विषय 11आध्ुनिकीकरण के रास्ते उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में चीन का पूवीर् एश्िाया पर प्रभुत्व था। लंबी परंपरा के वारिसछींग राजवंश की सत्ता अक्षुण्ण जान पड़ती थी, जबकि नन्हा - सा द्वीप - देश जापान अलग - थलग पड़ा हुआ प्रतीत होता था। इसके बावजूद, वुफछ ही दशकों के भीतर चीन अशांति की गिरफ्ऱत में आ गया और औपनिवेश्िाक चुनौती का सामना नहीं कर पाया। छींग राजवंश के हाथ से राजनीतिक नियंत्राण जाता रहा, वह कारगर सुधार करने में असपफल रहा और देश गृहयु( की लपटों में आ गया। दूसरी ओर जापान एक आधुनिक राष्ट्र - राज्य के निमार्ण में, औद्योगिक अथर्तंत्रा की रचना में और यहाँ तक कि ताइवान ;1895द्ध तथा कोरिया ;1910द्ध को अपने में मिलाते हुए एक औपनिवेश्िाक साम्राज्य वफायम करने में सपफल रहा। उसने अपनी संस्कृति और अपने आदशोर्ं की स्रोत - भूमि चीन को 1894 में हराया और 1905 में रूस जैसी यूरोपीय शक्ित को पराजित करने में वफामयाब रहा। चीनियों की प्रतिवि्रफया धीमी रही और उनके सामने कइर् कठिनाइयाँ आईं। आधुनिक दुनिया का सामना करने के लिए उन्होंने अपनी परंपराओं को पुनः परिभाष्िात करने का प्रयास किया। साथ ही अपनी राष्ट्र - शक्ित का पुननिर्मार्ण करने और पश्िचमी व जापानी नियंत्राण से मुक्त होने की कोश्िाश की। उन्होंने पाया कि असमानताओं को हटाने और अपने देश के पुननिर्मार्ण के दुहरे मवफसद को वे क्रांति के ज़्ारिये ही हासिल कर सकते हैं। 1949 में चीनी साम्यवादी पाटीर् ने गृहयु( में जीत हासिल की। लेकिन 1970 के दशक के आख्िार तक चीनी नेताओं को लगने लगा कि देश की विचारधारात्मक व्यवस्था उसकी आथ्िार्क वृि और विकास में बाधा डाल रही है। इस वजह से अथर्व्यवस्था में व्यापक सुधर किए गए। यद्यपि इससे पूँजीवाद और मुक्त बाज़्ाार की वापसी हुइर्, तथापि साम्यवादी दल का राजनीतिक नियंत्राण अब भी बरवफरार रहा। जापान उन्नत औद्योगिक राष्ट्र बन गया, लेकिन साम्राज्य की लालसा ने उसे यु( में झोंक दिया। 1945 में आंग्ल - अमरीकी सैन्यशक्ित के सामने उसे हार माननी पड़ी। अमरीकी आिापत्य के साथ अिाक लोकतांत्रिाक व्यवस्था की शुरुआत हुइर् और 1970 के दशक तक जापान अपनी अथर्व्यवस्था का पुननिर्मार्ण करके एक प्रमुख आथ्िार्क शक्ित बनकर उभरा। जापान का आधुनिकीकरण का सप़्ाफर पूँजीवाद के सि(ांतों पर आधारित था और यह सप़्ाफर उसने ऐसी दुनिया में तय किया, जहाँ पश्िचमी उपनिवेशवाद का प्रभुत्व था। दूसरे देशों में जापान के विस्तार को पश्िचमी प्रभुत्व का विरोध करने और एश्िाया को आज़्ााद कराने की माँग के आधार पर उचित ठहराया गया। जापान में जिस तेज़्ाी से विकास हुआ वह जापानी संस्थाओं और समाज में परंपरा की सुदृढ़ता, उनकी सीखने की शक्ित और राष्ट्रवाद की तावफत को दशार्ता है। चीन और जापान में इतिहास लेखन की लंबी परंपरा रही है, क्योंकि इन देशों में यह मानाजाता है कि इतिहास शासकों के लिए महत्त्वपूणर् मागर्दशर्क का काम करता है। ऐसा समझा जाता है कि अतीत वे मानक पेश करता है, जिनके आधार पर शासकों का आकलन किया ’जापान में वुफलनाम व्यक्ितगत नाम के पहले लिखा जाता है। जा सकता है। इसीलिए शासकों ने अभ्िालेखों की देखरेख और राजवंशों का इतिहास लिखने के लिए सरकारी विभागों की स्थापना की। सिमा छियन ;ैपउं फपंदए 145 - 90 इर्सा पूवर्द्ध को प्राचीन चीन का महानतम इतिहासकार माना जाता है। जापान में भी चीनी सांस्वृफतिकप्रभाव के चलते इतिहास को ऐसा ही महत्त्व दिया जाने लगा। मेजी सरकार के शुरुआती अध्ि नियमों में से एक था, 1869 में एक ब्यूरो की स्थापना, जिसका काम था अभ्िालेखों को इकऋा करना। इसका एक अन्य उद्देश्य मेजी पुनस्थार्पना के बारे में मेजी विजेताओं के नज़्ारिये से लेखन करना था। लिख्िात शब्द का बहुत सम्मान था और साहित्ियक कौशल को बहुमूल्यसमझा जाता था। इसका नतीजा यह रहा है कि भांति - भांति के लिख्िात ड्डोत उपलब्ध हैंःसरकारी इतिहास, विद्वत्तापूणर् लेखन, लोकपि्रय साहित्य और धामिर्क परचे। मुद्रांकन औरप्रकाशन पूवर् आधुनिक काल में महत्त्वपूणर् उद्योग थे और यह संभव है कि 18वीं शताब्दी के चीन और जापान की किसी किताब के वितरण का पता लगाया जा सके। आधुनिक विद्वानों ने इस सामग्री का इस्तेमाल नये और भ्िान्न तरीवफों से किया है। आधुनिक विद्वानों ने चीनी बौिकों जैसे लिमांग छिचाओ ;स्पंद फपबींवद्ध या जापान में आधुनिक इतिहास के पथप्रदशर्कों में से एक, वुफमे वुफनीताके ;ज्ञनउम ज्ञनदपजंामए 1839 - 1931द्ध जैसे बौिकों के काम को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा इन्होंने पहले के यूरोपीय मुसाप्ि़ाफरों के लेखन, जैसे इटली के माकोर् पोलो ;1254 - 1324द्ध जो चीन में 1274 से 1290 तक रहे, चीन में जैसूट पादरी मैटियो रिक्की ;डंजमव त्पबबपए 1552 - 1610द्ध और जापान में लूइर् प़्ाफराॅय ;स्नपे थ्तवपेए 1532 - 1597द्ध जैसे बुिजीवियों के काम को भी आगे बढ़ाया है। इन सभी ने इन देशों के बारे में समृ( जानकारियाँ दी हैं। आधुनिक विश्व को 19वीं सदी के इर्साइर् मिशनरियों के लेखन से भी प़्ाफायदे हुए, जिनके काम से इन देशों के बारे में समझ बनाने के लिए बहुमूल्य सामग्री मिलती है।अंग्रेज़्ाी में चीनी - जापानी इतिहास पर परिष्कृत पांडित्यपूणर् काम का विशाल भंडार उपलब्ध है। चीनी सभ्यता में विज्ञान के इतिहास पर जोज़्ापफ नीडहम ;श्रवेमची छममकींउद्ध के अत्यंत महत्त्वपूणर् कायर् और जापानी इतिहास और संस्कृति पर जाॅजर् सैन्सम के कायर् से इसकी शुरुआत हुइर्। हाल के वषोर्ं में चीनी और जापानी विद्वानों की लिखी चीज़्ों अंग्रेज़्ाी में अनूदित हुइर् हैं। उनमें से वुफछ विद्वान तो विदेशों में ही पढ़ाते हैं और अंग्रेज़्ाी में लिखते हैं। 1980 से कइर् चीनी विद्वान जापान में ही काम करते और जापानी में लिखते आए हैं। मतलब यह किहमारे पास विश्व के कइर् हिस्सों से आनेवाला विद्वत्तापूणर् लेखन उपलब्ध है, जो हमें इन देशों का अिाक विस्तृत और गहन परिचय देता है। नाइतो कोनन’ ;छंपजव ज्ञवदंदद्ध 1866.1934 ये चीन पर काम करने वाले प्रमुख जापानी विद्वान थे, जिनके लेखन ने अन्य जापानी लेखकों को प्रभावित किया। जापान में चीन का अध्ययन करने की लंबी परंपरा रही है। नाइतो ने अपने काम में पश्िचमी इतिहास - लेखन की नयी तकनीकों तथा अपने पत्राकारिता के अनुभवों का इस्तेमाल किया। उन्होंने 1907 में क्योतो विश्वविद्यालय में प्राच्य अध्ययन का विभाग बनाने में मदद की। श्िानाराॅन ;ैीपदंतवदद्ध ;चीन पर, 1914द्ध में उन्होंने तवर्फ दिया कि गणतांत्रिाक सरकार के ज़्ारिये चीनी सुंग राजवंश ;960 - 1279द्ध के काल से चले आ रहेअभ्िाजात वगर् के नियंत्राण और वेंफद्रीय सत्ता को खत्म कर सकते हैं। उनका मानना था कि स्थानीय समाज को पुनजीर्वित करने का यही रास्ता है और सुधार यहीं से शुरू होने चाहिए थे। उन्हें चीनी इतिहास में ऐसी क्षमताएँ नज़्ार आईं जो चीन को आधुनिक और लोकतांत्रिाक बना सकती थीं। उनके मुताबिक जापान चीन में एक अहम भूमिका निभा सकता था लेकिन वे चीनी राष्ट्रवाद की शक्ित का सही आकलन नहीं कर पाए। परिचय चीन और जापान के भौतिक भूगोल में कापफी अंतर है। चीन विशालकाय महाद्वीपीय देश है जिसमें कइर् तरह की जलवायु वाले क्षेत्रा हैंः मुख्य क्षेत्रा में 3 प्रमुख नदियाँ हैंः पीली नदी ;हुआंग हेद्ध, यांग्त्सी नदी ;छांग जिआंग - दुनिया की तीसरी सबसे लंबी नदीद्ध, और पलर् नदी। देश का बहुत सा हिस्सा पहाड़ी है। प्रशांत महासागर रू स मंचूरिया होकाइदो कज़्ााकिस्तान मंगोलिया जापानउत्तरी सागरकोरिया होन्शूजापान तोक्यो दक्ष्िाणकोरिया क्योतो हिरोश्िामा श्िाकोवूफ नागासाकी क्यूशू पीत सागर ची न शंघाइर् पूवीर् चीन सागर जापानी क्षेत्रा भा र त 1941 ताइर्वान हान सबसे प्रमुख जातीय समूह है और प्रमुख भाषा है चीनी ;पुतोंगहुआद्ध लेकिन कइर् और राष्ट्रीयताएँ हैं, जैसे कि उइघुर, हुइर्, मांचू और तिब्बती। वैंफटनीज़़्ााओद्ध कीा वैंफटन ;गुआंगज्बोली - उए और शंघाइर्नीज ;शंघाइर् की बोली - वूद्ध जैसी बोलियों के अलावा कइर् अल्पसंख्यक़भाषाएँ भी बोली जाती हैं। चीनी खानों में क्षेत्राीय विविधता की झलक मिलती है और इसमें कम से कम चार प्रमुख तरह के खाने देखे जा सकते हैं। सबसे प्रसि( पाकप्रणाली दक्ष्िाणी या वेंफटोनी है, जो वैंफटन व उसके आंतरिक क्षेत्रों की है। इसकी प्रसिि इस बात से है कि विदेशों में रहनेवाले ज़्यादातर चीनी वैंफटन प्रांत से आते हैं। जाना - माना डिम सम ;शाब्िदक अथर् दिल को छूनाद्ध यहीं का खाना है जो गुंथे हुए आटे को सब्ज़्ाी आदि भरकर उबाल कर बनाए गए व्यंजन जैसा है। उत्तर में गेहूँ मुख्य आहार है, जबकि शेचुआँ ;ै्रमबीनंदद्ध में प्राचीन काल में बौ( भ्िाक्षुओं द्वारा लाए गए मसाले और रेशम मागर् के ज़्ारिए पंद्रहवीं सदी में पुतर्गाली व्यापारियों द्वारा लाइर् गइर् मिचर् के चलते खासा झालदार और तीखा खाना मिलता है। पूवीर् चीन में चावल और गेहूँ, दोनों खाए जाते हैं। मानचित्रा 1रू पूवर् एश्िाया। ’ छपाइर् लकड़ी के ब्लाॅकों से की जाती थी। जापानी लोग यूरोपीय छपाइर् को पसंद नहीं करते थे। इसके विपरीत, जापान एक द्वीप शृंखला है जिसमें चार सबसे बड़े द्वीप हैं होंशू ;भ्वदेीनद्ध, क्यूशू ;ज्ञलनेीनद्ध, श्िाकोवूफ ;ैीपावानद्ध और होकाइदो ;भ्वाांपकवद्ध। ओकिनावा ;वपदंूंदद्ध द्वीपों की शृंखला सबसे दक्ष्िाण में है, लगभग बहामास वाले ही अक्षांश पर। मुख्य द्वीपों की 50 प्रतिशत से अिाक ज़्ामीन पहाड़ी है। जापान बहुत ही सिय भूकम्प क्षेत्रा में है। इन भौगोलिक परिस्िथतियों ने वहाँ की वास्तुकला को प्रभावित किया है। अिाकतर जनसंख्या जापानी है लेकिन वुफछ आयनू ;।पदनद्ध अल्पसंख्यक और वुफछ कोरिया के लोेग हैं जिन्हें श्रमिक मज़्ादूर के रूप में उस समय जापान लाया गया था जब कोरिया जापान का उपनिवेश था। जापान में पशुपालन की परंपरा नहीं है। चावल बुनियादी पफसल है और मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत। कच्ची मछली साश्िामी या सूशी अब दुनिया भर में बहुत लोकपि्रय हो गइर् है क्योंकि इसे बहुत सेहतमंद माना जाता है। जापान राजनीतिक व्यवस्था जापान पर क्योतो में रहनेवाले सम्राट का शासन हुआ करता था, लेकिन बारहवीं सदी आते - आतेअसली सत्ता शोगुनों के हाथ में आ गइर् जो सै(ांतिक रूप से राजा के नाम पर शासन करते थे। 1603 से 1867 तक तोवुफगावा परिवार के लोग शोगुनपद पर कायम थे। देश 250 भागों में विभाजित था जिनका शासन दैम्यो चलाते थे। शोगुन दैम्यो पर नियंत्राण रखते थे। शोगुन दैम्यो को लंबे अरसे के लिए राजधानी एदो ;आधुनिक तोक्योद्ध में रहने का आदेश देते थे ताकि उनकी तरप़्ाफ से कोइर् खतरा न रहे। शोगुन प्रमुख शहरों और खदानों पर भी नियंत्राण रखते थे। सामुराइर् ;यो(ा वगर्द्ध शासन करनेवाले वुफलीन थे और वे शोगुन तथा दैम्यो की सेवा में थे। 16वीं शताब्दी के अंतिम भाग में तीन परिवतर्नों ने आगे के विकास की तैयारी की। पहला, किसानों से हथ्िायार ले लिए गए, और अब केवल सामुराइर् तलवार रख सकते थे। इससे शान्ित और व्यवस्था बनी रही जबकि पिछली शताब्दी में इस वजह से अक्सर लड़ाइयाँ होती रहती थीं। दूसरा, दैम्यो को अपने क्षेत्रों की राजधानियों में रहने के आदेश दिए गए और उन्हें काप़्ाफी हद तकस्वायत्तता प्रदान की गइर्। तीसरा, मालिकों और करदाताओं का निधार्रण करने के लिए ज़्ामीन का सवेर्क्षण किया गया तथा उत्पादकता के आधार पर भूमि का वगीर्करण किया गया। इन सबका मिलाजुला मवफसद राजस्व के लिए स्थायी आधार बनाना था। दैम्यो की राजधानियाँ बड़ी हुइर्ं, जिसके चलते 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में एदो दुनिया का सबसे अिाक जनसख्ंया वाला शहर बन गया। इसके अलावा ओसाका और क्योतो अन्य बड़े शहरों के रूप में उभरे। कम से कम छह ऐसे गढ़ वाले शहर उभरे जहाँ जनसंख्या 50,000 से अिाक थी। इसकी तुलना में उस समय के ज़्यादातर यूरोपीय देशों में केवल एक बड़ा शहरथा। इससे वाण्िाज्ियक अथर्व्यवस्था का विकास हुआ और वित्त और ट्टण की प्रणालियाँ स्थापित हुइर्ं। व्यक्ित के गुण उसके पद से अिाक मूल्यवान समझे जाने लगेे। शहरों में जीवंत संस्वृफति ख्िालने लगी जहाँ तेज़्ाी से बढ़ते व्यापारी वगर् ने नाटक और कलाओं को प्रोत्साहन दिया। चूंकि लोगों को पढ़ने का शौवफ था, होनहार लेखकों के लिए यह संभव हो सका कि वे केवल लेखन से अपनी जीविका चला लें। एदो में लोग नूडल की कटोरी की वफीमत पर किताब किराये पर ले सकते थे। इससे यह पता चलता है कि छपाइर्’ किस स्तर पर होती थी और पढ़ना कितना लोकपि्रय था। जापान अमीर देश समझा जाता था, क्योंकि वह चीन से रेशम और भारत से कपड़ा जैसी विलासी वस्तुएँ आयात करता था। इन आयातों के लिए चाँदी और सोने में वफीमत अदा करने से अथर्व्यवस्था पर भार ज़्ारूर पड़ा जिसकी वजह से तोवुफगावा ने कीमती धातुओं के नियार्त पर रोक लगा दी। उन्होंने क्योतो के निश्िाजिन में रेशम उद्योग के विकास के लिए भी कदम उठाये जिससे रेशम का आयात कम किया जा सके। निश्िाजिन का रेशम दुनिया भर में बेहतरीन रेशम माना जाने लगा। मुद्रा का बढ़ता इस्तेमाल और चावल के शेयर बाजार का ़निमार्ण जैसे अन्य विकास दिखाते हैं कि अथर्तंत्रा नयी दिशाओं में विकसित हो रहा था। सामाजिक और बौिक बदलावोंμ मिसाल के लिए, प्राचीन जापानी साहित्य के अध्ययन - ने लोगों को यह सवाल उठाने पर मजबूर किया कि जापान पर चीन का प्रभाव किस हद तक है और यह तवर्फ पेश किया गया कि जापानी होने का सार चीन के संपकर् में आने से बहुत पहलेका है। यह सार की कहानी जैसे उच्च प्राचीन साहित्य में और जापान की उत्पिा की पौराण्िाक कथाओं में देखी जा सकती है, ये मिथकीय कहानियाँ बताती हैं कि इन द्वीपों को भगवान ने बनायाथा और सम्राट सूयर् देवी के उत्तरािाकारी थे। गेंजी की कथा मुरासाकी श्िाकिबु ;डनतंेंाप ैीपापइनद्धद्ध द्वारा लिखी गइर् हेआन ;भ्मपंदद्ध राजदरबार की यह काल्पनिक डायरी दि टेल आॅपफ दि गंेजी जापानी साहित्य में प्रमुख कथाकृति बन गइर्। इस काल में मुरासाकी जैसी अनेक लेख्िाकाएँ उभरीं जिन्होंने जापानी लिपि का इस्तेमाल किया, जबकि पुरुषों ने चीनी लिपि का। चीनी लिपि का इस्तेमाल श्िाक्षा और सरकार में होता था। इस उपन्यास में वुफमार गेंजी की रोमांचक ज्ि़ांदगी दशार्यी गइर् और हेआन राजदरबार के अभ्िाजात वातावरण की जीती जागती तस्वीर पेश की गइर्। इसमें यह भी दिखाया गया है कि औरतों को अपने पति चुनने और अपनी ज्ि़ांदगी जीने की कितनी आज़्ाादी थी। मेजी पुनस्थार्पना 1867 - 68 में मेजी वंश के नेतृत्व में तोवुफगावा वंश का शासन समाप्त किया गया। मेजियों की पुनस्थार्पना के पीछे कइर् कारण थे। देश में तरह - तरह का असंतोष था, साथ ही अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार व वूफटनीतिक संबंधें की भी माँग की जा रही थी। इसी बीच 1853 में अमरीका ने काॅमोडोर मैथ्यू पेरी ;1794 - 1858द्ध को जापानी सरकार से एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने की मांग के साथ भेजा जिसमें जापान ने अमरीका के साथ राजनयिक और व्यापारिक संबंध बनाए। जापान ने अगले साल ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए। जापान चीन के रास्ते में था और अमरीका चीन में एक बड़ा बाज़्ाार देखता था। इसके अलावा अमरीका को प्रशांत महासागर में अपने बेड़ों के लिए इर्ंधन लेने की जगह चाहिए थी। उस समय केवल एक ही पश्िचमी देश जापान के साथ व्यापार करता था। वह था, हाॅलैंड।पेरी के आगमन ने जापानी राजनीति पर महत्त्वपूणर् असर डाला। सम्राट की अचानक अहमियतबढ़ गइर्, जिसे तब तक बहुत कम राजनैतिक सत्ता मिली हुइर् थी। 1868 में एक आंदोलन द्वारा निश्िाजिन क्योतो की एक बस्ती है। 16वीं शताब्दी में वहाँ 31 परिवारों का बुनकर संघ था। 17वीं शताब्दी के आख्िार तक इस समुदाय में 70,000 लोग थे। रेशम उत्पादन पैफला और 1713 में केवल देशी धागा इस्तेमाल करने के आदेश जारी किए गए जिससे उसे और प्रोत्साहन मिला। निश्िाजिन में केवल विश्िाष्ट प्रकार के महंगे उत्पाद बनाए जाते थे। रेशम उत्पादन से ऐसे क्षेत्राीय उद्यमी वगर् का विस्तार हुआ जिन्होंने आगे चलकर तोवुफगावा व्यवस्था को चुनौती दी। जब 1859 में विदेशी व्यापार की शुरुआत हुइर्, जापान से रेशम का नियार्त अथर्व्यवस्था के लिए मुनाप़्ोफ का प्रमुख स्रोत बन गया, एक ऐसे समय में जबकि जापानी अथर्व्यवस्था पश्िचमी वस्तुओं से मुवफाबला करने की कोश्िाश कर रही थी। पेरी का जहाज़्ाः लकड़ी के ब्लाॅक का एक जापानी छापा जापानी जिन्हंे ‘काले जहाज़्ा’ ;इनकी लकड़ी के जोड़ों को कोलतार से सीलबंद किया जाता थाद्ध कहते थे। उन्हें ऐसे चित्रों और काटूर्नों में दिखाया गया है जिनमें ‘अजीबोगरीब’ विदेश्िायों और उनकी आदतों को दशार्या गया है। ये चित्रा जापान के ‘खुलने’ के शक्ितशाली प्रतीक बन गए ;आज विद्वान यह तवर्फ देते हैं कि जापान कभी ‘बंद’ ही नहीं था चूँकि उसकी पूवीर् एश्िाया के व्यापार में भूमिका थी और उसके लोग हालैंड और चीन निवासियो के जरिएं़बाहरी दुनिया के बारे मंेजानते थे।द्ध शोगुन को ज़्ाबरदस्ती सत्ता से हटा दिया गया और सम्राट मेजी को एदो ले आया गया। एदो को राजधानी बना दिया गया और इसका नया नामकरण हुआ, तोक्यो, जिसका मतलब है, ‘पूवीर् राजधानी’। अिाकारीगण और लोग यह जानते थे कि वुफछ यूरोपीय देश भारत व अन्य जगहों पर औपनिवेश्िाक साम्राज्य बना रहे हैं। बि्रतानियों के हाथों चीन की हार ;देख्िाए, पृ.244द्ध की खबरें पैफल रही थीं और इन्हें लोकपि्रय नाटकों में दशार्या भी जा रहा था। इस सबके चलते लोगों में एक असली डर बन रहा था कि जापान भी उपनिवेश बनाया जा सकता है। बहुत से विद्वान और नेता यूरोप के नए विचारों से सीखना चाहते थे बजाए उनकी उपेक्षा करने के, जैसा कि चीन ने किया था। वुफछ अन्य लोग यूरोपीय लोगों को गै़र मानते हुए अपने से दूर रखना चाहते थे हालाँकि वे उनकी नयी तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार थे। वुफछ ने देश को बाहरी दुनिया के लिए धीरे - धीरे और सीमित तरह से खोलने के लिए तवर्फ दिया। सरकार ने पुफकोवुफ क्योहे ;समृ( देश, मज़्ाबूत सेनाद्ध के नारे के साथ नयी नीति का ऐलान किया। उन्होंने यह समझ लिया कि उन्हें अपनी अथर्व्यवस्था का विकास और मज़्ाबूत सेना का निमार्ण करने की ज़्ारूरत है, अन्यथा उन्हें भी भारत की तरह पराधीनता का सामना करना पड़ सकता है। इस कायर् के लिए उन्हें जनता के बीच राष्ट्र की भावना का निमार्ण करने और प्रजा को नागरिक की श्रेणी में बदलने की ज़्ारूरत महसूस हुइर्। इसके साथ ही नयी सरकार ने ‘सम्राट - व्यवस्था’ के पुन£नमार्ण का काम शुरू किया। ;सम्राट व्यवस्था से जापानी विद्वानों का अभ्िाप्राय है एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सम्राट, नौकरशाही और सेना इकट्टेò सत्ता चलाते थे और नौकरशाही व सेना सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे।द्ध राजतांत्रिाक व्यवस्था के नमूनों को समझने के लिए वुफछ अध्िकारियों को यूरोप भेजा गया। सम्राट को सीधे - सीधे सूयर् देवी का वंशज माना गया, लेकिन साथ ही उसे पश्िचमीकरण का नेता भी बनाया गया। सम्राट का जन्मदिन राष्ट्रीय छु‘ी का दिन बन गया, वह पश्िचमी अंदाज़्ा के सैनिक कपड़े पहनने लगा, और उसके नाम से आधुनिक संस्थाएँ स्थापित करने के अध्िनियम जारी किए जाने लगे। 1890 की श्िाक्षासंबंधी राजाज्ञा ने लोगों को पढ़ने, जनता के सावर्जनिक एवं साझे हितों को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया। 1870 के दशक से नयी विद्यालय - व्यवस्था का निमार्ण शुरू हुआ। लड़के और लड़कियों के लिए स्कूल जाना अनिवायर् हो गया, और 1910 तक तवफरीबन ऐसी स्िथति आ गइर् कि स्वू्फल जाने से कोइर् वंचित नहीं रहा। पढ़ाइर् की प़्ाफीस बहुत कम थी। शुरू में पाठ्यचयार् पश्िचमी नमूनों पर आधारित थी लेकिन 1870 के दशक के आते - आते आधुनिक विचारों पर ज़्ाोर देने के साथ - साथ राज्य के प्रति निष्ठा और जापानी इतिहास के अध्ययन पर बल दिया जाने लगा। श्िाक्षा मंत्रालय पाठ्यचयार् पर, किताबों के चयन और श्िाक्षकों के प्रश्िाक्षण पर नियंत्राण रखता था। जिसे नैतिक संस्वृफति का विषय कहा गया उसे पढ़ना ज़्ारूरी था और किताबों में माता पिता के प्रति आदर, राष्ट्र के प्रति वप़्ाफादारी और अच्छे नागरिक बनने की प्रेरणा दी जाती थी। जापानी भाषा एक साथ तीन लिपियों का प्रयोग करती है। इनमें से एक कांजी, जापानियों ने चीनियों सेे छठी शताब्दी में ली। चँूकि उनकी भाषा चीनी भाषा से बहुत अलग है, उन्होंने दो ध्वन्यात्मक वणर्मालाओं का विकास भी कियाμ हीरागाना और कताकाना। हीरागाना नारी सुलभ समझी जाती है क्योंकि हेआन काल में बहुत सी लेख्िाकाएँ इसका इस्तेमाल करती थींμ जैसे कि मुरासाकी। यह चीनी चित्रात्मक चिह्नों और ध्वन्यात्मक अक्षरों ;हीरागाना अथवाकताकानाद्ध को मिलाकर लिखी जाती है। शब्द का प्रमुख भाग कांजी के चिÉ से लिखा जाता है और बाकी का हीरागाना में। ध्वन्यात्मक अक्षरमाला की मौजूदगी के चलते ज्ञान वुफलीन वगोंर् से व्यापक समाज में काप़्ाफी तेज़्ाी से पैफल सका। 1880 के दशक में यह सुझाव दिया गया कि जापानी या तो पूरी तरह से ध्वन्यात्मक लिपि का विकास करें या कोइर् यूरोपीय भाषा अपना लें। दोनो में से वुफछ भी नहीं किया गया। राष्ट्र के एकीकरण के लिए मेजी सरकार ने पुराने गाँवों और क्षेत्राीय सीमाओं को बदल कर नया प्रशासनिक ढाँचा तैयार किया। प्रशासनिक इकाइर् में पयार्प्त राजस्व ज़्ारूरी था जिससे स्थानीय स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएँ जारी रखी जा सवेंफ। साथ ही ये इकाइयाँ सेना के लिए भतीर् वेंफद्रों के काम आ सवंेफ। 20 साल से अिाक उम्र के नौजवानों के लिए वुफछ अरसे के लिए सेना में काम करना अनिवायर् हो गया। एक आधुनिक सैन्य बल तैयार किया गया। कानून व्यवस्था बनाइर् गइर् जो राजनीतिक गुटों के गठन को देख सके, बैठवेंफ बुलाने पर नियंत्राण रख सके, और सख्त सेंसर व्यवस्था बना सके। इन तमाम उपायों में सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा। सेना और नौकरशाही को सीधा सम्राट के निदेर्श में रखा गया। यानि कि संविधान बनने के बावजूद यह दो गुट सरकारी नियंत्राण के बाहर रहे। लोकतांत्रिाक संविधान और आधुनिक सेनाμ इन दो अलग आदशोंर् को महत्व देने के दूरगामी नतीजे हुए। सेना ने और इलाके जीतने के मवफसद से मज़्ाबूत विदेश नीति के लिए दबाव डाला। इस वजह से चीन और रूस के साथ जंग हुइर्, दोनों में ही जापान विजयी रहा। अिाक जनवाद की लोकपि्रय माँग अक्सर सरकार की इन आक्रामक नीतियों के विरोध में जाती थी। जापान आथ्िार्क रूप से विकास करता गया और उसने अपना एक औपनिवेश्िाक साम्राज्य वफायम किया। अपने देश में उसने लोकतंत्रा के प्रसारको वुफचला और साथ ही उपनिवेशीकृत लोगों के साथ टकराव का रिश्ता कायम किया। जापानी लेखः कांजी ;चीनी चित्रात्मकचिÉद्ध - लालऋ कताकाना - नीलाऋ हीरागाना - हरा। कपड़ों के एक कारखाने में श्रमिक। अथर्व्यवस्था का आध्ुनिकीकरण मेजी सुधरों का एक अन्य महत्त्वपूणर् हिस्सा अथर्व्यवस्था का आध्ुनिकीकरण था। इसके लिएकृष्िा पर कर लगाकर धन इकट्ठा किया गया। जापान की पहली रेल लाइन 1870μ72 में तोक्यो और योकोहामा बंदरगाह के बीच बिछाइर् गइर्। वस्त्रा उद्योग के लिए मशीनें यूरोप से आयात की गइर्ं। मज़्ादूरों के प्रश्िाक्षण के लिए विदेशी कारीगरों को बुलाया गया, साथ ही उन्हें जापानी विश्वविद्यालयों और स्कूलों में पढ़ाने के लिए भेजा गया। जापानी विद्याथ्िार्यों को पढ़ने के लिए विदेश भी भेजा गया। 1872 में आधुनिक बैंकिग संस्थाओं का प्रारंभ हुआ। मित्सुबिशी ;डपजेनइपेीपद्ध और सुमितोमो ;ैनउपजवउवद्ध जैसी कम्पनियों को सब्िसडी और करों में प़्ाफायदे के ज़्ारिये प्रमुख जहाज़्ा निमार्ता बनने में मदद मिली। इससे जापानी व्यापार जापानी जहाज़्ाों में होने लगा। ज़्ाायबात्सु ;र्ंपइंजेनद्ध ;बड़ी व्यापारिक संस्थाएँ जिन पर विश्िाष्ट परिवारों का नियंत्राण थाद्ध का प्रभुत्व दूसरे विश्व यु( के बाद तक अथर्व्यवस्था पर बना रहा। 1872 में जनसंख्या 3.5 करोड़ थी जो 1920 में 5.5 करोड़ हो गइर्। जनसंख्या के दबाव कोकम करने के लिए सरकार ने प्रवास को सिय रूप से बढ़ावा दियाऋ पहले उत्तरी टापू होकाइदो की ओर, जो कापफी हद तक स्वतंत्रा इलावफा था और जहाँ आयनू कहे जानेवाले देसी लोग रहते थेऋ पिफर हवाइर् और ब्राज़्ाील और जापान के बढ़ते हुए औपनिवेश्िाक साम्राज्य की तरप़्ाफ। उद्योग के विकास के साथ लोग शहरों में आये। 1925 तक 21 प्रतिशत जनता शहरों में रहती थी। 1935 तक यह बढ़ कर 32 प्रतिशत हो गइर् ;2.25 करोड़द्ध। औद्योगिक मशदूर औद्योगिक मज़्ादूरों की संख्या 1870 में 7,00,000 से बढ़कर 1913 में 40 लाख पहुँच गइर्। अिाकतर मज़्ादूर ऐसी इकाइयों में काम करते थे जिनमें 5 से कम लोग थे और जिनमें मशीनोंऔर विद्युत - ऊजार् का इस्तेमाल नहीं होता था। इन आधुनिक कारखानों में काम करने वालों में आधे से ज़्यादा महिलाएँ थीं। 1886 में पहली आधुनिक हड़ताल का आयोजन महिलाओं ने ही किया। 1900 के बाद कारखानों में पुरुषों की संख्या बढ़ने लगी लेकिन 1930 के दशक में आकर ही पुरुषों की संख्या महिलाओं से अिाक हुइर्। कारखानों में मज़्ादूरों की संख्या भी बढ़ने लगी। 100 से ज़्यादा मज़्ादूर वाले कारखानों की संख्या 1909 में 1000 थी। 1920 तक आते आते इनकी संख्या 2000 से ज़्यादा हो गइर् और 1930 के दशक में यह 4000 पहुँच गइर्। इसके बावजूद 1940 में 5,50,000 कारखानों में 5 से कम मज़्ादूर काम करते थे। इससे परिवार - वेंफदि्रत विचारधारा बनी रही, उसी तरह जिस तरह राष्ट्रवाद को मज़्ाबूत पैतृक व्यवस्था का सहारा था जहाँ सम्राट परिवार का वुफलपति माना जाता था।उद्योग के तेज़्ा और अनियंत्रिात विकास और लकड़ी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की माँग से पयार्वरण का विनाश हुआ। संसद के पहले निम्न सदन के सदस्य तनाको शोज़्ाो ;ज्ंदंां ैीव्रवद्ध ने 1897 में औद्योगिक प्रदूषण के ख्िालाप़्ाफ पहला आंदोलन छेड़ा जब 800 गाँववासी जन विरोध में इकऋे हुए और उन्होंने सरकार को कारर्वाइर् करने के लिए मज़्ाबूर किया। आक्रामक राष्ट्रवाद मेजी संविधान सीमित मतािाकार पर आधारित था और उसने डायट बनाइर् जिसके अिाकार सीमित थे ;जापानियों ने संसद के लिए इस जमर्न शब्द का इस्तेमाल किया क्योंकि उनकी वफानूनी सोचजमर्नी की सोच से प्रभावित थीद्ध। शाही पुनःस्थापना करनेवाले नेता सत्ता में बने रहे और उन्होंने राजनीतिक पाटिर्यों का गठन किया। 1918 और 1931 के दरमियान जनमत से चुने गए प्रधानमंत्रिायों ने मंत्रिापरिषद् बनाए। इसके बाद उन्होंने पाटिर्यों का भेद भुला कर बनाइर् गइर् राष्ट्रीयएकता मंत्रिापरिषदों के हाथों अपनी सत्ता खो दी। सम्राट सैन्यबलों का कमांडर था और 1890 से ये माना जाने लगा कि थलसेना और नौसेना का नियंत्राण स्वतंत्रा है। 1899 में प्रधानमंत्राी ने आदेश दिए कि केवल सेवारत जनरल और एडमिरल ही मंत्राी बन सकते हैं। सेना को मज़्ाबूत बनाने की मुहिम और जापान के उपनिवेश देशों की वृि इस डर से जुड़े हुए थे कि जापान पश्िचमी शक्ितयों की दया पर निभर्र है। इस डर को सैन्य - विस्तार के ख्िालाप़्ाफ और सैन्यबलों को अिाक धन देने के लिए वसूले जानेवाले उच्चतर करों के ख्िालाप़़्ाफ उठनेवाली आवाजों को दबाने में इस्तेमाल किया गया। एक पत्रिाका का आवरण पृष्ठः नवयुवकों को देश हेतु लड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। छात्रा - सैनिकों के चित्रा एक किसान के बेटे तनाका शोज़्ाो ;1841 - 1913द्ध ने अपनी पढ़ाइर् खुद की और एक मुख्य राजनैतिक हस्ती के रूप में उभरे। 1880 के दशक में उन्होंने जनवादी हवफों के आंदोलन में हिस्सा लिया। इस आंदोलन ने संवैधानिक सरकार की माँग की। वह पहली संसद - डायट - में सदस्य चुने गए। उनका मानना था कि औद्योगिक प्रगति के लिए आम लोगों की बलि नहीं दी जानी चाहिए। आश्िायो ;।ेीपवद्ध खान से वातारासे ;ॅंजंतंेमद्ध नदी में प्रदूषण पैैफल रहा था जिसके कारण 100 वगर्मील की कृष्िाभूमि बबार्द हो रही थी और 1000 परिवार प्रभावित हो रहे थे। आंदोलन के चलते कंपनी को प्रदूषण - नियंत्राण के तरीके अपनाने पड़े जिससे 1904 तक प़्ाफसल सामान्य हो गइर्। ‘पश्िचमीकरण’ और ‘परंपरा’ जापान के अन्य देशों के साथ संबंधों पर जापानी बुिजीवियों की आनुक्रमिक पीढि़यों के विचार अलग - अलग थे। वुफछ के लिए, अमरीका और पश्िचमी यूरोपीय देश सभ्यता की उफँचाइयों पर थे जहाँ जापान पहुँचने की आकांक्षा रखता था। प़़्ाुफवुफजावा यूकिची ;थ्नान्रंूं ल्नापबीपद्ध मेजी काल के प्रमुख बुिजीवियों में से थे। उनका कहना था कि जापान को ‘अपने में से एश्िाया को निकाल पेंफकना’ चाहिए। यानि जापान को अपने एश्िायाइर् लक्षण छोड़ देने चाहिए और पश्िचम का हिस्सा बन जाना चाहिए। प़़्ाुफवुफजावा यूकिची ;1835 - 1901द्ध इनका जन्म एक गरीब सामुराइर् परिवार में हुआ। इनकी श्िाक्षा नागासाकी और ओसाका में हुइर्। इन्होंने डच और पश्िचमी विज्ञान पढ़ा और बाद में अंग्रेज़्ाी भी। 1860 में वे अमरीका में पहले जापानी दूतावास में अनुवादक के रूप में गए। इससे इन्हें पश्िचम पर किताब लिखने के लिए बहुत वुफछ मिला। उन्होंने अपने विचार क्लासिकी नहीं बल्िक बोलने चालने के अंदाज़्ा में लिखे। यह किताब बहुत ही लोकपि्रय हुइर्। इन्होंने एक श्िाक्षा संस्थान स्थापित किया जो आज केओ विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है। वे मेरोवुफशा ;डमपतवानेींद्ध संस्था के मुख्य सदस्यों में से थे। ये संस्था पश्िचमी श्िाक्षा का प्रचार करती थी। अपनी एक किताब, ज्ञान के लिए प्रोत्साहन ;गावुफनोन नो सुसुमे, 1872 - 76द्ध में उन्होंने जापानी ज्ञान की कड़ी आलोचना कीः फ्जापान के पास प्राकृतिक दृश्यों के अलावा गवर् करने के लिए वुफछ भी नहीं हैय्, उन्होंने आधुनिक कारखानों व संस्थाओं के अलावा पश्िचम के सांस्कृतिक सारतत्त्व को भी बढ़ावा दिया जो कि उनके मुताबिक सभ्यता की आत्मा है। उसके ज़्ारिये एक नया नागरिक बनाया जा सकेगा। इनका सि(ांत था, फ्स्वगर् ने इंसान को इंसान के ऊपर नहीं बनाया, न ही इंसान को इंसान के नीचेय्। अगली पीढ़ी ने पश्िचमी विचारों को पूरी तरह से स्वीकार करने पर सवाल उठाये और कहा कि राष्ट्रीय गवर् देसी मूल्यों पर निमिर्त होना चाहिए। दशर्नशास्त्राी मियाके सेत्सुरे ;डपलंाम ैमजेनतमपए 1860 - 1945द्ध ने तकर् पेश किया कि विश्व सभ्यता के हित में हर राष्ट्र को अपने खास हुनर का विकास करना चाहिए। फ्अपने को अपने देश के लिए समपिर्त करना अपने को विश्व को समपिर्त करना हैय्। इसकी तुलना में बहुत से बुिजीवी पश्िचमी उदारवाद की तरपफ़आकष्िार्त थे और वे चाहते थे कि जापान अपना आधार सेना की बजाय लोकतंत्रा पर बनाए। संवैध् ानिक सरकार की माँग करने वाले जनवादी अिाकारों के आंदोलन के नेता उएकी एमोरी ;न्माप म्उवतपए 1857 - 1892द्ध प्रफांसीसी क्रांति में मानवों के प्राकृतिक अिाकार और जनप्रभुसत्ता के सि(ांतों के प्रशंसक थे। वे उदारवादी श्िाक्षा के पक्ष में थे जो प्रत्येक व्यक्ित को विकसित कर सके: ‘व्यवस्था से ज़़्यादा वफीमती चीज है, आज़्ाादी’। वुफछ दूसरे लोगों ने तो महिलाओं के मतािाकार की भी सिप़्ाफारिश की। इस दबाव ने सरकार को संविधान की घोषणा करने पर बाध्य किया। अमरीकी भूनक ;मांस वकम्पनियों ने शुरू में 200 येन देने के मछली भूननेबाद लगातार 10 साल के लिए 12 वालाद्ध, ब्रेड सेंकने वाला टोस्टर।येन माहवार की किश्तों पर लोगों को सस्ते मकान मुहैया कराये - यह एक ऐसे समय में जब एक बैंक कमर्चारी ;उच्च श्िाक्षाप्राप्त व्यक्ितद्ध की तनख्वाह 40 येन प्रतिमाह थी। कार क्लब मोगा: ‘आधुनिक लड़की’ के लिए संक्ष्िाप्त शब्द। यह 20वीं शताब्दी में लिंग बराबरी, विश्वजनीन ;काॅस्मोपाॅलिटनद्ध संस्कृति और विकसित अथर्व्यवस्था के विचारों के एक साथ आने का सूचक है। नए मध्यम वगर् परिवारों ने आवागमन और मनोरंजन के नए तरीकों का लुत्पफ उठाया। शहरों में बिजली की ट्रामों के साथ परिवहन बेहतर हुआ। 1878 से जनता के लिए बाग़ बनाये गए और बड़ी दुकानें डिपाटर्मेंट स्टोर बनने लगीं। तोक्यो में गिन्ज़्ाा गिनबुरा के लिए एक प़्ौफशनेबुल इलाव़़्ाफा बन गया। गिनबुरा शब्द गिन्जा और बुरबुरा मिला कर बनाया गया है। बुरबुरा का अथर् है ‘बिना किसी लक्ष्य के घूमना’। 1925 में पहला रेडियो - स्टेशन खुला। अभ्िानेत्राी मात्सुइर्, सुमाको, इब्सन के नाटक एक गुडि़या का घर ;। क्वससश्े भ्वनेमद्ध में नोरा का बेहतरीन किरदार निभा कर राष्ट्रीय स्तर की तारिका बन गइर्। 1899 में प्ि़ाफल्में बनने लगीं और जल्द ही दजर्न भर कंपनियाँ सैकड़ों की तादाद में प्ि़ाफल्में बनाने लगीं। यह दौर ओज से भरा हुआ था और इस दौरान सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार के पारंपरिक मानकों पर सवाल उठाये गए। रोज़्ामरार् की ¯ज़्ादगी जापान का एक आधुनिक समाज में रूपांतरण रोज़्ााना की ज्ि़ांदगी में आए बदलावों में भी देखा जा सकता है। पैतृक परिवार व्यवस्था में कइर् पीढि़याँ परिवार के मुख्िाया के नियंत्राण में रहती थीं। लेकिन जैसे - जैसे लोग समृ( हुए, परिवार के बारे में नए विचार पैफलने लगे। नया घर ;जिसे जापानी अंग्रेज़्ाी शब्द का इस्तेमाल करते हुए होमु कहते हैंद्ध का संबंध मूल परिवार से था, जहाँ पति - पत्नी साथ रह कर कमाते और घर बसाते थे। पारिवारिक जीवन की इस नयी समझ ने नए तरह के घरेलू उत्पादों, नए व्ि़ाफस्म के पारिवारिक मनोरंजन और नए प्रकार के घर की माँग पैदा की। 1920 के दशक में निमार्ण बिजली से चलने वाली नवीन घरेलू वस्तुएँः चावल पकाने वाला वुफकर, आध्ुनिकता पर विजय सत्ता वेंफदि्रत राष्ट्रवाद को 1930μ40 के दौरान बढ़ावा मिला जब जापान ने चीन और एश्िाया में अपने उपनिवेश बढ़ाने के लिए लड़ाइयाँ छेड़ीं। ये लड़ाइयाँ दूसरे विश्व यु( में जाकर मिल गइर्ं जब जापान ने अमरीका के पलर् हाबर्र पर हमला किया। इस दौर में सामाजिक नियंत्राण में वृि हुइर्। असहमति प्रकट करने वालों पर ज़्ाुल्म ढाये गए और उन्हें जेल भेजा गया। देशभक्तों की ऐसी संस्थाएँ बनीं जो यु( का समथर्न करती थीं। इनमें महिलाओं के कइर् संगठन थे। 1943 में एक संगोष्ठी हुइर् ‘आधुनिकता पर विजय’। इसमें जापान के सामने जो दुविधा थी उस पर चचार् हुइर्, यानि आधुनिक रहते हुए पश्िचम पर वैफसे विजय पाइर् जाए। संगीतकार मोरोइ साबुरो ने सवाल उठाया कि संगीत को ऐंदि्रक उद्दीपन की कला से वापस लाकर आत्मा की कला के रूप में उसका पुनवार्स वैफसे कराया जाए। वे पश्िचमी संगीत को नकार नहीं रहे थे। वे ऐसी राह खोज रहे थे जहाँ जापानी संगीत को पश्िचमी वाद्यों पर बजाए या दुहराए जाने से आगे ले जाया जा सके। दशर्नशास्त्राी निश्िातानी केजी ने ‘आधुनिक’ को तीन पश्िचमी धाराओं के मिलन और एकता से परिभाष्िात कियाः पुनजार्गरण, प्रोटैस्टेंट सुधार, औरप्राकृतिक विज्ञानों का विकास । उन्होंने कहा कि जापान की ‘नैतिक ऊजार्’ ;यह शब्द जमर्न दशर्नशास्त्राी रांके से लिया गया हैद्ध ने उसे एक उपनिवेश बनने से बचा लिया और जापान का प़़्ाफजर् बनता है एक नयी विश्व प(ति, एक विशाल पूवीर् एश्िाया के निमार्ण का। इसके लिए एक नयी सोच की जरूरत है जो विज्ञान और धमर् को जोड़ सके।़हार के बादμएक वैश्िवक आ£थक शक्ित के रूप में वापसी जापान की औपनिवेश्िाक साम्राज्य की कोश्िाशें संयुक्त बलों के हाथों हारकर खत्म हो गईं। यह तवर्फ दिया गया है कि यु( जल्दी खत्म करने के लिए हिरोश्िामा और नागासाकी पर नाभ्िाकीय बम गिराये गये। लेकिन अन्य लोगों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर जो विध्वंस और दुख - ददर् का तांडव हुआ, वह पूरी तरह से अनावश्यक था। अमरीकी नेतृत्व वाले वफब्ज़्ो ;1945 - 47द्ध के दौरान जापान का विसैन्यीकरण कर दिया गया और एक नया संविधान लागू हुआ। इसके अनुच्छेद 9 के ‘तथाकथ्िात यु( न करने के वाक्यांश’ के अनुसार यु( का राष्ट्रीय नीति के साधनके रूप में इस्तेमाल व£जत है। कृष्िा सुधार, व्यापारिक संगठनों का पुनगर्ठन और जापानी अथर्व्यवस्था में ज़्ाायबात्सु यानि बड़ी एकािाकार कंपनियों की पकड़ को खत्म करने की भी कोश्िाश की गइर्। राजनीतिक पाटिर्यों को पुनजीर्वित किया गया और जंग के बाद पहले चुनाव 1946 में हुए। इसमें पहली बार महिलाओं ने भी मतदान किया। अपनी भयंकर हार के बावजूद जापानी अथर्व्यवस्था का जिस तेज़्ाी से पुननिर्मार्ण हुआ, उसेएक यु(ोत्तर ‘चमत्कार’ कहा गया है। लेकिन यह चमत्कार से कहीं अिाक था और इसकी जड़ें जापान के लंबे इतिहास में निहित थीं। संविधान को औपचारिक स्तर पर गणतांत्रिाक रूप इसी समय दिया गया। लेकिन जापान में जनवादी आंदोलन और राजनीतिक भागेदारी का आधार बढ़ाने में बौिक सियता की ऐतिहासिक परंपरा रही है। यु( से पहले के काल की सामाजिक संब(ता को गणतांत्रिाक रूपरेखा के बीच सुदृढ़ किया गया। इसके चलते सरकार, नौकरशाही और उद्योग के बीच एक वफरीबी रिश्ता कायम हुआ। अमरीकी समथर्न और साथ ही कोरिया और वियतनाम में जंग से जापानी अथर्व्यवस्था को मदद मिली। आध्ुनिकीकरण के रास्ते 243 1964 में तोक्यो में हुए ओलंपिक खेल जापानी अथर्व्यवस्था की परिपक्वता के प्रतीक बनकर सामने आये। इसी तरह तेज़्ा गति वाली श्िांकांसेन यानि बुलेट टेªन का जाल भी 1964 में शुरू हुआ।200 मील प्रति घंटे की रफ्रइसपर रेलगाडि़याँ़तार से चलती थीं ;अब वे 300 मील प्रति घंटे कीरफ्ऱतार से चलती हैंद्ध। यह भी जापानियों की सक्षमता दशार्ती हैं कि वे नयी प्रौद्योगिकी के ज़्ारिये बेहतर और सस्ते उत्पाद बाज़्ाार में उतार सके। 1960 के दशक में नागरिक समाज आंदोलन का विकास हुआ। बढ़ते औद्योगीकरण की वजह से स्वास्थ्य और पयार्वरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को पूरी तरह से नज़्ार अंदाज़्ा करने का विरोध किया गया। अरगजी ;ब्ंकउपनउद्ध का जहर, जिसके चलते बड़ी ही कष्टप्रद बीमारी होती थी, एक आरंभ्िाक़सूचक था। इसके बाद 1960 के दशक में मिनामाता में पारे के ज्और 1970 के दशक के उत्तराधर् में हवा में प्रदूषण से भी समस्याएँजमीनी स्तरों पर दबाव बनाने वाले गुटों ने इन समस्याओं को पहचानने और साथ ही हताहतों के लिए मुआवज़्ाा देने की मांग की। सरकारी कारर्वाइर् और नए कानूनों से स्िथति बेहतर हुइर्। 1980 के दशक के मध्य से पयार्वरण संबंधी विषयों में लोगों की दिलचस्पी घटी है क्योंकि 1990 तक आते - आते जापान में विश्व के वुफछ कठोरतम पयार्वरण - नियंत्राण अमल में लाए गए। आज एक विकसित देश के रूप में यह अग्रगामी विश्व - शक्ित की अपनी हैसियत को बनाए रखने के लिए अपनी राजनीतिक और प्रौद्योगिकीय क्षमताओं का इस्तेमाल करने की चुनौतियों का सामना कर रहा है। चीन चीन का आधुनिक इतिहास संप्रभुता की पुनप्रार्प्ित, विदेशी वफब्ज़्ो के अपमान का अंत और समानता तथा विकास को संभव करने के सवालों के चारों ओर घूमता है। चीनी बहसों में तीन समूहों के नज़्ारिए झलकते हैं। कांग योवेल ;1858 - 1927द्ध या लियांग किचाउ ;1873 - 1929द्ध जैसे आरंभ्िाक सुधारकों ने पश्िचम की चुनौतियों का सामना करने के लिए पारंपरिक विचारों को नये और अलग तरीके से इस्तेमाल करने की कोश्िाश की। दूसरे, गणतंत्रा के पहले राष्ट्राध्यक्ष सन यात - सेन जैसे गणतांत्रिाक क्रांतिकारी जापान और पश्िचम के विचारों से प्रभावित थे। तीसरे, चीन की कम्युनिस्ट पाटीर् युगों - युगों की असमानताओं को खत्म करना और विदेश्िायों को खदेड़ देना चाहती थी। आधुनिक चीन की शुरुआत सोलहवीं और सत्राहवीं सदी में पश्िचम के साथ उसका पहला सामना होने के समय से मानी जा सकती है, जबकि जेसुइट मिशनरियों ने खगोलविद्या और गण्िात जैसे पश्िचमी विज्ञानों को वहाँ पहुँचाया। इसका तात्कालिक असर तो सीमित था, पर इसने उन चीज़्ाों की शुरुआत कर दी, जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में जाकर तेज गति पकड़ी, जब बि्रटेन ने़अप़्ाफीम के प़्ाफायदेमंद व्यापार को बढ़ाने के लिए सैन्य बलों का इस्तेमाल किया। इसी के चलते पहला अपफीम यु( ;1839 - 1942द्ध हुआ। इसने सत्ताधारी क्िवंग राजवंश को कमज़्ाोर किया औऱसुधार तथा बदलाव की मांगों को मज़्ाबूती दी। अप़्ाफीम का व्यापार चीनी उत्पादों जैसे चाय, रेशम और चीनी मि‘ी के बतर्नों की माँग ने व्यापार में असंतुलन की भारी समस्या खड़ी कर दी। पश्िचमी उत्पादों को चीन में बाज़्ाार नहीं मिला जिसकी वजह से भुगतान चाँदी में करना पड़ता था। इर्स्ट इंडिया कंपनी ने एक विकल्प ढूँढ़ा - अपफीम।़यह हिंदुस्तान के कइर् हिस्सों में बहुत आराम से उगती थी। चीन में अप़्ाफीम बेचने के ज़्ारिये वे चाँदी कमाकर केंटन में उधार पत्रों के बदले कंपनी के प्रतिनििायों को देने लगे। इस तरह कंपनी उस चाँदी का इस्तेमाल बि्रटेन के लिए चाय, रेशम और चीनी मि‘ी के बतर्न खरीदने के लिए करती थी। बि्रटेन, भारत और चीन के बीच यह उत्पादों का ‘त्रिाकोणीय व्यापार’ था। कांग यूवेइर् ;ज्ञंदह ल्वनूमपद्ध और लियांग किचाउ ;स्पंदह फपबींवद्ध जैसे क्िवंग सुधारकों ने व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की ज़्ारूरत महसूस की और एक आधुनिक प्रशासकीय व्यवस्था, नयी सेना और श्िाक्षा व्यवस्था के निमार्ण के लिए नीतियाँ बनाईं। साथ ही, संवैधानिक सरकार की स्थापना के लिए स्थानीय विधायिकाओं का भी गठन किया। उन्होंने चीन को उपनिवेशीकरण से बचाने की ज़्ारूरत भी महसूस की। उपनिवेश बनाए गए देशों के नकारात्मक उदाहरणों ने चीनी विचारकों पर ज़्ाबदर्स्त प्रभाव डाला। 18वीं सदी में पोलैंड का बँटवारा सवार्िाक बहुचचिर्त उदाहरण था। यहाँ तक कि 1890 के दशक में पोलैंड शब्द का इस्तेमाल िया के रूप में किया जाने लगा: बोलान वू का मतलब था, ‘हमें पोलेंड करने के लिए’। भारत का उदाहरण भी सामने था। विचारक लियांग किचाउ का मानना था कि चीनी लोगों में एक राष्ट्र की जागरूकता लाकर ही चीन पश्िचम का विरोध कर पाएगा। 1903 में उन्होंने लिखा कि भारत एक ऐसा देश है, जो किसी और देश नहीं, बल्िक एक कंपनी के हाथों बबार्द हो गया - इर्स्ट इंडिया कंपनी के। वे बि्रतानिया की ताबेदारी करने और अपने लोगों के साथ क्रूर होने के लिए हिंदुस्तानियों की आलोचना करते थे। उनके तकोर्ं ने आम आदमी को खासा आकष्िार्त किया, क्योंकि चीनी देखते थे कि बि्रतानिया चीन के साथ यु( मेंभारतीय जवानों का इस्तेमाल करता है।इन सबसे अिाक कइयों ने यह महसूस किया कि परंपरागत सोच को बदलने की ज़्ारूरत है।कन्पफयूश्िायसवाद चीन में प्रमुख विचारधारा रही है। यह विचारधारा कन्पफयूश्िायस ;551 - 479इर्.पू.द्ध और उनके अनुयायियों की श्िाक्षा से विकसित की गइर्। इसका दायरा अच्छे व्यवहार,व्यावहारिक समझदारी और उचित सामाजिक संबंधों के सि(ांतों का था। इसने चीनियों के जीवनके प्रति रवैये को प्रभावित किया, सामाजिक मानक दिये और चीनी राजनीतिक सोच और संगठनोंको आधार दिया।लोगों को नये विषयों में प्रश्िाक्ष्िात करने के लिए विद्याथ्िार्यों को जापान, बि्रटेन और प्रफांस मेंपढ़ने भेजा गया ताकि वे नये विचार सीख कर वापस आएँ। 1890 के दशक में बड़ी तादाद मेंचीनी विद्याथीर् पढ़ने के लिए जापान गए। वे न केवल नये विचार वापस लेकर आए बल्िक गणतंत्राकी स्थापना करने में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाइर्। चूंकि चीनी और जापानी भाषा एक हीचित्रालिपि का इस्तेमाल करती हैं, चीन ने जापान से न्याय, अिाकार और क्रांति के यूरोपीय विचारोंके जापानी अनुवाद लिए। यह एक तरह से पारंपरिक संबंधें का उलट जाना था। 1905 में रूसी - जापानी यु( ;एक ऐसा यु( जो चीन की जमीन पर और चीनी इलाके पर प्रभुत्व के लिए ़लड़ा गया थाद्ध के बाद सदियों पुरानी चीनी परीक्षा - प्रणाली समाप्त कर दी गइर्, जो प्रत्याश्िायोंको अभ्िाजात सत्ताधारी वगर् में दाख्िाला दिलाने का काम करती थी। परीक्षा प्रणाली अभ्िाजात सत्ताधारी वगर् में प्रवेश ;1850 तक लगभग 11 लाखद्ध ज़्यादातर इम्ितहान के ज़्ारिये ही होता था। इसमें 8 भाग वाला निबंध निधर्रित प्रपत्रा में ;पा - कू वेनद्ध शास्त्राीय चीनी में लिखना होता था। यह परीक्षा विभ्िान्न स्तरों पर हर 3 साल में 2 बार आयोजित की जाती थी। पहले स्तर की परीक्षा में केवल 1 - 2 प्रतिशत लोग 24 साल की उम्र तक पास हो पाते थे और वे ;सुंदर प्रतिभाद्ध बन जाते थे। इस डिग्री से उन्हें निचले वुफलीन वगर् में प्रवेश मिल जाता था। 1850 से पहले किसी भी समय 526,869 सिविल और 212,330 सैन्य प्रांतीय ;शेंग हुआनद्ध डिग्री वाले लोग पूरे देश में मौजूद थे। देश में केवल 27,000 राजकीय पद थे, इसलिए कइर् निचले दज़्ोर् के डिग्रीधारकों के पास नौकरी नहीं होती थी। यह इम्तहान विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में बाधक का काम करता था, क्योंकि इसमें सिप़्ार्फ साहित्ियक कौशल की माँग होती थी। चूंकि यह क्लासिक चीनी सीखने के हुनर पर ही आधारित था, जिसकी आधुनिक विश्व में कोइर् प्रासंगिकता नज़्ार नहीं आती थी, इसलिए 1905 में इस प्रणाली को खत्म कर दिया गया। गणतंत्रा की स्थापना 1911 में मांचू साम्राज्य समाप्त कर दिया गया और सन यात - सेन ;1866 - 1925द्ध के नेतृत्व में गणतंत्रा की स्थापना की गइर्। वे निविर्वाद रूप से आधुनिक चीन के संस्थापक माने जाते हैं। वे एक गरीब परिवार से थे और उन्होंने मिशन स्कूलों में श्िाक्षा ग्रहण की जहाँ उनका परिचय लोकतंत्रा और इर्साइर् धमर् से हुआ। उन्होंने डाक्टरी की पढ़ाइर् की लेकिन वे चीन के भविष्य को लेकर चिंतित थे। उनका कायर्क्रम तीन सि(ांत ;सन मिन चुइर्द्ध के नाम से मशहूर है। ये तीन सि(ांत हैं: राष्ट्रवाद - इसका अथर् था मांचू वंश - जिसे विदेशी राजवंश के रूप में देखा जाताथा - को सत्ता से हटाना, साथ ही अन्य साम्राज्यवादियों को हटाना ;गणतंत्रा या गणतांत्रिाक सरकार की स्थापना करनाद्ध और समाजवाद, जो पूँजी का नियमन करे और भूस्वामित्व में बराबरी लाए।सामाजिक और राजनीतिक हालात डाँवाडोल बने रहे। 4 मइर् 1919 में बीजिंग में यु(ोत्तर शांति सम्मेलन के निणर्य के विरोध में एक धुआँधार प्रदशर्न हुआ। हालांकि चीन बि्रतानिया के नेतृत्व में हुइर् जीत में विजयी देशों का सहयोगी था, पर उससे हथ्िाया लिए गए उसके इलाके वापस नहीं मिले थे। यह विरोध आंदोलन में तब्दील हो गया। इसने एक पूरी पीढ़ी को परंपरा पर हमला करने के लिए प्रेरित किया और चीन को आधुनिक विज्ञान, लोकतंत्रा और राष्ट्रवाद के जरिये बचाने़की माँग की गइर्। क्रांतिकारियों ने देश के संसाधनों पर कब्ज़्ाा जमाए विदेश्िायों को भगाने, असमानताएँ हटाने और गरीबी कम करने का नारा दिया। उन्होंने लेखन में एक ही भाषा का इस्तेमाल, पैरों को बाँधने की प्रथा और औरतों की अधीनस्थता के खात्मे, शादी में बराबरी और गरीबी खत्म करने के लिए आथ्िार्क विकास जैसे सुधारों की वकालत की। गणतांत्रिाक क्रांति के बाद देश में उथल - पुथल का एक दौर शुरू हुआ। वुफओमीनतांग ;नेशनल पीपुल्स पाटीर्द्ध औरचीनी कम्युनिस्ट पाटीर् मुल्वफ को एकताब( करने और स्िथरता लाने के लिए संघषर्रत दो महत्त्वपूणर् ताव़्ाफतों के रूप में उभरीं। सन यात - सेन के विचार वुफओमीनतांग के राजनीतिक दशर्न का आधार बने। उन्होंने कपड़ा, खाना, घर और परिवहन - इन ‘चार बड़ी ज़्ारूरतों’ को रेखांकित किया। सन यात - सेन की मृत्यु के बाद चियांग काइशेक ;ब्ीपंदह ज्ञंपेीमाए 1887 - 1975द्ध वुफओमीनतांग के नेता बनकरउभरे और उन्होंने सैन्य अभ्िायान के ज़्ारिये वारलाड्र्स को ;स्थानीय नेता जिन्होंने सत्ता छीन ली थीद्ध अपने नियंत्राण में किया और साम्यवादियों को खत्म कर डाला। उन्होंने सेक्युलर और विवेकपूणर् ‘इहलौकिक’ कन्पूफश्िायसवाद की हिमायत की, लेकिन साथ ही राष्ट्र का सैन्यकरण करने की भी कोश्िाश की। उन्होंने कहा कि लोगों को ‘ एकताब( व्यवहार की प्रवृिा और आदत’ का विकास करना चाहिए। उन्होंने महिलाओं को चार सद्गुण पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कियाः सतीत्व, रूप - रंग, वाणी और काम और उनकी भूमिका को घरेलू स्तर पर ही देखने पर ज़्ाोर दिया। यहाँ तक कि उनके कपड़ों की किनारियों की लंबाइर् भी प्रस्तावित की। वुफओमीनतांग का सामाजिक आधार शहरी इलाकों में था। औद्योगिक विकास धीमा और गिने चुने क्षेत्रों में था। शंघाइर् जैसे शहरों में 1919 में औद्योगिक मज़्ादूर वगर् उभर रहा था और इनकी संख्या 500,000 थी। लेकिन इनमें से केवल वुफछ प्रतिशत मज़्ादूर ही जहाज़्ा निमार्ण जैसे आधुनिक उद्योगों में काम कर रहे थे। ज्यादातर लोग ‘नगण्य शहरी’ ;़श्िायाओ श्िामिनद्ध, व्यापारी और दुकानदार होते थे। शहरी मज़्ादूरों, खासतौर से महिलाओं, को बहुत कम वेतन मिलता था। काम करने के घंटे बहुत लंबे थे और काम करने की परिस्िथतियाँ बहुत खराब। जैसे - जैसे व्यक्ितवाद बढ़ा, महिलाओं के अिाकार, परिवार बनाने के तरीके और प्यार - मुहब्बत की चचार् - इन सब विषयों को लेकर सरोकार बढ़ते गए।सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव में स्कूल और विश्वविद्यालयों के पैफलने से मदद मिली। पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना 1902 में हुइर्। पत्राकारिता पफली - पूफली जो कि इस नयी सोच के प्रति आकषर्ण का आइर्ना थी। शाओ तोआप़्ोफन ;र्ंव ज्ंवमिदए 1895 - 1944द्ध द्वारा संपादित लोकपि्रय लाइप़्ाफ वीकली इस नयी विचारधारा की प्रतिनििा थी। इसने अपने पाठकों को नए विचारों से, साथ ही गांधी और तुकीर् के आधुनिकतापसंद नेता कमाल अतातुवर्फ ;ज्ञमउंस ।जंजनताद्ध जैसे नेताओं से अवगत करवाया। इसका वितरण 1926 में केवल 2000 प्रतियों से बढ़कर 1933 में 200,000 हो गया। बढ़ती हुइर् कीमतों की कहानी। चीनी साम्यवादी दल का उदय 1937 में जब जापानियों ने चीन पर हमला किया तो वुफओमीनतांग पीछे हट गया। इस लंबे और थकाने वाले यु( ने चीन को कमज़्ाोर कर दिया। 1945 और 1949 के दरमियान वफीमतें 30 प्रतिशत प्रति महीने की र.फ्रतार से बढ़ीं। इससे आम आदमी की ज्ि़ांदगी तबाह हो गइर्। ग्रामीण चीन में दो संकट थेः एक, पयार्वरण संबंधी, जिसमें बंजर ज़्ामीन, वनों का नाश और बाढ़ शामिल थे। दूसरा, सामाजिक - आथ्िार्क जो विनाशकारी ज़्ामीन - प्रथा, ट्टण, आदिम प्रौद्योगिकी और निम्न स्तरीय संचार के कारण था। चीन की साम्यवादी पाटीर् की स्थापना 1921 में, रूसी क्रांति के वुफछ समय बाद हुइर् थी। रूसी सपफलता ने पूरी दुनिया पर ज़्ाबदर्स्त प्रभाव डाला। लेनिन और ट्राॅट्स्की जैसे नेताओं ने माचर् 1918 में कौमिंटनर् या तृतीय अंतरार्ष्ट्रीय ;ज्ीपतक प्दजमतदंजपवदंसद्ध का गठन किया जिससे विश्व स्तरीय सरकार बनाइर् जाए जो शोषण को खत्म कर सके। कौमिंटनर् और सोवियत संघ ने दुनिया भर में साम्यवादी पाटिर्यों का समथर्न किया। उनकी परंपरागत माक्सर्वादी समझ थी, कि क्रांति शहरी इलाकों में मज़़्ादूर वगो± के जरिये आयेगी। शुरू में विभ्िान्न देशों के लोग इससे बहुत आकष्िार्त हुए लेकिन जल्द ही यह सोवियत यूनियन के स्वाथार्ें का हथ्िायार बन गया और 1943 में इसे खत्म कर दिया गया। माओ त्सेतंुग ;1893 - 1976द्ध ने, जो सी. सी. पी. के प्रमुख नेता के रूप में उभरे, क्रांति के कायर्क्रम को किसानों पर आधारित करते हुए एक अलग रास्ता चुना। उनकी सपफलता से चीनी साम्यवादी पाटीर् एक शक्ितशाली राजनीतिक तावफत बनी जिसने अंततः वुफओमीनतांग पर जीत हासिल की। माओ त्सेतंुग के आमूूलपरिवतर्नवादी तौर - तरीकों को जियांग्सी में देखा जा सकता है। यहाँ पहाड़ों मे 1928 - 1934 के बीच उन्होंने वुफओमीनतांग के हमलों से सुरक्ष्िात श्िाविर लगाए। मजबूत किसान परिषद ;सोवियतद्ध का गठन किया, जमीन पर कब्जा और पुनविर्तरण के साथ ़़़एकीकरण हुआ। दूसरे नेताओं से हटकर, माओ ने आजाद सरकार और सेना पर ज़्ाोर दिया। ़वे महिलाओं की समस्याओं से अवगत थे और उन्होंने ग्रामीण महिला संघों को उभरने मंे प्रोत्साहन दिया। उन्होंने शादी के नए कानून बनाए जिसमें आयोजित शादियों और शादी के समझौते खरीदने और बेचने पर रोक लगाइर् और तलाक को आसान बनाया। 1930 में जुनवू ;ग्नदूनद्ध में किए गए एक सवेर्क्षण में माओ त्सेतंुग ने नमक और सोयाबीन जैसी रोज़मरार् की वस्तुओं, स्थानीय संगठनों की तुलनात्मक मज़्ाबूतियों, छोटे व्यापारियों और दस्तकारों, लोहारों और वेश्याओं, धामिर्क संगठनों की मज़्ाबूतियों, इन सबका परीक्षण किया ताकि शोषण के अलग - अलग स्तरों को समझा जा सके। उन्होंने ऐसे आंकड़े इकट्टòे किये कि कितने किसानों ने अपने बच्चों को बेचा है और इसके लिए उन्हें कितने पैसे मिले। लड़के 100 - 200 यूआन पर बिकते थे लेकिन लड़कियों की बिक्री के कोइर् उदाहरण नहीं मिले क्योंकि शरूरत मज़्ादूरों की थी लैंगिक शोषण की नहीं। इस अध्ययन के आधार पर उन्होंने सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के तरीव़्ोफ पेश किए। कम्युनिस्टों की सोवियत की वुफओ मीन तांग द्वारा नाकेबंदी ने पाटीर् को दूसरा आधार ढूँढ़ने पर मजबूर किया। इसके चलते उन्हें लाँग माचऱ्;1934 - 35द्ध पर जाना पड़ा, जो कि शांग्सी तक 6000 मील का मुश्िकल सप़्ाफर था। नये अîóे येनान में उन्होंने यु( सामंतवाद ;ॅंतसवतकपेउद्ध को खत्म करने, भूमि सुधार लागू करने और विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ने के कायर्क्रम को आगे बढ़ाया। इससे उन्हें मजबूत सामाजिक आधाऱमिला। यु( के मुश्िकल सालों में साम्यवादियों और वुफओमीनतांग नेमिलकर काम किया लेकिन यु( खत्म होने के बाद साम्यवादी सत्ता में आ गए और वुफओमीनतांग की हार हो गइर्। नए जनवाद की स्थापना: 1949.65 पीपुल्स रिपब्िलक आॅप़्ाफ चाइना की सरकार 1949 में वफायम हुइर्। यह ‘नए लोकतंत्रा’ के सि(ांतों पर आधारित थी। ‘सवर्हारा की तानाशाही’’, जिसे वफायम करने का दावा सोवियत संघ का था, से भ्िान्न नया लोकतंत्रा सभी सामाजिक वगोंर् का गठबंधन था। अथर्व्यवस्था के मुख्य क्षेत्रा सरकार के नियंत्राण में रखे गए और निजी कारखानों और भूस्वामित्व को धीरे - धीरे खत्म किया गया। यह कायर्क्रम 1953 तक चला जब सरकार ने समाजवादी बदलाव का कायर्क्रम शुरू करने की घोषणा की। 1958 में लंबी छलाँगवाले आंदोलन की नीति के ज़्ारिये देश का तेज़्ाी से औद्योगीकरण करने की कोश्िाश की गइर्। लोगों को अपने घर के पिछवाड़े में इस्पात की भिòयाँ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। ग्रामीण इलाकों में पीपुल्स कम्यून्स - जहाँ लोग इकऋे ज़्ामीन के मालिक थे और मिलजुलकर पफसल उगाते थे - शुरू किये गए। 1958 तक 26,000 ऐसे समुदाय थे जोकि कृषक आबादी का 98 प्रतिशत था। मानचित्रा 2रू लाँग माचर्। वैफमरा चित्रा - 1941 में लाँग माचर् पर सैनिकों द्वारा बंजर भूमि को वृफष्िायोग्य बनाते हुए। ’यह शब्द कालर्माक्सर् द्वारा प्रयोग किया गया था जिसमें यह बल दिया गया था कि अमीर वगर् की दमनकारी सरकार को श्रमिक वगर् की क्रांतिकारी सरकार प्रतिस्थापित कर देगी और यह मौजूदा अथर् में अध्िनायक तंत्रा नहीं होगा। माओ पाटीर् द्वारा निधार्रित लक्ष्यों को पाने के लिए जनसमुदाय को प्रेरित करने में सपफल रहे। उनकी चिंता ‘समाजवादी व्यक्ित’ बनाने की थी जिसकी पाँच चीज़्ों पि्रय होंगीः पितृभूमि, जनता,काम, विज्ञान और जन सम्पिा। किसानों, महिलाओं, छात्रों और अन्य गुटों के लिए जन संस्थाएँ बनाइर् गईं। उदाहरण के लिए आॅल चाइना डेमोक्रेटिक वीमेंस प़्ोफडरेशन के 760 लाख सदस्य थे, आॅल चाइना स्टूडेंट्स पेफडरेशन के 32 लाख 90 हज़्ाार सदस्य थे। लेकिन ये लक्ष्य और तरीवेफ़पाटीर् में सभी लोगों को पसंद नहीं थे। 1953 - 54 में वुफछ लोग औद्योगिक संगठनों और आथ्िार्क विकास की तरपफ ज्यादा ध्यान देने के लिए कह रहे थे। लीऊ शाओछी़;स्पन ैींवबीपए 1896 - 1969द्ध और तंग शीयाओपफींग ;क्मदह ग्पंवचपदहए 1904 - 97द्ध ने कम्यून प्रथा को बदलने की कोश्िाश की क्योंकि यह बहुत वुफशलता से काम नहीं कर रही थी। घरों के पिछवाड़ों में बनाइर् गइर् स्टील औद्योगिक लिहाज़्ा से अनुपयोगी था। दशर्नों का टकरावः 1965.78 ‘समाजवादी व्यक्ित’ की रचना के इच्छुक माओवादियों और दक्षता की बजाय विचारधारा पर माओ के बल देने की आलोचना करनेवालों के बीच संघषर् चला। माओ द्वारा 1965 में छेड़ी गइर् महानसवर्हारा सांस्कृतिक क्रांति इसी संघषर् का नतीजा था, जो उन्होंने अपने आलोचकों का सामना करनेके लिए शुरू की। पुरानी संस्कृति, पुराने रिवाज़़्ाफ अभ्िायान छेड़नेाों, और पुरानी आदतों के ख्िालाप्के लिए रेड गाड्र्स - मुख्यतः छात्रों और सेना - का इस्तेमाल किया गया। छात्रों और पेशेवर लोगों को जनता से ज्ञान हासिल करने के लिए ग्रामीण इलाकों में भेजा गया। विचारधारा ;साम्यवादी होनाद्ध पेशेवर ज्ञान से ज्यादा महत्त्वपूणर् थी। दोषारोपण और नारेबाज़्ाी ने तवर्फसंगत़बहस की जगह ले ली।सांस्कृतिक क्रांति से खलबली का दौर शुरू हो गया, पाटीर् कमजोर हो गइर् और अथर्व्यवस्था़और श्िाक्षा व्यवस्था में भारी रुकावट आइर्। 1960 के उत्तराधर् से प्रवाह बदलने लगा। 1975 में एक बार पिफर पाटीर् ने अिाक सामाजिक अनुशासन और औद्योगिक अथर्व्यवस्था का निमार्ण करने पर ज़्ाोर दिया ताकि चीन शताब्दी के खत्म होने से पहले एक शक्ितशाली देश बन सके। 1978 से शुरू होने वाले सुधर साँस्कृतिक क्रांति के बाद राजनीतिक दाव - पेचों की प्रिया शुरू हुइर्। तंग शीयाओपफींग ने पाटीर् पर नियंत्राण मज़्ाबूत बनाए रखा और साथ ही देश में समाजवादी बाजार अथर्व्यवस्था की शुरुआत़की। 1978 में पाटीर् ने आधुनिकीकरण के अपने चार सूत्राी लक्ष्य की घोषणा की। यह था,विज्ञान, उद्योग, कृष्िा और रक्षा का विकास। पाटीर् से सवाल - जवाब न करने की हद तक बहस की इजाज़्ात थी। इस नए और आज़्ााद वातावरण में, जैसे कि 60 साल पहले 4 मइर् के आंदोलन के समय था, नये विचारों का रोमांचकारी भंडार पूफट पड़ा। 5 दिसंबर 1978 को दीवार पर लगे एक पोस्टर ने पाँचवीं आधुनिकता का दावा किया कि लोकतंत्रा के बिना अन्य आधुनिकताएँ वुफछ भी नहीं बन पाएँगी। उसने गरीबी न हटाने और लैंगिक शोषण खत्म न कर पाने के लिए सी. सी. पी. की आलोचना की। इसके लिए उसने पाटीर् के अंदर से ही ऐसे दुव्यर्वहारों के उदाहरण पेश किए। इन मांगों को दबाया गया लेकिन 1989 में, 4 मइर् के आंदोलन की 70वीं सालगिरह पर बहुत से बुिजीवियों ने ज़्यादा खुलेपन के और कड़े सि(ांतों ;शू - शाओझीद्ध को खत्म करने की माँग की। बी¯जग के तियानमेन चैक पर छात्रों के प्रदशर्न को क्रूरतापूवर्क दबाया गया। दुनिया भर में इसकी कड़ी आलोचना हुइर्। सुधार के बाद के समय में चीन के विकास के विषय पर दुबारा बहस शुरू हुइर्। पाटीर् द्वारा समथ्िार्त प्रधान मत मज़्ाबूत राजनीतिक नियंत्राण, आथ्िार्क खुलेपन और विश्व बाजार से जुड़ाव़पर आधारित है। आलोचकों का कहना है कि सामाजिक गुटों, क्षेत्रों, पुरुषों और महिलाओं के बीच बढ़ती हुइर् असमानताओं से सामाजिक तनाव बढ़ रहा है और बाज़्ाार पर जो भारी महत्त्व दिया जा रहा है उस पर सवाल खड़े कर रहा है। अंत में, पहले केपारंपरिक विचार पुनजीर्वित हो रहे हैं। जैसे कि वंफफ्रयूश्िायसवाद और यह तवर्फ कि पश्िचम की नकल करने के बजाए चीन अपनी परंपरा पर चलते हुए एक आधुनिक समाज बना सकता है। ताइवान का किस्सा चीनी साम्यवादी दल द्वारा पराजित होने के बाद चियांग काइर् - शेक 30 करोड़ से अिाक अमरीकीडाॅलर और बेशवफीमती कलाकृतियाँ लेकर 1949 में ताइवान भाग निकले। वहाँ उन्होंने चीनी गणतंत्रा की स्थापना की। 1894 - 95 में जापान के साथ हुइर् लड़ाइर् में यह जगह चीन को जापान के हाथ में सौंपनी पड़ी थी और तब से वह जापानी उपनिवेश बनी हुइर् थी। कायरो घोषणापत्रा ;1943द्ध और पोट्सडैम उद्घोषणा ;1949द्ध के द्वारा चीन को संप्रभुता वापस मिली। पफरवरी 1947 में हुए ज़्ाबदर्स्त प्रदशर्नों के बाद वुफओमीनतांग ने नेताओं की एक पूरी पीढ़ी की निमर्मतापूवर्क हत्या करवा दी। चियांग काइर् - शेक के नेतृत्व में वुफओमीनतांग ने एक दमनकारी सरकार की स्थापना की, बोलने की और राजनीतिक विरोध करने की आज़्ाादी छीन ली और सत्ता की जगहों से स्थानीय आबादी को पूरी तरह बाहर कर दिया। पिफर भी उन्होंने भूमि सुधार लागू किया, जिसके चलते खेती की उत्पादकता बढ़ी। उन्होंने अथर्व्यवस्था का भी आधुनिकीकरण किया, जिसके चलते 1973 में वुफल राष्ट्रीय उत्पाद के मामले में ताइवान पूरे एश्िाया में जापान के बाद दूसरे स्थान पर रहा। अथर्व्यवस्था, जो मुख्यतः व्यापार पर आधारित थी, लगातार वृि करती गइर्। लेकिन अहम बात यह है कि अमीर और गरीब के बीच का भी अंतराल लगातार घटता गया है। ताइवान का एक लोकतंत्रा में रूपांतरण और भी नाटकीय रहा है। यह 1975 में चियांग की मौत के बाद धीरे - धीरे शुरू हुआ और 1887 में जब पफौजी कानून हटा लिया गया तथा विरोधी दलों को कानूनी इजाज़्ात मिल गइर्, तब इस प्रिया ने गति पकड़ी। पहले स्वतंत्रा मतदान ने स्थानीयताइवानियों को सत्ता में लाने की प्रिया शुरू कर दी। राजनयिक स्तर पर अिाकांश देशों के व्यापार मिशन केवल ताइवान में ही हैं। उनके द्वारा ताइवान में पूणर् राजनयिक संबंध और दूतावास रखना संभव नहीं, क्योंकि ताइवान को चीन का ही एक हिस्सा माना जाता है। मुख्य भूमि के साथ पुनःएकीकरण का प्रश्न अभी भी विवादास्पद मुद्दा होकर रहा है यद्यपि ‘खाड़ी - पार’ के संबंध् ;चीन और ताइवान के मध्यद्ध सुध्र रहे हैं, ताइवानी व्यापार और निवेश मुख्य भूमि में बड़े पैमाने पर हो रहा है और आवागमन कहीं अध्िक सहज हो गया है। संभवतःचीन ताइवान को एक अध्र्स्वायत्त क्षेत्रा के रूप में स्वीकार कर लेने में सहमत हो जाएगा अगर ताइवान पूणर् स्वतंत्राता के लिए कोइर् कदम उठाने से परहेश करता है। आध्ुनिकता के दो मागर् औद्योगिक समाजों ने एक दूसरे के जैसे बनने की बजाए आधुनिकता के अपने - अपने मागर् बनाए। चीन और जापान का इतिहास दिखाता है कि किस तरह अलग - अलग ऐतिहासिक परिस्िथतियों ने आजाद और आधुनिक देश बनाने की बिलवुफल अलग राहें तैयार कीं। जापान अपनी आज़्ाादी़बनाए रखने में सपफल रहा और पारंपरिक हुनर और प्रथाआंे को नए तरीके से इस्तेमाल कर पाया। तथापि वुफलीन वगर् के नेतृत्व में हुए आधुनिकीकरण ने एक उग्र राष्ट्रवाद को जन्म दिया और एकशोषणकारी सत्ता को बरकरार रखा जिसने विरोध और लोकतंत्रा की माँग का गला घोंट दिया। उसने एक औपनिवेश्िाक साम्राज्य की स्थापना की जिससे उस क्षेत्रा में बैर की भावना बनी रही और अंदरूनी विकास भी प्रभावित हुआ। जापान का आधुनिकीकरण ऐसे वातावरण में हुआ जहाँ पश्िचमी साम्राज्यवादी ताव़्ाफतों काप्रभुत्त्व था। हालांकि जापान ने उनकी नकल की, पर साथ ही अपने हल ढूँढ़ने की कोश्िाश भी की। जापानी राष्ट्रवाद पर इन मज़्ाबूरियों का प्रभाव है - एक ओर जहाँ जापानी एश्िाया को पश्िचमी आिापत्य से मुक्त रखने की उम्मीद करते थे, दूसरे लोगों के लिए यही विचारसाम्राज्य का निमार्ण करने के लिए महत्त्वपूणर् कारक सि( हुए। यहाँ यह उल्लेख करना ज़्ारूरी है कि सामाजिक और राजनीतिक संस्थानों के सुधार और रोज़्ामरार् की ¯जदगी को बदलने के लिए केवल परंपराओं को पुनजीर्वित करने या ज़़्ाबरदस्ती उन्हें पकड़े रखने या सँभालने का सवाल नहीं था बल्िक उन्हें नए और अलग रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल करने की बात थी। उदाहरण के लिए, मेजी स्वूफली प(ति ने यूरोपीय और अमरीकी प्रथाओं के अनुरूप नये विषयों की शुरुआत की। ¯कतु पाठ्यचयार् का मुख्य उद्देश्य निष्ठावान नागरिक बनाना था। नैतिकशास्त्रा का विषय पढ़ना अनिवायर् था जिसमें सम्राट के प्रति वप़्ाफादारी पर ज़्ाोर दिया जाता था। इसी तरह परिवार में और रोजमरार् की ¯ज़्ादगी में आए बदलाव विदेशी़और देशी विचारों को मिला कर वुफछ नया बनाने की कोश्िाश को दशार्ते हैं। चीन का आधुनिकीकरण का सप़्ाफर बहुत अलग था। पश्िचमी और जापानी, दोनों ही व्िाफस्म के विदेशी साम्राज्यवाद ने सारे नियंत्राण को कमजोर बनाया और राजनीतिक और सामाजिक़व्यवस्था तोड़ने के लिए माहौल बना दिया। इसके चलते ज़्यादातर लोगों को बहुत से दुख - ददर् सहने पड़े। यु( सामंतवाद, लूटमार और गृह - यु( ने बहुत से लोगों की जान ले ली। जापानी हमले की बबर्रता से भी भारी तादाद में लोगों की जानें गईं। प्रावृफतिक त्रासदियों ने बोझों को और बढ़ा दिया। 19वीं और 20वीं शताब्दी में परंपराओं को ठुकराया गया और राष्ट्रीय एकता तथा सुदृढ़ता निमिर्त करने के रास्तों की तलाश की गइर्। चीन के साम्यवादी दल और उसके समथर्कों ने परंपरा को खत्म करने की लड़ाइर् लड़ी। उन्हें लगा कि परंपरा जनसमुदाय को गरीबी में जकड़े हुए है, महिलाओं को अधीन बनाती है और देश को अविकसित रखती है। साम्यवादी दल ने लोगों को अिाकार एवं सत्ता देने की बात की परन्तु वास्तव में उसने बहुत ही वेंफद्रीकृत राज्य की स्थापना की। साम्यवादी कायर्क्रम की सपफलता ने उम्मीद का वादा किया लेकिन दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था ने मुक्ित और समानता के आदशो± को ऐसी नारेबाशी में बदल दिया, जो लोगों को चालाकी से प्रभावित कर अपने काबू में लाने में काम आती थी। तथापि इससे शताब्िदयों पुरानी असमानताएँ हट गईं, श्िाक्षा का विस्तार हुआ और जनता के बीच एक जागरूकता पैदा हुइर्। पाटीर् ने अब बाज़्ाार संबंध्ी सुधर किए और चीन को आथ्िार्क दृष्िट से ताकतवर बनाने में कामयाब हुइर्, जबकि राजनीतिक व्यवस्था अब भी कड़े नियंत्राण में है। अब समाज बढ़ती असमानताओं का सामना कर रहा है और सदियों से दबी परंपराएँ पुनजीर्वित होने लगी हैं। यह नयी स्िथति एक बार पिफर यह सवाल खड़ा करती है कि चीन किस तरह अपनी धरोहर को बरकरार रखते हुए अपना विकास कर सकता है। अभ्यास संक्षेप में उत्तर दीजिए 1ण् मेजी पुनस्थार्पना से पहले की वे अहम घटनाएँ क्या थीं, जिन्होंने जापान के तीव्र आधुनिकीकरण को संभव किया? 2ण् जापान के विकास के साथ - साथ वहाँ की रोज़्ामरार् की जिं़दगी में किस तरह बदलाव आए? चचार् कीजिए। 3ण् पश्िचमी तावफतों द्वारा पेश की गइर् चुनौतियों का सामना छींग राजवंश ने वैफसे किया? 4ण् सन यात - सेन के तीन सि(ांत क्या थे? संक्षेप में निबंध् लिख्िाए 5ण् क्या पड़ोसियों के साथ जापान के यु( और उसके पयार्वरण का विनाश तीव्र औद्योगीकरण की जापानी नीति के चलते हुआ? 6ण् क्या आप मानते हैं कि माओ त्सेतुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ित दिलाने और इसकी मौजूदा वफामयाबी की बुनियाद डालने में सपफलता प्राप्त की? निष्कषर् विश्व इतिहास के वुफछ विषयों पर इस पुस्तक ने आपका परिचय एक लंबी कालाविा से कराया जिसे प्राचीन, मध्य व आधुनिक युगों में बाँटा जा सकता है। मानव उद्भव और विकास के वुफछ प्रमुख विषय इस पुस्तक के वेंफद्र बिंदु रहे हैं। अलग - अलग अनुभागों में निम्नलिख्िात, क्रमशः लघुतर कालखंडों की चचार् की गइर् - पण् 60 लाख वषर् पूवर् से 400 इर्.पूपपण् 400 इर्.पू. - 1300 इर्पपप 800 - 1700 इर्पअ 1700 - 2000 इर्इतिहासकार प्रायः प्राचीन, मध्यकालीन या आधुनिक युग के विशेषज्ञ होते हैं, किंतु सवर्त्रा इतिहासकार के श्िाल्प की वुफछ सामान्य विशेषताएँ और समस्याएँ होती हैं। हमने प्राचीन, मध्य और आधुनिक युगों के बीच के अंतरों को म(म करने का प्रयत्न किया है, ताकि इतिहास कैसे लिखा जाता है और उसकी विवेचना कैसे की जाती है, इसका एक समग्र बोध प्राप्त हो। इसका उद्देश्य आपको पूरे मानव इतिहास की सामान्य समझ देना भी है - वह इतिहास, जो हमारी आधुनिक जड़ों के मुव़्ाफाबले कहीं ज़्यादा गहरे जाता है। इस पुस्तक से आपको अप्ऱफीका, पश्िचम तथा मध्य एश्िाया, पूवीर् एश्िाया, आॅस्ट्रेलिया, उत्तर तथा दक्ष्िाण अमरीका तथा युनाइटेड किंगडम सहित यूरोप के इतिहास की एक झलक मिली होगी। इसने आपको ‘केस स्टडी’ प(ति से परिचित कराया होगा। इन स्थानों के विस्तृत इतिहास के वणर्न का बोझ आप पर लादने की बजाय वुफछ परिघटनाओं के मुख्य उदाहरणों का अध्ययन हमें बेहतर लगा। विश्व इतिहास कइर् तरह से लिखा जा सकता है। इनमें से एक शायद सबसे पुराना तरीका लोगांे के बीच संपवर्फ पर ध्यान वेंफदि्रत करना है ताकि संस्कृतियों तथा सभ्यताओं के परस्पर संबंधों पर बल दिया जा सके और विश्व ऐतिहासिक परिवतर्न के बहुआयामी पक्षों का अन्वेषण किया जा सके। एक अन्य तरीका सापेक्षतः स्वावलंबी किंतु विस्तृत होते आथ्िार्क विनिमय के क्षेत्रों की पहचान करना है, जो संस्कृति और सत्ता के वुफछ रूपों को बनाए रखते हैं। राष्ट्रों और क्षेत्रों के ऐतिहासिक अनुभवों में अंतर स्पष्ट कर उनकी विश्िाष्टताओं को उभारना तीसरी वििा है। आपको इन तीनों वििायों के संकेत इस पुस्तक में मिले होंगे। किंतु समाजों ;तथा व्यक्ितयोंद्ध में विभ्िान्नताओं के साथ - साथ उनमें समानताएँ भी परिलक्ष्िात होती हैं। मानव समुदायों के बीच अंतस±बंध् और समानताएँ हमेशा से रही हैं। वैश्िवक तथा स्थानीय ;‘रेत के कण में विश्व’द्ध, ‘मुख्यधारा’ तथा ‘हाश्िाया’, सामान्य तथा विश्िाष्ट के आपसी संबंधों के बारे में आपने इस पुस्तक से जो वुफछ सीखा होगा, वह इतिहास के अध्ययन का एक आकषर्क पहलू है। हमारा विवरण अप़्रफीका, एश्िाया तथा यूरोप में बिखरी बस्ितयों से शुरू हुआ था। वहाँ से हम मेसोपोटामिया के शहरी जीवन की ओर बढ़े। आरंभ्िाक साम्राज्य मेसोपोटामिया, मिस्र, चीन, प़्ाफारस तथा भारत में शहरों के ही इदर् - गिदर् बने थे। इसके बाद इनसे अिाक विस्तृत यूनानी ;मकदूनियाइर्द्ध, रोमन, अरब तथा ;1200 सेद्ध मंगोल साम्राज्य बने। इन साम्राज्यों में व्यापार - प्रणालियाँ, प्रौद्योगिकी तथा शासन अक्सर अत्यिाक जटिल होते थे। ज़्यादातर वे एक लिख्िात भाषा के प्रभावी प्रयोग पर निभर्र थे। दूसरे सहड्डाब्िद के मध्य में ;1400 इर्. सेद्ध पश्िचमी यूरोप में प्रौद्योगिकीय और संगठनात्मक बदलावों के कारण मानव इतिहास में एक नए युग का सूत्रापात हुआ। ये सभ्यता के ‘पुनजार्गरण’ या ‘पुनजर्न्म’ से जुड़े थे। इनका शुरुआती असर उत्तरी इटली में हुआ, लेकिन जल्दी ही यह पूरे यूरोप में पैफल गया। यह पुनजार्गरण उस क्षेत्रा के नगरीय जीवन और भूमध्यसागर की मुस्िलम दुनिया तथा बाइशेंटाइन के साथ आदान - प्रदान का नतीजा था। समय के साथ सोलहवीं सदी में विचार तथा खोज अन्वेषकों तथा विजेताओं के साथ अमरीका ;उत्तर और दक्ष्िाणद्ध पहँुच गए। इनमें से वुफछ विचार बाद में जापान, भारत और दूसरी जगहों तक भी पहुँचे। विश्व - व्यापार, राजनीति तथा संस्कृति में यूरोप का वचर्स्व अभी व़्ाफायम नहीं हुआ था। यह अठारहवीं तथा उन्नीसवीं सदी की विशेषता बनी, जब बि्रटेन में औद्योगिक क्रांति हुइर् और शेष यूरोप में पैफल गइर्। बि्रटेन, प्रफांस और जमर्नी ने अप्ऱफीका तथा एश्िाया के वुफछ हिस्सों पर औपनिवेश्िाक सत्ता हासिल कर ली जो पुराने साम्राज्यों से अिाक शक्ितशाली थी। बीसवीं सदी के मध्य तक जिस प्रौद्योगिकी, आथ्िार्क जीवन और संस्कृति ने कभी यूरोपीय राष्ट्रों को शक्ित प्रदान की थी, वे अलग - अलग रूपों में शेष विश्व में पैफल चुके थे और इन्होंने आधुनिक जीवन की नींव रखी। आपने विभ्िान्न अध्यायों में उद्धृत अंशों को देखा होगा। इनमें कइर् ऐसे स्रोतों से लिए गए हैं, जिन्हें इतिहासकार ‘प्राथमिक ड्डोत’ कहते हैं। विद्वान ऐसी ही सामगि्रयों से अपने ‘तथ्य’ हासिल कर इतिहास रचते हैं। वे इनका आलोचनात्मक अध्ययन करते हैं और इन ड्डोतों की अस्पष्टता पर विशेष ध्यान देते हैं। एक ही ड्डोत का प्रयोग करनेवाले इतिहासकार भ्िान्न बल्िक विपरीत राय पेश कर सकते हैं। दूसरे मानव विज्ञानों की भांति इतिहास से भी अलग - अलग तरह की बातें कहलवाइर् जा सकती हैं। यह ऐतिहासिक तथ्यों और इतिहासकार के तकोर्ं के बीच जटिल संबंध की वजह से है। विद्यालय के अंतिम वषर् में आप भारतीय ;या दक्ष्िाण एश्िायाइर्द्ध इतिहास में हड़प्पा युग से आधुनिक भारत के संविधान बनने तक के इतिहास के वुफछ पहलुओं का अध्ययन करेंगे। एक बार पिफर राजनैतिक, आथ्िार्क, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के विवेकपूणर् मिश्रण पर बल होगा जो आपको केस - स्टडी प(ति से वुफछ चुने हुए विषयों का अध्ययन करने के लिए आमंत्रिात करेगा। हमें उम्मीद है कि ये पुस्तवेंफ आपको कइर् प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने में मदद करेंगी। इनमें से प्रमुख है, ‘इतिहास पढ़ने की ज़रूरत क्या है?’ क्या आपको पता है कि प्रतिभाशाली मध्ययुग विशेषज्ञ मावर्फ ब्लाॅक ने दूसरे विश्वयु( में खाइर् में रहते हुए लिखी गइर् अपनी पुस्तक द हिस्टोरियन्स क्राफ्रट की शुरुआत एक छोटे बच्चे के प्रश्न से की थी, ‘डैडी, मुझे बताइए, इतिहास का प़्ाफायदा क्या है?’

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