निदा प़्ाफाशली ;1938द्ध 12 अक्तूबर 1938 को दिल्ली में जन्मे निदा पफाशली का बचपन ग्वालियर में़़बीता। निदा पफाशली उदूर् की साठोत्तरी पीढ़ी के महत्त्वपूणर् कवि माने जाते हैं। आम बोलचाल की भाषा में और सरलता से किसी के भी दिलोदिमाग में घर कर सके, ऐसी कविता करने में इन्हें महारत हासिल है। वही निदा पफाशली अपनी गद्य़रचनाओं में शेर - ओ - शायरी पिरोकर बहुत वुफछ को थोड़े में कह देने के मामले में अपने किस्म के अकेले ही गद्यकार हैं। ़निदा पफाशली की लफ्ऱ जों का पुल नामक कविता की पहली पुस्तक आइर्। शायरी की किताब खोया हुआ सा वुफछ के लिए 1999 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित निदा पफाशली की आत्मकथा का पहला भाग़दीवारों के बीच और दूसरा दीवारों के पार शीषर्क से प्रकाश्िात हो चुका है। इन दिनों प्िाफल्म उद्योग़से संब( हैं। यहाँ तमाशा मेरे आगे किताब में संकलित एक अंश प्रस्तुत है। वुफदरत ने यह ध्रती उन तमाम जीवधरियों के लिए अता पफरमाइर् थी जिन्हें खुद उसी ने जन्म दिया था। लेकिन हुआ यह कि आदमी नाम के वुफदरत के सबसे अशीम करिश्मे ने ध्ीरे - ध्ीरे पूरी ध्रती को ही अपनी जागीर बना लिया और अन्य तमाम जीवधारियों को दरबदर कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अन्य जीवधारियों की या तो नस्लें खत्म होती गईं या उन्हें अपना ठौर - ठिकाना छोड़कर कहीं और जाना पड़ा या पिफर आज भी वे एक आश्िायाने की तलाश में मारे - मारे पिफर रहे हैं। इतना भर हुआ रहा होता तब भी गनीमत होती, लेकिन आदमी नाम के इस जीव की सब वुफछ समेट लेने की भूख यहीं पूरी नहीं हुइर्। अब वह अन्य प्राण्िायों को ही नहीं खुद अपनी जात को भी बेदखल करने से शरा भी परहेश नहीं करता। आलम यह है कि उसे न तो किसी के सुख - दुख की ¯चता है, न किसी को सहारा या सहयोग देने की मंशा ही। यकीन न आता हो तो इस पाठ को पढ़ जाइए और साथ ही याद कीजिएगा अपने आसपास के लोगों को। बहुत संभव है इसे पढ़ते हुए ऐसे बहुत लोग याद आएँ जो कभी न कभी किसी न किसी के प्रति वैसा ही बरताव करते रहे हों। अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले बाइबिल के सोलोमेन जिन्हें वुफरआन में सुलेमान कहा गया है, इर्सा से 1025 वषर् पूवर् एक बादशाह थे। कहा गया है, वह केवल मानव जाति के ही राजा नहीं थे, सारे छोटे - बड़े पशु - पक्षी के भी हाकिम थे। वह इन सबकी भाषा भी जानते थे। एक दपफा सुलेमान अपने लश्कर के साथ एक रास्ते से गुशर रहे थे। रास्ते में वुफछ चींटियों ने घोड़ों की टापों की आवाश सुनी तो डर कर एक - दूसरे से कहा, ‘आप जल्दी से अपने - अपने बिलों में चलो, पफौज आ रही है।’ सुलेमान उनकी बातें सुनकर थोड़ी़दूर पर रुक गए और चींटियों से बोले, ‘घबराओ नहीं, सुलेमान को खुदा ने सबका रखवाला बनाया है। मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं हूँ, सबके लिए मुहब्बत हूँ।’ चींटियों ने उनके लिए इर्श्वर से दुआ की और सुलेमान अपनी मंिाल की ओर बढ़ गए। 112 ध् स्पशर् ऐसी एक घटना का िाक्र ¯सध्ी भाषा के महाकवि शेख अयाश ने अपनी आत्मकथा में किया है। उन्होंने लिखा हैμ‘एक दिन उनके पिता वुफएँ से नहाकर लौटे। माँ ने भोजन परोसा। उन्होंने जैसे ही रोटी का कौर तोड़ा। उनकी नशर अपनी बाजू पर पड़ी। वहाँ एक काला च्योंटा रेंग रहा था। वह भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए।’ माँ ने पूछा, ‘क्या बात है? भोजन अच्छा नहीं लगा?’ शेख अयाश के पिता बोले, ‘नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को वुफएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।’ बाइबिल और दूसरे पावन ग्रंथों मंे नूह नाम के एक पैगंबर का िाक्र मिलता है। उनका असली नाम लशकर था, लेकिन अरब ने उनको नूह के लकब से याद किया है। वह इसलिए कि आप सारीउम्र रोते रहे। इसका कारण एक शख्मी वुफत्ता था। नूह के सामने से एक बार एक घायल वुफत्ता गुशरा।नूह ने उसे दुत्कारते हुए कहा, ‘दूर हो जा गंदे वुफत्ते!’ इस्लाम में वुफत्तों को गंदा समझा जाता है। वुफत्तेने उनकी दुत्कार सुनकर जवाब दिया...‘न मैं अपनी मशीर् से वुफत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इनसान हो। बनाने वाला सबका तो वही एक है।’ म‘ी से म‘ी मिले, खो के सभी निशान। किसमें कितना कौन है, वैफसे हो पहचान।। नूह ने जब उसकी बात सुनी और दुखी हो मुद्दत तक रोते रहे। ‘महाभारत’ में युध्िष्िठर का जोअंत तक साथ निभाता नशर आता है, वह भी प्रतीकात्मक रूप में एक वुफत्ता ही था। सब साथ छोड़ते गए तो केवल वही उनके एकांत को शांत कर रहा था। दुनिया वैफसे वजूद में आइर्? पहले क्या थी? किस बिंदु से इसकी यात्रा शुरू हुइर्? इन प्रश्नों केउत्तर विज्ञान अपनी तरह से देता है, धमिर्क ग्रंथ अपनी - अपनी तरह से। संसार की रचना भले ही वैफसे हुइर् हो लेकिन ध्रती किसी एक की नहीं है। पंछी, मानव, पशु, नदी, पवर्त, समंदर आदि की इसमें बराबर की हिस्सेदारी है। यह और बात है कि इस हिस्सेदारी में मानव जाति ने अपनी बुि से बड़ी - बड़ी दीवारें खड़ी कर दी हैं। पहले पूरा संसार एक परिवार के समान था अब टुकड़ों में बँटकर एक - दूसरे से दूर हो चुका है। पहले बड़े - बड़े दालानों - आँगनों में सब मिल - जुलकर रहते थे अब छोटे - छोटे डिब्बे जैसे घरों में जीवन सिमटने लगा है। बढ़ती हुइर् आबादियों ने समंदर को पीछे सरकाना शुरू कर दिया है, पेड़ों को रास्तों से हटाना शुरू कर दिया है, पैफलते हुए प्रदूषण ने पंछियों को बस्ितयों से भगाना शुरू कर दिया है। बारूदों की विनाशलीलाओं ने वातावरण को सताना शुरू कर दिया। अब गरमी में श्यादा गरमी, बेवक्त की बरसातें, शलशले, सैलाब, तूप़्ाफान और नित नए रोग, मानव और प्रकृति के इसी असंतुलन के परिणाम हैं। नेचर की सहनशक्ित की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना वुफछ साल पहले बंबइर् ;मुंबइर्द्ध में देखने को मिला था और यह नमूना इतना डरावना था कि बंबइर् निवासी डरकर अपने - अपने पूजा - स्थल में अपने खुदाओं से प्राथर्ना करने लगे थे। कइर् सालों से बड़े - बडे़ बिल्डर समंदर को पीछे धकेल कर उसकी शमीन को हथ्िाया रहे थे। बेचारा समंदर लगातार सिमटता जा रहा था। पहले उसने अपनी पैफली हुइर् टाँगें समेटीं, थोड़ा सिमटकर बैठ गया। पिफर जगह कम पड़ी तो उकडँÂ∏ बैठ गया। पिफर खड़ा हो गया...जब खड़े रहने की जगह कम पड़ी तो उसे गुस्सा आ गया। जो जितना बड़ा होता है उसे उतना ही कम गुस्सा आता है। परंतु आता है तो रोकना मुश्िकल हो जाता है, और यही हुआ, उसने एक रात अपनी लहरों पर दौड़ते हुए तीन जहाशों को उठाकर बच्चों की गेंद की तरह तीन दिशाओं में पेंफक दिया। एक वलीर् के समंदर के किनारे पर आकर गिरा, दूसरा बांद्रा में काटर्र रोड के सामने औंधे मुँह और तीसरा गेट - वे - आॅप़्ाफ इंडिया पर टूट - पूफटकर सैलानियों का नशारा बना बावजूद कोश्िाश, वे पिफर से चलने - पिफरने के काबिल नहीं हो सके।मेरी माँ कहती थी, सूरज ढले आँगन के पेड़ों से पत्ते मत तोड़ो, पेड़ रोएँगे। दीया - बत्ती के वक्त पूफलों को मत तोड़ो, पूफल बद्दुआ देते हैं।... दरिया पर जाओ तो उसे सलाम किया करो, वह खुश होता है। कबूतरों को मत सताया करो, वे हशरत मुहम्मद को अशीश हैं। उन्होंने उन्हें अपनी मशार के नीले गुंबद पर घोंसले बनाने की इशाशत दे रखी है। मुगेर् को परेशान नहीं किया करो, वह मुल्ला जी से पहले मोहल्ले में अशान देकर सबको सवेरे जगाता हैμ सब की पूजा एक - सी, अलग - अलग है रीत। मस्िजद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत।। ग्वालियर में हमारा एक मकान था, उस मकान के दालान में दो रोशनदान थे। उसमें कबूतर के एक जोड़े ने घोंसला बना लिया था। एक बार बिल्ली ने उचककर दो में से एक अंडा तोड़ दिया। मेरी माँ ने देखा तो उसे दुख हुआ। उसने स्टूल पर चढ़कर दूसरे अंडे को बचाने की कोश्िाश की। लेकिन इस कोश्िाश में दूसरा अंडा उसी के हाथ से गिरकर टूट गया। कबूतर परेशानी में इधर - उधर पफड़पफड़ा रहे थे। उनकी आँखों में दुख देखकर मेरी माँ की आँखों में आँसू आ गए। इस गुनाह को खुदा से मुआपफ कराने के लिए उसने पूरे दिन रोशा रखा। दिन - भर वुफछ खाया - पिया नहीं। सिप़्ार्फ रोती़रही और बार - बार नमाज पढ़ - पढ़कर खुदा से इस गलती को मुआप़्ाफ करने की दुआ माँगती रही। ग्वालियर से बंबइर् की दूरी ने संसार को काप़्ाफी वुफछ बदल दिया है। वसोर्वा में जहाँ आज मेरा घर है, पहले यहाँ दूर तक जंगल था। पेड़ थे, परिंदे थे और दूसरे जानवर थे। अब यहाँ समंदर के किनारे लंबी - चैड़ी बस्ती बन गइर् है। इस बस्ती ने न जाने कितने परिंदों - चरिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से वुफछ शहर छोड़कर चले गए हैं। जो नहीं जा सके हैं उन्होंने यहाँ - वहाँ डेरा डाललिया है। इनमें से दो कबूतरों ने मेरे फ्रलैट के एक मचान में घोंसला बना लिया है। बच्चे अभी छोटे 114 ध् स्पशर् हैं। उनके ख्िालाने - पिलाने की िाम्मेदारी अभी बड़े कबूतरों की है। वे दिन में कइर् - कइर् बार आते - जाते हैं। और क्यों न आएँ - जाएँ आख्िार उनका भी घर है। लेकिन उनके आने - जाने से हमें परेशानी भी होती है। वे कभी किसी चीश को गिराकर तोड़ देते हैं। कभी मेरी लाइब्रेरी में घुसकर कबीर या मिशार् गालिब को सताने लगते हैं। इस रोश - रोश की परेशानी से तंग आकर मेरी पत्नी ने उस जगह जहाँ उनका आश्िायाना था, एक जाली लगा दी है, उनके बच्चों को दूसरी जगह कर दिया है। उनके आने की ख्िाड़की को भी बंद किया जाने लगा है। ख्िाड़की के बाहर अब दोनों कबूतर रात - भर खामोश और उदास बैठे रहते हैं। मगर अब न सोलोमेन है जो उनकी शुबान को समझकर उनका दुख बाँटे, न मेरी माँ है, जो इनके दुखों में सारी रात नमाशों में काटेμ नदिया सींचे खेत को, तोता वुफतरे आम। सूरज ठेकेदार - सा, सबको बाँटे काम।। प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों मंे दीजिएμ 1.बडे़ - बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे क्यों ध्केल रहे थे? 2.लेखक का घर किस शहर में था? 3.जीवन वैफसे घरों में सिमटने लगा है? 4.कबूतर परेशानी में इधर - उधर क्यों पफड़पफड़ा रहे थे? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मंेद्ध लिख्िाएμ 1.अरब में लशकर को नूह के नाम से क्यों याद करते हैं? 2.लेखक की माँ किस समय पेड़ों के पत्ते तोड़ने के लिए मना करती थीं और क्यों? 3.प्रवृफति में आए असंतुलन का क्या परिणाम हुआ? 4.लेखक की माँ ने पूरे दिन का रोशा क्यों रखा? 5.लेखक ने ग्वालियर से बंबइर् तक किन बदलावों को महसूस किया? पाठ के आधर पर स्पष्ट कीजिए। 6.‘डेरा डालने’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए। 7.शेख अयाश के पिता अपने बाजू पर काला च्योंटा रेंगता देख भोजन छोड़ कर क्यों उठ खड़े हुए? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.बढ़ती हुइर् आबादी का पयार्वरण पर क्या प्रभाव पड़ा? 2.लेखक की पत्नी को ख्िाड़की में जाली क्यों लगवानी पड़ी? 3.समुद्र के गुस्से की क्या वजह थी? उसने अपना गुस्सा वैफसे निकाला? 4.‘म‘ी से म‘ी मिले, खो के सभी निशान, किसमें कितना कौन है, वैफसे हो पहचान’ इन पंक्ितयों के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए। ;गद्ध निम्नलिख्िात के आशय स्पष्ट कीजिएμ 1.नेचर की सहनशक्ित की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना वुफछ साल पहले बंबइर् में देखने को मिला था। 2.जो जितना बड़ा होता है उसे उतना ही कम गुस्सा आता है। 3.इस बस्ती ने न जाने कितने परिंदों - चरिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से वुफछ शहर छोड़कर चले गए हैं। जो नहीं जा सके हैं उन्होंने यहाँ - वहाँ डेरा डाल लिया है। 4.शेख अयाश के पिता बोले, ‘नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घरवाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को वुफएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।’ इन पंक्ितयों में छिपी हुइर् उनकी भावना को स्पष्ट कीजिए। भाषा - अध्ययन 1.उदाहरण के अनुसार निम्नलिख्िात वाक्यों में कारक चिÉों को पहचानकर रेखांकित कीजिए और उनके नाम रिक्त स्थानों में लिख्िाएऋ जैसेμ ;कद्ध माँने भोजन परोसा। कतार् ;खद्ध मैं किसी के लिए मुसीबत नहीं हूँ। .............................. ;गद्ध मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया। .............................. ;घद्ध कबूतर परेशानी में इध्र - उध्र पफड़पफड़ा रहे थे। ............................. ;घद्ध दरिया पर जाओ तो उसे सलाम किया करो। ............................. 2 नीचे दिए गए शब्दों के बहुवचन रूप लिख्िाएμ चींटी, घोड़ा, आवाश, बिल, पफौज, रोटी, ¯बदु, दीवार, टुकड़ा।़3.ध्यान दीजिए नुक्ता लगाने से शब्द के अथर् में परिवतर्न हो जाता है। पाठ में ‘दपफा’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अथर् होता हैμबार ;गणना संबंध्ीद्ध, कानून संबंध्ी। यदि इस शब्द में नुक्ता लगा दिया जाए तो शब्द बनेगा ‘दपफा’ जिसका अथर् होता हैμदूर करना, हटाना। यहाँ नीचे वुफछ नुक्तायुक्त और नुक्तारहित शब्द़दिए जा रहे हंै उन्हें ध्यान से देख्िाए और अथर्गत अंतर को समझिए। 116 ध् स्पशर् सजा - सशा नाज - नाश जरा - शरा तेज - तश ेनिम्नलिख्िात वाक्यों में उचित शब्द भरकर वाक्य पूरे कीजिएμ ;कद्ध आजकल ..............................बहुत खराब है। ;जमाना/शमानाद्ध ;खद्ध पूरे कमरे को दो। ;सजा/सशाद्ध ;गद्ध चीनी तो देना। ;जरा/शराद्ध माँ दही ..............................;घद्ध भूल गइर्। ;जमाना/शमानाद्ध दोषी को ..............................;घद्ध दी गइर्। ;सजा/सशाद्ध महात्मा के चेहरे पर ..............................;चद्ध था। ;तेज/तेशद्ध योग्यता विस्तार 1.पशु - पक्षी एवं वन्य संरक्षण वेंफद्रों में जाकर पशु - पक्ष्िायों की सेवा - सुश्रूषा के संबंध् में जानकारी प्राप्त कीजिए। परियोजना कायर् 1.अपने आसपास प्रतिवषर् एक पौध लगाइए और उसकी समुचित देखभाल कर पयार्वरण में आए असंतुलन को रोकने में अपना योगदान दीजिए। 2.किसी ऐसी घटना का वणर्न कीजिए जब अपने मनोरंजन के लिए मानव द्वारा पशु - पक्ष्िायों का उपयोग किया गया हो। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ हाकिम - राजा / मालिक लश्कर ;लशकरद्ध - सेना / विशाल जनसमुदाय लकब - पद सूचक नाम प्रतीकात्मक - प्रतीकस्वरूप दालान - बरामदा सिमटना - सिवुफड़ना शलशले - भूवंफप सैलाब - बाढ़ सैलानी - ऐसे पयर्टक जो भ्रमण कर नए - नए स्थानों के विषय में जानना चाहते हंै अशीश - पि्रय / प्यारा मशार - दरगाह / कब्र गुंबद - मंदिर, मस्िजद और गुरुद्वारे आदि के उफपर बनी गोल छत जिसमें आवाश गूँजती है अशान - नमाज के समय की सूचना जो मस्िजद की छत या दूसरी उँफची जगह पर खड़े होकर दी जाती है डेरा - अस्थायी पड़ाव

>chapter-15>

SparshBhag2-015

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Xokfy;j ls cacbZ dh nwjh us lalkj dks dkI+kQh oqQN cny fn;k gSA olksZok esa tgk¡ vkt esjk ?kj gS] igys ;gk¡ nwj rd taxy FkkA isM+ Fks] ifjans Fks vkSj nwljs tkuoj FksA vc ;gk¡ leanj osQ fdukjs yach&pkSM+h cLrh cu xbZ gSA bl cLrh us u tkus fdrus ifjanksa&pfjanksa ls mudk ?kj Nhu fy;k gSA buesa ls oqQN 'kgj NksM+dj pys x, gSaA tks ugha tk losQ gSa mUgksaus ;gk¡&ogk¡ Msjk Mky fy;k gSA buesa ls nks dcwrjksa us esjs ÝySV osQ ,d epku esa ?kksalyk cuk fy;k gSA cPps vHkh NksVs gSaA muosQ f[kykus&fiykus dh f”kEesnkjh vHkh cM+s dcwrjksa dh gSA os fnu esa dbZ&dbZ ckj vkrs&tkrs gSaA vkSj D;ksa u vk,¡&tk,¡ vkf[kj mudk Hkh ?kj gSA ysfdu muosQ vkus&tkus ls gesa ijs'kkuh Hkh gksrh gSA os dHkh fdlh ph”k dks fxjkdj rksM+ nsrs gSaA dHkh esjh ykbczsjh esa ?kqldj dchj ;k fe”kkZ xkfyc dks lrkus yxrs gSaA bl jks”k&jks”k dh ijs'kkuh ls rax vkdj esjh iRuh us ml txg tgk¡ mudk vkf'k;kuk Fkk] ,d tkyh yxk nh gS] muosQ cPpksa dks nwljh txg dj fn;k gSA muosQ vkus dh f[kM+dh dks Hkh can fd;k tkus yxk gSA f[kM+dh osQ ckgj vc nksuksa dcwrj jkr&Hkj [kkeks'k vkSj mnkl cSBs jgrs gSaA exj vc u lksyksesu gS tks mudh ”kqcku dks le>dj mudk nq[k ck¡Vs] u esjh ek¡ gS] tks buosQ nq[kksa esa lkjh jkr uek”kksa esa dkVs

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fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj ,d&nks iafDr;ksa eas nhft,

1- cMs+&cM+s fcYMj leqnz dks ihNs D;ksa /osQy jgs Fks\

2- ys[kd dk ?kj fdl 'kgj esa Fkk\

3- thou oSQls ?kjksa esa fleVus yxk gS\

4- dcwrj ijs'kkuh esa bèkj&mèkj D;ksa iQM+iQM+k jgs Fks\

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(d) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (25&30 'kCnksa eas) fyf[k,

1- vjc esa y'kdj dks uwg osQ uke ls D;ksa ;kn djrs gSa\

2- ys[kd dh ek¡ fdl le; isM+ksa osQ iÙks rksM+us osQ fy, euk djrh Fkha vkSj D;ksa\

3- izo`Qfr esa vk, vlarqyu dk D;k ifj.kke gqvk\

4- ys[kd dh ek¡ us iwjs fnu dk jks”kk D;ksa j[kk\

5- ys[kd us Xokfy;j ls cacbZ rd fdu cnykoksa dks eglwl fd;k\ ikB osQ vk/kj ij Li"V dhft,A

6- ^Msjk Mkyus* ls vki D;k le>rs gSa\ Li"V dhft,A

7- 'ks[k v;k”k osQ firk vius cktw ij dkyk P;ksaVk jsaxrk ns[k Hkkstu NksM+ dj D;ksa mB [kM+s gq,\

([k) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (50&60 'kCnksa esa) fyf[k,

1- c<+rh gqbZ vkcknh dk i;kZoj.k ij D;k izHkko iM+k\

2- ys[kd dh iRuh dks f[kM+dh esa tkyh D;ksa yxokuh iM+h\

3- leqnz osQ xqLls dh D;k otg Fkh\ mlus viuk xqLlk oSQls fudkyk\

4- eêðh ls eêðh feys]

[kks osQ lHkh fu'kku]

fdlesa fdruk dkSu gS]

oSQls gks igpku*

bu iafDr;ksa osQ ekè;e ls ys[kd D;k dguk pkgrk gS\ Li"V dhft,A

(x) fuEufyf[kr osQ vk'k; Li"V dhft,

1- uspj dh lgu'kfDr dh ,d lhek gksrh gSA uspj osQ xqLls dk ,d uewuk oqQN lky igys cacbZ esa ns[kus dks feyk FkkA

2- tks ftruk cM+k gksrk gS mls mruk gh de xqLlk vkrk gSA

3- bl cLrh us u tkus fdrus ifjanksa&pfjanksa ls mudk ?kj Nhu fy;k gSA buesa ls oqQN 'kgj NksM+dj pys x, gSaA tks ugha tk losQ gSa mUgksaus ;gk¡&ogk¡ Msjk Mky fy;k gSA

4- 'ks[k v;k”k osQ firk cksys] ^ugha] ;g ckr ugha gSA eSaus ,d ?kjokys dks cs?kj dj fn;k gSA ml cs?kj dks oqQ,¡ ij mlosQ ?kj NksM+us tk jgk gw¡A* bu iafDr;ksa esa fNih gqbZ mudh Hkkouk dks Li"V dhft,A

Hkk"kk&vè;;u

1- mnkgj.k osQ vuqlkj fuEufyf[kr okD;ksa esa dkjd fpÉksa dks igpkudj js[kkafdr dhft, vkSj muosQ uke fjDr LFkkuksa esa fyf[k,_ tSls

(d) ek¡ us Hkkstu ijkslkA drkZ

([k) eSa fdlh osQ fy, eqlhcr ugha gw¡A -------------------------------

(x) eSaus ,d ?kj okys dks cs?kj dj fn;kA -------------------------------

(?k) dcwrj ijs'kkuh esa b/j&m/j iQM+iQM+k jgs FksA ------------------------------

(Ä) nfj;k ij tkvks rks mls lyke fd;k djksA ------------------------------

2- uhps fn, x, 'kCnksa osQ cgqopu :i fyf[k,

phaVh] ?kksM+k] vkok”k] fcy] I+kQkSt] jksVh] ¯cnq] nhokj] VqdM+kA

3- è;ku nhft, uqDrk yxkus ls 'kCn osQ vFkZ esa ifjorZu gks tkrk gSA ikB esa ^niQk* 'kCn dk iz;ksx gqvk gS ftldk vFkZ gksrk gSckj (x.kuk laca/h)] dkuwu laca/hA ;fn bl 'kCn esa uqDrk yxk fn;k tk, rks 'kCn cusxk ^nI+kQk* ftldk vFkZ gksrk gS nwj djuk] gVkukA ;gk¡ uhps oqQN uqDrk;qDr vkSj uqDrkjfgr 'kCn fn, tk jgs gaS mUgsa è;ku ls nsf[k, vkSj vFkZxr varj dks lef>,A

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tjk & ”kjk rst & rs”k

fuEufyf[kr okD;ksa esa mfpr 'kCn Hkjdj okD; iwjs dhft,

(d) vktdy ------------------------------- cgqr [kjkc gSA (tekuk@”kekuk)

([k) iwjs dejs dks ------------------------------- nksA (ltk@l”kk)

(x) ------------------------------- phuh rks nsukA (tjk@”kjk)

(?k) ek¡ ngh ------------------------------- Hkwy xbZA (tekuk@”kekuk)

(Ä) nks"kh dks ------------------------------- nh xbZA (ltk@l”kk)

(p) egkRek osQ psgjs ij ------------------------------- FkkA (rst@rs”k)

;ksX;rk foLrkj

1- i'kq&i{kh ,oa oU; laj{k.k osaQnzksa esa tkdj i'kq&if{k;ksa dh lsok&lqJw"kk osQ laca/ esa tkudkjh izkIr dhft,A

ifj;kstuk dk;Z

1- vius vklikl izfro"kZ ,d ikS/k yxkb, vkSj mldh leqfpr ns[kHkky dj i;kZoj.k esa vk, vlarqyu dks jksdus esa viuk ;ksxnku nhft,A

2- fdlh ,slh ?kVuk dk o.kZu dhft, tc vius euksjatu osQ fy, ekuo }kjk i'kq&if{k;ksa dk mi;ksx fd;k x;k gksA

'kCnkFkZ vkSj fVIif.k;k¡

gkfde & jktk @ ekfyd

y'dj (y'kdj) & lsuk @ fo'kky tuleqnk;

ydc & in lwpd uke

izrhdkRed & izrhdLo:i

nkyku & cjkenk

fleVuk & floqQM+uk

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lSykuh & ,sls i;ZVd tks Hkze.k dj u,&u, LFkkuksa osQ fo"k; esa tkuuk pkgrs gaS

v”kh”k & fiz; @ I;kjk

e”kkj & njxkg @ dcz

xqacn & eafnj] efLtn vkSj xq#}kjs vkfn osQ mQij cuh xksy Nr ftlesa vkok”k xw¡trh gS

v”kku & uekt osQ le; dh lwpuk tks efLtn dh Nr ;k nwljh m¡Qph txg ij [kM+s gksdj nh tkrh gS

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