दुनिया को जोड़ना। 1927 में 25 वषीर्य चाल्सर् ¯लडबगर् की एक इंजन वाले हवाइर् जहाज में अंटलांटिक महासागर को पार करते हुए न्यूयावर्फ से पैरिस, की यात्रा। आध्ुनिकीकरण की ओर पिछले भाग में आपने मध्यकालीन और प्रारम्िभक आध्ुनिक विश्व की वुफछ महत्त्वपूणर् ऐतिहासिक प्रियाओं का अध्ययन किया - सामंतवाद, यूरोपीय पुनजार्गरण और यूरोप तथा अमरीका के बीच सम्पवर्फ अथवा टकराव। जैसा कि आप समझ गये होंगे, आधुनिक विश्व को बनाने में जिन घटनाओं का योगदान रहा वे इसी समय हुईंऋ खासतौर से 15वीं शताब्दी के मध्य से। विश्व इतिहास के दो अन्य परिवतर्नों ने ऐसी शमीन तैयार की जिसे ‘आधुनिकीकरण’ कहा गया। यह थे औद्योगिक क्रांति और राजनीतिक क्रांतियों की लड़ी जिसने प्रजा को नागरिक में तब्दील कर दिया। इन राजनीतिक क्रांतियों की शुरुआत अमरीकी क्रांति ;1776 - 81द्ध और प्रफांसीसी क्रांति ;1789 - 94द्ध से हुइर्। बि्रटेन दुनिया का पहला औद्योगिक राष्ट्र रहा है। विषय 9 में आप इसका अध्ययन करेंगे कि ऐसा वैफसे और क्यों हुआ। लंबे अरसे से यह समझा जाता था कि बि्रटेन के औद्योगीकरण ने दूसरे देशों के औद्योगीकरण के लिए आदशर् नमूना ;माॅडलद्ध प्रस्तुत किया। विषय 9 में किए गए विचार - विमशर् से आपको पता चलेगा कि इतिहासकारों ने औद्योगीकरण संबंध्ी पहले के वुफछ विचारों को लेकर प्रश्न उठाए हैं। हालाँकि प्रत्येक देश ने दूसरों के अनुभवों से बहुत वुफछ सीखा पिफर भी उसने औद्योगीकरण के प्रस्तुत नमूनों का अंधनुकरण नहीं किया। मिसाल के तौर पर बि्रटेन में कोयला और सूती कपड़े के उद्योगों का विकास औद्योगीकरण के पहले चरण में हुआ जबकि रेलवे के आविष्कार ने इस प्रिया के दूसरे चरण की शुरुआत की। अन्य देशों, जैसे रूस में औद्योगिक विकास काप़फी देर से शुरू हुआ - 19वीं शताब्दी के आख्िार में - यहाँ रेलवे और भारी उद्योग औद्योगीकरण के पहले चरण में ही विकसित होने लगे। इसी तरह औद्योगीकरण में राज्य और बैंकों की भूमिका प्रत्येक देश में भ्िान्न - भ्िान्न रही है। विषय 9 में जिस तरह बि्रटेन के औद्योगिक विकास की चचार् की गइर् है उससे अन्य औद्योगिक देशों जैसे अमरीका और जमर्नीजो महत्त्वपूणर् औद्योगिक शक्ितयाँ रहे हैं, के औद्योगिक प्रगति के बारे में आपकी जिज्ञासा जगेगी। विषय 9 इस बात पर भी शोर देता है कि बि्रटेन को औद्योगीकरण की कितनी मानवीय और भौतिक कीमत चुकानी पड़ी - गरीब मशदूर खासकर बच्चों की दुदर्शा, पयार्वरण का क्षय और हैशा तथा तपेदिक की महामारियाँ। इसी तरह से विषय 11 में आप जापान में वैफडमियम और पारे के शहर 187आध्ुनिकीकरण की ओर के पैफलने से हुए औद्योगिक प्रदूषण के बारे में पढ़ेंगे, जिसने लोगों को अंधध्ंुध् औद्योगीकरण के ख्िालाप़फ जन आंदोलन करने के लिए जागृत किया। यूरोपीय शक्ितयों ने औद्योगिक क्रांति के बहुत पहले से अमरीका, एश्िाया और दक्ष्िाण अप्ऱफीका के हिस्सों में उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया था। 10वाँ विषय आपको यूरोपीय उपनिवेश्िायों द्वारा अमरीका और आॅस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के साथ किए गए बतार्व की कहानी बताता है। आबादकारों की बुजुर्आ मानसिकता ने उन्हें शमीन और पानी से लेकर सब वुफछ बेचने और खरीदने के लिए प्रेरित किया। लेकिन मूल निवासी, जो यूरोपीय अमरीकियों को असभ्य नशर आते थे, का पूछना था ‘अगर आप हवा की ताशगी और पानी के बुलबुलों के मालिक नहीं हैं, तो उसे कोइर् वैफसे खरीद सकता है?’ मूल निवासियों को शमीन, मछली और जानवरों पर मालिकाना हक जताने की शरूरत महसूस नहीं हुइर्। उन्हें इन चीशों को बेचने और खरीदने की वस्तुओं के रूप में बदलने की कोइर् इच्छा नहीं थी। अगर चीशों के आदान - प्रदान की शरूरत थी, तो उन्हें आसानी से उपहार में दिया जा सकता था। शाहिर है कि मूल निवासी और यूरोपीय, सभ्यता की प्रतियोगीअवधरणाओं का प्रतिनिध्ित्व कर रहे थे। मूल निवासियों ने यूरोपीय अतिवृष्िट से अपनी संस्कृति को मिटने नहीं दिया। हालाँकि 20वीं सदी के मध्य की अमरीकी और कनाडा की सरकारें चाहतीथीं कि मूल निवासी ‘मुख्यधरा से जुड़ें’। इसी दौर में आस्ट्रेलिया में सत्ताधरियों ने उनकी परंपराऔर संस्कृति को पूरी तरह से नशरअंदाश करने का प्रयास किया। किसी को हैरत हो सकती है कि आख्िार ‘मुख्यधरा’ का मतलब क्या है? आथ्िार्क और राजनीतिक शक्ित किस तरह ‘मुख्यधाराकी संस्कृति’ के निमार्ण को प्रभावित करती है?पश्िचमी पूँजीवाद - व्यापारिक, औद्योगिक और वित्तीय - और 20वीं सदी के शुरू के जापानी पूँजीवाद ने तीसरी दुनिया के बहुत से हिस्सों में उपनिवेश बनाये। इनमें से वुफछ ऐसे उपनिवेश थे जहाँ यूरोपीय गोरे लोग बस गए। अन्य, जैसे कि भारत में बि्रटिश शासन, सीध्े औपनिवेश्िाक नियंत्राण के उदाहरण हैं। 19वीं और प्रारंभ्िाक 20वीं सदी का चीन उपनिवेशवाद वफी तीसरी किस्मका उदाहरण है। यहाँ बि्रटेन, प्रफांस, जमर्नी, रूस, अमरीका और जापान ने बिना सत्ता हाथ में लिए चीन के मामलों में दखलअंदाशी की। उन्होंने देश के संसाध्नों से भरपूर प़फायदा उठाया। इससे चीन की प्रभुसत्ता को गंभीर ठेस पहुँची और चीन का दजार् अध्र् - उपनिवेश का हो गया। लगभग सभी देशों में शक्ितशाली राष्ट्रीय आंदोलनों ने औपनिवेश्िाक शोषण को चुनौती दी। वैसे राष्ट्रवाद बिना औपनिवेश्िाक संदभर् के भी उभरा जैसे कि पश्िचम या जापान में। सभी किस्मों केराष्ट्रवाद लोक प्रभुसत्ता के सि(ांतों पर आधरित हैं। राष्ट्रीय आंदोलनों का मानना है कि राजनीतिकसत्ता जनता के हाथ में होनी चाहिए और इसी वजह से राष्ट्रवाद एक आध्ुनिक अवधरणा है।नागरिक राष्ट्रवाद भाषा, ध्मर्, जाति और लिंग पर ध्यान दिए बिना प्रभुसत्ता सभी लोगों के हाथ में प्रदान करता है। यह बराबर अध्िकार वाले नागरिकों का समुदाय बनाने की कोश्िाश करता है और राष्ट्रीयता को जातीयता और ध्मर् से परे हटकर नागरिकता से परिभाष्िात करता है। जातीय और धामिर्क राष्ट्रवाद राष्ट्रीय एकता का निमार्ण किसी भाषा, ध्मर् या वुफछ परंपराओं के इदर् - गिदर् बनाने की कोश्िाश करते हैं जहाँ लोगों को जातीयता के आधर पर परिभाष्िात किया जाता है, समाननागरिकता के आधर पर नहीं। बहु जातीय देश में जातीय राष्ट्रवादी प्रभुसत्ता चुने हुए समूहों - समुदायों तक सीमित कर सकते हैं, जिन्हें अल्पसंख्यक समुदायों की तुलना में बेहतर समझा दुनिया को जोड़ना। जेलिप्िसत्ज की पिफगर नामक मू£त जो उन्होंने 1920 के दशक में बनाइर्। इस पर मध्य अप्ऱफीका की मू£तकला का असर है। दुनिया को जोड़ना। जापान की शेन चित्राकारी। पश्िचमी कलाकार ऐसे चित्रों की प्रशंसा करते थे। 1920 के दशक के अमरीका में शेन का प्रभाव ‘निराकार अभ्िाव्यंजनावादी ;एक्सप्रेशनिस्टद्ध’ चित्राकारी पर पड़ा। जाता है। समसामयिक काल में अध्िकतर पश्िचमी देश राष्ट्रीयता की जातीयता की बजाय समान अध्िकारों से परिभाष्िात करते हैं। एक प्रमुख अपवाद जमर्नी है जहाँ जातीय राष्ट्रवाद की विचारधारा का लंबा और कष्टदायी इतिहास रहा है। यह इतिहास, एक तरह से, 1806 में जमर्न राज्यों पर प्रफांस के शाही कब्जे के ख्िालाप़फ प्रतििया से शुरू हुआ। नागरिक राष्ट्रवाद की विचारधारा विश्व भर में जातीय/धमिर्क राष्ट्रवाद के साथ प्रतियोगिता करती आइर् है। यही हाल आध्ुनिक भारत, चीन और जापान में भी रहा है। जैसे औद्योगीकरण के भ्िान्न - भ्िान्न तरीके रहे हैं, वैसे ही आध्ुनिकीकरण के कइर् माॅडल देखने को मिले हैं। विभ्िान्न समाजों ने अपनी विश्िाष्ट आध्ुनिकता विकसित की है। इस मामले में जापानी और चीनी उदाहरणों से बहुत वुफछ समझ में आता है। जापान उपनिवेशी नियंत्राण से आशाद रहने में सपफल रहा और 20वीं सदी के दौरान तेशी से आथ्िार्क और औद्योगिक प्रगति कर सका। द्वितीय विश्व यु( में हुइर् शमर्नाक हार के बाद जापानी अथर्व्यवस्था के पुननिर्मार्ण को केवल यु( के बाद के चमत्कार के रूप में नहीं देखना चाहिए। जैसा कि विषय 11 दिखाता है, यह उस उन्नति का नतीजा था जो जापान 19वीं और 20वीं शताब्दी के शुरू में बनाने में कामयाब हुआ था। उदाहरण के लिए, क्या आपको मालूम है कि 1910 तक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने के लिए प़फीस लगभग खत्म हो गइर् थी और सब बच्चों के लिए दाख्िाला अनिवायर् था? पिफर भी जापानी आध्ुनिकीकरण की, अन्य किसी भी देश की तरह, अपनी दिक्कतें थींः लोकतंत्रा और सैन्यवाद के बीच, जातीय राष्ट्रवाद और नागरिक राष्ट्र निमार्ण के बीच और जिसे बहुत से जापानी ‘परंपरा’ और ‘पश्िचमीकरण’ कहते हैं। चीनियों ने औपनिवेश्िाक शोषण का और अपने नौकरशाह - सामंत वगर् का प्रतिरोध् किसान विद्रोह, सुधर और क्रांति के शरिये किया। 1930 के दशक के शुरुआती सालों में चीनी साम्यवादी पाटीर्, जिसकी ताकत किसानों में थी, ने औपनिवेश्िाक शक्ितयों का और देश के वुफलीन वगर् का प्रतिनिध्ित्व कर रहे राष्ट्रवादियों का सामना करना शुरू किया। उन्होंने अपने विचार देश के वुफछ चुने हुए हिस्सों में आशमाने शुरू किये। उनकी समतावादी विचारधरा, भूमि सुधरों पर शोर, और महिलाओं की समस्याओं के प्रति जागरूकता ने 1949 में विदेशी उपनिवेशवाद और राष्ट्रवादियोंको उखाड़ पेंफकने में मदद की। एक बार सत्ता में आने के बाद वे असमानताएँ घटाने, श्िाक्षा पैफलाने और राजनीतिक जागरूकता बनाने में सपफल रहे। इसके बावजूद, देश के एक - पाटीर् ढाँचा और राज्य - प्रायोजित दमन ने, 1960 के दशक के मध्य के बाद राजनीतिक व्यवस्था के साथ बढ़ते असंतोष में योगदान किया। लेकिन साम्यवादी पाटीर् काप़फी हद तक देश पर अपना नियंत्राण रख पाइर् है क्योंकि बाशार के वुफछ सि(ांतों को अपनाकर उसने खुद का पुनराविष्कार किया और चीन को आथ्िार्क शक्ित में तब्दील करने के लिए कड़ी मेहनत की है। विभ्िान्न देशों ने आध्ुनिकता को अलग - अलग तरीके से समझा है और अलग - अलग तरीकों से प्राप्त करने की कोश्िाश की है। हर रास्ता अपनी परिस्िथति और विचारों के संदभर् में दिलचस्प कहानी पेश करता है। यह भाग उस कहानी के वुफछ पहलुओं से आपका परिचय करवाएगा। कालक्रम चार ;लगभग 1700.2000द्ध यह कालरेखा आपको यह बताएगी कि पिछले तीन सौ वषोर्ं में दुनिया के अलग - अलग भागों में क्या घटित हो रहा था और किस प्रकार विभ्िान्न देशों के लोग हमारे आध्ुनिक विश्व के निमार्ण में क्या योगदान दे रहे थे। आपको यह विश्व में पिछली शताब्दी में हुए अप़्रफीका के दासμव्यापार और दक्ष्िाण अप्ऱफीका में रंगभेद शासन की स्थापना, यूरोप में सामाजिक आंदोलनों, राष्ट्र राज्यों के निमार्ण, साम्राज्ियक शक्ितयों के विस्तार, उपनिवेशीकरण की प्रिया, जनतंत्राीय और उपनिवेश विरोध्ी आंदोलनों के विषय में बताएगी। यह आपको वुफछ उन अन्वेषणों और प्रौद्योगिक विकास के विषय में भी जानकारी देगी जो आध्ुनिकता संबंध्ी विचारों के सहयोगी रहे। जैसा कि सभी कालरेखाओं के साथ हुआ है, कालरेखा वुफछ तिथ्िायों पर ही प्रकाश डालती है। इसके अलावा वुफछ और तिथ्िायाँ भी हैं जो महत्त्वपूणर् हैं। जब आप इन कालरेखाओं की कडि़यों को देखते हैं तो यह न सोचें कि आपको केवल इन्हीं तिथ्िायों को ही जानना है। इसका भी पता लगाएँ कि क्यों विभ्िान्न कालों की कालरेखाएँ विभ्िान्न तिथ्िायों पर प्रकाश डालती हैं और इनका चयन आपको यह सब बताता है। तिथ्िा अप्ऱफीका यूरोप 1720.30 पश्िचम अप़्रफीका में स्िथत दाहोमी के राजा अग़ाज ;1724μ34द्ध ने दासμव्यापार’ पर प्रतिबंध् लगायाऋ 1740 इर्. में इसे पिफर से लागू किया गया 1730.40 वैफरोलस लिनेअएस ;ब्ंतवसने स्पददंमने द्ध ने पौधें और जानवरों का वगीर्करण करने के लिए एक वगिर्कीय प्रणाली ;जंगवदवदपब ेलेजमउद्ध की खोज की ;1735द्ध 1740.1750 1750.1760 दक्ष्िाण अप्रफीका के केप टाउन में पहली बारचेचक ;1755द्ध का प्रकोप हुआ जिसे नाविकों नेपैफलाया 1760.1770 1770.1780 अंतराष्ट्रीय दास - व्यापार अपने चरम उत्कषर् पर था। सभी ‘उपनिवेश्िाक शक्ितयाँ दास - व्यापार कर रही थीं। लाखों अश्वेत अप्रफीकी लोगों को प्रत्येक वषर् अटलांटिक के पार भेजा जाता था जिनमें दो तिहाइर् समुद्री यात्रा के दौरान मर जाते थे रूस में इमेलियन पगाचेव ;म्उमसपंद च्नहंबीमअद्ध ने कृषक विद्रोह ;1773.75द्ध का नेतृत्व किया 1780.90 Úांसीसी क्रांति’ ;1789द्ध का प्रारंभ 1790.1800 1800.1810 मोहम्मद अली ने मिड्ड में शासन किया, 1805.48य मिड्ड आॅटोमन साम्राज्य से अलग हो गया 1810.1820 1820.30 पश्िचम अप़्रफीका में लाइबेरिया की स्थापना ;1822द्ध जो स्वतंत्रा दासों का देश था लुइर् ब्रेल ;स्वनपे ठतंपससमद्ध ने अंगुलियों से पढ़नेकी प्रणाली’ को विकसित किया ;1823द्धऋ इंग्लैण्डमें यात्राी रेलगाड़ी चलाइर् गइर् ;1825द्ध 1830.40 अब्दुल - कादिर ने प्रफांसीसियों के अल्जीरिया में बसने के विरु( ;1832μ47द्ध आंदोलन किया 1840.50 अनेक यूरोपीय देशों में उदारवादी और सामाजिक आंदोलन ;1848द्ध 1850.60 तिथ्िा अप्ऱफीका यूरोप 1860.70 विश्व के सबसे महत्वपूणर् व्यापारिक मागोर्ं में से एक स्वेज नहर’ व्यापार हेतु खोली गइर् रूसी कृष्िा - दासों ;ेमतेिद्ध को स्वंतत्रा किया गया ;1861द्ध 1870.80 जमर्नी और इटली एक संयुक्त राष्ट्र राज्यों के रूप में उभर कर आए 1880.90 यूरोप के लोगों का‘अप्ऱफीका के लिए संघषर्’ प्रारंभ हुआ 1890.1900 पहली प्ि़ाफल्म का निमार्ण ;1895द्धऋ पहला ओलंपिक खेल एथेंस में संपन्न हुआ ;1896द्ध 1900.1910 महात्मा गांध्ी’ ने नस्लवादी कानूनों के ख्िालापफ सत्याग्रह की वकालत की ;1906द्ध 1910.1920 दक्ष्िाण अप्ऱफीका ने श्वेत लोगों के लिए 87 प्रतिशत भूमि आरक्ष्िात करने हेतु कानून बनाए ;1913द्ध प्रथम विश्व यु( ;1914 - 1918द्ध, 1917 की रूसी क्रांति 1920.30 मुस्तप़्ाफा वफमाल के नेतृत्व में तुकीर् गणराज्य बना ;1923द्ध 1930.40 अंगोला से मोशाम्िबक तक प्रथम ट्रांस - अÚ़ ीकी रेलसेवा पूणर् हुइर् ;1931द्ध हिटलर ने जमर्न शासन की बागडोर हथ्िाया ली ;1933द्धऋ द्वितीय विश्व यु( ;1939 - 45द्ध 1940.50 दक्ष्िाण अप्ऱफीका में अप्ऱफीकी नेशनल पाटीर् की विजय ;1948द्ध, रंगभेद नीति की स्थापना बि्रटेन ने आयरिश स्वतंत्राता को मान्यता दी ;1949द्ध 1950.60 उप - सहारा अप्ऱफीकी क्षेत्रा में घाना प्रथम स्वतंत्रा देश बना ;1957द्ध डी.एन.ए. की खोजऋ रूस ने अंतरिक्षयान स्पूतनिक भेजा ;1957द्ध 1960.70 अप्ऱफीकी एकता संगठन की स्थापना ;1963द्ध यूरोप में विरोध् आंदोलन ;1968द्ध 1970.80 1980.90 मिख़ाइल गोरबाचेव सोवियत रूस के नेता बने ;1985द्धऋ संपूणर् विश्व में वेब का प्रारंभ ;1989द्ध 1990.2000 दक्ष्िाण अप्ऱफीका में नेल्सन मंडेला’ को रिहा कियागया ;1990द्धऋ रंगभेद को समाप्त करने की प्रियाआरंभ हुइर् वैज्ञानिकों ने डाॅली ;1997द्ध क्लोन भेड़ बनाइर् जिससे आनुवंश्िाक इंजीनियरिंग की सीमा के बारे में नए विवाद प्रारंभ हुए तिथ्िा 1720.30 एश्िाया दक्ष्िाणी एश्िाया गुजिन तुशू जिचेंग’ ;ळनरपद जनेीन रपबीमदहद्ध नामक सबसे विशाल विश्वकोश को चीन के मंचूशासक कांगक्षी ने छपा कर अध्िकृत किया 1730.40 1740.1750 मराठों ने उत्तरी भारत में अपनी प्रभुता का विस्तार किया 1750.1760 एओकी कोन्यो ;।वाप ज्ञवदलवद्ध, एक जापानी विद्वान नेडच - जापानी शब्दकोश का संकलन किया ;1758द्ध। राबटर् क्लाइव ने बंगाल के नवाब को प्लासी के यु( में पराजित किया ;1757द्ध 1760.1770 1770.1780 1780.90 अंग्रेशांे ने भारत से चीन को अपफीम’ का नियार्त किया जिसमें अत्यध्िक वृि हुइर् 1790.1800 रणजीत सिंह’ ने पंजाब में सिख राज्य की स्थापना की;1799द्ध 1800.1810 1810.1820 1820.30 जावा के लोगों की डचों के ख्िालापफ बग़्ाावत ;1825 - 30द्ध सती प्रथा को ग़्ौर वफानूनी घोष्िात किया गया ;1829द्ध 1830.40 आॅटोमन सुल्तान अब्दुल मज़्ाीद ने आध्ुनिकीकरण के कायर्क्रम शुरू किए ;1839द्ध 1840.50 1850.60 थाइर्लैंड के राजा रामा चतुथर् का शासन, उसने अपने देश मंे विदेशी व्यापार की शुरुआत की ;1853द्ध रेल और टेलीग्रापफ लाइन का आरंभ ;1853द्धऋ महान विद्रोह’ ;1857द्ध 1860.70 Úांसीसियों के इंडोचीन ;दक्ष्िाण - एश्िायाद्ध में आध्िपत्य का प्रारंभ ;1862द्ध 1870.80 जापान की प्रथम रेल - सेवा, टोकियो से याकोहामा, का प्रारंभ ;1872द्ध दक्कन और दक्ष्िाण भारत में अकाल ;1876 - 78द्ध,पचास लाख से अध्िक लोगों की मृत्यु 1880.90 बि्रटेन ने बमार् ;म्यांमारद्ध पर अध्िकार किया ;1885 - 86द्ध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना’ ;1885द्ध 1890.1900 प्रथम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, 1885 तिथ्िा एश्िाया दक्ष्िाणी एश्िाया 1900.1910 जापानी जलसेना ने रूसी जहाज़्ाी बेड़ों को परास्तकिया ;1905द्ध 1910.1920 बेल्पफोर ;ठंसविनतद्ध घोषणा - पत्रा ने पिफलिस्तीन में यहूदियों को स्वदेश देने का आश्वासन दिया ;1917द्ध 1920.30 महात्मा गांध्ी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया ;1921द्धऋ इर्.वी. रामास्वामी नायकर ने तमिलनाडु में आत्म - सम्मान आंदोलन प्रारंभ किया ;1925द्ध 1930.40 इरावफ से सीरिया तक बि्रटिश तेल पाइपलाइन बनी ;1934द्ध अदेर्शीर इर्रानी की आलम आरा ;1931द्ध सबसे पहली टाॅकी प्ि़ाफल्म थी 1940.50 संयुक्त राष्ट्र अमरीका ने जापानी नगर हिरोश्िामा औरनागासाकी’ ;1945द्ध पर अणु बम गिराया जिसमेंलगभग 1,20,000 व्यक्ितयों की मृत्यु हुइर् बाद मेंबहुत से लोग विकिरण के प्रभाव से मरेऋ चीनीलोक - गणतंत्रा का संघटन ;1949द्ध भारत छोड़ो आंदोलन ;1942द्धऋ भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्राता मिली ;1947द्ध 1950.60 बांदुंग ;ठंदकनदहद्ध सम्मेलन ;1955द्ध ने गुट निरपेक्ष आंदोलन को मज़्ाबूत किया भारत गणतंत्रा’ ;1950द्ध बना 1960.70 पिफलिस्तीनी शरणाथ्िार्यों को एकत्रिात करने के लिएअरब नेताओं ने पिफलस्तीन मुक्ित संगठन की स्थापनाकी ;1964द्धऋ वियतनाम में यु( ;1965 - 73द्ध सिरमावो भंडारनायके’ ;ैपतपउंअव ठींदकंतदंपामद्ध विश्व की प्रथम महिला प्रधनमंत्राी ;1960द्ध। 1970.80 इर्रान के शाह का तख्ता - पलट दिया गया ;1979द्ध बांग्लादेश स्वतंत्रा राष्ट्र बना ;1971द्ध 1980.90 बेगिंग, चीन के तिआननमेन चैक ;ज्पंदंदउमद ैुनंतमद्ध में प्रजातंत्रा के लिए विशाल प्रदशर्न ;1989द्ध भोपाल यूनियन काबार्इड के कीटनाशी ;चमेजपबपकमेद्ध प्लांट में रिसाव ;1984द्ध। यह इतिहास में बहुत हीभयंकर औद्योगिक दुघर्टना थी जिसमें हज़्ाारों व्यक्ितयोंकी मृत्यु हुइर् 1990.2000 इराव़्ाफ, वुफवैत और अमरीका के मध्य खाड़ी यु( भारत और पाकिस्तान ने नाभ्िाकीय परीक्षण ;दनबसमंत जमेजेद्ध किए ;1998द्ध तिथ्िा अमरीका आस्ट्रेलिया/प्रशांत महासागरीय द्वीप 1720.30 पुतर्गालियों ने ब्राशील में काॅपफी का प्रचलन किया ;1727द्ध डच नाविक रोगेवीन ;त्वहहमअममदद्ध समोआ द्वीपों और प्रशांत महासागर के इर्स्टर द्वीप में पहुँचा ;1722द्ध 1730.40 स्टोनो दास विद्रोह का नेतृत्व एक श्िाक्ष्िात दास जेमी ने किया ;1739द्ध 1740.1750 जुआन सेंटोस ;श्रनंद ैंदजवेद्ध, जिसे अताहुआल्पा प्प् भी कहते हैं, ने पेरू के मूल निवासियों का नेतृत्वकिया विंफतु उसका विद्रोह असपफल रहा ;1742द्ध 1750.1760 1760.1770 बि्रटिश लोगों के विरु( ओटावा कबीले के चीपफ पोन्िटयक ने विरोध् प्रदशर्न का नेतृत्व किया ;1763द्ध वैफप्टन वुफक की प्रशांत महासागरीय’ तीन यात्राओं में प्रथम ;1768 - 71द्ध 1770.1780 अमरीकी स्वतंत्राता की घोषणा ;1776द्ध 1780.90 अमरीका का संविधन बनाऋ डाॅलर का पहली बार अमरीकी मुद्रा के रूप में प्रयोग ;1787द्ध प्रथम बि्रटिश अपराध्ियों को आस्ट्रेलिया के बोटानी बे ;ठवजंदल ठंलद्ध भेजा गया ;1788द्ध 1790.1800 1800.1810 मैथ्यू िलंडसर् ;डंजजीमू थ्सपदकमतेद्ध ने परिक्रमा की और आस्ट्रेलिया नाम रखा जिसका अथर् ‘दक्ष्िाणी’ है ;1801 - 03द्ध 1810.1820 1820.30 साइमन बोलिवर’ ;ैपउवद ठवसपअंतद्ध ने वेेनिज़्ाुएला को स्वतंत्राता दिलाइर् ;1821द्ध 1830.40 अमरीका में ‘टेªल आॅपफ टियसर्’ ;आँसुओं की पगडंडीद्धऋइसमें हज़्ाारों पूवीर् क्षेत्रा के अमरीकी मूल निवासियों कोजबरन पश्िचम की ओर खदेड़ा गया जिसमें बहुतों ने मागर्में ही दम तोड़ दिया ;1838द्ध चाल्सर् डाविर्न ने प्रशांत महासागर में गलपगोस ;ळंसंचंहवेद्ध द्वीपों ;1831द्ध की यात्रा की जिसके पफलस्वरूप विकास के सि(ांत को समझने में सहायता मिली 1840.50 सेनेका पफाॅल्स ;ैमदमबं थ्ंससेद्ध, न्यूयावर्फ की बैठक में अमरीकी महिलाओं के समान अध्िकार का आह्नान किया ;1848द्ध गया बि्रटिश और माओरिस ने न्यूजीलैंड में वेटंगी ;ॅंपजंदहपद्ध की संध्ि ;1840द्ध पर हस्ताक्षर किए। इसके बादमाओरिस लोगों ने अनेक विद्रोह किए ;1844 - 88द्ध 1850.60 आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच भाप की नियमित जलयान सेवा पहली बार शुरू की गइर्र् ;1856द्ध तिथ्िा उत्तरी - दक्ष्िाणी अमरीका आस्ट्रेलिया/प्रशांत द्वीप समूह 1860.70 अमरीका में गृह यु( ;1861 - 65द्धऋ संविधन के तेरहवें संशोध्न द्वारा दास प्रथा पर प्रतिबंध् बि्रटेन से आस्ट्रेलिया बंदियों को भेजने पर प्रतिबंध् ;1868द्ध 1870.80 टेलीपफोन, रिकाडर् - प्लेयर, बिजली के बल्ब का अन्वेषण 1880.90 कोका - कोला’ की खोज ;1886द्ध 1890.1900 न्यूजीलैंड में महिलाओं को मताध्िकार मिला ;1893द्ध 1900.1910 राइट ब्रदसर् ने हवाइर् जहाज़्ा का आविष्कार किया ;1903द्ध 1910.1920 हेनरी पफोडर् ने कार उत्पादन का प्रारंभ किया ;1913द्धऋअटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ने वालीपनामा नहर खोली गइर् ;1914द्ध पश्िचम सेमेओ की एक बटा पाँच जनसंख्या इन्फ्रलूएंज़्ाा से समाप्त हो गइर् ;1918द्ध 1920.30 अमरीका की वाॅल स्ट्रीट स्टाॅक एक्सचेंज में भारी गिरावट ;1929द्धऋ इससे महामंदी का दौर शुरू हुआ, 1932 तक 1 करोड़ बीस लाख व्यक्ित बेरोशगार हो गए न्यूजीलैंड सरकार के विरु( सेमेओ के मोओ लोगों का विद्रोह ;1929द्ध 1930.40 1940.50 संयुक्त राष्ट्र अमरीका ने द्वितीय विश्व यु( में भाग लिया। 1950.60 क्यूबा क्रांति के बाद पिफदेल कास्त्रो ;थ्पकमस ब्ंेजतवद्धए 1958 सत्ता में आए 1960.70 संयुक्त राज्य अमरीका में नागरिक अध्िकार आंदोलन;1963द्ध’ ऋ अमरीकी नागरिक अध्िकार अध्िनियम;1964द्ध मंे प्रजातीय पाथर्क्य पर प्रतिबंध् लगाया। नागरिकअध्िकार नेता माटिर्न लूथर किंग की हत्या ;1968द्धऋ अमरीकी अंतरिक्ष - यात्राी चन्द्रमा की भूमि पर उतरा ;1969द्ध 1970.80 महिलाओं के आंदोलनों के कारण अमरीकी कांग्रेस ने समान अवसर अध्िनियम पारित किया टोंगा और पफीजी ने बि्रटेन की अध्ीनता से मुक्त होकर स्वतंत्राता प्राप्त की ;1970द्धऋ पपुआ न्यू गिनी आस्टेªलिया की अध्ीनता से मुक्त होकर स्वतंत्रा हो गया 1980.90 न्यूजीलैंड को नाभ्िाकीय अस्त्रामुक्त क्षेत्रा घोष्िात किया गया;1984द्धऋ रेरोटोंगा की संध्ि ने दक्ष्िाण पेसिपिफक को नाभ्िाकीयअस्त्रा मुक्त क्षेत्रा ;छनबसमंत थ्तमम र्वदमद्ध घोष्िात किया 1990.2000 ियाकलाप यदि आप इस पुस्तक में दी गइर् चार कालरेखाओं की तुलना करें तो आप बाएँ खाने में दिए गए तिथ्िा क्रम के कालों में विभ्िान्नता पाएँगे। इसके पीछे के कारणों के बारे में आप क्या सोचते हैं? अपने आप एक कालरेखा बनाने की कोश्िाश करिए और घटनाओं के अपने चयन के कारण बताइए? विषय 9 ’वहाँ दूसरी औद्योगिक क्रांति लगभग 1850 के बाद आइर् और उसमें रसायन तथा बिजली जैसे नए औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तार हुआ। उस दौरान, बि्रटेन जो पहले विश्व - भर में औद्योगिक शक्ित के रूप में अग्रणी था, पिछड़ गया और जमर्नी तथा संयुक्त राज्य अमरीका उससे आगे निकल गए। औद्योगिक क्रांति बि्रटेन में, 1780 के दशक और 1850 के दशक के बीच उद्योग और अथर्व्यवस्था का जो रूपांतरण हुआ उसे ‘प्रथम औद्योगिक क्रांति के नाम से पुकारा जाता है।’’ इस क्रांति के बि्रटेन में दूरगामी प्रभाव हुए। बाद में, यूरोप के देशों और संयुक्त राज्य अमरीका में ऐसे ही परिवतर्न हुए और उन परिवतर्नों का उन देशों तथा शेष विश्व के समाज और अथर्व्यवस्था पर भी कापफी प्रभाव पड़ा। बि्रटेन में औद्योगिक विकास का यह चरण नयी मशीनों और तकनीकियों से गहराइर् से जुड़ा है। इन मशीनों तथा तकनीकों ने पहले की हस्तश्िाल्प और हथकरघा उद्योगों की तुलना में भारी पैमाने पर माल के उत्पादन को संभव बनाया। इस अध्याय में कपास और लोहा उद्योगों में हुए परिवतर्नों की रूपरेखा दी गइर् है। बि्रटेन के उद्योगों में शक्ित के एक नए स्रोत के रूप में भाप का व्यापक रूप से प्रयोग होने लगा। इसके प्रयोग से जहाशों और रेलगाडि़यों द्वारा परिवहन की गति अध्िक तेश हो गइर्। जिन आविष्कतार्ओं तथा व्यापारियों ने ये परिवतर्न लाने में योगदान दिया था उनमें से बहुत से लोग व्यक्ितगत रूप से न तो ध्नवान थे और न ही वे बुनियादी विज्ञानों, जैसे भौतिकी अथवा रसायन में श्िाक्ष्िात थे, जैसाकि उनमें से वुफछ वैज्ञानिकों की पृष्ठभूमि पर नशर डालने से पता चलेगा। आगे चलकर औद्योगीकरण की वजह से वुफछ लोग तो समृ( हो गए, पर इसके प्रारंभ्िाक दौर को लाखों लोगों के काम करने की खराब एवं बदतर रहन - सहन की परिस्िथतयों से जोड़ा जाता है। इनमें स्ित्रायाँ और बच्चे भी शामिल थे। इससे विरोध् भड़क उठा पफलस्वरूप सरकार को कायर् करने की परिस्िथतियों के नियंत्राण के लिए वफानून बनाने पड़े। ‘औद्योगिक क्रांति’ शब्द का प्रयोग यूरोपीय विद्वानों जैसे प्रफांस में जाॅ£जस मिशले ;ळमवतहमे डपबीमसमजद्ध और जमर्नी में प्रफाॅइडिªक एंजेल्स ;थ्तपमकतपबी म्दहमसेद्ध द्वारा किया गया। अंग्रेशी में इस शब्द का प्रयोग सवर्प्रथम दाशर्निक एवं अथर्शास्त्राी आॅरनाॅल्ड टाॅयनबी ;।तदवसक ज्वलदइममए1852 - 83द्ध द्वारा उन परिवतर्नों का वणर्न करने के लिए किया गया जो बि्रटेन के औद्योगिक विकास में 1760 और 1820 के बीच हुए थे। इस दौरान बि्रटेन में जाॅजर् तृतीय का शासन था, जिसके बारे में टाॅयनबी ने आॅक्सपफोडर् विश्वविद्यालय में कइर् व्याख्यान दिए थे। उनके व्याख्यान उनकी असामयिक मृत्यु के बाद, 1884 में एक पुस्तक के रूप में प्रकाश्िात हुए जिसका नाम था लेक्चसर् आॅन दि इंडस्िट्रयल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड: पाॅपुलर एड्रसेश, नोट्स एंड अदर पै्रफग्मेंट्स ;इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति पर व्याख्यानः लोकपि्रय अभ्िाभाषण, टिप्पण्िायाँ और अन्य अंशद्ध। परवतीर् इतिहासकार टी.एस.एश्टन ;ज्ण्ैण् ।ेीजवदद्ध, पाॅल मंतू ;च्ंनस डंदजवनगद्ध और एरिक हाॅब्सबाम ;म्तपब भ्वइेइंूउद्ध मोटे तौर पर टाॅयनबी के विचारों से सहमत थे। 1780 के दशक से 1820 के दौरान कपास और लौह उद्योगों, कोयला खनन, सड़कों और नहरों के निमार्ण और विदेशी व्यापार में उल्लेखनीय आ£थक प्रगति हुइर्। एश्टन ;1889 - 1968द्ध ने तो इस औद्योगिक क्रांति का उत्सव मनाया, जब इंग्लैंड छोटी - छोटी मशीनों और कल - पुजो± की बाढ़ से मानो आप्लावित हो गया। बि्रटेन क्यों? बि्रटेन पहला देश था जिसने सवर्प्रथम आध्ुनिक औद्योगीकरण का अनुभव किया था। यह सत्राहवीं शताब्दी से राजनीतिक दृष्िट से सुदृढ़ एवं संतुलित रहा था और इसके तीनों हिस्सों - इंग्लैंड, वेल्सऔर स्काॅटलैंड - पर एक ही राजतंत्रा यानी सम्राट का एकछत्रा शासन रहा था। इसका अथर् यहहुआ कि संपूणर् राज्य में एक ही कानून व्यवस्था, एक ही सिक्का ;मुद्रा - प्रणालीद्ध और एक हीबाशार व्यवस्था थी। इस बाशार व्यवस्था में स्थानीय प्राध्िकरणों का कोइर् हस्तक्षेप नहीं था, यानीवे अपने इलाके से होकर गुजरने वाले माल पर कोइर् कर नहीं लगा सकते थे जिससे कि उसकीकीमत बढ़ जाती। सत्राहवीं शताब्दी के अंत तक आते - आते, मुद्रा का प्रयोग विनिमय यानीआदान - प्रदान के माध्यम के रूप में व्यापक रूप से होने लगा था। तब तक बहुत से लोग अपनीकमाइर्, वस्तुओं की बजाय मशदूरी और वेतन के रूप में पाने लगे। इससे लोगों को अपनी आमदनीसे खचर् करने के लिए अध्िक विकल्प प्राप्त हो गए और वस्तुओं की बिक्री के लिए बाज़्ाार काविस्तार हो गया।अठारहवीं शताब्दी में इंग्लंैड एक बड़े आ£थक परिवतर्न के दौर से गुशरा था, जिसे बाद में‘वृफष्िा - क्रांति’ कहा गया है। यह एक ऐसी प्रिया थी जिसके द्वारा बड़े शमींदारों ने अपनी हीसंपिायों के आसपास छोटे - छोटे खेत ;पफामर्द्ध खरीद लिए और गाँव की सावर्जनिक शमीनों कोघेर लियाऋ इस प्रकार उन्होंने अपनी बड़ी - बड़ी भू - संपदाएँ बना लीं जिससे खाद्य उत्पादन की वृिहुइर्। इससे भूमिहीन किसानों और गाँव की सावर्जनिक शमीनों परअंग्रेज़्ाी के सुप्रसि( लेखक ओलिवर गोल्डस्िमथअपने पशु चराने वाले चरवाहों एवं पशुपालकों को कहीं और;व्सपअमत ळवसकेउपजीए 1728 - 74द्ध ने अपनी कविताकाम - ध्ंध तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनमें से अध्िकांश‘उजड़ा गांँव’ ;दि डेशटेर्ड विलेशद्ध में इस स्िथति कालोग आसपास के शहरों में चले गए। चित्राण किया है। वुफछ पंक्ितयाँ देख्िाएः फ्वो इनसान जो अपने ध्न और अहंकार से पनप रहा है। उस शमीन के लिएशहर, व्यापार और वित्त गरीबों ने अपना सब वुफछ हारा हैऋअठारहवीं शताब्दी से, यूरोप के बहुत - से शहर क्षेत्रापफल और वो शमीन जहाँ उसकी झील बनी हैआबादी दोनों ही दृष्िटयों से बढ़ने लगे थे। यूरोप के जिन उन्नीसवो शमीन जहाँ उसके बगीचे के आगेशहरों की आबादी सन् 1750 से 1800 के बीच दोगुनी हो गइर् थी,चारों ओर पैफली हुइर् हैउनमें से ग्यारह बि्रटेन में थे। इन ग्यारह शहरों में लंदन सबसे बड़ाउस जगह जहाँ उसके घोडे़े बँध्ते हैंथा जो देश के बाशारों का वेंफद्र थाऋ बाकी बड़े - बड़े शहर भी लंदनऔर वहाँ जहाँ घोड़ों के साशो - सामान रखे जाते हैंके आस - पास ही स्िथत थे।और वहीं जहाँ उनके वुफत्ते रहा करते हैंऋलंदन ने संपूणर् विश्व में भी एक महत्त्वपूणर् स्थान प्राप्त करवो रेशमी आलस्य जिसमें उसके अंग ढके हैंलिया था। अठारहवीं शताब्दी तक आतेेूं - आत भमडलीय व्यापार कान जाने कितने पड़ोसी खेतों कीवेंफद्र, इटली तथा प्रफांस के भूमध्यसागरीय पत्तनों ;बंदरगाहद्ध से हटकर,आध्ी से श्यादा, उपजों को छीना है।य्हाॅलैंड और बि्रटेन के अटलांटिक पत्तनों पर आ गया था। इसके बादतो लंदन ने अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार के लिए )ण प्राप्ित के प्रधन स्रोत के रूप में ऐम्सटडर्म का स्थान लेलिया। साथ ही, लंदन, इंग्लैंड, अप्ऱ फीका और वेस्टइंडीज के बीच स्थापित त्रिाकोणीय व्यापार का वेंफद्रभी बन गया। अमरीका और एश्िाया में व्यापार करने वाली वंफपनियों के कायार्लय भी लंदन में थे। इंग्लैंड मंे विभ्िान्न बाशारों के बीच माल की आवाजाही प्रमुख रूप से नदी मागर् से और समुद्री तट कीसुरक्ष्िात खाडि़यों में पानी के जहाशों से होती थी। रेलमागर् का प्रसार होने तक, जलमागो± द्वारा परिवहनस्थलमागो± की तुलना में सस्ता पड़ता था और उसमें समय भी कम लगता था। कापफी पहले यहाँ तककि सन् 1724 से इंग्लैंड के पास नदियों के शरिये लगभग 1,160 मील लंबा जलमागर् था जिसमें नौकाएँचल सकती थीं और पहाड़ी इलाकों को छोड़कर, देश के अध्िकांश स्थान नदी से अध्िक से अिाक15 मील की दूरी पर थे। चूंकि इंग्लैंड की नदियों के सभी नौचालनीय भाग समुद्र से जुड़े हुए कोलब्रुकडेल ;ब्वंसइतववाकंसमद्ध का चित्राः ध्मन भऋियाँ ;बाएँ और मध्य भाग मेंद्ध और काठकोयले की भऋियाँ ;दाएँद्ध ए.पफ .वाइवेसर् ;थ्ण् टपअंतमेद्ध द्वारा की गइर् चित्राकारी 1758। 198 विश्व इतिहास के वुफछ विषय थे, इसलिए नदी पोतों के शरिये ढोया जाने वाला माल समुद्रतटीय जहाशों तक जिन्हें ‘तटपोत’;ब्वंेजमतेद्ध कहा जाता था, आसानी से ले जाया और सौंपा जा सकता था। सन् 1800 तक इन कोस्टरतटपोतों पर काम करने वाले नाविकों की संख्या 100,000 तक पहुँच गइर् थी।देश की वित्तीय प्रणाली का वेंफद्र बैंक आॅपफ इंग्लैंड ;1694 में स्थापितद्ध था। 1784 तक,इंग्लैंड में वुफल मिलाकर एक सौ से अध्िक प्राँतीय बैंक थे और अगले दस वषो± में इनकी संख्याबढ़कर तीन गुना हो गइर् थी। 1820 के दशक तक, प्राँतों में 600 से अध्िक बैंक थे और अकेलेलंदन में ही 100 से अध्िक बैंक थे। बड़े - बड़े औद्योगिक उद्यम स्थापित करने ओर चलाने के लिएआवश्यक वित्तीय साध्न इन्हीं बैंकों द्वारा उपलब्ध् कराए जाते थे।1780 के दशक से 1850 के दशक तक बि्रटेन में जो औद्योगीकरण हुआ, उसके वुफछ कारणऊपर बताए जा चुके हैं - गाँवों से आए अनेक गरीब लोग नगरों में काम करने के लिए उपलब्ध्हो गए, बड़े - बड़े उद्योग - ध्ंध्े स्थापित करने के लिए आवश्यक )ण - राश्िा उपलब्ध् कराने केलिए बैंक मौजूद थे, और परिवहन के लिए एक अच्छी व्यवस्था उपलब्ध् थी।आगे के पृष्ठों में दो नए कारकों का वणर्न किया गया हैः प्रौद्योगिकीय परिवतर्नों की शंृखला,जिसने उत्पादन के स्तरों में अचानक वृि कर दी और एक नया परिवहन तंत्रा जो रेल मागो± केनिमार्ण से तैयार हो गया। इन दोनों विकासक्रमों के मामले में, यदि बीच के समय कोसावधानीपूवर्क देखा जाए तो यही पता चलेगा कि इन विकासक्रमों और उनके व्यापक इस्तेमालके बीच वुफछ दशकों का अंतराल रहा था। इसलिए कोइर् यह न समझे कि प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा मेंकोइर् नया आविष्कार होते ही उद्योग में तत्काल उसका प्रयोग शुरू हो गया।अठारहवीं शताब्दी में वुफल मिलाकर जो 26,000 आविष्कार हुए उनमें से आध्े से अध्िकआविष्कार 1782 से 1800 तक की अवध्ि में ही हुए थे। इन आविष्कारों के कारण अनेक परिवतर्नहुए। हम इन परिवतर्नों में से केवल चार बड़े परिवतर्नों अथार्त् लौह उद्योग का रूपांतरण, कपासकी कताइर् और बुनाइर्, भाप की ‘शक्ित’ का विकास और रेलमागो± की शुरुआत पर ही चचार् करेंगे। कोयला और लोहा इंग्लैंड इस मामले में सौभाग्यशाली था कि वहाँ मशीनीकरण में काम आने वाली मुख्य सामगि्रयाँ,कोयला और लौह - अयस्क, बहुतायत से उपलब्ध् थीं। इसके अलावा, वहाँ उद्योग में काम आनेवाले अन्य खनिजऋ जैसे - सीसा, ताँबा और राँगा ;टिनद्ध भी खूब मिलते थे। ¯कतु, अठारहवींशताब्दी तक, वहाँ इस्तेमाल योग्य लोहे की कमी थी। लोहा प्रगलन’ ;ेउमसजपदहद्ध की प्रिया के द्वारा लौह खनिज में से शु( तरल - धतु के रूप में निकाला जाता है। सदियों तक, इस प्रगलन प्रिया के लिए काठ कोयले ;चारकोलद्ध का प्रयोग किया जाताथा। लेकिन इस कायर् की कइर् समस्याएँ थींः काठकोयला लंबी दूरीतक ले जाने की प्रिया में टूट जाया करता थाऋ इसकी अशु(ताओंके कारण घटिया किस्म के लोहे का ही उत्पादन होता थाऋ यहपयार्प्त मात्रा में उपलब्ध् भी नहीं था क्योंकि लकड़ी के लिएजंगल काट लिए गए थेऋ और यह उच्च तापमान पैदा नहीं करसकता था। इस समस्या का कइर् वषो± से हल ढँूढ़ा जा रहा था अंततोगत्वाश्रोपशायर के एक डबीर् परिवार ने जो स्वयं लौह - उस्ताद थे, इससमस्या का हल निकाल लिया। आध्ी शताब्दी के दौरान, इसपरिवार की तीन पीढि़यों ने ;दादा, पिता और पुत्रा जो सभी अब्राहमडबीर् के नाम से पुकारे जाते थेद्ध धतुकमर् उद्योग में क्रांति ला दी।इस क्रांति का प्रारंभ 1709 में प्रथम अब्राहम डबीर् ;1677 - 1717द्ध द्वारा किए गए आविष्कार सेहुआ। यह ध्मनभऋी ;ठसंेज नितंदबमद्ध का आविष्कार था जिसमें सवर्प्रथम ‘कोक’ का इस्तेमालकिया गया। कोक में उच्चताप उत्पन्न करने की शक्ित थी और वह ;पत्थर केद्ध कोयले से, गंध्क तथा अपद्रव्य निकालकर तैयार किया जाता था। इस आविष्कार का पफल यह हुआ कि तब सेभऋियों को काठकोयले पर निभर्र नहीं रहना पड़ा। इन भऋियों से जो पिघला हुआ लोहा निकलताथा उससे पहले की अपेक्षा अध्िक बढि़या और लंबी ढलाइर् की जा सकती थी।इस प्रिया में वुफछ और आविष्कारों द्वारा आगे और सुधर किया गया। द्वितीय डबीर्;1711 - 68द्ध ने ढलवाँ लोहे ;चपह.पतवदद्ध से पिटवाँ लोहे ;ूतवनहीज.पतवदद्ध का विकास किया जो कम भंगुर था। हेनरी कोटर् ;1740 - 1823द्ध ने आलोड़न भऋी ;चनककसपदह नितंदबमद्ध, ;जिसमें पिघले लोहे में से अशुि को दूर कियाजा सकता थाद्ध, और बेलन मिल ;रो¯लग मिलद्ध का आविष्कारकिया, जिसमें परिशोध्ित लोहे से छड़ें तैयार करने के लिए भापकी शक्ित का इस्तेमाल किया जाता था। अब लोहे सेअनेकानेक उत्पाद बनाना संभव हो गया। चूंकि लोहे मेंटिकाऊपन अध्िक था इसलिए इसे मशीनें और रोशमरार् कीचीशंे बनाने के लिए लकड़ी से बेहतर सामग्री माना जाने लगा।लकड़ी तो जल या कट - पफट सकती थी, लेकिन लोहे केभौतिक और रासायनिक गुण - ध्मर् को नियंत्रिात किया जा सकताथा। 1770 के दशक में, जोन विल्िकनसन ;1728 - 1808द्ध नेसवर्प्रथम लोहे की वुफ£सयाँ, आसव तथा शराब की भिòयांे केलिए टंकियाँ ;अंजेद्ध और लोहे की सभी आकारों की नलियाँ;पाइपेंद्ध बनाईं। 1779 में तृतीय डबीर् ;1750 - 91द्ध ने विश्व मेंपहला लोहे का पुल कोलब्रुकडेल में सेवनर्’ नदी पर बनाया।विल्िकनसन ने पानी की पाइपें ;पेरिस को पानी की आपू£त केलिए 40 मील लंबीद्ध पहली बार ढलवाँ लोहे से बनाइर्।उसके बाद, लोहा उद्योग वुफछ खास क्षेत्रों में कोयला खननतथा लोहा प्रगलन की मिली - जुली इकाइयों के रूप में वंेंफदि्रतहो गया। यह बि्रटेन का सौभाग्य ही था कि वहाँ एक हीद्रोणी - क्षेत्रा ;ठंेपदद्ध यहाँ तक कि एक ही पिðयों में उत्तमकोटि का को¯कग कोयला और उच्च - स्तर का लौह खनिजसाथ - साथ पाया जाता था। ये द्रोणी - क्षेत्रा पत्तनों के पास ही थेः कोलब्रुकडेल के पास ढलवाँ लोहे का पुल। विलियम विलियम्स द्वारा चित्राकारी, 1780 ’आगे चलकर यह इलाका‘आइरनबि्रज’ नामक गाँवके रूप में विकसित होगया मानचित्रा 1रू बि्रटेनः लौह उद्योग। स्काॅटलैंड लौह और कोयला उत्पादन क्षेत्रा उत्तरी सागर न्यूवैफसल लंकाशायर लीड्स यावर्फशायर आयरिश सागर मैनचेस्टरलिवरपूल शे.फ्र.पफील्ड श्राॅपशायर ब¯मर्घम इं ग् लैं डवेल्स स्वान सागरबि्रस्टल चैनल बि्रस्टल लंदन कार्नवाल प्रफांसइंगलिश चैनल चित्रा में एक स्त्राी को खतरनाक स्िथति में अपने पाँवों से ट्रेडमिल ;पाँव - चक्कीद्ध चलाते हुए दिखाया गया है। वहाँ ऐसे पाँच तटीय कोयला - क्षेत्रा थे जो अपने उत्पादों वफो लगभग सीध्े ही जहाशों में लदवा सकतेथे। चूँकि कोयला - क्षेत्रा समुद्र तट के पास ही थे इसलिए जहाश - निमार्ण का कारोबार औरनौपरिवहन का व्यापार खूब बढ़ा।बि्रटेन के लौह उद्योग ने 1800 से 1830 के दौरान अपने उत्पादन को चैगुना बढ़ा लिया औरउसका उत्पादन पूरे यूरोप में सबसे सस्ता था। 1820 में, एक टन ढलवाँ लोहा बनाने के लिए 8टन कोयले की शरूरत होती थी, ¯कतु 1850 तक आते - आते यह मात्रा घट गइर् और केवल 2टन कोयले से ही एक टन ढलवाँ लोहा बनाया जाने लगा। 1848 तक यह स्िथति आइर् कि बि्रटेनद्वारा पिघलाए जाने वाले लोहे की मात्रा बाकी सारी दुनिया द्वारा वुफल मिलाकर पिघलाए जाने वालेलोहे से अध्िक थी। कपास की कताइर् और बुनाइर् बि्रटिश हमेशा ऊन और सन ;लिनन बनाने के लिएद्ध से कपड़ा बुना करते थे। सत्राहवीं शताब्दीसे इंग्लैंड भारत से बड़ी लागत पर सूती कपड़े की गांठों का आयात करता रहा था। लेकिन जबभारत के हिस्सों पर इर्स्ट इंडिया वंफपनी का राजनीतिक नियंत्राण स्थापित हो गया, तब इंग्लैंड नेकपड़े के साथ - साथ कच्चे कपास ;रूइर्द्ध का आयात करना भी शुरू कर दिया जिसकी इंग्लैंडमंे आने पर कताइर् की जाती थी और उससे कपड़ा बुना जाता था।अठारहवीं सदी के प्रारंभ्िाक वषो± में कताइर् का काम इतनी ध्ीमी गति और मेहनत से किया जाताथा कि एक बुनकर को व्यस्त रखने के लिए आवश्यक धागा कातने के लिए 10 कातने वालों,अध्िकतर स्ित्रायाँ, ;स्िपनर जिनसे अंग्रेशी भाषा में प्रयुक्त शब्द ‘स्िपंस्टर’ बना हैद्ध की शरूरतपड़ती थी। इसलिए, कातने वाले दिनभर कताइर् के काम में लगे रहते थे और बुनकर बुनाइर् के लिएधागे के इंतशार में समय बबार्द करते रहते थे। लेकिन प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में अनेक आविष्कार होजाने के बाद कच्ची रूइर् को कात कर उसका धगा बनाने और उससे कपड़ा बनाने की र.फ्रतार केबीच पहले जो अंतर था वह खत्म करने में सपफलता मिल गइर्। इस कायर् को और अध्िकवुफशलतापूवर्क करने के लिए उत्पादन का काम ध्ीरे - ध्ीरे, कताइर्गरों और बुनकरों के घरों से हटकरपैफक्िट्रयों यानी कारखानों में चला गया। 1ण् उड़न तुरी करघे ;थ्सलपदह ेीनजजसम सववउद्ध का आविष्कार जाॅन के ;1704 - 64द्धद्वारा 1733 में बनाए गए .फ्रलाइंग शटल लूम यानी उड़न तुरी करघे की सहायता से कम समयमें अध्िक चैड़ा कपड़ा बनाना संभव हो गया। परिणामस्वरूप कताइर् की तत्कालीन र.फ्रतार से जितना धगा बनता था उससे कहीं श्यादा मात्रा में धगे की शरूरत होने लगी। 2ण् जेम्स हरग्रीव्श ;1720 - 78द्ध द्वारा 1765 में बनाइर् गइर् कताइर् मशीन ;ैचपददपदह रमददलद्ध एक ऐसी मशीन थी जिसपर एक अकेला व्यक्ित एक साथ कइर् धगे कात सकता था। इससे बुनकरों को उनकी आवश्यकता से अध्िक तेशी से धगा मिलने लगा। 3ण् रिचडर् आवर्फराइट ;1732 - 92द्ध द्वारा 1769 में आविष्वृफत वाॅटर प़्रेफम ;ॅंजमत तिंउमद्ध नाम की मशीन द्वारा पहले से कहीं अध्िक मशबूत धगा बनाया जाने लगा। इससे लिनन और सूती धगा दोनों को मिलाकर कपड़ा बनाने की बजाय अकेले सूती धगे से ही विशु( सूती कपड़ा बनाया जाने लगा। 4ण् ‘म्यूल’ एक ऐसी मशीन का उपनाम था जो 1779 में सैम्यूअल क्राॅम्टन ;1753 - 1827द्ध द्वारा बनाइर् गइर् थी। इससे कता हुआ धगा बहुत मशबूत और बढि़या होता था। 5ण् कपड़ा उद्योग में उन मशीनों के आविष्कारों का दौर, जो कताइर् तथा बुनाइर् कायो± के बीच संतुलन बनाने के लिए बनाइर् जा रही थीं, एडमंड काटर्राइट ;1743 - 1823द्ध द्वारा 1787 मानचित्रा 2रू बि्रटेनः सूती कपड़ा उद्योग में पाॅवरलूम यानी शक्ितचालित करघे के आविष्कार के साथ समाप्त हो गया। पावरलूम को चलाना बहुत आसान था। जब भी धगा टूटता वह अपने आप काम करना बंद कर देता और इससे किसी भी तरह के धगे से बुनाइर् की जा सकती थी। 1830 के दशक से, कपड़ा उद्योग में नयी - नयी मशीनें बनाने की बजाय श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाने पर अध्िक ध्यान दिया जाने लगा। 1780 के दशक से, कपास उद्योग कइर् रूपों में बि्रटिश औद्योगीकरण का प्रतीक बन गया। इस उद्योग की दो प्रमुख विशेषताएँ थीं जो अन्य उद्योगों में भी दिखाइर् देती थीं। कच्चे माल के रूप में आवश्यक कपास संपूणर् रूप से आयात करना पड़ता था और जब उससे कपड़ा तैयार हो जाता तो उसका अध्िकांश भाग बाहर नियार्त किया जाता था। इस संपूणर् प्रिया के लिए इंग्लैंड के पास अपने उपनिवेश होना शरूरी था जिससे कि इन उपनिवेशों से कच्ची कपास भरपूर मात्रा में मँगाइर् जा सके और पिफर इंग्लैंड मंे उससे कपड़ा बनाकर उन्हीं उपनिवेशों के बाशारों में बेची जा सके। स्काॅटलैंड सूती वस्त्रों का उत्पादन क्षेत्राग्लाॅसगो उत्तरी सागर न्यूवैफसल याॅवर्फशायरलंकाशायरलीड्सआयरिश सागर मैनचेस्टर नाॅटिंघम लिसेस्टर ब¯मर्घम वेल्स इं ग् लैं ड बि्रस्टल चैनल लंदन प्रफांसइंग्िलश चैनल वाॅट के आविष्कार भाप के इंजन तक ही सीमित नहीं थे। उसने दस्तावेशों की नकल तैयार करने के लिए एक रासायनिक प्रिया का भी आविष्कार किया था। उसने नापने की एक इकाइर् बनाइर् थी जो पुराने सवर्त्रा शक्ित स्रोत ‘घोड़े’ की शक्ित के साथ यांत्रिाक शक्ित की तुलना पर आधरित थी। वाट की माप इकाइर् यानी अश्वशक्ित ;ीवतेम चवूमतद्ध एक घोड़े की एक मिनट में एक पुफट ;0.3 मीटरद्ध तक 33,000 पौंड ;14,969 कि.ग्रा.द्ध वशन उठाने की क्षमता के समकक्ष थी। अश्वशक्ित को विश्व में सवर्त्रा यांत्रिाक ऊजार् के सूचक के रूप में काम में लाया जाता है। यह उद्योग प्रमुख रूप से कारखानों में काम करने वाली स्ित्रायों तथा बच्चों परबहुत श्यादा निभर्र था। इससे औद्योगीकरण के प्रारंभ्िाक काल की घ्िानौनी तस्वीरसामने आती है, जिसका वणर्न आगे किया गया है। भाप की शक्ित जब यह पता चल गया कि भाप अत्यध्िक शक्ित उत्पन्न कर सकता है तो यहबड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के लिए निणार्यक सि( हुआ। द्रवचालित शक्ित केरूप में जल भी सदियों से ऊजार् का प्रमुख स्रोत बना रहा थाऋ लेकिन इसकाउपयोग वुफछ खास इलाकों, मौसमों और चल प्रवाह की गति के अनुसार सीमितरूप में ही किया जाता था। लेकिन अब इसका एक अलग रूप में प्रयोग कियाजाने लगा। भाप की शक्ित उच्च तापमानों पर दबाव पैदा करती जिससे अनेकप्रकार की मशीनें चलाइर् जा सकती थीं। इसका अथर् यह हुआ कि भाप की शक्ितऊजार् का अकेला ऐसा स्रोत था जो मशीनरी बनाने के लिए भी भरोसेमंद और कमखचीर्ला था।भाप की शक्ित का इस्तेमाल सवर्प्रथम खनन उद्योगों में किया गया। जब कोयलेऔर धातुओं की मांग बढ़ी तो उन्हें और भी अध्िक गहरी खानों में से निकालनेके प्रयासों में तेशी आइर्। खानों में अचानक पानी भर जाना भी एक गंभीर समस्याथी। थाॅमस सेवरी ;1650 - 1715द्ध ने खानों से पानी बाहर निकालने के लिए 1698में माइनसर् प्रेंफड ;खनक - मित्राद्ध नामक एक भाप के इंजन का माॅडल बनाया। येइंजन छिछली गहराइयों में ध्ीरे - ध्ीरे काम करते थे, और अध्िक दबाव हो जानेपर उनका वाष्िपत्रा ;बाॅयलरद्ध पफट जाता था।भाप का एक और इंजन 1712 में थाॅमस न्यूकाॅमेन ;1663 - 1729द्ध द्वाराबनाया गया। इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि संघनन बेलन ;वंफडे¯न्सगसि¯लडरद्ध के लगातार ठंडा होते रहने से इसकी ऊजार् खत्म होती रहती थी।भाप के इंजन का इस्तेमाल 1769 तक केवल कोयलेकी खानों में ही होता रहा, जब जेम्सवाट ;1736 - 1819द्धने इसका एक और प्रयोग खोज निकाला। वाट ने एक ऐसीमशीन विकसित की जिससे भाप का इंजन केवल एकसाधरण पंप की बजाय एक ‘प्राइम मूवर’ यानी प्रमुखचालक ;मूवरद्ध के रूप में काम देने लगा जिससे कारखानोंमें शक्ितचालित मशीनों को ऊजार् मिलने लगी। एक धनीनिमार्ता मैथ्यू बाॅल्टन ;1728 - 1809द्ध की सहायता से वाॅटने 1775 में ब²मघम में ‘सोहो पफाउंडरी’ का निमार्ण किया।इस पफाउंडरी से वाट के स्टीम इंजन बराबर बढ़ती हुइर्संख्या में बनकर निकलने लगे। अठारहवीं शताब्दी के अंततक वाट के भाप इंजन ने द्रवचालित शक्ित का स्थान लेनाशुरू कर दिया था।1800 के बाद, अध्िक हलकी तथा मशबूत धतुओं केइस्तेमाल से, अध्िक सटीक मशीनी औशारों के निमार्ण सेऔर वैज्ञानिक जानकारी के अध्िक व्यापक प्रसार से, भापके इंजन की प्रौद्योगिकी और अध्िक विकसित हो गइर्। पहले धतु को पीसने के लिए चक्के चलाने का काम घोड़ों सेलिया जाता था लेकिन बाद में भाप की शक्ित के इस्तेमाल सेजनशक्ित तथा अश्वशक्ित पर मनुष्य की निभर्रता कम हो गइर्। 1840 में, स्िथति यह थी कि बि्रटेन में बने भाप के इंजन ही संपूणर् यूरोप में आवश्यक उफजार् की70 प्रतिशत से अध्िक अश्वशक्ित का उत्पादन कर रहे थे। नहरें और रेलें प्रारंभ में नहरें कोयले को शहरों तक ले जाने के लिए बनाइर् गईं। इसका कारण यह था कि कोयलेको उसके परिमाण और भार के कारण सड़क मागर् से ले जाने में समय बहुत लगता था और उसपर खचर् भी अध्िक आता था जबकि उसे बजरों में भरकर नहरों के रास्ते ले जाने में समय औरखचर् दोनों ही कम लगते थे। औद्योगिक ऊजार् के लिए और शहरों में घर गमर् करने या उनमंे रोशनीकरने के लिए कोयले की माँग बराबर बढ़ती रही। इंग्लैंड में पहली नहर ‘वसर्ली वैफनाल’ 1761में जेम्स ¯ब्रडली ;1716 - 72द्ध द्वारा बनाइर् गइर्, जिसका प्रयोजन केवल यही था कि उसके शरियेवसर्ले ;मैनचेस्टर के पासद्ध के कोयला भंडारों से शहर तक कोयला ले जाया जाए। इस नहर केबन जाने के बाद कोयले की कीमत घटकर आध्ी हो गइर्।नहरें आमतौर पर बड़े - बडे़ शमींदारों द्वारा अपनी ज़्ामीनों पर स्िथत खानों, खदानों या जंगलों केमूल्य को बढ़ाने के लिए बनाइर् जाती थीं। नहरों के आपस में जुड़ जाने से नए - नए शहरों में बाशारबन गए। उदाहरण के लिए, ब²मघम शहर का विकास केवल इसीलिए तेज़्ाी से हुआ क्योंकि वहलंदन, बि्रस्टल चैनल और मरसी तथा हंबर नदियों के साथ जुड़ने वाली नहर प्रणाली के मध्य मेंस्िथत था। 1760 से 1790 के बीच, नहरें बनाने की पच्चीस नयी परियोजनाएँ शुरू की गईं। 1788से 1796 तक की, ‘नहरोन्माद’ ;ब्ंदंस.उंदपंद्ध के नाम से पुकारे जाने वाली अवध्ि में 46नयी परियोजनाएँ हाथ में ली गईं और उसके बाद अगले 60 वषो± में अनेकानेक नहरें बनाइर् गईंजिनकी लंबाइर् वुफल मिलाकर 4,000 मील से अध्िक थी।पहला भाप से चलने वाला रेल का इंजन - स्टीपेफनसन का राॅकेट 1814 में बना। अब रेलगाडि़याँपरिवहन का एक ऐसा नया साध्न बन गईं, जो वषर्भर उपलब्ध् रहती थीं, सस्ती और तेज़्ा भी थीं और माल तथा यात्राी दोनों को ढो सकती थीं। इस साध्न में एकसाथ दो आविष्कार सम्िमलित थेःलोहे की पटरी जिसने 1760 के दशक में लकड़ी की पटरी का स्थान ले लिया और भाप के इंजनद्वारा इस लोहे की पटरी पर रेल के डिब्बों की ¯खचाइर्।रेलवे के आविष्कार के साथ औद्योगीकरण की संपूणर् प्रिया ने दूसरे चरण में प्रवेश कर लिया।1801 में, रिचडर् ट्रेविथ्िाक ;1771 - 1833द्ध ने एक इंजन का निमार्ण किया जिसे ‘प¯प़्ाफग डेविल’यानी ‘पुफपफकारने वाला दानव’, कहते थे। यह इंजन ट्रकों को काॅनर्वाल में उस खान के चारों ओरखींचकर ले जाता था जहाँ रिचडर् काम करता था। 1814 में, एक रेलवे इंजीनियर जाॅजर् स्टीपेफनसन;1781 - 1848द्ध ने एक रेल इंजन बनाया जिसे ‘ब्लचर’ ;ज्ीम ठसनजबीमतद्ध कहा जाता था। यहइंजन 30 टन भार 4 मील प्रति घंटे की र.फ्रतार से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था। सवर्प्रथम1825 में स्टाॅकटन और डा²लगटन शहरों के बीच 9 मील लंबा रेलमागर् 24 किलोमीटर प्रति घंटा;15 मील प्रति घंटाद्ध की र.फ्रतार से 2 घंटे में रेल द्वारा तय किया गया। इसके बाद 1830 मेंलिवरपूल और मैनचेस्टर को आपस में रेलमागर् से जोड़ दिया गया। 20 वषो± के भीतर, रेल का30 से 50 मील प्रति घंटे की र.फ्रतार से दौड़ना एक आम बात हो गइर्।1830 के दशक में, नहरों के रास्ते परिवहन में अनेक समस्याएँ दिखाइर् दीं। नहरों के वुफछहिस्सों में जलपोतों की भीड़भाड़ के कारण परिवहन की र.फ्रतार ध्ीमी पड़ गइर् और पाले, बाढ़ यासूखे के कारण उनके इस्तेमाल का समय भी सीमित हो गया। अब रेलमागर् ही परिवहन कासुविधाजनक विकल्प दिखाइर् देने लगा। 1830 से 1850 के बीच, बि्रटेन में रेल पथ वुफल मिलाकरदो चरणों में लगभग 6,000 मील लंबा हो गया। 1833 - 37 के ‘छोटे रेलोन्माद’ के दौरान, 1400मील लंबी रेल लाइन बनी और 1844 - 47 के ‘बड़े रेल उन्माद’ के दौरान पिफर 9,500 मील लंबीरेल लाइन बनाने की मंजूरी दी गइर्। इस संपूणर् कायर् में कोयले और लोहे का भारी मात्रा में उपयोग़किया गया, बड़ी संख्या में लोगों को काम पर लगाया गया और निमार्ण तथा लोक कायर् उद्योगोंके ियाकलापों में तेज़्ाी लाइर् गइर्। 1850 तक आते - आते, अध्िकांश इंग्लैंड रेलमागर् से जुड़ गया। परिव£तत जीवन इसलिए इन वषो± के दौरान, प्रतिभाशाली व्यक्ितयों के लिए क्रांतिकारी परिवतर्न लाना संभव होपाया। इसी प्रकार, ऐसे ध्नवान लोग भी बहुत थे जिन्होंने जोख्िाम उठाकर उद्योग - ध्ंधें में इस आशासे पंूजी - निवेश किया कि इससे उन्हें मुनाप़्ाफा होगा और उनके धन में कइर् गुना वृि हो जाएगी।अध्िकांश मामलों में यह ध्नराश्िा यानी पूँजी कइर् गुना बढ़ी। ध्न में, माल, आय, सेवाओं, ज्ञानऔर उत्पादक वुफशलता के रूप में अचानक वृि हुइर्। लेकिन इसका मनुष्यों को दूसरे रूप में भारीखामियाज़्ाा भी उठाना पड़ा। इससे परिवार टूट गए। पुराने पते बदल गए और लोगों को नयी जगहोंपर रहना पड़ा। शहर विवृफत होने लगे और कारखानों में काम करने की परिस्िथतियाँ एकदम बिगड़गईं। इंग्लैंड मंे 50,000 से अध्िक की आबादी वाले नगरों की संख्या 1750 में केवल दो थीं जो बढ़ते - बढ़ते 1850 में 29 हो गइर्। आबादी में जिस र.फ्रतार से बढ़ोतरी हुइर् उस र.फ्रतार से रहन - सहन के अन्य साध्नों में वृि नहीं हो पाइर्। वहाँ रहने के लिए पयार्प्त व्यवस्था नहीं थी। सपफाइर् औऱस्वच्छ पेय - जल की व्यवस्था में भी बढ़ती हुइर् शहरी आबादी के मुताबिक सुधर नहीं हुआ। बाहर से आकर नए बसे लोगों को नगरों में कारखानों के आसपास भीड़भाड़ वाली गंदी बस्ितयों में रहनापड़ा, जबकि ध्नवान लोग नगर छोड़कर आसपास के उपनगरों में सापफ - सुथरे मकान बनाकर रहनेलगे, जहाँ की हवा स्वच्छ थी और पीने का पानी भी सापफ एवं सुरक्ष्िात था। एडवडर् कापे±टर ने 1881 के आसपास अपनी कविता ‘एक विनिमार्णकारी नगर में’ ;इन ए मैन्यूपैफक्च¯रग टाउनद्ध में इस स्िथति का वणर्न इस प्रकार किया थाः फ्जब मैं उस उदास शहर में बेचैन और निराश घूम रहा था, तो मैंने वहाँ अप़़्ाफरातपफरी में परेशान लोग देखे जो मानो नरक के किसी दरवाजे ;हेड्सद्ध़’ में भूतों की तरह आ - जा रहे थे - मैंने आकाश में ऊँची उठी चिमनियों की लंबी कतारें देखीं और देखे काले ध्ुएँ के बादल जो सूरज, आकाश और ध्रती को अपने बोझ से ढक रहे थे - और देखे वूफड़े के बड़े - बड़े ढेर जिनपर बच्चे रद्दी बटोर रहे थे, और पिफर आध्ी छतों वाले काले, भद्दे मकान और देखी नीचे बहती काली नदी - जब मैइन सबको देख रहा था तभी मेरी नजर दूरदराज के पँूजीपति मुहल्ले पर पड़ी जहाँ महलनुमा़ं़मकान - बंगले, ऊँची - ऊँची दीवारों वाले बगीचे, सुंदरसलोनी गाडि़याँ और उनके मालिक मानो दूर - दूर तक पसरी गरीबी, जिसकी बदौलत वे ध्नवान बने थे, देखकर अपना मुँह बिचका रहे थे..यह सब देखकर मेरी तो रूह ही काँप उठी।य् मशदूर 1842 में किए गए एक सवेर्क्षण से यह पता चला कि वेतनभोगी मज़्ादूरों यानी कामगारों के जीवनकी औसत अवध्ि शहरों में रहने वाले अन्य किसी भी सामाजिक समूह के जीवनकाल से कमथीः ब²मघम में यह 15 वषर्, मैनचेस्टर में 17 वषर्, डबीर् में 21 वषर् थी। नए औद्योगिक नगरों मेंगाँव से आकर रहने वाले लोग ग्रामीण लोगों की तुलना में कापफी छोटी आयु में मर जाते थे। वहाँपैदा होने वाले बच्चों में से आध्े तो पाँच साल की आयु प्राप्त करने से पहले ही चल बसते थे।शहरों की आबादी में वृि वहाँ पहले से रह रहे परिवारों में नए पैदा हुए बच्चों से नहीं बल्िकबाहर से आकर बसने वाले नए लोगों से ही होती थी।मौतें ज़़्यादातर उन महामारियों के कारण होती थीं जो जल - प्रदूषण से, जैसे हैजा ;ब्ीवसमतंद्ध तथा आंत्राशोथ ;ज्लचीवपकद्ध से और वायु - प्रदूषण से, जैसे क्षयरोग ;ज्नइमतबनसवेपेद्ध से होती थीं।1832 में हैज़्ो का भीषण प्रकोप हुआ जिसमें 31,000 से अध्िक लोग काल के गतर् में समा गए।उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों तक स्िथति यह थी कि नगर - प्राध्िकारी जीवन की इन भयंकरपरिस्िथतियों की ओर कोइर् ध्यान नहीं देते थे और इन बीमारियों के निदान और उपचार के बारेमें चिकित्सकों या अध्िकारियों को कोइर् जानकारी नहीं थी। दूर बाईं ओरः कोलब्रुकडेल में बढ़इर् और अन्य कामगारों के लिए 1783 में वंफपनी द्वारा बनवाए गए आवास। बाईं ओरः डबीर् परिवार के बंगले। विलियम वेस्टवुड द्वारा चित्रिात, 1835। ’नरक के द्वार। ब²मघम की गिल्ट - बटन पैफक्ट्री में काम करती हुइर् औरत का चित्रा। 1850 के दशक में बटनों के निमार्ण एवं व्यापार में काम करने वाले वुफल मशदूरों में से दो - तिहाइर् मशदूर स्ित्रायाँ और बच्चे थे। मदो± को प्रति सप्ताह 25 श्िा¯लग मज़्ादूरी मिलती थी जबकि उतने ही घंटे काम करने के लिए बच्चों को सिपर्फ एक श्िा¯लग़और औरतों को 7 श्िा¯लग मज़्ादूरी दी जाती थी। 206 विश्व इतिहास के वुफछ विषय औरतें, बच्चे और औद्योगीकरण औद्योगिक क्रांति एक ऐसा समय था जब औरतों और बच्चों के काम करने के तरीकों में महत्त्वपूणर्परिवतर्न आए। ग्रामीण गरीबों के बच्चे हमेशा घर में, या खेत में अपने माता - पिता या संबंध्ियोंकी निगरानी में तरह - तरह के काम किया करते थे जो समय, दिन या मौसम के अनुसार बदलतेरहते थे। इसी प्रकार, गाँवों मंे औरतें भी खेत के काम में सिय रूप से हिस्सा लेती थींऋ वे पशुओंका पालन - पोषण करती थीं, लकडि़याँ इकऋी करती थीं और अपने घरों में चरखे चलाकर सूतकातती थीं। कारखानों में काम करना इससे बिलवुफल अलग किस्म का होता था, वहाँ लगातार कइर् घंटों तकएक ही तरह का काम कठोर अनुशासन तथा तरह - तरह के दंड की भयावह परिस्िथतियों में करायाजाता था। मदो± की मज़्ादूरी मामूली होती थी, उससे अकेले घर का ख़चर् नहीं चल सकता था जिसे पूराकरने के लिए औरतों और बच्चों को भी वुफछ कमाना पड़ता था। ज्यांे - ज्यों मशीनों का इस्तेमालबढ़ता गया, काम पूरा करने के लिए मज़्ादूरों की शरूरत कम होती गइर्। उद्योगपति मदो± की बजायऔरतों और बच्चों को अपने यहाँ काम पर लगाना अध्िक पसंद करते थे क्योंकि एक तो उनकीमजदूरी कम होती थी और दूसरे वे अपने काम की घटिया परिस्िथतियों के बारे में भी कम आंदोलित़हुआ करते थे।स्ित्रायों और बच्चों को लंकाशायर और याॅवर्फशायर नगरों के सूती कपड़ा उद्योग में बड़ी संख्यामें काम पर लगाया जाता था। रेशम, प़्ाफीते बनाने और बुनने के उद्योग - ध्ंधें में और ब²मघम केधतु उद्योगों में ;बच्चों के साथ - साथद्ध औरतों को ही अध्िकतर नौकरी दी जाती थी। कपास कातनेकी जेनी जैसी अनेक मशीनें तो वुफछ इसी तरह की बनाइर् गइर् थीं कि उनमंे बच्चे ही अपनी पुफतीर्लीउंगलियों और छोटी - सी कद - काठी के कारण आसानी से काम कर सकते थे। बच्चों को अक्सरकपड़ा मिलों में रखा जाता था क्योंकि वहाँ सटाकर रखी गइर् मशीनों के बीच से छोटे बच्चे आसानी से आ - जा सकते थे। बच्चों से कइर् घंटों तक काम लिया जाता था, यहाँ तक कि उन्हें हर रविवारको भी मशीनें साप़़्ाफ करने के लिए काम पर आना पड़ता था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें ताजी हवा खाने या व्यायाम करने का कभी कोइर् मौका नहीं मिलता था। कइर् बार तो बच्चों के बाल मशीनोंमें पँफस जाते थे या उनके हाथ वुफचल जाते थेऋ यहाँ तक कि बच्चे काम करते - करते इतने थकजाते थे कि उन्हें नींद की झपकी आ जाती थी और वे मशीनों में गिरकर मौत के मुँह में चलेजाते थे। कोयले की खानें भी काम करने के लिहाज़्ा से बहुत खतरनाक होती थीं। खानों की छतें ध्ँसजाती थीं अथवा वहाँ विस्पफोट हो जाता था, और चोटें लगना तो वहाँ आम बात थी। कोयला खानोंके मालिक कोयले के गहरे अंतिम छोरों को देखने के लिए अथवा जहाँ जाने का रास्ता वयस्कोेंके लिए बहुत संकरा होता था, वहाँ बच्चों को ही भेजते थे। छोटे बच्चों को कोयला खानों में ‘ट्रैपर’का काम भी करना पड़ता था। कोयला खानों में जब कोयला भरे डिब्बे इध्र - उध्र ले जाये जातेथे तो वे आवश्यकतानुसार उन दरवाज़्ाों को खोलते और बंद करते थे। यहाँ तक कि वे ‘कोलबियरसर्’ के रूप में अपनी पीठ पर रखकर कोयले का भारी वशन भी ढोते थे। कारखानों के मालिक बच्चों से काम लेना बहुत ज़्ारूरी समझते थे, ताकि वे अभी से काम सीखकर बड़े होकर उनके लिए अच्छा काम कर सवेंफ। बि्रटिश पैफक्िट्रयों के अभ्िालेखों से प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि पैफक्ट्री मज़्ादूरों में से लगभग आधें ने तो वहाँ दस साल से भी कम उम्र में और 28 प्रतिशत मज़्ादूरों ने वहाँ 14 साल से कम की आयु में काम करना शुरू किया था। औरतों को मजदूरी मिलने से न केवल़वित्तीय स्वतंत्राता मिली बल्िक उनके आत्मसम्मान में भी बढ़ोतरी हुइर्। लेकिन इससे उन्हें जितना लाभ हुआ उससे कहीं ज़्यादा हानि काम की अपमानजनक परिस्िथतियों के कारण हुइर्। अक्सर उनके बच्चे पैदा होते ही या शैशवावस्था मंे ही मर जाते थे और उन्हें अपने औद्योगिक काम की वजह से मजबूर होकर शहर की घ्िानौनी व गंदी बस्ितयों में रहना पड़ता था। लंदन के गरीब मुहल्ले की एक गली, प्रफांसीसी कलाकार डोरे द्वारा उकेरा गया चित्रा, 1876। चाल्सर् डिकन्स ;1812 - 70द्ध औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप गरीबों के लिए जो भयंकर स्िथति उत्पन्न हुइर् उसका संभवतः सबसे कठोर समकालीन आलोचक थे। उन्होंने अपने उपन्यास हाडर् टाइम्स में एक काल्पनिक औद्योगिक नगर ‘कोकटाउन’ का बड़ा सटीक वणर्न किया है। फ्यह एक लाल ईंटों से बना नगर था, लेकिन उसकी ईंटों का रंग लाल तभी रह सकता था यदि ध्ुएँ और राख ने उसे पोतकर बदरंग न कर दिया होताऋ लेकिन हालत यह थी कि यह कस्बा अजीब लाल और काले रंग के मिश्रण से पुता था मानो वह किसी खूंखार आदमी का चेहरा हो। यह मशीनों और उन लंबी गगनचुंबी चिमनियों का शहर था जिनमें से ध्ुएँ के साँपों की अटूट पंक्ितयाँ कभी वुफंडलित न होकर, लगातार निकलती रहती थीं। इस नगर मे ंएक काली नहर थी और एक नदी भी थी जिसका पानी बदबूदार रंजक गंदगी से भरकर बैंगनी रंग का हो गया था। वहाँ ढेरों इमारतें थीं जो उनके भीतर चलने वाली मशीनों के कारण हरदम काँपती रहती थीं और उनकी ख्िाड़कियाँ हमेशा ही खड़कती रहती थीं और वहाँ भाप के इंजन का पिस्टन उकताहट के साथऊपर - नीचे होता रहता था, मानो किसी हाथी का सिर हो जो अपने दुःखभरे पागलपन में आँखे पफाड़े एक ही ओर देख रहा हो।य् बि्रटेन के निबंध्कार और उपन्यासकार डी.एच. लाॅरेन्स ने ;1885 - 1930द्ध, डिकेन्स केसत्तर साल बाद, कोयला क्षेत्रा में स्िथत एक गाँव में आए ऐसे परिवतर्न का इस प्रकार वणर्न किया जिसे उन्होंने स्वयं अनुभव नहीं किया था, लेकिन जिसके बारे में उन्होंने अपने बड़े - बुजुगो± से सुना था।़फ्इर्स्टवुड... उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अवश्य ही एक छोटा गाँव रहा होगा जहाँ छोटी - छोटी झोपडि़याँ थीं, खान मजदूरों के चार कमरों वाले छोटे - छोटे घरों की छिटपुट कतारें थीं और पुराने खान मालिकों के आवास थे... लेकिन 1820 के आसपास किसी समय कंपनी ने पहला बड़ा शै.फ्रट लगाया होगा... और औद्योगिक कोयला खान की पहली वास्तविक मशीनरी लगाइर्... मज़्ादूरों के रहने के छोटे - छोटे घरों की कतारें अध्िकतर गिरा दी गईं और पिफर नाटिंघम रोड के साथ - साथ छोटी - छोटी दुकानें खुलने लगीं और नीचे ढलान में कंपनी ने वुफछ इमारतें बनाईं जिन्हें आज भी ‘नयी इमारतें’ कहा जाता है... भऋी, काली गली में खुलने वाली छोटे - छोटे चार कमरों वाले घरों की कतारें जिनकी पीठ चैकोर निजर्न स्थल की ओर थी, बेरकों के बाड़े की तरह बंद कर दी गइर्, बड़ा अजीब लगता है यह सब।य् विरोध् आंदोलन औद्योगीकरण के प्रारंभ्िाक दशकों का समय वही था जब प्रफांसीसी क्रांति ;1789 - 94द्ध द्वारा उद्भूत नए - नए राजनीतिक विचारों का प्रचार - प्रसार हो रहा था। ‘स्वतंत्राता, समानता और भ्रातृत्व’ स्थापित करने के आंदोलनों ने यह दिखा दिया कि सामूहिक जन आंदोलन चलाना संभव है। इनसे 1790 के दशक की प्रफांसीसी संसदीय सभाओं जैसी लोकतांत्रिाक संस्थाएँ बनाइर् जा सकती हैं और रोटी जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रिात करके यु( की कठिनाइयों को भी रोका जा सकता है। इंग्लैंड में, पैफक्िट्रयों में काम करने की कठोर परिस्िथतियों के विरु( राजनीतिक विरोध् बढ़ता जा रहा था और श्रमजीवी लोग मतािाकार प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रहे थे। इसकी प्रतििया में, सरकार ने दमनकारी रुख अपनाया और कानून बनाकर, लोगों से विरोध् प्रदशर्न करने का अध्िकार ही छीन लिया। इंग्लैंड का प्रफांस के साथ लंबे अरसे ;1792 से 1815द्ध तक यु( चलता रहा। इंग्लैंड और यूरोप के बीच चलने वाला व्यापार छिन्न - भ्िान्न हो गया। पैफक्िट्रयों को मजबूरन बंद करना पड़ा, बेरोज़्ागारी में बढ़ोतरी हुइर् और रोटी, मांस जैसे आवश्यक खाद्य पदाथो± की कीमतें औसत मजदूरी स्तर से कहीं ज्यादा बढ़ गईं।़बि्रटेन की संसद ने 1795 में दो जुड़वाँ अध्िनियम पारित किए, जिनके अंतगर्त ‘लोगों को भाषण या लेखन द्वारा सम्राट, संविधन, या सरकार के विरु( घृणा या अपमान करने के लिए उकसाना’ अवैध् घोष्िात कर दिया गया और 50 से अध्िक लोगों की अनध्िवृफत सावर्जनिक बैठकों पर रोक लगा दी गइर्। लेकिन ‘पुराने भ्रष्टाचार’ ;व्सक ब्वततनचजपवदद्ध के विरु( आंदोलन बराबर चलता रहा। ‘पुराना भ्रष्टाचार’ शब्द का प्रयोग राजतंत्रा और संसद के संबंध् में किया जाता था। संसद के सदस्य जिनमें भू - स्वामी, उत्पादक तथा पेशेवर लोग शामिल थे, कामगारों को वोट का अध्िकार दिए जाने के ख्िालाप़़्ाफ थे। उन्होंने ‘कानर् लाॅज’ ;अनाज के कानूनद्ध का समथर्न किया। इस कानून के अंतगर्त विदेश से सस्ते अनाज के आयात पर रोक लगा दी गइर् थी जब तक कि बि्रटेन में इन अनाजों की कीमत में एक स्वीवृफत स्तर तक वृि न हो गइर् हो। जैसे - जैसे श्रमिकों की तादाद शहरों और कारखानों में बढ़ी, वे अपने गुस्से और हताशा को हर तरह के विरोध् में प्रकट करने लगे। 1790 के दशक से पूरे देश भर में ब्रैड अथवा खाद्य के लिए दंगे होने लगे। गरीबों का मुख्य आहार ब्रैड ही था और इसकी कीमत पर ही उनके रहन - सहन का स्तर निभर्र करता था। ब्रैड के भंडारों पर कब्जा कर लिया गया और उन्हें मुनाप़्ाफाखोरों द्वारा लगाइर्गइर् ऊँची कीमतों से काप़्ाफी कम मूल्य में बेचा जाने लगा जो आम आदमी के लिए वाजिब थीं और नैतिक दृष्िट से भी सही थीं। ऐसे दंगे ख़ासतौर पर यु( के बदतरीन वषर् ;1795द्ध में बार - बार हुए, लेकिन उनका सिलसिला 1840 के दशक तक चलता रहा। परेशानी का एक कारण और भी था जिसे चकबंदी या बाड़ा प(ति कहते हैं, जिसके द्वारा 1770 के दशक से छोटे - छोटे सैकड़ों पफामर् ;खेतद्ध शक्ितशाली ज़्ामींदारों के बड़े पफामो± में मिला दिए गए। इस प(ति से बुरी तरह से प्रभावित हुए गरीब परिवारों ने औद्योगिक काम देने की मांग की। लेकिन कपड़ा उद्योग मंे मशीनों के प्रचलन से हशारों की संख्या में हथकरघा बुनकर बेरोजगार होकर गरीबी की मार झेलने को मजबूर हो गए, क्योंकि उनका करघा मशीनों का मुकाबला नहीं कर सकता था। 1790 के दशक से बुनकर लोग अपने लिए न्यूनतम वैध् मजदूरी की माँग करने लगे। संसद ने इस माँग को ठुकरा दिया। जब वे हड़ताल पर चले गए तो उन्हें जबरदस्ती तितर - बितर कर दिया गया। हताश होकर सूती कपड़े के बुनकरों ने लंकाशायर में पावरलूमों को नष्ट कर दिया क्योंकि वे समझते थे कि इन बिजली के करघों ने ही उनकी रोजी - रोटी छीनी है।नो¯टघम में ऊनी कपड़ा उद्योग में भी मशीनों के चलन का प्रतिरोध् किया गया, इसी प्रकार लैसेस्टरशायर ;स्मपबमेजमतेीपतमद्ध और डबीर्शायर ;क्मतइलेीपतमद्ध में भी विरोध् प्रदशर्न हुए। यावर्फशायर ;ल्वतोीपतमद्ध में, ऊन कतरने वालों ने ऊन कतरने के ढाँचों ;शीय¯रग प्रेफमद्ध को तोड़ दिया। ये लोग परंपरागत रूप से अपने हाथों से भेड़ों के बालों की कटाइर् करते थे। 1830 के दंगों में पफामो± में काम करने वाले श्रमिकों को भी लगा कि उनका ध्ंध तो चैपट होने वाला है क्योंकि खेती में भूसी से दाना अलग करने के लिए नयी खलिहानी मशीनों ;थे्र¯शग मशीनद्ध का इस्तेमाल शुरू हो गया था। दंगाइयों ने इन मशीनों को तोड़ डाला। परिणामस्वरूप नौ दंगाइयों को पफाँसी की सजा हुइर् और 450 लोगों को वैफदियों के रूप में आस्ट्रेलिया भेज दिया गया। ;देख्िाए विषय 10द्ध एक करिश्माइर् व्यक्ितत्व वाले जनरल नेड लुड के नेतृत्व में लुडिज्म ;1811 - 17द्ध नामक अन्य आंदोलन चलाया गया। यह एक अन्य किस्म के विरोध् प्रदशर्न का उदाहरण था। लुडिज्म के अनुयायी मशीनों की तोड़पफोड़ में ही विश्वास नहीं करते थे, बल्िक न्यूनतम मजदूरी, नारी एवं बाल श्रम पर नियंत्राण, मशीनों के आविष्कार से बेरोजगार हुए लोगों के लिए काम और कानूनी तौर पर अपनी माँगंे पेश करने के लिए मजदूर संघ ;ट्रेड यूनियनद्ध बनाने के अध्िकार की भी माँग करते थे। औद्योगीकरण के प्रारंभ्िाक वषो± में श्रमजीवियों के पास उन कठोर कायर्वाहियों, जिनसे उनके जीवन में पेफरबदल हो रही थी, के ख्िालाप़्ाफ अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए न तो वोट देने का़अध्िकार था और न ही कोइर् कानूनी तरीका। अगस्त 1819 में 80,000 लोग अपने लिए लोकतांत्रिाक अध्िकारों, अथार्त् राजनीतिक संगठन बनाने, सावर्जनिक सभाएँ करने और प्रेस की स्वतंत्राता के अध्िकारों की मांग करने के लिए मैनचेस्टर में सेंट पीटसर् ;ैजण् च्मजमतश्े थ्पमसकद्ध मैदान में शांतिपूवर्क इकऋे हुए। लेकिन उनका बबर्रतापूवर्क दमन कर दिया गया। इसे पीटर लू’ के नरसंहार ;च्मजमतसवव डंेेंबतमद्ध के नाम से जाना जाता है। उन्होंने जिन अध्िकारों की माँग की थी उन्हें उसी वषर् संसद द्वारा पारित छः अध्िनियमों द्वारा नकार दिया गया। इन अध्िनियमों के द्वारा उन राजनीतिक कायर्कलापों पर रोक बढ़ा दी गइर्। इस रोक की शुरुआत 1795 के दो जुड़वाँ अिानियमों के तहत की गइर् थी। परन्तु इससे वुफछ लाभ भी हुए। पीटर लू के बाद बि्रटिश संसद के निचले सदन ‘हाउस आॅपफ काॅमन्स’ को अध्िक प्रतिनिध्ित्वकारी बनाए जाने की आवश्यकता उदारवादी राजनीतिक दलों द्वारा महसूस की गइर् और जुड़वाँ अध्िनियमों को 1824 - 25 में निरस्त कर दिया गया। ’इस शब्द को वाटर लू शब्द से मेल खाते हुए बनाया गया था। 1815 में वाटर लू में प्रफांसीसी सेना पराजित हुइर्। कानूनों के जरिये सुधर सरकार औरतों और बच्चों के काम की परिस्िथतियों के प्रति कितनी जागरूक थी? 1819 में वुफछ कानून बनाए गए जिनके तहत नौ वषर् से कम की आयु वाले बच्चों से पैफक्िट्रयों में काम करवाने पर पाबंदी लगा दी गइर् और नौ से सोलह वषर् की आयु वाले बच्चों से काम कराने की सीमा 12 घंटे तक सीमित कर दी गइर् लेकिन इस कानून में इसका प्रवतर्न यानी पालन कराने के लिएआवश्यक अध्िकारों की व्यवस्था नहीं की गइर् थी। संपूणर् उत्तरी इंग्लैंड में कामगारों द्वारा इस स्िथति का भारी विरोध् किए जाने के बाद, 1833 में एक अध्िनियम पारित किया गया जिसके अंतगर्त नौ वषर् से कम आयु वाले बच्चों को केवल रेशम की पैफक्िट्रयों में काम पर लगाने की अनुमति दी गइर्, बड़े बच्चों के लिए काम के घंटे सीमित कर दिए गए और वुफछ पैफक्ट्री निरीक्षकों की व्यवस्था कर दी गइर् जिससे कि अध्िनियम के प्रवतर्न तथा पालन को सुनिश्िचत किया जा सके। अंततः 1847 में, 30 वषर् से भी अध्िक लंबे अरसे तक आंदोलन चलने के बाद, दस घंटा विधेयक पारित कर दिया गया। इस कानून ने स्ित्रायों और युवकों के लिए काम के घंटे सीमित कर दिए और पुरुष श्रमिकों के लिए 10 घंटे का दिन निश्िचत कर दिया। ये अध्िनियम कपड़ा उद्योगों पर ही लागू होते थे, खनन उद्योग पर नहीं। सरकार द्वारा स्थापित, 1842 के खान आयोग ने यह उजागर कर दिया कि खानों में काम करने की परिस्िथतियाँ वास्तव में, 1833 के अध्िनियम के लागू होने से पहले कहीं अध्िक खराब हो गइर् हैं, क्योंकि पहले से अध्िक संख्या में बच्चों को कोयला खानों में काम पर लगाया जा रहा था। 1842 के खान और कोयला खान अध्िनियम ने दस वषर् से कम आयु के बच्चों और स्ित्रायों से खानों में नीचे काम लेने पर पाबंदी लगा दी। पफील्डसर् पैफक्ट्री अध्िनियम ने 1847 में यह कानून बना दिया कि अठारह साल से कम उम्र के बच्चों और स्ित्रायों से 10 घंटे प्रतिदिन से अध्िक काम न लिया जाए। इन कानूनों का प्रवतर्न पैफक्ट्री निरीक्षकों के द्वारा किया जाना था, लेकिन यह एक कठिन काम था। निरीक्षकों का वेतन बहुत कम था और प्रबंध्क उन्हें रिश्वत देकर आसानी से उनका मुँह बंद कर देते थे। दूसरी ओर, बच्चों के माता - पिता भी उनकी आयु के बारे में झूठ बोलकर उन्हें काम पर लगवा देते थे, ताकि उनकी मजदूरी से घर का खचर् चलाने में सहायता मिले। औद्योगिक क्रांति के विषय में तवर्फ - वितवर्फ 1970 के दशक तक, इतिहासकार ‘औद्योगिक क्रांति’ शब्द का प्रयोग बि्रटेन में 1780 के दशक से 1820 के दशक के बीच हुए औद्योगिकी विकास व विस्तारों के लिए करते थे। लेकिन उसके बाद इस शब्द के प्रयोग को अनेक आधर पर चुनौती दी जाने लगी। दरअसल औद्योगीकरण की िया इतनी ध्ीमी गति से होती रही कि इसे ‘क्रांति’ कहना ठीक नहीं होगा। इसके द्वारा पहले से मौजूद प्रियाओं को ही आगे नए स्तरों तक लाया गया। इस प्रकार, पैफक्िट्रयों में श्रमिकों का जमावड़ा पहले की अपेक्षा अध्िक हो गया और ध्न का प्रयोग भी पहले से अध्िक व्यापक रूप से होने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी शुरू होने के कापफी समय बाद तक भी इंग्लैंड के बड़े - बड़े क्षेत्रों में कोइर् पैफक्िट्रयाँ या खानें नहीं थीं, इसलिए ‘औद्योगिक क्रांति’ शब्द ‘अनुपयुक्त’ समझा गया। इंग्लैंड में परिवतर्न क्षेत्राीय तरीके से हुआ, प्रमुख रूप से लंदन, मैनचेस्टर, बम्ि±ाघम ;ठपतउपदहींउद्ध या न्यूकासल ;छमूबंेजसमद्ध नगरों के चारों ओर न कि संपूणर् देश में। क्या कपास या लोहा उद्योगों मंे अथवा विदेशी व्यापार में 1780 के दशक से 1820 के दशक तक हुए विकास या संवृि को क्रांतिकारी कहा जा सकता है? नयी मशीनों के कारण सूती कपड़ा उद्योग में जो ध्यानाकषर्णकारी संवृि हुइर् वह भी एक ऐसे कच्चे माल ;कपासद्ध पर आधरित थी जो बि्रटेन में बाहर से मँगाया जाता था और तैयार माल भी दूसरे देशों में ;विशेषतः भारत मेंद्धबेचा जाता था। धतु से बनी मशीनें और भाप की शक्ित तो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराध्र् तक दुलर्भ रहीं। बि्रटेन के आयात और नियार्त में 1780 के दशक से जो तेशी से वृि हुइर् उसकाकारण यह था कि अमरीकी स्वतंत्राता संग्राम के कारण उत्तरी अमरीका के साथ जो व्यापार बािात हो गया था वह पिफर से शुरू हो गया। इस वृि को तीव्र कहकर अंकित किया गया क्योंकि जिस बिन्दु से उसका प्रारंभ हुआ था वह कापफी नीचे था। आथ्िार्क परिवतर्नों के सूचकांक यह दशार्ते हैं कि सतत् औद्योगीकरण 1815 - 20 से पहले की बजाय बाद में दिखाइर् दिया था। 1793 के बाद के दशकों में प्रफांसीसी क्रांति और नेपोलियन के यु(ों के विघटनकारी प्रभावों का अनुभव किया गया था। औद्योगीकरण को देश के ध्न के पूँजी निमार्ण में या आधरभूत ढाँचा तैयार करने में अथवा नयी - नयी मशीनें लगाने के लिए अध्िकािाक निवेश करने में इन सुविधओं के वुफशलतापूणर् उपयोग के स्तरों को बढ़ाने और उत्पादकता में वृि करने के साथ जोड़ा जाता है। यानि लाभदायक निवेश इन मायनों में उत्पादकता के स्तरों के साथ - साथ 1820 के बाद ध्ीरे - ध्ीरे बढ़ने लगा। 1840 के दशक तक कपास, लोहा और इंजीनियरिंग उद्योगों से आध्े से भी कम औद्योगिक उत्पादन होता था। तकनीकी प्रगति इन्हींशाखाओं तक ही सीमित नहीं थीऋ बल्िक वह कृष्िा - संसाध्न तथा मिट्टðी के बतर्न बनाने ;पौटरीद्ध जैसे अन्य उद्योग - ध्ंधें मेें भी देखी जा सकती थी। बि्रटेन में औद्योगिक विकास 1815 से पहले की अपेक्षा उसके बाद अध्िक तेजी से क्यों हुआ?इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ने के लिए इतिहासकारों ने इस तथ्य की ओर इशारा किया है कि 1760 के दशक से 1815 तक बि्रटेन ने एक साथ दो काम करने की कोश्िाश कीμ पहला औद्योगिकरणऔर दूसरा यूरोप, उत्तरी अमरीका और भारत में यु( लड़नाऋ और शायद वह उनमें से एक काम में असपफल रहा। बि्रटेन 1760 के बाद अगले 60 वषो± में से 36 वषर् तक लड़ाइर् में व्यस्त रहा। जो पूंजी निवेश के लिए उधर ली गइर् थी वह यु( लड़ने में खचर् की गइर्। यहाँ तक कि यु( का 35 प्रतिशत तक खचर् लोगों की आमदनियों पर कर लगाकर पूरा किया जाता था। कामगारों और श्रमिकों को कारखानों तथा खेतों में से निकालकर सेना में भतीर् कर दिया जाता था। खाद्य सामगि्रयों की कीमतें तो इतनी तेशी से बढ़ीं कि गरीबों के पास अपनी उपभोक्ता सामग्री खरीदने के लिए भी बहुत कम पैसा बचता था। नेपोलियन की नाकाबंदी की नीति और बि्रटेन द्वारा उसे नाकाम करने की कोश्िाशों ने यूरोप महाद्वीप को व्यापारिक दृष्िट से अवरु( कर दिया। इससे बि्रटेन से नियार्त होने वाले अध्िकांश लक्ष्यस्थल बि्रटेन के व्यापारियों की पहुँच से बाहर हो गए। ‘क्रांति’ के साथ प्रयुक्त ‘औद्योगिक’ शब्द अथर् की दृष्िट से बहुत सीमित है। इस दौरान जो रूपांतरण हुआ वह आथ्िार्क तथा औद्योगिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्िक उसका विस्तार इन क्षेत्रों से परे तथा समाज के भीतर भी हुआ और इसके पफलस्वरूप दो वगार्ें को प्रधनता मिलीः पहला था बुजुर्आ वगर् यानी मध्यम वगर् और दूसरा था नगरों और देहाती इलाकों में रहने वाला मजदूरों का सवर्हारा वगर्। 1851 में लंदन में विशेष रूप से निमिर्त स्पफटिक प्रासाद ;िस्टल पैलेसद्ध में बि्रटिश उद्योग की उपलब्िध्यांे को दशार्ने के लिए एक विशाल प्रदशर्नी का आयोजन किया गया जिसे देखने 1851 की महान प्रदशर्नी ने सभी राष्ट्रों की औद्योगिक उपलब्िध्यों, विशेष रूप से बि्रटेन की उल्लेखनीय प्रगति की झाँकी प्रस्तुत की। यह प्रदशर्नी लंदन के हाइड पावर्फ में स्िथत िस्टल पैलेस में लगाइर् गइर् थी। यह पैलेस विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए बमिर्ंघम में उत्पादित लोहे पफलकों में जड़ी शीशे की चादरों से बनाया गया था 212 विश्व इतिहास के वुफछ विषय के लिए दशर्कों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। उस समय देश की आध्ी जनसंख्या शहरों में रहतीथी, लेकिन शहरों में रहने वाले कामगारों मेें से जितने लोग हस्तश्िाल्प की इकाइयों में काम करतेथे, लगभग उतने ही पैफक्िट्रयों या कारखानों में कायर्रत थे। 1850 के दशक से, शहरी इलाकों मेंरहने वाले लोगों का अनुपात अचानक बढ़ गया, और उनमें से अध्िकांश लोग उद्योगों में कामकरते थे, यानी वे श्रमजीवी वगर् के थे। अब बि्रटेन के समूचे कायर् - बल का केवल 20 प्रतिशतभाग ही देहाती इलाकों में रहता था। औद्योगीकरण की यह रफ्रतार अन्य यूरोपीय देशों में हो रहेऔद्योगीकरण के मुकाबले बहुत ज्यादा तेश थी। बि्रटिश उद्योग के विस्तृत अध्ययन में इतिहासकारए.इर्. मस्सन ने कहा है कि फ्1850 से 1914 तक की अवध्ि को एक ऐसा काल मानने के लिएपयार्प्त आधर हैं जिसमें औद्योगिक क्रांति वास्तव में अत्यंत व्यापक पैमाने पर हुइर्, जिससे संपूणर्अथर्व्यवस्था और समाज की कायापलट, अन्य किसी भी परिवतर्न के मुकाबले बड़ी तेशी से औरव्यापक रूप से हुआ था।य् अभ्यास संक्षेप में उत्तर दीजिए 1ण् बि्रटेन 1793 से 1815 तक कइर् यु(ों में लिप्त रहा, इसका बि्रटेन के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा? 2ण् नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्ष्िाक लाभ क्या - क्या हैं? 3ण् इस अवध्ि में किए गए ‘आविष्कारों’ की दिलचस्प विशेषताएँ क्या थीं? 4ण् बताइए कि बि्रटेन के औद्योगीकरण के स्वरूप पर कच्चे माल की आपूतिर् का क्या प्रभाव पड़ा? संक्षेप में निबंध् लिख्िाए 5ण् बि्रटेन में स्ित्रायों के भ्िान्न - भ्िान्न वगोर्ं के जीवन पर औद्योगिक क्रांति का क्या प्रभाव पड़ा? 6ण् विश्व के भ्िान्न - भ्िान्न देशों में रेलवे आ जाने से वहाँ के जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? तुलनात्मक विवेचना कीजिए।

RELOAD if chapter isn't visible.