विषय 7 बदलती हुइर् सांस्वृफतिक परंपराएँ चैदहवीं शताब्दी से सत्राहवीं शताब्दी के अंत तक यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या बढ़ रही थी। एक विशेष प्रकार की ‘नगरीय - संस्वृफति’ विकसित हो रही थी। नगर के लोग अब यह सोचने लगे थे कि वे गाँव के लोगों से अध्िक ‘सभ्य’ हैं। नगर खासकर फ्ऱलोरेंस, वेनिस और रोमμकला और विद्या के वेंफद्र बन गए। नगरों को राजाओं और चचर् से थोड़ी बहुत स्वायत्तता ;ंनजवदवउलद्ध मिली थी। नगर कला अैर ज्ञान के केन्द्र बन गए। अमीर और अभ्िाजात वगर् के लोग कलाकारों और लेखकों के आश्रयदाता थे। इसी समय मुद्रण के आविष्कार से अनेक लोगों को चाहे वह दूर - दराश नगरों या देशों में रह रहे हों, छपी हुइर् पुस्तवेंफ उपलब्ध् होने लगीं। यूरोप मंे इतिहास की समझ विकसित होने लगी और लोग अपने ‘आध्ुनिक विश्व’ की तुलना यूनानी व रोमन ‘प्राचीन दुनिया’ से करने लगे थे। अब यह माना जाने लगा कि प्रत्येक व्यक्ित अपनी इच्छानुसार अपना ध्मर् चुन सकता है। चचर् के, पृथ्वी के वेंफद्र संबंध्ी विश्वासों को वैज्ञानिकों ने गलत सि( कर दिया चूँकि वे अब सौर - मंडल को समझने लगे थे। नवीन भौगोलिक ज्ञान ने इस विचार को उलट दिया कि भूमध्यसागर विश्व का वेंफद्र है। इस विचार के पीछे यह मान्यता रही थी कि यूरोप विश्व का वेंफद्र है ;देख्िाए विषय 8द्ध। चैदहवीं शताब्दी से यूरोपीय इतिहास की जानकारी के लिए बहुत अध्िक सामग्री दस्तावेशों, मुदि्रत पुस्तकों, चित्रों, मूतिर्यों, भवनों तथा वस्त्रों से प्राप्त होती है जो यूरोप और अमरीका के अभ्िालेखागारों, कला - चित्राशालाओं और संग्रहालयों में सुरक्ष्िात रखी हुइर् हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने ‘रेनेसाँ’ ;शाब्िदक अथर् - पुनजर्न्म, हिंदी में पुनजार्गरणद्ध शब्द का प्रयोग किया जो उस काल के सांस्कृतिक परिवतर्नों को बताता है। स्िवटशरलैंड के ब्रेसले विश्वविद्यालय के इतिहासकार जैकब बवर्फहाटर् ;श्रंबवइ ठनतबाींतकजए 1818 - 97द्ध ने इस पर बहुत अध्िक बल दिया। वे जमर्न इतिहासकार लियोपोल्ड वाॅन रांके ;स्मवचवसक अवद त्ंदामए 1795 - 1886द्ध के विद्याथीर् थे। रांके ने उन्हें यह बताया कि इतिहासकार का पहला उद्देश्य है कि वह राज्यों और राजनीति के बारे में लिखे जिसके लिए वह सरकारी विभागों के कागशात और पफाइलों का इस्तेमाल करे। पर बवर्फहाटर् अपने गुरु के सीमित लक्ष्यों से असंतुष्ट थे। उनके अनुसार इतिहास - लेखन में राजनीति ही सब वुफछ नहीं है। इतिहास का सरोकार उतना ही संस्वृफति से है जितना राजनीति से। 1860 इर्. में बवर्फहाटर् ने दि सिविलाइर्जेशन आॅपफ दि रेनेसाँ इन इटली नामक पुस्तक की रचना की। इसमें उन्होंने अपने पाठकों का ध्यान साहित्य, वास्तुकला और चित्राकला की ओर आवफष्िर्ात किया और यह बताया कि चैदहवीं शताब्दी से सत्राहवीं शताब्दी तक इटली के नगरों में किस प्रकार एक ‘मानवतावादी’ संस्कृति पनप रही थी। उन्होंने यह लिखा कि 153बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ यह संस्कृति इस नए विश्वास पर आधारित थी कि व्यक्ित अपने बारे में खुद निणर्य लेने और अपनी दक्षता को आगे बढ़ाने में समथर् है। ऐसा व्यक्ित ‘आध्ुनिक’ था जबकि ‘मध्यकालीन मानव’ पर चचर् का नियंत्राण था। इटली के नगरों का पुनरुत्थानपश्िचम रोम साम्राज्य के पतन के बाद इटली के राजनैतिक और सांस्कृतिक केन्द्रों का विनाश हो गया। इस समय कोइर् भी एकीवृफत सरकार नहीं थी और रोम का पोप जो अपने राज्य मंे बेशक सावर्भौम था, समस्त यूरोपीय राजनीति में इतना मशबूत नहीं था। एक अरसे से पश्िचमी यूरोप के क्षेत्रा, सामंती संबंधें के कारण नया रूप ले रहे थे और लातिनी चचर् के नेतृत्व में उनका एकीकरण हो रहा था। इसी समय पूवीर् यूरोप बाइशंेटाइन साम्राज्य के शासन में बदल रहा था। उध्र वुफछ और पश्िचम में इस्लाम एक सांझी सभ्यता का निमार्ण कर रहा था। इटली एक कमशोर देश था और अनेक टुकड़ों में बँटा हुआ था। परंतु इन्हीं परिवतर्नोंने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता प्रदान की। बाइशंेटाइन साम्राज्य और इस्लामी देशों के बीच व्यापार के बढ़ने से इटली के तटवतीर् बंदरगाह पुनजीर्वित हो गए। बारहवीं शताब्दी से जब मंगोलों ने चीन के साथ ‘रेशम - मागर्’ ;देख्िाए विषय 5द्ध से व्यापार आरंभ किया तो इसके कारण पश्िचमी यूरोपीय देशों के व्यापार को बढ़ावा मिला। इसमें इटली के नगरों ने मुख्य भूमिका निभाइर्। अब वे अपने को एक शक्ितशाली साम्राज्य के अंग मानचित्रा 1: इटली के राज्य। के रूप में ही नहीं देखते थे बल्िक स्वतंत्रा नगर - राज्यों का एक समूह मानते थे। नगरों में फ्ऱलोरेंस और वेनिस, गणराज्य थे और कइर् अन्य दरबारी - नगर थे जिनका शासन राजवुफमार चलाते थे। इनमें सवार्ध्िक जीवंत शहरों में पहला वेनिस और दूसरा जिनेवा था। वे यूरोप के अन्य क्षेत्रों से इस दृष्िट में अलग थे कि यहाँ पर ध्मार्ध्िकारी और सामंत वगर् राजनैतिक दृष्िट से शक्ितशाली नहीं थे। नगर के ध्नी व्यापारी और महाजन नगर के शासन में सिय रूप से भाग लेते थे जिससे नागरिकता की भावना पनपने लगी। यहाँ तक कि जब इन नगरों का शासन सैनिक तानाशाहों के हाथ में रहा तब भी इन नगरों के निवासी अपने को यहाँ का नागरिक कहने में गवर् का अनुभव करते थे। नगर - राज्य काडिर्नल गेसपारो कोन्तारिनी ;ब्ंतकपदंस ळंेचंतव ब्वदजंतपदपए 1483 - 1542द्ध अपने ग्रंथ दि काॅमनवेल्थ एण्ड गवनर्मंेट आॅपफ वेनिस ;1534द्ध में अपने नगर - राज्य की लोकतांत्रिाक सरकार के बारे में लिखते हैंः फ्... हमारे वेनिस के संयुक्तमंडल ;ब्वउउवदूमंसजीद्ध की संस्था के बारे में जानने पर आपको ज्ञात होगा कि नगर का संपूणर् प्राध्िकार... एक ऐसी परिषद् के हाथों में है जिसमें 25 वषर् से अध्िक आयु वाले ख्संभ्रांत वगर् के, सभी पुरुषों को सदस्यता मिल जाती है...। सबसे पहले मैं आपको यह बताउँफगा कि हमारे पूवर्जों ने ऐसा नियम क्यों बनाया कि सामान्य जनता को नागरिक वगर् मेंμजिनके हाथ में संयुक्तमंडल के शासन की बागडोर हैμशामिल क्यों नहीं किया जाए... क्योंकि उन नगरों में अनेक प्रकार की गड़बडि़याँ और जन उपद्रव होते रहते हैं जहाँ की सरकार पर जन - सामान्य का प्रभाव रहता है। वुफछ लोगों के विचार इससे अलग थे। उनका कहना था कि यदि संयुक्त मंडल का शासन - संचालन अध्िक वुफशलता से करना है तो योग्यता और संपन्नता को आधर बनाना चाहिए। दूसरी ओर सच्चरित्रा नागरिक जिनका लालन - पालन उदार वातावरण में होता है वे प्रायः निध्र्न हो जाते हैं.... इसीलिए हमारे बुिमान और विवेकवान पूवर्जों ने ... यह विचार रखा कि इस सावर्जनिक नियम को बदल कर ध्न - संपन्नता को आधर न बनाकर वुफलीन वंशीय लोगों को प्राथमिकता दी जाए। तथापि इस शतर् के साथ कि केवल उच्च अभ्िाजात वंशीय लोग ही सत्ता में न रहें ;क्योंकि ऐसा करने से चंद लोगों की शक्ित कापफी बढ़ जाएगी न कि संयुक्तमंडल कीद्ध। गरीब लोगों को छोड़कर सभी नागरिकों का प्रतिनिध्ित्व सत्ता में होना चाहिएः चाहें वे अभ्िाजात वंशीय हों या वे लोग हों जो अपने विश्िाष्ट गुणों के कारण उदात्त हों। इन सभी को सरकार चलाने का अध्िकार मिलना चाहिए।य् 155बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ विश्वविद्यालय और मानवतावाद यूरोप में सबसे पहले विश्वविद्यालय इटली के शहरों में स्थापित हुए। ग्यारहवीं शताब्दी से पादुआ और बोलोनिया ;ठवसवहदंद्ध विश्वविद्यालय विध्िशास्त्रा के अध्ययन वेंफद्र रहे। इसका कारण था यह कि इन नगरों के प्रमुख ियाकलाप व्यापार और वाण्िाज्य संबंध्ी थे इसलिए वकीलों और नोटरी ;यह सोलिसिटर और अभ्िालेखपाल दोनों के कायर् करते थेद्ध की बहुत अध्िक आवश्यकता होती थी क्योंकि वे नियमों को लिखते, उनकी व्याख्या करते और समझौते तैयार करते थे। इनके बिना बड़े पैमाने पर व्यापार करना संभव नहीं था। यही कारण था कि कानून का अध्ययन एक पि्रय विषय बन गया। लेकिन कानून के अध्ययन में यह बदलाव आया कि उसे रोमन संस्वृफति के संदभर्में पढ़ा जाने लगा। Ú़ांचेस्को पेट्रावर्फ ;1304 - 1378द्ध इस परिवतर्न का प्रतिनिध्ित्व करते हैं। पेट्रावर्फ के लिए पुराकाल एक विश्िाष्ट सभ्यता थी जिसे प्राचीन यूनानियों और रोमनों के वास्तविक शब्दों के माध्यम से ही अच्छी तरह समझा जा सकता है। अतः उसने इस बात पर जोर दिया कि इन प्राचीन लेखकों की रचनाओं का बहुत अच्छी तरह से अध्ययन किया जाए। इस श्िाक्षा कायर्व्रफम में यह अंतनिर्हित था कि बहुत वुफछ जानना बाकी है और यह सब हम केवल धमिर्क श्िाक्षण से नहीं सीखते। इसी नयी संस्वृफति को उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने ‘मानवतावाद’ नाम दिया। पंद्रहवीं शताब्दी के शुरू के दशकों में ‘मानवतावादी’ शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्रा, कविता, इतिहास और नीतिदशर्न विषय पढ़ाते थे। लातिनी शब्द ‘ह्यूमेनिटास’ जिससे ‘ह्यूमेनिटिश’ शब्द बना है जिसे कइर् शताब्िदयों पहले रोम के वकील तथा निबंध्कार सिसरो ;ब्पबमतवए 106 - 43 इर्.पू.द्ध ने, जो कि जूलियस सीशर का समकालीन था, ‘संस्वृफति’ के अथर् में लिया था। ये विषय धमिर्क नहीं थे वरन् उस कौशल पर बल देते थे जो व्यक्ित चचार् और वाद - विवाद से विकसित करता है। इन क्रांतिकारी विचारों ने अनेक विश्वविद्यालयों का ध्यान आकष्िार्त किया। इनमें एक नया - नयास्थापित विश्वविद्यालय .फ्रलोरंेस भी था जो पेट्रावर्फ का स्थायी नगर - निवास था। इस नगर ने तेरहवीं .फ्रलोरंेस, 1470 में बनाया गया एक रेखाचित्रा। जोटो द्वारा रचित चित्रा, असिसी, इटली। .फ्रलोरेंस के मानवतावादी जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला ;ळपवअंददप च्पबव कमससं डपतंदकवसंए 1463.94द्ध ने आॅन दि डिगनिटी आॅपफ मैन ;1486द्ध नामक पुस्तक में वाद - विवाद केमहत्त्व पर लिखाμ फ्;प्लेटो और अरस्तूद्ध के अनुसार सत्य की खोज करने और इसे प्राप्त करने के लिए वे हमेशा जुटे रहते थे और उनका कहना था कि जहाँ तक हो सके विचारगोष्िठयों में जाना चाहिए और वाद - विवाद करना चाहिए। यह उसी तरह है जैसे शरीर को मशबूत बनाने के लिए कसरत शरूरी है, दिमाग की ताकत को बढ़ाने के लिए शब्दों के दंगल में उतरना शरूरी है। इससे दिमागी ताकत बढ़ने के साथ - साथ और अध्िक ओजस्वी होती है।य् शताब्दी के अंत तक व्यापार या श्िाक्षा के क्षेत्रा में कोइर् विशेष तरक्की नहीं की थी पर पंद्रहवीं शताब्दी में सब वुफछ पूरी तरह बदल गया। किसी भी नगर की पहचान उसके महान नागरिकोंके साथ - साथ उसकी संपन्नता से बनती है। .फ्रलोरंेस की प्रसिि में दो लोगों का बड़ा हाथ था। इनमें से एक व्यक्ित थे दाँते अलिगहियरी ;क्ंदजम ।सपहीपमतपए 1265 दृ 1321द्ध जो किसी धामिर्क संप्रदाय विशेष से संबंिात नहीं थे पर उन्होंने अपनी वफलम धमिर्क विषयों पर चलायी थी। दूसरे व्यक्ित थे कलाकार जोटो ;ळपवजजवए 1267दृ1337द्ध जिन्होंने जीते - जागते रूपचित्रा ;च्वतजतंपजद्ध बनाए। उनके बनाए रूपचित्रा पहले के कलाकारों की तरह बेजान नहीं थे। इसके बाद ध्ीरे - ध्ीरे .फ्रलोरंेस, इटली के सबसे जीवंत बौिक नगर के रूप में जाना जाने लगा और कलात्मकवृफतियों के सृजन का केन्द्र बन गया। ‘रेनेसाँ व्यक्ित’ शब्द का प्रयोग प्रायः उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हांे और अनेक हुनर में उसे महारत प्राप्त हो। पुनजार्गरणकाल में अनेक महान लोग हुए जो अनेक रुचियाँ रखते थे और कइर् कलाओं में वुफशल थे। उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ित विद्वान, वूफटनीतिज्ञ, ध्मर्शास्त्राज्ञ और कलाकार हो सकता था। इतिहास का मानवतावादी दृष्िटकोण मानवतावादी समझते थे कि वह अंध्कार की कइर् शब्तादियों बाद सभ्यता के सही रूप को पुनः स्थापित कर रहे हैं। इसके पीछे यह मान्यता थी कि रोमन साम्राज्य के टूटने के बाद ‘अंधकारयुग’ शुरू हुआ। मानवतावादियों की भाँति बाद के विद्वानों ने बिना कोइर् प्रश्न उठाए यह मान लिया कि ख्यूरोप में चैदहवीं शताब्दी के बाद ‘नये युग’ का जन्म हुआ।, ‘मध्यकाल’ जैसी संज्ञाओं का प्रयोग रोम साम्राज्य के पतन के बाद एक हशार वषर् की समयावध्ि के लिए किया गया। उनके यह 157बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ तवर्फ थे कि ‘मध्ययुग’ में चचर् ने लोगों की सोच को इस तरह जकड़ रखा था कि यूनान और रोमवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था। मानवतावादियों ने ‘आध्ुनिक’ शब्द का प्रयोग पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू होने वाले काल के लिए किया। मानवतावादियों और बाद के विद्वानों द्वारा प्रयुक्त कालक्रम ;च्मतपवकपेंजपवदद्ध। 5दृ14 शताब्दी मध्य युग 5दृ9 शताब्दी अंध्कार युग 9दृ11 शताब्दी आरंभ्िाक मध्य युग 11दृ14 शताब्दी उत्तर मध्य युग 15 शताब्दी से आध्ुनिक युग हाल में अनेक इतिहासकारों ने इस काल विभाजन पर सवाल उठाया है। इस काल के यूरोपके बारे में जैसे - जैसे खोजें और शोध् बढ़ते गए वैसे - वैसे विद्वानों ने शताब्िदयों की सांस्कृतिक समृि अथवा असमृि को आधर मानकर तीक्ष्ण विभाजन करने में अपनी दुविध जताइर्। किसी भी काल को ‘अंध्कार युग’ की संज्ञा देना उन्हें अनुचित लगा। विज्ञान और दशर्नμअरबीयों का योगदान पूरे मध्यकाल में इर्साइर् गिरजाघरों और मठों के विद्वान यूनानी और रोमन विद्वानों की वृफतियों से परिचित थे। पर इन लोगों ने इन रचनाओं का प्रचार - प्रसार नहीं किया। चैदहवीं शताब्दी में अनेक विद्वानों ने प्लेटो और अरस्तू के गं्रथों से अनुवादों को पढ़ना शुरू किया। इसके लिए वे अपनेविद्वानों के ट्टणी नहीं, बल्िक वे अरब के अनुवादकों के ट्टणी थे जिन्होंने अतीत की पांडुलिपियों का संरक्षण और अनुवाद सावधनीपूवर्क किया था ;अरबी भाषा में प्लेटो, अप़्ाफलातून और एरिसटोटिल, अरस्तू नाम से जाने जाते थेद्ध। जबकि एक ओर यूरोप के विद्वान यूनानी ग्रंथों के अरबी अनुवादों का अध्ययन कर रहे थे दूसरी ओर यूनानी विद्वान अरबी और प्.ाफारसी विद्वानों की वृफतियों को अन्य यूरोपीय लोगों के बीच प्रसार के लिए अनुवाद कर रहे थे। ये गं्रथ प्रावृफतिक विज्ञान, गण्िात, खगोल विज्ञान ;ंेजतवदवउलद्धए औषध्ि विज्ञान और रसायन विज्ञान से संबंध्ित थे। टाॅलेमी के अलमजेेस्ट ;खगोल शास्त्रा पर रचित ग्रंथ जो 140 इर्. के पूवर् यूनानी भाषा में लिखा गया था और बाद में इसका अरबी में अनुवाद भी हुआद्ध में अरबी भाषा के विशेष उपपद ‘अल’ का उल्लेख है जो कि यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधें को दशार्ता है। मुसलमान लेखकों, जिन्हें इतालवी दुनिया में ज्ञानी माना जाता था, में अरबी के हकीम और मध्य एश्िाया के बुखारा के दाशर्निक इब्न - सिना’ ;प्इद ैपदं.लातिनी में एविसिना 980 - 1037द्ध और आयुविर्ज्ञान विश्वकोश के लेखक अल - राशी ;रेशेसद्ध सम्िमलित थे। स्पेन के अरबी दशार्निक इब्न रूश्द ;लातिनी में अविरोश 1126 - 98द्ध ने दाशर्निक ज्ञान ;पैफलसुप़्ाफद्ध और धमिर्क विश्वासों के बीच रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। उनकी प(ति को इर्साइर् चिंतकों द्वारा अपनाया गया। मानवतावादी अपनी बात लोगों तक तरह - तरह से पहुँचाने लगे। यद्यपि विश्वविद्यालयों में पाठ्यचयार् पर कानून, आयुविर्ज्ञान और ध्मर्शास्त्रा का दबदबा रहा, पिफर भी मानवतावादी विषय धीरे - ध्ीरे स्वूफलों में पढ़ाया जाने लगा। यह सिपर्फ इटली में ही नहीं बल्िक यूरोप के अन्य देशों में भी हुआ। ’इन व्यक्ितयों के नामों की यूरोपीय वतर्नी ने बाद की पीढि़यों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे यूरोपीय थे! इस काल के विद्यालय लड़कों के लिए ही थे। कलाकार और यथाथर्वाद उस काल के लोगों के विचार को आकार देने का साध्न मानवतावादियों के लिए केवल औपचारिक श्िाक्षा ही नहीं थी। कला, वास्तुकला और गं्रथों ने मानवतावादी विचारों को पैफलाने में प्रभावी भूमिका निभाइर्। फ्कला प्रवृफति में रची - बसी होती है। जो इसके सार को पकड़ सकता है वहीइसे प्राप्त कर सकता है... इसके अतिरिक्त आप अपनी कला को गण्िात द्वारा दिखा सकते हैं। िांदगी की अपनी आवृफति से आपकी वृफति जितनी जुड़ीहोगी उतना ही सुंदर आपका चित्रा होगा। कोइर् भी आदमी केवल अपनी कल्पना मात्रा से एक सुंदर आवृफति नहीं बना सकता जब तक उसने अपने मनको जीवन की प्रतिछवि से न भर लिया हो।य् दृ अल्वटर् ड्यूरर ;।सइतमबीज क्नतमतए 1471 - 1528द्ध ड्यूरर द्वारा बनाया गया यह रेखाचित्रा ;प्राथर्नारत हस्तद्ध सोलहवीं शताब्दीकी इतालवी संस्वृफति का आभास कराता है जब यहाँ के लोग गहन रूप से धामिर्क थे। परंतु उन्हें मनुष्य की योग्यता पर भरोसा था कि वह निकटपूणर्ता को प्राप्त कर सकता है और दुनिया तथा ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझा सकता है। ‘दि पाइटा’ चित्रा में माइकेलपहले के कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्रों के अध्ययन से नए कलाकारों को प्रेरणा मिली। रोमनएन्िजलो ने मेरी को इर्सा केसंस्वृफति के भौतिक अवशेषों की उतनी ही उत्सुकता के साथ खोज की गइर् जितनी कि अतीत केशरीर को धरण करते हुएदिखाया है। प्राचीन ग्रंथों की। रोम साम्राज्य के पतन के एक हशार साल बाद भी प्राचीन रोम और उसके उजाड़ नगरों के खंडहरों में कलात्मक वस्तुएँ मिलीं। अनेक शताब्िदयों पहले बनी आदमी और औरतोें की ‘संतुलित’ मूतिर्यों के प्रति आदर ने उस परंपरा को कायम रखने के लिए इतालवी वास्तुविदों को प्रोत्साहित किया। 1416 में दोनातल्लो ;क्वदंजमससवए 1386 - 1466द्ध ने सजीव मूतिर्याँ बनाकर नयी परंपरा कायम की।कलाकारों द्वारा हूबहू मूल आकृति जैसी मूतिर्यों को बनाने की चाह को वैज्ञानिकों के कायार्ें से सहायता मिली। नर - वंफकालों का अध्ययन करने के लिए कलाकर आयुविर्ज्ञान काॅलेजों की प्रयोगशालाओं में गए। बेल्िजयम मूल के आन्ड्रीयस वेसेलियस ;।दकतमंे टमेंसपनेए 1514 - 64द्ध पादुआ विश्वविद्यालय में आयु£वज्ञान के प्राध्यापक थे। ये पहले व्यक्ित थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर - पफाड़ ;कपेेमबजपवदद्ध की। इसी समय से आधुनिक शरीर - वि्रफया विज्ञान ;च्ीलेपवसवहलद्ध का प्रारंभ हुआ। 159बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ यह स्वनिमिर्त रूपचित्रा लियोनाडोर् दा विन्ची ;स्मवदंतकव कं टपदबपए 1452 - 1519द्ध काहै जिनकी आश्चयर्जनक अभ्िारुचि वनस्पति विज्ञान और शरीर रचना विज्ञान से लेकरगण्िात शास्त्रा और कला तक विस्तृत थी। उन्होंने मोना लीसा और द लास्ट सपर चित्रों कीरचना की।उनका यह स्वप्न था कि वे आकाश में उड़ सवेंफ। वे वषोर् तक आकाश में पक्ष्िायों केउड़ने का परीक्षण करते रहे और उन्होंने एक उड़न - मशीन ;थ्सलपदह उंबीपदमद्ध का प्रतिरूप ;क्मेपहदद्ध बनाया। उन्होंने अपना नाम ‘लियोनाडोर् दा विन्ची, परीक्षण का अनुयायी’ रखा। चित्राकारों के लिए नमूने के तौर पर प्राचीन वृफतियाँ नहीं थीं। लेकिन मूतिर्कारों की तरह उन्होेंने यथाथर् चित्रा बनाने की कोश्िाश की। उन्हें अब यह मालूम हो गया कि रेखागण्िात ;हमवउमजतलद्ध के ज्ञान से चित्राकार अपने परिदृश्य ;च्मतेचमबजपअमद्ध को ठीक तरह से समझ सकता है तथाप्रकाश के बदलते गुणों का अध्ययन करने से उनके चित्रों में त्रिा - आयामी ;जीतमम कपउमदजपवदंसद्ध रूप दिया जा सकता है। लेप चित्रा ;च्ंपदजपदहद्ध के लिए तेल के एक माध्यम के रूप में प्रयोगने चित्रों को पूवर् की तुलना में अध्िक रंगीन और चटख बनाया। उनके अनेवफ चित्रों में दिखाएगए वस्त्रों के डिशाइन और रंग संयोजन में चीनी और प्.ाफारसी चित्राकला का प्रभाव दिखाइर् देता है जो उन्हें मंगोलांे से मिली थी ;विषय 5 देख्िाएद्ध।इस तरह शरीर विज्ञान, रेखागण्िात, भौतिकी और सौंदयर् की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कलाको नया रूप दिया जिसे बाद में ‘यथाथर्वाद’ ;तमंसपेउद्ध कहा गया। यथाथर्वाद की यह परंपराउन्नीसवीं शताब्दी तक चलती रही। वास्तुकला पंद्रहवीं शताब्दी में रोम नगर भव्य रूप से पुनजीर्वित हो उठा। 1417 से पोप राजनैतिक दृष्िट सेशक्ितशाली बन गए क्योंकि 1378 से दो प्रतिस्पध्ीर् पोप के निवार्चन से जन्मी दुबर्लता का अंतहो गया था। उन्होंने रोम के इतिहास के अध्ययन को सियरूप सेे प्रोत्साहित किया। पुरातत्त्वविदों ;पुरात्तत्व का नया हुनरथाद्ध द्वारा रोम के अवशेषांे का सावधनी से उत्खनन किया गया।इसने वास्तुकला की एक ‘नयी शैली’ को प्रोत्साहित किया जोवास्तव में रोम साम्राज्य कालीन शैली का पुनरू(ार थी जिसेअब ‘शास्त्राीय’ शैली कहा गया। पोप, धनी व्यापारियों औरअभ्िाजात वगर् के लोगों ने उन वास्तुविदों ;ंतबीपजमबजद्ध को अपने भवनों को बनाने के लिए नियुक्त किया जो शास्त्राीयवास्तुकला से परिचित थे। चित्राकारों और श्िाल्पकारों ने भवनोंको लेपचित्रों, मू£तयों और उभरे चित्रों से भी सुसज्िजत किया।इस काल में वुफछ ऐसे भी लोग हुए जो वुफशल चित्राकार,मूतिर्कार और वास्तुकार, सभी वुफछ थे। इसका सबसे श्रेष्ठउदाहरण माइर्वफल ऐंजेलो बुआनारोत्ती ;डपबींमस ।दहमसव ठनवदंततवजपए 1475 - 1564द्ध हैं जिन्होंने पोप के सिस्टीनचैपल की भीतरी छत में लेपचित्रा, ‘दि पाइटा’ नामक प्रतिमा,और सेंट पीटर गिरजे के गुम्बद का डिशाइन बनाया औरइनकी वजह से माइर्कल ऐंजेलो अमर हो गए। येसारी कलावृफतियाँ रोम में ही हैं। वास्तुकार पिफलिप्पो बू्रनेलेशी सोलहवीं शताब्दी की इटलीकी वास्तुकला ने रोमसाम्राज्य कालीन अनेकभवनों की विश्िाष्टताओं की नकल की। ;च्ीपसपचचव ठतनदमससमेबीपए1337.1446द्ध जिन्होंने .फ्रलोरेंस के भव्य गुम्बद ;क्नवउवद्ध का परिरूप प्रस्तुत किया था, ने अपना पेशा एक मूतिर्कार के रूप में शुरू किया। इस काल में एकऔर अनोखा बदलाव आया। अब कलाकार की पहचान उसके नाम से होने लगी, न कि पहलेकी तरह उसके संघ या श्रेणी ;गिल्डद्ध के नाम से। प्रथम मुदि्रत पुस्तवेंफ दूसरे देशों के लोग यदि महान कलाकारों द्वारा रचित लेप - चित्रों, मूतिर्यों याभवनों को देखना चाहते थे तो उन्हें इटली की यात्रा करनी पड़ती थी। किंतुजहाँ तक साहित्य की बात है जो वुफछ भी इटली में लिखा गया विदेशों तकपहुँचा। ये सब सोलहवीं शताब्दी की व्रफांतिकारी मुद्रण प्रौद्योगिकी की दक्षता की वजह से हुआ। इसके लिए यूरोपीय लोग अन्य लोगों केμमुद्रणप्रौद्योगिकी के लिए चीनियों के तथा मंगोल शासकों के ट्टणी रहे, क्योंकि यूरोप के व्यापारी और राजनयिक मंगोल शासकों के राज - दरबार में अपनी यात्राओं के दौरान इस तकनीक से परिचित हुए थे। ;ऐसा ही अन्य तीन प्रमुख तकनीकी नवीकरणोंμआग्नेयास्त्रा, कम्पास और पफलक ;।इंबनेद्ध के विषय में भी हुआद्ध। इससे पहले किसी गं्रथ की वुफछ ही हस्तलिख्िात प्रतियाँ होती थीं। सन् 1455 में जमर्नमूल के जोहानेस गूटेनबगर् ;श्रवीमददमे ळनजमदइमतहए 1400 - 58द्ध जिन्होंने पहले छापेखाने का निमार्ण किया, उनकी कायर्शाला में बाइर्बल की 150 प्रतियाँ छपीं। इससे पहले इतने ही समय में एक ध्मर्भ्िाक्षु ;डवदाद्ध बाइर्बल की केवल एक ही प्रति लिख पाता था। पंद्रहवी शताब्दी तक अनेक क्लासिकी गं्रथों जिनमें अध्िकतर लातिनी ग्रंथ थे, उनका मुद्रण इटली में हुआ था। चूंकि मुदि्रत पुस्तवेंफ उपलब्ध् होने लगीं और उनका व्रफय संभव होने लगा, छात्रों को केवल अध्यापकों के व्याख्यानों से बने नोट पर निभर्र नहीं रहना पड़ा। अब विचार, मत और जानकारी पहले की अपेक्षा तेशी से प्रसारित हुए। नये विचारों को बढ़ावा देने वाली एक मुदि्रत पुस्तक कइर् सौ पाठकों के पास बहुत जल्दी पहुँच सकती थी। अब पाठक एकांत में बैठकर पुस्तकों को पढ़ सकता था क्योंकि वह उन्हें बाशार से खरीद सकता था। इससे लोगों में पढ़ने की आदत का विकास हुआ।पंद्रहवी शताब्दी के अंत से इटली की मानवतावादी संस्कृति का आल्प्स ;।सचेद्ध पवर्त के पार बहुत तेशी से पैफलने का मुख्य कारण वहाँ पर छपी हुइर् पुस्तकों का वितरण था। इससे स्पष्ट है कि पहले के बौिक आंदोलन खास क्षेत्रों तक ही सीमित क्यों रहते थे। मनुष्य की एक नयी संकल्पना मानवतावादी संस्वृफति की विशेषताओं में से एक था मानव जीवन पर ध्मर् का नियंत्राण कमजोरहोना। इटली के निवासी भौतिक संपिा, शक्ित और गौरव से बहुत श्यादा आवृफष्ट थे। परंतु ये शरूरी नहीं कि वे अधमिर्क थे। वेनिस के मानवतावादी प्रेफन्चेस्को बरबारो ;थ्तंदबमेबव ठंतइंतवए 1390 - 1454द्ध ने अपनी एक पुस्ितका में संपिा अिाग्रहण करने को एकविशेष गुण कहकर उसकी तरप्.ाफदारी की। लोरेन्शो वल्ला ;स्वतमद्रव टंससंए 1406 - 1457द्ध 161बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ विश्वास करते थे कि इतिहास का अध्ययन मुनष्य को पूणर्तया जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करता है, उन्होंने अपनी पुस्तक आॅनप्लेशर में भोग - विलास पर लगाइर् गइर् इर्साइर् ध्मर् की निषेधज्ञा की आलोचना की। इस समय लोगों में अच्छे व्यवहारों के प्रति दिलचस्पी थीμ व्यक्ित को किस तरह विनम्रता से बोलना चाहिएऋ वैफसे कपड़े पहनने चाहिए और एक सभ्य व्यक्ित को किसमें दक्षता हासिल करनी चाहिए।मानवतावाद का मतलब यह भी था कि व्यक्ित विशेष सत्ता और दौलत की होड़ को छोड़कर अन्य कइर् माध्यमों से अपने जीवन को रूप दे सकता था। यह आदशर् इस विश्वास के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा था कि मनुष्य का स्वभाव बहुमुखी है जो कि तीन भ्िान्न - भ्िान्न वगो± जिसमें सामंती समाज विश्वास करता था, के विरु( गया। निकोलो मैक्ियावेली ;छपबबवसव डंबीपंअमससपद्ध अपने ग्रंथ दि पि्रंस ;1513द्ध के पंद्रहवें अध्याय में मनुष्य के स्वभाव के बारे में लिखते हैंμ फ्काल्पनिक बातों को यदि अलग कर दें और केवल उन्हीं विषयों के बारे में सोचें जो वास्तव में हैं, मैं यह कहता हूँ कि जब भी मनुष्यों के बारे में चचार् होती है ;विशेषकर राजवुफमारों के बारे में, जो जनता की नजर में रहते हैंद्ध तो इनमें अनेक गुण देखे जाते हैं जिनके कारण वे प्रशंसा या निंदा के योग्य बने हैं। उदाहरण के लिए, वुफछ को दानी माना जाता है और अन्य को कंजूस। वुफछ लोगों को हितैषी माना जाता है तो अन्य को लोभी कहा जाता हैऋ वुफछ निदर्यी और वुफछ दयालु। एक व्यक्ित अविश्वसनीय और दूसरा विश्वसनीयऋ एक व्यक्ित पौरुषहीन और कायरऋ दूसरा खूँखार और साहसीऋ एक व्यक्ित श्िाष्ट दूसरा घमंडीऋ एक व्यक्ित कामुक दूसरा पवित्राऋ एक निष्कपट दूसरा चालाकऋ एक अडि़यल दूसरा लचीलाऋ एक गंभीर दूसरा छिछोराऋ एक धमिर्क दूसरा संदेही इत्यादि। मैक्ियावेली यह मानते थे कि ‘सभी मनुष्य बुरे हैं और वह अपने दुष्ट स्वभाव को प्रदश्िर्ात करने में सदैव तत्पर रहते हैं क्योंकि वुफछ हद तक मनुष्य की इच्छाएँ अपूणर् रह जाती हैं।’ मैक्ियावेली ने देखा कि इसके पीछे, प्रमुख कारण है कि मनुष्य अपने समस्त कायोर्ं में अपना स्वाथर् देखता है।य् महिलाओं की आकांक्षाएँ वैयक्ितकता ;पदकपअपकनंसपजलद्ध और नागरिकता के नए विचारों से महिलाओं को दूर रखा गया। सावर्जनिक जीवन में अभ्िाजात व संपन्न परिवार के पुरुषों का प्रभुत्व था और घर - परिवार केमामले में भी वे ही निणर्य लेते थे। उस समय लोग अपने लड़कों को ही श्िाक्षा देते थे जिससे उनके बाद वे उनके खानदानी पेशे या जीवन की आम िाम्मेदारियों को उठा सवेंफ। कभी - कभीवे अपने छोटे लड़कों को धमिर्क कायर् के लिए चचर् को सौंप देते थे, यद्यपि विवाह में प्राप्त महिलाओं के दहेश को वे अपने पारिवारिक कारोबारों में लगा देते थे, तथापि महिलाओं को यहअध्िकार नहीं था कि वे अपने पति को कारोबार चलाने के बारे में कोइर् राय दें। प्रायः कारोबारी मैत्राी को सुदृढ़ करने के लिए दो परिवारों में आपस में विवाह संबंध् होते थे। अगर पयार्प्त दहेशका प्रबंध् नहीं हो पाता था तो शादीशुदा लड़कियों को इर्साइर् मठों में भ्िाक्षुणी ;छनदद्ध का जीवन बिताने के लिए भेज दिया जाता था। आम तौर पर सावर्जनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारीबहुत सीमित थी और उन्हें घर - परिवार को चलाने वाले के रूप में देखा जाता था। इसाबेला दि इस्ते। व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्िथति वुफछ भ्िान्न थी। दुकानदारों की स्ित्रायाँ दुकानों को चलाने में प्रायः उनकी सहायता करती थीं। व्यापारी और साहूकार परिवारों की पत्िनयाँ, परिवारके कारोबार को उस स्िथति में सँभालती थीं जब उनके पति लंबे समय के लिए दूर - दराश स्थानोंको व्यापार के लिए जाते थे। अभ्िाजात्य संपन्न परिवारों के विपरीत, व्यापारी परिवारों में यदिव्यापारी की कम आयु में मृत्यु हो जाती थी तो उसकी पत्नी सावर्जनिक जीवन में बड़ी भूमिका निभाने के लिए बाध्य होती थी।पर उस काल की वुफछ महिलाएँ बौिक रूप से बहुत रचनात्मक थीं और मानवतावादी श्िाक्षाकी भूमिका के बारे में संवेदनशील थीं। वेनिस निवासी कसान्द्रा पेफदेले ;ब्ंेेंदकतं थ्मकमसमए 1465 - 1558द्ध ने लिखा, फ्यद्यपि महिलाओं को श्िाक्षा न तो पुरस्कार देती है न किसी सम्मान काआश्वासन, तथापि प्रत्येक महिला को सभी प्रकार की श्िाक्षा को प्राप्त करने की इच्छा रखनी चाहिएऔर उसे ग्रहण करना चाहिए।य् वह उस समय की उन थोड़ी सी महिलाओं में से एक ऐसी महिलाथी जिन्होंने तत्कालीन इस विचारधरा को चुनौती दी कि एक मानवतावादी विद्वान के गुण एक महिलाके पास नहीं हो सकते। पेफदेले का नाम यूनानी और लातिनी भाषा के विद्वानों के रूप में विख्यातथा। उन्हें पादुआ विश्वविद्यालय में भाषण देने के लिए आमंत्रिात किया गया था।पेफदेले की रचनाओं से यह बात सामने आती है कि इस काल में सब लोग श्िाक्षा को बहुतमहत्त्व देते थे। वे वेनिस की अनेक लेख्िाकाओं में से एक थीं जिन्होंने गणतंत्रा की आलोचना‘‘स्वतंत्राता की एक बहुत सीमित परिभाषा निधर्रित करने के लिए की, जो महिलाओं की अपेक्षापुरुषों की इच्छा का ज्यादा समथर्न करती थी।य् इस काल की एक अन्य प्रतिभाशाली महिलामंटुआ की माचिर्सा इर्साबेला दि इस्तेे ;प्ेंइमससं कष् म्ेजमए1474 - 1539द्ध थीं। उन्होंने अपने पतिकी अनुपस्िथति में अपने राज्य पर शासन किया। यद्यपि मंटुआ, एक छोटा राज्य था तथापि उसकाराजदरबार अपनी बौिक प्रतिभा के लिए प्रसि( था। महिलाओं की रचनाओं से उनके इस दृढ़विश्वास का पता चलता है कि उन्हें पुरुष - प्रधन समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए अिाकआथ्िार्क स्वायत्तता, संपिा और श्िाक्षा मिलनी चाहिए। लेखक और वूफटनीतिज्ञ, बाल्थासार वफास्िटल्योनी ;ठंसजींेंत ब्ंेजपहसपवदमद्ध ने अपनी पुस्तक दि कोटिर्यर ;1528द्ध में लिखा हैμ मेरे विचार से अपने तौर - तरीके, व्यवहार, बातचीत के तरीके, भाव - भंगिमा और छवि में एक महिला पुरुष के सदृश नहीं होनी चाहिए। जैसे कि यह कहना बिलवुफल उपयुक्त होगा कि पुरुषों को हट्टा - कट्टा और पौरुषसंपन्न होना चाहिए इसी तरह एक स्त्राी के लिए यह अच्छा ही है कि उसमें कोमलता और सहृदयता हो, एक स्ित्रायोचित मध्ुरता का आभास उसके हर हाव - भाव में हो और यह उसके चाल - चलन, रहन - सहन और हर ऐसे कायर् में हो जो वह करती है, ताकि ये सारे गुण उसे हर हाल में एक स्त्राी के रूप में ही दिखाएँ, न कि किसी पुरुष के सदृश। यदि उन महानुभावों द्वारा दरबारियों को सिखाए गए नियमोें में इन नीति वचनों को जोड़ दिया जाए तो महिलाएँ इनमें से अनेक को अपनाकर खुद को बेहतरीन गुणों से सुसज्िजत कर सवेंफगी। क्योंकि मेरा यह मानना है कि मस्ितष्क के वुफछ ऐसे गुण हैं जो महिलाओं के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितने कि पुरुष के लिए जैसे कि अच्छे वुफल का होना, दिखावे का परित्याग करना, सहज रूप से शालीन होना, आचरणवान, चतुर और बुिमान होना, गवीर्, इर्ष्यार्लु, कटु और उद्दंड न होना...जिससे महिलाएँ उन क्रीड़ाओं को, श्िाष्टता और मनोहरता के साथ संपन्न कर सवंेंफ, जो उनके लिए उपयुक्त हैं। 163बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ इर्साइर् ध्मर् के अंतगर्त वाद - विवाद व्यापार और सरकार, सैनिक विजय और वूफटनीतिक संपको± के कारण इटली के नगरों और राजदरबारों के दूर - दूर के देशों से संपवर्फ स्थापित हुए। नयी संस्वृफति की श्िाक्ष्िात और समृिशाली लोगों द्वारा प्रशंसा ही नहीं की गइर् वरन् उसको अपनाया भी गया। परंतु इन नए विचारों में वुफछ ही आम आदमी तक पहुँच सके क्योंकि वे साक्षर नहीं थे।पंद्रहवीं और आरंभ्िाक सोलहवीं शताब्िदयों में उत्तरी यूरोप के विश्वविद्यालयों के अनेक विद्वान मानवतावादी विचारों की ओर आकष्िार्त हुए। अपने इतालवी सहकमिर्यों की तरह उन्होंने भी यूनान और रोम के क्लासिक गं्रथों और इर्साइर् ध्मर्ग्रंथों के अध्ययन पर अध्िक ध्यान दिया। पर इटलीके विपरीत जहाँ पेशेवर विद्वान मानवतावादी आंदोलन पर हावी रहे, उत्तरी यूरोप में मानवतावाद ने इर्साइर् चचर् के अनेवफ सदस्यों को आकष्िार्त किया। उन्होंने इर्साइयों को अपने पुराने ध्मर्ग्रथों में बताए गए तरीकों से ध्मर् का पालन करने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने अनावश्यक कमर्कांडों को त्यागने की बात की और उनकी यह कहकर निंदा की कि उन्हें एक सरल ध्मर् में बाद में जोड़ा गया है। मानव के बारे में उनका दृष्िटकोण बिलवुफल नया था क्योंकि वे उसे एक मुक्त विवेकपूणर् कतार् समझते थे। बाद के दाशर्निक बार - बार इसी बात को दोहराते रहे। वे एक दूरवतीर् इर्श्वर में विश्वास रखते थे और मानते थे कि उसने मनुष्य बनाया है लेकिन उसे अपना जीवन मुक्त रूप से चलाने की पूरी आशादी भी दी है। वे यह भी मानते थे कि मनुष्य को अपनी खुशी इसी विश्व में वतर्मान में ही ढूँढ़नी चाहिए। इर्साइर् मानवतावादी जैसे कि इंग्लैंड के टाॅमस मोर ;ज्ीवउंे डवतमए 1478 - 1535द्ध और हालैंड के इरेस्मस, ;म्तंेउनेए1466 - 1536द्ध का यह मानना था कि चचर् एक लालची और साधरण लोगों से बात - बात पर लूट - खसोट करने वाली संस्था बन गइर्। पादरियों का लोगों से धन ठगने का सबसे सरल तरीका ‘पाप - स्वीकारोक्ित’ ;पदकनसहमदबमेद्ध नामक दस्तावेश था जो व्यक्ित को उसके सारे किए गए पापों से छुटकारा दिला सकता था। इर्साइयों को बाइर्बल के स्थानीय भाषाओं में छपे अनुवाद से यह ज्ञात हो गया कि उनका ध्मर् इस प्रकार की प्रथाओं के प्रचलन की आज्ञा नहीं देता है। यूरोप के लगभग प्रत्येक भाग में किसानों ने चचर् द्वारा लगाए गए इस प्रकार के अनेक करों का विरोध् किया। इसके साथ - साथ राजा भी राज - काज में चचर् की दखलअंदाशी सेे चिढ़ते थे।जब मानवतावादियों ने उन्हें यह सूचित किया कि न्यायिक और वित्तीय शक्ितयों पर पादरियों का दावा ‘काॅन्स्टैनटाइन के अनुदान’ नामक एक दस्तावेश से उत्पन्न होता है जो कि प्रथम इर्साइर् रोमन सम्राट काॅन्स्टैनटाइन द्वारा संभवतः जारी किया गया था, तो उन राजाओं को खुशी हुइर् क्योंकि मानवातावादी विद्वान यह दशार्ने में सपफल रहे कि काॅन्स्टैनटाइन का वह दस्तावेश असली नहीं बल्िक परिवतीर् काल में जालसाजी से तैयार किया गया था। 1517 में एक जमर्न युवा भ्िाक्षु माटिर्न लूथर ;डंतजपद स्नजीमतए 1483 - 1546द्ध ने वैफथलिक चचर् के विरु( अभ्िायान छेड़ा और इसके लिए उसने दलील पेश की कि मनुष्य को इर्श्वर से संपवर्फ साध्ने के लिए पादरी की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अपने अनुयायियों को आदेश दिया कि वे इर्श्वर में पूणर् विश्वास रखें क्योंकि केवल उनका विश्वास ही उन्हें एक सम्यव्फ जीवन की ओर ले जा सकता है और उन्हें स्वगर् में प्रवेश दिला सकता है। इस आंदोलन को प्रोटैस्टेंट सुधारवाद नाम दिया गया जिसके कारण जमर्नी और स्िवटशरलैंड के चचर् ने पोप तथा वैफथलिक चचर् से अपने संबंध् समाप्त कर दिए। स्िवटशरलैंड में लूथर के विचारों को उलरिक ज्िंवगली न्यू टेस्टामेंट बाइर्बल का वह खंड है जिसमें इर्सा मसीह का जीवन - चरित्रा, ध्मोर्पदेश और प्रारंभ्िाक अनुयायियों का उल्लेख है। ;न्सतपबी र्ूपदहसपए 1484दृ1531द्ध और उसके बाद जौं वैफल्िवन ;श्रमंद ब्ंसअपदए 1509 - 64द्ध ने कापफी लोकपि्रय बनाया। व्यापारियों सेे समथर्न मिलने के कारण सुधरकों की लोकपि्रयता शहरों में अध्िक थी, जबकि ग्रामीण इलाकों में वैफथलिक चचर् का प्रभाव बरकरार रहा। अन्य जमर्न सुधारक जैसे कि एनाबेपटिस्ट सम्प्रदाय के नेता इनसे कहीं अध्िक उग्र - सुधरक थे। उन्होंने मोक्ष ;ेंसअंजपवदद्ध के विचार को हर तरह के सामाजिक - उत्पीड़न के अंत होने के साथ जोड़ दिया।उनका कहना था कि क्योंकि इर्श्वर ने सभी इनसानों को एक जैसा बनाया है इसलिए उनसे करदेने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए और उन्हें अपना पादरी चुनने का अध्िकार होना चाहिए।इसने सामंतवाद द्वारा उत्पीडि़त किसानों को आकष्िार्त किया। 1506 में अंग्रेशी भाषा में बाइर्बल का अनुवाद करने वाले, लूथरवादी अंग्रेश, विलियम टिंडेल ;ॅपससपंउ ज्लदकंसमए 1494 - 1536द्ध ने प्रोटैस्टेंटवाद का इस तरह समथर्न कियाःफ्इस बात से सब लोग सहमत होंगे कि वे आपको ध्मर्ग्रंथ के ज्ञान से दूर रखने के लिए यह चाहते थे कि ध्मर्ग्रंथ के अनुवाद आपकी मातृभाषा में उपलब्ध् न हो सवेंफ जिससेदुनिया अंध्कार में ही रहे और वे ख्पुरोहित वगर्, लोगों के अंतःकरण ;बवदेबपमदबमद्ध में बने रहें जिससे उनके द्वारा बनाए व्यथर् के अंध्विश्वास और झूठे ध्मर्सि(ांत चलते रहेंऋ जिसकेरहते उनकी उँफची आकांक्षाएँ और अतृप्त लोलुपता पूरी हो सके। इस तरह वे राजा, सम्राट और यहाँ तक कि अपने को इर्श्वर से भी उँफचा बना सके... जिस बात ने मुझे मुख्य रूपसे न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद करने की प्रेरणा दी। मुझे अपने अनुभवों से ज्ञात हुआ कि सामान्य लोगों को किसी भी सच्चाइर् की तब तक जानकारी नहीं हो सकती जब तक उनके पासअपने ध्मर्गं्रथ के मातृभाषा में अनुवाद उपलब्ध् न हों। इन अनुवादों से ही वे धमर्ग्रंथ की परिपाटी, क्रम और अथर् समझ सवेेंफगे। लूथर ने आमूल परिवतर्नवाद ;त्ंकपबंसपेउद्ध का समथर्न नहीं किया। उन्होंने आह्वान कियाकि जमर्न शासक समकालीन किसान विद्रोह का दमन करें। ऐसा इन शासकों ने 1525 में किया।पर इसके बावजूद आमूल परिवतर्नवाद बना रहा। आमूल परिवतर्नवादी Úांस में प्रोटैस्टेंटों के विरोध्से मिल गए जिन्होंने वैफथलिक शासकों के अत्याचार के कारण यह दावा करना शुरू कर दियाथा कि जनता को अत्याचारी शासक को अपदस्थ करने का अध्िकार है और वे उसके स्थान परअपने पसंद के व्यक्ित को शासक बना सवफते हैं। अंततः यूरोप के अनेक क्षेत्रों की तरह प्रफांसमें भी वैफथलिक चचर् ने प्रोटैस्टेंट लोगों को अपनी पसंद के अनुसार उपासना करने की छूट दी।इंग्लैंड के शासकों ने पोप से अपने संबंध् तोड़ दिए। इसके उपरांत राजा/रानी इंग्लैंड के चचर् केप्रमुख बन गए। वैफथलिक चचर् स्वयं भी इन विचारधराओं के प्रभाव से अछूता नहीं रह सका और उसने अनेक आंतरिक सुधर करने प्रारंभ कर दिए। स्पेन और इटली में पादरियों ने सादा जीवन और निधर्नों की सेवा पर जोर दिया। स्पेन में, प्रोटैस्टेंट लोगों से संघषर् करने के लिए इग्नेश्िायस लोयोला ;प्हदंजपने स्वलंसंद्ध ने 1540 में ‘सोसाइटी आॅपफ जीसस’ नामक संस्था की स्थापना की। उनके अनुयायी जेसुइट कहलाते थे और उनका ध्येय निध्र्नों की सेवा करना और दूसरी संस्वृफतियों के बारे में अपने ज्ञान को ज्यादा व्यापक बनाना था। 165बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ कोपरनिकसीय क्रांति इर्साइयों की यह धारणा थी कि मनुष्य पापी है इस पर वैज्ञानिकों ने पूणर्तया अलग दृष्िटकोण सेआपिा की। यूरोपीय विज्ञान के क्षेत्रा में एक युगांतरकारी परिवतर्न माॅटिर्न लूथर के समकालीन कोपरनिकस ;1473 - 1543द्ध के काम से आया। इर्साइयों का यह विश्वास था कि पृथ्वी पापों से भरी हुइर् है और पापों की अध्िकता के कारण वह स्िथर है। पृथ्वी, ब्रह्मांड ;नदपअमतेमद्ध के बीच में स्िथर है जिसके चारों और खगोलीय गृह ;बमसमेजपंस चसंदमजेद्ध घूम रहे हैं। कोपरनिकस ने यह घोषणा की कि पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूयर् के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। कोपरनिकस एक निष्ठावान इर्साइर् थे और वह इस बात से भयभीत थे कि उनकी इस नयी खोज से परंपरावादी इर्साइर् ध्मार्ध्िकारियों में घोर - प्रतििया उत्पन्न हो सकती है। यही कारण था कि वह अपनी पाण्डुलिपि दि रिवल्यूशनिबस ;क्म तमअवसनजपवदपइने.परिभ्रमणद्ध को प्रकाश्िात नहीं कराना चाहते थे। जब वह अपनी मृत्यु - शैया पर पडे़ थे तब उन्होंने यह पाण्डुलिपि अपने अनुयायी जोश्िाम रिटिकस ;श्रवंबीपउ त्ीमजपबनेद्ध को सौंप दी। उनके इन विचारों को ग्रहण करने में लोगों को थोड़ा समय लगा। कापफी समय बाद यानि आध्ी शताब्दी से अध्िक समय बीतने पर खगोलशास्त्राी जोहानेस वैफप्लर ;श्रवींददमे ज्ञमचसमतए 1571दृ1630द्ध तथा गैलिलियो गैलिली ;ळंसपसमव ळंसपसमपए 1564 - 1642द्ध ने अपने लेखों द्वारा ‘स्वगर्’ और ‘पृथ्वी’ के अंतर को समाप्त कर दिया। वैफप्लर ने अपने ग्रंथ काॅस्मोग्राप्ि़ाफकल मिस्ट्री ;ब्वेउवहतंचीपबंस डलेजमतल.खगोलीय रहस्यद्ध में कोपरनिकस खगोलीय का अथर् दैवी या स्वगीर्य है जबकि पाथ्िार्व में दुनियावी गुण अंत£नहित है। के सूयर् - वेंफित सौरमंडलीय सि(ांत को लोकपि्रय बनाया जिससे यह सि( हुआ कि सारे ग्रह सूयर्के चारों ओर वृत्ताकार ;बपतबसमेद्ध रूप में नहीं बल्िक दीघर् वृत्ताकार ;मससपचेमेद्ध मागर् पर परिक्रमा करते हैं। गैलिलियो ने अपने ग्रंथ दि मोशन ;ज्ीम डवजपवदए गतिद्ध में गतिशील विश्व के सि(ांतोंकी पुष्िट की। विज्ञान के जगत में इस क्रांति ने न्यूटन के गुरुत्वाकषर्ण के सि(ांत के साथ अपनीपराकाष्ठा की ऊँचाइर् को छू लिया। ब्रह्मांड का अध्ययन गैलिलियो ने एक बार टिप्पणी की कि बाइर्बल जिस स्वगर् का मागर् आलोकित करता है वह स्वगर् किस प्रकार चलता है, उसके बारे में वुफछ नहीं बताता। इन विचारकों ने हमें बताया कि ज्ञान विश्वास से हटकर अवलोकन एवं प्रयोगों पर आधरित है। जैसे - जैसे इन वैज्ञानिकों ने ज्ञान कीखोज का रास्ता दिखाया वैसे - वैसे भौतिकी, रसायन शास्त्रा और जीव विज्ञान के क्षेत्रा में अनेकप्रयोग और अन्वेषण कायर् बहुत तेशी से पनपने लगे। इतिहासकारों ने मनुष्य और प्रकृति के ज्ञानके इस नए दृष्िटकोण को वैज्ञानिक क्रांति का नाम दिया। परिणामस्वरूप संदेहवादियों और नास्ितकों के मन में सारी सृष्िट की रचना के स्रोत के रूपमें प्रकृति इर्श्वर का स्थान लेने लगी। यहाँ तक कि वे लोग जिन्होंने इर्श्वर में अपने विश्वास को बरकरार रखा वे भी एक दूरस्थ इर्श्वर की बात करने लगे जो भौतिक दुनिया में जीवन को प्रत्यक्षरूप से नियंत्रिात नहीं करता था। इस प्रकार के विचारों को वैज्ञानिक संस्थाओं के माध्यम सेलोकपि्रय बनाया गया जिससे सावर्जनिक क्षेत्रा में एक नयी वैज्ञानिक संस्कृति की स्थापना हुइर्।1670 में बनी पेरिस अकादमी और 1662 में वास्तविक ज्ञान के प्रसार के लिए लंदन में गठित राॅयल सोसाइटी ने लोगों की जानकारी के लिए व्याख्यानों का आयोजन किया और सावर्जनिकप्रदशर्न के लिए प्रयोग करवाए। चैदहवीं सदी में क्या यूरोप में ‘पुनजार्गरण’ हुआ था? अब हम ‘पुनजार्गरण’ की अवधारणा पर पुनविर्चार करें। क्या हम यह कह सकते हैं कि इस काल में अतीत से सापफ विच्छेद हुआ और यूनानी और रोमन परंपराओं से जुड़े विचारों का पुनजर्न्म हुआ? क्या इससे पहले का काल ;बारहवीं और तेरहवीं शताब्िदयाँद्ध अंधकार का समय था? इंग्लैंड के पीटर बवर्फ ;च्मजमत ठनतामद्ध जैसे हाल ही के लेखकों का यह सुझाव है कि बवर्फहाटर् के ये विचार अतिशयोक्ितपूणर् हैं। बवर्फहाटर् इस काल और इससे पहले के कालों के प़फको± को वुफछ बढ़ा - चढ़ा कर पेश कर रहे थे। ऐसा करने में उन्होंने पुनजार्गरण शब्द का प्रयोग किया। इस शब्द में यह अंतनिर्हित है कि यूनानी और रोमन सभ्यताओं का चैदहवीं शताब्दी में पुनजर्न्म हुआ और समकालीन विद्वानों और कलाकारों में इर्साइर् विश्वदृष्िट की जगह पूवर् इर्साइर् विश्वदृष्िट का प्रचार - प्रसार किया। दोनों ही तवर्फ अतिशयोक्ितपूणर् थे। पिछली शताब्िदयों के विद्वान यूनानी औररोमन संस्कृतियों से परिचित थे और लोगों के जीवन में धमर् का महत्त्वपूणर् स्थान था। यह कहना कि पुनजार्गरण, गतिशीलता और कलात्मक सृजनशीलता का काल था और इसके विपरीत, मध्यकाल अंध्कारमय काल था जिसमें किसी प्रकार का विकास नहीं हुआ था, शरूरत से ज्यादा सरलीकरण है। इटली में पुनजार्गरण से जुडे़ अनेक तत्व बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में पाए जा सकते हैं। वुफछ इतिहासकारों ने इसका उल्लेख किया है कि नौवीं शताब्दी में प्रफांस में इसी प्रकार के साहित्ियक और कलात्मक रचनाओं के विचार पनपे। 167बदलती हुइर् सांस्कृतिक परंपराएँ यूरोप में इस समय आए सांस्कृतिक बदलाव में रोम और यूनान की ‘क्लासिकी’ सभ्यता काही केवल हाथ नहीं था। रोमन संस्वृफति के पुरातािवक और साहित्ियक पुनरु(ार ने भी इस सभ्यता के प्रति बहुत अध्िक प्रशंसा के भाव उभारेे। लेकिन एश्िाया में प्रौद्योगिकी औरकायर् - वुुफशलता यूनानी और रोमन लोगों की तुलना में कापफी विकसित थी। विश्व का बहुत बड़ा क्षेत्रा आपस में सम्ब( हो चुका था और नौसंचालन ;दंअपहंजपवदद्ध की नयी तकनीकों ;विषय8 में देख्िाएद्ध ने लोगों के लिए पहले की तुलना में दूरदराश के क्षेत्रों की जलयात्रा को संभवबनाया। इस्लाम के विस्तार और मंगोलों की विजयों ने एश्िाया एवं उत्तरी अप़्रफीका को यूरोप केसाथ राजनीतिक दृष्िट से ही नहीं बल्िक व्यापार और कायर् - वुफशलता के ज्ञान को सीखने के लिए आपस में जोड़ दिया। यूरोपियों ने न केवल यूनानियों और रोमवासियों से सीखा बल्िक भारत, अरब,इर्रान, मध्य एश्िाया और चीन से भी ज्ञान प्राप्त किया। बहुत लंबे समय तक इन ट्टणों को स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि जब इस काल का इतिहास लिखने की प्रिया का प्रारंभ हुआ तबइतिहासकारों ने इसके यूरोप - वेंफदि्रत दृष्िटकोण को सामने रखा।इस काल में जो महत्त्वपूणर् परिवतर्न हुए उनमें ध्ीरे - ध्ीरे ‘निजी’ और ‘सावर्जनिक’ दोअलग - अलग क्षेत्रा बनने लगे। जीवन के सावर्जनिक क्षेत्रा का तात्पयर् सरकार के कायर्क्षेत्रा और औपचारिक ध्मर् से संबंध्ित था और निजी क्षेत्रा में परिवार और व्यक्ित का निजी ध्मर् था। व्यक्ितकी दो भूमिकाएँ थींμनिजी और सावर्जनिक। वह न केवल तीन वगो± ;जीतमम वतकमतेद्ध में से किसी एक वगर् का सदस्य ही था बल्िक अपने आप में एक स्वतंत्रा व्यक्ित था। एक कलाकार किसीसंघ या गिल्ड ;हनपसकद्ध का सदस्य मात्रा ही नहीं होता था बल्िक वह अपने हुनर के लिए भी जाना जाता था। अठारहवीं शताब्दी मंे व्यक्ित की इस पहचान को राजनीतिक रूप में अभ्िाव्यक्त कियागया, इस विश्वास के साथ कि प्रत्येक व्यक्ित के एकसमान राजनीतिक अध्िकार हैं।इस काल की एक अन्य महत्त्वपूणर् विशेषता यह थी कि भाषा के आधर पर यूरोप के विभ्िान्नक्षेत्रों ने अपनी पहचान बनानी शुरू की। पहले, आंश्िाक रूप से रोमन साम्राज्य द्वारा और बाद में लातिनी भाषा और इर्साइर् ध्मर् द्वारा जुड़ा यूरोप अब अलग - अलग राज्यों में बँटने लगा। इन राज्योंके आंतरिक जुड़ाव का कारण समान भाषा का होना था। अभ्यास संक्षेप में उत्तर दीजिए 1ण् चैदहवीं और पंद्रहवीं शताब्िदयों में यूनानी और रोमन संस्वृफति के किन तत्वों को पुनजीर्वित किया गया? 2ण् इस काल की इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला की विश्िाष्टताओं की तुलना कीजिए? 3ण् मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ? 4ण् वेनिस और समकालीन Úांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए। संक्षेप में निबंध् लिख्िाए 5ण् मानवतावादी विचारों के क्या अभ्िालक्षण थे? 6ण् सत्राहवीं शताब्दी के यूरोपियों को विश्व किस प्रकार भ्िान्न लगा? उसका एक सुचिंतित विवरण दीजिए।

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