कायर्, उफजार् और शक्ित अथार्त् प्रथम द्रव्यमान विरामावस्था में आ जाता है और संघट्टð के पश्चात् दूसरा द्रव्यमान, प्रथम द्रव्यमान का आरंभ्िाक वेग प्राप्त कर लेता है। दशा प्प्: यदि एक पिंड का द्रव्यमान दूसरे पिंड के द्रव्यमान से बहुत अध्िक है, अथार्त् उ2 झझ उ1ए तब अ् − अ अ्01 ि1प2 िभारी द्रव्यमान स्िथर रहता है जबकि हलके द्रव्यमान का वेग उत्क्रमित हो जाता है। ऽ उदाहरण 6ण्12 गतिशील न्यूट्राॅनों का मंदन: किसी नाभ्िाकीय रिऐक्टर में तीव्रगामी न्यूट्राॅन ;विश्िाष्ट रूप से दृ1वेग 107 उ ेदृ1द्ध को 103 उ े के वेग तक मंदित कर दिया जाना चाहिए ताकि नाभ्िाकीय विखंडन अभ्िािया में 235न्यूट्राॅन की यूरेनियम के समस्थानिक न् से अन्योन्यिया92करने की प्रायिकता उच्च हो जाए। सि( कीजिए कि न्यूट्राॅन एक हलके नाभ्िाक, जैसे ड्यूटीरियम या काबर्न जिसका द्रव्यमान न्यूट्राॅन के द्रव्यमान का मात्रा वुफछ गुना है, से प्रत्यास्थ संघट्टð करने में अपनी अिाकांश गतिज उफजार् की क्षति कर देता है। ऐसे पदाथर् प्रायः भारी जल ;क्2व्द्ध अथवा ग्रेपफाइट, जो न्यूट्राॅनों की गति को मंद कर देते हैं, ‘मंदक’ कहलाते हैं । हल न्यूट्राॅन की प्रारंभ्िाक गतिज उफजार् है 1 ज्ञ उअ 2 1प 11प2 जबकि समीकरण ;6ण्27द्ध से इसकी अंतिम गतिज उफजार् है 2 1 ज्ञि 2 1 1 1 2 उि अ 1 1 2 उ 1 1 उ उ 2 2 उ उ 2 1पअ क्षयित आंश्िाक गतिज उफजार् है 1 ि 1 1 िप ज्ञ ज्ञ 1 1 उ उ 2 2 उ उ 2 जबकि विमंदक नाभ्िाक ज्ञ ध्ज्ञ द्वारा भ्िान्नात्मक गतिज उफजार् वृि है । 2ि त्र 1 − 1ि ;प्रत्यास्थ संघट्टðद्ध 4उउ 2 ि1प 12 2 12उउ उपरोक्त परिणाम को समीकरण ;6.28द्ध से प्रतिस्थापित करके भी सत्यापित किया जा सकता है। ड्यूटीरियम के लिए, उ2 त्र 2 उ1 और हम प्राप्त करते हैं 1ि त्र 1ध्9ए जबकि 2ि त्र 8ध्9 है। अतः न्यूट्राॅन की लगभग 90» उफजार् ड्यूटीरियम को हस्तांतरित हो जाती है। काबर्न के लिए, 1ि त्र 71ण्6ः और 2ि त्र 28ण्4ः है। हालंाकि, व्यवहार में, सीध संघट्टð विरले ही होने के कारण यह संख्या कापफी कम होती है। फ् यदि दोनों ¯पडों के आरंभ्िाक तथा अंतिम वेग एक ही सरल रेखा के अनुदिश कायर् करते हैं तो ऐसे संघट्टð को एकविमीय संघट्टð अथवा सीध संघट्टð कहते हैं। छोटे गोलीय ¯पडों के लिए यह संभव है कि ¯पड 1 की गति की दिशा विरामावस्था में रखे ¯पड 2 के केन्द्र से होकर गुजरे। सामान्यतः, यदि आरंभ्िाक वेग तथा अंतिम वेग एक ही तल में हों तो संघट्टð द्विविमीय कहलाता है। 6ण्12ण्3 द्विविमीय संघट्टð चित्रा 6ण्10 स्िथर द्रव्यमान उ 2 से गतिमान द्रव्यमान उ 1 का संघट्टð का चित्राण करता है। इस प्रकार के संघट्टð में रेखीय संवेग संरक्ष्िात रहता है। चूंकि संवेग एक सदिश राश्िा है, अतः यह तीन दिशाओं क्ष्गए लए ्रद्व के लिए तीन समीकरण प्रदश्िर्ात करता है। संघट्टð के पश्चात् उ1 तथा उ2 के अंतिम वेग की दिशाओं के आधार पर समतल का निधार्रण कीजिए और मान लीजिए कि यह ग.ल समतल है। रेखीय संवेग के ्र.घटक का संरक्षण यह दशार्ता है कि संपूणर् संघट्टð ग.ल समतल में है। ग.घटक और ल.घटक के समीकरण निम्न हैं: उअ त्र उअ बवे θ ़ उअ बवे θ ;6ण्29द्ध11प111ि222ि0 त्र उअ ेपद θ दृ उअ ेपद θ ;6ण्30द्ध111ि222िअध्िकतर स्िथतियों में यह माना जाता है कि क्ष्उ1ए उ2ए अ1पद्व ज्ञात है। अतः संघट्टð के पश्चात्, हमें चार अज्ञात राश्िायाँ क्ष्अए अए θऔर θद्व प्राप्त होती हैं जबकि हमारे पास मात्रा दो1 ि2 ि1 2समीकरण हैं। यदि θ 1 त्र θ 2 त्र 0ए हम पुनः एकविमीय संघट्टð के लिए समीकरण ;6.24द्ध प्राप्त कर लेते हैं। अब यदि संघट्टð प्रत्यास्थ है तो, 11 122 2 उअ उअ उअ ;6.31द्ध11प 11 ि22 ि222 यह हमें समीकरण ;6.29द्ध व ;6.30द्ध के अलावा एक और समीकरण देता है लेकिन अभी भी हमारे पास सभी अज्ञात राश्िायों का पता लगाने के लिए एक समीकरण कम है। अतः प्रश्न को हल करने के लिए, चार अज्ञात राश्िायों में से कम से कम एक और राश्िा, मान लीजिए θ 1एज्ञात होनी चाहिए। उदाहरणाथर्, कोण θ1 का निधर्रण संसूचक को कोणीय रीति में ग.अक्ष से ल.अक्ष तक घुमा कर किया जा सकता है। राश्िायों क्ष्उ ए उ ए अ ए θ द्व121प1के ज्ञात मान से हम समीकरण ;6.29द्ध - ;6.31द्ध का प्रयोग करके क्ष्अए अए θद्व का निधर्रण कर सकते हैं।12ि2ि136 भौतिकी 3ण् न्यूटन के तृतीय नियमानुसार, किन्हीं दो पिंडों के मध्य परस्पर एक - दूसरे पर आरोपित बलों का योग शून्य होता है । थ् ़ थ् त्र 0 1221परंतु दो बलों द्वारा किए गए कायर् का योग सदैव शून्य नहीं होता है, अथार्त् ॅ 12 ़ ॅ 21 ≠ 0 तथापि, कभी - कभी यह सत्य भी हो सकता है । 4ण् कभी - कभी किसी बल द्वारा किए गए कायर् की गणना तब भी की जा सकती है जबकि बल की ठीक - ठीक प्रवृफति का ज्ञान न भी हो। उदाहरण 6.2 से यह स्पष्ट है, जहाँ कायर् - उफजार् प्रमेय का ऐसी स्िथति में प्रयोग किया गया है। 5ण् कायर् - उफजार् प्रमेय न्यूटन के द्वितीय नियम से स्वतन्त्रा नहीं है। कायर् - उफजार् प्रमेय को न्यूटन के द्वितीय नियम के अदिश रूप में देखा जा सकता है। यांत्रिाक उफजार् के संरक्षण के सि(ांत को, संरक्षी बलों के लिए कायर् - उफजार् प्रमेय के एक महत्त्वपूणर् परिणाम के रूप में समझा जा सकता है। 6ण् कायर् - उफजार् प्रमेय सभी जड़त्वीय प्रेफमों में लागू होती है। इसे अजड़त्वीय प्रेफमों में भी लागू किया जा सकता है यदि विचारणीय पिंड पर आरोपित वुफल बलों के परिकलन में छद्म बल के प्रभाव को भी सम्िमलित कर लिया जाए। 7ण् संरक्षी बलों के अध्ीन किसी पिंड की स्िथतिज उफजार् हमेशा किसी नियतांक तक अनिश्िचत रहती है। उदाहरणाथर्, किसी पिंड की स्िथतिज उफजार् किस ¯बदु पर शून्य लेनी है, यह केवल स्वेच्छा से चयन किए गए ¯बदु पर निभर्र करता है। जैसे गुरुत्वीय स्िथतिज उफजार् उ ह ी की स्िथति में स्िथतिज उफजार् के लिए शून्य ¯बदु पृथ्वी के पृष्ठ पर लिया गया है। स्िप्रंग के लिए जिसकी 1 2उफजार् ाग है, स्िथतिज उफजार् के लिए शून्य ¯बदु, दोलायमान द्रव्यमान की माध्य स्िथति पर लिया गया है । 2 8ण् यांत्रिाकी में प्रत्येक बल स्िथतिज उफजार् से संब( नहीं होता है। उदाहरणाथर्, घषर्ण बल द्वारा किसी बंद पथ में किया गया कायर् शून्य नहीं है और न ही घषर्ण से स्िथतिज उफजार् को संब( किया जा सकता है। 9ण् किसी संघट्टðके दौरान ;ंद्ध संघट्टðके प्रत्येक क्षण में पिंड का वुफल रेखीय संवेग संरक्ष्िात रहता है, ;इद्ध गतिज उफजार् संरक्षण ;चाहे संघट्टð प्रत्यास्थ ही होद्ध संघट्टð की समाप्ित के पश्चात् ही लागू होता है और संघट्टð के प्रत्येक क्षण के लिए लागू नहीं होता है। वास्तव में, संघट्टðकरने वाले दोनों पिंड विवृफत हो जाते हैं और क्षण भर के लिए एक दूसरे के सापेक्ष विरामावस्था में आ जाते हैं।

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