अंतोन चेखव;1860.1904द्ध दक्ष्िाणी रूस के तगनोर नगर में 1860 में जन्मे अंतोन चेखव ने श्िाक्षा काल में ही कहानियाँ लिखना आरंभ कर दिया था। उन्नीसवीं सदी का नौवाँ दशक रूस के लिए एक कठिन समय था। यह वह समय था जब आशाद खयाल होने से ही लोग शासन के दमन का श्िाकार हो जाया करते थे। ऐसे समय में चेखव ने उन मौकापरस्त लोगों को बेनकाब करती कहानियाँ लिखीं जिनके लिए पैसा और पद ही सब वुफछ था। चेखव सारे संसार के चहेते लेखक माने जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इनकी नशर में सत्य ही सवोर्परि रहा। सत्य के प्रति आस्था और निष्ठा, यही चेखव की ध्रोहर है। चेखव की प्रमुख कहानियाँ हैंμगिरगिट, क्लवर्फ की मौत, वान्का, तितली, एक कलाकार की कहानी, घोंघा, इओनिज, रोमांस, दुलहन। प्रसि( नाटक हैंμवाल्या मामा, तीन बहनें, सीगल और चेरी का बगीचा। पाठ प्रवेश अच्छी शासन व्यवस्था वही होती है जो समता पर चलती है। सबको एक दृष्िट से देखती है। अन्यायी और उसके अन्याय को न्याय के तराशू पर ही तौलती है। ऐसी शासन व्यवस्था जन - जन में कानून के प्रति आदर और समपर्ण का भाव जगाती है। निभर्यता की भावना भी पैदा करती है। ऐसी शासन व्यवस्था कायम तभी हो सकती है जब शासन की बागडोर सँभालने वाले पक्षपात किए बिना, अपने अध्िकारों और कतर्व्यों का पालन करें। जब वे इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते तब देश में अराजकता का साम्राज्य स्थापित होते देर नहीं लगती। 1884 में लिखी गइर् प्रस्तुत कहानी में रूस के महान लेखक ने एक ऐसे अवसर का वणर्न किया है जब जारशाही शासन चापलूसों, भाइर् - भतीजावाद के पोषक अध्िकारियों के भरोसे चल रहा था। नतीजा यह था कि वे कानून के या आम आदमी के पक्ष में ऐसी प़़्ाफरियाद का भी न्यायोचित पैफसला नहीं कर पातेथे, जिसमें दोषी कोइर् मनुष्य नहीं बल्िक वहशी वुफत्ता ही क्यों न हो? संभवतः ऐसी शासन व्यवस्था के लिए ही संत कवि तुलसीदास ने कभी कहा होगा, ‘समरथ को न¯ह दोष गुसाइर्’। गिरगिट हाथ में बंडल थामे, पुलिस इंसपेक्टर ओचुमेलाॅव नया ओवरकोट पहने हुए, बाशार के चैराहे से गुशरा। उसके पीछे, अपने हाथों में, शब्त की गइर् झरबेरियों की टोकरी उठाए, लाल बालोंवाला एक सिपाही चला आ रहा था। चारों ओर खामोशी थी... चैराहे पर किसी आदमी का निशान तक नहीं था। दुकानों के खुले दरवाशे, भूखे जबड़ों की तरह, भगवान की इस सृष्िट को उदास निगाहों से ताक रहे थे। कोइर् भ्िाखारी तक उनके आस - पास नहीं दिख रहा था। सहसा ओचुमेलाॅव के कानों में एक आवाश गूँजीμफ्तो तू काटेगा? तू? शैतान कहीं का! ओछोकरो! इसे मत जाने दो। इन दिनों काट खाना मना है। पकड़ लो इस वुफत्ते को। आह...!य्तब किसी वुफत्ते के किकियाने की आवाश सुनाइर् दी। ओचुमेलाॅव ने उस आवाश की दिशा मेंघूमकर घूरा और पाया कि एक व्यापारी पिचूगिन के काठगोदाम में से एक वुफत्ता तीन टाँगोें के बल पर रेंगता चला आ रहा है। छींट की कलप़्ाफ लगी कमीश और बिना बटन की वास्केट पहने हुए,एक व्यक्ित वुफत्ते के पीछे दौड़ रहा था। गिरते - पड़ते उसने वुफत्ते को पिछली टाँग से पकड़ लिया।पिफर वुफत्ते का किकियाना और एक चीखμफ्मत जाने दोय्μदोबारा सुनाइर् दी। दुकानों में उँफघते हुए चेहरे बाहर झाँके और देखते ही देखते, जैसे शमीन पफाड़कर निकल आइर् एक भीड़, काठगोदाम को घेरकर खड़ी हो गइर्। फ्हुशूर! यह तो जनशांति भंग हो जाने जैसा वुफछ दीख रहा है,य् सिपाही ने कहा। ओचुमेलाॅव मुड़ा और भीड़ की तरप़्ाफ चल दिया। उसने काठगोदाम के पास बटन विहीन वास्केट धारण किए हुए उस आदमी को देखा, जो अपना दायाँ हाथ उठाए वहाँ मौजूद था तथा उपस्िथत लोगों को अपनी लहूलुहान उँगली दिखा रहा था। उसके नशीले - से हो आए चेहरे पर साप़्ाफ लिखा दिख रहा थाμफ्शैतान की औलाद! मैं तुझे छोड़ने वाला नहीं! और उसकी उँगली भी जीत के झंडे की तरह गड़ी दिखाइर् दे रही थी। ओचुमेलाॅव ने इस व्यक्ित को पहचान लिया। वह ख्यूिन नामक सुनार था और इस भीड़ के बीचोंबीच, अपनी अगली टाँगें पसारे, नुकीले मुँह और पीठ पर पैफले पीले दागवाला, अपराधी - सा नशर आता, सप़्ोफद बारशोइर् पिल्ला, उफपर से नीचे तक काँपता पसरा पड़ा था। उसकी आँसुओं से सनी आँखों में संकट और आतंक की गहरी छाप थी। फ्यह सब क्या हो रहा है?य् भीड़ को चीरते हुए ओचुमेलाॅव ने सवाल कियाμफ्तुम सब लोग इधर क्या कर रहे हो? तुमने अपनी यह उँगली उफपर क्यों उठा रखी है? चिल्ला कौन रहा था?य् फ्हुशूर! मैं तो चुपचाप चला जा रहा था,य् मुँह पर हाथ रखकर खाँसते हुए ख्यूिन ने कहाμफ्मुझे मित्राी मित्रिाच से लकड़ी लेकर वुफछ काम निपटाना था, तब अचानक इस कम्बख्त ने अकारण मेरी उँगली काट खाइर्। मापफ करें। आप तो जानते हैं मैं ठहरा एक कामकाजी आदमी... मेरा काम भी एकदम़पेचीदा किस्म का है। मुझे लग रहा है एक हफ्ऱते तक मेरी यह उँगली अब काम करने लायक नहीं गिरगिट ध् 103 हो पाएगी। तो हुशूर! मेरी गुशारिश है कि इसके मालिकों से मुझे हरशाना तो दिलवाया जाए। यह तो किसी कानून मंे नहीं लिखा है हुशूर कि आदमखोर जानवर हमें काट खाएँ और हम उन्हें बरदाश्त करते रहें। अगर हर कोइर् इसी तरह काट खाना शुरू कर दे तो यह ¯शदगी तो नवर्फ हो जाए...य् फ्हूँ... ठीक है, ठीक है,य् ओचुमेलाॅव ने अपना गला खँखारते और अपनी त्योरियाँ चढ़ाते हुएकहाμफ्ठीक है यह तो बताओ कि यह वुफत्ता किसका है। मैं इस मामले को छोड़ने वाला नहीं हूँ।वुफत्तों को इस तरह आवारा छोड़ देने का मशा मैं इनके मालिकों को चखाकर रहूँगा। जो कानून का पालन नहीं करते, अब उन लोगों से निबटने का वक्त आ गया है। उस बदमाश आदमी को मैं इतनाजुमार्ना ठोवूँफगा ताकि उसे इल्म हो जाए कि वुफत्तों और जानवरों को इस तरह आवारा छोड़ देने का क्या नतीजा होता है? मैं उसे ठीक करके रहूँगा,य् तब सिपाही की तरप़्ाफ मुड़कर उसने अपनी बात जारी रखीμफ्येल्दीरीन! पता लगाओ यह पिल्ला किसका है और इसकी पूरी रिपोटर् तैयार करो। इसवुफत्ते को बिना देरी किए खत्म कर दिया जाए। शायद यह पागल हो... मैं पूछ रहा हूँ आख्िार यहकिसका वुफत्ता है?य् फ्मेरे खयाल से यह जनरल झिगालाॅव का है,य् भीड़ से एक आवाश उभरकर आइर्।फ्जनरल झिगालाॅव! हूँ येल्दीरीन, मेरा कोट उतरवाने में मेरी मदद करो... ओफ्रपफ! आज कितनी ़गरमी है। लग रहा है बारिश होकर रहेगी,य् वह ख्यूिन की तरप़फ मुड़ाμफ्एक बात मेरी समझ में नहीं आतीμआख्िार इसने तुम्हें वैफसे काट खाया? यह तुम्हारी उँगली तक पहुँचा वैफसे? तू इतना लंबा - तगड़ाआदमी और यह रत्ती भर का जानवर! शरूर ही तेरी उँगली पर कोइर् कील वगैरह गड़ गइर् होगी औरतत्काल तूने सोचा होगा कि इसे वुफत्ते के मत्थे मढ़कर वुफछ हरशाना वगैरह ऐंठकर प़्ाफायदा उठा लिया जाए। मैं तेरे जैसे शैतान लोगों को अच्छी तरह समझता हूँ।य्फ्इसने अपनी जलती सिगरेट से इस वुफत्ते की नाक यूँ ही जला डाली होगी, हुशूर! वरना यहवुफत्ता बेववूफफ्ऱ फ है क्या जो इसे काट खाता!य् येल्दीरीन ने कहाμफ्हुशूर! मैं जानता हूँ यह ख्यूिन हमेशा कोइर् न कोइर् शरारत करता रहता है।य् फ्अबे! तूने मुझे ऐसा करते जब देखा ही नहीं तो झूठ - मूठ में सब क्यों बके जा रहा है? हुशूर तो खुद बुिमान आदमी हैं और बखूबी जानते हैं कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। यदि मैं झूठ बोलता पाया जाउँफ तो मुझ पर अदालत में मुकदमा ठोक दो। कानून सम्मत तो यही है...कि सब लोग अब बराबर हैं। मैं, यदि आप चाहें तो यह भी बता दूँ कि मेरा एक भाइर् भी पुलिस में है...य् फ्बकवास बंद करो!य्फ्नहीं! यह जनरल साहब का वुफत्ता नहीं है,य् सिपाही ने गंभीरतापूवर्क टिप्पणी कीμफ्जनरल साहबके पास ऐसा कोइर् वुफत्ता नहीं है। उनके तो सभी वुफत्ते पोंटर हैं।य् फ्तुम विश्वास से कह रहे हो?य् फ्एकदम हुशूर!य्फ्तुम सही कहते हो। जनरल साहब के सभी वुफत्ते मँहगे और अच्छी नस्ल के हैं, और यहμशराइस पर नशर तो दौड़ाओ। कितना भद्दा और मरियल - सा पिल्ला है। कोइर् सभ्य आदमी ऐसा वुफत्ताकाहे को पालेगा? तुम लोगों का दिमाग खराब तो नहीं हो गया है। यदि इस तरह का वुफत्ता माॅस्को या पीटसर्वगर् में दिख जाता, तो मालूम हो उसका क्या हश्र होता? तब कानून की परवाह किए बगैर इसकी छु‘ी कर दी जाती। तुझे इसने काट खाया है, तो प्यारे एक बात गाँठ बाँध ले, इसे ऐसे मत छोड़ देना। इसे हर हालत में मशा चखवाया जाना शरूरी है। ऐसे वक्त में...य्फ्शायद यह जनरल साहब का ही वुफत्ता है।य् गंभीरता से सोचते हुए सिपाही ने कहाμफ्इसे देख लेने भर से तो नहीं कहा जा सकता कि यह उनका नहीं है। कल ही मैंने बिलवुफल इसी की तरहका एक वुफत्ता उनके आँगन में देखा था।य् फ्हाँ! यह जनरल साहब का ही तो है,य् भीड़ में से एक आवाश उभर आइर्। फ्हूँ! येल्दीरीन, मेरा कोट पहन लेने में शरा मेरी मदद करो। मुझे इस हवा से ठंड लगने लगी है।इस वुफत्ते को जनरल साहब के पास ले जाओ और पता लगाओ कि क्या यह उन्हीं का तो नहीं है? उनसे कहना कि यह मुझे मिला और मैंने इसे वापस उनके पास भेजा है। और उनसे यह भी विनती करना कि वे इसे गली में चले आने से रोवेंफ। लगता है कि यह कापफी म़हगा प्राणी है, और यदि हाँ, हर गुंडा - बदमाश इसके नाक में जलती सिगरेट घुसेड़ने लगे, तो यह तबाह ही हो जाएगा। तुम्हें मालूमहै वुफत्ता कितना नाशुक प्राणी है। और तू अपना हाथ नीचे कर बे! गधा कहीं का। अपनी इस भद्दी उँगली को दिखाना बंद कर। यह सब तेरी अपनी गलती है...य् फ्उधर देखो, जनरल साहब का बावचीर् आ रहा है। शरा उससे पता लगाते हैं... ओ प्रोखोर! इधरआना भाइर्। इस वुफत्ते को तो पहचानो... क्या यह तुम्हारे यहाँ का है?य् फ्एक बार पिफर से तो कहो! इस तरह का पिल्ला तो हमने कइर् ¯शदगियों में नहीं देखा होगा।य्फ्अब अिाक जाँचने की शरूरत नहीं है,य् ओचुमेलाॅव ने कहाμफ्यह आवारा वुफत्ता है। इसके बारे में इधर खड़े होकर चचार् करने की शरूरत नहीं है। मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ कि यह आवारा है, तो है। इसे मार डालो और सारा किस्सा खत्म!य् फ्यह हमारा नहीं है,य् प्रोखोर ने आगे कहाμफ्यह तो जनरल साहब के भाइर् का है, जो थोड़ीदेर पहले इधर पधारे हैं। अपने जनरल साहब को ‘बारजोयस’ नस्ल के वुफत्तों में कोइर् दिलचस्पी नहीं है पर उनके भाइर् को यही नस्ल पसंद है।य्फ्क्या? क्या जनरल साहब के भाइर् साहब पधर चुके हैं? वाल्दीमीर इवानिच?य् आींाद से सन आए अपने चेहरे को समेटते हुए, ओचुमेलाॅव ने हैरानी के भाव प्रदशर्न के साथ कहाμफ्कितना अद्भुत संयोग रहा। और मुझे मालूम तक नहीं। अभी वुफछ दिन रुवेंफगे?य् ँगिरगिट ध् 105 फ्हाँ! यह सही है।य् फ्तनिक सोचो! वे अपने भाइर् साहब से मिलने पधारे हैं और मैं इतना भी नहीं जानता। तो यह उनकावुफत्ता है। बहुत खुशी हुइर्... इसे ले जाइए... यह तो एक अति सुंदर ‘डाॅगी’ है। यह इसकी उँगली पर झपट पड़ा था? हा - हा - हा! बस - बस! अब काँपना बंद कर भाइर्! गरर् - गरर्... नन्हा - सा शैतान गुस्से में है... बहुत खूबसूरत पिल्ला है।य्प्रोखोर वुफत्ते को सँभालकर काठगोदाम से बाहर चला गया। भीड़ ख्यूिन की हालत पर हँस दी। फ्मैं तुझे अभी ठीक करता हूँ!य् ओचुमेलाॅव ने उसे धमकाया और अपने लंबे चोगे को शरीर पर डालता हुआ, बाशार के उस चैराहे को काटकर अपने रास्ते पर चला गया। प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नांे के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिएμ 1.काठगोदाम के पास भीड़ क्यों इकऋी हो गइर् थी? 2.उँगली ठीक न होने की स्िथति में ख्यूवि्रफन का नुकसान क्यों होता? 3.वुफत्ता क्यों किकिया रहा था? 4.बाशार के चैराहे पर खामोशी क्यों थी? 5.जनरल साहब के बावचीर् ने वुफत्ते के बारे में क्या बताया? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.ख्यूवि्रफन ने मुआवशा पाने की क्या दलील दी? 2.ख्यूवि्रफन ने ओचुमेलाॅव को उँगली उफपर उठाने का क्या कारण बताया? 3.येल्दीरीन ने ख्यूवि्रफन को दोषी ठहराते हुए क्या कहा? 4.ओचुमेलाॅव ने जनरल साहब के पास यह संदेश क्यों भ्िाजवाया होगा कि ‘उनसे कहना कि यह मुझे मिला और मैंने इसे वापस उनके पास भेजा है’? 5.भीड़ ख्यूिन पर क्यों हँसने लगती है? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60द्ध शब्दों में लिख्िाएμ 1.किसी कील - वील से उँगली छील ली होगीμऐसा ओचुमेलाॅव ने क्यों कहा? 2.ओचुमेलाॅव के चरित्रा की विशेषताओं को अपने शब्दों में लिख्िाए। 3.यह जानने के बाद कि वुफत्ता जनरल साहब के भाइर् का हैμओचुमेलाॅव के विचारों में क्या परिवतर्न आया और क्यों? 4.ख्यूवि्रफन का यह कथन कि ‘मेरा एक भाइर् भी पुलिस में है....।’ समाज की किस वास्तविकता की ओर संकेत करता है? 5.इस कहानी का शीषर्क ‘गिरगिट’ क्यों रखा होगा? क्या आप इस कहानी के लिए कोइर् अन्य शीषर्क सुझा सकते हैं? अपने शीषर्क का आधर भी स्पष्ट कीजिए। 6.‘गिरगिट’ कहानी के माध्यम से समाज की किन विसंगतियों पर व्यंग्य किया गया है? क्या आप ऐसी विसंगतियाँ अपने समाज मंे भी देखते हैं? स्पष्ट कीजिए। ;गद्ध निम्नलिख्िात के आशय स्पष्ट कीजिएμ 1.उसकी आँसुओं से सनी आँखों में संकट और आतंक की गहरी छाप थी। 2.कानून सम्मत तो यही है...कि सब लोग अब बराबर हैं। 3.हुशूर! यह तो जनशांति भंग हो जाने जैसा वुफछ दीख रहा है। भाषा अध्ययन 1.नीचे दिए गए वाक्यों में उचित विराम - चिÉ लगाइएμ ;कद्ध माँ ने पूछा बच्चों कहाँ जा रहे हो ;खद्ध घर के बाहर सारा सामान बिखरा पड़ा था ;गद्ध हाय राम यह क्या हो गया ;घद्ध रीना सुहेल कविता और शेखर खेल रहे थे ;घद्ध सिपाही ने कहा ठहर तुझे अभी मजा चखाता हूँ 2.नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिएμ ऽ मेरा एक भाइर् भी पुलिस में है। ऽ यह तो अति सुंदर ‘डाॅगी’ है। ऽ कल ही मैंने बिलवुफल इसी की तरह का एक वुफत्ता उनके आँगन में देखा था। वाक्य के रेखांकित अंश ‘निपात’ कहलाते हैं जो वाक्य के मुख्य अथर् पर बल देते हैं। वाक्य में इनसे पता चलता है कि किस बात पर बल दिया जा रहा है और वाक्य क्या अथर् दे रहा है। वाक्य में जो अव्यय किसी शब्द या पद के बाद लगकर उसके अथर् में विशेष प्रकार का बल या भाव उत्पन्न करने में सहायता करते हैं उन्हंे निपात कहते हैंऋ जैसेμही, भी, तो, तक आदि। ही, भी, तो, तक आदि निपातों का प्रयोग करते हुए पाँच वाक्य बनाइए। 3.पाठ में आए मुहावरों मंे से पाँच मुहावरे छाँटकर उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए। गिरगिट ध् 107 4.नीचे दिए गए शब्दों में उचित उपसगर् लगाकर शब्द बनाइएμ ;कद्ध ....................त्र ........................................ ...................$ भाव ;घद्ध $लायक त्र ;खद्ध ....................त्र ...........................................................$पसदं;चद्ध $ विश्वास त्र ....................त्र ...........................................................;गद्ध $ धरण ;छद्ध $ परवाह त्र ....................त्र ...........................................................;घद्ध $ उपस्िथत ;जद्ध $ कारण त्र 5.नीचे दिए गए शब्दों मंे उचित प्रत्यय लगाकर शब्द बनाइएμ मदद $ त्र बुि $ त्र गंभीर $ त्र सभ्य $ त्र ठंड $ त्र प्रदशर्न $ त्र 6.नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित पदबंध् का प्रकार बताइएμ ;कद्ध दुकानों में उँफघते हुए चेहरे बाहर झाँके। ;खद्ध लाल बालोंवाला एक सिपाही चला आ रहा था। ;गद्ध यह ख्यूवि्रफन हमेशा कोइर् न कोइर् शरारत करता रहता है। ;घद्ध एक वुफत्ता तीन टाँगों के बल रेंगता चला आ रहा है। 7.आपके मोहल्ले में लावारिस / आवारा वुफत्तों की संख्या बहुत श्यादा हो गइर् है जिससे आने - जाने वाले लोगों को असुविध होती है। अतः लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नगर निगम अिाकारी को एक पत्रा लिख्िाए। योग्यता विस्तार 1.जिस प्रकार गिरगिट शत्राु से स्वयं को बचाने के लिए अपने आस - पास के परिवेश के अनुसार रंग बदल लेता है उसी प्रकार कइर् व्यक्ित अपने स्वाथर् के लिए परिस्िथतियों के अनुसार अपनी बात, व्यवहार, दृष्िटकोण, विचार को बदल लेते हैं। यही कारण है कि ऐसे व्यक्ितयों को ‘गिरगिट’ कहा जाता है। 2.अवसर के अनुसार व्यावहारिकता का सहारा लेना आप कहाँ तक उचित समझते हैं? इस विषय पर कक्षा में चचार् कीजिए। 3.यहाँ आपने रूसी लेखक चेखव की कहानी पढ़ी है। अवसर मिले तो लियो ताल्स्ताय की कहानियाँ भी पढि़ए। परियोजना कायर् 1.‘गिरगिट’ कहानी में आवारा पशुओं से जुड़े किस नियम की चचार् हुइर् है? क्या आप इस नियम को उचित मानते हैं? तवर्फ सहित उत्तर दीजिए। 2.गिरगिट कहानी का कक्षा में या विद्यालय में मंचन कीजिए। मंचन के लिए आपको किस प्रकार की तैयारी और सामग्री की शरूरत होगी उनकी एक सूची भी बनाइए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ जब्त - कब्जा करना / हथ्िाया लेना झरबेरियाँ किकियाना - - बेर की एक किस्मकष्ट में होने पर वुफत्ते द्वारा की जाने वाली आवाश काठगोदाम - लकड़ी का गोदाम कलप़्ाफ बारजोयस - - मांड लगाया गया कपड़ा वुफत्ते की एक प्रजाति अकारण - बिना किसी कारण के पेचीदा - जटिल / कठिन गुशारिश - प्राथर्ना हरशाना - क्षतिपूतिर् / नुकसान के बदले में दी जाने वाली रकम बरदाश्त - सहना खँखारते - खाँसते हुए त्योरियाँ - भौंहें चढ़ाना विवरण - ब्योरा देना भद्दा - अनाकषर्क / वुफरूप नस्लआींाद - - जाति / वंश खुशी / प्रसन्नता

>chapter-14>

SparshBhag2-014

2103

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(1860&1904)


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¶D;k\ D;k tujy lkgc osQ HkkbZ lkgc i/kj pqosQ gSa\ okYnhehj bokfup\¸ vkÈkn ls lu vk, vius psgjs dks lesVrs gq,] vkspqesykWo us gSjkuh osQ Hkko izn'kZu osQ lkFk dgk¶fdruk vn~Hkqr la;ksx jgkA vkSj eq>s ekywe rd ughaA vHkh oqQN fnu #osaQxs\¸

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izks[kksj oqQÙks dks l¡Hkkydj dkBxksnke ls ckgj pyk x;kA HkhM+ [;wfØu dh gkyr ij g¡l nhA

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iz'u&vH;kl

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2- m¡xyh Bhd u gksus dh fLFkfr esa [;wfozQu dk uqdlku D;ksa gksrk\

3- oqQÙkk D;ksa fdfd;k jgk Fkk\

4- ck”kkj osQ pkSjkgs ij [kkeks'kh D;ksa Fkh\

5- tujy lkgc osQ ckophZ us oqQÙks osQ ckjs esa D;k crk;k\

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(d) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (25&30 'kCnksa esa) fyf[k,

1- [;wfozQu us eqvko”kk ikus dh D;k nyhy nh\

2- [;wfozQu us vkspqesykWo dks m¡xyh mQij mBkus dk D;k dkj.k crk;k\

3- ;sYnhjhu us [;wfozQu dks nks"kh Bgjkrs gq, D;k dgk\

4- vkspqesykWo us tujy lkgc osQ ikl ;g lans'k D;ksa fHktok;k gksxk fd ^muls dguk fd ;g eq>s feyk vkSj eSaus bls okil muosQ ikl Hkstk gS*\

5- HkhM+ [;wfØu ij D;ksa g¡lus yxrh gS\

([k) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (50-60) 'kCnksa esa fyf[k,

1- fdlh dhy&ohy ls m¡xyh Nhy yh gksxh,slk vkspqesykWo us D;ksa dgk\

2- vkspqesykWo osQ pfj=k dh fo'ks"krkvksa dks vius 'kCnksa esa fyf[k,A

3- ;g tkuus osQ ckn fd oqQÙkk tujy lkgc osQ HkkbZ dk gSvkspqesykWo osQ fopkjksa esa D;k ifjorZu vk;k vkSj D;ksa\

4- [;wfozQu dk ;g dFku fd ^esjk ,d HkkbZ Hkh iqfyl esa gS----A* lekt dh fdl okLrfodrk dh vksj laosQr djrk gS\

5- bl dgkuh dk 'kh"kZd ^fxjfxV* D;ksa j[kk gksxk\ D;k vki bl dgkuh osQ fy, dksbZ vU; 'kh"kZd lq>k ldrs gSa\ vius 'kh"kZd dk vk/kj Hkh Li"V dhft,A

6- ^fxjfxV* dgkuh osQ ekè;e ls lekt dh fdu folaxfr;ksa ij O;aX; fd;k x;k gS\ D;k vki ,slh folaxfr;k¡ vius lekt eas Hkh ns[krs gSa\ Li"V dhft,A

(x) fuEufyf[kr osQ vk'k; Li"V dhft,

1- mldh vk¡lqvksa ls luh vk¡[kksa esa ladV vkSj vkrad dh xgjh Nki FkhA

2- dkuwu lEer rks ;gh gS--- fd lc yksx vc cjkcj gSaA

3- gq”kwj! ;g rks tu'kkafr Hkax gks tkus tSlk oqQN nh[k jgk gSA

Hkk"kk vè;;u

1- uhps fn, x, okD;ksa esa mfpr fojke&fpÉ yxkb,

(d) ek¡ us iwNk cPpksa dgk¡ tk jgs gks

([k) ?kj osQ ckgj lkjk lkeku fc[kjk iM+k Fkk

(x) gk; jke ;g D;k gks x;k

(?k) jhuk lqgsy dfork vkSj 'ks[kj [ksy jgs Fks

(Ä) flikgh us dgk Bgj rq>s vHkh etk p[kkrk gw¡

2- uhps fn, x, okD;ksa esa js[kkafdr va'k ij è;ku nhft,

esjk ,d HkkbZ Hkh iqfyl esa gSA

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dy gh eSaus fcyoqQy blh dh rjg dk ,d oqQÙkk muosQ vk¡xu esa ns[kk FkkA

okD; osQ js[kkafdr va'k ^fuikr* dgykrs gSa tks okD; osQ eq[; vFkZ ij cy nsrs gSaA okD; esa buls irk pyrk gS fd fdl ckr ij cy fn;k tk jgk gS vkSj okD; D;k vFkZ ns jgk gSA okD; esa tks vO;; fdlh 'kCn ;k in osQ ckn yxdj mlosQ vFkZ esa fo'ks"k izdkj dk cy ;k Hkko mRiUu djus esa lgk;rk djrs gSa mUgas fuikr dgrs gSa_ tSlsgh] Hkh] rks] rd vkfnA

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3- ikB esa vk, eqgkojksa eas ls ik¡p eqgkojs Nk¡Vdj mudk okD; esa iz;ksx dhft,A

4- uhps fn, x, 'kCnksa esa mfpr milxZ yxkdj 'kCn cukb,

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5- uhps fn, x, 'kCnksa eas mfpr izR;; yxkdj 'kCn cukb,

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6- uhps fn, x, okD;ksa osQ js[kkafdr inca/ dk izdkj crkb,

(d) nqdkuksa esa m¡Q?krs gq, psgjs ckgj >k¡osQA

([k) yky ckyksaokyk ,d flikgh pyk vk jgk FkkA

(x) ;g [;wfozQu ges'kk dksbZ u dksbZ 'kjkjr djrk jgrk gSA

(?k) ,d oqQÙkk rhu Vk¡xksa osQ cy jsaxrk pyk vk jgk gSA

7- vkiosQ eksgYys esa ykokfjl @ vkokjk oqQÙkksa dh la[;k cgqr ”;knk gks xbZ gS ftlls vkus&tkus okys yksxksa dks vlqfo/k gksrh gSA vr% yksxksa dh lqj{kk dks è;ku esa j[krs gq, uxj fuxe vfèkdkjh dks ,d i=k fyf[k,A

;ksX;rk foLrkj

1- ftl izdkj fxjfxV 'k=kq ls Lo;a dks cpkus osQ fy, vius vkl&ikl osQ ifjos'k osQ vuqlkj jax cny ysrk gS mlh izdkj dbZ O;fDr vius LokFkZ osQ fy, ifjfLFkfr;ksa osQ vuqlkj viuh ckr] O;ogkj] n`f"Vdks.k] fopkj dks cny ysrs gSaA ;gh dkj.k gS fd ,sls O;fDr;ksa dks ^fxjfxV* dgk tkrk gSA

2- volj osQ vuqlkj O;kogkfjdrk dk lgkjk ysuk vki dgk¡ rd mfpr le>rs gSa\ bl fo"k; ij d{kk esa ppkZ dhft,A

3- ;gk¡ vkius :lh ys[kd ps[ko dh dgkuh i<+h gSA volj feys rks fy;ks rkYLrk; dh dgkfu;k¡ Hkh if<+,A

ifj;kstuk dk;Z

1- ^fxjfxV* dgkuh esa vkokjk i'kqvksa ls tqM+s fdl fu;e dh ppkZ gqbZ gS\ D;k vki bl fu;e dks mfpr ekurs gSa\ roZQ lfgr mÙkj nhft,A

2- fxjfxV dgkuh dk d{kk esa ;k fo|ky; esa eapu dhft,A eapu osQ fy, vkidks fdl izdkj dh rS;kjh vkSj lkexzh dh ”k:jr gksxh mudh ,d lwph Hkh cukb,A

'kCnkFkZ vkSj fVIif.k;k¡

tCr & dCtk djuk @ gfFk;k ysuk

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dyI+kQ & ekaM yxk;k x;k diM+k

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[k¡[kkjrs & [kk¡lrs gq,

R;ksfj;k¡ & HkkSagsa p<+kuk

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Hkík & vukd"kZd @ oqQ:i

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