उचित प्रकार की श्िाक्षा का अथर् है प्रज्ञा को जागृत करना तथा समन्िवत जीवन का पोषण करना और केवल ऐसी ही श्िाक्षा एकनवीन संस्कृति तथा शांतिमय विश्व की स्थापना कर सकेगी। जे. कृष्णमूतिर् कोइर् भी पुस्तक वुफछ शब्दों का संघात है। शब्दों के समूह ही तो पुस्तक कहलाते हैं। परंतु वे शब्द सजाकर इस प्रकार रखे गए होते हैं कि उनसे हम एक अथर् पाते रहते हैं। ;साहित्य का व्याकरण, हशारी प्रसाद द्विवेदीद्ध कलाकार होने के लिए शरूरी है कि वह चीशों को कस कर पकड़े और अनुभव को स्मृति में, स्मृति को अभ्िाव्यक्ित में, तत्व को रूप में ढाले। ;कला का प्रयोजन, अन्स्टर् पिफशरद्ध कहानी शायद समय की कला हैऋ समय के साथ कहानी अनेक प्रकार की कलाएँ दिखाती है। कभी वषो± को समेटकर एक क्षण में बाँध् लेती हैऋ कभी क्षण को खोलकर वषो± में पैफला देती हैऋ कभी समय के दायरे को तोड़ती है तो कभी टुकड़ों को जोड़कर एक दायरा बनाती है। ;कहानी और पैंफटेसी, नामवर ¯सहद्ध पे्रमचंद मूल नामः ध्नपत राय जन्मः सन्् 1880, लमही गाँव ;उ.प्र.द्ध प्रमुख रचनाएँः सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निमर्ला, कायाकल्प, गबन, कमर्भूमि, गोदान ;उपन्यासद्धऋ सोशे वतन, मानसरोवरμआठ खंड में, गुप्त ध्न ;कहानी संग्रहद्धऋ कबर्ला, संग्राम, प्रेम की देवी ;नाटकद्धऋ वुफछ विचार, विविध् प्रसंग ;निबंध् - संग्रहद्ध मृत्युः सन्् 1936 प्रेमचंद हिंदी कथा - साहित्य के श्िाखर पुरुष माने जाते हैं। कथा - साहित्य के इस श्िाखर पुरुष का बचपन अभावों में बीता। स्वूफली श्िाक्षा पूरी करने के बाद पारिवारिक समस्याओं के कारण जैसे - तैसे बी. ए. तक की पढ़ाइर् की। अंग्रेशी में एम.ए. करना चाहते थे लेकिन जीवनयापन के लिए नौकरी करनी पड़ी। सरकारी नौकरी मिली भी लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सिय होने के कारण त्यागपत्रा देना पड़ा। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने के बावजूद लेखन कायर् सुचारफ रूप से चलता रहा। पत्नी श्िावरानी देवी के साथ अंग्रेशों के ख्िालापफ़आंदोलनों में हिस्सा लेते रहे। उनके जीवन का राजनीतिक संघषर् उनकी रचनाओं में सामाजिक संघषर् बनकर सामने आया जिसमें जीवन का यथाथर् और आदशर् दोनों था। हिंदी साहित्य के इतिहास में कहानी और उपन्यास की विध के विकास का काल - विभाजन प्रेमचंद को ही वेंफद्र में रखकर किया जाता रहा है ;प्रेमचंद - पूवर् युग, प्रेमचंद युग, प्रेमचंदोत्तर युगद्ध। यह प्रेमचंद के निविर्वाद महत्त्व का एक स्पष्ट प्रमाण है। वस्तुतः प्रेमचंद ही पहले रचनाकार हैं जिन्होंने कहानी और उपन्यास की विधा को कल्पना और रुमानियत के धुँधलके से निकालकर यथाथर् की ठोस शमीन पर प्रतिष्िठत किया। यथाथर् की शमीन से जुड़कर कहानी किस्सागोइर् तक सीमित न रहकर पढ़ने - पढ़ाने की परंपरा से भी जुड़ी। इसमें उनकी हिंदुस्तानी ;हिंदी - उदूर् मिश्रितद्ध भाषा का विशेष योगदान रहा। उनके यहाँ हिंदुस्तानी भाषा अपने पूरे ठाट - बाट और जातीय स्वरूप के साथ आइर् है। उनका आरंभ्िाक कथा - साहित्य कल्पना, संयोग और रुमानियत के ताने - बाने से बुना गया है। लेकिन एक कथाकार के रूप में उन्होंने लगातार विकास किया और पंच परमेश्वर जैसी कहानी तथा सेवासदन जैसे उपन्यास के साथ सामाजिक जीवन को कहानी का आधर बनाने वाली यथाथर्वादी कला के अग्रदूत के रूप में सामने आए। यथाथर्वाद के भीतर भी आदशोर्न्मुख यथाथर्वाद से आलोचनात्मक यथाथर्वाद तक की विकास - यात्रा प्रेमचंद ने की। आदशोर्न्मुख यथाथर्वाद स्वयं उन्हीं की गढ़ी हुइर् संज्ञा है। यह कहानी और उपन्यास के क्षेत्रा में किए गए उनके ऐसे रचनात्मक प्रयासों पर लागू होती है जो कटु यथाथर् का चित्राण करते हुए भी समस्याओं और अंतविर्रोधें को अंततः एक आदशर्वादी और मनोवांछित समाधन तक पहुँचा देती है। सेवासदन, प्रेमाश्रम आदि उपन्यास और पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, नमक का दारोगा आदि कहानियाँ ऐसी ही हैं। बाद की उनकी रचनाओं में यह आदशर्वादी प्रवृिा कम होती गइर् है और धीरे - धीरे वे ऐसी स्िथति तक पहुँचते हैं जहाँ कठोर वास्तविकता को प्रस्तुत करने में वे किसी तरह का समझौता नहीं करते। गोदान उपन्यास और पूस की रात, कपफऩआदि कहानियाँ इसके संुदर उदाहरण हैं। यहाँ दी गइर् कहानी नमक का दारोगा ;प्रथम प्रकाशन 1914 इर्.द्ध प्रेमचंद की बहुचचिर्त कहानी है जिसे आदशोर्न्मुख यथाथर्वाद के एक मुकम्मल उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। कहानी में ही आए हुए एक मुहावरे को लें तो यह धन के उफपर ध्मर् की जीत की कहानी है। ध्न और ध्मर् को हम क्रमशः सद्वृिा औरअसद्वृिा, बुराइर् और अच्छाइर्, असत्य और सत्य इत्यादि भी कह सकते हैं। कहानी में इनका प्रतिनिध्ित्व क्रमशः पंडित अलोपीदीन और मुंशी वंशीध्र नामक पात्रों ने किया है। इर्मानदार कमर्योगी मुंशी वंशीध्र को खरीदने में असपफल रहने के बादपंडित अलोपीदीन अपने ध्न की महिमा का उपयोग कर उन्हें नौकरी से मुअत्तल करा देते हैं, लेकिन अंतःसत्य के आगे उनका सिर झुक जाता है। वे सरकारीमहकमे से बखार्स्त वंशीध्र को बहुत उफँचे वेतन और भत्ते के साथ अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियुक्त करते हैं और गहरे अपराध् - बोध् से भरी हुइर् वाणी में निवेदन करते हैं, परमात्मा से यही प्राथर्ना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारेवाला बेमुरौवत, उद्दंड, ¯कतु ध्मर्निष्ठ दारोगा बनाए रखे। कहानी के इस अंतिम प्रसंग से पहले तक की समस्त घटनाएँ प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था मंे व्याप्त भ्रष्टाचार तथा उस भ्रष्टाचार की व्यापक सामाजिक स्वीकायर्ता को अत्यंत साहसिक तरीके से हमारे सामने उजागर करती हैं। इर्मानदार व्यक्ित के अभ्िामन्यु के समान निहत्थे और अकेले पड़ते जाने की यथाथर् तसवीर इस कहानी की बहुत बड़ी खूबी है। ¯कतु प्रेमचंद इस संदेश पर कहानी को खत्म नहीं करना चाहते क्योंकि उस दौर में वे मानते थे कि ऐसा यथाथर्वाद हमको निराशावादी बना देता है, मानव - चरित्रा पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको चारों तरपफ बुराइर् - ही - बुराइर् नशर आने लगती है़ ;‘उपन्यास’ शीषर्क निबंध् सेद्ध इसीलिए कहानी का अंत सत्य की जीत के साथ होता है। नमक का दारोगा जब नमक का नया विभाग बना और इर्श्वर - प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध् हो गया तो लोग चोरी - छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल - प्रपंचों का सूत्रापात हुआ, कोइर् घूस से काम निकालता था, कोइर् चालाकी से। अध्िकारियों के पौ - बारह थे। पटवारीगिरी का सवर्सम्मानित पद छोड़ - छोड़कर लोग इस विभाग की बरवंफदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था। यह वह समय था, जब अंग्रेशी श्िाक्षा और इर्साइर् मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। प़्ाफारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढ़कर पफारसीदां लोग सवोर्च्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे। मुंशी वंशीध्र भी जुलेखा की विरहकथा समाप्त करके मजनू और प़्ाफरहाद के प्रेम - वृत्तांत को नल और नील कीलड़ाइर् और अमेरिका के आविष्कार से अध्िक महत्त्व की बातें समझते हुए रोशगार की खोज में निकले। उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगेμबेटा! घर कीदुदर्शा देख रहे हो। ट्टण के बोझ से दबे हुए हैं। लड़कियाँ हैं, वह घास - पूफस की तरह बढ़ती चली जाती हंै। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडँू़। अब तुम्हीं घर के मालिक - मुख्तार हो। नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मशार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढ़ना जहाँ वुफछ उफपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूणर्मासी का चाँद है जो एक दिन दिखाइर् देता है और घटते - घटते लुप्त हो जाता है। उफपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृि नहीं होती। उफपरी आमदनी इर्श्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती है, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाउँफ। इस विषय में विवेक की बड़ी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरशवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरश को दाँव पर पाना शरा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध् लो। यह मेरी जन्मभर की कमाइर् है। इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीवार्द दिया। वंशीध्र आज्ञाकारी पुत्रा थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खड़े हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए ध्ैयर् अपना मित्रा, बुि अपनी पथप्रदशर्क और आत्मावलंबन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शवुफन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्िठत हो गए। वेतन अच्छा और उफपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृ( मुंशीजी को सुख - संवाद मिला, तो पूफले न समाए। महाजन वुफछ नरम पड़े, कलवार की आशालता लहलहाइर्। पड़ोसियों के हृदय में शूल उठने लगे। जाड़े के दिन थे और रात का समय। नमक के सिपाही, चैकीदार नशे में मस्त थे। मुंशी वंशीध्र को यहाँ आए अभी छह महीनों से अध्िक न हुए थे, लेकिन इस़थोड़े समय में ही उन्होंने अपनी कायर्वुफशलता और उत्तम आचार से अपफसरों को मोहित कर लिया था। अप़्ाफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे। नमक के ़दफ्रतर से एक मील पूवर् की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। दारोगाजी किवाड़ बंद किए मीठी नींद से सो रहे थे। अचानक आँख खुली तो नदी के प्रवाह की जगह गाडि़यों की गड़गड़ाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाइर् दिया। उठ बैठे। इतनी रात गए गाडि़याँ क्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य वुफछ न वुफछ गोलमाल है। तवर्फ ने भ्रम को पुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब में रखा और बात की बात में घोड़ा बढ़ाए हुए पुल पर आ पहुँचे। गाडि़यों की एक लंबी कतार पुल के पार जाती दिखी। डाँटकर पूछाμकिसकी गाडि़याँ हैं? थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा। आदमियों में वुफछ काना - पूफसी हुइर्, तब आगे वाले ने कहाμपंडित अलोपीदीन की! ‘कौन पंडित अलोपीदीन?’ ‘दातागंज के।’ मंुशी वंशीध्र चैंके। पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्िठत शमींदार थे।लाखों रुपये का लेन - देन करते थे, इध्र छोटे से बड़े कौन ऐसे थे, जो उनके ट्टणी न हों। व्यापार भी बड़ा लंबा - चैड़ा था। बड़े चलते - पुरशे आदमी थे। अंगरेश अपफसर उनके़इलाके में श्िाकार खेलने आते और उनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था।मुंशीजी ने पूछाμगाडि़याँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिलाμकानपुर। लेकिन इस प्रश्न पर कि इनमें क्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब का संदेह और भी बढ़ा। वुफछ देर तक उत्तर की बाट देखकर वह शोर से बोलेμक्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछते हैं, इनमंे क्या लदा है?जब इस बार भी कोइर् उत्तर न मिला तो उन्होंने घोड़े को एक गाड़ी से मिलाकर बोरे को टटोला। भ्रम दूर हो गया। यह नमक के ढेले थे। पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार, वुफछ सोते वुफछ जागते चले आते थे। अचानक कइर् गाड़ीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोलेμमहाराज! दारोगा ने गाडि़याँ रोक दी हैं और घाट पर खड़े आपको बुलाते हैं। पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वगर् में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथाथर् ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही ख्िालौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं। लेटे ही लेटे गवर् से बोलेμचलो, हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी ने बड़ी निश्िंचतता से पान के बीड़े लगाकर खाए। पिफर लिहापफ ओढ़े हुए दारोगा़के पास आकर बोलेμबाबूजी, आशीवार्द! कहिए, हमसे ऐसा कौन - सा अपराध् हुआकि गाडि़याँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा - दृष्िट रहनी चाहिए। वंशीध्र रफखाइर् से बोलेμसरकारी हुक्म! पंडित अलोपीदीन ने हँसकर कहाμहम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को। हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं? आपने व्यथर् का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इध्र से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढ़ावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीध्र पर ऐश्वयर् की मोहिनी वंशी का वुफछ प्रभाव न पड़ा। इर्मानदारी की नयी उमंग थी। कड़ककर बोलेμहम उन नमकहरामों में नहीं हैं जो कौडि़यों पर अपना इर्मान बेचते पिफरते हैं। आप इस समय हिरासत में हंै। आपका कायदे के अनुसार चालान होगा। बस, मुझे अध्िक बातों की पुफरसत नहीं़है। जमादार बदलू ¯सह! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ। पंडित अलोपीदीन स्तंभ्िात हो गए। गाड़ीवानों में हलचल मच गइर्। पंडितजी के जीवन में कदाचित यह पहला ही अवसर था कि पंडितजी को यह ऐसी कठोर बातें सुननी पड़ीं। बदलू सिंह आगे बढ़ा किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड़ सके। पंडितजी ने ध्मर् को ध्न का ऐसा निरादर करते कभी न देखा था। विचार किया यह अभी उद्दंड लड़का है। माया - मोह के जाल में अभी नहीं पड़ा। अल्हड़ है, झिझकता है। बहुत दीन - भाव से बोलेμबाबू साहब, ऐसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इश्शत ध्ूल में मिल जाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहर थोड़े ही हैं। वंशीध्र ने कठोर स्वर में कहाμहम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते। अलोपीदीन ने जिस सहारे को च‘ान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे से ख्िासकता हुआ मालूम हुआ। स्वाभ्िामान और ध्न ऐश्वयर् को कड़ी चोट लगी। ¯कतु अभी तक ध्न की सांख्ियक शक्ित का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोलेμलाला जी, एक हशार के नोट बाबू साहब को भेंट करो, आप इस समय भूखे ¯सह हो रहे हैं। वंशीध्र ने गरम होकर कहाμएक हशार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मागर् से नहीं हटा सकते। ध्मर् की इस बुिहीन दृढ़ता और देव - दुलर्भ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया। अब दोनों शक्ितयों में संग्राम होने लगा। ध्न ने उछल - उछलकर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह, और पंद्रह से बीस हशार तक नौबत पहुँची, ¯कतु ध्मर् अलौकिक वीरता के साथ इस बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पवर्त की भाँति अटल, अविचलित खड़ा था। अलोपीदीन निराश होकर बोलेμअब इससे अध्िक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अध्िकार है। वंशीध्र ने अपने जमादार को ललकारा। बदलू सिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढ़ा। पंडित घबराकर दो - तीन कदम पीछे हट गए। अत्यंत दीनता से बोलेμबाबू साहब, इर्श्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हशार पर निपटारा करने को तैयार हूँ। ‘असंभव बात है।’ ‘तीस हशार पर?’ ‘किसी तरह भी संभव नहीं?’ ‘क्या चालीस हशार पर भी नहीं?’ ‘चालीस हशार नहीं, चालीस लाख पर भी असंभव है। बदलू सिंह, इस आदमी को अभी हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।’ धमर् ने धन को पैरों तले वुफचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट - पुष्ट मनुष्य को हथकडि़याँ लिए हुए अपनी तरपफ आते देखा। चारों ओर निराश और कातर दृष्िट़से देखने लगे। इसके बाद एकाएक मूछिर्त होकर गिर पड़े। दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देख्िाए तो बालक - वृ( सबके मुँह से यही बात सुनाइर् देती थी। जिसे देख्िाए, वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका - टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया। पानी को दूध के नाम से बेचनेवाला ग्वाला, कल्िपत रोशनामचे भरनेवाले अिाकारी वगर्, रेल में बिना टिकट सपफर करनेवाले बाबू लोग,़जाली दस्तावेश बनानेवाले सेठ और साहूकार, यह सब - के - सब देवताओं की भाँति गरदनें चला रहे थे। जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभ्िायुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकडि़याँ, हृदय में ग्लानि और क्षोभभरे, लज्जा से गरदन झुकाए अदालत की तरपफ चले, तो सारे शहर में हलचल मच गइर्। मेलों में कदाचित् आँखें़इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड़ के मारे छत और दीवार में कोइर् भेद न रहा। ¯कतु अदालत में पहुँचने की देर थी। पंडित अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अिाकारी वगर् उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील - मुख्तार उनके आज्ञापालक और अरदली, चपरासी तथा चैकीदार तो उनके बिना माल के गुलाम थे। उन्हें देखते ही लोग चारों तरप़्ाफ से दौड़े। सभी लोग विस्िमत हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यांे यह कमर् किया बल्िक इसलिए कि वह कानून के पंजे में वैफसे आए। ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करताथा। बड़ी तत्परता से इस आव्रफमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गइर्। न्याय के मैदान में धमर् और धन में यु( ठन गया। वंशीधर चुपचाप खड़े थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोइर् बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोइर् शस्त्रा। गवाह थेे, ¯कतु लोभ से डाँवाडोल। यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर से वुफछ ¯खचा हुआ दीख पड़ता था। वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कमर्चारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था। ¯कतु पक्षपात और न्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपात हो, वहाँ न्याय की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया। डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीश में लिखा, पंडित अलोपीदीन के विरु( दिए गए प्रमाण निमूर्ल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बड़े भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोड़े लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दारोगा मुंशी वंशीधर का अिाक दोष नहीं है, लेकिन यह बड़े खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पड़ा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम से सजग और सचेत रहता है, ¯कतु नमक से मुकदमे की बढ़ी हुइर् नमकहलाली ने उसके विवेक और बुि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होश्िायार रहना चाहिए। वकीलों ने यह प़्ौफसला सुना और उछल पड़े। पंडित अलोपीदीन मुसवुफराते हुए बाहर निकले। स्वजन - बांधवों ने रुपयों की लूट की। उदारता का सागर उमड़ पड़ा। उसकी लहरों ने अदालत की नींव तक हिला दी। जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर से उनके उफपर व्यंग्यबाणों की वषार् होने लगी। चपरासियों ने झुक - झुककर सलाम किए। ¯कतु इस समय एक - एक कटुवाक्य, एक - एक संकेत उनकी गवार्ग्िन नमक का दारोगाध्13 को प्रज्वलित कर रहा था। कदाचित् इस मुकदमे में सप़्ाफल होकर वह इस तरह अकड़ते हुए न चलते। आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्रा अनुभव हुआ। न्याय और विद्वता, लंबी - चैड़ी उपािायाँ, बड़ी - बड़ी दाढि़याँ और ढीले चोंगे एक भी सच्चे आदर के पात्रा नहीं हैं। वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवायर् था।कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कायर् - परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथ्िात घर को चले। बूढ़े मुंशीजी तो पहले ही से वुफड़ - बुड़ा रहे थे कि चलते - चलते इस लड़के को समझाया था लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाइर् के तगादे सहें, बुढ़ापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है, और कोइर् ओहदेदार नहीं थे, लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप इर्मानदार बनने चले हैं। घर में चाहे अँधेरा हो, मस्िजद में अवश्य दीया जलाएँगे। खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना - लिखना सब अकारथ गया। इसके थोड़े ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढ़े पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोलेμजी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर पफोड़ लूँ। बहुत देर तक पछता - पछताकर हाथ मलते रहे। व्रफोध में वुफछ कठोर बातेें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाते तो अवश्य ही यह व्रफोध विकट रूप धारण करता। वृ(ा माता को भी दुःख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मि‘ी में मिल गईं। पत्नी ने तो कइर् दिनों तक सीधे मुँह से बात भी नहीं की। इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। संध्या का समय था। बूढ़े मुंशीजी बैठे राम - नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिएँ बैलों की जोड़ी, उनकी गरदनों में नीले धागे, सीगें पीतल से जड़ी हुइर्। कइर् नौकर लाठियाँ वंफधों पर रखे साथ थे। मुंशीजी अगवानी को दौड़े। देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत की और लल्लो - चप्पो की बातें करने लगे, हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन - सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुइर् है। ¯कतु क्या करें, लड़का अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्यों मुँह छिपाना पड़ता? इर्श्वर निस्संतान चाहे रखे, पर ऐसी संतान न दे। अलोपीदीन ने कहाμनहीं भाइर् साहब, ऐसा न कहिए। मुंशीजी ने चकित होकर कहाμऐसी संतान को और क्या कहूँ? अलोपीदीन ने वात्सल्यपूणर् स्वर में कहाμवुफलतिलक और पुरुषों की कीतिर् उज्ज्वल करने वाले संसार में ऐसे कितने धमर्परायण मनुष्य हैं जो धमर् पर अपना सब वुफछ अपर्ण कर सवेंफ? पंडित अलोपीदीन ने वंशीधर से कहाμदारोगा जी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की शरूरत न थी। उस रात को आपने अपने अिाकार - बल से मुझे अपनी हिरासत में लिया था ¯कतु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में हूँ। मैंने हशारों रइर्स और अमीर देखे, हशारों उच्च पदािाकारियों से काम पड़ा, ¯कतु मुझे परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड़ दिया। मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे वुफछ विनय करूँ। वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया ¯कतु स्वाभ्िामान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्िजत करने और जलाने आए हैं। क्षमा - प्राथर्ना कर चेष्टा नहीं की, वरन उन्हें अपने पिता की यह ठवुफर - सुहाती की बात असह्य - सी प्रतीत हुइर्। पर पंडितजी की बातें सुनीं तो मन की मैल मिट गइर्। पंडितजी की ओर उड़ती हुइर् दृष्िट से देखा। सदभाव झलक रहा था। गवर् ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शरमाते हुए बोलेμयह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो वुफछ अविनय हुइर् है, उसे क्षमा कीजिए। मैं धमर् की बेड़ी में जकड़ा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी, वह मेरे सिर - माथे पर। अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहाμनदी तट पर आपने मेरी प्राथर्ना नहीं स्वीकार की थी ¯कतु आज स्वीकार करनी पड़ेगी। वंशीध्र बोलेμमैं किस योग्य हूँ किन्तु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्राुटि न होगी। अलोपीदीन ने एक स्टांप लगा हुआ पत्रा निकाला और उसे वंशीध्र के सामने रखकर बोलेμइस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ, जब तक यह सवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा। मुंशी वंशीध्र ने उस कागश को पढ़ा तो वृफतज्ञता से आँखों में आँसू भर आए। पंडित अलोपीदीन ने उनको अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियत किया था। छह हशार वाष्िार्क वेतन के अतिरिक्त रोशाना खचर् अलग, सवारी के लिए़घोड़े, रहने को बंगला, नौकर - चाकर मुफ्रत। वंफपित स्वर में बोलेμपंडित जी, मुझमें इतनी सामथ्यर् नहीं है कि आपकी उदारता की प्रशंसा कर सवूफँ। ¯कतु मैं ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ। अलोपीदीन हँसकर बोलेμमुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही शरूरत है। वंशीध्र ने गंभीर भाव से कहाμयों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीतिर्वान, सज्जन पुरफष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। ¯कतु मुझमें न विद्या है, न बुि, न वह स्वभाव, जो इन त्राुटियों की पूतिर् कर देता है। ऐसे महान कायर् के लिए एक बड़े ममर्ज्ञ अनुभवी मनुष्य की शरूरत है। अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीध्र के हाथ में देकर बोलेμन मुझे विद्वता की चाह है, न अनुभव की, न ममर्ज्ञता की, न कायर्वुफशलता की। इन गुणों के महत्त्व का परिचय खूब पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया है जिसके सामने योग्यता और विद्वता की चमक पफीकी पड़ जाती है। यह कलम लीजिए, अध्िक सोच - विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्राथर्ना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतु ध्मर्निष्ठ दारोगा बनाए रखे! वंशीध्र की आँखंे डबडबा आईं। हृदय के संवुफचित पात्रा मंे इतना एहसान न समा सका। एक बार पिफर पंडितजी की ओर भक्ित और श्र(ा की दृष्िट से देखा और काँपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागश पर हस्ताक्षर कर दिए। अलोपीदीन ने प्रपुफल्िलत होकर उन्हें गले लगा लिया। अभ्यास पाठ के साथ 1.कहानी का कौन - सा पात्रा आपको सवार्ध्िक प्रभावित करता है और क्यों? 2.‘नमक का दारोगा’ कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्ितत्व के कौन से दो पहलू ;पक्षद्ध उभरकर आते हैं? 3.कहानी के लगभग सभी पात्रा समाज की किसी - न - किसी सच्चाइर् को उजागर करते हैं। निम्नलिख्िात पात्रों के संदभर् में पाठ से उस अंश को उ(ृत करते हुए बताइए कि यह समाज की किस सच्चाइर् को उजागर करते हैंμ ;कद्ध वृ( मुंशी ;खद्ध वकील ;गद्ध शहर की भीड़ 4. निम्न पंक्ितयों को ध्यान से पढि़एμ नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मशार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढ़ना जहाँ वुफछ उफपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूणर्मासी का चाँद है जो एक दिन दिखाइर् देता है और घटते - घटते लुप्त हो जाता है। उफपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृि नहीं होती। उफपरी आमदनी इर्श्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती है, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाउँफ। ;कद्धयह किसकी उक्ित है? ;खद्ध मासिक वेतन को पूणर्मासी का चाँद क्यों कहा गया है? ;गद्धक्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हंै? 5. ‘नमक का दारोगा’ कहानी के कोइर् दो अन्य शीषर्क बताते हुए उसके आधर को भी स्पष्ट कीजिए। 6.कहानी के अंत में अलोपीदीन के वंशीध्र को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे क्या कारण होसकते हैं? तवर्फ सहित उत्तर दीजिए। आप इस कहानी का अंत किस प्रकार करते? पाठ के आस - पास 1.दारोगा वंशीध्र गैरकानूनी कायोर्ं की वजह से पंडित अलोपीदीन को गिरफ्रतार करता है, लेकिन कहानी के अंत में इसी पंडित अलोपीदीन की सहृदयता पर मुग्ध् होकर उसके यहाँ मैनेजर की नौकरी को तैयार हो जाता है। आपके विचार से वंशीध्र का ऐसा करना उचित था? आप उसवफी जगह होते तो क्या करते? 2.नमक विभाग के दारोगा पद के लिए बड़ों - बड़ों का जी ललचाता था। वतर्मान समाज में ऐसा कौन - सा पद होगा जिसे पाने के लिए लोग लालायित रहते होंगे और क्यों? 3. अपने अनुभवों के आधर पर बताइए कि जब आपके तको± ने आपके भ्रम को पुष्ट किया हो। 4.पढ़ना - लिखना सब अकारथ गया। वृ( मुंशी जी द्वारा यह बात एक विश्िाष्ट संदभर् में कही गइर् थी। अपने निजी अनुभवों के आधर पर बताइएμ ;कद्ध जब आपको पढ़ना - लिखना व्यथर् लगा हो। ;खद्ध जब आपको पढ़ना - लिखना साथर्क लगा हो। ;गद्ध ‘पढ़ना - लिखना’ को किस अथर् में प्रयुक्त किया गया होगा: साक्षरता अथवा श्िाक्षा? ;क्या आप इन दोनों को समान मानते हैं?द्ध 5.लड़कियाँ हंै, वह घास - पूफस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। वाक्य समाज में लड़कियों की स्िथति की किस वास्तविकता को प्रकट करता है? 6. इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कमर् किया बल्िक इसलिए कि वह कानून के पंजे में वैफसे आए। ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साध्न करनेवाला ध्न और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। अपने आस - पास अलोपीदीन जैसे व्यक्ितयों को देखकर आपकी क्या प्रतििया होगी? उपयर्ुक्त टिप्पणी को ध्यान में रखते हुए लिखें। समझाइए तो शरा 1.नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर की मशार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। 2.इस विस्तृत संसार में उनके लिए ध्ैयर् अपना मित्रा, बुि अपनी पथप्रदशर्क और आत्मावलंबन ही अपना सहायक था। 3.तवर्फ ने भ्रम को पुष्ट किया। 4.न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही ख्िालौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हंै, नचाती हैं। 5.दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी। 6.खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना - लिखना सब अकारथ गया। 7.ध्मर् ने ध्न को पैरों तले वुफचल डाला। 8.न्याय के मैदान में ध्मर् और ध्न में यु( ठन गया। भाषा की बात 1.भाषा की चित्रात्मकता, लोकोक्ितयों और मुहावरों के जानदार उपयोग तथा ¯हदी - उदूर् के साझा रूप एवं बोलचाल की भाषा के लिहाश से यह कहानी अद्भुत है। कहानी में से ऐसे उदाहरण छाँटकर लिख्िाए और यह भी बताइए कि इनके प्रयोग से किस तरह कहानी का कथ्य अध्िक असरदार बना है? 2.कहानी में मासिक वेतन के लिए किन - किन विशेषणों का प्रयोग किया गया है? इसके लिए आप अपनी ओर से दो - दो विशेषण और बताइए। साथ ही विशेषणों के आधर को तवर्फ सहित पुष्ट कीजिए। 3.;कद्ध बाबूजी आशीवार्द! ;खद्ध सरकारी हुक्म! ;गद्ध दातागंज के! ;घद्ध कानपुर! दी गइर् विश्िाष्ट अभ्िाव्यक्ितयाँ एक निश्िचत संदभर् में निश्िचत अथर् देती हैं। संदभर् बदलते ही अथर् भी परिवतिर्त हो जाता है। अब आप किसी अन्य संदभर् में इन भाष्िाक अभ्िाव्यक्ितयों का प्रयोग करते हुए समझाइए। चचार् करें इस कहानी को पढ़कर बड़ी - बड़ी डिगि्रयों, न्याय और विद्वता के बारे में आपकी क्या धरणा बनती है? वतर्मान समय को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर श्िाक्षकों के साथ एक परिचचार् आयोजित करें। शब्द - छवि बरवंफदाजी सदावत्रमुख्तार अलौकिक कातर अमले अरदली ;आॅडर्रलीद्ध तजवीश अकारथ पछहिएँनमक का दारोगाध्19 - बंदूक लेकर चलने वाला सिपाही, चैकीदार - हमेशा अÂ बाँटने का व्रत - कलक्टरी मंे वकील से कम दरजे का वकील - दिखाइर् न देने वाला - परेशान, दुखी - कमर्चारी मंडल, नौकर - चाकर - किसी बड़े अपफसर के साथ रहने वाला खास चपरासी़ - राय, निणर्य - व्यथर् - पश्िचमी

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गद्य खंड 

उचित प्रकार की शिक्षा का अर्थ है प्रज्ञा को जागृत करना तथा समन्वित जीवन का पोषण करना और केवल एेसी ही शिक्षा एक नवीन संस्कृति तथा शांतिमय विश्व की स्थापना कर सकेगी।

जे. कृष्णमूर्ति


कोई भी पस्तक कुछ  शब्दों का संघात है।  शब्दों के समूह ही तो पुस्तक कहलाते हैं। परंतु वे  शब्द सजाकर इस प्रकार  रखे गए होते हैं कि उनसे  हम एक अर्थ पाते रहते हैं।  (साहित्य का व्याकरण, हज़ारी  प्रसाद द्विवेदी)

कलाकार होने के लिए ज़रूरी है कि वह चीज़ों को कस कर पकड़े और अनुभव को स्मृति में, स्मृति को अभिव्यक्ति में, तत्व को रूप में ढाले।

(कला का प्रयोजन, अर्न्स्ट फिशर)

कहानी शायद समय की कला है; समय के साथ कहानी अनेक प्रकार की कलाएँ दिखाती है। कभी वर्षों को समेटकर ए क क्षण में बाँध लेती है; कभी क्षण को खोलकर वर्षों में फैला देती है; कभी समय के दायरे को तोड़ती है तो कभी टुकड़ों को जोड़कर एक दायरा बनाती है।

(कहानी और फैंटेसी, नामवर सिंह)

साहित्य वह जादू की लकड़ी है जो पशुओं में, ईंट-पत्थरों में, पेड़-पौधों में भी विश्व की आत्मा का दर्शन करा देती है।

(जीवन में साहित्य का स्थान)

प्रेमचंद


मूल नामः धनपत राय

जन्मः सन् 1880, लमही गाँव (उ.प्र.)

प्रमुख रचनाएँः सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान (उपन्यास); सोज़े वतन, मानसरोवर–आठ खंड में, गुप्त धन (कहानी संग्रह); कर्बला, संग्राम, प्रेम की देवी (नाटक); कुछ विचार, विविध प्रसंग (निबंध-संग्रह)

मृत्युः सन् 1936

प्रेमचंद हिंदी कथा-साहित्य के शिखर पुरुष माने जाते हैं। कथा-साहित्य के इस शिखर पुरुष का बचपन अभावों में बीता। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद पारिवारिक समस्याओं के कारण जैसे-तैसे बी. ए. तक की पढ़ाई की। अंग्रेज़ी में एम.ए. करना चाहते थे लेकिन जीवनयापन के लिए नौकरी करनी पड़ी। सरकारी नौकरी मिली भी लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय होने के कारण त्यागपत्र देना पड़ा। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने के बावजूद लेखन कार्य सुचारु रूप से चलता रहा। पत्नी शिवरानी देवी के साथ अंग्रेज़ों के खिलाफ़ आंदोलनों में हिस्सा लेते रहे। उनके जीवन का राजनीतिक संघर्ष उनकी रचनाओं में सामाजिक संघर्ष बनकर सामने आया जिसमें जीवन का यथार्थ और आदर्श दोनों था।

हिंदी साहित्य के इतिहास में कहानी और उपन्यास की विधा के विकास का काल-विभाजन प्रेमचंद को ही केंद्र में रखकर किया जाता रहा है (प्रेमचंद-पूर्व युग, प्रेमचंद युग, प्रेमचंदोत्तर युग)। यह प्रेमचंद के निर्विवाद महत्त्व का एक स्पष्ट प्रमाण है। वस्तुतः प्रेमचंद ही पहले रचनाकार हैं जिन्होंने कहानी और उपन्यास की विधा को कल्पना और रुमानियत के धुँधलके से निकालकर यथार्थ की ठोस ज़मीन पर प्रतिष्ठित किया। यथार्थ की ज़मीन से जुड़कर कहानी किस्सागोई तक सीमित न रहकर पढ़ने-पढ़ाने की परंपरा से भी जुड़ी। इसमें उनकी हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू मिश्रित) भाषा का विशेष योगदान रहा। उनके यहाँ हिंदुस्तानी भाषा अपने पूरे ठाट-बाट और जातीय स्वरूप के साथ आई है।

उनका आरंभिक कथा-साहित्य कल्पना, संयोग और रुमानियत के ताने-बाने से बुना गया है। लेकिन एक कथाकार के रूप में उन्होंने लगातार विकास किया और पंच परमेश्वर जैसी कहानी तथा सेवासदन जैसे उपन्यास के साथ सामाजिक जीवन को कहानी का आधार बनाने वाली यथार्थवादी कला के अग्रदूत के रूप में सामने आए। यथार्थवाद के भीतर भी आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से आलोचनात्मक यथार्थवाद तक की विकास-यात्रा प्रेमचंद ने की। आदर्शोन्मुख यथार्थवाद स्वयं उन्हीं की गढ़ी हुई संज्ञा है। यह कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में किए गए उनके एेसे रचनात्मक प्रयासों पर लागू होती है जो कटु यथार्थ का चित्रण करते हुए भी समस्याओं और अंतर्विरोधों को अंततः एक आदर्शवादी और मनोवांछित समाधान तक पहुँचा देती है। सेवासदन, प्रेमाश्रम आदि उपन्यास और पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी , नमक का दारोगा आदि कहानियाँ एेसी ही हैं। बाद की उनकी रचनाओं में यह आदर्शवादी प्रवृत्ति कम होती गई है और धीरे-धीरे वे एेसी स्थिति तक पहुँचते हैं जहाँ कठोर वास्तविकता को प्रस्तुत करने में वे किसी तरह का समझौता नहीं करते। गोदान उपन्यास और पूस की रात, कफ़ आदि कहानियाँ इसके सुंदर उदाहरण हैं।

यहाँ दी गई कहानी नमक का दारोगा (प्रथम प्रकाशन 1914 ई.) प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी है जिसे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के एक मुकम्मल उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। कहानी में ही आए हुए एक मुहावरे को लें तो यह धन के ऊपर धर्म की जीत की कहानी है। धन और धर्म को हम क्रमशः सद्वृत्ति और असद्वृत्ति, बुराई और अच्छाई, असत्य और सत्य इत्यादि भी कह सकते हैं। कहानी में इनका प्रतिनिधित्व क्रमशः पंडित अलोपीदीन और मुंशी वंशीधर नामक पात्रों ने किया है। ईमानदार कर्मयोगी मुंशी वंशीधर को खरीदने में असफल रहने के बाद पंडित अलोपीदीन अपने धन की महिमा का उपयोग कर उन्हें नौकरी से मुअत्तल करा देते हैं, लेकिन अंतःसत्य के आगे उनका सिर झुक जाता है। वे सरकारी महकमे से बर्खास्त वंशीधर को बहुत ऊँचे वेतन और भत्ते के साथ अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियुक्त करते हैं और गहरे अपराध-बोध से भरी हुई वाणी में निवेदन करते हैं, परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारेवाला बेमुरौवत, उद्दंड, किंतु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे। कहानी के इस अंतिम प्रसंग से पहले तक की समस्त घटनाएँ प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा उस भ्रष्टाचार की व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता को अत्यंत साहसिक तरीके से हमारे सामने उजागर करती हैं। ईमानदार व्यक्ति के अभिमन्यु के समान निहत्थे और अकेले पड़ते जाने की यथार्थ तसवीर इस कहानी की बहुत बड़ी खूबी है। किंतु प्रेमचंद इस संदेश पर कहानी को खत्म नहीं करना चाहते क्योंकि उस दौर में वे मानते थे कि एेसा यथार्थवाद हमको निराशावादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको चारों तरफ़ बुराई-ही-बुराई नज़र आने लगती है (‘उपन्यास’ शीर्षक निबंध से) इसीलिए कहानी का अंत सत्य की जीत के साथ होता है।

नमक का दारोगा

जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर-प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड़-छोड़कर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था। यह वह समय था, जब अंग्रेज़ी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फ़ारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढ़कर फारसीदां लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे। मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरहकथा समाप्त करके मजनू और फ़रहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लड़ाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्त्व की बातें समझते हुए रोज़गार की खोज में निकले। उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे–बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ऋण के बोझ से दबे हुए हैं। लड़कियाँ हैं, वह घास-फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ। अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो। नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मज़ार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। एेसा काम ढूँढ़ना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती है, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ। इस विषय में विवेक की बड़ी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरज़वाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरज़ को दाँव पर पाना ज़रा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध लो। यह मेरी जन्मभर की कमाई है।

इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खड़े हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुद्धि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलंबन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृद्ध मुंशीजी को सुख-संवाद मिला, तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पड़े, कलवार की आशालता लहलहाई। पड़ोसियों के हृदय में शूल उठने लगे।

जाड़े के दिन थे और रात का समय। नमक के सिपाही, चौकीदार नशे में मस्त थे। मुंशी वंशीधर को यहाँ आए अभी छह महीनों से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोड़े समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचार से अफ़सरों को मोहित कर लिया था। अफ़सर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे। नमक के दफ़्तर से एक मील पूर्व की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। दारोगाजी किवाड़ बंद किए मीठी नींद से सो रहे थे। अचानक आँख खुली तो नदी के प्रवाह की जगह गाड़ियों की गड़गड़ाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया। उठ बैठे। इतनी रात गए गाड़ियाँ क्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य कुछ न कुछ गोलमाल है। तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब में रखा और बात की बात में घोड़ा बढ़ाए हुए पुल पर आ पहुँचे। गाड़ियों की एक लंबी कतार पुल के पार जाती दिखी। डाँटकर पूछा–किसकी गाड़ियाँ हैं?


थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा। आदमियों में कुछ काना-फूसी हुई, तब आगे वाले ने कहा–पंडित अलोपीदीन की!

‘कौन पंडित अलोपीदीन?’

‘दातागंज के।’

मुंशी वंशीधर चौंके। पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित ज़मींदार थे। लाखों रुपये का लेन-देन करते थे, इधर छोटे से बड़े कौन एेसे थे, जो उनके ऋणी न हों। व्यापार भी बड़ा लंबा-चौड़ा था। बड़े चलते-पुरज़े आदमी थे। अंगरेज़ अफ़सर उनके इलाके में शिकार खेलने आते और उनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था।

मुंशीजी ने पूछा–गाड़ियाँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिला–कानपुर। लेकिन इस प्रश्न पर कि इनमें क्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब का संदेह और भी बढ़ा। कुछ देर तक उत्तर की बाट देखकर वह ज़ोर से बोले–क्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछते हैं, इनमें क्या लदा है?

जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोड़े को एक गाड़ी से मिलाकर बोरे को टटोला। भ्रम दूर हो गया। यह नमक के ढेले थे।

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पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार, कुछ सोते कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाड़ीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले–महाराज! दारोगा ने गाड़ियाँ रोक दी हैं और घाट पर खड़े आपको बुलाते हैं।

पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं। लेटे ही लेटे गर्व से बोले–चलो, हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी ने बड़ी निश्चिंतता से पान के बीड़े लगाकर खाए। फिर लिहाफ़ ओढ़े हुए दारोगा के पास आकर बोले–बाबूजी, आशीर्वाद! कहिए, हमसे एेसा कौन-सा अपराध हुआ कि गाड़ियाँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए।

वंशीधर रुखाई से बोले–सरकारी हुक्म!

पंडित अलोपीदीन ने हँसकर कहा–हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को। हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढ़ावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीधर पर एेश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पड़ा। ईमानदारी की नयी उमंग थी। कड़ककर बोले–हम उन नमकहरामों में नहीं हैं जो कौड़ियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। आपका कायदे के अनुसार चालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फ़ुरसत नहीं है। जमादार बदलू सिंह! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ।

पंडित अलोपीदीन स्तंभित हो गए। गाड़ीवानों में हलचल मच गई। पंडितजी के जीवन में कदाचित यह पहला ही अवसर था कि पंडितजी को यह एेसी कठोर बातें सुननी पड़ीं। बदलू सिंह आगे बढ़ा किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड़ सके। पंडितजी ने धर्म को धन का एेसा निरादर करते कभी न देखा था। विचार किया यह अभी उद्दंड लड़का है। माया-मोह के जाल में अभी नहीं पड़ा। अल्हड़ है, झिझकता है। बहुत दीन-भाव से बोले–बाबू साहब, एेसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इज़्ज़त धूल में मिल जाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहर थोड़े ही हैं।

वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा–हम एेसी बातें नहीं सुनना चाहते।

अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे से खिसकता हुआ मालूम हुआ। स्वाभिमान और धन एेश्वर्य को कड़ी चोट लगी। किंतु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोले–लाला जी, एक हज़ार के नोट बाबू साहब को भेंट करो, आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं।

वंशीधर ने गरम होकर कहा–एक हज़ार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते।

धर्म की इस बुद्धिहीन दृढ़ता और देव-दुर्लभ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछलकर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह, और पंद्रह से बीस हज़ार तक नौबत पहुँची, किंतु धर्म अलौकिक वीरता के साथ इस बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल, अविचलित खड़ा था।

अलोपीदीन निराश होकर बोले–अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है।

वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा। बदलू सिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढ़ा। पंडित घबराकर दो-तीन कदम पीछे हट गए। अत्यंत दीनता से बोले–बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हज़ार पर निपटारा करने को तैयार हूँ।

‘असंभव बात है।’

‘तीस हज़ार पर?’

‘किसी तरह भी संभव नहीं?’

‘क्या चालीस हज़ार पर भी नहीं?’

‘चालीस हज़ार नहीं, चालीस लाख पर भी असंभव है। बदलू सिंह, इस आदमी को अभी हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।’

धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट-पुष्ट मनुष्य को हथकड़ियाँ लिए हुए अपनी तरफ़ आते देखा। चारों ओर निराश और कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद एकाएक मूर्छित होकर गिर पड़े।

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दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देखिए तो बालक-वृद्ध सबके मुँह से यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिए, वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया। पानी को दूध के नाम से बेचनेवाला ग्वाला, कल्पित रोज़नामचे भरनेवाले अधिकारी वर्ग, रेल में बिना टिकट सफ़र करनेवाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज़ बनानेवाले सेठ और साहूकार, यह सब-के-सब देवताओं की भाँति गरदनें चला रहे थे। जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकड़ियाँ, हृदय में ग्लानि और क्षोभभरे, लज्जा से गरदन झुकाए अदालत की तरफ़ चले, तो सारे शहर में हलचल मच गई। मेलों में कदाचित् आँखें इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड़ के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा।

किंतु अदालत में पहुँचने की देर थी। पंडित अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञापालक और अरदली, चपरासी तथा चौकीदार तो उनके बिना माल के गुलाम थे। उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ़ से दौड़े। सभी लोग विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्याें यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए। एेसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। बड़ी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया। वंशीधर चुपचाप खड़े थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र। गवाह थेे, किंतु लोभ से डाँवाडोल।

यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर से कुछ खिंचा हुआ दीख पड़ता था। वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था। किंतु पक्षपात और न्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपात हो, वहाँ न्याय की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया। डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज़ में लिखा, पंडित अलोपीदीन के विरुद्ध दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बड़े भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोड़े लाभ के लिए एेसा दुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दारोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है, लेकिन यह बड़े खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पड़ा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम से सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक से मुकदमे की बढ़ी हुई नमकहलाली ने उसके विवेक और बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए।

वकीलों ने यह फ़ैसला सुना और उछल पड़े। पंडित अलोपीदीन मुसकुराते हुए बाहर निकले। स्वजन-बांधवों ने रुपयों की लूट की। उदारता का सागर उमड़ पड़ा। उसकी लहरों ने अदालत की नींव तक हिला दी। जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर से उनके ऊपर व्यंग्यबाणों की वर्षा होने लगी। चपरासियों ने झुक-झुककर सलाम किए। किंतु इस समय एक-एक कटुवाक्य, एक-एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्वलित कर रहा था। कदाचित् इस मुकदमे में सफ़ल होकर वह इस तरह अकड़ते हुए न चलते। आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ। न्याय और विद्वता, लंबी-चौड़ी उपाधियाँ, बड़ी-बड़ी दाढ़ियाँ और ढीले चोंगे एक भी सच्चे आदर के पात्र नहीं हैं।

वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था। कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथित घर को चले। बूढ़े मुंशीजी तो पहले ही से कुड़-बुड़ा रहे थे कि चलते-चलते इस लड़के को समझाया था लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढ़ापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है, और कोई ओहदेदार नहीं थे, लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घर में चाहे अँधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दीया जलाएँगे। खेद एेसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया। इसके थोड़े ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढ़े पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले–जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड़ लूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातेें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाते तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारण करता। वृद्धा माता को भी दुःख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने तो कई दिनों तक सीधे मुँह से बात भी नहीं की।

इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। संध्या का समय था। बूढ़े मुंशीजी बैठे राम-नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिएँ बैलों की जोड़ी, उनकी गरदनों में नीले धागे, सीगें पीतल से जड़ी हुई। कई नौकर लाठियाँ कंधों पर रखे साथ थे। मुंशीजी अगवानी को दौड़े। देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत की और लल्लो-चप्पो की बातें करने लगे, हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन-सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है। किंतु क्या करें, लड़का अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्यों मुँह छिपाना पड़ता? ईश्वर निस्संतान चाहे रखे, पर एेसी संतान न दे।

अलोपीदीन ने कहा–नहीं भाई साहब, एेसा न कहिए।

मुंशीजी ने चकित होकर कहा–एेसी संतान को और क्या कहूँ?

अलोपीदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा–कुलतिलक और पुरुषों की कीर्ति उज्ज्वल करने वाले संसार में एेसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें?

पंडित अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा–दारोगा जी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की ज़रूरत न थी। उस रात को आपने अपने अधिकार-बल से मुझे अपनी हिरासत में लिया था किंतु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में हूँ। मैंने हज़ारों रईस और अमीर देखे, हज़ारों उच्च पदाधिकारियों से काम पड़ा, किंतु मुझे परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड़ दिया। मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूँ।

वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया किंतु स्वाभिमान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं। क्षमा-प्रार्थना कर चेष्टा नहीं की, वरन उन्हें अपने पिता की यह ठकुर-सुहाती की बात असह्य-सी प्रतीत हुई। पर पंडितजी की बातें सुनीं तो मन की मैल मिट गई। पंडितजी की ओर उड़ती हुई दृष्टि से देखा। सदभाव झलक रहा था। गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शरमाते हुए बोले–यह आपकी उदारता है जो एेसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिए। मैं धर्म की बेड़ी में जकड़ा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी, वह मेरे सिर-माथे पर।

अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा–नदी तट पर आपने मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार की थी किंतु आज स्वीकार करनी पड़ेगी।

वंशीधर बोले–मैं किस योग्य हूँ किन्तु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्रुटि न होगी।

अलोपीदीन ने एक स्टांप लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले–इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ, जब तक यह सवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा।

मुशी वंशीधर ने उस कागज़ को पढ़ा तो कृतज्ञता से आँखों में आँसू भर आए। पंडित अलोपीदीन ने उनको अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियत किया था। छह हज़ार वार्षिक वेतन के अतिरिक्त रोज़ाना खर्च अलग, सवारी के लिए घोड़े, रहने को बंगला, नौकर-चाकर मुफ़्त। कंपित स्वर में बोले–पंडित जी, मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी उदारता की प्रशंसा कर सकूँ। किंतु मैं एेसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ।

अलोपीदीन हँसकर बोले–मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही ज़रूरत है।

वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा–यों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। किंतु मुझमें न विद्या है, न बुद्धि, न वह स्वभाव, जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है। एेसे महान कार्य के लिए एक बड़े मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्य की ज़रूरत है।

अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले–न मुझे विद्वता की चाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, न कार्य कुशलता की। इन गुणों के महत्त्व का परिचय खूब पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया है जिसके सामने योग्यता और विद्वता की चमक फीकी पड़ जाती है। यह कलम लीजिए, अधिक सोच-विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे!

वंशीधर की आँखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखा और काँपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज़ पर हस्ताक्षर कर दिए।

अलोपीदीन ने प्रफुल्लित होकर उन्हें गले लगा लिया।

अभ्यास

पाठ के साथ

1. कहानी का कौन-सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?

2. ‘नमक का दारोगा’ कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के कौन से दो पहलू (पक्ष) उभरकर आते हैं?

3. कहानी के लगभग सभी पात्र समाज की किसी-न-किसी सच्चाई को उजागर करते हैं। निम्नलिखित पात्रों के संदर्भ में पाठ से उस अंश को उद्धृत करते हुए बताइए कि यह समाज की किस सच्चाई को उजागर करते हैं–

(क) वृद्ध मुंशी (ख) वकील (ग) शहर की भीड़

4. निम्न पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए– नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मज़ार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। एेसा काम ढूँढ़ना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती है, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।

(क) यह किसकी उक्ति है?

(ख) मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद क्यों कहा गया है?

(ग) क्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हैं?

5. ‘नमक का दारोगा’ कहानी के कोई दो अन्य शीर्षक बताते हुए उसके आधार को भी स्पष्ट कीजिए।

6. कहानी के अंत में अलोपीदीन के वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए। आप इस कहानी का अंत किस प्रकार करते?

पाठ के आस-पास

1. दारोगा वंशीधर गैरकानूनी कार्यों की वजह से पंडित अलोपीदीन को गिरफ्तार करता है, लेकिन कहानी के अंत में इसी पंडित अलोपीदीन की सहृदयता पर मुग्ध होकर उसके यहाँ मैनेजर की नौकरी को तैयार हो जाता है। आपके विचार से वंशीधर का एेसा करना उचित था? आप उसकी जगह होते तो क्या करते?

2. नमक विभाग के दारोगा पद के लिए बड़ों-बड़ों का जी ललचाता था। वर्तमान समाज में एेसा कौन-सा पद होगा जिसे पाने के लिए लोग लालायित रहते होंगे और क्यों?

3. अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि जब आपके तर्कों ने आपके भ्रम को पुष्ट किया हो।

4. पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया। वृद्ध मुंशी जी द्वारा यह बात एक विशिष्ट संदर्भ में कही गई थी। अपने निजी अनुभवों के आधार पर बताइए–

(क) जब आपको पढ़ना-लिखना व्यर्थ लगा हो।

(ख) जब आपको पढ़ना-लिखना सार्थक लगा हो।

(ग) ‘पढ़ना-लिखना’ को किस अर्थ में प्रयुक्त किया गया होगा

साक्षरता अथवा शिक्षा? (क्या आप इन दोनों को समान मानते हैं?)

5. लड़कियाँ हैं, वह घास-फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। वाक्य समाज में लड़कियों की स्थिति की किस वास्तविकता को प्रकट करता है?

6. इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए। एेसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। अपने आस-पास अलोपीदीन जैसे व्यक्तियो को देखकर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? उपर्युक्त टिप्पणी को ध्यान में रखते हुए लिखें।

समझाइए तो ज़रा

1. नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर की मज़ार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए।

2. इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुद्धि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलंबन ही अपना सहायक था।

3. तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया।

4. न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं।

5. दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी।

6. खेद एेसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।

7. धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।

8. न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया।

भाषा की बात

1. भाषा की चित्रात्मकता, लोकोक्तियों और मुहावरों के जानदार उपयोग तथा हिंदी-उर्दू के साझा रूप एवं बोलचाल की भाषा के लिहाज़ से यह कहानी अद्भुत है। कहानी में से एेसे उदाहरण छाँटकर लिखिए और यह भी बताइए कि इनके प्रयोग से किस तरह कहानी का कथ्य अधिक असरदार बना है?

2. कहानी में मासिक वेतन के लिए किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया गया है? इसके लिए आप अपनी ओर से दो-दो विशेषण और बताइए। साथ ही विशेषणों के आधार को तर्क सहित पुष्ट कीजिए।

3. (क) बाबूजी आशीर्वाद!

(ख) सरकारी हुक्म!

(ग) दातागंज के!

(घ) कानपुर!

दी गई विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक निश्चित संदर्भ में निश्चित अर्थ देती हैं। संदर्भ बदलते ही अर्थ भी परिवर्तित हो जाता है। अब आप किसी अन्य संदर्भ में इन भाषिक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते हुए समझाइए।

चर्चा करें

इस कहानी को पढ़कर बड़ी-बड़ी डिग्रियों, न्याय और विद्वता के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? वर्तमान समय को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर शिक्षकों के साथ एक परिचर्चा आयोजित करें।

शब्द-छवि

बरकंदाजी - बंदूक लेकर चलने वाला सिपाही, चौकीदार

सदाव्रत - हमेशा अन्न बाँटने का व्रत

मुख्तार - कलक्टरी में वकील से कम दरजे का वकील

अलौकिक - दिखाई न देने वाला

कातर - परेशान, दुखी

अमले - कर्मचारी मंडल, नौकर-चाकर

अरदली (अॉर्डरली) - किसी बड़े अफ़सर के साथ रहने वाला खास चपरासी

तजवीज़ - राय, निर्णय

अकारथ - व्यर्थ

पछहिएँ - पश्चिमी


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