लीलाध्र मंडलोइर् ;1954द्ध 1954 की जन्माष्टमी के दिन ¯छदवाड़ा िाले के एक छोटे से गाँव गुढ़ी में जन्मे लीलाध्र मंडलोइर् की श्िाक्षा - दीक्षा भोपाल और रायपुर में हुइर्। प्रसारण की उच्च श्िाक्षा के लिए 1987 में काॅमनवेल्थ रिलेशंस ट्रस्ट, लंदन की ओर से आमंत्रिात किए गए। इन दिनों प्रसार भारती दूरदशर्न के महानिदेशक का कायर्भार सँभाल रहे हैं।लीलाध्र मंडलोइर् मूलतः कवि हैं। उनकी कविताओं में छत्तीसगढ़ अंचल की बोली की मिठास और वहाँ के जनजीवन का सजीव चित्राण है। अंदमान निकोबार द्वीपसमूह की जनजातियों पर लिखा इनका गद्य अपने आप में एक समाज शास्त्राीय अध्ययन भी है। उनका कवि मन ही वह स्रोत है जो उन्हें लोककथा, लोकगीत,यात्रा - वृत्तांत, डायरी, मीडिया, रिपोतार्श और आलोचना लेखन की ओर प्रवृत्त करता है। अपने रचनाकमर् के लिए कइर् पुरस्कारों से सम्मानित मंडलोइर् की प्रमुखकृतियाँ हैंμघर - घर घूमा, रात - बिरात, मगर एक आवाश, देखा - अनदेखा और काला पानी। पाठ प्रवेश जो सभ्यता जितनी पुरानी है, उसके बारे में उतने ही श्यादा किस्से - कहानियाँ भी सुनने को मिलती हैं। किस्से शरूरी नहीं कि सचमुच उस रूप में घटित हुए हों जिस रूप में हमें सुनने या पढ़ने को मिलते हैं। इतना शरूर है कि इन किस्सों में कोइर् न कोइर् संदेश या सीख निहित होती है। अंदमान निकोबार द्वीपसमूह में भी तमाम तरह के किस्से मशहूर हैं। इनमें से वुफछ को लीलाध्र मंडलोइर् ने पिफर से लिखा है। प्रस्तुत पाठ तताँरा - वामीरो कथा इसी द्वीपसमूह के एक छोटे से द्वीप पर वेंफदि्रत है। उक्त द्वीप में विद्वेष गहरी जड़ें जमा चुका था। उस विद्वेष को जड़ मूल से उखाड़ने के लिए एक युगल को आत्मबलिदान देना पड़ा था। उसी युगल के बलिदान की कथा यहाँ बयान की गइर् है। प्रेम सबको जोड़ता है और घृणा दूरी बढ़ाती है, इससे भला कौन इनकार कर सकता है। इसीलिए जो समाज के लिए अपने प्रेम का, अपने जीवन तक का बलिदान करता है, समाज उसे न केवल याद रखता है बल्िक उसके बलिदान को व्यथर् नहीं जाने देता। यही वजह है कि तत्कालीन समाज के सामने एक मिसाल कायम करने वाले इस युगल को आज भी उस द्वीप के निवासी गवर् और श्र(ा के साथ याद करते हैं। तताँरा - वामीरो कथा अंदमान द्वीपसमूह का अंतिम दक्ष्िाणी द्वीप है लिटिल अंदमान। यह पोटर् ब्लेयर से लगभग सौ किलोमीटर दूर स्िथत है। इसके बाद निकोबार द्वीपसमूह की शृंखला आरंभ होती है जो निकोबारी जनजाति कीआदिम संस्कृति के वेंफद्र हैं। निकोबार द्वीपसमूह का पहला प्रमुख द्वीप है कार - निकोबार जो लिटिल अंदमान से 96 कि.मी. दूर है। निकोबारियों का विश्वास है कि प्राचीन काल में ये दोनांे द्वीप एक ही थे। इनके विभक्त होने की एक लोककथा है जो आज भी दोहराइर् जाती है। सदियों पूवर्, जब लिटिल अंदमान और कार - निकोबार आपस में जुड़े हुए थे तब वहाँ एक सुंदर सा गाँव था। पास में एक सुंदर और शक्ितशाली युवक रहा करता था। उसका नाम था तताँरा। निकोबारी उसे बेहद प्रेम करते थे। तताँरा एक नेक और मददगार व्यक्ित था। सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता। अपने गाँववालों को ही नहीं, अपितु समूचे द्वीपवासियों की सेवा करना अपना परम कतर्व्य समझता था। उसके इस त्याग की वजह से वह चचिर्त था। सभी उसका आदर करते। वक्त मुसीबत में उसे स्मरण करते और वह भागा - भागा वहाँ पहुँच जाता। दूसरे गाँवों मंे भी पवर् - त्योहारों के समय उसे विशेष रूप से आमंत्रिात किया जाता। उसका व्यक्ितत्व तो आकषर्क था ही, साथ ही आत्मीय स्वभाव की वजह से लोग उसके करीब रहना चाहते। पारंपरिक पोशाक के साथ वह अपनी कमर में सदैव एक लकड़ी की तलवार बाँधे रहता। लोगों का मत था, बावजूद लकड़ी की होने पर, उस तलवार में अद्भुत दैवीय शक्ित थी। तताँरा अपनी तलवार को कभी अलग न होने देता। उसका दूसरों के सामने उपयोग भी न करता। ¯कतु उसके चचिर्त साहसिक कारनामों के कारण लोग - बाग तलवार में अद्भुत शक्ित का होना मानते थे। तताँरा की तलवार एक विलक्षण रहस्य थी। एक शाम तताँरा दिनभर के अथक परिश्रम के बाद समुद्र किनारे टहलने निकल पड़ा। सूरज समुद्र से लगे क्ष्िातिज तले डूबने को था। समुद्र से ठंडी बयारें आ रही थीं। पक्ष्िायों की सायंकालीन चहचहाहटें शनैः शनैः क्षीण होने को थीं। उसका मन शांत था। विचारमग्न तताँरा समुद्री बालू पर बैठकर सूरज की अंतिम रंग - बिरंगी किरणों को समुद्र पर निहारने लगा। तभी कहीं पास से उसे मधुर गीत गूँजता सुनाइर् दिया। गीत मानो बहता हुआ उसकी तरप़्ाफ आ रहा हो। बीच - बीच में लहरांे का संगीत सुनाइर् देता। गायन इतना प्रभावी था कि वह अपनी सुध - बुध खोने लगा। लहरों के एक प्रबल वेग ने उसकी तंद्रा भंग की। चैतन्य होते ही वह उधर बढ़ने को विवश हो उठा जिधर से अब भी 80 ध् स्पशर् गीत के स्वर बह रहे थे। वह विकल सा उस तरपफ बढ़ता गया। अंततः उसकी नशर एक युवती पऱपड़ी जो ढलती हुइर् शाम के सौंदयर् में बेसुध, एकटक समुद्र की देह पर डूबते आकषर्क रंगों को निहारते हुए गा रही थी। यह एक शृंगार गीत था। उसे ज्ञात ही न हो सका कि कोइर् अजनबी युवक उसे निःशब्द ताके जा रहा है। एकाएक एक उँफची लहर उठी और उसे भ्िागो गइर्। वह हड़बड़ाहट में गाना भूल गइर्। इसके पहले कि वह सामान्य हो पाती, उसने अपने कानों मंे गूँजती गंभीर आकषर्क आवाश सुनी। फ्तुमने एकाएक इतना मधुर गाना अधूरा क्यों छोड़ दिया?य् तताँरा ने विनम्रतापूवर्क कहा। अपने सामने एक सुंदर युवक को देखकर वह विस्िमत हुइर्। उसके भीतर किसी कोमल भावना का संचार हुआ। ¯कतु अपने को संयतकर उसने बेरुखी के साथ जवाब दिया। फ्पहले बताओ! तुम कौन हो, इस तरह मुझे घूरने और इस असंगत प्रश्न का कारण? अपने गाँव के अलावा किसी और गाँव के युवक के प्रश्नों का उत्तर देने को मैं बाध्य नहीं। यह तुम भी जानते हो।य् तताँरा मानो सुध - बुध खोए हुए था। जवाब देने के स्थान पर उसने पुनः अपना प्रश्न दोहराया। फ्तुमने गाना क्यों रोक दिया? गाओ, गीत पूरा करो। सचमुच तुमने बहुत सुरीला वंफठ पाया है।य् फ्यह तो मेरे प्रश्न का उत्तर न हुआ?य् युवती ने कहा। फ्सच बताओ तुम कौन हो? लपाती गाँव में तुम्हें कभी देखा नहीं।य् तताँरा मानो सम्मोहित था। उसके कानों में युवती की आवाश ठीक से पहुँच न सकी। उसने पुनः विनय की, फ्तुमने गाना क्यों रोक दिया? गाओ न?य् युवती झुँझला उठी। वह वुफछ और सोचने लगी। अंततः उसने निश्चयपूवर्क एक बार पुनः लगभग विरोध करते हुए कड़े स्वर में कहा। फ्ढीठता की हद है। मैं जब से परिचय पूछ रही हूँ और तुम बस एक ही राग अलाप रहे हो। गीत गाओ - गीत गाओ, आख्िार क्यों? क्या तुम्हें गाँव का नियम नहीं मालूम?य् इतना बोलकर वह जाने के लिए तेशी से मुड़ी। तताँरा को मानो वुफछ होश आया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह उसके सामने रास्ता रोककर, मानो गिड़गिड़ाने लगा। फ्मुझे माप़्ाफ कर दो। जीवन में पहली बार मैं इस तरह विचलित हुआ हूँ। तुम्हें देखकर मेरी चेतना लुप्त हो गइर् थी। मैं तुम्हारा रास्ता छोड़ दूँगा। बस अपना नाम बता दो।य् तताँरा ने विवशता में आग्रह किया। उसकी आँखें युवती के चेहरे पर वेंफदि्रत थीं। उसके चेहरे पर सच्ची विनय थी। फ्वा... मी... रो... य् एक रस घोलती आवाश उसके कानों में पहुँची। फ्वामीरो... वा... मी... रो... वाह कितना सुंदर नाम है। कल भी आओगी न यहाँ?य् तताँरा ने याचना भरे स्वर में कहा। फ्नहीं... शायद... कभी नहीं।य् वामीरो ने अन्यमनस्कतापूवर्क कहा और झटके से लपाती की तरपफ बेसुध सी दौड़ पड़ी। पीछे तताँरा के वाक्य गूँज रहे थे।़फ्वामीरो... मेरा नाम तताँरा है। कल मैं इसी च‘ान पर प्रतीक्षा करूँगा... तुम्हारी बाट जोहूँगा..शरूर आना...य् वामीरो रुकी नहीं, भागती ही गइर्। तताँरा उसे जाते हुए निहारता रहा। वामीरो घर पहुँचकर भीतर ही भीतर वुफछ बेचैनी महसूस करने लगी। उसके भीतर तताँरा से मुक्त होने की एक झूठी छटपटाहट थी। एक झल्लाहट में उसने दरवाशा बंद किया और मन को किसी और दिशा में ले जाने का प्रयास किया। बार - बार तताँरा का याचना भरा चेहरा उसकी आँखों में तैर जाता। उसने तताँरा के बारे में कइर् कहानियाँ सुन रखी थीं। उसकी कल्पना में वह एक अद्भुत साहसी युवक था। ¯कतु वही तताँरा उसके सम्मुख एक अलग रूप में आया। सुंदर, बलिष्ठ ¯कतु बेहद शांत, सभ्य और भोला। उसका व्यक्ितत्व कदाचित वैसा ही था जैसा वह अपने जीवन - साथी के बारे में सोचती रही थी। ¯कतु एक दूसरे गाँव के युवक के साथ यह संबंध परंपरा के विरु( था। अतएव उसने उसे भूल जाना ही श्रेयस्कर समझा। ¯कतु यह असंभव जान पड़ा। तताँरा बार - बार उसकी आँखों के सामने था। निनिर्मेष याचक की तरह प्रतीक्षा में डूबा हुआ। किसी तरह रात बीती। दोनों के हृदय व्यथ्िात थे। किसी तरह आँचरहित एक ठंडा और उफबाउफ दिन गुशरने लगा। शाम की प्रतीक्षा थी। तताँरा के लिए मानो पूरे जीवन की अकेली प्रतीक्षा थी। उसके गंभीर और शांत जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था। वह अचंभ्िात था, साथ ही रोमांचित भी। दिन ढलने के काप़्ाफी पहले वह लपाती की उस समुद्री च‘ान पर पहुँच गया। वामीरो की प्रतीक्षा में एक - एक पल पहाड़ की तरह भारी था। उसके भीतर एक आशंका भी दौड़ रही थी। अगर वामीरो न आइर् तो? वह वुफछ निणर्य नहीं कर पा रहा था। सिपर्फ प्रतीक्षारत था। बस आस की एक किरण़थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी। वह बार - बार लपाती़के रास्ते पर नशरें दौड़ाता। सहसा नारियल के झुरमुटों में उसे एक आकृति वुफछ सापफ हुइर्... वुफछ और... वुफछ और। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सचमुच वह वामीरो थी। लगा जैसे वह घबराहट में थी। वह अपने को छुपाते हुए बढ़ रही थी। बीच - बीच में इधर - उधर दृष्िट दौड़ाना न भूलती। पिफर तेश कदमों से चलती हुइर् तताँरा के सामने आकर ठिठक गइर्। दोनों शब्दहीन थे। वुफछ था जो दोनों के भीतर बह रहा था। एकटक निहारते हुए वे जाने कब तक खड़े रहे। सूरज समुद्र की लहरों में कहीं खो गया था। अँधेरा बढ़ रहा था। अचानक वामीरो वुफछ सचेत हुइर् और घर की तरपफ दौड़ पड़ी।़तताँरा अब भी वहीं खड़ा था... निश्चल... शब्दहीन...। दोनों रोश उसी जगह पहुँचते और मूतिर्वत एक - दूसरे को निनिर्मेष ताकते रहते। बस भीतर समपर्ण था जो अनवरत गहरा रहा था। लपाती के वुफछ युवकों ने इस मूक प्रेम को भाँप लिया और खबर हवा की तरह बह उठी। वामीरो लपाती ग्राम की थी और तताँरा पासा का। दोनों का संबंध संभव न 82 ध् स्पशर् था। रीति अनुसार दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था। वामीरो और तताँरा को समझाने - बुझाने के कइर् प्रयास हुए ¯कतु दोनों अडिग रहे। वे नियमतः लपाती के उसी समुद्री किनारे पर मिलते रहे। अपफवाहें पैफलती रहीं।़वुफछ समय बाद पासा गाँव में ‘पशु - पवर्’ का आयोजन हुआ। पशु - पवर् में हृष्ट - पुष्ट पशुओं के प्रदशर्न के अतिरिक्त पशुओं से युवकों की शक्ित परीक्षा प्रतियोगिता भी होती है। वषर् में एक बार सभी गाँव के लोग हिस्सा लेते हैं। बाद में नृत्य - संगीत और भोजन का भी आयोजन होता है। शाम से सभी लोग पासा में एकत्रिात होने लगे। धीरे - धीरे विभ्िान्न कायर्क्रम शुरू हुए। तताँरा का मन इन कायर्क्रमों में तनिक न था। उसकी व्यावुफल आँखें वामीरो को ढूँढ़ने मंे व्यस्त थीं। नारियल के झुंड के एक पेड़ के पीछे से उसे जैसे कोइर् झाँकता दिखा। उसने थोड़ा और करीब जाकर पहचानने की चेष्टा की। वह वामीरो थी जो भयवश सामने आने में झिझक रही थी। उसकी आँखें तरल थीं। होंठ काँप रहे थे। तताँरा को देखते ही वह पूफटकर रोने लगी। तताँरा विह्नल हुआ। उससे वुफछ बोलते ही नहीं बन रहा था। रोने की आवाश लगातार उँफची होती जा रही थी। तताँरा ¯ककतर्व्यविमूढ़ था। वामीरो के रुदन स्वरों को सुनकर उसकी माँ वहाँ पहुँची और दोनों को देखकर आग बबूला हो उठी। सारे गाँववालों की उपस्िथति में यह दृश्य उसे अपमानजनक लगा। इस बीच गाँव के वुफछ लोग भी वहाँ पहुँच गए। वामीरो की माँ क्रोध में उपफन उठी। उसने तताँरा को तरह - तरह से अपमानित किया। गाँव के लोग भी तताँरा के विरोध में आवाशें उठाने लगे। यह तताँरा के लिए असहनीय था। वामीरो अब भी रोए जा रही थी। तताँरा भी गुस्से से भर उठा। उसे जहाँ विवाह की निषेध परंपरा पर क्षोभ था वहीं अपनी असहायता पर खीझ। वामीरो का दुख उसे और गहरा कर रहा था। उसे मालूम न था कि क्या कदम उठाना चाहिए? अनायास उसका हाथ तलवार की मूठ पर जा टिका। क्रोध में उसने तलवार निकाली और वुफछ विचार करता रहा। क्रोध लगातार अग्िन की तरह बढ़ रहा था। लोग सहम उठे। एक सन्नाटा - सा ¯खच गया। जब कोइर् राह न सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसमें शक्ित भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा। वह पसीने से नहा उठा। सब घबराए हुए थे। वह तलवार को अपनी तरप़्ाफ खींचते - खींचते दूर तक पहुँच गया। वह हाँपफ रहा था। अचानक जहाँ तक लकीर ¯खच गइर् थी, वहाँ एक दरार होने लगी। मानो धरती दो टुकड़ों में बँटने लगी हो। एक गड़गड़ाहट - सी गूँजने लगी और लकीर की सीध में धरती पफटती ही जा रही थी। द्वीप के अंतिम सिरे तक तताँरा धरती को मानो क्रोध में काटता जा रहा था। सभी भयावुफल हो उठे। लोगों ने ऐसे दृश्य की कल्पना न की थी, वे सिहर उठे। उधर वामीरो पफटती हुइर् धरती के किनारे चीखती हुइर् दौड़ रही थीμतताँरा... तताँरा... तताँरा उसकी करुण चीख मानो गड़गड़ाहट में डूब गइर्। तताँरा दुभार्ग्यवश दूसरी तरप़्ाफ था। द्वीप के अंतिम सिरे तक धरती को चाकता वह जैसे ही अंतिम छोर पर पहुँचा, द्वीप दो टुकड़ों में विभक्त हो चुका था। एक तरप़़्ाफ तताँरा था दूसरी तरपफ वामीरो। तताँरा को जैसे ही होश आया, उसने देखा उसकी तरप़्ाफ का द्वीप समुद्र में धँसने लगा है। वह छटपटाने लगा उसने छलाँग लगाकर दूसरा सिरा थामना चाहा ¯कतु पकड़ ढीली पड़ गइर्। वह नीचे की तरपफ़पिफसलने लगा। वह लगातार समुद्र की सतह की तरपफ पिफसल रहा था। उसके मुँह से सिप़्ार्फ एक़ही चीख उभरकर डूब रही थी, फ्वामीरो... वामीरो... वामीरो... वामीरो...य् उधर वामीरो भी फ्तताँरा... तताँरा... ता... ताँ... राय् पुकार रही थी। तताँरा लहूलुहान हो चुका था... वह अचेत होने लगा और वुफछ देर बाद उसे कोइर् होश नहीं रहा। वह कटे हुए द्वीप के अंतिम भूखंड पर पड़ा हुआ था जो कि दूसरे हिस्से से संयोगवश जुड़ा था। बहता हुआ तताँरा कहाँ पहुँचा, बाद में उसका क्या हुआ कोइर् नहीं जानता। इधर वामीरो पागल हो उठी। वह हर समय तताँरा को खोजती हुइर् उसी जगह पहुँचती और घंटों बैठी रहती। उसने खाना - पीना छोड़ दिया। परिवार से वह एक तरह विलग हो गइर्। लोगों ने उसे ढूँढ़ने की बहुत कोश्िाश की ¯कतु कोइर् सुराग न मिल सका। आज न तताँरा है न वामीरो ¯कतु उनकी यह प्रेमकथा घर - घर में सुनाइर् जाती है। निकोबारियों का मत है कि तताँरा की तलवार से कार - निकोबार के जो टुकड़े हुए, उसमें दूसरा लिटिल अंदमान है जो कार - निकोबार से आज 96 कि.मी. दूर स्िथत है। निकोबारी इस घटना के बाद दूसरे गाँवों मंे भी आपसी वैवाहिक संबंध करने लगे। तताँरा - वामीरो की त्यागमयी मृत्यु शायद इसी सुखद परिवतर्न के लिए थी। प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिएμ 1.तताँरा - वामीरो कहाँ की कथा है? 2.वामीरो अपना गाना क्यों भूल गइर्? 3.तताँरा ने वामीरो से क्या याचना की? 4.तताँरा और वामीरो के गाँव की क्या रीति थी? 5.क्रोध में तताँरा ने क्या किया? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.तताँरा की तलवार के बारे में लोगों का क्या मत था? 2.वामीरो ने तताँरा को बेरुखी से क्या जवाब दिया। 84 ध् स्पशर् 3.तताँरा - वामीरो की त्यागमयी मृत्यु से निकोबार में क्या परिवतर्न आया? 4.निकोबार के लोग तताँरा को क्यों पसंद करते थे? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.निकोबार द्वीपसमूह के विभक्त होने के बारे में निकोबारियों का क्या विश्वास है? 2.तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद कहाँ गया? वहाँ के प्राकृतिक सौंदयर् का वणर्न अपने शब्दों मंे कीजिए। 3.वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में क्या परिवतर्न आया? 4.प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ित - प्रदशर्न के लिए किस प्रकार के आयोजन किए जाते थे? 5.रूढि़याँ जब बंध्न बन बोझ बनने लगें तब उनका टूट जाना ही अच्छा है। क्यों? स्पष्ट कीजिए। ;गद्ध निम्नलिख्िात के आशय स्पष्ट कीजिएμ 1.जब कोइर् राह न सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसमें शक्ित भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा। 2.बस आस की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी। भाषा अध्ययन 1.निम्नलिख्िात वाक्यों के सामने दिए कोष्ठक में ;9द्ध का चिÉ लगाकर बताएँ कि वह वाक्य किस प्रकार का हैμ ;कद्ध निकोबारी उसे बेहद प्रेम करते थे। ;प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधत्मक, विस्मयादिबोधकद्ध ;खद्ध तुमने एकाएक इतना मधुर गाना अधूरा क्यों छोड़ दिया? ;प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधत्मक, विस्मयादिबोधकद्ध ;गद्ध वामीरो की माँ क्रोध में उपफन उठी। ;प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधत्मक, विस्मयादिबोधकद्ध ;घद्ध क्या तुम्हें गाँव का नियम नहीं मालूम? ;प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधत्मक, विस्मयादिबोधकद्ध ;घद्ध वाह! कितना संुदर नाम है। ;प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधत्मक, विस्मयादिबोधकद्ध ;चद्ध मैं तुम्हारा रास्ता छोड़ दूँगा। ;प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधत्मक, विस्मयादिबोधकद्ध 2.निम्नलिख्िात मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिएμ ;कद्ध सुध - बुध खोना ;खद्ध बाट जोहना ;गद्ध खुशी का ठिकाना न रहना ;घद्ध आग बबूला होना ;घद्ध आवाश उठाना तताँरा - वामीरो कथा ध्85 3.नीचे दिए गए शब्दों में से मूल शब्द और प्रत्यय अलग करके लिख्िाएμ शब्द मूल शब्द प्रत्यय चचिर्त साहसिक छटपटाहट शब्दहीन 4.नीचे दिए गए शब्दों मंे उचित उपसगर् लगाकर शब्द बनाइएμ $ आकषर्क त्र $ज्ञात त्र $कोमल त्र $होश त्र $ घटना त्र 5.निम्नलिख्िात वाक्यों को निदेर्शानुसार परिवतिर्त कीजिएμ ;कद्ध जीवन में पहली बार मैं इस तरह विचलित हुआ हूँ। ;मिश्र वाक्यद्ध ;खद्ध पिफर तेश कदमों से चलती हुइर् तताँरा के सामने आकर ठिठक गइर्। ;संयुक्त वाक्यद्ध ;गद्ध वामीरो वुफछ सचेत हुइर् और घर की तरप़्ाफ दौड़ी। ;सरल वाक्यद्ध ;घद्ध तताँरा को देखकर वह पूफटकर रोने लगी। ;संयुक्त वाक्यद्ध ;घद्ध रीति के अनुसार दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था। ;मिश्र वाक्यद्ध 6.नीचे दिए गए वाक्य पढि़ए तथा ‘और’ शब्द के विभ्िान्न प्रयोगों पर ध्यान दीजिएμ ;कद्ध पास में सुंदर और शक्ितशाली युवक रहा करता था। ;दो पदों को जोड़नाद्ध ;खद्ध वह वुफछ और सोचने लगी। ;‘अन्य’ के अथर् मेंद्ध ़;गद्ध एक आकृति वुफछ सापफ हुइर्... वुफछ और... वुफछ और... ;क्रमशः धीरे - धीरे के अथर् मेंद्ध ;घद्ध अचानक वामीरो वुफछ सचेत हुइर् और घर की तरपफ दौड़ गइर्। ;दो उपवाक्यों को जोड़ने के अथर् मेंद्ध़;घद्ध वामीरो का दुख उसे और गहरा कर रहा था। ;‘अध्िकता’ के अथर् मेंद्ध ;चद्ध उसने थोड़ा और करीब जाकर पहचानने की चेष्टा की। ;‘निकटता’ के अथर् मेंद्ध 7.नीचे दिए गए शब्दों के विलोम शब्द लिख्िाएμ भय, मध्ुर, सभ्य, मूक, तरल, उपस्िथति, सुखद। 8.नीचे दिए गए शब्दों के दो - दो पयार्यवाची शब्द लिख्िाएμ समुद्र, आँख, दिन, अँध्ेरा, मुक्त। 86 ध् स्पशर् 9.नीचे दिए गए शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिएμ ¯ककतर्व्यविमूढ़, विह्नल, भयावुफल, याचक, आवंफठ। 10.‘किसी तरह आँचरहित एक ठंडा और उफबाउफ दिन गुशरने लगा’ वाक्य में दिन के लिए किन - किन विशेषणों का प्रयोग किया गया है? आप दिन के लिए कोइर् तीन विशेषण और सुझाइए। 11.इस पाठ में ‘देखना’ िया के कइर् रूप आए हैंμ‘देखना’ के इन विभ्िान्न शब्द - प्रयोगों में क्या अंतर है? वाक्य - प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए। आँखें वेंफदि्रत करना निनिर्मेष ताकना नशर पड़ना देखना निहारना ताकना घूरना इसी प्रकार ‘बोलना’ िया के विभ्िान्न शब्द - प्रयोग बताइए बोलना 12.नीचे दिए गए वाक्यों को पढि़एμ ;कद्ध श्याम का बड़ा भाइर् रमेश कल आया था। ;संज्ञा पदबंध्द्ध ;खद्ध सुनीता परिश्रमी और होश्िायार लड़की है। ;विशेषण पदबंध्द्ध ;गद्ध अरफण्िामा ध्ीरे - ध्ीरे चलते हुए वहाँ जा पहुँची। ;वि्रफया विशेषण पदबंधद्ध ;घद्ध आयुष सुरभ्िा का चुटवुफला सुनकर हँसता रहा। ;वि्रफया पदबंध्द्ध उफपर दिए गए वाक्य ;कद्ध में रेखांकित अंश में कइर् पद हैं जो एक पद संज्ञा का काम कर रहे हैं। वाक्य ;खद्ध में तीन पद मिलकर विशेषण पद का काम कर रहे हैं। वाक्य ;गद्ध और ;घद्ध में कइर् पद मिलकर व्रफमशः वि्रफया विशेषण और वि्रफया का काम कर रहे हैं। ध्वनियों के साथर्क समूह को शब्द कहते हैं और वाक्य में प्रयुक्त शब्द ‘पद’ कहलाता हैऋ जैसेμ ‘पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे थे।’ वाक्य में ‘पेड़ों’ शब्द पद है क्योंकि इसमें अनेक व्याकरण्िाक ¯बदु जुड़ जाते हैं। कइर् पदों के योग से बने वाक्यांश को जो एक ही पद का काम करता है, पदबंध् कहते हैं। पदबंध् वाक्य का एक अंश होता है। पदबंध् मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैंμ ऽ संज्ञा पदबंध् ऽ वि्रफया पदबंध् ऽ विशेषण पदबंध् ऽ वि्रफयाविशेषण पदबंध् वाक्यों के रेखांकित पदबंधें का प्रकार बताइएμ ;कद्ध उसकी कल्पना में वह एक अद्भुत साहसी युवक था। ;खद्ध तताँरा को मानो वुफछ होश आया। ;गद्ध वह भागा - भागा वहाँ पहुँच जाता। ;घद्ध तताँरा की तलवार एक विलक्षण रहस्य थी। ;घद्ध उसकी व्यावुफल आँखें वामीरो को ढूँढ़ने में व्यस्त थीं। योग्यता - विस्तार 1.पुस्तकालय में उपलब्ध विभ्िान्न प्रदेशों की लोककथाओं का अध्ययन कीजिए। 2.भारत के नक्शे में अंदमान निकोबार द्वीपसमूह की पहचान कीजिए और उसकी भौगोलिक स्िथति के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए। 3.अंदमान निकोबार द्वीपसमूह की प्रमुख जनजातियों की विशेषताओं का अध्ययन पुस्तकालय की सहायता से कीजिए। 4.दिसंबर 2004 में आए सुनामी का इस द्वीपसमूह पर क्या प्रभाव पड़ा? जानकारी एकत्रिात कीजिए। परियोजना कायर् 1.अपने घर - परिवार के बुशुगर् सदस्यों से वुफछ लोककथाओं को सुनिए। उन कथाओं को अपने शब्दों में कक्षा में सुनाइए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ शृंखला - क्रम / कडी़आदिम - प्रारंभ्िाक विभक्त - बँटा हुआ 88 ध् स्पशर् लोककथा आत्मीय साहसिक कारनामा विलक्षण बयार तंद्रा चैतन्य विकल संचार असंगत सम्मोहित झँुझलाना अन्यमनस्कता निनिर्मेष अचंभ्िात रोमांचित निश्चल अपफवाह़उपफनना निषेध परंपरा शमन घोंपना दरार - जन - समाज में प्रचलित कथा - अपना - साहसपूणर् कायर् - असाधारण - शीतल - मंद वायु - एकाग्रता - चेतना / सजग - बेचैन/व्यावुफल - उत्पन्न होना ;भावना काद्ध - अनुचित - मुग्ध - चिढ़ना - जिसका चित्त कहीं और हो - जिसमें पलक न झपकी जाए/बिना पलक झपकाए - चकित - पुलकित - स्िथर - उड़ती खबर - उबलना - वह परंपरा जिस पर रोक लगी हो - शांत करना - भोंकना - रेखा की तरह का लंबा छिद्र जो पफटने के कारण पड़ जाता है

>chapter-12>

SparshBhag2-012

2101

yhyk/j eaMyksbZ

(1954)


1954 dh tUek"Veh osQ fnu ¯NnokM+k f”kys osQ ,d NksVs ls xk¡o xq<+h esa tUes yhyk/j eaMyksbZ dh f'k{kk&nh{kk Hkksiky vkSj jk;iqj esa gqbZA izlkj.k dh mPp f'k{kk osQ fy, 1987 esa dkWeuosYFk fjys'kal VªLV] yanu dh vksj ls vkeaf=kr fd, x,A bu fnuksa izlkj Hkkjrh nwjn'kZu osQ egkfuns'kd dk dk;ZHkkj l¡Hkky jgs gSaA

yhyk/j eaMyksbZ ewyr% dfo gSaA mudh dforkvksa esa NÙkhlx<+ vapy dh cksyh dh feBkl vkSj ogk¡ osQ tuthou dk ltho fp=k.k gSA vaneku fudksckj }hilewg dh tutkfr;ksa ij fy[kk budk x| vius vki esa ,d lekt 'kkL=kh; vè;;u Hkh gSA mudk dfo eu gh og lzksr gS tks mUgsa yksddFkk] yksdxhr] ;k=kk&o`Ùkkar] Mk;jh] ehfM;k] fjiksrkZ”k vkSj vkykspuk ys[ku dh vksj izo`Ùk djrk gSA

vius jpukdeZ osQ fy, dbZ iqjLdkjksa ls lEekfur eaMyksbZ dh izeq[k Ñfr;k¡ gSa ?kj&?kj ?kwek] jkr&fcjkr] exj ,d vkok”k] ns[kk&vuns[kk vkSj dkyk ikuhA

ikB izos'k

tks lH;rk ftruh iqjkuh gS] mlosQ ckjs esa mrus gh ”;knk fdLls&dgkfu;k¡ Hkh lquus dks feyrh gSaA fdLls ”k:jh ugha fd lpeqp ml :i esa ?kfVr gq, gksa ftl :i esa gesa lquus ;k i<+us dks feyrs gSaA bruk ”k:j gS fd bu fdLlksa esa dksbZ u dksbZ lans'k ;k lh[k fufgr gksrh gSA vaneku fudksckj }hilewg esa Hkh reke rjg osQ fdLls e'kgwj gSaA buesa ls oqQN dks yhyk/j eaMyksbZ us fiQj ls fy[kk gSA

izLrqr ikB rrk¡jk&okehjks dFkk blh }hilewg osQ ,d NksVs ls }hi ij osaQfnzr gSA mDr }hi esa fo}s"k xgjh tM+sa tek pqdk FkkA ml fo}s"k dks tM+ ewy ls m[kkM+us osQ fy, ,d ;qxy dks vkRecfynku nsuk iM+k FkkA mlh ;qxy osQ cfynku dh dFkk ;gk¡ c;ku dh xbZ gSA

izse lcdks tksM+rk gS vkSj ?k`.kk nwjh c<+krh gS] blls Hkyk dkSu budkj dj ldrk gSA blhfy, tks lekt osQ fy, vius izse dk] vius thou rd dk cfynku djrk gS] lekt mls u osQoy ;kn j[krk gS cfYd mlosQ cfynku dks O;FkZ ugha tkus nsrkA ;gh otg gS fd rRdkyhu lekt osQ lkeus ,d felky dk;e djus okys bl ;qxy dks vkt Hkh ml }hi osQ fuoklh xoZ vkSj J¼k osQ lkFk ;kn djrs gSaA

rrk¡jk&okehjks dFkk

vaneku }hilewg dk vafre nf{k.kh }hi gS fyfVy vanekuA ;g iksVZ Cys;j ls yxHkx lkS fdyksehVj nwj fLFkr gSA blosQ ckn fudksckj }hilewg dh Ük`a[kyk vkjaHk gksrh gS tks fudksckjh tutkfr dh vkfne laLÑfr osQ osaQnz gSaA fudksckj }hilewg dk igyk izeq[k }hi gS dkj&fudksckj tks fyfVy vaneku ls 96 fd-eh- nwj gSA fudksckfj;ksa dk fo'okl gS fd izkphu dky esa ;s nksukas }hi ,d gh FksA buosQ foHkDr gksus dh ,d yksddFkk gS tks vkt Hkh nksgjkbZ tkrh gSA

lfn;ksa iwoZ] tc fyfVy vaneku vkSj dkj&fudksckj vkil esa tqM+s gq, Fks rc ogk¡ ,d lqanj lk xk¡o FkkA ikl esa ,d lqanj vkSj 'kfDr'kkyh ;qod jgk djrk FkkA mldk uke Fkk rrk¡jkA fudksckjh mls csgn izse djrs FksA rrk¡jk ,d usd vkSj ennxkj O;fDr FkkA lnSo nwljksa dh lgk;rk osQ fy, rRij jgrkA vius xk¡ookyksa dks gh ugha] vfirq lewps }hiokfl;ksa dh lsok djuk viuk ije drZO; le>rk FkkA mlosQ bl R;kx dh otg ls og pfpZr FkkA lHkh mldk vknj djrsA oDr eqlhcr esa mls Lej.k djrs vkSj og Hkkxk&Hkkxk ogk¡ igq¡p tkrkA nwljs xk¡oksa eas Hkh ioZ&R;ksgkjksa osQ le; mls fo'ks"k :i ls vkeaf=kr fd;k tkrkA mldk O;fDrRo rks vkd"kZd Fkk gh] lkFk gh vkReh; LoHkko dh otg ls yksx mlosQ djhc jguk pkgrsA ikjaifjd iks'kkd osQ lkFk og viuh dej esa lnSo ,d ydM+h dh ryokj ck¡èks jgrkA yksxksa dk er Fkk] ckotwn ydM+h dh gksus ij] ml ryokj esa vn~Hkqr nSoh; 'kfDr FkhA rrk¡jk viuh ryokj dks dHkh vyx u gksus nsrkA mldk nwljksa osQ lkeus mi;ksx Hkh u djrkA ¯drq mlosQ pfpZr lkgfld dkjukeksa osQ dkj.k yksx&ckx ryokj esa vn~Hkqr 'kfDr dk gksuk ekurs FksA rrk¡jk dh ryokj ,d foy{k.k jgL; FkhA

,d 'kke rrk¡jk fnuHkj osQ vFkd ifjJe osQ ckn leqnz fdukjs Vgyus fudy iM+kA lwjt leqnz ls yxs f{kfrt rys Mwcus dks FkkA leqnz ls BaMh c;kjsa vk jgh FkhaA if{k;ksa dh lk;adkyhu pgpgkgVsa 'kuS% 'kuS% {kh.k gksus dks FkhaA mldk eu 'kkar FkkA fopkjeXu rrk¡jk leqnzh ckyw ij cSBdj lwjt dh vafre jax&fcjaxh fdj.kksa dks leqnz ij fugkjus yxkA rHkh dgha ikl ls mls eèkqj xhr xw¡trk lqukbZ fn;kA xhr ekuks cgrk gqvk mldh rjI+kQ vk jgk gksA chp&chp esa ygjkas dk laxhr lqukbZ nsrkA xk;u bruk izHkkoh Fkk fd og viuh lqèk&cqèk [kksus yxkA ygjksa osQ ,d izcy osx us mldh ranzk Hkax dhA pSrU; gksrs gh og mèkj c<+us dks foo'k gks mBk ftèkj ls vc Hkh xhr osQ Loj cg jgs FksA og fody lk ml rjI+kQ c<+rk x;kA varr% mldh u”kj ,d ;qorh ij iM+h tks <yrh gqbZ 'kke osQ lkSan;Z esa cslqèk] ,dVd leqnz dh nsg ij Mwcrs vkd"kZd jaxksa dks fugkjrs gq, xk jgh FkhA ;g ,d Ük`axkj xhr FkkA

mls Kkr gh u gks ldk fd dksbZ vtuch ;qod mls fu%'kCn rkosQ tk jgk gSA ,dk,d ,d m¡Qph ygj mBh vkSj mls fHkxks xbZA og gM+cM+kgV esa xkuk Hkwy xbZA blosQ igys fd og lkekU; gks ikrh] mlus vius dkuksa eas xw¡trh xaHkhj vkd"kZd vkok”k lquhA

¶rqeus ,dk,d bruk eèkqj xkuk vèkwjk D;ksa NksM+ fn;k\¸ rrk¡jk us fouezrkiwoZd dgkA

vius lkeus ,d lqanj ;qod dks ns[kdj og fofLer gqbZA mlosQ Hkhrj fdlh dksey Hkkouk dk lapkj gqvkA ¯drq vius dks la;rdj mlus cs#[kh osQ lkFk tokc fn;kA

¶igys crkvks! rqe dkSu gks] bl rjg eq>s ?kwjus vkSj bl vlaxr iz'u dk dkj.k\ vius xk¡o osQ vykok fdlh vkSj xk¡o osQ ;qod osQ iz'uksa dk mÙkj nsus dks eSa ckè; ughaA ;g rqe Hkh tkurs gksA¸

rrk¡jk ekuks lqèk&cqèk [kks, gq, FkkA tokc nsus osQ LFkku ij mlus iqu% viuk iz'u nksgjk;kA ¶rqeus xkuk D;ksa jksd fn;k\ xkvks] xhr iwjk djksA lpeqp rqeus cgqr lqjhyk oaQB ik;k gSA¸

¶;g rks esjs iz'u dk mÙkj u gqvk\¸ ;qorh us dgkA

¶lp crkvks rqe dkSu gks\ yikrh xk¡o esa rqEgsa dHkh ns[kk ughaA¸

rrk¡jk ekuks lEeksfgr FkkA mlosQ dkuksa esa ;qorh dh vkok”k Bhd ls igq¡p u ldhA mlus iqu% fou; dh] ¶rqeus xkuk D;ksa jksd fn;k\ xkvks u\¸

;qorh >q¡>yk mBhA og oqQN vkSj lkspus yxhA varr% mlus fu'p;iwoZd ,d ckj iqu% yxHkx fojksèk djrs gq, dM+s Loj esa dgkA

¶<hBrk dh gn gSA eSa tc ls ifjp; iwN jgh gw¡ vkSj rqe cl ,d gh jkx vyki jgs gksA xhr xkvks&xhr xkvks] vkf[kj D;ksa\ D;k rqEgsa xk¡o dk fu;e ugha ekywe\¸ bruk cksydj og tkus osQ fy, rs”kh ls eqM+hA rrk¡jk dks ekuks oqQN gks'k vk;kA mls viuh xyrh dk vglkl gqvkA og mlosQ lkeus jkLrk jksddj] ekuks fxM+fxM+kus yxkA

¶eq>s ekI+kQ dj nksA thou esa igyh ckj eSa bl rjg fopfyr gqvk gw¡A rqEgsa ns[kdj esjh psruk yqIr gks xbZ FkhA eSa rqEgkjk jkLrk NksM+ nw¡xkA cl viuk uke crk nksA¸ rrk¡jk us foo'krk esa vkxzg fd;kA mldh vk¡[ksa ;qorh osQ psgjs ij osaQfnzr FkhaA mlosQ psgjs ij lPph fou; FkhA

¶ok--- eh--- jks--- ¸ ,d jl ?kksyrh vkok”k mlosQ dkuksa esa igq¡phA

¶okehjks--- ok--- eh--- jks--- okg fdruk lqanj uke gSA dy Hkh vkvksxh u ;gk¡\¸ rrk¡jk us ;kpuk Hkjs Loj esa dgkA

¶ugha--- 'kk;n--- dHkh ughaA¸ okehjks us vU;euLdrkiwoZd dgk vkSj >VosQ ls yikrh dh rjI+kQ cslqèk lh nkSM+ iM+hA ihNs rrk¡jk osQ okD; xw¡t jgs FksA

¶okehjks--- esjk uke rrk¡jk gSA dy eSa blh p^ku ij izrh{kk d:¡xk--- rqEgkjh ckV tksgw¡xk--- ”k:j vkuk---¸

okehjks #dh ugha] Hkkxrh gh xbZA rrk¡jk mls tkrs gq, fugizos'kkjrk jgkA

okehjks ?kj igq¡pdj Hkhrj gh Hkhrj oqQN cspSuh eglwl djus yxhA mlosQ Hkhrj rrk¡jk ls eqDr gksus dh ,d >wBh NViVkgV FkhA ,d >YykgV esa mlus njok”kk can fd;k vkSj eu dks fdlh vkSj fn'kk esa ys tkus dk iz;kl fd;kA ckj&ckj rrk¡jk dk ;kpuk Hkjk psgjk mldh vk¡[kksa esa rSj tkrkA mlus rrk¡jk osQ ckjs esa dbZ dgkfu;k¡ lqu j[kh FkhaA mldh dYiuk esa og ,d vn~Hkqr lkglh ;qod FkkA ¯drq ogh rrk¡jk mlosQ lEeq[k ,d vyx :i esa vk;kA lqanj] cfy"B ¯drq csgn 'kkar] lH; vkSj HkksykA mldk O;fDrRo dnkfpr oSlk gh Fkk tSlk og vius thou&lkFkh osQ ckjs esa lksprh jgh FkhA ¯drq ,d nwljs xk¡o osQ ;qod osQ lkFk ;g lacaèk ijaijk osQ fo#¼ FkkA vr,o mlus mls Hkwy tkuk gh Js;Ldj le>kA ¯drq ;g vlaHko tku iM+kA rrk¡jk ckj&ckj mldh vk¡[kksa osQ lkeus FkkA fufuZes"k ;kpd dh rjg izrh{kk esa Mwck gqvkA

fdlh rjg jkr chrhA nksuksa osQ ân; O;fFkr FksA fdlh rjg vk¡pjfgr ,d BaMk vkSj mQckmQ fnu xq”kjus yxkA 'kke dh izrh{kk FkhA rrk¡jk osQ fy, ekuks iwjs thou dh vosQyh izrh{kk FkhA mlosQ xaHkhj vkSj 'kkar thou esa ,slk igyh ckj gqvk FkkA og vpafHkr Fkk] lkFk gh jksekafpr HkhA fnu <yus osQ dkI+kQh igys og yikrh dh ml leqnzh p^ku ij igq¡p x;kA okehjks dh izrh{kk esa ,d&,d iy igkM+ dh rjg Hkkjh FkkA mlosQ Hkhrj ,d vk'kadk Hkh nkSM+ jgh FkhA vxj okehjks u vkbZ rks\ og oqQN fu.kZ; ugha dj ik jgk FkkA flI+kZQ izrh{kkjr FkkA cl vkl dh ,d fdj.k Fkh tks leqnz dh nsg ij Mwcrh fdj.kksa dh rjg dHkh Hkh Mwc ldrh FkhA og ckj&ckj yikrh osQ jkLrs ij u”kjsa nkSM+krkA lglk ukfj;y osQ >qjeqVksa esa mls ,d vkÑfr oqQN lkI+kQ gqbZ--- oqQN vkSj--- oqQN vkSjA mldh [kq'kh dk fBdkuk u jgkA lpeqp og okehjks FkhA yxk tSls og ?kcjkgV esa FkhA og vius dks Nqikrs gq, c<+ jgh FkhA chp&chp esa bèkj&mèkj n`f"V nkSM+kuk u HkwyrhA fiQj rs”k dneksa ls pyrh gqbZ rrk¡jk osQ lkeus vkdj fBBd xbZA nksuksa 'kCnghu FksA oqQN Fkk tks nksuksa osQ Hkhrj cg jgk FkkA ,dVd fugkjrs gq, os tkus dc rd [kM+s jgsA lwjt leqnz dh ygjksa esa dgha [kks x;k FkkA v¡èksjk c<+ jgk FkkA vpkud okehjks oqQN lpsr gqbZ vkSj ?kj dh rjI+kQ nkSM+ iM+hA rrk¡jk vc Hkh ogha [kM+k Fkk--- fu'py--- 'kCnghu---A

nksuksa jks”k mlh txg igq¡prs vkSj ewfrZor ,d&nwljs dks fufuZes"k rkdrs jgrsA cl Hkhrj leiZ.k Fkk tks vuojr xgjk jgk FkkA yikrh osQ oqQN ;qodksa us bl ewd izse dks Hkk¡i fy;k vkSj [kcj gok dh rjg cg mBhA okehjks yikrh xzke dh Fkh vkSj rrk¡jk iklk dkA nksuksa dk lacaèk laHko u FkkA jhfr vuqlkj nksuksa dks ,d gh xk¡o dk gksuk vko';d FkkA okehjks vkSj rrk¡jk dks le>kus&cq>kus osQ dbZ iz;kl gq, ¯drq nksuksa vfMx jgsA os fu;er% yikrh osQ mlh leqnzh fdukjs ij feyrs jgsA vI+kQokgsa iSQyrh jghaA

oqQN le; ckn iklk xk¡o esa ^i'kq&ioZ* dk vk;kstu gqvkA i'kq&ioZ esa â"V&iq"V i'kqvksa osQ izn'kZu osQ vfrfjDr i'kqvksa ls ;qodksa dh 'kfDr ijh{kk izfr;ksfxrk Hkh gksrh gSA o"kZ esa ,d ckj lHkh xk¡o osQ yksx fgLlk ysrs gSaA ckn esa u`R;&laxhr vkSj Hkkstu dk Hkh vk;kstu gksrk gSA 'kke ls lHkh yksx iklk esa ,df=kr gksus yxsA èkhjs&èkhjs fofHkUu dk;ZØe 'kq: gq,A rrk¡jk dk eu bu dk;ZØeksa esa rfud u FkkA mldh O;koqQy vk¡[ksa okehjks dks <w¡<+us eas O;Lr FkhaA ukfj;y osQ >qaM osQ ,d isM+ osQ ihNs ls mls tSls dksbZ >k¡drk fn[kkA mlus FkksM+k vkSj djhc tkdj igpkuus dh ps"Vk dhA og okehjks Fkh tks Hk;o'k lkeus vkus esa f>>d jgh FkhA mldh vk¡[ksa rjy FkhaA gksaB dk¡i jgs FksA rrk¡jk dks ns[krs gh og iwQVdj jksus yxhA rrk¡jk foày gqvkA mlls oqQN cksyrs gh ugha cu jgk FkkA jksus dh vkok”k yxkrkj m¡Qph gksrh tk jgh FkhA rrk¡jk ¯ddrZO;foew<+ FkkA okehjks osQ #nu Lojksa dks lqudj mldh ek¡ ogk¡ igq¡ph vkSj nksuksa dks ns[kdj vkx ccwyk gks mBhA lkjs xk¡ookyksa dh mifLFkfr esa ;g n`'; mls viekutud yxkA bl chp xk¡o osQ oqQN yksx Hkh ogk¡ igq¡p x,A okehjks dh ek¡ Øksèk esa miQu mBhA mlus rrk¡jk dks rjg&rjg ls viekfur fd;kA xk¡o osQ yksx Hkh rrk¡jk osQ fojksèk esa vkok”ksa mBkus yxsA ;g rrk¡jk osQ fy, vlguh; FkkA okehjks vc Hkh jks, tk jgh FkhA rrk¡jk Hkh xqLls ls Hkj mBkA mls tgk¡ fookg dh fu"ksèk ijaijk ij {kksHk Fkk ogha viuh vlgk;rk ij [kh>A okehjks dk nq[k mls vkSj xgjk dj jgk FkkA mls ekywe u Fkk fd D;k dne mBkuk pkfg,\ vuk;kl mldk gkFk ryokj dh ewB ij tk fVdkA Øksèk esa mlus ryokj fudkyh vkSj oqQN fopkj djrk jgkA Øksèk yxkrkj vfXu dh rjg c<+ jgk FkkA yksx lge mBsA ,d lUukVk&lk ¯[kp x;kA tc dksbZ jkg u lw>h rks Øksèk dk 'keu djus osQ fy, mlesa 'kfDr Hkj mls èkjrh esa ?kksai fn;k vkSj rkdr ls mls [khapus yxkA og ilhus ls ugk mBkA lc ?kcjk, gq, FksA og ryokj dks viuh rjI+kQ [khaprs&[khaprs nwj rd igq¡p x;kA og gk¡iQ jgk FkkA vpkud tgk¡ rd ydhj ¯[kp xbZ Fkh] ogk¡ ,d njkj gksus yxhA ekuks èkjrh nks VqdM+ksa esa c¡Vus yxh gksA ,d xM+xM+kgV&lh xw¡tus yxh vkSj ydhj dh lhèk esa èkjrh iQVrh gh tk jgh FkhA }hi osQ vafre fljs rd rrk¡jk èkjrh dks ekuks Øksèk esa dkVrk tk jgk FkkA lHkh Hk;koqQy gks mBsA yksxksa us ,sls n`'; dh dYiuk u dh Fkh] os flgj mBsA mèkj okehjks iQVrh gqbZ èkjrh osQ fdukjs ph[krh gqbZ nkSM+ jgh Fkhrrk¡jk--- rrk¡jk--- rrk¡jk mldh d#.k ph[k ekuks xM+xM+kgV esa Mwc xbZA rrk¡jk nqHkkZX;o'k nwljh rjI+kQ FkkA }hi osQ vafre fljs rd èkjrh dks pkdrk og tSls gh vafre Nksj ij igq¡pk] }hi nks VqdM+ksa esa foHkDr gks pqdk FkkA ,d rjI+kQ rrk¡jk Fkk nwljh rjI+kQ okehjksA rrk¡jk dks tSls gh gks'k vk;k] mlus ns[kk mldh rjI+kQ dk }hi leqnz esa èk¡lus yxk gSA og NViVkus yxk mlus Nyk¡x yxkdj nwljk fljk Fkkeuk pkgk ¯drq idM+ <hyh iM+ xbZA og uhps dh rjI+kQ fiQlyus yxkA og yxkrkj leqnz dh lrg dh rjI+kQ fiQly jgk FkkA mlosQ eq¡g ls flI+kZQ ,d gh ph[k mHkjdj Mwc jgh Fkh] ¶okehjks--- okehjks--- okehjks--- okehjks---¸ mèkj okehjks Hkh
¶rrk¡jk--- rrk¡jk--- rk--- rk¡--- jk¸ iqdkj jgh FkhA

rrk¡jk ygwyqgku gks pqdk Fkk--- og vpsr gksus yxk vkSj oqQN nsj ckn mls dksbZ gks'k ugha jgkA og dVs gq, }hi osQ vafre Hkw[kaM ij iM+k gqvk Fkk tks fd nwljs fgLls ls la;ksxo'k tqM+k FkkA cgrk gqvk rrk¡jk dgk¡ igq¡pk] ckn esa mldk D;k gqvk dksbZ ugha tkurkA bèkj okehjks ikxy gks mBhA og gj le; rrk¡jk dks [kkstrh gqbZ mlh txg igq¡prh vkSj ?kaVksa cSBh jgrhA mlus [kkuk&ihuk NksM+ fn;kA ifjokj ls og ,d rjg foyx gks xbZA yksxksa us mls <w¡<+us dh cgqr dksf'k'k dh ¯drq dksbZ lqjkx u fey ldkA

vkt u rrk¡jk gS u okehjks ¯drq mudh ;g izsedFkk ?kj&?kj esa lqukbZ tkrh gSA fudksckfj;ksa dk er gS fd rrk¡jk dh ryokj ls dkj&fudksckj osQ tks VqdM+s gq,] mlesa nwljk fyfVy vaneku gS tks dkj&fudksckj ls vkt 96 fd-eh- nwj fLFkr gSA fudksckjh bl ?kVuk osQ ckn nwljs xk¡oksa eas Hkh vkilh oSokfgd lacaèk djus yxsA rrk¡jk&okehjks dh R;kxe;h e`R;q 'kk;n blh lq[kn ifjorZu osQ fy, FkhA

iz'u&vH;kl

ekSf[kd

fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj ,d&nks iafDr;ksa esa nhft,

1- rrk¡jk&okehjks dgk¡ dh dFkk gS\

2- okehjks viuk xkuk D;ksa Hkwy xbZ\

3- rrk¡jk us okehjks ls D;k ;kpuk dh\

4- rrk¡jk vkSj okehjks osQ xk¡o dh D;k jhfr Fkh\

5- Øksèk esa rrk¡jk us D;k fd;k\

fyf[kr

(d) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (25-30 'kCnksa esa) fyf[k,

1- rrk¡jk dh ryokj osQ ckjs esa yksxksa dk D;k er Fkk\

2- okehjks us rrk¡jk dks cs#[kh ls D;k tokc fn;kA

3- rrk¡jk&okehjks dh R;kxe;h e`R;q ls fudksckj esa D;k ifjorZu vk;k\

4- fudksckj osQ yksx rrk¡jk dks D;ksa ilan djrs Fks\

([k) fuEufyf[kr iz'uksa osQ mÙkj (50-60 'kCnksa esa) fyf[k,

1- fudksckj }hilewg osQ foHkDr gksus osQ ckjs esa fudksckfj;ksa dk D;k fo'okl gS\

2- rrk¡jk [kwc ifjJe djus osQ ckn dgk¡ x;k\ ogk¡ osQ izkÑfrd lkSan;Z dk o.kZu vius 'kCnksa eas dhft,A

3- okehjks ls feyus osQ ckn rrk¡jk osQ thou esa D;k ifjorZu vk;k\

4- izkphu dky esa euksjatu vkSj 'kfDr&izn'kZu osQ fy, fdl izdkj osQ vk;kstu fd, tkrs Fks\

5- :f<+;k¡ tc ca/u cu cks> cuus yxsa rc mudk VwV tkuk gh vPNk gSA D;ksa\ Li"V dhft,A

(x) fuEufyf[kr osQ vk'k; Li"V dhft,

1- tc dksbZ jkg u lw>h rks Øksèk dk 'keu djus osQ fy, mlesa 'kfDr Hkj mls èkjrh esa ?kksai fn;k vkSj rkdr ls mls [khapus yxkA

2- cl vkl dh ,d fdj.k Fkh tks leqnz dh nsg ij Mwcrh fdj.kksa dh rjg dHkh Hkh Mwc ldrh FkhA

Hkk"kk vè;;u

1- fuEufyf[kr okD;ksa osQ lkeus fn, dks"Bd esa () dk fpÉ yxkdj crk,¡ fd og okD; fdl izdkj dk gS

(d) fudksckjh mls csgn izse djrs FksA (iz'uokpd] foèkkuokpd] fu"ks/kRed] foLe;kfncksèkd)

([k) rqeus ,dk,d bruk eèkqj xkuk vèkwjk D;ksa NksM+ fn;k\ (iz'uokpd] foèkkuokpd] fu"ks/kRed] foLe;kfncksèkd)

(x) okehjks dh ek¡ Øksèk esa miQu mBhA (iz'uokpd] foèkkuokpd] fu"ks/kRed] foLe;kfncksèkd)

(?k) D;k rqEgsa xk¡o dk fu;e ugha ekywe\ (iz'uokpd] foèkkuokpd] fu"ks/kRed] foLe;kfncksèkd)

(Ä) okg! fdruk laqnj uke gSA (iz'uokpd] foèkkuokpd] fu"ks/kRed] foLe;kfncksèkd)

(p) eSa rqEgkjk jkLrk NksM+ nw¡xkA (iz'uokpd] foèkkuokpd] fu"ks/kRed] foLe;kfncksèkd)

2- fuEufyf[kr eqgkojksa dk vius okD;ksa esa iz;ksx dhft,

(d) lqèk&cqèk [kksuk

([k) ckV tksguk

(x) [kq'kh dk fBdkuk u jguk

(?k) vkx ccwyk gksuk

(Ä) vkok”k mBkuk

3- uhps fn, x, 'kCnksa esa ls ewy 'kCn vkSj izR;; vyx djosQ fyf[k,

'kCn ewy 'kCn izR;;

pfpZr ------------------ ------------------

lkgfld ------------------ ------------------

NViVkgV ------------------ ------------------

'kCnghu ------------------ ------------------

4- uhps fn, x, 'kCnksa eas mfpr milxZ yxkdj 'kCn cukb,

-------------------- $ vkd"kZd ¾ --------------------

-------------------- $ Kkr ¾ --------------------

-------------------- $ dksey ¾ --------------------

-------------------- $ gks'k ¾ --------------------

-------------------- $ ?kVuk ¾ --------------------

5- fuEufyf[kr okD;ksa dks funsZ'kkuqlkj ifjofrZr dhft,

(d) thou esa igyh ckj eSa bl rjg fopfyr gqvk gw¡A (feJ okD;)

([k) fiQj rs”k dneksa ls pyrh gqbZ rrk¡jk osQ lkeus vkdj fBBd xbZA (la;qDr okD;)

(x) okehjks oqQN lpsr gqbZ vkSj ?kj dh rjI+kQ nkSM+hA (ljy okD;)

(?k) rrk¡jk dks ns[kdj og iwQVdj jksus yxhA (la;qDr okD;)

(Ä) jhfr osQ vuqlkj nksuksa dks ,d gh xk¡o dk gksuk vko';d FkkA (feJ okD;)

6- uhps fn, x, okD; if<+, rFkk ^vkSj* 'kCn osQ fofHkUu iz;ksxksa ij è;ku nhft,

(d) ikl esa lqanj vkSj 'kfDr'kkyh ;qod jgk djrk FkkA (nks inksa dks tksM+uk)

([k) og oqQN vkSj lkspus yxhA (^vU;* osQ vFkZ esa)

(x) ,d vkÑfr oqQN lkI+kQ gqbZ--- oqQN vkSj--- oqQN vkSj--- (Øe'k% èkhjs&èkhjs osQ vFkZ esa)

(?k) vpkud okehjks oqQN lpsr gqbZ vkSj ?kj dh rjI+kQ nkSM+ xbZA (nks miokD;ksa dks tksM+us osQ vFkZ esa)

(Ä) okehjks dk nq[k mls vkSj xgjk dj jgk FkkA (^vf/drk* osQ vFkZ esa)

(p) mlus FkksM+k vkSj djhc tkdj igpkuus dh ps"Vk dhA (^fudVrk* osQ vFkZ esa)

7- uhps fn, x, 'kCnksa osQ foykse 'kCn fyf[k,

Hk;] e/qj] lH;] ewd] rjy] mifLFkfr] lq[knA

8- uhps fn, x, 'kCnksa osQ nks&nks i;kZ;okph 'kCn fyf[k,

leqnz] vk¡[k] fnu] v¡/sjk] eqDrA

9- uhps fn, x, 'kCnksa dk okD;ksa esa iz;ksx dhft,

¯ddrZO;foew<+] foày] Hk;koqQy] ;kpd] vkoaQBA

10- ^fdlh rjg vk¡pjfgr ,d BaMk vkSj mQckmQ fnu xq”kjus yxk* okD; esa fnu osQ fy, fdu&fdu fo'ks"k.kksa dk iz;ksx fd;k x;k gS\ vki fnu osQ fy, dksbZ rhu fo'ks"k.k vkSj lq>kb,A

11- bl ikB esa ^ns[kuk* fØ;k osQ dbZ :i vk, gSa^ns[kuk* osQ bu fofHkUu 'kCn&iz;ksxksa esa D;k varj gS\ okD;&iz;ksx }kjk Li"V dhft,A


chapter12.png

12- uhps fn, x, okD;ksa dks if<+,

(d) ';ke dk cM+k HkkbZ jes'k dy vk;k FkkA (laKk inca/)

([k) lquhrk ifjJeh vkSj gksf'k;kj yM+dh gSA (fo'ks"k.k inca/)

(x) vjQf.kek /hjs&/hjs pyrs gq, ogk¡ tk igq¡phA (fozQ;k fo'ks"k.k incaèk)

(?k) vk;q"k lqjfHk dk pqVoqQyk lqudj g¡lrk jgkA (fozQ;k inca/)

mQij fn, x, okD; (d) esa js[kkafdr va'k esa dbZ in gSa tks ,d in laKk dk dke dj jgs gSaA okD; ([k) esa rhu in feydj fo'ks"k.k in dk dke dj jgs gSaA okD; (x) vkSj (?k) esa dbZ in feydj ozQe'k% fozQ;k fo'ks"k.k vkSj fozQ;k dk dke dj jgs gSaA

èofu;ksa osQ lkFkZd lewg dks 'kCn dgrs gSa vkSj okD; esa iz;qDr 'kCn ^in* dgykrk gS_ tSls

^isM+ksa ij i{kh pgpgk jgs FksA* okD; esa ^isM+ksa* 'kCn in gS D;ksafd blesa vusd O;kdjf.kd ¯cnq tqM+ tkrs gSaA

dbZ inksa osQ ;ksx ls cus okD;ka'k dks tks ,d gh in dk dke djrk gS] inca/ dgrs gSaA inca/ okD; dk ,d va'k gksrk gSA

inca/ eq[; :i ls pkj izdkj osQ gksrs gSa

laKk inca/  fozQ;k inca/

 fo'ks"k.k inca/  fozQ;kfo'ks"k.k inca/

okD;ksa osQ js[kkafdr inca/ksa dk izdkj crkb,

(d) mldh dYiuk esa og ,d vn~Hkqr lkglh ;qod FkkA

([k) rrk¡jk dks ekuks oqQN gks'k vk;kA

(x) og Hkkxk&Hkkxk ogk¡ igq¡p tkrkA

(?k) rrk¡jk dh ryokj ,d foy{k.k jgL; FkhA

(Ä) mldh O;koqQy vk¡[ksa okehjks dks <w¡<+us esa O;Lr FkhaA

;ksX;rk&foLrkj

1- iqLrdky; esa miyCèk fofHkUu izns'kksa dh yksddFkkvksa dk vè;;u dhft,A

2- Hkkjr osQ uD'ks esa vaneku fudksckj }hilewg dh igpku dhft, vkSj mldh HkkSxksfyd fLFkfr osQ fo"k; esa tkudkjh izkIr dhft,A

3- vaneku fudksckj }hilewg dh izeq[k tutkfr;ksa dh fo'ks"krkvksa dk vè;;u iqLrdky; dh lgk;rk ls dhft,A

4- fnlacj 2004 esa vk, lqukeh dk bl }hilewg ij D;k izHkko iM+k\ tkudkjh ,df=kr dhft,A

ifj;kstuk dk;Z

1- vius ?kj&ifjokj osQ cq”kqxZ lnL;ksa ls oqQN yksddFkkvksa dks lqfu,A mu dFkkvksa dks vius 'kCnksa esa d{kk esa lqukb,A

'kCnkFkZ vkSj fVIif.k;k¡

Ük`a[kyk & Øe @ dM+h

vkfne & izkjafHkd

foHkDr & c¡Vk gqvk

yksddFkk & tu&lekt esa izpfyr dFkk

vkReh; & viuk

lkgfld dkjukek & lkgliw.kZ dk;Z

foy{k.k & vlkèkkj.k

c;kj & 'khry&ean ok;q

raæk & ,dkxzrk

pSrU; & psruk @ ltx

fody & cspSu @ O;koqQy

lapkj & mRiUu gksuk (Hkkouk dk)

vlaxr & vuqfpr

lEeksfgr & eqXèk

>¡q>ykuk & fp<+uk

vU;euLdrk & ftldk fpÙk dgha vkSj gks

fufuZes"k & ftlesa iyd u >idh tk, @ fcuk iyd >idk,

vpafHkr & pfdr

jksekafpr & iqyfdr

fu'py & fLFkj

vI+kQokg & mM+rh [kcj

miQuuk & mcyuk

fu"ksèk ijaijk & og ijaijk ftl ij jksd yxh gks

'keu & 'kkar djuk

?kksaiuk & Hkksaduk

njkj & js[kk dh rjg dk yack fNnz tks iQVus osQ dkj.k iM+ tkrk gS

Capture23

RELOAD if chapter isn't visible.