विषय इस्लाम का उदय और विस्तारμ लगभग 570 - 1200 इर् 4 आज जबकि हम इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश कर चुके हैं, संसार के समस्त भागों में रहने वाले मुसलमानों की संख्या एक अरब से अिाक है। वे भ्िान्न - भ्िान्न राष्ट्रों के नागरिक हैं, अलग - अलग भाषाएँ बोलते हैं, और उनका पहनावा भी अलग - अलग किस्म का है। वे जिन तरीकों से मुसलमान बने वे भी भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के थे, और वे परिस्िथतियाँ भी भ्िान्न - भ्िान्न थीं, जिनके कारण वे अपने - अपने रास्तों पर चले गए। पिफर भी, मुस्िलम समाजों की जड़ें एक अिाक एकीवृफत अतीत में समाहित हैं, जिसका प्रारंभ लगभग 1400 वषर् पहले अरब प्रायद्वीप में हुआ था। हम इस अध्याय में इस्लाम के उदय और मिस्र से अप़्ाफगानिस्तान तक के विशाल क्षेत्रा में, उसके विस्तार के बारे में पढ़ने जा रहे हैं। 600 से 1200 तक की अविा में यह इलाका इस्लामी सभ्यता का मूल क्षेत्रा था। इन शताब्िदयों में, इस्लामी समाज में अनेक प्रकार के राजनीतिक और सांस्वृफतिक प्रतिरूप दिखते हैं। इस्लामी शब्द का प्रयोग यहाँ केवल उसके धा£मक अथो± में नहीं, बल्िक उस समूचे समाज और संस्वृफति के लिए भी किया गया है, जो ऐतिहासिक दृष्िट से इस्लाम से संब( रही है। इस समाज में जो वुफछ भी घटित हो रहा था उसका उद्भव सीधे धमर् से नहीं हुआ था, बल्िक इसका उद्भव एक ऐसे समाज में हुआ था, जिसमें मुसलमानों को और उनके ध्मर् को सामाजिक रूप से प्रमुखता प्राप्त थी। ग़ैर - मुसलमान भले ही वुफछ गौण सही लेकिन हमेशा इस समाज के अभ्िान्न भाग रहे, जैसे कि इर्साइर् प्रदेशों में यहूदी थे। उफपर दिए गए इस्लामी क्षेत्रों के सन् 600 से 1200 तक के इतिहास के बारे में हमारी समझइतिवृत्तों अथवा तवारीख़ पर ;जिसमें घटनाओं का वृत्तांत कालक्रम के अनुसार दिया जाता हैद्ध और अधर् - ऐतिहासिक वृफतियों पर आधारित है, जैसे जीवन - चरित ;सिराद्ध, पैगम्बर के कथनों और वृफत्यों के अभ्िालेख ;हदीथद्ध और व़्ाुफरान के बारे में टीकाएँ ;तप़्ाफसीरद्ध। इन वृफतियों का निमार्ण जिस सामग्री से किया गया था, वह प्रत्यक्षदशीर् वृत्तांतों ;अखबारद्धका बहुत बड़ा संग्रह था, ये वृत्तांत विशेष कालावध्ि में मौख्िाक रूप से बताकर अथवा कागश पर लिख्िात रूप में लोगों तक पहुँचे। ऐसी प्रत्येक सूचना ;ख़बरद्ध की प्रामाण्िाकता की जाँच एक आलोेचनात्मक तरीके से की जाती थी, जिसमें सूचना भेजने ;इस्नादद्ध की शृंखला का पता लगाया जाता था और वणर्नकतार् की विश्वसनीयता स्थापित की जाती थी। यद्यपि यह तरीका नितांत दोषरहित नहीं था, लेकिन मध्यकालीन मुस्िलम लेखक सूचना का चयन करने और अपने सूचनादाताओं के अभ्िाप्राय को समझने के मामले में विश्व के अन्य भागांे के अपने समकालीन लोगों की अपेक्षा अिाक सतवर्फ थे। विवादास्पद मुद्दों के मामले में, उन्होंने अपने स्रोतों से ज्ञात एक ही घटना के विभ्िान्न रूपांतरण प्रस्तुत किए, और उन्हें परखने का कायर् अपने पाठकों के लिए छोड़ दिया। उनके अपने समय के आस - पास की घटनाओं के बारे में उनका वणर्न अध्िक सुनियोजित और विश्लेषणात्मक है और उसे अख़बारों का संग्रह - मात्रा ही नहीं कहा जा सकता। अध्िकतर ऐतिहासिक औरअधर् - ऐतिहासिक रचनाएँ अरबी भाषा में हैं। इनमें सवोर्त्तम वृफति तबरी ;ज्ंइंतपद्ध ;923 में निध्नद्ध की तारीख़ है, जिसका 38 खंडों में अंग्रेज़्ाी में अनुवाद किया गया है। प़्ाफारसी ’अरामेइक, हिब्रू और अरबी से संबंध्ित भाषा है। अशोक के अभ्िालेखों में भी इसका प्रयोग किया गया है। ’’इस संदभर् में यह कहा जा सकता है कि कबीले रक्त - संबंधें ;वास्तविक या काल्पनिकद्ध पर संगठित समाज होते थे। अरबी कबीले वंशों से बने हुए होते थे अथवा बड़े परिवारों के समूह होते थे। गै़र - रिश्तेदार वंशों का, गढ़े हुए वंशक्रम के आधर पर इस आशा के साथ आपस में विलय होता था कि नया कबीला शक्ितशाली होगा। ग़र - अरब व्यक्ितै ;मवालीद्ध कबीलों के प्रमुखों के संरक्षण से सदस्य बन जाते थे। लेकिन इस्लाम में धमा±तरण के बाद भी मवालियों के साथ अरब मुसलमानों द्वारा समानता का व्यवहार नहीं किया जाता था और उन्हें अलग मस्िजदों में इबादत करनी पड़ती थी। में इतिवृत्त संख्या की दृष्िट से बहुत कम हैं, लेकिन उनमें इर्रान और मध्य एश्िाया के बारे में विस्तृत जानकारी दी गइर् है। सीरियाक ;अरामेइक’ की एक बोलीद्ध में लिखे इर्साइर् वृत्तांतग्रंथ और भी कम हैं, लेकिन उनसे प्रारंभ्िाक इस्लाम के इतिहास पर महत्त्वपूणर् रोशनीपड़ती है। इतिवृत्तों के अलावा, हमें कानूनी पुस्तवेंफ, भूगोल, यात्रा - वृत्तांत और साहित्ियक रचनाएँ जैसे कहानियाँ और कविताएँ प्राप्त होती हैं। दस्तावेजी साक्ष्य ;लेखों के खंडित अंश, जैसे सरकारी आदेश अथवा निजी पत्राचारद्ध़इतिहास - लेखन के लिए सवार्ध्िक बहुमूल्य हंै, क्योंकि इनमें पूवर् ¯चतन कर घटनाओं और व्यक्ितयों का उल्लेख नहीं होता। लगभग समूचा साक्ष्य यूनानी और अरबी पैपाइरस ;जो प्रशासनिक इतिहास के लिए बढि़या हैद्ध और गेनिजा अभ्िालेखों से प्राप्त होता है। वुफछ़साक्ष्य पुरातत्वीय ;उजड़े महलों में की गइर् खुदाइर्द्ध, मुद्राशास्त्राीय ;सिक्कों का अध्ययनद्ध और पुरालेखीय ;श्िालालेखों का अध्ययनद्ध स्रोतों से उभर कर सामने आते हैं। ये आ£थक इतिहास, कला इतिहास, नामों और तारीखों के प्रमाणीकरण के लिए बहुमूल्य हैं। सही मायने में इस्लाम के इतिहास ग्रंथ लिखे जाने का कायर् उन्नीसवीं शताब्दी में जमर्नी और नीदरलैंड के विश्वविद्यालयों के प्रोप़्ोफसरों द्वारा शुरू किया गया। मध्य पूवर् और उत्तरी अप़्ा्रफीका में औपनिवेश्िाक हितों से प्रफांसीसी और बि्रटिश शोधकतार्ओं को भी इस्लाम का अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहन मिला। इर्साइर् पादरियों ने इस्लाम के इतिहास की ओर बारीकी से ध्यान दिया और वुफछ अच्छी पुस्तवेंफ लिखीं, हालाँकि उनकी दिलचस्पी मुख्यतः इस्लाम की तुलना इर्साइर् ध्मर् से करने में रही। ये विद्वान, जिन्हें प्राच्यविद् कहा जाता है, अरबी और प़्ाफारसी के ज्ञान के लिए और मूल ग्रंथों के आलोचनात्मक विश्लेषण के लिए प्रसि( हैं। इग्नाज़्ा गोल्डज्ि़ाहर ;प्हदं्र ळवसक्रपीमतद्ध हंगरी के एक यहूदी थे, जिन्होंने काहिरा के इस्लामी काॅलेज ;अल - अज़्ाहरद्ध में अध्ययन किया और जमर्न भाषा में इस्लामी कानून और धमर्विज्ञान के बारे में नयी राह दिखाने वाली पुस्तवेंफ लिखीं। इस्लाम के बीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने अध्िकतर प्राच्यविदों की रुचियों और उनके तरीकों का ही अनुसरण किया है। उन्होंने नए विषयों को शामिल करके इस्लाम के इतिहास के दायरे का विस्तार किया है, और अथर्शास्त्रा, मानव - विज्ञान और सांख्ियकी जैसे संब( विषयों का इस्तेमाल करके प्राच्य अध्ययन के बहुत - से पहलुओं का परिष्करण किया है। इस्लाम का इतिहास - लेखन इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि इतिहास के आध्ुनिक तरीकों का इस्तेमाल करके ध्मर् का अध्ययन किस प्रकार किया जा सकता है, ऐसे लोगों द्वारा जो स्वयं अध्ययन करने वाले धमर् के अनुयायी न हों। अरब में इस्लाम का उदयμ ध्मर् - निष्ठा, समुदाय और राजनीति सन् 612 - 632 में पैगम्बर मुहम्मद ने एक इर्श्वर, अल्लाह की पूजा करने का और आस्ितकों ;उम्माद्ध के एक ही समाज की सदस्यता का प्रचार किया। यह इस्लाम का मूल था। पैगम्बर मुहम्मद सौदागर थे और भाषा तथा संस्वृफति की दृष्िट से अरबी थे। छठी शताब्दी की अरब संस्वृफति अध्िकांशतः अरब प्रायद्वीप और दक्ष्िाणी सीरिया और मेसोपोटामिया के क्षेत्रों तक सीमित थी। अरब लोग कबीलों’’ में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीले का नेतृत्व एक शेख द्वारा किया जाता था, जो वुफछ हद तक पारिवारिक संबंधें के आधर पर, लेकिन ज़्यादातर व्यक्ितगत साहस, बुिमत्ता और उदारता ;मुरव्वाद्ध के आधर पर चुना जाता था। प्रत्येक कबीले के अपने स्वयं के देवी - देवता होते थे, जो बुतों ;सनमद्ध के रूप में मस्िजदों में पूजे जाते थे। बहुत - से अरबी कबीले खानाबदोश ;बद्दू यानी बेदूइनद्ध होते थे, जो खाद्य ;मुख्यतः खजूरद्ध और अपने ऊमें रेगिस्तान में सूखे क्षेत्रों से हरे - भरे क्षेत्रों ;नखलिस्तानोंद्ध की ओर जाते रहते थे। वुफछ शहरों में ँटों के लिए चारे की तलाश महादूत जिबरील ;ळंइतपमसद्ध का एक मध्यकालीन चित्रा। यह बस गए थे और व्यापार अथवा खेती का काम करने लगे थे। पैगम्बर मुहम्मद का अपना कबीला, ़वुफरैश, मक्का में रहता था और उसका वहाँ के मुख्य धमर्स्थल पर नियंत्राण था। इस स्थल का ढाँचा घनाकार था और उसे ‘काबा’ कहा जाता था, जिसमें बुत रखे हुए थे। मक्का के बाहर के कबीले भी काबा को पवित्रा मानते थे, वे इस मंे अपने भी बुत रखते थे और हर वषर् इस इबादतगाह की ध£मक यात्रा ;हजद्ध करते थे। मक्का यमन और सीरिया के बीच के व्यापारी मागो± के एक चैराहे कहा जाता है कि जिबरील पैगम्बर मुहम्मद के लिए संदेश लाया करते थे। यह भी माना जाता है कि जो शब्द उन्होंने ़सबसे पहले पुकारा वह इवफरा ;पाठ करोद्ध था। वुफरान शब्द ़इवफरा से बना है। इस्लामीपर स्िथत था, जिससे शहर का महत्त्व और बढ़ गया था ;मानचित्रा 1द्ध। काबा को एक ऐसी पवित्रा जगह ;हरमद्ध माना जाता था, जहाँ ¯हसा व£जत थी और सभी दशर्ना£थयों को सुरक्षा प्रदान की ब्रह्मांड विज्ञान में दूतों को सृष्िट - जीवन के तीन बौिक रूपों में से एक माना जाता है।जाती थी। तीथर् - यात्रा और व्यापार ने खानाबदोश और बसे हुए कबीलों को एक दूसरे के साथ बातचीत करने और अपने विश्वासों और रीति - रिवाजों को आपस में बाँटने का मौका दिया। हालांकि बहुदेववादी अरबों को अल्लाह कहे जाने वाले परमात्मा की धरणा के बारे में अस्पष्ट सी ही जानकारी थी ;संभवतः उनके बीच रहने वाले यहूदी और इर्साइर् व़्ाफबीलों के प्रभाव के कारणद्ध, लेकिन मू£तयों और इबादतगाहों के साथ उनका लगाव सीधा और मज़्ाबूत था। सन् 612 के आस - पास पैगम्बर मुहम्मद ने अपने आपको खुदा का संदेशवाहक ;रसूलद्ध घोष्िात किया, जिन्हंे यह प्रचार करने का आदेश दिया गया था कि केवल अल्लाह की ही इबादत यानी आराधना की जानी चाहिए। इबादत की विध्ियाँ बड़ी सरल थीं, जैसे दैनिक प्राथर्ना ;सलतद्ध और नैतिक सि(ांत, जैसे खैरात बाँटना और चोरी न करना। पैगम्बर मुहम्मद ने बताया कि उन्हें आस्ितकों ;उम्माद्ध के ऐसे समाज की स्थापना करनी है, जो सामान्य ध£मक विश्वासों के ज़्ारिये आपस में जुड़े हुए हों। इस समाज के लोग इर्श्वर के सामने और अन्य ध£मक समुदायों के समक्ष ध्मर् के अस्ितत्व में अपना विश्वास ;शहादाद्ध प्रकट करते थे। पैगम्बर मुहम्मद के संदेश ने मक्का के उन लोगों को विशेष रूप से प्रभावित किया, जो अपने आपको व्यापार और ध्मर् के लाभों से वंचित महसूस करते थे और एक नयी सामुदायिक पहचान की बाट देखते थे। जो इस ध्मर् - सि(ांत को स्वीकार कर लेते थे, उन्हें मुसलमान ;मुस्िलमद्ध कहा जाता था, उन्हें व़्ाफयामत के दिन मुक्ित और ध्रती पर रहते हुए समाज के संसाधनों में हिस्सा देने का आश्वासन दिया जाता था। मुसलमानों को शीघ्र ही मक्का के समृ( लोगों के भारी विरोध् का सामना करना पड़ा, जिन्हें देवी - देवताओं का ठुकराया जाना बुरा लगा था और जिन्होंने नए ध्मर् को मक्का की प्रतिष्ठा और समृि के लिए खतरा समझा था। सन् 622 में, पैगम्बर मुहम्मद को अपने अनुयायियों के साथ मदीना वूफचकर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। पैगम्बर मुहम्मद की इस यात्रा ;हिजराद्ध से इस्लाम के इतिहास में एक नया मोड़ आया। जिस वषर् उनका आगमन मदीना में हुआ उस वषर् से मुस्िलम वैफलेंडर यानी हिजरी सन् की शुरुआत हुइर्। बाकी दो इनसान और जिन्न हैं। इस्लामी वैफलंेडर हिजरी सन् की स्थापना उमर की ख्िालापफत के समय की गइर् थी, जिसका पहला वषर् 622 इर्. में पड़ता था। हिजरी सन् की तारीख को जब अंग्रेजी में लिखा जाता है तो वषर् के बाद़ए.एच. लगाया जाता है। हिजरी वषर् चन्द्र वषर् है, जिसमें 354 दिन, 29 अथवा 30 दिनों के 12 महीने ;मुहरर्म से ध्ुल हिज्जा तकद्ध होते हैं। प्रत्येक दिन सूयार्स्त के समय से और प्रत्येक महीना अध्र्चन्द्र के दिन से शुरू होता है। हिजरी वषर् सौर वषर् से 11 दिन कम होता है। अतः हिजरी का कोइर् भी ध£मक त्योहार, जिनमें रमज़्ाान के रोशे, इर्द और हज शामिल हैं, मौसम के अनुरूप नहीं होता। हिजरी वैफलेंडर की तारीखों को ग्रैगोरियन वैफलेंडर ;जिसकी स्थापना पोप ग्रैगरी 13वें द्वारा 1582 इर्. में की गइर् थीद्ध की तारीखों के साथ मिलाने का कोइर् सरल तरीका नहीं है। इस्लामी ;एचद्ध और ग्रैगोरियन िश्िचयन ;सीद्ध वषो± के बीच मोटे रूप से समानता की गणना निम्नलिख्िात पफामूर्लों से की जा सकती हैः ;एच × 32ध्33द्ध ़ 622 त्र सी ;सी - 622द्ध × 33ध्32 त्र एच किसी ध्मर् का जीवित रहना उस पर विश्वास करने वाले लोगों के ¯ज़्ादा रहने पर निभर्र करता है। इन लोगों के समुदाय को आंतरिक रूप से मजबूत बनाना और उन्हें बाहरी खतरों से़बचाना जरूरी होता है। सुदृढ़ीकरण और सुरक्षा के लिए राजनैतिक संस्थाओं की आवश्यकता होती है, जैसे राज्य और सरकारें, जो या तो पीछे से विरासत में प्राप्त होती हैं या पिफर बाहर से प्राप्त की जाती हैं अथवा जिनका निमार्ण बिलवुफल नए सिरे से करना पड़ता है। पैगम्बर मुहम्मद ने इन तीनों तरीकों से मदीना में एक राजनैतिक व्यवस्था की स्थापना की, जिसने उनके अनुयाइयों को सुरक्षा प्रदान की, जिसकी उन्हें आवश्यकता थी और इसके साथ - साथ शहर में चल रही कलह को सुलझाया। उम्मा को एक बड़े समुदाय के रूप में बदला गया, ताकि मदीना के बहुदेववादियों और यहूदियों को पैगम्बर मुहम्मद के राजनैतिक नेतृत्व के अंतगर्त लाया जा सके। पैगम्बर मुहम्मद ने कमर्कांडों ;जैसे उपवासद्ध और नैतिक सि(ांतों को बढ़ा कर और उन्हें परिष्वृफत कर ध्मर् को अपने अनुयायियों के लिए मज़्ाबूत बनाया। मुस्िलम समुदाय वृफष्िा और व्यापार से प्राप्त होने वाले राजस्व और इसके अलावा खैरात - कर ;ज़्ाकातद्ध से जीवित रहा। इसके अलावा, मुसलमान मक्का के कापिफलों और ़गया चित्रा। एक हाजी काबा के काले पत्थर ;हज्र - अल - असवादद्ध को छू रहा है और कइर् दूत ;मलाइकाद्ध उसे देख रहे हैं। काबा में तीथर्यात्राी, 15वीं शताब्दी की एक पफारसी हस्तलिपि से लिया निकट के नखलिस्तानों पर छापे ;ग़ज्वद्ध़ भी मारते थे। इन छापों और धावों से मक्का के लोगों में प्रतििया हुइर् और मदीना के यहूदियों के साथ दरार उत्पन्न हुइर्। मक्का को जीत लिया गया और एक ध£मक प्रचारक और राजनैतिक नेता के रूप में पैगम्बर मुहम्मद की प्रतिष्ठा दूर - दूर तक पैफल गइर्। पैगम्बर मुहम्मद ने अब समुदाय की सदस्यता के लिए ध्मा±तरण को एकमात्रा कसौटी माना और इस बात पर बल दिया। रेगिस्तान की कठोर परिस्िथतियों में, अरबों ने शक्ित और एकताको महत्त्वपूणर् माना। पैगम्बर मुहम्मद की उपलब्िध्यों से प्रभावित होकर, बहुत से कबीलों, अिाकांशतः बद्दुओं, ने अपना ध्मर् बदलकर इस्लाम को अपना लिया और उस समाज में शामिल हो गए। पैगम्बर मुहम्मद द्वारा संरचित गठजोड़ का पैफलाव समूचे अरब देश में हो गया। मदीना उभरते हुए इस्लामी राज्य की प्रशासनिक राजधनी और मक्का उसका धा£मक वेंफद्र बन गया। काबा से बुतों को हटा दिया गया था, क्योंकि मुस्िलमों के लिए यह शरूरी था कि वे उस स्थल की ओर मुँह करके इबादत करें। पैगम्बर मुहम्मद को थोड़े ही समय में अरब प्रदेश के कापफी बड़े भाग को एक नए ध्मर्, समुदाय और राज्य के अंतगर्त लाने में सपफलता मिल गइर्। प्रारंभ्िाक इस्लामी राज्य व्यवस्था कापफी लंबे समय तक अरब कबीलों और वुफलों का राज्य संघ बनी रही। खलीप़्ाफाओं का शासनμविस्तार, गृहयु( और सम्प्रदाय निमार्ण सन् 632 में पैगम्बर मुहम्मद के देहांत के बाद, कोइर् भी व्यक्ित वैध् रूप से इस्लाम का अगलापैगम्बर होने का दावा नहीं कर सकता था। इसके परिणामस्वरूप, उनकी राजनैतिक सत्ता,उत्तरािाकार के किसी सुस्थापित सि(ांत के अभाव में उम्मा को अंतरित कर दी गइर्। इससे नवाचारों के लिए अवसर उत्पन्न हुए, लेकिन इससे मुसलमानों में गहरे मतभेद भी पैदा हो गए। सबसे बड़ा नव - परिवतर्न यह हुआ कि ख्िालाप़्ाफत की संस्था का निमार्ण हुआ, जिसमें समुदाय का नेता ;अमीर अल - मोमिनिनद्ध पैगम्बर का प्रतिनिध्ि ;खलीपफाद्ध़ बन गया। पहले चार खलीपफाओं़;632 - 661द्ध ने पैगम्बर के साथ अपने गहरे और नशदीकी संबंध् के आधर पर अपनी शक्ितयों का औचित्य स्थापित किया और पैगम्बर द्वारा दिए मागर् - निदेर्शों के अंतगर्त उनका कायर् जारी रखा। ख्िालापफत के दो प्रमुख उद्देश्य थेः एक तो कबीलों पर नियंत्राण कायम करना, जिनसे मिलकर उम्मा़का गठन हुआ था, और दूसरा, राज्य के लिए संसाध्न जुटाना। पैगम्बर मुहम्मद के देहावसान के बाद, बहुत से कबीले इस्लामी राज्य से टूट कर अलग हो गए। वुफछ कबीलों ने तो उम्मा के नमूने पर स्वयं अपने समाजों की स्थापना करने के लिए अपने स्वयं के पैगम्बर बना लिए। पहले खलीपफा अबू बकर ने अनेक अभ्िायानों द्वारा विद्रोहों का दमऩकिया। दूसरे खलीपफा उमर ने उम्मा की सत्ता के विस्तार की नीति को रूप प्रदान किया। खलीप़्ाफा जानता था कि उम्मा को व्यापार और करों से होने वाली मामूली आय के बल पर नहीं चलाया जा सकता। यह महसूस करते हुए कि अभ्िायानों के रूप में मारे जाने वाले छापों से लूट की भारी ध्नराश्िा ;ग़़्ानीमाद्ध प्राप्त की जा सकती है, खलीपफा और उसके सेनापतियों ने पश्िचम में बाइजेंटाइन साम्राज्य और पूवर् में ससानी साम्राज्य के इलाकों को जीतने के लिए अपने कबीलों की़शक्ित जुटाइर्। बाइज़्ोंटाइन और ससानी साम्राज्य जब अपनी शक्ित के सवोर्च्च श्िाखर पर थे, तो वे विशाल क्षेत्रों पर शासन करते थे और अरब में अपने राजनैतिक और वाण्िाज्ियक हितों को आगे बढ़ाने के लिए उनके पास बड़ी मात्रा में संसाध्न थे। बाइज़्ोंटाइन साम्राज्य इर्साइर् मत को बढ़ावा देता था और ससानी साम्राज्य इर्रान के प्राचीन धमर्, शरतुश्त ध्मर् को संरक्षण प्रदान करता था। अरबों खज़्ाारप्रेंफकिश साम्राज्यसाम्राज्य तुविर्फस्तानजेक्सरेट्सअरलसागर वुंफस्तुनतुनिया बुखारासमरवंफद मवर्रोम काला सागर आमेर्नियाखुरसामनिशापुरअंतोलियाएंटीओक दायलाम त्रिापोली इर्रानअलेप्पोसीरियाइराक ;मेसोपोटामियाद्धसमाराबग़्ादादइसपफाहन गज़्ानीख्िारबात अल मपफज़्ाारदमिश्क वुफप़्ाफालीबिया जेरूसलम वुफसायुर अमरा सिवंफदरियापूफस्टेट काहिरा पिफलिस्तीनमिस्र सिपर्फ मदीना आयधब मक्का अप़फीका्रअरब अरब सागर मानचित्रा 1ः इस्लामी क्षेत्रा। मुहम्मद के अधीन इस्लाम का प्रसार यमन मध्यवत्तीर् इस्लामी क्ष्रेत्रा 750 अदन के आक्रमण के समय, इन दो साम्राज्यों की शक्ित में ध£मक संघषो± और अभ्िाजात वगो± के विद्रोहों के कारण गिरावट आ चुकी थी। इसके कारण यु(ों और संध्ियों के ज़्ारिए उन्हें अपने अध्ीन लाना आसान हो गया था। तीन सपफल अभ्िायानों ;637 - 642द्ध में, अरबों ने सीरिया, इराव़्ाफ, इर्रान और मिस्र को मदीना के नियंत्राण में ला दिया। सामरिक नीति, ध£मक जोश और विरोध्ियों की कमज़़्ाोरियों ने अरबों की सपफलता में योगदान दिया। तीसरे खलीपफा, उथमान ने अपना नियंत्राण मध्य एश्िाया तक बढ़ाने के लिए और अभ्िायान चलाए। पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के एक दशक के अंदर, अरब - इस्लामी राज्य ने नील और आॅक्सस के बीच के विशाल क्षेत्रा को अपने नियंत्राण में ले लिया। ये इलाके आज तक मुस्िलम शासन के अंतगर्त हैं। जीते गए सभी प्रांतों में, खलीपफाओं ने नया प्रशासनिक ढाँचा लागू किया, जिनके अध्यक्ष गवनर्ऱ;अमीरद्ध और कबीलों के मुख्िाया ;अशरपफद्ध थे। वेंफद्रीय राजकोष ;बैत अल - मालद्ध अपना राजस्व मुसलमानों द्वारा अदा किए जाने वाले करों से और इसके अलावा धवों से मिलने वाली लूट में अपने हिस्से से प्राप्त करता था। खलीप़्ाफा के सैनिक, जिनमें अध्िकतर बेदुइन थे, रेगिस्तान के किनारों पर बसे शहरों, जैसे वुफप़्ाफा और बसरा में श्िाविरों में रहते थे, ताकि वे अपने प्रावृफतिक आवास स्थलों के निकट और खलीप़्ाफा की कमान के अंतगर्त बने रहें। शासक वगर् और सैनिकों को लूट में हिस्सा मिलता था और मासिक अदायगियाँ ;अताद्ध प्राप्त होती थीं। गै़र - मुस्िलम लोगों द्वारा करों ;खराज और जिज्ि़ायाद्ध को अदा करने पर, उनका सम्पिा का और ध£मक कायो± को संपन्न करने का अिाकार बना रहता था। यहूदी और इर्साइर् राज्य के संरक्ष्िात लोग ;ध्िम्मीसद्ध घोष्िात किए गए और अपने सामुदायिक कायो± को करने के लिए उन्हें कापफी अध्िक स्वायत्तता़दी गइर् थी। राजनैतिक विस्तार और एकीकरण का कायर् अरब कबीले सरलता से नहीं कर पाए। राजक्षेत्रा के विस्तार से, संसाध्नों और पदों के वितरण के बारे में पैदा हुए झगड़े उम्मा की एकता के लिए खतरा बन गए। प्रारंभ्िाक इस्लामी राज्य के शासन में मक्का के व़्ाुफरैश लोगों का ही बोलबाला था। तीसरा खलीपफा, उथमान ;644 - 56द्ध भी एक व़्ाुफरैश था और उसने अध्िक नियंत्राण प्राप्त करने़के लिए प्रशासन को अपने ही आदमियों से भर दिया। इससे राज्य का मक्काइर् स्वरूप और अिाक ज़़्ाोरदार हो गया। परिणामस्वरूप अन्य कबीलों के साथ झगड़े पैदा हो गए। इरावफ और मिस्र में तो विरोध् था ही अब मदीने में भी विरोध् उत्पन्न हो जाने के परिणामस्वरूप उथमान की हत्या कर दी गइर्। उथमान की मृत्यु के बाद अली को चैथा खलीप़्ाफा नियुक्त किया गया। अली द्वारा ;656 - 61द्ध उन लोगों के ख्िालाप़्ाफ, जो मक्का के अभ्िाजात - तंत्रा का प्रतिनिध्ित्व करते थे, दो यु( लड़े जाने के बाद, मुसलमानों में दरार और गहरी हो गइर्। अली के समथर्कों और शत्राुओं ने बाद में इस्लाम के दो मुख्य सम्प्रदाय श्िाया और सुन्नी, बना लिए। अली ने अपने आपकोवुफपफा में स्थापित कर लिया और मुहम्मद की पत्नी, आयशा के नेतृत्व वाली सेना को ‘ऊँट की लड़ाइर्’ ;657द्ध में पराजित कर दिया। लेकिन, वह उथमान के नातेदार और सीरिया के गवनर्रमुआविया के नेतृत्व वाले गुट का दमन नहीं कर सका। अली का दूसरा यु(, जो सििपफन ;उत्तरी मेसोपोटामियाद्ध में हुआ था, संध्ि के रूप में समाप्त हुआ, जिसने उसके अनुयायियों को दो ध्ड़ों में बाँट दियाऋ वुफछ उसके वपफादार बने रहे, जबकि अन्य लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया और वे खरजी कहलाने लगे। इसके शीघ्र बाद, एक खरजी द्वारा वुफपफा में एक मस्िजद में अली की हत्या कर दी गइर्। उसकी मृत्यु के बाद, उसके अनुयायियों ने उसके पुत्रा, हुसैन और उसके वंशजों के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की। मुआविया ने 661 में अपने आपको अगला खलीपफा घोष्िात करदिया और उमÕयद वंश की स्थापना की, जो 750 तक चलता रहा। गृह यु(ों के बाद, ऐसा प्रतीत होता था कि अरबों का आध्िपत्य विखंडित हो जाएगा। इस बात के भी संकेत थे कि कबाइली विजेता अपने अधीनस्थ लोगों की परिष्वृफत संस्वृफति को अपना रहेथे। वुफरैश कबीले के एक समृ( वंश उमÕयद के अध्ीन सुदृढ़ीकरण का दूसरा दौर आया। उमÕयद और राजतंत्रा का वेंफद्रीकरण बड़े - बड़े क्षेत्रों पर विजय प्राप्त होने से मदीना में स्थापित ख्िालाप़्ाफत नष्ट हो गइर् और उसका स्थानबढ़ते हुए सत्तावादी राजतंत्रा ने ले लिया। उमÕयदों ने ऐसे बहुत से राजनीतिक उपाय किए जिनसेउम्मा के भीतर उनका नेतृत्व सुदृढ़ हो गया। पहले उमÕयद खलीपफा मुआविया ने दमिश्क को अपनी राजधानी बनाया और पिफर बाइज़्ोंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों और प्रशासनिक संस्थाओं कोअपना लिया। उसने वंशगत उत्तराध्िकार की परंपरा भी प्रारंभ की और प्रमुख मुसलमानों को मना लिया कि वे उसके पुत्रा को उसका वारिस स्वीकार करें। उसके बाद आने वाले खलीप़्ाफाओं ने भी ये नवीन परिवतर्न अपना लिए, जिसके पफलस्वरूप उमÕयद नब्बे वषर् तक और अब्बासी दोशताब्िदयों तक सत्ता में बने रहे।उमÕयद राज्य अब एक साम्राज्ियक शक्ित बन चुका थाऋ अब वह सीध्े इस्लाम पर आधारित नहीं था, बल्िक वह शासन - कला और सीरियाइर् सैनिकों की वपफादारी के बल पर चल रहा था। प्रशासन में इर्साइर् सलाहकार और इसके अलावा ज़्ारतुश्त लिपिक और अिाकारीभी शामिल थे। लेकिन, इस्लाम उमÕयद शासन को वैध्ता प्रदान करता रहा। उमÕयद हमेशा एकता के लिए अनुरोध करते रहे और विद्रोहों को इस्लाम के नाम पर दबाते रहे। उन्होंने अपनी अरबी सामाजिक पहचान बनाए रखी। अब्द अल - मलिक और उसकेउत्तराध्िकारियों के शासनकाल में अरब और इस्लाम दोनों पहचानों पर मज़्ाबूती से बल दिया जाता रहा। अब्द अल - मलिक ने जो नीतियाँ अपनाईं, उनमें अरबी को प्रशासन की भाषा के रूप में अपनाना और इस्लामी सिक्कों को जारी करना शामिल था। ख्िालापफत में जो सोने के दीनार और चाँदी के दिरहम चल रहे थे, वे रोमन और इर्रानी सिक्कों ;दिनारियस और द्राख्माद्ध की अनुवृफतियाँ थे, जिन पर सलीब और अग्िन - वेदी के चिÉ बने होते थे और यूनानी औरपहलवी ;इर्रान की भाषाद्ध भाषा में लेख अंकित होते थे। इन चिÉों को हटा दिया गया और सिक्कों पर अब अरबी भाषा में लिखा गया। अब्द अल - मलिक ने जेरूसलम में डोम आॅपफ राॅक बनवाकर अरब - इस्लामी पहचान के विकास में भी एक अत्यंत प्रदशर्नीय योगदान दिया। सिक्कों में अब्द अल - मलिक द्वारा सुधर नीचे दिखाए गए सिक्कों से यह पता चलता है कि बाइज़्ोंटाइन मुद्रा प्रणाली से अरबी - इस्लामी प्रणाली में परिवतर्न वैफसे आया। दूसरे सिक्के पर दिखाया गया लंबे बालों व दाढ़ी वाला खलीपफा पारंपरिक अरबी कपड़े पहने हुए है। उसके हाथ में तलवार है। उस समय के मुसलमानों की जो तस्वीरें हमें मिली हैं उनमें यह पहली है। अपने में यह ख़ास भी है क्यांेकि बाद में कला व श्िाल्प में प्राण्िायों के प्रतिरूपण के प्रति विरोध् होने लगा। अब्द अल - मलिकके मौदि्रक सुधर उसके राज्य - वित्त के पुनगर्ठन से जुड़े हुए थे। अब्द अल - मलिक की सिक्के ढालने की प्रिया इतनी सपफल थी कि नीचे दिखाए गए तीसरे सिक्के के प्रारूप व वजऩके अनुसार ही कइर् शताब्िदयों तक सिक्के ढाले जाते रहे। बाइज़्ांेटाइन का सोने का बना साॅलिडस, जिसमें सम्राट अब्द अल - मलिक द्वारा अपने नामबदला हुआ दीनार जिस पर केवल लिखावट मिलती है।हेराक्िलअस व उसके दो पुत्रों को व रूप के साथ ढाला गया सोनेइस पर कलिमा गढ़ी हुइर् है। ‘अल्लाह के सिवाय कोइर्दिखाया गया है। का दीनार। अन्य ख़ुदा नहीं है और अल्लाह का कोइर् शरीक नहीं है।’ अब्बासी क्रांति मुस्िलम राजनैतिक व्यवस्था के वेंफद्रीकरण की सपफलता के लिए उमÕयद वंश को भारी कीमत चुकानी पड़ी। दवा नामक एक सुनियोजित आंदोलन ने उमÕयद वंश को उखाड़ पेंफका। 750 में इसवंश की जगह अब्बासियों ने ले ली जो मक्का के ही थे। अब्बासियों ने उमÕयद शासन को दुष्ट बताया और यह दावा किया कि वे पैगम्बर मुहम्मद के मूल इस्लाम की पुनस्थर्ापना करेंगे। इस क्रांति से केवल वंश का ही परिवतर्न नहीं हुआ बल्िक इस्लाम के राजनैतिक ढाँचे और उसकी संस्वृफति में भी बदलाव आए। अब्बासियों का विद्रोह खुरासान ;पूवीर् इर्रानद्ध के बहुत दूर स्िथत क्षेत्रा में प्रारंभ हुआ, जहाँ पर दमिश्क से बहुत तेज़्ा दौड़ने वाले घोड़े से 20 दिन में पहुँचा जा सकता था। खुरासान में अरब - इर्रानियों की मिली - जुली आबादी थी, जिसे विभ्िान्न कारणों से एकजुट किया जा सका। यहाँ पर अरब सैनिक अध्िकांशतः इराक से आए थे और वे सीरियाइर् लोगों के प्रभुत्व से नाराज़्ा थे। खुरासान के अरब नागरिक उमÕयद शासन को इसलिए नापसंद करते थे कि उन्होंने करों में रियायतें और विशेषाध्िकार देने के जो वायदे किए थे, वे पूरे नहीं किए गए थे। जहाँ तक इर्रानी मुसलमानों ;मवालियोंद्ध का संबंध् है, उन्हें अपनी जातीय चेतना से ग्रस्त अरबों के तिरस्कार का श्िाकार होनापड़ा था और वे उमÕयदों को बाहर निकालने के किसी भी अभ्िायान में शामिल होने के इच्छुक थे। अब्बासियों ने, जो पैगम्बर के चाचा अब्बास के वंशज थे, विभ्िान्न असहमत समूहों का समथर्न प्राप्त कर लिया और यह वचन देकर कि पैगम्बर के परिवार ;अहल अल - बयतद्ध का कोइर् मसीहा ;महदीद्ध उन्हें उमÕयदों के दमनकारीशासन से मुक्त कराएगा, सत्ता प्राप्त करने के अपने प्रयत्न को वैध् ठहराया। उनकी सेना का नेतृत्व एक इर्रानी गुलाम अबू मुस्िलम ने किया, जिसने अंतिमउमÕयद खलीपफा, मारवान, को ज़्ाब नदी पर हुइर् लड़ाइर् में हराया। अब्बासी शासन के अंतगर्त, अरबों के प्रभाव में गिरावट आइर्, जबकिइर्रानी संस्वृफति का महत्त्व बढ़ गया। अब्बासियों ने अपनी राजधनी प्राचीन इर्रानी महानगर टेसीपफोन के खंडहरों के निकट, बग़्ादाद में स्थापित की। इराक और खुरासान की अपेक्षावृफत अध्िक भागीदारी सुनिश्िचत करने के लिए, सेना और नौकरशाही का पुनगर्ठन गै़र - कबीलाइर् आधर पर किया गया। अब्बासी शासकों ने ख्िालाप़्ाफत की ध£मक स्िथति और कायो± को मशबूत बनाया और इस्लामी संस्थाओं और विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। लेकिन सरकार और साम्राज्य की शरूरतों ने उन्हें राज्य के वेंफद्रीय स्वरूप कोबनाए रखने के लिए मजबूर किया। उन्होंने उमÕयदों के शानदार शाही वास्तुकला और राजदरबार के व्यापक समारोहों की परंपराओं को बराबर कायम रखा। जिस शासन को पहले इस बात पर गवर् था कि उसने राजतंत्रा को समाप्त कर दिया है उसे ही राजतंत्रा को पिफर से स्थापित करने के लिए मजबूर होना पड़ा। दूसरी अब्बासी राजधनी समारा की अल - मुतव्वकिल की महान मस्िजद। इसे 850 में बनाया गया। इसकी ईंट की बनी हुइर् मीनार 50मीटर ऊँची है। मेसोपोटामिया की वास्तुकला की परंपराओं से प्रेरित यह कइर् शताब्िदयों तक दुनिया की सबसे बड़ी मस्िजद थी। ख्िालाप़्ाफत का विघटन और सल्तनतों का उदय अब्बासी राज्य नौवीं शताब्दी से कमजोर होता गया, क्योंकि दूर के प्रांतों पर बग़्ादाद का नियंत्राण़कम हो गया था, और इसका एक कारण यह भी था कि सेना और नौकरशाही में अरब - समथर्क और इर्रान - समथर्क गुटों में आपस मंे झगड़ा हो गया था। सन् 810 मंे, खलीप़्ाफा हारुन अल - रशीद के पुत्रों, अमीन और मामुन के समथर्कों के बीच गृह यु( शुरू हो गया, जिससे गुटबन्दी और गहरी हो गइर् और तुकीर् गुलाम अध्िकारियों ;मामलुकद्ध का एक नया शक्ित गुट बन गया। श्िायाओंने एक बार पिफर सुन्नी रूढि़वादिता के साथ सत्ता के लिए प्रतियोगिता की। बहुत से नए छोटे राजवंश उत्पन्न हो गएः खुरासान और ट्रांसोक्िसयाना यानी तूरान अथवा आॅक्सस के पार वाले इलाकेमें ताहिरी और समानी वंश और मिस्र तथा सीरिया में तुलुनी वंश। अब्बासियों की सत्ता जल्दी ही मध्य इराक और पश्िचमी इर्रान तक सीमित रह गइर्। सन् 945 में वह भी छिन गइर्, जब इर्रान के वैफस्िपयन क्षेत्रा ;डेलामद्ध के बुवाही नामक श्िाया वंश ने बग़़्ादाद पर कब्जा कर लिया। बुवाही शासकों ने विभ्िान्न उपािायाँ धरण कीं, जिनमें एक प्राचीन इर्रानी पदवी शहंशाह ;राजाओं का राजाद्ध भी शामिल थी, लेकिन ‘खलीप़़्ाफा’ की पदवी धरण नहीं की। उन्होंने अब्बासी खलीपफा को अपने सुन्नी प्रजाजनों के प्रतीकात्मक मुख्िाया के रूप में बनाए रखा। ख्िालाप़्ाफत को समाप्त न करने का पैफसला बड़ा चतुराइर्पूणर् था, क्योंकि एक अन्य श्िाया राजवंश, पफातिमी, की महत्त्वाकांक्षा थी कि वह इस्लामी जगत पर शासन करे। प़्ाफातिमी का संबंध श्िाया़सम्प्रदाय के एक उप - सम्प्रदाय इस्माइली से था और उनका दावा था कि वे पैगम्बर की बेटी, पफातिमा, के वंशज हैं और इसलिए वे इस्लाम के एकमात्रा न्यायसंगत शासक हैं। उत्तरी अप़्ा्रफीका़में अपने अंे से, उन्होंने 969 में मिस्र को जीता और प़़्ाफातिमी ख्िालापफत की स्थापना की। मिस्र की पुरानी राजधनी, पुफस्तात की बजाय एक नए शहर, काहिरा को राजधनी बनाया गया, जिसकी़स्थापना मंगल ग्रह ;मिरिख, जिसे अल - व़्ाफाहिर भी कहा जाता हैद्ध के उदय होने के दिन की गइर् थी। दोनों प्रतिस्पध्ीर् राजवंशों ने श्िाया प्रशासकों, कवियों और विद्वानों को आश्रय प्रदान किया। सन् 950 से 1200 के बीच, इस्लामी समाज किसी एकल राजनीतिक व्यवस्था अथवा किसी संस्वृफति की एकल भाषा ;अरबीद्ध से नहीं बल्िक सामान्य आ£थक और सांस्वृफतिक प्रतिरूपों से एकजुट बना रहा। राजनीतिक विभाजनों के बावजूद, एकता कायम रखने के लिए राज्य और समाज को अलग करके देखा गया और इस्लामी उच्च संस्वृफति की भाषा के रूप में प़्ाफारसी का विकास किया गया। इस एकता के निमार्ण में बौिक परंपराओं के बीच संवाद की परिपक्वता की भी भूमिका थी। विद्वान, कलाकार और व्यापारी इस्लामी दुनिया के भीतर मुक्त रूप से घूमते - पिफरते और आते - जाते थे और विचारों तथा तौर - तरीकों का प्रसार सुनिश्िचत करते थे। इनमें से वुुफछधमा±तरण के कारण गाँवों के स्तर तक नीचे पहुँच गए थे। मुसलमानों की जनसंख्या जो उमÕयद काल और प्रारंभ्िाक अब्बासी काल में 10 प्रतिशत से कम थी, आगे चलकर बहुत अध्िक हो गइर् और पिफर अन्य ध्मो± से अलग ध्मर् और सांस्वृफतिक प्रणाली के रूप में इस्लाम की पहचान अध्ि क सुस्पष्ट हो गइर्। इससे ध्मा±तरण संभव और अथर्वान प्रतीत हुआ। दसवीं और ग्यारहवीं शताब्िदयों में तुकीर् सल्तनत के उदय से अरबों और इर्रानियों के साथ एक तीसरा प्रजातीय समूह जुड़ गया। तुवर्फ, तु£कस्तान के मध्य एश्िायाइर् घास के मैदानों ;अरल सागर के उत्तर - पूवर् में चीन की सीमाओं तकद्ध के खानाबदोश कबाइली लोग थे, जिन्होंने ध्ीरे - ध्ीरे इस्लाम को अपना लिया ;देख्िाए विषय 5द्ध। वे वुफशल सवार और यो(ा थे और वे गुलामों और सैनिकों़के रूप में अब्बासी, समानी और बुवाही प्रशासनों में शामिल हो गए और अपनी वप़्ाफादारी तथा सैनिक योग्यताओं के कारण तरक्की करके उच्च पदों पर पहुँच गए। गजनी सल्तनत की स्थापना अल्पतिगिऩ;961द्ध द्वारा की गइर् थी और उसे गज़़्ानी के महमूद ;998 - 1030द्ध द्वारा मजबूत किया गया। बुवाहियों की तरह, गज़्ानवी एक सैनिक वंश था, जिनके पास तुको± और भारतीयों जैसी पेशेवर सेना थी ;मासूद का एक सेनापति भारतीय था जिसका नाम तिलक थाद्ध। लेकिन उनकी सत्ता और शक्ित का वेंफद्र खुरासान और अप़़्ाफगानिस्तान में था और उनके लिए अब्बासी ख़लीपेफ प्रतिद्वंदी नहीं थे, बल्िक उनकी वैध्ता के स्रोत थे। महमूद इस बारे में सचेत था कि वह एक गुलाम का बेटा है और वह खलीप़़्ाफा से सुलतान की उपाध्ि प्राप्त करने के लिए बहुत इच्छुक था। खलीपफा श्िाया सत्ता के प्रति संतुलनकारी घड़े के रूप में गजनवी को, जो सुन्नी था, समथर्न देने के लिए राज़्ाी था।़सलजुवफ तुवर्फ समानियों और व़्ाफाराखानियों ;आगे पूवर् की ओर से आए ग़्ौर - मुस्िलम तुवर्फद्ध की सेनाओं में सैनिकों के रूप में तुरान में दाख्िाल हो गए। उन्होंने बाद में अपने आपको दो भाइयों, तुगरिल और छागरी बेग के नेतृत्व में एक शक्ितशाली समूह के रूप में स्थापित कर लिया। गज़्ानी के महमूद की मृत्यु के बाद की अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए, सल्जुवफों ने 1037 में खुरासान को जीत लिया और निशापुर’ को अपनी पहली राजधनी बनाया। इसके बाद सल्जुवफों ने अपना ध्यान पश्िचमी पफारस और इराक ;जहाँ बुवाहियों का शासन थाद्ध की ओर दिया और 1055 में बग़्ादाद को पुनः सुन्नी शासन के अधीन कर दिया। खलीपफा अल - व़्ाफायम ने तुगरिल बेग को सुलतान की उपाध्ि प्रदाऩकी, जो एक ऐसी कारर्वाइर् थी जिसने ध£मक सत्ता को राजनीतिक सत्ता से अलग कर दिया। दोनों सल्जुव़्ाफ भाइयों ने परिवार द्वारा शासन चलाने की कबाइली धरणा के अनुसार इकऋे मिल कर शासन किया। भतीजा, अल्प अरसलन उसका उत्तराध्िकारी बना। अल्प अरसलन के शासन के दौरान सलजुव़्ाफ साम्राज्य का विस्तार अनातोलिया ;आध्ुनिक तुकीर्द्ध तक हो गया। ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी तक की अवध्ि में यूरोपीय इर्साइर् और अरब राज्यों के बीच कापफी अध्िक लड़ाइर् - झगड़े हुए। इसकी चचार् नीचे की गइर् है। पिफर तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में, मुस्िलम जगत ने अपने आपको एक बहुत बड़े विनाश के कगार पर पाया। यह मंगोलों की ओर से आने वाला खतरा थाऋ यह सुव्यवस्िथत सभ्यता पर ‘खानाबदोशों’ की ओर से होने वाला अंतिम विंफतु सबसे अिाक निणार्यक आक्रमण था ;देख्िाए विषय 5द्ध। ध्मर्यु( मध्यकाल के इस्लामी समाजों में, इर्साइयों को पुस्तक वाले लोग ;अहल अल - किताबद्ध समझा जाता था, क्योंकि उनके पास उनका अपना ध्मर्ग्रंथ ;न्यू टेस्टामेंट अथवा इंजीलद्ध था। व्यापारियों, तीथर्यात्रिायों, राजदूतों और यात्रिायों के रूप में मुस्िलम राज्यों मंे आने वाले इर्साइयों को सुरक्षा ;अमनद्ध प्रदान की जाती थी। इन क्षेत्रों में वे क्षेत्रा भी शामिल थे, जिन पर कभी बाइज़़्ोंटाइन साम्राज्य का कब्जा था, विशेष रूप से पिफलिस्तीन की पवित्रा भूमि। अरबों ने जेरूसलम को 638 में जीत लिया था, लेकिन वह इर्साइयों की कल्पना में इर्सा के व्रूफसारोपण और पुनरुज्जीवन के स्थान के रूप में हमेशा विद्यमान था। इर्साइर् यूरोप में मुस्िलम जगत की छवि के निमार्ण में यह एक महत्त्वपूणर् तत्व था। ’श्िाक्षा का एक महत्त्वपूणर् पफारसी - इस्लामी वेंफद्रऔर उमर खÕयाम का जन्म स्थान। अलेप्पो एक हितित्ता असीरियाइर् व हेलेनिक स्थल। अरबों ने 636 में इस पर अिाकार कर लिया। अगले हशार वषर् तक यह लड़ाइर् चलती रही। चित्रा में यु(रत धमर्यो(ाओं को देख्िाए - नसूह अल - मतरकी का यात्रावृत्तांत, 1534 - 36। मुस्िलम जगत के प्रति शत्राुता ग्याहरवीं शताब्दी में और अध्िक स्पष्ट हो गइर्। नामर्नों, हंगरीवासियों और वुफछ स्लाव लोगों को इर्साइर् बना लिया गया था और केवल मुसलमान मुख्य शत्राु रह गए थे। ग्याहरवीं शताब्दी में पश्िचमी यूरोप के सामाजिक और आ£थक संगठनों में भी परिवतर्न हो गया था, जिससे इर्साइर् जगत और इस्लामी जगत के बीच शत्राुता को बढ़ाने में योगदान मिला। पादरी और यो(ा वगर् ;पहले दो वगर् - देख्िाए विषय 6द्ध राजनीतिक स्िथरता और वृफष्िा तथा व्यापार पर आधारित आ£थक विकास सुनिश्िचत करने के प्रयत्न कर रहे थे। प्रतिस्पध्ीर् सामंती राज्यों के बीच सैनिक मुठभेड़ की संभावनाओं और लूटमार पर आधरित अथर्व्यवस्था के पुनउर्दय को ‘इर्श्वरीय शांति’ ;पीस आॅपफ गाॅडद्ध आंदोलन द्वारा रोका गया था। वुफछ क्षेत्रों में, पूजास्थलों के निकट, चचर् के वैफलेंडर में पवित्रा मानी जाने वाली वुफछ अवध्ियों और वुफछ कमजोऱसामाजिक समूहों जैसे पादरियों और आम लोगों के ख्िालापफ सभी प्रकार की सैनिक़¯हसा व£जत की गइर् थी। इर्श्वरीय शांति आंदोलन ने सामंती समाज की आक्रमणकारी प्रवृिायों को इर्साइर् जगत से हटा कर इर्श्वर के ‘शत्राुओं’ की ओर मोड़ दिया। इससे एक ऐसे वातावरण का निमार्ण हो गया, जिसमें अविश्वासियों ;विध£मयोंद्ध के ख्िालापफ लड़ाइर् न केवल उचित अपितु़प्रशंसनीय समझी जाने लगी। 1092 में बगदाद के सलजुव़्ाफ सुलतान,़मलिक शाह की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य का विघटन हो गया। इससे बाइज़्ोंटाइन सम्राट एलेक्िसयस प्रथम ;।समगपने प्द्ध को एश्िाया माइनर और उत्तरी सीरिया को पिफर से हथ्िायाने का मौका मिल गया। पोप अबर्न द्वितीय ;न्तइंद प्प्द्ध के लिए इर्साइर् ध्मर् की जीवट प्रवृिा को पिफर से जीवित करने का एक अवसर था। 1095 में, पोप ने बाइज़्ांेटाइन सम्राट के साथ मिलकर पुण्य देश ;होली लैंडद्ध को मुक्त कराने के लिए इर्श्वर के नाम पर यु( के लिए आ“वान किया। 1095 और 1291 के बीच पश्िचमी यूरोपीय इर्साइयों ने पूवीर् भूमध्यसागर ;लैवैंटद्ध के तटवतीर् मैदानों में मुस्िलम शहरों के ख्िालाप़्ाफ यु(ों की योजना बनाइर् और पिफर लगातार अनेक यु( लड़े गए। इन लड़ाइयों को बाद में ‘धमर्यु(’’ का नाम दिया गया। प्रथम ध्मर्यु( ;1098 - 1099द्ध में, प्रफांस और इटली के सैनिकों ने सीरिया में एंटीओक और जेरूसलम पर कब्जा कर लिया। शहर में मुसलमानों और यहूदियों की विद्वेषपूणर् हत्याएँ की गईं औऱशहर पर विजय प्राप्त कर ली गइर्, जिसके बारे में इर्साइयों और मुसलमानों दोनों ने कापफी लिखा है। मुस्िलम लेखकों ने इर्साइयों ;जिन्हें पिफरंगी अथवा इ¯प्रफजी कहा जाता थाद्ध के आगमन का उल्लेख पश्िचमी लोगों के आक्रमण के रूप में किया है। इन्होंने सीरिया - पिफलिस्तीन के क्षेत्रा में जल्दी ही ध्मर्यु( द्वारा जीते गए चार राज्य स्थापित कर लिए। इन क्षेत्रों को सामूहिक रूप से ‘आउटरैमर’ ;समुद्रपारीय भूमिद्ध कहा जाता था और बाद के ध्मर्यु( इसकी रक्षा और विस्तार के लिए किए गए। आउटरैमर प्रदेश वुफछ समय तक भली - भांति कायम रहा, लेकिन जब तुको± ने 1144 में एडेस्सा पर कब्ज़्ाा कर लिया तो पोप ने एक दूसरे ध्मर्यु( ;1145 - 1149द्ध के लिए अपील की। एक जमर्न और प्रफांसीसी सेना ने दमिश्क पर कब्ज़्ाा करने की कोश्िाश की, लेकिन उन्हें हरा कर घर लौटने के लिए मजबूर कर दिया गया। इसके बाद आउटरैमर की शक्ित ध्ीरे - ध्ीरे क्षीण होती गइर्। ध्मर्यु( का जोश अब खत्म हो गया और इर्साइर् शासकों ने विलासिता से जीना और नए - नए इलाकों के लिए लड़ाइर् करना शुरू कर दिया। सलाह अल - दीन ;सलादीनद्ध ने एक मिस्री - सीरियाइर् साम्राज्य स्थापित किया और इर्साइयों के विरु( ध्मर्यु( करने का आह्वान किया, और उन्हें 1187 में पराजित कर दिया। उसने पहले ध्मर्यु( के लगभग एक शताब्दी बाद, जेरूसलम पर पिफर से कब्जा कर लिया।़उस समय के अभ्िालेखों से संकेत मिलता है कि इर्साइर् लोगों के साथ सलाह अल - दीन का व्यवहार दयामय था, जो विशेष रूप से उस तरीके के व्यवहार के विपरीत था, जैसा पहले इर्साइयों ने मुसलमानों और यहूदियों के साथ किया था। हालांकि उसने द चचर् आॅपफ दि होली सेपलकर की अभ्िारक्षा का काम इर्साइयों को सौंप दिया था, लेकिन बहुत - से गिरजाघरों को मस्िजदों में बदल दिया गया, और जेरूसलम एक बार पिफर मुस्िलम शहर बन गया। इस शहर के छिन जाने से, 1189 में तीसरे ध्मर्यु( के लिए प्रोत्साहन मिला, लेकिन ध्मर्यु( करने वाले पिफलिस्तीन में वुफछ तटवतीर् शहरों और इर्साइर् तीथर्यात्रिायों के लिए जेरूसलम में मुक्त रूप से प्रवेश के सिवाय और वुफछ प्राप्त नहीं कर सके। मिस्र के शासकों, मामलुकों ने अंततः 1291 में ध्मर्यु( करने वाले सभी इर्साइयों को समूचे पिफलिस्तीन से बाहर निकाल दिया। ध्ीरे - ध्ीरे यूरोप की इस्लाम में सैनिक दिलचस्पी समाप्त हो गइर् और उसका ध्यान अपने आंतरिक राजनीतिक और सांस्वृफतिक विकास की ओर वेंफदि्रत हो गया। इन ध्मर्यु(ों ने इर्साइर् - मुस्िलम संबंधें के दो पहलुओं पर स्थायी प्रभाव छोड़ा। इनमें से एक था, मुस्िलम राज्यों का अपने इर्साइर् प्रजाजनों की ओर कठोर रुख, जो लड़ाइयों की कड़वी यादों और मिली - जुली आबादी वाले इलाकों में सुरक्षा की ज़्ारूरतों का परिणाम था। दूसरा था, मुस्िलम सत्ता की बहाली के बाद भी पूवर् और पश्िचम के बीच व्यापार में इटली के व्यापारिक समुदायों ;पीसा, जेनोआ और वैनिस का अध्िक प्रभाव।द्ध ’पोप ने यु( लड़ने की शपथ लेने वालों को समारोहपूवर्क क्रास प्रदान करने का आदेश दिया। सीरिया में प्रैंफक अपने अध्ीन किए गए मुस्िलम लोगों के साथ विभ्िान्न प्रैंफक ;पश्िचमी देशों के नागरिक जो ध्मर्यु(ों में विजयी हुएद्ध अभ्िाजातों का व्यवहार भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार का था। शुरू के ध्मर्यु(कारी, जो सीरिया और पिफलिस्तीन में बस गए थे, बाद में आने वालों की तुलना में, आमतौर पर मुस्िलम आबादी के प्रति अध्िक सहिष्णु थे। बारहवीं शताब्दी के एक सीरियाइर् मुसलमान उसामा इब्न मुनव्िाफथ ;न्ेंउं पइद डनदुपकीद्ध ने अपने संस्मरणों में अपने नए पड़ोसियों के बारे में वुफछ दिलचस्प बातें कही हैंः ‘प्रैंफक लोगों में वुफछ लोग ऐसे हैं, जो इस देश में बस गए हैं और मुसलमानों के साथ जुड़े हुए हैं। वे नए आने वालों से बेहतर हैं, लेकिन वे नियम का अपवाद हैं और उनके आधर पर कोइर् निष्कषर् नहीं निकाला जा सकता। एक उदाहरण यह है कि एक बार मैंने किसी आदमी को व्यापार के लिए एंटीओक भेजा। उस समय, चीपफ थ्िाओडोर सोपिफआनोस ;ब्ीपम िज्ीमवकवतम ैवचीपंदवेए एक पूवीर् इर्साइर्द्ध वहाँ पर था, वह और मैं आपस में दोस्त थे। वह तब एंटीओक में हर तरह से शक्ितशाली था। एक दिन उसने मेरे आदमी से कहा फ्मेरे एक प्रैंफक मित्रा ने मुझे आमंत्रिात किया है। मेरे साथ चलो और देखो कि वे लोग किस प्रकार रहते हैं।य् मेरे आदमी ने मुझे बताया, इसलिए मैं उसके साथ चला गया, और हम उन पुराने शूरवीरों में से एक शूरवीर ;नाइटद्ध के घर पहुँच गए, जो प्रथम प्रैंफक अभ्िायान के साथआए थे। वह अब राज्य और सेना से सेवानिवृत्तहो चुका था, और उसके पास एंटीओक मेंसम्पिा थी, जहाँ वह रहता था। उसने बहुत हीसपफाइर् से स्वादिष्ट भोजन परोसा था। उसने देखा कि मैं खाने में संकोच कर रहा हूँ, और तब उसने कहा, फ्जी भरकर खाना खाओ, क्योंकि मैं प्रैंफक खाना नहीं खाता। मेरे पास मिस्री महिलाएँ हैं जो मेरा खाना बनाती हैं और वे जो वुफछ तैयार करती हैं उसके अलावा मैं और वुफछ नहीं खाता। न कभी सूअर के मांस का मेरे घर के अंदर प्रवेश होता है।य् इसलिए मैंने खाना खाया, लेकिन वुफछ सावधनी के साथ, और तब हम वहाँ से रवाना हुए। बाद में, मैं बाज़्ाार से गुज़्ार रहा था, तब अचानक एक प्रैंफक महिला ने मुझे पकड़ लिया और अपनी भाषा में बड़बड़ाना शुरू कर दिया। मैं यह समझ नहीं पाया कि वह क्या कह रही है। प्रैंफक लोगों की भीड़ मेरे आस - पास इकट्टòी हो गइर्। मुझे यकीन हो गया कि मेरा अंत निकट आ गया है। तब, अचानक वही शूरवीरवहाँ आ गया और उसने उस औरत से पूछा, फ्तुम इस मुसलमान से क्या चाहती हो?य् उसने उत्तर दिया, फ्इसने मेरे भाइर् हुरसो की हत्या की थी।य् यह हुरसो अपफामिया का एक शूरवीर था, जिसकी हत्या हामा की सेना वेफ़किसी सिपाही द्वारा कर दी गइर् थी। तब उस शूरवीर ने चिल्लाकर उस महिला से कहा, फ्यह व्यक्ित मध्यवगीर् ;बुजुर्आद्ध है, अथार्त् यह एक व्यापारी है। यह लड़ता - लड़ाता नहीं है। किसी भी किस्म का यु( नहीं करता।य् वह भीड़ पर भी चिल्लाया और तब भीड़ तितर - बितर हो गइर्ऋ तब उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे वहाँ से ले गया। इस प्रकार उसके साथ भोजन करने का यह प्रभाव था कि उसने मुझे मृत्यु से बचा लिया।य् दृ किताब अल - इतिबार अथर्व्यवस्थाμवृफष्िा, शहरीकरण और वाण्िाज्य नए जीते गए क्षेत्रों में बसे हुए लोगों का प्रमुख व्यवसाय वृफष्िा था। इस्लामी राज्य ने इसमें कोइर् परिवतर्न नहीं किया। ज़़्ामीन के मालिक बड़े और छोटे किसान थे और, कहीं - कहीं राज्य था। इरावफ और इर्रान में, जमीन कापफी बड़ी इकाइयों में बँटी हुइर् थी, जिसकी खेती किसानों द्वारा की जाती़थी। ससानी और इस्लामी कालों में संपदा स्वामी राज्य की ओर से कर एकत्रा करते थे। उन इलाकों में, जो पशुचारण की स्िथति से आगे बढ़कर स्िथर वृफष्िा व्यवस्था तक पहुँच गए थे, शमीन गाँवकी सांझी सम्पिा थी। अंत में, जो भूमि - सम्पिायाँ इस्लामी विजय के बाद मालिकों द्वारा छोड़ दी गइर् थीं, वे राज्य द्वारा अपने हाथ में ले ली गइर् थीं और साम्राज्य के विश्िाष्ट वगर् के मुसलमानों को दे दी गइर् थीं, विशेष रूप से खलीपफा के परिवार के सदस्यों को।़वृफष्िा भूमि का सवोर्परि नियंत्राण राज्य के हाथों में था, जो विजय का काम पूरा होने पर अपनी अध्िकांश आय भू - राजस्व से प्राप्त करता था। अरबों द्वारा जीती गइर् भूमि पर, जो मालिकों के हाथों में रहती थी, कर ;खराजद्ध लगता था, जो खेती की स्िथति के अनुसार पैदावार के आध्े से लेकर उसके पांचवें हिस्से के बराबर होता था। जो शमीन मुसलमानों की मिलकियत थी अथवा जिसमें उनके द्वारा खेती की जाती थी, उस पर उपज के दसवें हिस्से के बराबर कर लगता था। जब ग़्ौर - मुसलमान कम कर देने के उद्देश्य से मुसलमान बनने लगे तो उससे राज्य की आय कम हो गइर्। इस कमी को पूरा करने के लिए, खलीपफाओं ने पहले तो़ध्मा±तरण को निरुत्साहित किया और बाद में कराधान की एकसमान नीति अपनाइर्। 10वीं शताब्दी से राज्य ने अध्िकारियों को अपना वेतन भूमियों के वृफष्िा राजस्व से, जिसे इक्ता ;राजस्व का हिस्साद्ध कहा जाता था, लेने के लिए प्राध्िवृफत किया। खेती में खुशहाली राजनीतिक स्िथरता साथ - साथ आइर्। बहुत - से क्षेत्रों में, विशेष रूप से नील घाटी में, राज्य ने ¯सचाइर् प्रणालियों, बाँधें और नहरों के निमार्ण, वुफओं की खुदाइर् ;जिनमें आमतौर पर पनचक्िकयाँ अथवा नोरिया लगी होती थींद्ध के लिए सहायता दी, ये सारी चीज़्ाफसल के लिए़ों अच्छी प्जरूरी थीं। इस्लामी कानून में उन लोगों को कर में़रियायत दी गइर्, जो शमीन को पहली बार खेती के काम में लाते थे। किसानों की पहल और राज्य के समथर्न के जरिए खेती - योग्य भूमि का विस्तार हुआ और प्रमुख प्रौद्योगिकीय परिवतर्नों वेफ़अभाव की स्िथति में भी उत्पादकता में वृि हुइर्। बहुत - सी नयी पफसलोंऋ जैसे - कपास, संतरा,़केला, तरबूश, पालक और बैंगन की खेती की गइर् और यूरोप को उनका नियार्त भी किया गया। जैसे - जैसे शहरों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुइर्, वैसे ही इस्लामी सभ्यता पफली - पूफली।़बहुत - से नए शहरों की स्थापना की गइर्, जिनका उद्देश्य मुख्य रूप से अरब सैनिकों ;जुंडद्ध को बसाना था, जो स्थानीय प्रशासन की रीढ़ थे। इस श्रेणी के पफौजी शहरों में, जिन्हें मिस्र कहा जाता था ;इजिप्ट का अरबी नामद्ध, वुफपफा और बसरा इरावफ में, और पुफस्तात तथा काहिरा मिस्र में थे।़़खाना एक ट्रे पर लाया जा रहा है। सूडो गैलन की प्रत्यौषधों की पुस्तक ;ठववा व ि।दजपकवजमेद्ध का अरबी रूपांतर, 1199 ;डा. गैलन की कहानी देख्िाये पृ. 63द्ध। पफसल की कटाइर्ऋ मजदूरों का बसरा को जाने वाली एक नाव। नाविक भारतीय है और यात्राी अरबी हैं। आध्ुनिक काल से पहले जलमागर् द्वारा माल और यात्रिायों की ढुलाइर् सस्ती, तेज़्ा और सुरक्ष्िात थी। ये चित्रा हरिरी द्वारा रचित 12वीं शताब्दी की एक पांडुलिपि मकामात से लिया गया। मकामात ;सभाएँद्ध एक लोकपि्रय अरबी साहित्य की विध थी, जिसमें वाचक एक चालबाज़्ा और उसकी शरारतों की कहानियाँ सुनाता है। अब्बासी ख्िालापफत ;800द्ध की राजधनी के रूप में अपनी स्थापना के बाद आध्ी शताब्दी के अंदर बग़्ादाद की जनसंख्या बढ़ कर लगभग दस लाख तक पहुँच गइर् थी। इन शहरों के साथ - साथ दमिश्क, इस्पफहान और समरवंफद जैसे वुफछ पुराने शहर थे, जिन्हें नया जीवन मिल गया था।़खाद्यान्नों और शहरी विनिमार्ताओं के लिए कच्ची सामग्री, जैसे कपास और चीनी के उत्पादन में वृि की गइर् जिससे इन शहरों के आकार और इनकी जनसंख्या में बढ़ोतरी हुइर्। इस प्रकार संपूणर् क्षेत्रा में शहरों का एक विशाल जाल विकसित हो गया। एक शहर दूसरे शहर से जुड़ गया और परस्पर संपवर्फ एव कारोबार बढ़ गया। शहर के वेंफद्र में दो भवन - समूह होते थे, जहाँ से सांस्वृफतिक और आ£थक शक्ित का प्रसारण होता था: उनमें एक मस्िजद ;मस्िजद अल - जामीद्ध होती थी जहाँ सामूहिक नमाज़्ा पढ़ी जाती थी। यह इतनी बड़ी होती थी कि दूर से दिखाइर् दे सकती थी। दूसरा भवन - समूह वेंफद्रीय मंडी ;सुव़़़़्ाफद्ध था, जिसमें दुकानों की कतारें होती थीं, व्यापारियों के आवास ;पंफदुवफद्ध और सरार्पफ का कायार्लय होता था। शहर प्रशासकों ;जो राज्य के आयन अथवा नेत्रा थेद्ध और विद्वानों और व्यापारियों ;तुज्जरद्ध के लिए घर होते थे, जो वेंफद्र के निकट रहते थे। सामान्य नागरिकों और सैनिकों के रहने के क्वाटर्र बाहरी घेरे में होते थे, और प्रत्येक में अपनी मस्िजद, गिरजाघर अथवा सिनेगोग ;यहूदी प्राथर्नाघरद्ध, छोटी मंडी और सावर्जनिक स्नानघर ;हमामद्ध और एक महत्त्वपूणर् सभा - स्थल होता था। शहर के बाहरी इलाकों में शहरी गरीबों के मकान, देहातों से लाइर् जाने वाली हरी सब्िज़्ायों और पफलों के लिए बाशार, कापिफलों के ठिकाने और ‘अस्वच्छ’ दुकानें, जैसे चमड़ा सापफ करने या रँगने की दुकानें और कसाइर् की दुकानें होती थीं। शहर की दीवारों के बाहर कबि्रस्तान और सराय होते थे। सराय में लोग उस समय आराम कर सकते थे जब शहर के दरवाज़्ो बंद कर दिए गए हों। सभी शहरों का नक्शा एक जैसा नहीं होता था, इस नक्शे में परिदृश्य, राजनीतिक परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं के आधर पर परिवतर्न किए जा सकते थे। राजनीतिक एकीकरण और खाद्य पदाथो± और विलास - वस्तुओं की शहरी माँग ने विनिमय के दायरे का विस्तार कर दिया। भूगोल ने मुस्िलम साम्राज्य की सहायता की, जो हिंद महासागर और भूमध्यसागर के व्यापारिक क्षेत्रों के बीच पैफल गया। पाँच शताब्िदयों तक, अरब और इर्रानी व्यापारियों का चीन, भारत और यूरोप के बीच के समुद्री व्यापार पर एकाध्िकार रहा। यह व्यापार दो मुख्य रास्तों यानी लाल सागर और पफारस की खाड़ी से होता था। लंबी दूरी के व्यापार के लिए उपयुक्त और उच्च मूल्य वाली वस्तुओंऋ जैसे - मसालों, कपड़ांे, चीनी मिट्टðी की चीज़्ाों और बारूद को भारतऔर चीन से लाल सागर के पत्तनों अथार्त् अदन औरऐधब तक और पफारस खाड़ी के पत्तन सिरापफ और बसरा तक शहाज पर लाया जाता था। यहाँ से, माल को ज़्ँ़ामीन पर ऊटों के कापिफलों के द्वारा बगदाद, दमिश्क और एलेप्पो के भंडारगृहों ;मखाज्ि़ान जो प्रफांसीसी शब्द मैगशीन का मूल है, जिसका अथर् है दुकानद्ध तक स्थानीय खपत के लिए अथवा आगे भेजने के लिए ले जाया जाता था। मक्का के रास्ते से गुशरने वाले कापिफले बड़े हो जाते थे, जब हज की यात्रा का समय हिंद महासागर में नौ - चालन के मौसम ;मवासिम, जो मानसून शब्द का मूल हैद्ध के साथपड़ता था। इन व्यापारिक मागो± के भूमध्यसागर के सिरे पर सिवंफदरिया के पत्तन से यूरोप को किए जाने वाले नियार्त को यहूदी व्यापारियों द्वारा संभाला जाता था, जिनमें से वुफछ भारत से सीधे व्यापार करते थे, जैसाकि गेनिजा़;ळमदप्रंद्ध संग्रह में परिरक्ष्िात उनके पत्रों से देखा जा सकता है। विंफतु, चैथी शताब्दी से, व्यापार और शक्ित के वेंफद्र के रूप में काहिरा के उभर आने के कारण और इटली के व्यापारिक शहरों से पूवीर् माल की बढ़ती हुइर् माँग के कारण लाल सागर के मागर् नेअिाक महत्त्व प्राप्त कर लिया। पूवीर् सिरे की चचार् करें तो इर्रानी व्यापारी मध्य एश्िायाइर् और चीनी वस्तुएँ, जिनमें कागज भी़शामिल था, लाने के लिए बग़्ादाद से बुखारा और समरवंफद ;तुरानद्ध होते हुए रेशम मागर् से चीन कागज़्ा, गेनिज़्ाा अभ्िालेख और इतिहास कागज़्ा के आविष्कार के बाद इस्लामी जगत मंे लिख्िात रचनाओं का व्यापक रूप से प्रसार होने लगा। कागज़्ा ;लिनन से नि£मतद्ध चीन से आया था, जहाँ कागश बनाने की प्रिया को बहुत सावधनी से गुप्त रखा गया था। 751 में, समरवंफद के मुसलमान प्रशासक ने 20,000 चीनी आक्रमणकारियों को बंदी बना लिया, जिनमें से वुफछ कागज़्ा बनाने में बहुत निपुणथे। अगले सौ वषो± के लिए, समरवंफद का कागश नियार्त की एक महत्त्वपूणर् वस्तु बन गया। चूंकि इस्लाम एकाध्िकार का निषेध करता है, इसलिए कागज़्ा इस्लामी दुनिया के बाकी हिस्सों में बनाया जाने लगा। दसवीं शताब्दी के मध्य भाग तक इसने अध्िकांशतः पैपाइरस का स्थान ले लिया था। पैपाइरस एक ऐसी लेखन सामग्री था, जिसे एक ऐसे पौधे के अंदरूनी तने से बनाया जाता था, जो नील घाटी में बहुतायत से उगता था। कागश की माँग बढ़ गइर्, और अब्द अल - लतीपफ, ;।इक ंस.स्ंजपद्धि जो बग़दाद से आया हुआ एक चिकित्सक था ;आदशर् विद्याथीर् का चित्राण पृष्ठ 98 पर देख्िाएद्ध और 1193से 1207 तक मिस्र का निवासी था, लिखता है कि मिस्र के किसानों ने ममियों के ऊपर लपेटे गए लिनन से बने हुए आवरण प्राप्त करने के लिए कब्रों को किस तरह लूटा था, ताकि वे इन लिनन आवरणों को कागज़्ा के कारखानों को बेच सवेंफ। कागज़्ा की उपलब्ध्ता के कारण सभी प्रकार के वाण्िाज्ियक और निजी दस्तावेज़्ाों को लिखना भी सुविधाजनक हो गया। 1896 में पुफस्तात ;पुराना काहिराद्ध में बेन एज़्ारा के यहूदी प्राथर्ना - भवन के एक सीलबंद कमरे ;गेनिज़्ाा, जिसका उच्चारण गनिज़्ाा़ के रूप में किया जाता हैद्ध में मध्यकाल के यहूदी दस्तावेजों का एक विशाल संग्रह मिला। ये दस्तावेज़्ा ़इस यहूदी प्रथा के कारण सँभाल कर रखे गए थे कि ऐसी किसी भी लिखावट को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें परमेश्वर का नाम लिखा हुआ हो। गेनिज़्ाा में लगभग ढाइर् लाख पांडुलिपियाँ और उनके टुकड़े थे, जिनमें कइर् आठवीं शताब्दी के मध्यकाल वफी भी थीं। अध्िकांश सामग्री दसवीं से तेरहवीं शताब्दी तक की थी, अथार्त् पफातिमी, अयूबी, और प्रारंभ्िाक मामलुक काल की थीं। इनमें व्यापारियों, परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच लिखे गए पत्रा, संविदा, दहेज से जुड़े वादे, बिक्री दस्तावेज़्ा, ध्ुलाइर् के कपड़ों की सूचियाँ और अन्य मामूली चीज़्ों शामिल थीं। अध्िकतर दस्तावेज़्ा यहूदी - अरबी भाषा में लिखे गए थे, जो हिब्रू अक्षरों में लिखी जाने वाली अरबी भाषा का ही रूप था, जिसका उपयोग समूचे मध्यकालीन भूमध्य सागरीय क्षेत्रा में यहूदी समुदायों द्वारा आमतौर पर किया जाता था। गेनिजा दस्तावेज़्ा निजी और ़आ£थक अनुभवों से भरे हुए हैं और वे भूमध्यसागरीय और इस्लामी संस्वृफति की अंदरूनी जानकारी प्रस्तुत करते हैं। इन दस्तावेज़्ाों से यह भी पता चलता है कि मध्यकालीन इस्लामी जगत के व्यापारियों के व्यापारिक कौशल और वाण्िाज्ियक तकनीवेंफ उनके यूरोपीय प्रतिपक्ष्िायों की तुलना में बहुत अध्िक उन्नत थीं। गेटिन ने गेनिज़्ाा अभ्िालेखों का प्रयोग करते हुए भूमध्यसागर का इतिहास कइर् संग्रहों में लिखा। गेनिज़्ाा के एक पत्रा से प्रेरित होकर अमिताभ घोष ने अपनी पुस्तक इन एन एंटीक लैंड में एक भारतीय दास की कहानी प्रस्तुत की है। जाते थे। तुरान भी वाण्िाज्ियक तंत्रा में एक महत्त्वपूणर् कड़ी था। यह तंत्रा यूरोपीय वस्तुओं, मुख्यतः पफर और स्लाव गुलामों ;इसी से अंग्रेज़्ाी ‘स्लेव’ शब्द बनाद्ध के व्यापार के लिए उत्तर में रूस और स्वेंफडीनेविया तक पैफला हुआ था। इन वस्तुओं की अदायगी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस्लामी सिक्के वोल्गा नदी के आसपास और बाल्िटक क्षेत्रा में बड़ी संख्या में पाए गए हैं। इन बाजारों में तुवर्फ गुलाम ;दास - दासियाँद्ध भी खलीपफाओं और सुलतानों के दरबारों के लिए खरीदे़़जाते थे। राजकोषीय प्रणाली ;राज्य की आय और उसका व्ययद्ध और बाजार के लेन - देन ने इस्लामी़देशों में ध्न के महत्त्व को बढ़ा दिया था। सोने, चाँदी और ताँबे ;प़्ाुफलसद्ध के सिक्के बनाए जाते थे और वस्तुओं और सेवाओं की अदायगी के लिए प्रायः सरार्प़्ाफों द्वारा सीलबंद किए गए थैलों में भेजे जाते थे। सोना अप़्ा्रफीका ;सूदानद्ध से और चाँदी मध्य एश्िाया ;ज़्ारपफशन घाटीद्ध से आती थी। कीमती धतुएँ और सिक्के यूरोप से भी आते थे, जो पूवीर् व्यापार की वस्तुओं को खरीदने के लिए यूरोप अदा करता था। ध्न की बढ़ती हुइर् माँग ने लोगों को अपने संचित भंडारों औरबेकार पड़ी सम्पिा का उपयोग करने के लिए विवश कर दिया। उधर का कारोबार भी मुद्राओं के साथ जुड़ गया जिससे वाण्िाज्य गतिशील हो गया। मध्यकालीन आ£थक जीवन में मुस्िलम जगत का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने अदायगी और व्यापार व्यवस्था के बढि़या तरीकों को विकसित किया। साख - पत्रों ;सक्क, जो अंग्रेज़्ाी शब्द चैक व हिंदी शब्द साख का मूल हैद्ध और हुंडियों ;बिल आॅपफ एक्सचेंज - ‘सुपफतजा’द्ध का उपयोग व्यापारियों, साहूकारों द्वारा ध्न को एक जगह से दूसरी जगह और एक व्यक्ित से दूसरे व्यक्ित को अंतरित करने के लिए किया जाता था। वाण्िाज्ियक पत्रों के व्यापक उपयोग से व्यापारियों को हर स्थान पर नकद मुद्रा अपने साथ ले जाने से मुक्ित मिल गइर् और इससे उनकी यात्राएँ भी ज़्ाफा भी वेतऩयादा सुरक्ष्िात हो गईं। खलीप्अदा करने अथवा कवियों और चारणों को इनाम देने के लिए सक्क का इस्तेमाल करते थे। यद्यपि व्यापारियों के लिए पारिवारिक व्यापार स्थापित करना अथवा अपने कायो± के संचालन के लिए ग़़्ाुलामों को काम में लगाना एक आम रिवाज था, लेकिन मुजबार् जैसे औपचारिक व्यापारिक प्रबंध् आमतौर पर किए जाते थे, जिनमें निष्िक्रय साझेदार अपनी पूँजी कारोबार के कामों में देश - विदेश पर जाने वाले सिय सौदागरों को सौंप देते थे। लाभ व हानि को किए गए निणर्यों के अनुसार बाँट लिया जाता था। इस्लाम लोगों को ध्न कमाने से नहीं रोकता था, बशतेर् कि वुफछ निषेध् संबंध्ी नियमों का पालन किया जाए। उदाहरण के लिए, ब्याज लेन - देन ;रिबाद्ध गैर - कानूनी थे, हालांकि लोग बड़े चतुराइर्पूणर् तरीकों ;हियालद्ध से सूदखोरी करते थे, जैसे किसी खास किस्म के सिक्कों में उधर लेना और एक अन्य किस्म के सिक्कों से अदायगी करना और मुद्रा - विनिमय ;हुंडी का मूलद्ध पर कमीशन के रूप में छिपे तौर पर ब्याज खा लेना। एक हशार एक रातें ;अलिपफ लैला व लैलाद्ध की कइर् कहानियों में हमें मध्यकालीन मुस्िलम समाज की तस्वीर मिलती है। इन कहानियों में नाविकों, गुलामों, सौदागरों और सरार्पफों जैसे कइर् पात्रों का वणर्न है। विद्या और संस्वृफति जब अन्य लोगों के साथ संपवर्फ में आने पर मुसलमानों के ध£मक और सामाजिक अनुभवों मेंगहराइर् आइर्, तो मुस्िलम समुदाय को अपने ऊपर सोच - विचार करना पड़ा और इर्श्वर ;अल्लाहद्ध और संसार से जुड़े मुद्दों से भी जूझना पड़ा। एक मुसलमान का आदशर् आचरण सबके सामने और अकेले में वैफसा होना चाहिए? सृष्िट रचना का क्या उद्देश्य है और कोइर् व्यक्ित यह वैफसे जान सकता है कि इर्श्वर उसके द्वारा पैदा किए जीवों से क्या चाहता है? कोइर् सृष्िट के रहस्यों कोवैफसे समझ सकता है? इन प्रश्नों के उत्तर विद्वान मुसलमानों से प्राप्त हुए, जिन्होंने समुदाय की सामाजिक पहचान को मज़्ाबूत बनाने के लिए और अपनी बौिक जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए विभ्िान्न प्रकार का ज्ञान प्राप्त और संकलित किया। ध£मक विद्वानों ;उलमाद्ध के लिए व़्ाुफरान से प्राप्त ज्ञान ;इल्मद्ध और पैगम्बर का आदशर् व्यवहार ;सुन्नाद्ध इर्श्वर की इच्छा को जानने का एकमात्रा तरीव़्ाफा है और वह इस विश्व में मागर्दशर्न प्रदान करता है। मध्यकाल में उलमा अपना समय व़्ाुफरान पर टीका ;तपफसीरद्ध़ लिखने और मुहम्मद की प्रामाण्िाक उक्ितयों और कायो± को लेखब( ;हदीथद्ध करने में लगाते थे। वुफछ उलमा ने कमर्कांडों ;इबादतद्ध के ज़्ारिए इर्श्वर के साथ मुसलमानों के संबंध् को नियंत्रिात करने और सामाजिक कायो± ;मुआमलातद्ध के ज़्ारिए बाकी इनसानों के साथ मुसलमानों के संबंधें को नियंत्रिात करने के लिए कानून अथवा शरीआ ;जिसका शाब्िदक अथर् है सीध रास्ताद्ध तैयार करनेका काम किया। इस्लामी कानून तैयार करने के लिए, विध्िवेत्ताओं ने तवर्फ और अनुमान ;व्िाफयासद्ध़का इस्तेमाल भी किया, क्योंकि व़्ाुफरान और हदीथ में हर चीज़्ा प्रत्यक्ष नहीं थी और शहरीकरणके कारण जीवन उत्तरोत्तर जटिल बन गया था। स्रोतों के अथर् - निणर्य और विध्िशास्त्रा के तरीकों के बारे में मतभेदों के कारण आठवीं और नौवीं शताब्दी में कानून की चार शाखाएँ ;मज़्ाहबद्ध बन गईं। ये मलिकी, हनपफी, शपफीइर् और हनबली थीं, जिनमें से प्रत्येक का नाम एक प्रमुख विध्िवेत्ता ;पफव़्ाफीहद्ध के नाम पर रखा गया था, और इनमें से अंतिम शाखा सवार्ध्िक रूढि़वादी थी। शरीआ ने सुन्नी समाज के भीतर सभी संभव कानूनी मुद्दों के बारे में मागर्दशर्न प्रदान किया था, हालांकि यह वाण्िाज्ियक अथवा दाण्िडक और संवैधनिक मुद्दों की अपेक्षा वैयक्ितक स्िथति ;विवाह, तलाक और विरासतद्ध के प्रश्नों के बारे में अध्िक सुस्पष्ट था। 1233 में स्थापित मुस्तनसिरिया मदरसे का आँगन। मकतब में अपनी स्वूफली श्िाक्षा पूरी कर चुके विद्या£थयों के लिए यह मदरसा ‘महाविद्यालय’ था। मदरसे मस्िजदों से जुड़े होते थे लेकिन बड़े मदरसों की अपनी मस्िजद होती थी। व़्ाुफरान शरीप़्ाफ फ्यदि संसार के सभी पेड़ कलम होते और समुद्र स्याही होते और इस तरह सात समुद्र स्याही की पू£त करने के लिए होते, तो भी लिखते - लिखते अल्लाह के शब्द समाप्त न होते।य् ;वुफरान, अध्याय़ 31ए पद 27द्ध नौवीं शताब्दी में चमर्पत्रा पर लिखे व़्ाुफरान का एक पृष्ठ। यह सूरा 18 ‘अल - काप़्ाफ’ ;गुपफाद्ध की शुरुआत है। इसमें मूसा, एपफीसस एवं सिवंफदर के सात सोने वालों ;ज़्ाुल्कर नैनद्ध का उल्लेख करता है। इस कोणीय वूफप़्ाफी लिपि में ध्वनियों कोलाल चिÉ से दिखाया गया है ताकि उच्चारण में मदद मिले। अरबी भाषा में रचित व़्ाुफरान 114 अध्यायों ;सूराओंद्ध मंे विभाजित है, जिनकी लंबाइर् क्रमिक रूप से घटती जाती है। इस प्रकार आख्िारी सूरा सबसे छोटा है। इसका अपवाद केवल पहला सूरा है, जो एक संक्ष्िाप्त प्राथर्ना ;अल - पफतिहा अथवा प्रारंभद्ध है। मुस्िलम परंपरा के अनुसार, व़्ाुफरान उन संदेशों ;रहस्योद्घाटनद्ध का संग्रह है, जो खुदा ने पैगम्बर मुहम्मद को 610 और 632 के बीच की अवध्ि में पहले मक्का में और पिफर मदीना में दिए थे। इन रहस्योद्घाटनों को संकलित करने का कायर् किसी समय 650 में पूरा किया गया था। आज जो सबसे प्राचीन संपूणर् व़्ाुफरान हमारे पास है, वह नौवीं शताब्दी का है। ऐसे बहुत से खंड हैं, जो इससे पुराने हैंऋ जो सबसे पहले के हैं, वे हैं च‘ान के गुंबद और सातवीं शताब्दी के सिक्कों पर उत्कीणर् पद। प्रारंभ्िाक इस्लाम के इतिहास के लिए स्रोत सामग्री के रूप में वुफरान के उपयोग ने वुफछ समस्याएँ प्रस्तुत की़हैं। पहली यह कि यह एक ध्मर्ग्रंथ है, एक ऐसा मूल - पाठ है, जिसमें ध£मक सत्ता निहित है। मुसलमानों का आमतौर पर यह विश्वास है कि खुदा की वाणी ;कलाम अल्लाहद्ध होने के कारण इसे शब्दशः समझा जाना चाहिए, हालाँकि बुिवादी ध्मर्विज्ञानी अध्िक उदार थे और उन्होंने वुफरान की व्याख्या अध्िक उदारता से की।़833 में, अब्बासी खलीप़़्ाफा, अल - मामून ने यह मत लागू किया ;विश्वास अथवा मिहना के मुकद्दमे मेंद्ध कि वुफरान खुदा की वाणी की बजाय उसकी रचना है। दूसरी समस्या यह है कि व़्ाुफरान प्रायः रूपकों में बात करता है और, ओल्ड टेस्टामेंट ;तवरितद्ध के विपरीत, यह घटनाओं का वणर्न नहीं करता, बल्िक केवल उनका उल्लेख करता है। इसलिए, मध्यकालीन मुस्िलम विद्वानों को पैगम्बर मुहम्मद के वचनों के अभ्िालेखों ;हदीथद्ध की सहायता से टीकाओं की रचना करनी पड़ी थी। वुफरान को पढ़ने - समझने के लिए कइर् ़हदीथ लिखे गए। अंतिम रूप लेने से पहले, शरीआ को विभ्िान्न क्षेत्रों के रीति - रिवाज़्ाों पर आधरित कानूनों ;उप़्ार्फद्ध और राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था के बारे में राज्य के कानूनों ;सियासा शरीआद्ध को ध्यान में रखते हुए समायोजित किया गया था। लेकिन देहातों के बहुत बड़े भागों में रीति - रिवाशों पर आधरित कानूनों ने अपनी ताकत बरकरार रखी और ज़्ामीन में बेटियों केउत्तरािाकार जैसे मामलों में शरीआ के पालन से बचते रहे। अध्िकतर शासनों में, शासक और उसके अध्िकारी राज्य की सुरक्षा के मामलों को नियमित रूप से निपटाते थे और केवल वुफछ ही चुने हुए मामले काज़्ाी ;न्यायाध्ीशद्ध के पास भेजते थे। राज्य द्वारा प्रत्येक शहर अथवा बस्ती में नियुक्त किया गया काज़्ाी अक्सर शरीआ का कड़ाइर् से पालन कराने की बजाय विवाद के सम्मत हल पर पहुँच कर एक मध्यस्थ के रूप में कायर् करता था। मध्यकालीन इस्लाम के ध£मक विचारों वाले लोगों का एक समूह बन गया था जिन्हें सूप़्ाफी कहा जाता है। ये लोग तपश्चयार् ;रहबनियाद्ध और रहस्यवाद के ज़्ारिए खुदा का अध्िक गहरा और अध्िक वैयक्ितक ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे। समाज जितना अध्िक भौतिक पदाथो± और सुखों की ओर लालायित होता था, सूप़्ाफी लोग संसार का त्याग ;शु“दद्ध उतना अध्िक करना चाहते थे और केवल खुदा पर भरोसा ;तवक्वुफलद्ध करना चाहते थे। आठवीं और नौवीं शताब्दी में तपश्चयार्एवं वैराग्य की प्रवृिायाँ सवेर्श्वरवाद और प्यार के विचारों द्वारा ऊँचा उठकर रहस्यवाद ;तसव्वुप़फद्धकी ऊँची अवस्था पर पहुँच गईं। सवेर्श्वरवाद इर्श्वर और उसकी सृष्िट के एक होने का विचार है, जिसका अभ्िाप्राय यह है कि मनुष्य की आत्मा को उसके निमार्ता यानी परमात्मा के साथ मिलाना चाहिए। इर्श्वर से मिलन, इर्श्वर के साथ तीव्र प्रेम ;इश्व़्ाफद्ध के जरिए ही प्राप्त किया जा़सकता है। इस इश्वफ का उपदेश एक महिला संत, बसरा़की राबिया ;मृत्यु 891 मेंद्ध द्वारा अपनी शायरी में दिया गया था। बयाज्ि़ाद बिस्तामी ;मृत्यु 875 मेंद्ध, जो एक इर्रानी सूपफी था, पहला व्यक्ित था, जिसने अपने आपको खुदा में़लीन ;प़्ाफनाद्ध करने का उपदेश दिया था। सूप़्ाफी आनंद उत्पन्न करने और प्रेम तथा भावावेश उदीप्त करने के लिए संगीत समारोहों ;समाद्ध का उपयोग करते थे। सूप़्ाफीवाद का द्वार सबके लिए खुला है, चाहे वह किसी भी ध्मर्, हैसियत अथवा ¯लग का हो। ध्ुलनुन मिस्री ;मृत्यु 861 मेंद्ध, जिसकी कब्र आज भी मिस्र में पिरामिडों के निकट देखी जा सकती है, ने अब्बासी खलीप़्ाफा, अल - मुतवक्िकल के सामने यह घोषणा की थी कि ‘उसने सच्चा इस्लाम एक बूढ़ी महिला से, और सच्ची वीरता एक जल - वाहक से सीखी है।’ सूप़्ाफीवाद ने इस्लाम को निजी अिाक, और संस्थात्मक कम बना दिया और इस प्रकार उसने लोकपि्रयता प्राप्त की और रूढि़वादी इस्लाम के समक्ष चुनौती पेश की। इस्लामी दाशर्निकों और वैज्ञानिकों ने यूनानी दशर्न और विज्ञान के प्रभाव में इर्श्वर और विश्व की एक वैकल्िपक कल्पना विकसित की। सातवीं शताब्दी के दौरान, बाइजेंटाइऩतेजी से नाचते हुए दरवेशों़का चित्रा, इर्रानी पांडुलिपि, 1490। नाचने वाले चार पुरुषों में से एक ही के हाथ सही स्िथति में दिखाए गए हैं। इनमें वुफछ चक्कर खाकर गिर गए हैं। उन्हें उठाकर ले जाया जा रहा है। और ससानी साम्राज्यों में पिछली यूनानी संस्वृफति के अवशेष पाए जा सकते थे, हालांकि, वे धीरे - ध्ीरे समाप्त हो रहे थे। सिवंफदरिया, सीरिया और मेसोपोटामिया के स्वूफलों में, जो कभी सिकन्दर के साम्राज्य के भाग थे, अन्य विषयों के साथ - साथ यूनानी दशर्न, गण्िात और चिकित्साकी श्िाक्षा दी जाती थी। उमÕयद और अब्बासी खलीपफाओं ने इर्साइर् विद्वानों से यूनानी औऱसीरियाक भाषा की किताबों का अनुवाद कराया। अल - मामून के शासन में अनुवाद एक सुनियोजित ियाकलाप बन गया था। उसने बग़्ादाद में पुस्तकालय - व - विज्ञान संस्थान ;बायत अल - हिक्माद्ध को, जहाँ विद्वान काम करते थे, सहायता दी थी। अरस्तु की वृफतियों, यूक्िलड की एलीमेंट्स और टोलेमी की पुस्तक एल्मागेस्ट की ओर अरबी पढ़ने वाले विद्वानों का ध्यान दिलाया गया। खगोल विज्ञान, गण्िात और चिकित्सा के बारे में भारतीय पुस्तकों का अनुवाद भी इसी काल में अरबी में किया गया। ये रचनाएँ यूरोप में पहुँची और इनसे दशर्न - शास्त्रा और विज्ञान में रुचि उत्पन्न हुइर्। आदशर् विद्याथीर् बारहवीं शताब्दी के बग़दाद में कानून और चिकित्सा के विषयों के विद्वान अब्द अल - लतीपफ़;।इक ंस.स्ंजप िद्ध अपने आदशर् विद्याथीर् से बात कर रहे हैंः फ्मेरा अनुरोध् है कि आप बिना किसी की सहायता के, केवल पुस्तकों से ही, विज्ञान न सीखें, चाहे आपको समझने की अपनी योग्यता पर भरोसा हो। उन्हें प्रत्येक विषय के लिए, जिसका ज्ञान आप प्राप्त करना चाहते हों, अध्यापकों का सहारा लें, और यदि आपके अध्यापक का ज्ञान सीमित हो, तो जो वुफछ वह दे सकता है उसे प्राप्त कर लें, जब तक आपको उससे योग्य अध्यापक न मिल जाए। आपको अपने अध्यापक का आदर और सम्मान अवश्य करना चाहिए। जब आप कोइर् पुस्तक पढ़ें, तो उसे वंफठस्थ करने और उसके अथर् पर पूणर् अध्िकार प्राप्त कर लें। मान लो कि पुस्तक खो गइर् है और आप उसे छोड़ सकते हैं तब पुस्तक वंफठस्थ होने पर आपका वुफछ नहीं बिगड़ेगा। व्यक्ित को इतिहास की पुस्तवेंफ पढ़नी चाहिए, जीवनियों और राष्ट्रों के अनुभवों का अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने से यह लगेगा कि पढ़ने वाला अपने अल्प जीवन - काल में अतीत के लोगों के साथ रह रहा है। उनके साथ उसके घनिष्ठ संबंध् हैं और उनमें अच्छों और बुरों को पहचानता है। आपको अपना आचरण शुरू के मुसलमानों के आचरण के अनुरूप बनाना चाहिए। इसलिए, पैगम्बर की जीवनी को पढ़ो औरउनके पद - चिÉों पर चलो। आपको अपने स्वभाव के बारे में अच्छी राय रखने की बजाय, उस पर बारंबार अविश्वास करना चाहिए, अपना ध्यान विद्वान लोगों और उनकी वृफतियों पर लगाना चाहिए, बहुत सावधनी से आगे बढ़ना चाहिए और कभी भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।़जिस व्यक्ित ने अध्ययन का दबाव न झेला हो, वह ज्ञान के आनंद का मज़्ाा नहीं ले सकता। जब आपने अपना अध्ययन और चिंतन - मनन पूरा कर लिया हो, तो अपनी जीभ को अल्लाह का नाम लेने के कायर् में व्यस्त रख्िाए और अल्लाह का गुणगान कीजिए। यदि संसार आपकी ओर पीठ मोड़ ले, तो श्िाकायत न करें। यह जान लें कि ज्ञान कभी खत्म नहीं होता, वह पीछे अपनी सुगंध् छोड़ जाता है, जो उसके स्वामी का पता बता देती है ज्ञान प्रकाश और कांति की किरण ज्ञानी पर चमकती रहती है और उसकी ओर संकेत करती रहती है।य् दृ अहमद इब्न अल व़्ाफासिम इब्न अबी उसयबिया, उयून अल अन्बा नए विषयों के अध्ययन ने आलोचनात्मक जिज्ञासा को बढ़ावा दिया और इस्लामी बौिकजीवन पर गहरा प्रभाव डाला। ध्मर् वैज्ञानिक प्रवृिायों वाले विद्वानों जैसे मुतज्ि़ाला के नाम से जाने गए विद्वानों के समूह ने इस्लामी विश्वासों की रक्षा के लिए यूनानी तवर्फ और विवेचना ;कलामद्ध के तरीकों का इस्तेमाल किया। दाशर्निकों ;पफलसिपफाद्ध ने व्यापक प्रश्न प्रस्तुत किए और उनकेनए उत्तर प्रदान किए। इब्न सिना ;980 - 1037द्ध का, जो व्यवसाय की दृष्िट से एक चिकित्सक और दाशर्निक था, यह विश्वास नहीं था कि व़्ाफयामत के दिन व्यक्ित पिफर से ¯जदा हो जाता था। धमर्वैज्ञानिकों ने इसका ज़्ाोरदार विरोध् किया। चिकित्सा संबंध्ी उनके लेख व्यापक रूप से पढ़े जाते थे। उनकी सबसे प्रभावशाली पुस्तक चिकित्सा के सि(ांत ;अल - व़्ाफानून पिफल तिबद्ध थी, जो दस लाख शब्दों वाली पांडुलिपि थी, जिसमें उस समय के औषध्शास्ित्रायों द्वारा बेची जाने वाली 760 औषध्ियों का उल्लेख किया गया है और उसके द्वारा अस्पतालों ;बीमारिस्तानद्ध में किए गए प्रयोगों तथा अनुभवों की जानकारी भी दी गइर् है। इस पुस्तक में आहार - विज्ञान ;आहार के विनियमन के जरिए उपचारद्ध के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। यह बताया गया है कि़जलवायु और पयार्वरण का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, और वुफछ रोगों के संक्रामक स्वरूप की जानकारी दी गइर् है। इस पुस्तक का उपयोग यूरोप में एक पाठ्यपुस्तक के रूप में किया जाता था जहाँ लेखक को एविसेन्ना के नाम से जाना जाता था ;देख्िाए विषय 7द्ध। यह कहा जाता हैकि वैज्ञानिक और कवि उमर खÕयाम अपनी मृत्यु से ठीक पहले यह पुस्तक पढ़ रहे थे। उनकी सोने की दाँत - वुफरेदनी इस पुस्तक के तत्वमीमांसा विषयक अध्याय के दो पृष्ठों के बीच पड़ी मिली थी। मध्यकालीन इस्लामी समाजों में, बढि़या भाषा और सृजनात्मक कल्पना को किसी व्यक्ित के सवार्ध्िक सराहनीय गुणों में शामिल किया जाता था। ये गुण किसी भी व्यक्ित की विचार - अभ्िाव्यक्ित को अदब के स्तर तक ऊँचा उठा देते थे। ‘अदब’ जिसका अथर् है साहित्ियक और सांस्वृफतिक परिष्कार। अदब रूपी अभ्िाव्यक्ितयों में पद्य ;नज़्म अथवा सुव्यवस्िथत विन्यासद्ध और गद्य ;नथ्र अथवा बिखरे हुए शब्दद्ध शामिल थे और यह अपेक्षा की जाती थी कि उन्हें वंफठस्थ कर लिया जाएगा और अवसर आने पर उनका उपयोग किया जाएगा। इस्लाम - पूवर् काल की सबसे अध्िक लोकपि्रय रचना संबोधन गीत ;वफसीदाद्ध था। अपने आश्रयदाताओं की उपलब्िध्यों का गुणगान करने के लिए अब्बासी काल के कवियों द्वारा इस विध का विकास किया गया। प़्ाफारस मूल के कवियों ने अरबी कविता का पुनः आविष्कार किया और उसमें नयी जान पँूफकी और अरबों के सांस्वृफतिक आध्िपत्य को चुनौती दी। अबु नुवास ;मृत्यु 815 मेंद्ध जो प़्ाफारसी मूल का था, ने इस्लाम द्वारा व£जत आनंद मनाने के इरादे से शराब और पुरुष - प्रेम जैसे नए विषयों पर उत्वृफष्ट श्रेणी की कविताओं की रचना करके नया मागर् चुना। अबु नुवास के बाद, कवियों ने अपने अनुराग के पात्रा को पुरुष के रूप में संबोध्ित किया, चाहे वह स्त्राी हो। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए, सूप्ि़ाफयों ने रहस्यवादी प्रेम की मदिरा द्वारा उत्पन्न मस्ती का गुणगान किया। जब अरबों ने इर्रान पर विजय प्राप्त की, तब पहलवी, जो प्राचीन इर्रान की पवित्रा पुस्तकों की भाषा थी, पतन की स्िथति में थी। शीघ्र ही पहलवी का एक और रूप, जिसे नयी पफारसी कहा जाता है, विकसित हुआ, जिसमें अरबी के शब्दों की संख्या बहुत अध्िक थी। खुरासान और तुरान सल्तनतों की स्थापना से नयी पफारसी बड़ी सांस्वृफतिक ऊँचाइयों पर पहुँच गइर्। समानी़राशदरबार के कवि, रुदकी ;मृत्यु 940 मेंद्ध, को नयी प़्ाफारसी कविता का जनक माना जाता थाऋ इस कविता में छोटे गीत - काव्य ;गज़्र्ालद्ध और चतुष्पदी ;रुबाइर्द्ध जैसे नए रूप शामिल थे। रुबाइचार पंक्ितयों वाला छंद होता है, जिसमें पहली दो पंक्ितयाँ भूमिका बाँध् देती हैं, तीसरी पंक्ित बढि़या तरीके से सध्ी होती है, और चैथी पंक्ित मुख्य बात प्रस्तुत करती है। इसके रूप के विपरीत, रुबाइर् की विषय - वस्तु अप्रतिबंध्ित होती है। इसका इस्तेमाल पि्रयतम अथवा प्रेयसी के सौंदयर् का बखान करने, संरक्षक की प्रशंसा करने, अथवा दाशर्निक के विचारों को अभ्िाव्यक्त करने के लिए किया जा सकता है। रुबाइर् ;बहुवचन रुबाइयात हैद्ध उमर खÕयाम के हाथों अपनीपराकाष्ठा पर पहुँच गइर्। उमर खÕयाम ;1048 - 1131द्ध एक खगोल वैज्ञानिक और गण्िातज्ञ भी थे, जो विभ्िान्न समयों पर बुखारा, समरवंफद और इस्पफाहान में रहे थे। ग्याहरवीं शताब्दी के प्रारंभ में, गज़्ानी पफारसी साहित्ियक़जीवन का वेंफद्र बन गया था। कवि स्वाभाविक रूप से शाही दरबारों की चमक - दमक से आक£षत होते थे। शासकों ने भी अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए कलाकारों और विद्वानों कोसंरक्षण देने के महत्त्व को समझ लिया था। गज़्ानी के महमूद ने अपने चारों ओर कवियों का एक समूह एकत्रा कर लिया था, जिन्होंने काव्य - संग्रहों ;दीवानोंद्ध और महाकाव्यों ;मथनवीद्ध की रचना की। इनमें सबसे अध्िक प्रसि( पिफरदौसी ;मृत्यु 1020 मेंद्ध थे, जिन्हें शाहनामा ;राजाओं का जीवनचरितद्ध को पूरा करने में 30 वषर् लग गएऋ इस पुस्तक में 50,000 पद हैं और यह इस्लामी साहित्य की एक श्रेष्ठ वृफति मानी जाती है। शाहनामा परंपराओं और आख्यानों का संग्रह है ;जिनमें सबसे अध्िक लोकपि्रय आख्यान रुस्तम का हैद्ध, जिसमें प्रारंभ से लेकर अरबों की विजय तक इर्रान का चित्राण काव्यात्मक शैली में किया गया है। यह गज़्ानवी परंपरा के अनुरूप ही था कि बाद में भारत में प़्ाफारसी प्रशासन और संस्वृफति की भाषा बन गइर्। बग़्ादाद के एक पुस्तक - विव्रेफता, इब्न नदीम ;मृत्यु 895द्ध की पुस्तक सूची ;किताब अल - पिफहरिस्तद्ध में ऐसी बहुत - सी पुस्तकों का उल्लेख है, जो पाठकों की नैतिक श्िाक्षा और उनके मनोरंजन के लिए लिखी गइर् थीं। इनमें सबसे पुरानी पुस्तक जानवरों की कहानियों का संग्रह है, जिसका नाम कलीला व दिमना ;दो गीदड़ों के नाम, जो उसके मुख्य पात्रा थेद्ध है। यह पुस्तक पंचतंत्रा के पहलवी संस्करण का अरबी अनुवाद है। सबसे अध्िक प्रचलित और स्थायी रचनाएँ वीर - साहसियों की कहानियाँ हैं, जैसे अल - सिवंफदर और सिन्दबाद और दुखी प्रेमियों, जैसे वफायस ;जिसे मजनू यानि कि पागल व्यक्ित कहा जाता थाद्ध की कहानियाँ। ये कहानियाँ कइर् शताब्िदयों में मौख्िाक अथवा लिख्िात परंपराओं के रूप में विकसित हुइर् हैं। ‘एक हज़्ाार एक रातें’ ;थाउजेंड एण्ड वन नाइट्सद्ध कहानियों का एक अन्य संग्रह है। ये कहानियाँ एक ही वाचिका, शहरज़्ााद द्वारा अपने पति को एक के बाद दूसरी रात को सुनाइर् गइर् थीं। ये संग्रह मूल रूप से भारतीय प़्ाफारसी भाषा में था और बगदाद में इसका अनुवाद अरबी भाषा में किया गया था। बाद में मामलुक काल़में काहिरा में इसमें और कहानियाँ जोड़ दी गइर् थीं। ये कहानियाँ विभ्िान्न किस्मों के मनुष्यों - उदार, मूखर्, भोले - भाले और ध्ूतर् मनुष्यों का चित्राण करती हैं और श्िाक्षा देने और मनोरंजन करने के लिए सुनाइर् गइर् थीं। बसरा के जहीज़्ा ;मृत्यु 868 मेंद्ध ने अपनी पुस्तक किताब अल - बुखाला ;वंफजूसों की पुस्तकद्ध में वंफजूसों के बारे में मन बहलाने वाले किस्से इकऋे किए थे और लालच का विश्लेषण किया था। नौवीं शताब्दी से, अदब के दायरे का विस्तार किया गया और उसमें जीवनियों, आचार संहिताओं ;अखलाव़्ाफद्ध, राजवुफमारों को शासनकला की श्िाक्षा देने वाली पुस्तकों और सबसे ऊपर, इतिहास और भूगोल को शामिल किया गया। पढ़े - लिखे मुस्िलम समाजों में इतिहास लिखने की परंपरा अच्छी तरह स्थापित थी। इतिहास की पुस्तवेंफ विद्वानों और विद्या£थयों द्वारा और इनके अलावा अध्िक पढ़े - लिखे लोगों द्वारा पढ़ी जाती थीं। इतिहास शासकों और अध्िकारियों के लिए किसी वंश की की£त बढ़ाने वाले कारनामों और उपलब्िध्यों का अच्छा विवरण और प्रशासन की तकनीकों के उदाहरण प्रस्तुत करता था। इतिहास के दो प्रमुख गं्रथों, बालाध्ुरी ;मृत्यु 892 मेंद्ध के अनसब अल - अशरपफ ;सामंतों की वंशावलियाँद्ध और ताबरी के तारीख अल - रसूल वल मुलुक ;पैगम्बरों और राजाओं का इतिहासद्ध में समूचे मानव इतिहास का वणर्न किया गया है, जिसमें इस्लामी काल वेंफद्र - बिंदु है। स्थानीय इतिहास - लेखन की परंपरा का विकास ख्िालापफत के विघटन के बाद हुआ। इस्लामी जगत की एकता और विविध्ता के अन्वेषण के लिए प़्ाफारसी में वंशों, नगरों और प्रदेशों के बारे में पुस्तवेंफ लिखी गईं।भूगोल और यात्रा वृत्तांत ;रिहलाद्ध अदब की एक विशेष विध बन गए। इनमें यूनानी, इर्रानी और भारतीय पुस्तकों के ज्ञान और व्यापारियों तथा यात्रिायों के विचारों एवं कथनों को शामिल किया गया। गण्िातीय भूगोल में, बसे हुए संसार को भूमध्यरेखा के समानान्तर, हमारे तीन महाद्वीपों के अनुरूप, सात किस्म की जलवायु ;‘क्लाइम’ एकवचन इक्िलमद्ध में विभाजित किया गया। प्रत्येक शहर की बिलवुफल सही स्िथति का निधर्रण खगोल - वैज्ञानिक तरीके से किया गया। मुकदसी ;मृत्यु 1000 मेंद्ध का वणर्नात्मक भूगोल ;अहसान अल - तकसीम अथवा सवोर्त्तम विभाजनद्ध विश्व के सभी देशों के लोगों का तुलनात्मक अध्ययन है और विदेशों के बारे में उठी जिज्ञासाओं को शांत करने वाला खज़्ााना है। विश्व की संस्वृफतियों की व्यापक विविध्ता दशार्ने के लिए मसूदी की ;943 में लिखीद्ध पुस्तक मुरुज अल - धहाब ;स्व£णम घासस्थलीद्ध में भूगोल और सामान्य इतिहास को मिला दिया गया था। अल्बरुनी की प्रसि( पुस्तक तहवफीवफ मा लिल - हिंद ;भारत का इतिहासद्ध ग्याहरवीं शताब्दी के एक मुस्िलम लेखक का इस्लाम की दुनिया से बाहर देखने और यह जानने का सबसे बड़ा प्रयास था कि एक अन्य सांस्वृफतिक परंपरा में क्या चीज़्ा कीमती है। दसवीं शताब्दी तक एक ऐसी इस्लामी दुनिया उभर आइर् थी, जिसे यात्राी आसानी से पहचान सकते थे। ध£मक इमारतें इस दुनिया की सबसे बड़ी बाहरी प्रतीक थीं। स्पेन से मध्य एश्िाया तक पैफली हुइर् मस्िजदें, इबादतगाह और मकबरों का बुनियादी नमूना एक जैसा था - मेहराबें, गुम्बद, मीनार और खुले सहन और ये इमारतें मुसलमानों की आध्यात्िमक और व्यावहारिक जरूरतों को अभ्िाव्यक्त करती थीं। इस्लाम की पहली़शताब्दी में, मस्िजद ने एक विश्िाष्ट वास्तुश्िाल्पीय रूप ;खंभों के सहारे वाली छतद्ध प्राप्त कर लिया था जो प्रादेश्िाक विभ्िान्नताओं से परे था। मस्िजद में एक खुला 8वीं शताब्दी, पिफलिस्तीन के ख्िारबत - अल - मप़्ाफजर महल के स्नानगृह का पफशर्। इस़पर सुन्दर पच्चीकारी की गइर् है। कल्पना कीजिए कि इस पेड़ पर खलीपफा़विराजमान है। नीचे दिए गए दृश्य में शांति व यु( का चित्राण किया गया है। इस्लामी सजावटी प्रतिभा धातु - वस्तुओं की कला में पूरी तरह प्रकट हुइर्। इन धातु वस्तुओं को अच्छी तरह सुरक्ष्िात रखा गया है। 14वीं शताब्दी, सीरिया की एक मस्िजद के दीपक पर प्रसि( ‘प्रकाश’ पद अंकित है। ‘इर्श्वर स्वगर् और ध्रती का नूर है उसका प्रकाश दीपक ;मिस्बहद्ध वाले आले ;मिश्कतद्ध के समान है। चिराग़्ा शीशे के अंदर है जो चमकते हुए सितारे की तरह दिखाइर् देता है जो सौभाग्यशाली जैतून के वृक्ष से प्रदीप्त है जो न तो पूवीर् है और न पश्िचमी जिसका तेल हमेशा चमकता रहेगा चाहे उसे कोइर् अग्िन स्पशर् न करे।’ ;व़्ाुफरान, अध्याय 24, पद 35द्ध 102 विश्व इतिहास के वुफछ विषय प्राँगण सहन होता था, जहाँ पर एक पफव्वारा अथवा जलाशय बनाया जाता था और यह प्राँगणएक बड़े कमरे की ओर खुलता, जिसमें प्राथर्ना करने वाले लोगों की लंबी पंक्ितयों और प्राथर्ना;नमाज़्ाद्ध का नेतृत्व करने वाले व्यक्ित ;इमामद्ध के लिए पयार्प्त स्थान होता था। बड़े कमरे कीदो विशेषताएँ थीं जो आज तक महत्त्वपूणर् हैंः दीवार में एक मेहराब, जो मक्का ;किबलाद्ध की दिशा का संकेत देती है और एक मंच ;मिम्बरद्ध जहाँ से शुक्रवार को दोपहर की नमाज़्ा के समय प्रवचन दिए जाते हैं। इमारत में एक मीनार जुड़ी होती है जिसका उपयोग नियत समयों पर प्राथर्नाहेतु लोगों को बुलाने के लिए किया जाता है। मीनार नए ध्मर् के अस्ितत्व का प्रतीक है। शहरोंऔर गाँवों में लोग समय का अंदाजा पाँच दैनिक प्राथर्नाओं और साप्ताहिक प्रवचनों की सहायतासे लगाते थे।वेंफद्रीय प्राँगण ;इवानद्ध के चारों ओर नि£मत इमारतों के निमार्ण का वही स्वरूप न केवलमस्िजदों और मकबरों में, बल्िक कापिफलों की सरायों, अस्पतालों और महलों में भी पाया जाताथा। उमÕयदों ने नखलिस्तानों में ‘मरुस्थली महल’ बनाए, जैसे पिफलिस्तीन में ख्िारबत अल - मपफजरऔर जोडर्न में वु़फसाइर्र अमरा, जो ठाठदार और विलासपूणर् निवास - स्थानों और श्िाकार औरमनोरंजन के लिए विश्राम - स्थलों के रूप में काम आते थे। महलों को, जो रोमन और ससानीवास्तुश्िाल्प के तरीके से बनाए गए थे, लोगों के चित्रों, प्रतिमाओं और पच्चीकारी से भव्य रूपसे सजाया जाता था। अब्बासियों ने समरा में बागों और बहते हुए पानी के बीच एक नया शाहीशहर बनाया जिसका िाक्र हारुन - अल - रशीद ;भ्ंतनद ंस.त्ंेीपकद्ध से जुड़ी कहानियों औरआख्यानों में किया जाता है। बग़्ादाद में अब्बासियों के विशाल महल अथवा काहिरा में पफातिमियोंके महल लुप्त हो गए हैंऋ और अब केवल साहित्ियक पुस्तकों में उनका संकेत मिलता है।इस्लामी ध£मक कला में प्राण्िायों के चित्राण की मनाही से कला के दो रूपों को बढ़ावा मिलाःखुशनवीसी ;खत्ताती अथवा सुन्दर लिखने की कलाद्ध और अरबेस्क ;ज्यामितीय और वनस्पतीयडिज़्ााइनद्ध। इमारतों ;वास्तुश्िाल्पद्ध को सजाने के लिए आमतौर पर ध£मक उ(रणों का छोटे औरबड़े श्िालालेखों में उपयोग किया जाता था। वुफरान की आठवीं और नौवीं शताब्िदयों कीपांडुलिपियों में खुशनवीसी की कला को सवोर्त्तम रूप में सुरक्ष्िात रखा गया है। किताब अल - अघानी ;गीत पुस्तकद्ध, कलीला व दिमना और हरिरी की मकामात, जैसी साहित्ियक वृफतियोंको लघुचित्रों से सजाया गया था। इसके अलावा, पुस्तक के सौंदयर् को बढ़ाने के लिए चित्रावली कीबहुत सी किस्मों की तकनीवेंफ शुरू की गइर् थीं। इमारतों और पुस्तकों के चित्राण में उद्यान कीकल्पना पर आधरित पौधें और पूफलों के नमूनों का उपयोग किया जाता था।जिन इस्लामी क्षेत्रों का हमने अध्ययन किया है उनके इतिहास में मानव सभ्यता केतीन पहलू महत्त्वपूणर् रहे हैंः धमर्, समुदाय एवं राजनीति। इन्हें हम तीन गोले मान सकतेहैं। सातवीं शताब्दी में ये तीनों गोले एक - दूसरे पर इस तरह बैठे हुए थे कि वह सब एकगोला ही लगते थे। अगली पाँच शताब्िदयों में ये गोले अलग - अलग हो गए। 1200 तकआते - आते इस्लाम का प्रभाव राज्य व सरकार पर न्यूनतम हो गया। इस काल में राजनीतिसे कइर् ऐसी चीज़्ों जुड़ गइर्ं जिनकी कोइर् धा£मक वैधता नहीं थी ;जैसे राजतंत्रा कीसंस्था, गृहयु( आदिद्ध। लेकिन अभी भी धमर् व समुदाय के गोले एक ही थे। निजीमामलों और रीतियों में शरीया से मुस्िलम समुदाय प्रभावित था और यह बात उसकीएकता का महत्त्वपूणर् कारण भी था। इस्लाम के धा£मक वुफलीन शासन नहीं चलारहे थे ;राजनीति का गोला भ्िान्न थाद्ध, लेकिन वे धा£मक अस्िमता को परिभाष्िातकर रहे थे। धमर् व समुदाय के गोलों का अलग होना मुस्िलम समाज के क्रमिकसांसारीकरण ;ैमबनसंतपेंजपवदद्ध के ज़्ारिए ही संभव था। वुफछ दाशर्निक व सूप़्ाफी ऐसे सांसारीकरण की सलाह देते थे। उनका सुझाव था कि नागरिक समाज को धमर् से स्वतंत्राहो जाना चाहिए और रीतियों व कमर्कांडों की जगह निजी आध्यात्िमकता को ले लेनीचाहिए। अभ्यास 1ण् सातवीं शताब्दी के आरंभ्िाक दशकों में बेदुइओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं? 2ण् ‘अब्बासी क्रांति’ से आपका क्या तात्पयर् है? 3ण् अरबों, इर्रानियों व तुको± द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृतियों के उदाहरण दीजिए? 4ण् यूरोप व एश्िाया पर ध्मर्यु(ों का क्या प्रभाव पड़ा? 5ण् रोमन साम्राज्य के वास्तुकलात्मक रूपों से इस्लामी वास्तुकलात्मक रूप वैफसे भ्िान्न थे? 6ण् रास्ते पर पड़ने वाले नगरों का उल्लेख करते हुए समरवंफद से दमिश्क तक की यात्रा का वणर्न कीजिए।

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