मैथ्िालीशरण गुप्त;1886.1964द्ध 1886 में झाँसी के करीब चिरगाँव मंे जन्मे मैथ्िालीशरण गुप्त अपने जीवनकाल में ही राष्ट्रकवि के रूप मंे विख्यात हुए। इनकी श्िाक्षा - दीक्षा घर पर ही हुइर्।संस्कृत, बांग्ला, मराठी और अंग्रेशी पर इनका समान अिाकार था। गुप्त जी रामभक्त कवि हैं। राम का कीतिर्गान इनकी चिरसंचित अभ्िालाषा रही। इन्होंने भारतीय जीवन को समग्रता में समझने और प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया। गुप्त जी की कविता की भाषा विशु( खड़ी बोली है। भाषा पर संस्कृत का प्रभाव है। काव्य की कथावस्तु भारतीय इतिहास के ऐसे अंशों से ली गइर् है जो भारत के अतीत का स्वणर् चित्रा पाठक के सामने उपस्िथत करते हैं।गुप्त जी की प्रमुख कृतियाँ हैंμसाकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध। गुप्त जी के पिता सेठ रामचरण दास भी कवि थे और इनके छोटे भाइर् सियारामशरण गुप्त भी प्रसि( कवि हुए। पाठ प्रवेश प्रकृति के अन्य प्राण्िायों की तुलना में मनुष्य में चेतना - शक्ित की प्रबलता होती ही है। वह अपने ही नहीं औरों के हिताहित का भी खयाल रखने में, औरों के लिए भी वुफछ कर सकने में समथर् होता है। पशु चरागाह में जाते हैं, अपने - अपने हिस्से का चर आते हैं, पर मनुष्य ऐसा नहीं करता। वह जो कमाता है, जो भी वुफछ उत्पादित करता है, वह औरों के लिए भी करता है, औरों के सहयोग से करता है। प्रस्तुत पाठ का कवि अपनों के लिए जीने - मरने वालों को मनुष्य तो मानता है लेकिन यह मानने को तैयार नहीं है कि ऐसे मनुष्यों में मनुष्यता के पूरे - पूरे लक्षण भी हैं। वह तो उन मनुष्यों को ही महान मानेगा जिनमें अपने और अपनों के हित ¯चतन से कहीं पहले और सवोर्परि दूसरों का हित ¯चतन हो। उसमें वे गुण हों जिनके कारण कोइर् मनुष्य इस मृत्युलोक से गमन कर जाने के बावजूद युगों तक औरों की यादों में भी बना रह पाता है। उसकी मृत्यु भी सुमृत्यु हो जाती है। आख्िार क्या हैं वे गुण? मनुष्यता विचार लो कि मत्यर् हो न मृत्यु से डरो कभी, मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी। हुइर् न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए, मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।वही पशु - प्रवृिा है कि आप आप ही चरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती, उसी उदार से धरा कृताथर् भाव मानती। उसी उदार की सदा सजीव कीतिर् वूफजतीऋ तथा उसी उदार को समस्त सृष्िट पूजती। अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। क्षुधातर् रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी, तथा दधीचि ने दिया पराथर् अस्िथजाल भी। उशीनर क्ष्िातीश ने स्वमांस दान भी किया, सहषर् वीर कणर् ने शरीर - चमर् भी दिया। अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे? वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यहीऋवशीकृता सदैव है बनी हुइर् स्वयं मही। विरफ(वाद बु( का दया - प्रवाह में बहा, विनीत लोकवगर् क्या न सामने झुका रहा? अहा! वही उदार है परोपकार जो करे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,सनाथ जान आपको करो न गवर् चित्त में। अनाथ कौन है यहाँ? त्रिालोकनाथ साथ हैं, दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं। अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े, समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े - बड़े। परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी, अभी अमत्यर् - अंक में अपंक हो चढ़ो सभी। रहो न यांे कि एक से न काम और का सरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। ‘मनुष्य मात्रा बंधु है’ यही बड़ा विवेक है, पुराणपुरफष स्वयंभू पिता प्रसि( एक है। पफलानुसार कमर् के अवश्य बाह्य भेद हैं, परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं। अनथर् है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। चलो अभीष्ट मागर् में सहषर् खेलते हुए,विपिा, विघ्न जो पडे़ें उन्हें ढकेलते हुए। घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भ्िान्नता कभी, अतवर्फ एक पंथ के सतवर्फ पंथ हांे सभी। तभी समथर् भाव है कि तारता हुआ तरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।। 22 ध् स्पशर् प्रश्न - अभ्यास ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नांे के उत्तर दीजिएμ 1.कवि ने वैफसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है? 2.उदार व्यक्ित की पहचान वैफसे हो सकती है? 3.कवि ने दधीचि, कणर् आदि महान व्यक्ितयों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है? 4.कवि ने किन पंक्ितयों में यह व्यक्त किया है कि हमंे गवर् - रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए? 5.‘मनुष्य मात्रा बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए। 6.कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है? 7.व्यक्ित को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिख्िाए। 8.‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है? ;खद्ध निम्नलिख्िात का भाव स्पष्ट कीजिएμ 1.सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यहीऋ वशीकृता सदैव है बनी हुइर् स्वयं मही। विरफ(वाद बु( का दया - प्रवाह में बहा, विनीत लोकवगर् क्या न सामने झुका रहा? 2.रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में, सनाथ जान आपको करो न गवर् चित्त में। अनाथ कौन है यहाँ? त्रिालोकनाथ साथ हैं, दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं। 3.चलो अभीष्ट मागर् में सहषर् खेलते हुए, विपिा, विघ्न जो पडे़ें उन्हें ढकेलते हुए। घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भ्िान्नता कभी, अतवर्फ एक पंथ के सतवर्फ पंथ हांे सभी। योग्यता विस्तार 1.अपने अध्यापक की सहायता से रंतिदेव, दधीचि, कणर् आदि पौराण्िाक पात्रों के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए। 2.‘परोपकार’ विषय पर आधारित दो कविताओं और दो दोहों का संकलन कीजिए। उन्हें कक्षा में सुनाइए। परियोजना कायर् 1.अयोध्या ¯सह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की कविता ‘कमर्वीर’ तथा अन्य कविताओं को पढि़ए तथा कक्षा में सुनाइए। 2.भवानी प्रसाद मिश्र की ‘प्राणी वही प्राणी है’ कविता पढि़ए तथा दोनों कविताओं के भावों में व्यक्त हुइर् समानता को लिख्िाए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ मत्यर् - मरणशील पशु - प्रवृिा - पशु जैसा स्वभाव उदार - दानशील / सहृदय कृताथर् - आभारी / ध्न्य कीतिर् - यश वूफजती - मधुर ध्वनि करती क्षुधातर् - भूख से व्यावुफल रंतिदेव - एक परम दानी राजा करस्थ - ुहाथ में पकड़ा हुआ / लिया हआ दधीचि - एक प्रसि( ट्टष्िा जिनकी हंियों से इंद्र का वज्र बना था पराथर् - जो दूसरों के लिए हो अस्िथजाल - हंियों का समूह उशीनर - गंधार देश का राजा क्ष्िातीश - राजा स्वमांस - अपने शरीर का मांस कणर् - दान देने के लिए प्रसि( वुंफती पुत्रा महाविभूति - बड़ी भारी पूँजी वशीकृता - वश में की हुइर् विरु(वाद बु( का दया - प्रवाह में बहा - बु( ने करफणावश उस समय की पारंपरिक मान्यताओं का विरोध किया था मदांध - जो गवर् से अंधा हो वित्त - धन - संपिा परस्परावलंब - एक - दूसरे का सहारा अमत्यर् - अंक - देवता की गोद अपंक - कलंक - रहित स्वयंभू - परमात्मा / स्वयं उत्पन्न होने वाला 24 ध् स्पशर् अंतरैक्य - आत्मा की एकता / अंतःकरण की एकता प्रमाणभूत - साक्षी अभीष्ट - इच्िछत अतवर्फ - तवर्फ से परे सतवर्फ पंथ - सावधान यात्राी

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SparshBhag2-004

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(1886&1964)


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