आध्ुनिक विश्व में चरवाहे चित्रा 1 - पूवीर् गढ़वाल के बुग्याल में चरती भेड़ेंबुग्याल उफँचे पहाड़ों पर 12,000 पुफट से भी श्यादा उफँचाइर् पर स्िथत विशाल प्राकृतिक चरागाह होते हैं। जाड़ों में ये बपर्फ से ढके रहते हैं और अप्रैल के बाद हरे - भरे हो जाते ़हैं। इस समय पहाडि़यों की तलहटी तरह - तरह की घास, जड़ों और जड़ी - बूटियों से भरी रहती है। माॅनसून तक इन चरागाहों में घनी हरियाली छा जाती है और चारों तरपफ पूफल ही पूफल दिखाइर् देने लगते हैं। इस अध्याय में आप घुमंतू चरवाहों के बारे में पढ़ेंगे। घुमंतू ऐसे लोग होते हैं जो किसी एक जगह टिक कर नहीं रहते बल्िक रोशी - रोटी के जुगाड़ में यहाँ से वहाँ घूमते रहते हैं। देश के कइर् हिस्सों में हम घुमंतू चरवाहों को अपने जानवरों के साथ आते- जाते देख सकते हैं। चरवाहों की किसी टोली के पास भेड़ - बकरियों का रेवड़ या झुंड होता है तो किसी के पास ऊँट या अन्य मवेशी रहते हैं। क्या उन्हें देख कर आपने कभी इस बारे में सोचा है कि वे कहाँ से आए हैं और कहाँ जा रहे हैं? क्या आपको पता है कि वे कैसे रहते हैं, उनकी आमदनी के साध्न क्या हैं और उनका अतीत क्या था? चरवाहों को इतिहास की पुस्तकों में विरले ही जगह मिल पाती है। जब भी आप अथर्व्यवस्था के बारे में पढ़ते हैं - पिफर चाहे वह इतिहास की कक्षा हो या अथर्शास्त्रा की - सिप़्ार्फ कृष्िा और उद्योगों के बारे में ही पढ़ते हैं। कभी - कभार इन कक्षाओं में कारीगरों के बारे में भी पढ़ने को मिल जाता है। लेकिन चरवाहों के बारे में पढ़ने - लिखने को श्यादा वुफछ नहीं मिलता। मानो उनकी िांदगी का कोइर् मतलब ही न हो। अकसर मान लिया जाता है कि वे ऐसे लोग हैं जिनके लिए आज की आधुनिक दुनिया में कोइर् जगह नहीं हैऋ जैसे उनका दौर बीत चुका हो। इस अध्याय में आप देखेंगे कि भारत और अप़फीका जैसे समाजों में चरवाही का ्रकितना महत्त्व है। यहाँ आप जानेंगे कि उपनिवेशवाद ने उनकी िांदगी पर कितना गहरा असर डाला है और इन समुदायों ने आधुनिक समाज के दबावों का किस तरह सामना किया है। इस भाग में हम पहले भारत और उसके बाद अप़्रफीका के चरवाहों की िांदगी का अध्ययन करेंगे। घुमंतू चरवाहे और उनकी आवाजाही 1.1 पहाड़ों में जम्मू और कश्मीर के गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोग भेड़ - बकरियों के बड़े - बड़े रेवड़ रखते हैं। इस समुदाय के अध्िकतर लोग अपने मवेश्िायों के लिए चरागाहों की तलाश में भटकते - भटकते उन्नीसवीं सदी में यहाँ आए थे। जैसे - जैसे समय बीतता गया वे यहीं के होकर रह गएऋ यहीं बस गए। इसके बाद वे सदीर् - गमीर् के हिसाब से अलग - अलग चरागाहों में जाने लगे। जाड़ों में जब ऊँची पहाडि़याँ बपर्फ से ढक जातीं तो वे श्िावालिक की निचली़पहाडि़यों में आकर डेरा डाल लेते। जाड़ों में निचले इलाके में मिलने वाली सूखी झाडि़याँ ही उनके जानवरों के लिए चारा बन जातीं। अप्रैल के अंत तक वे उत्तर दिशा में जाने लगते - गमिर्यों के चरागाहों के लिए। इस सपफऱमें कइर् परिवार काप्िाफला बना कर साथ - साथ चलते थे। वे पीर पंजाल के दरो±़ड्डोत क 1850 के दशक में जी.सी.बान्सर् ने काँगड़ा के गुज्जरों का वणर्न इस प्रकार किया था: ‘पहाडि़यों मंे रहने वाले गुज्जर शु( चरवाहा कबीले के लोग हैं। वे लगभग न के बराबर खेती करते हैं। गियों के पास भेड़ - बकरियाँ होती हैं तो गुज्जर गाय - भैंस पालते हैं। ये लोग जंगलों के किनारे रहते हैं और दूध, घी और मवेश्िायों से मिलने वाली दूसरी चीशें बेच कर अपना पेट पालते हैं। घर के मदर् फ्रतों़मवेश्िायों को चराने ले जाते हैं और कइर् बार हतक घर नहीं लौटते। इस बीच वे जंगल में अपनेको पार करते हुए कश्मीर की घाटी में पहँुच जाते। जैसे ही गमिर्याँ शुरू होतीं, रेवड़ के साथ ही रहते हैं। औरतें सिर पर टोकरियाँ जमी हुइर् बपर्फ की मोटी चादर पिघलने लगती और चारों तरप़्ाफ हरियाली छा़और कंधे पर हाँडियाँ लटका कर रोज बाशार चली जाती। इन दिनों में यहाँ उगने वाली तरह - तरह की घास से मवेश्िायों का पेट भी भर जाता था और उन्हें सेहतमंद खुराक भी मिल जाती थी। सितंबर के अंत में बकरवाल एक बार पिफर अपना बोरिया - बिस्तर समेटने लगते। इस बार वे वापस अपने जाड़ों वाले ठिकाने की तरपफ नीचे की ओर चले जाते।़जब पहाड़ों की चोटियों पर बपर्फ जमने लगती तो वे निचली पहाडि़यों की़शरण में चले जाते। पास के ही पहाड़ों में चरवाहों का एक और समुदाय रहता था। हिमाचल प्रदेश के इस समुदाय को गद्दी कहते हैं। ये लोग भी मौसमी उतार - चढ़ाव का सामना करने के लिए इसी तरह सदीर् - गमीर् के हिसाब से अपनी जगह बदलते रहते थे। वे भी श्िावालिक की निचली पहाडि़यों में अपने मवेश्िायों को झाडि़यों में चराते हुए जाड़ा बिताते थे। अप्रैल आतेाफ चल पड़ते़- आते वे उत्तर की तरप्जाती हैं। उनकी हाँडियों में दूध, मक्खन और घी आदि होता है। वे सिपर्फ इतनी चीशें ही बाशार में ले़जा पाती हैं जितनी घर चलाने के लिए कापफी हों।़गमिर्यों में गुज्जर अपने रेवड़ों को लेकर प्रायः ऊपरी इलाकों में चले जाते हैं जहाँ उनकी भैंसों को न केवल बहुत सारी हरी - भरी बरसाती घास मिल जाती है और वे शीतोष्ण ;न श्यादा ठंडा, न श्यादा गरमद्ध मौसम के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेती हैं बल्िक उन शहरीली मक्िखयों से भी छुटकारा मिल जाता है जो मैदानों में उनका जीना मुहाल किए रहते हैं।’ जी सी बान्सर्, सेटलमेंट रिपोटर् आॅपफ काँगड़ा, 1850 - 55़और पूरी गमिर्याँ लाहौार्फ पिघलती और ऊ़चेल और स्पीति में बिता देते। जब बप्ँदरेर् खुल जाते तो उनमें से बहुत सारे ऊपरी पहाड़ों में स्िथत घास के मैदानों में जा पहुँैचते थे। सितंबर तक वे दोबारा वापस चल पड़ते। वापसी में वे लाहाल चित्रा 2 - मध्य गढ़वाल के उफँचे पहाड़ों में एक गुज्जर मंडपगुज्जर गड़रिये बुग्याल में मिलने वाले रिंगल ;एक तरह का पहाड़ी बाँसद्ध और घास से बने मंडपों में रहते हैं। इन्हीं मंडपों का इस्तेमाल कायर्स्थल के रूप में भी होता था। यहाँ गुज्जर घी निकालते थे और उसे बेचते थे। हाल के सालों में वे बसों और ट्रकों में भर कर भी दूध ले जाने लगे हैं। ये मंडप 10,000 से 11,000 प़ुफट की उफँचाइर् पर होते हैं। भैंसें इससे श्यादा उफँचाइर् पर नहीं जा सकतीं। चित्रा 3 - उफन उतरने का इंतशार। हिमाचल प्रदेश स्िथत पालमपुर के पास उह्ल घाटीऔर स्पीति के गाँवों में एक बार पिफर वुफछ समय के लिए रुकते। इस बीच वे गमिर्यों की पफसलें काटते और सदिर्यों की प़्ाफसलों की बुवाइर् करके आगे ़बढ़ जाते। यहाँ से वे अपने रेवड़ लेकर श्िावालिक की पहाडि़यों में जाड़ों वाले चरागाहों में चले जाते और अगली अप्रैल में भेड़ - बकरियाँ लेकर वे दोबारा ़गमिर्यों के चरागाहों की तरपफ रवाना हो जाते। आइए, अब शरा और पूवर् की तरपफ चलें। गढ़वाल और वुफमाऊ़ँ के गुज्जर ़चरवाहे सदिर्यों में भाबर के सूखे जंगलों की तरपफ और गमिर्यों में ऊपरी घास के ़मैदानों - बुग्याल - की तरपफ चले जाते थे। इनमें से बहुत सारे हरे - भरे चरागाहों की तलाश में उन्नीसवीं सदी में जम्मू से उत्तर प्रदेश की पहाडि़यांे में आए थे और बाद में यहीं बस गए। सदीर् - गमीर् के हिसाब से हर साल चरागाह बदलते रहने का यह चलन हिमालय के पवर्तों में रहने वाले बहुत सारे चरवाहा समुदायों में दिखायी देता था। यहाँ के भोटिया, शेरपा और किन्नौरी समुदाय के लोग भी इसी तरह के चरवाहे थे। ये सभी समुदाय मौसमी बदलावों के हिसाब से ख़ुद को ढालते थे और अलग - अलग इलाकों में पड़ने वाले चरागाहों का बेहतरीन इस्तेमाल करते थे। जब एक चरागाह की हरियाली खत्म हो जाती थी या इस्तेमाल के काबिल ़नहीं रह जाती थी तो वे किसी और चरागाह की तरपफ चले जाते थे। इस आवाजाही से चरागाह शरूरत से श्यादा इस्तेमाल से भी बच जाते थे और उनमें दोबारा हरियाली व िांदगी भी लौट आती थी। नए शब्द भाबर: गढ़वाल और वुफमाऊँ के इलाके में पहाडि़यों के निचले हिस्से के आसपास पाए जाने वाला शुष्क या सूखे जंगल का इलाका। बुग्याल: ऊँचे पहाड़ों में स्िथत घास के मैदान। 1.2 पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों में चरवाहे सिपर्फ पहाड़ों में ही नहीं रहते थे। वे पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों में़भी बहुत बड़ी संख्या में मौजूद थे। ध्ंगर महाराष्ट्रª का एक जाना - माना चरवाहा समुदाय है। बीसवीं सदी की शुरुआत में इस समुदाय की आबादी लगभग 4,67,000 थी। उनमें से श्यादातर गड़रिये या चरवाहे थे हालाँकि वुफछ लोग वफम्बल और चादरें भी बनाते थे जबकि वुफछ भैंस पालते थे। ध्ंगर गड़रिये बरसात के दिनों में महाराष्ट्रª के मध्य पठारों में रहते थे। यह एक अधर् - शुष्क इलाका था जहाँ बारिश बहुत कम होती थी और मिट्टी भी खास उपजाऊ नहीं थी। चारों तरपफ सिप़्ार्फ कंटीली झाडि़याँ होती थीं। ़बाजरे जैसी सूखी प़्ॅाफसलों के अलावा यहाँ और वुफछ नहीं उगता था। मानसून में यह पट्टी ध्ंगरों के जानवरों के लिए एक विशाल चरागाह बन जाती थी। अक्तूबर के आसपास ध्ंगर बाजरे की कटाइर् करते थे और चरागाहों की तलाश में पश्िचम की तरपफ चल पड़ते थे। करीब महीने भर पैदल चलने के बाद वे ़अपने रेवड़ों के साथ कोंकण के इलाके में जाकर डेरा डाल देते थे। अच्छी बारिश और उपजाऊ मिट्टी की बदौलत इस इलाके में खेती खूब होती थी। कोंकणी किसान भी इन चरवाहों का दिल खोलकर स्वागत करते थे। जिस समय ध्ंगर कोंकण पहँाफ़की प़्ुचते थे उसी समय कोंकण के किसानों को खरीपफसल काट ़कर अपने खेतों को रबी की पफसल के लिए दोबारा उपजाऊ बनाना होता था। ध्ंगरों के मवेशी खरीपफ की कटाइर् के बाद खेतों में बची रह गइर् ़ठूठोंँको खाते थे और उनके गोबर से खेतों को खाद मिल जाती थी। कोंकणी किसान ध्ंगरों को चावल भी देते थे जिन्हें वे वापस अपने पठारी इलाके में ले जाते थे क्योंकि वहाँ इस तरह के अनाज बहुत कम होते थे। माॅनसून की बारिश शुरू होते ही ध्ंगर कोंकण और तटीय इलाके छोड़कर सूखे पठारों की तरपफ लौट जाते थे क्योंकि ़भेड़ें गीले माॅनसूनी हालात को बदार्श्त नहीं कर पातीं। कनार्टक और आंध्र प्रदेश में भी सूखे मध्य पठार घास और पत्थरों से अटे पड़े थे। इनमें मवेश्िायों, भेड़ - बकरियों और गड़रियों का ही बसेरा रहता था। नए शब्द रबी: जाड़ों की पफसलें जिनकी कटाइर् माचर् ़के बाद शुरू होती है। खरीपफ: सितंबर - अक्तूबर में कटने वाली़प़्ाफसलें। ठूँठ: पौधें की कटाइर् के बाद शमीन में रह जाने वाली उनकी जड़। यहाँ गोल्ला समुदाय के लोग गाय - भैंस पालते थे जबकि वुफरुमा और वुफरुबा समुदाय भेड़ - बकरियाँ पालते थे और हाथ के बुने कम्बल बेचते थे। ये लोग जंगलों और छोटे - छोटे खेतों के आसपास रहते थे। वे अपने जानवरों की देखभाल के साथ - साथ कइर् दूसरे काम - धंधे भी करते थे। पहाड़ी चरवाहों के विपरीत यहाँ के चरवाहों का एक स्थान से दूसरे स्थान जाना सदीर् - गमीर् से तय नहीं होता था। ये लोग बरसात और सूखे मौसम के हिसाब से अपनी जगह बदलते थे। सूखे महीनों में वे तटीय इलाकों की तरप़्ाफ चले जाते थे जबकि बरसात शुरू होने पर वापस चल देते थे। माॅनसून के दिनों में तटीय ़इलाकों में जिस तरह के गीले दलदली हालात पैदा हो जाते थे वे सिपर्फ भैंसों को ही रास आ सकते थे। ऐेसे समय में बाकी जानवरों को सूखे पठारी इलाकों में ले जाना शरूरी था। चरवाहों में एक जाना - पहचाना नाम बंजारों का भी है। बंजारे उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कइर् इलाकों में रहते थे। ये लोग बहुत दूर - दूर तक चले जाते थे और रास्ते में अनाज और चारे के बदले गाँव वालों को खेत जोतने वाले जानवर और दूसरी चीशें बेचते जाते थे। वे जहाँ भी जाते अपने जानवरों के लिए अच्छे चरागाहों की खोज में रहते। ड्डोत ख ाफरों के विवरणों में हमें चरवाहा समुदायों की िांदगी की झलक मिलतीबहुत सारे मुसाप्ि़है। मिसाल के तौर पर, उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बुकानन ने मैसूर की अपनी यात्रा के दौरान गोल्ला समुदाय का दौरा किया था। अपने इस अनुभव के आधार पर उन्होंने लिखा: ‘उनके परिवार जंगलों के किनारे छोटे - छोटे गाँवों में रहते हैं। यहाँ वे थोड़ी - सी शमीन पर खेती करते हैं, थोड़े - बहुत जानवर रखते हैं और पास के कस्बों में जाकर दुग्ध उत्पाद बेचते हैं। उनके परिवार बहुत बड़े होते हैं। एक - एक घर में सात - आठ नौजवान आसानी से मिल जाएँगे। उनमें से दो - तीन लोग जंगल में जानवर चराते हैं जबकि बाकी अपने खेत संभालते हैं और कस्बों में जलावन की लकड़ी, छप्पर के लिए पुआल आदि पहुँचाते हैं।’ ियाकलाप ड्डोत क और ख को पढि़ए: ऽ इन ड्डोतों के आधार पर संक्षेप में बताइए कि चरवाहा परिवारों के औरत - मदर् क्या - क्या काम करते थे। ़ाफ मैसूर, कनारा एण्ड मालाबार ;लंदन, 1807द्ध। रहते हैं? राजस्थान के रेगिस्तानों में राइका समुदाय रहता था। इस इलाके में बारिश का कोइर् भरोसा नहीं था। होती भी थी तो बहुत कम। इसीलिए खेती की उपज हर साल घटती - बढ़ती रहती थी। बहुत सारे इलाकों में तो दूर - दूर तक कोइर् पफसल होती ही नहीं थी। इसके ़चलते राइका खेती के साथ - साथ चरवाही का भी काम करते थे। बरसात में तो बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर के राइका अपने गाँवों में ही रहते थे क्योंकि इस दौरान उन्हें वहीं चारा मिल जाता था। पर, अक्तूबर आते - आते ये चरागाह सूखने लगते थे। ़नतीजतन ये लोग नए चरागाहों की तलाश में दूसरे इलाकों की तरपफ निकल जाते थे और अगली बरसात में ही वापस लौटते थे। राइकाओं का एक तबका ऊँट पालता था जबकि वुफछ भेड़ - बकरियाँ पालते थे। इस तरह हम देख सकते हैं कि चरवाहा समुदायों की िांदगी कइर् ़चीशों के बारे में कापफी सोच - विचार करके आगे बढ़ती थी। उन्हें इस प़्रफांसिस हेमिल्टन बुकानन, ए जनीर् प्ऱफाॅम मद्रास थ्रू दि कंट्रीश आॅप्ऽ आपकी राय में चरवाहे जंगलों के आसपास ही क्यों चित्रा 7 - पश्िचमी राजस्थान में बलोतरा स्िथत उफँट मेलाउफँँाफरोख्त के लिए आते हैं। मेले में मारू राइका उफ़टों के प्रश्िाक्षण में अपनी महारत का भी प्रदशर्न करते हैं। इस मेले में गुजरात से घोड़े भी लाए जाते हैं।ँटपालक यहाँ उफटों की खरीद - प्बात का हमेशा खयाल रखना पड़ता था कि उनके रेवड़ एक इलाके में कितने दिन तक रह सकते हैं और उन्हें कहाँ पानी और चरागाह मिल सकते हैं। उन्हें न केवल एक इलाके से दूसरे इलाके में जाने का सही समय चुनना पड़ता था बल्िक यह भी देखना पड़ता था कि उन्हें किन इलाकों से गुशरने की छूट मिल पाएगी और किन इलाकों से नहीं। सपफर के दौरान उन्हें रास्ते में पड़ने वाले गाँवों ़के किसानों से भी अच्छे संबंध बनाने पड़ते थे ताकि उनके जानवर किसानों के खेतों में घास चर सवेंफ और उनको उपजाऊ बनाते चलें। अपनी रोजी - रोटी के जुगाड़ में उन्हें खेती, व्यापार और चरवाही, ये सारे काम करने पड़ते थे। आइए, अब देखें कि औपनिवेश्िाक शासन के दौरान यानी अंग्रेशों के शमाने में चरवाहों का जीवन किस तरह बदला? चित्रा 9 - मारू राइकाओं की वंशावली बताने वालावंशावली बताने वाला समुदाय का इतिहास बताता है। इस तरह की मौख्िाक परंपराओं से चरवाहा समुदायों को अपनी पहचान का भाव मिलता है। इन परंपराओं से हम यह पता लगा सकते हैं कि कोइर् समूह अपने अतीत को किस तरह देखता है। औपनिवेश्िाक शासन और चरवाहों का जीवन औपनिवेश्िाक शासन के दौरान चरवाहों की िांदगी में गहरे बदलाव आए। उनके चरागाह सिमट गए, इधर - उधर आने - जाने पर बंदिशें लगने लगीं और उनसे जो लगान वसूल किया जाता था उसमें भी वृि हुइर्। खेती में उनका हिस्सा घटने लगा और उनके पेशे और हुनरों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा। आइए देखें कि यह सब कैसे और क्यों हुआ? पहली बात: अंग्रेश सरकार चरागाहों को खेती की शमीन में तब्दील कर देना चाहती थी। शमीन से मिलने वाला लगान उसकी आमदनी का एक बड़ा ड्डोत था। खेती का क्षेत्रापफल बढ़ने से सरकार की आय में और बढ़ोतरी हो सकती थी। इतना ही नहीं, इससे जूट ;पटसनद्ध, कपास, गेहूँ और अन्य खेतिहर चीशों के उत्पादन में भी इजाप़्ाफा हो जाता जिनकी इंग्लैंड में बहुत श्यादा शरूरत रहती थी। अंग्रेश अपफसरों को बिना खेती की शमीन का कोइऱ्मतलब समझ में नहीं आता था: उससे न तो लगान मिलता था और न ही उपज। अंग्रेश ऐसी शमीन को ‘बेकार’ मानते थे। उसे खेती के लायक बनाना शरूरी था। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से देश के विभ्िान्न भागों में परती भूमि विकास के लिए नियम बनाए जाने लगे। इन कायदे - कानूनों के शरिए सरकार गैर - खेतिहर शमीन को अपने कब्शे में लेकर वुफछ खास लोगों को सौंपने लगी। इन लोगों को कइर् तरह की रियायतें दी गईं और इस शमीन को खेती के लायक बनाने और उस पर खेती करने के लिए जम कर बढ़ावा दिया गया। ऐसे वुफछ लोगों को गाँव का मुख्िाया बना दिया गया। इस तरह कब्शे में ली गइर् श्यादातर शमीन चरागाहों की थी जिनका चरवाहे नियमित रूप से इस्तेमाल किया करते थे। इस तरह खेती के पफैलाव से चरागाह सिमटने लगे और चरवाहों के लिए समस्याएँ पैदा होने लगीं। दूसरी बात: उन्नीसवीं सदी के मध्य तक आते - आते देश के विभ्िान्न प्रांतों में वन अिानियम भी पारित किए जाने लगे थे। इन कानूनों की आड़ में सरकार ने ऐसे कइर् जंगलों को ‘आरक्ष्िात’ वन घोष्िात कर दिया जहाँ देवदार या साल जैसी कीमती लकड़ी पैदा होती थी। इन जंगलों में चरवाहों के घुसने पर पाबंदी लगा दी गइर्। कइर् जंगलों को ‘संरक्ष्िात’ घोष्िात कर दिया गया। इन जंगलों में चरवाहों को चरवाही के वुफछ परंपरागत अिाकार तो दे दिए गए लेकिन उनकी आवाजाही पर पिफर भी बहुत सारी बंदिशें लगी रहीं। औपनिवेश्िाक अिाकारियों को लगता था कि पशुओं के चरने से छोटे जंगली पौधे और पेड़ों की नइर् कोपलें नष्ट हो जाती हैं। उनकी राय में, चरवाहों के रेवड़ छोटे पौधों को वुफचल देते हैं और कोंपलों को खा जाते हैं जिससे नए पेड़ों की बढ़त रुक जाती है। वन अध्िनियमों ने चरवाहों की िांदगी बदल डाली। अब उन्हें उन जंगलों में जाने से रोक दिया गया जो पहले मवेश्िायों के लिए बहुमूल्य चारे ड्डोत ग एच.एस.गिब्सन, वन उपसंरक्षक, दाजिर्लिंग, ने 1913 में लिखा था: ‘... चरवाही के लिए प्रयोग किए जा रहे जंगल को किसी और काम के लिए प्रयोग नहीं किया जाएगा और वहाँ से इमारती लकड़ी तथा ईंध्न इकट्ठा नहीं किया जाएगा जो मुख्य वन उत्पाद होते हैं ...’ ियाकलाप मान लीजिए कि जंगलों में जानवरों को चराने पर रोक लगा दी गइर् है। इस बात पर निम्नलिख्िात की दृष्िट से टिप्पणी कीजिए: ऽ एक वन अिाकारी ऽ एक चरवाहा नए शब्द परंपरागत अध्िकारः परंपरा और रीति - रिवाज के आधर पर मिलने वाले अध्िकार। का ड्डोत थे। जिन क्षेत्रों में उन्हें प्रवेश की छूट दी गइर् वहाँ भी उन पर कड़ी नशर रखी जाती थी जंगलों में दाख्िाल होने के लिए उन्हें परमिट लेना पड़ता था। जंगल में उनके प्रवेश और वापसी की तारीख पहले से तय होती थी और वह जंगल में बहुत कम ही दिन बिता सकते थे। अब चरवाहे किसी जंगल में श्यादा समय तक नहीं रह सकते थे भले ही वहाँ चारा कितना ही हो, घास कितनी भी क्यों न हो, और चारों तरपफ घनी हरियाली हो। उन्हें इसलिए निकलता पड़ता था क्योंकि अब उनकी िांदगी वन विभाग द्वारा जारी किए परमिटों के अध्ीन थी। परमिट में पहले ही लिख दिया जाता था कि वह कानूनन कब तक जंगल में रहेंगे। अगर वह समय - सीमा का उल्लंघन करते थे तो उन पर जुमार्ना लगा दिया जाता था। तीसरी बात: अंग्रेश अप़्ाफसर घुमंतू किस्म के लोगों को शक की नशर से देखते थे। वे गाँव - गाँव जाकर अपनी चीशें बेचने वाले कारीगरों व व्यापारियों और अपने रेवड़ के लिए हर साल नए - नए चरागाहों की तलाश में रहने वाले, हर मौसम में अपनी रिहाइश बदल लेने वाले चरवाहों पर यकीन नहीं कर पाते थे। वे चाहते थे कि ग्रामीण जनता गाँवों में रहे, उनकी रिहाइश और खेतों पर उनके अिाकार तय हों। इस तरह की आबादी की पहचान करना और उसको नियंत्रिात करना श्यादा आसान था जो एक जगह टिक कर रहती हो। ऐसे लोगों को शांतिपि्रय और कानून का पालन करने वाला माना जाता थाऋ घुमंतुओं को अपराधी माना जाता था। 1871 में औपनिवेश्िाक सरकार ने अपराधी जनजाति अिानियम ;ब्तपउपदंस ज्तपइमे ।बजद्ध पारित किया। इस कानून के तहत दस्तकारों, व्यापारियों और चरवाहों के बहुत सारे समुदायों को अपराधी समुदायों की सूची में रख दिया गया। उन्हें वुफदरती और जन्मजात अपराधी घोष्िात कर दिया गया। इस कानून के लागू होते ही ऐसे सभी समुदायों को वुफछ खास अिासूचित गाँवों/बस्ितयों में बस जाने का हुक्म सुना दिया गया। उनकी बिना परमिट आवाजाही पर रोक लगा दी गइर्। ग्राम्य पुलिस उन पर सदा नशर रखने लगी। चैथी बात: अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए अंग्रेशों ने लगान वसूलने का हर संभव रास्ता अपनाया। उन्होंने शमीन, नहरों के पानी, नमक, खरीद - पफरोख्त की चीशों और यहाँ तक कि मवेश्िायों पर भी टैक्स वसूलने़का एलान कर दिया। चरवाहों से चरागाहों में चरने वाले एक - एक जानवर पर टैक्स वसूल किया जाने लगा। देश के श्यादातर चरवाही इलाकों में उन्नीसवीं सदी के मध्य से ही चरवाही टैक्स लागू कर दिया गया था। प्रति मवेशी टैक्स की दर तेशी से बढ़ती चली गइर् और टैक्स वसूली की व्यवस्था दिनोंदिन मशबूत होती गइर्। 1850 से 1880 के दशकों के बीच टैक्स वसूली का काम बाकायदा बोली लगा कर ठेकेदारों को सौंपा जाता था। ठेकेदारी पाने के लिए ठेकेदार सरकार को जो पैसा देते थे उसे वसूल करने और साल भर में श्यादा से श्यादा मुनाप़्ाफा बनाने के लिए वे जितना चाहे उतना कर वसूल सकते थे। 1880 के दशक तक आते - आते सरकार ने अपने कारिंदों के माध्यम से सीधे चरवाहों से ही कर वसूलना शुरू कर दिया। हरेक चरवाहे को एक ‘पास’ जारी कर दिया गया। किसी भी चरागाह में दाख्िाल होने के लिए चरवाहों को ड्डोत घ 1920 के दशक में राॅयल कमीशन आॅन एग्रीकल्चर ने अपनी रिपोटर् में लिखा कि: ‘बढ़ती आबादी, सिंचाइर् सुविधाओं के विस्तार और रक्षा, उद्योग एवं कृष्िा प्रायोगिक उद्योगों के लिए सरकार द्वारा चरागाहों के अिाग्रहण की वजह से चरवाही के लिए उपलब्ध इलाकों के क्षेत्रापफल में बहुत भारी गिरावट आइर् है। ख्अब, पशुपालकों को बड़े - बड़े रेवड़ रखने में मुश्िकल पैदा हो रही है। इसकी वजह से उनकी आमदनी में गिरावट आइर् है। उनके जानवरों की गुणवत्ता और खुराक गिर गइर् है और कशेर् बढ़ते जा रहे हैं।’ द रिपोटर् आॅपफ द राॅयल कमीशन आॅन एग्रीकल्चर इऩइंडिया, 1928ियाकलाप कल्पना कीजिए कि आप उन्नीसवीं सदी के आख्िारी सालों यानी सन् 1890 के आसपास रह रहे हैं। आप घुमंतू चरवाहों या कारीगरों के एक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। आपको पता चला है कि सरकार ने आपके समुदाय को अपराधी समुदाय घोष्िात कर दिया है। ऽ संक्षेप में बताइए कि यह जानकर आपको कैसा महसूस होता और आप क्या करते। ऽ स्थानीय कलेक्टर को चिट्ठी लिखकर बताइए कि आपकी नशर में यह कानून किस तरह अन्यायपूणर् है और इससे आपकी िांदगी पर क्या असर पड़ेंगे। पास दिखाकर पहले टैक्स अदा करना पड़ता था। चरवाहे के साथ कितने जानवर हैं और उसने कितना टैक्स चुकाया है, इस बात को उसके पास में दजर् कर दिया जाता था। 2.1 इन बदलावों ने चरवाहों की जिंदगी को किस तरह प्रभावित किया? इन चीशों की वजह से चरागाहों की गंभीर कमी पैदा हो गइर्। जैसे - जैसे श्यादा से श्यादा चरागाहों को सरकारी कब्शे में लेकर उन्हें खेतों में बदला जाने लगा, वैसे - वैसे चरागाहों के लिए उपलब्ध इलाका सिवुफड़ने लगा। इसी तरह, जंगलों के आरक्षण का नतीजा यह हुआ कि गड़रिये और पशुपालक अब अपने मवेश्िायों को जंगलों में पहले जैसी आशादी से नहीं चरा सकते थे। जब चरागाह खेतों में बदलने लगे तो बचे - खुचे चरागाहों में चरने वाले जानवरों की तादाद बढ़ने लगी। इसका नतीजा यह हुआ कि चरागाह सदा जानवरों से भरे रहने लगे। अब तक तो घुमंतू चरवाहे अपने मवेश्िायों को वुफछ दिन तक ही एक इलाके में चराते थे और उसके बाद किसी और इलाके में चले जाते थे। इस अदला - बदली की वजह से पिछले चरागाह भी पिफर से हरे - भरे हो जाते थे। लेकिन चरवाहों की आवाजाही पर लगी बंदिशों इस नक्शे में केवल उन चरवाहा समुदायों के इलाकों का उल्लेख किया गया है जिनके बारे में इस अध्याय में बात की गइर् है। इनके अलावा भी हमारे देश में कइर् और चरवाहा समुदाय रहते हैं। और चरागाहों के बेहिसाब इस्तेमाल से चरागाहों का स्तर गिरने लगा। जानवरों के लिए चारा कम पड़ने लगा। पफलस्वरूप जानवरों की सेहत और तादाद भी गिरने लगी। चारे की कमी और जब - तब पड़ने वाले अकाल की वजह से कमशोर और भूखे जानवर बड़ी संख्या में मरने लगे। 2.2 चरवाहों ने इन बदलावों का सामना कैसे किया? इन बदलावों पर चरवाहों की प्रतििया कइर् रूपों में सामने आइर्। वुफछ चरवाहों ने तो अपने जानवरों की संख्या ही कम कर दी। अब बहुत सारे जानवरों को चराने के लिए पहले की तरह बड़े - बड़े और बहुत सारे मैदान नहीं बचे थे। जब पुराने चरागाहों का इस्तेमाल करना मुश्िकल हो गया तो वुफछ चरवाहों ने नए - नए चरागाह ढूँढ़ लिए। मिसाल के तौर पर, ऊँट और भेड़ पालने वाले राइका 1947 के बाद न तो सिंध में दाख्िाल हो सकते थे और न सिंधु नदी के किनारे अपने जानवरों को चरा सकते थे। भारत और पाकिस्तान के बीच खींच दी गइर् नइर् सीमारेखा ने उन्हें उस तरपफ जाने से़रोक दिया। शाहिर है अब उन्हें जानवरों को चराने के लिए नइर् जगह ढूँढ़नी थी। अब वे हरियाणा के खेतों में जाने लगे हैं जहाँ कटाइर् के बाद खाली पड़े खेतों में वे अपने मवेश्िायों को चरा सकते हैं। इसी समय खेतों को खाद की भी शरूरत रहती है जो उन्हें इन जानवरों के मल - मूत्रा से मिल जाती है। समय गुशरने के साथ वुफछ धनी चरवाहे शमीन खरीद कर एक जगह बस कर रहने लगे। उनमें से वुफछ नियमित रूप से खेती करने लगे जबकि वुफछ व्यापार करने लगे। जिन चरवाहों के पास श्यादा पैसा नहीं था वे सूदखोरों से ब्याज पर कशर् लेकर दिन काटने लगे। इस चक्कर में बहुतों के मवेशी भी हाथ से जाते रहे और वे मशदूर बन कर रह गए। वे खेतों या छोटे - मोटे कस्बों में मशदूरी करते दिखाइर् देने लगे। इस सबके बावजूद चरवाहे न केवल आज भी िांदा हैं बल्िक हाल के दशकों में कइर् जगह तो उनकी संख्या में वृि भी हुइर् है। जब भी किसी इलाके के चरागाहों में उनके दाख्िाले पर रोक लगा दी जाती वे अपनी दिशा बदल लेते, रेवड़ छोटा कर लेते और नइर् दुनिया के मिशाज से तालमेल बिठाने के लिए दूसरे काम - धंधे भी करने लगते। बहुत सारे पारिस्िथति विज्ञानी मानते हैं कि सूखे इलाकों और पहाड़ों में िांदा रहने के लिए चरवाही ही सबसे व्यावहारिक रास्ता है। बहरहाल, चरवाहों पर इस तरह के बदलाव सिप़्ार्फ हमारे देश में ही नहीं थोपे गए थे। दुनिया के बहुत सारे इलाकों में नए कानूनों और बसाहट के नए तौर - तरीकों ने उन्हें आधुनिक दुनिया में आ रहे बदलावों के मुताबिक अपनी िांदगी का ढरार् बदलने पर मजबूर किया है। आधुनिक विश्व में आए इन बदलावों से निपटने के लिए बाकी देशों के चरवाहों ने क्या रास्ते अपनाए? अप़्रफीका में चरवाहा जीवन ़्रचरवाहा आबादी रहती है। आज भी अप़्रफीका के लगभग सवा दो करोड़ लोग रोशी - रोटी के लिए किसी न किसी तरह की चरवाही गतिवििायों पर ही आश्रित हैं। इनमें बेदुइर्न्स, बरबेसर्, मासाइर्, सोमाली, बोरान और तुकार्ना जैसे जाने - माने समुदाय भी शामिल हैं। इनमें से श्यादातर अब अधर् - शुष्क घास के मैदानों या सूखे रेगिस्तानों में रहते हैं जहाँ वषार् आधारित खेती करना बहुत मुश्िकल है। यहाँ के चरवाहे गाय - बैल, ऊँट, बकरी, भेड़ व गधे पालते हैं और दूध, माँस, पशुओं की खाल व ऊन आदि बेचते हैं। वुफछ चरवाहे व्यापार और यातायात संबंधी काम भी करते हैं। वुफछ चरवाही के साथ - साथ खेती भी करते हैं। वुफछ लोग चरवाही से होने वाली मामूली आय से गुजर नहीं हो पाने पर कोइर् भी धंधा कर लेते हैं। हिंदुस्तान की तरह अप़्रफीकी चरवाहों की िांदगी में भी औपनिवेश्िाक और उत्तर - औपनिवेश्िाक काल में गहरे बदलाव आए हैं। आख्िार क्या थे ये बदलाव? आइए अब शरा अप़फीका की तरपफ चलें जहाँ दुनिया की आधी से श्यादा बदलती परिस्िथतियों के कारण मासाइर् मक्का, चावल, आलू, गोभी जैसे उन खाद्य पदाथो± पर निभर्र होते जा रहे हैं जो उनके इलाके में पैदा नहीं होते। परंपरागत रूप से वे इन चीशों को पसंद नहीं करते थे। मासाइर् मानते हैं कि पफसल उगाने के लिए शमीन पर हल चलाना प्रवृफति के विरु( हैऋ यदि आप शमीन पर खेती करने लगते हैं तो वह चरवाही के लायक़नहीं रहती। सौजन्य: द मासाइर् एसोसिएशन। ़छोटी तस्वीर ;इनसेटद्ध में कीनिया और तंशानिया में मासाइयों का इलाका दशार्या गया है। इन परिवतर्नों को हम चरवाहों के एक खास समुदाय के माध्यम से समझने की कोश्िाश करेंगे। चलिए इसके लिए मासाइर् नाम के समुदाय को चुन लेते हैं। मासाइर् पशुपालक मोटे तौर पर पूवीर् अप़्रफीका के निवासी हैं। इनमें से लगभग 3,00,000 दक्ष्िाणी कीनिया में और करीब 1,50,000 तंशानिया में रहते हैं। अभी हम देखेंगे कि नए कानूनों और बंदिशों ने किस तरह न केवल उनकी शमीन उनसे छीन ली बल्िक उनकी आवाजाही पर भी बहुत सारी पाबंदियाँ थोप दी हैं। इन कानूनों के कारण सूखे के दिनों मंे उनकी िांदगी गहरे तौर पर बदल गइर् है और उनके सामाजिक संबंध भी एक नइर् शक्ल में ढल गए हैं। 3.1 चरागाहों का क्या हुआ? मासाइयों की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि उनके चरागाह दिनोंदिन सिमटते जा रहे हैं। औपनिवेश्िाक शासन से पहले मासाइर्लैंड का इलाका उत्तरी कीनिया से लेकर तंशानिया के घास के मैदानों ;स्तेपीशद्ध तक पफैला हुआ था। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में यूरोप की साम्राज्यवादी ताकतों ने अप्ऱफीका में कब्शे के लिए मारकाट शुरू कर दी और बहुत सारे इलाकों को छोटे - छोटे उपनिवेशों में तब्दील करके अपने - अपने कब्शे में ले लिया। 1885 में बि्रटिश कीनिया और जमर्न तांगान्ियका के बीच एक अंतरार्ष्ट्रीय तांगान्ियका के बारे में बि्रटेन ने पहले विश्वयु( के दौरान उस इलाके पर कब्शा कर लिया जिसे जमर्न इर्स्ट अप़्रफीका कहा जाता था। 1919 में तांगान्ियका बि्रटिश नियंत्राण में आ गया। 1961 में उसे आशादी मिली और 1964 में शंशीबार के विलय के बाद उसे तंशानिया का नया नाम दिया गया। सीमा खींचकर मासाइर्लैंड के दो बराबर - बराबर टुकड़े कर दिए गए। बाद के सालों में सरकार ने गोरों को बसाने के लिए बेहतरीन चरागाहों को अपने कब्शे में ले लिया। मासाइयों को दक्ष्िाणी कीनिया और उत्तरी तंशानिया के छोटे से इलाके में समेट दिया गया। औपनिवेश्िाक शासन से पहले मासाइयों के पास जितनी शमीन थी उसका लगभग 60 पफीसदी हिस्सा उनसे छीऩलिया गया। उन्हें ऐसे सूखे इलाकों में वैफद कर दिया गया जहाँ न तो अच्छी बारिश होती थी और न ही हरे - भरे चरागाह थे। उन्नीसवीं सदी के अंतिम सालों से बि्रटिश औपनिवेश्िाक सरकार पूवीर् अप्ऱफीका में भी स्थानीय किसानों को अपनी खेती के क्षेत्रापफल को श्यादा से श्यादा पफैलाने के लिए प्रोत्साहित करने लगी। जैसे - जैसे खेती का प्रसार हुआ वैसे - वैसे चरागाह खेतों में तब्दील होने लगे। अंग्रेशों के आने से पहले मासाइर् आथ्िार्क और राजनीतिक, दोनों स्तर पर अपने किसान पड़ोसियों पर भारी पड़ते थे। औपनिवेश्िाक शासन के अंत तक आते - आते यह समीकरण बिल्वुफल उलट चुका था। बहुत सारे चरागाहों को श्िाकारगाह बना दिया गया। कीनिया में मासाइर् मारा व साम्बूरू नैशनल पावर्फ और तंशानिया में सेरेन्गेटी पावर्फ जैसे श्िाकारगाह इसी तरह अस्ितत्व में आए थे। इन आरक्ष्िात जंगलों में चरवाहों का आना मना था। इन इलाकों में न तो वे श्िाकार कर सकते थे और न अपने जानवरों को चरा सकते थे। ऐसे बहुत सारे आरक्ष्िात जंगलों में अब तक मासाइर् अपने ढोर - डंगर चराया करते थे। मिसाल के तौर पर सेरेन्गेटी नैशनल पावर्फ का 14,760 वगर् किलोमीटर से भी श्यादा क्षेत्रापफल मासाइयों के चरागाहों पर कब्शा करके बनाया गया था। ड्डोत च अप़्ाफीका की अन्य जगहों पर भी चरवाहों को इसी तरह की मुश्िकलों का सामना करना्र पड़ा। दक्ष्िाण - पश्िचम अप़्रफीका में स्िथत नामीबिया के काओकोलैंड चरवाहे परंपरागत रूप से काओकोलैंड और पास ही में स्िथत ओवाम्बोलैंड के बीच आते - जाते रहते थे। ये लोग आसपास के बाशारों में जानवरों की खाल, गोश्त और अन्य वस्तुएँ बेचा करते थे। नइर् भौगोलिक सीमाओं ने दूर - दूर के इलाकों में उनके आने - जाने पर पाबंदी लगा दी जिससे उनका पहले की तरह दोनों इलाकों में आना - जाना पूरी तरह बंद हो गया। नामीबिया स्िथत काओकोलैंड के घुमंतू पशुपालकों की श्िाकायत थी: ‘हम बड़ी मुश्िकल में हैं। हम बस रोते रहते हैं। हमें वैफद में डाल दिया गया है। हमें तो पता भी नहीं कि हमें बंद क्यों किया गया है। हम जेल में हैं। हमारे पास रहने की कोइर् जगह नहीं है...। हम दक्ष्िाण से गोश्त नहीं ला सकते...। खालों को बाहर नहीं भेज सकते..। ओवाम्बोलैंड अब हमारे लिए बंद हो चुका है। हम लंबे समय तक ओवाम्बोलैंड में रहे हैं। हम अपने जानवरों को, अपनी भेड़ों और बकरियों को वहाँ ले जाना चाहते हैं। पर सीमाएँ बंद हैं। ये सीमाएँ हमें मारे दे रही हैं। जीना मुश्िकल है।’ नामीबिया स्िथत काओकोलैंड के चरवाहों का बयान, नामीबिया, 1949़माइकेल बाॅलिग, ‘द काॅलोनियल एनकेप्स्युलेशन आॅपफ द नाॅथर् वेस्टनर् नामीबियन पास्टोरल इकाॅनाॅमी’, अप़्रफीका, 68 ;4द्ध, 1998 में उ(ृत। 111 ड्डोत छ अच्छे चरागाहों और जल संसाधनों के हाथ से निकल जाने की वजह से उस छोटे से इलाके पर दबाव बहुत श्यादा बढ़ गया जिसमें मासाइयों को धकेल दिया गया था। एक छोटे - से इलाके में लगातार चरायी का नतीजा यह हुआ कि चरागाहों का स्तर गिरने लगा। चारे की हमेशा कमी रहने लगी। मवेश्िायों का पेट भरना एक स्थायी समस्या बन गया। 3.2 सरहदें बंद हो गईं उन्नीसवीं सदी में चरवाहे चरागाहों की खोज में बहुत दूर - दूर तक चले जाते थे। जब एक जगह के चरागाह सूख जाते थे तो वे अपने रेवड़ लेकर किसी और जगह चले जाते थे। लेकिन उन्नीसवीं सदी के आख्िारी दशकों से औपनिवेश्िाक सरकार उनकी आवाजाही पर तरह - तरह की पाबंदियाँ लगाने लगी। मासाइयों की तरह अन्य चरवाहों को भी विशेष आरक्ष्िात इलाकों की सीमाओं में वैफद कर दिया गया। अब ये समुदाय इन आरक्ष्िात इलाकों की सीमाओं के पार आ - जा नहीं सकते थे। वे विशेष परमिट लिए बिना अपने जानवरों को लेकर बाहर नहीं जा सकते थे। लेकिन परमिट हासिल करना भी कोइर् आसान काम नहीं था। इसके लिए उन्हें तरह - तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता था और उन्हें तंग किया जाता था। अगर कोइर् नियमों का पालन नहीं करता था तो उसे कड़ी सशा दी जाती थी। चरवाहों को गोरों के इलाके में पड़ने वाले बाशारों में दाख्िाल होने से भी रोक दिया गया। बहुत सारे इलाकों में तो वे कइर् तरह के व्यापार भी नहीं कर सकते थे। बाहर से आए गोरे और यूरोपीय औपनिवेश्िाक अपफसर उन्हें ़खतरनाक और बबर्र स्वभाव वाला मानते थे। उनकी नशर में ये ऐसे लोग थे जिनके साथ कम से कम संबंध रखना ही उचित था। लेकिन इन स्थानीय लोगों से किसी भी तरह के संबंध न रखना भी मुमकिन नहीं था। आख्िार खानों से माल निकालने, सड़वेंफ बनाने और शहर बसाने के लिए गोरों को इन कालों के श्रम का ही तो भरोसा था। नइर् सरहदों ने चरवाहों की िांदगी रातों - रात बदल डाली। नइर् पाबंदियों और बाधाओं की आड़ में उन्हें प्रताडि़त किया जाने लगा और वे छोटे - से इलाके में खुद को वैफद - सा महसूस करने लगे। इससे उनकी चरवाही और व्यापारिक, दोनों तरह की गतिवििायों पर बहुत बुरा असर पड़ा। अब तक चरवाहे न केवल मवेशी चराते थे बल्िक तरह - तरह के व्यवसाय भी किया करते थे। औपनिवेश्िाक शासन के अंतगर्त थोप दी गइर् बंदिशों से उनका व्यापार बंद तो नहीं हुआ लेकिन अब उस पर तरह - तरह के अंवुफश शरूर लग गए। 3.3 जब चरागाह सूख जाते हैं सूखा दुनिया भर के चरवाहों की िांदगी पर असर डालता है। जिस साल बारिश नहीं होती और चरागाह सूख जाते हैं अगर उस साल मवेश्िायों को किसी हरे - भरे इलाके में न ले जाया जाए तो उनके सामने भुखमरी का संकट पैदा हो जाता है। इसीलिए परंपरागत तौर पर चरवाहे घुमंतू स्वभाव के लोग होते हैं, वे यहाँ से वहाँ जाते ही रहते हैं। इसी घुमंतूपने की वजह से वे बुरे वक्त का सामना कर पाते हैं और संकट से बच निकलते हैं। लेकिन औपनिवेश्िाक शासन की स्थापना के बाद तो मासाइयों को एक निश्िचत इलाके में वैफद कर दिया गया था। उनके लिए एक इलाका आरक्ष्िात कर दिया गया और चरागाहों की खोज में यहाँ - वहाँ भटकने पर रोक लगा दी गइर्। उन्हें बेहतरीन चरागाहों से महरूम कर दिया गया और एक ऐसी अधर् - शुष्क पट्टी में रहने पर मजबूर कर दिया गया जहाँ सूखे की आशंका हमेशा बनी रहती थी। क्योंकि ये लोग संकट के समय भी अपने जानवरों को लेकर ऐसी जगह नहीं जा सकते थे जहाँ उन्हें अच्छे चरागाह मिल सकते थे। इसलिए सूखे के सालों में मासाइयों के बहुत सारे मवेशी भूख और बीमारियों की वजह से मारे जाते थे। 1930 की एक जाँच से पता चला कि कीनिया में मासाइयों के पास 7,20,000 मवेशी, 8,20,000 भेड़ और 1,71,000 गधे थे। 1933 और 1934 में पड़े केवल दो साल के सूखे के बाद इनमें से आधे से श्यादा जानवर मर चुके थे। जैसे - जैसे चरने की जगह सिवुफड़ती गइर्, सूखे के दुष्परिणाम भयानक रूप लेते चले गए। बार - बार आने वाले बुरे सालों की वजह से चरवाहों के जानवरों की संख्या में लगातार गिरावट आती गइर्। 3.4 सब पर एक जैसा असर नहीं पड़ा ़्रआए बदलावों से सारे चरवाहों पर एक जैसा असर नहीं पड़ा। उपनिवेश बनने से पहले मासाइर् समाज दो सामाजिक श्रेण्िायों में बँटा हुआ था - वरिष्ठ जन ;ऐल्डसर्द्ध और यो(ा ;वाॅरियसर्द्ध। वरिष्ठ जन शासन चलाते थे। समुदाय से ़औपनिवेश्िाक काल में अपफीका के बाकी स्थानों की तरह मासाइर्लैंड में भी जुड़े मामलों पर विचार - विमशर् करने और अहम पैफसले लेने के लिए वे समय - समय पर सभा करते थे। यो(ाओं में श्यादातर नौजवान होते थे जिन्हें मुख्य रूप से लड़ाइर् लड़ने और कबीले की हिपफाशत करने के लिए तैयाऱकिया जाता था। वे समुदाय की रक्षा करते थे और दूसरे कबीलों के मवेशी छीन कर लाते थे। जहाँ जानवर ही संपिा हो वहाँ हमला करके दूसरों के जानवर छीन लेना एक महत्त्वपूणर् काम होता था। अलग - अलग चरवाहा समुदायों की ताकत इन्हीं हमलों से तय होती थी। युवाओं को यो(ा वगर् का हिस्सा तभी माना जाता था जब वे दूसरे समूह के मवेश्िायों को छीन कर और चित्रा 16 - यो(ा गहरे लाल रंग की शुका और चमकदार मोतियों के आभूषण पहनते हैं तथा स्टील की नोक वाला पाँच पुफट लंबा ़भाला रखते हैं। बारीकी से सँवारे गए उनके बाल गेरू से रंगे होते हैं। उगते सूरज को सम्मान देने के लिए वे पूवर् की ओर मुँह करके खड़े होते हैं। यो(ा अपने समुदाय की रक्षा करते हैं और लड़के पशुओं को चराते हैं। सूखे के मौसम में यो(ा और लड़के, दोनों ही पशु चराते हैं। सौजन्य: द मासाइर् एसोसिएशन। चित्रा 17 - आज भी यो(ा बनने के लिए युवकों को व्यापक अनुष्ठानों से गुशरना पड़ता है हालाँकि अब यह प्रथा पहले जैसी प्रचलित नहीं है। इसके लिए युवकों को लगभग चार माह तक अपने कबीले के इलाके का दौरा करना पड़ता है। इस यात्रा के अंत में वे छापामारों की तरह दौड़कर अपने अहाते में घुसते हैं। इस समारोह के मौके पर युवक ढीले कपड़े पहनते हैं और पूरे दिन नाचते रहते हैं। इस अनुष्ठान के साथ ही वे जीवन के एक नए चरण में पहुँच जाते हैं। लड़कियों को इस तरह के अनुष्ठानों से नहीं गुशरना पड़ता। सौजन्य: द मासाइर् एसोसिएशन। यु( में बहादुरी का प्रदशर्न करके अपनी मदार्नगी साबित कर देते थे। पिफर भी वे वरिष्ठ जनों के नीचे रह कर ही काम करते थे। मासाइयों के मामलों की देखभाल करने के लिए अंग्रेश सरकार ने कइर् ़ऐसे पैफसले लिए जिनसे आने वाले सालों में बहुत गहरे असर पड़े। उन्होंने कइर् मासाइर् उपसमूहों के मुख्िाया तय कर दिए और अपने - अपने कबीले के सारे मामलों की िाम्मेदारी उन्हें ही सौंप दी। इसके बाद उन्होंने हमलों और लड़ाइयों पर पाबंदी लगा दी। इस तरह वरिष्ठ जनों और यो(ाओं, दोनों की परंपरागत सत्ता बहुत कमशोर हो गइर्। जैसे - जैसे समय बीता, औपनिवेश्िाक सरकार द्वारा नियुक्त किए गए मुख्िाया माल इकट्टòा करने लगे। उनके पास नियमित आमदनी थी जिससे वे जानवर, साशो - सामान और शमीन खरीद सकते थे। वे अपने गरीब पड़ोसियों को लगान चुकाने के लिए कशर् पर पैसा देते थे। उनमें से श्यादातर बाद में शहरों में जाकर बस गए और व्यापार करने लगे। उनके बीवी - बच्चे गाँव में ही रहकर जानवरों की देखभाल करते थे। उन्हें चरवाही और गैर - चरवाही, दोनों तरह की आमदनी होती थी। अगर उनके जानवर किसी वजह से घट जाएँ तो वे और जानवर खरीद सकते थे। जो चरवाहे सिपर्फ अपने जानवरों के सहारे िांदगी बसर करते थे उनकी़हालत अलग थी। उनके पास बुरे वक्त का सामना करने के लिए अकसर साधन नहीं होते थे। यु( और अकाल के दौरान उनका सब वुफछ खत्म हो जाता था। तब उन्हें काम की तलाश में आसपास के शहरों की शरण लेनी पड़ती थी। कोइर् कच्चा कोयला जलाने का काम करने लगता था तो कोइर् वुफछ और करता था। जिनकी तकदीर श्यादा अच्छी थी उन्हें सड़क या भवन निमार्ण कायो± में काम मिल जाता था। इस तरह मासाइर् समाज में दो स्तरों पर बदलाव आए। पहला, वरिष्ठ जनों और यो(ाओं के बीच उम्र पर आधारित परंपरागत पफवर्फ पूरी तरह खत्म भले़न हुआ हो पर बुरी तरह अस्त - व्यस्त शरूर हो गया। दूसरा, अमीर और गरीब चरवाहों के बीच नया भेदभाव पैदा हुआ। निष्कषर् इस तरह हम देखते हैं कि आधुनिक विश्व में आए बदलावों से दुनिया के अलग - अलग चरवाहा समुदायों पर अलग - अलग तरह के असर पड़े हैं। नए कानूनों और सीमाओं ने उनकी आवाजाही का ढरार् बदल दिया। जैसे - जैसे चरागाह खत्म होते गए, जानवरों को चराना एक मुश्िकल काम होता चला गया और जो चरागाह बचे थे वे भी अत्यिाक इस्तेमाल की वजह से बेकार हो गए। सूखे के समय उनकी समस्याएँ पहले से भी श्यादा बढ़ गईं क्योंकि तब उनके जानवर बड़ी तादाद में दम तोड़ने लगते थे। अब उनके आने - जाने पर बहुत सारी बंदिशें थोप दी गइर् थीं इसलिए वे नए चरागाहों की तलाश भी नहीं कर सकते थे। पिफर भी चरवाहे बदलते वक्त के हिसाब से ख़ुद को ढालते हैं। वे अपनी सालाना आवाजाही का रास्ता बदल लेते हैं, जानवरों की संख्या कम कर लेते हैं, नए इलाकों में दाख्िाल होने के लिए हर संभव लेन - देन करते हैं और राहत, रियायत व मदद के लिए सरकार पर राजनीतिक दबाव डालते हैं। वे उन इलाकों में अपने अिाकारों को बचाए रखने के लिए अपना संघषर् जारी रखते हैं जहाँ से उन्हें खदेड़ने की कोश्िाश की जाती है और जंगलों के रखरखाव और प्रबंधन में अपना हिस्सा माँगते हैं। चरवाहे अतीत के अवशेष नहीं हैं। वे ऐसे लोग नहीं हैं जिनके लिए आज की आधुनिक दुनिया में कोइर् जगह नहीं है। पयार्वरणवादी और ़अथर्शास्त्राी अब इस बात को कापफी गंभीरता से मानने लगे हैं कि घुमंतू चरवाहों की जीवनशैली दुनिया के बहुत सारे पहाड़ी और सूखे इलाकों में ियाकलाप 1. कल्पना कीजिए कि यह 1950 का समय है और आप 60 वषीर्य राइका पशुपालक हैं। आप अपनी पोती को बता रहे हैं कि आशादी के बाद से आपके जीवन में क्या बदलाव आए हैं। आप उसे क्या बताएँगे? 2. मान लीजिए कि आपको एक प्रसि( पत्रिाका ने उपनिवेशवाद से पहले अप्ऱफीका में मासाइयों की स्िथति के बारे में एक लेख लिखने के लिए कहा है। वह लेख लिख्िाए और उसे एक संुदर शीषर्क दीजिए। 3. चित्रा 11 और 13 में चिित चरवाहा समुदायों में से वुफछ समुदायों के बारे में और जानकारियाँ इकऋा कीजिए। ियाकलाप प्रश्न

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