रवींद्र केलेकर ;1925 . 2010द्ध 7 माचर् 1925 को कोंकण क्षेत्रा में जन्मे रवींद्र केलेकर छात्रा जीवन से ही गोवा मुक्ित आंदोलन में शामिल हो गए थे। गांध्ीवादी ¯चतक के रूप में विख्यात केलेकर ने अपने लेखन में जन - जीवन के विविध् पक्षों, मान्यताओं और व्यक्ितगत विचारों को देश और समाज के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। इनकी अनुभवजन्य टिप्पण्िायों में अपने ¯चतन की मौलिकता के साथ ही मानवीय सत्य तक पहुँचने की सहज चेष्टा रहती है। कोंकणी और मराठी के शीषर्स्थ लेखक और पत्राकार रवींद्र केलेकर की कोंकणी में पच्चीस, मराठी में तीन, ¯हदी और गुजराती में भी वुफछेक पुस्तवेंफ प्रकाश्िात हैं। केलेकर ने काका कालेलकर की अनेक पुस्तकों का संपादन और अनुवाद भी किया है। गोवा कला अकादमी के साहित्य पुरस्कार सहित कइर् पुरस्कारों से सम्मानित केलेकर की प्रमुख कृतियाँ हैं - कोंकणी में उजवाढाचे सूर, समिध, सांगली, ओथांबेऋ मराठी में कोंकणीचें राजकरण, जापान जसा दिसला और ¯हदी में पतझर में टूटी पिायाँ। पाठ प्रवेश ऐसा माना जाता है कि थोड़े मंे बहुत वुफछ कह देना कविता का गुण है। जब कभी यह गुण किसी गद्य रचना में भी दिखाइर् देता है तब उसे पढ़ने वाले को यह मुहावरा याद नहीं रखना पड़ता कि ‘सार - सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय’। सरल लिखना, थोड़े शब्दों में लिखना श्यादा कठिन काम है। पिफर भी यह काम होता रहा है। सूक्ित कथाएँ, आगम कथाएँ, जातक कथाएँ, पंचतंत्रा की कहानियाँ उसी लेखन के प्रमाण हैं। यही काम कोंकणी में रवींद्र केलेकर ने किया है। प्रस्तुत पाठ के प्रसंग पढ़ने वालों से थोड़ा कहा बहुत समझना की माँग करते हैं। ये प्रसंग महज पढ़ने - गुनने की नहीं, एक जागरूक और सिय नागरिक बनने की प्रेरणा भी देते हैं। पहला प्रसंग गिन्नी का सोना जीवन में अपने लिए सुख - साध्न जुटाने वालों से नहीं बल्िक उन लोगों से परिचित कराता है जो इस जगत को जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं। दूसरा प्रसंग झेन की देन बौ( दशर्न में वण्िार्त ध्यान की उस प(ति की याद दिलाता है जिसके कारण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिनचयार् के बीच वुफछ चैन भरे पल पा जाते हैं। पतझर में टूटी पिायाँ ;प्द्ध गिन्नी का सोना शु( सोना अलग है और गिन्नी का सोना अलग। गिन्नी के सोने में थोड़ा - सा ताँबा मिलाया हुआ होता है, इसलिए वह श्यादा चमकता है और शु( सोने से मशबूत भी होता है। औरतें अकसर इसी सोने के गहने बनवा लेती हैं। पिफर भी होता तो वह है गिन्नी का ही सोना। शु( आदशर् भी शु( सोने के जैसे ही होते हैं। चंद लोग उनमें व्यावहारिकता का थोड़ा - सा ताँबा मिला देते हैं और चलाकर दिखाते हैं। तब हम लोग उन्हें ‘प्रैक्िटकल आइडियालिस्ट’ कहकर उनका बखान करते हैं। पर बात न भूलें कि बखान आदशो± का नहीं होता, बल्िक व्यावहारिकता का होता है। और जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब ‘प्रैक्िटकल आइडियालिस्टों’ के जीवन से आदशर् धीरे - धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यावहारिक सूझबूझ ही आगे आने लगती है। सोना पीछे रहकर ताँबा ही आगे आता है। चंद लोग कहते हैं, गांधीजी ‘प्रैक्िटकल आइडियालिस्ट’ थे। व्यावहारिकता को पहचानते थे। उसकी कीमत जानते थे। इसीलिए वे अपने विलक्षण आदशर् चला सके। वरना हवा में ही उड़ते रहते। देश उनके पीछे न जाता। हाँ, पर गांधीजी कभी आदशो± को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं देते थे। बल्िक व्यावहारिकता को आदशो± के स्तर पर चढ़ाते थे। वे सोने में ताँबा नहीं बल्िक ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे। इसलिए सोना ही हमेशा आगे आता रहता था। व्यवहारवादी लोग हमेशा सजग रहते हैं। लाभ - हानि का हिसाब लगाकर ही कदम उठाते हैं। वे जीवन में सपफल होते हैं, अन्यों से आगे भी जाते हैं पर क्या वे उफपर चढ़ते हैं। खुद उफपर चढ़ें और अपने साथ दूसरों को भी उफपर ले चलें, यही महत्त्व की बात है। यह काम तो हमेशा आदशर्वादी लोगों ने ही किया है। समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा वुफछ है तो वह आदशर्वादी लोगों का ही दिया हुआ है। व्यवहारवादी लोगों ने तो समाज को गिराया ही है। ;प्प्द्ध झेन की देन जापान में मैंने अपने एक मित्रा से पूछा, फ्यहाँ के लोगों को कौन - सी बीमारियाँ अिाक होती हैं?य् फ्मानसिकय्, उन्होंने जवाब दिया, फ्यहाँ के अस्सी प़्ाफीसदी लोग मनोरुग्ण हैं।य् फ्इसकी क्या वजह है?य् कहने लगे, फ्हमारे जीवन की रफ्ऱ तार बढ़ गइर् है। यहाँ कोइर् चलता नहीं, बल्िक दौड़ता है। कोइर् बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं। ...अमेरिका से हम प्रतिस्पधार् करने लगे। एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही पूरा करने की कोश्िाश करने लगे। वैसे भी दिमाग की रफ्ऱ तार हमेशा तेश ही रहती है। उसे ‘स्पीड’ का इंजन लगाने पर वह हशार गुना अिाक रफ्ऱतार से दौड़ने लगता है। पिफर एक क्षण ऐसा आता है जब दिमाग का तनाव बढ़ जाता है और पूरा इंजन टूट जाता है। ...यही कारण है जिससे मानसिक रोग यहाँ बढ़ गए हैं।...य् शाम को वह मुझे एक ‘टी - सेरेमनी’ में ले गए। चाय पीने की यह एक वििा है। जापानी में उसे चा - नो - यू कहते हंै। वह एक छः मंजिली इमारत थी जिसकी छत पर दफ्ऱती की दीवारोंवाली और तातामी ;चटाइर्द्ध की शमीनवाली एक सुंदर पणर्वुफटी थी। बाहर बेढब - सा एक मि‘ी का बरतन था। उसमें पानी भरा हुआ था। हमने अपने हाथ - पाँव इस पानी से धोए। तौलिए से पोंछे और अंदर गए। अंदर ‘चाजीन’ बैठा था। हमें देखकर वह खड़ा हुआ। कमर झुकाकर उसने हमें प्रणाम किया। दो...झो...;आइए, तशरीप्ाफ लाइएद्ध़कहकर स्वागत किया। बैठने की जगह हमें दिखाइर्। अँगीठी सुलगाइर्। उस पर चायदानी रखी। बगल के ़कमरे में जाकर वुफछ बरतन ले आया। तौलिए से बरतन सापफ किए। सभी ियाएँ इतनी गरिमापूणर् ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों। वहाँ का वातावरण इतना शांत था कि चायदानी के पानी का खदबदाना भी सुनाइर् दे रहा था। एक - एक बूँद चाय पीते रहे। करीब डेढ़ घंटे तक चुसकियों का यह सिलसिला चलता रहा। पहले दस - पंद्रह मिनट तो मैं उलझन में पड़ा। पिफर देखा, दिमाग की रफ्ऱ तार धीरे - धीरे धीमी पड़ती जा रही है। थोड़ी देर में बिलवुफल बंद भी हो गइर्। मुझे लगा, मानो अनंतकाल में मैं जी रहा हूँ। यहाँ तक कि सन्नाटा भी मुझे सुनाइर् देने लगा। अकसर हम या तो गुशरे हुए दिनों की ख‘ी - मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपने देखते रहते हैं। हम या तो भूतकाल में रहते हैं या भविष्यकाल में। असल में दोनों काल मिथ्या हैं। एक चला गया है, दूसरा आया नहीं है। हमारे सामने जो वतर्मान क्षण है, वही सत्य है। उसी में जीना चाहिए। चाय पीते - पीते उस दिन मेरे दिमाग से भूत और भविष्य दोनों काल उड़ गए थे। केवल वतर्मान क्षण सामने था। और वह अनंतकाल जितना विस्तृत था। जीना किसे कहते हैं, उस दिन मालूम हुआ। झेन परंपरा की यह बड़ी देन मिली है जापानियों को! प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नांे के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिए - प् 1.शु( सोना और गिन्नी का सोना अलग क्यों होता है? 2.प्रैक्िटकल आइडियालिस्ट किसे कहते हैं? 3.पाठ के संदभर् में शु( आदशर् क्या है? प्प् 4.लेखक ने जापानियों के दिमाग में ‘स्पीड’ का इंजन लगने की बात क्यों कही है? 5.जापानी में चाय पीने की विध्ि को क्या कहते हैं? 6.जापान में जहाँ चाय पिलाइर् जाती है, उस स्थान की क्या विशेषता है? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - प् 1.शु( आदशर् की तुलना सोने से और व्यावहारिकता की तुलना ताँबे से क्यों की गइर् है? प्प् 2.चाजीन ने कौन - सी ियाएँ गरिमापूणर् ढंग से पूरी कीं? 3.‘टी - सेरेमनी’ में कितने आदमियों को प्रवेश दिया जाता था और क्यों? 4.चाय पीने के बाद लेखक ने स्वयं में क्या परिवतर्न महसूस किया? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - प् 1.गांध्ीजी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थीऋ उदाहरण सहित इस बात की पुष्िट कीजिए। 2.आपके विचार से कौन - से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं? वतर्मान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए। 3.अपने जीवन की किसी ऐसी घटना का उल्लेख कीजिए जब - ;1द्ध शु( आदशर् से आपको हानि - लाभ हुआ हो। ;2द्ध शु( आदशर् में व्यावहारिकता का पुट देने से लाभ हुआ हो। 4.‘शु( सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना’, गांध्ीजी के आदशर् और व्यवहार के संदभर् में यह बात किस तरह झलकती है? स्पष्ट कीजिए। 5.‘गिरगिट’ कहानी में आपने समाज में व्याप्त अवसरानुसार अपने व्यवहार को पल - पल में बदल डालने की एक बानगी देखी। इस पाठ के अंश ‘गिन्नी का सोना’ के संदभर् में स्पष्ट कीजिए कि ‘आदशर्वादिता’ और ‘व्यावहारिकता’ इनमें से जीवन में किसका महत्त्व है? पतझर में टूटी पिायाँ ध् 123 प्प् 6.लेखक के मित्रा ने मानसिक रोग के क्या - क्या कारण बताए? आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं? 7.लेखक के अनुसार सत्य केवल वतर्मान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? स्पष्ट कीजिए। ;गद्ध निम्नलिख्िात के आशय स्पष्ट कीजिए - प् 1.समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा वुफछ है तो वह आदशर्वादी लोगों का ही दिया हुआ है। 2.जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब ‘प्रैक्िटकल आइडियालिस्टों’ के जीवन से आदशर् ध्ीरे - धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनवफी व्यावहारिक सूझ - बूझ ही आगे आने लगती है। प्प् 3.हमारे जीवन की रफ्ऱतार बढ़ गइर् है। यहाँ कोइर् चलता नहीं बल्िक दौड़ता है। कोइर् बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं। 4.सभी वि्रफयाएँ इतनी गरिमापूणर् ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हांे। भाषा अध्ययन प् 1.नीचे दिए गए शब्दों का वाक्य में प्रयोग कीजिए - व्यावहारिकता, आदशर्, सूझबूझ, विलक्षण, शाश्वत 2.‘लाभ - हानि’ का विग्रह इस प्रकार होगा - लाभ और हानि यहाँ द्वंद्व समास है जिसमंे दोनों पद प्रधन होते हैं। दोनों पदों के बीच योजक शब्द का लोप करने के लिए योजक चिÉ लगाया जाता है। नीचे दिए गए द्वंद्व समास का विग्रह कीजिए - ;कद्ध माता - पिता त्र ;खद्ध पाप - पुण्य त्र ;गद्ध सुख - दुख त्र ;घद्ध रात - दिन त्र ;घद्ध अन्न - जल त्र ;चद्ध घर - बाहर त्र ;छद्ध देश - विदेश त्र 3.नीचे दिए गए विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाइए - ;कद्ध सपफल त्र ;खद्ध विलक्षण त्र ;गद्ध व्यावहारिक त्र ;घद्ध सजग त्र ;घद्ध आदशर्वादी त्र ;चद्ध शु( त्र 4.नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए और शब्द के अथर् को समझिए - ;कद्ध शु( सोना अलग है। ;खद्ध बहुत रात हो गइर् अब हमें सोना चाहिए। उफपर दिए गए वाक्यों मंे ‘सोना’ का क्या अथर् है? पहले वाक्य में ‘सोना’ का अथर् है धतु ‘स्वणर्’। दूसरे वाक्य में ‘सोना’ का अथर् है ‘सोना’ नामक िया। अलग - अलग संदभो± में ये शब्द अलग अथर् देते हैं अथवा एक शब्द के कइर् अथर् होते हैं। ऐसे शब्द अनेकाथीर् शब्द कहलाते हैं। नीचे दिए गए शब्दों के भ्िान्न - भ्िान्न अथर् स्पष्ट करने के लिए उनका उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए - उत्तर, कर, अंक, नग प्प् 5.नीचे दिए गए वाक्यों को संयुक्त वाक्य में बदलकर लिख्िाए - ;कद्ध 1.अँगीठी सुलगायी। 2.उस पर चायदानी रखी। ;खद्ध 1.चाय तैयार हुइर्। 2.उसने वह प्यालों में भरी। ;गद्ध 1.बगल के कमरे से जाकर वुफछ बरतन ले आया। 2.तौलिये से बरतन सापफ किए।़6.नीचे दिए गए वाक्यों से मिश्र वाक्य बनाइए - ;कद्ध 1.चाय पीने की यह एक विध्ि है। 2.जापानी में उसे चा - नो - यू कहते हैं। ;खद्ध 1.बाहर बेढब - सा एक मि‘ी का बरतन था। 2.उसमें पानी भरा हुआ था। ;गद्ध 1.चाय तैयार हुइर्। 2.उसने वह प्यालों में भरी। 3. पिफर वे प्याले हमारे सामने रख दिए। पतझर में टूटी पिायाँ ध् 125 योग्यता विस्तार प् 1.गांध्ीजी के आदशो± पर आधरित पुस्तवेंफ पढि़एऋ जैसे - महात्मा गांध्ी द्वारा रचित ‘सत्य के प्रयोग’ और गिरिराज किशोर द्वारा रचित उपन्यास ‘गिरमिटिया’। प्प् 2.पाठ में वण्िार्त ‘टी - सेरेमनी’ का शब्द चित्रा प्रस्तुत कीजिए। परियोजना कायर् 1.भारत के नक्शे पर वे स्थान अंकित कीजिए जहाँ चाय की पैदावार होती है। इन स्थानों से संबंध्ित भौगोलिक स्िथतियों और अलग - अलग जगह की चाय की क्या विशेषताएँ हैं, इनका पता लगाइए और परियोजना पुस्ितका में लिख्िाए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ व्यावहारिकता - समय और अवसर देखकर कायर् करने की सूझ प्रैक्िटकल आइडियालिस्ट - व्यावहारिक आदशर् बखान - वणर्न करना / बयान करना सूझ - बूझ - काम करने की समझ स्तर - श्रेणी के स्तर - के बराबर सजग - सचेत शाश्वत - जो सदैव एक - सा रहे / जो बदला न जा सके शु( सोना - 24 वैफरेट का ;बिना मिलावट काद्ध सोना गिन्नी का सोना - 22 वैफरेट ;सोने में ताँबा मिला हुआद्ध का सोना जिससे गहने बनाए जाते हैं मानसिक - मस्ितष्क संबंध्ी / दिमागी मनोरुग्ण - तनाव के कारण मन से अस्वस्थ प्रतिस्प(ार् - होड़ स्पीड - गति टी - सेरेमनी - जापान में चाय पीने का विशेष आयोजन चा - नो - यू - जापानी में टी - सेरेमनी का नाम दफ्ऱती - लकड़ी की खोखली सरकने वाली दीवार जिस पर चित्राकारी होती है पणर्वुफटी - पत्तों से बनी वुफटिया बेढब - सा - बेडौल - सा चाजीन - जापानी विध्ि से चाय पिलाने वाला 126 ध् स्पशर् गरिमापूणर् - सलीके से भंगिमा - मुद्रा जयजयवंती - एक राग का नाम खदबदाना - उबलना उलझन - असमंजस की स्िथति अनंतकाल - वह काल जिसका अंत न हो सन्नाटा - खामोशी मिथ्या - भ्रम

>chapter-16>

SparshBhag2-016

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(1925- 2010)

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4- ys[kd us tkikfu;ksa osQ fnekx esa ^LihM* dk batu yxus dh ckr D;ksa dgh gS\

5- tkikuh esa pk; ihus dh fof/ dks D;k dgrs gSa\

6- tkiku esa tgk¡ pk; fiykbZ tkrh gS] ml LFkku dh D;k fo'ks"krk gS\

fyf[kr

(d) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (25-30 'kCnksa esa) fyf[k,

1- 'kq¼ vkn'kZ dh rqyuk lksus ls vkSj O;kogkfjdrk dh rqyuk rk¡cs ls D;ksa dh xbZ gS\

2- pkthu us dkSu&lh fØ;k,¡ xfjekiw.kZ <ax ls iwjh dha\

3- ^Vh&lsjseuh* esa fdrus vknfe;ksa dks izos'k fn;k tkrk Fkk vkSj D;ksa\

4- pk; ihus osQ ckn ys[kd us Lo;a esa D;k ifjorZu eglwl fd;k\

([k) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (50-60 'kCnksa esa) fyf[k,

1- xka/hth esa usr`Ro dh vn~Hkqr {kerk Fkh_ mnkgj.k lfgr bl ckr dh iqf"V dhft,A

2- vkiosQ fopkj ls dkSu&ls ,sls ewY; gSa tks 'kk'or gSa\ orZeku le; esa bu ewY;ksa dh izklafxdrk Li"V dhft,A

3- vius thou dh fdlh ,slh ?kVuk dk mYys[k dhft, tc

(1) 'kq¼ vkn'kZ ls vkidks gkfu&ykHk gqvk gksA

(2) 'kq¼ vkn'kZ esa O;kogkfjdrk dk iqV nsus ls ykHk gqvk gksA

4- ^'kq¼ lksus esa rk¡cs dh feykoV ;k rk¡cs esa lksuk*] xka/hth osQ vkn'kZ vkSj O;ogkj osQ lanHkZ esa ;g ckr fdl rjg >ydrh gS\ Li"V dhft,A

5- ^fxjfxV* dgkuh esa vkius lekt esa O;kIr voljkuqlkj vius O;ogkj dks iy&iy esa cny Mkyus dh ,d ckuxh ns[khA bl ikB osQ va'k ^fxUuh dk lksuk* osQ lanHkZ esa Li"V dhft, fd ^vkn'kZokfnrk* vkSj ^O;kogkfjdrk* buesa ls thou esa fdldk egÙo gS\

6- ys[kd osQ fe=k us ekufld jksx osQ D;k&D;k dkj.k crk,\ vki bu dkj.kksa ls dgk¡ rd lger gSa\

7- ys[kd osQ vuqlkj lR; osQoy orZeku gS] mlh esa thuk pkfg,A ys[kd us ,slk D;ksa dgk gksxk\ Li"V dhft,A

(x) fuEufyf[kr osQ vk'k; Li"V dhft,

1- lekt osQ ikl vxj 'kk'or ewY;ksa tSlk oqQN gS rks og vkn'kZoknh yksxksa dk gh fn;k gqvk gSA

2- tc O;kogkfjdrk dk c[kku gksus yxrk gS rc ^izSfDVdy vkbfM;kfyLVksa* osQ thou ls vkn'kZ /hjs&èkhjs ihNs gVus yxrs gSa vkSj muoQh O;kogkfjd lw>&cw> gh vkxs vkus yxrh gSA

3- gekjs thou dh jÝ+rkj c<+ xbZ gSA ;gk¡ dksbZ pyrk ugha cfYd nkSM+rk gSA dksbZ cksyrk ugha] cdrk gSA ge tc vosQys iM+rs gSa rc vius vkils yxkrkj cM+cM+krs jgrs gSaA

4- lHkh fozQ;k,¡ bruh xfjekiw.kZ <ax ls dha fd mldh gj Hkafxek ls yxrk Fkk ekuks t;t;oarh osQ lqj xw¡t jgs gkasA

Hkk"kk vè;;u

1- uhps fn, x, 'kCnksa dk okD; esa iz;ksx dhft,

O;kogkfjdrk] vkn'kZ] lw>cw>] foy{k.k] 'kk'or

2- ^ykHk&gkfu* dk foxzg bl izdkj gksxkykHk vkSj gkfu

;gk¡ }a} lekl gS ftleas nksuksa in iz/ku gksrs gSaA nksuksa inksa osQ chp ;kstd 'kCn dk yksi djus osQ fy, ;kstd fpÉ yxk;k tkrk gSA uhps fn, x, }a} lekl dk foxzg dhft,

(d) ekrk&firk ¾ ------------------------------------

([k) iki&iq.; ¾ ------------------------------------

(x) lq[k&nq[k ¾ ------------------------------------

(?k) jkr&fnu ¾ ------------------------------------

(Ä) vUu&ty ¾ ------------------------------------

(p) ?kj&ckgj ¾ ------------------------------------

(N) ns'k&fons'k ¾ ------------------------------------

3- uhps fn, x, fo'ks"k.k 'kCnksa ls Hkkookpd laKk cukb,

(d) liQy ¾ ------------------------------------

([k) foy{k.k ¾ ------------------------------------

(x) O;kogkfjd ¾ ------------------------------------

(?k) ltx ¾ ------------------------------------

(Ä) vkn'kZoknh ¾ ------------------------------------

(p) 'kq¼ ¾ ------------------------------------

4- uhps fn, x, okD;ksa esa js[kkafdr va'k ij è;ku nhft, vkSj 'kCn osQ vFkZ dks lef>,

(d) 'kq¼ lksuk vyx gSA

([k) cgqr jkr gks xbZ vc gesa lksuk pkfg,A

mQij fn, x, okD;ksa eas ^lksuk* dk D;k vFkZ gS\ igys okD; esa ^lksuk* dk vFkZ gS /krq ^Lo.kZ*A nwljs okD; esa ^lksuk* dk vFkZ gS ^lksuk* uked fØ;kA vyx&vyx lanHkks± esa ;s 'kCn vyx vFkZ nsrs gSa vFkok ,d 'kCn osQ dbZ vFkZ gksrs gSaA ,sls 'kCn vusdkFkhZ 'kCn dgykrs gSaA uhps fn, x, 'kCnksa osQ fHkUu&fHkUu vFkZ Li"V djus osQ fy, mudk mudk okD;ksa esa iz;ksx dhft,

mÙkj] dj] vad] ux

5- uhps fn, x, okD;ksa dks la;qDr okD; esa cnydj fyf[k,

(d) 1- v¡xhBh lqyxk;hA

2- ml ij pk;nkuh j[khA

([k) 1- pk; rS;kj gqbZA

2- mlus og I;kyksa esa HkjhA

(x) 1- cxy osQ dejs ls tkdj oqQN cjru ys vk;kA

2- rkSfy;s ls cjru lkI+kQ fd,A

6- uhps fn, x, okD;ksa ls feJ okD; cukb,

(d) 1- pk; ihus dh ;g ,d fof/ gSA

2- tkikuh esa mls pk&uks&;w dgrs gSaA

([k) 1- ckgj cs<c&lk ,d fe^h dk cjru FkkA

2- mlesa ikuh Hkjk gqvk FkkA

(x) 1- pk; rS;kj gqbZA

2- mlus og I;kyksa esa HkjhA

3- fiQj os I;kys gekjs lkeus j[k fn,A

;ksX;rk foLrkj

1- xka/hth osQ vkn'kks± ij vk/kfjr iqLrosaQ if<+,_ tSlsegkRek xka/h }kjk jfpr ^lR; osQ iz;ksx* vkSj fxfjjkt fd'kksj }kjk jfpr miU;kl ^fxjfefV;k*A

2- ikB esa of.kZr ^Vh&lsjseuh* dk 'kCn fp=k izLrqr dhft,A

ifj;kstuk dk;Z

1- Hkkjr osQ uD'ks ij os LFkku vafdr dhft, tgk¡ pk; dh iSnkokj gksrh gSA bu LFkkuksa ls lacaf/r HkkSxksfyd fLFkfr;ksa vkSj vyx&vyx txg dh pk; dh D;k fo'ks"krk,¡ gSa] budk irk yxkb, vkSj ifj;kstuk iqfLrdk esa fyf[k,A

'kCnkFkZ vkSj fVIif.k;k¡

O;kogkfjdrk & le; vkSj volj ns[kdj dk;Z djus dh lw>

izSfDVdy vkbfM;kfyLV & O;kogkfjd vkn'kZ

c[kku & o.kZu djuk @ c;ku djuk

lw>&cw> & dke djus dh le>

Lrj & Js.kh

osQ Lrj & osQ cjkcj

ltx & lpsr

'kk'or & tks lnSo ,d&lk jgs @ tks cnyk u tk losQ

'kq¼ lksuk & 24 oSQjsV dk (fcuk feykoV dk) lksuk

fxUuh dk lksuk & 22 oSQjsV (lksus esa rk¡ck feyk gqvk) dk lksuk ftlls xgus cuk, tkrs gSa

ekufld & efLr"d laca/h @ fnekxh

euks#X.k & ruko osQ dkj.k eu ls vLoLFk

izfrLi¼kZ & gksM+

LihM & xfr

Vh&lsjseuh & tkiku esa pk; ihus dk fo'ks"k vk;kstu

pk&uks&;w & tkikuh esa Vh&lsjseuh dk uke

nÝ+rh & ydM+h dh [kks[kyh ljdus okyh nhokj ftl ij fp=kdkjh gksrh gS

i.kZoqQVh & iÙkksa ls cuh oqQfV;k

cs<c&lk & csMkSy&lk

pkthu & tkikuh fof/ ls pk; fiykus okyk

xfjekiw.kZ & lyhosQ ls

Hkafxek & eqnzk

t;t;oarh & ,d jkx dk uke

[kncnkuk & mcyuk

my>u & vleatl dh fLFkfr

vuardky & og dky ftldk var u gks

lUukVk & [kkeks'kh

feF;k & Hkze

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