मन्नू भंडारी जन्मः सन्् 1931, भानपुरा ;मध्यप्रदेशद्ध प्रमुख रचनाएँः एक प्लेट सैलाब, मैं हार गइर्, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिाशंवुफ, आँखों देखा झूठ ;कहानी - संग्रहद्धऋ आपका बंटी, महाभोज, स्वामी, एक इंच मुस्कान ;राजेंद्र यादव के साथद्ध ;उपन्यासद्ध पटकथाएँः रजनी, निमर्ला, स्वामी, दपर्ण सम्मानः हिंदी अकादमी दिल्ली का श्िाखर सम्मान, बिहार सरकार, भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता,राजस्थान संगीत नाटक अकादमी और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत मन्नू भंडारी हिंदी कहानी में उस समय सिय हुईं जब नइर् कहानी आंदोलन अपने उठान पर था। नइर् कहानी आंदोलन ;छठा दशकद्ध में जो नया मोड़ आया उसमें मन्नू जी का विशेष योगदान रहा। उनकी कहानियों में कहीं पारिवारिक जीवन, कहीं नारी - जीवन और कहीं समाज के विभ्िान्न वगो± के जीवन की विसंगतियाँ विशेष आत्मीय अंदाश में अभ्िाव्यक्त हुइर् हैं। उन्होंने आक्रोश, व्यंग्य और संवेदना को मनोवैज्ञानिक रचनात्मक आधर दिया हैμ वह चाहे कहानी हो, उपन्यास हो या पिफर पटकथा ही क्यों न हो। यहाँ आप मन्नू जी द्वारा लिख्िात एक पटकथा पढ़ने जा रहे हैं। पटकथा, यानी पट या स्क्रीन के लिए लिखी गइर् वह कथा रजत पट ;प्िाफल्म का स्क्रीनद्ध के लिए़भी हो सकती है और टेलीविशन के लिए भी। मूल बात यह है कि जिस तरह मंच पर खेलने के लिए नाटक लिखे जाते हैं, उसी तरह वैफमरे से प्ि़ाफल्माए जाने के लिए पटकथा लिखी जाती है। कोइर् लेखक किसी भी दूसरी विध में लेखन करके उतने लोगों तक अपनी बात नहीं पहुँचा सकता, जितना की पटकथा लेखन द्वाराऋ क्योंकि पटकथा शूट होने के बाद धरावाहिक या प्ि़ाफल्मों के रूप में लाखों - करोड़ों दशर्कों तक पहुँच जाती है। इस लोकपि्रयता के चलते ही पटकथा लेखन की ओर लेखकों का भी पयार्प्त रुझान हुआ है और पत्रा - पत्रिाकाओं तथा पुस्तकों में भी पटकथाएँ छपने लगी हैं। प्रस्तुत पाठ में रजनी धरावाहिक की एक कड़ी दी जा रही है। रजनी पिछली सदी के नवें दशक का एक बहुचचिर्त टी.वी. धरावाहिक रहा है। यह वह समय था जब हमलोग और बुनियाद जैसे सोप ओपेरा दूरदशर्न का भविष्य गढ़ रहे थे। बासु चटजीर् के निदेर्शन में बने इस धरावाहिक की हर कड़ी अपने में स्वतंत्रा और मुकम्मल होती थी और उन्हें आपस में गूँथनेवाली सूत्रा रजनी थी। हर कड़ी में यह जुझारू और इंसाप़्ाफ - पसंद स्त्राी - पात्रा किसी न किसी सामाजिक - राजनीतिक समस्या से जूझती नशर आती थी। प्रस्तुत अंश भी व्यवसाय बनती श्िाक्षा की समस्या की ओर हमारा ध्यान खींचता है। रजनी ;मध्यवगीर्य परिवार के फ्ऱलैट का एक कमरा। एक महिला रसोइर् में व्यस्त है। घंटी बजती है। बाइर् दरवाशा खोलती है। रजनी का प्रवेश।द्ध रजनी: लीला बेन कहाँ हो...बाशार नहीं चलना क्या? लीला: ;रसोइर् में से हाथ पोंछती हुइर् निकलती हैद्ध चलना तो था पर इस समय तो अमित आ रहा होगा अपना रिशल्ट लेकर। आज उसका रिशल्ट निकल रहा है न। ;चेहरे पर खुशी का भावद्ध रजनी: अरे वाह! तब तो मैं मिठाइर् खाकर ही जाऊँगी। अमित तो पढ़ने में इतना अच्छा है कि पफस्टर् आएगा और नहीं तो सेवंफड तो कहीं गया़नहीं। तुमको मिठाइर् भी बढि़या ख्िालानी पड़ेगी...सूजी के हलवे से काम नहीं चलने वाला, मैं अभी से बता देती हूँ। लीला: ;हँसकरद्ध नहीं - नहीं, मैं तुम्हें अच्छी मिठाइर् ही ख्िालाऊँगी...मैंने पहले से ही मँगवाकर रखी हैμ केसरिया रसमलाइर्। अमित को बहुत पसंद है न। रजनी: देखा {{! मुझे अपने घर में ही केसर की सुगंध आ गइर् थी। बाशार का तो मैं बहाना करके चली आइर् वरना तुम तो मुझे काट ही देतीं। लीला: वैफसी बात करती हो? मैं एक बार काट भी दूँ, लेकिन अमित! अपनेमुँह में डालने से पहले रसमलाइर् लेकर तुम्हारे फ्ऱलैट में दौड़ता। मैंकोइर् भी चीश घर में बनाऊँ या बाहर से लाऊँ, अमित जब तक तुम्हारे भोग नहीं लगा लेता, हम लोग खा थोड़े ही सकते हैं। रजनी आंटी तो हीरो हैं उसकी। ;दोनों ख्िालख्िालाकर हँसती हैंद्ध रजनी: बहुत मेधावी बच्चा है अमित...तुम देखना तो, आगे जाकर क्या बनता है! लीला: बस, स{ब तुम्हारा ही आशीवार्द है। ;पिफर घंटी बजती है। लीला एक तरह से दौड़ते हुए दरवाशा खोलती है। अमित का प्रवेश। रोश की तरह भारी बस्ते की जगह एक हल्का - सा थैला है।द्ध रजनी: ;अमित को बाँहों में भरने के लिए दोनों बाँहें पैफलाते हुए आगे बढ़ती है।द्ध कांग्रेचुलेशंस अमित। बधाइर् देने के लिए रजनी आंटी पहले से मौजूद हैं। ;अमित का चेहरा उतरा हुआ है, पर दोनों में से अभी तक उसपर किसी का ध्यान नहीं गया। अमित आँसू भरी आँखों से थैले में से रिपोटर् निकालकर माँ की ओर पेंफकते हुए।द्ध अमित: लो...लो...देखो, क्या हुआ है मेरे रिशल्ट का। मैंने कितना कहा था कि मैथ्स में भी मेरी ट्यूशन लगवा दीजिए, वरना मेरा रिशल्ट बिगड़ जाएगा। बस वही हुआ। मैथ्स में ही तो पूरे नंबर आ सकते हैं, रिशल्ट बन - बिगड़ सकता है। रिपोटर् रजनी देखने लगती है। ;लीला उसे अपनी बाँहों में भरकरद्ध लीला: पर तू तो सारे सवाल ठीक करके आया था। यहाँ आकर पापा के सामने तूने पिफर से किया था अपना सारा पेपर। सब तो ठीक था। तेरे पापा ने नहीं कहा था कि चार - पाँच नंबर भले ही काट ले सपफाइर् - वपफाइऱ़्के पर नाइंटी - प़्ाफाइव तो तेरे पक्के हैं। रजनी: ;रिपोटर् देखते हुएद्ध पर मिले तो वुफल बहत्तर ही हैं। ;पिफर दूसरे विषयों के नंबर भी पढ़ने लगती है इंगलिश 86, हिस्ट्री 80, सिविक्स 88, हिंदी 82, ड्राइंग 90...सबसे कम मैथ्स में ही।द्ध अमित: ;गुस्से और दुख सेद्ध कम तो होंगे ही। ट्यूशन नहीं लेने से मिलते हैं कहीं अच्छे नंबर? सर तो बार - बार कहते ही थे कि ट्यूशन कर लो, ट्यूशन कर लो वरना पिफर बाद में मत रोना। ;रो पड़ता हैद्ध लीला: ;अपराधी की तरह सप़्ाफाइर् देते हुएद्ध तुझे अंग्रेशी को लेकर थोड़ी परेशानी थी सो अंग्रेशी में करवा दी थी ट्यूशन। अब दो - दो विषयों की ट्यूशन...पिफर लंबी - चैड़ी पफीस। बेटे...़;अपनी आथ्िार्क मजबूरी की बात वह शब्दों से नहीं, चेहरे से व्यक्त करती है।द्ध पर यह तो अँधेर ही हुआ कि सारा पेपर ठीक हो, पिफर भी नंबर काट लो। रजनी: ;रजनी की भौंहों में एकाएक बल पड़ जाते हैं। वह रोते हुए अमित को खींचकर अपने पास सटा लेती हैद्ध रोओ मत। ;उसके आँसू पोंछते हुएद्ध अमित रोएगा नहीं...समझे। मैं जो पूछती हूँ उसका जवाब देना। बस। ;वुफछ देर रुककरद्ध तुझे अच्छी तरह याद है कि तूने पूरा पेपर ठीक किया था? ;अमित स्वीकृति में सिर हिलाता हैद्ध पापा के पास दुबारा पेपर करने से पहले दोस्तों से या किताबों से उन सवालों के जवाब तो नहीं देख लिए थे? अमित: नहीं।ज्यों - के - त्यों आकर कर दिए थे। हमको आतेथेवोसारेसवाल। रजनी: मैथ्स के सर कौन हैं? अमित: मिस्टर पाठक। रजनी: कितने लड़के ट्यूशन लेते हैं उनसे? अमित: बाइस। साल के शुरू में तो आठ लेते थे...पिफर पहले टमिर्नल के बाद से पंद्रह हो गए थे। हाप़्ाफ - इर्यरली के बाद सात लड़कों ने और लेना शुरू कर दिया। मुझसे भी तभी से कह रहे थे। लीला: हापफ - इर्यरली में तो इसके नाइंटी - सिक्स नंबर आए थे...इसी ने़बताया था कि क्लास में सबसे श्यादा हैं। रजनी: उसके बाद भी कहते थे कि ट्यूशन लो? अमित: हाँ! काॅपी लौटाते हुए कहा था कि तुमने किया तो अच्छा है पर यह तो हाप़्ाफ - इर्यरली है...बहुत आसान पेपर होता है इसका तो। अब अगर इर्यरली में भी पूरे नंबर लेने हैं तो तुरंत ट्यूशन लेना शुरू कर दो। वरना रह जाओगे। सात लड़कों ने तो शुरू भी कर दिया था। पर मैंने जब मम्मी - पापा से कहा, हमेशा बस एक ही जवाब ;मम्मी की नकल उतारते हुएद्ध मैथ्स में तो तू वैसे ही बहुत अच्छा है, क्या करेगा ट्यूशन लेकर? देख लिया अब? सिक्स्थ पोशीशन आइर् है मेरी। जो आज तक कभी नहीं आइर् थी। ;अमित की आँखों से पिफर आँसू टपक पड़ते हैं।द्ध रजनी: ;डाँटते हुएद्ध पिफर आँसू। जानता नहीं, रोने वाले बच्चे रजनी आंटी को बिलवुफल पसंद नहीं। मम्मी ने बिलवुफल ठीक ही कहा और ठीक ही किया। जिस विषय में तुम वैसे ही बहुत अच्छे हो, उसमें क्यों लोगे ट्यूशन? ट्यूशन तो कमशोर बच्चे लेते हैं। अमित: आप जानती नहीं आंटी...अच्छे - बुरे की बात नहीं होती। अगर सर कहें और बार - बार कहें तो लेनी ही होती है। वरना तो नंबर कम हो ही जाते हैं। रजनी: पेपर अच्छा करो तब भी नंबर कम हो जाते हैं? अमित: हाँ, कितना ही अच्छा करो पिफर भी कम हो जाते हैं...जैसेमेरेहो गए। रजनी: यानी कि अच्छा पेपर करने पर भी कम आते हैं। सिप़्ार्फ इसलिए कि ट्यूशन नहीं ली थी! तो यह तो सर की गलती नहीं, बदमाशी है और तू मम्मी से लड़ रहा है। सर से जाकर लड़। ;अमित इस भाव से सिर हिलाता है मानो कितनी बेकार की बात कर रही हैं रजनी आंटी। लीला दो गिलासों में श्िावंफजी बनाकर लाती है। अमित लेने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता तो रजनी घुड़कती है।द्ध रजनी: चलो पियो श्िावंफजी। देखते नहीं, चेहरा वैफसे पसीना - पसीना हो रहा है। ;दोनों श्िावंफजी पीने लगते हैं। इस दौरान रजनी वुफछ सोच रही है। श्िावंफजी खत्म करकेद्ध कल आप नौ बजे तैयार रहिए अमित साहब...आपके स्वूफल चलना है। अमित: ;अमित एकदम डर जाता हैद्ध कल से तो छु‘ी है। पर आप अगर स्वूफल जाकर वुफछ कहेंगी तो सर मुझसे बहुत गुस्सा हो जाएँगे...वहाँ मत जाइए...प्लीश वहाँ बिलवुफल मत जाइए। लीला : हाँ रजनी तुम वुफछ करोगी - कहोगी तो अगले साल कहीं और श्यादा परेशान न करें इसे। अब जब रहना इसी स्वूफल में है तो इन लोगों से झगड़ा। रजनी : ;बात को बीच में ही काटकर गुस्से सेद्ध यानी कि वे लोग जो भी जुलुम - श्यादती करें, हम लोग चुपचाप बदार्श्त करते जाएँ? सही बात कहने में डर लग रहा है तुझे, तेरी माँ को! अरे जब बच्चे ने सारा पेपर ठीक किया है तो हम काॅपी देखने की माँग तो कर ही सकते हैं...पता तो लगे कि आख्िार किस बात के नंबर काटे हैं? अमित : ;झुँझलाकरद्ध बता तो दिया आंटी। आप.. रजनी : ;गुस्से सेद्ध ठीक है तो अब बैठकर रोओ तुम माँμबेटे दोनों। ;दनदनाती निकल जाती है। दोनों के चेहरे पर एक असहाय - सा भाव।द्ध लीला : अब यह रजनी कोइर् और मुसीबत न खड़ी करे। दृश्य समाप्त नया दृश्य ;स्वूफल के हैडमास्टर का कमरा। बड़ी - सी टेबल। दीवार के सहारे रखी काँच की अलमारी में बच्चों द्वारा जीते हुए कप और शील्ड्स जमे हुए रखे हैं। दीवार पर वुफछ नेताओं की तसवीरें, एक बड़ा - सा मैप लटका है। एक स्वूफल के हैडमास्टर के कमरे का वातावरण तैयार किया जाए। हैडमास्टर काम में व्यस्त है। चपरासी बड़े अदब से एक चिट लाकर रखता है। हैडमास्टर वुफछ क्षण उसे देखता रहता है।द्ध हैडमास्टर : बुलाओ। ;रजनी का प्रवेश नमस्कार करती है।द्ध हैडमास्टर : बैठिए ;वुफछ देर रुककरद्ध कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? रजनी : मैं सेविंथ क्लास के अमित सक्सेना की मैथ्स की काॅपी देखना चाहती हूँ ;हैडमास्टर के चेहरे पर ऐसा भाव जैसे वह वुफछ समझा न होद्ध इर्यरली एक्शाम्स की, कल ही जिसका रिशल्ट निकला है। हैडमास्टर रजनी हैडमास्टर रजनी हैडमास्टर रजनी हैडमास्टर रजनी ः साॅरी मैडम, इर्यरली एक्शाम्स की काॅपियाँ तो हम लोग नहीं दिखाते हैं। ः जानती हूँ मैं, लेकिन बात यह है कि अमित ने मैथ्स का पूरा पेपरठीक किया था लेकिन उसे वुफल बहत्तर नंबर ही मिले हैं। काॅपी देखकर सिप़्ार्फ यह जानना चाहती हूँ कि अमित को अपने बारे में वुफछ गलतप़्ाफहमी हो गइर् थी या ;एक - एक शब्द पर शोर देकरद्ध गलती एक्शामिनर की है। ः ;सारी बात को बहुत हलके ढंग से लेते हुएद्ध आप भी कमाल करती हैं, बच्चे ने कहा और आपने मान लिया। अरे, हर बच्चा घर जाकर यही कहता है कि उसने पेपर बहुत अच्छा किया है और उसे बहुत अच्छे नंबर मिलेंगे। अगर हम इसी तरह काॅपियाँ दिखाने लग जाएँ तो यहाँ तो पेरेंट्स की भीड़ लगी रहे सारे समय। इसीलिए तो इर्यरली एक्शाम्स की काॅपियाँ न दिखाने का नियम बनाया गया है स्वूफलों में। ः ;अपने गुस्से पर काबू पाते हुएद्ध देख्िाए आप चाहें तो अमित का पूरा रिशल्ट देख सकते हैं। मैथ्स में हमेशा सेंट - परसेंट नंबर लेता रहा है। इस साल भी उसने पूरा पेपर ठीक किया है। ;तैश आ ही जाता हैद्ध काॅपी देखकर मैं सिप़्ार्फ यह जानना चाहती हूँ कि नंबर आख्िार कटे किस बात के हैं? ः आप बहस करके बेकार ही अपना और मेरा समय बबार्द कर रही हैं। मैंने कह दिया न कि इन काॅपियों को दिखाने का नियम नहीं है और मैं नियम नहीं तोड़ूँगा। ः ;व्यंग्य सेद्ध नियम! यानी कि आपका स्वूफल बहुत नियम से चलता है। ः ;गुस्से सेद्ध व्हाॅट डू यू मीन? ः आइर् मीन व्हाॅट आइर् से। नियम का शरा भी खयाल होता तो इस तरह की हरकतें नहीं होतीं स्वूफल में। कोइर् बच्चा बहुत अच्छा है किसी विषय में पिफर भी उसे मजबूर किया जाता है कि वह ट्यूशन ले। यह कौन - सा नियम है आपके स्वूफल का? हैडमास्टर : देख्िाए यह टीचसर् और स्टूडेंट्स का अपना आपसी मामला है, वो पढ़ने जाते हैं और वो पढ़ाते हैं। इसमें न स्वूफल आता है, न स्वूफल के नियम! इस बारे में हम क्या कर सकते हैं? रजनी : वुफछ नहीं कर सकते आप? तो मेहरबानी करके यह वुफसीर् छोड़ दीजिए। क्योंकि यहाँ पर वुफछ कर सकने वाला आदमी चाहिए। जो ट्यूशन के नाम पर चलने वाली धाँधलियों को रोक सके...मासूम और बेगुनाह बच्चों को ऐसे टीचसर् के श्िावंफजों से बचा सके जो ट्यूशन न लेने पर बच्चों के नंबर काट लेते हैं...और आप हैं कि काॅपियाँ न दिखाने के नियम से उनके सारे गुनाह ढक देते हैं। हैडमास्टर : ;चीखकरद्ध विल यू प्लीश गेट आउट आॅपफ दिस रूम। ;शोर - शोर से घंटी बजाने लगता है। दौड़ता हुआ चपरासी आता हैद्ध मेमसाहब को बाहर ले जाओ। रजनी : मुझे बाहर करने की शरूरत नहीं। बाहर कीजिए उन सब टीचसर् को जिन्होंने आपकी नाक के नीचे ट्यूशन का यह घ्िानौना रैकेट चला रखा है। ;व्यंग्य सेद्ध पर आप तो वुफछ कर नहीं सकते, इसलिए अब मुझे ही वुफछ करना होगा और मैं करूँगी, देख्िाएगा आप। ;तमतमाती हुइर् निकल जाती है।द्ध ;हैडमास्टर चपरासी पर ही बिगड़ पड़ता हैद्ध जाने किस - किस को भेज देते हो भीतर। चपरासी : मैंने तो आपको स्िलप लाकर दी थी साहब। ;हैडमास्टर गुस्से में स्िलप की चिंदी - चिंदी करके पेंफक देता है, वुफछ इस भाव से मानो रजनी की ही च्िंादियाँ बिखेर रहा हो।द्ध दृश्य समाप्त नया दृश्य ;रजनी का फ्ऱ लैट। शाम का समय। घंटी बजती है। रजनी आकर दरवाशा खोलती है। पति का प्रवेश। उसके हाथ से ब्रीप़्ाफकेस लेती है।द्ध पति: ;जूते खोलते हुएद्ध तुम आज दिन में कहीं बाहर गइर् थीं क्या? रजनी: तुम्हें वैफसे मालूम? पति: पफोन किया था। एक प़्ाफाइल रह गइर् थी, सोचा चपरासी को भेजकऱमँगवा लूँ पर कोइर् घर में हो तब न। ;पति के चेहरे पर खीज भरा गुस्सा पुता हुआ हैद्ध रजनी: तुम प़्ाफाइल भूल गए...और जिसके बारे में मुझे पता भी नहीं। पर पिफर भी उसके लिए मुझे घर बैठना चाहिए। यह कौन - सी बात हुइर्? पति: ;शरा शांत होते हुएद्ध अच्छा गइर् कहाँ थीं? रजनी: ;एक स्वूफल का नाम लेती हैद्ध पति: ;स्वूफल का नाम दोहराता हैद्ध...तुम क्या करने गइर् थीं वहाँ? रजनी: ;गद्गद भाव सेद्ध पहले चाय ले आऊँ, पिफर बताती हूँ। ;वैफमरा रजनी के साथ किचन में। गुनगुनाते हुए रजनी खाने का भी वुफछ बना रही है। लगता है जो वुफछ करके आइर्, उससे बहुत प्रसन्न है।द्ध ;दृश्य पिफर बाहर के कमरे में। नाश्ते की प्लेट कापफी खाली हो चुकी है,़जिससे लगे कि रजनी सारी बात बता चुकी है।द्ध रजनी: बोलती बंद कर दी हैडमास्टर साहब की। जवाब देते नहीं बना तो चिल्लाने लगे। पर मैं क्या छोड़ने वाली हूँ इस बात को? पति: अच्छा मास्टर लोग ट्यूशन करते हैं या धंधा करते हैं, पर तुम्हें अभी बैठे - बिठाए इससे क्या परेशानी हो गइर्? तुम्हारा बेटा तो अभी पढ़ने नहीं जा रहा है न? रजनी: ;एकदम भड़क जाती हैद्ध यानी कि मेरा बेटा जाए तभी आवाश उठानी चाहिए...अमित के लिए नहीं उठानी चाहिए...और जो इतने - इतने बच्चे इसका श्िाकार हो रहे हैं, उनके लिए नहीं उठानी चाहिए। सब वुफछ जानने के बाद भी नहीं उठानी चाहिए? पति: ठेका लिया है तुमने सारी दुनिया का? रजनी: देखो, तुम मुझे पिफर गुस्सा दिला रहे हो रवि...गलती करने वाला तो है ही गुनहगार, पर उसे बदार्श्त करने वाला भी कम गुनहगार नहीं होता जैसे लीला बेन और कांति भाइर् और हशारों - हशारों माँ - बाप। लेकिन सबसे बड़ा गुनहगार तो वह है जो चारों तरप़्ाफ अन्याय, अत्याचार और तरह - तरह की धाँधलियों को देखकर भी चुप बैठा रहता है, जैसे तुम। ;नकल उतारते हुएद्ध हमें क्या करना है, हमने कोइर् ठेका ले रखा है दुनिया का। ;गुस्से और हिकारत सेद्ध माइर् पुफट़;उठकर भीतर जाने लगती है। जाते - जाते मुड़करद्ध तुम जैसे लोगों के कारण ही तो इस देश में वुफछ नहीं होता, हो भी नहीं सकता! ;भीतर चली जाती है।द्ध पति: ;बेहद हताश भाव से दोनों हाथों से माथा थामकरद्ध चढ़ा दिया सूली पर। दृश्य समाप्त नया दृश्य ;डायरेक्टर आॅपफ एजुकेशन के आॅप्िाफस का बाहरी कक्ष। कमरे के बाहर उसवेफ़नाम और पद की तख्ती लगी है। साथ ही मिलने का समय भी लिखा है। एक स्टूल पर चपरासी बैठा है। सामने की बेंच पर रजनी और तीन - चार लोग और बैठे हैंμप्रतीक्षारत। रजनी के चेहरे से बेचैनी टपक रही है। बार - बार घड़ी देखती है, मिलने का समय समाप्त होता जा रहा है।द्ध रजनी: ;चपरासी सेद्ध कितनी देर और बैठना होगा? चपरासी: हम क्या बोलेगा...जब साहब घंटी मारेगा...बुलाएगा तभी तो ले जाएगा। बहुत बिशी रहता न साहब। रजनी: ;अपने में ही गुनगुनाते हुएद्ध यह तो लोगों से मिलने का समय है, न ़जाने किसमें बिशी बनकर बैठ जाते हैं ;चपरासी दूसरी तरपफ देखने लगता है।द्ध ;वैफमरा आॅपिफस के अंदर चला जाता है। साहब मेश पर पेपर - वेट घुमा रहा है। पिफर घड़ी देखता है, पिफर घुमाने लगता है। बाहर एक आदमी आता है। अपने नाम की स्िलप के नीचे पाँच रुपए का एक नोट रखकर देता है और चपरासी का कंधा थपथपाता है। चपरासी हँसकर भीतर जाता है। लौटकर उस आदमी को तुरंत अपने साथ ले जाता है। रजनी के चेहरे पर तनाव, घूरकर चपरासी को देखती है। थोड़ी देर में आदमी बाहर निकलता है। रजनी उठकर दनदनाती हुइर् भीतर जाने लगती है।द्ध चपरासी: अरे...अरे...अरे...किधर वूफ जाता? अभी घंटी बजा क्या? रजनी: घंटी तो मिलने का समय खत्म होने तक बजेगी भी नहीं। ;दरवाशा धकेलकर भीतर चली जाती हैद्ध चपरासी: अरे वैफसी औरत है...सुनतीच नइर्। ;वहाँ बैठे दो - तीनलोगहँसनेलगतेहैं।द्ध ;दृश्य कमरे के भीतर। निदेशक वुफसीर् की पीठ से टिककर सिगरेट पी रहा है। रजनी को देखकर आश्चयर् से।द्ध निदेशक: आपको स्िलप भेजकर भीतर आना चाहिए न। रजनी: ;मुस्कराकरद्ध स्िलप तो घंटे भर से आपके चपरासी की जेब में पड़ी है। और शायद दो - चार दिन चक्कर लगवाने तक पड़ी ही रहेगी। निदेशक: क्या कह रही हैं आप? रजनी: तो क्या यह सीधी - सापफ - सी बात भी मुझे ही समझानी होगी़आपको? खैर अभी छोडि़ए इस बात को, इस समय मैं आपके पास किसी दूसरे ही काम से आइर् हूँ। ;निदेशक के चेहरे पर रजनी को लेकर एक आश्चयर् मिश्रित कौतूहल का भाव उभरता है।द्ध निदेशक: कहिए। रजनी: ;थोड़ा सोचते हुएद्ध देख्िाए, मैं स्वूफलों, विशेषकर प्राइवेट स्वूफलों और बोडर्केआपसीरिलेशंस के बारे में वुफछ जानकारी इकऋा कर रही हूँ। निदेशक: कोइर् रिसचर् प्रोजेक्ट है क्या? व्हेरी इंटरेस्िंटग सब्जेक्ट। रजनी: बस वुफछ ऐसा ही समझ लीजिए। निदेशक: कहिए आप क्या जानना चाहती हैं? रजनी: जिन प्राइवेट स्वूफलों को आप रिकगनाइश कर लेते हैं उन्हें बोडर् शायद 90» ग्रांट देता है। निदेशक: ;शरा गवर् सेद्ध जी हाँ, देता है। बोडर् का काम ही यह है कि श्िाक्षा के प्रचार - प्रसार में जितना भी हो सके सहयोग करे। इट्स अवर ड्यूटी मैडम। रजनी: जब इतनी बड़ी एड देते हैं तो आपका कोइर् वंफट्रोल भी रहता होगा स्वूफलों पर। निदेशक: आॅपफकोसर्। बोडर् के बहुत से ऐसे नियम हैं जो स्वूफलों को मानने होते़हैं, स्वूफल मानते हैं। सिलेबस बोडर् बनाता है...प़्ाफाइनल इर्यर के एक्शाम्स बोडर् वंफडक्ट करता है। रजनी: ;निदेशक के चेहरे पर नशरें गड़ाकरद्ध स्वूफलों में आजकल प्राइवेट ट्यूशंस का जो सिलसिला चला हुआ है, ट्यूशंस क्या बच्चों को लूटने का जो धंधा चला हुआ है, उसके बारे में आपका बोडर् क्या करता है? निदेशक: ;बड़े सहज भाव सेद्ध इसमें धंधे की क्या बात है? जब किसी का बच्चा कमशोर होता है तभी उसके माँ - बाप ट्यूशन लगवाते हैं। अगर लगे कि कोइर् टीचर लूट रहा है तो उस टीचर से न लें ट्यूशन, किसी और के पास चले जाएँ...यह कोइर् मजबूरी तो है नहीं। रजनी: बच्चा कमशोर नहीं, होश्िायार है...बहुत होश्िायार...उसके बावजूद उसका टीचर लगातार उसे कोंचता रहता है कि वह ट्यूशन ले...वह ट्यूशन ले वरना पछताएगा। लेकिन बच्चे के माँ - बाप को शरूरी नहीं लगता और वे नहीं लगवाते। जानते हैं क्या हुआ? मैथ्स का पूरा पेपर ठीक करने के बावजूद उसे वुफल 72 नंबर मिलते हैं, जानते हैं क्यों?..क्योंकि उसने टीचर के बार - बार कहने पर भी ट्यूशन नहीं ली। निदेशक: वैरी सैड! हैडमास्टरको एक्शन लेना चाहिए ऐसे टीचर के ख्िालाप़्ाफ। रजनी: क्या खूब! आप कहते हैं कि हैडमास्टर को एक्शन लेना चाहिए..हैडमास्टर कहते हैं मैं वुफछ नहीं कर सकता, तब करेगा कौन? मैं पूछती हूँ कि ट्यूशन के नाम पर चलने वाले इस घ्िानौने रैकेट को तोड़ने के लिए दखलअंदाशी नहीं करनी चाहिए आपको, आपके बोडर् को? ;चेहरा तमतमा जाता हैद्ध निदेशक: लेकिन हमारे पास तो आज तक किसी पेरेंट से इस तरह की कोइर् श्िाकायत नहीं आइर्। रजनी: यानी की श्िाकायत आने पर ही आप इस बारे में वुफछ सोच सकते हैं। वैसे श्िाक्षा के नाम पर दिन - दहाड़े चलने वाली इस दुकानदारी की आपके ;बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग सेद्ध बोडर् आॅपफ एजुकेशन को कोइर् जानकारी ही नहीं, कोइर् चिंता ही नहीं? निदेशक: वैफसी बात करती हैं आप? कितने इंपोटे±ट मैटसर् रहते हैं हम लोगों के पास? अभी पिछले छह महीने से तो नइर् श्िाक्षा प्रणाली को लेकर ही कितने सेमिनासर् आॅगर्नाइश किए हैं हमने? रजनी: ;व्यंग्य सेद्ध ओह, इंपोटे±ट मैटसर्, नइर् श्िाक्षा प्रणाली। अरे पहले इस श्िाक्षा प्रणाली के छेदों को तो रोकिए वरना बच्चों के भविष्य के साथ - साथ आपकी नइर् श्िाक्षा प्रणाली भी छनकर गइे में चली जाएगी। निदेशक: ;थोड़े गुस्से के साथद्ध आप ही पहली महिला हैं, और हो सकता है कि आख्िारी भी हों, जो इस तरह की श्िाकायत लेकर आइर् हैं। रजनी: ठीक है तो पिफर आपके पास श्िाकायत का ढेर ही लगवाकर रहूँगी। ;झटके से उठकर बाहर चली जाती है, निदेशक देखता रहता है, पिफर कंधे उचका देता है।द्ध ;अब मोंटाज में वुफछ दृश्य दिखाए जाएँ। रजनी प़्ाफोन कर रही है। मेश पर वुफछ पत्रा रखे हैं और रजनी एक रजिस्टर में उनके नाम पते उतार रही है। साथ में एक - दो महिलाएँ और भी हैं। पिफर एक के बाद एक तीन - चार घरों में माँ - बाप से मिल रही है उन्हें समझा रही है। साथ में लीला बेन और तीन - चार महिलाएँ और भी हैं।द्ध दृश्य समाप्त नया दृश्य ;किसी अखबार का दफ्ऱतर। कमरे में संपादक बैठे हैं, साथ में तीन - चार स्ित्रायों के साथ रजनी बैठी है।द्ध संपादक: आपने तो इसे बाकायदा एक आंदोलन का रूप ही दे दिया। बहुत अच्छा किया। इसके बिना यहाँ चीशें बदलती भी तो नहीं हैं। श्िाक्षा के क्षेत्रा में पैफली इस दुकानदारी को तो बंद होना ही चाहिए। रजनी: ;एकाएक जोश में आकरद्ध आप भी महसूस करते हैं न ऐसा?... तो पिफर साथ दीजिए हमारा। अखबार यदि किसी इश्यू को उठा ले और लगातार उस पर चोट करता रहे तो पिफर वह थोड़े से लोगों की बात नहीं रह जाती। सबकी बन जाती है...आँख मूँदकर नहीं रह सकता पिफर कोइर् उससे। आप सोचिए शरा अगर इसके ख्िालापफ कोइर् नियम़बनता है तो ;आवेश के मारे जैसे बोला नहीं जा रहा है।द्ध कितने पेरेंट्स को राहत मिलेगी...कितने बच्चों का भविष्य सुधर जाएगा, उन्हें अपनी मेहनत का पफल मिलेगा, माँ - बाप के पैसे का नहीं, ...श्िाक्षा के नाम पर बचपन से ही उनके दिमाग में यह तो नहीं भरेगा कि पैसा ही सब वुफछ है...वे...वे..संपादक: ;हँसकरद्ध बस - बस मैं समझ गया आपकी सारी तकलीपफ, आपका़सारा गुस्सा। रजनी: तो पिफर दीजिए हमारा साथ...उठाइए इस इश्यू को। लगातार लिख्िाए और धुआँधार लिख्िाए। संपादक: इसमें आप अखबारवालों को अपने साथ ही पाएँगी। अमित के उदाहरण से आपकी सारी बात मैंने नोट कर ली है। एक अच्छा - साराइट - अप तैयार करके पी.टी.आइर्. के द्वारा मैं एक साथ फ्ऱलैश करवाता हूँ। रजनी: ;गद्गद होते हुएद्ध एक काम और कीजिए। 25 तारीख को हम लोग पेरेंट्स की एक मीटिंग कर रहे हैं, राइट - अप के साथ इसकी सूचना भी दे दीजिए तो सब लोगों तक खबर पहुँच जाएगी। व्यक्ितगत तौर पर तो हम मुश्िकल से सौ - सवा सौ लोगों से संपवर्फ कर पाए हैं..वह भी रात - दिन भाग - दौड़ करके ;शरा - सा रुककरद्ध अिाक - से - अिाक संपादक रजनी लोगों के आने के आग्रह के साथ सूचना दीजिए।: दी। ;सब लोग हँस पड़ते हैं।द्ध: ये हुइर् न वुफछ बात। दृश्य समाप्त नया दृश्य ;मीटिंग का स्थान। बाहर कपड़े का बैनर लगा हुआ है। बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं और भीतर जा रहे हैं, लोग खुश हैं, लोगों में जोश है। विरोध और विद्रोह का पूरा माहौल बना हुआ है। दृश्य कटकर अंदर जाता है। हाॅल भरा हुआ है। एक ओर पे्रस वाले बैठे हैं, इसे बाकायदा पफोकस करना है। एक महिला माइक पर से उतरकर नीचे आती है। हाॅल में तालियों की़गड़गड़ाहट। अब मंच पर से उठकर रजनी माइक पर आती है। पहली पंक्ित में रजनी के पति भी बैठे हैं।द्ध बहनों और भाइयों, इतनी बड़ी संख्या में आपकी उपस्िथति और जोश ही बता रहा है कि अब हमारी मंजिल दूर नहीं है। इन दो महीनों में लोगों से मिलने पर इस समस्या के कइर् पहलू हमारे सामने आए...वुफछ अभी आप लोगों ने भी यहाँ सुने। ;वुफछ रुककरद्ध यह भी सामने आया कि बहुत से बच्चों के लिए ट्यूशन शरूरी भी है। माँएँ इस लायक नहीं होतीं कि अपने बच्चों को पढ़ा सवेंफ और पिता ;शरा रुककरद्ध जैसे वे घर के और किसी काम में शरा - सी भी मदद नहीं करते, बच्चों को भी नहीं पढ़ाते। ;ठहाका, वैफमरा उसके पति पर भी जाएद्ध तब कमशोर बच्चों के लिए ट्यूशन शरूरी भी हो जाती है। ;रुककरद्ध बड़ा अच्छा लगा जब टीचसर् की ओर से भी एक प्रतिनििा ने आकर बताया कि कइर् प्राइवेट स्वूफलों में तो उन्हें इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि ट्यूशन न करें तो उनका गुशारा ही न हो। कइर् जगह तो ऐसा भी है कि कम तनख्वाह देकर श्यादा पर दस्तखत करवाए जाते हैं। ऐसे टीचसर् से मेरा अनुरोध है कि वे संगठित होकर एक आंदोलन चलाएँ और इस अन्याय का पदार्पफाश करें़;हाॅल में बैठा हुआ पति धीरे से पुफसपुफसाता है, लो, अब एक और आंदोलन का मसाला मिल गया, वैफमरा पिफर रजनी परद्ध इसलिए अब हम अपनी समस्या से जुड़ी सारी बातों को नशर में रखते हुए ही बोडर् के सामने यह प्रस्ताव रखेंगे कि वह ऐसा नियम बनाए ;एक - एक शब्द पर शोर देते हुएद्ध कि कोइर् भी टीचर अपने ही स्वूफल के छात्रों का ट्यूशन नहीं करेगा। ;रुककरद्ध ऐसी स्िथति में बच्चों के साथ शोर - शबरदस्ती करने, उनके नंबर काटने की गंदी हरकतें अपने आप बंद हो जाएँगी। साथ ही यह भी हो कि इस नियम को तोड़ने वाले टीचसर् के ख्िालाप़्ाफ सख्त - से - सख्त कायर्वाही की जाएगी...। अब आप लोग अपनी राय दीजिए। ;सारा हाॅल, एप्रूव्ड, एप्रूव्ड की आवाशों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है।द्ध दृश्य समाप्त नया दृश्य ;रजनी का फ्ऱलैट। सवेरे का समय। कमरे में पति अखबार पढ़ रहा है। पहला पृष्ठ पलटते ही रजनी की तस्वीर दिखाइर् देती है, जल्दी - जल्दी पढ़ता है, पिफर एकदम चिल्लाता है।द्ध पति: अरे रजनी...रजनी, सुनो तो बोडर् ने तुम लोगों का प्रस्ताव ज्यों - का - त्यों स्वीकार कर लिया। रजनी: ;भीतर से दौड़ती हुइर् आती है। अखबार छीनकर जल्दी - जल्दी पढ़ती है। चेहरे पर संतोष, प्रसन्नता और गवर् का भाव।द्ध रजनी: तो मान लिया गया हमारा प्रस्ताव...बिलवुफल जैसा का तैसा और बन गया यह नियम। ;खुशी के मारे अखबार को ही छाती से चिपका लेती है।द्ध मैं तो कहती हूँ कि अगर डटकर मुकाबला किया जाए तो कौन - सा ऐसा अन्याय है, जिसकी धज्िजयाँ न बिखेरी जा सकती हैं। पति: ;मुग्ध भाव से उसे देखते हुएद्ध आइर् एम प्राउड आॅपफ यू रजनी...रियली, रियली...आइर् एम वैरी प्राउड आॅपफ यू। रजनी: ;इतराते हुएद्ध हूँ {{ दो महीने तक लगातार मेरी धज्िजयाँ बिखेरने के बाद। ;दोनों हँसते हैं।द्ध ;लीला बेन, कांतिभाइर् और अमित का प्रवेशद्ध लीला बेन: उस दिन तुम्हारी जो रसमलाइर् रह गइर्, वह आज खाओ। कांतिभाइर्: और सबके हिस्से की तुम्हीं खाओ। ;अमित दौड़कर अपने हाथ से उसे रसमलाइर् ख्िालाने जाता है पर रजनी उसे अमित के मुँह में ही डाल देती है।द्ध ;सब हँसते हैं। हँसी के साथ ही धीरे - धीरे दृश्य समाप्त हो जाता है।द्ध अभ्यास पाठ के साथ 1.रजनी ने अमित के मुद्दे को गंभीरता से लिया, क्योंकि μ क.वह अमित से बहुत स्नेह करती थी। ख.अमित उसकी मित्रा लीला का बेटा था। ग.वह अन्याय के विरु( आवाश उठाने की सामथ्यर् रखती थी। घ.उसे अखबार की सुख्िार्यों में आने का शौक था। 2.जब किसी का बच्चा कमशोर होता है, तभी उसके माँ - बाप ट्यूशन लगवाते हैं। अगर लगे कि कोइर् टीचर लूट रहा है, तो उस टीचर से न ले ट्यूशन, किसी और के पास चले जाएँ... यह कोइर् मजबूरी तो है नहींμ प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताएँ कि यह संवाद आपको किस सीमा तक सही या गलत लगता है, तवर्फ दीजिए। 3.तो एक और आंदोलन का मसला मिल गयाμ पुफसपुफसाकर कही गइर् यह बातμ क.किसने किस प्रसंग में कही? ख.इससे कहने वाले की किस मानसिकता का पता चलता हैै। 4.रजनी धरावाहिक की इस कड़ी की मुख्य समस्या क्या है? क्या होता अगरμ क.अमित का पचार् सचमुच खराब होता। ख.संपादक रजनी का साथ न देता। पाठ के आस - पास 1.गलती करने वाला तो है ही गुनहगार, पर उसे बदार्श्त करने वाला भी कम गुनहगार नहीं होताμ इस संवाद के संदभर् में आप सबसे श्यादा किसे और क्यों गुनहगार मानते हैं? 2.स्त्राी के चरित्रा की बनी बनाइर् धरणा से रजनी का चेहरा किन मायनों में अलग है? 3.पाठ के अंत में मीटिंग के स्थान का विवरण कोष्ठक में दिया गया है। यदि इसी दृश्य को प्ि़ाफल्माया जाए तो आप कौन - कौन से निदेर्श देंगे? 4.इस पटकथा में दृश्य - संख्या का उल्लेख नहीं है। मगर गिनती करें तो सात दृश्य हैं। आप किस आधर पर इन दृश्यों को अलग करेंगे? भाषा की बात 1. निम्नलिख्िात वाक्यों के रेखांकित अंश में जो अथर् निहित हैं उन्हें स्पष्ट करते हुए लिख्िाएμ ;कद्धवरना तुम तो मुझे काट ही देतीं। ;खद्ध अमित जबतक तुम्हारे भोग नहीं लगा लेता, हमलोग खा थोड़े ही सकते हैं। ;गद्ध बस - बस, मैं समझ गया। कोड मिक्िसंग/कोड स्िवचिंग 1.कोइर् रिसचर् प्रोजेक्ट है क्या? व्हेरी इंटरेस्िंटग सब्जेक्ट। उफपर दिए गए संवाद में दो पंक्ितयाँ हैं पहली पंक्ित में रेखांकित अंश हिंदी से अलग अंग्रेशी भाषा का है जबकि शेष हिंदी भाषा का है। दूसरा वाक्य पूरी तरह अंग्रेशी में है। हम बोलते समय कइर् बार एक ही वाक्य में दो भाषाओं ;कोडद्ध का इस्तेमाल करते हैं। यह कोड मिक्िसंग कहलाता है। जबकि एक भाषा में बोलते - बोलते दूसरी भाषा का इस्तेमाल करना कोड स्िवचिंग कहलाता है। पाठ में से कोड मिक्िसंग और कोड स्िवचिंग के तीन - तीन उदाहरण चुनिए और हिंदी भाषा में रूपांतरण करके लिख्िाए। पटकथा की दुनिया ऽ आपने दूरदशर्न या सिनेमा हाॅल में अनेक चलचित्रा देखे होंगे। पदेर् पर चीशें जिस सिलसिलेवार ढंग से चलती हैं उसमें पटकथा का विशेष योगदान होता है। पटकथा कइर् महत्वपूणर् संकेत देती है, जैसेμ ऽ कहानी/कथा ऽ संवादों की विषय - वस्तु ऽ संवाद अदायगी का तरीका ऽ आस - पास का वातावरण/दृश्य ऽ दृश्य का बदलना ऽ इस पुस्तक के अपने पसंदीदा पाठ के किसी एक अंश को पटकथा में रूपांतरित कीजिए। शब्द - छवि कांग्रेचुलेशंस - बधइर् हो, मुबारक हो हाप़्ाफ - इर्यरली - छमाही, अ(र्वाष्िार्क बेगुनाह - जिसका कोइर् गुनाह न हो, निदोर्ष रजनीध्99 हिकारत डायरेक्टर आॅप़्ाफ - उपेक्षा एजुकेशन - श्िाक्षा निदेशक रिकगनाइश - मान्य रिसचर् प्रोजेक्ट - शोध् परियोजना वंफडक्ट - संचालन सुनतीच नइर् - सुनती ही नहीं दखलअंदाशी - हस्तक्षेप पेरेंट - अभ्िाभावक इंपोटे±ट मैटसर् - महत्वपूणर् विषय बाकायदा - कायदे के अनुसार इश्यू प़्ाफोकस करना एप्रूव्ड - - - मुद्दा ध्यान में लानास्वीकृत मोंटाज - दृश्य मीडिया ;टेलीविशन मेंद्ध में जब अलग दृश्यों या छवियों को एक साथ इकट्टòा कर उसे संयोजित किया जाता है तो उसे मोंटाज कहते हैं।

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लोकप्रियता कभी भी रचना का मानक नहीं बन सकती। असली मानक तो 
होता है रचनाकार का दायित्वबोध, उसके सरोकार, उसकी जीवन-दृष्टि।

(एक कहानी यह भी)

मन्नू भंडारी

जन्म: 1931, भानपुरा (मध्यप्रदेश) 

प्रमुख रचनाएँः एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिशंकु, आँखों देखा झूठ (कहानी-संग्रह); आपका बंटी, महाभोज, स्वामी, एक इंच मुस्कान (राजेंद्र यादव के साथ) (उपन्यास)

पटकथाएँः रजनी, निर्मला, स्वामी, दर्पण

सम्मानः हिंदी अकादमी दिल्ली का शिखर सम्मान, बिहार सरकार, भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत 

मन्नू भंडारी हिंदी कहानी में उस समय सक्रिय हुईं जब नई कहानी आंदोलन अपने उठान पर था। नई कहानी आंदोलन (छठा दशक) में जो नया मोड़ आया उसमें मन्नू जी का विशेष योगदान रहा। उनकी कहानियों में कहीं पारिवारिक जीवन, कहीं नारी-जीवन और कहीं समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन की विसंगतियाँ विशेष आत्मीय अंदाज़ में अभिव्यक्त हुई हैं। उन्होंने आक्रोश, व्यंग्य और संवेदना को मनोवैज्ञानिक रचनात्मक आधार दिया है– वह चाहे कहानी हो, उपन्यास हो या फिर पटकथा ही क्यों न हो।

यहाँ आप मन्नू जी द्वारा लिखित एक पटकथा पढ़ने जा रहे हैं। पटकथा, यानी पट या स्क्रीन के लिए लिखी गई वह कथा रजत पट (फ़िल्म का स्क्रीन) के लिए भी हो सकती है और टेलीविज़न के लिए भी। मूल बात यह है कि जिस तरह मंच पर खेलने के लिए नाटक लिखे जाते हैं, उसी तरह कैमरे से फ़िल्माए जाने के लिए पटकथा लिखी जाती है।

कोई लेखक किसी भी दूसरी विधा में लेखन करके उतने लोगों तक अपनी बात नहीं पहुँचा सकता, जितना की पटकथा लेखन द्वारा; क्योंकि पटकथा शूट होने के बाद धारावाहिक या फ़िल्मों के रूप में लाखों-करोड़ों दर्शकों तक पहुँच जाती है। इस लोकप्रियता के चलते ही पटकथा लेखन की ओर लेखकों का भी पर्याप्त रुझान हुआ है और पत्र-पत्रिकाओं तथा पुस्तकों में भी पटकथाएँ छपने लगी हैं। प्रस्तुत पाठ में रजनी धारावाहिक की एक कड़ी दी जा रही है।

रजनी पिछली सदी के नवें दशक का एक बहुचर्चित टी.वी. धारावाहिक रहा है। यह वह समय था जब हमलोग और बुनियाद जैसे सोप ओपेरा दूरदर्शन का भविष्य गढ़ रहे थे। बासु चटर्जी के निर्देशन में बने इस धारावाहिक की हर कड़ी अपने में स्वतंत्र और मुकम्मल होती थी और उन्हें आपस में गूँथनेवाली सूत्र रजनी थी। हर कड़ी में यह जुझारू और इंसाफ़-पसंद स्त्री-पात्र किसी न किसी सामाजिक- राजनीतिक समस्या से जूझती नज़र आती थी।

प्रस्तुत अंश भी व्यवसाय बनती शिक्षा की समस्या की ओर हमारा ध्यान खींचता है। 

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रजनी

(मध्यवर्गीय परिवार के फ़्लैट का एक कमरा। एक महिला रसोई में व्यस्त है। घंटी बजती है। बाई दरवाज़ा खोलती है। रजनी का प्रवेश।)

रजनी : लीला बेन कहाँ हो...बाज़ार नहीं चलना क्या? 

लीला : (रसोई में से हाथ पोंछती हुई निकलती है) चलना तो था पर इस समय तो अमित आ रहा होगा अपना रिज़ल्ट लेकर। आज उसका रिज़ल्ट निकल रहा है न। (चेहरे पर खुशी का भाव)

रजनी : अरे वाह! तब तो मैं मिठाई खाकर ही जाऊँगी। अमित तो पढ़ने में इतना अच्छा है कि फ़र्स्ट आएगा और नहीं तो सेकंड तो कहीं गया नहीं। तुमको मिठाई भी बढ़िया खिलानी पड़ेगी...सूजी के हलवे से काम नहीं चलने वाला, मैं अभी से बता देती हूँ। 

लीला : (हँसकर) नहीं-नहीं, मैं तुम्हें अच्छी मिठाई ही खिलाऊँगी...मैंने पहले से ही मँगवाकर रखी है– केसरिया रसमलाई। अमित को बहुत पसंद है न। 

रजनी : देखा ! मुझे अपने घर में ही केसर की सुगंध आ गई थी। बाज़ार का तो मैं बहाना करके चली आई वरना तुम तो मुझे काट ही देतीं। 

लीला : कैसी बात करती हो? मैं एक बार काट भी दूँ, लेकिन अमित! अपने मुँह में डालने से पहले रसमलाई लेकर तुम्हारे फ़्लैट में दौड़ता। मैं कोई भी चीज़ घर में बनाऊँ या बाहर से लाऊँ, अमित जब तक तुम्हारे भोग नहीं लगा लेता, हम लोग खा थोड़े ही सकते हैं। रजनी आंटी तो हीरो हैं उसकी।  (दोनों खिलखिलाकर हँसती हैं)

रजनी : बहुत मेधावी बच्चा है अमित...तुम देखना तो, आगे जाकर क्या बनता है!

लीला : बस, सब तुम्हारा ही आशीर्वाद है।

(फिर घंटी बजती है। लीला एक तरह से दौड़ते हुए दरवाज़ा खोलती है। अमित का प्रवेश। रोज़ की तरह भारी बस्ते की जगह एक हल्का-सा थैला है।)

रजनी : (अमित को बाँहों में भरने के लिए दोनों बाँहें फैलाते हुए आगे बढ़ती है।) कांग्रेचुलेशंस अमित। बधाई देने के लिए रजनी आंटी पहले से मौजूद हैं। (अमित का चेहरा उतरा हुआ है, पर दोनों में से अभी तक उसपर किसी का ध्यान नहीं गया। अमित आँसू भरी आँखों से थैले में से रिपोर्ट निकालकर माँ की ओर फेंकते हुए।)

अमित : लो...लो...देखो, क्या हुआ है मेरे रिज़ल्ट का। मैंने कितना कहा था कि मैथ्स में भी मेरी ट्यूशन लगवा दीजिए, वरना मेरा रिज़ल्ट बिगड़ जाएगा। बस वही हुआ। मैथ्स में ही तो पूरे नंबर आ सकते हैं, रिज़ल्ट बन-बिगड़ सकता है। रिपोर्ट रजनी देखने लगती है। (लीला उसे अपनी बाँहों में भरकर)

लीला : पर तू तो सारे सवाल ठीक करके आया था। यहाँ आकर पापा के सामने तूने फिर से किया था अपना सारा पेपर। सब तो ठीक था। तेरे पापा ने नहीं कहा था कि चार-पाँच नंबर भले ही काट ले सफ़ाई-वफ़ाई के पर नाइंटी-फ़ाइव तो तेरे पक्के हैं। 

रजनी : (रिपोर्ट देखते हुए) पर मिले तो कुल बहत्तर ही हैं। (फिर दूसरे विषयों के नंबर भी पढ़ने लगती है इंगलिश 86, हिस्ट्री 80, सिविक्स 88, हिंदी 82, ड्राइंग 90...सबसे कम मैथ्स में ही।)

अमित : (गुस्से और दुख से) कम तो होंगे ही। ट्यूशन नहीं लेने से मिलते हैं कहीं अच्छे नंबर? सर तो बार-बार कहते ही थे कि ट्यूशन कर लो, ट्यूशन कर लो वरना फिर बाद में मत रोना।  (रो पड़ता है)

लीला : (अपराधी की तरह सफ़ाई देते हुए) तुझे अंग्रेज़ी को लेकर थोड़ी परेशानी थी सो अंग्रेज़ी में करवा दी थी ट्यूशन। अब दो-दो विषयों की ट्यूशन...फिर लंबी-चौड़ी फ़ीस। बेटे... (अपनी आर्थिक मजबूरी की बात वह शब्दों से नहीं, चेहरे से व्यक्त करती है।) पर यह तो अँधेर ही हुआ कि सारा पेपर ठीक हो, फिर भी नंबर काट लो। 

रजनी : (रजनी की भौंहों में एकाएक बल पड़ जाते हैं। वह रोते हुए अमित को खींचकर अपने पास सटा लेती है) रोओ मत। (उसके आँसू पोंछते हुए) अमित रोएगा नहीं...समझे। मैं जो पूछती हूँ उसका जवाब देना। बस। (कुछ देर रुककर) तुझे अच्छी तरह याद है कि तूने पूरा पेपर ठीक किया था? (अमित स्वीकृति में सिर हिलाता है) पापा के पास दुबारा पेपर करने से पहले दोस्तों से या किताबों से उन सवालों के जवाब तो नहीं देख लिए थे? 

अमित : नहीं। ज्यों-के-त्यों आकर कर दिए थे। हमको आते थे वो सारे सवाल।

रजनी : मैथ्स के सर कौन हैं?

अमित : मिस्टर पाठक। 

रजनी : कितने लड़के ट्यूशन लेते हैं उनसे?

अमित : बाइस। साल के शुरू में तो आठ लेते थे...फिर पहले टर्मिनल के बाद से पंद्रह हो गए थे। हाफ़-ईयरली के बाद सात लड़कों ने और लेना शुरू कर दिया। मुझसे भी तभी से कह रहे थे।

लीला : हाफ़-ईयरली में तो इसके नाइंटी-सिक्स नंबर आए थे...इसी ने बताया था कि क्लास में सबसे ज़्यादा हैं।

रजनी : उसके बाद भी कहते थे कि ट्यूशन लो?

अमित : हाँ! कॉपी लौटाते हुए कहा था कि तुमने किया तो अच्छा है पर यह तो हाफ़-ईयरली है...बहुत आसान पेपर होता है इसका तो। अब अगर ईयरली में भी पूरे नंबर लेने हैं तो तुरंत ट्यूशन लेना शुरू कर दो। वरना रह जाओगे। सात लड़कों ने तो शुरू भी कर दिया था। पर मैंने जब मम्मी-पापा से कहा, हमेशा बस एक ही जवाब (मम्मी की नकल उतारते हुए) मैथ्स में तो तू वैसे ही बहुत अच्छा है, क्या करेगा ट्यूशन लेकर? देख लिया अब? सिक्स्थ पोज़ीशन आई है मेरी। जो आज तक कभी नहीं आई थी। (अमित की आँखों से फिर आँसू टपक पड़ते हैं।)

रजनीः (डाँटते हुए) फिर आँसू। जानता नहीं, रोने वाले बच्चे रजनी आंटी को बिलकुल पसंद नहीं। मम्मी ने बिलकुल ठीक ही कहा और ठीक ही किया। जिस विषय में तुम वैसे ही बहुत अच्छे हो, उसमें क्यों लोगे ट्यूशन? ट्यूशन तो कमज़ोर बच्चे लेते हैं।

अमित :आप जानती नहीं आंटी...अच्छे-बुरे की बात नहीं होती। अगर सर कहें और बार-बार कहें तो लेनी ही होती है। वरना तो नंबर कम हो ही जाते हैं।

रजनी : पेपर अच्छा करो तब भी नंबर कम हो जाते हैं?

अमित  : हाँ, कितना ही अच्छा करो फिर भी कम हो जाते हैं...जैसे मेरे हो गए।

रजनी : यानी कि अच्छा पेपर करने पर भी कम आते हैं। सिर्फ़ इसलिए कि ट्यूशन नहीं ली थी! तो यह तो सर की गलती नहीं, बदमाशी है और तू मम्मी से लड़ रहा है। सर से जाकर लड़। 

(अमित इस भाव से सिर हिलाता है मानो कितनी बेकार की बात कर रही हैं रजनी आंटी। लीला दो गिलासों में शिकंजी बनाकर लाती है। अमित लेने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता तो रजनी घुड़कती है।)

रजनी : चलो पियो शिकंजी। देखते नहीं, चेहरा कैसे पसीना-पसीना हो रहा है। (दोनों शिकंजी पीने लगते हैं। इस दौरान रजनी कुछ सोच रही है। शिकंजी खत्म करके)

कल आप नौ बजे तैयार रहिए अमित साहब...आपके स्कूल चलना है।

अमित  : (अमित एकदम डर जाता है) कल से तो छुट्टी है। पर आप अगर स्कूल जाकर कुछ कहेंगी तो सर मुझसे बहुत गुस्सा हो जाएँगे...वहाँ मत जाइए...प्लीज़ वहाँ बिलकुल मत जाइए।

लीला : हाँ रजनी तुम कुछ करोगी-कहोगी तो अगले साल कहीं और ज़्यादा परेशान न करें इसे। अब जब रहना इसी स्कूल में है तो इन लोगों से झगड़ा।

रजनी : (बात को बीच में ही काटकर गुस्से से) यानी कि वे लोग जो भी जुलुम-ज़्यादती करें, हम लोग चुपचाप बर्दाश्त करते जाएँ? सही बात कहने में डर लग रहा है तुझे, तेरी माँ को! अरे जब बच्चे ने सारा पेपर ठीक किया है तो हम कॉपी देखने की माँग तो कर ही सकते हैं...पता तो लगे कि आखिर किस बात के नंबर काटे हैं?

अमित : (झुँझलाकर) बता तो दिया आंटी। आप...

रजनी (गुस्से से) ठीक है तो अब बैठकर रोओ तुम माँ–बेटे दोनों। (दनदनाती निकल जाती है। दोनों के चेहरे पर एक असहाय-सा भाव।)

लीला : अब यह रजनी कोई और मुसीबत न खड़ी करे। 

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

(स्कूल के हैडमास्टर का कमरा। बड़ी-सी टेबल। दीवार के सहारे रखी काँच की अलमारी में बच्चों द्वारा जीते हुए कप और शील्ड्स जमे हुए रखे हैं। दीवार पर कुछ नेताओं की तसवीरें, एक बड़ा-सा मैप लटका है। एक स्कूल के हैडमास्टर के कमरे का वातावरण तैयार किया जाए। हैडमास्टर काम में व्यस्त है। चपरासी बड़े अदब से एक चिट लाकर रखता है। हैडमास्टर कुछ क्षण उसे देखता रहता है।)

हैडमास्टर : बुलाओ। (रजनी का प्रवेश नमस्कार करती है।)

हैडमास्टर : बैठिए (कुछ देर रुककर) कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?

रजनी : मैं सेविंथ क्लास के अमित सक्सेना की मैथ्स की कॉपी देखना चाहती हूँ (हैडमास्टर के चेहरे पर एेसा भाव जैसे वह कुछ समझा न हो) ईयरली एक्ज़ाम्स की, कल ही जिसका रिज़ल्ट निकला है।

हैडमास्टर : सॉरी मैडम, ईयरली एक्ज़ाम्स की कॉपियाँ तो हम लोग नहीं दिखाते हैं।

रजनी : जानती हूँ मैं, लेकिन बात यह है कि अमित ने मैथ्स का पूरा पेपर ठीक किया था लेकिन उसे कुल बहत्तर नंबर ही मिले हैं। कॉपी देखकर सिर्फ़ यह जानना चाहती हूँ कि अमित को अपने बारे में कुछ गलतफ़हमी हो गई थी या (एक-एक शब्द पर ज़ोर देकर) गलती एक्ज़ामिनर की है।

हैडमास्टर : (सारी बात को बहुत हलके ढंग से लेते हुए) आप भी कमाल करती हैं, बच्चे ने कहा और आपने मान लिया। अरे, हर बच्चा घर जाकर यही कहता है कि उसने पेपर बहुत अच्छा किया है और उसे बहुत अच्छे नंबर मिलेंगे। अगर हम इसी तरह कॉपियाँ दिखाने लग जाएँ तो यहाँ तो पेरेंट्स की भीड़ लगी रहे सारे समय। इसीलिए तो ईयरली एक्ज़ाम्स की कॉपियाँ न दिखाने का नियम बनाया गया है स्कूलों में।

रजनी (अपने गुस्से पर काबू पाते हुए) देखिए आप चाहें तो अमित का पूरा रिज़ल्ट देख सकते हैं। मैथ्स में हमेशा सेंट-परसेंट नंबर लेता रहा है। इस साल भी उसने पूरा पेपर ठीक किया है। (तैश आ ही जाता है) कॉपी देखकर मैं सिर्फ़ यह जानना चाहती हूँ कि नंबर आखिर कटे किस बात के हैं?

हैडमास्टर : आप बहस करके बेकार ही अपना और मेरा समय बर्बाद कर रही हैं। मैंने कह दिया न कि इन कॉपियों को दिखाने का नियम नहीं है और मैं नियम नहीं तोड़ूँगा।

रजनी (व्यंग्य से) नियम! यानी कि आपका स्कूल बहुत नियम से चलता है।

हैडमास्टर : (गुस्से से) व्हॉट डू यू मीन?

रजनी : आई मीन व्हॉट आई से। नियम का ज़रा भी खयाल होता तो इस तरह की हरकतें नहीं होतीं स्कूल में। कोई बच्चा बहुत अच्छा है किसी विषय में फिर भी उसे मजबूर किया जाता है कि वह ट्यूशन ले। यह कौन-सा नियम है आपके स्कूल का?

हैडमास्टर : देखिए यह टीचर्स और स्टूडेंट्स का अपना आपसी मामला है, वो पढ़ने जाते हैं और वो पढ़ाते हैं। इसमें न स्कूल आता है, न स्कूल के नियम! इस बारे में हम क्या कर सकते हैं?

रजनी : कुछ नहीं कर सकते आप? तो मेहरबानी करके यह कुर्सी छोड़ दीजिए। क्योंकि यहाँ पर कुछ कर सकने वाला आदमी चाहिए। जो ट्यूशन के नाम पर चलने वाली धाँधलियों को रोक सके...मासूम और बेगुनाह बच्चों को एेसे टीचर्स के शिकंजों से बचा सके जो ट्यूशन न लेने पर बच्चों के नंबर काट लेते हैं...और आप हैं कि कॉपियाँ न दिखाने के नियम से उनके सारे गुनाह ढक देते हैं।

हैडमास्टर : (चीखकर) विल यू प्लीज़ गेट आउट अॉफ दिस रूम। (ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजाने लगता है। दौड़ता हुआ चपरासी आता है) मेमसाहब को बाहर ले जाओ।

रजनी : मुझे बाहर करने की ज़रूरत नहीं। बाहर कीजिए उन सब टीचर्स को जिन्होंने आपकी नाक के नीचे ट्यूशन का यह घिनौना रैकेट चला रखा है। (व्यंग्य से) पर आप तो कुछ कर नहीं सकते, इसलिए अब मुझे ही कुछ करना होगा और मैं करूँगी, देखिएगा आप। (तमतमाती हुई निकल जाती है।) (हैडमास्टर चपरासी पर ही बिगड़ पड़ता है) जाने किस-किस को भेज देते हो भीतर।

चपरासी : मैंने तो आपको स्लिप लाकर दी थी साहब।

(हैडमास्टर गुस्से में स्लिप की चिंदी-चिंदी करके फेंक देता है, कुछ इस भाव से मानो रजनी की ही चि्ांदियाँ बिखेर रहा हो।)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

(रजनी का फ़्लैट। शाम का समय। घंटी बजती है। रजनी आकर दरवाज़ा खोलती है। पति का प्रवेश। उसके हाथ से ब्रीफ़केस लेती है।)

पति : (जूते खोलते हुए) तुम आज दिन में कहीं बाहर गई थीं क्या?

रजनी : तुम्हें कैसे मालूम?

पति : फ़ोन किया था। एक फ़ाइल रह गई थी, सोचा चपरासी को भेजकर मँगवा लूँ पर कोई घर में हो तब न। (पति के चेहरे पर खीज भरा गुस्सा पुता हुआ है)

रजनी : तुम फ़ाइल भूल गए...और जिसके बारे में मुझे पता भी नहीं। पर फिर भी उसके लिए मुझे घर बैठना चाहिए। यह कौन-सी बात हुई?

पति : (ज़रा शांत होते हुए) अच्छा गई कहाँ थीं?

रजनी (एक स्कूल का नाम लेती है)

पति : (स्कूल का नाम दोहराता है)...तुम क्या करने गई थीं वहाँ?

रजनी (गद्गद भाव से) पहले चाय ले आऊँ, फिर बताती हूँ।

(कैमरा रजनी के साथ किचन में। गुनगुनाते हुए रजनी खाने का भी कुछ बना रही है। लगता है जो कुछ करके आई, उससे बहुत प्रसन्न है।)

(दृश्य फिर बाहर के कमरे में। नाश्ते की प्लेट काफ़ी खाली हो चुकी है, जिससे लगे कि रजनी सारी बात बता चुकी है।)

रजनी : बोलती बंद कर दी हैडमास्टर साहब की। जवाब देते नहीं बना तो चिल्लाने लगे। पर मैं क्या छोड़ने वाली हूँ इस बात को?

पति : अच्छा मास्टर लोग ट्यूशन करते हैं या धंधा करते हैं, पर तुम्हें अभी बैठे-बिठाए इससे क्या परेशानी हो गई? तुम्हारा बेटा तो अभी पढ़ने नहीं जा रहा है न?

रजनी (एकदम भड़क जाती है) यानी कि मेरा बेटा जाए तभी आवाज़ उठानी चाहिए...अमित के लिए नहीं उठानी चाहिए...और जो इतने-इतने बच्चे इसका शिकार हो रहे हैं, उनके लिए नहीं उठानी चाहिए। सब कुछ जानने के बाद भी नहीं उठानी चाहिए?

पति : ठेका लिया है तुमने सारी दुनिया का?

रजनी : देखो, तुम मुझे फिर गुस्सा दिला रहे हो रवि...गलती करने वाला तो है ही गुनहगार, पर उसे बर्दाश्त करने वाला भी कम गुनहगार नहीं होता जैसे लीला बेन और कांति भाई और हज़ारों-हज़ारों माँ-बाप। लेकिन सबसे बड़ा गुनहगार तो वह है जो चारों तरफ़ अन्याय, अत्याचार और तरह-तरह की धाँधलियों को देखकर भी चुप बैठा रहता है, जैसे तुम। (नकल उतारते हुए) हमें क्या करना है, हमने कोई ठेका ले रखा है दुनिया का। (गुस्से और हिकारत से) माई फ़ुट (उठकर भीतर जाने लगती है। जाते-जाते मुड़कर) तुम जैसे लोगों के कारण ही तो इस देश में कुछ नहीं होता, हो भी नहीं सकता! (भीतर चली जाती है।)

पति : (बेहद हताश भाव से दोनों हाथों से माथा थामकर) चढ़ा दिया सूली पर।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

(डायरेक्टर अॉफ एजुकेशन के अॉफ़िस का बाहरी कक्ष। कमरे के बाहर उसके नाम और पद की तख्ती लगी है। साथ ही मिलने का समय भी लिखा है। एक स्टूल पर चपरासी बैठा है। सामने की बेंच पर रजनी और तीन-चार लोग और बैठे हैं–प्रतीक्षारत। रजनी के चेहरे से बेचैनी टपक रही है। बार-बार घड़ी देखती है, मिलने का समय समाप्त होता जा रहा है।)

रजनी  : (चपरासी से) कितनी देर और बैठना होगा?

चपरासी : हम क्या बोलेगा...जब साहब घंटी मारेगा...बुलाएगा तभी तो ले जाएगा। बहुत बिज़ी रहता न साहब।

रजनी (अपने में ही गुनगुनाते हुए) यह तो लोगों से मिलने का समय है, न जाने किसमें बिज़ी बनकर बैठ जाते हैं (चपरासी दूसरी तरफ़ देखने लगता है।)

(कैमरा अॉफिस के अंदर चला जाता है। साहब मेज़ पर पेपर-वेट घुमा रहा है। फिर घड़ी देखता है, फिर घुमाने लगता है। बाहर एक आदमी आता है। अपने नाम की स्लिप के नीचे पाँच रुपए का एक नोट रखकर देता है और चपरासी का कंधा थपथपाता है। चपरासी हँसकर भीतर जाता है। लौटकर उस आदमी को तुरंत अपने साथ ले जाता है। रजनी के चेहरे पर तनाव,घूरकर चपरासी को देखती है। थोड़ी देर में आदमी बाहर निकलता है। रजनी उठकर दनदनाती हुई भीतर जाने लगती है।)

चपरासी : अरे...अरे...अरे...किधर कू जाता? अभी घंटी बजा क्या?

रजनी : घंटी तो मिलने का समय खत्म होने तक बजेगी भी नहीं। (दरवाज़ा धकेलकर भीतर चली जाती है)

चपरासी : अरे कैसी औरत है...सुनतीच नई। (वहाँ बैठे दो-तीन लोग हँसने लगते हैं।)

(दृश्य कमरे के भीतर। निदेशक कुर्सी की पीठ से टिककर सिगरेट पी रहा है। रजनी को देखकर आश्चर्य से।)

निदेशक : आपको स्लिप भेजकर भीतर आना चाहिए न।

रजनी (मुस्कराकर) स्लिप तो घंटे भर से आपके चपरासी की जेब में पड़ी है। और शायद दो-चार दिन चक्कर लगवाने तक पड़ी ही रहेगी।

निदेशक : क्या कह रही हैं आप?

रजनी : तो क्या यह सीधी-साफ़-सी बात भी मुझे ही समझानी होगी आपको? खैर अभी छोड़िए इस बात को, इस समय मैं आपके पास किसी दूसरे ही काम से आई हूँ।

(निदेशक के चेहरे पर रजनी को लेकर एक आश्चर्य मिश्रित कौतूहल का भाव उभरता है।)

निदेशक : कहिए।

रजनी (थोड़ा सोचते हुए) देखिए, मैं स्कूलों, विशेषकर प्राइवेट स्कूलों और बोर्ड के आपसी रिलेशंस के बारे में कुछ जानकारी इकट्ठा कर रही हूँ।

निदेशक : कोई रिसर्च प्रोजेक्ट है क्या? व्हेरी इंटरेसि्ंटग सब्जेक्ट।

रजनी : बस कुछ एेसा ही समझ लीजिए।

निदेशक : कहिए आप क्या जानना चाहती हैं?

रजनी : जिन प्राइवेट स्कूलों को आप रिकगनाइज़ कर लेते हैं उन्हें बोर्ड शायद 90% ग्रांट देता है।

निदेशक : (ज़रा गर्व से) जी हाँ, देता है। बोर्ड का काम ही यह है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जितना भी हो सके सहयोग करे। इट्स अवर ड्यूटी मैडम।

रजनी : जब इतनी बड़ी एड देते हैं तो आपका कोई कंट्रोल भी रहता होगा स्कूलों पर।

निदेशक : अॉफ़कोर्स। बोर्ड के बहुत से एेसे नियम हैं जो स्कूलों को मानने होते हैं, स्कूल मानते हैं। सिलेबस बोर्ड बनाता है...फ़ाइनल ईयर के एक्ज़ाम्स बोर्ड कंडक्ट करता है।

रजनी : (निदेशक के चेहरे पर नज़रें गड़ाकर) स्कूलों में आजकल प्राइवेट ट्यूशंस का जो सिलसिला चला हुआ है, ट्यूशंस क्या बच्चों को लूटने का जो धंधा चला हुआ है, उसके बारे में आपका बोर्ड क्या करता है?

निदेशक : (बड़े सहज भाव से) इसमें धंधे की क्या बात है? जब किसी का बच्चा कमज़ोर होता है तभी उसके माँ-बाप ट्यूशन लगवाते हैं। अगर लगे कि कोई टीचर लूट रहा है तो उस टीचर से न लें ट्यूशन, किसी और के पास चले जाएँ...यह कोई मजबूरी तो है नहीं।

रजनी : बच्चा कमज़ोर नहीं, होशियार है...बहुत होशियार...उसके बावजूद उसका टीचर लगातार उसे कोंचता रहता है कि वह ट्यूशन ले...वह ट्यूशन ले वरना पछताएगा। लेकिन बच्चे के माँ-बाप को ज़रूरी नहीं लगता और वे नहीं लगवाते। जानते हैं क्या हुआ? मैथ्स का पूरा पेपर ठीक करने के बावजूद उसे कुल 72 नंबर मिलते हैं, जानते हैं क्यों?...क्योंकि उसने टीचर के बार-बार कहने पर भी ट्यूशन नहीं ली।

निदेशक : वैरी सैड! हैडमास्टर को एक्शन लेना चाहिए एेसे टीचर के खिलाफ़।

रजनी : क्या खूब! आप कहते हैं कि हैडमास्टर को एक्शन लेना चाहिए...हैडमास्टर कहते हैं मैं कुछ नहीं कर सकता, तब करेगा कौन? मैं पूछती हूँ कि ट्यूशन के नाम पर चलने वाले इस घिनौने रैकेट को तोड़ने के लिए दखलअंदाज़ी नहीं करनी चाहिए आपको, आपके बोर्ड को? (चेहरा तमतमा जाता है)

निदेशक : लेकिन हमारे पास तो आज तक किसी पेरेंट से इस तरह की कोई शिकायत नहीं आई।

रजनी : यानी की शिकायत आने पर ही आप इस बारे में कुछ सोच सकते हैं। वैसे शिक्षा के नाम पर दिन-दहाड़े चलने वाली इस दुकानदारी की आपके (बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग से) बोर्ड अॉफ एजुकेशन को कोई जानकारी ही नहीं, कोई चिंता ही नहीं?

निदेशक : कैसी बात करती हैं आप? कितने इंपोर्टेंट मैटर्स रहते हैं हम लोगों के पास? अभी पिछले छह महीने से तो नई शिक्षा प्रणाली को लेकर ही कितने सेमिनार्स अॉर्गनाइज़ किए हैं हमने?

रजनी (व्यंग्य से) ओह, इंपोर्टेंट मैटर्स, नई शिक्षा प्रणाली। अरे पहले इस शिक्षा प्रणाली के छेदों को तो रोकिए वरना बच्चों के भविष्य के साथ-साथ आपकी नई शिक्षा प्रणाली भी छनकर गड्ढे में चली जाएगी।

निदेशक : (थोड़े गुस्से के साथ) आप ही पहली महिला हैं, और हो सकता है कि आखिरी भी हों, जो इस तरह की शिकायत लेकर आई हैं।

रजनी  : ठीक है तो फिर आपके पास शिकायत का ढेर ही लगवाकर रहूँगी।

(टके से उठकर बाहर चली जाती है, निदेशक देखता रहता है, फिर कंधे उचका देता है।)

(अब मोंटाज में कुछ दृश्य दिखाए जाएँ। रजनी फ़ोन कर रही है। मेज़ पर कुछ पत्र रखे हैं और रजनी एक रजिस्टर में उनके नाम पते उतार रही है। साथ में एक-दो महिलाएँ और भी हैं। फिर एक के बाद एक तीन-चार घरों में माँ-बाप से मिल रही है उन्हें समझा रही है। साथ में लीला बेन और तीन-चार महिलाएँ और भी हैं।)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

(किसी अखबार का दफ़्तर। कमरे में संपादक बैठे हैं, साथ में तीन-चार स्त्रियों के साथ रजनी बैठी है।)

संपादक : आपने तो इसे बाकायदा एक आंदोलन का रूप ही दे दिया। बहुत अच्छा किया। इसके बिना यहाँ चीज़ें बदलती भी तो नहीं हैं। शिक्षा के क्षेत्र में फैली इस दुकानदारी को तो बंद होना ही चाहिए।

रजनी : (एकाएक जोश में आकर) आप भी महसूस करते हैं न एेसा?... तो फिर साथ दीजिए हमारा। अखबार यदि किसी इश्यू को उठा ले और लगातार उस पर चोट करता रहे तो फिर वह थोड़े से लोगों की बात नहीं रह जाती। सबकी बन जाती है...आँख मूँदकर नहीं रह सकता फिर कोई उससे। आप सोचिए ज़रा अगर इसके खिलाफ़ कोई नियम बनता है तो (आवेश के मारे जैसे बोला नहीं जा रहा है।) कितने पेरेंट्स को राहत मिलेगी...कितने बच्चों का भविष्य सुधर जाएगा, उन्हें अपनी मेहनत का फल मिलेगा, माँ-बाप के पैसे का नहीं, ...शिक्षा के नाम पर बचपन से ही उनके दिमाग में यह तो नहीं भरेगा कि पैसा ही सब कुछ है...वे...वे...

संपादक : (हँसकर) बस-बस मैं समझ गया आपकी सारी तकलीफ़, आपका सारा गुस्सा।

रजनी : तो फिर दीजिए हमारा साथ...उठाइए इस इश्यू को। लगातार लिखिए और धुआँधार लिखिए।

संपादक : इसमें आप अखबारवालों को अपने साथ ही पाएँगी। अमित के उदाहरण से आपकी सारी बात मैंने नोट कर ली है। एक अच्छा-सा राइट-अप तैयार करके पी.टी.आई. के द्वारा मैं एक साथ फ़्लैश करवाता हूँ।

रजनी : (गद्गद होते हुए) एक काम और कीजिए। 25 तारीख को हम लोग पेरेंट्स की एक मीटिंग कर रहे हैं, राइट-अप के साथ इसकी सूचना भी दे दीजिए तो सब लोगों तक खबर पहुँच जाएगी। व्यक्तिगत तौर पर तो हम मुश्किल से सौ-सवा सौ लोगों से संपर्क कर पाए हैं...वह भी रात-दिन भाग-दौड़ करके (ज़रा-सा रुककर) अधिक-से-अधिक लोगों के आने के आग्रह के साथ सूचना दीजिए।

संपादक : दी। (सब लोग हँस पड़ते हैं।)

रजनी : ये हुई न कुछ बात।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

(मीटिंग का स्थान। बाहर कपड़े का बैनर लगा हुआ है। बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं और भीतर जा रहे हैं, लोग खुश हैं, लोगों में जोश है। विरोध और विद्रोह का पूरा माहौल बना हुआ है। दृश्य कटकर अंदर जाता है। हॉल भरा हुआ है। एक ओर प्रेस वाले बैठे हैं, इसे बाकायदा फ़ोकस करना है। एक महिला माइक पर से उतरकर नीचे आती है। हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट। अब मंच पर से उठकर रजनी माइक पर आती है। पहली पंक्ति में रजनी के पति भी बैठे हैं।)

बहनों और भाइयों,

इतनी बड़ी संख्या में आपकी उपस्थिति और जोश ही बता रहा है कि अब हमारी मंजिल दूर नहीं है। इन दो महीनों में लोगों से मिलने पर इस समस्या के कई पहलू हमारे सामने आए...कुछ अभी आप लोगों ने भी यहाँ सुने। (कुछ रुककर) यह भी सामने आया कि बहुत से बच्चों के लिए ट्यूशन ज़रूरी भी है। माँएँ इस लायक नहीं होतीं कि अपने बच्चों को पढ़ा सकें और पिता (ज़रा रुककर) जैसे वे घर के और किसी काम में ज़रा-सी भी मदद नहीं करते, बच्चों को भी नहीं पढ़ाते। (ठहाका, कैमरा उसके पति पर भी जाए) तब कमज़ोर बच्चों के लिए ट्यूशन ज़रूरी भी हो जाती है। (रुककर) बड़ा अच्छा लगा जब टीचर्स की ओर से भी एक प्रतिनिधि ने आकर बताया कि कई प्राइवेट स्कूलों में तो उन्हें इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि ट्यूशन न करें तो उनका गुज़ारा ही न हो। कई जगह तो एेसा भी है कि कम तनख्वाह देकर ज़्यादा पर दस्तखत करवाए जाते हैं। एेसे टीचर्स से मेरा अनुरोध है कि वे संगठित होकर एक आंदोलन चलाएँ और इस अन्याय का पर्दाफ़ाश करें (हॉल में बैठा हुआ पति धीरे से फुसफुसाता है, लो, अब एक और आंदोलन का मसाला मिल गया, कैमरा फिर रजनी पर) इसलिए अब हम अपनी समस्या से जुड़ी सारी बातों को नज़र में रखते हुए ही बोर्ड के सामने यह प्रस्ताव रखेंगे कि वह एेसा नियम बनाए (एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए) कि कोई भी टीचर अपने ही स्कूल के छात्रों का ट्यूशन नहीं करेगा। (रुककर) एेसी स्थिति में बच्चों के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करने, उनके नंबर काटने की गंदी हरकतें अपने आप बंद हो जाएँगी। साथ ही यह भी हो कि इस नियम को तोड़ने वाले टीचर्स के खिलाफ़ सख्त-से-सख्त कार्यवाही की जाएगी...। अब आप लोग अपनी राय दीजिए।

(सारा हॉल, एप्रूव्ड, एप्रूव्ड की आवाज़ों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है।)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

(रजनी का फ़्लैट। सवेरे का समय। कमरे में पति अखबार पढ़ रहा है। पहला पृष्ठ पलटते ही रजनी की तस्वीर दिखाई देती है, जल्दी-जल्दी पढ़ता है, फिर एकदम चिल्लाता है।)

पति : अरे रजनी...रजनी, सुनो तो बोर्ड ने तुम लोगों का प्रस्ताव ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया।

रजनी (भीतर से दौड़ती हुई आती है। अखबार छीनकर जल्दी-जल्दी पढ़ती है। चेहरे पर संतोष, प्रसन्नता और गर्व का भाव।)


रजनी : तो मान लिया गया हमारा प्रस्ताव...बिलकुल जैसा का तैसा और बन गया यह नियम। (खुशी के मारे अखबार को ही छाती से चिपका लेती है।) मैं तो कहती हूँ कि अगर डटकर मुकाबला किया जाए तो कौन-सा एेसा अन्याय है, जिसकी धज्जियाँ न बिखेरी जा सकती हैं।

पति : (मुग्ध भाव से उसे देखते हुए) आई एम प्राउड अॉफ यू रजनी...रियली, रियली...आई एम वैरी प्राउड अॉफ यू।

रजनी : (इतराते हुए) हूँ  दो महीने तक लगातार मेरी धज्जियाँ बिखेरने के बाद। (दोनों हँसते हैं।)

(लीला बेन, कांतिभाई और अमित का प्रवेश)

लीला बेन : उस दिन तुम्हारी जो रसमलाई रह गई, वह आज खाओ।

कांतिभाई : और सबके हिस्से की तुम्हीं खाओ।

(अमित दौड़कर अपने हाथ से उसे रसमलाई खिलाने जाता है पर रजनी उसे अमित के मुँह में ही डाल देती है।)

(सब हँसते हैं। हँसी के साथ ही धीरे-धीरे दृश्य समाप्त हो जाता है।)

अभ्यास

पाठ के साथ

1. रजनी ने अमित के मुद्दे को गंभीरता से लिया, क्योंकि –

क. वह अमित से बहुत स्नेह करती थी।

ख. अमित उसकी मित्र लीला का बेटा था।

ग. वह अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने की सामर्थ्य रखती थी। घ. उसे अखबार की सुर्खियों में आने का शौक था।

2. जब किसी का बच्चा कमज़ोर होता है, तभी उसके माँ-बाप ट्यूशन लगवाते हैं। अगर लगे कि कोई टीचर लूट रहा है, तो उस टीचर से न ले ट्यूशन, किसी और के पास चले जाएँ... यह कोई मजबूरी तो है नहीं– प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताएँ कि यह संवाद आपको किस सीमा तक सही या गलत लगता है, तर्क दीजिए।

3. तो एक और आंदोलन का मसला मिल गया– फुसफुसाकर कही गई यह बात–

क. किसने किस प्रसंग में कही?

ख. इससे कहने वाले की किस मानसिकता का पता चलता हैै।

4. रजनी धारावाहिक की इस कड़ी की मुख्य समस्या क्या है? क्या होता अगर–

क. अमित का पर्चा सचमुच खराब होता।

ख. संपादक रजनी का साथ न देता।

पाठ के आस-पास

1. गलती करने वाला तो है ही गुनहगार, पर उसे बर्दाश्त करने वाला भी कम गुनहगार नहीं होता– इस संवाद के संदर्भ में आप सबसे ज़्यादा किसे और क्यों गुनहगार मानते हैं?

2. स्त्री के चरित्र की बनी बनाई धारणा से रजनी का चेहरा किन मायनों में अलग है?

3. पाठ के अंत में मीटिंग के स्थान का विवरण कोष्ठक में दिया गया है। यदि इसी दृश्य को फ़िल्माया जाए तो आप कौन-कौन से निर्देश देंगे?

4. इस पटकथा में दृश्य-संख्या का उल्लेख नहीं है। मगर गिनती करें तो सात दृश्य हैं। आप किस आधार पर इन दृश्यों को अलग करेंगे?

भाषा की बात

1. निम्नलिखित वाक्यों के रेखांकित अंश में जो अर्थ निहित हैं उन्हें स्पष्ट करते हुए लिखिए–

(क) वरना तुम तो मुझे काट ही देतीं

(ख) अमित जबतक तुम्हारे भोग नहीं लगा लेता, हमलोग खा थोड़े ही सकते हैं।

(ग) बस-बस, मैं समझ गया।

कोड मिक्सिंग/कोड स्विचिंग

1. कोई रिसर्च प्रोजेक्ट है क्या? व्हेरी इंटरेसि्ंटग सब्जेक्ट।

ऊपर दिए गए संवाद में दो पंक्तियाँ हैं पहली पंक्ति में रेखांकित अंश हिंदी से अलग अंग्रेज़ी भाषा का है जबकि शेष हिंदी भाषा का है। दूसरा वाक्य पूरी तरह अंग्रेज़ी में है। हम बोलते समय कई बार एक ही वाक्य में दो भाषाओं (कोड) का इस्तेमाल करते हैं। यह कोड मिक्सिंग कहलाता है। जबकि एक भाषा में बोलते-बोलते दूसरी भाषा का इस्तेमाल करना कोड स्विचिंग कहलाता है। पाठ में से कोड मिक्सिंग और कोड स्विचिंग के तीन-तीन उदाहरण चुनिए और हिंदी भाषा में रूपांतरण करके लिखिए।

पटकथा की दुनिया

• आपने दूरदर्शन या सिनेमा हॉल में अनेक चलचित्र देखे होंगे। पर्दे पर चीज़ें जिस सिलसिलेवार ढंग से चलती हैं उसमें पटकथा का विशेष योगदान होता है। पटकथा कई महत्वपूर्ण संकेत देती है, जैसे–

  • कहानी / कथा
  • संवादों की विषय-वस्तु
  • संवाद अदायगी का तरीका
  • आस-पास का वातावरण/दृश्य
  • दृश्य का बदलना

इस पुस्तक के अपने पसंदीदा पाठ के किसी एक अंश को पटकथा में रूपांतरित कीजिए।

शब्द-छवि

कांग्रेचुलेशंस - बधाई हो, मुबारक हो

हाफ़-ईयरली - छमाही, अर्द्धवार्षिक

बेगुनाह - जिसका कोई गुनाह न हो, निर्दोष

हिकारत - उपेक्षा डायरेक्टर अॉफ़

एजुकेशन - शिक्षा निदेशक

रिकगनाइज़ - मान्य

रिसर्च प्रोजेक्ट - शोध परियोजना

कंडक्ट - संचालन

सुनतीच नई - सुनती ही नहीं

दखलअंदाज़ी - हस्तक्षेप

पेरेंट - अभिभावक

इंपोर्टेंट मैटर्स - महत्वपूर्ण विषय

बाकायदा - कायदे के अनुसार

इश्यू - मुद्दा

फ़ोकस करना - ध्यान में लाना

एप्रूव्ड - स्वीकृत

मोंटाज - दृश्य मीडिया (टेलीविज़न में) में जब अलग दृश्यों या छवियों को एक साथ इकट्ठा कर उसे संयोजित किया जाता है तो उसे मोंटाज कहते हैं। 



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