जीविका, अथर्व्यवस्था एवं समाज जीविका, अथर्व्यवस्था एवं समाज खण्ड प्प् में हम जीविका और अथर्व्यवस्थाओं के बारे में अध्ययन करेंगे। यहाँ हम इस बात पर विचार करेंगे कि आध्ुनिक विश्व में वनवासियों, चरवाहा समुदायों और किसानों की िांदगी में किस तरह के बदलाव आए और इन बदलावों को तय करने में उन्होंने किस तरह का योगदान दिया। आध्ुनिक विश्व का उदय वैफसे हुआ है, इस बात पर विचार करते हुए हम अकसर कारखानों और शहरों पर और बाशार को आपूतिर् करने वाले औद्योगिक और कृष्िा क्षेत्रों पर ही ध्यान देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि इन क्षेत्रों के बाहर दूसरी अथर्व्यवस्थाएँ भी हैं, दूसरे लोग भी हैं जो राष्ट्र के लिए महत्त्व रखते हैं। आध्ुनिक दृष्िट से देखने पर ऐसा लगता है कि चरवाहों और वनवासियों, घुमंतू किसानों और खाने की चीशें बीन कर गुशर करने वालों की िांदगी अतीत में ही कहीं अटक कर रह गइर् है। समकालीन विश्व के उदय का अध्ययन करते हुए उनके प्रति हमारा रवैया वुफछ ऐसा रहता है मानो उनकी िांदगी का कोइर् महत्त्व ही न हो। खण्ड प्प् के अध्यायों में इस बात को रेखांकित किया गया है कि हमें उनकी िांदगी के बारे मंे जानना चाहिएऋ हमें देखना चाहिए कि वे अपनी दुनिया को वैफसे व्यवस्िथत करते हैं और वैफसे अपनी रोशी - रोटी चलाते हैं। ये लोग भी पूरी तरह उसी दुनिया का हिस्सा हैं जिसमें हम आज रह रहे हैं। वे गुशरे हुए शमाने के बचे - खुचे लोग नहीं हैं। अध्याय 4 में आप जंगलों की सैर करेंगे। यहाँ आप देखेंगे कि जंगलों में रहने वाले विविध् समुदाय जंगलों का किस - किस तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। यहाँ आपको पता चलेगा कि उन्नीसवीं सदी में उद्योग और शहरों, जहाशरानी और रेलवे के उदय व विस्तार से लकड़ी और अन्य वन उत्पादों के लिए जंगलों पर दबाव कितना बढ़ गया था। इन नइर् शरूरतों और माँगों के चलते जंगलों के प्रयोग से संबंध्ित कायदे - कानून बदले गए और जंगलों के रखरखाव की एक नइर् प(ति सामने आइर्। यहाँ इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि जंगलों पर औपनिवेश्िाक नियंत्राण वैफसे कायम हुआ, वैफसे वन क्षेत्रों को मापा गया, पेड़ों का वगीर्करण किया गया और बागान विकसित किए गए। इन सारे परिवतर्नों से वन संसाध्नों का इस्तेमाल करने वाले स्थानीय समुदायों की जिं़दगी पर भी असर पड़ा। उन्हें नइर् व्यवस्था में काम करने और अपने जीवन को नए सिरे से संगठित करने ़के लिए विवश किया गया। लेकिन बहुध उन्होंने इन नियमों और कानूनों के ख्िालापफ बगावत भी की और सरकारों को अपनी नीतियाँ बदलने के लिए बाध्य किया। इस अध्याय में आपको इस बात का अंदाशा मिलेगा कि भारत और इंडोनेश्िाया में इन परिवतर्नों का इतिहास क्या रहा है। फीका के पहाड़ों और रेगिस्तानों, मैदानों और पठारों में चरवाहों के पदचिÉों को ़ा्रअध्याय 5 में भारत और अप् ढूँढ़ने की कोश्िाश की गइर् है। इन दोनों क्षेत्रों में चरवाहा समुदाय आबादी का एक महत्त्वपूणर् हिस्सा है। पिफर भी हम विरले ही कभी उनके जीवन का अध्ययन करते हैं। उनवफा इतिहास पाठ्यपुस्तकों के पन्नों में शामिल नहीं हो पाता। अध्याय 5 में आपको पता चलेगा कि जंगलों पर स्थापित होते जा रहे नियंत्राण, कृष्िा विस्तार और चरागाहों के सिमटते जाने से उनके जीवन पर किस तरह के असर पड़े। इस हिस्से में आपको उनके आवागमन, अपने समुदाय के साथ उनके संबंधें और बदलते परिवेश के अनुरूप वह खुद को वैफसे ढालते हैं, इसके बारे में जानने का मौका मिलेगा। अध्याय 6 में हम किसानों और काश्तकारों की जिंदगी में आए परिवतर्नों के बारे में पढ़ेंगे। इस अध्याय में हम भारत, इंग्लैंड और अमेरिका की परिस्िथतियों का अध्ययन करेंगे। पिछली दो शताब्िदयों के दौरान खेती को संगठित करने के तरीके में गहरे बदलाव आए हैं। नइर् तकनीक और नइर् माँगों, नये नियमों और कानूनों, संपिा की नयी अवधरणाओं ने ग्रामीण दुनिया की शक्ल - सूरत पूरी तरह बदल डाली है। पूँजीवाद और उपनिवेशवाद ने ग्रामीणों के जीवन को सिरे से बदल डाला है। अध्याय 6 आपको इन बदलावों से परिचित कराएगा और इस अध्ययन से आपको अहसास होगा कि समाज के विभ्िान्न तबकोंअमीर - गरीब,कृमदर् - औरत, बच्चों और वयस्कोंकृपर किस तरह के अलग - अलग असर पड़े। जब तक हम विभ्िान्न समुदायों और समाजों के जीवन में आ रहे परिवतर्नों को देखना - बूझना शुरू नहीं करेंगे तब तक इस बात को अच्छी तरह नहीं समझ पाएँगे कि आज की दुनिया वैफसे बनी है। साथ ही आधुनिकीकरण की समस्याओं को भी हम तब तक पूरी तरह नहीं समझ पाएँगे जब तक कि हम उससे पयार्वरण पर पड़ रहे प्रभावों पर विचार नहीं करेंगे। वन्य - समाज और उपनिवेशवाद अपने स्वूफल और घर में चारों ओर नशर दौड़ाकर उन सभी वस्तुओं को पहचानें जो जंगल की हैं - इस किताब का कागश, मेश - वुफस्िर्ायाँ, दरवाशे - ख्िाड़कियाँ, वे रंग जिनसे आपके कपड़े रंगे जाते हैं, मसाले, आपकी टाॅपफी के सेलोप़्ोफन रैपर, बीडि़यों के तेंदू पत्ते, गोंद, शहद, काॅप़्ाफी, चाय औऱरबड़। साथ ही चाॅकलेट में इस्तेमाल होने वाला तेल जो साल के बीजों से निकलता है, खाल से चमड़ा बनाने में इस्तेमाल होने वाला चमर्शोधक ;टैनिनद्ध या दवाओं के रूप में इस्तेमाल होने वाली जड़ी - बूटियाँ - इन सबको भी हमें नहीं भूलना चाहिए। और हाँ, बाँस, जलावन की लकड़ी, घास, कच्चा कोयला, पैविंफग में उपयोग होने वाली वस्तुएँ, पफल - पूफल, पशु - पक्षी एवं ढेरों दूसरी चीशें भी तो जंगलों से ही आती हैं। ऐमेशाॅन या पश्िचमी घाट के जंगलों के एक ही टुकड़े में पौधें की 500 अलग - अलग प्रजातियाँ मिल जाती हैं। यह विविध्ता तेशी से लुप्त होती जा रही है। औद्योगीकरण के दौर में सन् 1700 से 1995 के बीच 139 लाख वगर् किलोमीटर जंगल यानी दुनिया के वुफल क्षेत्रापफल का 9.3 प्रतिशत भाग औद्योगिक इस्तेमाल, खेती - बाड़ी, चरागाहों व ईंधन की लकड़ी के लिए साप़्ाफ कर दिया गया। चित्रा 1 - यह छत्तीसगढ़ का एक साल वन हैघना होने के कारण जंगल की सतह तक सूरज की रोशनी यहाँ कम ही पहुँच पाती है। इस चित्रा में आप पेड़ - पौधें के विभ्िान्न आकार और प्रजातियाँ देख सकते हैं। वनों का विनाश क्यों? वनों के लुप्त होने को सामान्यतः वन - विनाश कहते हैं। वन - विनाश कोइर् नयी समस्या नहीं है। वैसे तो यह प्रिया कइर् सदियों से चली आ रही थी लेकिन औपनिवेश्िाक शासन के दौरान इसने कहीं अध्िक व्यवस्िथत और व्यापक रूप ग्रहण कर लिया। आइए, भारत में वन - विनाश के वुफछ कारणों पर गौर करें। 1.1 शमीन की बेहतरी सन् 1600 में हिंदुस्तान के वुफल भू - भाग के लगभग छठे हिस्से पर खेती होती थी। आज यह आँकड़ा बढ़ कर आधे तक पहुँच गया है। इन सदियों के दौरान जैसे - जैसे आबादी बढ़ती गयी और खाद्य पदाथो± की माँग में भी वृि हुइर्, वैसे - वैसे किसान भी जंगलों को साप़्ाफ करके खेती की सीमाओं को विस्तार देते गए। औपनिवेश्िाक काल में खेती में तेशी से पैफलाव आया। चित्रा 2 - ह्नेन द वैलीश वर पुफल ;जब घाटियाँ भरी पड़ी थींद्ध। जाॅन डाॅसन की पेंटिंगलाकोता जैसे देशज अमेरिकी आदिवासी समूह, जो इन विशाल उत्तर - अमेरिकी मैदानों में रहते थे, का अथर्तंत्रा अत्यंत वैविध्यपूणर् था। वे मक्का उगाते, बीसन का श्िाकार करते और जंगली पौधें की खोज में रहते थे। अंगे्रश आबादकारों ने बीसनों के लिए विशाल भू - भाग को खुला छोड़ना बेकार समझा। 1860 के बाद बीसनों की बहुत बड़ी संख्या में हत्या की गइर्। इसकी कइर् वजहें थीं। पहली, अंग्रेशों ने व्यावसायिक पफसलों जैसे पटसन, ़गन्ना, गेहूँ व कपास के उत्पादन को जम कर प्रोत्साहित किया। उन्नीसवीं सदी के यूरोप में बढ़ती शहरी आबादी का पेट भरने के लिए खाद्यान्न और औद्योगिक उत्पादन के लिए कच्चे माल की शरूरत थी। लिहाशा इन पफसलों ़बाॅक्स 1 किसी स्थान पर खेती न होने का मतलब उस जगह का गैर - आबाद होना नहीं है। जब गोरे आबादकार आॅस्ट्रेलिया पहुँचे तो उन्होंने दावा किया कि यह महाद्वीप खाली था। वास्तव में, ये आदिवासी पथ - प्रदशर्कों के नेतृत्व में, पुरातन रास्तों से इस भू - भाग में प्रविष्ट हुए थे। आॅस्ट्रेलिया के विभ्िान्न आदिवासी समुदायों के अपने स्पष्ट विभाजित इलाके थे। आॅस्ट्रेलिया के नगारिर्न्दशेरियों ;छहंततपदकरमतपद्ध की अपनी शमीन की आकृति इनके पहले पूवर्ज, नगुरूनदेरी ;छहनतनदकमतपद्ध के प्रतीकात्मक शरीर जैसी थी। यह शमीन पाँच अलग - अलग प्राकृतिक प्रदेशों: खारे पानी, झीलों, झाडि़यों, रेगिस्तानी मैदानों, नदीतटीय मैदानों को अपने में समेटे हुए थी, जो अलग - अलग सामाजिक - आथ्िार्क शरूरतों को पूरा किया करते थे। की माँग में इजापफा हुआ। दूसरी वजह यह थी कि उन्नीसवीं सदी की ़शुरुआत में औपनिवेश्िाक सरकार ने जंगलों को अनुत्पादक समझा। उनके हिसाब से इस व्यथर् के बियाबान पर खेती करके उससे राजस्व और कृष्िा उत्पादों को पैदा किया जा सवफता था और इस तरह राज्य की आय में बढ़ोतरी की जा सकती थी। यही वजह थी कि 1880 से 1920 के बीच खेती योग्य शमीन के क्षेत्रापफल में 67 लाख हेक्टेयर की बढ़त हुइर्। खेती के विस्तार को हम विकास वफा सूचक मानते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शमीन को जोतने के पहले जंगलों की कटाइर् करनी पड़ती है। 1.2 पटरी पर स्लीपर ड्डोत क परती शमीन पर कब्शा करके उसे खेती के योग्य बनाया जाए, यह विचार सारी दुनिया के उपनिवेशकों के बीच शुरू से ही लोकपि्रय रहा है। यही वह विचार था जिसने विजय को न्यायोचित ठहराया। अमेरिकी लेखक रिचडर् हाडि±ग 1896 में मध्य - अमेरिका के हाॅन्डूरास के बारे में लिखते हंैः ‘आज इससे बढ़कर रोचक सवाल वुफछ और नहीं हो सकता कि दुनिया की गैर - विकसित पड़ी शमीन का क्या किया जाएऋ क्या इसे उस महान शक्ित के हाथों में जाना चाहिए जो इसके परिवतर्न की इच्छा रखती है या कि इसे इसके वास्तविक स्वामी के हाथों में ही रहने देना चाहिए, जो इसके मूल्य को नहीं समझ सकता। ये मध्य - अमेरिकी एक सुसज्िजत घर में अध्र् - बबर्रों के गिरोह जैसे हैं जो न तो इस घर का उपयोग ही कर सकते हैं और न ही इसमें आराम।’ तीन साल बाद अमेरिकी - आध्िपत्य में यूनाइटेड पू्रफट वंफपनी का गठन हुआ जिसने व्यापक पैमाने पर मध्य - अमेरिका में केले उगाना प्रारंभ किया। इस कंपनी ने इन मुल्कों की सरकारों पर इस हद तक अपना वचर्स्व स्थापित कर लिया था कि इन्हें ‘बनाना रिपब्िलक’ के नाम से जाना गया। ़डेविड स्पर, ‘द रेटरिक आॅपफ एम्पायर’ ;1993द्ध में उ(ृत। नए शब्द स्लीपरः रेल की पटरी के आर - पार लगे लकड़ी के तख्ते जो पटरियों को उनकी जगह पर रोके रखते हैं। चित्रा 3 - सिंहभूम के जंगलों में साल के तनों से ‘स्लीपरों’ का निमार्ण, छोटा नागपुर, मइर् 1897रेल की पटरी हेतु स्लीपर बनाने के लिए वन - विभाग पेड़ों को काटने और इनसे पटरे बनाने के लिए तो आदिवासियों को नियुक्त किया करता था लेकिन उनको अपने घर बनाने के लिए इन पेड़ों को काटने की अनुमति न थी। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक इंग्लैंड में बलूत ;ओकद्ध के जंगल लुप्त होने लगे थे। इसकी वजह से शाही नौसेना के लिए लकड़ी की आपूतिर् में मुश्िकल आ खड़ी हुइर्। मशबूत और टिकाऊ लकड़ी की नियमित आपूतिर् के बिना अंगे्रशी जहाश भला वैफसे बन सकते थे? और जहाशों के बिना शाही सत्ता वैफसे बचाइर् और बनाए रखी जा सकती थी? 1820 के दशक में खोजी दस्ते हिंदुस्तान की वन - संपदा का अन्वेषण करने के लिए भेजे गए। एक दशक के भीतर बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाने लगे और भारी मात्रा में लकड़ी का हिंदुस्तान से नियार्त होने लगा। 1850 के दशक में रेल लाइनों के प्रसार ने लकड़ी के लिए एक नइर् तरह की माँग पैदा कर दी। शाही सेना के आवागमन और औपनिवेश्िाक व्यापार के लिए रेल लाइनें अनिवायर् थीं। इंजनों को चलाने के लिए ईंध्न के तौर पर और रेल की पटरियों को जोड़े रखने के लिए ‘स्लीपरों’ के रूप में लकड़ी की भारी शरूरत थी। एक मील लंबी रेल की पटरी के लिए 1760 - 2000 स्लीपरों की आवश्यकता पड़ती थी। भारत में रेल - लाइनों का जाल 1860 के दशक से तेशी से पफैला। 1890 तक लगभग 25,500 कि.मी. लंबी लाइनें बिछायी जा चुकी थीं। 1946 में इन लाइनों की लंबाइर् 7,65,000 कि.मी. तक बढ़ चुकी थी। रेल लाइनों के प्रसार के साथ - साथ बड़ी तादाद में पेड़ भी काटे गए। अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में 1850 के दशक में प्रतिवषर् 35, 000 पेड़ स्लीपरों के लिए काटे गए। सरकार ने आवश्यक मात्रा की आपूतिर् के लिए निजी ठेके दिए। इन ठेकेदारों ने बिना सोचे - समझे पेड़ काटना शुरू कर दिया। रेल लाइनों के इदर् - गिदर् जंगल तेशी से गायब होने लगे। चित्रा 4 - बाँस के बेड़े कासालाँग नदी में बह कर जाते हुए, चि‘गाँग पवर्तीय प‘ीचित्रा 5 - रंगून के एक लकड़ी गोदाम में लकड़ी के शहतीर सहेजता हुआ हाथीऔपनिवेश्िाक दौर में अकसर हाथ्िायों का इस्तेमाल जंगलों और लकड़ी के गोदामों में भारी - भरकम लकड़ी को उठाने के लिए किया जाता था। ड्डोत ख ियाकलाप ‘मुल्तान और सुक्कूर के बीच इंडस वैली रेलवे नाम से लगभग 300 मील लंबी एक नइर् लाइन बनायी जानी थी। 2000 स्लीपर प्रति मील की दर से, इसके लिए एक मील लंबी रेल की पटरी के लिए 1,760 से 2,000 10 पुफट़× 10 इंच × 5 इंच ;या 3.5 घन पुफट प्रति इकाइर्द्ध के 600,000 स्लीपर की ़तक स्लीपर की शरूरत थी। यदि 3 मीटर लंबी बड़ी शरूरत होगी या कि 2,00,000 क्यूबिक पफीट से ऊपर लकड़ी की। इन इंजनों को़लाइन की पटरी बिछाने के लिए एक औसत कद के ईंध्न के लिए लकड़ी चाहिए। दोनों तरप़्ाफ प्रतिदिन एक ट्रेन व एक मन प्रति ट्रेन - मील पेड़ से 3 - 5 स्लीपर बन सकते हैं तो हिसाब लगा करके हिसाब से सालाना 2,19,000 मन की शरूरत होगी। इसके अलावा ईंटों के लिए देखें कि एक मील लंबी पटरी बिछाने के लिए कितनेभी भारी मात्रा में ईंध्न की शरूरत होगी। स्लीपर मुख्य रूप से सिंध् के जंगलों से पेड़ काटने होंगे?आया करेंगे। यह ईंध्न, सिंध् और पंजाब के झाऊ ;ज्ंउंतपेाद्ध और झांड ;श्रींदकद्ध के जंगलों से लाया जाना था। दूसरी नयी लाइन नाॅदर्नर् स्टेट रेलवे, लाहौर से मुल्तान तक थी। आँकड़ों के हिसाब से इसके निमार्ण के लिए 22,00,000 स्लीपर की शरूरत होगी।’ इर्.पी.स्टेबिंग, द प़्ाफाॅरेस्ट्स आॅप़्ाफ इंडिया, भाग प्प् ;1923द्ध। 1.3 बागान यूरोप में चाय, काॅप़्ाफी और रबड़ की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए इन वस्तुओं के बागान बने और इनके लिए भी प्राकृतिक वनों का एक भारी हिस्सा सापफ किया गया। औपनिवेश्िाक सरकार ने जंगलों को अपने कब्शे में ़लेकर उनके विशाल हिस्सों को बहुत सस्ती दरों पर यूरोपीय बागान मालिकों को सौंप दिया। इन इलाकों की बाड़ाबंदी करके जंगलों को सापफ कर दिया ़गया और चाय - काॅपफी की खेती की जाने लगी। ़चित्रा 8 - प्लेशर ब्राँड चाय व्यावसायिक वानिकी की शुरुआत पिछले खंड में हमने देखा कि जहाश और रेल की पटरियाँ बिछाने के लिए अंग्रेशों को जंगलों की शरूरत थी। अंग्रेशों को इस बात की चिंता थी कि स्थानीय लोगों द्वारा जंगलों का उपयोग व व्यापारियों द्वारा पेड़ों की अंधध्ुंध् कटाइर् से जंगल नष्ट हो जाएँगे। इसलिए उन्होंने डायटिªच बै्रंडिस नामवफ जमर्न विशेषज्ञ को इस विषय पर मशविरे के लिए बुलाया और उसे देश का पहला वन महानिदेशक नियुक्त किया गया। बै्रंडिस ने महसूस किया कि लोगों को संरक्षण विज्ञान में प्रश्िाक्ष्िात करना और जंगलों के प्रबंधन के लिए एक व्यवस्िथत तंत्रा विकसित करना होगा। इसके लिए कानूनी मंशूरी की शरूरत पड़ेगी। वन संपदा के उपयोग संबंधी नियम तय करने पड़ेंगे। पेड़ों की कटाइर् और पशुओं को चराने जैसी गतिवििायों पर पाबंदी लगा कर ही जंगलों को लकड़ी उत्पादन के लिए आरक्ष्िात किया जा सकेगा। इस तंत्रा की अवमानना करके पेड़ काटने वाले ियाकलाप यदि 1862 में भारत सरकार की बागडोर आपके हाथ में होती और आप पर इतने व्यापक पैमाने पर रेलों के लिए स्लीपर और ईंधन आपूतिर् की िाम्मेवारी होती तो आप इसके लिए कौन - कौन से कदम उठाते? चित्रा 9 - इटली स्िथत टस्कनी में पोपलर के जंगल का एक व्यवस्िथत गलियारापोपलर के जंगल मुख्यतः लकड़ी के लिए महत्त्व रखते हैं। पत्तों, पफलों या दूसरे उत्पादों के लिए ये उपयोगी नहीं हैं। एक समान लंबाइर् वाले और सीध् में लगे इन पेड़ों को देखें। यही वह माॅडल है जिसे ‘वैज्ञानिक’ वानिकी ने प्रोत्साहित किया। इंाफारेस्ट रिकाॅडर्स़्, भाग ग्ट से ।डियन प्किसी भी व्यक्ित को सशा का भागी बनना होगा। इस तरह बै्रंडिस ने 1864 में भारतीय वन सेवा की स्थापना की और 1865 के भारतीय वन अिानियम नया शब्द वैज्ञानिक वानिकी: वन विभाग द्वारा पेड़ों की कटाइर् जिसमें पुराने पेड़ काट कर उनकी जगह नए पेड़ लगाए जाते हैं। को सूत्राब( करने में सहयोग दिया। इम्पीरियल प्ाफाॅरेस्ट रिसचर् इंस्टीट्यूट की स्थापना 1906 में देहरादून में हुइर्। यहाँ जिस प(ति की श्िाक्षा दी जाती थी उसे ‘वैज्ञानिक वानिकी’ ;साइंटिप्ि़़ाफक पफाॅरेस्ट्रीद्ध कहा गया। लेकिन आज पारिस्िथतिकी विशेषज्ञों सहित श्यादातर लोग मानते हैं कि यह प(ति कतइर् वैज्ञानिक नहीं है। वैज्ञानिक वानिकी के नाम पर विविध् प्रजाति वाले प्राकृतिक वनों को काट डाला गया। इनकी जगह सीध्ी पंक्ित में एक ही किस्म के पेड़ लगा दिए गए। इसे बागान कहा जाता है। वन विभाग के अध्िकारियों ने जंगलों का सवेर्क्षण किया, विभ्िान्न किस्म के पेड़ों वाले क्षेत्रा की नाप - जोख की और वन - प्रबंध्न के लिए योजनाएँ बनायीं। उन्होंने यह भी तय किया कि बागान का कितना क्षेत्रा प्रतिवषर् काटा जाएगा। कटाइर् के बाद खाली शमीन पर पुनः पेड़ लगाए जाने थे ताकि वुफछ ही वषो± में यह क्षेत्रा पुनः कटाइर् के लिए तैयार हो जाए। 1865 में वन अध्िनियम के लागू होने के बाद इसमें दो बार संशोधन किए गए - पहले 1878 में और पिफर 1927 में। 1878 वाले अध्िनियम में जंगलों को तीन श्रेण्िायों में बाँटा गया: आरक्ष्िात, सुरक्ष्िात व ग्रामीण। सबसे अच्छे जंगलों को ‘आरक्ष्िात वन’ कहा गया। गाँव वाले इन जंगलों से अपने उपयोग के लिए वुफछ भी नहीं ले सकते थे। वे घर बनाने या इर्ंध्न के लिए केवल सुरक्ष्िात या ग्रामीण वनों से ही लकड़ी ले सकते थे। 2.1 लोगों का जीवन कैसे प्रभावित हुआ? एक अच्छा जंगल वैफसा होना चाहिए इसके बारे में वनपालों और ग्रामीणों के विचार बहुत अलग थे। जहाँ एक तरपफ ग्रामीण अपनी अलग - अलग शरूरतों, ़गाँव वाले उजाला होने के पहले ही उठकर जमीन पर गिरे हुए महुआ के पूफलों को बीनने के लिए जंगल चले जाते। महुआ के पेड़ बेशकीमती हैं। महुआ के पूफल खाए भी जा सकते हैं और इनका इस्तेमाल शराब बनाने के लिए भी किया जा सकता है। इसके बीजों से तेल भी बनाया जाता है। जैसे ईंध्न, चारे व पत्तों की पूतिर् के लिए वन में विभ्िान्न प्रजातियों का मेल चाहते थे, वहीं वन - विभाग को ऐसे पेड़ों की शरूरत थी जो जहाशों और रेलवे के लिए इमारती लकड़ी मुहैया करा सवेंफ, ऐसी लकडि़याँ जो सख्त, लंबी और सीध्ी हों। इसलिए सागौन और साल जैसी प्रजातियों को प्रोत्साहित किया गया और दूसरी किस्में काट डाली गईं। वन्य इलाकों में लोग कंद - मूल - पफल, पत्ते आदि वन - उत्पादों का विभ्िान्न शरूरतों के लिए उपयोग करते हैं। पफल और कंद अत्यंत पोषक खाद्य हैं, विशेषकर माॅनसून के दौरान जब प्ाफसल कट कर घर न आयी हो। दवाओं के लिए जड़ी - बूटियों का इस्तेमाल होता है, लकड़ी का प्रयोग हल जैसे खेती के औशार बनाने में किया जाता है, बाँस से बेहतरीन बाड़ें बनायी जा सकती हैं और इसका उपयोग छतरी तथा टोकरी बनाने के लिए भी किया जा सकता है। सूखे हुए वुफम्हड़े के खोल का प्रयोग पानी की बोतल के रूप में किया जा सकता है। जंगलों में लगभग सब वुफछ उपलब्ध् है - पत्तों को जोड़ - जोड़ कर ‘खाओ - पफेंको’ किस्म के पत्तल और दोने बनाए जा सकते हैं, सियादी ;ठंनीपतपं अंीपसपद्धकी लताओं से रस्सी बनायी जा सकती है, सेमूर ;सूती रेशमद्ध की काँटेदार छाल पर सब्िशयाँ छीली जा सकती हैं, महुए के पेड़ से खाना पकाने और रोशनी के लिए तेल निकाला जा सकता है। ़खलिहानों से पुरुष टोकरियों में अनाज ला रहे हैं। पुरुष अपने वंफधों के आर - पार एक छड़ी में बंध्ी टोकरियों को लाते हैं जबकि औरतंे इन टोकरियों को अपने सिर पर रख कर लाती हैं। वन अध्िनियम के चलते देश भर में गाँव वालों की मुश्िकलें बढ़ गईं। इस कानून के बाद घर के लिए लकड़ी काटना, पशुओं को चराना, कंद - मूल - पफल इकट्ठा करना आदि रोशमरार् की गतिविध्ियाँ गैरकानूनी बन गईं। अब उनके पास जंगलों से लकड़ी चुराने के अलावा कोइर् चारा नहीं बचा और पकड़े जाने की स्िथति में वे वन - रक्षकों की दया पर होते जो उनसे घूस ऐंठते थे। जलावनी लकड़ी एकत्रा करने वाली औरतें विशेष तौर से परेशान रहने लगीं। मुफ्ऱत खाने - पीने वफी मांग करके लोगों को तंग करना पुलिस और जंगल के चैकीदारों के लिए सामान्य बात थी। 2.2 वनों के नियमन से खेती कैसे प्रभावित हुइर्? यूरोपीय उपनिवेशवाद का सबसे गहरा प्रभाव झूम या घुमंतू खेती की प्रथा पर ियाकलाप वन - प्रदेशों में रहने वाले बच्चे पेड़ - पौधें की सैकड़ों प्रजातियों के नाम बता सकते हैं। आप पेड़ - पौधें की कितनी प्रजातियों के नाम जानते हैं? ाफीका व दक्ष्िाण अमेरिका के अनेक भागों में यह़्रदिखायी पड़ता है। एश्िाया, अप्खेती का एक परंपरागत तरीका है। इसके कइर् स्थानीय नाम हैं जैसे - ाफीका में चितमेन ़ लादिंग, मध्य अमेरिका में मिलपा, अप््रदक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया में या तावी व श्रीलंका में चेना। हिंदुस्तान में घुमंतू खेती के लिए धया, पेंदा, बेवर, नेवड़, झूम, पोड़ू, खंदाद और वुफमरी ऐसे ही वुफछ स्थानीय नाम हैं। घुमंतू कृष्िा के लिए जंगल के वुफछ भागों को बारी - बारी से काटा और जलाया जाता है। माॅनसून की पहली बारिश के बाद इस राख में बीज बो दिए जाते हैं और अक्तूबर - नवंबर में पफसल काटी जाती है। इन खेतों पर दो - एक ़साल खेती करने के बाद इन्हें 12 से 18 साल तक के लिए परती छोड़ दिया जाता है जिससे वहाँ पिफर से जंगल पनप जाए। इन भूखंडों में मिश्रित पफसलें ़उगायी जाती हैं जैसे मध्य भारत और अप्ऱफीका में ज्वार - बाजरा, ब्राशील में कसावा और लैटिन अमेरिका के अन्य भागों में मक्का व पफलियाँ। यूरोपीय वन रक्षकों की नशर में यह तरीका जंगलों के लिए नुकसानदेह था। उन्होंने महसूस किया कि जहाँ वुफछेक सालों के अंतर पर खेती की जा रही हो ऐसी शमीन पर रेलवे के लिए इमारती लकड़ी वाले पेड़ नहीं उगाए घुमंतू खेती में जंगलों को सापफ किया जाता है। सामान्यतः च़‘ानों की ढलानों पर पेड़ों को काटने के बाद राख के लिए इन्हें जला दिया जाता है। इसके बाद इस क्षेत्रा में पिफर बीज बिखेर दिए जाते हैं और वषार् से सिंचाइर् के लिए इन्हें छोड़ दिया जाता है। जा सकते। साथ ही, जंगल जलाते समय बाकी बेशकीमती पेड़ों के भी पैफलती लपटों की चपेट में आ जाने का खतरा बना रहता है। घुमंतू खेती के कारण सरकार के लिए लगान का हिसाब रखना भी मुश्िकल था। इसलिए सरकार ने घुमंतू खेती पर रोक लगाने का पैफसला किया। इसके परिणामस्वरूप अनेक समुदायों को जंगलों में उनके घरों से जबरन विस्थापित कर दिया गया। वुफछ को अपना पेशा बदलना पड़ा तो वुफछ ने छोटे - बड़े विद्रोहों के शरिए प्रतिरोध् किया। 2.3 श्िाकार की आशादी किसे थी? जंगल संबंध्ी नए कानूनों ने वनवासियों के जीवन को एक और तरह से प्रभावित किया। वन कानूनों के पहले जंगलों में या उनके आसपास रहने वाले बहुत सारे लोग हिरन, तीतर जैसे छोटे - मोटे श्िाकार करके जीवनयापन करते थे। यह पारंपरिक प्रथा अब गैर - कानूनी हो गयी। श्िाकार करते हुए पकड़े जाने वालों को अवैध् श्िाकार के लिए दंडित किया जाने लगा। जहाँ एक तरपफ वन कानूनों ने लोगों को श्िाकार के परंपरागत अध्िकार ़से वंचित किया, वहीं बड़े जानवरों का आखेट एक खेल बन गया। हिंदुस्तान में बाघों और दूसरे जानवरों का श्िाकार करना सदियों से दरबारी और नवाबी संस्कृति का हिस्सा रहा था। अनेक मुगल कलाकृतियों में शहशादों और सम्राटों को श्िाकार का मशा लेते हुए दिखाया गया है। किंतु औपनिवेश्िाक शासन के दौरान श्िाकार का चलन इस पैमाने तक बढ़ा कि कइर् प्रजातियाँ बच्चे अपने माँ - बाप के साथ जंगल जाते हैं और बहुत जल्द ही वे मछली पकड़ना, वन - उत्पादों को इकट्ठा करना व खेती करना सीख लेते हैं। बाँस के ट्रैप को, जिसे यह लड़का अपने बाएँ हाथ में पकड़े है, बहाव के मुहाने पर रखने पर मछली इसमें चली आती है। पफोटो में मृत बाघों की गिनती करें। बि्रटिश औपनिवेश्िाक अप़्ाफसर और राजा जब श्िाकार के लिए जाते तब उनके साथ नौकरों की एक पूरी प़्ाफौज होती थी। गाँव के वुफशल श्िाकारी़हाँका लगाते थे और साहब को बस गोली भर चलाना होता था । लगभग पूरी तरह लुप्त हो गईं। अग्रेशों की नशर में बड़े जानवर जंगली, बबर्र और आदि समाज के प्रतीक - चिÉ थे। उनका मानना था कि खतरनाक जानवरों को मार कर वे हिन्दुस्तान को सभ्य बनाएँगे। बाघ, भेडि़ये और दूसरे बड़े जानवरों के श्िाकार पर यह कह कर इनाम दिए गए कि इनसे किसानों को खतरा है। 1875 से 1925 के बीच इनाम के लालच में 80,000 से श्यादा बाघ, 1,50,000 तेंदुए और 2,00,000 भेडि़ये मार गिराए गए। धीरे - ध्ीरे बाघ के श्िाकार को एक खेल की ट्राॅप़्ाफी के रूप में देखा जाने लगा। अकेले जाॅजर् यूल नामक अंग्रेश अप़्ाफसर ने 400 बाघों को मारा था। प्रारंभ में जंगल के वुफछ इलाके श्िाकार के लिए ही आरक्ष्िात थे। कापफी समय बाद़पयार्वरणविदों और संरक्षणवादियों ने आवाश उठाइर् कि जानवरों की इन सारी प्रजातियों की सुरक्षा होनी चाहिए न कि इनको मारा जाना चाहिए। 2.4 नए व्यापार, नए रोशगार और नइर् सेवाएँ जंगलों पर वन विभाग का नियंत्राण स्थापित हो जाने से लोगों को कइर् तरह के नुकसान हुए, लेकिन वुफछ लोगों को व्यापार के नए अवसरों का लाभ भी मिला। कइर् समुदाय अपने परंपरागत पेशे छोड़ कर वन - उत्पादों का व्यापार करने लगे। महश हिंदुस्तान ही नहीं बल्िक दुनिया भर में वुफछ ऐसा ड्डोत ग बैगा मध्य भारत का एक वन समुदाय है। 1892 में जब उनकी घुमंतू खेती पर रोक लगा दी गयी तब उन्होंने सरकार को यह याचिका दीः ‘हर रोश हम पफाका करते हैं, क्योंकि हमारे पास खाने ़का अनाज नहीं है। हमारे पास सिपर्फ एक ही दौलत है ़और वह है हमारी वुफल्हाड़ी। हमारे पास अपने तन ढकने को कपड़े नहीं हैं। आग ताप कर हम ठंडी रातें गुशारते हैं। हम अब खाने के लिए मर रहे हैं। हम कहीं जा भी नहीं सकते हैं। हमने ऐसी क्या गलती की है कि सरकार हमारी परवाह नहीं करती? वैफदियों को जेलों में पयार्प्त भोजन दिया जाता है। घास उगाने वालों को भी उनकी शमीन से बेदखल नहीं किया जाता है, लेकिन हम जो यहाँ कइर् पीढि़यों से रहते आए हैं, हमें सरकार हमारा अध्िकार नहीं देती।’ वेरियर एल्िवन ;1939द्धऋ माध्व गाडगिल व रामचन्द्र गुहा, ‘दिस प्िाफशडर् लैंडः एन इकोलाॅजिकल हिस्ट्री़आॅपफ इंडिया’ में उ(ृत।़ही नशारा दिखता है। उदाहरण के लिए, उन्नीसवीं सदी के मध्य में ऊँची जगहों पर रह कर मैनियोक उगाने वाले ब्राशीली ऐमेशाॅन के मुनदुरुवुफ समुदाय के लोगों ने व्यापारियों को रबड़ की आपूतिर् के लिए जंगली रबड़ के वृक्षों से ‘लेटेक्स’ एकत्रा करना प्रारंभ कर दिया। कालांतर में वे व्यापार चैकियों की ओर नीचे उतर आए और पूरी तरह व्यापारियों पर निभर्र हो गए। हिंदुस्तान में वन - उत्पादों का व्यापार कोइर् अनोखी बात नहीं थी। मध्यकाल से ही आदिवासी समुदायों द्वारा बंजारा आदि घुमंतू समुदायों के माध्यम से हाथ्िायों और दूसरे सामान जैसे खाल, सींग, रेशम के कोये, हाथी - दाँत, बाँस, मसाले, रेशे, घास, गोंद और राल के व्यापार के सबूत मिलते हैं। लेकिन अंग्रेशों के आने के बाद व्यापार पूरी तरह सरकारी नियंत्राण में चला गया। बि्रटिश सरकार ने कइर् बड़ी यूरोपीय व्यापारिक वंफपनियों को विशेष इलाकों में वन - उत्पादों के व्यापार की इजारेदारी सौंप दी। स्थानीय लोगों द्वारा श्िाकार करने और पशुओं को चराने पर बंदिशें लगा दी गईं। इस प्रिया में मद्रास प्रेसीडेंसी के कोरावा, कराचा व येरुवुफला जैसे अनेक चरवाहे और घुमंतू समुदाय अपनी जीविका से हाथ धे बैठे। इनमें से वुफछ को ‘अपराधी कबीले’ कहा जाने लगा और ये सरकार की निगरानी में पैफक्िट्रयों, खदानों व बागानों में काम करने को मजबूर हो गए।़काम के नए अवसरों का मतलब यह नहीं था कि उनकी जीवन स्िथति में हमेशा सुधर ही हुआ हो। असम के चाय बागानों में काम करने के लिए झारखंड के संथाल और उराँव व छत्तीसगढ़ के गोंड जैसे आदिवासी मदर् व औरतों, दोनों की भतीर् की गयी। उनकी मशदूरी बहुत कम थी और कायर्परिस्िथतियाँ उतनी ही खराब। उन्हें उनके गाँवों से उठा कर भतीर् तो कर लिया गया था लेकिन उनकी वापसी आसान नहीं थी। नया शब्द इजारेदारीः एकाध्िकार। ड्डोत घ पुतुमायो में रबड़ की निकासी दुनिया भर में, बागानों में काम की स्िथतियाँ भयावह थीं। ऐमेशाॅन के पुटुमायो क्षेत्रा में ‘पेरूवियन रबड़ कंपनी’ ;बि्रटिश व पेरूवियन साझे मेंद्ध द्वारा रबड़ की निकासी हुइर्तोतोस कहे जाने वाले स्थानीय इंडियनों की बेगार पर निभर्र थी। 1900 - 1912 के बीच पुटुमायो में 4,000 टन रबड़ का उत्पादन हुआ और इसी दौरान इंडियन आबादी में यंत्राणा, रोगों और पलायन के चलते 30,000 की गिरावट आयी। रबड़ वंफपनी के एक वेतनभोगी ने वणर्न किया है कि रबड़ का संग्रह वैफसे किया जाता था। मैनेजर ने सैकड़ों इंडियनों को स्टेशन पर उपस्िथत होने का निदेर्श दियाः उसने अपनी काबार्इन और छुरा पकड़ा और इन बेबस इंडियनों का कत्लेआम शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में बच्चों, महिलाओं और पुरुषों की 150 लाशों से शमीन ढक गयी। खून से नहाए हुए, दया की भीख माँगते िांदा बचे लोगों को मुदो± के ढेर के साथ जला दिया गया और मैनेजर चिल्लाया, ‘‘मैं उन सभी इंडियनों को खत्म कर देना चाहता हूँ जो रबड़ लाने के लिए दिए गए मेरे आदेश को नहीं मानते हैं।’’ निकोलस डक्सर् ;सं.द्ध काॅलोनियलिश्म ऐन्ड कल्चर ;1992द्ध में माइकेल ताउसिग, ‘कल्चर आॅप्ाफ टेरर - स्पेस़आॅपफ डैथ’।़ड्डोत वन - विद्रोह हिंदुस्तान और दुनिया भर में वन्य समुदायों ने अपने ऊपर थोपे गए बदलावों के ख्िालापफ बगावत की। संथाल परगना में सीध्ू और कानू, छोटा नागपुर में़बिरसा मुंडा और आंध््र प्रदेश में अल्लूरी सीताराम राजू को लोकगीतों और कथाओं में अंग्रेशों के ख्िालाप़्ाफ उभरे आंदोलनों के नायक के रूप में आज भी याद किया जाता है। अब हम बस्तर रियासत में 1910 में हुए ऐसे ही एक विद्रोह का विस्तार से अध्ययन करेंगे। 3.1 बस्तर के लोग बस्तर छत्तीसगढ़ के सबसे दक्ष्िाणी छोर पर आंध््र प्रदेश, उड़ीसा व महाराष्ट्र की सीमाओं से लगा हुआ क्षेत्रा है। बस्तर का वेंफद्रीय भाग पठारी है। इस पठार के उत्तर में छत्तीसगढ़ का मैदान और दक्ष्िाण में गोदावरी का मैदान है। इन्द्रावती नदी बस्तर के आर - पार पूरब से पश्िचम की तरप़्ाफ बहती है। बस्तर में मरिया और मुरिया गोंड, धुरवा, भतरा, हलबा आदि अनेक आदिवासी समुदाय रहते हैं। अलग - अलग शबानें बोलने के बावजूद इनके रीति - रिवाज और विश्वास एक जैसे हैं। बस्तर के लोग मानते हैं कि हरेक गाँव को उसकी शमीन ‘ध्रती माँ’ से मिली है और बदले में वे प्रत्येक खेतिहर त्योहार पर ध्रती को चढ़ावा चढ़ाते हैं। ध्रती के अलावा वे नदी, जंगल व पहाड़ों की आत्मा को भी उतना ही मानते हैं। चूँकि हर गाँव को अपनी चैहद्दी पता होती है इसलिए ये लोग इन सीमाओं के भीतर समस्त प्राकृतिक संपदाओं की देखभाल करते हैं। यदि एक गाँव के लोग दूसरे गाँव के जंगल 1947 में बस्तर रियासत को काँकेर रियासत में मिला दिया गया और यह पूरा क्षेत्रा मध्य प्रदेश का बस्तर िाला बना। 1998 में इस िाले को एक बार पिफर काँकेर, बस्तर और दांतेवाड़ा जिलों में बाँट दिया गया। 2000 में ये जिले छत्तीसगढ़ का हिस्सा बन गए। 1990 का विद्रोह काँकेर वन क्षेत्रा ;घेरे मंेद्ध से ही शुरू हुआ था और जल्दी ही राज्य के अन्य क्षेत्रों में पैफल गया। बस्तर में सेना के एक वैंफप का यह चित्रा 1910 में लिया गया। सेना तंबुओं, बावचिर्यों और सिपाहियों के साथ चलती थी। यहाँ एक सिपाही विद्रोहियों से सुरक्षा के लिए वैंफप की पहरेदारी कर रहा है। से थोड़ी लकड़ी लेना चाहते हैं तो इसके बदले में वे एक छोटा शुल्क अदा करते हैं जिसे देवसारी, दांड़ या मान कहा जाता है। वुफछ गाँव अपने जंगलों की हिप़फाशत के लिए चैकीदार रखते हैं जिन्हें वेतन के रूप में हर घर से थोड़ा - थोड़ा अनाज दिया जाता है। हर वषर् एक बड़ी सभा का आयोजन होता है जहाँ एक परगने ;गाँवों का समूहद्ध के गाँवों के मुख्िाया जुटते हैं और जंगल सहित तमाम दूसरे अहम मुद्दों पर चचार् करते हैं। 3.2 लोगों के भय औपनिवेश्िाक सरकार ने 1905 में जब जंगल के दो - तिहाइर् हिस्से को आरक्ष्िात करने, घुमंतू खेती को रोकने और श्िाकार व वन्य - उत्पादों के संग्रह पर पाबंदी लगाने जैसे प्रस्ताव रखे तो बस्तर के लोग बहुत परेशान हो गए। वुफछ गाँवों को आरक्ष्िात वनों में इस शतर् पर रहने दिया गया कि वे वन - विभाग के लिए पेड़ों की कटाइर् और ढुलाइर् का काम मुफ्रत करेंगे और जंगल को आग से बचाए रखेंगे। बाद में इन्हीं गाँवों को ‘वन ग्राम’ कहा जाने लगा। बाकी गाँवों के लोग बगैर किसी सूचना या मुआवशे के हटा दिए गए। काप़्ाफी समय से गाँव वाले शमीन के बढ़े हुए लगान तथा औपनिवेश्िाक अप़्ाफसरों के हाथों बेगार और चीशों की निरंतर माँग से त्रास्त थे। इसके बाद भयानक अकाल का दौर आया: पहले 1899 - 1900 में और पिफर 1907 - 1908 में। वन आरक्षण ने चिंगारी का काम किया। लोगों ने बाशारों में, त्योहारों के मौके पर और जहाँ कहीं भी कइर् गाँवों के मुख्िाया और पुजारी इकट्ठा होते थे वहाँ जमा होकर इन मुद्दों पर चचार् करना प्रारंभ कर दिया। काँगेर वनों के ध्ुरवा समुदाय के लोग इस मुहिम में सबसे आगे थे क्योंकि आरक्षण सबसे पहले यहीं लागू हुआ था। हालाँकि ड्डोत च ‘भोंडिया ने 400 लोगों को इकट्ठा कर कइर् सारे बकरों की वुफबार्नी दी और दीवान, जिसके बीजापुर की तरपफ़से आने की संभावना थी, को बीच में ही रोकने के लिए कोइर् एक व्यक्ित इनका नेता नहीं था लेकिन बहुत सारे लोग नेथानार गाँव के गंुडा ध्ूर को इस आंदोलन की एक अहम शख्िसयत मानते हैं। 1910 में आम की टहनियाँ, मि‘ी के ढेले, मिचर् और तीर गाँव - गाँव चक्कर काटने लगे। यह गाँवों में अंग्रेशों के ख्िालापफ बगावत का संदेश था। हरेक गाँव ने़इस बगावत के खचेेर् में वुफछ न वुफछ मदद दी। बाशार लूटे गए, अपफसरों़और व्यापारियों के घर, स्वूफल और पुलिस थानों को लूटा व जलाया गया तथा अनाज का पुनविर्तरण किया गया। जिन पर हमले हुए उनमें से श्यादातर लोग औपनिवेश्िाक राज्य और इसके दमनकारी कानूनों से किसी न किसी तरह जुड़े थे। इन घटनाओं के एक चश्मदीद गवाह, मिशनरी विलियम वाडर् ने लिखा: ‘पुलिसवालों, व्यापारियों, जंगल के अदर्लियों, स्कूल मास्टरों और प्रवासियों का हुजूम चारों तरपफ से जगदलपुर में चला आ रहा था।’़अंगे्रशों ने बगावत को वुफचल देने के लिए सैनिक भेजेे। आदिवासी नेताओं ने बातचीत करनी चाही लेकिन अंग्रेश पफौज ने उनके तंबुओं को घेऱकर उन पर गोलियाँ चला दीं। इसके बाद बगावत में शरीक लोगों पर कोडे़ बरसाते और उन्हें सशा देते सैनिक गाँव - गाँव घूमने लगे। श्यादातर गाँव खाली हो गए क्योंकि लोग भाग कर जंगलों में चले गए थे। अंग्रेशों को पिफर ़चल पड़ा। 10 पफरवरी को चली इस भीड़ ने पुलिस - चैकी तथा मारेंगा स्वूफल जला दिया, केसलुर में लाइर्नें व पशु - अवरोध्शाला और टोकापाल ;राजुरद्ध में भी एक स्वूफल को जलाया गया। दीवान को सुरक्ष्िात वापस लाने के लिए भेजे गए स्टेट रिशवर् पुलिस के एक हेड कांस्टेबल और चार कांस्टेबलों को बंध्क बना लिया गया और एक दस्ता करंजी स्वूफल जलाने के लिए छोड़ दिया गया। इस भीड़ ने गाडो± के साथ कोइर् बदसलूकी करने के बजाय उनके हथ्िायार उनसे ले लिए और उन्हें छोड़ दिया। भोंडिया माझी के नेतृत्व में बागियों के एक दल ने कोयर नदी का रास्ता लिया क्योंकि दीवान मुख्य सड़क छोड़कर उध्र से आ सकता था। बाकी लोग बीजापुर से आने वाली मुख्य सड़क को बंद करने के लिए दिलमिल्ली चले गए। बु(ू माझी और हरचंद नाइर्क ने मुख्य दल की कमान सँभाली।’ डेब्रेट, पोलिटिकल एजेन्ट, छत्तीसगढ़ फ्ऱयूडेटरी स्टेट्स, का 23 जून, 1910 को कमिश्नर, छत्तीसगढ़ डिवीशन, के नाम लिखा पत्रा। ड्डोत ड्डोत छ बस्तर में रहने वाले बुशुगर् इस लड़ाइर् के बारे में, जिसे उन्होंने अपने माता - पिता से सुना था, बताते हैं: कनकापाल के पोदियामी गंगा को उनके पिता पोदियामी तोकेली ने बताया किः ‘अंग्रेशांे ने आकर शमीन लेनी शुरू कर दी। राजा को आसपास क्या हो रहा है इसकी परवाह न थी, इसलिए शमीन ली जा रही है, यह देख उसके समथर्कों ने लोगों को इकट्ठा किया। लड़ाइर् शुरू हुइर्। उसके कट्टर समथर्क मारे गए और बाकियों पर कोड़ों से मार पड़ी। मेरे पिता, पोदियामी तोकेली को भी कोड़ों से पीटा गया। लेकिन वह भागने में कामयाब हुए और बच निकले। यह आंदोलन अंग्रेशों से छुटकारा पाने के लिए था। अंग्रेश उनको घोड़ों से बाँध् कर घसीटा करते थे। हरेक गाँव से दो - चार लोग जगदलपुर गए - - चिदपाल के गागीर् देवा और मिखोला, माकी - मिरास के दोल और अबराबंुदी, बालेरास का वादापांदु, पालेम का उंगा और दूसरे ढेर सारे लोग।’ इसी तरह से नंदरासा के एक बुशुगर् चंेद्रू ने कहा कि: ‘लोगों की तरपफ पुरनिया थे - - पालेम के मिल्ले मुदाल, नंदरासा के सोयेकाल धुवार् और पंडवा माझी। हर परगना ़से लोग अलनार तराइर् इकट्ठा हुए। एक झटके में पलटन ने सबको घेर लिया। गंुडा ध्ूर उड़ सकते थे इसलिए उड़ निकले। लेकिन तीर - कमान वाले अब क्या करें? रात में लड़ाइर् होने लगी। लोग झाडि़यों में छिप कर पेट के बल भागे। पफौज की पलटन भी भागी। जो लोग िांदा बचे किसी तरह अपने गाँव - घर पहुँचे।’ ़से नियं़ंत्राण पाने में तीन महीने ;पफरवरी - मइर्द्ध लग गए। पिफर भी वे गुडा धूर को कभी नहीं पकडआरक्षण का काम वुफछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया और आरक्ष्िात क्षेत्रा को भी 1910 से पहले की योजना से लगभग आध कर दिया गया। बस्तर के जंगलों और लोगों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। आशादी के बाद भी लोगों को जंगलों से बाहर रखने और जंगलों को औद्योगिक उपयोग के लिए आरक्ष्िात रखने की नीति कायम रही। 1970 के दशक में, विश्व बैंवफ ने प्रस्ताव रखा कि कागश उद्योग को लुगदी उपलब्ध् कराने के लिए 4,600 हेक्टेयर प्रावृफतिक साल वनों की जगह देवदार के पेड़ लगाए जाएँ। लेकिन, स्थानीय पयार्वरणविदों के विरोध् के पफलस्वरूप इस परियोजना को रोक दिया गया। आइए, अब एश्िाया के एक और हिस्से - इंडोनेश्िाया - की तरपफ चलें। शरा देखें कि इसी वक्त वहाँ क्या वुफछ हो रहा था। ़़़ सके। विद्रोहियों की सबसे बड़ी जीत यह रही कि जावा के जंगलों में हुए बदलाव जावा को आजकल इंडोनेश्िाया के चावल - उत्पादक द्वीप के रूप में जाना जाता है। लेकिन एक शमाने में यह क्षेत्रा अध्िकांशतः वनाच्छादित था। इंडोनेश्िाया एक डच उपनिवेश था और जैसा कि हम देखेंगे, भारत व इंडोनेश्िाया के वन कानूनों में कइर् समानताएँ थीं। इंडोनेश्िाया में जावा ही वह क्षेत्रा है जहाँ डचों ने वन - प्रबंध्न की शुरुआत की थी। अंग्रेशों की तरह वे भी जहाश बनाने के लिए जावा से लकड़ी हासिल करना चाहते थे। सन् 1600 में जावा की अनुमानित आबादी 34 लाख थी। हालाँकि उपजाऊ मैदानों में ढेर सारे गाँव थे लेकिन पहाड़ों में भी घुमंतू खेती करने वाले अनेक समुदाय रहते थे। 4.1 जावा के लकड़हारे जावा में कलांग समुदाय के लोग वुफशल लकड़हारे और घुमंतू किसान थे। उनका महत्त्व इस बात से आँका जा सकता है कि 1755 में जब जावा की माताराम रियासत बँँटी तो यहा के 6,000 कलांग परिवारों को भी दोनों राज्यों मंे बराबर - बराबर बाँट दिया गया। उनके कौशल के बगैर सागौन की कटाइर् कर राजाओं के महल बनाना बहुत मुश्िकल था। डचों ने जब अठारहवीं सदी में वनों पर नियंत्राण स्थापित करना प्रारंभ किया तब उन्होंने भी कोश्िाश की कि कलांग उनके लिए काम करें। 1770 में कलांगों ने एक डच किले पर हमला करके इसका प्रतिरोध् किया लेकिन इस विद्रोह को दबा दिया गया। 4.2 डच वैज्ञानिक वानिकी उन्नीसवीं सदी में जब लोगों के साथ - साथ इलाकों पर भी नियंत्राण स्थापित करना शरूरी लगने लगा तो डच उपनिवेशकों ने जावा में वन - कानून लागू कर ग्रामीणों की जंगल तक पहुँच पर बंदिशें थोप दीं। इसके बाद नाव या घर बनाने जैसे खास उद्देश्यों के लिए, सिपर्फ़चुने हुए जंगलों से लकड़ी काटी जा सकती थी और वह भी कड़ी निगरानी में। ग्रामीणों को मवेशी चराने, बिना परमिट लकड़ी ढोने या जंगल से गुशरने वाली सड़क पर घोड़ा - गाड़ी अथवा जानवरों पर चढ़ कर आने - जाने के लिए दंडित किया जाने लगा। भारत की ही तरह यहाँ भी जहाश और रेल - लाइनों के निमार्ण ने वन - प्रबंध्न और वन - सेवाओं को लागू करने की आवश्यकता पैदा कर दी। 1882 में अकेले जावा से ही 2,80,000 स्लीपरों का नियार्त किया गया। शाहिर है कि पेड़ काटने, लट्ठों को ढोने और स्लीपर ड्डोत जतैयार करने के लिए श्रम की आवश्यकता थी। डचों ने पहले तो जंगलों में खेती की शमीनों पर लगान लगा दिया और बाद में वुफछ गाँवों को इस शतर् यूनाइटेड इर्स्ट इंडिया वंफपनी के एक अप़्ाफसर डवर्फ वाॅनपर इससे मुक्त कर दिया कि वे सामूहिक रूप से पेड़ काटने और लकड़ी होशेनड्राप ने उपनिवेश कालीन जावा में कहा थाः ढोने के लिए भैंसें उपलब्ध् कराने का काम मुफ्रत में किया करेंगे। इस ‘बटाविया के लोगो! चैंक पड़ो। आश्चयर् से सुनो, मुझे व्यवस्था को ब्लैन्डाँगडिएन्स्टेन के नाम से जाना गया। बाद में वन - ग्रामवासियों को लगान - मापफी के बजाय थोड़ा - बहुत मेहनताना तो दिया जाने लगा लेकिऩवन - भूमि पर खेती करने के उनके अध्िकार सीमित कर दिए गए। 4.3 सामिन की चुनौती सन् 1890 के आसपास सागौन के जंगलों में स्िथत रान्दुब्लातुंग गाँव के निवासी सुरोन्ितको सामिन ने जंगलों पर राजकीय मालिकाने पर सवाल खड़ा करना प्रारंभ कर दिया। उसका तकर् था कि चूँकि हवा, पानी, शमीन और लकड़ी राज्य की बनायी हुइर् नहीं हैं इसलिए उन पर उसका अध्िकार नहीं हो सकता। जल्दी ही एक व्यापक आंदोलन खड़ा हो गया। इस आंदोलन को संगठित करने वालों में सामिन वफा दामाद भी सिय था। 1907 तक 3,000 परिवार उसके विचारों को मानने लगे थे। डच जब शमीन का सवेर्क्षण करने आए तो वुफछ सामिनवादियों ने अपनी शमीन पर लेट कर इसका विरोध् किया जबकि दूसरों ने लगान या जुमार्ना भरने या बेगार करने से इनकार कर दिया। मलाया दक्ष्िाणी चीन वुफआलालम्पुर राज्य सागर बि्रटिश औपनिवेश्िाक शासन जो तुम्हें बताना है। हमारे बेेड़े नष्ट हो चुके हैं, हमारा व्यापार मुरझा चुका है, हमारा नौकायन नष्ट होने वाला है - उत्तरी ताकतों से हम बेपनाह दौलत देकर जहाशों को बनाने के लिए लकड़ी और दूसरी सामग्री खरीदते हैं और जावा में हम सामरिक व व्यापारिक संगठित दलों को, जिनकी जडं़े इस ध्रती में ध्ँसी है, छोड़ते हैं। हाँ, जावा के जंगलों में एक सम्मानजनक नौसेना के निमार्ण को बहुत ही कम समय में संभव करने के लिए पयार्प्त लकड़ी है, साथ ही जितनी शरूरत हो उतने व्यापारिक जहाशों को बनाने के लिए भी - - इसके बावजूद जावा के जंगल उतनी ही तेशी से उगते हैं जितनी तेशी से उन्हें काटा जाता है। उचित प्रबंध्न और अच्छी देख - रेख के साथ ये ड्डोत कभी भी खत्म नहीं होंगे।’ ़पीपुल, 1992 में उ(ृत। डवर्फ वाॅन होशेनडाॅपर्ऋ पेलूसो, रिच पफाॅरेस्ट्स, पुअर उत्तरी बाॅनिर्यो 4.4 यु( और वन - विनाश पहले और दूसरे विश्वयु( का जंगलों पर गहरा असर पड़ा। भारत में तमाम चालू कायर्योजनाओं को स्थगित करके वन विभाग ने अंग्रेशों की जंगी शरूरतों को पूरा करने के लिए बेतहाशा पेड़ काटे। जावा पर जापानियों के कब्शे से ठीक पहले डचों ने ‘भस्म - कर - भागो नीति’ ;ैबवतबीमक म्ंतजी च्वसपबलद्ध अपनायी जिसके तहत आरा - मशीनों और सागौन के विशाल लट्ठंों के ढेर जला दिए गए जिससे वे जापानियों के हाथ न लग पाएँ। इसके बाद जापानियों ने वनवासियों को जंगल काटने के लिए बाध्य करके अपने यु( उद्योग के लिए जंगलों का निमर्म दोहन किया। बहुत सारे गाँव वालों ने इस अवसर का लाभ उठा कर जंगल में अपनी खेती वफा विस्तार किया। जंग के बाद इंडोनेश्िायाइर् वन सेवा के लिए इन शमीनों को वापस हासिल कर पाना कठिन था। हिंदुस्तान की ही तरह यहाँ भी खेती योग्य भूमि के प्रति लोगों की चाह और शमीन को नियन्ित्रात करने तथा लोगों को उससे बाहर रखने की वन विभाग की िाद के बीच टकराव पैदा हुआ। 4.5 वानिकी में नए बदलाव अस्सी के दशक से एश्िाया और अप़्रफीका की सरकारों को यह समझ में आने लगा कि वैज्ञानिक वानिकी और वन समुदायों को जंगलों से बाहर रखने की नीतियों के चलते बार - बार टकराव पैदा होते हैं। परिणामस्वरूप, वनों से इमारती लकड़ी हासिल करने के बजाय जंगलों का संरक्षण श्यादा महत्त्वपूणर् लक्ष्य बन गया है। सरकार ने यह भी मान लिया है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वन प्रदेशों में रहने वालों की मदद लेनी होगी। मिशोरम से लेकर केरल तक हिंदुस्तान में हर कहीं घने जंगल सिपर्फ इसलिए बच पाए कि ग्रामीणों ने सरना, देवरावुफडु, कान, राइर् इत्यादि नामों से पवित्रा बगीचा समझ कर इनकी रक्षा की। वुफछ गाँव तो वन - रक्षकों पर निभर्र रहने के बजाय अपने जंगलों की चैकसी आप करते रहे हैं - इसमें हर परिवार बारी - बारी से अपना योगदान देता है। स्थानीय वन - समुदाय और पयार्वरणविद् अब वन - प्रबंध्न के वैकल्िपक तरीकों के बारे में सोचने लगे हैं। पहले और दूसरे विश्वयु( में मित्रा राष्ट्र शायद इतना सपफल नहीं होते यदि वे अपने उपनिवेशों की संपदाओं और व्यक्ितयों का ऐसा दोहन करने में सक्षम न होते। दोनों विश्वयु(ों का हिंदुस्तान, इंडोनेश्िाया व दूसरी जगहों के वनों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। कायर्योेजनाओं को स्थगित कर दिया गया और वन विभाग ने यु( की शरूरतों को पूरा करने के लिए जमकर वृक्ष काटे। ियाकलाप 1जहाँ आप रहते हैं क्या वहाँ के जंगली इलाकों में कोइर् बदलाव आए हैं? ये बदलाव क्या हैं और क्यों हुए हैं? 2एक औपनिवेश्िाक वनपाल और एक अदिवासी के बीच जंगल में श्िाकार करने के मसले पर होने वाली बातचीत के संवाद लिखें। ियाकलाप प्रश्न

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