्युत क्षेत्रा पृष्ठ के आर - पार विच्िछन्न होता है। 11ण् किसी आवेश विन्यास जिसमें वुफल आवेश शून्य है, के कारण सभी बिंदुओं पर विद्युत क्षेत्रा शून्य नहीं होताऋ उन दूरियों के लिए जो आवेश विन्यास के आकार की तुलना में बड़ी हैं, 2इसके क्षेत्रा में कमी 1ध्त से भी अध्िक तीव्र गति से होती है, जो कि किसी एकल आवेश के विद्युत क्षेत्रा की विशेषता है। एक वैद्युत द्विधु्रव इस तथ्य का एक सरलतम उदाहरण है। अभ्यास 1ण्1 वायु में एक - दूसरे से 30 बउ दूरी पर रखे दो छोटे आवेश्िात गोलों पर क्रमशः 2 × 10−7ब् तथा 3 × 10−7 ब् आवेश हैं। उनके बीच कितना बल है? 1ण्2 0ण्4 - ब् आवेश के किसी छोटे गोले पर किसी अन्य छोटे आवेश्िात गोले के कारण वायु में 0ण्2 छ बल लगता है। यदि दूसरे गोले पर 0ण्8 - ब् आवेश हो तो ;ंद्ध दोनों गोलों के बीच कितनी दूरी है? ;इद्ध दूसरे गोले पर पहले गोले के कारण कितना बल लगता है? 1ण्3 जाँच द्वारा सुनिश्िचत कीजिए कि ाम2ध्ळ उमउच विमाहीन है। भौतिक नियतांकों की सारणी देखकर इस अनुपात का मान ज्ञात कीजिए। यह अनुपात क्या बताता है? 1ण्4 ;ंद्ध फ्किसी वस्तु का वैद्युत आवेश क्वांटीकृत है,य् इस प्रकथन से क्या तात्पयर् है? ;इद्ध स्थूल अथवा बड़े पैमाने पर वैद्युत आवेशों से व्यवहार करते समय हम वैद्युत आवेश के क्वांटमीकरण की उपेक्षा वैफसे कर सकते हैं? 1ण्5 जब काँच की छड़ को रेशम के टुकड़े से रगड़ते हैं तो दोनों पर आवेश आ जाता है। इसी प्रकार की परिघटना का वस्तुओं के अन्य युग्मों में भी प्रेक्षण किया जाता है। स्पष्ट कीजिए कि यह प्रेक्षण आवेश संरक्षण नियम से किस प्रकार सामंजस्य रखता है। 1ण्6 चार ¯बदु आवेश ु। त्र 2 - ब्ए ुठ त्र दृ 5 - ब्ए ुब् त्र 2 - ब् तथा ुक् त्र दृ 5 - ब्ए 10 बउ भुजा के किसी वगर् ।ठब्क् के शीषो± पर अवस्िथत हैं। वगर् के केंद्र पर रखे 1 - ब् आवेश पर लगने वाला बल कितना है? 1ण्7 ;ंद्ध स्िथरवैद्युत क्षेत्रा रेखा एक संतत वक्र होती है अथार्त कोइर् क्षेत्रा रेखा एकाएक नहीं टूट सकती। क्यों? ;इद्ध स्पष्ट कीजिए कि दो क्षेत्रा रेखाएँ कभी भी एक - दूसरे का प्रतिच्छेदन क्यों नहीं करतीं? 1ण्8 दो ¯बदु आवेश ु। त्र 3 - ब् तथा ुठ त्र दृ 3 - ब् निवार्त में एक - दूसरे से 20 बउ दूरी पर स्िथत हैं। ;ंद्ध दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा ।ठ के मध्य ¯बदु व् पर विद्युत क्षेत्रा कितना है? ;इद्ध यदि 1ण्5 × 10−9 ब् परिमाण का कोइर् )णात्मक परीक्षण आवेश इस ¯बदु पर रखा जाए तो यह परीक्षण आवेश कितने बल का अनुभव करेगा? 1ण्9 किसी निकाय में दो आवेश ु। त्र 2ण्5 × 10−7 ब् तथा ुठ त्र दृ2ण्5 × 10−7 ब् क्रमशः दो ¯बदुओं । रू ;0ए 0ए दृ15 बउद्ध तथा ठ रू ;0ए 0ए ़15 बउद्ध पर अवस्िथत हैं। निकाय का वुफल आवेश तथा वैद्युत द्विध्रुव आघूणर् क्या है? 1ण्10 4 × 10−9 ब् उ द्विधु्रव आघूणर् का कोइर् वैद्युत द्विधु्रव 5 × 104 छ ब्−1 परिमाण के किसी एकसमान विद्युत क्षेत्रा की दिशा से 30° पर संरेख्िात है। द्विधु्रव पर कायर्रत बल आघूणर् का परिमाण परिकलित कीजिए। 1ण्11 ऊन से रगड़े जाने पर कोइर् पाॅलीथीन का टुकड़ा 3 × 10−7 ब् के )णावेश से आवेश्िात पाया गया। ;ंद्ध स्थानांतरित ;किस पदाथर् से किस पदाथर् मेंद्ध इलेक्ट्राॅनों की संख्या आकलित कीजिए। ;इद्ध क्या ऊन से पाॅलीथीन में संहति का स्थानांतरण भी होता है? 1ण्12 ;ंद्ध दो विद्युतरोधी आवेश्िात ताँबे के गोलों । तथा ठ के वेंफद्रों के बीच की दूरी 50 बउ है। यदि दोनों गोलों पर पृथक - पृथक आवेश 6ण्5 × 10−7 ब् हैं, तो इनमें पारस्परिक स्िथरवैद्युत प्रतिकषर्ण बल कितना है? गोलों के बीच की दूरी की तुलना में गोलों । तथा ठ की त्रिाज्याएँ नगण्य हैं। ;इद्ध यदि प्रत्येक गोले पर आवेश की मात्रा दो गुनी तथा गोलों के बीच की दूरी आधी कर दी जाए तो प्रत्येक गोले पर कितना बल लगेगा? 1ण्13 मान लीजिए अभ्यास 1ण्12 में गोले । तथा ठ साइश में सवर्सम हैं तथा इसी साइश का कोइर् तीसरा अनावेश्िात गोला पहले तो पहले गोले के संपवर्फ, तत्पश्चात दूसरे गोले के संपवर्फ में लाकर, अंत में दोनों से ही हटा लिया जाता है। अब । तथा ठ के बीच नया प्रतिकषर्ण बल कितना है? 1ण्14 चित्रा 1ण्33 में किसी एकसमान स्िथरवैद्युत क्षेत्रा मंे तीन आवेश्िात कणों के पथचिÉ ;जतंबोद्ध दशार्ए गए हैं। तीनों आवेशों के चिÉ लिख्िाए। इनमें से किस कण का आवेश - संहति अनुपात ;ुध्उद्ध अिाकतम है? चित्रा 1ण्33 1ण्15 एकसमान विद्युत क्षेत्रा म् त्र 3 × 103 î छध्ब् पर विचार कीजिए। ;ंद्ध इस क्षेत्रा का 10 बउ भुजा के वगर् के उस पाश्वर् से जिसका तल ल्र तल के समांतर है, गुजरने वाला फ्रलक्स क्या है? ;इद्ध इसी वगर् से गुजरने वाला फ्रलक्स कितना है यदि इसके तल का अभ्िालंब ग.अक्ष से 60° का कोण बनाता है? 1ण्16 अभ्यास 1ण्15 के एकसमान विद्युत क्षेत्रा का 20 बउ भुजा के किसी घन से ;जो इस प्रकार अभ्िाविन्यासित है कि उसके पफलक निदेर्शांक तलों के समांतर हैंद्ध कितना नेट फ्रलक्स गुजरेगा? 1ण्17 किसी काले बाॅक्स के पृष्ठ पर विद्युत क्षेत्रा की सावधानीपूवर्क ली गइर् माप यह संकेत देती है कि बाॅक्स के पृष्ठ से गुजरने वाला नेट फ्रलक्स 8ण्0 × 103 छउ2ध्ब् है। ;ंद्ध बाॅक्स के भीतर नेट आवेश कितना है? ;इद्ध यदि बाॅक्स के पृष्ठ से नेट बहिमर्ुखी फ्रलक्स शून्य है तो क्या आप यह निष्कषर् निकालेंगे कि बाॅक्स के भीतर कोइर् आवेश नहीं है? क्यों, अथवा क्यों नहीं? 1ण्18 चित्रा 1ण्34 में दशार्ए अनुसार 10 बउ भुजा के किसी वगर् के केंद्र से ठीक 5 बउ ऊँचाइर् पर कोइर् ़10 - ब् आवेश रखा है। इस वगर् से गुजरने वाले वैद्युत फ्रलक्स का परिमाण क्या है? ;संकेत: वगर् को 10 बउ किनारे के किसी घन का एक पफलक मानिए।द्ध चित्रा 1ण्34 भौतिकी 1ण्19 2ण्0 - ब् का कोइर् ¯बदु आवेश किसी किनारे पर 9ण्0 बउ किनारे वाले किसी घनीय गाउसीय पृष्ठ के केंद्र पर स्िथत है। पृष्ठ से गुजरने वाला नेट फ्रलक्स क्या है? 1ण्20 किसी ¯बदु आवेश के कारण उस ¯बदु को केंद्र मानकर खींचे गए 10 बउ त्रिाज्या के गोलीय गाउसीय पृष्ठ पर वैद्युत फ्रलक्स दृ1ण्0 × 103 छउ2ध्ब्। ;ंद्ध यदि गाउसीय पृष्ठ की त्रिाज्या दो गुनी कर दी जाए तो पृष्ठ से कितना फ्रलक्स गुजरेगा? ;इद्ध ¯बदु आवेश का मान क्या है? 1ण्21 10 बउ त्रिाज्या के चालक गोले पर अज्ञात परिणाम का आवेश है। यदि गोले के वेंफद्र से 20 बउ दूरी पर विद्युत क्षेत्रा 1ण्5 × 103 छध्ब् त्रिाज्यतः अंतमर्ुखी ;तंकपंससल पदूंतकद्ध है तो गोले पर नेट आवेश कितना है? 1ण्22 2ण्4 उ व्यास के किसी एकसमान आवेश्िात चालक गोले का पृष्ठीय आवेश घनत्व 80ण्0 - ब्ध्उ2 है। ;ंद्ध गोले पर आवेश ज्ञात कीजिए। ;इद्ध गोले के पृष्ठ से निगर्त वुफल वैद्युत फ्रलक्स क्या है? 1ण्23 कोइर् अनंत रैख्िाक आवेश 2 बउ दूरी पर 9 × 104 छ ब्−1 विद्युत क्षेत्रा उत्पन्न करता है। रैख्िाक आवेश घनत्व ज्ञात कीजिए। 1ण्24 दो बड़ी, पतली धातु की प्लेटें एक - दूसरे के समानांतर एवं निकट हैं। इनके भीतरी पफलकों पर, प्लेटों के पृष्ठीय आवेश घनत्वों के चिÉ विपरीत हैं तथा इनका परिमाण 17ण्0 × 10दृ22 ब्ध्उ2 है। ;ंद्ध पहली प्लेट के बाह्य क्षेत्रा में, ;इद्ध दूसरी प्लेट के बाह्य क्षेत्रा में, तथा ;बद्ध प्लेटों के बीच में विद्युत क्षेत्रा म् का परिमाण परिकलित कीजिए। अतिरिक्त प्रश्न 1ण्25 मिलिकन तेल बूँद प्रयोग में 2ण्55 × 104 छ ब्−1 के नियत विद्युत क्षेत्रा के प्रभाव में 12 इलेक्ट्राॅन आिाक्य की कोइर् तेल बूँद स्िथर रखी जाती है। तेल का घनत्व 1ण्26 ह बउ−3 है। बूँद की त्रिाज्या का आकलन कीजिए ;ह त्र 9ण्81 उ ेदृ2य म त्र 1ण्60 × 10दृ19 ब्द्ध। 1ण्26 चित्रा 1ण्35 में दशार्ए गए वक्रों में से कौन संभावित स्िथरवैद्युत क्षेत्रा रेखाएँ निरूपित नहीं करते? चित्रा 1ण्35 1ण्27 दिव्फस्थान के किसी क्षेत्रा में, विद्युत क्षेत्रा सभी जगह ्र.दिशा के अनुदिश है। परंतु विद्युत क्षेत्रा का परिमाण नियत नहीं है, इसमें एकसमान रूप से ्र.दिशा के अनुदिश 105 छ ब्दृ1 प्रति मीटर की दर से वृि होती है। वह निकाय जिसका )णात्मक ्र.दिशा में वुफल द्विधु्रव आघूणर् 10−7 ब् उ के बराबर है, कितना बल तथा बल आघूणर् अनुभव करता है? 1ण्28 ;ंद्ध किसी चालक । जिसमें चित्रा 1ण्36 ;ंद्ध में दशार्ए अनुसार कोइर् कोटर/गुहा ;ब्ंअपजलद्ध है, को फ आवेश दिया गया है। यह दशार्इए कि समस्त आवेश चालक के बाह्य पृष्ठ पर प्रतीत होना चाहिए। ;इद्ध कोइर् अन्य चालक ठ जिस पर आवेश ु है, को कोटर/गुहा ;ब्ंअपजलद्ध में इस प्रकार धँसा दिया जाता है कि चालक ठ चालक । से विद्युतरोधी रहे। यह दशार्इए कि चालक । के बाह्य पृष्ठ पर वुफल आवेश फ ़ ु है ¹चित्रा 1ण्36 ;इद्धह्। ;बद्ध किसी सुग्राही उपकरण को उसके पयार्वरण के प्रबल स्िथरवैद्युत क्षेत्रों से परिरक्ष्िात किया जाना है। संभावित उपाय लिख्िाए। चित्रा 1ण्36 1ण्29 किसी खोखले आवेश्िात चालक में उसके पृष्ठ पर कोइर् छिद्र बनाया गया है। यह दशार्इए कि छिद्र में विद्युत क्षेत्रा ;σध्2ε0द्ध द६ है, जहाँ द६ अभ्िालंबवत दिशा में बहिमर्ुखी एकंाक सदिश है तथा σ छिद्र के निकट पृष्ठीय आवेश घनत्व है। 1ण्30 गाउस नियम का उपयोग किए बिना किसी एकसमान रैख्िाक आवेश घनत्व λ के लंबे पतले तार के कारण विद्युत क्षेत्रा के लिए सूत्रा प्राप्त कीजिए ¹संकेत: सीधे ही वूफलाॅम नियम का उपयोग करके आवश्यक समाकलन का मान निकालिएह्। 1ण्31 अब ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्वयं प्रोटाॅन एवं न्यूट्राॅन ;जो सामान्य द्रव्य के नाभ्िाकों का निमार्ण करते हैंद्ध और अिाक मूल इकाइयों जिन्हें क्वावर्फ कहते हैं, के बने हैं। प्रत्येक प्रोटाॅन तथा न्यूट्राॅन तीन क्वाको± से मिलकर बनता है। दो प्रकार के क्वावर्फ होते हैं: ‘अप’ क्वावर्फ ;न द्वारा निदिर्ष्टद्ध जिन पर ़;2ध्3द्ध म आवेश तथा ‘डाउन’ क्वावर्फ ;क द्वारा निदिर्ष्टद्ध जिन पर ;दृ1ध्3द्ध म आवेश होता है, इलेक्ट्राॅन से मिलकर सामान्य द्रव्य बनाते हैं। ;वुफछ अन्य प्रकार के क्वावर्फ भी पाए गए हैं जो भ्िान्न असामान्य प्रकार का द्रव्य बनाते हैं।द्ध प्रोटाॅन तथा न्यूट्राॅन के संभावित क्वावर्फ संघटन भौतिकी 1ण्32 ;ंद्ध किसी यादृच्िछक स्िथरवैद्युत क्षेत्रा विन्यास पर विचार कीजिए। इस विन्यास की किसी शून्य - विक्षेप स्िथति ;दनसस.चवपदजए अथार्त् जहाँ म् त्र 0द्ध पर कोइर् छोटा परीक्षण आवेश रखा गया है। यह दशार्इए कि परीक्षण आवेश का संतुलन आवश्यक रूप से अस्थायी है। ;इद्ध इस परिणाम का समान परिमाण तथा चिÉों के दो आवेशों ;जो एक - दूसरे से किसी दूरी पर रखे हैंद्ध के सरल विन्यास के लिए सत्यापन कीजिए। 1ण्33 प्रारंभ में ग.अक्ष के अनुदिश अग चाल से गति करती हुइर् दो आवेश्िात प्लेटों के मध्य क्षेत्रा में उ द्रव्यमान तथा दृु आवेश का एक कण प्रवेश करता है ;चित्रा 1.33 में कण 1 के समानद्ध। प्लेटों की लंबाइर् स् है। इन दोनों प्लेटों के बीच एकसमान विद्युत क्षेत्रा म् बनाए रखा जाता है। दशार्इए कि प्लेट के अंतिम किनारे पर कण का ऊध्वार्ध्र विक्षेप ुम्स्2ध्;2उ अग 2द्ध है। ;कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक के अनुभाग 4ण्10 में व£णत गुरुत्वीय क्षेत्रा में प्रक्षेप्य की गति के साथ इस कण की गति की तुलना कीजिएद्ध। 1ण्34 अभ्यास 1ण्33 में व£णत कण की इलेक्ट्राॅन के रूप में कल्पना कीजिए जिसको अग त्र 2ण्0 × 106 उ ेदृ1 के साथ प्रक्षेपित किया गया है। यदि 0ण्5 बउ की दूरी पर रखी प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्रा म् का मान 9ण्1 × 102 छध्ब् हो तो ऊपरी प्लेट पर इलेक्ट्राॅन कहाँ टकराएगा? ;द्यमद्यत्र1ण्6 × 10दृ19 ब्ए उम त्र 9ण्1 × 10दृ31 ाहण्द्ध

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