विषय लेखन कला और शहरी जीवन 2 शहरी जीवन की शुरुआत मेसोपोटामिया’ में हुइर् थी। पफरात़;म्नचीतंजमेद्ध और दजला़;ज्पहतपेद्ध नदियों के बीच स्िथत यह प्रदेश आजकल इराक गणराज्य का हिस्सा है। मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी संपन्नता, शहरी जीवन, विशाल एवं समृ( साहित्य, गण्िात और खगोलविद्या के लिए प्रसि( है। मेसोपोटामिया की लेखन - प्रणाली और उसका साहित्यपूवीर् भूमध्यसागरीय प्रदेशों और उत्तरी सीरिया तथा तुकीर् में 2000 इर्.पू. के बाद पैफला, जिसकेपफलस्वरूप उस समस्त क्षेत्रा के राज्यों के बीच आपस में, यहाँ तक कि मिड्ड के प़्ाफराओ ;च्ींतंवीद्ध के साथ भी मेसोपोटामिया की भाषा और लिपि में लिखा - पढ़ी होने लगी। यहाँ हम शहरी जीवन और लेखन के बीच के संबंधें की खोज करने का प्रयत्न करेंगे और पिफर यह जानना चाहेंगे कि लेखन की सतत परंपरा से क्या - क्या प्रतिपफल प्राप्त हुए। अभ्िालिख्िात इतिहास के आरंभ्िाक काल में, इस प्रदेश को मुख्यतः इसके शहरीवृफत दक्ष्िाणी भाग को ;नीचे विवरण देखेंद्ध सुमेर ;ैनउमतद्ध और अक्कद ;।ाांकद्ध कहा जाताथा। 2000 इर्.पू. के बाद जब बेबीलोन एक महत्त्वपूणर् शहर बन गया तब दक्ष्िाणी क्षेत्रा कोबेबीलोनिया कहा जाने लगा। लगभग 1100 इर्.पू. से, जब असीरियाइयों ने उत्तर में अपना राज्य स्थापित कर लिया, तब उस क्षेत्रा को असीरिया ;।ेेलतपंद्ध कहा जाने लगा। उस प्रदेश की प्रथम ज्ञात भाषा सुमेरियन यानी सुमेरी थी। ध्ीरे - ध्ीरे 2400 इर्.पू. के आसपास जब अक्कदी भाषी लोग यहाँ आ गए तब अक्कदी ने सुमेरी भाषा का स्थान ले लिया। अक्कदी भाषा सिवंफदर के समय ;336 - 323 इर्.पू.द्ध तक वुफछ क्षेत्राीय परिवतर्नों के साथ पफलती - पूफलती रही। 1400 इर्.पू. से ध्ीरे - ध्ीरे अरामाइक ;।तंउंपबद्ध भाषा का भी प्रवेश शुरू हुआ। यह भाषा हिब्रू से मिलती - जुलती थी और 1000 इर्.पू. के बाद व्यापक रूप से बोली जाने लगी थी। यह आज भी इराक के वुफछ भागों में बोली जाती है। मेसोपोटामिया में पुरातत्त्वीय खोजों की शुरुआत 1840 के दशक में हुइर्। वहाँ एक या दो स्थलों पर ;जैसे उरुक और मारी में, जिन पर आगे चचार् करेंगेद्ध उत्खनन कायर् कइर् दशकों तक चलता रहा। ;भारत में किसी भी स्थल पर इतने लंबे अरसे तक खुदाइर् की कोइर् परियोजना नहीं चली।द्ध इन खुदाइयों के पफलस्वरूप आज हम इतिहास के स्रोतों के रूप में सैकड़ों की संख्या में इमारतों, मू£तयों, आभूषणों, कब्रों, औज़्ाारों और मुद्राओं का ही नहीं बल्िक हज़्ाारों की संख्या में लिख्िात दस्तावेज़्ाों का भी अध्ययन कर सकते हैं।यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया इसलिए महत्त्वपूणर् था क्योंकि बाइर्बल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ मंे इसका उल्लेख कइर् संदभोर् में किया गया है। उदाहरण के लिए, ओल्ड टेस्टामेंट की ‘बुक आॅपफ जेनेसिस’ ;ठववा व िळमदमेपेद्ध में ‘श्िामार’ ;ेीपउंतद्ध का उल्लेख है जिसका तात्पयर् अथार्त् सुमेर ईंटों से बने शहरों की भूमि से है। यूरोप के यात्राी और विद्वज्जन मेसोपोटामिया को एक तरह से अपने पूवर्जों की भूमि मानते थे, और जबइस क्षेत्रा में पुरातत्त्वीय खोज की शुरुआत हुइर् तो ओल्ड टेस्टामेंट के अक्षरशः सत्य को सि( करने का प्रयत्न किया गया। उन्नीसवीं सदी के मध्य से, मेसोपोटामिया के अतीत को खोजे जाने के उत्साह में कभी कोइर् कमी नहीं आइर्। सन 1873 में एक बि्रटिश सामाचार - पत्रा ने बि्रटिश म्यूज्ि़ायम द्वारा ’मेसोपोटामिया नाम यूनानी भाषा के दो शब्दों मेसोस ;डमेवेद्ध यानी मध्य और पोटैमोस ;च्वजंउवेद्ध यानी नदी से मिलकर बना है। इसलिए ‘मेसोपोटामिया शब्द दशला प़्ाफरात नदियों केबीच की ऊपजाऊ ध्रती को इंगित करता है। बाइर्बल के अनुसार यहजलप्लावन पृथ्वी पर संपूणर्जीवन को नष्ट करने वालाथा। ¯कतु परमेश्वर नेजलप्लावन के बाद भीजीवन को पृथ्वी परसुरक्ष्िात रखने के लिएनोआ ;छंवीद्ध नाम के एक मनुष्य को चुना। नोआ नेएक बहुत विशाल नावबनायी और उसमें सभीजीव - जंतुओं का एक - एकजोड़ा रख लिया और जबजलप्लावन हुआ तो बाकीसब वुफछ नष्ट हो गया परनाव में रखे सभी जोड़ेसुरक्ष्िात बच गए। ऐसी हीएक कहानी मेसोपोटामियाके परंपरागत साहित्य में भीमिलती हैऋ इस कहानी केमुख्य पात्रा को ‘ज्ि़ाउसूद्र’ प्रारंभ किए गए खोज अभ्िायान का खचर् उठाया जिसके अंतगर्त मेसोपोटामिया में एक ऐसी पिðका ;ज्ंइसमजद्ध की खोज की जानी थी जिसपर बाइर्बल में उल्िलख्िात जलप्लावन ;थ्सववकद्ध की कहानी का अंकन था। 1960 के दशक तक यह समझा जाता था कि ओल्ड टेस्टामेंट की कहानियाँ अक्षरशःसही नहीं हंै लेकिन ये इतिहास में हुए महत्त्वपूणर् परिवतर्नों के अतीत को अपने ढंग सेअभ्िाव्यक्त करती हैं। ध्ीरे - ध्ीरे, पुरातािवक तकनीवेंफ अध्िकाध्िक उन्नत और परिष्वृफत होती गईं। इसके अलावा भ्िान्न - भ्िान्न पहलुओं पर ध्यान दिया जाने लगा, यहाँ तक कि आम लोगों के जीवन की भी परिकल्पना की जाने लगी। बाइर्बल की कहानियों की अक्षरशः सच्चाइर् को प्रमाण्िात करने का कायर् गौण हो गया। आगे के अनुभागों में हम जिन बातों पर चचार् करेंगे उनमें से अध्िकांश इन परवतीर् अध्ययनों पर आधरित हैं। अरलसागर काला सागर वैफस्िपयन तुकीर् सागर सीरियाप्लेबनान;र्पनेनकतंद्ध या मारी ‘उतनापिष्िटम’ भूमध्यसागर इर्रान;न्जदंचपेीजपउद्ध कहाजाता था। बेबीलोनउरूक मानचित्रा 1: पश्िचम एश्िाया। उर मिस्र अरबी रेगिस्तानपफारस की खाड़ी़अरब सागरपवर्त श्रेण्िायाँ मेसोपोटामिया और उसका भूगोल इराक भौगोलिक विवध्ता का देश है। इसके पूवोर्त्तर भाग में हरे - भरे, ऊँचे - नीचे मैदान हैं जोधीरे - ध्ीरे वृक्षाच्छादित पवर्त - शृंखला के रूप में पैफलते गए हैं। साथ ही यहाँ स्वच्छ झरने तथा जंगली पूफल हैं। यहाँ अच्छी प़्ाफसल के लिए पयार्प्त वषार् हो जाती है। यहाँ 7000 से6000 इर्.पू. के बीच खेती शुरू हो गइर् थी। उत्तर में उँफची भूमि है जहाँ ‘स्टेपी’ - घास के मैदान हैं, यहाँ पशुपालन खेती की तुलना में आजीविका का अध्िक अच्छा साध्न है। स£दयों की वषार् के बाद, भेड़ - बकरियाँ यहाँ उगने वाली छोटी - छोटी झाडि़यों और घास से अपना भरण - पोषण करती हैं। पूवर् में दज़्ाला की सहायक नदियाँ इर्रान के पहाड़ी प्रदेशों में जाने के लिए परिवहन का अच्छा साध्न हैं। दक्ष्िाणी भाग एक रेगिस्तान है और यही वह स्थान है जहाँ सबसे पहले नगरों और लेखन - प्रणाली का प्रादुभार्व हुआ ;नीचे देख्िाएद्ध। इन रेगिस्तानों में शहरों के लिए भरण - पोषण का साध्न बन सकने की क्षमता थी। क्योंकि पफरात और दज़्ाला नाम की नदियाँ उत्तरी़पहाड़ों से निकलकर अपने साथ उपजाउफ बारीक मि‘ी लाती रही हंै। जब इन नदियों में बाढ़ आतीहै अथवा जब इनके पानी को ¯सचाइर् के लिए खेतों में ले जाया जाता है तब यह उपजाऊ मिट्टðी वहाँ जमा हो जाती है। मानचित्रा 2रू मेसोपोटामियाμ पवर्त, स्टेपी, रेगिस्तान, दक्ष्िाण का सिंचित क्षेत्रा। असीरिया निनवेह नीमरूद अस्सुर मारी बगदाद बेबीलोन तेल अबु सलाबिखमरुस्थल उरुक वृफष्िा उत्पादकता का प्रदेश ;¯सचितद्धवषार् ¯सचित वृफष्िा प्रदेश की दक्ष्िाणी सीमापवर्तीय क्षेत्रा उर खाड़ी प़्ाफरात नदी रेगिस्तान में प्रवेश करने के बाद कइर् धराओं में बँटकर बहने लगती है। कभी - कभी इन धराओं में बाढ़ आ जाती है और पुराने जमाने में ये धराएँ सिंचाइर् की नहरों का काम देती थीं। इनसे आवश्यकता पड़ने पर गेहूँ, जौ और मटर या मसूर के खेतों की ¯सचाइर् की जाती थी। रोम साम्राज्य ;विषय 3द्ध सहित सभी पुरानी व्यवस्थाओं में दक्ष्िाणी मेसोपोटामिया की खेती सबसे ज़़्यादा उपज देने वाली हुआ करती थी। हालांकि वहाँ पफसल उपजाने के लिए आवश्यक वषार् की वुफछ कमी रहती थी।खेती के अलावा भेड़ - बकरियाँ स्टेपी घास के मैदानों, पूवोर्त्तरी मैदानों और पहाड़ों के ढालों पर पाली जाती थीं ;ये उपजाउफ स्थान बाढ़ की नदियों से कापफी उँफचाइर् पर स्िथत थेद्ध, जिनसे भारी मात्रा में मांस, दूध् और उफन आदि वस्तुएँ मिलती थीं। इसके अलावा, नदियों में मछलियों की कोइर् कमी नहीं थी और गमिर्यों में खजूर के पेड़ खूब पफल ;पिंड खजूरद्ध देते थे। लेकिन हमें यह सोचने की गलती नहीं करनी चाहिए कि शहरों का विकास केवल ग्रामीण समृि के बल पर ही हुआ था। इस विकास के अन्य कारकों के विषय में हम बारी - बारी से चचार् करेंगे, लेकिन पहले हमें शहरी जीवन के बारे में स्पष्ट जानकारी लेनी चाहिए। मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का निमार्ण कांस्य युग यानी लगभग 3000 इर्.पू. में शुरू हो गया था। काँसा, ताँबे और राँगे के मिश्रण से बनता है। काँसे के इस्तेमाल का मतलब है कि ये धातुएँ दूर - दूर से मंगाइर् जाती थीं। बढ़इर् का सही काम करने, मनकों में छेद करने, पत्थर की मुद्राएँ उकेरने, पफनीर्चर में जड़ने, सीपियाँ काटने आदि कामों के लिए धतु के औज़्ाारों की जरूरत पड़ती थी। मेसोपोटामियाइर् हथ्िायार भी काँसे के ही होते थेऋ उदाहरण के लिए, भालों की नोवेंफ काँस्य की बनी होती थीं जिन्हें हम पृष्ठ 38 पर देख सकते हैं। शहरीकरण का महत्त्व शहर और नगर बड़ी संख्या में लोगों के रहने के ही स्थान नहीं होते थे। जब किसी अथर्व्यवस्थामें खाद्य उत्पादन के अतिरिक्त अन्य आथ्िार्क गतिविध्ियाँ विकसित होने लगती है तब किसी एकस्थान पर जनसंख्या का घनत्व बढ़ जाता है। इसके पफलस्वरूप कस्बे बसने लगते हैं। ऐसीपरिस्िथति में लोगों का कस्बों में इकऋे रहना उनके लिए पफायदेमंद सि( होता है। विशेषतःइसलिए क्योंकि शहरी अथर्व्यवस्थाओं में खाद्य उत्पादन के अलावा व्यापार, उत्पादन औरतरह - तरह की सेवाओं की भी महत्त्वपूणर् भूमिका होती है। नगर के लोग आत्मनिभर्र नहीं रहतेऔर उन्हें नगर या गाँव के अन्य लोगों द्वारा उत्पन्न वस्तुओं या दी जाने वाली सेवाओं के लिएउन पर आश्रित होना पड़ता है। उनमें आपस में बराबर लेन - देन होता रहता है। उदाहरण के लिए,एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले को पत्थर उकेरने के लिए काँसे के औज़्ाारों की जरूरत पड़तीहैऋ वह स्वयं ऐसे औज़्ाार नहीं बना सकता और वह यह भी नहीं जानता कि मुद्राओं के लिएआवश्यक रंगीन पत्थर वह कहाँ से प्राप्त करे। उसकी विशेषज्ञता तो सिपर्फ नक्वफाशी यानी पत्थरउकेरने तक ही सीमित होती है, वह व्यापार करना नहीं जानता। काँसे के औज़्ाार बनाने वाला भीधतु - ताँबा या राँगा ;टिनद्ध लाने के लिए खुद बाहर नहीं जाता। साथ ही, उसे ईंध्न के लिए हरदमलकड़ी के कोयले की ज़्ारूरत रहती है। इस प्रकार श्रम - विभाजन ;क्पअपेपवद व िस्ंइवनतद्ध शहरी - जीवन की विशेषता है।इसके अलावा, शहरी अथर्व्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना भी जरूरी है। शहरीविनिमार्ताओं के लिए ईंध्न, धतु, विभ्िान्न प्रकार के पत्थर, लकड़ी आदि जरूरी चीज़्ों भ्िान्न - भ्िान्नजगहों से आती हंै जिनके लिए संगठित व्यापार और भंडारण की भी आवश्यकता होती है। शहरोंमंे अनाज और अन्य खाद्य - पदाथर् गाँवों से आते हैं और उनके संग्रह तथा वितरण के लिए व्यवस्थाकरनी होती है। इसके अलावा और भी अनेक प्रकार के ियाकलापों में तालमेल बैठाना पड़ताहैः मुद्रा काटने वालों को केवल पत्थर ही नहीं, उन्हें तराशने के लिए औज़्ाार और बतर्न भीचाहिए। जाहिर है कि ऐसी प्रणाली में वुफछ लोग आदेश देते हैं और दूसरे उनका पालन करतेहैं। इसके अलावा, शहरी अथर्व्यवस्था को अपना हिसाब - किताब लिख्िात रूप में रखना होता है। वाकार् शीषर् 3000 इर्.पू. उरुक नगर में स्त्राी का यह सिर एक सप़्ोफद संगमरमर को तराशकर बनाया गया था। इसकी आँखों और भौंहों में क्रमशः नीले लाजवदर् ;स्ंचपे सं्रनसपद्ध तथा सपेफद सीपी और काले डामऱ;ठपजनउमदद्ध की जड़ाइर् की गइर् होगी। सिर के उफपर एक खाँचा बना हुआ है जो शायद गहना पहनने के लिए बनाया गया था। यह मूतिर्कला का एक विश्व - प्रसि( नमूना है, इसके मुख, ठोड़ी और गालों की सुकोमल - संुदर बनावट के लिए इसकी प्रशंसा की जाती है। यह एक ऐसे कठोर पत्थर में तराशा गया है जिसे कापफी अध्िक दूरी से लाना पड़ा होगा। पत्थर लाने से लेकर इस मू£त के निमार्ण में और किन विशेषज्ञों का योगदान रहा होगा। उनकी सूची बनाइए। शहरों में माल की आवाजाही मेसोपोटामिया के खाद्य - संसाध्न चाहे कितने भी समृ( रहे हों, उसके यहाँ खनिश - संसाध्नों काअभाव था। दक्ष्िाण के अध्िकांश भागों में औज़्ाार, मोहरें ;मुद्राएँद्ध और आभूषण बनाने के लिएपत्थरों की कमी थी। इराकी खजूर और पोपलार के पेड़ों की लकड़ी, गाडि़याँ, गाडि़यों के पहिएया नावें बनाने के लिए कोइर् खास अच्छी नहीं थीऋ और औजार, पात्रा, या गहने बनाने के लिए़कोइर् धतु वहाँ उपलब्ध् नहीं थी। इसलिए हमारे विचार से प्राचीन काल के मेसोपोटामियाइर् लोगसंभवतः लकड़ी, ताँबा, राँगा, चाँदी, सोना, सीपी और विभ्िान्न प्रकार के पत्थरों को तुकीर् और इर्रानअथवा खाड़ी - पार के देशों से मंगाते थे जिसके लिए वे अपना कपड़ा और वृफष्िा - जन्य उत्पादकापफी मात्रा में उन्हें नियार्त करते थे। इन देशों के पास खनिज संसाध्नों की कोइर् कमी नहीं थी, मगरवहाँ खेती करने की बहुत कम गंुजाइश थी। इन वस्तुओं का नियमित रूप से आदान - प्रदान तभी संभवहोता जबकि इसके लिए कोइर् सामाजिक संगठन हो जो विदेशी अभ्िायानों और विनिमयों को निदेर्श्िातकरने में सक्षम हो। दक्ष्िाणी मेसोपोटामिया के लोगों ने ऐसे संगठन स्थापित करने की शुरुआत की।श्िाल्प, व्यापार और सेवाओं के अलावा, वुफशल परिवहन व्यवस्था भी शहरी विकास के लिएअत्यंत महत्त्वपूणर् होती है। भारवाही पशुओं की पीठ पर रखकर या बैलगाडि़यों में डालकर शहरोंमें अनाज या काठ कोयला लाना - ले जाना बहुत कठिन होता है क्योंकि उसमें बहुत ज़्यादा समय लगताहै और पशुओं के चारे आदि पर भी कापफी खचर् आता है। शहरी अथर्व्यवस्था इसका बोझ उठानेके लिए सक्षम नहीं होती। इसलिए परिवहन का सबसे सस्ता तरीका सवर्त्रा जलमागर् ही होता है।अनाज के बोरों से लदी हुइर् नावें या बजरे, नदी की धरा अथवा हवा के वेग से चलते हैं, जिसमेंकोइर् खचार् नहीं लगता, जबकि जानवरों से माल की ढुलाइर् की जाए तो उन्हें चारानगर का जो विवरण दिया गया है उसे पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्लेखन कला का विकास संकेतों या चिÉांे के रूप में प्रस्तुत की जाती हंै।मेसोपोटामिया में जो पहली पिðकाएँ ;ज्ंइसमजद्ध पाइर् गइर् हैं वे लगभग 3200 इर्.पू. की हैं। उनमें चित्रा जैसे चिÉऔर संख्याएँ दी गइर् हैं। वहाँ बैलों, मछलियों और रोटियोंआदि की लगभग 5000 सूचियाँ मिली हैं, जो वहाँ केदक्ष्िाणी शहर उरुक के मंदिरों में आने वाली और वहाँ सेबाहर जाने वाली चीज़्ाों की होंगी। स्पष्टतः, लेखन कायर् तभी शुरू हुआ जब समाज को अपने लेन - देन का स्थायीहिसाब रखने की ज़्ारूरत पड़ी क्योंकि शहरी जीवन में लेन - देनअलग - अलग समय पर होते थे, उन्हें करने वाले भी कइर् लोगहोते थे और सौदा भी कइर् प्रकार के माल के बारे मेंहोता था। एक चिकनी मि‘ी की प‘िका जो दोनों ओर कीलाक्षरों में लिखी हुइर् है। यह एक गण्िातीय अभ्यास है। प‘िका के अग्रभाग में सबसे ऊपर एक त्रिाभुज और उसके आर - पार वुफछ रेखाएँ अंकित हैं। आप देखेंगे कि अक्षर मि‘ी में दबाकर अंकित किए गए हैं। क्यूनीप़्ाफामर्’ ;कीलाकारद्ध लातिनी शब्द क्यूनियस जिसका अथर् ‘खूँटी’ और प़्ाफोमार् जिसका अथर् ‘आकार’ है, से बना है। 34 विश्व इतिहास के वुफछ विषय मेसोपोटामिया के लोग मिट्टðी की पिðकाओं पर लिखा करते थे। लिपिक चिकनी मिट्टðी को गीला करता था और पिफर उसको गूंध् कर और थापकर एक ऐसे आकार की पट्टðी का रूप दे देता था जिसे वह आसानी से अपने एक हाथ में पकड़ सके। वह सावधनीपूवर्क उसकी सतहों को चिकना बना लेता था पिफर सरवंफडे की तीली की तीखी नोक से वह उसकी नम चिकनी सतहपर कीलाकार चिÉ ;बनदमपवितउ’द्ध बना देता था। जब ये पिðकाएँ ध्ूप में सूख जाती थीं तो पक्की हो जाती थीं और वे मि‘ी के बतर्नों जैसी ही मज़्ाबूत हो जाती थीं। जब उन पर लिखा हुआ कोइर् हिसाब, जैसे धतु के टुकड़े सौंपने का हिसाब असंगत या गैर - ज़्ारूरी हो जाता तो उस पिðका को पंेफक दिया जाता था। ऐसी प‘ी जब एक बार सूख जाती थी तो उस पर कोइर् नयाचिÉ या अक्षर नहीं लिखा जा सकता था। इस प्रकार प्रत्येक सौदे के लिए चाहे वह कितना ही छोटा हो, एक अलग प‘िका की जरूरत होती थी। इसीलिए मेसोपोटामिया के खुदाइर् स्थलों पर सैकड़ों प‘िकाएँ मिली हैं। और इस ड्डोत - संपदा के कारण ही आज हम मेसोपोटामिया के बारे में इतना वुफछ जानते हैं। लगभग 2600 इर्.पू. के आसपास वणर् कीलाकार हो गए और भाषा सुमेरियन थी। अब लेखन का इस्तेमाल हिसाब - किताब रखने के लिए ही नहीं, बल्िक शब्द - कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्रदान करने, राजाओं के कायो± का वणर्न करने और कानून में उन परिवतर्नों को उद्घोष्िात करने के लिए किया जाने लगा जो देश की आम जनता के लिए बनाए जाते थे। मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन का स्थान, 2400 इर्.पू. के बाद, धीरे - धीरे अक्कदी भाषा ने ले लिया। अक्कदी भाषा में कीलाकार लेखन का रिवाज इर्सवी सन् की पहली शताब्दी तक अथार्त् 2000 से अध्िक वषो± तक चलता रहा। लेखन प्रणाली जिस ध्वनि के लिए कीलाक्षर या कीलाकार चिÉ का प्रयोग किया जाता था वह एक अकेला व्यंजन या स्वर नहीं होता था ;जैसे अंग्रेजी वणर्माला में उ या ंद्ध लेकिन अक्षर ;ैलससंइसमेद्ध होते थे ;जैसे अंग्रेजी में .चनज.ए या .सं.या .पद.द्ध। इस प्रकार, मेसोपोटामिया के लिपिक कोसैकड़ों चिÉ सीखने पड़ते थे और उसे गीली प‘ी पर उसके सूखने से पहले ही लिखना होता था। लेखन कायर् के लिए बड़ी वुफशलता की आवश्यकता होती थी, इसलिए लिखने का काम अत्यंत महत्वपूणर् माना जाता था। इस प्रकार, किसी भाषा - विशेष की ध्वनियों को एक दृश्य रूप में प्रस्तुत करना एक महान बौिक उपलब्िध् माना जाता था। साक्षरता मेसोपोटामिया के बहुत कम लोग पढ़ - लिख सकते थे। न केवल प्रतीकों या चिÉों की संख्या सैकड़ों में थी, बल्िक ये कहीं अध्िक पेचीदा थे ;पृष्ठ 33 पर दिए गए चित्रा को देख्िाए।द्ध अगर राजा स्वयं पढ़ सकता था तो वह यह चाहता था कि प्रशस्ितपूणर् अभ्िालेखों में उन तथ्यों का उल्लेख अवश्य किया जाए। अध्िकतर लिखावट बोलने के तरीके को दशार्ती थी। एक अध्िकारी द्वारा राजा को लिखा गया पत्रा उसे पढ़कर सुनाया जाता था, इसलिए उसकी शुरुआत इस तरह की जाती थीः फ्मेरे ‘अमुक’ मालिक को..... उनका ‘अमुक’ सेवक निवेदन करता है.... मुझे सौंपे गए काम को मैंने पूरा कर दिया है.....।य् सृष्िट के बारे में लिखे गए एक लंबे पौराण्िाक काव्य के अंत में यह लिखा गया हैः फ्इन काव्य पंक्ितयों को सदा याद रखा जाए और बड़े - बूढ़े लोग इन्हें छोटों को पढ़ाएँऋ बुिमान और विद्वान लोग इन पर चचार् करेंऋ पिता इन्हें अपने पुत्रों के लिए बार - बार दोहराएँऋ ;यहाँ तक किद्ध ग्वालों के कान भी इन पंक्ितयों को सुनने के लिए सदा खुले रहें।य् लेखन का प्रयोग शहरी जीवन, व्यापार और लेखन कला के बीच के संबंधें को उरुक के एक प्राचीन शासक एनमवर्फर ;म्दउमतांतद्ध के बारे में लिखे गए एक सुमेरियन महाकाव्य में स्पष्ट किया गया है। मेसोपोटामिया की परंपरागत कथाओं के अनुसार, उरुक एक अत्यंत संुदर शहर था जिसे अक्सर केवल ‘शहर’ कहकर ही पुकारा जाता था। सुमेर के व्यापार की पहली घटना को एनमवर्फर के साथ जोड़ा जाता है। उस महाकाव्य में कहा गया है कि उन दिनों व्यापार क्या होता है, यह कोइर् नहीं जानता था। एनमवर्फर अपने शहर के एक सुंदर मंदिर को सजाने के लिए लाजवदर् और अन्य बहुमूल्य रत्न तथा धतुएँ मंगाना चाहता था। इस काम के लिए उसने अपना एक दूत अर‘ा ;।तंजजंद्ध नाम के एक सुदूर देश के शासक के पास भेजा। फ्दूत ने राजा के आदेश का पालन किया। रात में वह चाँद - तारों की रोशनी और उनसे सूचित दिशा के अनुसार और दिन में सूरज के बताए मागर् पर आगे बढ़ता गया। वह रास्ते में आने वाले ँउफँचे - उँफचे पहाड़ों को लाघने के लिए उफपर चढ़ता और उतरता रहा। जब वह पहाड़ पर था तो पहाड़ की तलहटी में रहने वाले ‘सूसा’ ;ैनेंद्ध नगर के लोगों ने उसे छोटे चूहों’ की तरह नमस्कार किया। उसने पाँच पवर्तमालाएँ, छः पवर्तमालाएँ और पिफर सात पवर्तमालाएँ पार की ......।य् दूत अर‘ा के मुख्िाया से लाजवदर् या चाँदी नहीं ला पाया और उसे बारम्बार लंबी यात्राओं के उपरान्त खाली हाथ ही लौटना पड़ा। इसके बावजूद कि वह अर‘ा के मुख्िाया से चाँदी प्राप्त करने के लिए उसको उरुक के राजा की ओर से तरह - तरह की ध्मकियाँ और आश्वासन देता रहा। अंत मंे दूत इतना चकरा गया कि अपनी बात को सही तरह से व्यक्त ही नहीं कर पाया और उसने एनमवर्फर के संदेशों को घालमेल कर दिया। तब, फ्राजा एनमवर्फर ने अपने हाथ से चिकनी मि‘ी की प‘िका बनाइर् और उस पर शब्द लिख दिए। उन दिनों, मि‘ी पर शब्द लिखने का रिवाश नहीं था।य् ’;कवि के कहने का तात्पयर् यह था कि जब दूत एक बार उँफचे पहाड़ पर चढ़ गया तो नीचे घाटी में सभी चीज़्ों उसे बहुत छोटी लगीं।द्ध जब लिखी हुइर् प‘िका दूत ने अर‘ा के शासक के हाथों में दी, फ्तो उसने उसकी जाँच की। उच्चरित शब्द कील’ यानी कीलाकार शब्द थे। उसे देखते ही उसकी त्योरियाँ चढ़ गईं। उसनेपिðका पर नज़्ार गड़ाए रखी।य्इस घटना को शाब्िदक रूप से सत्य नहीं माना जाना चाहिएऋ लेकिन इससे यह निष्कषर्निकाला जा सकता है कि मेसोपोटामिया की विचारधरा के अनुसार सवर्प्रथम राजा ने ही व्यापारऔर लेखन की व्यवस्था की थी। यह काव्य हमें यह भी बताता है कि लेखन कायर् सूचना इकट्टòीकरने और दूर - दूर भेजने का साध्न तो था ही, साथ ही उससे मेसोपोटामिया की शहरी संस्वृफतिकी उत्वृफष्टता की भी झलक मिलती है। दक्ष्िाणी मेसोपोटामिया का शहरीकरणμमंदिर और राजा 5000 इर्.पू. से दक्ष्िाणी मेसोपोटामिया में बस्ितयों का विकास होने लगा था। इन बस्ितयों में से वुफछ ने प्राचीन शहरों का रूप ले लिया। ये शहर कइर् तरह के थे। पहले वे जो मंदिरों के चारों ओरविकसित हुएऋ दूसरे जो व्यापार के वेंफद्रों के रूप में विकसित हुएऋ और शेष शाही शहर थे। इनमेंसे पहली दो श्रेण्िायों के शहरों पर यहाँ चचार् की जाएगी।बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने ;उनके मूल स्थान का पता नहींद्ध अपने गाँवों में वुफछचुने हुए स्थानों या मंदिरों को बनाना या उनका पुन£नमार्ण करना शुरू किया। सबसे पहला ज्ञातमंदिर एक छोटा - सा देवालय था जो कच्ची ईंटों का बना हुआ था। मंदिर विभ्िान्न प्रकार केदेवी - देवताओं के निवास स्थान थे, जैसे उर जो चंद्र देवता था और इन्नाना जो प्रेम व यु( कीदेवी थी। ये मंदिर ईंटों से बनाए जाते थे और समय के साथ बड़े होते गए। क्योंकि उनके खुलेआँगनों के चारों ओर कइर् कमरे बने होते थे। वुफछ प्रारंभ्िाक मंदिर साधारणघरों से अलग किस्म के नहीं होते थेμ क्योंकि मंदिर भी किसी देवता काघर ही होता था। लेकिन मंदिरों की बाहरी दीवारें वुुफछ खास अंतरालों के बादभीतर और बाहर की ओर मुड़ी हुइर् होती थींऋ यही मंदिरों की विशेषता थी।साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं।देवता पूजा का वेंफद्र - ¯बदु होता था। लोग देवी - देवता के लिए अन्न, दही,मछली लाते थे ;पुराने जमाने के वुफछ मंदिरों के पफशो± पर मछली की हंियों़की परतें जमी हुइर् मिली हैं।द्ध आराध्य देव सै(ांतिक रूप से खेतों, मत्स्य क्षेत्रोंऔर स्थानीय लोगों के पशुध्न का स्वामी माना जाता था। समय आने पर उपजको उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रिया ;जैसे तेल निकालना, अनाजपीसना, कातना और ऊनी कपड़ों को बुनना आदिद्ध यहीं की जाती थी।घर - परिवार से ऊपर के स्तर के व्यवस्थापक, व्यापारियों के नियोक्ता, अन्न,हल जोतने वाले पशुओं, रोटी, जौ की शराब, मछली आदि के आवंटन औरवितरण के लिख्िात अभ्िालेखों के पालक के रूप में मंदिर ने ध्ीरे - ध्ीरे अपनेियाकलाप बढ़ा लिए और मुख्य शहरी संस्था का रूप ले लिया। लेकिन अन्यदूसरे कारक भी इस व्यवस्था में विद्यमान थे।जमीन में प्रावृफतिक उपजाउफपन होने के बावजूद वृफष्िा कइर् बार संकटों़से घ्िार जाती थी। प़्ाफरात नदी की प्रावृफतिक धराओं में किसी वषर् तो बहुतज़्यादा पानी बह आता था और पफसलों को डुबा देता था और कभी - कभी़दक्ष्िाणी मेसोपोटामिया का ये धराएँ अपना रास्ता बदल लेती थीं, जिससे खेत सूखे रह जाते थे। जैसा कि पुरातत्त्वीयसबसे प्राचीन ज्ञात मंदिर - अभ्िालेखों से पता चलता है, मेसोपोटामिया के इतिहास में गाँव समय - समय पर पुनः स्थापित किएलगभग 5000 इर्.पू. ;नक्शाद्ध। जाते रहे हैं। इन प्रावृफतिक विपदाओं के अलावा, कइर् बार मानव - निमिर्त समस्याएँ भी आ खड़ी होती थीं। जो लोग इन धराआंे के उफपरी इलाकों मंे रहते थे, वे अपने पास की जलधारा से इतना ज़्यादा पानी अपने खेतों में ले लेते थे कि धरा के नीचे की ओर बसे हुए गाँवों को पानी ही नहींमिलता था। ये लोग अपने हिस्से की सरणी में से गाद ;मि‘ीद्ध नहीं निकालते थे, जिससे बहावरुक जाता था और नीचे वालों को पानी नहीं मिलता था। इसलिए मेसोपोटामिया के तत्कालीनदेहातों में ज़्ामीन और पानी के लिए बार - बार झगड़े हुआ करते थे।जब किसी क्षेत्रा में लंबे समय तक लड़ाइर् चलती थी तो जो मुख्िाया लड़ाइर् जीतते थे वे अपनेसाथ्िायों एवं अनुयायियों को लूट का माल बाँटकर खुश कर देते थे तथा हारे हुए समूहों में से लोगोंको बंदी बनाकर अपने साथ ले जाते थे, जिन्हें वे अपने चैकीदार या नौकर बना लेते थे। इसप्रकार, वे अपना प्रभाव और अनुयायियों की संख्या बढ़ा लेते थे। ¯कतु, यु( में विजयी होने वालेये नेता लोग स्थायी रूप से समुदाय के मुख्िाया नहीं बने रहते थेऋ आज हैं तो कल चले जातेथे। लेकिन बाद में एक ऐसा समय आया जब इन नेताओं ने समुदाय के कल्याण पर अिाक ध्यानदेना शुरू कर दिया और उसके पफलस्वरूप नयी - नयी संस्थाएँ और परिपाटियाँ स्थापित हो गईं।इस समय के विजेता मुख्िायाओं ने कीमती भेंटों को देवताओं पर अ£पत करना शुरू कर दियाजिससे कि समुदाय के मंदिरों की सुंदरता बढ़ गइर्। उन्होंने लोगों को उत्वृफष्ट पत्थरों और धातुओंको लाने के लिए भेजा, जो देवता और समुदाय को लाभ पहुँचा सवेंफ तथा मंदिर की ध्न - संपदाके वितरण का और मंदिरों में आने - जाने वाली वस्तुओं का हिसाब - किताब रखकर प्रभावी तरीकेसे संचालन कर सवेंफ। जैसा कि एनमवर्फर से जुड़ी कविताएँ व्यक्त करती हैं कि इस व्यवस्था नेराजा को ऊँचा स्थान दिलाया तथा समुदाय पर उसका पूणर् नियंत्राण स्थापित किया।हम पारस्परिक हितों को सुदृढ़ करने वाले विकास के एक ऐसे दौर की कल्पना कर सकतेहैं, जिसमें मुख्िाया लोगों ने ग्रामीणों को अपने पास बसने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे किवे आवश्यकता पड़ने पर तुरंत अपनी सेना इकऋी कर सवेंफ। इसके अलावा, लोग एक - दूसरे केआस - पास रहने से स्वयं को अध्िक सुरक्ष्िात महसूस कर सवेंफ। उरुक,जो उन दिनों सबसे पुरानेमंदिर - नगरों मंे से एक था, से हमें सशस्त्रा वीरों और उनसे हताहत हुए शत्राुओं के चित्रा मिलतेहैंऋ और सावधनीपूवर्क किए गए पुरातत्त्वीय सवेर्क्षणों से पता चला है कि 3000 इर्.पू. केआसपास जब उरुक नगर का 250 हैक्टेयर भूमि में विस्तार हुआ तो उसके कारण दजर्नों छोटे - छोटेगाँव उजड़ गए और बड़ी संख्या में आबादी का विस्थापन हुआ। उसका यह विस्तार शताब्िदयों बाद पफले - पफूले मोहनजोदड़ो नगर से दो गुना था। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि उरुक नगर लगभग 3000 इर्.पू. में नि£मत एक मंदिर जिसका खुला हुआ आँगन और बाहरी - भीतरी मुख भाग ;उत्खनित रूप मेंद्ध चित्रा में दिखाया गया है। ऊपरμएककाले पत्थर परउत्कीण्िार्त श्िालापट्टð;स्टेलद्ध’ पर दाढ़ी वालेव्यक्ित का दोहरा चित्रा दियागया है। उसके बालों और सिरपर बंध्ी हुइर् पटððी, कमर पटी और लंबे अंगरखे के निचलेहिस्से ;स्कटर्द्ध को देख्िाए।नीचे के दृश्य में उसे एक शेरपर अपने बड़े ध्नुष - बाण सेआक्रमण करते हुए दिखायागया है। ऊपर के दृश्य में, यहवीर उस उग्र शेर को आख्िारअपने भाले से मार गिराता है।;लगभग 3200 इर्.पू.द्ध ’स्टेल, पत्थर के ऐसे श्िालाप‘ होते हैं जिन पर अभ्िालेखउत्कीणर् किये जाते हैं। 38 विश्व इतिहास के वुफछ विषय की रक्षा के लिए उसके चारों ओर कापफी पहले ही एक सुदृढ़ प्राचीर बना दी गइर् थी। उरुकनगर 4200 इर्.पू. से 400 इर्सवी तक बराबर अपने अस्ितत्व में बना रहा, और उस दौरान2800 इर्.पू. के आसपास वह बढ़कर 400 हैक्टेयर में पैफल गया।यु(बंदियों ओर स्थानीय लोगों को अनिवायर् रूप से मंदिर का अथवा प्रत्यक्ष रूपसे शासक का काम करना पड़ता था। वृफष्िाकर भले ही न देना पड़े, पर काम करनाअनिवायर् था। जिन्हें काम पर लगाया जाता था उन्हंे काम के बदले अनाज दियाजाता था। सैकड़ों ऐसी राशन - सूचियाँ मिली हैं जिनमें काम करने वाले लोगों केनामों के आगे उन्हें दिए जाने वाले अनाज, कपड़े और तेल आदि की मात्रा लिखीगइर् है। एक अनुमान के अनुसार, इन मंदिरों में से एक मंदिर को बनाने के लिए1500 आदमियों ने पाँच साल तक प्रतिदिन 10 घंटे काम किया था।शासक के हुक्म से आम लोग पत्थर खोदने, धतु - खनिज लाने, मि‘ी से इर्ंटें तैयार करने और मंदिर में लगाने, और सुदूर देशों में जाकर मंदिर के लिए उपयुक्तसामान लाने के कामों में जुटे रहते थे। इसकी वजह से 3000 इर्.पू. के आसपासउरुक में खूब तकनीकी प्रगति भी हुइर्। अनेक प्रकार के श्िाल्पों के लिए काँसे केऔज़्ाारों का प्रयोग होता था। वास्तुविदों ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया थाक्योंकि उन दिनों बड़े - बड़े कमरों की छतों के बोझ को सँभालने के लिए शहतीर बनानेहेतु उपयुक्त लकड़ी नहीं मिलती थी।सैकड़ों लोगों को चिकनी मि‘ी के शंवुफ ;कोनद्ध बनाने और पकाने के काम में लगाया जाता था। इन शंवुफओं को भ्िान्न - भ्िान्न रंगों में रँगकर मंदिरों की दीवारों में लगाया जाता था जिससे वेदीवारें विभ्िान्न रंगों से सुशोभ्िात हो जाती थीं। मूतिर्कला के क्षेत्रा मंे भी उच्चकोटि की सपफलता प्राप्त की गइर्ऋ इस कला के संुदर नमूने आसानी से उपलब्ध् होने वाली चिकनी मि‘ी की अपेक्षा अध्िकतर आयातित पत्थरों से तैयार किए जाते थे। तभी प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में भी एक युगांतरकारी परिवतर्न आया जो शहरी अथर्व्यवस्था के लिए अत्यंत उपयुक्त साबित हुआ और वह थाः वुफम्हार के चाक का निमार्ण। आगे चलकर इस चाक से वुफम्हार की कायर्शाला में एक साथ बड़े पैमाने पर दजर्नों एक जैसे बतर्न आसानी से बनाए जाने लगे। एक बेलनाकार मुद्रा की छाप, लगभग 3200 इर्.पू.। इस छाप में अंकित दाढ़ी वाले सशस्त्रा खड़े व्यक्ित औरऊपर काले पत्थर पर अंकित वीर का उत्कीण्िार्त श्िालापट्टð या स्टेल’, दोनों में पोशाक और केश - शैली एकजैसी है। चित्रा में तीन यु(बंदी दिखाए गए हैं जिनके हाथ बंध्े हुए हैं और चैथा व्यक्ित विजयी यो(ा सेहाथ पैफलाकर दया की भीख माँग रहा है। मोहर: एक शहरी श्िाल्प - वृफति भारत में, प्राचीन काल में पत्थर की मोहरें होती थीं जिनपर चिÉ अंकित किए गए होतेथे। लेकिन मेसोपोटामिया में, पहली सहड्डाब्दी इर्.पू. के अंत तक पत्थर की बेलनाकर मोहरें,जो बीच में आर - पार छिदी होती थीं, एक तीली लगाकर गीली मिट्टðी के उफपर घुमाइर् जातीथीं और इस प्रकार उनसे लगातार चित्रा बनता जाता था। वे अत्यंत वुफशल कारीगरांे द्वाराउकेरी जाती थीं और कभी - कभी उनमें ऐसे लेख होते थेऋ जैसे - मालिक का नाम, उसकेइष्टदेव का नाम और उसकी अपनी पदीय स्िथति, आदि। किसी कपड़े की गठरी या बतर्नके मुँह को चिकनी मिट्टðी से लीप - पोतकर उसपर वह मोहर घुमाइर् जाती थी जिससे उसमंेअंकित लिखावट मिट्टðी की सतह पर छप जाती थीऋ इससे उस गठरी या बतर्न में रखीवस्तुओं को मोहर लगाकर सुरक्ष्िात किया जा सकता था। जब इस मोहर को मिट्टðी की बनीपिðका पर लिखे पत्रा पर घुमाया जाता था तो वह मोहर उस पत्रा की प्रामाण्िाकता की प्रतीकबन जाती थी। इस प्रकार मुद्रा सावर्जनिक जीवन में नगरवासी की भूमिका को दशार्ती थी। पाँच पुरानी बेलनाकार मोहरें और उनके छापे । प्रत्येक की छाप का विवरण दें। क्या उन पर कीलाकार लिपि अंकित है? शहरी जीवन उफपर के विवरण से पता चलता है कि नगरों की सामाजिक व्यवस्था में एक उच्च या संभ्रांत वगर् का प्रादुभार्व हो चुका था। ध्न - दौलत का ज़्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे से वगर् में वेंफदि्रत था। इस बात की पुष्िट इस तथ्य से होती है कि बहुमूल्य चीज़्ों ;आभूषण, सोने के पात्रा, सपेफद सीपियाँ और लाजवदर् जड़े हुए लकड़ी के वाद्य यंत्रा, सोने के सजावटी खंजर, आदिद्ध विशाल मात्रा में उर में राजाओं और रानियों की वुफछ कब्रों या समाध्ियों में उनके साथ दपफनाइर् गइर् मिली़हैं। लेकिन आम आदमी की स्िथति क्या थी?कानूनी दस्तावेज़्ाों ;विवाह, उत्तराध्िकार आदि के मामलों से संबंध्ितद्ध से पता चलता है किमेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार’ ;छनबसमंत ंिउपसलद्ध को ही आदशर् माना जाता थाहालांकि एक शादीशुदा बेटा और उसका परिवार अक्सर अपने माता - पिता के साथ ही रहा करतेथे। पिता परिवार का मुख्िाया होता था। हमंे विवाह की प्रिया या विध्ि के बारे में वुफछ जानकारीमिली है। विवाह करने की इच्छा के बारे में घोषणा की जाती थी और वध्ू के माता - पिता उसकेविवाह के लिए अपनी सहमति देते थे। उसके बाद वर पक्ष के लोग वध्ू को वुफछ उपहार देते ’एकल परिवार में एक पुरुष, उसकी पत्नी और बच्चे शामिल होते हैं। थे। जब विवाह की रस्म पूरी हो जाती थी, तब दोनों पक्षों की ओर से उपहारों का आदान - प्रदानकिया जाता था और वे एकसाथ बैठकर भोजन करते थे और पिफर मंदिर में जाकर भेंट चढ़ाते थे।जब नववध्ू को उसकी सास लेने आती थी, तब वध्ू को उसके पिता द्वारा उसकी दाय का हिस्सादे दिया जाता था। पिता का घर, पशुध्न, खेत आदि उसके पुत्रों को मिलते थे।आइए, अब उर नगर का अवलोकन करें। यह उन नगरों में से एक था जहाँ सबसे पहले खुदाइर्की गइर् थी। उर, मेसोपोटामिया का एक ऐसा नगर था जिसके साधरण घरों की खुदाइर् 1930 केदशक में सुव्यवस्िथत ढंग से की गइर्। उसमें टेढ़ी - मेढ़ी व संकरी गलियाँ पाइर् गईं जिससे यह पताचलता है कि पहिए वाली गाडि़याँ वहाँ के अनेक घरों तक नहीं पहुँच सकती थीं। अनाज केबोरे और इर्ंध्न के गऋे संभवतः गध्े पर लादकर घर तक लाए जाते थे। पतली व घुमावदार गलियोंतथा घरों के भू - खंडों का एक जैसा आकार न होने से यह निष्कषर् निकलता है कि नगर - नियोजनकी प(ति का अभाव था। वहाँ गलियों के किनारे जल - निकासी के लिए उस तरह की नालियाँ़़’हौज जमीन में एक ऐसा नहीं थीं, जैसी कि उसके समकालीन नगर मोहनजोदड़ो में पाइर् गइर् हैं। बल्िक जल - निकासी कीढका हुआ गîक्का होता है नालियाँ और मिट्टðी की नलिकाएँ उर नगर के घरों के भीतरी आँगन में पाइर् गइर् हैं, जिससे यहजिसमें पानी और मल समझा जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था और वषार् का पानी निकासजाता है। नालियों के माध्यम से भीतरी आँगनों में बने हुए हौज़्ाों’ में ले जाया जाता था। शायद यह इसलिएकिया गया था कि एक साथ तेज़्ा वषार् आने पर घर के बाहर की कच्ची गलियाँ बुरी तरह कीचड़उर नगर का एकसे न भर जाएँ।रिहायशी इलाका, लगभगउपिफर भी ऐसा प्रतीत होता है कि लोग अपने घर2000 इर्.पू.। क्या आप का सारा वूफड़ा - कचरा बुहारकर गलियों में डाल देतेचित्रा में टेढ़ी - मेढ़ी गलियोंके अलावा, दो या तीन थे, जहाँ वह आने - जाने वाले लोगों के पैरों के नीचेबंद गलियाँ भी खोज आता रहता था। इस प्रकार बाहर कूड़ा डालते रहनेसकते हैं? से गलियों की सतहें उँफची उठ जाती थीं जिसकेकारण वुफछ समय बाद घरों की दहलीशों को भीउँफचा उठाना पड़ता था ताकि वषार् के बाद कीचड़बह कर घरों के भीतर न आ सके। कमरों के अंदररोशनी ख्िाड़कियों से नहीं, बल्िक उन दरवाज़्ाों सेहोकर आती थी जो आँगन में खुला करते थे। इससेघरों के परिवारों में गोपनीयता ;चतपअंबलद्ध भी बनी रहती थी। घरों के बारे में कइर् तरह के अंध्विश्वासप्रचलित थे, जिनके विषय में उर मंे पाइर् गइर्शवुफन - अपशवुफन संबंध्ी बातें प‘िकाओं पर लिखीमिली हैंऋ जैसे - घर की देहली उँफची उठी हुइर् होतो वह ध्न - दौलत लाती हैऋ सामने का दरवाज़्ाा अगर किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वहसौभाग्य प्रदान करता हैऋ लेकिन अगर घर कालकड़ी का मुख्य दरवाज़्ाा ;भीतर की ओर नखुलकरद्ध बाहर की ओर खुले तो पत्नी अपने पतिके लिए यंत्राणा का कारण बनेगी।उर में नगरवासियों के लिए एक कबि्रस्तान था,जिसमें शासकांे तथा जन - साधरण की समाध्ियाँपाइर् गईंऋ लेकिन वुफछ लोग साधरण घरों के पफशोऱ्के नीचे भी दप़्ाफनाए हुए पाए गए थे। पशुचारक क्षेत्रा में एक व्यापारिक नगर2000 इर्.पू. के बाद मारीनगर शाही राजधनी के रूप में खूब पफला - पफूला। आपने देखा होगामानचित्रा 3रू मारी नगर की;मानचित्रा 2 मेंद्ध कि मारी नगर दक्ष्िाण के उस मैदानी भाग में स्िथत नहीं हैं जहाँ खेती की पैदावारस्िथति। भरपूर होती थी, बल्िक वह प़्ाफरात नदी की उध्वर्धरा पर स्िथत है। मानचित्रा 3 में विभ्िान्न रंगोंका प्रयोग करके यह दशार्या गया है कि इस उफपरी क्षेत्रा मंें खेती और पशुपालन साथ - साथ चलतेथे। मारी राज्य में वैसे तो किसान और पशुचारक दोनांे ही तरहके लोग होते थे, लेकिन उस प्रदेश का अध्िकांश भागभेड़ - बकरी चराने के लिए ही काम में लिया जाता था।पशुचारकों को जब अनाज, धतु के औज़्ाारों आदि कीजरूरत पड़ती थी तब वे अपने पशुओं तथा उनके पनीर,चमड़ा तथा मांस आदि के बदले ये चीज़्ों प्राप्त करते थे। बाड़ेमें रखे जाने वाले पशुओं के गोबर से बनी खाद भी किसानोंके लिए बहुत उपयोगी होती थी। पिफर भी, किसानों तथागड़रियों के बीच कइर् बार झगड़े हो जाते थे। गड़रिये कइर् बारअपनी भेड़ - बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए हुए खेतोंसे गुज़्ाार कर ले जाते थे जिससे किसान की पफसल को नुकसानपहुँचता था। ये गड़रिये खानाबदोश होते थे और कइर् बारवृफष्िा भूमिकिसानों के गाँवों पर हमला बोलकर उनका इकऋा किया माललूट लेते थे। दूसरी तरपफ, कइर् बार ऐसा भी होता था किमारीबस्ितयों में रहने वाले लोग भी इन पशुचारकों का रास्ता रोकदेते थे और उन्हें अपने पशुओं को नदी - नहर तक नहीं ले जानेदेते थे। पठारमेसोपोटामिया के इतिहास पर नज़्ार डालें तो पता चलेगा किभूमि जो प्रत्येक वषर् बाढ़ ग्रस्त होती है - वसंत के उत्तरा(र् में चराइर् ;चरागाह क्षेत्राद्धवहाँ के वृफष्िा से समृ( हुए मुख्य भूमि प्रदेश में यायावरवृफष्िा भूमि चरागाह भूमि - वेदिकाएँ, जहाँ नहर का पानी नहीं पहुंच पाता हैसमुदायों के झुंड के झंुड पश्िचमी मरुस्थल से आते रहते थे।वसंत में चरागाह क्षेत्रा मौसमी धराये गड़रिये गमिर्यों में अपने साथ इस उपजाउफ क्षेत्रा के बोए हुएनिम्बलानिचली भूमि में पठार की ओर स्टेपी बाढ़ ग्रस्त क्षेत्राखेतों में अपनी भेड़ - बकरियाँ ले आते थे। ये समूह गड़रिये,पफसल काटने वाले मज़्ादूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप मेंआते थे और समृ( होकर यहीं बस जाते थे। उनमें से वुफछ ने तो अपना खुद काशासन स्थापित करने की भी शक्ित प्राप्त कर ली थी। ये खानाबदोश लोग अक्कदी,एमोराइट, असीरियाइर् और आमीर्नियन जाति के थे। ;आगे विषय 5 में इन पशुचारकसमाजों के शासकों के बारे में वुफछ अध्िक जानकारी दी गइर् है।द्ध मारी के राजाएमोराइट समुदाय के थे। उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भ्िान्न होती थीऔर उन्होंने मेसोपोटामिया के देवी - देवताओं का आदर ही नहीं किया बल्िक स्टेपीक्षेत्रा के देवता डैगन ;क्ंहंदद्ध के लिए मारी नगर में एक मंदिर भी बनवाया। इसप्रकार, मेसोपोटामिया का समाज और वहाँ की संस्वृफति भ्िान्न - भ्िान्न समुदायों केलोगों और संस्वृफतियों के लिए खुली थी और संभवतः विभ्िान्न जातियों तथा समुदायोंके लोगों के परस्पर मिश्रण से ही वहाँ की सभ्यता में जीवन - शक्ित उत्पन्न हो गइर्। एक यो(ा अपने हाथों में एक लंबा भाला और एक खपच्ची की ढाल पकड़े हुए है।एमोराइट लोगों की एक खास किस्म की पोशाक देख्िाए जो ;पृष्ठ 38 पर दिखाइर्गइर्द्ध सुमेरियन यो(ा की पोशाक से भ्िान्न होती थी। यह चित्रा एक सीपी पर उकेरागया था, लगभग 2600 इर्.पू.। प्राँगण ;131द्ध मि‘ीदानों में प‘िकाएँ रखी जाती थीं। ज्ि़ामरीलिम का मारी स्िथत राजमहल ;1810.1760 इर्.पू.द्ध मारी का विशाल राजमहल वहाँ के शाही परिवार का निवास स्थान तो था ही, साथ ही वह प्रशासन और उत्पादन, विशेष रूप से कीमती धतुओं के आभूषणों के निमार्ण का मुख्य वेंफद्र भी था। अपने समय में वह इतना अध्िक प्रसि( था कि उसे देखने केलिए ही उत्तरी सीरिया का एक छोटा राजा आयाऋ वह अपने साथ मारी के राजा ज्ि़ामरीलिम के नाम उसके एक अन्य राजा का परिचय पत्रा लेकर वहाँ आया था। दैनिक सूचियों से पता चलता है कि राजा के भोजन की मेज पर हर रोज भारी मात्रा में खाद्य पदाथर् पेश किए जाते थेμआटा, रोटी, मांस, मछली, पफल, मदिरा और वीयर। वह संभवतः अपने अन्य साथ्िायों के साथ सप़्ोफद पत्थर जड़े आँगन ;106द्ध में बैठकर बाकायदा भोजन करता था। नक्शा देखने से आपको पता चलेगा कि राजमहल का सिप़्ार्फ एक ही प्रवेश द्वार था जो उत्तर की ओर बना हुआ था। उसके विशाल, खुले प्राँगण ;जैसे 131द्ध सुंदर पत्थरों से जड़े हुए थे। राजा विदेशी अतिथ्िायों और अपने प्रमुख लोगों से कमरा - 132 में मिलताथा जहाँ के भ्िािा - चित्रों को देखकर आगंतुक लोग हतप्रभ रह जाते थे। राजमहल 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्रा में स्िथत एक अत्यंत विशाल भवन था जिसमें 260 कक्ष बने हुए थे। विंफतु, मारी के राजाओं को सदा सतवर्फ एवं सावधन रहना पड़ता थाऋ विभ्िान्न जन - जातियोंके चरवाहों को राज्य में चलने - पिफरने की इजाज़्ात तो थी, परन्तु उन पर कड़ी नज़्ार रखी जाती थी।राजाओं तथा उनके पदाध्िकारियों के बीच हुए पत्रा - व्यवहार में अक्सर इन पशुचारकों की गतिविध्ियोंऔर श्िाविरों का उल्लेख किया गया है। एक बार एक पदाध्िकारी ने राजा को लिखा था कि उसने रातको बार - बार आग से किए गए ऐसे संकेतों को देखा है जो एक श्िाविर से दूसरे श्िाविर को भेजे गएथे और उसे संदेह है कि कहीं किसी छापे या हमले की योजना तो नहीं बनाइर् जा रही है।मारी नगर एक अत्यंत महत्त्वपूणर् व्यापारिक स्थल पर स्िथत था जहाँ से होकर लकड़ी, ताँबा,राँगा, तेल, मदिरा और अन्य कइर् किस्मों का माल नावों के जरिए पफरात नदी के रास्ते दक्ष्िाण औऱतुकीर्, सीरिया और लेबनान के उँफचे इलाकों के बीच लाया - ले जाया जाता था। मारी नगर व्यापारके बल पर समृ( हुए शहरी वेंफद्र का एक अच्छा उदाहरण है। दक्ष्िाणी नगरों को घ्िासाइर् - पिसाइर्के पत्थर, चक्िकयाँ, लकड़ी और शराब तथा तेल के पीपे ले जाने वाले जलपोत मारी में रुकाकरते थे, मारी के अध्िकारी जलपोत पर जाया करते थे, उस पर लदे हुए सामान की जाँच करतेथे ;एक नदी में 300 मदिरा के पीपे रखे जा सकते थे।द्ध और उसे आगे बढ़ने की इजाज़्ात देनेसे पहले उसमें लदे माल की कीमत का लगभग 10 प्रतिशत प्रभार वसूल करते थे। जौ एक विशेषकिस्म की नौकाओं में आता था। सबसे महत्त्वपूणर् बात यह है कि वुफछ पिðकाओं में साइप्रसके द्वीप ‘अलाश्िाया’ ;।संेीपलंद्ध से आने वाले ताँबे का उल्लेख मिला है, यह द्वीप उन दिनों ताँबेतथा टिन के व्यापार के लिए मशहूर था। परंतु यहाँ राँगे का भी व्यापार होता था। क्योंकि काँसा,औज़्ाार और हथ्िायार बनाने के लिए एक मुख्य औद्योगिक सामग्री था, इसलिए इसके व्यापार काबहुत महत्त्व था। इस प्रकार, यद्यपि मारी राज्य सैनिक दृष्िट से उतना सबल नहीं था, परंतु व्यापारऔर समृि के मामले में वह अद्वितीय था। मेसोपोटामिया संस्वृफति में शहरों का महत्त्व मेसोपोटामिया वासी शहरी जीवन को महत्त्व देते थे जहाँ अनेक समुदायों और संस्वृफतियों के लोग साथ - साथ रहा करते थे। यु( में शहरों के नष्ट हो जाने के बाद वे अपने काव्यों के जरिए उन्हें याद किया करते थे। मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर कितना अध्िक गवर् था इस बात का सबसे अिाक ममर्स्पशीर् वणर्न हमें गिल्गेमिश ;ळपसहंउमेीद्ध महाकाव्य के अंत में मिलता है। यह काव्य 12 पिðकाओं पर लिखा गया था। ऐसा कहा जाता है कि गिल्गेमिश ने एनमवर्फर के वुफछ समय बाद उरुक नगर पर शासन किया था। वह एक महान यो(ा था जिसने दूर - दूर तक के प्रदेशों को अपने अध्ीन कर लिया था, लेकिन उसे उस समय गहरा झटका लगा जब उसका वीर मित्रा अचानक मर गया। इससे दुःखी होकर वह अमरत्व की खोज में निकल पड़ा। उसने सागरों - महासागरों को पार किया, और दुनियाभर का चक्कर लगाया। मगर उसे अपने साहसिक कायर् में सपफलता नहीं मिली। हारकर गिल्गेमिश अपने नगर उरुक लौट आया। वहाँ जब वह अपने आपको सांत्वना देने के लिए शहर की चहारदीवारी के पास आगे - पीछे चहलकदमी कर रहा था तभी उसकी नज़्ार उन पकी ईंटों पर पड़ी जिनसे उसकी नींव डाली गइर् थी। वह भावविभोर हो उठा। इस प्रकार उरुक नगर की विशाल प्राचीर पर आकर उस महाकाव्य की लंबी वीरतापूणर् और साहस भरी कथा का अंत हो गया। यहाँ गिल्गेमिश, एक जनजातीय यो(ा की तरह यह नहीं कहता कि उसका अंत निश्िचत है पर उसके पुत्रा तो जीवित रहेंगे और इस नगर का आनंद लेंगे। इस प्रकार उसे अपने नगर में ही सांत्वना मिलती है जिसे उसकी प्यारी प्रजा ने बनाया था। लेखन कला की देन हालांकि ममर्स्पशीर् कहानियों - किस्सों और तरह - तरह के वणर्न को तो मौख्िाक रूप से एक - दूसरों को सुनाते हुए जीवित रखा जा सकता है, पर विज्ञान को जीवित रखने के लिए लिख्िात दस्तावेज़्ाों और किताबों की जरूरत पड़ती है ताकि विद्वानों की आगे आने वाली पीढि़याँ उन्हें पढ़ सवेंफ।़संभवतः मेसोपोटामिया की दुनिया को सबसे बड़ी देन है उसकी कालगणना और गण्िात कीविद्वत्तापूणर् परंपरा है। 1800 इर्.पू. के आसपास की वुफछ प‘िकाएँ मिली हैं जिनमें गुणा और भाग की तालिकाएँ, वगर् तथा वगर्मूल और चक्रवृि ब्याज की सारण्िायाँ दी गइर् हैं। उनमें 2 का वगर्मूल यह दिया गया हैः 1 ़ 24ध्60 ़ 51ध्602 ़ 10ध्603 अगर आप इसे हल करें तो इसका उत्तर 1.41421296 होगा जो इसके सही उत्तर 1.41421356 से थोड़ा - सा ही भ्िान्न है। उस समय के विद्याथ्िार्यों को इस प्रकार के सवाल हल करने होते थेः अगर एक खेत का क्षेत्रापफल इतना - इतना है और वह एक अंगुल गहरे पानी में डूबा हुआ है तो संपूणर् पानी का आयतन बताओ। पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा के अनुसार एक पूरे वषर् का 12 महीनों में विभाजन,एक महीने का 4 हफ्रतांे में विभाजन, एक दिन का 24 घंटांे में और एक घंटे का 60 मिनट में विभाजन - यह सब जो आज हमारी रोज़्ामरार् की ¯ज़्ादगी का अचेतन हिस्सा है, मेसोपोटामियावासियोंसे ही हमें मिला है। समय का उपयुर्क्त विभाजन सिवंफदर के उत्तराध्िकारियों ने अपनाया, वहाँ से वह रोम और पिफर इस्लाम की दुनिया को मिला और पिफर मध्ययुगीन यूरोप में पहुँचा ;यह सब वैफसे हुआ विषय 7 में देख्िाएद्ध। जब कभी सूयर् और चंद्र ग्रहण होते थे तो वषर्, मास और दिन के अनुसार उनके घटित होने का हिसाब रखा जाता था। इसी प्रकार रात को आकाश में तारों और तारामंडल की स्िथति पर बराबरनज़्ार रखते हुए उनका हिसाब रखा जाता था।मेसोपोटामियावासियों की इन महत्त्वपूणर् उपलब्िध्यों में से एक भी उपलब्िध् संभव नहीं होतीयदि लेखन की कला और विद्यालयों जैसी उन संस्थाओं का अभाव होता जहाँ विद्याथीर्गण पुरानीलिख्िात पिðकाओं को पढ़ते और उनकी नकल करते थे और जहाँ वुफछ छात्रों को साधरणप्रशासन का हिसाब - किताब रखने वाले लेखाकार न बनाकर, ऐसा प्रतिभासंपन्न व्यक्ित बनाया जाताथा जो अपने पूवर्जों की बौिक उपलब्िध्यों को आगे बढ़ा सवेंफ।यह सोचना गलत होगा कि मेसोपोटामिया के शहरी लोग आध्ुनिक तौर - तरीकों से परिचितनहीं थे। अंत में, हमें उन दो प्रकार के प्रारंभ्िाक प्रयत्नों का अवलोकन करना चाहिए जिनके द्वाराअतीत के प्रलेखों एवं परंपराओं को खोजने और सुरक्ष्िात रखने की कोश्िाश की गइर् थी। अभ्यास 1ण् आप यह वैफसे कह सकते हैं कि प्रावृफतिक उवर्रता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे? 2ण् आपके विचार से निम्नलिख्िात में से कौन - सी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारंभ मेंशहरीकरण हुआ था और निम्नलिख्िात में से कौन - कौन सी बातें शहरों के विकास के पफलस्वरूपउत्पन्न हुईं?;कद्धअत्यंत उत्पादक खेती, ;खद्ध जल - परिवहन, ;गद्ध धतु और पत्थर की कमी, ;घद्ध श्रम विभाजन,;ड.द्ध मुद्राओं का प्रयोग, ;चद्ध राजाओं की सैन्य - शक्ित जिसने श्रम को अनिवायर् बना दिया। 3ण् यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्िचत रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थे? 4ण् आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत वुफछ घर जैसे ही होंगे? 5ण् शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन - कौन सी नयी संस्थाएँ अस्ितत्व में आईं? आपके विचार से उनमें से कौन - सी संस्थाएँ राजा वफी पहल पर निभर्र थीं। 6ण् किन पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है?

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