नात्सीवाद और हिटलर का उदय 1945 के वसंत में हेलमुट नामक 11 वषीर्य जमर्न लड़का बिस्तर में लेटे वुफछ सोच रहा था। तभी उसे अपने माता - पिता की दबी - दबी सी आवाशें सुनाइर् दीं। हेलमुट कान लगा कर उनकी बातचीत सुनने की कोश्िाश करने लगा। वे गंभीर स्वर में किसी मुद्दे पर बहस कर रहे थे। हेलमुट के पिता एक जाने - माने चिकित्सक थे। उस वक्त वे अपनी पत्नी से इस बारे में बात कर रहे थे कि क्या उन्हें पूरे परिवार को खत्म कर देना चाहिए या अकेले आत्महत्या कर लेनी चाहिए। उन्हें अपना भविष्य सुरक्ष्िात दिखाइर् नहीं दे रहा था। वे घबराहट भरे स्वर में कह रहे थे, फ्अब मित्रा राष्ट्र भी हमारे साथ वैसा ही बतार्व करेंगे जैसा हमने अपाहिजों और यहूदियों के साथ किया था।य् अगले दिन वे हेलमुट को लेकर बाग में घूमने गए। यह आख्िारी मौका था जब हेलमुट अपने पिता के साथ बाग में गया। दोनों ने बच्चों के पुराने गीत गाए और खूब सारा वक्त खेलते - वूफदते बिताया। वुफछ समय बाद हेलमुट केफ्रतर में खुद को गोली मार ली। हेलमुट की यादों में वह क्षण चित्रा 1 - हिटलर ;मध्यद्ध और ग्योबल्स ;बाएँद्ध सरकारी बैठक के बाद बाहर निकलते हुए, 1932नए शब्द मित्रा राष्ट्र: मित्रा राष्ट्रों का नेतृत्व शुरू में ़बि्रटेन और प्रफंास के हाथों में था। 1941 में सोवियत संघ और अमेरिका भी इस गठबंधन में शामिल हो गए। उन्होंने धुरी शक्ितयों यानी जमर्नी, इटली और जापान का मिल कर सामना किया। नात्सीवाद और हिटलर का उदय अध्याय 3 ़पिता ने अपने दअभी भी िांदा है जब उसके पिता की खून में सनी वदीर् को घर के अलाव में ही जला दिया गया था। हेलमुट ने जो वुफछ सुना था और जो वुफछ हुआ, उससे उसके दिलोदिमाग पर इतना गहरा सदमा पहुँचा कि अगले नौ साल तक वह घर में एक कौर भी नहीं खा पाया। उसे यही डर सताता रहा कि कहीं उसकी माँ उसे भी शहर न दे दे। हेलमुट को शायद समझ में न आया हो लेकिन हकीकत यह है कि उसके पिता ‘नात्सी’ थे। वे एडाॅ़ल्पफ हिटलर के क‘र समथर्क थे। आप में से कइर् बच्चे नात्िसयों और उनके नेता हिटलर के बारे में जानते होंगे। आपको शायद पता होगा कि हिटलर जमर्नी को दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनाने को कटिब( था। वह पूरे यूरोप को जीत लेना चाहता था। आपने यह भी सुना होगा कि उसने यहूदियों को मरवाया था। लेकिन नात्सीवाद सिप़र्फ इन इक्का - दुक्का घटनाओं का नाम नहीं है। यह दुनिया और राजनीति के बारे में एक संपूणर् व्यवस्था, विचारों की एक पूरी संरचना का नाम है। आइए, समझने की कोश्िाश करें कि नात्सीवाद का मतलब क्या था। इस सिलसिले में सबसे पहले हम यह देखेंगे कि हेलमुट के पिता ने आत्महत्या क्यों की थीऋ वे किस चीश से डरे हुए थे। मइर् 1945 में जमर्नी ने मित्रा राष्ट्रों के सामने समपर्ण कर दिया। हिटलर को अंदाशा हो चुका था कि अब उसकी लड़ाइर् का क्या हश्र होने वाला है। इसलिए, हिटलर और उसके प्रचार मंत्राी ग्योबल्स ने बलिर्न के एक बंकर में पूरे परिवार के साथ अप्रैल में ही आत्महत्या कर ली थी। यु( खत्म होने के बाद न्यूरेम्बगर् में एक अंतरार्ष्ट्रीय सैनिक अदालत स्थापित की गइर्। इस अदालत को शांति के विरु( किए गए अपराधों, मानवता के ख्िालाप़फ किए गए अपराधों और यु( अपराधों के लिए नात्सी यु(बंदियों पर मुकदमा चलाने का िाम्मा सौंपा गया था। यु( के दौरान जमर्नी के व्यवहार, खासतौर से इंसानियत के ख्िालाप़फ किए गए उसके अपराधों की वजह से कइर् गंभीरनैतिक सवाल खड़े हुए और उसके कृत्यों की दुनिया भर में निंदा की गइर्। ये कृत्य क्या थे? दूसरे विश्वयु( के साए में जमर्नी ने जनसंहार शुरू कर दिया जिसके तहत यूरोप में रहने वाले वुफछ खास नस्ल के लोगों को सामूहिक रूप से मारा जाने लगा। इस यु( में मारे गए लोगों में 60 लाख यहूदी, 2 लाख जिप्सी और 10 लाख पोलैंड के नागरिक थे। साथ ही मानसिक व शारीरिक रूप से अपंग घोष्िात किए गए 70,000 जमर्न नागरिक भी मार डाले गए। इनके अलावा न जाने कितने ही राजनीतिक विरोिायों को भी मौत की नींद सुला दिया गया। इतनी बड़ी तादाद में लोगों को मारने के लिए औषवित्स जैसे कत्लखाने बनाए गए जहाँ शहरीली गैस से हशारों लोगों को एक साथ मौत के घाट उतार दिया जाता था। न्यूरेम्बगर् अदालत ने केवल 11 मुख्य नात्िसयों को ही मौत की सशा दी। बाकी आरोपियों में से बहुतों को उम्र कैद की सशा सुनाइर् गइर्। सशा तो मिली लेकिन नात्िसयों को जो सशा दी गइर् वह उनकी बबर्रता और उनके शुल्मों के मुकाबले बहुत छोटी थी। असल में, मित्रा राष्ट्र पराजित जमर्नी पर इस बार वैसा कठोर दंड नहीं थोपना चाहते थे जिस तरह का दंड पहले विश्वयु( के बाद जमर्नी पर थोपा गया था। बहुत सारे लोगों का मानना था कि पहले विश्वयु( के आख्िार में जमर्नी के लोग जिस तरह के अनुभव से गुशरे उसने भी नात्सी जमर्नी के उदय में योगदान दिया था। यह अनुभव क्या था? नात्सी शब्द जमर्न भाषा वेफ शब्द ‘नात्िसयोणाल’ के प्रारंभ्िाक अक्षरों को लेकर बनाया गया है। ‘नात्िसयोणाल’ शब्द हिटलर की पाटीर् के नाम का पहला शब्द था इसलिए इस पाटीर् के लोगों को नात्सी कहा जाता था। वाइमर गणराज्य का जन्म बीसवीं शताब्दी के शुरुआती सालों में जमर्नी एक ताकतवर साम्राज्य था। उसने आॅस्िट्रयाइर् साम्राज्य के साथ मिलकर मित्रा राष्ट्रों ;इंग्लैंड, प्ऱफांस औऱरूसद्ध के ख्िालापफ पहला विश्वयु( ;1914 - 1918द्ध लड़ा था। दुनिया की सभी बड़ी शक्ितयाँ यह सोच कर इस यु( में वूफद पड़ी थीं कि उन्हें जल्दी ही विजय मिल जाएगी। सभी को किसी - न - किसी प़फायदे की उम्मीद थी। उन्हें अंदाशा नहीं था कि यह यु( इतना लंबा ख्िांच जाएगा और पूरे यूरोप को आथ्िार्क दृष्िट से निचोड़ कर रख देगा। प़्रफांस और बेल्िजयम पर व़फब्शा करके जमर्नी ने शुरुआत में सपफलताएँ हासिल कीं लेकिन 1917 में जब अमेरिका भी मित्रा राष्ट्रों में शामिल हो गया तो इस ख़ेमे को काप़फी ताकत मिली और आख्िारकार, नवंबर 1918 में उन्होंने वेंफद्रीय शक्ितयों को हराने के बाद जमर्नी को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। साम्राज्यवादी जमर्नी की पराजय और सम्राट के पदत्याग ने वहाँ की संसदीय पाटिर्यों को जमर्न राजनीतिक व्यवस्था को एक नए साँचे में ढालने का अच्छा मौका उपलब्ध कराया। इसी सिलसिले में वाइमर में एक राष्ट्रीय सभा की बैठक बुलाइर् गइर् और संघीय आधर पर एक लोकतांत्रिाक संविधान पारित किया गया। नइर् व्यवस्था में जमर्न संसद यानी राइख़स्टाग के लिए जनप्रतिनििायों का चुनाव किया जाने लगा। प्रतिनििायों के निवार्चन के लिए औरतों सहित सभी वयस्क नागरिकों को समान और सावर्भौमिक मतािाकार प्रदान किया गया। लेकिन यह नया गणराज्य खुद जमर्नी के ही बहुत सारे लोगों को रास नहीं आ रहा था। इसकी एक वजह तो यही थी कि पहले विश्वयु( में जमर्नी चित्रा 2 - वसार्य की संिा के बाद जमर्नीइस नक्शे में आप उन इलाकों को देख सकते हैं जो संिा के बाद जमर्नी के हाथ से निकल गए थे। 51 की पराजय के बाद विजयी देशों ने उस पर बहुत कठोर शते± थोप दी थीं। मित्रा राष्ट्रों के साथ वसार्य ;टमतेंपससमेद्ध में हुइर् शांति - संिा जमर्नी की जनता के लिए बहुत कठोर और अपमानजनक थी। इस संिा की वजह से जमर्नी को अपने सारे उपनिवेश, तकरीबन 10 प्रतिशत आबादी, 13 प्रतिशत भूभाग, 75 प्रतिशत लौह भंडार और 26 प्रतिशत कोयला भंडार प्ऱफांस, पोलैंड, डेनमावर्फ और लिथुआनिया के हवाले करने पड़े। जमर्नी की रही - सही ताकत खत्म करने के लिए मित्रा राष्ट्रों ने उसकी सेना भी भंग कर दी। यु( अपराधबोध अनुच्छेद ;ॅंत ळनपसज ब्संनेमद्ध के तहत यु( के कारण हुइर् सारी तबाही के लिए जमर्नी को िाम्मेदार ठहराया गया। इसके एवश में उस पर छः अरब पौंड का जुमार्ना लगाया गया। खनिज संसाधनों वाले राइर्नलैंड पर भी बीस के दशक में श्यादातर मित्रा राष्ट्रों का ही व़फब्शा रहा। बहुत सारे जमर्नों ने न केवल इस हार के लिए बल्िक वसार्य में हुए इस अपमान के लिए भी वाइमर गणराज्य को ही िाम्मेदार ठहराया। 1.1 यु( का असर इस यु( ने पूरे महाद्वीप को मनोवैज्ञानिक और आथ्िार्क, दोनों ही स्तरों पर तोड़ कर रख दिया। यूरोप कल तक कशर् देने वालों का महाद्वीप कहलाता था जो यु( खत्म होते - होते कशर्दारों का महाद्वीप बन गया। विडंबना यह थी कि पुराने साम्राज्य द्वारा किए गए अपराधों का हजार्ना नवजात वाइमर गणराज्य से वसूल किया जा रहा था। इस गणराज्य को यु( में पराजय के अपराधबोध और राष्ट्रीय अपमान का बोझ तो ढोना ही पड़ा, हजार्ना चुकाने की वजह से आथ्िार्क स्तर पर भी वह अपंग हो चुका था। वाइमर गणराज्य के हिमायतियों में मुख्य रूप से समाजवादी, वैफथलिक और डेमोव्रैफट खेमे के लोग थे। रूढि़वादी/पुरातनपंथी राष्ट्रवादी मिथकों की आड़ में उन्हें तरह - तरह के हमलों का निशाना बनाया जाने लगा। ‘नवंबर के अपराधी’ कहकर उनका खुलेआम मशाक उड़ाया गया। इस मनोदशा का तीस के दशक के शुरुआती राजनीतिक घटनाक्रम पर गहरा असर पड़ा। पहले महायु( ने यूरोपीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था पर अपनी गहरी छाप छोड़ दी थी। सिपाहियों को आम नागरिकों के मुकाबले ज़्यादा सम्मान दिया जाने लगा। राजनेता और प्रचारक इस बात पर शोर देने लगे कि पुरुषों को आक्रामक, ताकतवर और मदार्ना गुणों वाला होना चाहिए। मीडिया में खंदकों की िांदगी का महिमामंडन किया जा रहा था। लेकिन सच्चाइर् यह थी कि सिपाही इन खंदकों में बड़ी दयनीय िांदगी जी रहे थे। वे लाशों को खाने वाले चूहों से घ्िारे रहते। वे शहरीली गैस और दुश्मनों की गोलाबारी का बहादुरी से सामना करते हुए भी अपने साथ्िायों को पल - पल मरते देखते थे।़सावर्जनिक जीवन में आक्रामक पफौजी प्रचार और राष्ट्रीय सम्मान व प्रतिष्ठाकी चाह के सामने बाकी सारी चीशें गौण हो गईं जबकि हाल ही में सत्ता में आए रूढि़वादी तानाशाहों को व्यापक जनसमथर्न मिलने लगा। उस वक्त लोकतंत्रा एक नया और बहुत नाशुक विचार था जो दोनों महायु(ों के बीच पूरे यूरोप में पफैली अस्िथरता का सामना नहीं कर सकता था। 1.2 राजनीतिक रैडिकलवाद ;आमूल परिवतर्नवादद्ध और आथ्िार्क संकट जिस समय वाइमर गणराज्य की स्थापना हुइर् उसी समय रूस में हुइर् बोल्शेविक क्रांति की तशर् पर जमर्नी में भी स्पाटर्किस्ट लीग अपने क्रांतिकारी 52 नए शब्द हजार्ना: किसी गलती के बदले दण्ड के रूप में नुकसान की भरपाइर् करना। खंदक: यु( के मोचेर् पर सैनिकों के छिपने के लिए खोदे गए गइे। चित्रा 3 - स्पाटर्किस्ट लीग नामक रैडिकल संगठन द्वारा आयोजित की गइर् रैली का दृश्यप्रश्िायन चेंबर आॅप़फ डेप्यूटीश, बलिर्न के सामने आयोजित रैली। 1918 - 1919 के जाड़ों में बलिर्न की सड़कों पर आम लोगों का ही कब्शा था। राजनीतिक प्रदशर्न रोशाना की घटना बन गया था। विद्रोह की योजनाओं को अंजाम देने लगी। बहुत सारे शहरों में मशदूरों और नाविकों की सोवियतें बनाइर् गईं। बलिर्न के राजनीतिक माहौल में सोवियत किस्म की शासन व्यवस्था की हिमायत के नारे गूँज रहे थे। इसीलिए समाजवादियों, डेमोव्रैफट्स और वैफथलिक गुटों ने वाइमर में इकऋा होकर इस प्रकार की शासन व्यवस्था के विरोध में एक लोकतांत्रिाक गणराज्य की स्थापना का प़ैफसला लिया। और आख्िारकार वाइमर गणराज्य ने पुराने सैनिकों के प़्रफी कोर नामक संगठन की मदद से इस विद्रोह को वुफचल दिया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद स्पाटर्किस्टों ने जमर्नी में कम्युनिस्ट पाटीर् की नींव डाली। इसके बाद कम्युनिस्ट ;साम्यवादीद्ध और समाजवादी एक - दूसरे के क‘र दुश्मन हो गए और हिटलर के ख्िालाप़फ कभी भी साझा मोचार् नहीं खोल सके। क्रांतिकारी और उग्र राष्ट्रवादी, दोनों ही खेमे रैडिकल समाधानों के लिए आवाशें उठाने लगे। राजनीतिक रैडिकलवादी विचारों को 1923 के आथ्िार्क संकट से और बल मिला। जमर्नी ने पहला विश्वयु( मोटे तौर पर कशर् लेकर लड़ा था। और यु( के बाद तो उसे स्वणर् मुद्रा में हजार्ना भी भरना पड़ा। इस दोहरे बोझ से जमर्नी के स्वणर् भंडार लगभग समाप्त होने की स्िथति में पहुँच गए थे। आख्िारकार 1923 में जमर्नी ने कशर् और हजार्ना चुकाने से इनकार कर दिया। इसके जवाब में प्ऱफांसीसियों ने जमर्नी के मुख्य औद्योगिक इलाके रूर पर कब्शा कर लिया। यह जमर्नी के विशाल कोयला भंडारों वाला इलाका था। जमर्नी ने प्ऱफांस के विरु( निष्िव्रफय प्रतिरोध् के रूप में बड़े पैमाने पर कागशी मुद्रा छापना शुरू कर दिया। जमर्न सरकार ने इतने बड़े पैमाने पर मुद्रा छाप दी कि उसकी मुद्रा मावर्फ का मूल्य तेशी से गिरने लगा। अप्रैल में एक अमेरिकी डाॅलर की कीमत 24ए000 मावर्फ के बराबर थी जो जुलाइर् में 3,53,000 मावर्फ, अगस्त में 46,21,000 मावर्फ तथा दिसंबर में 9,88,60,000 मावर्फ हो गइर्। इस तरह एक डाॅलर में खरबों मावर्फ मिलने लगे। जैसे - जैसे मावर्फ की कीमत गिरती गइर्, शरूरी चीशों की कीमतें आसमान छूने लगीं। रेखाचित्रों में जमर्न नागरिकों को पावरोटी खरीदने के लिए बैलगाड़ी में नोट भरकर ले जाते हुए दिखाया जाने लगा। जमर्न समाज दुनिया भर में हमददीर् का पात्रा बन कर रह गया। इस संकट को बाद में अति - मुद्रास्पफीति का नाम दिया गया। जब कीमतें बेहिसाब बढ़ जाती हैं तो उस स्िथति को अति - मुद्रास्पफीति का नाम दिया जाता है। जमर्नी को इस संकट से निकालने के लिए अमेरिकी सरकार ने हस्तक्षेप किया। इसके लिए अमेरिका ने डाॅव्स योजना बनाइर्। इस योजना में जमर्नी के आथ्िार्क संकट को दूर करने के लिए हजार्ने की शतो± को दोबारा तय किया गया। 1.3 मंदी के साल सन् 1924 से 1928 तक जमर्नी में वुफछ स्िथरता रही। लेकिन यह स्िथरता मानो रेत के ढेर पर खड़ी थी। जमर्न निवेश और औद्योगिक गतिवििायों में सुधार मुख्यतः अमेरिका से लिए गए अल्पकालिक कजो± पर आश्रित था। जब 1929 में वाॅल स्ट्रीट एक्सचेंज ;शेयर बाशारद्ध धराशायी हो गया तो जमर्नी को मिल रही यह मदद भी रातों - रात बंद हो गइर्। कीमतों में गिरावट की आशंका को देखते हुए लोग ध्ड़ाध्ड़ अपने शेयर बेचने लगे। 24 अक्तूबर को केवल एक दिन में 1.3 करोड़ शेयर बेच दिए गए। यह आथ्िार्क महामंदी की शुरुआत थी। 1929 से 1932 तक के अगले तीन सालों में अमेरिका की राष्ट्रीय आय केवल आधी रह गइर्। प़ैफक्िट्रयाँ बंद हो गइर् थीं, नियार्त गिरता जा रहा था, किसानों की हालत खराब थी और स‘ेबाज बाशार से पैसा खींचते जा रहे थे। अमेरिकी अथर्व्यवस्था में आइर् इस मंदी का असर दुनिया भर में महसूस किया गया। इस मंदी का सबसे बुरा प्रभाव जमर्न अथर्व्यवस्था पर पड़ा। 1932 में जमर्नी का औद्योगिक उत्पादन 1929 के मुकाबले केवल 40 प्रतिशत रह गया था। मशदूर या तो बेरोशगार होते जा रहे थे या उनके वेतन काप़फी गिर चुके थे। बेरोशगारों की संख्या 60 लाख तक जा पहुँची। जमर्नी की सड़कों पर ऐसे लोग बड़ी तादाद में दिखाइर् देने लगे जो - ‘मैं कोइर् भी काम करने को तैयार हूँ’ - लिखी तख्ती गले में लटकाये खड़े रहते थे। बेरोशगार नौजवान या तो ताश खेलते पाए जाते थे, नुक्कड़ों पर झुंड लगाए रहते थे या पिफर रोशगार दफ्ऱतरों के बाहर लंबी - लंबी कतार में खड़े पाए जाते थे। जैसे - जैसे रोशगार चित्रा 5 - रात को सोने के लिए कतार में खड़े बेघर लोग, 1923नए शब्द वाॅल स्ट्रीट एक्सचेंज: अमेरिका में स्िथत दुनिया का सबसे बड़ा शेयर बाशार। चित्रा 6 - लाइन पर सोते लोग। महामंदी के दिनों में बेरोशगारों को न तो वेतन की उम्मीद रहती थी न ही ठौर - ठिकाने की। जाड़ों में जब उन्हें सिर छिपाने की जगह चाहिए होती थी तो इसके लिए भी उन्हें पैसा देना पड़ता था। खत्म हो रहे थे, युवा वगर् आपरािाक गतिवििायों में लिप्त होता जा रहा था। चारों तरप़फ गहरी हताशा का माहौल था। आथ्िार्क संकट ने लोगों में गहरी बेचैनी और डर पैदा कर दिया था। जैसे - जैसे मुद्रा का अवमूल्यन होता जा रहा थाऋ मध्यवगर्, खासतौर से वेतनभोगी कमर्चारी और पेंशनधारियों की बचत भी सिवुफड़ती जा रही थी। कारोबार ठप्प हो जाने से छोटे - मोटे व्यवसायी, स्वरोशगार में लगे लोग और खुदरा व्यापारियों की हालत भी खराब होती जा रही थी। समाज के इन तबकों को सवर्हाराकरण का भय सता रहा था। उन्हें डर था कि अगर यही ढरार् रहा तो वे भी एक दिन मशदूर बनकर रह जाएँगे या हो सकता है कि उनके पास कोइर् रोशगार ही न रह जाए। अब सिप़र्फ संगठित मशदूर ही थे जिनकी हिम्मत टूटी नहीं थी। लेकिन बेरोशगारों की बढ़ती प़ँफौज उनकी मोल - भाव क्षमता को भी चोट पहुचा रही थी। बड़े व्यवसाय संकट में थे। किसानों का एक बहुत बड़ा वगर् वृफष्िा उत्पादों की कीमतों में बेहिसाब गिरावट की वजह से परेशान था। युवाओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखाइर् दे रहा था। अपने बच्चों का पेट भर पाने में असपफल औरतों के दिल भी डूब रहे थे। राजनीतिक स्तर पर वाइमर गणराज्य एक नाशुक दौर से गुशर रहा था। वाइमर संविधान में वुफछ ऐसी कमियाँ थीं जिनकी वजह से गणराज्य कभी भी अस्िथरता और तानाशाही का श्िाकार बन सकता था। इनमें से एक कमी आनुपातिक प्रतिनििात्व से संबंिात थी। इस प्रावधान की वजह से किसी एक पाटीर् को बहुमत मिलना लगभग नामुमकिन बन गया था। हर बार गठबंधन सरकार सत्ता में आ रही थी। दूसरी समस्या अनुच्छेद 48 की वजह से थी जिसमें राष्ट्रपति को आपातकाल लागू करने, नागरिक अिाकार रद्द करने और अध्यादेशों के शरिए शासन चलाने का अिाकार दिया गया था। अपने छोटे से जीवन काल में वाइमर गणराज्य का शासन 20 मंत्रिामंडलों के हाथों में रहा और उनकी औसत अविा 239 दिन से ज्यादा नहीं रही। इस दौरान अनुच्छेद़48 का भी जमकर इस्तेमाल किया गया। पर इन सारे नुस्खों के बावजूद संकट दूर नहीं हो पाया। लोकतांत्रिाक संसदीय व्यवस्था में लोगों का विश्वास खत्म होने लगा क्योंकि वह उनके लिए कोइर् समाधान नहीं खोज पा रही थी। नए शब्द सवर्हाराकरण: गरीब होते - होते मशदूर वगर् की आथ्िर्ाक स्िथति में पहुँच जाना। हिटलर का उदय अथर्व्यवस्था, राजनीति और समाज में गहराते जा रहे इस संकट ने हिटलर के सत्ता में पहुँ़चने का रास्ता सापफ कर दिया। 1889 में आॅस्िट्रया में जन्मे हिटलर की युवावस्था बेहद गरीबी में गुशरी थी। रोशी - रोटी का कोइर् शरिया न होने के ़कारण पहले विश्वयु( की शुरुआत में उसने भी अपना नाम पफौजी भतीर् के लिए लिखवा दिया था। भतीर् के बाद उसने अगि्रम मोचेर् पर संदेशवाहक का काम किया, काॅपोर्रल बना और बहादुरी के लिए उसने वुफछ तमगे भी हासिल किए। जमर्न सेना की पराजय ने तो उसे हिला दिया था, लेकिन वसार्य की संिा ने तो उसे आग - बबूला ही कर दिया। 1919 में उसने जमर्न वकर्सर् पाटीर् नामक एक छोटे - से समूह की सदस्यता ले ली। धीरे - धीरे उसने इस संगठन पर अपना नियंत्राण कायम कर लिया और उसे नैशनल सोशलिस्ट पाटीर् का नया नाम दिया। इसी पाटीर् को बाद में नात्सी पाटीर् के नाम से जाना गया। 1923 में ही हिटलर ने बवेरिया पर कब्शा करने, बलिर्न पर चढ़ाइर् करने और सत्ता पर कब्शा करने की योजना बना ली थी। इन दुस्साहसिक योजनाओं ़में वह असपफल रहा। उसे गिरफ्रतार कर लिया गया। उस पर देशद्रोह का मुकदमा भी चला लेकिन वुफछ समय बाद उसे रिहा कर दिया गया। नात्सी राजनीतिक खेमा 1930 के दशक के शुरुआती सालों तक जनता को बड़े पैमाने पर अपनी तरप़फ आकष्िार्त नहीं कर पाया। लेकिन महामंदी के दौरान नात्सीवाद ने एक जन आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया। जैसा कि हम पहले देख चुके हैं, 1929 के बाद बैंक दिवालिया हो चुके थे, काम - धंधे बंद होते जा रहे थे, मशदूर बेरोशगार हो रहे थे और मध्यवगर् को लाचारी और भुखमरी का डर सता रहा था। नात्सी प्रोपेगंैडा में लोगों को एक बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाइर् देती थी। 1929 में नात्सी पाटीर् को जमर्न संसद - राइख़स्टाग - के नए शब्द प्रोपेगंैडा: जनमत को प्रभावित करने के लिए किया जाने वाला एक खास तरह का प्रचार ;पोस्टरों, पि़फल्मों और भाषणों आदि के माध्यम सेद्ध। चित्रा 8 - न्यूरेम्बगर् रैली, 1936इस तरह की रैलियाँ हर साल आयोजित की जाती थीं। नात्सी सत्ता का प्रदशर्न इन रैलियों का एक महत्त्वपूणर् आयाम होता था। विभ्िान्न संगठन हिटलर के सामने से परेड करते हुए निकलते थे, उसके प्रति निष्ठा की शपथ लेते थे और उसके भाषण सुनते थे। लिए हुए चुनावों में महश 2.6 प़फीसदी वोट मिले थे। 1932 तक आते - आते यह देश की सबसे बड़ी पाटीर् बन चुकी थी और उसे 37 प़फीसदी वोट मिले। हिटलर शबदर्स्त वक्ता था। उसका जोश और उसके शब्द लोगों को हिलाकर रख देते थे। वह अपने भाषणों में एक शक्ितशाली राष्ट्र की स्थापना, वसार्य संिा में हुइर् नाइंसाप़फी के प्रतिशोध और जमर्न समाज को खोइर् हुइर् प्रतिष्ठा वापस दिलाने का आश्वासन देता था। उसका वादा था कि वह बेरोशगारों को रोशगार और नौजवानों को एक सुरक्ष्िात भविष्य देगा। उसने आश्वासन दिया कि वह देश को विदेशी प्रभाव से मुक्त कराएगा और तमाम विदेशी ‘सािाशों’ का मुँहतोड़ जवाब देगा। चित्रा 9 - हिटलर द्वारा एसए और एसएस कतारों के सामने भाषणयहाँ लंबी और सीध्ी कतारों को देख्िाए। इस तरह के चित्रों के माध्यम से नात्सी सत्ता की भव्यता और ताकत को दशार्ने की कोश्िाश की जाती थी। हिटलर ने राजनीति की एक नइर् शैली रची थी। वह लोगों को गोलबंद करने के लिए आडंबर और प्रदशर्न की अहमियत समझता था। हिटलर के प्रति भारी समथर्न दशार्ने और लोगों में परस्पर एकता का भाव पैदा करने के लिए नात्िसयों ने बड़ी - बड़ी रैलियाँ और जनसभाएँ आयोजित कीं। स्वस्ितक छपे लाल झंडे, नात्सी सैल्यूट और भाषणों के बाद खास अंदाश में तालियों की गड़गड़ाहट - ये सारी चीशें शक्ित प्रदशर्न का हिस्सा थीं। नात्िसयों ने अपने धूँआधार प्रचार के शरिए हिटलर को एक मसीहा, एक रक्षक, एक ऐसे व्यक्ित के रूप में पेश किया, जिसने मानो जनता को तबाही से उबारने के लिए ही अवतार लिया था। एक ऐसे समाज को यह छवि बेहद आकषर्क दिखाइर् देती थी जिसकी प्रतिष्ठा और गवर् का अहसास चकनाचूर हो चुका था और जो एक भीषण आथ्िार्क एवं राजनीतिक संकट से गुशर रहा था। 2.1 लोकतंत्रा का ध्वंस 30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति हिंडनबगर् ने हिटलर को चांसलर का पद - भार संभालने का न्यौता दिया। यह मंत्रिामंडल में सबसे शक्ितशाली पद था। तब तक नात्सी पाटीर् रूढि़वादियों को भी अपने उद्देश्यों से जोड़ चुकी थी। सत्ता हासिल करने के बाद हिटलर ने लोकतांत्रिाक शासन की संरचना और संस्थानों को भंग करना शुरू कर दिया। पफरवरी माह में जमर्न संसद भवन में हुए रहस्यमय अग्िनकांड से उसका रास्ता और आसान हो गया। 28 पफरवरी 1933 को जारी किए गए अग्िन अध्यादेश ;प़फायर डिक्रीद्ध के शरिए अभ्िाव्यक्ित, प्रेस एवं सभा करने की आशादी जैसे नागरिक अिाकारों को अनिश्िचतकाल के लिए निलंबित कर दिया गया। वाइमर संविधान में इन अिाकारों को काप़फी महत्त्वपूणर् स्थान प्राप्त था। इसके बाद हिटलर ने अपने क‘र शत्राु - कम्युनिस्टों - पर निशाना साधा। श्यादातर कम्युनिस्टों को रातों - रात कंसन्टेªशन कैंपों में बंद कर दिया गया। कम्युनिस्टों का बबर्र दमन किया गया। लगभग पाँच लाख की आबादी वाले ड्युस्सलडापॅ़र्फ शहर में गिरफ्ऱतार किए गए लोगों की बची - खुची 6,808 प़फाइलों में से 1,440 सिप़र्फ कम्युनिस्टों की थीं। नात्िसयों ने सिप़र्फ कम्युनिस्टों का ही सप़फाया नहीं किया। नात्सी शासन ने वुफल 52 किस्म के लोगों को अपने दमन का निशाना बनाया था। 3 माचर् 1933 को प्रसि( विशेषािाकार अिानियम ;इनेबलिंग ऐक्टद्ध पारित किया गया। इस कानून के शरिए जमर्नी में बाकायदा तानाशाही स्थापित कर दी गइर्। इस कानून ने हिटलर को संसद को हाश्िाए पर धकेलने और केवल अध्यादेशों के शरिए शासन चलाने का निरंवुफश अिाकार प्रदान कर दिया। नात्सी पाटीर् और उससे जुड़े संगठनों के अलावा सभी राजनीतिक पाटिर्यों और ट्रेड यूनियनों पर पाबंदी लगा दी गइर्। अथर्व्यवस्था, मीडिया, सेना और न्यायपालिका पर राज्य का पूरा नियंत्राण स्थापित हो गया। पूरे समाज को नात्िसयों के हिसाब से नियंत्रिात और व्यवस्िथत करने के लिए विशेष निगरानी और सुरक्षा दस्ते गठित किए गए। पहले से मौजूद हरी वदीर्धारी पुलिस और स्टाॅमर् ट्रपसर् ;एसएद्ध के अलावा गेस्तापो ;गुप्तचर राज्यन्न्पुलिसद्ध, एसएस ;अपराध नियंत्राण पुलिसद्ध और सुरक्षा सेवा ;एसडीद्ध का भी गठन किया गया। इन नवगठित दस्तों को बेहिसाब असंवैधानिक अिाकार दिए गए और इन्हीं की वजह से नात्सी राज्य को एक खूंखार आपरािाक राज्य की छवि प्राप्त हुइर्। गेस्तापो के यंत्राणा गृहों में किसी को भी बंद किया 58 नए शब्द कंसन्टेªशन वैंफप: ऐसे स्थान जहाँ बिना किसी कानूनी प्रिया के लोगों को कैद रखा जाता था। ये कंसन्टेªशन वैंफप बिजली का करंट दौड़ते कँटीले तारों से घ्िारे रहते थे। जा सकता था। ये नए दस्ते किसी को भी यातना गृहों में भेज सकते थे, किसी को भी बिना कानूनी कारर्वाइर् के देश निकाला दिया जा सकता था यागिरफ्ऱतार किया जा सकता था। दंड की आशंका से मुक्त पुलिस बलों ने निरंवुफश और निरपेक्ष शासन का अिाकार प्राप्त कर लिया था। 2.2 पुननिर्मार्ण हिटलर ने अथर्व्यवस्था को पटरी पर लाने की िाम्मेदारी अथर्शास्त्राी ह्यालमार शाख़़्त को सौंपी। शाख्त ने सबसे पहले सरकारी पैसे से चलाए जाने वाले रोशगार संवधर्न कायर्क्रम के शरिए सौ प़फीसदी उत्पादन और सौ प़फीसदी रोशगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया। मशहूर जमर्न सुपर हाइवे और जनता की कार - प़ॅफाक्सवैगन - इस परियोजना की देन थी। विदेश नीति के मोचेर् पर भी हिटलर को प़फौरन कामयाबियाँ मिलीं। 1933 में उसने ‘लीग आॅप़फ नेशंस’ से पल्ला झाड़ लिया। 1936 में राइर्नलैंड पर दोबारा व़फब्शा किया और एक जन, एक साम्राज्य, एक नेता के नारे की आड़ में 1938 में आॅस्िट्रया को जमर्नी में मिला लिया। इसके बाद उसने चेकोस्लोवाकिया के व़फब्शे वाले जमर्नभाषी सुडेंटनलैंड प्रांत पर कब्शा किया और पिफर पूरे चेकोस्लोवाकिया को हड़प लिया। इस दौरान उसे इंग्लैंड का भी खामोश समथर्न मिल रहा था क्योंकि इंग्लैंड की नशर में वसार्य की संिा के नाम पर ़जमर्नी के साथ बड़ी नाइंसापफी हुइर् थी। घरेलू और विदेशी मोचेर् पर जल्दी - जल्दी मिली इन कामयाबियों से ऐसा लगा कि देश की नियति अब पलटने वाली है। ाफाॅक्सवागन’.़चित्रा 10 - पोस्टर से घोषणाः‘आपकी प् इन पोस्टरों के शरिए यह एहसास कराने की कोश्िाश की जाती थी कि अब आम मशदूर भी कार खरीद सकता है। लेकिन हिटलर यहीं नहीं रुका। शाख़्त ने हिटलर को सलाह दी थी कि ़सेना और हथ्िायारों पर ज्यादा पैसा खचर् न किया जाए क्योंकि सरकारी बजट अभी भी घाटे में ही चल रहा था। लेकिन नात्सी जमर्नी में एहतियात पसंद लोगों के लिए कोइर् जगह नहीं थी। शाख़्त को उनके पद से हटा दिया गया। हिटलर ने आथ्िार्क संकट से निकलने के लिए यु( का विकल्प चुना। वह राष्ट्रीय सीमाओं का विस्तार करते हुए ज़़्यादा से ज्यादा संसाधन इकऋइसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सितंबर 1939 में उसने पोलैंड पर हमला कर दिया। इसकी वजह से प्ऱफांस और इंग्लैंड के साथ भी उसका यु( शुरू हो गया। सितंबर 1940 में जमर्नी ने इटली और जापान के साथ एक त्रिापक्षीय संिा पर हस्ताक्षर किए। इस संिा से अंतरार्ष्ट्रीय समुदाय में हिटलर का दावा ा करना चाहता था। यादातर देशों में नात्सी जमर्नी का समथर्न करने़और मशबूत हो गया। यूरोप के ज्वाली कठपुतली सरकारें बिठा दी गईं। 1940 के अंत में हिटलर अपनी ताकत के श्िाखर पर था। अब हिटलर ने अपना सारा ध्यान पूवीर् यूरोप को जीतने के दीघर्कालिक सपने पर केंित कर दिया। वह जमर्न जनता के लिए संसाध्न और रहने की जगह ;स्पअपदह ैचंबमद्ध का इंतशाम करना चाहता था। जून 1941 में उसने सोवियत संघ ़पर हमला किया। यह हिटलर की एक ऐतिहासिक बेववूफपफी थी। इस आक्रमण से जमर्न पश्िचमी मोचार् बि्रटिश वायुसैनिकों के बमबारी की चपेट में आ गया जबकि पूवीर् मोचेर् पर सोवियत सेनाएँ जमर्नों को नाकों चने चबवा रही थीं। सोवियत लाल सेना ने स्तालिनग्राद में जमर्न सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। सोवियत लाल सैनिकों ने पीछे हटते जमर्न सिपाहियों का आख्िार तक पीछा किया और अंत में वेँबलिर्न के बीचोंबीच जा पहुचे। इस घटनाक्रम ने अगली आधी सदी के लिए समूचे पूवीर् यूरोप पर सोवियत वचर्स्व स्थापित कर दिया। अमेरिका इस यु( में पफँसने से लगातार बचता रहा। अमेरिका पहले विश्वयु( की वजह से पैदा हुइर् आथ्िार्क समस्याओं को दोबारा नहीं झेलना चाहता था। लेकिन वह लंबे समय तक यु( से दूर भी नहीं रह सकता था। पूरब में जापान की ताकत पफैलती जा रही थी। उसने प्ऱेंफच - इंडो - चाइना पर कब्शा कर लिया था और प्रशांत महासागर में अमेरिकी नौसैनिक ठिकानों पर हमले की पूरी योजना बना ली थी। जब जापान ने हिटलर को समथर्न दिया और पलर् हाबर्र पर अमेरिकी ठिकानों को बमबारी का निशाना बनाया तो अमेरिका भी दूसरे विश्वयु( में वूफद पड़ा। यह यु( मइर् 1945 में हिटलर की पराजय और जापान के हिरोश्िामा शहर पर अमेरिकी परमाणु बम गिराने के साथ खत्म हुआ। दूसरे विश्वयु( के इस संक्ष्िाप्त ब्यौरे के बाद अब हम एक बार पिफर हेलमुट और उसके पिता की कहानी पर वापस लौटते हैं। यह यु( के दौरान नात्सी शुल्मों की कहानी है। चित्रा 12 - भारतीय समाचारपत्रों में जमर्नी के हालात पर नशरनात्िसयों का विश्व दृष्िटकोण नात्िसयों ने जो अपराध किए वे खास तरह की मूल्य - मान्यताआंे, एक खास तरह के व्यवहार से संबंिात थे। नात्सी विचारधारा हिटलर के विश्व दृष्िटकोण का पयार्यवाची थी। इस विश्व दृष्िटकोण में सभी समाजों को बराबरी का हक नहीं था, वे नस्ली आधार पर या तो बेहतर थे या कमतर थे। इस नशरिये में ब्लाॅन्ड, नीली आँखों वाले, नाॅ£डक जमर्न आयर् सबसे ऊपरी और यहूदी सबसे निचली पायदान पर आते थे। यहूदियों को नस्ल विरोधी, यानी आयो± का क‘र शत्राु माना जाता था। बाकी तमाम समाजों को उनके बाहरी रंग - रूप के हिसाब से जमर्न आयो± और यहूदियों के बीच में रखा गया था। हिटलर की नस्ली सोच चाल्सर् डाविर्न और हबर्टर् स्पेंसर जैसे विचारकों के सि(ांतों पर आधारित थी। डाविर्न प्रकृति विज्ञानी थे जिन्होंने विकास और प्राकृतिक चयन की अवधारणा के शरिए पौधों और पशुओं की उत्पिा की व्याख्या का प्रयास किया था। बाद में हबर्टर् स्पेंसर ने ‘अति जीविता का सि(ांत’ ;सरवाइवल आॅप़फ द पि़फटेस्टद्ध - जो सबसे योग्य है, वही िांदा बचेगा - यह विचार दिया। इस विचार का मतलब यह था कि जो प्रजातियाँ बदलती हुइर् वातावरणीय परिस्िथतियों के अनुसार खुद को ढाल सकती हैं वही पृथ्वी पर िांदा रहती हैं। यहाँ हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि डाविर्न ने चयन के सि(ांत को एक विशु( प्राकृतिक प्रिया कहा था और उसमें इंसानी हस्तक्षेप की वकालत कभी नहीं की। लेकिन नस्लवादी विचारकों और राजनेताओं ने पराजित समाजों पर अपने साम्राज्यवादी शासन को सही ठहराने के लिए डाविर्न के विचारों का सहारा लिया। नात्िसयों की दलील बहुत सरल थीः जो नस्ल सबसे ताकतवर है वह िांदा रहेगीऋ कमशोर नस्लें खत्म हो जाएँगी। आयर् नस्ल सवर्श्रेष्ठ है। उसे अपनी शु(ता बनाए रखनी है, ताकत हासिल करनी है और दुनिया पर वचर्स्व कायम करना है। हिटलर की विचारधारा का दूसरा पहलू लेबेन्ड्डाउम या जीवन - परििा की भू - राजनीतिक अवधारणा से संबंिात था। वह मानता था कि अपने लोगों को बसाने के लिए श्यादा से श्यादा इलाकों पर कब्शा करना शरूरी है। इससे मातृ देश का क्षेत्रापफल भी बढ़ेगा और नए इलाकों में जाकर बसने वालों को अपने जन्मस्थान के साथ गहरे संबंध बनाए रखने में मुश्िकल भी पेश नहीं आएगी। हिटलर की नशर में इस तरह जमर्न राष्ट्र के लिए संसाधन और बेहिसाब शक्ित इकट्ठा की जा सकती थी। पूरब में हिटलर जमर्न सीमाओं को और पफैलाना चाहता था ताकि सारे जमर्नों को भौगोलिक दृष्िट से एक ही जगह इकऋा किया जा सके। पोलैंड इस धारणा की पहली प्रयोगशाला बना। 3.1 नस्लवादी राज्य की स्थापना सत्ता में पहुँचते ही नात्िसयों ने ‘शु(’ जमर्नों के विश्िाष्ट नस्ली समुदाय की स्थापना के सपने को लागू करना शुरू कर दिया। सबसे पहले उन्होंने विस्तारित जमर्न ड्डोत क ‘यह पृथ्वी न तो किसी को हिस्से में मिली है और न तोहपेफ में। नियति ने यह उन्हें सौंपी हैं जिनके हृदय में़इसको जीत लेने का, इसको बचाए रखने का साहस है और जिनके पास इस पर हल चलाने की उद्यमशीलता है...। इस दुनिया का सबसे बुनियादी अिाकार है जीवन का अिाकार बशतेर् किसी के पास उसे हासिल करने की ताकत हो। इस अिाकार के आधार पर एक उफजार्वान राष्ट्र अपने भूभाग को अपनी जनसंख्या के हिसाब से पैफलाने के रास्ते ढूँढ़ लेगा।’ ़हिटलर, सीव्रेफट बुक, सं., टेलपफोडर् टेलर। ियाकलाप ड्डोत क और ख को पढ़ें - ऽ इनसे हिटलर के साम्राज्यवादी मंसूबों के बारे में आपको क्या पता चलता है? ऽ आपकी राय में इन विचारों पर महात्मा गांधी हिटलर से क्या कहते? नए शब्द नाॅ£डक जमर्न आयर्: आयर् बताए जाने वालों की एक शाखा। ये लोग उत्तरी यूरोपीय देशों में रहते थे और जमर्न या मिलते - जुलते मूल के लोग थे। ब्लाॅन्डः नीली आँखों और सुनहरे बालों वाले। साम्राज्य में मौजूद उन समाजों या नस्लों को खत्म करना शुरू किया जिन्हें वे ‘अवांछित’ मानते थे। नात्सी ‘शु( और स्वस्थ नाॅ£डक आयो±’ का समाज बनाना चाहते थे। उनकी नशर में केवल ऐसे लोग ही ‘वांछित’ थे। केवल ये ही लोग थे जिन्हें तरक्की और वंश - विस्तार के योग्य माना जा सकता था। बाकी सब ‘अवांछित’ थे। इसका मतलब यह निकला कि ऐसे जमर्नों को भी िांदा रहने का कोइर् हक नहीं है जिन्हें नात्सी अशु( या असामान्य मानते थे। यूथनेिाया ;दया मृत्युद्ध कायर्क्रम के तहत बाकी नात्सी अप़फसरों के साथ - साथ हेलमुट के पिता ने भी असंख्य ऐसे जमर्नों को मौत के घाट उतारा था जिन्हें वह मानसिक या शारीरिक रूप से अयोग्य मानते थे। केवल यहूदी ही नहीं थे जिन्हें ‘अवांछितों’ की श्रेणी में रखा गया था। इनके अलावा भी कइर् नस्लें थीं जो इसी नियति के लिए अभ्िाशप्त थीं। जमर्नी में रहने वाले जिप्िसयों और अश्वेतों की पहले तो जमर्न नागरिकता छीन ली गइर् और बाद में उन्हें मार दिया गया। रूसी और पोलिश मूल के लोगों को भी मनुष्य से कमतर माना गया। जब जमर्नी ने पोलैंड और रूस के वुफछ हिस्सों पर कब्शा कर लिया तो स्थानीय लोगों को भयानक परिस्िथतियों में गुलामों की तरह काम पर झोंक दिया गया। उन्हें इंसानी बतार्व के लायक नहीं माना जाता था। उनमें से बहुत सारे बेहिसाब काम के बोझ और भूख से ही मर गए। नात्सी जमर्नी में सबसे बुरा हाल यहूदियों का हुआ। यहूदियों के प्रति नात्िसयों की दुश्मनी का एक आधार यहूदियों के प्रति इर्साइर् धमर् में मौजूद परंपरागत घृणा भी थी। इर्साइयों का आरोप था कि इर्सा मसीह को यहूदियों ने ही मारा था। इर्साइयों की नशर में यहूदी आदतन हत्यारे और सूदखोर थे। मध्यकाल तक यहूदियों को शमीन का मालिक बनने की मनाही थी। ये लोग मुख्य रूप से व्यापार और धन उधार देने का धंधा करके अपना गुशारा चलाते थे। वे बाकी समाज से अलग बस्ितयों में रहते थे जिन्हें घेटो ;ळीमजजवमेद्ध यानी दड़बा कहा जाता था। नस्ल - संहार के शरिए इर्साइर् बार - बार उनका सप़फाया करते रहते थे। उनके ख्िालाप़फ जब - तब संगठित हिंसा की जाती थी और उन्हें उनकी बस्ितयों से खदेड़ दिया जाता था। लेकिन इर्साइयत ने उन्हें बचने का एक रास्ता पिफर भी दिया हुआ था। यह धमर् परिवतर्न का रास्ता था। आधुनिक काल में बहुत सारे यहूदियों ने इर्साइर् धमर् अपना लिया और जानते - बूझते हुए जमर्न संस्कृति में ढल गए। लेकिन यहूदियों के प्रति हिटलर की घृणा तो नस्ल के छद्म वैज्ञानिक सि(ांतों पर आधारित थी। इस नप़फरत में ‘यहूदी समस्या’ का हल धमा±तरण से नहीं निकल सकता था। हिटलर की ‘दृ़र्फ एक ही हल था - ष्िट’ में इस समस्या का सिपयहूदियों को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। सन् 1933 से 1938 तक नात्िसयों ने यहूदियों को तरह - तरह से आतंकित किया, उन्हें दरिद्र कर आजीविका के साधनों से हीन कर दिया और उन्हें शेष समाज से अलग - थलग कर डाला। यहूदी देश छोड़कर जाने लगे। 1939 - 45 के दूसरे दौर में यहूदियों को वुफछ खास इलाकों में इकट्ठा करने और अंततः पोलैंड में बनाए गए गैस चेंबरों में ले जाकर मार देने की रणनीति अपनाइर् गइर्। ड्डोत ख ‘पृथ्वी को लगातार राज्यों के बीच बाँटा जा रहा है और उनमें से कइर् तो महाद्वीप जितने बड़े हैं। ऐसे युग में हम किसी ऐसी विश्व शक्ित की बात नहीं सोच सकते जिसका राजनीतिक मातृ - देश केवल पाँच सौ वगर् किलोमीटर जैसे वाहियात से क्षेत्रापफल में सिमटा हुआ हो।’ ़हिटलर, मेन काम्पफ, पृ. 644 । नए शब्द जिप्सी: ‘जिप्सी’ के नाम से श्रेणीब( किए गए समूहों की अपनी सामुदायिक पहचान थी। सिन्ती और रोमा ऐसे ही दो समुदाय थे। सूदखोर: बहुत श्यादा ब्याज वसूल करने वाले महाजनऋ इस शब्द का प्रायः गाली के रूप प्रयोग किया जाता है। घेटोः किसी समुदाय को औरों से अलग - थलग करके रखना। 3.2 नस्ली कल्पनालोक ;यूटोपियाद्ध यु( के साए में नात्सी अपने कातिलाना, नस्लवादी कल्पनालोक या आदशर् विश्व के निमार्ण में लग गए। जनसंहार और यु( एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए। पराजित पोलैंड को पूरी तरह तहस - नहस कर दिया गया।उत्तर - पश्िचमी पोलैंड का ज़्यादातर हिस्सा जमर्नी में मिला लिया गया। पोलैंड के लोगों को अपने घर और माल - असबाब छोड़कर भागने के लिए मजबूर किया गया ताकि जमर्नी के कब्शे वाले यूरोप में रहने वाले जमर्नों को वहाँ लाकर बसाया जा सके। इसके बाद पोलैंडवासियों को मवेश्िायों की तरह खदेड़ कर जनरल गवनर्मेंट नामक दूसरे हिस्से में पहुँचा दिया गया। जमर्नसाम्राज्य में मौजूद तमाम अवांछित तत्त्वों को जनरल गवनर्मेंट नामक इसी इलाके में लाकर रखा जाता था। पोलैंड के बुिजीवियों को बड़े पैमाने पर मौत के घाट उतारा गया। यह पूरे पोलैंड के समाज को बौिक और आध्यात्िमक स्तर पर गुलाम बना लेने की चाल थी। आयर् जैसे लगने वाले पोलैंड के बच्चों को उनके माँ - बाप से छीन कर जाँच के लिए ‘नस्ल विशेषज्ञों’ के पास पहुँचा दिया गया। अगर वे नस्ली जाँच में कामयाब हो जाते तो उन्हें जमर्न परिवारों में पाला जाता और अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें अनाथाश्रमों में डाल दिया जाता जहाँ उनमें से श्यादातर मर जाते थे। जनरल गवनर्मेंट में वुफछ विशालतम घेटो और गैस चेंबर भी थे इसलिए यहाँ यहूदियों को बड़े पैमाने पर मारा जाता था। ियाकलाप अगले दो पन्नों को देख्िाए और इनके बारे में संक्षेप में लिख्िाए: ऽ आपके लिए नागरिकता का क्या मतलब है? अध्याय 1 एवं 3 को देखें और 200 शब्दों में बताएँ कि प़्रफांसीसी क्रांति और नात्सीवाद ने नागरिकता को किस तरह परिभाष्िात किया? ऽ नात्सी जमर्नी में ‘अवांछितों’ के लिए न्यूरेम्बगर् कानूनों का क्या मतलब था? उन्हें इस बात का अहसास कराने के लिए कि वह ‘अवांछित’ हैं अन्य कौन - कौन से कानूनी कदम उठाए गए? मौत का सिलसिला पहला चरण: बहिष्कार: 1933 - 39 हमारे बीच तुम्हें नागरिकों की तरह रहने का कोइर् हक नहीं। न्यूरेम्बगर् नागरिकता अिाकार, सितंबर 1935: 1.जमर्न या उससे संबंिात रक्त वाले व्यक्ित ही जमर्न नागरिक होंगे और उन्हें जमर्न साम्राज्य का संरक्षण मिलेगा। 2. यहूदियों और जमर्नों के बीच विवाह पर पाबंदी। 3. यहूदियों और जमर्नों के बीच विवाहेतर संबंधों को अपराध घोष्िात कर दिया गया। 4. यहूदियों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज पफहराने पर पाबंदी लगा दी गइर्। अन्य कानूनी उपाय: यहूदी व्यवसायों का बहिष्कार। सरकारी सेवाओं से निकाला जाना।यहूदियों की संपिा की शब्ती और बिक्री। इसके अलावा नवंबर 1938 के एक जनसंहार में यहूदियों की संपिायों को तहस - नहस किया गया, लूटा गया, उनके घरों पर हमले हुए, यहूदी प्राथर्नाघर ़;ैलदंहवहनमेद्ध जला दिए गए और उन्हें गिरफ्रतार किया गया। इस घटना को ‘नाइट आॅप़फ ब्रोकन ग्लास’ के नाम से याद किया जाता है। दूसरा चरण: दड़बाबंदी ;ळीमजजवपेंजपवदद्धः1940 - 44 तुम्हें हमारे बीच रहने का कोइर् हक नहीं। सितंबर 1941 से सभी यहूदियों को हुक्म दिया गया कि वह डेविड का पीला सितारा अपनी छाती पर लगा कर रखेंगे। उनके पासपोटर्, तमाम कानूनी दस्तावेजोंऔर घरों के बाहर भी यह पहचान चिÉ छाप दिया गया। जमर्नी में उन्हें यहूदी मकानों में और पूवीर् क्षेत्रा के लोद्श एवं वाॅरसा जैसी घेटो बस्ितयों में कष्टपूणर् और दरिद्रता की स्िथति में रखा जाता था। ये बेहद पिछड़े और निधर्न इलाके थे। घेटो में दाख्िाल होने से पहले यहूदियों को अपनी सारी संपिा छोड़ देने के लिए मजबूर किया गया। वुफछ ही समय में घेटो बस्ितयों में वंचना, भुखमरी, गंदगी और बीमारियों का साम्राज्य व्याप्त हो गया। तीसरा चरण: सवर्नाश: 1941 के बाद तुम्हें जीने का अिाकार नहीं। समूचे यूरोप के यहूदी मकानों, यातना गृहों और घेटो बस्ितयों में रहने वाले यहूदियों को मालगाडि़यों में भर - भर कर मौत के कारखानों में लाया जाने लगा। पोलैंड तथा अन्य पूवीर् इलाकों में, मुख्य रूप से बेलशेक, औषवित्स, सोबीबोर, त्रोबलिंका, चेल्म्नो, तथा मायदानेक में उन्हें गैस चेंबरों में झोंक दिया गया। औद्योगिक और वैज्ञानिक तकनीकों के सहारे बहुत सारे लोगों को पलक झपकते मौत के घाट उतार दिया गया। नात्सी जमर्नी में युवाओं की स्िथति युवाओं में हिटलर की दिलचस्पी जुनून की हद तक पहुँच चुकी थी। उसका मानना था कि एक शक्ितशाली नात्सी समाज की स्थापना के लिए बच्चों को नात्सी विचारधारा की घु‘ी पिलाना बहुत शरूरी है। इसके लिए स्वूफल के भीतर और बाहर, दोनों जगह बच्चों पर पूरा नियंत्राण आवश्यक था। नात्सीवाद के दौरान स्वूफलों में क्या हो रहा था? तमाम स्वूफलों में सपफाए़और शु(ीकरण की मुहिम चलाइर् गइर्। यहूदी या ‘राजनीतिक रूप से अविश्वसनीय’ दिखाइर् देने वाले श्िाक्षकों को पहले नौकरी से हटाया गया और बाद में मौत के घाट उतार दिया गया। बच्चों को अलग - अलग बिठाया जाने लगा। जमर्न और यहूदी बच्चे एक साथ न तो बैठ सकते थे और न खेल - वूफद सकते थे। बाद में ‘अवांछित बच्चों’ को यानी यहूदियों, जिप्िसयों के बच्चों और विकलांग बच्चों को स्वूफलों से निकाल दिया गया। चालीस के दशक में तो उन्हें भी गैस चेंबरों में झोंक दिया गया। ‘अच्छे जमर्न’ बच्चों को नात्सी श्िाक्षा प्रिया से गुशरना पड़ता था। यह विचारधारात्मक प्रश्िाक्षण की एक लंबी प्रिया थी। स्वूफली पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से लिखा गया। नस्ल के बारे में प्रचारित नात्सी विचारों को सही ठहराने के लिए नस्ल विज्ञान के नाम से एक नया विषय पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। और तो और, गण्िात की कक्षाओं में भी यहूदियों की एक खास छवि गढ़ने की कोश्िाश की जाती थी। बच्चों को सिखाया गया कि वे वप़़फादार व आज्ञाकारी बनें, यहूदियों से नपफरत और हिटलर की पूजा करें। खेल - वूफद के शरिए भी बच्चों में हिंसा और आक्रामकता की भावना पैदा की जाती थी। हिटलर का मानना था कि मुक्केबाशी का प्रश्िाक्षण बच्चों को पफौलादी दिल वाला, ताकतवर और मदार्ना बना सकता है।़जमर्न बच्चों और युवाओं को ‘राष्ट्रीय समाजवाद की भावना’ से लैस करने की िाम्मेदारी युवा संगठनों को सौंपी गइर्। 10 साल की उम्र के बच्चों को युंगप़फोक में दाख्िाल करा दिया जाता था। 14 साल की उम्र में सभी लड़कों को नात्िसयों के युवा संगठन - हिटलर यूथ - की सदस्यता लेनी पड़ती थी। इस संगठन में वे यु( की उपासना, आक्रामकता व हिंसा, लोकतंत्रा की निंदा और यहूदियों, कम्युनिस्टों, जिप्िसयों व अन्य ‘अवांछितों’ से घृणा का सबक सीखते थे। गहन विचारधारात्मक और शारीरिक प्रश्िाक्षण के बाद लगभग 18 साल की उम्र में वे लेबर सविर्स ;श्रम सेवाद्ध में शामिल हो जाते थे। इसके बाद उन्हें सेना में काम करना पड़ता था और किसी नात्सी संगठन की सदस्यता लेनी पड़ती थी। नए शब्द यंुगप़फोक: 14 साल से कम उम्र वाले बच्चों के लिए नात्सी युवा संगठन। अन्स्र्ट हीमर ;न्यूरेम्बगर्: डेअर श्टुमर्र, 1938द्ध द्वारा रचित डेअर गिफ्रटपिल्श ;विषैला मशरूमद्ध से, पृष्ठ 7. चित्रा का शीषर्क इस प्रकाऱहै: ‘यहूदी नाक सिरे पर मुड़ी हुइर् है। यह अंग्रेशी के अंक 6 जैसी दिखती है।’ एल्वीरा बाउफअर ;न्यूरेम्बगर्ःडेअर श्टुमर्र, 1936द्ध रचित ट्राउफ कीनेम जुड आउफप़फ ग्रुनर हीदः इर्न बिल्दरबुश प़ुफर ग्राॅस उंद कियोम ;ग्रीन हीथ में किसी यहूदी पर यकीन न करोः छोटे - बड़ों के लिए एक चित्रा पुस्तकद्ध से। ियाकलाप अगर आप ऐसी किसी कक्षा में होते तो यहूदियों के प्रति आप का रवैया कैसा होता? क्या आपने कभी सोचा है कि आपके जान - पहचान वाले अन्य समुदायों के बारे में क्या सोचते हैं? उन्होंने इस तरह की छवियाँ कहाँ से हासिल की हैं? ड्डोत ग छह से दस साल तक की उम्र के सभी लड़कों को नात्सी विचारधारा का शुरुआती प्रश्िाक्षण दिया जाता था। प्रश्िाक्षण पूरा होने पर उन्हें हिटलर के प्रति निष्ठा की यह शपथ लेनी पड़ती थी: ‘हमारे फ्ऱयूह्रर का प्रतिनििात्व करने वाले इस रक्तध्वज की उपस्िथति में मैं शपथ लेता कि मेरी सारी ऊजार् और मेरी सारी शक्ित हमारे देश के रक्षक एडाॅ़फ हिटलर को समपिर्त ल्पहूँहै। मैं उनके लिए अपना जीवन देने को इच्छुक और तैयार हूँ। इर्श्वर मेरी मदद करे।’ डब्ल्यू.शाइरर, द राइश एंड प़फाॅल आॅप़फ द थडर् राइख से उ(ृत। ड्डोत घ जमर्न लेबर पं्ऱफट के प्रमुख राॅबटर् ले ने कहा था: हम तभी से काम शुरू कर देते हैं जब बच्चा तीन साल का होता है। जैसे ही वह शरा - सा भी सोचने लगता है उसे लहराने के लिए एक छोटा - सा झंडा थमा दिया जाता है। इसके बाद स्वूफल, हिटलर यूथ और सैनिक सेवा का नंबर आता है। लेकिन यह सब वुफछ पूरा हो जाने के बाद भी हम किसी को छोड़ते नहीं हैं। लेबर प्ऱफंट उन्हें अपनी गिरफ्ऱत में ले लेता है। चाहे उन्हें अच्छा लगे या बुरा, कब्र तक यह उनका पीछा नहीं छोड़ता।’ ियाकलाप चित्रा 23, 24 और 27 को देख्िाए। कल्पना कीजिए कि आप नात्सी जमर्नी में रहने वाले यहूदी या पोलिश मूल के व्यक्ित हैं। आप सितंबर 1941 में जी रहे हैं और अभी - अभी कानून बनाया गया है कि यहूदियों को डेविड का तमगा पहनकर रहना होगा। ऐसी परिस्िथति में अपने जीवन के एक दिन का ब्यौरा लिख्िाए। नात्सी यूथ लीग का गठन 1922 में हुआ था। चार साल बाद उसे हिटलर यूथ का नया नाम दिया गया। 1933 तक आते - आते इस संगठन में 12.5 लाख से ज्यादा बच्चे थे। युवा आंदोलन को नात्सीवाद के तहत एकजुट़करने के लिए बाकी सभी युवा संगठनों को पहले भंग कर दिया गया और बाद में उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 4.1 मातृत्व की नात्सी सोच नात्सी जमर्नी में प्रत्येक बच्चे को बार - बार यह बताया जाता था कि औरतें बुनियादी तौर पर मदो± से भ्िान्न होती हैं। उन्हें समझाया जाता था कि औरत - मदर् के लिए समान अिाकारों का संघषर् गलत है। यह समाज को नष्ट कर देगा। इसी आधार पर लड़कों को आक्रामक, मदार्ना और पत्थरदिल होना सिखाया जाता था जबकि लड़कियों को यह कहा जाता था कि उनका प़फशर् एक अच्छी माँ बनना और शु( आयर् रक्त वाले बच्चों को जन्म देना और उनका पालन - पोषण करना है। नस्ल की शु(ता बनाए रखने, यहूदियों से दूर रहने, घर संभालने और बच्चों को नात्सी मूल्य - मान्यताओं की श्िाक्षा देने का दायित्व उन्हें ही सौंपा गया था। आयर् संस्कृति और नस्ल की ध्वजवाहक वही थीं। 1933 में हिटलर ने कहा था: ‘मेरे राज्य की सबसे महत्त्वपूणर् नागरिक माँ है।’ लेकिन नात्सी जमर्नी में सारी माताओं के साथ भी एक जैसा बतार्व नहीं होता था। जो औरतें नस्ली तौर पर अवांछित बच्चों को जन्म देती थीं उन्हें दंडित किया जाता था जबकि नस्ली तौर पर वांछित दिखने वाले बच्चों को जन्म देने वाली माताओं को इनाम दिए जाते थे। ऐसी माताओं को अस्पताल में विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं, दुकानों में उन्हें ज्यादा छूट मिलती़थी और थ्िायेटर व रेलगाड़ी के टिकट उन्हें सस्ते में मिलते थे। हिटलर ने खूब सारे बच्चों को जन्म देने वाली माताओं के लिए वैसे ही तमगे देने का इंतशाम किया था जिस तरह के तमगे सिपाहियों को दिए जाते थे। चार बच्चे पैदा करने वाली माँ को काँसे का, छः बच्चे पैदा करने वाली माँ को चाँदी का और आठ या उससे ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाली माँ को सोने का तमगा दिया जाता था। निधार्रित आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली ‘आयर्’ औरतों की सावर्जनिक रूप से निंदा की जाती थी और उन्हें कड़ा दंड दिया जाता था। बहुत सारी औरतों को गंजा करके, मुँह पर कालिख पोत कर और उनके गले में तख्ती लटका कर पूरे शहर में घुमाया जाता था। उनके गले में लटकी तख्ती पर लिखा होता था - ‘मैंने राष्ट्र के सम्मान को मलिन किया है।’ इस आपरािाक वृफत्य के लिए बहुत सारी औरतों को न केवल जेल की सशा दी गइर् बल्िक उनसे तमाम नागरिक सम्मान और उनके पति व परिवार भी छीन लिए गए। 4.2 प्रचार की कला नात्सी शासन ने भाषा और मीडिया का बड़ी होश्िायारी से इस्तेमाल किया और उसका शबदर्स्त प़फायदा उठाया। उन्होंने अपने तौर - तरीकों को बयान करने के लिए जो शब्द इर्जाद किए थे वे न केवल भ्रामक बल्िक दिल दहला देने वाले शब्द थे। नात्िसयों ने अपने अिाकृत दस्तावेशों में ‘हत्या’ या ‘मौत’ जैसे शब्दों का कभी इस्तेमाल नहीं किया। सामूहिक हत्याओं को विशेष व्यवहार, अंतिम समाधान ;यहूदियों के संदभर् मेंद्ध, यूथनेिाया ;विकलांगों के लिएद्ध, चयन और संक्रमण - मुक्ित आदि शब्दों से व्यक्त किया जाता था। ‘इवैक्युएशन’ ;खाली करानाद्ध का आशय था लोगों को गैस चेंबरों में ले जाना। क्या आपको मालूम है कि गैस चेंबरों को क्या कहा जाता था? उन्हें ‘संक्रमण मुक्ित - क्षेत्रा’ कहा जाता था। गैस चेंबर स्नानघर जैसे दिखाइर् देते थे और उनमें नकली प़फव्वारे भी लगे होते थे। ड्डोत च न्यूरेम्बगर् पाटीर् रैली में औरतों को संबोिात करते हुए 8 सितंबर 1934 को हिटलर ने कहा था: हम इस बात को अच्छा नहीं मानते कि औरतें मदर् की दुनिया में, उसके मुख्य दायरे में दखल दें। हमारी नशर में यह वुफदरती बात है कि ये दोनों दुनिया एक - दूसरे से अलग - अलग हैं...। जिस तरह मदर् अपने साहस के रूप में यु( के मोचेर् पर अपना सवर्स्व न्यौछावर कर देता है उसी तरह औरतें अपने अनंत आत्मबलिदान, अनंत पीड़ा और ददर् के रूप में अपना योगदान देती हैं। हर बच्चा जो औरत संसार में लाती है वह उसके लिए एक यु( ही है, अपने समाज को िांदा रखने के लिए औरत द्वारा छेड़ा गया यु(। ड्डोत छ न्यूरेम्बगर् पाटीर् रैली में 8 सितंबर 1934 को ही हिटलर ने यह भी कहा था: ‘औरत किसी समुदाय के संरक्षण में सबसे स्िथर तत्त्व है...। उसे इस बात का सबसे अच्छी तरह पता होता है कि अपनी नस्ल को खत्म होने से बचाने के लिए क्या - क्या चीशें महत्त्वपूणर् होती हैं क्योंकि उसी के बच्चे हैं जो इस सारी पीड़ा से सबसे पहले प्रभावित होंगे...। इसीलिए हमने नस्ली समुदाय के संघषर् में औरत को भी वही जगह दी है जो प्रकृति और नियति के अनुसार है।’ शासन के लिए समथर्न हासिल करने और नात्सी विश्व दृष्िटकोण को पैफलाने के लिए मीडिया का बहुत सोच - समझ कर इस्तेमाल किया गया। नात्सी विचारों को पैफलाने के लिए तस्वीरों, पि़फल्मों, रेडियो, पोस्टरों, आकषर्क नारों और इश्तहारी पचो± का खूब सहारा लिया जाता था। पोस्टरों में जमर्नों के ‘दुश्मनों’ की रटी - रटाइर् छवियाँ दिखाइर् जाती थीं, उनका मशाक उड़ाया जाता था, उन्हें अपमानित किया जाता था, उन्हें शैतान के रूप में पेश किया जाता था। समाजवादियों और उदारवादियों को कमशोर और पथभ्रष्ट तत्त्वों के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। उन्हें विदेशी एजेंट कहकर बदनाम किया जाता था। प्रचार पिफल्मों में यहूदियों के प्रति नप़फरत पफैलाने पर शोर दिया जाता था। ‘द़एटनर्ल ज्यू’ ;अक्षय यहूदीद्ध इस सूची की सबसे वुफख्यात पि़फल्म थी। परंपरापि्रय यहूदियों को खास तरह की छवियों में पेश किया जाता था। उन्हें दाढ़ी बढ़ाए और काफ्ऱतान ;चोगाद्ध पहने दिखाया जाता था, जबकि वास्तव में जमर्न यहूदियों और बाकी जमर्नों के बीच कोइर् प़फवर्फ करना असंभव था क्योंकि दोनों समुदाय एक - दूसरे में काप़फी घुले - मिले हुए थे। उन्हें केंचुआ, चूहा और कीड़ा जैसे शब्दों से संबोध्ित किया जाता था। उनकी चाल - ढाल की तुलना वुफतरने वाले छछुंदरी जीवों से की जाती थी। नात्सीवाद ने लोगों के दिलोदिमाग पर गहरा असर डाला, उनकी भावनाओं को भड़का कर उनके गुस्से और नप़फरत को ‘अवांछितों’ पर वंेफित कर दिया। इसी अभ्िायान से नात्सीवाद का सामाजिक आधार पैदा हुआ। नात्िसयों ने आबादी के सभी हिस्सों को आकष्िार्त करने के लिए प्रयास किए। पूरे समाज को अपनी तरप़फ आकष्िार्त करने के लिए उन्होंने लोगों को इस बात का अहसास कराया कि उनकी समस्याओं को सिपर्फ नात्सी ही हल़कर सकते हैं। चित्रा के नीचे दी गइर् पंक्ितयाँ: ‘पैसा ही यहूदी का भगवान है। पैसे के लिए वह भयानक अपराध करता है। वह तब तक चैन से नहीं बैठता जब तक कि नोटों से भरे बोरे पर न बैठ जाए, जब तक कि वह पैसे का राजा न हो जाए।’ ियाकलाप अगर आप यहूदी औरत या गैर - यहूदी जमर्न औरत होतीं तो हिटलर के विचारों पर किस तरह की प्रतििया देतीं? ियाकलाप आपके विचार से इस पोस्टर में क्या दिखाने की कोश्िाश की जा रही है? जमर्न किसान तुम सिप़र्फ हिटलर के हो! क्यों? आज जमर्न किसान दो भयानक पाटों के बीच पिस रहा है: एक खतरा अमेरिकी अथर्व्यवस्था यानी बड़े पूँजीवाद का है दूसरा खतरा बोलशेविज़्म की माक्सर्वादी अथर्व्यवस्था का है बड़ा पूँजीवाद और बोलशेविज़्म, दोनों हाथ मिला कर काम करते हैं: ये दोनों ही यहूदी विचारों से जन्मे हैं और विश्व यहूदीवाद की महायोजना को लागू कर रहे हैं। किसान को इन खतरों से कौन बचा सकता है? केवल राष्ट्रीय समाजवाद 1932 में छपे एक नात्सी पचेर् से। चित्रा 29 - यह पोस्टर दशार्ता है कि किसानों को नात्सी किस तरह आकष्िार्त करते थेइसमें हिटलर, को अगि्रम मोचेर् पर यु(रत सिपाही बताकर उसे वोट देने का आह्नान किया जा रहा है। ियाकलाप चित्रा 29 - 30 को देखें और निम्नलिख्िात का उत्तर दें: इनसे नात्सी प्रचार के बारे में हमें क्या पता चलता है? आबादी के विभ्िान्न हिस्सों को गोलबंद करने के लिए नात्सी क्या प्रयास कर रहे हैं? आम जनता और मानवता के ख्िालापफ अपराध़नात्सीवाद पर आम लोगों की प्रतििया क्या रही? बहुत सारे लोग नात्सी शब्दाडंबर और धुआँेधार प्रचार का श्िाकार हो गए। वदुनिया को नात्सी नशरों से देखने लगे और अपनी भावनाओं को नात्सी शब्दावली में ही व्यक्त करने लगे। किसी यहूदी से आमना - सामना हो जाने पर उन्हें अपने भीतर गहरी नप़फरत और गुस्से का अहसास होता था। उन्होंने न केवल यहूदियों के घरों के बाहर निशान लगा दिए बल्िक जिन पड़ोसियों पर शक था उनके बारे में पुलिस को भी सूचित कर दिया। उन्हें पक्का विश्वास था कि नात्सीवाद ही देश को तरक्की के रास्ते पर लेकर जाएगाऋ यही व्यवस्था सबका कल्याण करेगी। लेकिन जमर्नी का हर व्यक्ित नात्सी नहीं था। बहुत सारे लोगों ने पुलिस दमन और मौत की आशंका के बावजूद नात्सीवाद का जमकर विरोध् किया। लेकिन जमर्न आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस पूरे घटनाक्रम का मूक दशर्क और उदासीन साक्षी बना हुआ था। लोग कोइर् विरोध्ी कदम उठाने, अपना मतभेद व्यक्त करने, नात्सीवाद का विरोध करने से डरते थे। वे अपने दिल की बाॅक्स 1 क्या नात्िसयों द्वारा सताए गए लोगों के प्रति हमददीर् का अभाव केवल दहशत की वजह से था? लाॅरेंस रीस का कहना है कि यह मानना गलत होगा। लाॅरेंस रीस ने हाल ही में अपने वृत्तचित्रा ‘द नात्सीश: ए वानि±ग प़्रफाॅम हिस्ट्री’ के लिए तरह - तरह के लोगों से बातचीत की थी।यादा बेहतर मानते थे। पादरी नीम्योलर ने नात्िसयों का लगातार विरोध किया। उन्होंने पाया कि नात्सी साम्राज्य में लोगों पर जिस तरह के निमर्म और संगठित शुल्म किए जा रहे हैं उनवफा जमर्नी की आम जनता विरोध नहीं कर पाती थी। जनता एक अजीब - सी खामोशी में डूबी हुइर् थी। गेस्तापो की दहशतनाक कायर्शैली और वुफवृफत्यों पर निशाना साध्ते हुए इस खामोशी के बारे में उन्होंने बड़े ममर्स्पशीर् ढंग से लिखा हैः ‘पहले वे कम्युनिस्टों को ढूँढ़ते आए, मैं कम्युनिस्ट नहीं था इसलिए मैंने वुफछ नहीं कहा। पिफर वे सोशल डेमोव्रैफट्स को ढूँढ़ते आए, मैं सोशल डेमोव्रैफट नहीं था इसलिए चुप रहा। इसके बाद वे ट्रेड यूनियन वालों को ढूँ़ढते आए, पर मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था। और पिफर वे यहूदियों को ढूँढ़ते आए, लेकिन मैं यहूदी नहीं था - इसलिए मैंने वुफछ नहीं किया। पिफर, अंत में जब वह मेरे लिए आए तो वहाँ कोइर् नहीं बचा था जो मेरे साथ खड़ा हो सके।’ बात कहने की बजाय आ़ख पेफर कर चल देना ज्ँइसी सिलसिले में उन्होंने एनार् क्राँत्स से भी बात की जो 1930 के दशक में किशोरी थीं और अब दादी बन चुकी हैं। एनार् ने रीस से कहा: तीस के दशक में एक उम्मीद सी दिखाइर् देती थी। यह बेरोशगारों के लिए ही नहीं बल्िक हर किसी के लिए उम्मीद का दौर था क्योंकि हम सभी दबा - वुफचला महसूस करते थे। अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकती हूँ कि उन दिनों तनख्वाहें बढ़ी थीं और जमर्नी को मानो अपना उद्देश्य दोबारा मिल गया था। कम से कम मुझे तो यही लगता था कि वह अच्छा दौर था। मुझे अच्छा लगता था। ियाकलाप एनार् क्राँत्स ने ये क्यों कहा - ‘कम से कम मुझे तो यही लगता था’? आप उनकी राय को किस तरह देखते हैं? नात्सी जमर्नी में यहूदी क्या महसूस करते थे यह एक बिल्वुफल अलग कहानी है। शालर्ट बेराट ने अपनी डायरी में लोगों के सपनों को चोरी - छिपे दजर् किया था। बाद में उन्होंने अपनी इस डायरी को पुस्तक के रूप में प्रकाश्िात किया। पढ़ने वालों को झकझोर कर रख देने वाली इस किताब का नाम है थडर् राइख़़्फा आॅपड्रीम्स। शालर्टे ने इस किताब में बताया है कि एक समय के बाद किस तरह खुद यहूदी भी अपने बारे में नात्िसयों द्वारा पफैलाइर् जा रही रूढ़ छवियों पर यकीन करने लगे थे। अपने सपनों में उन्हें भी अपनी नाक आगे से मुड़ी हुइर्, बाल व आँखें काली और यहूदियों जैसी शक्ल - सूरत व चाल - ढाल दिखने लगी थी। नात्सी प्रेस में यहूदियों की जो छवियाँ और तस्वीरें छपती थीं, वे दिन - रात यहूदियों का पीछा कर रही थीं। ये छवियाँ सपनों में भी उनका पीछा नहीं छोड़ती थीं। बहुत सारे यहूदी गैस चेँंबर में पहुचने से पहले ही दम तोड़ गए। 5.1 महाध्वंस ;होलोकाॅस्टद्ध के बारे में जानकारियाँ नात्सी तौर - तरीकों की जानकारी नात्सी शासन के आख्िारी सालों में रिस - रिस कर जमर्नी से बाहर जाने लगी थी। लेकिन, वहाँ कितना भीषण रक्तपात और बबर्र दमन हुआ था, इसका असली अंदाशा तो दुनिया को यु( खत्म होने और जमर्नी के हार जाने के बाद ही लग पाया। जमर्न समाज तो मलबे में दबे एक पराजित राष्ट्र के रूप में अपनी दुदर्शा से दुखी था ही, लेकिन यहूदी भी चाहते थे कि दुनिया उन भीषण अत्याचारों और पीड़ाओं को याद रखे जो उन्होंने नात्सी कत्लेआम में झेली थीं। इन्हीं कत्लेआमों को महाध्वंस ;होलोकाॅस्टद्ध भी कहा जाता है। जब दमनचक्र अपने श्िाखर पर था उन्हीं दिनों एक यहूदी टोले में रहने वाले एक आदमी ने अपने साथी से कहा था कि वह यु( के बाद सिप़र्फ आधा घंटा और जीना चाहता है। शायद वह दुनिया को यह बता कर जाना चाहता था कि नात्सी जमर्नी में क्या - क्या हो रहा था। जो वुफछ हुआ उसकी गवाही देने और जो भी दस्तावेश हाथ आए उन्हें बचाए रखने की यह अदम्य चाह घेटो और वैंफपों में नारकीय जीवन भोगने वालों में बहुत गहरे तौर पर देखी जा सकती है। उनमें से बहुतों ने डायरियाँ लिखीं, नोटबुक लिखीं और दस्तावेशों के संग्रह बनाए। लेकिन, इसके विपरीत, जब यह दिखाइर् देने लगा कि अब यु( में नात्िसयों की पराजय तय ही है तो नात्सी नेतृत्व ने दफ्ऱतरों में मौजूद तमाम सबूतों को नष्ट करने के लिए अपने कमर्चारियों को पेट्रोल बाँटना शुरू कर दिया। दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में स्मृति लेखों, साहित्य, वृत्तचित्रों, शायरी, स्मारकों और संग्रहालयों में इस महाध्वंस का इतिहास और स्मृति आज भी िांदा है। ये सारी चीशें उन लोगों के लिए एक श्र(ांजलि हैं जिन्होंने उन स्याह दिनों में भी प्रतिरोध का साहस दिखाया। उन लोगों के लिए भी ये सारी बातें शमर्नाक यादगार हैं जिन्होंने ये शुल्म ढाए और उनके लिए चेतावनी की आवाशें हैं जो खामोशी से सब वुफछ देखते रहे। बाॅक्स 2 गांध्ी जी ने हिटलर को लिखा हिटलर को गांधीजी का पत्रा वधार्, मध्य प्रान्त, भारत 23 जुलाइर् 1939 हिटलर को गांधीजी का पत्रा वधार् 24 दिसंबर 1940 पि्रय मित्रा, मित्रों का यह आग्रह रहा है कि मानवता की खातिर मैं आपको वुफछ लिखूँ। लेकिन मैं उनके अनुरोध को अस्वीकार करता रहा हूँ, क्योंकि मैं यह महसूस करता हूँ कि मेरा आपको पत्रा लिखना धृष्टता होगी। लेकिन मुझे वुफछ ऐसा लगता है कि इस मामले में मुझे हिसाब - किताब करके नहीं चलना चाहिए और मुझे आपसे अपील करनी ही चाहिए, चाहे वह जिस लायक हो। यह बात बिल्वुफल स्पष्ट है कि आज संसार में आप ही एक ऐसे व्यक्ित हैं जो उस यु( को रोक सकते हैं, जो मानव - जाति को बबर्र अवस्था में पहुँचा सकता है। क्या आपको किसी उद्देश्य के लिए इतना बड़ा मूल्य चुकाना चाहिए, पिफर चाहे वह उद्देश्य आपकी दृष्िट में कितना ही महान क्यों न हो? क्या आप एक ऐसे व्यक्ित की अपील पर ध्यान देंगे जिसने सोच - विचार कर यु( के तरीके का त्याग कर दिया है और इसमें उसे कापफी सपफलता भी मिली है? जो भी हो, मैं यह मान लेता हूँ कि यदि मैंने आपको पत्रा लिख कर कोइर् भूल की है तो उसके लिए आप मुझे क्षमा कर देंगे? मैं हूँ, आपका सच्चा मित्रा, मो. क. गांधी सम्पूणर् गांधी वाघ्मय खण्ड 70, प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार हमें अहिंसा के रूप में एक ऐसी शक्ित प्राप्त हो गइर् है जिसे यदि संगठित कर लिया जाए तो वह संसार भर की सभी प्रबलतम हिंसात्मक शक्ितयों के गठजोड़ का मुकाबला कर सकती है। जैसा कि मैंने कहा, अहिंसात्मक तरीके में पराजय नाम की कोइर् चीज है ही नहीं। यह तरीका तो बिना मारे या चोट पहुँचाए ‘‘करने या मरने’’ का तरीका है। इसका इस्तेमाल करने में धन की लगभग कोइर् शरूरत नहीं है और उस विनाशशास्त्रा की तो नहीं ही जिसे आपने पूणर्ता के चरमबिंदु पर पहुँचा दिया है। मुझे यह देखकर आश्चयर् होता है कि आप यह भी नहीं देख पाते कि विनाशकारी यंत्रों पर किसी का एकािाकार नहीं है। अगर बि्रटिश लोग नहीं तो कोइर् और देश निश्चय ही आपके तरीकों से श्यादा बेहतर तरीका इर्जाद कर लेगा और आपके ही तरीकों से आपको नीचा दिखाएगा। आप अपने देशवासियों के लिए कोइर् ऐसी विरासत नहीं छोड़ रहे हैं जिस पर उन्हें गवर् होगा। वे एक क्रूर कमर् की चचार् करने में गवर् का अनुभव नहीं करेंगे पिफरभले ही वह कृत्य कितनी ही निपुणतापूवर्क नियोजित क्यों न किया गया हो। अतः मैं मानवता के नाम पर आपसे यु( रोक देने की अपील करता हूँ। हृदय से आपका मित्रा, मो.क.गांधी सम्पूणर् गांधी वाघ्मय खण्ड 73, प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार ियाकलाप प्रश्न

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