एकक 13 हाइड्रोकाबर्न भ्ल्क्त्व्ब्।त्ठव्छ उद्देश्य इस एकक के अध्ययन के पश्चात् आप: ऽ नामकरण की आइर्.यू.पी.ए.सी. प(ति के अनुसार हाइड्रोकाबर्नों का नाम बता सवेंफगेऋ ऽ ऐल्केन, एल्कीन, एल्काइन तथा ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्न के समावयवों की पहचान कर सवेंफगे तथा उनकी संरचना लिख सवेंफगेऋ ऽ हाइड्रोकाबर्न के विरचन की विभ्िान्न वििायों के बारे में सीखेंगेऋ ऽ भौतिक एवं रासायनिक गुणधमर् के आधार पर ऐल्केन, एल्कीन, एल्काइन तथा ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्नों में विभेद कर सवेंफगेऋ ऽ एथेन के विभ्िान्न संरूपणों ;काॅन्पफाॅमेर्शनोंद्ध के आरेख बनाकर उनमें विभेद कर सवेंफगेऋ ऽ हाइड्रोकाबर्न की भूमिका का ऊजार् के ड्डोत के रूप में तथा अन्य औद्योगिक अनुप्रयोगोंमें महत्त्व बता सवेंफगेऋ ऽ इलेक्ट्राॅनिक ियावििा के आधार पर असममित एल्कीनों तथा एल्काइनों के संकलन उत्पादों के बनने का अनुमान कर सवेंफगेऋ ऽ बेन्जीनकी संरचना का वणर्न, ऐरोमैटिकता एवं इलेक्ट्राॅनस्नेही प्रतिस्थापन - अभ्िाियाओं की ियावििा की व्याख्या कर सवेंफगेऋ ऽ एकल प्रतिस्थापी बेन्जीनवलय पर प्रतिस्थापियों के निदेर्शात्मक प्रभाव की व्याख्या कर सवेंफगेऋ तथा ऽ वैफन्सरजन्यता तथा विषाक्तता के विषय में सीख सवेंफगे। हाइड्रोकाबर्न ऊजार् के प्रमुख स्रोत है। हाइड्रोकाबर्न पद स्वतः स्पष्ट है, जिसका अथर् केवल काबर्न तथा हाइड्रोजन के यौगिक है। हमारे दैनिक जीवन में हाइड्रोकाबर्न का महत्त्वपूणर् योगदान है। आप एलपीजी, सीएनजी आदि संक्ष्िाप्त शब्दों से परिचित होंगे, जो ईंधन के रूप में उपयोग में लाए जाते हैं। एलपीजी द्रवित पेट्रोलियम गैस का, जबकि सीएनजी संघनित प्राकृतिक गैस का संक्ष्िाप्त रूप है। आजकल दूसरा संक्ष्िाप्त शब्द एलएनजी ;द्रवित प्राकृतिक गैसद्ध प्रचलन में है। यह भी ईंधन है, जो प्राकृतिक गैस के द्रवीकरण से प्राप्त होता है। पेट्रोलियम, जो भू - पपर्टी के नीचे पाया जाता है, के प्रभावी आसवन ;तिंबजपवदंस कपेजपससंजपवदद्ध से पेट्रोल, डीजल तथा वैफरोसिन प्राप्त होते हैं। कोल गैस, कोल के भंजक आसवन ;कमेजतनबजपअम कपेजपसपंजपवदद्ध से प्राप्त होती है। प्राकृतिक गैसें तेल के वुफओं की खुदाइर् के दौरान ऊपरी स्तर में पाइर् जाती है। संपीडन के पश्चात् प्राप्त गैसों को ‘संपीडित प्राकृतिक गैस’ कहते हैं। एलपीजी का उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में होता है, जो सबसे कम प्रदूषण वाली गैस है। वैफरोसिन का भी उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता है, लेकिन इससे वुफछ प्रदूषण पैफलता है। स्वचालित वाहनों को ईंधन के रूप में पेट्रोल, डीजल तथा सीएनजी की आवश्यकता होती है। पेट्रोल तथा सीएनजी से चलने वाले स्वचालित वाहन कम प्रदूषण पैफलाते हैं। ये सभी ईंधन हाइड्रोकाबर्न के मिश्रण होते हैं, जो ऊजार् के ड्डोत हैं। हाइड्रोकाबर्न का उपयोग पाॅलिथीन, पाॅलिप्रोपेन, पाॅलिस्टाइरीन आदि बहुलकों के निमार्ण में किया जाता है। उच्च अणुभार वाले हाइड्रोकाबर्नों का उपयोग पेन्ट में विलायक के रूप में और रंजक तथा औषिायों के निमार्ण में प्रारंभ्िाक पदाथर् के रूप में भी किया जाता है। अब आप दैनिक जीवन में हाइड्रोकाबर्न के महत्त्वपूणर् उपयोग को अच्छी तरह समझ गए हैं। इस एकक में हाइड्रोकाबर्नों के बारे में और अिाक जानेंगे। 13.1 वगीर्करण हाइड्रोकाबर्न विभ्िान्न प्रकार के होते हैं। काबर्न - काबर्न आबंधोंकी प्रकृति के आधार पर इन्हें मुख्यतः तीन समूहों में वगीर्कृत किया गया हैμ ;1द्ध संतृप्त, ;2द्ध असंतृप्त तथा ;3द्ध ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्न। संतृप्त हाइड्रोकाबर्न में काबर्न - काबर्न तथा काबर्न - हाइड्रोजन एकल आबंध होते हैं। यदि विभ्िान्न काबर्न परमाणु आपस में एकल आबंध से जुड़कर विवृत शंृखला बनाते हैं, तो उन्हें ‘ऐल्केन’ कहते हैं, जैसाकि आप एकक - 12 में पढ़ चुके हैं। दूसरी ओर यदि काबर्न परमाणु संवृत शंृखला या वलय का निमार्ण करते हैं, तो उन्हें ‘साइक्लोऐल्केन’ कहा जाता है। असंतृप्त हाइड्रोकाबर्नों में काबर्न - काबर्न बहुआबंध जैसे द्विआबंध, त्रिाआबंध या दोनों उपस्िथत होते हैं। ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्न संवृत यौगिकों का एक विशेष प्रकार है। आप काबर्न की चतुस±योजकता तथा हाइड्रोजन की एकल संयोजकता को ध्यान में रखते हुए ;विवृत शंृखला या संवृत शंृखलाद्ध अनेक अणुओं के माॅडल बना सकते हैं। ऐल्केनों के माॅडल बनाने के लिए आबंधों के लिए टूथपिक तथा परमाणुओं के लिए प्लास्िटक की गेंदों का उपयोग हम कर सकते हैं। एल्कीन, एल्काइन तथा ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्नों के लिए ¯स्प्रग माॅडल बनाए जा सकते हैं। 13.2 ऐल्केन जैसा पहले बताया जा चुका है, ऐल्केन काबर्न - काबर्न एकल आबंधयुक्त संतृप्त विवृत शंृखला वाले हाइड्रोकाबर्न है। मेथैन ;ब्भ्4द्ध इस परिवार का प्रथम सदस्य है। मेथैन एक गैस है, जो कोयले की खानों तथा दलदली क्षेत्रों में पाइर् जाती है। अगर आप मेथैन के एक हाइड्रोजन परमाणु को काबर्न के द्वारा प्रतिस्थापित कर तथा हाइड्रोजन परमाणु की आवश्यक संख्या जोड़कर दूसरे काबर्न की चतुस±योजकता को संतुष्ट करते हैं, तो आपको क्या प्राप्त होगा? आपको ब्भ्प्राप्त होगा। वह हाइड्रोकाबर्न,26 जिसका अणुसूत्रा ब्2भ्है, एथेन कहलाती है। अतः आप ब्भ्46 के एक हाइड्रोजन परमाणु को दृब्भ्समूह द्वारा प्रतिस्थापित3 करके ब्2भ्के रूप में प्राप्त कर सकते हैं।6 इस प्रकार हाइड्रोजन को मेथ्िाल ;ब्भ्द्ध समूह द्वारा3प्रतिस्थापित करके आप अन्य कइर् ऐल्केन बना सकते हैं। इस प्रकार प्राप्त अणु ब्भ्ए ब् भ्इत्यादि होंगे।38410 ये हाइड्रोकाबर्न सामान्य अवस्थाओं में निष्िक्रय होते हैं क्योंकि ये अम्लों और अन्य अभ्िाकमर्कों से अभ्िािया नहीं करते। अतः प्रारंभ में इन्हें पैरापिफन ;च्ंतनउत्रकम ।पििदपेत्रियाशीलद्ध कहते थे। क्या आप ऐल्केन परिवार या सजातीय श्रेणी ;ीवउवसवहवने ेमतपमेद्ध के सामान्य सूत्रा के बारे में वुफछ अनुमान लगा सकते हैं। ऐल्केन का सामान्य सूत्रा ब्भ्है, जहाँ द काबर्न परमाणुओं को तथा 2द ़ 2 द 2द़2 हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या को प्रद£शत करते हैं। क्या आप मेथैन की संरचना का स्मरण कर सकते हैं? संयोजकता कोश इलेक्ट्राॅन युग्म प्रतिकषर्ण सि(ांत ;टैम्च्त्द्ध के अनुसार ;एकक - 4 देख्िाएद्ध मेथैन की चतुष्पफलीय संरचना होती है ;चित्रा 13.1द्ध जो बहुसमतलीय है जिसमें काबर्न परमाणु वेंफद्र में तथा चार हाइड्रोजन परमाणु समचतुष्पफलक के चारों कोनों पर स्िथत हैं। इस प्रकार प्रत्येक भ्दृब् का बंध कोण 109ण्50 होता है। चित्रा 13.1 मेथैन ;ब्भ्4द्ध की चतुष्पफलक संरचना ऐल्केनों के चतुष्पफलक आपस में जुड़े रहते हैं, जिनमें ब्.ब् तथा ब्.भ् आबंधों की लंबाइयाँ क्रमशः 154 चउ और 112 चउ होती हैं ;एकक - 12 देख्िाएद्ध। आप पहले अध्ययन कर चुके हैं कि ब्.ब् तथा ब्.भ्σ ;सिग्माद्ध आबंध का निमार्ण काबर्न परमाणु के संकरित ेच3 तथा हाइड्रोजन परमाणुओं के 1े के समाक्षीय अतिव्यापन से होता है। 13.2.1 नाम प(ति तथा समावयवता एकक - 12 में आप विभ्िान्न काबर्निक यौगिकों की श्रेण्िायों वफी नाम प(ति की बारे में अध्ययन कर चुके हैं। ऐल्केन में नाम प(ति तथा समावयवता को वुफछ और उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। साधारण नाम कोष्ठक में दिए गए हैं। प्रथम तीन सदस्य मेथैन, एथेन तथा प्रोपेन में केवल एक संरचना पाइर् जाती है, जबकि उच्च ऐल्केनो में एक से अिाक संरचना भी हो सकती है। ब्भ्की संरचना लिखने पर चार काबर्न410 परमाणु आपस में सतत् शंृखला अथवा शाख्िात शंृखला के द्वारा जुड़े रहते हैं। ब्यूटेन ;द.ब्यूटेनद्ध ;क्वथनांक 237 ज्ञद्ध और 2 - मेथ्िालप्रोपेन ;आइसोब्यूटेनद्ध ;क्वथनांक 261ज्ञद्ध ब्भ्में आप किस प्रकार पाँच काबर्न तथा बारह512 हाइड्रोजन परमाणुओं को जोड़ सकते हैं? इन्हें तीन प्रकार से व्यवस्िथत कर सकते हैं, जैसा संरचना प्प्प्.ट में दिखाया गया है। पेन्टेन ;द.पेन्टेनद्ध ;क्वथनांक 309 ज्ञद्ध प्ट 2 - मेथ्िालब्यूटेन ;आइसोपेन्टेनद्ध ;क्वथनांक 301ज्ञद्ध ट 2, 2 - डाइमेथ्िालप्रोपेन ;नियोपेन्टेनद्ध ;क्वथनांक 282ण्5ज्ञद्ध संरचना प् तथा प्प् का अणु सूत्रा समान है, ¯कतु क्वथनांक तथा अन्य गुणधमर् भ्िान्न हैं। इसी प्रकार संरचनाओं प्प्प्ए प्ट तथा ट के अणु सूत्रा समान हैं, ¯कतु क्वथनांक तथा गुणधमर् भ्िान्न हैं। संरचना प् तथा प्प् ब्यूटेन के समावयव हैं, जबकि संरचना प्प्प्ए प्ट तथा ट पेन्टेन के समावयव हैं। इनके गुणधमो± में अंतर इनकी संरचनाओं में अंतर के कारण है। अतः इन्हें ‘संरचनात्मक समावयव’ ;ेजतनबजनतंस पेवउमतेद्ध कहना उत्तम रहेगा। संरचना प् तथा प्प्प् में सतत् काबर्न परमाणुओं की शंृखला है, जबकि संरचना प्प्ए प्ट तथा ट में शाख्िात काबर्न शंृखला है। अतः ऐसे संरचनात्मक समावयवी, जो काबर्न परमाणुओं कीशंृखला में अंतर के कारण होते हैं, को ‘ शंृखला समावयव’ ;बींपद पेवउमतेद्ध कहते हैं। अतः आपने देखा कि ब्भ्410 तथा ब्भ् में क्रमशः दो तथा तीन शंृखला समावयव होते हैं।512 उदाहरण 13.1 अणुसूत्रा ब्6भ्14 वाली ऐल्केन के विभ्िान्न शंृखला - समावयवों की संरचना तथा आइर्.यू.पी.सी नाम लिख्िाए। हल ;पद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2दृ ब्भ्2दृ ब्भ्3 द.हैक्सेन ;पद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2दृ ब्भ्3 द्य ब्भ्3 2.मेथ्िालपेन्टेन ;पपपद्ध 3.मेथ्िालपेन्टेन ;पअद्ध 2ए3.डाइमेथ्िालब्यूटेन ;अद्ध 2ए2.डाइमेथ्िालब्यूटेन काबर्न परमाणु से जुड़े हुए अन्य काबर्न परमाणुओं की संख्या के आधार पर काबर्न परमाणुओं को प्राथमिक ;1°द्धए द्वितीयक ;2°द्धए तृतीयक ;3°द्ध तथा चतुष्क ;4°द्ध काबर्न परमाणु कहते हैं। काबर्न परमाणु ;जो अन्य काबर्न से नहीं जुड़ा हो, जैसे - मेथैनद्ध में अथवा केवल एक काबर्न परमाणु से जुड़ा हो जैसे - एथेन में उसे ‘प्राथमिक काबर्न’ कहते हैं। अंतिम सिरे वाले परमाणु सदैव प्राथमिक होते हैं। काबर्न परमाणु, जो दो काबर्न परमाणु से जुड़ा हो, उसे ‘द्वितीयक’ कहते हैं। तृतीयक बनाते रहेंगे, तो कइर् प्रकार के समावयव प्राप्त होंगे। ब्भ्के614 काबर्न तीन काबर्न परमाणुओं से तथा नियो या चतुष्क काबर्न पाँच, ब्भ्के नौ तथा ब्भ्के 75 समावयव संभव हैं।716 1022 परमाणु चार अन्य काबर्न परमाणुओं से जुड़े होते हैं। क्या आप संरचना प्प्ए प्ट तथा ट में आपने देखा है कि दृब्भ्समूह3 संरचनाएँ प् से ट में 1° 2° 3° तथा 4° काबर्न परमाणुओं की काबर्न क्रमांक दृ2 से जुड़ा है। ऐल्केन के काबर्न परमाणुओं पहचान कर सकते हैं? यदि आप उच्चतर ऐल्केनों की संरचनाएं या अन्य वगो± के यौगिकों में दृब्भ्एदृब्भ्एदृब्भ्जैसे32537 उदाहरण 13.2 ब्5भ्11 अणुसूत्रा वाले ऐल्िकल समूह के विभ्िान्न समावयवों की संरचनाएँ लिख्िाए तथा विभ्िान्न काबर्न शंृखला पर दृव्भ् जोड़ने से प्राप्त ऐल्कोहाॅलों के आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम बताइए। एकक 12 में पहले से च£चत नाम प(ति के सामान्य नियमों का स्मरण करते हुए प्रतिस्थापित ऐल्केनों के निम्नलिख्िात उदाहरणों द्वारा नामकरण की अवधारणा को आप भली - भाँति समझ सवेंफगे। हल ब्भ्समूह की संरचना संगत ऐल्कोहाॅल ऐल्कोहाॅल का नाम511 ;पद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2दृ ब्भ्2 दृब्भ्3 दृ ब्भ्2दृब्भ्2 दृ ब्भ्2दृ ब्भ्2 दृ व्भ् पेन्टेन - 1 - आॅल ;पपद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2दृ ब्भ्3 पेन्टेन - 2 - आॅलद्य द्य व्भ् ;पपपद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2दृ ब्भ्3 पेन्टेन - 3 - आॅलद्यद्य व्भ्ब्भ्3ब्भ्3 3 - मेथ्िालब्यूटेन - 1 - आॅलद्यद्य ;पअद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2दृ व्भ्ब्भ्3ब्भ्3 2 - मेथ्िालब्यूटेन - 1 - आॅलद्यद्य ;अद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2दृ व्भ्ब्भ्3ब्भ्3 2 - मेथ्िालब्यूटेन - 2 - आॅलद्यद्य ;अपद्ध ब्भ्3 दृ ब् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 ब्भ्3 दृ ब् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 द्यद्य व्भ्ब्भ्3ब्भ्3 2,2 - डाइमेथ्िालप्रोपेन - 1 - आॅलद्यद्य ;अपपद्ध ब्भ्3 दृ ब् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 दृ ब् दृ ब्भ्2व्भ् द्यद्यब्भ्3ब्भ्3ब्भ्3ब्भ्3 व्भ् 3 - मेथ्िालब्यूटेन - 2 - आॅलद्य द्यद्य द्य ;अपपपद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ्दृ ब्भ्3 ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ् दृ ब्भ्3 समूहों को ‘ऐल्िकल समूह’ कहा जाता है, क्यांेकि उन्हें ऐल्केन से हाइड्रोजन परमाणु के विस्थापन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। ऐल्िकल समूह का सामान्य सूत्रा ब्भ्;एकक - 12द्ध है।द 2द़1 यदि दी गइर् संरचना का सही प्न्च्।ब् नाम लिखनामहत्त्वपूणर् है, तो प्न्च्।ब् नाम से सही संरचना वुफछ काबर्निकयौगिकों का नामकरण - सूत्रा लिखना भी उतना ही महत्त्वपूणर् है। इसके लिए सवर्प्रथम जनक ऐल्केन के काबर्न परमाणुओं की दीघर्तम शंृखला को लिखेंगे। तत्पश्चात् उनका अंकन किया जाएगा। जिस काबर्न परमाणु पर प्रतिस्थापी जुड़ा हुआ है तथा अंत में हाइड्रोजन परमाणुओं की यथेष्ट संख्या द्वारा काबर्न परमाणु की संयोजकता को संतुष्ट किया जाएगा। उदाहरण 13.3 निम्नलिख्िात यौगिकों के आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम लिख्िाए - ;पद्ध ;ब्भ्3द्ध3ब्ब्भ्2ब्;ब्भ्3द्ध3 ;पपद्ध ;ब्भ्3द्ध2ब्;ब्2भ्5द्ध2 ;पपपद्ध टेट्रा - तृतीयक ;ट£शयरीद्ध - ब्यूटिलमेथेन हल ;पद्ध 2ए 2ए 4ए 4.टेट्रामेथ्िालपेन्टेन ;पपद्ध 3ए 3.डाइमेथ्िालपेन्टेन ;पपपद्ध 3ए 3.डाइ. तृतीयक ;ट£शयरीद्ध - ब्यूटिल - 2ए 2ए 4ए 4 - टेट्रामेथ्िालपेन्टेन सारण्ी 13.1ः काबर्निक यौगिकों का नामकरण संरचना तथा प्ण्न्ण्च्ण्।ण्ब्ण् नाम टिप्पण्िायाँ ;कद्ध 1ब्भ्3 दृ2ब्भ् दृ 3ब्भ्2 दृ 4ब्भ् दृ 5ब्भ्2 दृ 6ब्भ्3 ;4 - एथ्िाल - 2 - मेथ्िालहेक्सेनद्ध ;खद्ध 8ब्भ्3 दृ 7ब्भ्2 दृ 6ब्भ्2 दृ 5ब्भ् दृ 4ब्भ् दृ 3ब् दृ 2ब्भ्2 दृ 1ब्भ्3 ;3,3 - डाइऐथ्िाल - 5 - आइसोप्रोपिल - 4 - मेथ्िालआॅक्टेनद्ध ;गद्ध 1ब्भ्3 दृ2ब्भ्2 दृ3ब्भ्2 दृ4ब्भ्दृ5ब्भ्दृ6ब्भ्2 दृ7ब्भ्2 दृ8ब्भ्2 दृ9ब्भ्2 दृ10ब्भ्3 ;5 - द्विती - ब्यूटिल - 4 - आइसोप्रोपिलडेकेनद्ध ;घद्ध 1ब्भ्3 दृ2ब्भ्2 दृ3ब्भ्2 दृ4ब्भ्2 दृ5ब्भ्दृ6ब्भ्2 दृ7ब्भ्2 दृ8ब्भ्2 दृ9ब्भ्3 5 - ;2,2 - डाइमेथ्िालप्रोपिलद्ध नोनेन ;घद्ध 1ब्भ्3 दृ 2ब्भ्2 दृ 3ब्भ् दृ 4ब्भ्2 दृ 5ब्भ् दृ 6ब्भ्2 दृ 7ब्भ्3 3 - एथ्िाल - 5 - मेथ्िालहैप्टेन न्यूनतम योग तथा वणर्माला के क्रम में व्यवस्था न्यूनतम योग तथा वणर्माला के क्रम में व्यवस्था वणर्माला के क्रम में द्वितीयक ;ेमबवदकंतलद्ध को नहीं माना जाता हैऋ आइसोप्रोपिल को एक शब्द मानते हैं। पाश्वर् - शंृखला के प्रतिस्थापियों का पुनरांकन वणर्माला के प्राथमिकता क्रम में उदाहरणाथर्दृ3 - एथ्िाल - 2, 2 - डाइमेथ्िालपेन्टेन की संरचना वफो निम्नलिख्िात पदों के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है - ;पद्ध पाँच काबर्न परमाणुओं की शंृखला बनाइएμ ब्.ब्.ब्.ब्.ब् ;पपद्ध काबर्न परमाणुओं को अंकन दीजिएμ ब्1दृब्2दृब्3दृब्4दृब्5 ;पपपद्ध काबर्न - 3 पर एक एथ्िाल - समूह तथा काबर्न - 2 पर दो मेथ्िाल - समूह जोडि़एμ ब्भ्3 द्य ब्1 2दृब् दृ 3ब् दृ 4ब् दृ 5ब् द्यद्य ब्भ् ब्भ्3 25 ;पअद्ध प्रत्येक काबर्न परमाणु की संयोजकता को हाइड्रोजन परमाणुओं की आवश्यक संख्या से संतुष्ट कीजिए। ब्भ्3 द्य1 345 ब्भ् − ब्2 − ब्भ् − ब्भ् − ब्भ् 3 23 द्यद्य ब्भ् ब्भ् 3 25 इस प्रकार हम सही संरचना पर पहुँच जाते हैं। यदि आप दिए गए नाम वफो संरचना - सूत्रा में लिखना समझ चुके हैं, तो निम्नलिख्िात प्रश्नों को हल कीजिएμ उदाहरण 13.4 निम्नलिख्िात यौगिकों के संरचनात्मक सूत्रा लिख्िाएμ ;पद्ध 3ए 4ए 4ए 5दृटेट्रामेथ्िालहेप्टेन ;पपद्ध 2ए5.डाइमेथ्िालहेक्सेन हल 123 5 674 ;पद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब् दृ ब्भ्दृ ब्भ् दृ ब्भ्3 1 23456 ;पपद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब्भ्3ब्भ्3 ब्भ्3 उदाहरण 13.5 निम्नलिख्िात यौगिकों की संरचनाएँ लिख्िाए। दिए गए नाम अशु( क्यों हैं? सही आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम लिख्िाए। ;पद्ध 2.एथ्िालपेन्टेन ;पपद्ध 5.एथ्िाल - 3 - मेथ्िालहेप्टेन हल 3 4 5 6 ;पद्ध ब्भ्दृब्भ् दृब्भ्दृब्भ् दृब्भ् 3 223 द्य 2ब्भ्12 5 इस यौगिक में दीघर्तम शंृखला पाँच काबर्न की न होकर छः काबर्न की होती है। अतः सही नाम 3 - मेथ्िालहेक्सेन है। ;पपद्ध 7 6 54321 1 2 34567 ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 इस यौगिक में अंकन उस छोर से प्रारंभ करेंगे, जहाँ से ऐथ्िाल समूह को कम अंक मिले। अतः सही नाम 3 - ऐथ्िाल - 5 - मेथ्िालहेप्टेन है। 13.2.2 विरचन ऐल्केन के मुख्य ड्डोत पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस हैं पिफर भी ऐल्केनों को इन वििायों द्वारा बनाया जा सकता हैμ 1. असंतृप्त हाइड्रोकाबर्नों सेμ डाइहाइड्रोजन गैस सूक्ष्म विभाजित उत्पे्ररक ;जैसे - प्लैटिनम, पैलेडियम तथा निकेलद्ध की उपस्िथति में एल्कीन के साथ योग कर ऐल्केन बनाती है। इस प्रिया को हाइड्रोजनीकरण ;भ्लकतवहमदंजपवदद्ध कहते हैं। ये धातुएं हाइड्रोजन गैस को अपनी सतह पर अिाशोष्िात करती हैं और हाइड्रोजन - हाइड्रोजन आबंध को सिय करती हैं। प्लैटिनम तथा पैलेडियम, कमरे के ताप पर ही अभ्िािया को उत्पे्ररित कर देती है, परंतु निवैफल उत्पे्ररक के लिए आपेक्ष्िाक रूप से उच्च ताप तथा दाब की आवश्यकता होती है। च्जध्च्कध्छप ब्भ् त्रब्भ् ़भ् ⎯⎯⎯⎯→ब्भ् −ब्भ् ;13ण्1द्ध222 33 एथीन एथेन च्जध्च्कध्छपब्भ् −ब्भ्त्रब्भ् भ् ⎯⎯→ब्भ् −ब्भ़्⎯⎯−ब्भ्3 2 3 2 3 प्रोपीन प्रोपेन ;13ण्2द्ध च्जध्च्कध्छपब्भ्3 −≡−़ ⎯ब् भ् भ्2 ⎯⎯→ब्भ् − 2ब् ⎯3 ब्भ् −ब्भ्3 प्रोपीन प्रोपेन ;13ण्3द्ध 2. ऐल्िकल हैलाइडों सेμ ;पद्ध ऐल्िकल हैलाइडों ;फ्रलुओराइडों के अलावाद्ध का ¯जक तथा तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल द्वारा अपचयन करने पर ऐल्केन प्राप्त होते हैं। र्दए भ़् 2़ब्भ् −़ब्स भ् ⎯⎯⎯→ब्भ़्र्द32 4 क्लोरोमेथेन मेथेन ;13ण्4द्ध र्दए भ़् 2़ब्भ् −़ब्स भ् ⎯⎯⎯→ब्भ् ़र्द252 26 क्लोरोएथेन एथेन ;13ण्5द्ध र्दए भ़् 2़ब्भ्ब्भ्ब्भ्ब्स भ़् ⎯⎯⎯ब्भ् ब्भ् ब्भ्→़र्द322 2 323 क्लोरोप्रोपेन प्रोपेन ;13ण्6द्ध ;पपद्ध शुष्क इर्थरीय विलयन ;नमी से मुक्तद्ध में ऐल्िकल हैलाइड की सोडियम धातु के साथ अभ्िािया द्वारा उच्चतर ऐल्केन प्राप्त होते हैं। इस अभ्िािया को वुट्जर् अभ्िािया ;ूनतज्र तमंबजपवदद्ध कहते हैं। यह सम काबर्न परमाणु संख्या वाली उच्चतर ऐल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती है। शष्ु क इथ्र्ारब्भ् ठत3 2छं ठतब्भ्3 ब्भ्3 ब्भ्3 2छंठत ब्रोमोमेथेन एथेन ;13ण्7द्ध शष्ुक इथ्र्ारब्भ्ठत 2छं ठतब्भ्2 5 ़़ 5 ⎯⎯⎯25 −ब् भ्52 →ब्भ् 2 ़2छंठत ब्रोमोएथेन द.ब्यूटेन ;13ण्8द्ध क्या होगा, यदि दो असमान ऐल्िकल हैलाइड लेते हैं? 3. काबोर्क्िसलिक अम्लों सेμ ;पद्ध काबोर्क्िसलिक अम्लों के सोडियम लवण को सोडा लाइम ;सोडियम हाइड्राॅक्साइड एवं वैफल्िसयम आॅक्साइड के मिश्रणद्ध के साथ गरम करने पर काबोर्क्िसलिक अम्ल से एक कम काबर्न परमाणु वाले ऐल्केन प्राप्त होते हैं। काबोर्क्िसलिक अम्ल से काबर्न डाइआॅक्साइड के इस विलोपन को विकाबोर्क्िसलीकरण ;कमबंतइवतलजंजपवदद्ध कहते हैं। −़ ब्ंव्ब्भ् ब्व्व् छं ़छंव्भ्⎯→ ़छं ब्व्⎯ब्भ्3 Δ 4 23 सोडियम एथेनोएट उदाहरण 13.6 प्रोपेन के विरचन के लिए किस अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होगी। अभ्िािया का रासायनिक समीकरण भी लिख्िाए। हल ब्यूटेनोइक अम्ल ब्भ् ब्भ् ब्भ् ब्व्व् छंब्भ्ब्भ्ब्भ् छंब्व् 322−़ छंव्भ् ब्ंव् 323 23 ;पपद्ध कोल्बे की विद्युत् - अपघटनीय वििा काबोर्क्िसलिक अम्लों के सोडियम अथवा पोटैश्िायम लवणों के जलीय विलयन का विद्युत् - अपघटन करने पर ऐनोड पर सम काबर्न परमाणु संख्या वाले ऐल्केन प्राप्त होते हैं। −़विद्यतु - ्अपघटन2ब्भ् ब्व्व् छं ़2भ् व्⎯⎯⎯⎯→ब्भ् दृब्भ्32 33 सोडियम ऐसीटेट ़2ब्व्2 ़भ्2 ़2छंव्भ् ;13ण्9द्ध यह अभ्िािया निम्नलिख्िात पदों में संपन्न होती है - व् द्य −़ ़;कद्ध 3 3 ब्व्2छं2ब्भ् ब्व्व् छं 2ब्भ् −−़ ;खद्ध एनोड परμ व्व् द्यद्य द्यण्−2म− - −−⎯ब्व् ⎯2ब्भ् −− ⎯→2ब्भ् ़↑2ब्भ् → ब् व्रू ⎯2व् ;गद्ध 3 3 - - 3 2 ऐसीटेट आयन ऐसीटेट मुक्त मूलक मेथ्िाल मुक्त मूलक भ्ब् ब्भ़् ⎯⎯भ्ब् ब्भ् ↑→−33 33 ;घद्ध वैफथोड परμ म−− ़ 2 →़भ्व़्⎯व्भ् भ् 2भ़्⎯भ्2→ ↑ मेथेन इस वििा द्वारा नहीं बनाइर् जा सकती, क्यों? 13.2.3 गुणधमर् भौतिक गुणधमर् एल्केन अणुओं में ब्दृब् तथा ब्दृभ् आबंध के सहसंयोजक गुणतथा काबर्न एवं हाइड्रोजन परमाणुओं की विद्युत् ट्टणात्मकता में बहुत कम अंतर के कारण लगभग सभी ऐल्केन अध्रुवीय होते हैं। इनके मध्य दुबर्ल वान्डरवाल्स बल पाए जाते हैं। दुबर्ल बलों के कारण ऐल्केन श्रेणी के प्रथम चार सदस्य ब्से ब्तक1 4 गैस, ब्से ब्तक द्रव तथा ब् या उससे अिाक काबर्न5 17 18युक्त ऐल्केन 298ज्ञ पर ठोस होते हैं। ये रंगहीन तथा गंधहीन होते हैं। जल में ऐल्केन की विलेयता के लिए आप क्या सोचते हैं? पेट्रोल, हाइड्रोकाबर्न का मिश्रण है, जिसका उपयोग स्वचालित वाहनों में ईंधन के रूप में किया जाता है। पेट्रोल तथा उसके निम्न प्रभाजों का उपयोग कपड़ों से ग्रीस के धब्बे हटाने, उनकी निजर्ल धुलाइर् करने आदि के लिए किया जाता है।इस प्रेक्षण के आधार पर ग्रीसी पदाथा±े की प्रकृति के बारे में आप क्या सोचते हैं? आप सही हैं यदि आप कहते हैं कि ग्रीस ;उच्च ऐल्केनों का मिश्रणद्ध अध्रुवीय है अतः यह जलविरोधी प्रकृति का होगा तो विलायकों में पदाथो± की विलेयता के संबंध में सामान्यतः यह देखा गया है कि ध्रुवीय पदाथर्, धु्रवीय विलायकों जबकि अधु्रवीय पदाथर् अधु्रवीय विलायकों में विलेय होते हैं, अथार्त् फ्समान समान को घोलता हैय्। विभ्िान्न एल्केनों के क्वथनांक सारणी 13.1 में दिए गए हैं, जिसमें यह स्पष्ट है कि आण्िवक द्रव्यमान में वृि के साथ - साथ उनके क्वथनांकों में भी नियत वृि होती है। यह इस तथ्य पर आधारित है कि आण्िवक आकार अथवा अणु का पृष्ठीय क्षेत्रापफल बढ़ने के साथ - साथ उनमें आंतराण्िवक वान्डरवाल्स बल बढ़ते हैं। पेन्टेन के तीन समावयव ऐल्केनों ;पेन्टेन, 2 - मेथ्िाल ब्यूटेन तथा 2, 2 - डाइमेथ्िालप्रोपेनद्ध के क्वथनांकों को देखने से यह पता लगता है कि पेन्टेन में पाँच काबर्न परमाणुओं की एक सतत् शंृखला का उच्च क्वथनांक ;309ण्1ज्ञद्ध है, जबकि 2.2 - डाइमेथ्िालप्रोपेन 282ण्5ज्ञ पर उबलती है। शाख्िात शंृखलाओंकी संख्या के बढ़ने के साथ - साथ अणु की आकृति लगभग गोल हो जाती है, जिससे गोलाकार अणुओं में कम आपसी संपवर्फ स्थल तथा दुबर्ल अंतराण्िवक बल होते हैं। इसलिए इनके क्वथनांक कम होते हैं। रासायनिक गुणधमर् जैसा पहले बताया जा चुका हैμ अम्ल, क्षारक, आॅक्सीकारक ;आॅक्सीकरण कमर्कद्ध एवं अपचायक ;अपचयन कमर्कद्ध पदाथो± के प्रति ऐल्केन सामान्यतः निष्िक्रय होते हैं। विशेष परिस्िथतियों में ऐल्केन इन अभ्िाियाओं को प्रद£शत करता हैμ रसायन विज्ञान 1. प्रतिस्थापन अभ्िाियाएं एल्केन के एक या अिाक हाइड्रोजन परमाणु हैलोजन, नाइट्रोजन तथा सल्पफोनिक अम्ल द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। उच्च तापक्रम ;573.773 ज्ञद्ध या सूयर् के विसरित प्रकाश या पराबैगनी विकिरणों की उपस्िथति में हैलोजेनीकरण होता है। कम अणुभार वाले ऐल्केन नाइट्रीकरण तथा सल्पफोनीकरण नहीं दशार्ते हैं। वे अभ्िाियाओं, जिनमें ऐल्केनों के हाइड्रोजन परमाणु प्रतिस्थापित हो जाते हैं, को प्रतिस्थापन अभ्िाियाएं कहते हैं। उदाहरणस्वरूप मेथैन का क्लोरीनीकरण नीचे दिया गया हैμ हैलोजनीकरण या हेलोजनन ब्भ्ब्स ीअब्भ् ब्स भ्ब्स ;13ण्10द्ध4 2 3 क्लोरोमेथेन ब्भ्ब्स ब्स ीअ ब्भ् ब्स भ्ब्स ;13ण्11द्ध32 22 डाइक्लोरोएथेन ब्भ्ब्स ब्स ीअ ब्भ्ब्स भ्ब्स ;13ण्12द्ध222 3 ट्राइक्लोरोमेथेन ब्भ्ब्स ब्स ीअब्ब्स भ्ब्स ;13ण्13द्ध3 2 4 टेट्राक्लोरोमेथेन ब्भ्.ब्भ् ब्स ीअ ब्भ् ब्भ्ब्स भ्ब्स ;13ण्14द्ध3 32 32 क्लोरोएथेन एल्केनों की हैलोजन के साथ अभ्िािया की गति का क्रम थ्झझझब्सझझठतझप्है। ऐल्केनों के हाइड्रोजन के2222 विस्थापन की दर 3°झ2°झ1° है। फ्रलुओरीनीकरण प्रचंड व अनियंत्रिात होता है जबकि आयोडीनीकरण बहुत धीमे होता है। यह एक उत्क्रमणीय अभ्िािया है। यह अभ्िािया आॅक्सीकारक ;जैसे भ्प्व्या भ्छव्द्धकी उपस्िथति में होती है। 33ब्भ् ़प् ़ब्भ्प् भ्प् ;13ण्15द्ध42 3 भ्प्व् ़5भ्प्→ 3प् ़3भ् व् ;13ण्16द्ध3 22 हैलोजनीकरण मुक्त मूलक शंृखला ियावििा द्वारा इन तीन पदोंμ प्रारंभन ;पदपजपंजपवदद्धए संचरण ;चतवचंहंजपवदद्ध तथा समापन ;जमतउपदंजपवदद्ध के द्वारा संपन्न होता है। ियावििा ;पद्ध प्रारंभन - यह अभ्िािया वायु तथा प्रकाश की उपस्िथति में क्लोरीन अणु के समअपघटन ;ीवउवसलेपेद्ध से प्रारंभ होती है। ब्सदृब्स आबंध, ब्.ब् तथा ब्.भ् आबंध् की तुलना में दुबर्ल है अतः यह आसानी से टूट जाता है। ीअ ब्सब्स ब्स ब्स सभाश्ंा विदलन क्लोरीन मुक्त - मूलक ;पपद्ध संचरण - क्लोरीन मुक्त - मूलक, मेथेन अणु पर आक्रमण करके ब्.भ् आबंध को तोड़कर भ्ब्स बनाते हुए मेथ्िाल मुक्त मूलक बनाते हैं, जो अभ्िािया को अग्र दिशा में ले जाते हैं। ीअ;कद्ध ब्भ् ़ब्स ⎯⎯⎯→ब्भ् ़भ्−ब्स 4 3 मेथ्िाल मुक्त - मूलक क्लोरीन के दूसरे अणु पर आक्रमण करके ब्भ्.ब्स तथा एक अन्य क्लोरीन मुक्त - मूलक बनाते हंै,3जो क्लोरीन अणु के समांशन के कारण बनते हैं। ;खद्ध ीअ ऽ ब्भ् ब्स ़ब्स−ब्स⎯⎯⎯ब्भ् −ब्स ़ब्स 3 → 3 क्लारेीन मक्ुत - मलूक मेथ्िाल तथा क्लोरीन मुक्त - मूलक, जो उपरोक्त पदों क्रमशः ;कद्ध तथा ;खद्ध से प्राप्त होते हैं, पुनः व्यवस्िथत होकर शंृखला अभ्िािया का प्रारंभ करते हैं। संचरण पद ;कद्ध एवं ;खद्ध सीध्े ही मुख्य उत्पाद देते हैं किंतु अन्य कइर् संचरण पद संभव हैं ऐसे दो पद निम्नलिख्िात हैं जो अध्िक हैलोजनयुक्त उत्पादों के निमार्ण को समझाते हैं। ब्भ् ब्स़ब्स → ब्भ् ब्स़भ्ब्स 32 2 ़ ब्स दृब्स → 2 ़ब्स ब्भ्ब्स ब्भ्ब्स 2 369 ;पपपद्ध शंृखला समापन - वुफछ समय पश्चात् अभ्िाकमर्क की समाप्ित तथा विभ्िान्न पाश्वर् अभ्िाियाओं के कारण अभ्िािया समाप्त हो जाती है। विभ्िान्न संभावित शंृखला समापन पद निम्नलिख्िात हैंः ;कद्ध ब्स ़ब्स → ब्स−ब्स ;खद्ध भ्ब् ़ ब्भ् → भ्ब् −ब्भ् 3 333 ;गद्ध भ्ब् ़ ब्स → भ्ब् −ब्स 33 यद्यपि पद ;गद्ध में ब्भ्.ब्स एक उत्पाद बनता है, ¯कतु3ऐसा होने में मुक्त मूलकों की कमी हो जाती है। मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन का उपोत्पाद ;इलचतवकनबजद्ध के रूप में बनने के कारण को उपरोक्त ियावििा द्वारा समझा जा सकता है। 2. दहन ऐल्केन वायु तथा डाइआॅक्सीजन की उपस्िथति में गरम करनेपर पूणर्तः आॅक्सीकृत होकर काबर्न डाइआॅक्साइड और जलबनाते हैं तथा साथ ही अध्िक मात्रा में ऊष्मा निकलती है। ब्भ् ;हद्ध ़2व् ;हद्ध ⎯⎯→ब्व् ;हद्ध ़2भ् व्;सद्धय 42 22 −Δबभ्ट त्र−890 ाश्र उवस−1 ;13ण्17द्ध ब् भ् ;हद्ध 13ध्2 व् ;हद्ध ़ ⎯⎯4ब्व् ;हद्ध 5भ् व्;सद्धय →़410 2 22 −Δबभ्ट त्र−2875ण्84 ाश्र उवस−1 ;13ण्18द्ध सारणी 13.1 ऐल्केनों के क्वथनांकों एवं गलनांकों में परिवतर्न आण्िवक सूत्रा नाम अणु भार ;नद्ध क्वथनांक ;ज्ञद्ध गलनांक;ज्ञद्ध ब्भ्4 मेथेन 16 111ण्0 90ण्5 ब्2भ्6 एथेन 30 184ण्4 101ण्0 ब्3भ्8 प्रोपेन 44 230ण्9 85ण्3 ब्4भ्10 ब्यूटेन 58 272ण्4 134ण्6 ब्4भ्10 2.मेथ्िालप्रोपेन 58 261ण्0 114ण्7 ब्5भ्12 पेन्टेन 72 309ण्1 143ण्3 ब्5भ्12 2.मेथ्िालब्यूटेन 72 300ण्9 113ण्1 ब्5भ्12 2, 2 - डाइमेथ्िालप्रोपेन 72 282ण्5 256ण्4 ब्6भ्14 हेक्सेन 86 341ण्9 178ण्5 ब्7भ्16 हेप्टेन 100 371ण्4 182ण्4 ब्8भ्18 आॅक्टेन 114 398ण्7 216ण्2 ब्9भ्20 नोनेन 128 423ण्8 222ण्0 ब्10भ्22 डेकेन 142 447ण्1 243ण्3 ब्20भ्42 आइकोसेन 282 615ण्0 236ण्2 किसी ऐल्केन के लिए सामान्य दहन अभ्िािया निम्नलिख्िात होती हैμ ⎛3द 1 ⎞ब्भ् ़़ व् ⎯⎯→दब्व् ़;द ़1द्धभ् व् द 2द ़2 ⎜⎟ 2 22⎝ 2 ⎠ ;13ण्19द्ध अध्िक मात्रा में ऊष्मा निकलने के कारण ऐल्केनों को ईंधन के रूप में काम में लेते हैं। ऐल्केनों का अपयार्प्त वायु तथा डाइआॅक्सीजन द्वारा अपूणर् दहन से काबर्न कज्जल ;ठसंबाद्ध बनता है, जिसका उपयोग स्याही, मुद्रण स्याही के काले वणर्क ;चपहउमदजेद्ध एवं पूरक ;पिससमतद्ध के रूप में होता है। अपण्ूार् दहन ब्भ् ;हद्ध व् ;हद्ध ब्;ेद्ध 2भ् व्;सद्ध ;13ण्20द्ध42 2 3ण् नियंत्रिात आॅक्सीकरण उच्च दाब, डाइआॅक्सीजन तथा वायु के सतत् प्रवाह के साथ उपयुक्त उत्पे्ररक की उपस्िथति में ऐल्केनों को गरम करने पर कइर् प्रकार के आॅक्सीकारक उत्पाद बनते हैं। ब्नध्523ज्ञध्100 वायुपद्ध 2ब्भ् व् 2ब्भ्व्भ् 42 3 मथ्ेानेालॅ ;13ण्21द्ध डव व् 23पपद्ध ब्भ् ़व् ⎯⎯⎯→ भ्ब्भ्व़्भ्व् 4 2 Δ 2 ;13ण्22द्ध मथ्ेानेालॅ ;ब्भ् ब्व्व्द्ध डद 3 2़पपपद्ध 2ब्भ् ब्भ् ़3व् ⎯⎯⎯⎯⎯⎯→2ब्भ् ब्व्व्भ् 2भ् व् 33 2 Δ 32 एथनेाइॅकअम्ल ;13ण्23द्ध ;पअद्ध साधारणतः ऐल्केनों का आॅक्सीकरण नहीं होता, ¯कतु तृतीयक हाइड्रोजन ;भ्द्ध परमाणु वाले ऐल्केन पोटैश्िायमपरमैंगनेट से आॅक्सीकृत होकर संगत ऐल्कोहाॅल देते हैं। ज्ञडदव्4;ब्भ् द्धब्भ् ⎯⎯⎯⎯;ब्भ् द्ध ब्व्भ् →33 आक्ॅसीकरण 33 2 - मेथ्िालप्रोपेन 2 - मेथ्िालप्रोपेन - 2 - आॅल ;13ण्24द्ध 4. समावयवीकरण या समावयवन ददृ ऐल्केन को निजर्ल ऐलुमीनियम क्लोराइड तथा हाइड्रोजन क्लोराइड गैस की उपस्िथति में गरम करने पर वे उनके शाख्िातशंृखला वाले ऐल्केनों में समावयवीकृत हो जाते हैं। मुख्य उत्पाद नीचे दिए गए हैं तथा अन्य अल्प उत्पाद के बनने की संभावना भी होती है, जिसे आप सोच सकते हैं। अल्प उत्पादों का वणर्न समान्यत काबर्निक अभ्िाियाओं में नहीं किया जाता है। निजलर् ।सब्स ध्भ्ब्स 3ब्भ्;ब्भ् द्धब्भ् ⎯⎯⎯⎯⎯⎯→3 24 3 द.हक्ेसने − −3 2 2 ब्भ् ब्भ् ;ब्भ् द्ध ब्भ् 3 ब्भ् ब्भ् ़ 3 −2 ब्भ् ब्भ् − −2 ब्भ् 3 द्य द्य 3ब्भ् 3ब्भ् 2 - मेथ्िालपेन्टेन 3 - मेथ्िालपेन्टेन ;13ण्25द्ध 5. ऐरोमैटीकरण या ऐरोमैटन छः या छः से अिाक काबर्न परमाणु वाले ददृ ऐल्केन ऐलुमिना आधारित वैनेडियम, मालिब्डेनम तथा क्रोमियम के आॅक्साइड की उपस्िथति में 773ज्ञ तथा 10 से 20 वायुमंडलीय दाब परगरम करने से विहाइड्रोजनीकृत होकर बेन्जीन या उसके सजातीयव्युत्पन्न में चक्रीकृत हो जाते हैं। इस अभ्िािया को ऐरोमैटीकरण ;।तवउंजप्रंजपवदद्ध या पुनस±भवन ;त्मवितउपदहद्ध कहते हैं। ;13ण्26द्ध टाॅलूइर्न, बेन्जीन का मेथ्िाल व्युत्पन्न है। टाॅलूइर्न के विरचन के लिए आप कौन सी ऐल्केन सुझाएंगे। 6. भाप के साथ अभ्िािया मेथेन भाप के साथ निवैफल उत्पे्ररक की उपस्िथति में 1273ज्ञ पर गरम करने पर काबर्न मोनोआॅक्साइड तथा डाइहाइड्रोजन देती है। यह वििा डाइहाॅइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन में अपनाइर् जाती है। छपब्भ् ़भ्व् ⎯⎯→ ब्व़्3भ् ;13ण्27द्ध42 Δ 2 7. ताप - अपघटन उच्चतर ऐल्केन उच्च ताप पर गरम करने पर निम्नतर ऐल्केनोंया एल्कीनों में अपघटित हो जाते हैं। ऊष्मा के अनुप्रयोग से छोटे विखंड बनने की ऐसी अपघटनी अभ्िािया को ताप - अपघटन ;चलतवसलेपेद्ध या भंजन ;बतंबापदहद्ध कहते हैं। ;13ण्28द्ध एल्केनों का भंजन एक मुक्त - मूलक अभ्िािया मानी जाती है। विफरोसिन तेल या पेट्रोल से प्राप्त तेल गैस या पेट्रोल गैस बनाने में भंजन के सि(ांत का उपयोग होता है। उदाहरणस्वरूप डोडेकेन ;जो विफरोसिन तेल का घटक हैद्ध को 973ज्ञ पर प्लैटिनम, पैलेडियम अथवा निवैफल की उपस्िथति में गरम करने पर हेप्टेन तथा पेन्टीन का मिश्रण प्राप्त होता है। ब्भ् ⎯⎯⎯⎯ब्भ् ़973ज्ञ → ब्भ् ़ अन्य उत्पाद1226 716 510 च्जध्च्कध्छप डोडेकेन हेप्टेन ेपन्टीन ;13ण्29द्ध 13.2.4 संरूपण ऐल्केनों में काबर्न - काबर्न सिग्मा ;σद्ध आबंध होता है। काबर्न - काबर्न ;ब्दृब्द्ध आबंध के अंतरनाभ्िाकीय अक्ष के चारों ओर सिग्मा आण्िवक कक्षक के इलेक्ट्राॅन का वितरण सममित होता है। इस कारण ब्दृब् एकल आबंध के चारों ओर मुक्त घूणर्न होता है। इस घूणर्न के कारण त्रिाविम में अणुओं के विभ्िान्न त्रिाविमीय विन्यास होते हैं। पफलतः विभ्िान्न समावयव एक - दूसरे में परिव£तत हो सकते हैं। ऐसे परमाणुओं की त्रिाविम व्यवस्थाएँ ;जो ब्दृब् एकल आबंध के घूणर्न के कारण एक - दूसरे में परिव£तत हो जाती हंैद्ध संरूपण, संरूपणीय समावयव या घूणीर् ;त्वजंउमतेद्ध कहलाती हैं। अतः ब्दृब् एकल आबंध के घूणर्न के कारण ऐल्केन में असंख्य संरूपण संभव है। यद्यपि यह ध्यान रहे कि ब्दृब् एकल आबंध का घूणर्न पूणर्तः मुक्त नहीं होता है। यह प्रतिकषर्ण अन्योन्य िया के कारण होता है। यह 1 से 20 ाश्रउवसदृ1 तक ऊजार् द्वारा बािात है। निकटवतीर् काबर्न परमाणुओं के मध्य इस क्षीण बल को मरोड़ी विकृति ;जवतेपवदंस ेजतंपदद्ध कहते हैं। एथेन के संरूपण: एथेन अणु में काबर्न - काबर्न एकल आबंध होता है, जिसमें प्रत्येक काबर्न परमाणु पर तीन हाइड्रोजन परमाणु जुड़े रहते हैं। एथेन के बाॅल एवं स्िटक माॅडल को लेकर यदि हम एक काबर्न को स्िथर रखकर दूसरे काबर्न परमाणु को ब्दृब् अक्ष पर घूणर्न कराएं, तो एक काबर्न परमाणु के हाइड्रोजन दूसरे काबर्न परमाणु के हाइड्रोजन के संदभर् में असंख्य त्रिाविमीय व्यवस्था प्रद£शत करते हैं। इन्हें संरूपणीय समावयव ;संरूपणद्ध कहते हैं। अतः ऐथेन के असंख्य संरूपण होते हैं। हालाँकि इनमें से दो संरूपण चरम होते हैं। एक रूप में दोनों काबर्न के हाइड्रोजन परमाणु एक - दूसरे के अिाक पास हो जाते हैं। उसे ग्रस्त ;म्बसपचेमकद्ध रूप कहते हैं। दूसरे रूप में, हाइड्रोजन परमाणु दूसरे काबर्न के हाइड्रोजन परमाणुओं से अिाकतम दूरी पर होते हैं। उन्हें सांतरित ;ेजंहहमतमकद्ध रूप कहते हैं। इनके अलावा कोइर् भी मध्यवतीर् संरूपण विषमतलीय ;ेामूद्ध संरूपण कहलाता है। यह ध्यान रहे कि सभी संरूपणों में आबंध कोण तथा आबंध लंबाइर् समान रहती है। ग्रस्त तथा सांतरित तथा संरूपणों को साॅहासर् तथा न्यूमैन प्रक्षेप ;छमूउमद चतवरमबजपवदद्ध द्वारा प्रद£शत किया जाता है। 1. साॅहासर् प्रक्षेप इस प्रक्षेपण में अणु को आण्िवक अक्ष की दिशा में देखा जाता है। कागज पर वेंफद्रीय ब्दृब् आबंध को दिखाने के लिए दाईं या बाईं ओर झुकी हुइर् एक सीधी रेखा खींची जाती है। इस रेखा को वुफछ लंबा बनाया जाता है। आगे वाले काबर्न को नीचे बाईंओर तथा पीछे वाले काबर्न को ऊपर दाईं ओर से प्रद£शत करते हैं। प्रत्येक काबर्न से संलग्न तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को तीन रेखाएँ खींचकर दिखाया जाता है। ये रेखाएँ एक - दूसरे से 120° का कोण बनाकर झुकी होती हैं। एथेन के ग्रस्त एवं सांतरित साॅहासर् प्रक्षेप चित्रा 13.2 में दशार्ए गए हैं। चित्रा 13.2 एथेन के साहासर् प्रक्षेप 2. न्यूमैन प्रक्षेप इस प्रक्षेपण में अणु को सामने से देखा जाता है। आँख के पास वाले काबर्न को एक ¯बदु द्वारा दिखाया जाता है और उससे जुड़े तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को 120° कोण पर खींची तीन चित्रा 13.3 एथेन के न्यूमैन प्रक्षेप रेखाओं के सिरों पर लिखकर प्रद£शत किया जाता है। पीछे;आँख से दूरद्ध वाले काबर्न को एक वृत्त द्वारा दशार्ते हैं तथाइसमें आबंिात हाइड्रोजन परमाणुओं को वृत्त की परििा से परस्पर 120° के कोण पर स्िथत तीन छोटी रेखाओं से जुड़े हुए दिखाया जाता है। एथेन के न्यूमैन प्रक्षेपण चित्रा 13.3 में दिखाए गए हैं। संरूपणों का आपेक्ष्िाक स्थायित्व: जैसा पहले बताया जा चुका है, एथेन के सांतरित रूप में काबर्न - हाइड्रोजन आबंध के इलेक्ट्राॅन अभ्र एक - दूसरे से अिाकतम दूरी पर होते हैं। अतःउनमें न्यूनतम प्रतिकषणर् बल न्यूनतम ऊजार् तथा अणु का अिाकतम स्थायित्व होता है। दूसरी ओर, जब सांतरित को ग्रस्त रूप में परिव£तत करते हैं, तब काबर्न - हाइड्रोजन आबंध के इलेक्ट्राॅन अभ्र एक - दूसरे के इतने निकट होते हैं कि उनके इलेक्ट्राॅन अभ्रों के मध्य प्रतिकषर्ण बढ़ जाता है। इस बढ़े हुएप्रतिकषीर् बल को दूर करने के लिए अणु में वुफछ अिाक ऊजार् निहित होती है। इसलिए इसका स्थायित्व कम हो जाता है। जैसा पहले बताया जा चुका है, इलेक्ट्राॅन अभ्र के मध्य प्रतिकषीर् अन्योन्य िया, जो संरूपण के स्थायित्व को प्रभावित करती है, को मरोड़ी विकृति कहते हैं। मरोड़ी विकृति का परिणाम ब्दृब् एकल आबंध के घूणर्न कोण पर निभर्र करता है। इस कोण को द्वितल कोण या मरोड़ी कोण भी कहते हैं। एथेन के सभी संरूपणों में मरोड़ी कोण सांतरित रूप में न्यून्तम तथा ग्रस्त रूप में अिाकतम होता है। अतः यह निष्कषर् निकाला जाता है कि एथेन में ब्दृब् ;आबंधद्ध का घूणर्न पूणर्तःमुक्त नहीं है। दो चरम रूपों के मध्य ऊजार् का अंतर 12ण्5 ाश्र उवसदृ1 है, जो बहुत कम है। सामान्य ताप पर अंतराण्िवक संघट्यों ;ब्वससपेपवदेद्ध के द्वारा एथेन अणु मेंतापीय तथा गतिज ऊजार् होती है, जो 12ण्5 ाश्र उवसदृ1 के ऊजार् - अवरोध को पार करने में सक्षम होती है। अतः एथेन में काबर्न - काबर्न एकल आबंध का घूणर्न सभी प्रायोगिक कायर् के लिए लगभग मुक्त है। एथेन के संरूपणों को पृथव्फ तथा वियोजित करना संभव नहीं है। 13.3 एल्कीन एल्कीन द्विआबंधयुक्त असंतृप्त हाइड्रोकाबर्न होते हैं। एल्कीनों का सामान्य सूत्रा क्या होना चाहिए? अगर एल्कीन में दो काबर्न परमाणुओं के मध्य एक द्विआबंध उपस्िथत है, तो उनमें ऐल्केन से दो हाइड्रोजन परमाणु कम होने चाहिए। इस प्रकार एल्कीनों का सामान्य सूत्रा ब्भ्होना चाहिए। एल्कीनों के प्रथम सदस्यद 2द एथ्िालीन अथवा एथीन ;ब्भ्द्ध की अभ्िािया क्लोरीन से24कराने पर तैलीय द्रव प्राप्त होता है। अतः एल्कीनों को ओलीपफीन ;तैलीय यौगिक बनाने वालेद्ध भी कहते हैं। 13.3.1 द्विआबंध की संरचना एल्कीनों में ब् त्र ब् द्विआबंध है, जिसमें एक प्रबल सिग्मा ;σद्ध आबंध ;बंध एंथैल्पी लगभग 397 ाश्रउवसदृ1 हैद्ध होता है, जो दो काबर्न परमाणुओं के ेच2 संकरित कक्षकों के सम्मुख अतिव्यापन से बनता है। इसमें दो काबर्न परमाणुओं के 2च असंकरित कक्षकों के संपा£श्वक अतिव्यापन करने पर एक दुबर्ल पाइर् ;πद्ध बंध, ;बंध एन्थैल्पी 284 ाश्र उवसदृ1 हैद्ध बनता है। ब्दृब् एकल आबंध लंबाइर् ;1ण्54 चउद्ध की तुलना में ब् त्र ब् द्विआबंध लंबाइर् ;1ण्34 चउद्ध छोटी होती है। आपने पूवर् में अध्ययन किया है कि पाइर् ;πद्ध आबंध दो च कक्षकों के दुबर्ल अतिव्यापन के कारण दुबर्ल होते हैं। अतः पाइर् ;πद्ध आबंध वाले एल्कीनों को दुबर्ल बंध्ित गतिशील इलेक्ट्राॅनों का स्रोत कहा जाता है। अतः एल्कीनों पर उन अभ्िाकमर्कों अथवा यौगिकों, जो इलेक्ट्राॅन की खोज में हों, का आक्रमण आसानी से हो जाता है। ऐसे अभ्िाकमर्कों को इलेक्ट्राॅनस्नेही अभ्िाकमर्क कहते हैं। दुबर्ल π आबंध की उपस्िथति एल्कीन अणुओं को ऐल्केन की तुलना में अस्थायी बनाती है। अतः एल्कीन इलेक्ट्राॅनस्नेही अभ्िाकमर्कों के साथ संयुक्त होकर एकल आबंध - युक्त यौगिक बनाते हैं। ब्दृब् द्विआबंध की सामथ्यर् ;बंध एंथैल्पी, 681 ाश्र उवसदृ1द्ध एथेन के काबर्न - काबर्न एकल आबंध ;आबंध एंथैल्पी, 348 ाश्र उवसदृ1द्ध की तुलना में अिाक होती है। एथीन अणु का कक्षक आरेख चित्रा - संख्या 13.4 तथा 13.5 में दशार्या गया है। चित्रा 13.4 एथीन का कक्षीय आरेख केवल σ बंधों को चित्रिात करते हुए 13.3.2 नाम - प(ति एल्कीनों के आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम प(ति के लिए द्विआबंध युक्त दीघर्तम काबर्न परमाणुओं की शंृखला में, अनुलग्न ‘ऐन’ के स्थान पर अनुलग्न ‘इर्न’ ;मदमद्ध का प्रयोग किया जाता है। स्मरण रहे कि एल्कीन श्रेणी का प्रथम सदस्य हैः ब्भ्2 चित्रा 13.5 एथीन का कक्षीय आरेख ;कद्ध π आबंध बनना ;खद्धπदृ अभ्र का बनना तथा ;गद्ध आबंध कोण तथा आबंध लंबाइर् ;ब्भ्में द को 1 द्वारा प्रतिस्थापित करने परद्ध, जिसे मेथेन द 2द कहते हैं। इसकी आयु अल्प होती है। जैसा पहले प्रद£शत किया गया है, एल्कीन श्रेणी के प्रथम स्थायी सदस्य ब्भ्को24 एथ्िालीन ;सामान्य नामद्ध या एथीन ;आइर्.यू.पी.ए.सी. नामद्ध कहते हैं। वुफछ एल्कीनों सदस्यों के आइर्.यू.पी.ए.सी नाम नीचे दिए गए हैंμ संरचना ब्भ्3 दृ ब्भ् त्र ब्भ्2 ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् त्र ब्भ्2 ब्भ्3 दृ ब्भ् त्र ब्भ्दृब्भ्3 ब्भ्2 त्र ब्भ् दृ ब्भ् त्र ब्भ्2 ब्भ्2 त्र ब् दृ ब्भ्3 द्य ब्भ्3 1 234 ब्भ्2 त्र ब्भ् दृ ब्भ् दृ ब्भ्3 द्य ब्भ्3 प्न्च्।ब् नाम प्रोपीन ब्यूट दृ स .इर्न ब्यूट दृ 2 .इर्न ब्यूट दृ सए 3 .डाइइर्न 2 - मेथ्िालप्रोप - 1 - इर्न 3 - मेथ्िालब्यूट - 1 - इर्न उदाहरण 13.7 निम्नलिख्िात यौगिकों के आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम लिख्िाए - ;पद्ध ;ब्भ्3द्ध2ब्भ् दृ ब्भ् त्र ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ् लब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ् द्य ब्2भ्5 ;पपद्ध ;पपपद्ध ब्भ्2 त्र ब् ;ब्भ्2ब्भ्2ब्भ्3द्ध2 ;पअद्ध ब्भ्3 ब्भ्2 ब्भ्2 ब्भ्2 ब्भ्2ब्भ्3 द्य द्य ब्भ्3 दृ ब्भ्ब्भ् त्र ब् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्ब्भ्3द्य ब्भ्3 हल ;पद्ध 2, 8 - डाइमेथ्िालडेका - 3, 6 - डाइर्न ;पपद्ध 1, 3, 5, 7 दृ आॅक्टाटेट्राइर्न ;पपपद्ध 2दृददृप्रोपिलपेन्ट - 1दृ इर्न ;पअद्ध 4दृएथ्िाल - 2,6 - डाइमेथ्िाल - डेक - 4 - इर्न उदाहरण 13.8 ऊपर दी गईं संरचनाओं ;प.पअद्ध में सिग्मा ;σद्ध तथा पाइर् ;πद्ध आबंधों की संख्या का परिकलन कीजिए। हल ;पद्ध σ बंध रू 33, π बंध रू 2 ;पपद्ध σ बंध रू 17, π बंध रू 4 ;पपपद्ध σ बंध रू 23, π बंध रू 1 ;पअद्ध σ बंध रू 41, π बंध रू 1 13.3.3 समावयता एल्कीनों द्वारा संरचनात्मक एवं ज्यामितीय समावयवता प्रद£शत की जाती है। संरचनात्मक समावयवता - एल्केनों की भाँति एथीन ;ब्भ्द्ध24तथा प्रोपीन ;ब्भ्द्ध में केवल एक ही संरचना होती है, ¯कतु36प्रोपीन से उच्चतर एल्कीनों में भ्िान्न संरचनाएं होती हैं। ब्भ्अणुसूत्रा वाली एल्कीन को तीन प्रकार से लिख 48 सकते हैं। 1 234 ब्भ्2 त्र ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 प्ण् ब्यूट - 1 - इर्न 1 234 ब्भ्3 दृ ब्भ् त्र ब्भ् दृ ब्भ्3 प्प्ण् ब्यूट - 2 - इर्न 1 23 ब्भ्2 त्र ब् दृ ब्भ्3 द्य ब्भ्3 प्प्प्ण् 2 - मेथ्िालप्रोप - 1 - इर्न संरचना प् एवं प्प्प् तथा प्प् एवं प्प्प् शंृखला समावयवता के उदाहरण हैं, जबकि संरचना प् एवं प्प् स्िथति समावयव हैं। उदाहरण 13.9 ब्5भ्10 के संगत एल्कीनों के विभ्िान्न संरचनात्मक समावयवियों के संरचना - सूत्रा एवं आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम लिख्िाए। हल ;कद्धब्भ्2 त्र ब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 पेन्ट - 1 - इर्न ;खद्धब्भ्3 दृ ब्भ्त्रब्भ् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 पेन्ट - 2 - इर्न ;गद्धब्भ्3 दृ ब् त्र ब्भ् दृ ब्भ्3 द्य ब्भ्3 2 - मेथ्िालब्यूट - 2 - इर्न ;घद्धब्भ्3 दृ ब्भ् दृ ब्भ् त्र ब्भ्2 द्य ब्भ्3 3 - मेथ्िालब्यूट - 1 - इर्न ;घद्धब्भ्2 त्र ब् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 द्य ब्भ्3 2 - मेथ्िालब्यूट - 1 - इर्न ज्यामितीय समावयवता: द्विआबंिात काबर्न परमाणुओं की बची हुइर् दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जुड़कर संतुष्ट करते हैं। अगर प्रत्येक काबर्न से जुड़े दो परमाणु या समूह भ्िान्न - भ्िान्न हैं तो इसे ल्ग्ब्त्रब्ग्ल् द्वारा प्रद£शत करते हैं। ऐसी संरचनाओं को दिव्फ में इस प्रकार प्रद£शत किया जाता हैμ संरचना ‘क’ में एक समान दो परमाणुओं ;दोनों ग् या दोनों ल्द्ध द्विआबंिात काबर्न परमाणुओं के एक ही ओर स्िथत होते हैं। संरचना ‘ख’ में दोनों ग् अथवा दोनों ल् द्विआबंध काबर्न की दूसरी तरपफ या द्विआबंिात काबर्न परमाणु के विपरीत स्िथत होते हैं, जो विभ्िान्न ज्यामिति समावयवता दशार्ते हैं, जिसका दिव्फ में परमाणु या समूहों की भ्िान्न स्िथतियों के कारण विन्यास भ्िान्न होता है। अतः ये त्रिाविम समावयवी ;ेजमतमवपेवउमतद्ध हैं। इनकी समान ज्यामिति तब होती है, जब द्विआबंिात काबर्न परमाणुओं या समूहों का घूणर्न हो सकता है, ¯कतु ब्त्रब् द्विआबंध में मुक्त घूणर्न नहीं होता। यह प्रतिबंिात होता है। इस तथ्य को समझने के लिए दो सख्त काडर्बोडर् के टुकड़े लीजिए और दो कीलों की सहायता से उन्हें संलग्न कर दीजिए। एक काडर्बोडर् को हाथ से पकड़कर दूसरे काडर्बोडर् को घू£णत करने का प्रयास कीजिए। क्या वास्तव में आप दूसरे काडर् - बोडर् का घूणर्न कर सकते हैं? नहीं, क्योंकि घूणर्न प्रतिबंिात हैं। अतः परमाणुओं अथवा समूहों के द्विआबंिात काबर्न परमाणुओं के मध्य प्रतिबंिात घूणर्न के कारण यौगिकों द्वारा भ्िान्न ज्यामितियाँ प्रद£शत की जाती हैं। इस प्रकार के त्रिाविम समावयव, जिसमें दो समान परमाणु या समूह एक ही ओर स्िथत हों, उन्हें समपक्ष ;बपेद्ध कहा जाता है, जबकि दूसरे समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह विपरीत ओर स्िथत हों, विपक्ष ;जतंदेद्ध समावयव कहलाते हैं। इसलिए दिव्फ में समपक्ष तथा विपक्ष समावयवों की संरचना समान होती है, ¯कतु विन्यास भ्िान्न होता है। दिव्फ में परमाणुओं या समूहों की भ्िान्न व्यवस्थाओं के कारण ये समावयवी उनके गुणों ;जैसेμगलनांक, क्वथनांक द्विधु्रव आघूणर्, विलेयता आदिद्ध में भ्िान्नता दशार्ते हैं। ब्यूट - 2 - इर्न की ज्यामितीय समावयवता अथवा समपक्ष - विपक्ष समावयवता को निम्नलिख्िात संरचना द्वारा प्रद£शत किया जाता हैμ एल्कीन का समपक्ष रूप विपक्ष की तुलना में अिाक ध्रुवीय होता है। उदाहरणस्वरूपμसमपक्ष ब्यूट - 2 - इर्न का द्विधु्रव आघूणर् 0.350 डिबाइर् है, जबकि विपक्ष ब्यूट - 2 - इर्न का लगभग शून्य होता है। अतः विपक्ष ब्यूट - 2 - इर्न अध्रुवीय है। इन दोनों रूपों की निम्नांकित विभ्िान्न ज्यामितियों को बनाने से यह पाया गया है कि विपक्ष - ब्यूट - 2 - इर्न के दोनों मेथ्िाल समूह, जो विपरीत दिशाओं में होते हैं, प्रत्येक ब्.ब्भ्आबंध के कारण3 धु्रवणता को नष्ट करके विपक्ष रूप को इस प्रकार अध्रुवीय बनाते हैंμ ठोसों में विपक्ष समावयवियों के गलनांक समपक्ष समावयवियों की तुलना में अिाक होते हैं। ज्यामितीय या समपक्ष ;ब्पेद्ध विपक्ष ;ज्तंदेद्ध समावयवता, ग्ल्ब्त्रब्ग्र् तथा ग्ल्ब्त्रब्र्ॅ प्रकार की एल्कीनों द्वारा भी प्रद£शत की जाती है। उदाहरण 13.10 निम्नलिख्िात यौगिकों के समपक्ष ;बपेद्ध तथा विपक्ष ;जतंदेद्ध समावयव बनाइए और उनके आइर्.यू.पी.ए.सीनाम लिख्िाए। हल उदाहरण 13.11 निम्नलिख्िात में से कौन से यौगिक समपक्ष - विपक्ष समावयवता प्रद£शत करते हैं? ;पद्ध ;ब्भ्3द्ध2ब् त्र ब्भ् दृ ब्2भ्5 ;पपद्ध ब्भ्2 त्र ब्ठत2 ;पपपद्ध ब्6भ्5ब्भ् त्र ब्भ् दृ ब्भ्3 ;पअद्ध ब्भ्3ब्भ् त्र ब्ब्स ब्भ्3 हल यौगिक पपप तथा पअ 13.3.4 विरचन 1.एल्काइनों से: एल्काइनों के डाइहाइड्रोजन की परिकलितमात्रा के साथ पैलेडिकृत चारकोल की उपस्िथति में जिसे सल्पफर जैसे विषाक्त यौगिकों द्वारा आंश्िाक निष्िक्रय किया गया हो तो इसके आंश्िाक अपचयन पर एल्कीन प्राप्त होतेहैं। आंश्िाक रूप से निष्िक्रय पैलेडिकृत चारकोल को ¯लडलार अभ्िाकमर्क ;स्पदकसंतश्े बंजंसलेजद्ध कहते हैं। इस प्रकार प्राप्त एल्कीनों की समपक्ष ज्यामिती होती है। एल्काइनों के सोडियम तथा द्रव अमोनिया के साथ अपचयन करने पर विपक्ष समावयव वाले एल्कीन बनते हैं। ;13ण्30द्ध ;13ण्31द्ध च्कध्ब् → ;13ण्32द्ध;पपपद्ध ब्भ्≡ब्भ़्भ् ⎯⎯⎯ब्भ् त्रब्भ्2 22 एथाइन एथीन च्कध्ब् ;पअद्ध ब्भ् ब्ब्भ्भ् ब्भ् ब्भ्ब्भ्3 232 प्रोपाइन प्रोपीन ;13ण्33द्ध क्या इस प्रकार प्राप्त प्रोपीन ज्यामिती समावयवता प्रद£शतकरेगी? अपने उत्तर की पुष्िट के लिए कारण खोजिए। 2.ऐल्िकल हैलाइडों से: ऐल्िकल हैलाइड ;त्.ग्द्ध को ऐल्कोहाॅली पोटाश ;जैसेμऐथेनाॅल में विलेय पोटैश्िायम हाइड्राॅक्साइडद्ध की उपस्िथति में गरम करने पर हैलोजेन अम्ल के अणु के विलोचन पर एल्कीन बनते हैं। इस अभ्िािया को विहाइड्रोहैलोजनीकरण ;या विहाइड्रोहैलोजननद्ध कहते हैं, जिसमें हैलोजन अम्ल का विलोपन होता है। यह एक βदृ विलोपन अभ्िािया का उदाहरण है। चूँकि βदृ काबर्न परमाणु ;जिस काबर्न से हैलोजन परमाणु जुड़ा हो, उसके अगलेकाबर्न परमाणुद्ध से हाइड्रोजन का विलोपन होता है। हैलोजन परमाणु की प्रकृति तथा ऐल्िकल समूह ही अभ्िािया की दर निधार्रित करते हैं। ऐसा देखा गया है कि हैलोजन परमाणु के लिए दर निम्न इस प्रकार हैंμ आयोडीन झ ब्रोमीन झ क्लोरीन, जबकि ऐल्िकल समूहों के लिए यह हैंμ 3° झ 2°झ1°ण् 3.सन्िनध डाइहैलाइडों से: डाइहैलाइड, जिनमें दो निकटवतीर् काबर्न परमाणुओं पर दो हैलोजन परमाणु उपस्िथत हों, सन्िनध डाइहैलाइड कहलाते हैं। सन्िनध डाइहैलाइड ¯शक धातु से अभ्िािया करके र्दग्अणु का विलोपन करके एल्कीन देते हैं।2 इस अभ्िािया को विहैलोजनीकरण या विहैलोजनन कहते हैं। ब्भ् ठत −ब्भ् ठत ़र्द ⎯⎯ब्भ् त्रब्भ् ़र्दठत →2 2 222 ;13ण्35द्ध ब्भ् ब्भ्ठत −ब्भ् ठत ़र्द ⎯⎯ब्भ् ब्भ् →त्रब्भ्32 32 ़र्दठत 2 ;13ण्36द्ध 4.ऐल्कोहाॅलों के अम्लीय निजर्लन से:आपने एकक - 12 में विभ्िान्न सजातीय श्रेण्िायों की नामकरण प(ति का अध्ययन किया है। ऐल्कोहाॅल ऐल्केन के हाइड्राॅक्सी व्युत्पन्न होते हैं। इन्हें त्दृव्भ् से प्रद£शत करते हैं, जहाँ त्त्रब् भ्है। ऐल्कोहाॅलों को सांद्र सल्फ्रयूरिक अम्लद 2द़1 रसायन विज्ञान के साथ गरम करने पर जल के एक अणु का विलोपन होता है। पफलतः ऐल्कीन बनती हैं। चूँकि अम्ल की उपस्िथति में ऐल्कोहाॅल अणु से जल का एक अणु विलोपित होता है, अतः इस अभ्िािया को ऐल्कोहाॅलों का अम्लीय निजर्लीकरण कहते हैं। यह βदृ विलोपन अभ्िािया का उदाहरण है, क्योंकि इसमें दृव्भ् समूह, βदृ काबर्न परमाणु से एक हाइड्रोजन परमाणु हटाता है। ;13ण्37द्ध 13.3.5 गुणधमर् भौतिक गुणधमर् ध्रुवीय प्रकृति में अंतर के अलावा एल्कीन भौतिक गुणधमो± में ऐल्केन से समानता दशार्ती है। प्रथम तीन सदस्य ‘गैस’, अगले चैदह सदस्य ‘द्रव’ तथा उससे अध्िक काबर्न संख्या वाली सदस्य ‘ठोस’ होते हैं। एथीन रंगहीन तथा हलकी मधुर सुगंध् वाली गैस है। अन्य सभी एल्कीन रंगहीन तथा सुगंध्ित, जल में अविलेय, परंतु काबर्निक विलायकों जैसेμबेन्जीन, पेट्रोलियम इर्थर में विलेय होती हंै। आकार में वृि होने के साथ - साथ इसके क्वथनांक में क्रमागत वृि होती है, जिसमें प्रत्येक ब्भ्2 समूह बढ़ने पर क्वथनांक में 20 से 30 ज्ञ तक की वृि होती है। ऐल्केनों के समान सीधी शृंखला वाले एल्कीनों का क्वथनांक समावयवी शाख्िात शंृखला वाले एल्कीनों की तुलना में उच्च होता है। रासायनिक गुणधमर् एल्कीन क्षीण बंध्ित π इलेक्ट्राॅनों के स्रोत होते हैं। इसलिए ये योगज अभ्िाियाएं दशार्ते हैं, जिनमें इलेक्ट्राॅनस्नेही ब्त्रब् द्विबंध पर जुड़कर योगात्मक उत्पाद बनाते हैं। वुफछ अभ्िाकमर्कों के साथ िया मुक्त - मूलक ियावििा द्वारा भी होती है। एल्कीन वुफछ विशेष परिस्िथतियों में मुक्त - मूलक प्रतिस्थापन अभ्िाियाएं प्रद£शत करती हैं। एल्कीन में आॅक्सीकरण तथा ओजोनी अपघटन अभ्िाियाएं प्रमुख हैं। एल्कीन की विभ्िान्न अभ्िाियाओं का संक्ष्िाप्त विवरण इस प्रकार हैμ 1.डाइहाइड्रोजन का संयोजनμ एल्कीन सूक्ष्म पिसे हुए निवैफल, पैलेडियम अथवा प्लैटिनम की उपस्िथति में डाइहाइड्रोजन गैस के एक अणु के योग से ऐल्केन बनाती हैं ;13.2.2द्ध। 2.हैलोजन का संयोजनμ एल्कीन से संयुक्त होकर हैलोजन जैसे ब्रोमीन या क्लोरीन सन्िनध डाइहैलाइड देते हैं, हालाँकि आयोडीन सामान्य परिस्िथतियों में योगज अभ्िािया प्रद£शत नहीं करती। ब्रोमीन द्रव का लाल - नारंगी रंग असंतृप्त स्थान पर ब्रोमीन के जुड़ने के पश्चात् लुप्त हो जाता है। इस अभ्िािया का उपयोग असंतृप्तता के परीक्षण के लिए होता है। एल्कीन पर हैलोजन का योग इलेक्ट्राॅनस्नेही ;इलेक्ट्राॅनरागीद्ध योगज अभ्िािया का उदाहरण है, जिसमें चक्रीय हैलोनियम आयन का निमार्ण सम्िमलित होता है। इसका अध्ययन आप उच्च कक्षा में करेंगे। ;13ण्38द्ध ;पपद्ध ब्भ् दृब्भ्त्रब्भ् ़ब्सदृब्स⎯⎯→ ब्भ् दृब्भ्दृब्भ् 32 32 द्य द्यपा्रपेीनब्स ब्स 1, 2 - डाइक्लोरोप्रोपेन ;13ण्39द्ध 3. हाइड्रोजन हैलाइडों का संयोजनμ हाइड्रोजन हैलाइड, भ्ब्सए भ्ठतए भ्स एल्कीनों से संयुक्त होकर ऐल्िकल हैलाइड बनाते हैं। हाइड्रोजन हैलाइडों की अभ्िाियाशीलता का क्रम इस प्रकार हैः भ्प् झ भ्ठत झ भ्ब्स। एल्कीनों में हैलोजन के योग के समान हाइड्रोजन हैलाइड का योग भी इलेक्ट्राॅनस्नेही योगज अभ्िािया का उदाहरण है। इसे हम सममित तथा असममित एल्कीनों की योगज अभ्िावि्रफयाओं से स्पष्ट करंेगे। सममित एल्कीनों में भ्ठत की योगज अभ्िाियादृसममित एल्कीनों में ;जब द्विआबंध पर समान समूह जुड़े हुए होंद्ध भ्ठत की योगज अभ्िाियाएं इलेक्ट्राॅनस्नेही योगज ियावििा सेसंपÂ होती हैं। ब्भ् त्रब्भ् ़भ्दृठत ⎯⎯→ब्भ् दृब्भ् दृठत ;13ण्40द्ध22 32 ब्भ् दृब्भ् त्रब्भ्दृब्भ् ़भ्ठत⎯→ब्भ् दृब्भ् दृब्भ्ब्भ् 3 3 323 द्य ठत ;13ण्41द्ध असममित एल्कीनों पर भ्ठत का योगज ;माकोर्नीकाॅपफ नियमद्ध प्रोपीन पर भ्ठत का संकलन वैफसे होगा? इसमें दो संभावित उत्पाद प् तथा प्प् हो सकते हैं। ;13ण्42द्ध रूसी रसायनविद् माकोर्नीकाॅपफ ने सन् 1869 में इन अभ्िाियाओं का व्यापक अध्ययन करने के पश्चात् एक नियम प्रतिपादित किया, जिसे माकोर्नीकाॅपफ का नियम कहते हैं। इस नियम के अनुसार, योज्य ;वह अभ्िाकमर्क, जिसका संकलनहो रहा हैद्ध का अिाक ट्टणात्मक भाग उस काबर्न पर संयुक्त होता है, जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो। अतः इस नियम के अनुसार उत्पाद ;प्द्ध 2 - ब्रोमोप्रोपेन अपेक्ष्िात है। वास्तविक व्यवहार में यह अभ्िािया का मुख्य उत्पाद है। अतः माकोर्नीकाॅपफ नियम के व्यापकीकरण को अभ्िािया की ियावििा से अच्छी तरह समझा जा सकता है। ियावििा हाइड्रोजन ब्रोमाइड इलेक्ट्राॅनस्नेही भ़् देता है, जो द्विआबंध पर आक्रमण करके नीचे दिए गए काबर्धनायन ;ब्ंतइवबंजपवदद्ध बनाता हैμ यहाँ ‘क’ कम स्थायी प्राथमिक काबर्ध्नायन है जबकि ‘ख’ अध्िक स्थायी द्वितीयक काबर्ध्नायन है। ;पद्धद्वितीयक काबर्ध्नायन, ;खद्ध प्राथमिक काबर्ध्नायन ;कद्ध की तुलना में अध्िक स्थायी होता है। अतः द्वितीयक काबर् - धनायन प्रधान रूप से बनेगा, क्योंकि यह शीघ्र नि£मत होता है। ;पपद्ध काबर्धनायन ;खद्ध में ठतदृ के आव्रफमण से उत्पाद इस प्रकार बनता हैμ 2 - ब्रोमोप्रोपेन ;मुख्य उत्पादद्ध प्रति माकोर्नीकाॅप़फ योगज अथवा पराॅक्साइड प्रभाव अथवा खराश प्रभावμ पराॅक्साइड की उपस्िथति में असममित एल्कीनों ;जैसेμ प्रोपीनद्ध से भ्ठत का संयोजन प्रति माकोर्नीकाॅपफ नियम से होता है। ऐसा केवल भ्ठत के साथ होता है, भ्ब्स एवं भ्प् के साथ नहीं। इस योगज अभ्िावि्रफया का अध्ययन एमएस. खराश तथा एपफ.आर. मेयो द्वारा सन् 1933 में श्िाकागो विश्वविद्यालय में किया गया। अतः इस अभ्िावि्रफया को पराॅक्साइड या खराश प्रभाव ;ज्ञींतंबी ममििबजद्ध या योगज अभ्िावि्रफया का प्रति माकोर्नीकाॅपफ नियम कहते हैं। ;ब्भ्ब्व्द्ध व् 6522ब्भ् दृब्भ्त्रब्भ् ़भ्ठत⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ब्भ् दृब्भ्→ दृ 32 32 ब्भ् ठत 2 1 - ब्रोमोप्रोपेन 2 - ब्रोमोप्रोपेन ;13.43द्ध पराॅक्साइड प्रभाव, मुक्त - मूलक शृंखला वि्रफयावििा द्वारा होता है, जिसकी ियावििा नीचे दी गइर् है। ;पद्ध समांशन;पपद्ध ब्6भ्5़भ्दृठत ब् भ् ़ठत66उपरोक्त वि्रफया ;पपपद्ध से प्राप्त द्वितीयक मुक्त - मूलक प्राथमिक मुक्त - मूलक की तुलना में अध्िक स्थायी होता है, जिसके कारण 1 - ब्रोमोप्रोपेन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है। यह ध्यान रखने योग्य बात है कि पराॅक्साइड प्रभाव भ्ब्स तथा भ्प् के संकलन में प्रद£शत नहीं होता है। यह इस तथ्य पर आधरित है कि भ्ब्स का आबंध् ;430.5 ाश्र उवस.1द्ध, भ्.ठत के आबंध् ;363.7 ाश्र उवस.1द्ध की तुलना में प्रबल होता है। जो ब्भ्5 मुक्त - मूलक द्वारा विदलित नहीं हो पाता।6यद्यपि भ्प् ;296.8 ाश्र उवस.1द्ध का आबंध् दुबर्ल होता है, परंतु आयोडीन मुक्त - मूलक द्विआबंध् पर जुड़ने की बजाय आपस में संयुक्त होकर आयोडीन अणु बनाते हैं। उदाहरण 13.12 हेक्स - 1 - इर्न की भ्ठत के साथ संकलन अभ्िावि्रफया से प्राप्त उत्पादों के आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम दीजिए। ;पद्ध पराॅक्साइड की अनुपस्िथति में ;पपद्ध पराॅक्साइड की उपस्िथति में। हल 4. सल्फ्रयूरिक अम्ल का संयोजनμ एल्कीनों की ठंडे सांद्र सल्फ्रयूरिक अम्ल से िया माकोर्नीकाॅपफ नियम के अनुसार होती है तथा इलेक्ट्राॅनस्नेही योगज अभ्िावि्रफया द्वारा ऐल्िकल हाइड्रोजन सल्पेफट बनते हैं। ;13ण्44द्ध ;13ण्45द्ध ़5. जल का संयोजनμ एल्कीन, संाद्र सल्फ्रयूरिक अम्ल की वुफछ बूँदों की उपस्िथति में जल के साथ माकोर्नीकाॅपफ नियमानुसार अभ्िावि्रफया करके ऐल्कोहाॅल बनाते हैं। ;13ण्46द्ध 6. आॅक्सीकरणμ एल्कीन ठंडे, तनु, जलीय पोटैश्िायम परमैंगनेट, विलयन ;बेयर अभ्िाकमर्कद्ध के साथ अभ्िावि्रफया करके संनिध् ग्लाइकाॅल बनाती हैं। पोटैश्िायम परमैंगनेट विलयन ;13.47द्ध ;13.48द्ध अम्लीय पोटैश्िायम परमैंगनेट अथवा अम्लीय पोटैश्िायम डाइव्रफोमेट, एल्कीन को कीटोन और अम्ल में आॅक्सीवृफत करते हैं। उत्पाद की प्रकृति, एल्कीन की प्रवृफति तथा प्रायोगिक परिस्िथतियों पर निभर्र करती है। ज्ञडदव् ध्भ् ब्भ् दृब्भ् ब्भ्दृब्भ् 42ब्भ् ब्व्व्भ् 33 3 ब्यटू - 2 - इनर् एथनेाइेक अम्ल ;13.50द्ध 7. ओजोनी अपघटनμ ओजोनी अपघटन में एल्कीन व्3 का संकलन कर ओजोनाइड बनाते हैं और र्द.भ्व् के द्वारा2ओजोनाइड का विदलन छोटे अणुओं में हो जाता है। यह अभ्िावि्रफया एल्कीन तथा अन्य असंतृप्त यौगिकों में द्विआबंध् की स्िथति निश्िचत करने के लिए उपयोग में आती है। ;13.51द्ध ;13.52द्ध 8. बहुलकीकरणμ आप पाॅलिथीन की थैलियों तथा पाॅलिथीन शीट से परिचित होंगे। अध्िक संख्या में एथीन अणुओं का उच्च ताप, उच्च दाब तथा उत्प्रेरक की उपस्िथति में संकलन करने से पाॅलिथीन प्राप्त होती है। इस प्रकार प्राप्त बृहद् अणु बहुलक कहलाते हैं। इस अभ्िावि्रफया को ‘बहुलकीकरण’ या ‘बहुलकन’ कहते हैं। सरल यौगिक, जिनसे बहुलक प्राप्त होते हैं, एकलक कहलाते हैं। 380 उच्चताप/दाबद;ब्भ् त्रब्भ् द्ध ⎯⎯⎯⎯→;दृब्भ् दृब्भ् दृद्ध 22 22दउत्परे्र क ;13ण्53द्धपाॅिलथीन अन्य एल्कीन भी बहुलकीकरण अभ्िािया प्रद£शत करती हैं। उच्चताप/दाबद;ब्भ् दृब्भ् त्रब्भ् द्ध ⎯⎯⎯⎯→ब्भ् ;दृब्भ् दृब्भ् दृद्ध 32 उत्पर32े्र क द पालॅीपाप्रेीन ;13ण्54द्ध बहुलकों का उपयोग प्लास्िटक के थैले, निष्पीडित बोतल, रेपि्रफजरेटर डिश, ख्िालौने, पाइप, रेडियो तथा टी.वी. वैफबिनेट आदि के निमार्ण में किया जाता है। पाॅलिप्रोपीन का उपयोग दूध् के वैफरेट, प्लास्िटक की बाल्िटयाँ तथा अन्य संचलित ;डवनसकमकद्ध वस्तुओं के उत्पादन के लिए किया जाता है, हालाँकि अब पाॅलिथीन तथा पाॅलिप्रोपीन का बृहत् उपयोग हमारे लिए एक ¯चता का विषय बन गया है। 13.4 एल्काइन एल्कीन की तरह एल्काइन भी असंतृप्त हाइड्रोकाबर्न हैं। इनमें दो काबर्न परमाणुओं के मध्य एक त्रिाआबंध् होता है। ऐल्केन तथा एल्कीन की तुलना में, एल्काइन में हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम होती है। इनका सामान्य सूत्रा ब् भ्2द.2 है।द एल्काइन श्रेणी का प्रथम स्थायी सदस्य एथाइन है, जो ऐसीटिलीन नाम से प्रचलित है। ऐसीटिलीन का उपयोग आवर्फ व¯ल्डग के लिए आॅक्सीऐसीटिलीन ज्वाला के रूप में होता है, जो आॅक्सीजन गैस तथा ऐसीटिलीन को मिश्रित करने से बनती है। एल्काइन कइर् काबर्निक यौगिकों के लिए प्रारंभ्िाक पदाथर् है। अतः इस श्रेणी के काबर्निक यौगिकों का अध्ययन रुचिकर है। 13.4.1 नामप(ति तथा समावयवता सामान्य प(ति में एल्काइन ऐसीटिलीन के व्युत्पÂ के नाम से जाने जाते हैं। आइर्.यू.पी.ए.सी. प(ति में संगत ऐल्केन में अनुलग्न ‘ऐन’ का ‘आइन’ द्वारा प्रतिस्थापन करके एल्काइन कोसंगत ऐल्केन के व्युत्पÂ नाम से जाना जाता है। त्रिाआबंध् की स्िथति प्रथम त्रिा - आबंध्ित काबर्न से इंगित की जाती है। एल्काइन श्रेणी के वुफछ सदस्यों के सामान्य तथा आइर्.यू.पी.ए.सीनाम सारणी 13.2 में दिए गए हैं। रसायन विज्ञान जैसा आपने पहले पढ़ा है, एथाइन तथा प्रोपाइन अणुओं की केवल एक ही संरचना होती है, ¯कतु ब्यूटाइन में दो संरचनाएँ संभावित हंैμ ;1द्ध ब्यूट - 1 - आइन ;2द्ध ब्यूट - 2 - आइन। चूँकि दोनों यौगिक त्रिा - आबंध् की स्िथति के कारण संरचना में भ्िान्न है। अतः ये समावयव स्िथति समावयव कहलाते हैं। आप कितने प्रकार से अगले सजात की संरचना को बना सकते हैं? अथार्त् अगला एल्काइन ;जिसका अणुसूत्रा ब्भ् हैद्ध के पाँच58काबर्न परमाणुओं को सतत् शृंखला तथा पाश्वर् शृंखला के रूप में व्यवस्िथत करने पर निम्नलिख्िात संरचनाएँ संभव हंैμ संरचना प्न्च्।ब् नाम 123 4 5प्ण् पेन्ट - 1 - आइनभ्ब्≡ब्दृब्भ् दृब्भ् दृब्भ् 223 1234 5प्प्ण् पेन्ट - 2 - आइनभ् ब्दृब्≡ब्दृब्भ् दृब्भ् 3 23 43 21प्प्प्ण् भ्ब्दृब्भ्दृब्≡ब्भ् 3दृमेथ्िालब्यूट - 1 - आइन3 द्य ब्भ्3 संरचना - सूत्रा प् एवं प्प् स्िथति समावयव तथा संरचना सूत्रा प् एवं प्प्प् अथवा प्प् एवं प्प्प् शृंखला समावयव के उदाहरण हैं उदाहरण 13.13 एल्काइन श्रेणी के पाँचवें सदस्य के विभ्िान्न समावयवों की संरचना एवं आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम लिख्िाए। विभ्िान्न समावयवी युग्म किस प्रकार की समावयवता दशार्ते हैं? हल एल्काइन श्रेणी के पाँचवे सदस्य का अणुसूत्रा ब्6भ्10 होता है इसके संभावित समवयव इस प्रकार हैμ ;कद्ध भ्ब् ≡ ब् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 हेक्स - 1 - आइन ;खद्ध ब्भ्3 दृ ब् ≡ ब् दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्3 हेक्स - 2 - आइन ;गद्ध ब्भ्3 दृ ब्भ्2 दृ ब् ≡ ब् दृ ब्भ्2दृ ब्भ्3 हेक्स - 3 - आइन सारणी 13.2 एल्काइन ब्भ्श्रेणी के सामान्य तथा प्ण्न्ण्च्ण्।ण्ब् नाम द 2द.2 द का मान सूत्रा संरचना - सूत्रा सामान्य नाम प्न्च्।ब् नाम 2 3 4 4 ब्2भ्2ब्3भ्4ब्4भ्6ब्4भ्6 भ्ब् ≡ ब्भ् ब्भ्3.ब् ≡ ब्भ् ब्भ्3ब्भ्2ब् ≡ ब्भ् ब्भ्3.ब् ≡ ब्.ब्भ्3 ऐसीटिलीनमेथ्िाल ऐसीटिलीनएथ्िाल ऐसीटिलीनडाइमेथ्िाल ऐसीटिलीन एथाइनप्रोपाइनब्यूट - 1 - आइनब्यूट - 2 - आइन 3 - मेथ्िालपेन्ट - 1 - आइन ;घद्ध भ्ब् ≡ ब् − ब्भ् − ब्भ् − ब्भ् 23 द्य ब्भ्3 4 - मेथ्िालपेन्ट - 1 - आइन ;चद्ध ब्भ् − ब् ≡ ब् −ब्भ् − ब्भ्33 द्य ब्भ्3 4 - मेथ्िालपेन्ट - 2 - आइन ब्भ्3 द्य;छद्ध भ्ब् ≡ ब् − ब् − ब्भ् द्य3 ब्भ्3 3, 3 - डाइमेथ्िालब्यूट - 1 - आइन उपरोक्त समावयव - शंृखला समावयवता एवं स्िथति समावयवता के उदाहरण हैं। 13.4.2 त्रिा - आबंध् की संरचना एथाइन, एल्काइन श्रेणी का सरलतम अणु है। एथाइन की संरचना चित्रा 13.6 में दशार्यी गइर् है। एथाइन के प्रत्येक काबर्न परमाणु के साथ दो ेच संकरित कक्षकों के समअक्षीय अतिव्यापन से काबर्न - काबर्न सिग्माआबंध् बनता है। प्रत्येक काबर्न परमाणु का शेष ेच संकरित कक्षक अंतरनाभ्िाकीय अक्ष के सापेक्ष हाइड्रोजन परमाणु के 1े कक्षक के साथ अतिव्यापन करके, दो ब्.भ् सिग्मा आबंध् बनाते हैं, चित्रा 13.6 आबंध् कोण तथा आबंध् लंबाइर् दशार्ता एथाइन का कक्षीय आरेख ;कद्ध σ अतिव्यापन ;खद्ध π अतिव्यापन भ्.ब्.ब् आबंध् कोण 180° का होता है। प्रत्येक काबर्न परमाणु के पास ब्.ब् आबंध् तथा तल के लंबवत् असंकरित च - कक्षक होते हैं। एक काबर्न परमाणु का 2च कक्षक दूसरे के समांतर होता है, जो समपा£श्वक अतिव्यापन करके दो काबर्न परमाणुओं के मध्य दो ;पाइर्द्ध बंध् बनाते हैं। अतः एथाइन अणु में एक ब्.ब् ;सिग्माद्ध आबंध् दो ब्.भ् सिग्मा आबंध् तथा दो ब्.ब् ;पाइर्द्ध आबंध् होते हैं। ब्≡ब् की आबंध् सामथ्यर् बंध् एंथैल्पी 823 ाश्र उवस.1 है, जो ब्त्रब् द्विआबंध् बंध् ऐंथैल्पी 681 ाश्र उवस.1 और ब्.ब् एकल आबंध् बंध् एंथैल्पी 348 ाश्र उवस.1 अध्िक होती है। ब्≡ब् की त्रिाआबंध् लंबाइर् ;120चउद्ध, ब्त्रब् द्विआबंध् ;134 चउद्ध तथा ब्.ब् एकल आबंध् ;154 चउद्ध तुलना में छोटी होती है। अक्षों पर दो काबर्न परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्राॅन अभ्र अंतरानाभ्िाकीय सममित बेलनाकार स्िथति में होते हैं। एथाइन एक रेखीय अणु है। 13.4.3 विरचन 1. वैफल्िसयम काबार्इड सेμ जल के साथ वैफल्िसयम काबार्इड की अभ्िावि्रफया पर औद्योगिक रूप से एथाइन बनाइर् जाती है। कोक तथा बिना बुझे चूने को गरम करके वैफल्िसयम काबार्इड बनाया जाता है। चूना पत्थर से निम्नलिख्िात अभ्िावि्रफया द्वारा बिना बुझा चूना प्राप्त होता हैμ Δब्ंब्व् 3 ⎯→ ब्ंव् ़ ब्व्2 ;13ण्55द्ध ब्ंव् ़ 3ब् ⎯Δ→ ब्ंब् 2 ़ ब्व् ;13ण्56द्ध वैफल्िसयम काबार्इड ब्ंब् ़2भ् व् ⎯→ ब्ं;व्भ्द्ध ़ब्भ् ;13ण्57द्ध2 2 222 2. सन्िनध् डाइहैलाइडों सेμ सन्िनध् डाइहैलाइडों की अभ्िावि्रफया ऐल्कोहाॅली पोटैश्िायम हाइड्राॅक्साइड से कराने पर इनका विहाइड्रोहैलोजनीकरण होता है। हाइड्रोजन हैलाइड के एक अणु विलोपित करने से ऐल्िकनाइल हैलाइड प्राप्त होता है, जो सोडामाइड के साथ उपचार कराने पर एल्काइन देते हैं। 13.4.4 गुणध्मर् भौतिक गुणध्मर् एल्काइनों के भौतिक गुण, एल्कीनों तथा ऐल्केनों के समान होते हैं। प्रथम तीन सदस्य गैस, अगले आठ सदस्य द्रव तथा शेष उच्चतर सदस्य ठोस होते हैं। समस्त एल्काइन रंगहीन होते हैं। एथाइन की आभ्िालाक्षण्िाक गंध् होती है। इसके अन्य सदस्य गंध् हीन होते हैं। एल्काइन दुबर्ल ध््रुवीय, जल से हलके तथा जल में अमिश्रणीय होते हैं, परंतु काबर्निक विलायकों जैसेμइर्थर, काबर्नटेट्राक्लोराइड और बेन्जीनमें विलेय होते हैं। इनके गलनांक, क्वथनांक तथा घनत्व अणुभार के साथ बढ़ते हैं। रासायनिक गुणध्मर् एल्काइन सामान्यतया अम्लीय प्रवृफति, योगात्मक तथा बहुलकीकरण अभ्िावि्रफयाएँ प्रद£शत करती है, वे इस प्रकार हैंμ ;कद्ध एल्काइन का अम्लीय गुणμ सोडियम धतु या सोडामाइड ;छंछभ्द्ध प्रबल क्षारक होते हैं। ये एथाइन के साथ अभ्िावि्रफया2करके डाइहाइड्रोजन मुक्त कर सोडियम ऐसीटिलाइड बनाते हैं। इस प्रकार की अभ्िाव्रफयाएँ एथीन तथा एथेन प्रद£शत नहीं करते। यह परीक्षण एथीन तथा ऐथेन की तुलना में एथाइन की अम्लीय प्रवृफति को इंगित करता है। ऐसा क्यों है? क्या इसकी संरचना तथा संकरण के कारण होता है? आप यह अध्ययन कर चुके हैं कि एथाइन में हाइड्रोजन परमाणु ेच संकरित काबर्न परमाणु से, एथीन में ेच2 संकरित काबर्न परमाणु से तथा एथेन में ेच3 संकरित काबर्न परमाणु से जुड़ा रहता है। एथाइन के ेच संकरित कक्षक में अध्िकतम ै गुण ;50»द्ध के कारण उसमें उच्चविद्युत्ट्टणात्मकता होती है। अतः ये एथाइन में ब्.भ् आबंध् के साझा इलेक्ट्राॅनों को, एथीन में काबर्न के ेच2 संकरित कक्षक तथा एथेन में काबर्न के ेच3 संकरित कक्षकों की तुलना में अपनी ओर अध्िक आकष्िार्त करेंगे, जिससे एथेन तथा एथीन की तुलना में एथाइन में हाइड्रोजन परमाणु प्रोटाॅन के रूप में आसानी से विलोपित हो जाएँगे। अतः त्रिाआबंध्ित काबर्न परमाणु से जुड़े हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय प्रवृफति के होते हैं। दृ ़भ्ब् ≡ ब्भ् ़ छं → भ्ब् ≡ ब् छं ़ )भ् 2 सोि डयम एथ्ेानेाइड ;13ण्59द्ध दृ ़़ दृदृ ़भ्ब् ≡ ब् छं ़ छं → छं ब् ≡ ब् छं ़ )भ्2 डाइसोडियम ऐथेनाइड ;13ण्60द्ध ़ दृदृ ़ब्भ्दृब् ब्भ् ़ छं छभ् → ब्भ् दृब् ≡ ब् छं ≡−3 23 सोि डयम प्रोपिनाइड ़ छभ्3 ;13ण्61द्ध रसायन विज्ञान यह ध्यान रखने योग्य बात है कि त्रिाआबंध् से जुड़े हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय होते हैं, परंतु एल्काइन के समस्त हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय नहीं होते। उपयुर्क्त अभ्िावि्रफयाएँ एल्कीन तथा ऐल्केन प्रद£शत नहीं करते हैं। यह परीक्षण एल्काइन, एल्कीन तथा ऐल्केन में विभेद करने हेतु प्रयुक्त किया जाता है। ब्यूट - 1 - आइन तथा ब्यूट - 2 - आइन की उपरोक्त अभ्िावि्रफया कराने पर क्या होगा? ऐल्केन, एल्कीन तथा एल्काइन निम्नलिख्िात व्रफम में अम्लीय प्रवृफति दशार्ते हैंμ ;पद्ध भ्ब्≡ब्भ् झ भ् ब् त्रब्भ् झब्भ् दृब्भ् 2 233 ;पपद्ध भ्ब् ≡ब्भ्झब्भ् दृब् ≡ब्भ् झझ ब्भ् दृब्≡ब्दृब्भ्3 33 ;खद्ध योगज अभ्िावि्रफयाμ एल्काइनों में त्रिाआबंध् होता है। अतः यह डाइहाइड्रोजन, हैलोजन, हाइड्रोजन हैलाइड आदि के दो अणुओं से योग करते हैं। योगज उत्पाद निम्नलिख्िात पदों में बनता हैμ बना हुआ योगज उत्पाद सामान्यतया वाइनिलिक ध्नायन के स्थायित्व पर निभर्र करता है। असममित एल्काइनों में योगज माकोर्नीकाॅपफ नियम के अनुसार होता है। एल्काइनों में अध्िकतर अभ्िावि्रफयाएं इलेक्ट्राॅनस्नेही योगज अभ्िावि्रफयाएं हैं, जिनके वुफछ उदाहरण दिए जा रहे हैंμ ;पद्ध डाइहाइड्रोजन का संयोजन च्जध्च्कध्छप भ्2भ्ब्ब्भ्भ् ख्भ्ब् ब्भ्, ब्भ् दृब्भ्2 22 33 ;13ण्62द्ध च्जध्च्कध्छप ब्भ् दृब्≡ब्भ् ़भ् ⎯⎯⎯⎯→ ख्ब्भ् दृब्भ्त्रब्भ् , 32 32 पा्रपेाइन पा्रपेीन भ्2⎯⎯→ब्भ्3 दृब्भ्2 दृब्भ् 3 पा्रपेने ;13ण्63द्ध ;पपद्ध हैलोजनों का संयोजन ;13ण्64द्ध इस संकलन पर ब्रोमीन का लाल - नारंगी रंग विरंजीवृफत हो जाता है। अतः इसे असंतृप्तता के परीक्षण के लिए प्रयुक्त किया जाता है। ;पपपद्ध हाइड्रोजन हैलाइडो का संयोजनμ एल्काइनों में हाइड्रोजन हैलाइड ;भ्ब्सए भ्ठतए भ्प्द्ध के दो अणु के संकलन से जैम डाइहैलाइड ;जिनमें एक ही काबर्न परमाणु पर दो हैलोजन जुड़े होंद्ध बनते हैं। भ्ठतभ्−≡−ब्ब्भ़्भ्−ठत ⎯→ख्ब्भ्2 त्रब्भ्−ठत,⎯⎯→ 2 - बा्रमेापेा्रपेीन ब्भ्3 दृब्भ्ठत3 1ए1.डाइबा्रमेाऐथने ;13ण्65द्ध ;13.66द्ध ;पअद्ध जल का संयोजनμ ऐल्केन तथा एल्कीन की भाँति एल्काइन भी जल में अमिश्रणीय होते हैं और जल से अभ्िावि्रफया नहीं करते हैं। एल्काइन 333ज्ञ पर मक्यूर्रिक सल्पेफट तथा तुनसल्फ्रयूरिक अम्ल की उपस्िथति में जल के एक अणु के साथ संयुक्त होकर काबोर्निल यौगिक देते हैं। ;13.68द्ध ;अद्धबहुलकीकरण ;कद्धरैख्िाक बहुलकीकरणμ अनुवूफल परिस्िथतियों में एथाइन का रैख्िाक बहुलकीकरण होने से पाॅलिऐसीटिलीन अथवा पाॅलिएथाइन बनता है, जो उच्चतर अणुभार वाले पाॅलिएथाइन इकाइयों ब्भ् ब्भ्ब्भ् ब्भ् से युक्त होता है। इसे ;दृब्भ् त्र ब्भ् − ब्भ् त्र ब्भ्दृद्ध प्रद£शत किया जा सकता है।द विश्िाष्ट परिस्िथतियों में ये बहुलक विद्युत् के सुचालक होते हैं। अतः पाॅलिऐसीटिलीन की इस पिफल्म का उपयोग बैटरियों में इलेक्ट्राॅड के रूप में किया जाता है। धतु चालकों की अपेक्षा यह पिफल्म हलकी, सस्ती तथा सुचालक होती है। ;खद्ध चव्रफीय बहुलकीकरणμ एथाइन को लाल तप्त लोह नलिका में 873ज्ञ पर प्रवाहित कराने पर उसका चव्रफीय बहुलकीकरण हो जाता है। एथाइन के तीन अणु बहुलकीवृफत होकर बेन्जीन बनाते हैं, जो बेन्जीनव्युत्पन्न, रंजक, औषध्ि तथा अनेक काबर्निक यौगिकों के प्रारंभ्िाक अणु है। यह ऐलीपैफटिक यौगिकों को ऐरोमैटिक यौगिकों में परिवतिर्त करनेके लिए सवोर्त्तम पथ है। ;13ण्69द्ध उदाहरण 13.14 आप एथेनोइक अम्ल को बेन्जीनमें वैफसे परिव£तत करेंगे? हल छंव्भ्;ंुद्ध साडेा लाइमब्भ् ब्व्व्भ्⎯⎯⎯⎯→ब्भ् ब्व्व्छं ⎯⎯⎯⎯→33 Δ ब्स2ब्भ् ⎯⎯→ब्भ् ब्स4ीअ 3 छंध्शल्ुक इथ्र्ार⎯⎯⎯⎯⎯→वटुश््ार्अभ्िािया ब्स ंसबण् ज्ञव्भ्ब्भ् ⎯⎯⎯2 →ब्भ् ब्स छंछभ् →⎯⎯⎯⎯⎯ब्भ् त्र ब्भ्2625 222 ठत ंसबण् ज्ञव्भ्2⎯⎯⎯→ 2 − ब्भ् ठत → ब्भ्2ब्भ्ठत 2 ⎯⎯⎯⎯⎯त्र ब्भ्ठतऊष्मा लाल तत्प लोह नलिका छंछभ्2←⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ब्भ् त्र ब्भ् ←⎯⎯⎯⎯873ज्ञ 13.5 ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्न ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्न को ऐरीन भी कहते हैं, क्योंकि इनके अध्िकांश यौगिकों में विश्िाष्ट गंध् ;ग्रीक शब्द ‘ऐरोमा’, जिसका अथर् सुगंध् होता है।द्ध रहती है। ऐसे यौगिकों को ‘ऐरौमेटिक यौगिक’ नाम दिया गया है। अध्िकतर ऐसे यौगिकों में बेन्जीनवलय पाइर् जाती है। यद्यपि बेन्जीनवलय अतिअसंतृप्त होती है, परंतु अध्िकतर अभ्िावि्रफयाओं में बेन्जीनवलय अति असंतृप्त बनी रहती है। ऐरोमैटिक यौगिकों के कइर् उदाहरण ऐसे भी हैं, जिनमें बेन्जीनवलय नहीं होती है, ¯कतु उनमें अन्य अतिअसंतृप्त वलय होती है। जिन ऐरोमेटिक यौगिकों में बेन्जीनवलय होती है, उन्हें बेन्जेनाइड ;ठमद्रमदवपकद्ध तथा जिसमें बेन्जीनवलय नहीं होती है, उन्हें अबेन्जेनाइड ;दवदइम्रमदवपकद्ध कहते है। ऐरीन के वुफछ उदाहरण नीचे दिए गए हैंμ बेन्जीन टाॅलूइर्न नैफ्रथलीनबाइपेफनिल 13.5.1 नाम प(ति तथा समावयवता हम ऐरामैटिक यौगिकों की नाम प(ति तथा समावयवता का वणर्न एकक 12 में कर चुके हैं। बेन्जीन के सभी छः हाइड्रोजन परमाणु समतुल्य हैं। अतः ये एक प्रकार का एकल प्रतिस्थापित उत्पाद बनाती हैं। यदि बेन्जीन के दो हाइड्रोजन परमाणु दो समान या भ्िान्न एक संयोजी परमाणु या समूह द्वारा प्रतिस्थापित हों, तो तीन विभ्िान्न स्िथति समावयव संभव हैं। ये 1, 2 अथवा 1, 6 आथोर् ;वदृद्धऋ 1, 3 अथवा 1, 5 मेटा ;उ.द्ध तथा 1, 4 पैरा ;च.द्ध हैं। द्विप्रतिस्थापित बेन्जीन व्युत्पÂ के वुफछ उदाहरण यहाँ दिए जा रहे हैं। मेक्ष्िाल बेन्जीन 1, 2 - डाइमेथ्िालबेन्जीन ;टालूइर्नद्ध ;व - जाइलीनद्ध 1, 3 - डाइर्मेथ्िालबेन्जीन1, 1, 4 - डाइमेथ्िालबेन्जीन;उ.जाइलीनद्ध ;च.जाइलीनद्ध 13.5.2 बेन्जीनकी संरचनाबेन्जीन को सवर्प्रथम माइकेल पैफराडे ने सन् 1825 में प्राप्त किया। बेन्जीन का अणुसूत्रा ब्6भ्है, जो उच्च असंतृप्तता6 दशार्ता है। यह अणुसूत्रा संगत ऐल्केन, एल्कीन तथा एल्काइन, से कोइर् संबंध् नहीं बताता है। आप इसकी संभावित संरचना के बारे में क्या सोचते हैं? इसके विश्िाष्ट गुण तथा असामान्य स्थायित्व के कारण इसकी संरचना निधर्रित करने में कइर् वषर् लग गए। बेन्जीन एक स्थायी अणु है और ट्राइर्ओजोनाइड बनाता है, जो तीन द्विआबंध् की उपस्िथति को इंगित करता है। बेन्जीन केवल एक प्रकार का एकल प्रतिस्थापित व्युत्पÂ बनाता है, जो बेन्जीन के छः काबर्न तथा छः हाइड्रोजन की समानता को इंगित करती है। इन प्रेक्षणों के आधर पर आगुस्ट् केवुफले ने सन् 1865 में बेन्जीन की एक संरचना दी, जिसमें छः काबर्न परमाणु की चव्रफीय व्यवस्था है। उसमें एकांतर क्रम में द्विआबंध् है तथा प्रत्येक काबर्न से एक हाइड्रोजन परमाणु जुड़ा है। अथवा जमर्न रसायनज्ञ Úीड्रिक आगुस्ट् केवुफले का जन्म सन् 1829 में जमर्नी के डामर्स्ड्ट नामक नगर में हुआ था। वे सन् 1856 में प्रोपेफसर तथा सन् 1875 में राॅयल सोसायटी के पैफलो बने। संरचनात्मककाबर्निक रसायन के क्षेत्रा में उन्होंने दो महत्त्वपूणर् योगदान दिए। प्रथम सन् 1958 में जब उन्होंने यह प्रस्तावित किया कि अनेक काबर्न परमाणु आपस में आबंध् बनाकर शंृखलाओं का निमार्ण कर सकते हैं। द्वितीय उन्होंने सन् 1875 में बेन्जीन की संरचना को स्पष्ट करने में योगदान दिया, जब उन्होंने प्रस्तावित किया कि काबर्न परमाणुओं की शंृखलाओं के सिरे जुड़कर वलय का निमार्ण कर सकते हैं। तत्पश्चात् उन्होंने बेन्जीन की गतिक संरचना प्रस्तावित की, जिस पर बेन्जीन की आध्ुनिक इलेक्ट्राॅनीय Úीड्रिक आगुस्ट् केवुफलेसंरचना आधारित है। बाद में उन्होंने बेन्जीन संरचना की खोज को एक रोचक घटना द्वारा समझाया। ;7 सितम्बर 1829फ्मैं पाठ्यपुस्तक लिख रहा था, परंतु कायर् आगे नहीं बढ़ रहा था क्योंकि, मेरे विचार कहीं अन्य थे। 13 जुलाइ 1896द्धतभी मैंने अपनी वुफसीर् को अलाव की ओर किया। वुफछ समय बाद मुझे झपकी लग गईं। स्वप्न में मेरी आँखों के सामने परमाणु नाच रहे थे। अनेक प्रकार के विन्यासों की संरचनाएं मेरी मस्ितष्क की आँख के सम्मुख घूम रही थी। मैं स्पष्ट रूप से लंबी - लंबी कतारें देख पा रहा था, जो कभी - कभी समीप आ रही थीं, वे सपर् की भाँति घूम रही थीं, वुफंडली बना रही थीं। तभी मैं देखा कि एक सपर् ने अपनी ही दुम को अपने मुँह में दबा लिया। इस प्रकार बनी संरचना को मैं स्पष्ट रूप से देख पा रहा था। तभी अचानक मेरी आँखें खुल गइर् तथा रात्रिा का शेष पहर मैंने अपने सपने को समझकर उपयुक्त निष्कषर् निकालने में व्यतीत किया। वे आगे कहते हैं किμ सज्जनो! हमें स्वप्न देखने की आदत डालनी चाहिए, तभी हम सत्य से साक्षात्कार कर सकते हैं। परंतु हमें अपने स्वप्नों को, इससे पहले कि हम उन्हें भूल जाएं, अन्य को बता देना चाहिएय् ;सन् 1890द्ध। सौ वषर् के बाद, केवुफले की जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर पाॅलिबेंजिनायड संरचना युग्म यौगिकों के एक वगर् को ‘केवुफलीन’ नाम दिया गया। केवुफले संरचना 1, 2 - डाइब्रोमो बेन्जीन के दो समावयवों की संभावना व्यक्त करती है। एक समावयव में दोनों ब्रोमीन परमाणु द्विआबंध्ित काबर्न परमाणुओं से जुड़े रहते हैं, जबकि दूसरे समावयव में एकल आबंध्ित काबर्न परमाणुओं से। परंतु बेन्जीन केवल एक ही आॅथोर् द्विप्रतिस्थापित उत्पाद बनाती है। इस समस्या का निराकरण केवुफले ने बेन्जीन में द्विआबंध् के दोलन ;व्ेबपससंजपदहद्ध प्रवृफति पर विचार करके प्रस्तावित किया। यह सुधर भी बेन्जीन की संरचना के असामान्य स्थायित्व तथा योगात्मक अभ्िाियाओं की तुलना में प्रतिस्थापन अभ्िावि्रफयाओं की प्राथमिकता को समझाने में विपफल रहा, जिसे बाद में अनुनाद ;त्मेवदंदबमद्ध द्वारा समझाया गया। अनुनाद एवं बेन्जीन का स्थायित्व ‘संयोजकता बंध् सि(ांत’ के अनुसार, द्विआबंध् के दोलन को अनुनाद के द्वारा समझाया गया है। बेन्जीन विभ्िान्न अनुनादी संरचनाओं का संकर है। केवुफले द्वारा दो मुख्य संरचनाएं ;कद्धएवं ;खद्ध दी गईं, अनुनाद संकर को षट्भुजीय संरचना में वृत्तया ¯बदु वृत्त द्वारा ;गद्ध में प्रद£शत किया गया है। वृत्त, बेन्जीनवलय के छः काबर्न परमाणु पर विस्थानीवृफत ;क्मसवबंसपेमकद्ध छः इलेक्ट्रानों को दशार्ता है। ;कद्ध ;खद्ध ;गद्ध कक्षीय अतिव्यापन हमें बेन्जीन संरचना के बारे में सही दृश्य देता है। बेन्जीन में सभी छः काबर्न परमाणु ेच2 संकरित है। प्रत्येक काबर्न परमाणु के दो ेच2 कक्षक निकटवतीर् काबर्न परमाणुओं के ेच2 कक्षक से अतिव्यापन करके छः ;ब्.ब्द्ध σ आबंध् बनाते हैं, जो समतलीय षट्भुजीय होते हैं। प्रत्येक काबर्न परमाणु के बचे हुए ेच2 कक्षक प्रत्येक हाइड्रोजन परमाणु के े - कक्षक से अतिव्यापन करके छः ब्.भ् सिग्मा आबंध् बनाते हैं। अब प्रत्येक काबर्न परमाणु पर एक असंकरित च - कक्षक रह जाता है, जो वलय के तल के लंबवत् होता है, जैसा नीचे दशार्या गया हैμ प्रत्येक काबर्न परमाणु पर उपस्िथत असंकरित च - कक्षक इतने निकट होते हैं कि वे पाश्वर्अतिव्यापन करके आबंध् का निमार्ण करते हैं। च - कक्षकों के अतिव्यापन से तीन आबंध् बनने की व्रफमशः दो संभावनाएँ ;ब्.ब्ए ब्.ब्ए ब्.ब् अथवा123456ब्.ब्ए ब्.ब्ए ब्.ब्द्ध हैं, जैसा नीचे दिए गए चित्रों में234561दशार्या गया है। संरचना 13.6 ;कद्ध तथा ;खद्ध केवुफले की विस्थानीवृफत आबंध्युक्त संरचना दशार्ता है। चित्रा 13.7 ;कद्ध तथा ;खद्ध केवुफले की दोनों संरचनाओंके संगत है जिसमें स्थानीकृत π.बंध् होते हैं। ग्.किरण चित्रा 13.7 ;कद्ध चित्रा 13.7 ;खद्ध चित्रा 13.7 ;गद्ध चित्रा 13.7 ;घद्ध विवतर्न से ज्ञात की गइर् वलय में काबर्न परमाणुओं के मध्य अन्तनार्भ्िाकीय दूरी समान पाइर् गईं प्रत्येक काबर्न परमाणु के च - कक्षक की दोनों तरपफ साथ वाले काबर्न परमाणु के च - कक्षक से अतिव्यापन की संभावना समान है ख्चित्रा 13.7 ;गद्ध,। इस इलेक्ट्राॅन अभ्र को चित्रा 13.7 ;घद्ध के अनुसार षट्भुजीय वलय के एक उफपर तथा एक नीचे स्िथत माना जा सकता है। इस प्रकार काबर्न के छः च इलेक्ट्राॅन विस्थानीवृफत होकर छः काबर्न नाभ्िाकों के परितः स्वच्छंद रूप से घूम सकेंगे, न कि वे केवल दो काबर्न नाभ्िाकों के मध्य, जैसा चित्रा 13.7 ;कद्ध एवं ;खद्ध में दशार्या गया है। विस्थानीवृफत इलेक्ट्राॅन अभ्र दो काबर्न परमाणु के मध्य स्िथत इलेक्ट्रान अभ्र की बजाय वलय के सभी काबर्न परमाणुओं के नाभ्िाक द्वारा अध्िक आकष्िार्त होगा। अतः विस्थानीवृफत इलेक्ट्राॅन की उपस्िथति में बेन्जीन वलय परिकल्िपत साइक्लोहैक्साट्राइन की तुलना में अध्िक स्थायी है। ग् - किरण विवर्तन आँकड़े बेन्जीनके समतलीय अणु को दशार्ते हैं। बेन्जीन की उपरोक्त संरचना ;कद्ध तथा ;खद्ध सही होतीं तो दोनों प्रकारों में ब्.ब् आबंध् लंबाइर् की अपेक्षा की जाती, जबकि ग्.किरण आँकड़ों के अध्ययन के आधार पर छः समान ब्.ब् आबंध् लंबाइर् ;139चउद्ध पाइर् गइर्, जो ब्.ब् एकल आबंध् ;154चउद्ध तथा ब्.ब् द्विआबंध् ;134चउद्ध के मध्य हैं। अतः सामान्य परिस्िथतियों में बेन्जीन पर शु( द्विआबंध् की अनुपस्िथति बेन्जीन पर योगज अभ्िावि्रफया होने से रोकती है। यह बेन्जीन के असाधरण व्यवहार को स्पष्ट करती है। 13.5.3 ऐरोमैटिकता बेन्जीन को जनक ऐरोमैटिक यैगिक मानते हैं। अब ‘ऐरोमैटिक’ नाम सभी वलय तंत्रों, चाहे उसमें बेन्जीन वलय हो या नहीं, में प्रयोग में लाया जाता है। ये निम्नलिख्िात गुण दशार्ते हैंμ ;पद्ध समतलीयता। ;पपद्ध वलय में इलेक्ट्राॅन का संपूणर् विस्थानीकरण। ;पपपद्ध वलय में ;4द ़ 2द्धπ इलेक्ट्राॅन, जहाँ द एक पूणा±क है ;द त्र 0ए1ए2एण्ण्ण्द्ध। इसे हकल नियम ;भ्üबामस त्नसमद्ध द्वारा भी उल्लेख्िात करते हैं। ऐरोमैटिक यौगिकों के वुफछ उदाहरण इस प्रकार हैंμ 13.5.4 बेन्जीन का विरचन बेन्जीन को व्यापरिक रूप में कोलतार से प्राप्त किया जाता है, यद्यपि इसे निम्नलिख्िात प्रयोगशाला विध्ियों द्वारा बना सकते हैंμ ;पद्ध एथाइन के चव्रफीय बहुलकीकरण से ;देख्िाए अनुभाग 13.4द्ध ;पपद्ध एरोमैटिक अम्लों के विकाबोर्क्िसलीकरण सेμ बेन्जोइक अम्ल के सोडियम लवण को सोडालाइम के साथ गरम करने पर बेन्जीन प्राप्त होती है। ;13ण्70द्ध ;पपपद्ध पफीनाॅल के अपचयन सेμ पफीनाॅल की वाष्प को जस्ता के चूणर् पर प्रवाहित करने से यह बेन्जीनमें अपचयित हो जाती है। ;13ण्71द्ध 13.5.5 गुणध्मर् भौतिक गुणध्मर् भौतिक गुणध्मर् ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्न अध््रुवीय अणु हैं। ये सामान्यतः विश्िाष्ट गंध्युक्त, रंगहीन द्रव या ठोस होते हैं। आपनैफ्ऱथलीन की गोलियों से चिरपरिचित हैं। इसकी विश्िाष्ट गंध् तथा शलभ प्रतिकषीर् गुणध्मर् के कारण इसे शौचालय में तथा कपड़ों को सुरक्ष्िात रखने के लिए उपयोग में लाते हैं। ऐरोमैटिक हाइड्रोकाबर्न जल में अमिश्रणीय तथा काबर्निक विलायाकों में विलेय है। ये कज्जली ;ैववजलद्ध लौ के साथ जलते हैं। रासायनिक गुणध्मर् रासायनिक गुणध्मर् ऐरीनो को इलेक्ट्राॅनस्नेही प्रतिस्थापन द्वारा अभ्िालक्ष्िात किया जाता है, हालाँकि विशेष परिस्िथतियों में ये संकलन तथा आॅक्सीकरण अभ्िावि्रफया दशार्ते हैं। इलेक्ट्राॅनरागी प्रतिस्थापन अभ्िावि्रफयाएँ साधरणतया ऐरीन नाइट्रोकरण, हैलोजनन, सल्पफोनेशन, प्रफीडेलव्रफाफ्रट ऐल्िकलन, ऐसीटिलन आदि इलेक्ट्रानरागी प्रतिस्थापन अभ्िािया दशार्ते हैं, जिनमें इलेक्ट्राॅनरागी एक आव्रफमणकारी अभ्िाकमर्क म़् है। ;पद्ध नाइट्रोकरणμ यदि बेन्जीन वलय को सान्द्र नाइटिªक अम्लतथा सल्फ्रयूरिक अम्ल ;नाइट्रोकरण मिश्रणद्ध के साथ गरम किया जाता है तो बेन्जीन वलय में नाइट्रो समूह प्रविष्ट हो जाता है। ;13ण्72द्ध ;पपद्ध हैलोजनीकरण या हैलोजननμ लुइस अम्ल ;जैसेμथ्मब्सए3थ्मठत तथा ।सब्सद्ध की उपस्िथति में ऐरीन, हैलोजन से33अभ्िावि्रफया कर हैलोऐरीन देते हैं। हाइड्रोजन परमाणु का प्रतिस्थापन सल्पफोनीकरण या सल्पफोनेशनकहलाता है। यह सांद्र सल्फ्रयूरिक अम्ल के साथ गरम करके प्राप्त किया जाता है। ;13ण्74द्ध ;पअद्ध प्रफीडेल - व्रफाफ्रट ऐल्िकलीकरण या ऐल्िकलनμ निजर्ल ।सब्स की उपस्िथति में बेन्जीन की ऐल्िकल हैलाइड से3अभ्िावि्रफया कराने पर ऐल्िकल बेन्जीन प्राप्त होती है। 1 - क्लोरोप्रोपेन की बेन्जीन से अभ्िावि्रफया कराने पर द.प्रोपिल बेन्जीन की अपेक्षा आइसोप्रोपिल बेन्जीन क्यों प्राप्त होती हैं? ;अद्ध प्रफीडेल - व्रफाफ्रट ऐसिलीकरण या ऐसीटिलनμ लुइस अम्ल ;।सब्सद्ध की उपस्िथति में बेन्जीन की ऐसिल हैलाइड अथवा3ऐसिड ऐनहाइड्राइड के साथ अभ्िावि्रफया करने पर ऐसिल बेन्जीन प्राप्त होती है। ;13ण्77द्ध ;13ण्75द्ध ;13ण्76द्ध ;13ण्78द्ध अगर इलेक्ट्राॅनस्नेही अभ्िाकमर्क को आध्िक्य में लिया जाए तो पुनः प्रतिस्थापन अभ्िावि्रफया होगी जिसमें इलेक्ट्रानस्नेहीद्वारा बेन्जीन के दूसरे हाइड्रोजन उत्तरोतर प्रतिस्थापित होंगे। उदाहरणस्वरूप, बेन्जीन की क्लोरीन की आध्िक्य मात्रा के साथ एवं निजर्ल ।सब्स की उपस्िथति में अभ्िावि्रफया कराने पर3हैक्साक्लोरोबेन्जीन ;ब्ब्सद्ध प्राप्त की जा सकती है।66;13ण्79द्ध इलेक्ट्रानस्नेही ;इलेक्ट्राॅनरागीद्ध प्रतिस्थापन की वि्रफयाविध्ि प्रायोगिक तथ्यों के आधर पर ै ;ै त्रप्रतिस्थापनम्म् त्र इलेक्ट्राॅनस्नेही द्ध अभ्िावि्रफयाएं निम्नलिख्िात पदों द्वारा सम्पÂ होती हैं। ;कद्ध इलेक्ट्राॅनस्नेही की उत्पिा ;खद्ध काबर्ध्नायन का बनना ;गद्ध मध्यवतीर् काबर्ध्नायन से प्रोटाॅन का विलोपन ;कद्ध इलेक्ट्राॅनस्नेही म़् की उत्पिाμ बेन्जीन के क्लोरीनन, ऐरीनोनियम आयन निम्नलिख्िात प्रकार से अनुनाद द्वारा स्थायित्व ऐल्िकलन तथा ऐसिलन में निजर्ल ।सब्सए जो लूइस अम्ल है, प्राप्त करता हैμ3आव्रफमणकारी अभ्िाकमर्क के साथ संयुक्त होकर व्रफमशः ब्स⊕ ए त्⊕ए त्ब्⊕व् ;ऐसीलियम आयनद्ध देता है। नाइट्रोकरण के संदभर् में सल्फ्रयूरिक अम्ल से नाइटिªक अम्ल को प्रोटाॅन के स्थानांतरण पर इलेक्ट्राॅनस्नेही नाइट्रोनियम ⊕आयन ;छव्2 द्ध इस प्रकार बनता हैμप्रोट्रोनीवृफत नाइटिªक अम्ल यह रोचक तथ्य है कि नाइट्रोनियम आयन की उत्पिा कीप्रवि्रफया में सल्फ्रयूरिक अम्ल, अम्ल की भाँति तथा नाइटिªक अम्ल, क्षारक की भाँति कायर् करता है। अतः यह साधरण अम्ल - क्षारक साम्य है। ;खद्ध काबर्ध्नायन ;ऐरीनोनियम आयनद्ध का बनना इलेक्ट्राॅनस्नेही के आव्रफमण से σ संकर या ऐरीनोनियम आयन बनता है, जिसमें एक काबर्न ेच3 संकरित अवस्था में होता है।सिग्मा संवुफल ;ऐरेनोनियम आयनद्ध सिग्मा संवुफल या ऐरीनोनियम आयन के ेच3 संकरित काबर्न परमाणु पर इलेक्ट्राॅन का विस्थानीकरण रुक जाता है, जिसके कारण यह ऐरोमैटिक गुण खो देता है। ;गद्ध प्रोटाॅन का विलोपनμ ऐरोमैटिक गुण को पुनः स्थापित करने के लिए σ संवुफल ेच3 संकरित काबर्न पर ।सब्सदृ 4 ;हैलोजनन, ऐल्िकलन तथा ऐसिलन के संदभर् मेंद्ध अथवा भ्ैव्दृ ;नाइट्रोकरण के संदभर् मेंद्ध के आव्रफमण द्वारा प्रोटाॅन4का विलोपन करता है। योगज अभ्िाियाएं प्रबल परिस्िथतियों जैसेμउच्च ताप एवं दाब पर निवैफल उत्प्रेरक की उपस्िथति में बेन्जीन हाइड्रोजनीकरण यानी हाइड्रोजनन द्वारा साइक्लोहेक्सेन बनाती है। साइक्लोहेक्सेन ;13ण्80द्ध पराबैंगनी प्रकाश की उपस्िथति में तीन क्लोरीन अणु बेन्जीन वलय पर संयोजित होकर बेन्जीनहैक्साक्लोराइड ब्भ्ब्स666 बनाते हैं, जिसे गैमेक्सीन भी कहते हैं। बेन्जीनहेक्साक्लोराइड ;13ण्81द्ध दहनμ बेन्जीन को वायु की उपस्िथति में गरम करने पर कज्जली लौ के साथ ब्व् एवं भ्व् बनती है।2215ब्भ् ़ व् → 6ब्व् ़ 3भ् व् 662 22 ;13ण्82द्ध2 किसी हाइड्रोकाबर्न की सामान्य दहन अभ्िावि्रफया को निम्नलिख्िात रासायनिक अभ्िावि्रफया द्वारा प्रद£शत किया जाता हैμ ब्भ् ़ ;ग ़ ल द्ध व्2 → ग ब्व्2 ़ ल भ्2व् ;13ण्83द्धगल42 13.5.6 एकल प्रतिस्थापित बेन्जीन में वि्रफयात्मक समूह का निदेर्शात्मक प्रभाव यदि एकल प्रतिस्थापित बेन्जीन का पुनः प्रतिस्थापन कराया जाए तो तीनों संभावित द्विप्रतिस्थापित उत्पाद समान मात्रा में नहीं बनते हैं। यहाँ दो प्रकार के व्यवहार देखे गए हैंμ ;पद्ध आॅथो± एवं पैरा उत्पादन या ;पपद्ध मेटा उत्पादन। यह भी देखा गया है कि यह व्यवहार पहले से उपस्िथत प्रतिस्थापी की प्रवृफति पर निभर्र करता है, न कि आने वाले समूह की प्रवृफति पर। इसे प्रतिस्थापियों का निदेर्शात्मक प्रभाव कहते हैं। समूहों की विभ्िान्न निदेर्शात्मक प्रवृफति का कारण नीचे व£णत किया गया हैμ आथोर् एवं पैरा निदेर्शी समूहμ वे समूह जो आने वाले समूह को आॅथो± एवं पैरा स्िथति पर निदिर्ष्ट करते हैं, उन्हें आथो± तथा पैरा निदेर्शी समूह कहते हैं। उदाहरणस्वरूपμ हम पफीनाॅलिक समूह के निदेर्शात्मक प्रभाव की व्याख्या करते हैं। पफीनाॅल अनुनादी संरचनाओं से स्पष्ट है कि व.एवं च.स्िथति पर इलेक्ट्राॅन घनत्व अध्िक है। अतः मुख्यतः इन्हीं स्िथतियों पर प्रतिस्थापन होगा। यद्यपि ध्यान रखने योग्य बात यह है कि .व्भ् समूह का .प् प्रभाव भी कायर् करता है, जिससे बेन्जीन वलय की व.एवं च.स्िथति पर वुफछ इलेक्ट्राॅन घनत्व घटेगा, किंतु अनुनाद के कारण इन स्िथतियों पर व्यापक इलेक्ट्राॅन घनत्व बहुत कम घटेगा। अतः .व्भ् समूह बेन्जीन वलय को इलेक्ट्राॅनस्नेही के आव्रफमण के लिए सवि्रफय कर देते हैं। वुफछ अन्य सवि्रफयकारी समूह के उदाहरणμ छभ्ए .छभ्त्ए 2छभ्ब्व्ब्भ्ए .व्ब्भ्ए.ब्भ्ए.ब्भ्ए हैं।33325ऐरिल हैलाइड में हैलोजन यद्यपि विसियकारी है, परंतु प्रबल .प् प्रभाव के कारण ये बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्राॅन घनत्व कम कर देते हैं, जिससे पुनः प्रतिस्थापन कठिन हो जाता है। हालाँकि अनुनाद के कारण व.एवं च.स्िथति पर इलेक्ट्राॅन घनत्व उदृ स्िथति से अध्िक है। अतः ये भी व.एवं च.निदेर्शी समूह है। मेटा निदेर्शी समूहμ वे समूह, जो आने वाले समूह को मेटा स्िथति पर निदिर्ष्ट करते हैं, उन्हें मेटा निदेर्शी समूह कहते हैं। वुफछ मेटा निदेर्शी समूह के उदाहरण .छव्ए.ब्छए2ब्भ्व्ए .ब्व्त्ए.ब्व्व्भ्ए.ब्व्व्त्ए.ैव्भ् आदि हैं। आइए,3नाइट्रोसमूह का उदाहरण लेते हैं। नाइट्रो समूह प्रबल - प् प्रभाव के कारण बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्राॅन घनत्व कम कर देता है। नाइट्रोबेन्जीन निम्नलिख्िात संरचनाओं का अनुनाद संकर हैμ नाइट्रोबेन्जीन में बेन्जीन वलय पर व्यापक इलेक्ट्राॅन घनत्व घट जाता है, जो पुनः प्रतिस्थापन को कठिन बनाता है। अतः इन समूहों को निष्िक्रयकारी समूह कहते हैं। मेटा स्िथति की तुलना में व.एवं च.स्िथति पर इलेक्ट्राॅन घनत्व कम होता है। परिणामतः इलेक्ट्राॅनस्नेही तुलनात्मक रूप में इलेक्ट्राॅनध्नी स्िथति ;मेटाद्ध पर आव्रफमण करता है एवं प्रतिस्थापन मेटा स्िथति पर होता है। 13.6 वैंफसरजन्य गुण तथा विषाक्तता बेन्जीन तथा बहुलवेंफद्रकीय हाइड्रोकाबर्न, जिनमें दो से अिाक जुड़ी हुइर् वलय हों, विषाक्त तथा वैंफसर जनित ;वैंफसरजनीद्धगुण दशार्ते हैं। बहुलवेंफद्रकीय हाइड्रोकाबर्न, काबर्निक पदाथो±जैसेμतंबावूफ, कोल तथा पेट्रोलियम के अपूणर् दहन से बनतेहैं, जो मानव शरीर में प्रवेश कर विभ्िान्न जैव रासायनिकअभ्िावि्रफयाओं द्वारा डी.एन.ए. को अंततः नष्ट कर वैंफसर उत्पÂ करते हैं। वुफछ वैंफसरजनी हाइड्रोकाबर्न नीचे दिए गए हैंμ 13.1 मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान ऐथेन वैफसे बनती है? आप इसे वैफसे समझाएँगे। 13.2 निम्नलिख्िात यौगिकों के प्न्च्।ब् नाम लिख्िाएμ ;कद्ध ब्भ्ब्भ्त्रब्;ब्भ्द्ध;खद्ध ब्भ्त्रब्भ्.ब् ≡ ब्.ब्भ्332 23 ;गद्ध ;घद्ध दृब्भ्2दृब्भ्2दृब्भ्त्रब्भ्2 ब्भ्;ब्भ्द्ध ब्भ्;ब्भ्द्धब्भ् 3 24 23 3 ;चद्ध ;छद्ध द्य ब्भ्2 ब्भ्;ब्भ् द्ध 3 2 ;जद्ध ब्भ्दृ ब्भ् त्र ब्भ् दृ ब्भ् दृ ब्भ् त्र ब्भ् दृ ब्भ् दृ ब्भ् दृ ब्भ् त्र ब्भ्3 2 22द्य ब्2भ्5 13.3 निम्नलिख्िात यौगिकों, जिनमें द्विआबंध् तथा त्रिाआबंध् की संख्या दशार्यी गइर् है, के सभी संभावित स्िथति समावयवों के संरचना - सूत्रा एवं प्न्च्।ब् नाम दीजिएμ ;कद्ध ब्भ्;एक द्विआबंध्द्ध ;खद्ध ब्भ् ;एक त्रिाआबंध्द्ध48 5813.4 निम्नलिख्िात यौगिकों के ओजोनी - अपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिख्िाएμ ;पद्ध पेन्ट - 2 - इर्न ;पपद्ध 3, 4 - डाइर्मेथ्िाल - हेप्ट - 3 - इर्न ;पपपद्ध 2 - एथ्िालब्यूट - 1 - इर्न ;पअद्ध 1 - पेफनिलब्यूट - 1 - इर्न 13.5 एक एल्कीन श्।श् के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन - 3 - ओन तथा ऐथेनाॅल का मिश्रण प्राप्त होता है। । का प्न्च्।ब् नाम तथा संरचना दीजिए। 13.6 एक ऐल्केन । में तीन ब्.ब्ए आठ ब्.भ् सिग्मा आबंध् तथा एक ब्.ब् पाइर् आबंध् हैं। । ओजोनी अपघटन से दो अणु ऐल्िडहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। । का आइर्.यू.पी.ए.सी. नाम लिख्िाए। 13.7 एक एल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनाॅल तथा पेन्टेन - 3 - ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्रा क्या है? 13.8 निम्नलिख्िात हाइड्रोकाबर्नों के दहन की रासायनिक अभ्िावि्रफया लिख्िाएμ ;पद्ध ब्यूटेन ;पपद्ध पेन्टीन ;पपपद्ध हैक्साइन ;पअद्ध टाॅलूइन 13.9 हैक्स - 2 - इर्न की समपक्ष ;सिसद्ध तथा विपक्ष ;ट्रांसद्ध संरचनाएं बनाइए। इनमें से कौन - से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों? 13.10 बेन्जीन में तीन द्वि - आबंध् होते हैं, पिफर भी यह अत्यध्िक स्थायी है, क्यों? 13.11 किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रद£शत करने के लिए आवश्यक शते± क्या हैं? 13.12 इनमें में कौन से निकाय ऐरोमैटिक नहीं हैं? कारण स्पष्ट कीजिएμ ;पद्ध ;पपद्ध ;पपपद्ध 13.13 बेन्जीन को निम्नलिख्िात में वैफसे परिव£तत करेंगेμ ;पद्ध च.नाइट्रोब्रोमोबेन्जीन ;पपद्ध उ दृनाइट्रोक्लोरोबेन्जीन ;पपपद्ध च.नाइट्रोटाॅलूइर्न ;पअद्ध ऐसीटोपफीनोन 13.14 ऐल्केन भ्3ब्दृ ब्भ्2 दृ ब्दृ ;ब्भ्3द्ध2 दृ ब्भ्2 दृ ब्भ्;ब्भ्3द्ध2 में 1°ए2° तथा 3° काबर्न परमाणुओं की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक काबर्न से आबंध्ित वुफल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए। 13.15 क्वथनांक पर ऐल्केन की शृंखला के शाखन का क्या प्रभाव प्रड़ता है? 13.16 प्रोपीन पर भ्ठत के संकलन से 2 - ब्रोमोप्रोपेन बनता है, जबकि बेन्जाॅयल पराॅक्साइड की उपस्िथति में यह अभ्िावि्रफया 1 - ब्रोमोप्रोपेन देती है। वि्रफयाविध्ि की सहायता से इसका कारण स्पष्ट कीजिए। 13.17 1, 2 - डाइमेथ्िालबेन्जीन;व - जाइलीनद्ध के ओजोनी अपघटन के पफलस्वरूप निमिर्त उत्पादों को लिख्िाए। यह परिणाम बेन्जीन की केवुफले संरचना की पुष्िट किस प्रकार करता है? 13.18 बेन्जीन, द.हैक्सेन तथा एथाइन को घटते हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्िथत कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए। 13.19 बेन्जीन इलेक्ट्राॅनस्नेही प्रतिस्थापन अभ्िावि्रफयाएं सरलतापूवर्क क्यों प्रद£शत करती हैं, जबकि उसमें नाभ्िाकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है? 13.20 आप निम्नलिख्िात यौगिकों को बेन्जीन में वैफसे परिवतिर्त करेंगे? ;पद्ध एथाइन ;पपद्ध एथीन ;पपपद्ध हैक्सेन 13.21 उन सभी एल्कीनों की संरचनाएं लिख्िाए, जो हाइड्रोजेनीकरण करने पर 2 - मेथ्िालब्यूटेन देती है। 13.22 निम्नलिख्िात यौगिकों को उनकी इलेक्ट्राॅनस्नेही ;म़्द्ध के प्रति घटती आपेक्ष्िाक वि्रफयाशीलता के व्रफम में व्यवस्िथत कीजिएμ ;कद्ध क्लोरोबेन्जीन, 2,4 - डाइनाइट्रोक्लोरोबेन्जीन, च.नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन ;खद्ध टाॅलूइन, च.भ्3ब् दृ ब्6भ्4 दृ छव्2ए च.व्2छ दृ ब्6भ्4 दृ छव्2 13.23 बेन्जीन, उ.डाइनाइट्रोबेन्जीन तथा टाॅलूइर्न में से किसका नाइट्रोकरण आसानी से होता है और क्यों? 13.24 बेन्जीन के एथ्िालीकरण में निजर्ल ऐलुमीनियम क्लोराइड के स्थान पर कोइर् दूसरा लूइस अम्ल सुझाइए। 13.25 क्या कारण है कि वुट्शर् अभ्िावि्रफया से विषम संख्या काबर्न परमाणु वाले विशु( ऐल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती। एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।

>Unit-13>
Rasayanbhag2-006

एकक 13

हाइड्रोकार्बन
Hydrocarbon

उद्देश्य

इस एकक के अध्ययन के पश्चात् आप :

  • नामकरण की आई.यू.पी.ए.सी. पद्धति के अनुसार हाइड्रोकार्बनों का नाम बता सकेंगे;
  • एेल्केन, एल्कीन, एल्काइन तथा एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बन के समावयवों की पहचान कर सकेंगे तथा उनकी संरचना लिख सकेंगे;
  • हाइड्रोकार्बन के विरचन की विभिन्न विधियों के बारे में सीखेंगे;
  • भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्म के आधार पर एेल्केन, एल्कीन, एल्काइन तथा एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों में विभेद कर सकेंगे;
  • एथेन के विभिन्न संरूपणों (कॉन्फॉर्मेशनों) के आरेख बनाकर उनमें विभेद कर सकेंगे;
  • हाइड्रोकार्बन की भूमिका का ऊर्जा के स्रोत के रूप में तथा अन्य औद्योगिक अनुप्रयोगों में महत्त्व बता सकेंगे;
  • इलेक्ट्रॉनिक क्रियाविधि के आधार पर असममित एल्कीनों तथा एल्काइनों के संकलन उत्पादों के बनने का अनुमान कर सकेंगे;
  • बेन्जीन की संरचना का वर्णन, एेरोमैटिकता एवं इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन-अभिक्रियाओं की क्रियाविधि की व्याख्या कर सकेंगे;
  • एकल प्रतिस्थापी बेन्जीनवलय पर प्रतिस्थापियों के निर्देशात्मक प्रभाव की व्याख्या कर सकेंगे; तथा
  • कैन्सरजन्यता तथा विषाक्तता के विषय में सीख सकेंगे।


"हाइड्रोकार्बन ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है।"

हाइड्रोकार्बन पद स्वतः स्पष्ट है, जिसका अर्थ केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन के यौगिक है। हमारे दैनिक जीवन में हाइड्रोकार्बन का महत्त्वपूर्ण योगदान है। आप एलपीजी, सीएनजी आदि संक्षिप्त शब्दों से परिचित होंगे, जो ईंधन के रूप में उपयोग में लाए जाते हैं। एलपीजी द्रवित पेट्रोलियम गैस का, जबकि सीएनजी संघनित प्राकृतिक गैस का संक्षिप्त रूप है। आजकल दूसरा संक्षिप्त शब्द एलएनजी (द्रवित प्राकृतिक गैस) प्रचलन में है। यह भी ईंधन है, जो प्राकृतिक गैस के द्रवीकरण से प्राप्त होता है। पेट्रोलियम, जो भू-पर्पटी के नीचे पाया जाता है, के प्रभावी आसवन (fractional distillation) से पेट्रोल, डीजल तथा कैरोसिन प्राप्त होते हैं। कोल गैस, कोल के भंजक आसवन (destructive distiliation) से प्राप्त होती है। प्राकृतिक गैसें तेल के कुओं की खुदाई के दौरान ऊपरी स्तर में पाई जाती है। संपीडन के पश्चात् प्राप्त गैसों को ‘संपीडित प्राकृतिक गैस’ कहते हैं। एलपीजी का उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में होता है, जो सबसे कम प्रदूषण वाली गैस है। कैरोसिन का भी उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता है, लेकिन इससे कुछ प्रदूषण फैलता है। स्वचालित वाहनों को ईंधन के रूप में पेट्रोल, डीजल तथा सीएनजी की आवश्यकता होती है। पेट्रोल तथा सीएनजी से चलने वाले स्वचालित वाहन कम प्रदूषण फैलाते हैं। ये सभी ईंधन हाइड्रोकार्बन के मिश्रण होते हैं, जो ऊर्जा के स्रोत हैं। हाइड्रोकार्बन का उपयोग पॉलिथीन, पॉलिप्रोपेन, पॉलिस्टाइरीन आदि बहुलकों के निर्माण में किया जाता है। उच्च अणुभार वाले हाइड्रोकार्बनों का उपयोग पेन्ट में विलायक के रूप में और रंजक तथा औषधियों के निर्माण में प्रारंभिक पदार्थ के रूप में भी किया जाता है।

अब आप दैनिक जीवन में हाइड्रोकार्बन के महत्त्वपूर्ण उपयोग को अच्छी तरह समझ गए हैं। इस एकक में हाइड्रोकार्बनों के बारे में और अधिक जानेंगे।

13.1 वर्गीकरण

हाइड्रोकार्बन विभिन्न प्रकार के होते हैं। कार्बन-कार्बन आबंधों की प्रकृति के आधार पर इन्हें मुख्यतः तीन समूहों में वर्गीकृत किया गया है– (1) संतृप्त, (2) असंतृप्त तथा (3) एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बन। संतृप्त हाइड्रोकार्बन में कार्बन-कार्बन तथा कार्बन-हाइड्रोजन एकल आबंध होते हैं। यदि विभिन्न कार्बन परमाणु आपस में एकल आबंध से जुड़कर विवृत शृंखला बनाते हैं, तो उन्हें ‘एेल्केन’ कहते हैं, जैसाकि आप एकक-12 में पढ़ चुके हैं। दूसरी ओर यदि कार्बन परमाणु संवृत शृंखला या वलय का निर्माण करते हैं, तो उन्हें ‘साइक्लोएेल्केन’ कहा जाता है। असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों में कार्बन-कार्बन बहुआबंध जैसे द्विआबंध, त्रिआबंध या दोनों उपस्थित होते हैं। एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बन संवृत यौगिकों का एक विशेष प्रकार है। आप कार्बन की चतुर्संयोजकता तथा हाइड्रोजन की एकल संयोजकता को ध्यान में रखते हुए (विवृत शृंखला या संवृत शृंखला) अनेक अणुओं के मॉडल बना सकते हैं। एेल्केनों के मॉडल बनाने के लिए आबंधों के लिए टूथपिक तथा परमाणुओं के लिए प्लास्टिक की गेंदों का उपयोग हम कर सकते हैं। एल्कीन, एल्काइन तथा एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों के लिए स्प्रिंग मॉडल बनाए जा सकते हैं।

13.2 एेल्केन

जैसा पहले बताया जा चुका है, एेल्केन कार्बन-कार्बन एकल आबंधयुक्त संतृप्त विवृत शृंखला वाले हाइड्रोकार्बन है। मेथैन (CH4) इस परिवार का प्रथम सदस्य है। मेथैन एक गैस है, जो कोयले की खानों तथा दलदली क्षेत्रों में पाई जाती है। अगर आप मेथैन के एक हाइड्रोजन परमाणु को कार्बन के द्वारा प्रतिस्थापित कर तथा हाइड्रोजन परमाणु की आवश्यक संख्या जोड़कर दूसरे कार्बन की चतुर्संयोजकता को संतुष्ट करते हैं, तो आपको क्या प्राप्त होगा? आपको C2H6 प्राप्त होगा। वह हाइड्रोकार्बन, जिसका अणुसूत्र C2H6 है, एथेन कहलाती है। अतः आप CH4 के एक हाइड्रोजन परमाणु को –CH3 समूह द्वारा प्रतिस्थापित करके C2H6 के रूप में प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्रकार हाइड्रोजन को मेथिल (CH3) समूह द्वारा प्रतिस्थापित करके आप अन्य कई एेल्केन बना सकते हैं। इस प्रकार प्राप्त अणु C3H8, C4 H10 इत्यादि होंगे।

ये हाइड्रोकार्बन सामान्य अवस्थाओं में निष्क्रिय होते हैं क्योंकि ये अम्लों और अन्य अभिकर्मकों से अभिक्रिया नहीं करते। अतः प्रारंभ में इन्हें पैराफिन (Parum=कम Affinis=क्रियाशील) कहते थे। क्या आप एेल्केन परिवार या सजातीय श्रेणी (homologous series) के सामान्य सूत्र के बारे में कुछ अनुमान लगा सकते हैं। यदि हम विभिन्न एेल्केनों के सूत्रों का अध्ययन करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि एेल्केन का सामान्य सूत्र CnH2n+2 है। जब n को कोई उपर्युक्त मान दिया जाता है तो यह विशेष सजातीय (homologoue) का प्रतिनिधित्व करता है। क्या आप मेथेन की संरचना का स्मरण कर सकते हैं? संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण सिद्धांत (VSEPR) के अनुसार (एकक- 4 देखिए) मेथेन की संरचना चतुष्फलीय होती है (चित्र 13.1) जो बहुसमतलीय है जिसमें कार्बन परमाणु केंद्र में तथा चार हाइड्रोजन परमाणु समचतुष्फलक के चारों कोनों पर स्थित हैं। इस प्रकार प्रत्येक H–C का बंध कोण 109.50 होता है।

चित्र 13.1 मेथैन (CH4) की चतुष्फलक संरचना

एेल्केनों के चतुष्फलक आपस में जुड़े रहते हैं, जिनमें C-C तथा C-H आबंधों की लंबाइयाँ क्रमशः 154 pm और 112 pm होती हैं (एकक-12 देखिए)। आप पहले अध्ययन कर चुके हैं कि C-C तथा C-Hσ (सिग्मा) आबंध का निर्माण कार्बन परमाणु के संकरित sp3 तथा हाइड्रोजन परमाणुओं के 1s के समाक्षीय अतिव्यापन से होता है।

13.2.1 नाम पद्धति तथा समावयवता

एकक-12 में आप विभिन्न कार्बनिक यौगिकों की श्रेणियों की नाम पद्धति की बारे में अध्ययन कर चुके हैं। एेल्केन में नाम पद्धति तथा समावयवता को कुछ और उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। साधारण नाम कोष्ठक में दिए गए हैं। प्रथम तीन सदस्य मेथैन, एथेन तथा प्रोपेन में केवल एक संरचना पाई जाती है, जबकि उच्च एेल्केनो में एक से अधिक संरचना भी हो सकती है। C4H10 की संरचना लिखने पर चार कार्बन परमाणु आपस में सतत् शृंखला अथवा शाखित शृंखला के द्वारा जुड़े रहते हैं।

I        

ब्यूटेन (n- ब्यूटेन) (क्वथनांक 237 K) और

II         

2-मेथिलप्रोपेन (आइसोब्यूटेन)

(क्वथनांक 261K)

C5H12 में आप किस प्रकार पाँच कार्बन तथा बारह हाइड्रोजन परमाणुओं को जोड़ सकते हैं? इन्हें तीन प्रकार से व्यवस्थित कर सकते हैं, जैसा संरचना III-V में दिखाया गया है।
III   

पेन्टेन (n- पेन्टेन)

(क्वथनांक 309 K)

IV   

2-मेथिलब्यूटेन (आइसोपेन्टेन)

(क्वथनांक 301K)

V    

2, 2-डाइमेथिलप्रोपेन (नियोपेन्टेन)

(क्वथनांक 282.5K)

संरचना I तथा II का अणु सूत्र समान है, किंतु क्वथनांक तथा अन्य गुणधर्म भिन्न हैं। इसी प्रकार संरचनाओं III, IV तथा V के अणु सूत्र समान हैं, किंतु क्वथनांक तथा गुणधर्म भिन्न हैं। संरचना I तथा II ब्यूटेन के समावयव हैं, जबकि संरचना III, IV तथा V पेन्टेन के समावयव हैं। इनके गुणधर्मों में अंतर इनकी संरचनाओं में अंतर के कारण है। अतः इन्हें ‘संरचनात्मक समावयव’ (structural isomers) कहना उत्तम रहेगा। संरचना I तथा III में सतत् कार्बन परमाणुओं की शृंखला है, जबकि संरचना II, IV तथा V में शाखित कार्बन शृंखला है। अतः एेसे संरचनात्मक समावयवी, जो कार्बन परमाणुओं की

शृंखला में अंतर के कारण होते हैं, को ‘ शृंखला समावयव’ (chain isomers) कहते हैं। अतः आपने देखा कि C4H10 तथा C5H12 में क्रमशः दो तथा तीन शृंखला समावयव होते हैं।

उदाहरण 13.1

अणुसूत्र C6H14 वाली एेल्केन के विभिन्न शृंखला- समावयवों की संरचना तथा आई.यू.पी.सी नाम लिखिए।

हल

(i) CH3 CH2 CH2 CH2 CH2 CH3

n-हैक्सेन

(i) CH3 CH CH2 CH2 CH3

                     |

               CH3                                                                                                        2-मेथिलपेन्टेन

(iii)

3-मेथिलपेन्टेन

(iv)

2,3-डाइमेथिलब्यूटेन

(v)

2,2-डाइमेथिलब्यूटेन

कार्बन परमाणु से जुड़े हुए अन्य कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर कार्बन परमाणुओं को प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°), तृतीयक (3°) तथा चतुष्क (4°) कार्बन परमाणु कहते हैं। कार्बन परमाणु (जो अन्य कार्बन से नहीं जुड़ा हो, जैसे- मेथैन) में अथवा केवल एक कार्बन परमाणु से जुड़ा हो जैसे- एथेन में उसे ‘प्राथमिक कार्बन’ कहते हैं। अंतिम सिरे वाले परमाणु सदैव प्राथमिक होते हैं। कार्बन परमाणु, जो दो कार्बन परमाणु से जुड़ा हो, उसे ‘द्वितीयक’ कहते हैं। तृतीयक कार्बन तीन कार्बन परमाणुओं से तथा नियो या चतुष्क कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़े होते हैं। क्या आप संरचनाएँ I से V में 1° 2° 3° तथा 4° कार्बन परमाणुओं की पहचान कर सकते हैं? यदि आप उच्चतर एेल्केनों की संरचनाएं बनाते रहेंगे, तो कई प्रकार के समावयव प्राप्त होंगे। C6H14 के पाँच, C7H16 के नौ तथा C10H22 के 75 समावयव संभव हैं।

संरचना II, IV तथा V में आपने देखा है कि –CH3 समूह कार्बन क्रमांक –2 से जुड़ा है। एेल्केन के कार्बन परमाणुओं या अन्य वर्गों के यौगिकों में –CH3,–C2H5,–C3H7 जैसे समूहों को ‘एेल्किल समूह’ कहा जाता है, क्याेंकि उन्हें एेल्केन से हाइड्रोजन परमाणु के विस्थापन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। एेल्किल समूह का सामान्य सूत्र CnH2n+1 (एकक-12) है।


उदाहरण 13.2

C5H11 अणुसूत्र वाले एेल्किल समूह के विभिन्न समावयवों की संरचनाएँ लिखिए तथा विभिन्न कार्बन शृंखला पर –OH जोड़ने से प्राप्त एेल्कोहॉलों के आई.यू.पी.ए.सी. नाम बताइए।

एकक 12 में पहले से चर्चित नाम पद्धति के सामान्य नियमों का स्मरण करते हुए प्रतिस्थापित एेल्केनों के निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा नामकरण की अवधारणा को आप भली-भाँति समझ सकेंगे।

हल

image01

यदि दी गई संरचना का सही IUPAC नाम लिखना महत्त्वपूर्ण है, तो IUPAC नाम से सही संरचना कुछ कार्बनिक यौगिकों का नामकरण-सूत्र लिखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए सर्वप्रथम जनक एेल्केन के कार्बन परमाणुओं की दीर्घतम शृंखला को लिखेंगे। तत्पश्चात् उनका अंकन किया जाएगा। जिस कार्बन परमाणु पर प्रतिस्थापी जुड़ा हुआ है तथा अंत में हाइड्रोजन परमाणुओं की यथेष्ट संख्या द्वारा कार्बन परमाणु की संयोजकता को संतुष्ट किया जाएगा।


उदाहरण 13.3

निम्नलिखित यौगिकों के आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए-

(i) (CH3)3 CCH2C(CH3)3

(ii) (CH3)2C(C2H5)2

(iii) टेट्रा-तृतीयक (टर्शियरी)-ब्यूटिलमेथेन

हल

(i) 2, 2, 4, 4-टेट्रामेथिलपेन्टेन

(ii) 3, 3-डाइमेथिलपेन्टेन

(iii) 3, 3-डाइ. तृतीयक (टर्शियरी)-ब्यूटिल-2, 2, 4, 4 -टेट्रामेथिलपेन्टेन

image02


उदाहरणार्थ–3-एथिल-2, 2-डाइमेथिलपेन्टेन की संरचना को निम्नलिखित पदों के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(i) पाँच कार्बन परमाणुओं की शृंखला बनाइए–

C-C-C-C-C

(ii) कार्बन परमाणुओं को अंकन दीजिए–

C1–C2–C3–C4–C5

(iii) कार्बन-3 पर एक एथिल-समूह तथा कार्बन-2 पर दो मेथिल-समूह जोड़िए–

image03

(iv) प्रत्येक कार्बन परमाणु की संयोजकता को हाइड्रोजन परमाणुओं की आवश्यक संख्या से संतुष्ट कीजिए।

इस प्रकार हम सही संरचना पर पहुँच जाते हैं। यदि आप दिए गए नाम को संरचना-सूत्र में लिखना समझ चुके हैं, तो निम्नलिखित प्रश्नों को हल कीजिए–

उदाहरण 13.4

निम्नलिखित यौगिकों के संरचनात्मक सूत्र लिखिए–

(i) 3, 4, 4, 5–टेट्रामेथिलहेप्टेन

(ii) 2,5-डाइमेथिलहेक्सेन

हल

image04


उदाहरण 13.5

निम्नलिखित यौगिकों की संरचनाएँ लिखिए। दिए गए नाम अशुद्ध क्यों हैं? सही आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए।

(i) 2-एथिलपेन्टेन

(ii) 5-एथिल-3-मेथिलहेप्टेन

हल

इस यौगिक में दीर्घतम शृंखला पाँच कार्बन की न होकर छः कार्बन की होती है। अतः सही नाम 3-मेथिलहेक्सेन है।

image05

इस यौगिक में अंकन उस छोर से प्रारंभ करेंगे, जहाँ से एेथिल समूह को कम अंक मिले। अतः सही नाम 3-एेथिल- 5-मेथिलहेप्टेन है।

13.2.2 विरचन

एेल्केन के मुख्य स्रोत पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस हैं फिर भी एेल्केनों को इन विधियों द्वारा बनाया जा सकता है–

1. असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों से–

डाइहाइड्रोजन गैस सूक्ष्म विभाजित उत्प्रेरक (जैसे- प्लैटिनम, पैलेडियम तथा निकेल) की उपस्थिति में एल्कीन के साथ योग कर एेल्केन बनाती है। इस प्रक्रिया को हाइड्रोजनीकरण (Hydrogenation) कहते हैं। ये धातुएं हाइड्रोजन गैस को अपनी सतह पर अधिशोषित करती हैं और हाइड्रोजन-हाइड्रोजन आबंध को सक्रिय करती हैं। प्लैटिनम तथा पैलेडियम, कमरे के ताप पर ही अभिक्रिया को उत्प्रेरित कर देती है, परंतु निकैल उत्प्रेरक के लिए आपेक्षिक रूप से उच्च ताप तथा दाब की आवश्यकता होती है।

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2. एेल्किल हैलाइडों से–

(i) एेल्किल हैलाइडों (फ्लुओराइडों के अलावा) का जिंक तथा तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल द्वारा अपचयन करने पर एेल्केन प्राप्त होते हैं।

image08

(ii) शुष्क ईथरीय विलयन (नमी से मुक्त) में एेल्किल हैलाइड की सोडियम धातु के साथ अभिक्रिया द्वारा उच्चतर एेल्केन प्राप्त होते हैं। इस अभिक्रिया को वुर्ट्ज अभिक्रिया (wurtz reaction) कहते हैं। यह सम कार्बन परमाणु संख्या वाली उच्चतर एेल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती है।

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क्या होगा, यदि दो असमान एेल्किल हैलाइड लेते हैं?

3. कार्बोक्सिलिक अम्लों से–

(i) कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम लवण को सोडा लाइम (सोडियम हाइड्रॉक्साइड एवं कैल्सियम अॉक्साइड के मिश्रण) के साथ गरम करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल से एक कम कार्बन परमाणु वाले एेल्केन प्राप्त होते हैं। कार्बोक्सिलिक अम्ल से कार्बन डाइअॉक्साइड के इस विलोपन को विकार्बोक्सिलीकरण (decarbo- rytation) कहते हैं।

सोडियम एथेनोएट

उदाहरण 13.6

प्रोपेन के विरचन के लिए किस अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होगी। अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण भी लिखिए।

हल

ब्यूटेनोइक अम्ल

(ii) कोल्बे की विद्युत्-अपघटनीय विधि कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम अथवा पोटैशियम लवणों के जलीय विलयन का विद्युत्-अपघटन करने पर एेनोड पर सम कार्बन परमाणु संख्या वाले एेल्केन प्राप्त होते हैं।

image10

यह अभिक्रिया निम्नलिखित पदों में संपन्न होती है-

image11

(ख) एनोड पर–

image12

(ग)image13

(घ) कैथोड पर–

मेथेन इस विधि द्वारा नहीं बनाई जा सकती, क्यों?

13.2.3 गुणधर्म

भौतिक गुणधर्म

एल्केन अणुओं में C–C तथा C–H आबंध के सहसंयोजक गुण तथा कार्बन एवं हाइड्रोजन परमाणुओं की विद्युत् ऋणात्मकता में बहुत कम अंतर के कारण लगभग सभी एेल्केन अध्रुवीय होते हैं। इनके मध्य दुर्बल वान्डरवाल्स बल पाए जाते हैं। दुर्बल बलों के कारण एेल्केन श्रेणी के प्रथम चार सदस्य C1 से C4 तक गैस, C5 से C17 तक द्रव तथा C18 या उससे अधिक कार्बन युक्त एेल्केन 298K पर ठोस होते हैं। ये रंगहीन तथा गंधहीन होते हैं। जल में एेल्केन की विलेयता के लिए आप क्या सोचते हैं? पेट्रोल, हाइड्रोकार्बन का मिश्रण है, जिसका उपयोग स्वचालित वाहनों में ईंधन के रूप में किया जाता है। पेट्रोल तथा उसके निम्न प्रभाजों का उपयोग कपड़ों से ग्रीस के धब्बे हटाने, उनकी निर्जल धुलाई करने आदि के लिए किया जाता है।

इस प्रेक्षण के आधार पर ग्रीसी पदार्थाें की प्रकृति के बारे में आप क्या सोचते हैं? आप सही हैं यदि आप कहते हैं कि ग्रीस (उच्च एेल्केनों का मिश्रण) अध्रुवीय है अतः यह जल विरोधी प्रकृति का होगा तो विलायकों में पदार्थों की विलेयता के संबंध में सामान्यतः यह देखा गया है कि ध्रुवीय पदार्थ, ध्रुवीय विलायकों जबकि अध्रुवीय पदार्थ अध्रुवीय विलायकों में विलेय होते हैं, अर्थात् "समान समान को घोलता है"।

विभिन्न एल्केनों के क्वथनांक सारणी 13.1 (क) में दिए गए हैं, जिसमें यह स्पष्ट है कि आण्विक द्रव्यमान में वृद्धि के साथ- साथ उनके क्वथनांकों में भी नियत वृद्धि होती है। यह इस तथ्य पर आधारित है कि आण्विक आकार अथवा अणु का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने के साथ-साथ उनमें आंतराण्विक वान्डरवाल्स बल बढ़ते हैं।

पेन्टेन के तीन समावयव एेल्केनों (पेन्टेन, 2-मेथिल ब्यूटेन तथा 2, 2- डाइमेथिलप्रोपेन) के क्वथनांकों को देखने से यह पता लगता है कि पेन्टेन में पाँच कार्बन परमाणुओं की एक सतत् शृंखला का उच्च क्वथनांक (309.1K) है, जबकि 2.2- डाइमेथिलप्रोपेन 282.5K पर उबलती है। शाखित शृंखलाओं की संख्या के बढ़ने के साथ-साथ अणु की आकृति लगभग गोल हो जाती है, जिससे गोलाकार अणुओं में कम आपसी संपर्क स्थल तथा दुर्बल अंतराण्विक बल होते हैं। इसलिए इनके क्वथनांक कम होते हैं।

रासायनिक गुणधर्म

जैसा पहले बताया जा चुका है– अम्ल, क्षारक, अॉक्सीकारक (अॉक्सीकरण कर्मक) एवं अपचायक (अपचयन कर्मक) पदार्थों के प्रति एेल्केन सामान्यतः निष्क्रिय होते हैं। विशेष परिस्थितियों में एेल्केन इन अभिक्रियाओं को प्रदर्शित करता है–

1. प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं

एल्केन के एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु हैलोजन, नाइट्रोजन तथा सल्फोनिक अम्ल द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। उच्च तापक्रम (573-773 K) या सूर्य के विसरित प्रकाश या पराबैगनी विकिरणों की उपस्थिति में हैलोजेनीकरण होता है। कम अणुभार वाले एेल्केन नाइट्रीकरण तथा सल्फोनीकरण नहीं दर्शाते हैं। वे अभिक्रियाओं, जिनमें एेल्केनों के हाइड्रोजन परमाणु प्रतिस्थापित हो जाते हैं, को प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं कहते हैं। उदाहरणस्वरूप मेथैन का क्लोरीनीकरण नीचे दिया गया है–

हैलोजनीकरण या हेलोजनन

image14

एल्केनों की हैलोजन के साथ अभिक्रिया की गति का क्रम F2>>>Cl2>>Br2>I2 है। एेल्केनों के हाइड्रोजन के विस्थापन की दर 3°>2°>1° है। फ्लुओरीनीकरण प्रचंड व अनियंत्रित होता है जबकि आयोडीनीकरण बहुत धीमे होता है। यह एक उत्क्रमणीय अभिक्रिया है। यह अभिक्रिया अॉक्सीकारक (जैसे HIO3 या HNO3)की उपस्थिति में होती है।

(13.15)

(13.16)

हैलोजनीकरण मुक्त मूलक शृंखला क्रियाविधि द्वारा इन तीन पदों– प्रारंभन (initiation), संचरण (propagation) तथा समापन (termination) के द्वारा संपन्न होता है।

क्रियाविधि

(i) प्रारंभन- यह अभिक्रिया वायु तथा प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरीन अणु के समअपघटन (homolysis) से प्रारंभ होती है। Cl–Cl आबंध, C-C तथा C-H आबंध की तुलना में दुर्बल है अतः यह आसानी से टूट जाता है।

image15

(ii) संचरण- क्लोरीन मुक्त-मूलक, मेथेन अणु पर आक्रमण करके C-H आबंध को तोड़कर HCl बनाते हुए मेथिल मुक्त मूलक बनाते हैं, जो अभिक्रिया को अग्र दिशा में ले जाते हैं।

(क)

मेथिल मुक्त-मूलक क्लोरीन के दूसरे अणु पर आक्रमण करके CH3-Cl तथा एक अन्य क्लोरीन मुक्त-मूलक बनाते हैं, जो क्लोरीन अणु के समांशन के कारण बनते हैं।

(ख)image16

मेथिल तथा क्लोरीन मुक्त-मूलक, जो उपरोक्त पदों क्रमशः (क) तथा (ख) से प्राप्त होते हैं, पुनः व्यवस्थित होकर शृंखला अभिक्रिया का प्रारंभ करते हैं। संचरण पद (क) एवं (ख) सीधे ही मुख्य उत्पाद देते हैं किंतु अन्य कई संचरण पद संभव हैं एेसे दो पद निम्नलिखित हैं जो अधिक हैलोजनयुक्त उत्पादों के निर्माण को समझाते हैं।

(iii) शृंखला समापन- कुछ समय पश्चात् अभिकर्मक की समाप्ति तथा विभिन्न पार्श्व अभिक्रियाओं के कारण अभिक्रिया समाप्त हो जाती है।

विभिन्न संभावित शृंखला समापन पद निम्नलिखित हैंः

(क)

(ख)

(ग)

यद्यपि पद (ग) में CH3-Cl एक उत्पाद बनता है, किंतु एेसा होने में मुक्त मूलकों की कमी हो जाती है।

मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन का उपोत्पाद (byproduct) के रूप में बनने के कारण को उपरोक्त क्रियाविधि द्वारा समझा जा सकता है।

2. दहन

एेल्केन वायु तथा डाइअॉक्सीजन की उपस्थिति में गरम करने पर पूर्णतः अॉक्सीकृत होकर कार्बन डाइअॉक्साइड और जल बनाते हैं तथा साथ ही अधिक मात्रा में ऊष्मा निकलती है।

(13.17)

(13.18)

image17

किसी एेल्केन के लिए सामान्य दहन अभिक्रिया निम्नलिखित होती है–

(13.19)

अधिक मात्रा में ऊष्मा निकलने के कारण एेल्केनों को ईंधन के रूप में काम में लेते हैं।

एेल्केनों का अपर्याप्त वायु तथा डाइअॉक्सीजन द्वारा अपूर्ण दहन से कार्बन कज्जल (Black) बनता है, जिसका उपयोग स्याही, मुद्रण स्याही के काले वर्णक (pigments) एवं पूरक (filler) के रूप में होता है।

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3. नियंत्रित अॉक्सीकरण

उच्च दाब, डाइअॉक्सीजन तथा वायु के सतत् प्रवाह के साथ उपयुक्त उत्प्रेरक की उपस्थिति में एेल्केनों को गरम करने पर कई प्रकार के अॉक्सीकारक उत्पाद बनते हैं।

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(iv) साधारणतः एेल्केनों का अॉक्सीकरण नहीं होता, किंतु तृतीयक हाइड्रोजन (H) परमाणु वाले एेल्केन पोटैशियम परमैंगनेट से अॉक्सीकृत होकर संगत एेल्कोहॉल देते हैं।

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4. समावयवीकरण या समावयवन

n एेल्केन को निर्जल एेलुमीनियम क्लोराइड तथा हाइड्रोजन क्लोराइड गैस की उपस्थिति में गरम करने पर वे उनके शाखित शृंखला वाले एेल्केनों में समावयवीकृत हो जाते हैं। मुख्य उत्पाद नीचे दिए गए हैं तथा अन्य अल्प उत्पाद के बनने की संभावना भी होती है, जिसे आप सोच सकते हैं। अल्प उत्पादों का वर्णन समान्यत कार्बनिक अभिक्रियाओं में नहीं किया जाता है।

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5. एेरोमैटीकरण या एेरोमैटन

छः या छः से अधिक कार्बन परमाणु वाले n– एेल्केन एेलुमिना आधारित वैनेडियम, मालिब्डेनम तथा क्रोमियम के अॉक्साइड की उपस्थिति में 773K तथा 10 से 20 वायुमंडलीय दाब पर गरम करने से विहाइड्रोजनीकृत होकर बेन्जीन या उसके सजातीय व्युत्पन्न में चक्रीकृत हो जाते हैं। इस अभिक्रिया को एेरोमैटीकरण (Aromatization) या पुनर्संभवन (Reforming) कहते हैं।

   (13.26)

टॉलूईन, बेन्जीन का मेथिल व्युत्पन्न है। टॉलूईन के विरचन के लिए आप कौन सी एेल्केन सुझाएंगे।

6. भाप के साथ अभिक्रिया

मेथेन भाप के साथ निकैल उत्प्रेरक की उपस्थिति में 1273K पर गरम करने पर कार्बन मोनोअॉक्साइड तथा डाइहाइड्रोजन देती है। यह विधि डाइहॉइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन में अपनाई जाती है।

(13.27)

7. ताप-अपघटन

उच्चतर एेल्केन उच्च ताप पर गरम करने पर निम्नतर एेल्केनों या एल्कीनों में अपघटित हो जाते हैं। ऊष्मा के अनुप्रयोग से छोटे विखंड बनने की एेसी अपघटनी अभिक्रिया को ताप-अपघटन (pyrolysis) या भंजन (cracking) कहते हैं।

    (13.28)

एल्केनों का भंजन एक मुक्त-मूलक अभिक्रिया मानी जाती है। किरोसिन तेल या पेट्रोल से प्राप्त तेल गैस या पेट्रोल गैस बनाने में भंजन के सिद्धांत का उपयोग होता है। उदाहरणस्वरूप डोडेकेन (जो किरोसिन तेल का घटक है) को 973K पर प्लैटिनम, पैलेडियम अथवा निकैल की उपस्थिति में गरम करने पर हेप्टेन तथा पेन्टीन का मिश्रण प्राप्त होता है।

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13.2.4 संरूपण

एेल्केनों में कार्बन-कार्बन सिग्मा (σ) आबंध होता है। कार्बन-कार्बन (C–C) आबंध के अंतरनाभिकीय अक्ष के चारों ओर सिग्मा आण्विक कक्षक के इलेक्ट्रॉन का वितरण सममित होता है। इस कारण C–C एकल आबंध के चारों ओर मुक्त घूर्णन होता है। इस घूर्णन के कारण त्रिविम में अणुओं के विभिन्न त्रिविमीय विन्यास होते हैं। फलतः विभिन्न समावयव एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं। एेसे परमाणुओं की त्रिविम व्यवस्थाएँ (जो C–C एकल आबंध के घूर्णन के कारण एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाती हैं) संरूपण, संरूपणीय समावयव या घूर्णी (Rotamers) कहलाती हैं। अतः C–C एकल आबंध के घूर्णन के कारण एेल्केन में असंख्य संरूपण संभव है। यद्यपि यह ध्यान रहे कि C–C एकल आबंध का घूर्णन पूर्णतः मुक्त नहीं होता है। यह प्रतिकर्षण अन्योन्य क्रिया के कारण होता है। यह 1 से 20 kJmol–1 तक ऊर्जा द्वारा बाधित है। निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं के मध्य इस क्षीण बल को मरोड़ी विकृति (torsional strain) कहते हैं।

एथेन के संरूपण : एथेन अणु में कार्बन-कार्बन एकल आबंध होता है, जिसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु पर तीन हाइड्रोजन परमाणु जुड़े रहते हैं। एथेन के बॉल एवं स्टिक मॉडल को लेकर यदि हम एक कार्बन को स्थिर रखकर दूसरे कार्बन परमाणु को C–C अक्ष पर घूर्णन कराएं, तो एक कार्बन परमाणु के हाइड्रोजन दूसरे कार्बन परमाणु के हाइड्रोजन के संदर्भ में असंख्य त्रिविमीय व्यवस्था प्रदर्शित करते हैं। इन्हें संरूपणीय समावयव (संरूपण) कहते हैं। अतः एेथेन के असंख्य संरूपण होते हैं। हालाँकि इनमें से दो संरूपण चरम होते हैं। एक रूप में दोनों कार्बन के हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के अधिक पास हो जाते हैं। उसे ग्रस्त (Eclipsed) रूप कहते हैं। दूसरे रूप में, हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं से अधिकतम दूरी पर होते हैं। उन्हें सांतरित (staggered) रूप कहते हैं। इनके अलावा कोई भी मध्यवर्ती संरूपण विषमतलीय (skew) संरूपण कहलाता है। यह ध्यान रहे कि सभी संरूपणों में आबंध कोण तथा आबंध लंबाई समान रहती है। ग्रस्त तथा सांतरित तथा संरूपणों को सॉहार्स तथा न्यूमैन प्रक्षेप (Newmen projection) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

1. सॉहार्स प्रक्षेप

इस प्रक्षेपण में अणु को आण्विक अक्ष की दिशा में देखा जाता है। कागज पर केंद्रीय C–C आबंध को दिखाने के लिए दाईं या बाईं ओर झुकी हुई एक सीधी रेखा खींची जाती है। इस रेखा को कुछ लंबा बनाया जाता है। आगे वाले कार्बन को नीचे बाईं ओर तथा पीछे वाले कार्बन को ऊपर दाईं ओर से प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक कार्बन से संलग्न तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को तीन रेखाएँ खींचकर दिखाया जाता है। ये रेखाएँ एक-दूसरे से 120° का कोण बनाकर झुकी होती हैं। एथेन के ग्रस्त एवं सांतरित सॉहार्स प्रक्षेप चित्र 13.2 में दर्शाए गए हैं।

चित्र 13.2 एथेन के साहार्स प्रक्षेप

2. न्यूमैन प्रक्षेप

इस प्रक्षेपण में अणु को सामने से देखा जाता है। आँख के पास वाले कार्बन को एक बिंदु द्वारा दिखाया जाता है और उससे जुड़े तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को 120° कोण पर खींची तीन


चित्र 13.3 एथेन के न्यूमैन प्रक्षेप

रेखाओं के सिरों पर लिखकर प्रदर्शित किया जाता है। पीछे (आँख से दूर) वाले कार्बन को एक वृत्त द्वारा दर्शाते हैं तथा इसमें आबंधित हाइड्रोजन परमाणुओं को वृत्त की परिधि से परस्पर 120° के कोण पर स्थित तीन छोटी रेखाओं से जुड़े हुए दिखाया जाता है। एथेन के न्यूमैन प्रक्षेपण चित्र 13.3 में दिखाए गए हैं।

संरूपणों का आपेक्षिक स्थायित्व : जैसा पहले बताया जा चुका है, एथेन के सांतरित रूप में कार्बन-हाइड्रोजन आबंध के इलेक्ट्रॉन अभ्र एक-दूसरे से अधिकतम दूरी पर होते हैं। अतः उनमें न्यूनतम प्रतिकषर्ण बल न्यूनतम ऊर्जा तथा अणु का अधिकतम स्थायित्व होता है। दूसरी ओर, जब सांतरित को ग्रस्त रूप में परिवर्तित करते हैं, तब कार्बन-हाइड्रोजन आबंध के इलेक्ट्रॉन अभ्र एक-दूसरे के इतने निकट होते हैं कि उनके इलेक्ट्रॉन अभ्रों के मध्य प्रतिकर्षण बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए प्रतिकर्षी बल को दूर करने के लिए अणु में कुछ अधिक ऊर्जा निहित होती है। इसलिए इसका स्थायित्व कम हो जाता है। जैसा पहले बताया जा चुका है, इलेक्ट्रॉन अभ्र के मध्य प्रतिकर्षी अन्योन्य क्रिया, जो संरूपण के स्थायित्व को प्रभावित करती है, को मरोड़ी विकृति कहते हैं। मरोड़ी विकृति का परिणाम
C–C एकल आबंध के घूर्णन कोण पर निर्भर करता है। इस कोण को द्वितल कोण या मरोड़ी कोण भी कहते हैं। एथेन के सभी संरूपणों में मरोड़ी कोण सांतरित रूप में न्यून्तम तथा ग्रस्त रूप में अधिकतम होता है। अतः सांतरित संरूपण, ग्रस्त प्रक्षेप की तुलना में अधिक स्थायी होता है। परिणामतः अणु अधिकतर सांतरित संरूपण में रहते हैं अथवा हम कह सकते हैं कि यह इनका अधिमत संरूपण है। अतः यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि एथेन में C–C (आबंध) का घूर्णन पूर्णतः  मुक्त नहीं है। दो चरम रूपों के मध्य ऊर्जा का अंतर 12.5 kJ mol–1 है, जो बहुत कम है। सामान्य ताप पर अंतराण्विक संघट्यों (Collisions) के द्वारा एथेन अणु में तापीय तथा गतिज ऊर्जा होती है, जो 12.5 kJ mol–1 के ऊर्जा-अवरोध को पार करने में सक्षम होती है। अतः एथेन में कार्बन-कार्बन एकल आबंध का घूर्णन सभी प्रायोगिक कार्य के लिए लगभग मुक्त है। एथेन के संरूपणों को पृथक् तथा वियोजित करना संभव नहीं है।


13.3 एल्कीन

एल्कीन द्विआबंधयुक्त असंतृप्त हाइड्रोकार्बन होते हैं। एल्कीनों का सामान्य सूत्र क्या होना चाहिए? अगर एल्कीन में दो कार्बन परमाणुओं के मध्य एक द्विआबंध उपस्थित है, तो उनमें एेल्केन से दो हाइड्रोजन परमाणु कम होने चाहिए। इस प्रकार एल्कीनों का सामान्य सूत्र CnH2n होना चाहिए। एल्कीनों के प्रथम सदस्य एथिलीन अथवा एथीन (C2H4) की अभिक्रिया क्लोरीन से कराने पर तैलीय द्रव प्राप्त होता है। अतः एल्कीनों को ओलीफीन (तैलीय यौगिक बनाने वाले) भी कहते हैं।

13.3.1 द्विआबंध की संरचना

एल्कीनों में C = C द्विआबंध है, जिसमें एक प्रबल सिग्मा (σ) आबंध (बंध एंथैल्पी लगभग 397 kJmol–1 है) होता है, जो दो कार्बन परमाणुओं के sp2 संकरित कक्षकों के सम्मुख अतिव्यापन से बनता है। इसमें दो कार्बन परमाणुओं के 2p असंकरित कक्षकों के संपार्श्विक अतिव्यापन करने पर एक दुर्बल पाई (π) बंध, ( बंध एन्थैल्पी 284 kJ mol–1 है ) बनता है।

C–C एकल आबंध लंबाई (1.54 pm) की तुलना में C = C द्विआबंध लंबाई (1.34 pm) छोटी होती है। आपने पूर्व में अध्ययन किया है कि पाई ) आबंध दो p कक्षकों के दुर्बल अतिव्यापन के कारण दुर्बल होते हैं। अतः पाई (π) आबंध वाले एल्कीनों को दुर्बल बंधित गतिशील इलेक्ट्रॉनों का स्रोत कहा जाता है। अतः एल्कीनों पर उन अभिकर्मकों अथवा यौगिकों, जो इलेक्ट्रॉन की खोज में हों, का आक्रमण आसानी से हो जाता है। एेसे अभिकर्मकों को इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक कहते हैं। दुर्बल π आबंध की उपस्थिति एल्कीन अणुओं को एेल्केन की तुलना में अस्थायी बनाती है। अतः एल्कीन इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मकों के साथ संयुक्त होकर एकल आबंध-युक्त यौगिक बनाते हैं। C–C द्विआबंध की सामर्थ्य (बंध एंथैल्पी, 681 kJ mol–1) एथेन के कार्बन-कार्बन एकल आबंध (आबंध एंथैल्पी, 348 kJ mol–1) की तुलना में अधिक होती है। एथीन अणु का कक्षक आरेख चित्र- संख्या 13.4 तथा 13.5 में दर्शाया गया है।


चित्र 13.4 एथीन का कक्षीय आरेख केवल बंधों को चित्रित करते हुए

13.3.2 नाम-पद्धति

एल्कीनों के आई.यू.पी.ए.सी. नाम पद्धति के लिए द्विआबंध युक्त दीर्घतम कार्बन परमाणुओं की शृंखला में, अनुलग्न ‘एेन’ के स्थान पर अनुलग्न ‘ईन’ (ene) का प्रयोग किया जाता है। स्मरण रहे कि एल्कीन श्रेणी का प्रथम सदस्य हैः CH2

चित्र 13.5 एथीन का कक्षीय आरेख (क) π आबंध बनना (ख) π अभ्र का बनना तथा (ग) आबंध कोण तथा आबंध लंबाई

(CnH2n में n को 1 द्वारा प्रतिस्थापित करने पर ), जिसे मेथेन कहते हैं। इसकी आयु अल्प होती है। जैसा पहले प्रदर्शित किया गया है, एल्कीन श्रेणी के प्रथम स्थायी सदस्य C2H4 को एथिलीन (सामान्य नाम) या एथीन (आई.यू.पी.ए.सी. नाम) कहते हैं। कुछ एल्कीनों सदस्यों के आई.यू.पी.ए.सी नाम नीचे दिए गए हैं–

image23

उदाहरण 13.7

निम्नलिखित यौगिकों के आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए-

image24

(ii)

(iii) CH2 = C (CH2CH2CH3)2

image25

हल

(i) 2, 8-डाइमेथिलडेका-3, 6-डाईन

(ii) 1, 3, 5, 7 – अॉक्टाटेट्राईन

(iii) 2–n–प्रोपिलपेन्ट-1 ईन

(iv) 4–एथिल-2,6-डाइमेथिल-डेक-4-ईन

उदाहरण 13.8 ऊपर दी गईं संरचनाओं (i-iv) में सिग्मा (σ) तथा पाई (π) आबंधों की संख्या का परिकलन कीजिए।

हल

(i) σ बंध : 33, π बंध : 2

(ii) σ बंध : 17, π बंध : 4

(iii) σ बंध : 23, π बंध : 1

(iv) σ बंध : 41, π बंध : 1

13.3.3 समावयता

एल्कीनों द्वारा संरचनात्मक एवं ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित की जाती है।

संरचनात्मक समावयवता- एल्केनों की भाँति एथीन (C2H4) तथा प्रोपीन (C3H6) में केवल एक ही संरचना होती है, किंतु प्रोपीन से उच्चतर एल्कीनों में भिन्न संरचनाएं होती हैं।

C4H8 अणुसूत्र वाली एल्कीन को तीन प्रकार से लिख सकते हैं।

image26

I. ब्यूट-1-ईन

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II. ब्यूट-2-ईन

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III. 2-मेथिलप्रोप-1-ईन

संरचना I एवं III तथा II एवं III शृंखला समावयवता के उदाहरण हैं, जबकि संरचना I एवं II स्थिति समावयव हैं।

उदाहरण 13.9

C5H10 के संगत एल्कीनों के विभिन्न संरचनात्मक समावयवियों के संरचना-सूत्र एवं आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए।

हल

(क) CH2 = CH CH2 CH2 CH3

                      पेन्ट-1-ईन

(ख) CH3 CH=CH CH2 CH3

                     पेन्ट-2-ईन

image29

image30

ज्यामितीय समावयवता : द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं की बची हुई दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जुड़कर संतुष्ट करते हैं। अगर प्रत्येक कार्बन से जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न-भिन्न हैं तो इसे YXC=CXY द्वारा प्रदर्शित करते हैं। एेसी संरचनाओं को दिक् में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है–

संरचना ‘क’ में एक समान दो परमाणुओं (दोनों X या दोनों Y) द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के एक ही ओर स्थित होते हैं। संरचना ‘ख’ में दोनों X अथवा दोनों Y द्विआबंध कार्बन की दूसरी तरफ या द्विआबंधित कार्बन परमाणु के विपरीत स्थित होते हैं, जो विभिन्न ज्यामिति समावयवता दर्शाते हैं, जिसका दिक् में परमाणु या समूहों की भिन्न स्थितियों के कारण विन्यास भिन्न होता है। अतः ये त्रिविम समावयवी (stereoisomer) हैं। इनकी समान ज्यामिति तब होती है, जब द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं या समूहों का घूर्णन हो सकता है, किंतु C=C द्विआबंध में मुक्त घूर्णन नहीं होता। यह प्रतिबंधित होता है। इस तथ्य को समझने के लिए दो सख्त कार्डबोर्ड के टुकड़े लीजिए और दो कीलों की सहायता से उन्हें संलग्न कर दीजिए। एक कार्डबोर्ड को हाथ से पकड़कर दूसरे कार्डबोर्ड को घूर्णित करने का प्रयास कीजिए। क्या वास्तव में आप दूसरे कार्ड-बोर्ड का घूर्णन कर सकते हैं? नहीं, क्योंकि घूर्णन प्रतिबंधित हैं। अतः परमाणुओं अथवा समूहों के द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के मध्य प्रतिबंधित घूर्णन के कारण यौगिकों द्वारा भिन्न ज्यामितियाँ प्रदर्शित की जाती हैं। इस प्रकार के त्रिविम समावयव, जिसमें दो समान परमाणु या समूह एक ही ओर स्थित हों, उन्हें समपक्ष (cis) कहा जाता है, जबकि दूसरे समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह विपरीत ओर स्थित हों, विपक्ष (trans) समावयव कहलाते हैं। इसलिए दिक् में समपक्ष तथा विपक्ष समावयवों की संरचना समान होती है, किंतु विन्यास भिन्न होता है। दिक् में परमाणुओं या समूहों की भिन्न व्यवस्थाओं के कारण ये समावयवी उनके गुणों (जैसे–गलनांक, क्वथनांक द्विध्रुव आघूर्ण, विलेयता आदि) में भिन्नता दर्शाते हैं। ब्यूट-2-ईन की ज्यामितीय समावयवता अथवा समपक्ष-विपक्ष समावयवता को निम्नलिखित संरचना द्वारा प्रदर्शित किया जाता है–

एल्कीन का समपक्ष रूप विपक्ष की तुलना में अधिक ध्रुवीय होता है। उदाहरणस्वरूप–समपक्ष ब्यूट-2-ईन का द्विध्रुव आघूर्ण 0.350 डिबाई है, जबकि विपक्ष ब्यूट-2-ईन का लगभग शून्य होता है। अतः विपक्ष ब्यूट-2-ईन अध्रुवीय है। इन दोनों रूपों की निम्नांकित विभिन्न ज्यामितियों को बनाने से यह पाया गया है कि विपक्ष-ब्यूट-2-ईन के दोनों मेथिल समूह, जो विपरीत दिशाओं में होते हैं, प्रत्येक C-CH3 आबंध के कारण ध्रुवणता को नष्ट करके विपक्ष रूप को इस प्रकार अध्रुवीय बनाते हैं–

ठोसों में विपक्ष समावयवियों के गलनांक समपक्ष समावयवियों की तुलना में अधिक होते हैं।

ज्यामितीय या समपक्ष (Cis) विपक्ष (Trans) समावयवता, XYC=CXZ तथा XYC=CZW प्रकार की एल्कीनों द्वारा भी प्रदर्शित की जाती है।

उदाहरण 13.10

निम्नलिखित यौगिकों के समपक्ष (cis) तथा विपक्ष (trans) समावयव बनाइए और उनके आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए।

हल


उदाहरण 13.11

निम्नलिखित में से कौन से यौगिक समपक्ष-विपक्ष समावयवता प्रदर्शित करते हैं?

(i) (CH3)2C = CH C2H5

(ii) CH2 = CBr2

(iii) C6H5CH = CH CH3

(iv) CH3CH = CCl CH3

हल

यौगिक iii तथा iv

13.3.4 विरचन

1. एल्काइनों से : एल्काइनों के डाइहाइड्रोजन की परिकलित मात्रा के साथ पैलेडिकृत चारकोल की उपस्थिति में जिसे सल्फर जैसे विषाक्त यौगिकों द्वारा आंशिक निष्क्रिय किया गया हो तो इसके आंशिक अपचयन पर एल्कीन प्राप्त होते हैं। आंशिक रूप से निष्क्रिय पैलेडिकृत चारकोल को लिंडलार अभिकर्मक (Lindlar's catalyst) कहते हैं। इस प्रकार प्राप्त एल्कीनों की समपक्ष ज्यामिती होती है। एल्काइनों के सोडियम तथा द्रव अमोनिया के साथ अपचयन करने पर विपक्ष समावयव वाले एल्कीन बनते हैं।

(13.30)

(13.31)

image31

क्या इस प्रकार प्राप्त प्रोपीन ज्यामिती समावयवता प्रदर्शित करेगी? अपने उत्तर की पुष्टि के लिए कारण खोजिए।

2. एेल्किल हैलाइडों से : एेल्किल हैलाइड (R-X) को एेल्कोहॉली पोटाश (जैसे–एेथेनॉल में विलेय पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड) की उपस्थिति में गरम करने पर हैलोजेन अम्ल के अणु के विलोचन पर एल्कीन बनते हैं।
इस अभिक्रिया को विहाइड्रोहैलोजनीकरण (या विहाइड्रोहैलोजनन) कहते हैं, जिसमें हैलोजन अम्ल का विलोपन होता है। यह एक
β– विलोपन अभिक्रिया का उदाहरण है। चूँकि β– कार्बन परमाणु (जिस कार्बन से हैलोजन परमाणु जुड़ा हो, उसके अगले कार्बन परमाणु) से हाइड्रोजन का विलोपन होता है।

(13.34)

हैलोजन परमाणु की प्रकृति तथा एेल्किल समूह ही अभिक्रिया की दर निर्धारित करते हैं। एेसा देखा गया है कि हैलोजन परमाणु के लिए दर निम्न इस प्रकार हैं– आयोडीन > ब्रोमीन > क्लोरीन, जबकि एेल्किल समूहों के लिए यह हैं–
> 2°>1°.

3. सन्निध डाइहैलाइडों से : डाइहैलाइड, जिनमें दो निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं पर दो हैलोजन परमाणु उपस्थित हों, सन्निध डाइहैलाइड कहलाते हैं। सन्निध डाइहैलाइड ज़िंक धातु से अभिक्रिया करके ZnX2 अणु का विलोपन करके एल्कीन देते हैं। इस अभिक्रिया को विहैलोजनीकरण या विहैलोजनन कहते हैं।

(13.35)

(13.36)

4. एेल्कोहॉलों के अम्लीय निर्जलन से : आपने एकक-12 में विभिन्न सजातीय श्रेणियों की नामकरण पद्धति का अध्ययन किया है। एेल्कोहॉल एेल्केन के हाइड्रॉक्सी व्युत्पन्न होते हैं। इन्हें R–OH से प्रदर्शित करते हैं, जहाँ R=CnH2n+1 है। एेल्कोहॉलों को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गरम करने पर जल के एक अणु का विलोपन होता है। फलतः एेल्कीन बनती हैं। चूँकि अम्ल की उपस्थिति में एेल्कोहॉल अणु से जल का एक अणु विलोपित होता है, अतः इस अभिक्रिया को एेल्कोहॉलों का अम्लीय निर्जलीकरण कहते हैं। यह β– विलोपन अभिक्रिया का उदाहरण है, क्योंकि इसमें –OH समूह, β– कार्बन परमाणु से एक हाइड्रोजन परमाणु हटाता है।

(13.37)

13.3.5 गुणधर्म

भौतिक गुणधर्म

ध्रुवीय प्रकृति में अंतर के अलावा एल्कीन भौतिक गुणधर्मों में एेल्केन से समानता दर्शाती है। प्रथम तीन सदस्य ‘गैस’, अगले चौदह सदस्य ‘द्रव’ तथा उससे अधिक कार्बन संख्या वाली सदस्य ‘ठोस’ होते हैं। एथीन रंगहीन तथा हलकी मधुर सुगंध वाली गैस है। अन्य सभी एल्कीन रंगहीन तथा सुगंधित, जल में अविलेय, परंतु कार्बनिक विलायकों जैसे–बेन्जीन, पेट्रोलियम ईथर में विलेय होती हैं। आकार में वृद्धि होने के साथ-साथ इसके क्वथनांक में क्रमागत वृद्धि होती है, जिसमें प्रत्येक CH2 समूह बढ़ने पर क्वथनांक में 20 से 30 K तक की वृद्धि होती है। एेल्केनों के समान सीधी शृंखला वाले एल्कीनों का क्वथनांक समावयवी शाखित शृंखला वाले एल्कीनों की तुलना में उच्च होता है।

रासायनिक गुणधर्म

एल्कीन क्षीण बंधित π इलेक्ट्रॉनों के स्रोत होते हैं। इसलिए ये योगज अभिक्रियाएं दर्शाते हैं, जिनमें इलेक्ट्रॉनस्नेही C=C द्विबंध पर जुड़कर योगात्मक उत्पाद बनाते हैं। कुछ अभिकर्मकों के साथ क्रिया मुक्त-मूलक क्रियाविधि द्वारा भी होती है। एल्कीन कुछ विशेष परिस्थितियों में मुक्त-मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं प्रदर्शित करती हैं। एल्कीन में अॉक्सीकरण तथा ओजोनी अपघटन अभिक्रियाएं प्रमुख हैं। एल्कीन की विभिन्न अभिक्रियाओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है–

1. डाइहाइड्रोजन का संयोजन– एल्कीन सूक्ष्म पिसे हुए निकैल, पैलेडियम अथवा प्लैटिनम की उपस्थिति में डाइहाइड्रोजन गैस के एक अणु के योग से एेल्केन बनाती हैं (13.2.2)।

2. हैलोजन का संयोजन– एल्कीन से संयुक्त होकर हैलोजन जैसे ब्रोमीन या क्लोरीन सन्निध डाइहैलाइड देते हैं, हालाँकि आयोडीन सामान्य परिस्थितियों में योगज अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करती। ब्रोमीन द्रव का लाल-नारंगी रंग असंतृप्त स्थान पर ब्रोमीन के जुड़ने के पश्चात् लुप्त हो जाता है। इस अभिक्रिया का उपयोग असंतृप्तता के परीक्षण के लिए होता है। एल्कीन पर हैलोजन का योग इलेक्ट्रॉनस्नेही (इलेक्ट्रॉनरागी) योगज अभिक्रिया का उदाहरण है, जिसमें चक्रीय हैलोनियम आयन का निर्माण सम्मिलित होता है। इसका अध्ययन आप उच्च कक्षा में करेंगे।

(13.38)

image32

(13.39)

3. हाइड्रोजन हैलाइडों का संयोजन– हाइड्रोजन हैलाइड, HCl, HBr, Hl एल्कीनों से संयुक्त होकर एेल्किल हैलाइड बनाते हैं। हाइड्रोजन हैलाइडों की अभिक्रियाशीलता का क्रम इस प्रकार हैः HI > HBr > HCl। एल्कीनों में हैलोजन के योग के समान हाइड्रोजन हैलाइड का योग भी इलेक्ट्रॉनस्नेही योगज अभिक्रिया का उदाहरण है। इसे हम सममित तथा असममित एल्कीनों की योगज अभिक्रियाओं से स्पष्ट करेंगे।

सममित एल्कीनों में HBr की योगज अभिक्रियासममित एल्कीनों में (जब द्विआबंध पर समान समूह जुड़े हुए हों) HBr की योगज अभिक्रियाएं इलेक्ट्रॉनस्नेही योगज क्रियाविधि से संपन्न होती हैं।

(13.40)

(13.41)

असममित एल्कीनों पर HBr का योगज (मार्कोनीकॉफ नियम)

प्रोपीन पर HBr का संकलन कैसे होगा? इसमें दो संभावित उत्पाद I तथा II हो सकते हैं।

(13.42)

रूसी रसायनविद् मार्कोनीकॉफ ने सन् 1869 में इन अभिक्रियाओं का व्यापक अध्ययन करने के पश्चात् एक नियम प्रतिपादित किया, जिसे मार्कोनीकॉफ का नियम कहते हैं। इस नियम के अनुसार, योज्य (वह अभिकर्मक, जिसका संकलन हो रहा है) का अधिक ऋणात्मक भाग उस कार्बन पर संयुक्त होता है, जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो। अतः इस नियम के अनुसार उत्पाद (I) 2- ब्रोमोप्रोपेन अपेक्षित है। वास्तविक व्यवहार में यह अभिक्रिया का मुख्य उत्पाद है। अतः मार्कोनीकॉफ नियम के व्यापकीकरण को अभिक्रिया की क्रियाविधि से अच्छी तरह समझा जा सकता है।

क्रियाविधि

हाइड्रोजन ब्रोमाइड इलेक्ट्रॉनस्नेही H+ देता है, जो द्विआबंध पर आक्रमण करके नीचे दिए गए कार्बधनायन (Carbocation) बनाता है–

यहाँ ‘क’ कम स्थायी प्राथमिक कार्बधनायन है जबकि ‘ख’ अधिक स्थायी द्वितीयक कार्बधनायन है।

(i) द्वितीयक कार्बधनायन, (ख) प्राथमिक कार्बधनायन

(क) की तुलना में अधिक स्थायी होता है। अतः द्वितीयक कार्ब- धनायन प्रधान रूप से बनेगा, क्योंकि यह शीघ्र निर्मित होता है।

(ii) कार्बधनायन (ख) में Br के आक्रमण से उत्पाद इस प्रकार बनता है–

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प्रति मार्कोनीकॉफ़ योगज अथवा परॉक्साइड प्रभाव अथवा खराश प्रभाव– परॉक्साइड की उपस्थिति में असममित एल्कीनों (जैसे– प्रोपीन) से HBr का संयोजन प्रति मार्कोनीकॉफ नियम से होता है। एेसा केवल HBr के साथ होता है, HCl एवं HI के साथ नहीं। इस योगज अभिक्रिया का अध्ययन एम.एस. खराश तथा एफ.आर. मेयो द्वारा सन् 1933 में शिकागो विश्वविद्यालय में किया गया। अतः इस अभिक्रिया को परॉक्साइड या खराश प्रभाव (Kharach effect) या योगज अभिक्रिया का प्रति मार्कोनीकॉफ नियम कहते हैं।

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परॉक्साइड प्रभाव, मुक्त-मूलक शृंखला क्रियाविधि द्वारा होता है, जिसकी क्रियाविधि नीचे दी गई है।

(i)

(ii)

उपरोक्त क्रिया (iii) से प्राप्त द्वितीयक मुक्त-मूलक प्राथमिक मुक्त-मूलक की तुलना में अधिक स्थायी होता है, जिसके कारण 1-ब्रोमोप्रोपेन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है। यह ध्यान रखने योग्य बात है कि परॉक्साइड प्रभाव HCl तथा HI के संकलन में प्रदर्शित नहीं होता है। यह इस तथ्य
पर आधारित है कि
HCl का आबंध (430.5 kJ mol-1), H-Br के आबंध (363.7 kJ mol-1) की तुलना में प्रबल होता है। जो मुक्त-मूलक द्वारा विदलित नहीं हो पाता। यद्यपि HI (296.8 kJ mol-1) का आबंध दुर्बल होता है, परंतु आयोडीन मुक्त-मूलक द्विआबंध पर जुड़ने की बजाय आपस में संयुक्त होकर आयोडीन अणु बनाते हैं।

उदाहरण 13.12

हेक्स-1-ईन की HBr के साथ संकलन अभिक्रिया से प्राप्त उत्पादों के आई.यू.पी.ए.सी. नाम दीजिए।

(i) परॉक्साइड की अनुपस्थिति में (ii) परॉक्साइड की उपस्थिति में।

हल

4. सल्फ्यूरिक अम्ल का संयोजन– एल्कीनों की ठंडे सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल से क्रिया मार्कोनीकॉफ नियम के अनुसार होती है तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही योगज अभिक्रिया द्वारा एेल्किल हाइड्रोजन सल्फेट बनते हैं।

(13.44)

(13.45)

5. जल का संयोजन– एल्कीन, सांद्र सल्फ़्यूरिक अम्ल की कुछ बूँदों की उपस्थिति में जल के साथ मार्कोनीकॉफ नियमानुसार अभिक्रिया करके एेल्कोहॉल बनाते हैं।

(13.46)

6. अॉक्सीकरण– एल्कीन ठंडे, तनु, जलीय पोटैशियम परमैंगनेट, विलयन (बेयर अभिकर्मक) के साथ अभिक्रिया करके संनिध ग्लाइकॉल बनाती हैं। पोटैशियम परमैंगनेट विलयन का विरंजीकरण असंतृप्तता का परीक्षण है।

(13.47)

(13.48)

अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट अथवा अम्लीय पोटैशियम डाइक्रोमेट, एल्कीन को कीटोन और अम्ल में अॉक्सीकृत करते हैं। उत्पाद की प्रकृति, एल्कीन की प्रकृति तथा प्रायोगिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

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7. ओजोनी अपघटन– ओजोनी अपघटन में एल्कीन O3 का संकलन कर ओजोनाइड बनाते हैं और Zn-H2O के द्वारा ओजोनाइड का विदलन छोटे अणुओं में हो जाता है। यह अभिक्रिया एल्कीन तथा अन्य असंतृप्त यौगिकों में द्विआबंध की स्थिति निश्चित करने के लिए उपयोग में आती है।

(13.51)

(13.52)

8. बहुलकीकरण– आप पॉलिथीन की थैलियों तथा पॉलिथीन शीट से परिचित होंगे। अधिक संख्या में एथीन अणुओं का उच्च ताप, उच्च दाब तथा उत्प्रेरक की उपस्थिति में संकलन करने से पॉलिथीन प्राप्त होती है। इस प्रकार प्राप्त बृहद् अणु बहुलक कहलाते हैं। इस अभिक्रिया को ‘बहुलकीकरण’ या ‘बहुलकन’ कहते हैं। सरल यौगिक, जिनसे बहुलक प्राप्त होते हैं, एकलक  कहलाते हैं।

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अन्य एल्कीन भी बहुलकीकरण अभिक्रिया प्रदर्शित करती हैं।

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बहुलकों का उपयोग प्लास्टिक के थैले, निष्पीडित बोतल, रेफ्रिजरेटर डिश, खिलौने, पाइप, रेडियो तथा टी.वी. कैबिनेट आदि के निर्माण में किया जाता है। पॉलिप्रोपीन का उपयोग दूध के कैरेट, प्लास्टिक की बाल्टियाँ तथा अन्य संचलित (Moulded) वस्तुओं के उत्पादन के लिए किया जाता है, हालाँकि अब पॉलिथीन तथा पॉलिप्रोपीन का बृहत् उपयोग हमारे लिए एक चिंता का विषय बन गया है।

13.4 एल्काइन

एल्कीन की तरह एल्काइन भी असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं। इनमें दो कार्बन परमाणुओं के मध्य एक त्रिआबंध होता है। एेल्केन तथा एल्कीन की तुलना में, एल्काइन में हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम होती है। इनका सामान्य सूत्र CnH2n-2 है। एल्काइन श्रेणी का प्रथम स्थायी सदस्य एथाइन है, जो एेसीटिलीन नाम से प्रचलित है। एेसीटिलीन का उपयोग आर्क वल्डिंग के लिए अॉक्सीएेसीटिलीन ज्वाला के रूप में होता है, जो अॉक्सीजन गैस तथा एेसीटिलीन को मिश्रित करने से बनती है। एल्काइन कई कार्बनिक यौगिकों के लिए प्रारंभिक पदार्थ है। अतः इस श्रेणी के कार्बनिक यौगिकों का अध्ययन रुचिकर है।

13.4.1 नामपद्धति तथा समावयवता

सामान्य पद्धति में एल्काइन एेसीटिलीन के व्युत्पन्न के नाम से जाने जाते हैं। आई.यू.पी.ए.सी. पद्धति में संगत एेल्केन में अनुलग्न ‘एेन’ का ‘आइन’ द्वारा प्रतिस्थापन करके एल्काइन को संगत एेल्केन के व्युत्पन्न नाम से जाना जाता है। त्रिआबंध की स्थिति प्रथम त्रि-आबंधित कार्बन से इंगित की जाती है। एल्काइन श्रेणी के कुछ सदस्यों के सामान्य तथा आई.यू.पी.ए.सी. नाम सारणी 13.2 में दिए गए हैं।

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जैसा आपने पहले पढ़ा है, एथाइन तथा प्रोपाइन अणुओं की केवल एक ही संरचना होती है, किंतु ब्यूटाइन में दो संरचनाएँ संभावित हैं– (1) ब्यूट-1-आइन (2) ब्यूट-2-आइन। चूँकि दोनों यौगिक त्रि-आबंध की स्थिति के कारण संरचना में भिन्न है। अतः ये समावयव स्थिति समावयव कहलाते हैं। आप कितने प्रकार से अगले सजात की संरचना को बना सकते हैं? अर्थात् अगला एल्काइन (जिसका अणुसूत्र C5H8 है) के पाँच कार्बन परमाणुओं को सतत् शृंखला तथा पार्श्व शृंखला के रूप में व्यवस्थित करने पर निम्नलिखित संरचनाएँ संभव हैं–

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संरचना-सूत्र I एवं II स्थिति समावयव तथा संरचना सूत्र I एवं III अथवा II एवं III शृंखला समावयव के उदाहरण हैं

उदाहरण 13.13

एल्काइन श्रेणी के पाँचवें सदस्य के विभिन्न समावयवों की संरचना एवं आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए। विभिन्न समावयवी युग्म किस प्रकार की समावयवता दर्शाते हैं?

हल

एल्काइन श्रेणी के पाँचवे सदस्य का अणुसूत्र C6H10 होता है इसके संभावित समवयव इस प्रकार है–

(क) HC C CH2 CH2 CH2 CH3

                हेक्स-1-आइन

(ख) CH3 C C CH2 CH2 CH3

                 हेक्स-2-आइन

(ग) CH3 CH2 C C CH2 CH3

                 हेक्स-3-आइन


3-मेथिलपेन्ट-1-आइन

4-मेथिलपेन्ट-1-आइन

4-मेथिलपेन्ट-2-आइन

3, 3-डाइमेथिलब्यूट-1-आइन

उपरोक्त समावयव- शृंखला समावयवता एवं स्थिति समावयवता के उदाहरण हैं।

13.4.2 त्रि-आबंध की संरचना

एथाइन, एल्काइन श्रेणी का सरलतम अणु है। एथाइन की संरचना चित्र 13.6 में दर्शायी गई है।

एथाइन के प्रत्येक कार्बन परमाणु के साथ दो sp संकरित कक्षकों के समअक्षीय अतिव्यापन से कार्बन-कार्बन सिग्माआबंध बनता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु का शेष sp संकरित कक्षक अंतरनाभिकीय अक्ष के सापेक्ष हाइड्रोजन परमाणु के 1s कक्षक के साथ अतिव्यापन करके, दो C-H सिग्मा आबंध बनाते हैं,

चित्र 13.6 आबंध कोण तथा आबंध लंबाई दर्शाता एथाइन का कक्षीय आरेख (क) σ अतिव्यापन (ख) π अतिव्यापन

H-C-C आबंध कोण 180° का होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु के पास C-C आबंध तथा तल के लंबवत् असंकरित p-कक्षक होते हैं। एक कार्बन परमाणु का 2p कक्षक दूसरे के समांतर होता है, जो समपार्श्विक अतिव्यापन करके दो कार्बन परमाणुओं के मध्य दो (पाई) बंध बनाते हैं। अतः एथाइन अणु में एक C-C (सिग्मा) आबंध दो C-H सिग्मा आबंध तथा दो C-C (पाई) आबंध होते हैं।

CC की आबंध सामर्थ्य बंध एंथैल्पी 823 kJ mol-1 है, जो C=C द्विआबंध बंध एेंथैल्पी 681 kJ mol-1 और C-C एकल आबंध बंध एंथैल्पी 348 kJ mol-1 अधिक होती है। CC की त्रिआबंध लंबाई (120pm), C=C द्विआबंध (134 pm) तथा C-C एकल आबंध (154 pm)

तुलना में छोटी होती है। अक्षों पर दो कार्बन परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन अभ्र अंतरानाभिकीय सममित बेलनाकार स्थिति में होते हैं। एथाइन एक रेखीय अणु है।

13.4.3 विरचन

1. कैल्सियम कार्बाइड से–

जल के साथ कैल्सियम कार्बाइड की अभिक्रिया पर औद्योगिक रूप से एथाइन बनाई जाती है। कोक तथा बिना बुझे चूने को गरम करके कैल्सियम कार्बाइड बनाया जाता है। चूना पत्थर से निम्नलिखित अभिक्रिया द्वारा बिना बुझा चूना प्राप्त होता है–

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2. सन्निध डाइहैलाइडों से–

सन्निध डाइहैलाइडों की अभिक्रिया एेल्कोहॉली पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड से कराने पर इनका विहाइड्रोहैलोजनीकरण होता है। हाइड्रोजन हैलाइड के एक अणु विलोपित करने से एेल्किनाइल हैलाइड प्राप्त होता है, जो सोडामाइड के साथ उपचार कराने पर एल्काइन देते हैं।

13.4.4 गुणधर्म

भौतिक गुणधर्म

एल्काइनों के भौतिक गुण, एल्कीनों तथा एेल्केनों के समान होते हैं। प्रथम तीन सदस्य गैस, अगले आठ सदस्य द्रव तथा शेष उच्चतर सदस्य ठोस होते हैं। समस्त एल्काइन रंगहीन होते हैं। एथाइन की आभिलाक्षणिक गंध होती है। इसके अन्य सदस्य गंधहीन होते हैं। एल्काइन दुर्बल ध्रुवीय, जल से हलके तथा जल में अमिश्रणीय होते हैं, परंतु कार्बनिक विलायकों जैसे–ईथर, कार्बनटेट्राक्लोराइड और बेन्जीन में विलेय होते हैं। इनके गलनांक, क्वथनांक तथा घनत्व अणुभार के साथ बढ़ते हैं।

रासायनिक गुणधर्म

एल्काइन सामान्यतया अम्लीय प्रकृति, योगात्मक तथा बहुलकीकरण अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती है, वे इस प्रकार हैं–

(क) एल्काइन का अम्लीय गुण– सोडियम धातु या सोडामाइड (NaNH2) प्रबल क्षारक होते हैं। ये एथाइन के साथ अभिक्रिया करके डाइहाइड्रोजन मुक्त कर सोडियम एेसीटिलाइड बनाते हैं। इस प्रकार की अभिक्रयाएँ एथीन तथा एथेन प्रदर्शित नहीं करते। यह परीक्षण एथीन तथा एेथेन की तुलना में एथाइन की अम्लीय प्रकृति को इंगित करता है। एेसा क्यों है? क्या इसकी संरचना तथा संकरण के कारण होता है? आप यह अध्ययन कर चुके हैं कि एथाइन में हाइड्रोजन परमाणु sp संकरित कार्बन परमाणु से, एथीन में sp2 संकरित कार्बन परमाणु से तथा एथेन में sp3 संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा रहता है। एथाइन के sp संकरित कक्षक में अधिकतम S गुण (50%) के कारण उसमें उच्च विद्युत्ऋणात्मकता होती है। अतः ये एथाइन में C-H आबंध के साझा इलेक्ट्रॉनों को, एथीन में कार्बन के sp2 संकरित कक्षक तथा एथेन में कार्बन के sp3 संकरित कक्षकों की तुलना में अपनी ओर अधिक आकर्षित करेंगे, जिससे एथेन तथा एथीन की तुलना में एथाइन में हाइड्रोजन परमाणु प्रोटॉन के रूप में आसानी से विलोपित हो जाएँगे। अतः त्रिआबंधित कार्बन परमाणु से जुड़े हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय प्रकृति के होते हैं।

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यह ध्यान रखने योग्य बात है कि त्रिआबंध से जुड़े हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय होते हैं, परंतु एल्काइन के समस्त हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय नहीं होते। उपर्युक्त अभिक्रियाएँ एल्कीन तथा एेल्केन प्रदर्शित नहीं करते हैं। यह परीक्षण एल्काइन, एल्कीन तथा एेल्केन में विभेद करने हेतु प्रयुक्त किया जाता है। ब्यूट-1-आइन तथा ब्यूट-2-आइन की उपरोक्त अभिक्रिया कराने पर क्या होगा? एेल्केन, एल्कीन तथा एल्काइन निम्नलिखित क्रम में अम्लीय प्रकृति दर्शाते हैं–

(i)

(ii)

(ख) योगज अभिक्रिया– एल्काइनों में त्रिआबंध होता है। अतः यह डाइहाइड्रोजन, हैलोजन, हाइड्रोजन हैलाइड आदि के दो अणुओं से योग करते हैं। योगज उत्पाद निम्नलिखित पदों में बनता है–

बना हुआ योगज उत्पाद सामान्यतया वाइनिलिक धनायन के स्थायित्व पर निर्भर करता है। असममित एल्काइनों में योगज मार्कोनीकॉफ नियम के अनुसार होता है। एल्काइनों में अधिकतर अभिक्रियाएं इलेक्ट्रॉनस्नेही योगज अभिक्रियाएं हैं, जिनके कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं–

(i) डाइहाइड्रोजन का संयोजन

(13.62)

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(ii) हैलोजनों का संयोजन

(13.64)

इस संकलन पर ब्रोमीन का लाल-नारंगी रंग विरंजीकृत हो जाता है। अतः इसे असंतृप्तता के परीक्षण के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

(iii) हाइड्रोजन हैलाइडो का संयोजन– एल्काइनों में हाइड्रोजन हैलाइड (HCl, HBr, HI) के दो अणु के संकलन से जैम डाइहैलाइड (जिनमें एक ही कार्बन परमाणु पर दो हैलोजन जुड़े हों) बनते हैं।

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(13.66)

(iv) जल का संयोजन– एेल्केन तथा एल्कीन की भाँति एल्काइन भी जल में अमिश्रणीय होते हैं और जल से अभिक्रिया नहीं करते हैं। एल्काइन 333K पर मर्क्यूरिक सल्फेट तथा तुन सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में जल के एक अणु के साथ संयुक्त होकर कार्बोनिल यौगिक देते हैं।


(13.67)

(13.68)

(v) बहुलकीकरण

(क) रैखिक बहुलकीकरण– अनुकूल परिस्थितियों में एथाइन का रैखिक बहुलकीकरण होने से पॉलिएेसीटिलीन अथवा पॉलिएथाइन बनता है, जो उच्चतर अणुभार वाले पॉलिएथाइन इकाइयों से युक्त होता है। इसे प्रदर्शित किया जा सकता है। विशिष्ट परिस्थितियों में ये बहुलक विद्युत् के सुचालक होते हैं। अतः पॉलिएेसीटिलीन की इस फिल्म का उपयोग बैटरियों में इलेक्ट्रॉड के रूप में किया जाता है। धातु चालकों की अपेक्षा यह फिल्म हलकी, सस्ती तथा सुचालक होती है।

(ख) चक्रीय बहुलकीकरण– एथाइन को लाल तप्त लोह नलिका में 873K पर प्रवाहित कराने पर उसका चक्रीय बहुलकीकरण हो जाता है। एथाइन के तीन अणु बहुलकीकृत होकर बेन्जीन बनाते हैं, जो बेन्जीनव्युत्पन्न, रंजक, औषधि तथा अनेक कार्बनिक यौगिकों के प्रारंभिक अणु है। यह एेलीफैटिक यौगिकों को एेरोमैटिक यौगिकों में परिवर्तित करने के लिए सर्वोत्तम पथ है।

(13.69)

उदाहरण 13.14

आप एथेनोइक अम्ल को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे?

हल

image60

13.5 एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बन

एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बन को एेरीन भी कहते हैं, क्योंकि इनके अधिकांश यौगिकों में विशिष्ट गंध (ग्रीक शब्द ‘एेरोमा’, जिसका अर्थ सुगंध होता है।) रहती है। एेसे यौगिकों को ‘एेरौमेटिक यौगिक’ नाम दिया गया है। अधिकतर एेसे यौगिकों में बेन्जीनवलय पाई जाती है। यद्यपि बेन्जीनवलय अतिअसंतृप्त होती है, परंतु अधिकतर अभिक्रियाओं में बेन्जीनवलय अति असंतृप्त बनी रहती है। एेरोमैटिक यौगिकों के कई उदाहरण एेसे भी हैं, जिनमें बेन्जीनवलय नहीं होती है, किंतु उनमें अन्य अतिअसंतृप्त वलय होती है। जिन एेरोमेटिक यौगिकों में बेन्जीनवलय होती है, उन्हें बेन्जेनाइड (Benzenoid) तथा जिसमें बेन्जीनवलय नहीं होती है, उन्हें अबेन्जेनाइड (nonbezenoid) कहते है। एेरीन के कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं–

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13.5.1 नाम पद्धति तथा समावयवता

हम एेरामैटिक यौगिकों की नाम पद्धति तथा समावयवता का वर्णन एकक 12 में कर चुके हैं। बेन्जीन के सभी छः हाइड्रोजन परमाणु समतुल्य हैं। अतः ये एक प्रकार का एकल प्रतिस्थापित उत्पाद बनाती हैं। यदि बेन्जीन के दो हाइड्रोजन परमाणु दो समान या भिन्न एक संयोजी परमाणु या समूह द्वारा प्रतिस्थापित हों, तो तीन विभिन्न स्थिति समावयव संभव हैं। ये 1, 2 अथवा 1, 6 आर्थो (o–); 1, 3 अथवा 1, 5 मेटा (m-) तथा 1, 4 पैरा (p-) हैं। द्विप्रतिस्थापित बेन्जीन व्युत्पन्न के कुछ उदाहरण यहाँ दिए जा रहे हैं।

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13.5.2 बेन्जीन की संरचना

बेन्जीन को सर्वप्रथम माइकेल फैराडे ने सन् 1825 में प्राप्त किया। बेन्जीन का अणुसूत्र C6H6 है, जो उच्च असंतृप्तता दर्शाता है। यह अणुसूत्र संगत एेल्केन, एल्कीन तथा एल्काइन, से कोई संबंध नहीं बताता है। आप इसकी संभावित संरचना के बारे में क्या सोचते हैं? इसके विशिष्ट गुण तथा असामान्य स्थायित्व के कारण इसकी संरचना निर्धारित करने में कई वर्ष लग गए। बेन्जीन एक स्थायी अणु है और ट्राईओजोनाइड बनाता है, जो तीन द्विआबंध की उपस्थिति को इंगित करता है। बेन्जीन केवल एक प्रकार का एकल प्रतिस्थापित व्युत्पन्न बनाता है, जो बेन्जीन के छः कार्बन तथा छः हाइड्रोजन की समानता को इंगित करती है। इन प्रेक्षणों के आधार पर आगुस्ट् केकुले ने सन् 1865 में बेन्जीन की एक संरचना दी, जिसमें छः कार्बन परमाणु की चक्रीय व्यवस्था है। उसमें एकांतर क्रम में द्विआबंध है तथा प्रत्येक कार्बन से एक हाइड्रोजन परमाणु जुड़ा है।

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जर्मन रसायनज्ञ फ्रीड्रिक आगुस्ट् केकुले का जन्म सन् 1829 में जर्मनी के डार्मस्ड्ट नामक नगर में हुआ था। वे सन् 1856 में प्रोफेसर तथा सन् 1875 में रॉयल सोसायटी के फैलो बने। संरचनात्मक कार्बनिक रसायन के क्षेत्र में उन्होंने दो महत्त्वपूर्ण योगदान दिए। प्रथम सन् 1958 में जब उन्होंने यह प्रस्तावित किया कि अनेक कार्बन परमाणु आपस में आबंध बनाकर शृंखलाओं का निर्माण कर सकते हैं। द्वितीय उन्होंने सन् 1875 में बेन्जीन की संरचना को स्पष्ट करने में योगदान दिया, जब उन्होंने प्रस्तावित किया कि कार्बन परमाणुओं की शृंखलाओं के सिरे जुड़कर वलय का निर्माण कर सकते हैं। तत्पश्चात् उन्होंने बेन्जीन की गतिक संरचना प्रस्तावित की, जिस पर बेन्जीन की आधुनिक इलेक्ट्रॉनीय संरचना आधारित है। बाद में उन्होंने बेन्जीन संरचना की खोज को एक रोचक घटना द्वारा समझाया।


फ्रीड्रिक आगुस्ट् केकुले

(7 सितम्बर 1829
13 जुलाइ 1896)

"मैं पाठ्यपुस्तक लिख रहा था, परंतु कार्य आगे नहीं बढ़ रहा था क्योंकि, मेरे विचार कहीं अन्य थे। तभी मैंने अपनी कुर्सी को अलाव की ओर किया। कुछ समय बाद मुझे झपकी लग गईं। स्वप्न में मेरी आँखों के सामने परमाणु नाच रहे थे। अनेक प्रकार के विन्यासों की संरचनाएं मेरी मस्तिष्क की आँख के सम्मुख घूम रही थी। मैं स्पष्ट रूप से लंबी-लंबी कतारें देख पा रहा था, जो कभी-कभी समीप आ रही थीं, वे सर्प की भाँति घूम रही थीं, कुंडली बना रही थीं। तभी मैं देखा कि एक सर्प ने अपनी ही दुम को अपने मुँह में दबा लिया। इस प्रकार बनी संरचना को मैं स्पष्ट रूप से देख पा रहा था। तभी अचानक मेरी आँखें खुल गई तथा रात्रि का शेष पहर मैंने अपने सपने को समझकर उपयुक्त निष्कर्ष निकालने में व्यतीत किया।

वे आगे कहते हैं कि– सज्जनो! हमें स्वप्न देखने की आदत डालनी चाहिए, तभी हम सत्य से साक्षात्कार कर सकते हैं। परंतु हमें अपने स्वप्नों को, इससे पहले कि हम उन्हें भूल जाएं, अन्य को बता देना चाहिए" (सन् 1890)।

सौ वर्ष के बाद, केकुले की जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर पॉलिबेंजिनायड संरचना युग्म यौगिकों के एक वर्ग को ‘केकुलीन’ नाम दिया गया।


केकुले संरचना 1, 2-डाइब्रोमो बेन्जीन के दो समावयवों की संभावना व्यक्त करती है। एक समावयव में दोनों ब्रोमीन परमाणु द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं से जुड़े रहते हैं, जबकि दूसरे समावयव में एकल आबंधित कार्बन परमाणुओं से।

परंतु बेन्जीन केवल एक ही अॉर्थो द्विप्रतिस्थापित उत्पाद बनाती है। इस समस्या का निराकरण केकुले ने बेन्जीन में द्विआबंध के दोलन (Oscillating) प्रकृति पर विचार करके प्रस्तावित किया।

यह सुधार भी बेन्जीन की संरचना के असामान्य स्थायित्व तथा योगात्मक अभिक्रियाओं की तुलना में प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं की प्राथमिकता को समझाने में विफल रहा, जिसे बाद में अनुनाद (Resonance) द्वारा समझाया गया।

अनुनाद एवं बेन्जीन का स्थायित्व

‘संयोजकता बंध सिद्धांत’ के अनुसार, द्विआबंध के दोलन को अनुनाद के द्वारा समझाया गया है। बेन्जीन विभिन्न अनुनादी संरचनाओं का संकर है। केकुले द्वारा दो मुख्य संरचनाएं (क) एवं (ख) दी गईं, अनुनाद संकर को षट्भुजीय संरचना में वृत्त या बिंदु वृत्त द्वारा (ग) में प्रदर्शित किया गया है। वृत्त, बेन्जीनवलय के छः कार्बन परमाणु पर विस्थानीकृत (Delocalised) छः इलेक्ट्रानों को दर्शाता है।

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कक्षीय अतिव्यापन हमें बेन्जीन संरचना के बारे में सही दृश्य देता है। बेन्जीन में सभी छः कार्बन परमाणु sp2 संकरित है। प्रत्येक कार्बन परमाणु के दो sp2 कक्षक निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं के sp2 कक्षक से अतिव्यापन करके छः (C-C) σ आबंध बनाते हैं, जो समतलीय षट्भुजीय होते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु के बचे हुए sp2 कक्षक प्रत्येक हाइड्रोजन परमाणु के s-कक्षक से अतिव्यापन करके छः C-H सिग्मा आबंध बनाते हैं। अब प्रत्येक कार्बन परमाणु पर एक असंकरित p-कक्षक रह जाता है, जो वलय के तल के लंबवत् होता है, जैसा नीचे दर्शाया गया है–


प्रत्येक कार्बन परमाणु पर उपस्थित असंकरित p-कक्षक इतने निकट होते हैं कि वे पार्श्वअतिव्यापन करके आबंध का निर्माण करते हैं। p-कक्षकों के अतिव्यापन से तीन आबंध बनने की क्रमशः दो संभावनाएँ (C1-C2, C3-C4, C5-C6 अथवा C2-C3, C4-C5, C6-C1) हैं, जैसा नीचे दिए गए चित्रों में दर्शाया गया है। संरचना 13.6 (क) तथा (ख) केकुले की विस्थानीकृत आबंधयुक्त संरचना दर्शाता है।

चित्र 13.7 (क) तथा (ख) केकुले की दोनों संरचनाओं के संगत है जिसमें स्थानीकृत π-बंध होते हैं। X-किरण

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 विवर्तन से ज्ञात की गई वलय में कार्बन परमाणुओं के मध्य अन्तर्नाभिकीय दूरी समान पाई गईं प्रत्येक कार्बन परमाणु के p-कक्षक की दोनों तरफ साथ वाले कार्बन परमाणु के p-कक्षक से अतिव्यापन की संभावना समान है [चित्र 13.7 (ग)]। इस इलेक्ट्रॉन अभ्र को चित्र 13.7 (घ) के अनुसार षट्भुजीय वलय के एक ऊपर तथा एक नीचे स्थित माना जा सकता है।

इस प्रकार कार्बन के छः p इलेक्ट्रॉन विस्थानीकृत होकर छः कार्बन नाभिकों के परितः स्वच्छंद रूप से घूम सकेंगे, न कि वे केवल दो कार्बन नाभिकों के मध्य, जैसा चित्र 13.7 (क) एवं (ख) में दर्शाया गया है। विस्थानीकृत इलेक्ट्रॉन अभ्र दो कार्बन परमाणु के मध्य स्थित इलेक्ट्रान अभ्र की बजाय वलय के सभी कार्बन परमाणुओं के नाभिक द्वारा अधिक आकर्षित होगा। अतः विस्थानीकृत इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति में बेन्जीन वलय परिकल्पित साइक्लोहैक्साट्राइन की तुलना में अधिक स्थायी है।

X-किरण विर्वतन आँकड़े बेन्जीनके समतलीय अणु को दर्शाते हैं। बेन्जीन की उपरोक्त संरचना (क) तथा (ख) सही होतीं तो दोनों प्रकारों में C-C आबंध लंबाई की अपेक्षा की जाती, जबकि X-किरण आँकड़ों के अध्ययन के आधार पर छः समान C-C आबंध लंबाई (139pm) पाई गई, जो C-C एकल आबंध (154pm) तथा C-C द्विआबंध (134pm) के मध्य हैं। अतः सामान्य परिस्थितियों में बेन्जीन पर शुद्ध द्विआबंध की अनुपस्थिति बेन्जीन पर योगज अभिक्रिया होने से रोकती है। यह बेन्जीन के असाधारण व्यवहार को स्पष्ट करती है।

13.5.3 एेरोमैटिकता

बेन्जीन को जनक एेरोमैटिक यैगिक मानते हैं। अब ‘एेरोमैटिक’ नाम सभी वलय तंत्रों, चाहे उसमें बेन्जीन वलय हो या नहीं, में प्रयोग में लाया जाता है। ये निम्नलिखित गुण दर्शाते हैं–

(i) समतलीयता।

(ii) वलय में इलेक्ट्रॉन का संपूर्ण विस्थानीकरण।

(iii) वलय में (4n + 2)π इलेक्ट्रॉन, जहाँ n एक पूर्णांक है (n = 0,1,2,...)। इसे हकल नियम (Hückel Rule) द्वारा भी उल्लेखित करते हैं।

एेरोमैटिक यौगिकों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं–



13.5.4 बेन्जीन का विरचन

बेन्जीन को व्यापरिक रूप में कोलतार से प्राप्त किया जाता है, यद्यपि इसे निम्नलिखित प्रयोगशाला विधियों द्वारा बना सकते हैं–

(i) एथाइन के चक्रीय बहुलकीकरण से (देखिए अनुभाग 13.4)

(ii) एरोमैटिक अम्लों के विकार्बोक्सिलीकरण से– बेन्जोइक अम्ल के सोडियम लवण को सोडालाइम के साथ गरम करने पर बेन्जीन प्राप्त होती है।


(13.70)

(iii) फीनॉल के अपचयन से– फीनॉल की वाष्प को जस्ता के चूर्ण पर प्रवाहित करने से यह बेन्जीन में अपचयित हो जाती है।

(13.71)

13.5.5 गुणधर्म

भौतिक गुणधर्म

भौतिक गुणधर्म एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बन अध्रुवीय अणु हैं। ये सामान्यतः विशिष्ट गंधयुक्त, रंगहीन द्रव या ठोस होते हैं। आप नैफ़्थलीन की गोलियों से चिरपरिचित हैं। इसकी विशिष्ट गंध तथा शलभ प्रतिकर्षी गुणधर्म के कारण इसे शौचालय में तथा कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग में लाते हैं। एेरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जल में अमिश्रणीय तथा कार्बनिक विलायाकों में विलेय है। ये कज्जली (Sooty) लौ के साथ जलते हैं।

रासायनिक गुणधर्म

रासायनिक गुणधर्म एेरीनो को इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन द्वारा अभिलक्षित किया जाता है, हालाँकि विशेष परिस्थितियों में ये संकलन तथा अॉक्सीकरण अभिक्रिया दर्शाते हैं।

इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ

साधारणतया एेरीन नाइट्रोकरण, हैलोजनन, सल्फोनेशन, फ्रीडेल क्राफ्ट एेल्किलन, एेसीटिलन आदि इलेक्ट्रानरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया दर्शाते हैं, जिनमें इलेक्ट्रॉनरागी एक आक्रमणकारी अभिकर्मक E+ है।

(i) नाइट्रोकरण– यदि बेन्जीन वलय को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल तथा सल्फ्यूरिक अम्ल (नाइट्रोकरण मिश्रण) के साथ गरम किया जाता है तो बेन्जीन वलय में नाइट्रो समूह प्रविष्ट हो जाता है।

(13.72)

(ii) हैलोजनीकरण या हैलोजनन– लुइस अम्ल (जैसे–FeCl3, FeBr3 तथा AlCl3) की उपस्थिति में एेरीन, हैलोजन से अभिक्रिया कर हैलोएेरीन देते हैं।

(13.73)

(iii) सल्फोनीकरण– सल्फोनिक अम्ल समूह द्वारा वलय के हाइड्रोजन परमाणु का प्रतिस्थापन सल्फोनीकरण या सल्फोनेशन कहलाता है। यह सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गरम करके प्राप्त किया जाता है।

(13.74)

(iv) फ्रीडेल-क्राफ्ट एेल्किलीकरण या एेल्किलन– निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में बेन्जीन की एेल्किल हैलाइड से अभिक्रिया कराने पर एेल्किल बेन्जीन प्राप्त होती है।

(13.75)

(13.76)

1-क्लोरोप्रोपेन की बेन्जीन से अभिक्रिया कराने पर n-प्रोपिल बेन्जीन की अपेक्षा आइसोप्रोपिल बेन्जीन क्यों प्राप्त होती हैं?

(v) फ्रीडेल-क्राफ्ट एेसिलीकरण या एेसीटिलन– लुइस अम्ल (AlCl3) की उपस्थिति में बेन्जीन की एेसिल हैलाइड अथवा एेसिड एेनहाइड्राइड के साथ अभिक्रिया करने पर एेसिल बेन्जीन प्राप्त होती है।

(13.77)

(13.78)

अगर इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक को आधिक्य में लिया जाए तो पुनः प्रतिस्थापन अभिक्रिया होगी जिसमें इलेक्ट्रानस्नेही द्वारा बेन्जीन के दूसरे हाइड्रोजन उत्तरोतर प्रतिस्थापित होंगे। उदाहरणस्वरूप, बेन्जीन की क्लोरीन की आधिक्य मात्रा के साथ एवं निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में अभिक्रिया कराने पर हैक्साक्लोरोबेन्जीन (C6Cl6) प्राप्त की जा सकती है।

(13.79)

इलेक्ट्रानस्नेही (इलेक्ट्रॉनरागी) प्रतिस्थापन की क्रियाविधि

प्रायोगिक तथ्यों के आधार पर SE (S =प्रतिस्थापन  E = इलेक्ट्रॉनस्नेही ) अभिक्रियाएं निम्नलिखित पदों द्वारा सम्पन्न होती हैं।

(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही की उत्पत्ति

(ख) कार्बधनायन का बनना

(ग) मध्यवर्ती कार्बधनायन से प्रोटॉन का विलोपन

(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही E+ की उत्पत्ति– बेन्जीन के क्लोरीनन, एेल्किलन तथा एेसिलन में निर्जल AlCl3, जो लूइस अम्ल है, आक्रमणकारी अभिकर्मक के साथ संयुक्त होकर क्रमशः Cl, R, RCO (एेसीलियम आयन) देता है।


नाइट्रोकरण के संदर्भ में सल्फ्यूरिक अम्ल से नाइट्रिक अम्ल को प्रोटॉन के स्थानांतरण पर इलेक्ट्रॉनस्नेही नाइट्रोनियम आयन इस प्रकार बनता है–

image51


यह रोचक तथ्य है कि नाइट्रोनियम आयन की उत्पत्ति की प्रक्रिया में सल्फ्यूरिक अम्ल, अम्ल की भाँति तथा नाइट्रिक अम्ल, क्षारक की भाँति कार्य करता है। अतः यह साधारण अम्ल-क्षारक साम्य है।

(ख) कार्बधनायन (एेरीनोनियम आयन) का बनना

इलेक्ट्रॉनस्नेही के आक्रमण से σ संकर या एेरीनोनियम आयन बनता है, जिसमें एक कार्बन sp3 संकरित अवस्था में होता है।

image52

एेरीनोनियम आयन निम्नलिखित प्रकार से अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त करता है–

सिग्मा संकुल या एेरीनोनियम आयन के sp3 संकरित कार्बन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन का विस्थानीकरण रुक जाता है, जिसके कारण यह एेरोमैटिक गुण खो देता है।

(ग) प्रोटॉन का विलोपन– एेरोमैटिक गुण को पुनः स्थापित करने के लिए σ संकुल sp3 संकरित कार्बन पर AlCl4 (हैलोजनन, एेल्किलन तथा एेसिलन के संदर्भ में) अथवा HSO4 (नाइट्रोकरण के संदर्भ में) के आक्रमण द्वारा प्रोटॉन का विलोपन करता है।

योगज अभिक्रियाएं

प्रबल परिस्थितियों जैसे–उच्च ताप एवं दाब पर निकैल उत्प्रेरक की उपस्थिति में बेन्जीन हाइड्रोजनीकरण यानी हाइड्रोजनन द्वारा साइक्लोहेक्सेन बनाती है।

साइक्लोहेक्सेन

(13.80)

पराबैंगनी प्रकाश की उपस्थिति में तीन क्लोरीन अणु बेन्जीन वलय पर संयोजित होकर बेन्जीनहैक्साक्लोराइड C6H6Cl6 बनाते हैं, जिसे गैमेक्सीन भी कहते हैं।

image53

(13.81)

दहन– बेन्जीन को वायु की उपस्थिति में गरम करने पर कज्जली लौ के साथ CO2 एवं H2O बनती है।

(13.82)

किसी हाइड्रोकार्बन की सामान्य दहन अभिक्रिया को निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रिया द्वारा प्रदर्शित किया
जाता है–

CxHy + (x + ) O2 x CO2 + H2O (13.83)

13.5.6 एकल प्रतिस्थापित बेन्जीन में क्रियात्मक समूह का निर्देशात्मक प्रभाव

यदि एकल प्रतिस्थापित बेन्जीन का पुनः प्रतिस्थापन कराया जाए तो तीनों संभावित द्विप्रतिस्थापित उत्पाद समान मात्रा में नहीं बनते हैं। यहाँ दो प्रकार के व्यवहार देखे गए हैं– (i) अॉर्थों एवं पैरा उत्पादन या (ii) मेटा उत्पादन। यह भी देखा गया है कि यह व्यवहार पहले से उपस्थित प्रतिस्थापी की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि आने वाले समूह की प्रकृति पर। इसे प्रतिस्थापियों का निर्देशात्मक प्रभाव कहते हैं। समूहों की विभिन्न निर्देशात्मक प्रकृति का कारण नीचे वर्णित किया गया है–

आर्थो एवं पैरा निर्देशी समूह– वे समूह जो आने वाले समूह को अॉर्थों एवं पैरा स्थिति पर निर्दिष्ट करते हैं, उन्हें आर्थों तथा पैरा निर्देशी समूह कहते हैं। उदाहरणस्वरूप– हम फीनॉलिक समूह के निर्देशात्मक प्रभाव की व्याख्या करते हैं। फीनॉल निम्नलिखित संरचनाओं का अनुनाद संकर है–

अनुनादी संरचनाओं से स्पष्ट है कि o- एवं p- स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक है। अतः मुख्यतः इन्हीं स्थितियों पर प्रतिस्थापन होगा। यद्यपि ध्यान रखने योग्य बात यह है कि -OH समूह का -I प्रभाव भी कार्य करता है, जिससे बेन्जीन वलय की o- एवं p- स्थिति पर कुछ इलेक्ट्रॉन घनत्व घटेगा, किंतु अनुनाद के कारण इन स्थितियों पर व्यापक इलेक्ट्रॉन घनत्व बहुत कम घटेगा। अतः -OH समूह बेन्जीन वलय को इलेक्ट्रॉनस्नेही के आक्रमण के लिए सक्रिय कर देते हैं। कुछ अन्य सक्रियकारी समूह के उदाहरण– NH2, -NHR, -NHCOCH3, -OCH3,-CH3,-C2H5, हैं।

एेरिल हैलाइड में हैलोजन यद्यपि विसक्रियकारी है, परंतु प्रबल -I प्रभाव के कारण ये बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम कर देते हैं, जिससे पुनः प्रतिस्थापन कठिन हो जाता है। हालाँकि अनुनाद के कारण o- एवं p- स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व m स्थिति से अधिक है। अतः ये भी o- एवं p-निर्देशी समूह है।

क्लोरोबेन्जीन की अनुनादी संरचनाएँ नीचे दी गई हैं।

मेटा निर्देशी समूह– वे समूह, जो आने वाले समूह को मेटा स्थिति पर निर्दिष्ट करते हैं, उन्हें मेटा निर्देशी समूह कहते हैं। कुछ मेटा निर्देशी समूह के उदाहरण -NO2,-CN,-CHO, -COR,-COOH,-COOR,-SO3H आदि हैं। आइए, नाइट्रोसमूह का उदाहरण लेते हैं। नाइट्रो समूह प्रबल-I प्रभाव के कारण बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम कर देता है। नाइट्रोबेन्जीन निम्नलिखित संरचनाओं का अनुनाद संकर है–


नाइट्रोबेन्जीन में बेन्जीन वलय पर व्यापक इलेक्ट्रॉन घनत्व घट जाता है, जो पुनः प्रतिस्थापन को कठिन बनाता है। अतः इन समूहों को निष्क्रियकारी समूह कहते हैं। मेटा स्थिति की तुलना में o- एवं p- स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम होता है। परिणामतः इलेक्ट्रॉनस्नेही तुलनात्मक रूप में इलेक्ट्रॉनधनी स्थिति (मेटा) पर आक्रमण करता है एवं प्रतिस्थापन मेटा स्थिति पर होता है।


13.6 कैंसरजन्य गुण तथा विषाक्तता

बेन्जीन तथा बहुलकेंद्रकीय हाइड्रोकार्बन, जिनमें दो से अधिक जुड़ी हुई वलय हों, विषाक्त तथा कैंसर जनित (कैंसरजनी) गुण दर्शाते हैं। बहुलकेंद्रकीय हाइड्रोकार्बन, कार्बनिक पदार्थों जैसे–तंबाकू, कोल तथा पेट्रोलियम के अपूर्ण दहन से बनते हैं, जो मानव शरीर में प्रवेश कर विभिन्न जैव रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा डी.एन.ए. को अंततः नष्ट कर कैंसर उत्पन्न करते हैं। कुछ कैंसरजनी हाइड्रोकार्बन नीचे दिए गए हैं–


सारांश

हाइड्रोकार्बन केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन के यौगिक होते हैं। हाइड्रोकार्बन मुख्यतः कोल तथा पेट्रोलियम से प्राप्त होते हैं, जो ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं। शैल रसायन (Petrochemicals) अनेक महत्त्वपूर्ण व्यावसायिक उत्पादों के निर्माण के लिए मुख्य प्रारंभिक पदार्थ हैं। घरेलू ईंधन तथा स्वचालित वाहनों के प्रमुख ऊर्जा स्रोत द्रवित पेट्रोलियम गैस, एल.पी.जी. (Liquified petroleum gas) तथा संपीडित प्राकृतिक गैस सी.एन.जी (Compressed natural gas) है, जो पेट्रोलियम से प्राप्त किए जाते हैं। संरचना के आधार पर हाइड्रोकार्बन को विवृत्त शृंखला संतृप्त (एेल्केन), असतृंप्त (एल्कीन तथा एल्काइन), चक्रीय (एेलिसाइक्लिक) तथा एेरोमैटिक वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।

एेल्केनों की प्रमुख अभिक्रियाएं, मुक्त-मूलक प्रतिस्थापन, दहन, अॉक्सीकरण तथा एेरोमैटीकरण है। एेल्कीन तथा एेल्काइन संकलन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं, जो मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही योगज अभिक्रियाएं होती हैं। एेरोमेटिक हाइड्रोकार्बन असंतृप्त
होते हुए भी इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं प्रदर्शित करते हैं। ये यौगिक विशेष परिस्थितियों में संकलन-अभिक्रियाएं प्रदर्शित करते हैं।

एेल्केन C-C (सिग्मा) आबंध के मुक्त घूर्णन के कारण संरूपणीय समावयवता (Conformational Isomerism) प्रदर्शित करते हैं। एथेन के सांतरित (Staggered) एवं ग्रस्त रूप (Eclipsed) में से सांतरित संरूपण हाइड्रोजन परमाणुओं की अधिकतम दूरी के कारण अधिक स्थायी है। कार्बन-कार्बन द्विआबंध के चारों ओर प्रतिबंधित घूर्णन के कारण एल्कीन ज्यामितीय (सिस-ट्रांस) समावयवता प्रदर्शित करती है।

बेन्जीन तथा बेन्जनाइड यौगिक एेरोमैटिकता प्रदर्शित करते हैं। यौगिकों में एेरोमैटिक होने का गुण, हकल द्वारा प्रतिपादित (4n + 2)π इलेक्ट्रॉन नियम पर आधारित है। बेन्जीनवलय से जुडे समूहों अथवा प्रतिस्थापियों की प्रकृति पुनः इलेक्ट्रानस्नेही प्रतिस्थापन हेतु वलय की सक्रियता एवं निष्क्रियता को तथा प्रवेश करने वाले समूह की स्थिति (Orientation) को प्रभावित करती है। कई बहुकेंद्रकीय हाइड्रोकार्बन (Polynuclear hydrocarbon) में बेन्जीनवलय आपस में जुड़ी रहती है। ये कैंसरजनी प्रकृति दर्शाते हैं।


अभ्यास

13.1 मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एेथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे।

13.2 निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए–

(क) CH3CH=C(CH3)2

 (ख) CH2=CH-C C-CH3

(ग)

 (घ) –CH2–CH2–CH=CH2

(च)

 (छ)

(ज)image54

13.3 निम्नलिखित यौगिकों, जिनमें द्विआबंध तथा त्रिआबंध की संख्या दर्शायी गई है, के सभी संभावित स्थिति समावयवों के संरचना-सूत्र एवं IUPAC नाम दीजिए–

(क) C4H8 (एक द्विआबंध)

(ख) C5H8 (एक त्रिआबंध)

13.4 निम्नलिखित यौगिकों के ओजोनी-अपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिखिए–

(i) पेन्ट-2-ईन

(ii) 3, 4-डाईमेथिल-हेप्ट-3-ईन

(iii) 2-एथिलब्यूट-1-ईन

(iv) 1-फेनिलब्यूट-1-ईन

13.5 एक एल्कीन 'A' के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा एेथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। A का IUPAC नाम तथा संरचना दीजिए।

13.6 एक एेल्केन A में तीन C-C, आठ C-H सिग्मा आबंध तथा एक C-C पाई आबंध हैं। A ओजोनी अपघटन से दो अणु एेल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए।

13.7 एक एल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनॉल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?

13.8 निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए–

(i) ब्यूटेन

(ii) पेन्टीन

(iii) हैक्साइन

(iv) टॉलूइन

13.9 हैक्स-2-ईन की समपक्ष (सिस) तथा विपक्ष (ट्रांस) संरचनाएं बनाइए। इनमें से कौन-से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों?

13.10 बेन्जीन में तीन द्वि-आबंध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?

13.11 किसी निकाय द्वारा एेरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्तें क्या हैं?

13.12 इनमें में कौन से निकाय एेरोमैटिक नहीं हैं? कारण स्पष्ट कीजिए–

image55

13.13 बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे–

(i) p-नाइट्रोब्रोमोबेन्जीन

(ii) m–नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन

(iii) p-नाइट्रोटॉलूईन

(iv) एेसीटोफीनोन

13.14 एेल्केन H3C CH2 C (CH3)2 CH2 CH(CH3)2 में 1°,2° तथा 3° कार्बन परमाणुओं की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक कार्बन से आबंधित कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए।

13.15 क्वथनांक पर एेल्केन की शृंखला के शाखन का क्या प्रभाव प्रड़ता है?

13.16 प्रोपीन पर HBr के संकलन से 2-ब्रोमोप्रोपेन बनता है, जबकि बेन्जॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया 1-ब्रोमोप्रोपेन देती है। क्रियाविधि की सहायता से इसका कारण स्पष्ट कीजिए।

13.17 1, 2-डाइमेथिलबेन्जीन(o-जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप निर्मित उत्पादों को लिखिए। यह परिणाम बेन्जीन की केकुले संरचना की पुष्टि किस प्रकार करता है?

13.18 बेन्जीन, n-हैक्सेन तथा एथाइन को घटते हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए।

13.19 बेन्जीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं सरलतापूर्वक क्यों प्रदर्शित करती हैं, जबकि उसमें नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?

13.20 आप निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे?

(i) एथाइन

(ii) एथीन

(iii) हैक्सेन

13.21 उन सभी एल्कीनों की संरचनाएं लिखिए, जो हाइड्रोजेनीकरण करने पर 2-मेथिलब्यूटेन देती है।

13.22 निम्नलिखित यौगिकों को उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही (E+) के प्रति घटती आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए–

(क) क्लोरोबेन्जीन, 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेन्जीन, p- नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन

(ख) टॉलूइन, p-H3C C6H4 NO2, p-O2N C6H4 NO2

13.23 बेन्जीन, m- डाइनाइट्रोबेन्जीन तथा टॉलूईन में से किसका नाइट्रोकरण आसानी से होता है और क्यों?

13.24 बेन्जीन के एथिलीकरण में निर्जल एेलुमीनियम क्लोराइड के स्थान पर कोई दूसरा लूइस अम्ल सुझाइए।

13.25 क्या कारण है कि वुर्ट्ज़ अभिक्रिया से विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले विशुद्ध एेल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती। एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।

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