इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप ऽ मन एवं व्यवहार को समझने में मनोविज्ञान के स्वरूप और उसकी भूमिका को जान सवेंफगे, ऽ इस विद्याशाखा के विकास का वणर्न कर सवेंफगे, ऽ मनोविज्ञान के विविध् क्षेत्रों और अन्य विद्याशाखाओं तथा व्यवसायों से उसके संबंध् को जान सवेंफगे, तथा ऽ दैनंदिन जीवन में अपने तथा अन्यों को ठीक से समझने में मनोविज्ञान के महत्त्व को जान सवेंफगे। विषयवस्तु परिचय मनोविज्ञान क्या है? मनोविज्ञान एक विद्याशाखा के रूप मेंमनोविज्ञान एक प्राकृतिक विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान के रूप में मन एवं व्यवहार की समझ मनोविज्ञान विद्याशाखा की प्रसि( धरणाएँ मनोविज्ञान का विकास आध्ुनिक मनोविज्ञान के विकास में वुफछ रोचक घटनाएँ ;बाॅक्स 1.1द्ध भारत में मनोविज्ञान का विकास मनोविज्ञान की शाखाएँ अनुसंधन एवं अनुप्रयोग के कथ्य मनोविज्ञान एवं अन्य विद्याशाखाएँ कायर्रत मनोवैज्ञानिक दैनंदिन जीवन में मनोविज्ञान प्रमुख पद सारांश समीक्षात्मक प्रश्न परियोजना विचार संभवतः आपसे आपके अध्यापक ने कक्षा में पूछा होगा कि अन्य विषयों को छोड़कर आपने मनोविज्ञान क्यों लिया। आप क्या सीखने की आशा करते हैं? यदि आपसे यह प्रश्न पूछा जाए तो आप क्या प्रतििया देंगे? सामान्यतया, जिस तरह की प्रतिियाएँ कक्षा में मिलती हैं वे विस्मयकारी होती हैं। अिाकांश विद्याथीर् निरथर्क प्रतििया देते हैं, जैसे वे जानना चाहते हैं कि दूसरे लोग क्या सोच रहे हैं। परंतु ऐसी भी प्रतिियाएँ हो सकती हैंऋ जैसे - स्वयं को जानना, दूसरों को जानना अथवा विशेष प्रतिियाएँऋ जैसे - लोग स्वप्न क्यों देखते हैं, लोग क्यों आगे बढ़कर दूसरों की सहायता करते हैं अथवा एक दूसरे को पीटते हैं। समस्त प्राचीन परंपराओं में मानव स्वभाव से संबंिात प्रश्न अवश्य होते हैं। भारतीय दाशर्निक परंपराएँ विशेष रूप से ऐसे प्रश्नों का सामना करती हैं कि लोग जिस तरह का व्यवहार करते हैं वैसा वे क्यों करते हैं। लोग अिाकतर अप्रसन्न क्यों होते हैं? यदि वे अपने जीवन में प्रसन्नता चाहते हैं तो उन्हें अपने विषय में वैफसे परिवतर्न लाने चाहिए। सभी ज्ञान की तरह, मनोवैज्ञानिक ज्ञान भी मानव कल्याण के लिए बहुत योगदान देना चाहता है। यदि संसार दुखागार है तो यह अिाकतर मनुष्यों के ही कारण है। संभवतः आप यह पूछना चाहेंगे कि 11 सितंबर ;9/11द्ध अथवा इराक मेंयु( की घटना क्यों हुइर्? दिल्ली, मुंबइर्, श्रीनगर अथवा पूवोर्त्तर में निदोर्ष लोगों को बम एवं गोलियों का सामना क्यों करना पड़ता है? मनोवैज्ञानिक यह पूछते हैं कि युवा मन में वैफसे अनुभव होते हैं जो बदला लेने वाले आतंकवादियों के रूप में परिवतिर्त हो जाते हैं? परंतु मानव स्वभाव का एक दूसरा रूप भी है। आपने संभवतः मेजर एच.पी.एस. अहलूवालिया का नाम सुना होगा जिन्हें पाकिस्तान के साथ यु( के समय एक चोट के कारण कमर के नीचे लकवा मार गया था और वे माउंट एवरेस्ट पर चढ़े थे। उनमें इतनी उफँचाइर् पर चढ़ने का भाव कहाँ से जागृत हुआ? मानव स्वभाव के विषय में ऐसे ही प्रश्न नहीं होते हैं जिन्हें मनोविज्ञान एक मानव विज्ञान के रूप में देखता है। आपको जानकर आश्चयर् होगा कि आधुनिक मनोविज्ञान अस्पष्ट सूक्ष्मस्तर गोचरों जैसे चेतना, शोरगुल के मध्य अवधान पर ध्यान वेंफदि्रत करने अथवा अपने पारंपरिक विरोधी से पुफटबाल के खेल में विजयी होने पर उस टीम के समथर्कों द्वारा व्यावसायिक प्रतिष्ठान को जलाने का प्रयास करने आदि बातों का भी अध्ययन करता है। मनोविज्ञान इस बात का दावा नहीं कर सकता कि वह ऐसे सभी जटिल प्रश्नोंका उत्तर दे सकता है। परंतु इसने हमारी समझ को बढ़ाया है और इन गोचरों का अथर् हम समझने लगे हैं। इस विद्याशाखा की सबसे अिाक आकष्िार्त करने वाली बात यह है कि, अन्य विज्ञानों के विपरीत, मनोविज्ञान में आंतरिक एवं स्वयं मनुष्यों द्वारा अपने प्रेक्षण में समाहित मनोवैज्ञानिक प्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। अथार्त आत्मा और लाॅगोस ;स्वहवेद्ध अथार्त विज्ञान अथवामनोविज्ञान क्या है? एक विषय के अध्ययन से बना है। अतः मनोविज्ञान आत्मा ज्ञान की किसी भी विद्याशाखा को परिभाष्िात करना कठिन अथवा मन का अध्ययन था। परंतु तब से इसका वेंफद्रीय बिंदु होता है। प्रथम, क्योंकि यह सवर्दा विकसित होता रहता है। बहुत अिाक बदल चुका है तथा यह अपने को एक द्वितीय, क्योंकि गोचरों का जिस सीमा तक अध्ययन किया वैज्ञानिक विद्याशाखा के रूप में स्थापित कर चुका है जो जाता है उन्हें किसी एक परिभाषा में नहीं लाया जा सकता है। मानव अनुभव एवं व्यवहार में निहित प्रियाओं की विवेचना यह बात मनोविज्ञान के विषय में और अिाक सही है। बहुत करता है। इसमें जिन तथ्यों का अध्ययन किया जाता है, पहले, आप जैसे विद्याथीर् को बताया गया होगा कि मनोविज्ञान उनका कायर् क्षेत्रा कइर् स्तरों तक पैफला हैऋ जैसे - वैयक्ितक, ;च्ेलबीवसवहलद्ध शब्द दो ग्रीक शब्दों साइकी ;च्ेलबीमद्ध द्विजन ;दो व्यक्ितद्ध समूह तथा संगठनात्मक। इनमें से वुफछ का वणर्न हमने पहले किया है। इनके जैविक तथा सामाजिक आधार भी होते हैं। इसलिए, स्वभावतः इनके अध्ययन की वििायाँ अलग - अलग होती हैं, क्योंकि वे उस तथ्य पर निभर्र करती हैं जिसका अध्ययन करना है। किसी भी विद्याशाखा की परिभाषा इस बात पर निभर्र करती है कि वह किन बातों का तथा वैफसे उनका अध्ययन करती है। वास्तव में, वह वैफसे अथवा किन वििायों का उपयोग करती है। इसी बात को ध्यान रखते हुए, औपचारिक रूप से मनोविज्ञान को मानसिक प्रियाओं, अनुभवों एवं विभ्िान्न संदभो± में व्यवहारों का अध्ययन करने वाले विज्ञान के रूप मे परिभाष्िात किया जाता है । ऐसा करने के लिए मनोविज्ञान जैविक तथा सामाजिक विज्ञानों की वििायों का उपयोग व्यवस्िथत ढंग से प्रदत्त प्राप्त करने के लिए करता है। यह प्रदत्तों कीअथर्वत्ता बताता है जिससे वे ज्ञान के रूप मे संगठित किए जा सवेंफ। आइए, परिभाषा में प्रयुक्त तीन पदों - मानसिक प्रियाएँ, अनुभव एवं व्यवहार को समझ लिया जाए। जब हम कहते हैं कि अनुभव, अनुभव करने वाले व्यक्ित के लिए आंतरिक होता है तो हमारा आशय चेतना अथवा मानसिक प्रियाओं ;उमदजंस चतवबमेेमेद्ध से होता है। जब हम किसी बात को जानने या उसका स्मरण करने के लिए चिंतन करते हैं अथवा समस्या का समाधान करते हैं तो हम मानसिक प्रियाओं का उपयोग करते हैं। मस्ितष्क की ियाओं के स्तर पर ये मानसिक प्रियाएँ परिलक्ष्िात होती हैं। जब हम किसी गण्िातीय समस्या का समाधान करते हैं तो हमें दिखता है कि मस्ितष्क किस प्रकार की तकनीकों का उपयोग करता है। हम मानसिक ियाओं एवं मस्ितष्क की ियाओं को एक नहीं मान सकते हैं, यद्यपि वे एक दूसरे पर आश्रित होती हंै। मानसिक ियाएँ एवं कोश्िाकीय ियाएँ एक दूसरे से आच्छादित लगती हैं परंतु वे समरूप नहीं होती हैं। मस्ितष्क से भ्िान्न मन की कोइर् भौतिक संरचना अथवा अवस्िथति नहीं होती है। मन का आविभार्व एवं विकास होता है। ऐसा तब होता है जब इस संसार में हमारी अंतःियाएँ एवं अनुभव एक व्यवस्था के रूप में गतिमान होकर संगठित होते हैं जो विविध प्रकार कीमानसिक प्रियाओं के घटित होने के लिए उत्तरदायी होते हैं। मस्ितष्क की ियाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि हमारा मन वैफसे कायर् करता है। परंतु हमारे अपने अनुभव एवं मानसिक प्रियाओं की चेतना कोश्िाकीय अथवा मस्ितष्क की ियाओं से बहुत अिाक होती है। जब हम सोते हंै तब भी हमारी मानसिक ियाएँ चलती रहती हैं। हम स्वप्न देखते हैं और सूचनाएँ भी ग्रहण करते हैं, जैसे दरवाजे का खटखटाया जाना हम सोते समय भी जान जाते हैं। वुफछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हम सोते समय सीखते और स्मरण भी करते हैं। मनोवैज्ञानिक स्मरण करने, सीखने, जानने, प्रत्यक्षण करने एवं अनुभूतियों में रफचि लेते हैं। वे इन प्रियाओं का अध्ययन यह जानने के लिए करते हैं कि हमारा मन वैफसे कायर् करता है तथा हमारी सहायता करने के लिए करते हैं जिससे हम अपनी मानसिक क्षमताओं के उपयोग एवं उसके अनुप्रयोग में सुधार कर सवेंफ। मनोवैज्ञानिक लोगों के अनुभवों ;मगचमतपमदबमेद्ध का भी अध्ययन करते हैं। अनुभव स्वभाव से आत्मपरक होते हैं। हम प्रत्यक्षतः न तो दूसरों के अनुभव का प्रेक्षण कर सकते हैं और न ही उसके विषय में जान सकते हैं। अनुभव करने वाला व्यक्ित ही अपने अनुभवों को जान सकता है अथवा उसके प्रति सचेतन हो सकता है। इसलिए अनुभव हमारी चेतना में रचा - बसा रहता है। मनोवैज्ञानिकों ने लोगों की उस पीड़ा पर ध्यान दिया है जो अंतिम साँसें गिन रहे रोगियों में दिखाइर् देतीहै अथवा उस मनोवैज्ञानिक पीड़ा पर जो शोकात्तर् होने पर होती है, साथ ही साथ धनात्मक अनुभूतियों का भी जो हम रोमांस करते समय अनुभव करते हैं। वुफछ गूढ़ अनुभव भी होते हैं जिन पर मनोवैज्ञानिक ध्यान देते हैं जैसे जब कोइर् योगी ध्यानावस्िथत होता है तो वह चेतना के एक भ्िान्न धरातल पर पहुँचता है तथा एक नवीन अनुभव को उत्पन्न करता है अथवा जब कोइर् नशेड़ी किसी नशीली दवा का सेवन हवा में उड़ने के लिए करता है, यद्यपि ऐसी दवाइयाँ हानिकारक होती हैं। अनुभव अनुभवकतार् की आंतरिक एवं बाह्य दशाओं से प्रभावित होते हैं। यदि गमीर् में किसी दिन आप भीड़ वाली बस में यात्रा करते हैं, तो आपको वैसी असुविधा की अनुभूति नहीं होती है क्योंकि आप अपने मित्रों के साथ पिकनिक के लिए जा रहे होते हैं। इस प्रकार, अनुभव के स्वरूप को आंतरिक एवं बाह्य दशाओं के जटिल परिदृश्य का विश्लेषण करके समझा जा सकता है। व्यवहार ;इमींअपवनतेद्ध हमारी ियाओं, जिसमें हम संलग्न होते हैं, की अनुियाएँ अथवा प्रतिियाएँ होते हैं। जब वुफछ आपकी तरपफ आता है तो पलवेंफ सामान्य प्रतिवतर् िया में खुलती - बंद होती हैं। आप परीक्षा देते समय यह अनुभव कर सकते हैं कि आपका हृदय धड़कता है। आप सुनिश्िचत करते हैं कि आप एक चलचित्रा विशेष अपने मित्रा के साथ देखेंगे। व्यवहार सामान्य अथवा जटिल, कम समय तक अथवा देर तक बना रहने वाला हो सकता है। वुफछ व्यवहार प्रकट होते हैं। एक प्रेक्षक इन्हें बाह्य जगत में देख सकता है अथवा अनुभव कर सकता है। वुफछ आंतरिक या अप्रकट होते हैं। शतरंज का खेल खेलते समय जब आप कठिन परिस्िथति में पड़ते हैं तो आपको अपने हाथ की मांसपेश्िायाँ पफड़कने जैसी लगती होंगी कि एक खास चाल चल सवेंफ। समस्त व्यवहार, प्रकट एवं अप्रकट, वातावरण के वुफछ उद्दीपकों अथवा आंतरिक धरातल पर होने वाले परिवतर्नों द्वारा त्वरित रूप से संचलित होने से संब( होते हैं। आप एक बाघ देखते हैं और दौड़ते हैं अथवा सोचते हैं कि बाघ है और भाग जाना चाहिए। वुफछ मनोवैज्ञानिक व्यवहार के उद्दीपक ;ैद्ध एवं अनुिया ;त्द्ध के मध्य साहचयर् के रूप में अध्ययन करते हैं। उद्दीपक एवं अनुिया दोनों ही आंतरिक अथवा बाह्य हो सकते हैं। मनोविज्ञान एक विद्याशाखा के रूप में जैसा कि हमने उफपर पढ़ा है, मनोविज्ञान व्यवहार, अनुभव एवं मानसिक प्रियाओं का अध्ययन करता है। वह यह समझने का प्रयास करता है कि मन वैफसे कायर् करता है एवं विभ्िान्न मानसिक ियाएँ विविध व्यवहारों के रूप में वैफसे उत्पन्न होती हैं। जब हम लोगों को अनाड़ी अथवा सामान्य रूप में देखते हैं तो हमारे अपने विचार बिंदु अथवा जगत को समझने के हमारे अपने तरीके उनके व्यवहारों एवं अनुभवों की हमारी व्याख्या को प्रभावित करते हैं। मनोवैज्ञानिक व्यवहार एवं अनुभव की व्याख्या से ऐसी अभ्िानतियों को अनेक तरीकों से कम करने का प्रयास करते हैं। वुफछ मनोवैज्ञानिक अपने विश्लेषण को वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ बनाकर ऐसा करते हैं। अन्य लोग व्यवहार की व्याख्या उसके अनुभवकतार् की दृष्िट से करते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि व्यक्ितपरकता मानव अनुभव का महत्वपूणर् अंग है। भारतीय परंपरा में आत्म - परावतर्न एवं सचेतन अनुभव का विश्लेषण मनोवैज्ञानिक समझ का एकमहत्वपूणर् ड्डोत माना जाता है। कइर् पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक भी आत्म - परावतर्न ;ेमस.ितमसिमबजपवदद्ध एवं आत्मज्ञान की भूमिका को मानव व्यवहार एवं अनुभव को समझने के लिए महत्वपूणर् मानने लगे हैं और अब इन पर बल देने लगे हैं। व्यवहार, मानसिक प्रियाओं एवं अनुभव के अध्ययन में मतांतर के बाद भी वे इनको व्यवस्िथत एवं सत्यापन करने योग्य शैली में समझने एवं व्याख्या करने का प्रयास करते हैं। मनोविज्ञान, जो यद्यपि एक बहुत पुरानी ज्ञान विद्याशाखा है, पिफर भी यह एक आधुनिक विज्ञान है क्योंकि 1879 में ही लिपिाग ;स्मपच्रपहद्ध, जमर्नी में इसकी प्रथम प्रयोगशाला वफी स्थापना हुइर् थी। तथापि, मनोविज्ञान किस प्रकार का विज्ञान है, यह अभी भी बहस का विषय है, विशेष रूप से उन रूपों पर जो वतर्मान समय में उभरे हैं। मनोविज्ञान को सामान्यतया सामाजिक विज्ञान वफी श्रेणी में रखा जाता है। लेकिन आपको आश्चयर् नहीं होना चाहिए कि अन्य देशों में ही नहीं बल्िक भारतमें भी स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर यह विज्ञान संकाय के अंतगर्त ही एक पाठ्य विषय है। विद्याथीर् विश्वविद्यालयों मेंस्नातक विज्ञान एवं स्नातकोत्तर विज्ञान की उपािायाँ प्राप्त करने जाते हैं। वास्तव में दो प्रसि( उभर रही विद्याशाखाएँ - तंत्रिाका विज्ञान और वंफप्यूटर विज्ञान बहुत वुफछ मनोविज्ञान से लगातार उधार लेती हैं। हममें से बहुत से लोग तीव्रगति से विकसित हो रही मस्ितष्क प्रतिमा तकनीकऋ जैसे - एपफ.एम.आर.आइर्., इर्.इर्जी इत्यादि से परिचित होंगे जिनसे मस्ितष्क की प्रियाओं को वास्तविक समय, अथार्त जब वे वास्तव में हो रही हों, में समझना संभव होता है। इसी प्रकार, सूचना तकनीक के क्षेत्रामें, मानव - वंफप्यूटर अंतःिया तथा कृत्रिाम बुि का विकास संज्ञानात्मक प्रियाओं में मनोवैज्ञानिक ज्ञान के बिना संभव नहीं हो सकता है। इसलिए, एक विद्याशाखा के रूप में मनोविज्ञान की दो समानांतर धाराएँ हैं। पहली जो अनेक मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक तथ्यों के अध्ययन में भौतिक एवं जैविक विज्ञान की वििायों का उपयोग करती है एवं दूसरी जोउनके अध्ययन में सामाजिक और सांस्कृतिक विज्ञान की वििायों का उपयोग करती है। ये धाराएँ कभी - कभी एक दूसरे में मिलकर भी अपने अलग - अलग मागो± से जाती हैं। पहली दशा में मनोविज्ञान अपने को मानव व्यवहार की व्याख्या के लिए अिाकतर जैविक सि(ांतों पर निभर्र रहने वाली विद्याशाखा मानता है। इसकी मान्यता है कि समस्त व्यवहारपरक गोचरों के कारण होते हैं जिनकी खोज नियंत्रिात दशा में व्यवस्िथत रूपसे प्रदत्त संग्रह करके की जा सकती है। यहाँ अनुसंधानकतार् का लक्ष्य कारण - प्रभाव संबंध को जानना होता है जिससे व्यवहारपरक गोचरों का पूवर्कथन किया जा सके तथा आवश्यकता पड़ने पर व्यवहार को नियंत्रिात भी किया जा सके। दूसरी ओर, सामाजिक विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान इस बात पर ध्यान देता है कि व्यवहारपरक गोचरों की व्याख्या अंतःिया के रूप में किस प्रकार की जा सकती है। यहाँअंतःिया व्यक्ित एवं उसके सामाजिक - सांस्कृतिक संदभो± में घटित होती है जिसका कि वह एक हिस्सा होता है। प्रत्येक व्यवहारपरक गोचर के कइर् कारण हो सकते हैं। आइए, इन दोनों धाराओं की अलग - अलग व्याख्या करें। मनोविज्ञान एक प्राकृतिक विज्ञान के रूप में पूवर् में बताया गया है कि मनोविज्ञान की जड़ें दशर्नशास्त्रा में होती हैं। हालँाकि, आधुनिक मनोविज्ञान का विकास मनोवैज्ञानिक गोचरों के अध्ययन में वैज्ञानिक वििायों के अनुप्रयोग के कारण हुआ है। विज्ञान वस्तुनिष्ठता पर सवार्िाक बल देता है जो एक संप्रत्यय की परिभाषा एवं वह वैफसे मापा जा सकता है, के विषय में सहमति बनने पर प्राप्त की जा सकती है। देकातर् ;क्मेबंतजमेद्ध से प्रभावित तथा बाद में भौतिकी में हुए विकास से मनोविज्ञान में परिकल्पनात्मक - निगमनात्मक प्रतिरूप का अनुसरण हुआ। इस प्रतिरूप के अनुसार, यदि आपके पास किसी गोचर की व्याख्या हेतु सि(ांत उपलब्ध है तो वैज्ञानिक उन्नति हो सकती है। उदाहरण के लिए, भौतिकविदों के पास महाविस्पफोट सि(ांत है जो विश्व निमार्ण ;समष्िट - निमार्णद्ध के होने की व्याख्या करता है। सि(ांत और वुफछ नहीं है बल्िक वुफछ कथन होते हैं जो यह बतलाते हैं कि कतिपय जटिल गोचरों की व्याख्या कतिपय प्रतिज्ञप्ितयों जो एक - दूसरे से संबंिात होती हैं, की सहायता से किस प्रकार की जा सकती है। एक सि(ांत पर आधारित वैज्ञानिक निगमन अथवा एक परिकल्पना का प्रस्ताव करता है जो एक काल्पनिक व्याख्या प्रदान करता है कि कोइर् निश्िचत गोचर वैफसे घटित होता है। उसके बाद परिकल्पना का परीक्षण किया जाता हैऔर संग्रहीत प्रदत्तों के आधार पर उसे सही अथवा गलत सि(किया जाता है। यदि संग्रहीत प्रदत्त परिकल्पना द्वारा बताए गए तथ्य के विपरीत दिशा की सूचना देते हैं तो सि(ांत की पुनसर्मीक्षा की जाती है। उपयुर्क्त उपागम के उपयोग द्वारा मनोवैज्ञानिकों ने अिागम, स्मृति, अवधान, प्रत्यक्षण, अभ्िाप्रेरणा एवं संवेग आदि के सि(ांतों को विकसित किया है तथा साथर्क प्रगति की है। आज तक मनोविज्ञान के अिाकांश अनुसंधान इस उपागम का उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त, मनोवैज्ञानिक विकासात्मक उपागम से भी बहुत प्रभावित हुए हैं जो जैविक विज्ञानों में प्रबल है। इस उपागम का उपयोग लगाव तथा आक्रोश जैसे विविध मनोवैज्ञानिक गोचरों की व्याख्या में भी किया गया है। मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान के रूप में हमने उफपर चचार् की है कि मनोविज्ञान की पहचान एक सामाजिक विज्ञान के रूप में अिाक है क्योंकि यह मानव व्यवहार का उसके सामाजिक - सांस्कृतिक संदभो± में अध्ययनकरता है। मानव मात्रा अपने सामाजिक - सांस्कृतिक संदभो± से ही प्रभावित नहीं होते हैं बल्िक वे उनका निमार्ण भी करते हैं। मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान की विद्याशाखा के रूप में मनुष्यों को सामाजिक प्राणी के रूप में देखता है। रंजीता एवं शबनम की निम्न कहानी देखें। रंजीता एवं शबनम एक ही कक्षा में थीं। यद्यपि वे एक ही कक्षा में थीं और एक दूसरे से परिचित थीं पिफर भी उनका जीवन कापफी भ्िान्न था। रंजीता किसान परिवार से थी। उसके दादी - दादा, माता - पिता एवं बड़े भाइर् अपने खेतों में काम करते थे। वे गाँव के अपने घर में एक साथ रहते थे। रंजीता एक अच्छी ख्िालाड़ी थी तथा लंबी दौड़ में अपने विद्यालय मेंसवोर्त्तम थी। उसे लोगों से मिलना तथा मित्रा बनाना पसंद था। उसके विपरीत, शबनम उसी गाँव में अपनी माँ के साथ रहती थी। उसके पिता पास के एक कस्बे के कायार्लय में काम करते थे और छुिðयों में घर आते थे। शबनम एक अच्छी कलाकार थी और घर पर रहना तथा अपने छोटे भाइर् का ध्यान रखना उसे पसंद था। वह शमीर्ली थी तथा लोगों से मिलने जुलने से बचती थी। विगत वषर् बहुत वषार् हुइर् तथा पास की नदी में आइर् बाढ़ गाँव में आ गइर्। निचले हिस्से में बने बहुत से घरों में पानी भर गया था। गाँव वालों ने एक साथ मिलकर जो लोग दुखी थे उन्हें आश्रय दिया था। शबनम के घर में भी बाढ़ आइर् थी तथा वह अपनी माँ एवं भाइर् के साथ रंजीता के घर रहने आइर् थी। रंजीता परिवार की सहायता करने तथा उन्हें सुख की अनुभूति कराने में प्रसन्न थी। जब बाढ़ कम हुइर् तो रंजीता की माँ एवं दादी ने शबनम की माँ का घर बसाने में सहायता की थी। दोनों परिवार एक दूसरे के बहुत निकट हो गए। रंजीता एवं शबनम भी एक दूसरे की घनिष्ठ मित्रा हो गइर् थीं। रंजीता एवं शबनम के इस उदाहरण में दोनों बिलवुफल भ्िान्न व्यक्ित हैं। जटिल सामाजिक एवं सांस्वृफतिक दशाओं में दोनों भ्िान्न परिवारों में पली - बढ़ी हैं। आप उनके स्वभाव, अनुभव एवं मानसिक प्रियाओं में उनके सामाजिक एवं भौतिक वातावरण के साथ संबंध में वुफछ नियमितता देख सकते हैं। परंतु उसी के साथ उनके व्यवहारों एवं अनुभवों में अंतर भी है, जिसका पूवर्कथन ज्ञात मनोवैज्ञानिक सि(ांतों से बहुत कठिन होगा। यहाँ यह समझा जा सकता है कि क्यों और वैफसे समुदायों में लोग एक दूसरे की कठिनाइर् के समय सहायता करते हैं तथा त्याग करते हैं, जैसाकि रंजीता एवं शबनम के उदाहरण में देखने को मिला। परंतु उनकी स्िथति में भी सभी ग्रामीणों ने समान रूप से सहायता नहीं की थी तथा ऐसी समान स्िथति में सभी समुदाय इतना आगे नहीं आते हैंऋ वास्तव में, कभी - कभी, उसका उलटा ही सही होता है - लोग समान परिस्िथतियों में असामाजिक हो जाते हैं तथा विपदा में लूटने तथा शोषण करने में संलग्न हो जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मनोविज्ञान मानव व्यवहार एवं अनुभव का उनके समाज तथा संस्वृफति के संदभो± में अध्ययन करता है। अतः मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है जो व्यक्ितयों एवं समुदायों पर उनके सामाजिक - सांस्वृफतिक एवं भौतिक वातावरण के संदभर् में ध्यान वेंफदि्रत करता है। मन एवं व्यवहार की समझ आपकोे स्मरण होगा कि मनोविज्ञान को मन के विज्ञान के रूप में परिभाष्िात किया गया था। कइर् दशकों तक मनोविज्ञान में मन को अछूत माना गया था क्योंकि यह पूणर् व्यवहारपरक शब्दावली में न ही परिभाष्िात हो पाया था, न ही इसकी स्िथति ज्ञात हो पाइर् थी। यदि मन शब्द का मनोविज्ञान में पुनरागमन हुआ है तो हमें उसके लिए स्पेरी ;ैचमततलद्ध जैसे तंत्रिाका वैज्ञानिक एवं पेनरोश ;च्मदतवेमद्ध जैसे भौतिकविद का आभारी होना चाहिए जिन्होंने उसे वह सम्मान दिया जो उसके लिए वांछित था तथा जो सम्मान अब है। मनोविज्ञान सहित विविध विधाओं में वैज्ञानिक हैं जो यह सोचते हैं कि मन का एक एकीवृफत सि(ांत संभव है, यद्यपि यह वतर्मान में नहीं है। मन क्या है? क्या यह मस्ितष्क के समान है? जैसाकि हमने उफपर उल्लेख किया, यह सत्य है कि मन मस्ितष्क केबिना नहीं रह सकता, पिफर भी मन एक पृथक सत्ता है। अनेक प्रलेख्िात और रुचिकर उदाहरणों के आधार पर आप सभी इसकी प्रशंसा कर सकते हैं। वुफछ रोगियों में दृष्िट के लिएउत्तरदायी पश्चकपाल पालि को शल्य - चिकित्सा द्वारा हटा दिया गया था, तब भी उन्होंने चाक्षुष ;आँखों से होने वाला प्रत्यक्ष प्रमाणद्ध संकेतों की स्िथति एवं स्वरूप के विषय मेंसही उत्तर दिए। इसी प्रकार एक अनाड़ी ख्िालाड़ी मोटरसाइकिल दुघर्टना में अपनी बाँह गँवा बैठा परंतु बाँह का अनुभव वह बराबर करता रहा तथा उसकी गति का भी अनुभव करता रहा। जब उसे काॅपफी दी गइर् तो उसकी छायाभासी बाँह काॅपफी के कप तक पहुँची और जब किसी ने कप हटा दिया तो उसने विरोध किया। तंत्रिाका वैज्ञानिकों द्वारा और भी बहुत से उदाहरण दिए गए हैं। एक व्यक्ित जिसे एक दुघर्टना में मस्ितष्क आघात हुआ था, जब वह अस्पताल से घर लौट आया, तो उसने बताया की उसके अभ्िाभावक प्रतिरूपों द्वारा बदल दिए गए हैं। वे पाखंडी हैं। ऐसी प्रत्येक घटना में, व्यक्ित मस्ितष्क के किसी भाग की क्षतिग्रस्तता का श्िाकार हुआ था परंतु उसका मन बिल्वुफल ठीक - ठाक था। वैज्ञानिक पहले यह मानते थे कि मन एवं शरीर में कोइर् संबंध नहीं है और वे एक दूसरे के समानांतर हैं। भावपरक तंत्रिाका विज्ञान में आधुनिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि मन एवं व्यवहार में संबंध है। यह दशार्या गया है कि धनात्मक चाक्षुषीय तकनीकों तथा धनात्मक संवेगों की अनुभूतियों द्वारा शारीरिक प्रियाओं में साथर्क परिवतर्न लाया जा सकता है। आॅनिर्श ;व्तदपेीद्ध ने अपने रोगियों पर किए गए अनेक अध्ययनों में यह दिखाया है। इन अध्ययनों में जिस व्यक्ित की धमनियों में रुकावट थी उसे यह अनुभव कराया गया कि उसकी अवरु( धमनियों में रक्त प्रवाह हो रहा है। वुफछ समय तक इसका अभ्यास करने के बाद इन रोगियों को साथर्क रूप से आराम हुआ क्योंकि धमनियों की अवरु(ता कम हो गइर् थी। मानसिक प्रतिमा उदय अथार्त किसी व्यक्ित द्वारा मन में प्रतिमा उत्पन्न करने से भयग्रस्तता ;वस्तुओं एवं परिस्िथतियों से अताविर्फक भयद्ध के कइर् रूपों का निदान किया गया है। एक नयी विद्याशाखा, जिसे मनस्तंत्रिाकीय रोग प्रतिरोधक विज्ञान कहा जाता है, विकसित हो रही है जो रोगप्रतिरोधक तंत्रा को सशक्त करने में मन की भूमिका पर बल देती है। ियाकलाप 1ण्1 आप अपने आपको दी गइर् परिस्िथतियों में कल्पना कीजिए एवं देख्िाए। प्रत्येक दशा में समाहित तीन मनोवैज्ञानिक प्रियाओं को बताइए। 1.आप किसी प्रतिस्पधार् के लिए निबंध लिख रहे हैं। 2.आप किसी रोचक विषय पर अपने मित्रा से गपशप कर रहे हैं। 3.आप पुफटबाल खेल रहे हैं। 4.आप टेलीविजन पर सोप ओपेरा देख रहे हैं। 5.आपके अच्छे मित्रा ने आपको दुख पहुँचाया है। 6.आप किसी परीक्षा में भाग ले रहे हैं। 7.आप एक महत्वपूणर् व्यक्ित के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। 8.आप अपने विद्यालय में देने के लिए एक भाषण तैयार कर रहे है। 9.आप शतरंज खेल रहे हैं। 10.आप एक कठिन गण्िातीय समस्या का समाधान ढूँढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।आप अपने उत्तरों पर अपने अध्यापक तथा सहपाठियों से चचार् कीजिए। मनोविज्ञान विद्याशाखा की प्रसि( धारणाएँ हम पहले भी बता चुके हैं कि प्रतिदिन, हम सभी लोग एक मनोवैज्ञानिक की तरह कायर् करते हैं। हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि कोइर् व्यक्ित जिस रूप में व्यवहार कर रहा है वह वैसा क्यों कर रहा है और उसका तैयार व्याख्यान देते हैं। मात्रा यही नहीं, हममंे से सभी ने मानव व्यवहार के लिए अपने - अपने सि(ांत बनाए हैं। यदि हम किसी कायर्कतार् से चाहते हैं कि वह अपने विगत कायर् से अच्छा कायर् करे तो हम जानते हैं कि हमें उसे उत्साहित करना पड़ेगा। आपको संभवतः छड़ी का प्रयोग करना पड़े क्योंकि लोग आलसी होते हंै। सामान्य ज्ञान सामान्य बोध पर आधारित मानव व्यवहार के ऐसे सि(ांतों का वैज्ञानिक अध्ययन करने पर वे सही तथा सही नहीं भी हो सकते हैं। वास्तव में, आप पाएँगे कि मानव व्यवहार की सामान्य बोध आधारित व्याख्याएँ अंधकार में तीर चलाने जैसी होंगी एवं बहुत कम व्याख्या कर पाएँगी। उदाहरण के लिए, यदि आपका पि्रय मित्रा कहीं दूर चला जाए तो उसके प्रति आपके आकषर्ण में क्या परिवतर्न आएगा? दो बातें कही जातीहैं जो आप अपने उत्तर के रूप में देख सकते हैं। उनमें से एक है ‘दृष्िट ओझल मन ओझल’। दूसरी बात ‘दूरी से हृदय में प्रेम और प्रगाढ़ होता है’। दोनों बयान एक दूसरे के विपरीत हैं। प्रश्न है कि इनमें कौन सही है। इसकी चयनित व्याख्या इस बात पर निभर्र करेगी कि अपने मित्रा के जाने के बाद आपके जीवन में क्या घटित हुआ। मान लीजिए कि आपको एक नया मित्रा मिल जाता है तो आप ‘दृष्िट ओझल मन ओझल’ की बात व्यवहार की व्याख्या के लिए उपयोग में लाएँगे। यदि आपको कोइर् नया मित्रा नहीं मिलता है तो आप व्यग्रता से अपने मित्रा को याद करेंगे। इस दशा में ‘दूरी से हृदय में प्रेम और प्रगाढ़ होता है’ से आप व्यवहार की व्याख्या करेंगे। सामान्य बोध अंधकार में तीर चलाने जैसा होगा। मनोविज्ञान एक विज्ञान के रूप में व्यवहार के स्वरूप को देखता है जिसका पूवर्कथन किया जा सके न कि घटित होने के पश्चात की गइर् व्याख्या को। मनोविज्ञान द्वारा उत्पादित वैज्ञानिक ज्ञान सामान्य बोध के प्रायः विरु( होता है। इसका एक उदाहरण ड्वेक ;क्ूमबाद्ध का एक अध्ययन है। यह अध्ययन उन बच्चों से संबंिात है जोकठिन समस्या आने अथवा अनुत्तीणर् होने पर सरलता से उसे छोड़ देते हैं। उसने सोचा कि उनकी सहायता वैफसे की जा सकती है। सामान्य बोध के अनुसार हमें उन्हें सरल प्रश्न देनाचाहिए जिससे उनके अनुत्तीणर् होने की दर घट सके तथा उनका विश्वास बढ़ सके। इसके बाद ही उन्हें कठिन समस्याएँ देनी चाहिए जिनको वे अपने नए विश्वास के साथ हल कर सवेंफगे। ड्वेक ने इसका परीक्षण किया। उसने विद्याथ्िार्यों के दो समूहों को लिया जिन्हें गण्िात के प्रश्नों को हल करने के लिए 25 दिनों तक प्रश्िाक्षण दिया गया था। प्रथम समूह को सरल समस्याएँ दी गइर् थीं जो वे सहजतापूवर्क हल करने में सक्षम थे। द्वितीय समूह को जटिल एवं सरल दोनों ही प्रकार की समस्याएँ हल करने को दी गइर् थीं। स्पष्टतया वे जटिल समस्याओं को नहीं हल कर सके। जब कभी ऐसा हुआ तो ड्वेक ने विद्याथ्िार्यों से कहा कि वे समस्याओं को इसलिए नहीं हल कर पाए क्योंकि उन्होंने कठिन प्रयास नहीं किए तथा उन्हें ड्वेक ने पलायन के बदले प्रयास करते रहने को कहा। प्रश्िाक्षण काल समाप्त होने के बाद ड्वेक ने दोनों समूहों को समस्याओं का एक नया सेट दिया। जो लोग हमेशा सपफल हुए थे क्योंकि उन्हें सरल समस्याएँ दी गइर् थीं वे असपफल होने पर बहुत जल्दी पलायन कर गए, तुलना में उनके जिन्होंने सपफलता और असपफलता दोनों को देखा था तथा जिन्हें यह बताया गया था कि असपफलता का कारण प्रयास की कमी रही है। अन्य बहुत सी सामान्य बोध धारणाएँ हंै जिन्हें आप सत्यनहीं पाएँगे। अभी वुफछ ही समय पूवर् वुफछ संस्कृतियों के लोगों का विश्वास था कि पुरुष महिलाओं से अिाक बुिमान होते हैं अथवा पुरुषों की तुलना में महिलाएं अिाक दुघर्टना करती हैं। आनुभाविक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि ये दोनों धारणाएँ गलत हैं। सामान्य बोध यह भी बताता है कि यदि किसी व्यक्ित से अिाक श्रोताओं के समक्ष अपनी बात करने कोकहा जाए तो उसका निष्पादन सवोर्त्तम नहीं होता है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि यदि आपने अच्छा अभ्यास किया है तो वास्तव में आप अच्छा निष्पादन कर सवेंफगे क्योंकि अिाक श्रोताओं के रहने से आपका निष्पादन बढ़ेगा। यह आशा है कि जैसे - जैसे आप इस पाठ्यपुस्तक को पढ़ते जाएँगे आप में अनेक विश्वास एवं मानव व्यवहार की समझ परिवतिर्त होती जाएगी। आप यह भी जान सवेंफगे कि मनोवैज्ञानिक ज्योतिष्िायों, तांत्रिाकों एवं हस्तरेखा विशारदों जैसानहीं होता है क्योंकि वह प्रदत्तों पर आधारित बातों का व्यवस्िथत अध्ययन करता है और मानव व्यवहार एवं अन्य मनोवैज्ञानिक गोचरों के विषय में सि(ांत विकसित करता है। ियाकलाप 1ण्2 विद्याथ्िार्यों के एक प्रतिनिध्यात्मक समूह से पूछिए कि वे क्या समझते हैं कि मनोविज्ञान क्या है? आप तुलना कीजिए कि वे क्या कहते हैं और पाठ्यपुस्तक में क्या कहा गया है। आप उससे क्या निष्कषर् निकालेंगे। मनोविज्ञान का विकास आधुनिक विद्याशाखा के रूप में मनोविज्ञान, जो पाश्चात्य विकास से एक बड़ी सीमा तक प्रभावित है, का इतिहास बहुत छोटा है। इसका उद्भव मनोवैज्ञानिक साथर्कता के प्रश्नों से संब( प्राचीन दशर्नशास्त्रा से हुआ है। हमने उल्लेख किया है कि आधुनिक मनोविज्ञान का औपचारिक प्रारंभ 1879 में हुआ जब विलहम वुण्ट ;ॅपसीमसउ ॅनदकजद्ध ने लिपिाग, जमर्नी में मनोविज्ञान की प्रथम प्रायोगिक प्रयोगशाला को स्थापित किया। वुण्ट सचेतन अनुभव के अध्ययन मे रुचि ले रहे थे और मन के अवयवों अथवा निमार्ण की इकाइयों का विश्लेषण करना चाहते थे। वुण्ट के समय में मनोवैज्ञानिक अंतनिर्रीक्षण ;पदजतवेचमबजपवदद्ध द्वारा मन की संरचना का विश्लेषण कर रहे थे इसलिए उन्हें संरचनावादी कहा गया। अंतनिर्रीक्षण एक प्रिया थी जिसमें प्रयोज्यों से मनोवैज्ञानिक प्रयोग में कहा गया था कि वे अपनी मानसिक प्रियाओं अथवा अनुभवों का विस्तार से वणर्न करें। यद्यपि, अंतनिर्रीक्षण एक वििा के रूप में अनेक मनोवैज्ञानिकों को संतुष्ट नहीं कर सका। इसे कम वैज्ञानिक माना गया क्योंकि अंतनिर्रीक्षणीय विवरणों का सत्यापन बाह्य प्रेक्षकांे द्वारा संभव नहीं हो सका था। इसके कारण मनोविज्ञान में एक नया परिदृश्य उभर कर आया। एक अमरीकी मनोवैज्ञानिक, विलियम जेम्स ;ॅपससपंउ श्रंउमेद्ध जिन्होंने वैफम्िब्रज, मसाचुसेट्स में एक प्रयोगशाला की स्थापना लिपिाग की प्रयोगशाला के वुफछ ही समय बाद की थी, ने मानव मन के अध्ययन के लिए प्रकायर्वादी ;निदबजपवदंसपेजद्ध उपागम का विकास किया। विलियम जेम्स का विश्वास था कि मानस की संरचना पर ध्यान देने के बजाय मनोविज्ञान को इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि मन क्या करता है तथा व्यवहार लोगों को अपने वातावरण से निपटने के लिए किस प्रकार कायर् करता है। उदाहरण के लिए, प्रकायर्वादियों ने इस बात पर ध्यान वेंफदि्रत किया कि व्यवहार लोगों को अपनी आवश्यकताओं की पूतिर् करने योग्य वैफसे बनाता है। विलियम जेम्स के अनुसार वातावरण से अंतःिया करने वाली मानसिक प्रियाओं की एक सतत धारा के रूप में चेतना ही मनोविज्ञान का मूल स्वरूप रूपायित करती है। उस समय के एक प्रसि( शैक्ष्िाक विचारक जाॅन डीवी ;श्रवीद क्मूमलद्ध ने प्रकायर्वाद का उपयोग यह तवर्फ करने के लिए किया कि मानव किस प्रकार वातावरण के साथ अनुवूफलन स्थापित करते हुए प्रभावोत्पादक ढंग से कायर् करता है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, एक नयी धारा जमर्नी में गेस्टाल्ट मनोविज्ञान ;हमेजंसज चेलबीवसवहलद्ध के रूप में वुण्ट के संरचनावाद ;ेजतनबजनतंसपेउद्ध के विरफ( आइर्। इसने प्रात्यक्ष्िाक अनुभवों के संगठन को महत्वपूणर् माना। मन के अवयवों पर ध्यान न देकर गेस्टाल्टवादियों ने तवर्फ किया कि जब हम दुनिया को देखते हैं तो हमारा प्रात्यक्ष्िाक अनुभव प्रत्यक्षण के अवयवों के समस्त योग से अिाक होता है। दूसरे शब्दों में, हम जो अनुभव करते हैं वह वातावरण से प्राप्त आगतों से अिाक होता है। उदाहरण के लिए, जब अनेक चमकते बल्बों से प्रकाश हमारे दृष्िटपटल पर पड़ता है तो हम प्रकाश की गति का अनुभव करते हैं। जब हम कोइर् चलचित्रा देखते हैं तो हम स्िथर चित्रों की तेश गति से चलती प्रतिमाओं को अपने दृष्िटपटल पर देखते हैं। इसलिए, हमारा प्रात्यक्ष्िाक अनुभव अपने अवयवों से अिाक होता है। अनुभव समग्रतावादी होता है - यह एक गेस्टाल्ट होता है। हम गेस्टाल्ट मनोविज्ञान के विषय में प्रत्यक्षण के स्वरूप की चचार् करते हुए अध्याय 5 में अिाक विस्तार से पढ़ेंगे। संरचनावाद की प्रतििया स्वरूप एक और धारा व्यवहारवाद ;इमींअपवनतपेउद्ध के रूप में आइर्। सन् 1910 के आसपास जाॅन वाट्सन ;श्रवीद ॅंजेवदद्ध ने मन एवं चेतना के विचार को मनोविज्ञान के वेंफद्रीय विषय के रूप में अस्वीकार कर दिया। वे दैहिकशास्त्राी इवान पावलव ;प्अंद च्ंअसवअद्ध के प्राचीन अनुबंधन वाले कायर् से बहुत प्रभावित थे। उनके लिए मन प्रेक्षणीय नहीं है और अंतनिर्रीक्षण व्यक्ितपरक है क्योंकि उसका सत्यापन एक अन्य प्रेक्षक द्वारा नहीं किया जा सकता है। उनके अनुसार एक विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान क्या प्रेक्षणीय तथा सत्यापन करने योग्य है, इसी पर ध्यान वेंफदि्रत करना चाहिए। उन्होंने मनोविज्ञान को व्यवहार के अध्ययन अथवा अनुियाओं ;उद्दीपकों कीद्ध जिनका मापन किया जा सकता है तथा वस्तुपरक ढंग से अध्ययन किया जा सकता है, के रूप में परिभाष्िात किया। वाट्सन के व्यवहारवाद का विकास अनेक प्रसि( मनोवैज्ञानिकों द्वारा आगे बढ़ाया गया जिन्हें हम व्यवहारवादी कहते हैं। इनमें सबसे प्रसि( स्िकनर ;ैापददमतद्ध थे जिन्होंने व्यवहारवाद का अनुप्रयोग विविध प्रकार की परिस्िथतियों में किया तथा इस उपागम को प्रसिि दिलाइर्। हम स्िकनर के कायर् का इस पुस्तक में आगे वणर्न करेंगे। वाट्सन के बाद यद्यपि व्यवहारवाद मनोविज्ञान में कइर् दशकों तक छाया रहा परंतु उसी समय मनोविज्ञान के विषय बाॅक्स आधुनिक मनोविज्ञान के विकास में वुफछ रोचक घटनाएँ 1879 विलहम वुण्ट ;ॅपसीमसउ ॅनदकजद्ध ने लिपिाग, जमर्नी ह्यूमन बिहेविअर’ प्रकाश्िात की जिससे व्यवहारवाद को में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला को स्थापित किया। मनोविज्ञान के एक प्रमुख उपागम के रूप में बढ़ावा 1890 विलियम जेम्स ;ॅपससपंउ श्रंउमेद्ध ने ‘पि्रंसिपल मिला। आॅपफ साइकोलाॅजी’ प्रकाश्िात की। 1954 मानववादी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ;।इतंींउ 1895 मनोविज्ञान की एक व्यवस्था के रूप में प्रकायर्वाद की डंेसवूद्ध ने ‘मोटिवेशन एंड पसर्नाॅलटी’ प्रकाश्िात की। स्थापना। 1954 इलाहाबाद में मनोविज्ञानशाला की स्थापना। 1900 सिगमंड प्रफायड ;ैपहउनदक थ्तमनकद्ध ने मनोविश्लेषणवाद 1955 बंगलौर में नेशनल इंस्टीट्यूट आॅपफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस का विकास किया। ;छप्डभ्।छैद्ध की स्थापना। 1904 इवान पावलव ;प्अंद च्ंअसवअद्ध को नोबल पुरस्कार 1962 रांची में हाॅस्िपटल पफाॅर मेंटल डिशीिाज की स्थापना। पाचन व्यवस्था के कायर् के लिए मिला जिससे अनुियाओं 1973 कोनराड लारेंश ;ज्ञवदतंक स्वतमद्रद्ध तथा निको टिनबगेर्न के विकास के सि(ांत को समझा जा सका। ;छपाव ज्पदइमतहमदद्ध को उनके कायर् पशु व्यवहार की 1905 बीने ;ठपदमजद्ध एवं साइमन ;ैपउवदद्ध द्वारा बुि उपजाति विश्िाष्टता वफी अंतनिर्मिर्त शैली जो बिना किसी पूवर् 1916 परीक्षण का विकास।कलकत्ता विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान का प्रथम विभाग अनुभव अथवा अिागम के होती है, पर नोबल पुरस्कार मिला। खुला। 1978 निणर्यन पर किए गए कायर् के लिए हबर्टर् साइमन ;भ्मतइमतज 1920 जमर्नी में गेस्टाल्ट मनोविज्ञान का उदय हुआ। ैपउवदद्ध को नोबल पुरस्कार प्राप्त। 1922 मनोविज्ञान को इण्िडयन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन में 1981 डेविड ह्यूबल ;क्ंअपक भ्नइमसद्ध एवं टास्र्टेन वीसल सम्िमलित किया गया। ;ज्वतेजमद ॅपमेमसद्ध को मस्ितष्क की दृष्िट कोश्िाकाओं 1924 भारतीय मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन की स्थापना हुइर्। पर शोध के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त। 1924 जाॅन बी. वाट्सन ;श्रवीद ठण् ॅंजेवदद्ध ने व्यवहारवाद 1981 रोजर स्पेरी ;त्वहमत ैचमततलद्ध को मस्ितष्क विच्छेद अनुसंधान पुस्तक लिखी जिससे व्यवहारवाद की नींव पड़ी। के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त। 1928 एन.एन. सेनगुप्ता ;छण्छण् ैमदहनचजंद्ध एवं 1989 नेशनल अकेडमी आॅपफ साइकोलाॅजी ;छ।व्च्द्ध इंडिया की राधाकमल मुकजीर् ;त्ंकींांउंस डनामतरममद्ध ने स्थापना। सामाजिक मनोविज्ञान की प्रथम पुस्तक लिखी ;लंदन: 1997 गुड़गाँव, हरियाणा में नेशनल ब्रेन रिसचर् संेटर ;छठत्ब्द्ध की एलन और अनविनद्ध। स्थापना। 1949 डिपेफंस साइंस आगेर्नाइजेशन आॅपफ इंडिया में मनोवैज्ञानिक 2002 अनिश्िचतता में मानव निणर्यन के अनुसंधान पर डेनियल शोध खण्ड की स्थापना। कहनेमन ;क्ंदपमस ज्ञंीदमउंदद्ध को नोबल पुरस्कार मिला। 1951 मानववादी मनोवैज्ञानिक कालर् रोजसर् ;ब्ंतस त्वहमतेद्ध 2005 आथ्िार्क व्यवहार में सहयोग एवं द्वंद्व की समझ में खेल ने रोगी - वेंफदि्रत चिकित्सा प्रकाश्िात की। सि(ांत के अनुप्रयोग के लिए थामस शेलिंग ;ज्ीवउंे 1953 बी.एपफ. स्िकनर ;ठण्थ्ण् ैापददमतद्ध ने ‘साइंस एंड ैबीमससपदहद्ध को नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। में एवं उसवफी विषयवस्तु के विषय में कइर् अन्य विचार एवं उपागम विकसित हो रहे थे। एक व्यक्ित जिसने मानव स्वभावके विषय में अपने मौलिक विचार से पूरी दुनिया को झंकृत कर दिया वे सिगमंड प्रफायड ;ैपहउनदक थ्तमनकद्ध थे। प्रफायड ने मानव व्यवहार को अचेतन इच्छाओं एवं द्वंद्वांे का गतिशील प्रदशर्न बताया। मनोवैज्ञानिक विकारों को समझने एवं उन्हें ठीक करने के लिए उन्होंने मनोविश्लेषण ;चेलबीवंदंसलेपेद्ध को एक प(ति के रूप में स्थापित किया। प्रफायड की मनोविश्लेषण प(ति ने मानव स्वभाव को आनंद प्राप्ित की ;बहुधा लैंगिकद्ध इच्छाओं की संतुष्िट के लिए अचेतन इच्छाओं द्वारा अभ्िाप्रेरित बताया। जबकि मानवतावादी परिदृश्य ;ीनउंदपेजपब चमतेचमबजपअमद्ध ने मानव स्वभाव को एक धनात्मक विचारधारा बताया। मानवतावादी, जैसे कालर् रोजसर् ;ब्ंतस त्वहमतेद्ध तथा अब्राहम मैस्लो ;।इतंींउ डंेसवूद्ध ने मानव की स्वतंत्रा कामनाओं तथा उनके विकसित होने की उद्दाम लालसाओं एवं अपने आंतरिक विभवों के मुखरित होने की इच्छाओं पर अिाक बल दिया। उनका तवर्फ था कि व्यवहारवाद वातावरण की दशाओं से निधार्रित व्यवहार पर बल देता है जो मानव स्वतंत्राता एवं गरिमा का न्यूनानुमान करता है तथा मानव स्वभाव के विषय में एक यांत्रिाक विचार रखता है। इन विविध उपागमों ने आधुनिक मनोविज्ञान का इतिहास रचा तथा उसके विकास के विविध पक्षों को प्रस्तुत किया। इनमें से प्रत्येक पक्ष की अपनी वेंफद्रीयता है तथा वे मनोवैज्ञानिक जटिलताओं की तरपफ हमारा ध्यानकषर्ण करते हैं। प्रत्येक उपागम के अपने गुण एवं दोष हैं। इनमें से वुफछ उपागमों का इस विद्याशाखा के विकास में आगे भी सहयोग रहा है। गेस्टाल्ट उपागम के विविध पक्ष तथा संरचनावाद के पक्ष संयुक्त होकर संज्ञानात्मक परिदृश्य ;बवहदपजपअम चमतेचमबजपअमद्ध का विकास करते हैं जो इस बात पर वेंफदि्रत होते हैं कि हम दुनिया को वैफसे जानते हैं। संज्ञान ;बवहदपजपवदद्ध ज्ञान होने की प्रिया होता है। इसमें चिंतन, समझ, प्रत्यक्षण, स्मरण करना, समस्या समाधान तथा अन्य अनेक मानसिक प्रियाएँ आती हैं जिससे हमारा दुनिया का ज्ञान विकसित होता है - हम दुनिया को जान सकते हैं। यह हमें इस योग्य बनाता है कि हम वातावरण के साथ विश्िाष्ट ढंग से रह सवेंफ। वुफछ संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक मानव मन को वंफप्यूटर की तरह एक सूचना प्रक्रमण तंत्रा के रूप में देखते हैं। इस विचारधारा के अनुसार मन एक वंफप्यूटर की तरह का होता है जो सूचना को प्राप्त करता है, प्रक्रमण करता है, रूपांतरण करता है, संचित करता है तथा आवश्यकता पड़ने पर उसकी पुनप्रार्प्ित करता है। आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान मनुष्यों को उनके सामाजिक एवं भौतिक वातावरण के अन्वेषणों के द्वारा अपने मन की सिय रचना करने वाले के रूप में देखता है। इस विचारधारा को कभी - कभी निमिर्तिवाद ;बवदेजतनबजपअपेउद्ध कहते हैं। बाल - विकास के विषय में पियाजे ;च्पंहमजद्ध का सि(ांत, जिसकी चचार् हम आगे करेंगे, को मानव मन के विकास का निमिर्तिपरक सि(ांत कहा जाता है। रूस के एक अन्य मनोवैज्ञानिक व्यगाट्स्की ;टलहवजेालद्ध ने आगे बढ़ कर सुझाव दिया हैकि मानव मन का विकास सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रियाओं के माध्यम से होता है जिसमें मन को वयस्कों एवं बच्चों केमध्य होेने वाली अंतःियाओं द्वारा सांस्कृतिक निमिर्तियों के रूप में देखा जाता है। दूसरे शब्दों में, जहाँ पियाजे मानते हैं कि बच्चे अपने मन का निमार्ण सिय रूप से करते हैं वहींव्यगाट्स्की का मत है कि मन एक संयुक्त सांस्कृतिक निमिर्ति है तथा वयस्कों एवं बच्चों की अंतःिया के परिणामस्वरूप उद्भूत होती है। भारत में मनोविज्ञान का विकास भारतीय दाशर्निक परंपरा इस बात में धनी रही है कि वह मानसिक प्रियाओं तथा मानव चेतना, स्व, मन - शरीर के संबंध तथा अनेक मानसिक प्रकायर्ऋ जैसे - संज्ञान, प्रत्यक्षण, भ्रम, अवधान तथा तवर्फना आदि पर उनकी झलक के संबंध में वेंफदि्रत रही है। दुभार्ग्य से भारतीय परंपरा की गहरी दाशर्निक जड़ें भारतवषर् में आधुनिक मनोविज्ञान के विकास को नहीं प्रभावित कर सकी हैं। भारत में इसके विकास पर पाश्चात्य मनोविज्ञान का भी प्रभुत्व निरंतर बना हुआ है, यद्यपि यहाँ एवं विदेश में भी इसकी एक अलग पहचान के लिए वुफछ प्रयास किए गए हैं और वुफछ बिंदु सुनिश्िचत किए गए हैं। इन प्रयासों ने वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से भारतीय दाशर्निक परंपरा की बहुत सी मान्यताओं की सत्यता स्थापित करने का यत्न किया है।भारतीय मनोविज्ञान का आधुनिक काल कलकत्ता विश्वविद्यालय के दशर्नशास्त्रा विभाग में 1915 में प्रारंभ हुआ जहाँ प्रायोगिक मनोविज्ञान का प्रथम पाठ्यक्रम आरंभ कियागया तथा प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला स्थापित हुइर्। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने 1916 में प्रथम मनोविज्ञान विभाग तथा 1938 में अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान का विभाग प्र्र्रारंभ किया।कलकत्ता विश्वविद्यालय में आधुनिक प्रायोगिक मनोविज्ञान का प्रारंभ भारतीय मनोवैज्ञानिक डाॅ. एन.एन. सेनगुप्ता, जो वुण्ट की प्रायोगिक परंपरा में अमेरिका में प्रश्िाक्षण प्राप्त थे, से बहुत प्रभावित था। प्रोपेफसर जी. बोस प्रफायड के मनोविश्लेषण में प्रश्िाक्षण प्राप्त थे - एक ऐसा क्षेत्रा जिसने भारत में मनोविज्ञान के आरंभ्िाक विकास को प्रभावित किया। प्रोपेफसर बोस ने ‘इंडियन साइकोएनेलिटिकल एसोसिएशन’ की स्थापना 1922 में की थी। मैसूर विश्वविद्यालय एवं पटना विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के अध्यापन एवं अनुसंधान के प्रारंभ्िाक वेंफद्र प्रारंभ हुए। प्रारंभ से मनोविज्ञान भारत में एक सशक्त विद्याशाखा के रूप में विकसित हुआ। मनोविज्ञान अध्यापन, अनुसंधान तथाअनुप्रयोग के अनेक वेंफद्र हैं। मनोविज्ञान में उत्कृष्टता अथवा वैश्िाष्ट्य के दो वंेफद्र उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा सहायता प्राप्त हैं। करीब 70 विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान के पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। दुगार्नन्द सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘साइकोलाॅजी इन ए थडर् वल्डर् कन्ट्री: दि इंडियन एक्सपीरियन्स’ ;1986 में प्रकाश्िातद्ध में भारत में सामाजिक विज्ञान के रूप में चार चरणों में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास को खोजा है। उनके अनुसार, प्रथम चरण स्वतन्त्राता की प्राप्ित तक एक ऐसा चरण था जब प्रयोगात्मक, मनोविश्लेषणात्मक एवं मनोवैज्ञानिक परीक्षण अनुसंधान पर बहुत बल था जिससे पाश्चात्य देशों का मनोविज्ञान के विकास में योगदान परिलक्ष्िात हुआ था। द्वितीय चरण में 1960 तक भारत में मनोविज्ञान की विविध शाखाओं में विस्तार का समय था। इस चरण में भारतीय मनोविज्ञानिकों की इच्छा थी कि भारतीय पहचान के लिए पाश्चात्य मनोविज्ञान को भारतीय संदभो± से जोड़ा जाए। उन्होंने ऐसा प्रयास पाश्चात्य विचारों द्वारा भारतीय परिस्िथतियों को समझने के लिए किया। प्िाफर भी, भारत में मनोविज्ञान 1960 के बाद भारतीय समाज के लिए समस्या - वेंफदि्रत अनुसंधानों द्वारा साथर्क हुआ। मनोवैज्ञानिक भारतीय समाज की समस्याओं के प्रति अिाक ध्यान देने लगे। पुनश्च, अपने सामाजिक संदभर् में पाश्चात्य मनोविज्ञान पर अतिशय निभर्रता का अनुभव किया जाने लगा। महत्वपूणर् मनोवैज्ञानिकों ने उस अनुसंधान की साथर्कता पर अिाक बल दिया जो हमारी परिस्िथतियों के लिए साथर्क हों। भारत में मनोविज्ञान की नयी पहचान की खोज के कारण चतुथर् चरण के रूप में 1970 के अंतिम समय में देशज मनोविज्ञान का उदय हुआ। पाश्चात्य ढाँचे को नकारने के अतिरिक्त भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने एक ऐसी समझ विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया जो सामाजिक एवं सांस्वृफतिक रूप से साथर्क ढाँचे पर आधारित हो। इस रुझान की झलक उन प्रयासों में दिखी जिनसे पारंपरिक भारतीय मनोविज्ञान पर आधारित उपागमों का विकास हुआ, जो हमने प्राचीन गं्रथों एवं धमर्गं्रथों से लिए थे। इस प्रकार इस चरण की विशेषता को देशज मनोविज्ञान के विकास, जो भारतीय सांस्वृफतिक संदभर् से उत्पन्न हुआ था तथा भारतीय मनोविज्ञान एवं समाज के लिए साथर्क था और भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर आधारित था, द्वारा जाना जाता है। अब ये विकास सतत रूप से हो रहे हैं, भारत में मनोविज्ञान विश्व में मनोविज्ञान के क्षेत्रा में साथर्क योगदान कर रहा है। यह बहुत ही संदभर्गत है जिसमें मनोवैज्ञानिक सि(ांतों के विकास की आवश्यकता है जिनकी जड़ें हमारे सामाजिक एवं सांस्वृफतिक संदभर् में पाइर् जाएँ। इसी के साथ हम देखते हैं कि नए अनुसंधान अध्ययन, जिसमें तंत्रिाका - जैविक तथा स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तरापृष्ठीय स्वरूप समाविष्ट हैं, किए जा रहे हैं। भारत में मनोविज्ञान का अनुप्रयोग अनेक व्यावसायिक क्षेत्रों में किया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक मात्रा विश्िाष्ट समस्याओं वाले बच्चों के साथ ही कायर् नहीं कर रहे हैं, वे चिकित्सालयों में नैदानिक मनोवैज्ञानिक के रूप में नियुक्त हो रहे हैं, मानव संसाधन विकास विभाग एवं विज्ञापन विभागों जैसे वंफपनी संगठनों में, खेलवूफद निदेशालयों में, विकास क्षेत्राक तथा सूचना प्रौद्योगिकी उद्योगों में नियुक्त हो रहे हैं। मनोविज्ञान की शाखाएँ वषो± मेें मनोविज्ञान के विविध विश्िाष्ट क्षेत्रों का प्रादुभार्व हुआ है जिनमें से वुफछ का वणर्न इस खंड में किया जा रहा है। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान अजर्न, संग्रह, प्रहस्तन तथा सूचनाओं के रूपांतरण में, जो वातावरण से प्राप्त होती हैं, उनके उपयोग तथा संप्रेषण के साथ मानसिक प्रियाओं की खोज करता है। प्रमुख संज्ञानात्मक प्रियाएँ अवधान, प्रत्यक्षण, स्मृृति, तवर्फना, समस्या समाधान, निणर्यन एवं भाषा हैं। आप इन विषयों को इस पाठ्यपुस्तक में आगे पढ़ेंगे। इन प्रियाओं के अध्ययन के लिए मनोवैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में प्रयोग करते हैं। इनमें से वुफछ पारिस्िथतिक उपागम का भी उपयोग करते हैं अथार्तवह उपागम जो संज्ञानात्मक प्रियाओं को उनके प्राकृतिक स्वरूप में अध्ययन करने के लिए पयार्वरणी कारकों पर ध्यान देते हैं। संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक तंत्रिाकावैज्ञानिक एवं वंफप्यूटर वैज्ञानिकों के साथ भी सहयोग करते हैं। जैविक मनोविज्ञान व्यवहार तथा शारीरिक व्यवस्था के मध्य संबंधों, मस्ितष्क तथा अन्य तांत्रिाका तंत्रा, प्रतिरोधक व्यवस्था, एवं आनुवंश्िाकी सहित, पर ध्यान वेंफदि्रत करते हैं। जैविक मनोवैज्ञानिक तंत्रिाकावैज्ञानिकों, प्राण्िावैज्ञानिकों तथा मानवशास्ित्रायों के साथ भी कायर् करते हैं। तंत्रिाका मनोविज्ञान ;दमनतवचेलबीवसवहलद्ध अनुसंधान के एक क्षेत्रा के रूप में उभरा है जहाँ मनोवैज्ञानिक एवं तंत्रिाकावैज्ञानिक मिल - जुलकर कायर् करते हैं। अनुसंधानकतार् तंत्रिाका संचारकों की भूमिका, जोमस्ितष्क के विभ्िान्न क्षेत्रों में तंत्रिाका संचार के लिए उत्तरदायी होते हैं और इसीलिए साहचयर्युक्त मानसिक प्रकायो± में इनका अध्ययन करते हैं। वे अपना अनुसंधान प्रवृफत रूप में कायर् करने वाले मस्ितष्क के व्यक्ितयों तथा शल्य मस्ितष्क वाले लोगों के प्रकायोेर् का विकसित तकनीकों यथा इर्.इर्.जी., पी.इर्.टी. तथा एपफ.एम.आर.आइर्. आदि की सहायता से, जिसके विषय में आप आगे पढ़ेंगे, अध्ययन करते हैं। विकासात्मक मनोविज्ञान गभर्धारण से लेकर वृ(ावस्था तक के जीवन विस्तार के विभ्िान्न आयु एवं अवस्थाओं में होने वाले भौतिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक परिवतर्नों का अध्ययन करता है। विकासात्मक मनोवैज्ञानिकों का प्राथमिक लक्ष्य यह जानना होता है कि जो हम हंै वह वैफसे हुए। बहुत वषो± तक बच्चों एवं किशोरों के विकास पर ध्यान वेंफदि्रत था। यद्यपि आजकल वयस्कों एवं काल - प्रभावन के विषय में विकासात्मक मनोवैज्ञानिक बहुत अिाक रुचि ले रहे हैं। वे जैविक,सामाजिक - सांस्कृतिक तथा पयार्वरणी कारकों जो मनोवैज्ञानिक विशेषताओं यथा बुि, संज्ञान, संवेग, मिशाज, नैतिकता एवं सामाजिक संबंधों को प्रभावित करते हैं, पर अिाक ध्यान वेंफदि्रत करते हैं। विकासात्मक मनोवैज्ञानिक मानवशास्ित्रायों, श्िाक्षाविदों, तंत्रिाकावैज्ञानिकों, सामाजिक कायर्कतार्ओं, परामशर्दाताओं तथा ज्ञान की सभी शाखाओं, जो मनुष्य की संवृि एवं विकास से संब( हैं, के साथ मिलकर कायर् करते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान यह समन्वेषण करता है कि लोग अपने सामाजिक वातावरण से वैफसे प्रभावित होते हैं, लोग दूसरों के विषय में वैफसा सोचते हैं तथा उन्हें वैफसे प्रभावितकरते हैं। सामाजिक मनोवैज्ञानिक अभ्िावृिा, समरूप तथा अिाकारियों के प्रति आज्ञाकारिता, अंतवैर्यक्ितक आकषर्ण, सहायतापरक व्यवहार, पूवार्ग्रह, आक्रोश, सामाजिक अभ्िाप्रेरणा, अंतसर्मूह संबंध आदि विषयों में रुचि लेते हैं। अंतःसांस्कृतिक एवं सांस्कृतिक मनोविज्ञान व्यवहार, विचारतथा संवेग को समझने में संस्कृति की भूमिका का अध्ययन करता है। इसकी मान्यता है कि मानव व्यवहार मात्रा मानव - जैविक विभवों की प्रस्तुति न होकर संस्कृति का भी उत्पाद होता है।इसलिए, व्यवहार का अध्ययन उसके सामाजिक - सांस्कृतिक संदभर् में किया जाना चाहिए। जैसाकि आप इस पुस्तक केविभ्िान्न अध्यायों में पढ़ेंगे, संस्कृति मानव व्यवहार को विविध रूपों एवं विभ्िान्न सीमाओं तक प्रभावित करती है। पयार्वरणी मनोविज्ञान तापमान, आदर््रता, प्रदूषण तथा प्राकृतिक आपदा जैसे भौतिक कारकों का मानव व्यवहार के साथ अंतःियाओं का अध्ययन करता है। कायर् करने के स्थान पर भौतिक चीशों की व्यवस्था के स्वरूप का स्वास्थ्य, सांवेगिक अवस्था तथा अंतवैर्यक्ितक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का अन्वेषण करता है। इस क्षेत्रा में नवीन विषय के रूप में किससीमा तक, उत्सगर् प्रबंधन, जनसंख्या विस्पफोट, ऊजार् संरक्षण, सामुदायिक संसाधनों का सक्षम उपयोग आदि जुड़े हैं जो मानव व्यवहार के प्रकायर् होते हैं। स्वास्थ्य मनोविज्ञान रोगों के विकास, बचाव एवं निदान में मनोवैज्ञानिक कारकों ;उदाहरण के लिए, दबाव, दुश्िंचताद्ध की भूमिका पर वेंफदि्रत होता है। स्वास्थ्य मनोवैज्ञानिकों की रुचि के क्षेत्रा दबाव तथा समायोजी व्यवहार, मनोवैज्ञानिक कारकों एवं स्वास्थ्य के बीच संबंध, डाॅक्टर - रोगी संबंध तथा स्वास्थ्य वृि के कारकों को बढ़ावा देने वाले उपाय हैं। नैदानिक एवं उपबोधन मनोविज्ञान दुश्िंचता, अवसाद, खानपान व्यतिक्रम तथा चिरकालिक पदाथर् दुरुपयोग जैसे मनोवैज्ञानिक व्यतिक्रमों के निदान एवं बचाव से संबंिात होता है। एक संबंिात क्षेत्रा उपबोधन का होता है जिसका लक्ष्य लोगों के दैनंदिन प्रकायो± में लोगों की रोजमरार् की समस्याओं को हल करने तथा चुनौतीपूणर् स्िथतियों में सामंजस्य बनाने में सहायता करके सुधार लाना होता है। नैदानिक मनोवैज्ञानिकों का कायर् उपबोधन मनोवैज्ञानिकों के कायर् से भ्िान्न नहीं होता है, यद्यपि उपबोधन मनोवैज्ञानिक कभी - कभी ऐसे लोगों का अध्ययन करते हैं जिनकी समस्याएँ कम गंभीर रहती हैं। बहुत सी स्िथतियों में उपबोधन मनोवैज्ञानिक छात्रों को उनकी व्यक्ितगत समस्याओं एवं जीवनवृिा योजना के विषय में अपनी सलाह भी देते हैं। नैदानिक मनोवैज्ञानिकों की तरह मनोरोगविज्ञानी भी मनोवैज्ञानिक व्यतिक्रमों के कारणों, उपचारों तथा उनसे बचाव का अध्ययन करते हैं। नैदानिक मनोवैज्ञानिक एवं मनोरोगविज्ञानी एक दूसरे से वैफसे भ्िान्न होते हैं? नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास मनोविज्ञान की एक उपािा होती है जिसमें वह कठिन प्रश्िाक्षण प्राप्त करता है तथा वह लोगों के मनोवैज्ञानिक व्यतिक्रमों का उपचार करता है। इसके विपरीत, मनोरोगविज्ञानी के पास चिकित्सा विज्ञान की उपािा होती है जो मनोवैज्ञानिक व्यतिक्रम के निदान हेतु वषो± का विश्िाष्ट प्रश्िाक्षण प्राप्त किए हुए हाते हैं। एक महत्वपूणर् अंतर यह होता है कि मनोरोगविज्ञानी ही दवाइयों का सुझाव दे सकता है तथा विद्युत आघात उपचार प्रदान कर सकता है जबकि नैदानिक मनोरोगवैज्ञानिक ऐसा नहीं कर सकता है। औद्योगिक/संगठनात्मक मनोविज्ञान कायर्स्थल व्यवहार का अध्ययन करता है तथा कामिर्कों एवं उन्हें नियुक्त करने वाले संगठनों पर ध्यान देता है। औद्योगिक/संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक कमर्चारियों के प्रश्िाक्षण, कायर्दशा में सुधार तथा कमर्चारियों की नियुक्ित के मानक से संबंिात होता है। उदाहरण के लिए, संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक इस बात का सुझाव दे सकता है कि वंफपनी एक नयी प्रबंध संरचना तैयार करे जो कमर्चारियों तथा प्रबंधक के मध्य के संवाद में वृि कर सके। औद्योगिक एवं संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक की पृष्ठभूमि में संज्ञानात्मक तथा सामाजिक मनोविज्ञान में प्राप्त प्रश्िाक्षण होता है। शैक्ष्िाक मनोविज्ञान इस बात का अध्ययन करता है कि विभ्िान्न आयुवगर् के लोग वैफसे सीखते हैं। शैक्ष्िाक मनोवैज्ञानिक मूलतः शैक्ष्िाक और कायर्दशा दोनों में लोग निदेर्शात्मक वििायों एवं सामगि्रयों के उपयोग से वैफसे प्रश्िाक्ष्िात किए जाते हैं, से संबंिात होते हैं। वे श्िाक्षा, उपबोधन और अिागम की समस्याओं के लिए साथर्क पक्षों के अनुसंधानों से भी संबंिात होते हैं। एक संबंिात क्षेत्रा, विद्यालय मनोविज्ञान ;ेबीववस चेलबीवसवहल द्ध बच्चों के बौिक, सामाजिक एवं सांवेगिक विकास के कायर्क्रमों को तैयार करने में ध्यान देता है, जिसमें विशेष आवश्यकता वाले बच्चे भी सम्िमलित होते हैं। वे मनोविज्ञान के ज्ञान का स्वूफल परिवेश में अनुप्रयोग करते हैं। क्रीड़ा मनोविज्ञान क्रीड़ा निष्पादन का अभ्िाप्रेरणा स्तर बढ़ाकर मनोवैज्ञानिक सि(ांतों द्वारा सुधार लाने का प्रयास करता है। क्रीड़ा मनोविज्ञान तुलनात्मक रीति से नया क्षेत्रा है परंतु विश्व स्तर पर स्वीवृफति पा रहा है। मनोविज्ञान की अन्य उद्भूत शाखाएँ: मनोविज्ञान के अनुसंधान एवं अनुप्रयोग में अंतविर्षयक ध्यान के कारण अन्य अनेक क्षेत्रा उत्पन्न हुए हैंऋ जैसे - वैमानिकी मनोविज्ञान, अंतरिक्ष मनोविज्ञान, सैन्य मनोविज्ञान, न्यायालयिक मनोविज्ञान, ग्रामीण मनोविज्ञान, अभ्िायांत्रिाकी मनोविज्ञान, प्रबंधकीय मनोविज्ञान, सामुदायिक मनोविज्ञान, महिला मनोविज्ञान, तथा राजनैतिक मनोविज्ञान वुफछ उदाहरण हैं। नीचे दिए गए ियाकलाप 1.3 से मनोविज्ञान में अपनी रुचि का क्षेत्रा पहचानिए। ियाकलाप 1ण्3 पुस्तक में पढ़े गए मनोविज्ञान के क्षेत्रों के विषय में सोचिए। नीचे दी गइर् सूची देख्िाए तथा 1 ;अत्यंत रुचिकरद्ध से 11 ;अल्प रुचिकरद्ध की कोटि प्रदान कीजिए। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान जैविक मनोविज्ञान विकासात्मक मनोविज्ञान सामाजिक मनोविज्ञान अंतःसांस्कृतिक एवं सांस्कृतिक मनोविज्ञान पयार्वरणी मनोविज्ञान स्वास्थ्य मनोविज्ञान नैदानिक एवं उपबोधन मनोविज्ञान औद्योगिक/संगठनात्मक मनोविज्ञान शैक्ष्िाक मनोविज्ञान क्रीड़ा मनोविज्ञान इस पाठ्यपुस्तक को पढ़ने और पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद, आप इस ियाकलाप की ओर लौटना और अपनी कोटि में परिवतर्न करना चाहेंगे। अनुसंधान एवं अनुप्रयोग के कथ्य पिछले अनुभाग में आपने मनोविज्ञान की विविध शाखाओं के विषय में जानकारी प्राप्त की। यदि आपसे एक सरल प्रश्न पूछा जाए कि ‘मनोवैज्ञानिक क्या करते हैं?’ तो आपका चिरपरिचितउत्तर होगा कि वे विविध परिवेशों में कायर् करते समय बहुत - सी ियाएँ करते हैं। यदि आप उनके कायो± का विश्लेषण करने का प्रयास करें तो आप पाएँगे कि वे मूलतः दो प्रकार के कायो± में संलग्न रहते हैं, एक मनोविज्ञान में अनुसंधान ;तमेमंतबीद्ध तथा दूसरा मनोविज्ञान के अनुप्रयोग ;ंचचसपबंजपवदद्ध। मनोविज्ञान के अनुसंधान एवं अनुप्रयोग को दिशा प्रदान करने वाले कथ्य ;जीमउमेद्ध क्या होते हैं? ऐसे बहुत से कथ्य हैं। हम उनमें से वुफछ पर सवेंफद्रण करेंगेे। कथ्य 1: अन्य विज्ञानों की भाँति मनोविज्ञान व्यवहार एवं मानसिक प्रियाओं के सि(ांतों का विकास करने का प्रयास करता है। अनुसंधान में मुख्य बात व्यवहार एवं मानसिक घटनाओं तथा प्रियाओं की समझ एवं व्याख्या की होती है। मनोवैज्ञानिक, जो अनुसंधान करना चाहते हैं, अन्य वैज्ञानिकों की तरह ही कायर् करते हैं। उन्हीं की भाँति वे निष्कषर् निकालते हैं जोप्रदत्तों द्वारा समथ्िार्त होता है। वे प्रयोगों की अभ्िाकल्पना करतेहैं तथा उनको संपादित करते हैं अथवा वृहत्तर आयाम के मनोवैज्ञानिक गोचरों का नियंत्रिात दशा में अध्ययन करते हैं। इसका उद्देश्य व्यवहार एवं मानसिक प्रियाओं के सामान्य सि(ांतों का विकास करना होता है। ऐसे अध्ययनों के आधारपर लिए गए निष्कषर् चूँकि सभी के ऊपर लागू होते हैं इसलिए सावर्भौमिक होते हैं। प्रायोगिक, तुलनात्मक, शरीरिया, विकासात्मक, सामाजिक, विभेद एवं अपसामान्य मनोविज्ञान आदि क्षेत्रों को प्राथमिक मनोविज्ञान का क्षेत्रा कहा जाता है। इन क्षेत्रों में अनुसंधान की विषयवस्तु एक दूसरे से भ्िान्न होती है। उदाहरण के लिए, प्रायोगिक मनोवैज्ञानिक प्रत्यक्षण, अिागम, स्मृति, चिंतन एवं अभ्िाप्रेरणा आदि प्रियाओं का प्रयोगात्मक वििा द्वारा अध्ययन करते हैं जबकि शरीरिया मनोवैज्ञानिक इन व्यवहारों के शरीरियात्मक आधारों का परीक्षण करने का प्रयास करते हैं। विकासात्मक मनोवैज्ञानिक मानव जीवन के प्रारंभ से लेकर अंत तक के व्यवहार में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवतर्नों का अध्ययन करते हैं, जबकि सामाजिक मनोवैज्ञानिक सामाजिक सदंभो± में लोगों के व्यवहार एवं अनुभव के अध्ययन पर ध्यान वेंफदि्रत करते हैं। कथ्य 2: मानव व्यवहार व्यक्ितयों एवं वातावरण के लक्षणों का एक प्रकायर् है। वुफटर् लेविन ;ज्ञनतज स्मूपदद्ध ने सवर्प्रथम प्रसि( समीकरण ठत्र;िच्एम्द्ध का प्रतिपादन किया था जो यह बताता है कि व्यवहार व्यक्ित एवं उसके वातावरण का उत्पाद है। यह समीकरण साधारण ढंग से यह बताता है कि लोगों के व्यवहार में जो अंतर हम पाते हैं वह बड़ी सीमा तक इस तथ्य के कारण पाते हैं कि लोग अपने गुणों के कारण एक दूसरे से भ्िान्न होते हैं और ऐसा उनके आनुवंश्िाक नििा तथा विविध अनुभवों एवं इसी प्रकार उनके अपने वातावरण द्वारा हो पाता है। यहाँ वातावरण का सम्प्रत्ययन, जिस रूप में उसका प्रत्यक्षण होता है उसी रूप में अथवा जिस रूप में वह व्यक्ित के लिए अथर्वान होता है उस रूप में, किया जाता है। मनोवैज्ञानिकों ने बहुत पहले यह कहा था कि कोइर् भी दो व्यक्ित एकसमान नहीं होते हैं, यदि उनके मनोवैज्ञानिक गुणों को देखा जाए तो वे बुि, अभ्िारुचि, मूल्य, अभ्िाक्षमता तथा अन्य बहुत से व्यक्ितत्व संबंधी कारकों के आधार पर एक दूसरे से भ्िान्न होते हैं। वास्तव में, मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निमार्ण इन्हीं भ्िान्नताओं के मापन के लिए किया गया था। एक विद्याशाखा, जिसे विभेद मनोविज्ञान कहा जाता है जो उन्नीसवीं सदी के अंतिम समय एवं बीसवीं सदी के आरंभ में प्रारंभ हुइर्, वैयक्ितक विभेद पर बल देती है। इसकी बहुत सी बातें व्यक्ितत्व मनोविज्ञान के रूप में आज भी दिखाइर् देती हैं। मनोवैज्ञानिक विश्वास करते हैं कि यद्यपि मूल मनोवैज्ञानिक प्रियाएँ सावर्भौमिक होती हैं तब भी वे वैयक्ितक गुणों के प्रति संवेदनशील होती हैं। वैयक्ितक विभेद के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक यह भी विश्वास करते हैं कि पयार्वरणी कारकों के कारण भी व्यवहार में भ्िान्नता दिखाइर् देती है। मनोवैज्ञानिकों ने यह विचारधारा मानवशास्ित्रायों, विकासवादी सि(ांतकारों तथा जीववैज्ञानिकों से ग्रहण की है। मनोवैज्ञानिक विविध मनोवैज्ञानिक गोचरों की व्याख्या व्यक्ित - वातावरण की अंतःियाओं के आधार पर करता है। यद्यपि ऐसा कर पाना कठिन होता है, तथापि मनोवैज्ञानिक मानव व्यवहार की व्याख्या करते समय आनुवंश्िाकता एवंवातावरण के सापेक्ष महत्त्व की जानकारी करते हैं। कथ्य 3: मानव व्यवहार उत्पन्न किया जाता है। अिाकांश मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि समस्त मानव व्यवहारों की व्याख्या वातावरण के बाहर की स्िथति तथा आंतरिक ;प्राणी के लिएद्ध कारणों के आधार पर की जा सकती है। कारणपरक व्याख्याएँ समस्त विज्ञानों की वेंफद्रीयता हैं क्योंकि बिना उनको समझेे कोइर् भी पूवर्कथन संभव नहीं होगा। यद्यपि मनोवैज्ञानिक व्यवहार के कारणों की तरपफ भागते हैं परंतु वे यह भी जानते हैं कि मात्रा रेखीय व्याख्याएँ, जैसे एक्स ;ग्द्ध के कारण वाइर् ;ल्द्ध, हमेशा सही नहीं होती हैं। व्यवहार का कोइर् एक ही कारण नहीं होता है। मानव व्यवहार के बहुत से कारण होेते हैं। इसलिए, मनोवैज्ञानिक कारणपरक प्रतिरूपों को खोजते हैं जहाँ अन्योन्याश्रित परिवत्यो± के सेट द्वारा व्यवहार की व्याख्या की जा सके। जब यह कहा जाता है कि व्यवहार के कइर् कारण होते हैं तो उसका अथर् होता है कि व्यवहार के किसी एक ही कारण का सुनिदेशन कर पाना कठिन होेता है क्योंकि संभव है कि उसका स्वयं कोइर् परिवत्यर् कारण हो जिसका पुनः कोइर् अन्य कारण हो सकता है। कथ्य 4: मानव व्यवहार की समझ संस्कृति निमिर्त होती है। यह कथ्य अभी हाल ही में सामने आया है। वुफछ मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि अिाकांश मनोवैज्ञानिक सि(ांत एवं प्रतिरूप स्वभाव से यूरो - अमेरिकन हैं, इसलिए व्यवहारको दूसरी सांस्कृतिक स्िथतियों में समझने में सहायता नहीं करते हैं। यूरो - अमेरिकन उपागम जिसे सावर्भौम स्वरूप में प्रचारित किया गया है, एश्िाया, अप्रफीका एवं लैटिन अमेरिका के मनोवैज्ञानिक उसकी आलोचना करते हैं। इसी प्र्रकार की आलोचना नारी अिाकारवादियों द्वारा की जाती है और उनका तवर्फ है कि मनोविज्ञान मात्रा पुरफष पक्षों की वकालत करता है तथा स्ित्रायों के पक्षों की अनदेखी करता है। वे द्वंद्वात्मक उपागम की पक्षधरता करते हैं जिसमें स्ित्रायों एवं पुरफषों दोनों के पक्षों को समाहित करते हुए मानव व्यवहार को समझा जाता है। कथ्य 5: मनोवैज्ञानिक सि(ांतों के अनुप्रयोग द्वारा मानव व्यवहार को नियंत्रिात एवं परिवतिर्त किया जा सकता है। कतिपय भौतिक अथवा मनोवैज्ञानिक घटनाओं के विषय में वैज्ञानिक क्यों यह सोचते हैं कि उन्हें वैफसे नियंत्रिात किया जा सकता है। वे ऐसा इसलिए सोचते हैं क्योंकि उनकी इच्छा ऐसी तकनीकों अथवा वििायों को विकसित करने की होती है जिससे मानव व्यवहार में गुणात्मक सुधार लाया जा सके। जब मनोवैज्ञानिक अपने द्वारा अजिर्त ज्ञान का उपयोग करना चाहते हैं तो भी वे वैसा ही सोचते हैं। इसके लिए आवश्यक होता है कि जीवन के विविध धरातलोें पर लोग जिन कठिनाइयों अथवा विपरीत परिस्िथतियों का अनुभव करते हैं उन्हें दूर किया जाए। परिणामस्वरूप, मनोवैज्ञानिक आवश्यकता वाले लोगों के जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। एक ओर, मनोवैज्ञानिकों की यह अनुप्रयुक्त भूमिका विषय ;मनोविज्ञानद्ध को सामान्य लोगों के निकट लाती है तुलना में अन्य सामाजिक विज्ञान के विषयों के तथा उसके सि(ांतों की व्यावहारिकता की सीमा की जानकारी प्राप्त करता है। दूसरी तरपफ, अपने आप में मनोविज्ञान को एक विषय के रूप में प्रसिि दिलाने में यह भूमिका बहुत सहायक रही है। इसलिए मनोविज्ञान की अनेक शाखाएँ उत्पन्न हुइर् हैं जो औद्योगिक एवं संगठनात्मक स्िथतियों, नैदानिक सेवाओं, श्िाक्षा, पयार्वरण, स्वास्थ्य, सामुदायिक विकास तथा अन्य से जुड़ी समस्याओं की जानकारी करने एवं उनका निदान खोेजने की पहल करती हैं। औद्योगिक मनोविज्ञान, संगठनात्मक मनोविज्ञान, नैदानिक मनोविज्ञान, शैक्ष्िाक मनोविज्ञान, अभ्िायांत्रिाकी मनोविज्ञान तथा क्रीड़ा मनोविज्ञान वुफछ ऐसे क्षेत्रा हैं जिनमें मनोवैज्ञानिक व्यक्ितयों, समूहों अथवा संस्थाओं को अपनी सेवाएँ प्र्रदान कर रहे हैं। मूल बनाम अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान यह ध्यातव्य है कि अनेक क्षेत्रा जिन्हें ‘मूल’ एवं ‘अनुप्रयुक्त’ मनोविज्ञान शीषर्क में रखा गया है, उनके द्वारा अध्ययन किएजाने वाले विषय एवं वृहत्तर सरोकारों के आधार पर उनकी पहचान की जाती है। मनोविज्ञान के अनुसंधान एवं अनुप्रयोग में कोइर् स्पष्ट भेद नहीं होता है। उदाहरण के लिए, मूल मनोविज्ञान हमें वह सि(ांत एवं नियम प्रदान करता है जो मनोविज्ञान के अनुप्रयोग के आधार बनते हैं और अनुप्र्रयुक्त मनोविज्ञान हमें वे संदभर् देता है जिनमें अनुसंधान से प्राप्त सि(ांतों एवं नियमों को साथर्क ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है। दूसरी ओर, अनुसंधान मनोविज्ञान के उन क्षेत्रों का भी मूल भाग होता है जो ‘अनुप्रयोग’ श्रेणी में आते हैं अथवा इन्हीं के द्वारा जाने जाते हैं। विभ्िान्न क्षेत्रों में मनोविज्ञान की लगातार होती मांग के कारण बहुत से क्षेत्रा जो पिछले दशकों में ‘अनुसंधान - वेंफदि्रत’ माने जाते थे, वे भी धीर - धीरे ‘अनुप्रयोग - वेंफदि्रत’ होने लगे हैं। नयी उभरती विद्याशाखाएँ जैसे अनुप्र्रयुक्त प्रायोगिक मनोविज्ञान, अनुप्र्रयुक्त सामाजिक मनोविज्ञान, तथा अनुप्र्रयुक्त विकासात्मक मनोविज्ञान यह बतलाते हैं कि वास्तव में सभी मनोविज्ञान अनुप्रयोग का विभव रखते हैं तथा स्वभाव से अनुप्र्रयुक्त होते हैं। इसलिए, मनोविज्ञान के अनुसंधान एवं अनुप्रयोग में कोइर् मौलिक अंतर नहीं होता है। ये ियाएँ बहुत अिाक अंतस±बंिात होती हैं तथा एक दूसरे को पुनबर्लित करने वाली होती हैं।इनकी एक दूसरे से पारस्परिक अंतःियाओं तथा वृहत्तर प्रभाव इतने विश्िाष्ट हो गए हैं कि वतर्मान में अनेक प्रशाखाएँ ;शाखाएँद्ध उत्पन्न हो गइर् हैं जो अपनी विषयवस्तु पर विश्िाष्ट बल देती हैं। इस प्रकार, पारिस्िथतिक मनोविज्ञान, पयार्वरणीमनोविज्ञान, अंतःसांस्कृतिक मनोविज्ञान, जैविक मनोविज्ञान, अंतरिक्ष मनोविज्ञान, संज्ञानात्मक मनोविज्ञान आदि वुफछ महत्वपूणर् नाम हैं। ये अनुसंधान तथा अनुप्रयोग के नए एवं सीमांत क्षेत्रा हैं जो उसके पूवर् मनोविज्ञान के दूसरे क्षेत्रों से संब( थे। पूवर् की तुलना में अनुसंधानकतार्ओं को इन नए विकास के क्षेत्रों में विश्िाष्ट अनुसंधान कौशल एवं प्रश्िाक्षण की आवश्यकता होती है। मनोविज्ञान एवं अन्य विद्याशाखाएँ कोइर् भी विद्याशाखा, जो लोगों का अध्ययन करती है, वह निश्िचत रूप सेे मनोविज्ञान के ज्ञान की साथर्कता को मानेगी। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक भी मानव व्यवहार को समझने में अन्य विद्याशाखाओं की साथर्कता को स्वीकारते हैं। इसी रफझान के कारण मनोविज्ञान में अंतविर्षयक उपागम का उदय हुआ। अनुसंधानकतार्ओं एवं विज्ञान, सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी में विद्वानों ने एक विद्याशाखा के रूप में मनोविज्ञान की साथर्कता के अनुभव किए। चित्रा 1.1 स्पष्ट रूप से मनोविज्ञान के अन्य विद्याशाखाओं से संबंध को प्रदश्िार्त करता है। मस्ितष्क एवं व्यवहार का अध्ययन करने में मनोविज्ञान अपने ज्ञान को तंत्रिाका विज्ञान, शरीरियाविज्ञान, जीवविज्ञान, आयुविर्ज्ञान तथावंफप्यूटर विज्ञान के साथ बाँटता है। एक सामाजिक - संास्कृतिक के संदभर् में मानव व्यवहार को समझने के लिए ;उसका अथर्, संवृि, तथा विकासद्ध मनोविज्ञान अपने ज्ञान को मानव विज्ञान, समाजशास्त्रा, समाजकायर् विज्ञान, राजनीति विज्ञान एवं अथर्शास्त्रा के साथ भी मिलकर बाँटता है। सहित्ियक पुस्तकों, संगीत एवं नाटक के निमार्ण में निहित मानसिक ियाओं का अध्ययन करने में मनोविज्ञान अपना ज्ञान साहित्य, कला एवं संगीत के साथ बाँटता है। वुफछ प्रमुख विद्याशाखाएँ जो मनोविज्ञान से जुड़ी हैं उनकी चचार् नीचे की जा रही है: दशर्नशास्त्रा: उन्नीसवीं सदी के अंत तक वुफछ चीशें जो समसामयिक मनोविज्ञान से संबंिात हैं, जैसे मन का स्वरूप क्या है अथवा मनुष्य अपनी अभ्िाप्रेरणाओं एवं संवेगों के विषय में वैफसे जानता है, वे बातें दाशर्निकों की रुचि की थीं। उन्नीसवीं सदी में आगे चलकर वुण्ट एवं अन्य मनोवैज्ञानिकों ने इन प्रश्नों के लिए प्रायोगिक उपागम का उपयोग किया तथा समसामयिक मनोविज्ञान का उदय हुआ। विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान के उदय के बाद भी यह दशर्नशास्त्रा से बहुत वुफछ लेता है, विशेषकर ज्ञान की वििा तथा मानव स्वभाव के विविध क्षेत्रों सेे संबंिात बातें। आयुविर्ज्ञान: चिकित्सकों ने यह मान लिया है कि यह उक्ित ‘स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन की आवश्यकता होती है’, वास्तव में सही है। बहुत से चिकित्सालय आज मनोवैज्ञानिक नियुक्त करते हैं। लोगों को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक व्यवहारों से दूर रखने में मनोवैज्ञानिकों की भूमिका एवं चिकित्सकों की अन्वय के प्रति संसक्ित वुफछ ऐसे क्षेत्रा हैं जहाँ दोनों विद्याशाखाएँ साथ - साथ कायर् करती हैं। वैंफसर से पीडि़त रोगियों का उपचार करते समय, एड्स, शारीरिक चुनौतियों से जूझते लोगों, अथवा गहन चिकित्सा इकाइर् में भतीर् रोगियों की देखभाल तथा शल्यचिकित्सा के पश्चात रोगियों का ध्यान रखना आदि ऐसे क्षेत्रा हैं जहाँ चिकित्सकों ने मनोवैज्ञानिकों की आवश्यकता का अनुभव किया है। एक सपफल चिकित्सक रोगियों के शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक कल्याण का ध्यान रखता है। अथर्शास्त्रा, राजनीति विज्ञान एवं समाजशास्त्रा: सहभागी सामाजिक विज्ञान विद्याशाखाओं के रूप में इन तीनों ने मनोविज्ञान से बहुत वुफछ प्राप्त किया है तथा उसको भी समृ( किया है। मनोविज्ञान ने आथ्िार्क व्यवहारों के सूक्ष्म स्तरों के अध्ययन, विशेष रूप से उपभोक्ताओं के व्यवहारों को समझने में तथा बचत व्यवहारों एवं निणर्य की कला में बड़ा योगदान किया है। अमेेेरिका के अथर्शास्ित्रायों ने उपभोक्ताओं कीभावुकताओं के प्रदत्तों के आधार पर आथ्िार्क विकास का पूवर्कथन किया है। एच. साइमन, डी. केहनेमन एवं टी. शेलिंग जैसे तीन विद्वानों को ऐसी ही समस्याओं पर कायर् करने के कारण अथर्शास्त्रा में नोबल पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। अथर्शास्त्रा की तरह, राजनीति विज्ञान भी मनोविज्ञान से बहुत वुफछ ग्रहण करता है, विशेष रूप से शक्ित एवं प्रभुत्व के उपयोग, राजनैतिक द्वंद्व के स्वरूप एवं उनके समाधान, तथा मतदान आचरण को समझने में। मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्रा एक दूसरे के साथमिलकर विभ्िान्न सामाजिक - सांस्कृतिक संदभो± में व्यक्ितयों के व्यवहारों को समझने एवं उनकी व्याख्या को व्यक्त करते हैं। समाजीकरण, सामूहिक एवं संग्रहपरक व्यवहारों तथा अंतःसमूह द्वंद्वों से संबंिात बातें इन दोनों विद्याशाखाओं से जुड़ी होती हैं। वंफप्यूटर विज्ञान: प्रारंभ से ही वंफप्यूटर मानव स्वभाव का अनुभव करने का प्र्रयास करता रहा है। वंफप्यूटर की संरचना, उसकी संगठित स्मृति, सूचनाओं के क्रमवार एवं साथ - साथ प्रक्रमण आदि में ये बातें देखी जा सकती हैं। वंफप्यूटर वैज्ञानिक तथा इंजीनियर केवल बुिमान से बुिमान वंफप्यूटर का निमार्ण नहीं कर रहे हैं बल्िक ऐसी मशीनों को बना रहे हैं जो संवेेद एवं अनुभूति को भी जान सवेंफ। इन दोनों विद्याशाखाओं में हो रहे विकास संज्ञानात्मक विज्ञान के क्षेत्रा में साथर्क योगदान कर रहे हैं। वििा एवं अपराधशास्त्रा: एक वुफशल अिावक्ता तथा अपराधशास्त्राी को मनोविज्ञान के ज्ञान की जानकारी ऐसे चित्रा 1ण्1: मनोविज्ञान एवं अन्य विद्याशाखाएँ प्रश्नों - कोइर् गवाह एक दुघर्टना, गली की लड़ाइर् अथवा हत्या है? जूरी के निणर्यों को कौन से कारक प्रभावित करते हैं? झूठ जैसी घटना को वैफसे याद रखता है? न्यायालय में गवाही देते एवं पश्चाताप के क्या विश्वसनीय लक्षण हैं? किन कारकों केसमय वह इन तथ्यों का कितनी सत्यता के साथ उल्लेख करता आधार पर किसी अभ्िायुक्त को उसके कायो± के लिए उत्तरदायी माना जाए? किसी आपरािाक कायर् के लिए दंड की किससीमा को उपयुक्त माना जाए? का उत्तर देने के लिए आवश्यकहोती है। मनोवैज्ञानिक ऐसे प्रश्नों का उत्तर देते हैं। आजकल बहुत से मनोवैज्ञानिक ऐसी बातों पर अनुसंधान कायर् कररहे हैं जिसके उत्तर देेश में भावी वििा व्यवस्था की बड़ी सहायता करेंगे। जनसंचार: पि्रंट एवं इलेक्ट्राॅनिक संचार - साधन हमारे जीवनमें बहुत ही वृहत्तर स्तर पर प्रवेश कर चुके हैं। वे हमारे चिंतन,अभ्िावृिायों एवं संवेगों को बहुत बड़ी सीमा तक प्रभावित कररहे हैं। यदि वे हमें निकट लाए हैं तो साथ ही साथ सांस्कृतिकअसमानताएँ भी कम किए हैं। बच्चों के अभ्िावृिा निमार्ण एवं व्यवहार में संचार - साधनों का प्रभाव ऐसा क्षेत्रा है जो दोनों विधाओं को साथ रखता है। मनोविज्ञान संचार को अच्छा एवं प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक युक्ितयों के निमार्ण में सहायता करता है। समाचार कहानियों को लिखते समय पत्राकारों को पाठकों की रफचियों का ध्यान रखना चाहिए। चूँकि अिाकांश कहानियाँ मानवीय घटनाओं से संबंिात होती हैं, अतः उनके अभ्िाप्रेरकों एवं संवेगों का ज्ञान आवश्यक होता है। यदि कहानी मनोवैज्ञानिक ज्ञान एवं अंतदृर्ष्िट पर आधारित होती है तो वह अंदर तक छू जाती है। संगीत एवं ललित कला: संगीत एवं मनोविज्ञान का कइर् क्षेत्रों में मिलन हुआ है। मनोवैज्ञानिकांे ने संगीत के उपयोग से कायर् निष्पादन स्तर बढ़ाने का कायर् किया है। संगीत एवं संवेग एक और क्षेत्रा है जिसमें अनेक अध्ययन किए गए हैं। भारतवषर् में संगीतज्ञों ने वतर्मान में एक प्रयोग करना प्रारंभ किया है जिसे ‘संगीत चिकित्सा’ ;उनेपब जीमतंचलद्ध कहते हैं। इसमें वे रागों के माध्यम से कतिपय शारीरिक व्यािायों का निदान करना प्रारंभ करते हैं। संगीत चिकित्सा की क्षमता का सि( होना शेष है। वास्तुकला एवं अभ्िायांत्रिाकी: प्रथम दृष्िट में मनोविज्ञान, वास्तुकला एवं अभ्िायांत्रिाकी के मध्य संबंध ठीक नहीं लगेगा। परंतु ऐसी बात नहीं है। किसी वास्तुकार से पूछिए, वह अपने ग्राहकों को अपने अभ्िाकल्प एवं सौंदयर्शास्त्राीय विवेचना से भौतिक एवं मानसिक संतुष्िट प्रदान कर देगा। सुरक्षा की योजना बनाते समय अभ्िायंताओं को, उदाहरण के लिए, गलियों एवं राजमागर् के विषय में, मानवीय आदतों का ध्यान रखना चाहिए। यांत्रिाक तकनीकों एवं सजावटों की अभ्िाकल्पना में मनोवैज्ञानिक ज्ञान बहुत सहायता करता है। संक्षेप में, मानवीय प्रकायो± से संबंिात ज्ञान के विविध क्षेत्रों के चैराहे पर मनोविज्ञान खड़ा मिलता है। कायर्रत मनोवैज्ञानिक आजकल मनोवैज्ञानिक ऐसी अनेक स्िथतियों में कायर् करते हैं जहाँ वे मनोवैज्ञानिक सि(ांतों की सहायता से लोगों को अपने जीवन की समस्याओं का दक्षतापूवर्क सामना करने के लिए भ्िाज्ञ बनाते हैं एवं प्रश्िाक्षण प्रदान करते हंै। इन्हंे हम प्रायः ‘मानव सेवा क्षेत्रा’ कहते हैं। इनमें नैदानिक, उपबोधन, समुदायिक, विद्यालय तथा संगठनात्मक मनोविज्ञान आते हैं। नैदानिक मनोवैज्ञानिक व्यावहारिक समस्याओं वाले रोगियों की सहायता करने की विश्िाष्टता रखते हैं। वे अनेक मानसिक व्यतिक्रमों तथा दुश्िंचता, भय या कायर्स्थल के दबावों के लिए चिकित्सा प्रदान करते हैं। वे या तो प्राइवेट प्रैक्िटस करते हैं अथवा चिकित्सालयों, मानसिक संस्थानों अथवा सामाजिक संगठनों के साथ कायर् करते हैं। रोगियों की समस्याओं को जानने के लिए वे साक्षात्कार करते हैं एवं मनोवैज्ञानिक परीक्षण देते हैं, तथा उनके उपचार एवं पुनवार्स के लिए मनोवैज्ञानिक वििायों का उपयोग करते हैं। नौकरी पाने के अवसर ने नैदानिक मनोविज्ञान के क्षेत्रा में लोगों को अिाक आकष्िार्त किया है। उपबोधन मनोवैज्ञानिक अभ्िाप्रेरणात्मक एवं संवेगात्मक समस्याओं वाले व्यक्ितयों के लिए कायर् करते हैं। इनके रोगियों की समस्या नैदानिक मनोवैज्ञानिकों की तुलना में कम घातक होती है। एक उपबोधन मनोवैज्ञानिक व्यावसायिक पुनवार्स कायर्क्रमों अथवा व्यावसायिक चयन में सहायता करने अथवा जीवन की नयी एवं जटिल परिस्िथतियों में समायोजन के लिए कायर् करता है। उपबोधन मनोवैज्ञानिक पब्िलक एजेन्िसयोंऋ जैसे - मानसिक स्वास्थ्य वेंफद्र, चिकित्सालय, विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के लिए कायर् करते हैं। सामुदायिक मनोवैज्ञानिक प्रायः सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य पर अिाक ध्यान देते हैं। वे मानसिक स्वास्थ्य एजेंसियों, प्राइवेट संगठनों तथा राज्य सरकारों के लिए कायर् करते हैं। वे समुदाय एवं उनके संस्थानों की शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के संबंध में सहायता करते हैं। ग्रामीण परिवेश में वे मानसिक स्वास्थ्य वेंफद्र की स्थापना कर सकते हैं। शहरी परिवेश में वे औषिा पुनवार्स कायर्क्रम की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं। अनेक सामुदायिक मनोवैज्ञानिक वुफछ विश्िाष्ट समष्िटयों पर कायर् करते हैंऋ जैसे - वयोवृ( अथवा शारीरिक अथवा मानसिक रूप से अशक्त लोग। विविध कायर्क्रमों एवं योजनाओं को नयी दिशा देने तथा मूल्यांकन करने के अलावा, समुदाय - आधारित पुनर्वास में सामुदायिक मनोवैज्ञानिकों की अिाक रफचि होती है। विद्यालय मनोवैज्ञानिक शैक्ष्िाक व्यवस्था में कायर् करते हैं तथा उनकी भूमिका उनके प्रश्िाक्षण स्तर के अनुसार बदलती रहती है। उदाहरण के लिए, वुफछ विद्यालय मनोवैज्ञानिक मात्रा मनोवैज्ञानिक परीक्षण देते हैं, जबकि वुफछ अन्य परीक्षण के परिणामों की व्याख्या करते हैं तथा छात्रों की समस्याओं में उनकी सहायता करते है। वे विद्यालय की नीतिनिधार्रण में भी सहायता करते हैं। वे अभ्िाभावकों, अध्यापकों तथा प्रशासकों वफेमध्य संवाद बढ़ाते हैं तथा छात्रों की शैक्ष्िाक प्रगति के विषय में अध्यापकों एवं अभ्िाभावकों को सूचना प्रदान करते हैं। संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक संगठन में अिाकारियों एवं कमर्चारियों की भूमिका निवर्हन में आने वाली समस्याओं को समझने में अपनी महत्वपूणर् सहायता प्रदान करते हैं। वे संगठनों में परामशर् की सेवाएं प्रदान करते हैं तथा उनकी दक्षता एवं प्रभावोत्पादकता में वृि करने के लिए कौशल प्रश्िाक्षण कायर्क्रम आयोजित करते हैं। वुफछ संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक मानव संसाधन विकास में जबकि वुफछ अन्य संगठनात्मक विकास एवं परिवतर्न प्रबंधन कायर्क्रमों में विश्िाष्टता अजिर्त करते हैं। दैनंदिन जीवन में मनोविज्ञान उफपर की गइर् चचार् से स्पष्ट हो चुका है कि मनोविज्ञान मात्रा एक विषय के रूप में हमारे मन की उत्सुकताओं को ही नहीं संतुष्ट करता है बल्िक यह एक ऐसा विषय है जो अनेक प्रकार की समस्याओं का समाधान करता है। ये समस्याएँ पूणर्तः व्यक्ितगत ;उदाहरण के लिए, किसी लड़की का अपने मद्यप पिता से सामना अथवा किसी माँ का अपने समस्याग्रस्त बच्चे से सामनाद्ध अथवा पारिवारिक पृष्ठभूमि में अंतग्रर्थ्िात ;उदाहरण के लिए, पारिवारिक सदस्यों में संवाद एवं अंतःिया की कमीद्ध अथवा बड़े समूह या सामुदायिक परिवेश में ;उदाहरण के लिए, आतंकवादी समूह या सामाजिक रूप से एकांतिक कर दिए गए समुदायद्ध होती हैं अथवा राष्ट्रीय या अंतरार्ष्ट्रीय विमाओं वाली होती हैं। श्िाक्षा, स्वास्थ्य, पयार्वरण, सामाजिक न्याय, महिला विकास, अंतसर्मूह संबंध आदि समस्याएँ बड़ी होती हैं। इन समस्याओं के समाधान राजनैतिक, आथ्िार्क एवं सामाजिक सुधार तथा वैयक्ितक स्तर पर हस्तक्षेप आदि से परिवतर्न लाकर किए जाते हैं। इनमें से अिाकांश समस्याएँ मनोवैज्ञानिक होती हैं तथा उनका उदय हमारे अस्वस्थ चिंतन,लोगों तथा स्व के प्रति )णात्मक अभ्िावृिा तथा व्यवहार की अवंाछित शैली के कारण होता है। इन समस्याओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण इन समस्याओं को गहराइर् से समझने तथा उसके प्रभावी समाधान को खोजने में सहायता करता है। जीवन की समस्याओं के निदान में मनोविज्ञान के विभव को अिाक से अिाक महत्त्व दिया जा रहा है। इस संबंध में संचार - साधनों की भूमिका महत्वपूणर् है। बच्चों, किशोरों, वयस्कों तथा वयोिाक लोगों की समस्याओं के संबंध मंें दूरदशर्न पर एवं मनोचिकित्सकों द्वारा दी जाने वाली सलाह आप देखते होंगे। आप उन्हें सामाजिक परिवतर्न तथा विकास, जनसंख्या, गरीबी, अंतःवैयक्ितक एवं अंतःसामूहिक हिंसा तथा पयार्वरणी गिरावट से संबंिात वेंफद्रीय सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण करते हुए भी देखते होंगे। बहुत से मनोवैज्ञानिक लोगों के गुणात्मक रूप से अच्छे जीवन के लिए हस्तक्षेपी कायर्क्रमों की अभ्िाकल्पना एवं संचालन में भी सिय भूमिका का निवर्हन करते हैं। इसलिए इस बात पर आश्चयर् नहीं करना चाहिए कि मनोवैज्ञानिकों को हम विविध परिस्िथतियों में कायर् करते हुए देखते हैंऋ जैसे - विद्यालयों, चिकित्सालयों, उद्योगों, कारागारों, व्यावसायिक संगठनों, सैन्य प्रतिष्ठानों तथा प्राइवेट प्रैक्िटस में परामशर्दाता के रूप में जहाँ वे लोगों की अपने क्षेत्रा में समस्याओं के समाधान में सहायता करते हैं। दूसरों के लिए समाज सेवा प्रदान करने में सहायता के अतिरिक्त, मनोविज्ञान का ज्ञान व्यक्ितगत रूप से आपके दिन प्रतिदिन के जीवन के लिए साथर्क होता है। मनोविज्ञान के सि(ांत एवं वििायाँ जो आप इस पाठ्यक्रम में पढ़ेंगे, उसका उपयोग दूसरों के परिप्रेक्ष्य में स्वयं के विश्लेषण एवं समझने के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए। ऐसा नहीें है कि हम अपने विषय में सोचते नहीं हैं। परंतु प्र्रायः हम लोगों में वुफछ लोग अपने विषय में बहुत उँफचा सोचते हैं तथा कोइर् विचार/ सूचना जो हमारे विषय में अपने मत का विरोध करती है उसे हम नकार देते हैं, क्योंकि हम रक्षात्मक व्यवहार में लग जाते हैं। वुफछ अन्य दशाओं में लोग ऐसी आदतेें सीख लेते हैं जो उन्हें स्वयं नीचे ले जाती हैं। दोनों ही दशाएँ हमें आगे नहीं बढ़ने देती हैं। हमें अपने विषय में सकारात्मक तथा संतुलित समझ रखनी चाहिए। आपको मनोवैज्ञानिक सि(ांतों का उपयोग सकारात्मक ढंग से करना चाहिए जिससे आप अपने अिागम एवं स्मृति में सुधार के लिए अध्ययन की अच्छी आदतें विकसित कर सवेंफ तथा व्यक्ितगत एवं अंतवैर्यक्ितक समस्याओं का निणर्य लेने की उपयुक्त युक्ितयों द्वारा समाधान कर सवेंफ। इसको आप परीक्षा के दबाव को भी कम अथवा समाप्त करने में सहायक पाएँगे। इस प्रकार, मनोविज्ञान का ज्ञान, हमारे दिन प्रतिदिन के जीवन में बहुत उपयोगी है तथा व्यक्ितगत एवं सामाजिक दृष्िट से भी लाभप्रद है। व्यवहार, व्यवहारवाद, संज्ञान, संज्ञानात्मक उपागम, चेतना, निमिर्तिवाद, विकासात्मक मनोविज्ञान, प्रकायर्वाद, गेस्टाल्ट, गेस्टाल्ट मनोविज्ञान, मानवतावादी उपागम, अंतनिर्रीक्षण, मन, तंत्रिाका मनोविज्ञान, शरीरिया मनोविज्ञान, मनोविश्लेषण, समाजशास्त्रा, उद्दीपक, संरचनावाद ऽ मनोविज्ञान आधुनिक विद्याशाखा है जो मानसिक प्रियाओं, अनुभवों तथा लोगों के व्यवहारों की जटिलताओं को विविधसंदभो± में समझने का लक्ष्य रखती है। इसे प्राकृतिक विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान दोनों माना जाता है। ऽ मनोवैज्ञानिक विचारधाराओं के प्रमुख संप्रदाय संरचनावाद, प्रकायर्वाद, व्यवहारवाद, गेस्टाल्ट स्वूफल, मनोविश्लेषण, मानवतावादी मनोविज्ञान, तथा संज्ञानात्मक मनोविज्ञान हैं। ऽ समसामयिक मनोविज्ञान बहुआयामी है क्योंकि इसको बहुत से उपागमों अथवा बहुविध विचारों द्वारा जाना जाता है जो विभ्िान्न स्तरों पर व्यवहार की व्याख्या करता है। ये उपागम पारस्परिक रूप से एक दूसरे से अलग नहीं होते हैं। प्रत्येक उपागम मानव प्रकायर् की जटिलताओं में महत्वपूणर् अंतदर्ृष्िट प्रदान करते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रकायो± के लिए संज्ञानात्मकउपागम चिंतन प्रियाओं कोे वेंफद्रीय महत्त्व का मानता है। मानवतावादी उपागम के अनुसार मानव प्रकायर् विकसित होने की इच्छा, उत्पादन करने की इच्छा एवं मानव क्षमताओं को पूणर् करने की इच्छा से संचालित होता है। ऽ आज मनोवैज्ञानिक बहुत से विश्िाष्ट क्षेत्रों में कायर् करते हैं जिनके अपने सि(ांत एवं वििायाँ होती हैं। वे सि(ांत के निमार्ण का प्रयास तथा क्षेत्रा विशेष की समस्याओं के समाधान का प्रयास करते हैं। मनोविज्ञान के वुफछ प्रमुख क्षेत्रा हैं - संज्ञानात्मक मनोविज्ञान, जैविक मनोविज्ञान, स्वास्थ्य मनोविज्ञान, विकासात्मक मनोविज्ञान, सामाजिक मनोविज्ञान, शैक्ष्िाक एवं विद्यालय मनोविज्ञान, नैदानिक एवं उपबोधन मनोविज्ञान, पयार्वरणी मनोविज्ञान, औद्योगिक/संगठनात्मक मनोविज्ञान, तथा क्रीड़ा मनोविज्ञान। ऽ आजकल वास्तविकता की अच्छी समझ के लिए बहु/अंतविर्षयक पहल की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इससे विद्याशाखाओं में आपसी सहयोग का उदय हुआ है। मनोविज्ञान की रफचि सामाजिक विज्ञानों में परस्पर रूप से व्याप्त है ;जैसे - अथर्शास्त्रा, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्राद्ध, जैव विज्ञानों ;जैसे - तंत्रिाकाविज्ञान, शरीरियात्मक, आयुविर्ज्ञानद्ध, जनसंचार, तथा संगीत एवं ललित कला। ऐसे प्रयासों से पफलदायी अनुसंधानों एवं अनुप्रयोगों को बढ़ावा मिला है। ऽ मनोविज्ञान मात्रा ऐसी विद्याशाखा नहीं है जो केवल मानव व्यवहार के विषय में सै(ांतिक ज्ञान का विकास करती है बल्िक विभ्िान्न स्तरों पर समस्याओं का समाधान करती है। मनोवैज्ञानिक विभ्िान्न परिस्िथतियों में विविध ियाओं की सहायता के लिए नियुक्त होते हैंऋ जैसे - विद्यालय, चिकित्सालय, उद्योग, प्रश्िाक्षण संस्थान, सैन्य एवं सरकारी प्रतिष्ठान। इनमें बहुत से मनोवैज्ञानिक प्राइवेट प्र्रैक्िटस करते हैं तथा परामशर्दाता होते हैं। समीक्षात्मक प्रश्न 1.व्यवहार क्या है? प्रकट एवं अप्रकट व्यवहार का उदाहरण दीजिए। 2.आप वैज्ञानिक मनोविज्ञान को मनोविज्ञान विद्याशाखा की प्रसि( धारणाओं से वैफसे अलग करेंगे? 3.मनोविज्ञान के विकास का संक्ष्िाप्त रूप प्रस्तुत कीजिए। 4.वे कौन सी समस्याएँ होती हैं जिनके लिए मनोवैज्ञानिकों का अन्य विद्याशाखा के लोगों के साथ सहयोग लाभप्रद हो सकता है? किन्हीं दो समस्याओं की व्याख्या कीजिए। 5.अंतर कीजिए ;अद्ध मनोवैज्ञानिक एवं मनोरोगविज्ञानी में, तथा ;बद्ध परामशर्दाता एवं नैदानिक मनोवैज्ञानिक में। 6.दैनंदिन जीवन के वुफछ क्षेत्रों का वणर्न कीजिए जहाँ मनोविज्ञान की समझ को अभ्यास रूप में लाया जा सके। 7.पयार्वरण के अनुवूफल मित्रावत् व्यवहार को किस प्रकार उस क्षेत्रा में ज्ञान द्वारा बढ़ाया जा सकता है? 8.अपराध जैसी महत्वपूणर् सामाजिक समस्या का समाधान खोजने मे सहायता करने के लिए आपके अनुसार मनोविज्ञान की कौन सी शाखा सबसे उपयुक्त है। क्षेत्रा की पहचान कीजिए एवं उस क्षेत्रा में कायर् करने वाले मनोवैज्ञानिकों के सरोकारों की व्याख्या कीजिए। परियोजना विचार 1.यह अध्याय मनोवज्ञान के क्षेत्रा में अनेक उद्यमियों के विषय में बतलाता है। वगीर्करणों में से किसी एक मनोवैज्ञानिक से संपवर्फ कीजिए एवं उस व्यक्ित का साक्षात्कार कीजिए। पहले से प्रश्नों की एक सूची तैयार रख्िाए। संभावित प्रश्न होंगे: ;1द्ध आपके कायर् विशेष के लिए किस प्रकार की श्िाक्षा आवश्यक है? ;2द्ध इस विद्याशाखा के अध्ययन के लिए आप किस महाविद्यालय/विश्वविद्यालय की सलाह देंगे? ;3द्ध क्या आपके कायर् - क्षेत्रा में आजकल नौकरी के अिाक अवसर उपलब्ध हैं? ;4द्ध अपने लिए आपकी पसंद का अतिविश्िाष्ट कायर् दिवस वैफसा - वैफसा होगा - अथवा अतिविश्िाष्ट जैसी कोइर् चीश नहीं होती है? ;5द्ध इस तरह के कायर् में आने के लिए आपको कौन सी चीश ने अभ्िाप्रेरित किया? अपने साक्षात्कार की एक रिपोटर् लिख्िाए तथा अपनी विश्िाष्ट प्रतिियाओं को भी सम्िमलित कीजिए। 2.किसी पुस्तकालय अथवा पुस्तक की दुकान पर जाइए अथवा इंटरनेट पर देख्िाए कि कौन सी पुस्तक ;कथा साहित्य/कथा साहित्य के अतिरिक्त अथवा पिफल्मद्ध मनोविज्ञान के अनुप्रयोग का संदभर् देती है। संक्ष्िाप्त सारांश प्रस्तुत करते हुए एक रिपोटर् तैयार कीजिए।

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