किसान और काश्तकार पिछले दो अध्यायों में आप वनों और चरागाहों के बारे में पढ़ रहे थे, और उनके बारे में भी जो इन ड्डोतों से रोशी - रोटी अजिर्त करते हैं। आपने झूम खेती करने वालों, चरवाहों और जनजातीय समूहों के बारे में भी पढ़ा। आपने जाना कि किस तरह वनों और चरागाहों को आधुनिक सरकारों ने नियंत्रिात करना शुरू किया और उनकी पाबंदियों से उन पर भी असर पड़ा जो इन संसाधनों पर आश्रित थे। इस अध्याय में आप विभ्िान्न देशों के खेतिहर समुदायों के बारे में पढ़ेंगे। यहाँ एक ओर इंग्लैंड के छोटे किसानों ;काॅटेजरद्ध, अमेरिका के गेहूँ उत्पादकों और बंगाल के अप़्ाफीम उत्पादक किसानों के बारे में जानकारी हासिल करेंगे वहीं दूसरी तरपफ आप जानेंगे कि आधुनिक खेती की शुरुआत़का विभ्िान्न देहाती समूहों पर क्या प्रभाव पड़ा। यह भी कि विश्वव्यापी पूँजीवादी बाशार से जुड़ने का दुनिया के अलग - अलग इलाकों पर क्या प्रभाव पड़ता है। इन विभ्िान्न स्थानों की तुलना से आप यह जान पाएँगे कि इन स्थानों का इतिहास एक - दूसरे से भ्िान्न होते हुए भी एक प्रिया के रूप में कितना मिलता - जुलता रहा है। आइए इस सपफर की शुरुआत इंग्लैंड से ही करें जहाँ कृष्िा क्रांति ने़पहली दस्तक दी थी। इंग्लैंड में आधुनिक खेती की शुरुआत पहली जून 1830 की घटना है। इंग्लैंड के उत्तर - पश्िचमी क्षेत्रा के एक किसान नए शब्द ने अचानक पाया कि उसके बाड़े में रात को आग लगने से पुआल सहित सारा बाड़ाबंदीः पारंपरिक खुली शमीनों पर निजीखलिहान जलकर राख हो गया है। बाद के महीनों में इस तरह की घटनाएँ कइर् बाड़ लगाने की ऐतिहासिक प्रवि्रफया।दूसरे िालों में भी दजर् की गईंार्फ पुआल जल जाती और कहीं तो ़। कहीं सिप्काॅमन्सः पारंपरिक समाजों में साझा, सामुदायिकपूरा का पूरा पफामर्हाउफस ही स्वाहा हो जाता था। पिफर 28 अगस्त 1830 के ़दिन इंग्लैंड के इर्स्ट वेंफट में मशदूरों ने एक थ्रेश्िांग मशीन को तोड़ कर नष्ट कर दिया। इसके बाद दो साल तक दंगों का दौर चला जिसमें तोड़ - पफोड़ की ये घटनाएँ±पूरे दक्ष्िाणी इंग्लैंड में पैफल गइ। इस दौरान लगभग 387 थ्रेश्िांग मशीनें तोड़ी गईं। किसानों को धमकी भरे पत्रा मिलने लगे कि वे इन मशीनों का इस्तेमाल करना बंद कर दें क्योंकि इनके कारण मेहनतकशों की रोशी छिन गइर् है। श्यादातर खतों पर ‘वैफप्टेन स्िवंग’ नाम के किसी आदमी के दस्तखत होते थे। शमींदारों को यह खतरा सताने लगा कि कहीं हथ्िायारबंद गिरोह रात में उन पर भी हमला न बोल दें। इस चक्कर में बहुत सारे शमींदारों ने तो अपनी मशीनें खुद ही तोड़ डालीं। जवाब में सरकार ने सख्त कारर्वाइर् की। जिन जल - जंगल - शमीन। लोगों पर शक था कि वे दंगे में लिप्त हैं उन्हें प़्फ्रतार कर लिया गया।़ाफौरन गिर1976 लोगों पर मुकदमा चला, 9 को पफाँसी दी गइर् और 505 को देश निकाला दिया गया जिनमें से 450 को आॅस्ट्रेलिया भेज दिया गया। लगभग 644 लोगों को बंदी बनाया गया। इन खतों में मौजूद ‘वैफप्टेन स्िवंग’ एक मिथकीय नाम था। तो स्िवंग के नाम पर दंगे करने वाले आख्िार थे कौन? वे थ्रेश्िांग मशीनों को तोड़ने पर क्यों आमादा थे? वे किस बात का विरोध कर रहे थे? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के दौरान इंग्लैंड की खेती में आए बदलाव को देखना होगा। 1.1 खुले खेतों और काॅमन्स का दौर अठारहवीं सदी के अंतिम वषो± और उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर में इंग्लैंड के देहाती इलाकों में नाटकीय बदलाव हुए। पहले इंग्लैंड का ग्रामीण क्षेत्रा कापफी खुला - खुला हुआ करता था। न तो शमीन भूस्वामियों की निजी़संपिा थी और न ही उसकी बाड़ाबंदी की गइर् थी। किसान अपने गाँव के आसपास की शमीन पर प़्ाफसल उगाते थे। साल की शुरुआत में एक सभा बुलाइर् जाती थी जिसमें गाँव के हर व्यक्ित को शमीन के टुकड़े आवंटित कर दिए जाते थे। शमीन के ये टुकड़े समान रूप से उपजाउफ नहीं होते थे और कइर् जगह बिखरे होते थे। कोश्िाश यह होती थी कि हर किसान को अच्छी और खराब, दोनों तरह की शमीन मिले। खेती की इस शमीन के परे साझा शमीन होती थी। काॅमन्स की इस साझा शमीन पर सारे ग्रामीणों का हक होता था। यहाँ वे अपने मवेशी और भेड़ - बकरियाँ चराते थे, जलावन की ड्डोत क ये धमकी भरे खत काप़्ाफी बड़े पैमाने पर भेजे जाते थे। कइर् बार इन खतों की भाषा कापफी शालीन होती थी जबकि कइर् बार बहुत कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाता था। वुफछ पत्रा बहुत छोटे होते थे। देखें एक नमूना: श्रीमान हम आपको यह बताना चाहते हैं कि अगर आपने अपनी थ्रेश्िांग मशीन खुद नहीं तोड़ी तो हम अपने लोगों को भेज कर यह काम कराएँगे। सब लोगों की ओर से स्िवंग इ.जे. हाॅब्सबाॅम और जाॅजर् रूदे, वैफप्टेन स्िवंग से। लकडि़याँ बीनते थे और खाने के लिए कंद - मूल - पफल इकट्ठा करते थे। जंगल ड्डोत ख में वे श्िाकार करते और नदियों, ताल - तलैयों में मछली पकड़ते। गरीबों के लिए स्िवंग की ओर से सख्त भाषा में भेजे गए खत का एकतो यह साझा शमीन िांदा रहने का बुनियादी साधन थी। इसी शमीन के बल पर नमूना: वे लोग अपनी आय में कमी को पूरा करते, अपने जानवरों को पालते। जब किसी ़साल पफसल चैपट हो जाती तो यही शमीन उन्हें संकट से उबारती थी। इंग्लैंड के वुफछ हिस्सों में खुले खेतों और मुक्त और साझी शमीन की यह अथर्व्यवस्था सोलहवीं शताब्दी से ही बदलने लगी थी। सोलहवीं सदी में जब ऊन के दाम विश्व बाशार में चढ़ने लगे तो संपन्न किसान लाभ कमाने के लिए ऊन का उत्पादन बढ़ाने की कोश्िाश करने लगे। इसके लिए उन्हें भेड़ों की नस्ल सुधारने और बेहतर चरागाहों की आवश्यकता हुइर्। नतीजा यह हुआ कि साझा शमीन को काट - छाँट कर घेरना शुरू कर दिया गया ताकि एक की संपिा दूसरे से या साझा शमीन से अलग हो जाए। साझा शमीन पर झोपडि़याँ डाल कर रहने वाले ग्रामीणों को उन्होंने निकाल बाहर किया और बाड़ाबंद खेतों में उनका प्रवेश निष्िा( कर दिया गया। यह बाड़ाबंदी की शुरुआत थी। अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक बाड़ाबंदी आंदोलन की रफ्ऱतार कापफी धीमी रही। शुरू में गिने - चुने भूस्वामियों ने अपनी पहल पर ही बाड़ाबंदी की थी। इसके पीछे राज्य या चचर् का हाथ नहीं था। लेकिन अठारहवीं सदी के दूसरे हिस्से में बाड़ाबंदी आंदोलन इंग्लैंड के पूरे देहात में पफैल गया और इसने इंग्लैंड के भूदृश्य को आमूल बदलकर रख दिया। 1750 से 1850 के बीच 60 लाख एकड़ शमीन पर बाड़ें लगाइर् गइर्ं। बि्रटेन की संसद ने सिय भूमिका निभाते हुए इन बाड़ों को वैधता प्रदान करने के लिए 4,000 कानून पारित किए। श्रीमान, आपका नाम ब्लैक बुक में दजर् ब्लैक हाट्र्स की सूची में रखा गया है। आप और आप जैसे अन्य लोगों को सलाह दी जाती है ... कि अपना इरादा बताएँ। आप हर अवसर पर जनता के विरोधी रहे हो। आपको जैसा करना चाहिए था अभी तक आपने वैसा किया नहीं है। स्िवंग चित्रा 1 - वैफप्टेन स्िवंग आंदोलन ;1830 - 32द्ध के दौरान इंग्लैंड की विभ्िान्न काउंटियों में तोड़ी गइर् थ्रेश्िांग मशीनें.इर्.जे.हाॅब्सबाॅम तथा जाॅजर् रूदे की पुस्तक वैफप्टेन स्िवंग पर आधारित। 1.2 अनाज की बढ़ती माँग शमीन को बाड़ाबंद करने की ऐसी जल्दबाशी क्यों थी? और, इन बाड़ों का मतलब क्या था? नए बाड़े पुराने बाड़ों से भ्िान्न थे। जहाँ सोलहवीं शताब्दी के बाड़ों में भेड़ पालन का विकास किया गया, वहीं अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वषो± में बाड़ाबंदी का उद्देश्य अनाज उत्पादन बढ़ाना हो गया, और इसका संदभर् भी अलग था - एक नए दौर का सूचक। अठारहवीं शताब्दी के मध्य से इंग्लैंड की आबादी तेशी से बढ़ी। 1750 से 1900 के बीच इंग्लैंड की आबादी चार गुना बढ़ गइर्। 1750 में वुफल आबादी 70 लाख थी जो 1850 में 2.1 करोड़ और 1900 में 3 करोड़ तक जा पहुँची। शाहिर है कि अब श्यादा अनाज की शरूरत थी। इसी दौर में इंग्लैंड का औद्योगीकरण भी होने लगा था। बहुत सारे लोग रहने और काम करने के लिए गाँव से शहरों का रुख करने लगे थे। खाद्यान्नों के लिए वह बाशार पर निभर्र होते गए। इस तरह जैसे - जैसे शहरी आबादी बढ़ी वैसे - वैसे खाद्यान्नों का बाशार भी पफैलता गया और खाद्यान्नों की माँग के साथ उनके दाम भी बढ़ने लगे। अठारहवीं सदी के अंत में प्ऱफांस और इंग्लैंड के बीच यु( शुरू हो गया। इसकी वजह से यूरोपीय खाद्यान्नों के आयात सहित व्यापार बािात हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि इंग्लैंड में खाद्यान्नों के दाम आसमान छूने लगे। इससे उत्साहित होकर भूस्वामी अपनी बाड़ाबंद शमीन में बड़े पैमाने पर अनाज उगाने लगे। उनकी तिजोरियाँ भरने लगीं और उन्होंने बाड़ाबंदी कानून पारित करने के लिए संसद पर दबाव डालना शुरू कर दिया। नए शब्द बुशेल: क्षमता की माप श्िालिंग: इंग्लैंड की एक मुद्रा का नाम। 20 श्िालिंग त्र 1 पौंड ियाकलाप ग्रापफ को ध्यानपूवर्क देखें। गौर करें कि मूल्य रेखा़1790 के दौरान किस प्रकार तेशी से ऊपर उठती है और 1815 के बाद नाटकीय ढंग से नीचे गिरने लगती है। क्या आप ग्राप़्ाफ की इन रेखाओं में आए इन उतार - चढ़ावों के कारणों का पता लगा सकते हैं। चित्रा 3 - उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में सपफोक का देहाती इलाका़अंग्रेश चित्राकार जाॅन काॅन्सटेबल की कृति। काॅन्सटेबल के पिता अनाज के बड़े व्यापारी थे। काॅन्सटेबल का बचपन पूवीर् इंग्लैंड के ग्रामीण क्षेत्रा सपफोक में बीता। इस क्षेत्रा में बाड़ाबंदी का काम उन्नीसवीं सदी से कापफी पहले पूरा हो चुका था। काॅन्सटेबल के चित्रा देहात के खुले जीवन को बड़े भावपूणर् ढंग से उकेरते हैं। उनके चित्रा हमें एक ऐसे दौर से परिचित कराते ़हैं जब देहात का सीधा, सरल और खुशनुमा जीवन अतीत की बात बनता जा रहा था और खुले खेतों की बाड़ाबंदी की जा रही थी। इस चित्रा में हम खेेतों पर लगी बाड़ें देख सकते हैं। लेकिन इससे हमें यह पता नहीं चलता कि तत्कालीन भूदृश्य वैफसे बदलता जा रहा था। काॅन्सटेबल के चित्रों में हमें आमतौर पर मेहनतकश जनता दिखाइर् नहीं देती। चित्रा 1 पर नशर डालने से पता चलता है कि सपफोक ऐसे इलाकों से घ्िारा हुआ था जहाँ स्िवंग दंगों के दौरान बड़े पैमाने पर थ्रेश्िांग मशीनें तोड़ी गइर् थीं। ़़1.3 बाड़ाबंदी का युग इंग्लैंड के इतिहास में 1780 का दशक पहले के किसी भी दौर से श्यादा नाटकीय दिखाइर् देता है। इससे पहले अकसर यह होता था कि आबादी बढ़ने से खाद्यान्न का संकट गहरा जाता था। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में इंग्लैंड में ऐसा नहीं हुआ। जिस तेशी से आबादी बढ़ी, उसी हिसाब से खाद्यान्न उत्पादन भी बढ़ा। जनसंख्या वृि की तेश रफ्ऱतार के बावजूद 1868 में खाद्यान्न की अपनी शरूरतों का अस्सी प्रतिशत इंग्लैंड खुद पैदा कर रहा था। बाकी का आयात किया जा रहा था। खाद्यान्न उत्पादन में हुइर् यह वृि खेती की तकनीक में हुए किसी नए बदलाव का परिणाम नहीं थी। बल्िक हुआ सिप़्ार्फ यह कि नइर् - नइर् शमीन पर खेती की जाने लगी। भूस्वामियों ने मुक्त खेतों, सावर्जनिक जंगलों, दलदली शमीन और चरागाहों को काट - छाँट कर बड़े - बड़े खेत बना लिए थे। इस समय तक किसान खेती में उन्हीं सरल तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे थे जो अठारहवीं सदी के प्रारंभ में बड़े पैमाने पर प्रचलित थीं। 1660 के दशक में इंग्लैंड के कइर् हिस्सों में किसान शलजम और तिपतिया घास ;क्लोवरद्ध की खेती करने लगे थे। उन्हें जल्द ही अहसास हो गया कि इन चित्रा 4 - संसदीय कानूनों के तहत सावर्जनिक भूमि की बाड़ाबंदी: अठारहवीं - उन्नीसवीं सदी.इर्.जे.हाॅब्सबाॅम तथा जाॅजर् रूदे की पुस्तक वैफप्टेन स्िवंग पर आधारित। प़्ाफसलों से शमीन की पैदावार बढ़ती है। पिफर, शलजम को पशु भी बड़े चाव से खाते थे। इसलिए वे शलजम और तिपतिया घास की खेती नियमित रूप से करने लगे। बाद के अध्ययनों से पता चला कि इन पफसलों से शमीन में ़नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है जो पफसल वृि के लिए महत्त्वपूणर् थी। ़असल में लगातार खेती करने से शमीन में नाइट्रोजन की मात्रा घट जाती है जिसके कारण शमीन की उवर्रता भी कम होने लगती है। शलजम और तिपतिया घास की खेती से शमीन में नाइट्रोजन की मात्रा पिफर से बढ़ जाती थी और शमीन पिफर उपजाउफ हो जाती थी। इस तरह उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ्िाक वषो± में खेती में सुधार लाने के लिए किसान इन्हीं सरल तरीकों का नियमित रूप से इस्तेमाल करने लगे थे। अब बाड़ाबंदी को एक दीघर्कालिक निवेश के रूप में देखा जाने लगा था और मिट्टी की उवर्रता बढ़ाने के लिए लोग बदल - बदल कर प़्ाफसलें बोने लगे थे। बाड़ाबंदी से अमीर भूस्वामियों को अपनी जोत बढ़ाने और बाशार के लिए पहले से श्यादा उत्पादन करने की सहूलियत मिली। 1.4 गरीबों पर क्या बीती ? बाड़ाबंदी ने भूस्वामियों की तिजोरियाँ भर दीं। पर उन लोगों का क्या हुआ जो रोशी - रोटी के लिए काॅमन्स पर ही आश्रित थे? बाड़ लगने से बाड़े के भीतर की शमीन भूस्वामी की निजी संपिा बन जाती थी। गरीब अब न तो जंगल से जलावन की लकड़ी बटोर सकते थे और न ही साझा शमीन पर अपने पशु चरा सकते थे। वे न तो सेब या कंद - मूल बीन सकते थे और न ही गोश्त के लिए श्िाकार कर सकते थे। अब उनके पास प़्ाफसल कटाइर् के बाद बची ठूंठों को बटोरने का विकल्प भी नहीं रह गया था। हर चीश पर जमींदारों का कब्शा हो गया, हर चीश बिकने लगी और वह भी ऐसी कीमतों पर कि जिन्हें अदा करने की सामथ्यर् गरीबों के पास नहीं थी। जहाँ कहीं बड़े पैमाने पर बाड़ाबंदी हुइर्, खासतौर पर इंग्लैंड के मध्यवतीर् क्षेत्रों और आसपास के प्रांतों ;काउंटियोंद्ध में, वहाँ गरीबों को शमीन से बेदखल कर दिया गया। उनके पारंपरिक अिाकार धीरे - धीरे खत्म होते गए। अपने अिाकारों से वंचित और शमीन से बेदखल होकर वे नए रोशगार की तलाश में दर - दर भटकने लगे। मध्यवतीर् क्षेत्रों से वे दक्ष्िाणी प्रांतों की ओर जाने लगे। मध्य क्षेत्रा में सबसे सघन खेती होती थी और वहाँ खेतिहर मशदूरों की भारी माँग थी। लेकिन अब कहीं भी गरीबों को एक सुरक्ष्िात और नियमित रोशगार नहीं मिल पा रहा था। पुराने शमाने में आमतौर पर मशदूर भूस्वामियों के साथ ही रहा करते थे। वे मालिकों के साथ खाना खाते और साल भर उनकी सेवा - टहल करते थे। यह रिवाज 1800 तक आते - आते समाप्त होने लगा था। अब मशदूरों को काम के बदले दिहाड़ी दी जाती थी और काम भी केवल कटाइर् के दौरान ही होता था। जमींदार अपना मुनापफा बढ़ाने के लिए मशदूरों की दिहाड़ी की़मद में कटौती करने लगे। काम अनिश्िचत, रोशगार असुरक्ष्िात और आय अस्िथर हो गइर्। वषर् के बड़े हिस्से में गरीब बेरोशगार रहने लगे। ियाकलाप औरतों और बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ा? गो - पालन, जलावन की लकड़ी बीनने, सावर्जनिक भूमि पर पफलों और बेरियों को इकट्ठा करने का काम पहले अकसर औरतें और बच्चे करते थे। क्या आप बता सकते हैं कि बाड़ाबंदी का बच्चों और स्ित्रायों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? सावर्जनिक भूमि की समाप्ित का परिवार के भीतर स्त्राी - पुरुष और बच्चों के आपसी संबंधों पर क्या असर हुआ होगा? 1.5 थ्रेश्िांग मशीन का आगमन जिन दिनों नेपोलियन इंग्लैंड के विरु( यु( छेड़े हुए था, उन दिनों खाद्यान्न के भाव कापफी ऊँचे थे और काश्तकारों ने जमकर अपना उत्पादन बढ़ाया।़मशदूरों की कमी के डर से उन्होंने बाशार में नइर् - नइर् आइर् थे्रश्िांग मशीनों को खरीदना शुरू कर दिया। काश्तकार अकसर मशदूरों के आलस, शराबखोरी और मेहनत से जी चुराने की श्िाकायत किया करते थे। उन्हें लगा कि मशीनों से मशदूरों पर उनकी निभर्रता कम हो जाएगी। यु( समाप्त होने के बाद बहुत सारे सैनिक अपने गाँव और खेत - खलिहान में वापस लौट आए। अब उन्हें नए रोशगार की शरूरत थी। लेकिन उसी समय यूरोप से अनाज का आयात बढ़ने लगा, उसके दाम कम हो गए और कृष्िा मंदी छा गइर् ;चित्रा 2 में कीमतों का ग्रापफ देखेंद्ध। बेचैन होकऱभूस्वामियों ने खेती की शमीन को कम करना शुरू कर दिया और माँग करने लगे कि अनाज का आयात रोका जाए। उन्होंने मशदूरों की दिहाड़ी और संख्या कम करनी शुरू कर दी। गरीब और बेरोशगार लोग काम की तलाश में गाँव - गाँव भटकते थे और जिनके पास अस्थायी - सा कोइर् काम था, उन्हें भी आजीविका खो जाने की आशंका रहती थी। यही वह दौर था जब देहात में वैफप्टेन स्िवंग वाले दंगे पैफले। गरीबों की नशर में थ्रेश्िांग मशीन बुरे वक्त की निशानी बन कर आइर्। निष्कषर् इस तरह इंग्लैंड में आधुनिक खेती के आगमन से कइर् तरह के बदलाव आए। मुक्त खेत समाप्त हो गए और किसानों के पारंपरिक अिाकार भी जाते रहे। अमीर किसानों ने पैदावार में वृि और अनाज को बाशार में बेच कर मोटा मुनाप़्ाफा कमाया और ताकतवर हो गए। गाँव के गरीब बड़ी संख्या में शहरों की ओर पलायन करने लगे। वुफछ लोग मध्यवतीर् क्षेत्रों को छोड़कर दक्ष्िाणी प्रांतों का रुख करने लगे जहाँ रोशगार की संभावना बेहतर थी तो वुफछ अन्य शहरों की ओर चल पड़े। मशदूरों की आय का ठिकाना न रहा, रोशगार असुरक्ष्िात और आजीविका के ड्डोत अस्िथर हो गए। ड्डोत ग बाड़ाबंदी के कारण सावर्जनिक शमीन पर अिाकार समाप्त होने से एक किसान ने स्थानीय शमींदार को यह पत्रा लिखा था: ‘अगर कोइर् गरीब आदमी सावर्जनिक शमीन से आपकी एक भेड़ ले ले तो कानून उसके ख्िालाप़्ाफ खड़ा हो जाएगा। लेकिन अगर आप सैकड़ों गरीबों की भेड़ - बकरियों के चरने की शमीन छीन लेते हैं तो कानून वुफछ नहीं करता। अगर गरीब आदमी आपसे कोइर् चीश छीन ले तो उसको पफाँसी दे दी जाती है जबकि अगर आप उस व्यक्ित की आजीविका छीन लें तो आपके ख्िालापफ कोइर् कारर्वाइर् नहीं की जाती...। गरीब इस बात को किस तरह समझें... कि कानून उनकी पहुँच से बाहर है और सरकार उनके लिए वुफछ नहीं करती’? जे.एम.नीसन, काॅमनसर्: काॅमन राइट्स, एनक्लोशसर् एण्ड सोशल चेंज, 1700 - 1820 ;1993द्ध से उ(ृत। ड्डोत घ इसके विपरीत बहुत से लेखकों ने बाड़ाबंदी के लाभों की भूरि - भूरि प्रशंसा की है। ‘खुले खेतों और बाड़ाबंदी की शमीन के बीच कोइर् तुलना नहीं की जा सकती। बाड़ाबंदी की व्यवस्था निश्िचत रूप से खुले खेतों से बेहतर है। खुले खेतों के मामले में खेतिहर शंजीरों में जकड़ा रहता है। वह मिट्टी या मूल्यों में कोइर् बदलाव नहीं ला सकता। उसकी हालत उस घोड़े जैसी होती है जो अन्य घोड़ों के साथ बंधा होता है। यानी वह उनसे अलग होकर वुफछ नहीं कर सकता और उनके बीच ही वूफद - पफांद कर सकता है’। जाॅन मिडिल्टन, अठाहरवीं शताब्दी के एक लेखक। ियाकलाप ड्डोत ग और घ को पढ़ें और निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर दें: ऽ ड्डोत ग में किसान क्या कहना चाहता है? ऽ जाॅन मिडिल्टन क्या दलील देना चाहते हैं? ऽ खंड 1.1 से 1.4 तक दोबारा पढ़ें और खुले खेतों के पक्ष और विपक्ष में दिए गए तको± का सार - संक्षेप प्रस्तुत करें। आप किस तवर्फ को श्यादा उचित समझते हैं? ‘रोटी की टोकरी’ और रेतीला बंजर आइए अब जरा अटलांटिक के पार अमेरिका चलें। आइए देखें कि यहाँ आधुनिक खेती का विकास वैफसे हुआ, किस तरह अमेरिका दुनिया की ‘रोटी की टोकरी’ ;ब्रेड बास्केटद्ध बनकर उभरा और इन बदलावों का अमेरिका के ग्रामीणों पर क्या प्रभाव पड़ा? जब अठारहवीं सदी के अंत में इंग्लैंड में साझा शमीन को बाड़ाबंद किया जा रहा था उस समय तक अमेरिका में बड़े पैमाने पर स्थायी खेती का विकास नहीं हुआ था। यहाँ 80 करोड़ एकड़ भूमि पर जंगल थे और 60 करोड़ एकड़ भूमि पर सिपर्फ घास उगती थी। चित्रा 5 से आप उस समय़की प्राकृतिक हरियाली के बारे में अंदाशा लगा सकते हैं। उस समय अमेरिकी भूदृश्य का श्यादातर हिस्सा श्वेत अमेरिकियों के नियंत्राण में नहीं था। 1780 के दशक तक श्वेत अमेरिकी बसावट पूवीर् तट की एक छोटी संकीणर् पट्टी तक सीमित थी। अगर आप उस समय अमेरिका की सैर पर निकलते तो आपको जगह - जगह अमेरिका के मूल निवासियों के बड़े - बड़े समूह मिलते। इनमें से वुफछ घुमंतू थे और वुफछ स्थायी रूप से रहने वाले थे। बहुत सारे समूह सिपर्फ श्िाकार करके, खाद्य़पदाथर् बीन कर और मछलियाँ पकड़ कर गुशारा करते थे जबकि वुफछ मक्का, पफलियों, तंबावूफ और वुफम्हड़े की खेती करते थे। अन्य समूह जंगली पशुओं को पकड़ने में माहिर थे और सोलहवीं सदी से ही वनबिलाव का पफऱयूरोपीय व्यापारियों को बेचते रहे थे। चित्रा 5 में अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ्िाक वषो± में विभ्िान्न कबीलों की अवस्िथति को दशार्या गया है। चित्रा 5 - श्वेत आप्रवासियों के पश्िचमी प्रसार से पहले अमेरिका में जंगल और घास के मैदानों की स्िथतिबेकर की पुस्तक इकनाॅमिक ज्याॅग्रपफी़, खण्ड 2, 1926 में संकलित ‘एग्रीकल्चरल रीजन्स आॅपफ नाॅथर् अमेरिका’ से उ(ृत। जंगलों का ़करीब आधा और घास के मैदानों का एक - तिहाइर् हिस्सा खेती के लिए सापफ किया गया था। मानचित्रा में आप उन्नीसवीं सदी के ़प्रारंभ्िाक काल में अमेरिका के विभ्िान्न मूल कबीलों के निवास क्षेत्रों को भी देख सकते हैं। चित्रा 6: 1920 में अमेरिका के खेतिहर क्षेत्रों की स्िथति1920 के दशक में प्रकाश्िात बेकर की पुस्तक इकनाॅमिक ज्याॅग्रपफी़ में संकलित लेखों के आधार पर। बीसवीं सदी आते - आते यह भूदृश्य पूरी तरह बदल चुका था। श्वेत अमेरिकी पश्िचम की ओर पफैल गए थे और उन्होंने वहाँ की शमीन को कृष्िा योग्य बना लिया था। इस प्रिया में उन्होंने मूल कबीलों को उनकी जगहों से विस्थापित करके अलग - अलग खेतिहर इलाके बना लिए थे। कृष्िा उत्पादन के विश्व बाशार में अमेरिका की तूती बोलने लगी थी। यह परिवतर्न वैफसे संभव हुआ? अमेरिका में बसने वाले ये नए लोग कौन थे? खेती के इस प्रसार से अमेरिका के मूल निवासी यानी इंडियन मूल के कबीलाइर् समुदायों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? 2.1 पश्िचम की ओर प्रसार तथा गेहूँ की खेती अमेरिका में कृष्िा विस्तार का संबंध श्वेतों के पश्िचमी क्षेत्रा में जाकर बसने से गहरे रूप से जुड़ा है। 1775 से 1783 तक चले अमेरिकी स्वतंत्राता संग्राम और संयुक्त राज्य अमेरिका के गठन के बाद श्वेत अमेरिकी पश्िचमी इलाकों की तरप़्ाफसर्न के 1800 में अमेरिका का़ाफ बढ़ने लगे। टाॅमस जेप्राष्ट्रपति बनने तक लगभग सात लाख श्वेत, दरो± के रास्ते अपलेश्िायन पठारी क्षेत्रा में जाकर बस चुके थे। पूवीर् तट से देखने पर अमेरिका संभावनाओं से भरा दिखता था। वहाँ के बियाबानों को कृष्िा योग्य भूमि में बदला जा सकता था, जंगल से इमारती लकड़ी का नियार्त किया जा सकता था, खाल के लिए पशुओं का श्िाकार किया जा सकता था और पहाडि़यों से सोने जैसे खनिज पदाथो± का दोहन किया जा सकता था। लेकिन इसका मतलब था कि पहले यहाँ के अश्वेत निवासियों को निकाल बाहर किया जाए। संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार ने 1800 के बाद के दशकों में औपचारिक नीति बना कर अमेरिकी इंडियनों को पहले मिसीसिपी नदी के पार और बाद में और भी पश्िचम की तरपफ खदेड़ना शुरू किया। इस प्रिया़में कइर् लड़ाइयाँ लड़ी गईं, मूल निवासियों का जनसंहार किया गया और उनके गाँव जला दिए गए। इंडियनों ने प्रतिरोध किया, कइर् लड़ाइयों में जीते भी, लेकिन अंततः उन्हें समझौता - संिायाँ करनी पड़ीं और अपना घर - बार छोड़कर पश्िचम की ओर वूफच करना पड़ा। 1775 1830 1850 1920 चित्रा 7 - 1775 से 1920 के बीच श्वेत आप्रवासियों का पश्िचम की ओर प्रसार मूल निवासियों की जगहों पर नए प्रवासी बसने लगे। प्रवासियांे की लहर पर लहर आती गइर्। अठारहवीं शताब्दी के पहले दशक तक ये प्रवासी अपलेश्िायन पठार में बस चुके थे और 1820 - 1850 के बीच उन्होंने मिसीसिपी की घाटी में भी पैर जमा लिए। उन्होंने जंगलों को काट - जलाकर, ठूँठ उखाड़कर, खेत और घर बना लिए। पिफर उन्होंने बाकी जंगलों का सप़्ाफाया करके बाड़ें लगा दीं। इस शमीन पर वह मक्का और गेहूँ की खेती करने लगे। शुरुआती वषो± में इस उवर्र शमीन पर किसानों ने अच्छी पफसलें पैदा कीं। ़जैसे ही एक जगह शमीन की पैदावार घट जाती, किसान बेहतर शमीन की तलाश में नइर् जगह चले जाते। मिसीसिपी नदी के पार स्िथत विशालकाय मैदानों चित्रा 8 - सीमांत क्षेत्रों में साॅड मकाऩघास के मैदान सापफ करने के दौरान आप्रवासी किसान इस तरह के घर बनाते थे। इस क्षेत्रा में मकान बनाने के लिए लकड़ी का अभाव था। ा्रफेड हल्टस्ट्रैंड हिस्ट्री इन पिक्चसर् कलेक्शन, एनडीआइर्आरएस ;सौजन्यःप़्- एनडीएसयू, पफारगोद्ध। ़नए शब्द में प्रवासी आबादी का प्रसार 1860 के बाद की घटना है। बाद के दशकों में साॅड: घास व मि‘ी का मिश्रण।यह समूचा क्षेत्रा अमेरिका के गेहूँ उत्पादन का एक बड़ा क्षेत्रा बन गया। 126 अब शरा गेहूँ उत्पादक किसानों के बारे में वुफछ विस्तार से बात की जाए। देखा जाए कि इन किसानों ने किस तरह घास के मैदानों को अमेरिका की ‘रोटी की टोकरी’ में तब्दील किया। उन्हें किन समस्याओं से जूझना पड़ा और इस प्रिया के क्या परिणाम रहे? 2.2 गेहूँ उत्पादक किसान उन्नीसवीं सदी के आख्िारी सालों में अमेरिका के गेहूँ उत्पादन में शबदर्स्त वृि हुइर्। इस दौरान अमेरिका की शहरी आबादी बढ़ती जा रही थी और नियार्त बाशार भी दिनोंदिन पफैलता जा रहा था। माँग बढ़ने के साथ गेहूँ के दामों में भी उछाल आ रहा था। इससे उत्साहित होकर किसान गेहूँ उगाने की तरप़्ाफ झुकने लगे। रेलवे के प्रसार से खाद्यान्नों को गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों से नियार्त के लिए पूवीर् तट पर ले जाना आसान हो गया था। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत तक गेहूँ की माँग में और भी वृि हुइर् तथा प्रथम विश्वयु( के दौरान गेहूँ के विश्व बाशार में भारी उछाल आया। रूसी गेहूँ की आपूतिर् पर रोक लगने के बाद गेहूँ के लिए यूरोप अमेरिका पर ही आश्रित था। अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने किसानों से वक्त की पुकार सुनने का आह्वान किया - ‘खूब गेहूँ उपजाओ। गेहूँ ही हमें जंग जिताएगा।’ 1910 में अमेरिका की 4.5 करोड़ एकड़ शमीन पर गेहूँ की खेती की जा रही थी। नौ साल बाद गेहूँ उत्पादन का क्षेत्रापफल बढ़कर 7.4 करोड़ एकड़ यानी लगभग 65 प्रतिशत श्यादा हो गया था। इसमें से श्यादातर वृि विशाल मैदानों ;ग्रेट प्लेन्सद्ध में हुइर् थी जहाँ नित नए क्षेत्रों को जोता जा रहा था। गेहूँ उत्पादन बहुधा बड़े किसानों के कब्शे में था - कइर् बड़े किसानों के पास तो दो - तीन हशार एकड़ तक शमीन होती थी। 2.3 नइर् तकनीक का आगमन गेहूँ उत्पादन में हुइर् यह विलक्षण वृि नइर् तकनीक का परिणाम थी। उन्नीसवीं शताब्दी में नए प्रवासी जैसे - जैसे नइर् शमीन को अपने कब्शे में लेते गए वैसे - वैसे उन्होंने नइर् शरूरतों के मुताबिक अपनी तकनीक में भी बदलाव किए। जब वे लोग मध्य पश्िचम के घास के मैदानों में पहुँचे तो उनके वे साधारण हल बेकार साबित हुए जिनका वे पूवीर् तट पर इस्तेमाल करते आए थे। यहाँ के मैदान घनी घास से ढँके थे जिसकी जड़ें बहुत गहरी होती थीं। इस सख्त शमीन को तोड़ने के लिए कइर् तरह के हल विकसित किए गए। स्थानीय स्तर पर विकसित इन हलों में वुफछ हल 12 पुफट लंबे ़होते थे। इन हलों का अगला हिस्सा छोटे - छोटे पहियों पर टिका होता था और उन्हें 6 बैल या घोड़े खींचते थे। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में विशाल मैदानी क्षेत्रा के किसान इस सख्त शमीन को ट्रैक्टर और डिस्क हलों की मदद से गेहूँ की खेती करने के लिए तैयार करने में जुटे थे। प़्ाफसल पकने के बाद उसकी कटाइर् का नंबर आता था। 1830 से पहले प़्ाफसल कटाइर् के लिए हँसिये का इस्तेमाल किया जाता था। यह एक ऐसा चित्रा 13 - मशीनी युग से पहले नइर् शमीन को खेती के लिए इस तरह तैयार किया जाता थाचित्रा में बारह हलों के समूह में कइर् घोड़े जुते दिखाइर् दे रहे हैं। ;सौजन्य: पे्रफड हल्टस्ट्रैंड हिस्ट्री इन पिक्चसर् कलेक्शन, एनडीआइर्आरएस - ़एनडीएसयू, पफारगोद्ध। ़यहाँ तीन डिªल और पैकर मशीनें दिखाइर् गइर् हैं। इन्हें ट्रैक्टर के पीछे बाँधा जाता था। डिªल मशीनें 10 - 12 प़फुट लंबी होती थीं। प्रत्येक डिªल में 20 डिस्क लगी होती थीं। डिस्क का काम शमीन को बुआइर् के लिए तैयार करना होता था। पैकसर् रोपे गए बीजों पर मिट्टी डालने का काम करते थे। चित्रा में दूर तक पैफली रोपित शमीन दिखाइर् दे रही है। सौजन्य: एपफ. ए. पशानदक चित्रा संग्रह, एनडीआइर्आरएस - एनडीएसयू, ़पफारगो। ़चित्रा 15 - उत्तरी डकोटा के विशाल मैदानों में शमीन की सपफाइर्, 1910.़इस चित्रा में मिनियापोलिस वाष्प ट्रैक्टर दिखाया गया है। ट्रैक्टर के पीछे जाॅन डीरे हल बंध है और उसमें धातु के पफाल लगे हैं। इन पफालों की सहायता से शमीन को आसानी से तोड़ा जा सकता था। घास की मशबूत जड़ों का सपफाया करने में भी ये हल काप़्ाफी मददगार थे। मशीन के पीछे गहरे वूंफड़ देखे जा सकते हैं। बायीं ओर की शमीन पर दूर - दूर तक घास पफैली ़हुइर् है। इन मशीनों का इस्तेमाल गेहूँ उगाने वाले बड़े किसान ही कर पाते थे। ;सौजन्य: पे्रफड हल्टस्ट्रैंड हिस्ट्री इन पिक्चसर् कलेक्शन, एनडीआइर्आरएस - एनडीएसयू, प़फारगोद्ध़। काम था जिसे सैकड़ांे स्त्राी - पुरुष एक साथ लगकर करते थे। लेकिन 1831 में सायरस मैक्काॅमिर्क ने एक ऐसे औशार का आविष्कार किया जो एक ही दिन में इतना काम कर देता था जितना कि 16 आदमी हँसियों के साथ कर सकते थे। इस तरह बीसवीं शताब्दी के शुरू होते - होते अमेरिका के श्यादातर किसान प़्ाफसल काटने के लिए कम्बाइन्ड हावेर्स्टसर् का इस्तेमाल करने लगे थे। इन मशीनों की सहायता से 500 एकड़ के खेत की कटाइर् का काम ़सिपर्फ दो सप्ताह में ही निपटाया जा सकता था। विशाल मैदानों के अमीर किसानों के लिए यह मशीन बहुत महत्त्वपूणर् बन गइर् थी। गेहूँ के दाम आसमान छू रहे थे। उसकी माँग खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। इन मशीनों से शमीन के बड़े टुकड़ों पर प़्ाफसल काटने, ठूँठ निकालने, घास हटाने और शमीन को दोबारा खेती के लिए तैयार करने का काम बहुत आसान हो गया था। यह सारा काम मशीनें बहुत जल्दी कर डालती थीं। इसके लिए मानव श्रम की भी बहुत आवश्यकता नहीं पड़ती थी। विद्युत से चलने वाली ये मशीनें इतनी उपयोगी थीं कि उनकी सहायता से सिपर्फ चार व्यक्ित मिलकर एक मौसम में 2000 से़़4000 एकड़ भूमि पर पफसल पैदा कर सकते थे। 2.4 गरीब जनता की दशा गरीब किसानों के लिए ये मशीनें बबार्दी बनकर आईं। बहुत सारे किसानों ने इन मशीनों को इस उम्मीद के साथ खरीदा था कि गेहूँ के दामों में पहले जैसी तेशी बनी रहेगी। इन किसानों को बैंक आसानी से )ण दे देते थे। लेकिन )ण को चुकाना मुश्िकल काम होता था। )ण अदा न करने की स्िथति में बहुत सारे किसानों को अपनी शमीन से ही हाथ धोना पड़ जाता था। और इसका मतलब होता था काम की नए सिरे से तलाश। लेकिन इस काल में रोशगार बहुत मुश्िकल से मिल पाता था। बिजली चालित मशीनों के आगमन से मशदूरों की शरूरत कापफी कम हो गइर् थी। इसके ़साथ ही 1920 के दशक के मध्य तक उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वषो± और बीसवीं शताब्दी के आरंभ्िाक वषो± की आथ्िार्क तेशी खत्म हो चली थी। महायु( के उपरांत उत्पादन की हालत यह हो गइर् थी कि बाशार गेहूँ से अटा पड़ा था लेकिन खरीदार ढँूढे़ नहीं मिलते थे। श्यादातर किसानों के लिए यह संकट का समय था। गेहूँ के भंडार बढ़ते जा रहे थे। गोदामों में खाद्यान्न भरा रहता था। हालत यहाँँतक पहुच गइर् थी कि गोदाम में रखे खाद्यान्न को पशुओं को ख्िालाया जा रहा था। गेहूँ के दाम गिरने से आयात बाशार ढह गया था। 1930 के दशक की जिस महामंदी का अकसर िाक्र किया जाता है उसकी पृष्ठभूमि में यही परिस्िथतियाँंकाम कर रही थी। इस मंदी का असर हर जगह दिखाइर् पड़ता था। 2.5 ‘रोटी की टोकरी’ से ‘रेत के कटोरे’ तक विशाल मैदानों में गेहूँ की सघन खेती से कइर् समस्याएँ पैदा हुइर्ं। 1930 के ़़दशक में दक्ष्िाण के मैदानों में रेतीले तूपफान आने शुरू हुए। इन तूपफानों की ऊँचाइर् 7,000 से 8,000 पफीट होती थी। गंदले कीचड़ की़शक्ल में आने वाले इन तूपफानों से चैतरप़्ाफा तबाही पफैल़जाती थी। 1930 का पूरा दशक इन तूपफानों से आक्रांत रहा।़इस पूरे काल में ऐसा कोइर् दिन या वषर् नहीं रहा जब इन रेतीले तूपफानों ने तबाही न मचाइर् हो। जैसे ही आसमान में़अंधेरा छाने लगता, रेत के ये तूप़्ाफान शहरों और खेतों को चारों ओर से घेर लेते। तूपफान के कारण सब वुफछ अंधकारमय़हो जाता था। पेफपफड़ों में धूल और कीचड़ भरने से पशु भारी संख्या में मरने लगे। रेतीले तूपफानों से खेत के खेत पट जाते़थे और उनकी मंेड़ रेत में गुम हो जाती थी। यह रेत नदी की सतह पर इस कदर जम जाती थी कि मछलियाँ साँस तक नहीं ले पाती थीं। मैदानों में हर तरपफ चिडि़यों औऱपशुओं की हडि्डयाँ बिखरी दिखाइर् देती थीं। 1920 के दशक में गेहूँ के उत्पादन में क्रांति लाने वाले टैªक्टर और मशीनंे अब रेत के ढेरों में पंफस कर बेकार हो गए थे। ये मशीनें इस हद तक खराब हो चुकी थीं कि उनकी मरम्मत भी नहीं की जा सकती थी। इस तबाही का कारण क्या था? रेतीले तूप़्ाफान क्यों पैदा हुए थे? तूप़्ाफानों का एक कारण तो 1930 के दशक के आरंभ्िाक वषो± में पड़ने वाला सूखा था। कइर् वषो± तक बारिश न होने के कारण तापमान बढ़ता चला गया। लेकिन रेत के ये सामान्य तूप़्ाफान काले भयावह तूप़्ाफान का रूप इसलिए ले सके क्योंकि शमीन के एक विशाल हिस्से पर लगातार खेती करने के कारण शमीन की उफपरी परत काप़्ाफी हद तक टूट गइर् थी। उस पर घास का नामोनिशान नहीं बचा था। उन्नीसवीं सदी के आरंभ्िाक वषो± में गेहूँ पैदा करने वाले किसानों ने शमीन के हर संभव हिस्से से घास साप़्ाफ कर डाली थी। ये किसान ट्रैक्टरों की सहायता से इस शमीन को गेहूँ की खेती के लिए तैयार कर रहे थे। रेतीले तूप़्ाफान इसी असंतुलन से पैदा हुए थे। यह सारा क्षेत्रा रेत के एक विशालकाय कटोरे में बदल गया था यानी खुशहाली का सपना एक डरावनी हकीकत बन कर रह गया था। प्रवासियों को लगता था कि वे सारी शमीन को अपने कब्शे में लेकर उसे गेहूँ की लहलहाती पफसल में बदल डालेंगे और करोड़ों़में खेलने लगेंगे। लेकिन तीस के दशक में उन्हें यह बात समझ में आइर् कि पयार्वरण के संतुलन का सम्मान करना कितना शरूरी है। होग ने अपने चित्रों में रेतीले तूपफानों से होने वाली तबाही और मौत के तांडव को दशार्या है। लाइपफ मैगशीन ़ने होग को रेतीले कटोरे का चित्राकार बताया था। ़भारतीय किसान और अप़्ाफीम की खेती आइए, अब भारत की ओर चलें और देखें कि अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वषो± और उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के ग्रामीण क्षेत्रा में क्या चल रहा था। जैसा कि आप जानते हैं, प्लासी के यु( ;1757द्ध के बाद भारत में धीरे - धीरे अंग्रेशी राज स्थापित हो चला था। औपनिवेश्िाक शासन के दौरान भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आमूल बदलाव आए। अंग्रेश सत्ता के लिए राजस्व सरकारी आय का एक बड़ा ड्डोत था। सरकार अपनी आय बढ़ाने के लिए भू - राजस्व ;लगानद्ध की एक नियमित व्यवस्था करना चाहती थी। इस नीति के तहत राजस्व की दर तथा खेती की जोत बढ़ाने के प्रयास भी किए गए। जैसे - जैसे खेती का क्षेत्रा बढ़ता गया वैसे - वैसे जंगल और चरागाह कम होने लगे। किसानों और चरागाहों पर आश्रित समुदायों को इसके चलते कइर् समस्याओं का सामना करना पड़ा। अंग्रेशी सत्ता के कानूनों के तहत अब किसान जंगलों का मनचाहा प्रयोग नहीं कर सकते थे। सरकार ने जंगल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर कइर् तरह की पाबंदियाँ लगा दी थीं। किसानों पर लगान जमा करने का दबाव हर समय बना रहता था। औपनिवेश्िाक काल के दौरान भारत के ग्रामीण क्षेत्रा ने विश्व बाशार की माँग के अनुसार कइर् नइर् प़्ाफसलों को उगाना शुरू किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ्िाक वषो± में नील जैसी व्यावसायिक प़्ाफसलों की खेती इसी अंतरार्ष्ट्रीय बाशार की मांग के पफलस्वरूप शुरू की गइर् थी। शताब्दी का अंत होते - होते यहाँ के किसान गन्ना, कपास, जूट ;पटसनद्ध, गेहूँ और अन्य ऐसी ही नियार्त आधारित प़़्ाफसलें पैदा करने लगे थे। ये पफसलें यूरोप की शहरी आबादी और इंग्लैंड स्िथत लंकाशायर और मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों की शरूरतों को पूरा करने के लिए पैदा की जा रही थीं। भारतीय किसानों के लिए इस अंतरार्ष्ट्रीय वाण्िाज्य और व्यापार से जुड़ने का अनुभव वैफसा रहा, इस बात को हम अप़्ाफीम की खेती के माध्यम से समझने की कोश्िाश करेंगे। इससे हमें खेतिहर लोगों पर औपनिवेश्िाक शासन के प्रभाव को समझने में मदद मिलेगी। साथ ही हम यह भी जान सवेंफगे कि इस दौरान उपनिवेशों में बाशार व्यवस्था किस तरह काम करती थी। 3.1 चाय का शौक: चीन के साथ व्यापार भारत में अपफीम के उत्पादन का इतिहास चीन और इंग्लैंड के पारस्परिक़व्यापार से गहरे रूप से जुड़ा है। अठारहवीं शताब्दी के आख्िारी वषो± के दौरान इर्स्ट इंडिया कंपनी चीन से चाय और रेशम खरीदकर इंग्लैंड में बेचा करती थी। चाय की लोकपि्रयता बढ़ने के साथ - साथ चाय का व्यापार दिनोंदिन महत्त्वपूणर् होता गया। 1785 के आसपास इंग्लैंड में 1.5 करोड़ पौंड चाय का आयात किया जा रहा था। 1830 तक आते - आते यह आँकड़ा 3 करोड़ पौंड को पार कर चुका था। वास्तव में, इस समय तक इर्स्ट इंडिया वंफपनी के मुनाप़्ोफ का एक बहुत बड़ा हिस्सा चाय के व्यापार से पैदा होने लगा था। इस व्यापार की एक समस्या यह थी कि इंग्लैंड में इस समय ऐसी किसी वस्तु का उत्पादन नहीं किया जाता था जिसे चीन के बाशार में आसानी से बेचा जा सके। चीन का मंचू शासक विदेशी व्यापारियों को संदेह की दृष्िट से देखता था। शासकों को भय था कि ये व्यापारी स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप किया करेंगे और शासकों की सत्ता में अड़ंगा लगाने की कोश्िाश करेंगे। वुफल मिलाकर मंचू शासक विदेशी वस्तुओं के लिए चीन के दरवाशे खोलने के पक्ष में नहीं थे। आख्िार ऐसी स्िथति में पश्िचम के व्यापारी चाय के व्यापार को वैफसे जारी रख सकते थे। व्यापार संतुलन कायम रखना उनके लिए एक बड़ी समस्या बन गया था। व्यापारी चाय के बदले चाँदी के सिक्के ;बुलियनद्ध दिया करते थे। चाँदी के नियार्त को इंग्लैंड में अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। यह एक तरह से इंग्लैंड के खशाने को खाली करना था। इंग्लैंड में यह सावर्जनिक चिंता का विषय बन गया था। लोगों में यह भावना घर करने लगी थी कि खशाना खाली होने से देश में गरीबी पफैल जाएगी और राष्ट्रीय संपिा हाथ से निकल जाएगी। इसी कारण व्यापारी चाँदी का विकल्प ढूँढ़ने की कोश्िाश कर रहे थे। वे एक ऐसी वस्तु की तलाश में थे जिसे चीन के बाशार में बेचा जा सके। अपफीम एक ऐसा ही उत्पाद था। चीन में अप़्ाफीम की शुरुआत सोलहवीं ़शताब्दी के प्रारंभ में पुतर्गालियों ने की थी लेकिन अपफीम को मुख्यतः़चित्रा 18 - त्रिाकोणीय व्यापारअंग्रेश व्यापारी भारत से अपफीम ले जाकर चीन में बेचते थे और चीन से ़इंग्लैंड को चाय का नियार्त करते थे। भारत और इंग्लैड के बीच दोतरपफा व्यापार होता था। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में भारत से इंग्लैड को होने वाले हथकरघा नियार्त में गिरावट आने लगी और इसके स्थान पर कच्चे माल ;रेशम व कपासद्ध तथा खाद्यान्नों का नियार्त बढ़ने लगा। इंग्लैंड भारत में अपने यहाँ निमिर्त माल भेजने लगा जिसके परिणामस्वरूप भारत के दस्तकारी उत्पादों का ”ास होने लगा। ़दिया। पश्िचम के व्यापारी चीन के दक्ष्िाण - पूवीर् बंदरगाहों पर अपफीम लाते थे़और वहाँ से स्थानीय एजेंटों के शरिए देश के आंतरिक हिस्सों में भेज देते थे। 1820 के आसपास अपफीम के लगभग 10,000 व्रेफट अवैध रूप से चीन ़में लाए जा रहे थे। 15 साल बाद गैरकानूनी ढंग से लाए जाने वाली इस अपफीम की मात्रा 35,000 व्रेफट का आँकड़ा पार कर चुकी थी। ़ियाकलाप मानचित्रा में दिखाइर् दे रहे तीर के निशानों के अनुसार बताएँ कि किस देश से कौन - सी वस्तु किस देश को भेजी जाती थी। चित्रा 19 - चीन से भारत आए जहाश का चित्रा.थाॅमस डेनियल की कृति। डेनियल अपने भतीजे विलियम डेनियल के साथ 1786 में भारत आए थे। वे दोनों पहले चीन गए थे। वहाँ वुफछ समय बिताने के बाद वे वैंफटन, दक्ष्िाण चीन से भारत पहुँचे। उनका जहाश भारत के एक बंदरगाह पर पंजीकृत था। लेकिन इस जहाश से पूवीर् देशों के साथ व्यापार किया जाता था। चीन के साथ अपफीम के अवैध व्यापार के लिए ़इसी तरह के जहाशों का इस्तेमाल किया जाता था। ड्डोत च 1839 में चीन के शासक ने लिन शे - शू को वैंफटन का विशेष आयुक्त नियुक्त किया। लिन शे - शू को अपफीम का व्यापार ़रोकने की जिम्मेदारी दी गइर् थी। वह 1839 के वसंत में वैंफटन पहुँचा। शे - शू ने पद संभालते ही अपफीम के व्यापार में लगे ़1600 लोगों को गिरफ्ऱतार करने के आदेश दिए और 11,000 पौंड अपफीम जब्त कर ली। इसके बाद लिन शे - शू ने विदेशी ़पैफक्िट्रयों को अप़्ाफीम का स्टाॅक खाली करने की हिदायत दी। इस कारर्वाइर् के तहत अप़्ाफीम के 20,000 व्रेफट नष्ट किए ़गए। शे - शू के वैंफटन में विदेशी व्यापार पर रोक लगाने से इंग्लैंड ने चीन के ख्िालापफ यु( की घोषणा कर दी। अपफीम ़़यु( ;1837 - 42द्ध में चीन को मुँह की खानी पड़ी और उसे एक अपमानजनक संिा स्वीकार करनी पड़ी। संिा की शतो± के अनुसार अपफीम के व्यापार को कानूनी मान्यता दे दी गइर् और चीन के दरवाशे विदेशी व्यापारियों के लिए खोल दिए़गए। यु( से पहले लिन ने इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को एक पत्रा लिखा था जिसमें अपफीम के व्यापार की भत्सर्ना ़की गइर् थी। यहाँ लिन द्वारा महारानी को लिखे गए उस पत्रा का एक अंश प्रस्तुत है। ़़अपफीम बेचने वाले इन बबर्र लोगों के अपराधों की जाँच करें और उनकी हरकतों से देश को होने वाले नुकसान का जायशा़लें तो इन लोगों को मृत्युदंड देना कहीं से गलत नहीं लगता..चीन में जो लोग अपफीम की खरीद - पफरोख्त करते हैं या उसका सेवन करते हैं उन्हें मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। अगर हम आपका देश चीन से साठ या सत्तर हशार ली ;तीन ली, एक मील के बराबर होता हैद्ध दूर है। इसके बावजूद इन बबर्र लोगों के जहाश अपफीम के व्यापार के लिए चीन में आते हैं और भारी मुनाप़्ाफा कमाते हैं। चीन की संपिा का ये बबर्ऱव्यापारी अपने हित में दोहन कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि इन बबर्र व्यापारियों द्वारा कमाया गया धन वास्तव में चीन की संपिा है। इन लोगों को इस बात का कोइर् अिाकार नहीं है कि इस व्यापार के बदले वे चीन की जनता को यह खतरनाक नशीली दवा ख्िालाएँ। मैं पूछना चाहता हूँ कि आपकी नैतिकता कहाँ चली गइर् है। मैंने सुना है कि इंग्लैंड में अपफीम़के सेवन पर सख्त रोक है। इसका कारण यह है कि आपका देश अपफीम के खतरों को समझता है। यदि आप अपने देश़का नुकसान नहीं करना चाहते तो दूसरे देशों का नुकसान करने का भी आपको कोइर् अिाकार नहीं है। भला चीन इस बला का श्िाकार क्यों? ड्डोत: सूयू तेंग और जाॅन प़्ोफयरबैंक, चाइनाश रेस्पाॅन्स टू द वेस्ट ;1954द्ध। इस तरह यह हुआ कि जहाँ इंग्लैंड में चीन से आयात की गइर् चाय लोगों की शबान पर चढ़ने लगी वहीं चीन की जनता अपफीम की लत का श्िाकाऱहोने लगी। यह लत समाज के सभी वगो± - दुकानदार, सरकारी कमर्चारी, सेना के लोग, उच्च वगर् और भ्िाखारियों में पफैल गइर् थी। 1839 में वैंफटन के विशेष आयुक्त लिन शे - शू के अनुसार चीन में 40 लाख लोग अप़्ाफीम का सेवन कर रहे थे। वैंफटन में रहने वाले एक अंग्रेश डाॅक्टर के मुताबिक लगभग 1 करोड़ 20 लाख लोग अपफीम की लत के आदी हो चुके थे। एक़तरपफ जहाँ चीन अप़्ाफीमचियों का देश बन गया था वहीं इंग्लैंड का चाय़व्यापार दिनोंदिन प्रगति कर रहा था। अपफीम के इस अवैध व्यापार से हासिल़की गइर् राश्िा का इस्तेमाल चाय खरीदने के लिए किया जा रहा था। 3.2 अंग्रेश व्यापारी अप़्ाफीम कहाँ से प्राप्त करते थे? ़अपफीम के व्यापार में भारतीय किसानों की भूमिका यहीं से शुरू होती है। बंगाल विजय के बाद अंग्रेशों ने अपने कब्शे की शमीन पर अप़्ाफीम की खेती शुरू की। जैसे - जैसे चीन में अपफीम का बाशार बढ़ता गया वैसे - वैसे़बंगाल के बंदरगाहों से अप़्ाफीम का नियार्त बढ़ने लगा। 1767 से पहले भारत से केवल 500 पेटी ;दो मन के बराबरद्ध अपफीम नियार्त की जाती थी।़़सिपर्फ चार वषो± के भीतर यह मात्रा तीन गुना बढ़ गइर्। 100 वषर् बाद अथार्त् 1870 तक आते - आते सरकार हर वषर् लगभग 50,000 पेटी अप़्ाफीम का नियार्त करने लगी थी। दिनोंदिन बढ़ते व्यापार को कायम रखने के लिए अप़्ाफीम की माँग को बढ़ाना आवश्यक था लेकिन यह काम आसान नहीं था। आख्िार किसानों को अपफीम की खेती के लिए वैफसे तैयार किया जा सकता था? किसान अप़्ाफीम़बोने के लिए तैयार नहीं थे। इसके कइर् कारण थे। सबसे पहले किसानों को ़अपफीम की खेती सबसे उवर्र शमीन पर करनी होती थी। खासतौर पर ऐसी शमीन पर जो गाँव के पास पड़ती थी। आमतौर पर ऐसी उपजाउफ शमीन पर किसान दाल पैदा करते थे। अच्छी और उवर्र शमीन पर अपफीम बोने का़मतलब दाल की पैदावार से हाथ धोना था। उन्हें दाल की पफसल के लिए़कम उवर्र शमीन का इस्तेमाल करना पड़ रहा था। खराब शमीन में दालों का उत्पादन न केवल अनिश्िचत रहता था बल्िक उसकी पैदावार भी काप़्ाफी कम रहती थी। दूसरे, बहुत सारे किसानों के पास शमीन थी ही नहीं। अपफीम की़खेती के लिए ऐसे किसानांे को भूस्वामियों को लगान देना पड़ता था। वे इन भूस्वामियों से बटाइर् पर ली गइर् शमीन पर अप़्ाफीम उगाते थे। गाँव के पास की शमीन की लगान दर बहुत ऊँची रहती थी। तीसरे, अप़्ाफीम की खेती बहुत मुश्िकल से होती थी। अप़्ाफीम के नाशुक पौधे को जिंदा रखना बहुत मेहनत का काम था। अपफीम बोने के बाद किसान दूसरी प़़्ाफसलों पर ध्यान नहीं दे पाते थे। अंत में, सरकार अपफीम बोने के बदले किसानों को बहुत़कम दाम देती थी। किसानों के लिए सरकारी मूल्य पर अप़्ाफीम पैदा करना घाटे का सौदा था। ियाकलाप कल्पना करें कि चीन के शासक ने आपसे अपफीम के नुकसानदेह प्रभावों के बारे में एक पचार् तैयार करने के लिए कहा है। पता लगाएँ कि अपफीम के सेवन का ़मनुष्य पर क्या - क्या प्रभाव पड़ता है। एक पचार् तैयार करें और उसे आकषर्क शीषर्क दें। ़नए शब्द मन: भार की माप 1 मन: 40 सेर। 1 सेर 1 किलोग्राम से वुफछ कम होता है। ियाकलाप कल्पना करें कि आप अपफीम की खेती का विरोध ़करने वाले किसानों का नेतृत्व कर रहे हैं। आपको इर्स्ट इंडिया कंपनी के स्थानीय अिाकारियों से इस संबंध में बात करनी है। बातचीत वैफसे आगे बढ़ेगी? कक्षा के विद्याथ्िार्यों को दो समूह में बाँटें और चचार् करें। 3.3 किसानों को अप़्ाफीम की खेती के लिए कैसे मनाया गया? ड्डोत छ किसानों को अपफीम की खेती करने के लिए अगि्रम रकम दी जाती थी।़ाफीम एजेंट ने लिखा़बंगाल और बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब किसानों की एक बड़ी जमात 1833 में इलाहाबाद के सहायक अप्ऐसी थी जो हर समय आथ्िार्क संकट में घ्िारी रहती थी। भूस्वामी का कर चुकाने या अपने लिए भोजन और वस्त्रा का प्रबंध करना उनके लिए हमेशा मुश्िकल रहता था। 1780 के बाद गाँव के मुख्िाया इन किसानों को अप़्ाफीम पैदा करने के लिए अगि्रम रकम पेश करने लगे। )ण की सुविधा इन किसानों के लिए बड़ी राहत बन कर आइर्। )ण की सुविधा के चलते किसान न केवल अपनी तात्कालिक शरूरतों को पूरा कर पाते थे बल्िक पहले से लिए कशर् को भी अदा करने की हालत में आ जाते थे। लेकिन इस )ण व्यवस्था के साथ एक खराब बात यह जुड़ी हुइर् थी कि )ण लेते ही किसान गाँव के प्रधान और सरकार के बंधुआ हो जाते थे। इन किसानों तक यह रकम अप़्ाफीम के सरकारी एजेंटों के जरिए पहुँचती थी। ये एजेंट गाँव के प्रधान को अगि्रम रकम देते थे और गाँव का प्रधान इन किसानों को। एक बार )ण लेने के बाद किसान अप़्ाफीम बोने से मुकर नहीं सकते थे। इस व्यवस्था के तहत किसानों को एक निश्िचत क्षेत्रापफल में अपफीम बोनी़पड़ती थी। पफसल अप़्ाफीम के एजेंटों द्वारा काटी जाती थी। एक बार प़्ाफसल़बोने के बाद उस पर किसान का कोइर् अिाकार नहीं रह जाता था। वह इस शमीन पर कोइर् दूसरी प़़्ाफसल नहीं उगा सकता था। उसे इस पफसल को कहीं और बेचने की भी आशादी नहीं थी। साथ ही पफसल के दाम एजेंट द्वारा तय़किए जाते थे और ये दाम हमेशा ही बहुत कम होते थे। जहाँ तक अप़्ाफीम की खेती से होने वाली कम आय का सवाल है यह अपफीम के दाम बढ़ाने से दूर की जा सकती थी। लेकिन इस मामले में सरकार ़का रवैया सकारात्मक नहीं था। वह खुद इस बात के पक्ष में थी कि अपफीम ़का उत्पादन कम से कम लागत पर किया जाए और कलकत्ता के अपफीम ़एजेंटों को यह अपफीम ऊ़ँ चे दाम पर बेची जाए। कलकत्ता स्िथत ये एजेंट इस अपफीम को चीन भेजने की व्यवस्था करते थे। अप़्ाफीम के इस क्रय और विक्रय ़का अंतर सरकार के खाते में जाता था। दूसरे शब्दांे में यही सरकार का राजस्व होता था। अप़्ाफीम पैदा करने वाले किसानों को इतना कम मूल्य दिया जाता था कि अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत तक आते - आते किसान बेहतर दाम की माँग करने लगे थे और अगि्रम पेशगी लेने से इन्कार करने लगे थे। बनारस के आसपास के क्षेत्रा में अपफीम पैदा करने वाले किसानों ने तंग आकर इसकी ़खेती ही बंद कर दी थी। इसके बदले उन्होंने गन्ने और आलू की खेती अपना ली। बहुत सारे किसानों ने अपनी पफसलों को घुमंतू व्यापारियों ;पैकारोंद्ध को ़बेच डाला था। ये व्यापारी किसानों को बेहतर दाम देते थे। 1773 तक बंगाल सरकार ने अप़्ाफीम के व्यापार पर आिापत्य जमा लिया। सरकार के अलावा कोइर् बाहरी व्यक्ित यह व्यापार नहीं कर सकता था। 1820 के दशक में अंग्रेश सरकार ने पाया कि उनके क्षेत्रा में अपफीम़का उत्पादन घटने लगा है। जबकि गैर - बि्रटिश इलाकों में अप़्ाफीम की खेती खूब पफल - पूफल रही थी। मध्य भारत और राजस्थान जैसे गैर - बि्रटिश क्षेत्रों में था: ‘बोडर् मानता है कि किसान अपफीम पैदा नहीं करना़चाहते। पिछले दो वषो± के दौरान मैं जमुना के दक्ष्िाणी िालों में रहने वाले किसानों के संपकर् में रहा हूँ और मैंने यह बात महसूस की है कि यहाँ के सभी किसान इस व्यवस्था से नाराश हैं। वे इसे कतइर् पसंद नहीं करते। इस मामले में मैंने कइर् जगह पड़ताल की है और मेरा अनुभव यह है कि अपफीम की खेती को़किसान अभ्िाशाप मानते हैं। वे अपफीम की खेती अपनी ़मशीर् से नहीं बल्िक डंडे के शोर पर करते हैं...। यह खेती कलेक्टर के आदेश के तहत शुरू की गइर् थी...। लोग बाग बताते हैं कि उनके साथ चपरासी बदतमीजी से पेश आते हैं और उनसे गाली - गलौश करते हैं...। किसानों की राय है कि अपफीम की खेती से उन्हें़नुकसान हुआ है।’ बिनाॅय चैधरी की पुस्तक ग्रोथ आॅप़्ाफ कमश्िार्यल एग्रीकल्चर इन बंगाल से। ़अपफीम का उत्पादन बदस्तूर जारी था। इन क्षेत्रों में स्थानीय व्यापारी किसानों को बेहतर मूल्य देते थे। 1820 के दशक में ये व्यापारी सशस्त्रा दल - बल के साथ व्यापार करते थे। अंग्रेशों की दृष्िट में यह व्यापार अवैध था। वे इसे तस्करी मानते थे और इस पर रोक लगाना चाहते थे। सरकार अपफीम पऱअपना आिापत्य बनाए रखना चाहती थी इसलिए उसने रियासतों में तैनात अपने एजेंटों को इन व्यापारियों की अपफीम शब्त करने और प़्ाफसलों को नष्ट़करने के आदेश दिए। जब तक अप़्ाफीम का उत्पादन जारी रहा तब तक बि्रटिश सरकार, किसान और स्थानीय व्यापारियों के बीच यह टकराव चलता रहा। लेकिन इससे हमें यह अथर् नहीं निकालना चाहिए कि औपनिवेश्िाक भारत में सभी किसानों की हालत अपफीम की खेती करने वाले किसानों जैसी़ही थी। औपनिवेश्िाक भारत में अन्य किसानों की हालत के बारे में हम एक अलग अध्याय में बात करेंगे। निष्कषर् इस अध्याय में आपने पढ़ा कि आधुनिक काल में विश्व के विभ्िान्न ग्रामीण क्षेत्रों में महत्त्वपूणर् परिवतर्न आए। इन बदलावों पर नशर डालते समय हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ये बदलाव हर जगह एक जैसे नहीं थे। ग्रामीण क्षेत्रा के सभी वगो± पर इन परिवतर्नों का प्रभाव एक समान नहीं था। इन बदलावों से वुफछ वगो± को लाभ हुआ और वुफछ को नुकसान। आधुनिकीकरण का यह इतिहास सिपर्फ वैभवपूणर् ही नहीं था। इसे केवल वृि और विकास की एक ़शानदार कहानी भर नहीं कहा जा सकता। इस काल में लोगों को अपनी मूल जगह छोड़कर आजीविका की तलाश में अन्य स्थानों का रुख करना पड़ा। यह काल गरीबी, पयार्वरणीय संकट, सामाजिक विद्रोह, औपनिवेशीकरण और दमन का काल भी था। हमें इन बदलावांे के विभ्िान्न पक्षों को समझने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि आधुनिक विश्व में खेतिहर जनता और किसानों ने इस स्िथति का मुकाबला अलग - अलग ढंग से किया है। ियाकलाप 1 1650 से 1930 के बीच कृष्िा के क्षेत्रा में आए महत्त्वपूणर् बदलावों को दशार्ने के लिए एक कालरेखा तैयार करें। 2 नीचे दी गइर् सारणी में इस अध्याय में उल्िलख्िात घटनाओं के आधार पर जानकारी भरें। याद रखें कि किसी देश में एक से श्यादा बदलाव भी देखे जा सकते हैं। देश परिवतर्न किसका किसको नुकसान हुआ लाभ हुआ प्रश्न

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