रोशाना की िांदगी, संस्कृति और राजनीति रोशाना की जिंदगी, संस्कृति और राजनीति तीसरे खंड में आपका परिचय दैनिक जीवन के इतिहास से होगा। यहाँ आप खेल और पहनावे का इतिहास पढ़ सवेंफगे। इतिहास महश दुनिया की महान या नाटकीय घटनाओं की दास्तान नहीं है। यह हमारे जीवन की छोटी - मोटी बातों से भी उतना ही जुड़ा है। हमारे आसपास की हर चीश का एक इतिहास है - जो कपड़े हम पहनते हैं, जो खाना हम खाते हैं, जो दवाएँ हम लेते हैं, जो संगीत सुनते हैं, जो साहित्य पढ़ते हैं और जो खेल खेलते हैं। ये सब चीशें वक्त के साथ बनी हैं या बदली हैं। रोशमरार् की चीश होने के चलते हमारा ध्यान उन पर नहीं जाता। हम ठहरकर सोचते भी नहीं कि सौ साल पहले इनमें से कोइर् चीश वैफसी रही होगीऋ या अलग - अलग समाज के लोग भोजन या कपड़े के बारे में वैफसे भ्िान्न - भ्िान्न तरीके से सोचते हैं। अध्याय 7 इतिहास व खेल पर है। इसमें आप एक ऐसे खेल का इतिहास पढ़ेंगे जिसने पिछले वुफछ दशकों से अपने देश के लोगों को दीवाना कर रखा है। िकेट से जुड़ी खबरें अखबारों की सुख्िार्याँ बन जाती हैं। िकेट का खेल आयोजित करके राष्ट्रों के बीच दोस्ितयाँ गाँठी जाती हैं और िकेटर अपने देश के राजदूत माने जाते हैं। सच कहा जाए तो यह खेल भारत की एकता का प्रतीक बनकर उभरा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमेशा से ऐसा नहीं था? इस अध्याय में आपको इसके लंबे और टेढ़े - मेढ़े सपफऱकी एक झलक मिलेगी। एक शमाने में, करीब डेढ़ सौ साल पहले, िकेट प्ि़ाफरंगी खेल था। इसका आविष्कार इंग्लैंड में हुआ और यह 19वीं सदी के विक्टोरियाइर् समाज और संस्कृति के रंग में रँग गया। इस खेल को अंग्रेश अपने तमाम पि्रय मूल्यों - बराबरी का न्याय, अनुशासन, शरापफत ;जेन्ट्लमैनलिनेसद्ध - का वाहक मानते थे। िकेट को ़स्वूफलों में शारीरिक श्िाक्षा के वृहत्तर कायर्क्रम के तहत लगाया गया कि लड़के आदशर् नागरिक बन सवेंफ। लड़कियों को लड़कों का खेल खेलने की इजाशत नहीं थी। अंग्रेशों के साथ चलकर िकेट उपनिवेशों में पहुँचा। औपनिवेश्िाक मालिकों ने सोचा कि खेल को इसके वाजिब अंदाश, इसकी असली भावना के साथ सिप़्ार्फ वही खेल सकते हैं। लिहाशा जब उपनिवेश के गुलाम लोग िकेट खेलने लगे और अकसर उनसे बेहतर खेलने लगेऋ इतना ही नहीं कइर् बार उन्हें हराने में भी सपफल रहे, तो उन्हें गंभीर चिंता होने लगी। इस तरह िकेट का खेल उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद की राजनीति से जुड़ गया। उपनिवेशों के अंदर खेल का अपना इतिहास भी पेचीदा रहा। जैसा कि आप अध्याय 7 में देखेंगे, िकेट जाति, क्षेत्रा, समुदाय व राष्ट्र की राजनीति से जुड़ गया। राष्ट्रीय खेल के रूप में वि्रफकेट का उभरना कइर् दशकों के ऐतिहासिक विकास का परिणाम था। िकेट के बाद हम पहनावे की ओर बढ़ेंगे ;अध्याय 8द्ध। आप देखेंगे कि पहनावे के इतिहास से हमें विभ्िान्न समाजों के इतिहास के बारे कितना वुफछ पता चलता है। लोग जो कपड़े पहनते हैं, उन पर समाज की रीति - नीतियों की छाप होती है। उनसे हमें सुंदरता, मयार्दा व उचित - अनुचित आचार - व्यवहार के उनके खयालात का पता चलता है। समाज के बदलने से ये रीतियाँ - नीतियाँ भी बदलती हैं। लेकिन समाज के रस्मों - रिवाज और पहनावे - ओढ़ावे में बदलाव के पीछे लंबी जद्दोजहद होती है। इनका एक इतिहास होता है, ये स्वाभाविक तौर पर, यूँ ही बस, हो नहीं जाते। अध्याय 8 इसी इतिहास से आपका परिचय कराएगा। आप पढ़ेंगे कि इंग्लैंड व भारत में पहनावे में हुए बदलाव किस तरह इन देशों में चल रहे सामाजिक आंदोलनों और आथ्िार्क परिवतर्नों से प्रभावित हुए। आप एक बार पिफर देखेंगे कि पहनावा भी उपनिवेशवादी व राष्ट्रवादी, जाति और वगर् की राजनीति से किस गहराइर् से जुड़ा है। पहनावे के इतिहास पर थोड़ा गौर करें तो स्वदेशी की राजनीति व चरखे के प्रतीक में हमें नए अथर् खुलते दिखेंगे। शायद इससे हमें महात्मा गांध्ी को भी बेहतर समझने का मौका मिले क्योंकि वह अकेले ऐसे इंसान थे, जो न सिपर्फ कपड़ों की राजनीति के प्रति निहायत सजग थे, बल्िक उन्होंने इस पर जमकर लिखा भी। अगर आप इन दो - एक चीशों के इतिहास को समझने लगें तो शायद अपनी िांदगी के ऐसे पहलुओं का इतिहास खुद टटोलने लगेंगे जिन्हें अब तक आपने साधरण मानकर अनदेखा कर दिया था। इतिहास और खेल: िकेट की कहानी िकेट इंग्लैंड में 500 साल पहले अलग - अलग नियमों के तहत खेले जा रहे गेंद - डंडे के खेलों से पैदा हुआ। ‘बैट’ अंग्रेशी का एक पुराना शब्द है, जिसका सीध अथर् है ‘डंडा’ या ‘वुुंफदा’। सत्राहवीं सदी में एक खेल के रूप में िकेट की आम पहचान बन चुकी थी और यह इतना लोकपि्रय हो चुका था कि रविवार को चचर् न जाकर मैच खेलने के लिए इसके दीवानों पर जुमार्ना लगाया जाता था। अठारहवीं सदी के मध्य तक बल्ले की बनावट हाॅकी - स्िटक की तरह नीचे से मुड़ी होती थी। इसकी सीध्ी - सी वजह ये थी कि बाॅल लुढ़का कर, अंडरआमर्, पेंफकी जाती थी और बैट के निचले सिरे का घुमाव बल्लेबाश को गेंद से संपवर्फ साध्ने में मदद करता था। इंग्लैंड के गाँवों से उठकर यह खेल वैफसे और कब बड़े शहरों के विशाल स्टेडियम में खेला जानेवाला आध्ुनिक खेल बन गया, यह इतिहास का एक दिलचस्प विषय है, क्योंकि इतिहास का एक इस्तेमाल तो यही है कि वह हमें वतर्मान के बनने की कहानी बताए। खेल हमारी मौजूदा ¯शदगी का एक अहम हिस्सा है - इसके शरिए हम अपना मनोरंजन करते हैं, एक दूसरे से होड़ लेते हैं, खुद को प्ि़़ाफट रखते हैं और अपनी सामाजिक तरपफदारी भी व्यक्त करते हैं। अगर आज के दिन लाखों - करोड़ों हिन्दुस्तानी सब - वुफछ छोड़ - छाड़कर भारतीय टीम को टेस्ट या एकदिवसीय मैच खेलते देखने में जुट जाते हैं तो यह जानना शरूरी लगता है कि दक्ष्िाण - पूवर् इंग्लैंड में खोजा गया यह गेंद - डंडे का खेल आख्िार भारतीय उपमहाद्वीप का जुनून वैफसे बन गया। इस खेल की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि एक ओर जहाँ उपनिवेशवाद व राष्ट्रवाद की बड़ी कहानी इससे जुड़ी है तो दूसरी ओर ध्मर् व जाति की राजनीति ने भी एक हद तक इसका स्वरूप गढ़ा। िकेट के इस इतिहास में पहले हम इंग्लैंड में इसके विकास को देखेंगे और उस समय प्रचलित शारीरिक चुस्ती व प्रश्िाक्षण की संस्कृति का भी जायशा लेंगे। तब हम भारत का रुख़ करते हुए िकेट को यहाँ अपनाये जाने से लेकर इसमें हुए आध्ुनिक बदलावों तक की चचार् करेंगे। हरेक खंड में हम देखेंगे कि खेल का इतिहास किस तरह सामाजिक इतिहास से नथा - गुँथा है। अध्याय 7इतिहास और खेल: िकेट की कहानी 1 इंग्लैंड में खेल के रूप में िकेट का ऐतिहासिक विकास अठारहवीं व उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास ने िकेट को इसका अनोखा स्वरूप प्रदान किया, क्योंकि यह िकेट का शुरुआती दौर था। मिसाल के तौर पर यह सिप़्ार्फ टेस्ट िकेट का ही अजूबा है कि खेल पाँच दिन तक लगातार चले और कोइर् नतीजा न निकले। किसी भी अन्य आध्ुनिक खेल के खत्म होने में इससे आध वक़्त भी नहीं लगता। पुफटबाॅल मैच करीब डेढ़ घंटे चलता है। गेंद व बल्ले से खेले जाने वाले बेसबाॅल जैसे आध्ुनिक शमाने के लिहाश से अपेक्षाकृत लंबे खेल में भी उतने समय में नौ पारियाँ हो जाती हैं जितने में िकेट के लघु संस्करण, यानी एकदिवसीय मैच, की एक पारी हो पाती है। िकेट की एक और दिलचस्प ख़ासियत यह है कि पिच की लंबाइर् तो तय - 22 गश - होती है पर मैदान का आकार - प्रकार एक - सा नहीं होता। हाॅकी, पुफटबाॅल जैसे दूसरे टीम - खेलों में मैदान के आयाम तय होते हैं, िकेट में नहीं। ऐडीलेड ओवल की तरह मैदान अंडाकार हो सकता है, तो चेन्नइर् के चेपाॅक की तरह लगभग गोल भी। मेलबनर् िकेट ग्राउंड में छक्का होने के लिए गेंद को काप़्ाफी दूरी तय करनी पड़ती है, जबकि दिल्ली के पि़फरोशशाह कोटला में थोड़े प्रयास में ही गेंद सीमा - रेखा के पार जाकर गिरती है। इन दोनों अजूबों के पीछे ऐतिहासिक कारण हैं। व़फायदा - व़फानून से बँधने वाले खेलों में िकेट का नंबर अव्वल था, यानी, साॅकर व हाॅकी जैसे बाव़फी खेलों के मुव़फाबले में िकेट ने सबसे पहले अपने लिए नियम बनाए और वदिर्याँ भी अपनाईं। ‘िकेट के व़फानून’ पहले - पहल 1744 इर्. में लिखे गए। उनके मुताबिक, ‘‘हािार शरीप़फों में से दोनों पि्रंसिपल ;कप्तानद्ध दो अंपायर चुनेंगे, जिन्हें किसी भी विवाद को निपटाने का अंतिम अध्िकार होगा। स्टंप 22 इंच ऊँचे होंगे, उनके बीच की गिल्िलयाँ 6 इंच की। गेंद का वशन 5 से 6 औंस के बीच होगा और स्टंप के बीच की दूरी 22 गश होगी’’। बल्ले के रूप व आकार पर कोइर् पाबंदी नहीं थी। ऐसा लगता है कि 40 नाॅच या रन का स्कोर काप़फी बड़ा होता था, शायद इसलिए कि गेंदबाश तेशी से बल्लेबाश के नंगे, पैडरहित पिंडलियों पर गेंद पेंफकते थे। दुनिया का पहला िकेट क्लब हैम्बल्डन में 1760 के दशक में बना और मेरिलिबाॅन िकेट क्लब ;एमसीसीद्ध की स्थापना 1787 में हुइर्। इसके अगले साल ही एमसीसी ने िकेट के नियमों में सुधर किए और उनका अभ्िाभावक बन बैठा। एमसीसी के सुधारों से खेल के रंग - ढंग में ढेर सारे परिवतर्न हुए, जिन्हें 18वीं सदी के दूसरे हिस्से में लागू किया गया। 1760 व 1770 के दशक में शमीन पर लुढ़काने की जगह गेंद को हवा में लहराकर आगे पटकने का चलन हो गया था। इससे गेंदबाशों को गेंद की लंबाइर् का विकल्प तो मिला ही, वे अब हवा में चकमा भी दे सकते थे और पहले से कहीं तेश गेंदें पेंफक सकते थे। इससे स्िपन और स्िवंग के लिए नए दरवाशे खुले। जवाब में बल्लेबाशों को अपनी टाइमिंग व शाॅट चयन पर महारत हासिल करनी थी। एक नतीजा तो प़फौरन यह हुआ कि मुड़े हुए बल्ले की जगह सीध्े बल्ले ने ले ली। इन सबकी वजह से हुनर व तकनीक महत्वपूणर् हो गए, जबकि ऊबड़ - खाबड़ मैदान या शु( ताकत की भूमिका कम हो गइर्। गेंद का वशन अब साढ़े पाँच से पौने छः औंस तक हो गया और बल्ले की चैड़ाइर् चार इंच कर दी गइर्। यह तब हुआ जब एक बल्लेबाश ने अपनी पूरी पारी विकेट जितने चैड़े बल्ले से खेल डाली! पहला लेग बिप़फोर विकेट ;पगबाधद्ध नियम 1774 में प्रकाश्िात हुआ। लगभग उसी समय तीसरे स्टंप का चलन भी हुआ। 1780 तक बड़े मैचों की अवध्ि तीन दिन की हो गइर् थी और इसी साल छः सीवन वाली िकेट बाॅल भी अस्ितत्व में आइर्। उन्नीसवीं सदी में ढेर सारे बदलाव हुए। वाइड बाॅल का नियम लागू हुआ, गेंद का सटीक व्यास तय किया गया, चोट से बचाने के लिए पैड व दस्ताने जैसे हिप़फाशती उपकरण उपलब्ध् हुए, बाउंड्री की शुरुआत हुइर्, जबकि पहले हरेक रन दौड़ कर लेना पड़ता था, और सबसे अहम बात, ओवरआमर् बोलिंग कानूनी ठहरायी गइर्। पर अठारहवीं सदी में िकेट पूवर् - औद्योगिक खेल रहा, जिसे परिपक्व होने के लिए औद्योगिक क्रांति, यानी 19वीं सदी के दूसरे हिस्से का इंतशार करना पड़ा। अपने इस ख़ास इतिहास के चलते िकेट में भूत - वतर्मान दोनों की विशेषताएँ शामिल हैं। िकेट की ग्रामीण जड़ों की पुष्िट टेस्ट मैच की अवध्ि से भी हो जाती है। शुरू में िकेट मैच की समय - सीमा नहीं होती थी। खेल तब तक चलता था जब तक एक टीम दूसरी को दोबारा पूरा आउट न कर दे। ग्रामीण िांदगी की रफ्ऱतार ध्ीमी थी और िकेट के नियम औद्योगिक क्रांति से पहले बनाए ़गए थे। आध्ुनिक पैफक्ट्री का मतलब था कि लोगों को घंटे, दिहाड़ी या फ्रते के हिसाब से काम के पैसे मिलते थेः पुफटबाॅल या हाॅकी जैसे खेलों़हकी संहिताएँ औद्योगिक क्रांति के बाद बनीं, लिहाशा उनकी कठोर समय - सीमाएँ औद्योगिक शहरी िांदगी के रूटीन को ध्यान में रखकर बनाइर् गईं। उसी तरह िकेट में मैदान के आकार का अस्पष्ट होना उसकी ग्रामीण शुरुआत का सबूत है। िकेट मूलतः गाँव के काॅमन्स में खेला जाता था। काॅमन्स ऐसे सावर्जनिक और खुले मैदान थे जिनपर पूरे समुदाय का साझा हव़फ होता था। काॅमन्स का आकार हरेक गाँव में अलग - अलग होता था, इसलिए न तो बाउंड्री तय थी और न ही चैके। जब गेंद भीड़ में घुस जाती नए शब्द संहिता: स्पष्ट रूप से निधार्रित नियमों और कानूनों को औपचारिक रूप में सूत्राब( कर देना। तो लोग क्षेत्रारक्षक या प़फील्डर के लिए रास्ता बना देते थे, ताकि वह आकर गेंद वापस ले जाए। जब सीमा - रेखा िकेट की नियमावली का हिस्सा बनी तब भी, विकेट से उसकी दूरी तय नहीं की गइर्। नियम सिप़र्फ यह कहता है कि ‘अंपायर दोनों कप्तानों से सलाह कर के खेल के इलाके की सीमा तय करेगा।’ खेल के औशारों को देखें तो पता चलता है कि वक्त के साथ बदलने के बावजूद िकेट अपनी ग्रामीण इंग्लैंड की जड़ों के प्रति वप़फादार रहा। िकेट के सबसे शरूरी उपकरण प्रकृति में उपलब्ध् पूवर् - औद्योगिक सामग्री से बनते हैं। बल्ला, स्टंप व गिल्िलयाँ लकड़ी से बनती हैं, जबकि गेंद चमड़े, सुतली ;ट्वाइनद्ध और काग ;काॅवर्फद्ध से। आज भी बल्ला और गेंद हाथ से ही बनते हैं, मशीन से नहीं। बल्ले की सामग्री अलबत्ता वक्त के साथ बदली। किसी शमाने में इसे लकड़ी के एक साबुत टुकड़े से बनाया जाता था। लेकिन अब इसके दो हिस्से होते हैं - ब्लेड या पफट्टा जो विलो ;बैदद्ध नामक पेड़ से बनता है और हत्था जो बेंत से बनता है। बेंत तब जाकर उपलब्ध् हुइर् जब यूरोपीय उपनिवेशकारों व कंपनियों ने खुद को एश्िाया में जमाया। गोल्प़फ और टेनिस के विपरीत, िकेट ने प्लास्िटक, प़फायबर - शीशा या धतु - जैसी औद्योगिक या कृत्रिाम सामग्री के इस्तेमाल को सिरे से नकारा है। जब आॅस्ट्रेलियाइर् िकेटर डेनिस लिली ने एल्युमीनियम के बल्ले से खेलने की कोश्िाश की तो अंपायरों ने उसे अवैध् करार दिया। दूसरी ओर हिप़फाशती साश - सामान पर तकनीकी बदलाव का सीध असर पड़ा है। वल्केनाइश्ड रबड़ की खोज के बाद पैड पहनने का रिवाज 1848 में चला, जल्द ही दस्ताने भी बने और धतु, सिन्थेटिक व हल्की सामग्री से बने हेल्मेट के बिना तो आध्ुनिक िकेट की कल्पना ही असंभव है। चित्रा 5 - इस पोस्टर में लाॅडर््स में 1848 में होने वाले एक मैच का ऐलान किया जा रहा हैपेास्टर में शौकिया और पेशेवर ख्िालाडि़योें को ‘जेंटलमेन’ और ‘प्लेयसर्’ कह कर संबोिात किया गया है। उन्नीसवीं शताब्दी में होने वाले मैचों के विज्ञापन रंगमंच के पोस्टरों जैसे लगते थे और उनसे इस खेल के नाटकीय स्वरूप का पता चलता है। चित्रा 6 - महान बल्लेबाश डब्ल्यू.जी.ग्रेस बल्लेबाशी के लिए आते हुए, लाॅडर््स, 1895वह प्लेयसर् के ख्िालापफ़जेंटलमेन के लिए खेलते थे। 1.1 िकेट और विक्टोरियाइर् इंग्लैंड इंग्लैंड में वि्रफकेट के आयोजन पर अंग्रेशी समाज की छाप सापफ है। अमीरों़को, जो मशे के लिए वि्रफकेट खेलते थे, ‘शौकिया’ ख्िालाड़ी कहा गया और अपनी रोशी - रोटी के लिए खेलनेवाले गरीबों को ‘पेशेवर’ ;प्रोप़ेफशनलद्ध कहा गया। अमीर शौव्ि़ाफया दो कारणों से थेः एक, यह खेल उनके लिए एक तरह का मनोरंजन था - खेलने के आनंद के लिए न कि पैसे के लिए खेलना नवाबी ठाठ की निशानी था। दूसरे, खेल में अमीरों को लुभा सकने लायक पैसा भी नहीं था। पेशेवर ख्िालाडि़यों का मेहनताना वशीप़फा, चंदे, या गेट पर इकट्ठा किए गए पैसे से दिया जाता था। मौसमी होने के कारण खेल से साल भर का रोशगार तो नहीं मिल सकता था। जाड़े के महीनों, यानी आॅप़फ - सीशन में, श्यादातर पेशेवर ख्िालाड़ी खदानों में काम करते थे या कहीं और मशदूरी करते थे। शौकीनों की सामाजिक श्रेष्ठता िकेट की परंपरा का हिस्सा बन गइर्। शौव़्ाफीनों को जहाँ ‘जेंट्लमेन’ की उपाध्ि दी गइर् तो पेशेवरों को ‘ख्िालाड़ी’ ;‘प्लेयसर्’द्ध का अदना - सा नाम मिला। मैदान में घुसने के उनके प्रवेश - द्वार भी अलग - अलग थे। शौकीन जहाँ बल्लेबाश हुआ करते वहीं खेल में असली मशक्कत और ऊजार् वाले काम, जैसे तेश गेंदबाशी, ख्िालाडि़यों के ड्डोत क नए शब्द चंदा: किसी खास उद्देश्य ;जैसे िकेटद्ध के लिए इकऋा की जाने वाली राश्िा या मदद। टाॅमस ह्यूश ;1822 - 1896द्ध ने उस समय रग्बी स्वूफल में पढ़ाइर् की थी जिस समय थाॅमस आनर्ल्ड वहाँ के प्रधानाचायर् थे। अपने स्वूफली अनुभवों के आधार पर उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसका शीषर्क था - टाॅम ब्राउन्स स्वूफलडेश। 1857 में छपी यह किताब काप्ाफी लोकपि्रय हुइर् और उससे बाहुबली इर्साइयत ;मस्क्युलर िश्िचऐनिटीद्ध के प्रसार में मदद मिली। इर्साइर् धमर् की इस धारा का मानना था कि स्वस्थ नागरिकों को इर्साइर् आदशो± और खेलों के शरिए ढाला जाना चाहिए। इस पुस्तक में टाॅम ब्राउन, घर की याद में खोए रहने वाले और मुझार्ए से लड़के की जगह एक कद्दावर, मदार्ना विद्याथीर् बन जाता है। उसे नायकों जैसी ख्याति मिलती है और शारीरिक साहस, ख्िालाड़ीपन, वपफादारी और देशभक्ित की भावना के लिए सब उसकी चचार् करते हैं। यह रूपांतरण उस ़पब्िलक स्वूफल के अनुशासन और खेल संस्कृति से पैदा होता है। इसी उपन्यास के अंश ‘चलो, ब्राउन, अब अपने व्यंग्य - बाण मत मारो’, मास्टर ने कहा। ‘मैंने इस खेल को वैज्ञानिक ढंग से समझना शुरू कर दिया है और क्या शालीन खेल है यह!’ ‘है कि नहीं? लेकिन यह सिपर्फ खेल नहीं है’, टाॅम ने कहा।़‘बिलवुफल’, आथर्र ने कहा, ‘बि्रटिश जवानों से लेकर बूढ़ों का जन्मसि( अध्िकार जैसे कि बंदी प्रत्यक्षीकरण और प्रवि्रफया - सम्मत न्याय हर बि्रटिश का हव़फ है।’ ‘इससे हमें अनुशासन और पारस्परिक निभर्रता की जो सीख मिलती है, वह अनमोल है’, मास्टर ने कहना जारी रखा, ‘मुझे लगता है कि इस खेल को इतना ही निःस्वाथीर् होना चाहिए। यहाँ व्यक्ित एकादश में मिल जाता हैऋ वह इसलिए नहीं खेलता कि वह जीते, बल्िक उसकी टीम जीते।’ ‘यह बिलवुफल सही है’, टाॅम ने कहा, ‘और इसीलिए प़़्ाुफटबाल और वि्रफकेट पुराने पारंपरिक खेलों के मुवफाबले श्यादा लोकपि्रय हैं। क्योंकि बाकी खेलों में इंसान अपनी जीत के लिए खेलता है न कि अपने पक्ष की जीत के लिए।’ ‘पिफर एकादश के कप्तान के क्या कहने!’ मास्टर ने कहा, ‘हमारी स्वूफली दुनिया में वैफसी गरिमा है इस पद की!... इसके लिए हुनर भी चाहिए, भद्रता और सख्ती भी, और न जाने कितने सारे और गुण।’ टाॅमस ह्यूश, टाॅम ब्राउन्स स्वूफलडेश से उ(ृत। ़हिस्से आते थे। िकेट में संदेह का लाभ ;बेनेपि़फट आॅप़फ डाउटद्ध हमेशा बल्लेबाश को क्यों मिलता है, उसकी एक वजह यह भी है। िकेट बल्लेबाशों का ही खेल इसीलिए बना क्योंकि नियम बनाते समय बल्लेबाशी करनेवाले ‘जेंटलमेन’ को तरजीह दी गइर्। शौवि़फया ख्िालाडि़यों की सामाजिक श्रेष्ठता का ही नतीजा था कि टीम का कप्तान पारंपरिक तौर पर बल्लेबाश ही होता थाः इसलिए नहीं कि बल्लेबाश वुफदरती तौर पर बेहतर कप्तान होते थे, बल्िक इसलिए कि बल्लेबाश तो आम तौर पर ‘जेंटलमेन’ ही होते थे। चाहे क्लब की टीम हो या राष्ट्रीय टीम, कप्तान तो शौवि़फया ख्िालाड़ी ही होता था। 1930 के दशक में जाकर पहली बार अंग्रेशी टीम की कप्तानी किसी पेशेवर ख्िालाड़ी - याॅवर्फशायर के बल्लेबाश लेन हटन - ने की। अकसर कहा जाता है कि ‘वाटरलू का यु( इर्टन के खेल के मैदान में जीता गया’। इसका अथर् यह है कि बि्रटेन की सैनिक सपफलता का राश उसके पब्िलक स्वूफल के बच्चों को सिखाए गए मूल्यों में था। अंग्रेशी आवासीय विद्यालय में अंग्रेश लड़कों को शाही इंग्लैंड के तीन अहम संस्थानों - सेना, प्रशासनिक सेवा व चचर् में करियर के लिए प्रश्िाक्ष्िात किया जाता था। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक टाॅमस आनर्ल्ड - जो मशहूर रग्बी स्वूफल के हेडमास्टर होने के साथ - साथ आध्ुनिक पब्िलक स्वूफल प्रणाली के प्रणेता थे - रग्बी व िकेट जैसे खेलों को महश मैदानी खेल नहीं मानते थे बल्िक अंग्रेश लड़कों को अनुशासन, ऊँच - नीच का बोध्, हुनर, स्वाभ्िामान की रीति - नीति और नेतृत्व क्षमता सिखाने का शरिया मानते थे। इन्हीं गुणों पर तो बि्रतानी साम्राज्य को बनाने और चलाने का दारोमदार था। विक्टोरियाइर् साम्राज्य - निमार्ता दूसरे देशों को जीतना निःस्वाथर् समाज सेवा मानते थे, क्योंकि उनसे हारने के बाद ही तो पिछड़े समाज बि्रतानी कानून व पश्िचमी ज्ञान के संपवर्फ में आकर सभ्यता का सबक सीख सकते थे। िकेट ने अभ्िाजात अंग्रेशों की इस आत्मछवि को पुष्ट करने में मदद की - ऐसा शौकिया खेल को बतौर आदशर् पेश करके हुआ, यानी खेल जहाँ प़फायदे या जीत के लिए न होकर सिप़र्फ खेलने और स्िपरिट आॅप़फ प़ेफयरप्ले ;न्यायोचित खेल भावनाद्ध के लिए खेला जाता था। ़सच्ची बात तो यह है कि नेपोलियन के ख्िालापफ लड़ाइर् इसलिए जीती जा सकी कि स्काॅटलैंड व वेल्स के लौह उद्योग, लंकाशायर की मिलों व सिटी आॅप़फ लंदन के वित्तीय घरानों से भरपूर सहयोग मिला। इंग्लैंड के व्यापार व उद्योग में आगे होने के चलते बि्रटेन विश्व की सबसे बड़ी ताकत बन गया था, लेकिन अंग्रेशी शासक - वगर् को यही खयाल अच्छा लगता था कि दुनिया में उनकी श्रेष्ठता के पीछे आवासीय विद्यालयों में पढ़कर तैयार हुए और शरीप़फों का खेल - िकेट - खेलनेवाले युवावगर् का चरित्रा ही है। चित्रा 7 - लाॅडर््स पर इर्टन और हैरो नामक मशहूर पब्िलक स्वूफलों के बीच िकेट का मैचयह खेल तो सब जगह एक जैसा लगता है लेकिन उसको देखने के लिए जुटने वाली भीेड़ एक जैसी नहीं होती। बाउफलर टोपियाँ पहने पुरुष और धूप से बचने के लिए पैरासोल पहने मैच देखने आयी औरतों के चित्राण से इस खेल का उच्चवगीर्य सामाजिक चरित्रा सापफ़दिखाइर् देता है। इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूश, 20 जुलाइर् 1872 से। चित्रा 8 - औरतों के लिए िकेट नहीं बल्िक क्रोकेटऔरतों के लिए कठिन और प्रतिस्पधीर् खेल अच्छा नहीं माना जाता था। क्रोकेट एक धीमी गति वाला सौम्य ख्ेाल था जिसे औरतों के लिए, खासतौर से उच्चवगीर्य औरतों के लिए अच्छा माना जाता था। ख्िालाडि़नों के लंबे गाउन, झालरों और टोपियों से उनके खेलों के स्वरूप की झलक मिलती है। इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़, 20 जुलाइर् 1872 से। ड्डोत ख उन्नीसवीं सदी के आख्िारी सालों तक खेल - वूफद और व्यायाम लड़कियों की श्िाक्षा का हिस्सा नहीं था। 1858 से 1906 तक चेलटेनहेम लेडीश काॅलेज की प्रधानाचायार् रही डोरोथी बीएले ने स्वूफल के जाँच आयोग को बताया था: ‘लड़कों को िकेट आदि खेलों से जो शारीरिक व्यायाम मिलता है उसके स्थान पर लड़कियों के लिए पैदल चाल और ... वूफदने आदि की व्यवस्था की जानी चाहिए।’ वैफथलीन, इर्.मैक्क्राॅने, ‘प्ले अप! प्ले अप! ऐण्ड प्ले द गेम: स्पोटर् ऐट द लेट विक्टोरियन गल्सर् पब्िलक स्वूफल’ से उ(ृत। 1890 के दशक तक पहुँचते - पहुँचते स्वूफल को खेल के मैदान आदि मिलने लगे और लड़कियों को भी उन खेलों में हाथ आशमाने का मौका मिलने लगा जिन्हें अब तक केवल लड़कों का खेल माना जाता था। लेकिन लड़कियों से प्रतिस्पधार्त्मक खेल की उम्मीद अब भी नहीं की जाती थी। डोरोथी बीएले ने 1893 - 1894 में स्वूफल परिषद् को बताया: ‘मैं मानती हूँ कि लड़कियों को अपने शरीर पर शरूरत से श्यादा शोर नहीं डालना चाहिए और न ही उन्हें ऐथलेटिक प्रतिद्वंद्विता में डूब जाना चाहिए। इसीलिए, हम दूसरे स्वूफलों के विरु( नहीं खेलते। मेरे खयाल में लड़कियों को उफबड़ - खाबड़ मैदानों में खुद को थकाने के बजाय वनस्पति शास्त्रा, भूगभर्शास्त्रा आदि में ही दिलचस्पी लेनी चाहिए।’ वैफथलीन, इर्.मैक्क्राॅने, ‘प्ले अप! प्ले अप! ऐण्ड प्ले द गेम’ से उ(ृत। ियाकलाप उन्नीसवीं सदी के स्वूफली पाठ्यक्रम के आधार पर उस समय लड़कियों के लिए वैफसा आचरण सही माना जाता था? 2 िकेट का प्रसार हाॅकी व पुफटबाॅल जैसे टीम - खेल तो अंतरार्ष्ट्रीय बन गए, पर िकेट औपनिवेश्िाक खेल ही बना रहा, यानी यह उन्हीं देशों तक सीमित रहा जो कभी बि्रटिश साम्राज्य के अंग थे। िकेट की पूवर् - औद्योगिक विचित्राता के कारण इसका नियार्त होना मुश्िकल था। इसने उन्हीं देशों में जड़ें जमायीं जहाँ अंग्रेशों ने कब्शा जमाकर शासन किया। इन उपनिवेशों ;जैसे कि दक्ष्िाण अप़्ा्रफीका, िाम्बाब्वे, आॅस्ट्रेलिया, न्यूशीलैंड, वेस्ट इंडीश और कीनियाद्ध में िकेट इसलिए लोकपि्रय खेल बन पाया क्योंकि गोरे बाश्िांदों ने इसे अपनाया या पिफर जहाँ स्थानीय अभ्िाजात वगर् ने अपने औपनिवेश्िाक मालिकों की आदतों की नकल करने की कोश्िाश की, जैसे कि भारत में। हालाँकि बि्रटिश शाही अप़फसर उपनिवेशों में यह खेल लेकर शरूर आए पर इसके प्रसार के लिए, खास तौर पर वेस्ट इंडीश व ¯हदुस्तान जैसे ग़ैर - गोरे उपनिवेशों में, उन्होंने शायद ही कोइर् प्रयास किया। िकेट खेलना यहाँ सामाजिक व नस्ली श्रेष्ठता का प्रतीक बन गया और अपफीकी - वैफरिबियाइर् आबादी को क्लब िकेट़्रखेलने से हमेशा हतोत्साहित किया गया। नतीजतन, इस पर गोरे बागान - मालिकों और उनके नौकरों का बोलबाला रहा। वेस्ट इंडीश में पहला गैर - गोरा क्लब उन्नीसवीं सदी के अंत में बना और यहाँ भी सदस्य हल्के रंगवाले मुलैट्टो समुदाय के थे। इस तरह काले रंग के लोग समुद्री बीचों पर, सुनसान गलियों और पाको± में बड़ी संख्या में नए शब्द मुलैट्टो: मिश्रित यूरोपीय और अप़के लोग। ्रफीकी मूल इस तस्वीर में पैविलियन के आसपास खड़े नौकरों के अलावा शायद और कोइर् भारतीय नहीं है। िकेट खेलते थे, लेकिन क्लब िकेट पर 1930 के दशक तक गोरे अभ्िाजनों का ही वचर्स्व रहा। वेस्ट इंडीश में अभ्िाजात गोरों की विश्िाष्टतावादी नीतियों के बावजूद वैफरिबियाइर् द्वीप समूह में िकेट महालोकपि्रय हो गया। िकेट में कामयाबी का मतलब नस्ली समानता व राजनीतिक प्रगति हो गया। अपनी ़आशादी के समय, पफोब्सर् बनर्हैम व एरिक विलियम्स जैसे नेताओं ने िकेट में आत्मसम्मान और अंतरार्ष्ट्रीय प्रतिष्ठा की संभावनाएँ देखीं। जब वेस्ट इंडीश ने 1950 के दशक में इंग्लैंड के ख्िालाप़फ अपनी पहली टेस्ट शृंखला जीती तो राष्ट्रीय उत्सव मनाया गया, मानो वेस्ट इंडियनों ने दिखा दिया हो कि वे गोरे अंग्रेशों से कम नहीं हैं। इस महान जीत में दो विडंबनाएँ थीं। पहली, विजयी वेस्ट इंडीश की टीम का कप्तान एक गोरा ही था। याद रहे कि 1960 में पहली बार किसी अश्वेत - प़ै्रफन्क वाॅरेल - को नेतृत्व सँभालने का मौका मिला। दूसरी, वेस्ट इंडीश की टीम किसी एक देश की नहीं थी, बल्िक उसमें कइर् डोमीनियनों के ख्िालाड़ी शामिल थे और ये राज्य बाद में स्वतंत्रा देश बने। मशेदार बात है कि वैफरिबियाइर् क्षेत्रा की नुमाइंदगी करनेवाली वेस्ट इंडियन टीम, वेस्ट इंडियन एकता के तमाम असपफल प्रयासों का एकमात्रा अपवाद है। िकेट के प़ैफन जानते हैं कि िकेट देखने का मतलब ही है कि आप किसी न किसी ओर से हैं। रणजी ट्राॅप़फी मैच में जब दिल्ली का मुंबइर् से मुव़फाबला हो तो दशर्क की वप़फादारी इस पर निभर्र करती है कि वह किस शहर का है या वह किसका साथ दे रहा है। जब भारत बनाम पाकिस्तान हो तो भोपाल या चेन्नइर् में टेलीविशन पर मैच देखते दशर्कों की भावनाएँ राष्ट्रीय निष्ठाओं से तय होती हैं। लेकिन भारतीय प्रथम श्रेणी िकेट के शुरुआती इतिहास में टीमों को भौगोलिक आधरों पर नहीं बाँटा जाता था - बल्िक यह जानना दिलचस्प है कि 1932 के पहले किसी टीम को टेस्ट मैच में राष्ट्रीय नुमाइंदगी का अध्िकार नहीं मिला था। तो टीमें बनती वैफसे थीं और राष्ट्रीय और क्षेत्राीय टीमों के नहीं होने की स्िथति में प़ैफन अपनी तरप़फदारी वैफसे तय करते थे? आइए देखें कि इतिहास के पास इन सवालों के क्या जवाब हैं - देखें कि भारत में िकेट वैफसे पनपा और कौन - सी वप़फादारियाँ बि्रतानी राज के शमाने में हिंदुस्तानियों को साथ ला रही थीं और कौन उन्हें बाँट रही थीं। 2.2 िकेट, नस्ल और ध्मर् औपनिवेश्िाक भारत में िकेट नस्ल व ध्मर् के आधर पर संगठित था। भारत में िकेट का पहला सबूत हमें 1721 से मिला है, जो अंग्रेश जहािायों द्वारा वैफम्बे में खेले गए मैच का ब्यौरा है। पहला भारतीय क्लब, कलकत्ता क्लब, 1792 में बना। पूरी अठारहवीं सदी में िकेट भारत में बि्रटिश सैनिक व सिविल सवे±ट्स द्वारा सिप़र्फ - गोरे क्लबों व जिमखानों में खेला जानेवाला खेल रहा। इन क्लबों की निजी चहारदीवारियों के अंदर िकेट खेलने में मशा तो था ही, यह अंग्रेशों के भारतीय प्रवास के खतरों नए शब्द डोमीनियन: बि्रटिश साम्राज्य के अंतगर्त आने वाले स्वशासित क्षेत्रा। व मुश्िकलों से राहत व पलायन का सामान भी था। हिंदुस्तानियों में इस खेल के लिए शरूरी हुनर की कमी समझी जाती थी, न ही उनसे खेलने की उम्मीद की जाती थी। लेकिन वे खेले। ¯हदुस्तानी िकेट - यानी ¯हदुस्तानियों द्वारा िकेट - की शुरुआत का श्रेय बम्बइर् के शरतुश्ितयों यानी पारसियों के छोटे से समुदाय को जाता है। व्यापार के चलते सबसे पहले अंग्रेशों के संपवर्फ में आए और पश्िचमीकृत होनेवाले पहले भारतीय समुदाय के रूप में पारसियों ने 1848 में पहले िकेट क्लब की स्थापना बम्बइर् में की, जिसका नाम था - ओरिएंटल िकेट क्लब। पारसी क्लबों के प्रायोजक व वित्तपोषक थे टाटा व वाडिया जैसे पारसी व्यवसायी। िकेट खेलने वाले गोरे प्रभुवगर् ने उत्साही पारसियों की कोइर् मदद नहीं की। उल्टे, गोरों के बाॅम्बे जिमखाना क्लब और पारसी िकेटरों के बीच पावर्फ के इस्तेमाल को लेकर एक झगड़ा भी हुआ। पारसियों ने श्िाकायत की कि बाॅम्बे जिमखाना के पोलो टीम के घोड़ों द्वारा रौंदे जाने के बाद मैदान िकेट खेलने लायक नहीं रह गया। जब ये साप़फ हो गया कि औपनिवेश्िाक अध्िकारी अपने देशवासियों का पक्ष ले रहे हैं, तो पारसियों ने िकेट खेलने के लिए अपना खुद का जिमखाना बनाया। पर पारसियों व नस्लवादी बाॅम्बे जिमखाना के बीच की इस स्पधर् का अंत अच्छा हुआ - पारसियों की एक टीम ने बाॅम्बे जिमखाना को 1889 में हरा दिया। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के चार साल बाद हुआ, और दिलचस्प बात यह है कि इस संस्था के मूल नेताओं में से एक दादाभाइर् नौरोजी, जो अपने वक्त के महान राजनेता व बुिजीवी थे, पारसी ही थे। पारसी जिमखाना क्लब की स्थापना ने जैसे एक नइर् परंपरा डाल दी, दूसरे भारतीयों ने भी ध्मर् के आधर पर क्लब बनाने चालू कर दिए। ¯हदू व मुसलमान दोनों ही 1890 के दशक में ¯हदू व इस्लाम जिमखाना के लिए पैसे इकट्ठे करते दिखाइर् दिए। बि्रटिश औपनिवेश्िाक भारत को राष्ट्र नहीं मानते थे - उनके लिए तो यह जातियों, नस्लों व ध्मो± के लोगों का एक समुच्चय था, जिन्हें उन्होंने उपमहाद्वीप के स्तर पर एकीकृत किया। 19वीं सदी के अंत में कइर् ¯हदुस्तानी संस्थाएँ व आंदोलन जाति व ध्मर् के आधर पर ही बने क्योंकि औपनिवेश्िाक सरकार भी इन बँटवारों को बढ़ावा देती थी - सामुदायिक संस्थाओं को प़्ाफौरन मान्यता मिल जाती थी। मिसाल के तौर पर, इस्लाम जिमखाना द्वारा बम्बइर् के समुद्री इलाके के पास वाली शमीन की अशीर् पर विचार करते हुए बाॅम्बे प्रेसिडेंसी के गवनर्र ने लिखाः ‘... हमें मानकर चलना चाहिए कि बहुत जल्द हमारे पास किसी ¯हदू जिमखाना के लिए ऐसी ही अशीर् आएगी... इन अिर्ायों को नामंशूर करने का कोइर् उपाय मेरे पास नहीं है, लेकिन मैं ... हर राष्ट्रीयता के जिमखाने की स्थापना के बाद... आगे के आवेदनों को स्वीकार नहीं करूँगा’। ;शोर हमाराद्ध। इस पत्रा से शाहिर है कि औपनिवेश्िाक अप़फसर हरेक धमिर्क समुदाय को अलग राष्ट्रीयता मानते थे। यह भी साप़फ है कि धमिर्क प्रतिनिध्ित्व के नाम पर स्वीकृति की गुंजाइश श्यादा थी। जिमखाना िकेट के इतिहास ने प्रथम श्रेणी के िकेट को सांप्रदायिक व नस्ली आधरों पर संगठित करने की रिवायत डाली। औपनिवेश्िाक हिंदुस्तान में सबसे मशहूर िकेट टूनार्मेंट खेलनेवाली टीमें क्षेत्रा के आधार पर नहीं बनती थीं, जैसा कि आजकल रणजी ट्राॅपफी में होता है, बल्िक धामिर्क समुदायों की बनती थीं। इस टूनार्मेंट को शुरू - शुरू में क्वाड्रैंग्युलर या चतुष्कोणीय कहा गया, क्योंकि इसमें चार टीमें - यूरोपीय, पारसी, हिंदू व मुसलमान - खेलती थीं। बाद में यह पेंटांग्युलर या पाँचकोणीय हो गया - और द रेस्ट नाम की नइर् टीम में भारतीय इर्साइर् जैसे बचे - खुचे समुदायों को नुमाइंदगी दी गइर्। मिसाल के तौर पर विजय हशारे, जो इर्साइर् थे, द रेस्ट के लिए खेलते थे। पत्राकारों, िकेटरों व राजनेताओं ने 1930 - 40 के दशक तक इस पाँचकोणीय टूनार्मेंट की नस्लवादी व सांप्रदायिक बुनियाद पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। बाॅम्बे क्राॅनिकल नामक अखबार के मशहूर संपादक ़एस.ए. बरेलवी, रेडियो कमेंटेटर ए.एपफ.एस. तलयारखान और भारत के सबसे लोकपि्रय राजनेता महात्मा गांध्ी ने पेंटांग्युलर को समुदाय के आधर पर बाँटनेवाला बताकर इसकी निंदा की। उनका कहना था ऐसे समय में जब राष्ट्रवादी हिंदुस्तानी अवाम को एकजुट करना चाह रहे थे, इस टूनार्मेंट का क्या तुक था? इसके विपरीत क्षेत्रा - आधरित नैशनल िकेट चैंपियनश्िाप ़नामक एक नए टूनार्मेंट का आयोजन शुरू हुआ ;जिसे बाद में रणजी ट्राॅपफी कहा गयाद्ध, लेकिन पाँचकोणीय टूनार्मेंट की जगह लेने के लिए इसे आशादी का इंतशार करना पड़ा। पाँचकोणीय टूनार्मेंट की नींव में बि्रतानी सरकार की ‘पूफट डालो राज करो’ की नीति थी। यह एक औपनिवेश्िाक टूनार्मेंट था, जो बि्रटिश राज के साथ खत्म हो गया। बाॅक्स 1 जाति और िकेट पालवंकर बालू का जन्म 1875 में पूना में हुआ था। उस समय भारतीयों को टेस्ट िकेट नहीं खेलने दिया जाता था। इसके बावजूद बालू धीमी गति की गेंदबाजी में अपने समय के बेहतरीन गेंदबाज थे। बालू औपनिवेश्िाक काल के सबसे बड़े भारतीय िकेट मुकाबले क्वाड्रैंग्युलर में हिंदूश टीम की तरपफ से खेलते थे। अपनी टीम का़सबसे अच्छा ख्िालाड़ी होते हुए भी उन्हें कभी कप्तान नहीं बनाया गया क्योंकि वह दलित थे और सवणर् चयनकतार् उनके विरु( पक्षपात करते थे। आगे चलकर 1923 में, उनके छोटे भाइर् वि्टठल को हिंदूश टीम की कप्तानी का मौका मिला और यूरोपीय ख्िालाडि़यों के ख्िालापफ कइर् सपफलताओं में उन्होंने अपनी टीम का़नेतृत्व किया। एक अखबार के नाम भेजे गए पत्रा में िकेट के एक प्रशंसक ने हिंदूश टीम की जीत और ‘अस्पृश्यता’ के विरु( गांधीजी द्वारा चलाए जा रहे अभ्िायान को एक - दूसरे से जोड़ते हुए लिखा था: ‘हिंदूश की शानदार विजय का श्रेय मुख्य रूप से इस बात को जाता है कि हिंदू जिमखाना के कतार्धतार्ओं ने देश के बेहतरीन गेंदबाश श्री बालू के भाइर् श्री विट्ठल को हिंदूश टीम का कप्तान नियुक्त किया है जो कि अछूत वगर् से आते हैं। हिदूश की जीत से यही सबक निकलता है कि छुआछूत के खात्मे से ही स्वराज का रास्ता खुलेगा - जो महात्मा जी की भी भविष्यवाणी है।’ रामचंद्र गुहा, ए काॅनर्र आॅपफ ए पफाॅरेन पफील्ड।़़चित्रा 14 - पालवंकर बालू ;1904द्धअभूतपूवर् खेल योग्यता के ध्नी बालू को टीम से बाहर तो नहीं रखा जा सकता था लेकिन दलित जाति से होने के कारण उन्हें कभी टीम का कप्तान नहीं बनाया गया। 3 खेल के आध्ुनिक बदलाव आध्ुनिक िकेट में टेस्ट और एकदिवसीय इंटरनैशनल का वचर्स्व है, जिन्हें राष्ट्रीय टीमों के बीच खेला जाता है। मशहूर होकर लोगों की यादों में रच - बस जानेवाले िकेटर आम तौर पर अपनी राष्ट्रीय टीमों के ख्िालाड़ी होते हैं। पाँचकोणीय और चतुष्कोणीय मैचों के दौर से उन्हीं ख्िालाडि़यों को हिंदुस्तानी प़ैफन याद करते हैं, जिन्हें टेस्ट िकेट खेलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अपने समय के बेहतरीन बल्लेबाश सी.के. नायडू को तो लोग अब भी याद करते हैं, जबकि पालवंकर विट्ठल व पालवंकर बालू जैसे उनके वुफछ अन्य समकालीन इसलिए भुला दिए गए हैं, क्योंकि नायडू का करियर तो लंबा था पर ये दोनों ख्िालाड़ी टेस्ट िकेट खेलने के वक्त तक सिय ड्डोत घ महात्मा गांधी और औपनिवेश्िाक खेल महात्मा गांधी देह और दिमाग के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए खेल - वूफद को बहुत महत्वपूणर् मानते थे। लेकिन वह यह बात भी अकसर कहते थे कि िकेट और हाॅकी जैसे खेल अंग्रेश भारत में लेकर आए हैं और ये खेल हमारे परंपरागत खेलों को नष्ट करते जा रहे हैं। उनका मानना था कि िकेट, हाॅकी, पुफटबाॅल और टेनिस जैसे खेल संपन्न वगो± के खेल हैं। इन खेलों में औपनिवेश्िाक मनोदशा के दशर्न होते हैं और ये खेल हमारी अपनी मिट्टी से उपजे साधारण व्यायामों के मुकाबले कम प्रभावी श्िाक्षा ही दे पाते हैं, ऐसा उनका मानना था। महात्मा गांधी के लेखों में से लिए गए इन तीन अंशों को पढि़ये और टाॅमस आनर्ल्ड या ह्यूश ;ड्डोत कद्ध द्वारा श्िाक्षा और खेल - वूफद के बारे में व्यक्त किए गए विचारों से उनकी तुलना कीजिए: ‘आइए, अब शरीर की ओर दृष्िटपात करें। हर रोश एक घंटा टेनिस, पुफटबाॅल अथवा िकेट खेल लेने से क्या हम शरीर को श्िाक्ष्िात हुआ कह सकते हैं? यह सच है कि शरीर इसमें मजबूत हेाता है। लेकिन जैसे जंगल में मनमाना दौड़ने - पिफरनेवाले घोड़े का शरीर मजबूत तो कहा जा सकता है, किंतु श्िाक्ष्िात नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार ऐसा शरीर मजबूत होते हुए भी श्िाक्ष्िात नहीं कहा जा सकता। श्िाक्ष्िात शरीर नीरोग होता है, मजबूत हेाता है, कसा हुआ होता है और उसके हाथ - पैर आदि भी इच्िछत कायर् कर सकते हैं। उसके हाथों में वुफदाली, पफावड़ा, हथौड़ा, आदि सुशोभ्िात होते हैं और ये हाथ इन सबका उपयोग भी कर सकते हैं। तीस मील की यात्रा करते हुए श्िाक्ष्िात शरीर थकेगा नहींऋ ऐसी शरीरिक श्िाक्षा वैफसे मिलती है? हम कह सकते हैं कि आध्ुनिक पाठ्यक्रम में इस दृष्िट से शरीरिक श्िाक्षा नहीं दी जाती।’ ‘सच्ची श्िाक्षा क्या है’, 20 पफरवरी 1926, संपूणर् गांध्ी वाघ्मय, खण्ड 30‘लेकिन, अगर यह हकीकत हो कि इस पवित्रा भूमि पर िकेट और पुफटबाॅल का चलन होने से पहले आपके अपने राष्ट्रीय खेल हों तो मैं आपसे अनुरोध् करूँगा कि आपकी संस्था को उन्हें पुनः प्रतिष्िठत करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि भारत के कइर् बहुत अच्छे देशी खेल हैं। वे िकेट और पुफटबाॅल की ही तरह रोचक और उत्साहवध्र्क हैं। उनमें खतरे भी उतने ही रहते हैं और उफपर से उनकी एक खूबी यह है कि वे व्ययसाध्य नहीं होते, क्योंकि उनपर लगभग कोइर् खचर् नहीं बैठता।’ महिंद कालेज, गैल में भाषण, 24 नवंबर 1927, संपूणर् गांध्ी वाघ्मय, खण्ड 35‘मेरी दृष्िट में स्वस्थ शरीर वह है जो आत्मा का अंवुफश मानता है और उसकी सेवा के साध्न के रूप में सदा तैयार रहता है। मेरी राय में ऐसे शरीर पुफटबाॅल के मैदान में नहीं बनाये जाते। वे तो अनाज के खेतों और पफामो± में बनाये जाते हैं। मेरा आपसे अनुरोध् है कि आप इस संबंध् में विचार करें और आपको मैंने जो वुफछ कहा है उसकी सच्चाइर् के समथर्न में असंख्य उदाहरण मिल जायेंगे। हमारे उपनिवेशों में उत्पन्न भारतीय पुफटबाॅल और िकेट के इस उन्माद के प्रवाह में बह जाते हैं। वुफछ विशेष स्िथतियों में इन खेलों का अपना महत्व हो सकता है। आप इस सीध्ी - सादी बात पर विचार क्यों नहीं करते कि मानव जाति का बहुत बड़ा भाग जिनके शरीर और मस्ितष्क शक्ितशाली हैं, सिपर्फ किसान ही हैं, वे इन खेलों को जानते तक नहीं और वे ही संसार में सवर्श्रेष्ठ हंै।’ पत्रा: लाजरस को, 17 अप्रैल 1915, संपूणर् गांध्ी वाघ्मय, खण्ड 13नहीं रहे। हालाँकि नायडू भी इंग्लैंड के ख्िालाप़फ 1932 में शुरू होनेवाले पहले िकेट मैचों तक अपने पुराने प़फाॅमर् में नहीं थे, पर देश के पहले टेस्ट कप्तान के रूप में इतिहास में उनका नाम सुरक्ष्िात है। इस तरह भारत ने आशाद होने के डेढ़ दशक पहले ही टेस्ट िकेट में प्रवेश ले लिया था। ऐसा इसलिए संभव हुआ चूँकि 1877 में अपनी शुरुआत से ही टेस्ट िकेट बि्रटिश साम्राज्य के विभ्िान्न हिस्सों के बीच खेला जाता था न कि संप्रभु राष्ट्रों के बीच। पहला टेस्ट आॅस्ट्रेलिया व इंग्लैंड के बीच जब खेला गया तब आॅस्ट्रेलिया गोरों का उपनिवेश - भर था, स्वशासी डोमीनियन राज्य भी नहीं था। उसी तरह, वेस्ट इंडीश के नाम से जाने जानेवाले विभ्िान्न वैफरिबियाइर् देश दूसरे विश्वयु( के काप़फी बाद तक बि्रटिश उपनिवेश ही थे। 3.2 खेल और वि - औपनिवेशीकरण यूरोपीय साम्राज्यों से आशादी हासिल कर स्वतंत्रा राष्ट्रों के बनने की प्रिया को वि - औपनिवेशीकरण कहा जाता है। सन् 1947 में भारत की आशादी से शुरू होकर यह सिलसिला अगली आध्ी सदी तक चलता रहा। इस सिलसिले का असर व्यापार - वाण्िाज्य, सैन्य क्षेत्रा, अंतरार्ष्ट्रीय राजनीति और अंततः खेल में बि्रटेन के पतन के रूप में हुआ। लेकिन यह सब एकबारगी नहीं हुआ - िकेट संगठन में उत्तर - साम्राज्यवादी बि्रटेन के प्रभाव को कम होने में अच्छा - खासा वक्त लगा। भारत की आशादी से बि्रतानी साम्राज्य के खात्मे का बिगुल तो बज गया था, पर िकेट के अंतरार्ष्ट्रीय आयोजन पर साम्राज्यवादी िकेट काॅन्प्ऱेफन्स का नियंत्राण बरकरार रहा। आइर्सीसी पर, जिसका 1965 में नाम बदलकर इंटरनैशनल िकेट काॅन्प़े्रफन्स हो गया, इसके संस्थापक सदस्यों का वचर्स्व रहा, उन्हीं के हाथ में कायर्कलाप के वीटो अध्िकार रहे। इंग्लैंड व आॅस्ट्रेलिया के विशेषाध्िकार 1989 में जाकर खत्म हुए और वे अब सामान्य सदस्य रह गए। पिछली सदी के 50 व 60 के दशक में विश्व िकेट के मिशाज का पता इस बात से मिलता है कि इंग्लैंड तथा काॅमनवेल्थ के दूसरे देशों - आॅस्ट्रेलिया व न्यूशीलैंड - ने दक्ष्िाण अप़्रफीका जैसे देश के साथ िकेट खेलना जारी रखा, जहाँ न सिप़र्फ नीतिगत तौर पर नस्ली भेदभाव बरता जाता था, बल्िक टेस्ट मैचों में अश्वेतों ;द. अप़फीका की बहुमत आबादीद्ध को खेलने की मनाही ्रथी। भारत, पाकिस्तान व वेस्ट इंडीश ने हालाँकि दक्ष्िाण अप़फीका का ्रबहिष्कार किया, लेकिन अंतरार्ष्ट्रीय िकेट परिषद् ;आइर्सीसीद्ध में उनकी इतनी ताकत नहीं थी कि उसे खेल से प्रतिबंध्ित कर दें। यह तभी हो पाया जब एश्िाया व अप़्रफीका में उपनिवेशवाद से नए आशाद हुए देशों ने और साथ में बि्रटेन की उदारवादी हवा ने अंग्रेशी िकेट अध्िकारियों पर दबाव डालकर 1970 में बि्रटेन के दक्ष्िाण अप़फीकी दौरे को रद्द करवाने में ्रकामयाबी पायी। 4 आज के दौर में व्यापार, मीडिया और िकेट िकेट 1970 के दशक में काप़फी बदल गयाः यह ऐसा दौर था जिसमें इस पारंपरिक खेल ने बदलते शमाने के साथ खुद को ढाल लिया। अगर 1970 में दक्ष्िाण अप़्रफीका को िकेट से बहिष्कृत किया गया, तो 1971 को इसलिए याद किया जाएगा चूँकि इस साल इंग्लैंड व आॅस्ट्रेलिया के बीच सबसे पहला एकदिवसीय मैच मेलबनर् में खेला गया। िकेट का यह छोटा संस्करण इतना लोकपि्रय हुआ कि 1975 में पहला विश्व कप खेला गया और सपफल रहा। पिफर 1977 में, जब िकेट टेस्ट मैचों की सौवीं जयंती मना रहा था, तो खेल हमेशा के लिए बदल गया। इस बदलाव में किसी ख्िालाड़ी या प्रशासक का नहीं, बल्िक एक व्यवसायी का हाथ था। केरी पैकर नामक आॅस्ट्रेलियाइर् टेलीविशन मुग़ल ने िकेट के प्रसारण की बाशारी संभावनाओं को भाँपकर दुनिया के 51 बेहतरीन ख्िालाडि़यों को उनके बोडर् की मशीर् के ख्िालाप़फ अनुबंध् पर ले लिया और दो सालों तक वल्डर् सीरीश िकेट के नाम से समांतर, ग़ैर - अध्िकृत ‘टेस्ट’ व ‘एकदिवसीय’ खेलों का आयोजन किया। पैकर का यह ‘सवर्फस’ ;इसे तब यही कहा जाता थाद्ध दो सालों के बाद पैक हो गया, लेकिन टेलीविशन दशर्कों को लुभाने के लिए उसके द्वारा किए गए बदलाव स्थायी साबित हुए, और इससे खेल का रंग - ढंग ही बदल गया। रंगीन वदीर्, हिप़फाशती हेल्मेट, क्षेत्रारक्षण की पाबंदियाँ, रौशनी जलाकर रात को िकेट खेलना, आदि वुफछ ऐसी चीशें हैं जो पैकर के बाद िकेट का स्थायी हिस्सा बन गए। सबसे अहम बात, पैकर ने शाहिर कर दिया कि िकेट का बाशार है और इसे बेचकर बहुत पैसे कमाये जा सकते हैं। टेलीविशन कंपनियों को टेलीविशन प्रसारण का अध्िकार बेचकर िकेट बोडर् अमीर हो गए। टेलीविशन कंपनियों ने विज्ञापन - समय व्यावसायिक कंपनियों को बेचे, जिन्हें इतना बड़ा दशर्क - समूह और कहाँ मिलता! निरंतर टीवी कवरेज के बाद िकेटर सेलेबि्रटी बन गए और उन्हें अपने िकेट बोडर् से तो श्यादा वेतन मिलने ही लगा, पर उससे भी बड़ी कमाइर् के साधन टायर से लेकर कोला तक के टीवी विज्ञापन हो गए। टीवी प्रसारण से िकेट बदल गया। इसके शरिए िकेट की पहुँच छोटे शहरों व गाँवों के दशर्कों तक हो गइर्। िकेट का सामाजिक आधर भी व्यापक हुआ। महानगरों से दूर रहनेवाले बच्चे जो कभी बड़े मैच नहीं देख पाते थे, अब अपने नायकों को देखकर सीख सकते हैं। उपग्रह ;सैटेलाइटद्ध टीवी की तकनीक और बहु - राष्ट्रीय कंपनियों की दुनिया भर की पहुँच के चलते िकेट का वैश्िवक बाशार बन गया। सिडनी में चल रहे मैच को अब सीध्े सूरत में देखा जा सकता था। इस मामूली बात ने िकेट की सत्ता का वेंफद्र ही बदल दियाः जिस प्रिया की शुरुआत बि्रटिश साम्राज्य के पतन से हुइर् थी, वह वैश्वीकरण में अपने ताकिर्क Úी दुबइर् में आना स्वाभाविक लगता है।़लंदन से टैक्स - अंजाम तक पहुँची। चूँकि भारत में खेल के सबसे श्यादा दशर्क थे और यह िकेट खेलने वाले देशों में सबसे बड़ा बाशार था, इसलिए खेल का गुरुत्व केन्द्र दक्ष्िाण एश्िाया हो गया। प्रतीकात्मक तौर पर आइर्सीसी मुख्यालय का अंग्रेशी - आॅस्ट्रेलियाइर् ध्ुरी से गुरुत्व केन्द्र के ख्िासकने की एक और निशानी ये है कि हाल के वषो± में िकेट के नए तकनीकी प्रयोग भारतीय उपमहाद्वीप के ख्िालाडि़यों ने शुरू किए हैं। पाकिस्तान ने गेंदबाशी को ‘दूसरा’ व ‘रिवसर् - स्िवंग’ नाम के दो अहम हथ्िायार दिए। ये दोनों इर्जाद महाद्वीपीय स्िथतियों की उपज हैं। ‘दूसरा’ इसलिए कि भारी बल्लों से आक्रामक बल्लेबाशी करनेवाले ख्िालाड़ी उँगलियों की स्िपन को बेकार साबित किए दे रहे थे और ‘रिवसर् स्िवंग’ इसलिए कि खुली ध्ूप में, ध्ूल उड़ाती, बेजान पिचों पर तेश गेंदें घुमाइर् जा सवेंफ। इन दोनों प्रयोगों को शुरू - शुरू में इंग्लैंड व आॅस्ट्रेलिया जैसे देशों ने शक की नशर से देखा, उन्हें लगा कि ये तो चोरी - छिपे िकेट के नियमों के साथ ख्िालवाड़ किया जा रहा है। वक्त के साथ यह मान लिया गया कि िकेट के कानून सिपर्फ आॅस्ट्रेलियाइर् या अंग्रेशी स्िथतियों के मुताबिक नहीं बनाए जा सकते और इन जुगाड़ों को पूरी दुनिया के गेंदबाशों ने अपना लिया। लगभग 150 साल पहले भारत के अग्रणी िकेटरों - पारसियों - को खेल के मैदान के लिए संघषर् करना पड़ा था। आज वैश्िवक बाशार ने हिन्दुस्तानी िकेटरों को खेल का सबसे मशहूर और अमीर ख्िालाड़ी बना दिया है, पूरी दुनिया जैसे अब उनका रंगमंच हो गया है। इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे वुफछ छोटे - मोटे कारण भी थेः शौकिया जेंट्लमेन की जगह वेतनभोगी पेशेवरों का आना, लोकपि्रयता में टेस्ट मैच िकेट का एकदिवसीय मैचों द्वारा पछाड़ दिया जाना और वैश्िवक वाण्िाज्य व प्रौद्योगिकी में अहम बदलावों का होना। वक्त के साथ परिवतर्न को समझना ही इतिहास का काम है। इस अध्याय में हमने एक औपनिवेश्िाक खेल के इतिहास के शरिए इसके विस्तार को समझा और यह भी कि उपनिवेशोत्तर शमाने में इसने खुद को वैफसे ढाला। नए शब्द उपनिवेशोत्तर: उपनिवेश$उत्तरत्र आशादी के बाद। बाॅक्स 2 हाॅकी, भारत का राष्ट्रीय खेल आधुनिक हाॅकी का उदय एक शमाने में बि्रटेन में बड़े पैमाने पर खेले जाने वाले परंपरागत खेलों से हुआ है। स्काॅटलैंड में खेले जाने वाले खेल श्िांटी और इंग्िलश एवं वेल्श खेल बेंडी व आइरिश हलि±ग को हाॅकी का पूवर्ज माना जा सकता है। बहुत सारे दूसरे आधुनिक खेलों की तरह हमारे यहाँ भी हाॅकी की शुरुआत औपनिवेश्िाक काल में बि्रटिश सेना द्वारा ही की गइर् थी। पहले हाॅकी क्लब की स्थापना 1885 - 1886 में कलकत्ता में हुइर्। ओलम्िपक खेलों की हाॅकी प्रतिस्पधार् में भारत को पहली बार 1928 में शामिल किया गया था। इस प्रतिस्पधार् में आॅस्िट्रया, जमर्नी, डेनमाकर् और स्िवट्शरलैंड को हराते हुए भारत पफाइनल तक जा पहुँचा। प़्ाफाइनल में भारत ने हाॅलैंड को ़भी शून्य के मुकाबले तीन गोल से मात दे दी। हाॅकी के जादूगर ध्यानचंद जैसे ख्िालाडि़यों के खेल - कौशल और तीक्ष्णता ने हमारे देश को ओलम्िपक के कइर् स्वणर् पदक दिलाए। 1928 से 1956 के बीच भारतीय टीम ने लगातार छः ओलम्िपक खेलों में स्वणर् पदक जीता था। हाॅकी की दुनिया में भारतीय वचर्स्व के इस स्वणर् युग में भारत ने ओलम्िपक में वुफल 24 मैच खेले और सभी में सपफलता प्राप्त की। इन मैचों में भारतीय ख्िालाडि़यों ने 178 गोल ;प्रति मैच औसतन 7.43 गोलद्ध दागे और विपक्षी टीमें उनके ख्िालापफ केवल 7 ही गोल कर पायीं। हाॅकी में भारत को बाकी दो स्वणर् पदक 1964 के टोकियो ओलम्िपक और 1980 ़के मास्को ओलम्िपक में प्राप्त हुए थे। बाॅक्स 3 पोलो को सेना और भागदौड़ के माहिर नौजवानों के लिए अच्छा खेल माना जाता था। इंग्लैंड के पुराने खेलों में से एक का विश्लेषण करते हुए इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़ ने दावा किया था: ‘कसरत के तौर पर ... इस साहसिक और गरिमापूणर् खेल से सैनिकों को बल्लम व तलवार के या अन्य सैन्य हथ्िायारों के इस्तेमाल में और श्यादा दक्षता प्राप्त हो सकती है। इसके साथ ही उन्हें रकाब में और मशबूती से जमे रहने तथा पलक झपकते दाहिने या बाएँ मुड़ने का अभ्यास भी होगा जो कि यु( के मोचेर् पर बेहद उपयोगी साबित होगा।’ इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूश, 1872 से उ(ृत। चित्रा 15 - पोलो का खेल भी औपनिवेश्िाक अिाकारियों ने ही विकसित किया था और जल्दी ही उसे भारी लोकपि्रयता मिलने लगी। िकेट बि्रटेन से भारत आया था जबकि पोलो जैसे कुछ खेल उपनिवेशों में विकसित हुए और बाद में उन्हें बि्रटेन में भी खेला जाने लगा जिससे वहाँ खेलों का स्वरूप भी प्रभावित हुआ। इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूश, 20 जुलाइर् 1872 से। ियाकलाप प्रश्न

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