कणों के निकाय तथा घूणीर् गति थ्पह 7ण्1 नत - तल पर एक ब्लाॅक की अधेमुखी स्थानांतरण ;पिफसलनद्ध गति ;ब्लाॅक का प्रत्येक ¯बदु यथा च्1ए च्2ण्ण्ण्ण् किसी भी क्षण समान गति में हैंद्ध 7ण्1ण्1 एक दृढ़ पिण्ड में किस प्रकार की गतियाँ हो सकती हैं? आइये, दृढ़ पिण्डों की गति के वुफछ उदाहरणों से इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने की कोश्िाश करें। प्रथम एक आयताकार ब्लाॅक पर विचार करें जो एक नत तल पर सीध ;बिना इध्र - उध्र हटेद्ध नीचे की ओर पिफसल रहा है। ब्लाॅक एक दृढ़ पिण्ड है। नत तल पर नीचे की ओर इसकी गति ऐसी है कि इसके सभी कण साथ - साथ चल रहे हैं, अथार्त् किसी क्षण सभी कण समान वेग से चलते हैं ;चित्रा 7ण्1द्ध। यहाँ यह दृढ़ पिंड शु( स्थानांतरण गति में है। शु( स्थानांतरण गति में किसी क्षण विशेष पर पिण्ड का प्रत्येक कण समान वेग से चलता है। चित्रा 7ण्2 नत तल पर नीचे की ओर लुढ़कता सि¯लडर ;बेलनद्ध। यह शु( स्थानांतरण गति नहीं है। किसी क्षण पर बिन्दु च्1ए च्2ए च्3एवं च्4के अलग - अलग वेग हैं ;जैसा कि तीर दशार्ते हैंद्ध। वास्तव में सम्पवर्फ बिन्दुच्3का वेग किसी भी क्षण शून्य है यदि बेलन बिना पिफसले हुए लुढ़कता है। आइये, अब उसी नत तल पर नीचे की ओर लुढ़कते हुए एक धतु या लकड़ी के बेलन की गति पर विचार करते हैं ;चित्रा 7ण्2द्ध। यह दृढ़ पिण्ड ;बेलनद्ध नत तल के शीषर् से उसकी तली तक स्थानांतरित होता है, अतः इसमें स्थानांतरण गति है। लेकिन चित्रा 7ण्2 यह भी दशार्ता है कि इसके सभी कण क्षण विशेष पर एक ही वेग से नहीं चल रहे हैं। अतः पिण्ड शु( स्थानांतरण गति में नहीं है। अतः इसकी गति स्थानांतरीय होने के साथ - साथ ‘वुफछ और अलग’ भी है। यह ‘वुफछ और अलग’ भी क्या है? यह समझने के लिए, आइये, हम एक ऐसा दृढ़ ¯पड लें जिसको इस प्रकार व्यवरु( कर दिया गया है कि यह स्थानांतरण गति न कर सके। किसी दृढ़ पिण्ड की स्थानांतरण गति को निरु( करने की सवर् सामान्य विध्ि यह है कि उसे एक सरल रेखा के अनुदिश स्िथर कर दिया जाए। तब इस दृढ़ पिण्ड की एकमात्रा संभावित गति घूणीर् गति होगी। वह सरल रेखा जिसके अनुदिश इस दृढ़ पिण्ड को स्िथर बनाया गया है इसकी घूणर्न - अक्ष कहलाती है। यदि आप अपने चारों ओर देखें तो आपको छत का पंखा, वुफम्हार का चाक ;चित्रा 7ण्3;ंद्ध एवं ;इद्धद्ध, विशाल चक्री - झूला ;जाॅयन्ट व्हीलद्ध, मेरी - गो - राउण्ड जैसे अनेक ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ किसी अक्ष के परितः घूणर्न हो रहा हो। ;ंद्ध ;इद्ध चित्रा 7ण्3 एक स्िथर अक्ष के परितः घूणर्न ;ंद्ध छत का पंखा ;इद्धवुफम्हार का चाक 146 भौतिकी आइये, अब हम यह समझने की चेष्टा करें कि घूणर्न क्या है, और इसके क्या अभ्िालक्षण हैं? आप देख सकते हैं कि एक दृढ़ पिण्ड के एक स्िथर अक्ष के परितः घूणर्न में, पिण्ड का हर कण एक वृत्त में घूमता है। यह वृत्त अक्ष के लम्बवत् तल में है और इनका केन्द्र अक्ष पर अवस्िथत है। चित्रा 7ण्4 में एक चित्रा 7ण्4 ्र.अक्ष के परितः एक दृढ़ पिण्ड का घूणर्न। पिण्ड का प्रत्येक बिन्दु च्1याच्2एक वृत्त पर घूमता है जिसका केन्द्र ;ब्1या ब्2द्धअक्ष पर स्िथत है। वृत्त की त्रिाज्या;त1 या त2द्धअक्ष से बिन्दु;च्1या च्2द्धकी लम्बवत् दूरी है। अक्ष पर स्िथत च्3 जैसा बिन्दु स्िथर रहता है। स्िथर अक्ष ;निदेर्श प्रेफम की ्र.अक्षद्ध के परितः किसी दृढ़ पिण्ड की घूणर्न गति दशार्यी है। हम अक्ष से त1दूरी पर स्िथत दृढ़ पिण्ड का कोइर् स्वेच्छ कण च्1लें। यह कण अक्ष के परितः त1त्रिाज्या के वृत्त पर घूमता है जिसका केन्द्र ब्1अक्ष पर स्िथत है। यह वृत्त अक्ष के लम्बवत् तल में अवस्िथत है। चित्रा में एक दूसरा कण च्2भी दशार्या गया है जो स्िथर अक्ष सेत2 दूरी पर है। कण च्2 , त2त्रिाज्या के वृत्ताकार पथ पर चलता है जिसका केन्द्रअक्ष पर ब्2है। यह वृत्त भी अक्ष के लम्बवत् तल में है। ध्यान दें कि च्1एवं च्2द्वारा बनाये गए वृत्त अलग - अलग तलों में हैं पर ये दोनों तल स्िथर अक्ष के लम्बवत् हैं। अक्ष पर स्िथत किसी बिन्दु, जैसे च्3 के लिए,त त्र 0 । ये कण, पिण्ड के घूमते समय भी स्िथत रहते हैं। यह अपेक्ष्िात भी है क्योंकि अक्ष स्िथर है। तथापि, घूणर्न के वुफछ उदाहरणों में, अक्ष स्िथर नहीं भी रहती। इस प्रकार के घूणर्न के मुख्य उदाहरणों में एक है, एक ही स्थान पर घूमता लट्टू ;चित्रा 7ण्5;ंद्धद्ध। ;लट्टू की गति के संबंध् में हमने यह मान लिया है कि यह एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित नहीं होता और इसलिए इसमें स्थानांतरण गति नहीं है।द्ध अपने अनुभव के आधर पर हम यह जानते हैं कि इस प्रकार घूमते लट्टू की अक्ष, भूमि पर इसके सम्पवर्फ - बिन्दु से गुजरते अभ्िालम्ब के परितः एक शंवुफ बनाती है जैसा कि चित्रा 7ण्5;ंद्ध में दशार्या गया है। ;ऊध्वार्ध्र के परितः लट्टू की अक्ष का इस प्रकार घूमना पुरस्सरण कहलाता है द्ध। ध्यान दें कि लट्टू का वह बिन्दु जहाँ यह ध्रातल को छूता है, स्िथर है। किसी भी क्षण, लट्टू की घूणर्न - अक्ष, इसके सम्पवर्फ बिन्दु से गुजरती है। इस प्रकार की घूणर्न गति का दूसरा सरल उदाहरण घूमने वाला मेज का पंखा या पीठिका - पंखा है। आपने देखा होगा कि इस प्रकार के पंखे की अक्ष, क्षैतिज तल में, दोलन गति ;इधर से उध्र घूमने कीद्ध करती है और यह गति ऊध्वार्ध्र रेखा के परितः होती है जो उस बिन्दु से गुजरती है जिस पर अक्ष की ध्ुरी टिकी होती है ;चित्रा 7ण्5;इद्ध में बिन्दु व्द्ध। चित्रा 7ण्5 ;ंद्ध घूमता हुआ लट्टू ;इसकी टिप व् का ध्रातल पर सम्पवर्फ बिन्दु स्िथर हैद्ध चित्रा7ण्5 ;इद्ध घूमता हुआ मेज का पंखा ;पंखे की ध्ुरी, बिन्दु व्ए स्िथर है द्ध कणों के निकाय तथा घूणीर् गति अध्िक होती है, कि इन समीकरणों में, सभी पृथक - पृथक कणों को लेकर संयुक्त प्रभाव ज्ञात करना असंभव कायर् है। पर, क्योंकि कणों के बीच की दूरी बहुत कम है, हम पिण्ड में द्रव्यमान का सतत वितरण मान सकते हैं। यदि पिण्ड को द छोटे द्रव्यमान खण्डों में विभाजित करें जिनके द्रव्यमानΔउ 1ए Δउ 2ण्ण्ण् Δउ द हैं तथा प.वाँखण्डΔउप बिन्दु ;ग पए लपए ्र पद्ध पर अवस्िथत है ऐसा सोचें तो द्रव्यमान केन्द्र के निदेर्शांकों के लगभग मान इस प्रकार व्यक्त करेंगे - ; उ द्धग ∑;Δउप द्धलप ;Δउ द्ध्रप∑Δ पप ∑ पग् त्र एल् त्र एर् त्र ∑Δउप ∑Δउप ∑Δउप यदि हमदको वृहत्तर करें अथार्त् Δउपको और छोटा करें तो ये समीकरण कापफी यथाथर् मान बताने लगेंगे। उस स्िथति में प.कणों के योग को हम समाकल से व्यक्त करेंगे। ∑Δउप → कउ त्र डए∫ ∑;Δउप द्धगप →∫ ग कउए ;Δउ द्धल → ल कउए∑ पप ∫और ∑; Δउप द्ध्रप → ्र कउ∫ यहाँड पिण्ड का वुफल द्रव्यमान है। द्रव्यमान केन्द्र के निदेर्शांकों को अब हम इस प्रकार लिख सकते हैं11 1 ग् त्र ग कउ ए ल् त्र ल कउ और र् त्र ्र कउ ∫∫ ∫डड ड ;7ण्5ंद्ध इन तीन अदिश व्यंजकों के तुल्य सदिश व्यंजक इस प्रकार लिख सकते हैं - 1 त् त्र∫ तकउ ;7ण्5इद्धड यदि हम द्रव्यमान केन्द्र को अपने निदेर्शांक निकाय का मूल - बिन्दु चुनें तो त् ;गल्र एएद्ध त्र 0 अथार्त्ए ∫ तकउ त्र 0 या ग कउ त्र∫ ल कउ त्र ्र कउ त्र 0 ;7ण्6द्ध∫∫ प्रायः हमें नियमित आकार के समांग पिण्डोंऋ जैसे - वलयों, गोल - चकतियों, गोलों, छड़ों इत्यादि के द्रव्यमान केन्द्रों की गणना करनी पड़ती है। ;समांग पिण्ड से हमारा तात्पयर् एक ऐसी वस्तु से है जिसमें द्रव्यमान का समान रूप से वितरण होद्ध। सममिति का विचार करके हम सरलता से यह दशार् सकते हैं कि इन पिण्डों के द्रव्यमान केन्द्र उनके ज्यामितीय केन्द्र ही होते हैं। आइये, एक पतली छड़ पर विचार करें, जिसकी चैड़ाइर् और मोटाइर् ;यदि इसकी अनुप्रस्थ काट आयताकार हैद्ध अथवा त्रिाज्या ;यदि छड़ बेलनाकार हैद्ध, इसकी लम्बाइर् की तुलना में बहुत छोटी है। छड़ की लम्बाइर् ग.अक्ष के अनुदिश रखें और मूल बिन्दु इसके ज्यामितीय केन्द्र पर ले लें तो परावतर्न सममिति की दृष्िट से हम कह सकते हैं कि प्रत्येक ग पर स्िथत प्रत्येक कउ घटक के समानकउका घटक दृग पर भी स्िथत होगा;चित्रा 7ण्8द्ध। चित्रा 7ण्8 एक पतली छड़ का द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात करना समाकल में हर जोड़े का योगदान शून्य है और इस कारण स्वयं ग कउ का मान शून्य हो जाता है। समीकरण ;7ण्6द्ध बताती है कि∫ जिस बिन्दु के लिए समाकल शून्य हो वह पिण्ड का द्रव्यमान केन्द्र है। अतः समांग छड़ का ज्यामितीय केन्द्र इसका द्रव्यमान केन्द्र है। इसे परावतर्न सममिति के प्रयोग से समझ सकते हैं। सममिति का यही तवर्फ, समांग वलयों, चकतियों, गोलों और यहाँ तक कि वृत्ताकार या आयताकार अनुप्रस्थ काट वाली मोटी छड़ों के लिए भी लागू होगा। ऐसे सभी पिण्डों के लिए आप पायेंगे कि बिन्दु ;गएलए्रद्ध पर स्िथत हर द्रव्यमान घटक के लिए बिन्दु ;.गए.लए.्रद्ध पर भी उसी द्रव्यमान का घटक लिया जा सकता है। ;दूसरे शब्दों में कहें तो इन सभी पिण्डों के लिए मूल बिन्दु परावतर्न - सममिति का बिन्दु हैद्ध। परिणामतः, समीकरण ;7ण्5 ंद्ध में दिए गए सभी समाकल शून्य हो जाते हैं। इसका अथर् यह हुआ कि उपरोक्त सभी पिण्डों का द्रव्यमान केन्द्र उनके ज्यामितीय केन्द्र पर ही पड़ता है। ऽ उदाहरण 7ण्1एक समबाहु त्रिाभुज के शीषो± पर रखे गए तीन कणों का द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात कीजिए। कणों के द्रव्यमान क्रमशः 100हए 150हए एवं 200ह हैं। त्रिाभुज की प्रत्येक भुजा की लम्बाइर् 0ण्5 उ है। हल चित्रा 7ण्9 150 भौतिकी ग एवं ल.अक्ष चित्रा 7ण्9 में दशार्ये अनुसार चुनें तो समबाहु त्रिाभुज के शीषर् बिन्दुओं व्ए । एवं ठ के निदेर्शांक क्रमशः ;0ए0द्धए ;0ण्5ए0द्ध एवं;0ण्25ए0ण्25 3 द्ध होंगे। माना कि 100हए 150ह एवं200ह के द्रव्यमान क्रमशः व्ए । एवं ठ पर अवस्िथत हैं। तब उग ़ उग ़ उग 11 22 33ग् त्र उ ़ उ ़ उ123 ⎡100 0 ़ 150;0ण्5द्ध ़ 200;0ण्25द्ध ⎤ हउ⎣;द्ध⎦ त्र ;100 ़ 150 ़ 200द्ध ह 75 ़ 50 125 5 त्र उ त्र उ त्र उ 450 450 18 ⎡100;0द्ध ़ 150;0द्ध ़ 200;0ण्25 3द्ध ⎤ हउ⎣ ⎦ल् त्र 450 ह 50 3 3 1 त्र उ त्र उ त्र उ 450 933 द्रव्यमान केन्द्र ब् चित्रा में दशार्या गया है। ध्यान दें कि यह त्रिाभुज व्।ठ का ज्यामितीय केन्द्र नहीं है। क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा क्यों नही है? ऽ ऽ उदाहरण 7ण्2रू एक त्रिाभुजाकार पफलक का द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात कीजिए। हल पफलक ;Δस्डछद्ध को आधर ;डछद्ध के समान्तर पतली प‘ियों में बांटा जा सकता है जैसा चित्रा 7ण्10 में दशार्या गया है। चित्रा 7ण्10 सममिति के आधर पर हम कह सकते हैं कि हर प‘ी का द्रव्यमान केन्द्र उसका मध्य बिन्दु है। अगर हम सभी प‘ियों के मध्य बिन्दुओं को मिलाते हैं तो हमें माियका स्च् प्राप्त होती है। इसलिए, पूरे त्रिाभुज का द्रव्यमान केन्द्र इस माियका स्च् पर कहीं अवस्िथत होगा। इसी प्रकार हम तवर्फ कर सकते हैं कि यह माियका डफ और छत् पर भी अवस्िथत होगा। अतः यह द्रव्यमान केन्द्र तीनों माियकाओं का संगामी बिन्दु गति त्रिाभुज का केन्द्रक ळ है। ऽ ऽ उदाहरण 7ण्3रू एक दिए गए स्.आवृफति के पफलक ;एक पतली चपटी प्लेटद्ध का द्रव्यमान केन्द्र ज्ञात कीजिए, जिसका विभ्िान्न भुजाओं को चित्रा 7.11 में दशार्या है। पफलक का द्रव्यमान 3 ाह है। हल चित्रा 7ण्11 के अनुसार ग् एवं ल् अक्षांे को चुनें तो स्.आवृफति पफलक के विभ्िान्न शीषो± के निदेर्शांक वही प्राप्त होते हैं जो चित्रा में अंकित किए गए हैं। हम स्.आवृफति को तीन वगो± से मिलकर बना हुआ मान सकते हैं जिनमें से प्रत्येक वगर् की भुजा 1उ है। प्रत्येक वगर् का द्रव्यमान 1ाह है, क्योंकि पफलक समांग हैं। इन तीन वगो± के द्रव्यमान केन्द्र ब् 1ए ब्2 और ब्3 हैं, जो सममिति के विचार से उनके ज्यामितीय केन्द्र हैं और इनके निदेर्शांक क्रमशः ;1ध्2ए1ध्2द्धए ;3ध्2ए1ध्2द्धए ;1ध्2ए3ध्2द्ध हैं। हम कह सकते हैं कि स्.आवृफति का द्रव्यमान केन्द्र ;ग्ए ल्द्ध इन द्रव्यमान बिन्दुओं का द्रव्यमान केन्द्र हैं। चित्रा 7ण्11 अतः 1;1ध्2द्ध ़ 1;3ध्2द्ध ़ 1;1ध्2द्ध ाह उ ख्, 5ग् त्र त्र उ 1 1ाह ;़ 1 ़द्ध 6 ⎡ख्1;1ध् 2द्ध ़ 1;1ध्2द्ध ़1;3ध् 2द्ध ,⎤ ाह उ ⎣⎦ 5 ल् त्रत्र उ;़ 1़द्ध 61 1ाह स्.आवृफति का द्रव्यमान केन्द्र रेखा व्क् पर पड़ता है। इस बात का अंदाजा हम बिना किसी गणना के लगा सकते थे। क्या आप बता सकते हैं, वैफसे? यदि यह मानें कि चित्रा 7.11 में दशार्ये गए स् आवृफति पफलक के तीन वगो± के द्रव्यमान कणों के निकाय तथा घूणीर् गति स्पष्टतः ऐसा इसलिए है क्योंकिं × ं का परिमाण ं 2 ेपद 0 °त्र 0। इससे हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि ˜˜˜ ˜ ˜˜प × प त्र 0ए र× र त्र 0ए ा × ा त्र 0 ;पपद्ध ˜ ˜ ˜प × र त्र ा ध्यान दें, कि ˜प × ˜रका परिमाण ेपद 900 या 1 है, चूंकि ˜पऔर ˜रदोनों का परिमाण 1 है और उनके बीच 900 का कोण है। अतः ˜प × ˜रएक एकांक सदिश है। ˜पऔर ˜रके तल के अभ्िालम्बवत् दक्ष्िाणावतर् पेंच के नियमानुसार ज्ञात करें तो इनसे संबंध्ित यह एकांक सदिश ा˜है। इसी प्रकार आप यह भी पुष्ट कर सकते हैं कि ˜˜˜ ˜˜˜र × ा त्र प आरै ा × प त्र र सदिश गुणन के क्रम विनिमेयता गुण के आधर पर हम कह सकते हैं - ˜˜˜˜˜˜˜˜ ˜र × प त्र−ाए ा × र त्र−पए प × ा त्र− र ध्यान दें कि उपरोक्त सदिश गुणन व्यंजकों में यदि ˜˜ ˜ एएप राचक्रीय क्रम में आते हैं तो सदिश गुणन ध्नात्मक है और यदि चक्रीय क्रम में नहीं आते हैं तो सदिश गुणन )णात्मक है। अब, ˜˜˜ ˜˜˜ं × इ त्र ;ं प ़ ं र ़ ं ाद्ध × ;इ प ़ इ र ़ इ ाद्धगल्र गल्र ˜ ˜ ˜˜˜˜त्र ंइ ा − ंइ र − ंइ ा ़ ंइ प ़ ंइ र − ंइ प गल ग्रलग ल्र्रग्रल त्र ;ंइ − ंइ द्ध˜प ़ ;ंइ − ंइ द्ध˜र ़ ;ंइ − ंइ द्धा˜ ल्र्रग ्रगग्र गललग उपरोक्त व्यंजक प्राप्त करने में हमने सरल सदिश गुणनपफलों का उपयोग किया है।ं × इ को व्यक्त करने वाले व्यंजक को हम एक डिटरमिनेंट ;सारण्िाकद्ध के रूप में लिख सकते हैं जो याद रखने में आसान है। ˜˜˜प रा ं × इ त्र ंं गल्र इइइ गल्र ऽ उदाहरण 7ण्4रूदो सदिशों ं त्र ;3प६ दृ 4र६ ़ 5६ाद्धएवं इ त्र ;दृ 2६प़ र६ द्ध के अदिश एवं सदिश गुणनपफल६ दृ 3ाज्ञात कीजिए। हल ˜˜˜ ˜˜˜ ण् त्र ;3 − 4 र ़ 5ा प − प ़ र − 3ंइ प द्ध;2 ाद्ध त्र−6 − 4 − 15 त्र−25 ˜˜˜प रा ˜˜ ˜ं × इ त्र 3 −45 त्र 7प − र − 5ा −21 −3 ˜˜ ˜ध्यान दें कि, इ × ं त्र−7प ़ र ़ 5ा ऽ 7ण्6 कोणीय वेग और इसका रेखीय वेग से संबंध् इस अनुभाग में हम अध्ययन करेंगे कि कोणीय वेग क्या है, और घूणीर् गति में इसकी क्या भूमिका है? हम यह समझ चुके हैं कि घूणीर् गति में पिण्ड का प्रत्येक कण एक वृत्ताकार पथ पर चलता है। किसी कण का रेखीय वेग उसके कोणीय वेग से संबंध्ित चित्रा 7ण्16 एक स्िथर अक्ष के परितः घूणर्न। स्िथर ;्र.द्ध अक्ष के परितः घूमते दृढ़ पिण्ड के किसी कण च् का वृत्ताकार पथ पर चलना। वृत्त का केन्द्र ;ब्द्धए अक्ष पर अवस्िथत है। होता है। इन दो राश्िायों के बीच का संबंध् एक सदिश गुणन से व्यक्त होता है। सदिश गुणन के विषय में आपने पिछले अनुभाग में पढ़ा है। 156 भौतिकी आइये चित्रा 7ण्4 पुनः देंखे। जैसा ऊपर बताया गया है, किसी दृढ़ पिण्ड की एक स्िथर अक्ष के परितः घूणीर् गति में, पिण्ड का प्रत्येक कण एक वृत्त में गति करता है। ये वृत्त अक्ष के लम्बवत् समतल में होते हैं जिनके केन्द्र अक्ष के ऊपर अवस्िथत होते हैं। चित्रा 7ण्16 में हमने चित्रा 7ण्4 को पिफर से बनाया है और इसमें स्िथर;्र.द्ध अक्ष के परितः घूमते, दृढ़ पिण्ड के, एक विश्िाष्ट कण को बिन्दु च् पर दशार्या है। यह कण एक वृत्त बनाता है जिसका केन्द्र ब्ए अक्ष पर स्िथत है।वृत्त की त्रिाज्यात है, जो बिन्दु च् की अक्ष से लम्बवत् दूरी है। चित्रा में हमने च् बिन्दु पर कण का रेखीय वेग सदिश अभी दशार्या है। इसकी दिशा वृत्त के च् बिन्दु पर खींची गइर् स्पशर् रेखा के अनुदिश है। माना किΔज समय अंतराल के बाद कण की स्िथति च्श् है ;चित्रा 7.16द्ध। कोण च्ब् Ρ′ ए Δज समय में कण के कोणीय विस्थापनΔθका माप है। Δज समय में कण का औसत कोणीय वेगΔθध्Δज है। जैसे - जैसेΔज का मान घटाते हुए शून्योन्मुख करते हैं, अनुपात Δθध्Δज का मान एक सीमांत मान प्राप्त करता है जो च् बिन्दु पर कण का तात्क्षण्िाक कोणीय वेग कθध्कजहै। तात्क्षण्िाक कोणीय वेग को हम ω से व्यक्त करते हैं। वृत्तीय गति के अध्ययन से हम जानते हैं कि रेखीय वेग सदिश का परिमाण अ एवं कोणीय वेग ω के बीच संबंध् एक सरल समीकरण υत्रω त द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है, जहाँत वृत्त की त्रिाज्या है। हमने देखा कि किसी दिए गए क्षण पर समीकरण υत्रωत दृढ़ पिण्ड के सभी कणों पर लागू होती है। अतः स्िथर अक्ष से तप दूरी पर स्िथत किसी कण का, किसी क्षण पर, रेखीय वेगअप होगा υप त्रω तप;7ण्19द्ध यहाँ भी सूचकांक पका मान 1 सेद तक बदलता है, जहाँ दपिण्ड के वुफल कणों की संख्या है। अक्ष पर स्िथत कणों के लिए त त्र 0 ए और इसलिए त्र 0। अतः अक्ष पर स्िथत कण रेखीय गति नहीं करते। इससे यह पुष्ट होता है कि अक्ष स्िथर है। ध्यान दें कि हमने सभी कणों का समान कोणीय वेग लिया है। इसलिए हम ωको पूरे पिण्ड का कोणीय वेग कह सकते हैं। किसी पिण्ड की शु( स्थानांतरण गति का अभ्िालक्षण हमने यह बताया कि इसके सभी कण, किसी दिए गए क्षण पर समान वेग से चलते हैं। इसी प्रकार, शु( घूणीर् गति के लिए हम कह सकते हैं कि किसी दिए गए क्षण पर पिण्ड के सभी कण समान कोणीय वेग से घूमते हैं। ध्यान दें कि स्िथर अक्ष के परितः घूमते दृढ़ पिण्ड की घूणीर् गति का यह अभ्िालक्षण, दूसरे शब्दों में ;जैसा अनुभाग 7.1 में बताया गया हैद्ध पिण्ड का हर कण एक वृत्त में गति करता है और यह वृत्त अक्ष के अभ्िालम्बवत् तल में स्िथत होता है जिसका केन्द्र अक्ष पर होता है। हमारे अभी तक के विवेचन से ऐसा लगता है कि कोणीय वेग एक अदिश राश्िा है। ¯कतु तथ्य यह है, कि यह एक सदिश राश्िा है। हम इस तथ्य के समथर्न या पुष्िट के लिए कोइर् तवर्फ नहीं देंगे, बस यह मान कर चलेंगे। एक स्िथर अक्ष के परितः घूणर्न में, कोणीय वेग सदिश, घूणर्न अक्ष के अनुदिश होता है, और उस दिशा में संकेत करता है जिसमें एक दक्ष्िाणावतर् पेंच आगे बढ़ेगा जब उसके शीषर् को पिण्ड के घूणर्न की दिशा में घुमाया जाएगा। देख्िाए चित्रा 7ण्17;ंद्ध। इस सदिश का परिमाण, ए जैसा ऊपर बताया गया है। चित्रा 7ण्17;ंद्ध यदि दक्ष्िाणावत्तर् पेंच के शीषर् को पिण्ड के घूणर्न की दिशा में घुमाया जाए तो पेंच कोणीय वेगωकी दिशा में आगे बढ़ेगा। यदि पिण्ड के घूणर्न की दिशा ;वामावतर् या दक्ष्िाणावतर्द्ध बदलेगी तोωकी दिशा भी बदल जाएगी। चित्रा7ण्17 ;इद्ध कोणीय वेग सदिशωकी दिशा स्िथर घूणर्न अक्ष के अनुदिश है। च् बिन्दु पर स्िथत कण का रेखीय वेग अ त्रω× त है। यह ωएवंत दोनों के लम्बवत् है और कण जिस वृत्त पर चलताहै उसके ऊपर खींची गइर् स्पशर् रेखा के अनुदिश है।

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