यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति सामाजिक परिवतर्न का युग पिछले अध्याय में आपने प़्रफांसीसी क्रांति के बाद यूरोप में पैफलते जा रहे स्वतंत्राता और समानता के शक्ितशाली विचारों के बारे में पढ़ा। प़्रफांसीसी क्रांति ने सामाजिक संरचना के क्षेत्रा में आमूल परिवतर्न की संभावनाओं का सूत्रापात कर दिया था। जैसा कि आप पढ़ चुके हैं, अठारहवीं सदी से पहले प़्रफांस का समाज मोटे तौर पर एस्टेट्स और श्रेण्िायों में बँटा हुआ था। समाज की आथ्िार्क और सामाजिक सत्ता पर वुफलीन वगर् और चचर् का नियंत्राण था। लेकिन क्रांति के बाद इस संरचना को बदलना संभव दिखाइर् देने लगा। यूरोप और एश्िाया सहित दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में व्यक्ितगत अिाकारों के स्वरूप और सामाजिक सत्ता पर किसका नियंत्राण हो - इस पर चचार् छिड़ गइर्। भारत में भी राजा राममोहन राॅय और डेरो़फांसीसी क्रांति के महत्त्व का उल्लेख िायो ने प्रकिया। और भी बहुत सारे लोग क्रांति पश्चात यूरोप की स्िथतियों के बारे में चल रही बहस में कूद पड़े। आगे चलकर उपनिवेशों में घटी घटनाओं ने भी इन विचारों को एक नया रूप प्रदान करने में योगदान दिया। मगर यूरोप में भी सभी लोग आमूल समाज परिवतर्न के पक्ष में नहीं थे। इस सवाल पर सबकी अलग - अलग राय थी। बहुत सारे लोग बदलाव के लिए तो तैयार थे लेकिन वह चाहते थे कि यह बदलाव धीरे - धीरे हो। एक खेमा मानता था कि समाज का आमूल पुनगर्ठन शरूरी है। वुफछ ‘रुढि़वादी’ ;ब्वदेमतअंजपअमेद्ध थे तो वुफछ ‘उदारवादी’ ;स्पइमतंसेद्ध या ‘आमूल परिवतर्नवादी’ ;त्ंकपबंसए रैडिकलद्ध समाधानों के पक्ष में थे। उस समय के संदभर् में इन शब्दों का क्या मतलब था? राजनीति की इन धाराओं में क्या पफवर्फ थे और कौन - कौन सी बातें थीं जो समान थीं? यहाँ हमें ध्यान रखना़चाहिए कि इन शब्दों का अथर् हर काल और परिवेश में एक ही नहीं होता। इस अध्याय में हम उन्नीसवीं शताब्दी की वुफछ महत्त्वपूणर् राजनीतिक परंपराओं का अध्ययन करेंगे और देखेंगे कि उन्होंने परिवतर्न के संदभर् में क्या असर डाला। इसके बाद हम एक ऐसी ऐतिहासिक घटना पर अपना ध्यान वेंफित करेंगे जिसमें समाज के रैडिकल पुनगर्ठन का एक गंभीर प्रयास किया गया। रूस में हुइर् क्रांति के पफलस्वरूप समाजवाद बीसवीं सदी का स्वरूप तय करने वाले सबसे महत्त्वपूणर् और शक्ितशाली विचारों की शृंखला का हिस्सा बन गया। 1.1 उदारवादी, रैडिकल और रुढि़वादी समाज परिवतर्न के समथर्कों में एक समूह उदारवादियों का था। उदारवादी ऐसा राष्ट्र चाहते थे जिसमें सभी धमो± को बराबर का सम्मान और जगह मिले। शायद अध्याय 2यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति आप जानते होंगे कि उस समय यूरोप के देशों में प्रायः किसी एक धमर् को ही श्यादा महत्व दिया जाता था ;बि्रटेन की सरकार चचर् आॅप़्ाफ इंग्लैंड का समथर्न करती थी, आॅस्िट्रया और स्पेन, वैफथलिक चचर् के समथर्क थेद्ध। उदारवादी समूह वंश - आधारित शासकों की अनियंत्रिात सत्ता के भी विरोधी थे। वे सरकार के समक्ष व्यक्ित मात्रा के अिाकारों की रक्षा के पक्षधर थे। उनका कहना था कि सरकार को किसी के अिाकारों का हनन करने या उन्हें छीनने का अिाकार नहीं दिया जाना चाहिए। यह समूह प्रतिनििात्व पर आधारित एक ऐसी निवार्चित सरकार के पक्ष में था जो शासकों और अपफसरों के प्रभाव से मुक्त और ़सुप्रश्िाक्ष्िात न्यायपालिका द्वारा स्थापित किए गए कानूनों के अनुसार शासन - कायर् चलाए। पर यह समूह ‘लोकतंत्रावादी’ ;क्मउवबतंजद्ध नहीं था। ये लोग सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार यानी सभी नागरिकों को वोट का अिाकार देने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि वोट का अध्िकार केवल संपिाधारियों को ही मिलना चाहिए। इसके विपरीत रैडिकल समूह के लोग ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समथर्न पर आधारित हो। इनमें से बहुत सारे लोग महिला मतािाकार आंदोलन के भी समथर्क थे। उदारवादियों के विपरीत ये लोग बड़े शमींदारों और संपन्न उद्योगपतियों को प्राप्त किसी भी तरह के विशेषािाकारों के ख्िालाप्ाफ थे। वे निजी संपिा के विरोधी नहीं थे लेकिन केवल वुफछ लोगों के पास संपिा के संवेंफद्रण का विरोध शरूर करते थे। रुढि़वादी तबका रै़डिकल और उदारवादी, दोनों के ख्िालापफ था। मगर प़्रफांसीसी क्रांति के बाद तो रुढि़वादी भी बदलाव की शरूरत को स्वीकार करने लगे थे। पुराने समय में, यानी अठारहवीं शताब्दी में रुढि़वादी आमतौर पर परिवतर्न के विचारों का विरोध करते थे। लेकिन उन्नीसवीं सदी तक आते - आते वे भी मानने लगे थे कि वुफछ परिवतर्न आवश्यक हो गया है परंतु वह चाहते थे कि अतीत का सम्मान किया जाए अथार्त् अतीत को पूरी तरह ठुकराया न जाए और बदलाव की प्रिया धीमी हो। प़्रफांसीसी क्रांति के बाद पैदा हुइर् राजनीतिक उथल - पुथल के दौरान सामाजिक परिवतर्न पर वें़फित इन विविध विचारों के बीच कापफी टकराव हुए। उन्नीसवीं सदी में क्रांति और राष्ट्रीय कायांतरण की विभ्िान्न कोश्िाशों ने इन सभी राजनीतिक धाराओं की सीमाओं और संभावनाओं को स्पष्ट कर दिया। 1.2 औद्योगिक समाज और सामाजिक परिवतर्न ये राजनीतिक रुझान एक नए युग का द्योतक थे। यह दौर गहन सामाजिक एवं आथ्िार्क बदलावों का था। यह ऐसा समय था जब नए शहर बस रहे थे, नए - नए औद्योगिक क्षेत्रा विकसित हो रहे थे, रेलवे का कापफी विस्तार हो चुका था और औद्योगिक क्रांति संपन्न हो चुकी थी। औद्योगीकरण ने औरतों - आदमियों और बच्चों, सबको कारखानों में ला दिया। काम के घंटे यानी पाली बहुत लंबी होती थी और मशदूरी बहुत कम थी। बेरोशगारी आम समस्या थी। औद्योगिक वस्तुओं की माँग में गिरावट आ ़नए शब्द मतािाकार आंदोलन: वोट डालने का अिाकार पाने के लिए चलाया गया आंदोलन। चित्रा 1 - उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में लंदन के गरीबों की दशा उसी समय के एक व्यक्ित की दृष्िट से .ड्डोतः हेनरी मेह्यू, लंदन लेबर ऐन्ड लंदन पुअर, 1861 जाने पर तो बेरोशगारी और बढ़ जाती थी। शहर तेशी से बसते और पफैलते जा रहे थे इसलिए आवास और साप़़्ाफ - सपफाइर् का काम भी मुश्िकल होता जा रहा था। उदारवादी और रैडिकल, दोनों ही इन समस्याओं का हल खोजने की कोश्िाश कर रहे थे। लगभग सभी उद्योग व्यक्ितगत स्वामित्व में थे। बहुत सारे रैडिकल और उदारवादियों के पास भी कापफी संपिा थी और उनके यहाँ बहुत सारे लोग नौकरी करते थे। उन्होंने व्यापार या औद्योगिक व्यवसायों के शरिए धन - दौलत इकट्ठा की थी इसलिए वह चाहते थे कि इस तरह के प्रयासों को श्यादा से श्यादा बढ़ावा दिया जाए। उन्हें लगता था कि अगर मशदूर स्वस्थ हों और नागरिक पढ़े - लिखे हों, तो इस व्यवस्था का भरपूर लाभ लिया जा सकता है। ये लोग जन्मजात मिलने वाले विशेषािाकारों के विरु( थे। व्यक्ितगत प्रयास, श्रम और उद्यमशीलता में उनका गहरा विश्वास था। उनकी मान्यता थी कि यदि हरेक को व्यक्ितगत स्वतंत्राता दी जाए, गरीबों को रोशगार मिले, और जिनके पास पूँजी है उन्हें बिना रोक - टोक काम करने का मौका दिया जाए तो समाज तरक्की कर सकता है। इसी कारण उन्नीसवीं सदी के श्ुारुआती दशकों में समाज परिवतर्न के इच्छुक बहुत सारे कामकाजी स्त्राी - पुरुष उदारवादी और रैडिकल समूहों व पाटिर्यों के इदर् - गिदर् गोलबंद हो गए थे। यूरोप में 1815 में जिस तरह की सरकारें बनीं उनसे छुटकारा पाने के लिए वुफछ राष्ट्रवादी, उदारवादी और रैडिकल आंदोलनकारी क्रांति के पक्ष में थे। प़्रफांस, इटली, जमर्नी और रूस में ऐसे लोग क्रांतिकारी हो गए और राजाओं के तख्तापलट का प्रयास करने लगे। राष्ट्रवादी कायर्कतार् क्रांति के शरिए ऐसे ‘राष्ट्रों’ की स्थापना करना चाहते थे जिनमें सभी नागरिकों को समान अिाकार प्राप्त हों। 1815 के बाद इटली के राष्ट्रवादी गिसेप्पे मेिानी ने यही लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपने समथर्कों के साथ मिलकर राजा के ख्िालापफ सािाश रची थी। भारत सहित दुनिया भर के राष्ट्रवादी उसकी़रचनाओं को पढ़ते थे। 1.3 यूरोप में समाजवाद का आना समाज के पुनगर्ठन की संभवतः सबसे दूरगामी दृष्िट प्रदान करने वाली विचारधारा समाजवाद ही थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोप में समाजवाद एक जाना - पहचाना विचार था। उसकी तरप़्ाफ बहुत सारे लोगों का ध्यान आकष्िार्त हो रहा था। समाजवादी निजी संपिा के विरोधी थे। यानी, वे संपिा पर निजी स्वामित्व को सही नहीं मानते थे। उनका कहना था कि संपिा के निजी स्वामित्व की व्यवस्था ही सारी समस्याओं की जड़ है। वे ऐसा क्यों मानते थे? उनका तवर्फ था कि बहुत सारे लोगों के पास संपिा तो है जिससे दूसरों को रोशगार भी मिलता है लेकिन समस्या यह है कि संपिाधारी व्यक्ित को सिपर्फ़अपने प़्ाफायदे से ही मतलब रहता हैऋ वह उनके बारे में नहीं सोचता जो उसकी संपिा को उत्पादनशील बनाते हैं। इसलिए, अगर संपिा पर किसी एक व्यक्ित के बजाय पूरे समाज का नियंत्राण हो तो साझा सामाजिक हितों पर श्यादा अच्छी तरह ध्यान दिया जा सकता है। समाजवादी इस तरह का बदलाव चाहते थे और इसके लिए उन्होंने बड़े पैमाने पर अभ्िायान चलाया। कोइर् समाज संपिा के बिना वैफसे चल सकता है? समाजवादी समाज का आधार क्या होगा? समाजवादियों के पास भविष्य की एक बिल्वुफल भ्िान्न दृष्िट थी। वुफछ समाजवादियों को कोआॅपरेटिव यानी सामूहिक उद्यम के विचार में दिलचस्पी थी। इंग्लैंड के जाने - माने उद्योगपति राॅबटर् ओवेन ;1771 - 1858द्ध ने इंडियाना ;अमेरिकाद्ध में नया समन्वय ;छमू भ्ंतउवदलद्ध के नाम से एक नये तरह के समुदाय की रचना का प्रयास किया। वुफछ समाजवादी मानते थे कि केवल व्यक्ितगत पहलकदमी से बहुत बड़े सामूहिक खेत नहीं बनाए जा सकते। वह चाहते थे कि सरकार अपनी तरप़्ाफ से सामूहिक खेती को बढ़ावा दे। उदाहरण के लिए, प़्रफांस में लुइर् ब्लांक ;1813 - 1882द्ध चाहते थे कि सरकार पँूजीवादी उद्यमों की जगह सामूहिक उद्यमों को बढ़ावा दे। कोआॅपरेटिव ऐसे लोगों के समूह थे जो मिल कर चीशें बनाते थे और मुनापेफ को प्रत्येक सदस्य़द्वारा किए गए काम के हिसाब से आपस में बाँट लेते थे। ियाकलाप मान लीजिए कि निजी संपिा को खत्म करने और उसकी जगह सामूहिक स्वामित्व की व्यवस्था लागू करने के सवाल पर आपके इलाके में एक बैठक बुलाइर् गइर् है। निम्नलिख्िात व्यक्ितयों के रूप में उस बैठक में आप जो भाषण देंगे वह लिखें: ऽ एक गरीब खेतिहर मशदूर ऽ एक मंझौला भूस्वामी ऽ एक गृहस्वामी ियाकलाप निजी संपिा के बारे में पूँजीवादी और समाजवादी विचारधारा के बीच दो अंतर बताएँ। कालर् माक्सर् ;1818 - 1882द्ध और प़्रेफडरिक एंगेल्स ;1820 - 1895द्ध ने इस दिशा में कइर् नए तवर्फ पेश किए। माक्सर् का विचार था कि औद्योगिक समाज ‘पूँजीवादी’ समाज है। प़्ौफक्िट्रयों में लगी पूँजी पर पूँजीपतियों का स्वामित्व है और पूँजीपतियों का मुनाप़्ाफा मशदूरों की मेहनत से पैदा होता है। माक्सर् का निष्कषर् था कि जब तक निजी पूँजीपति इसी तरह मुनाप़्ोफ का संचय करते जाएँगे तब तक मशदूरों की स्िथति में सुधार नहीं हो सकता। अपनी स्िथति में सुधार लाने के लिए मशदूरों को पूँजीवाद व निजी संपिा पर आधरित शासन को उखाड़ पफेंकना होगा। माक्सर् का विश्वास था कि खुद को पूँजीवादी शोषण से मुक्त कराने के लिए मशदूरों को एक अत्यंत भ्िान्न किस्म का समाज बनाना होगा जिसमें सारी संपिा पर पूरे समाज का यानी सामाजिक नियंत्राण और स्वामित्व रहेगा। उन्होंने भविष्य के इस समाज को साम्यवादी ;कम्युनिस्टद्ध समाज का नाम दिया। माक्सर् को विश्वास था कि पूँजीपतियों के साथ होने वाले संघषर् में जीत अंततः मशदूरों की ही होगी। उनकी राय में कम्युनिस्ट समाज ही भविष्य का समाज होगा। 1.4 समाजवाद के लिए समथर्न 1870 का दशक आते - आते समाजवादी विचार पूरे यूरोप में पैफल चुके थे। अपने प्रयासों में समन्वय लाने के लिए समाजवादियों ने द्वितीय इंटरनैशनल के नाम से एक अंतरार्ष्ट्रीय संस्था भी बना ली थी। इंग्लैंड और जमर्नी के मशदूरों ने अपनी जीवन और कायर्स्िथतियों में सुधार लाने के लिए संगठन बनाना शुरू कर दिया था। संकट के समय अपने सदस्यों को मदद पहँुचाने के लिए इन संगठनों ने कोष स्थापित किए और काम के घंटों में कमी तथा मतािाकार के लिए आवाश उठाना शुरू कर दिया। जमर्नी में सोशल डेमोव्रैफटिक पाटीर् ;एसपीडीद्ध के साथ इन संगठनों के चित्रा 2 - यह पेरिस कम्यून, 1871 का एक चित्रा है। इस चित्रा में माचर् और मइर् 1871 के बीच हुए जनविद्रोह को दशार्या गया है। यह ऐसा दौर था जब पेरिस की नगर परिषद् ;कम्यूनद्ध पर मशदूरों, आम लोगों, पेशेवरों, और राजनीतिक कायर्कतार्ओं को लेकर बनाइर् गइर् ‘जन सरकार’ ने कब्शा कर लिया था। यह उथल - पुथल प़फाँसीसी सरकार ्रकी नीतियों के प्रति बढ़ते असंतोष के कारण पैदा हुइर् थी। यद्यपि ‘पेरिस कम्यून’ को अंततः सरकारी टुकडि़यों ने वुफचल डाला लेकिन दुनिया भर के समाजवादियों ने समाजवादी क्रांति की पूवर्पीठिका के रूप में इसका जमकर जश्न मनाया। पेरिस कम्यून को दो और चीशों की वजह से आज भी याद रखा जाता हैः एक, मशदूरों के लाल झंडे का उदय इसी घटना से हुआ था - कम्युनाडो± ;क्रांतिकारियोंद्ध ने अपने लिए यही झंडा चुना थाऋ दो, ‘मासेर्येस’ के लिए, जो इस घटना के बाद पेरिस कम्यून और मुक्ित संघषर् का प्रतीक बन गया। उल्लेखनीय है कि इस गीत को मूलतः 1792 में यु( गीत के रूप में लिखा गया था। ;सौजन्यः लंदन न्यूश, 1871द्ध कापफी गहरे रिश्ते थे और संसदीय चुनावों में वे पाटीर् की मदद भी करते थे। 1905 तक बि्रटेन के समाजवादियों और ट्रेड यूनियन आंदोलनकारियों ने लेबर पाटीर् के नाम से अपनी एक अलग पाटीर् बना ली थी। प़्रफांस में भी सोशलिस्ट पाटीर् के नाम से ऐसी ही एक पाटीर् का गठन किया गया। लेकिन 1914 तक यूरोप में समाजवादी कहीं भी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाए। संसदीय राजनीति में उनके प्रतिनििा बड़ी संख्या में जीतते रहे, उन्होंने कानून बनवाने में भी अहम भूमिका निभायी, मगर सरकारों में रुढि़वादियों, उदारवादियों और रैडिकलों का ही दबदबा बना रहा। रूसी क्रांति यूरोप के सबसे पिछड़े औद्योगिक देशों में से एक, रूस में यह समीकरण उलट गया। 1917 की अक्तूबर क्रांति के शरिए रूस की सत्ता पर समाजवादियों ने कब्शा कर लिया। पफरवरी 1917 में राजशाही के पतन और अक्तूबर की घटनाओं को ही अक्तूबर क्रांति कहा जाता है। ऐसा वैफसे हुआ? क्रांति के समय रूस के सामाजिक और राजनीतिक हालात वैफसे थे? इन सवालों का जवाब ढूँढ़ने के लिए, आइए, क्रांति से वुफछ साल पहले की स्िथतियों पर नशर डालें। 2.1 रूसी साम्राज्य, 1914 1914 में रूस और उसके पूरे साम्राज्य पर शार निकोलस प्प् का शासन था। मास्को के आसपास पड़ने वाले भूक्षेत्रा के अलावा आज का प्िाफनलैंड,़लातविया, लिथुआनिया, एस्तोनिया तथा पोलैंड, यूव्रेफन व बेलारूस के वुफछ हिस्से रूसी साम्राज्य के अंग थे। यह साम्राज्य प्रशांत महासागर तक पफैला हुआ था और आज के मध्य एश्िायाइर् राज्यों के साथ - साथ जाॅजिर्या, आमेर्निया व अशरबैशान भी इसी साम्राज्य के अंतगर्त आते थे। रूस में ग्रीक आॅथोर्डाॅक्स चचर् से उपजी शाखा रूसी आॅथोर्डाॅक्स िश्िचयैनिटी को मानने वाले बहुमत चित्रा 3 - सेंट पीटसर्बगर् स्िथत विंटर पैलेस के व्हाइट हाॅल में शार निकोलस प्प्ए 1900अनेर्स्ट लिपगाटर् ;1847 - 1932द्ध द्वारा चित्रिात। में थे। लेकिन इस साम्राज्य के तहत रहने वालों में वैफथलिक, प्रोटेस्टेंट, मुस्िलम और बौ( भी शामिल थे। 2.2 अथर्व्यवस्था और समाज बीसवीं सदी की शुरुआत में रूस की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खेती - बाड़ी से जुड़ा हुआ था। रूसी साम्राज्य की लगभग 85 प्रतिशत जनता आजीविका के लिए खेती पर ही निभर्र थी। यूरोप के किसी भी देश में खेती पर आश्रित जनता का प्रतिशत इतना नहीं था। उदाहरण के तौर पर, प़फांस ्रऔर जमर्नी में खेती पर निभर्र आबादी 40 - 50 प्रतिशत से श्यादा नहीं थी। रूसी साम्राज्य के किसान अपनी शरूरतों के साथ - साथ बाशार के लिए भी पैदावार करते थे। रूस अनाज का एक बड़ा नियार्तक था। उद्योग बहुत कम थे। सेंट पीटसर्बगर् और मास्को प्रमुख औद्योगिक इलाके थे। हालाँकि श्यादातर उत्पादन कारीगर ही करते थे लेकिन कारीगरों की वकर्शाॅपों के साथ - साथ बड़े - बड़े कल - कारखाने भी मौजूद थे। बहुत सारे कारखाने 1890 के दशक में चालू हुए थे जब रूस के रेल नेटववर्फ को पफैलाया जा रहा था। उसी समय रूसी उद्योगों में विदेशी निवेश भी तेजी से बढ़ा था। इन कारकों के चलते वुफछ ही सालों में रूस के कोयला उत्पादन में दोगुना और स्टील उत्पादन में चार गुना वृि हुइर् थी। सन् 1900 तक वुफछ इलाकों में तो कारीगरों और कारखाना मशदूरों की संख्या लगभग बराबर हो चुकी थी। श्यादातर कारखाने उद्योगपतियों की निजी संपिा थे। मशदूरों को न्यूनतम वेतन मिलता रहे और काम की पाली के घंटे निश्िचत हों - इस बात का ध्यान रखने के लिए सरकारी विभाग बड़ी पैफक्िट्रयों पर नशर रखते थे।़लेकिन पैफक्ट्री इंस्पेक्टर भी नियमों के उल्लंघन को रोक पाने में नाकामयाब़थे। कारीगरों की इकाइयों और वकर्शाॅपों में काम की पाली प्रायः 15 घंटे तक ख्िांच जाती थी जबकि कारखानों में मशदूर आमतौर पर 10 - 12 घंटे की पालियों में काम करते थे। मशदूरों के रहने के लिए भी कमरों से लेकर डाॅमिर्टरी तक तरह - तरह की व्यवस्था मौजूद थी। सामाजिक स्तर पर मशदूर बँटे हुए थे। वुफछ मशदूर अपने मूल गाँवों के साथ अभी भी गहरे संबंध बनाए हुए थे। बहुत सारे मशदूर स्थायी रूप से शहरों में ही बस चुके थे। उनके बीच योग्यता और दक्षता के स्तर पर भी कापफी प़्ाफकर् था। सेंट पीटसर्बगर् के एक धातु मशदूर ने कहा था: ‘धातुकमीर् मशदूरों में खुद को साहब मानते थे। उनके काम में श्यादा प्रश्िाक्षण और निपुणता की शरूरत जो रहती थी...।’ 1914 में प़्ौफक्ट्री मशदूरों में औरतों की संख्या 31 प्रतिशत थी लेकिन उन्हें पुरुष मशदूरों के मुकाबले कम वेतन मिलता था ;मदो± की तनख्वाह के मुकाबले आधे से तीन - चैथाइर् तकद्ध। मशदूरों के बीच मौजूद प़़्ाफासला उनके पहनावे और व्यवहार में भी सापफ दिखाइर् देता था। यद्यपि वुफछ मशदूरों ने बेरोशगारी या आथ्िार्क संकट के समय एक - दूसरे की मदद करने के लिए संगठन बना लिए थे लेकिन ऐसे संगठन बहुत कम थे। इन विभेदों के बावजूद, जब किसी को नौकरी से निकाल दिया जाता था या उन्हें मालिकों से कोइर् श्िाकायत होती थी तो मशदूर एकजुट होकर हड़ताल भी कर देते थे। 1896 - 1897 के बीच कपड़ा उद्योग में और 1902 में धातु उद्योग में ऐसी हड़तालें कापफी बड़ी संख्या में आयोजित की गईं।़देहात की श्यादातर शमीन पर किसान खेती करते थे। लेकिन विशाल संपिायों पर सामंतों, राजशाही और आॅथोर्डाॅक्स चचर् का कब्शा था। मशदूरों की तरह किसान भी बँटे हुए थे। किसान बहुत धामिर्क स्वभाव के थे। इक्का - दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जाए तो वे सामंतों और नवाबों का बिल्वुफल सम्मान नहीं करते थे। नवाबों और सामंतों को जो सत्ता और हैसियत मिली हुइर् थी वह लोकपि्रयता की वजह से नहीं बल्िक शार के प्रति उनकी निष्ठा और सेवाओं के बदले में मिली थी। यहाँ की स्िथति प़्रफांस जैसी नहीं थी। मिसाल के तौर पर, प़्रफांसीसी क्रांति के दौरान बि्रटनी के किसान न केवल नवाबों का सम्मान करते थे बल्िक उन्होंने नवाबों को बचाने के लिए बाकायदा लड़ाइयाँ भी लड़ीं। इसके विपरीत, रूस के किसान चाहते थे कि नवाबों की शमीन छीनकर किसानों के बीच बाँट दी जाए। बहुधा वह लगान भी नहीं चुकाते थे। कइर् जगह तो शमींदारों की हत्या भी की जा चुकी थी। 1902 में दक्ष्िाणी रूस में ऐसी घटनाएँ बड़े पैमाने पर घटीं। 1905 में तो पूरे रूस में ही ऐसी घटनाएँ घटने लगीं। रूसी किसान यूरोप के बाकी किसानों के मुकाबले एक और लिहाश से भी भ्िान्न थे। यहाँ के किसान समय - समय पर सारी शमीन को अपने कम्यून ;मीरद्ध को सौंप देते थे और पिफर कम्यून ही प्रत्येक परिवार की शरूरत के हिसाब से किसानों को शमीन बाँटता था। 2.3 रूस में समाजवाद 1914 से पहले रूस में सभी राजनीतिक पाटिर्याँ गैरकानूनी थीं। माक्सर् के विचारों को मानने वाले समाजवादियों ने 1898 में रश्िायन सोशल डेमोव्रैफटिक वकर्सर् पाटीर् ;रूसी सामाजिक लोकतांत्रिाक श्रमिक पाटीर्द्ध का गठन किया था। सरकारी आतंक के कारण इस पाटीर् को गैरकानूनी संगठन के रूप में काम करना पड़ता था। इस पाटीर् का एक अखबार निकलता था, उसने मशदूरों को संगठित किया था और हड़ताल आदि कायर्क्रम आयोजित किए थे। वुफछ रूसी समाजवादियों को लगता था कि रूसी किसान जिस तरह समय - समय पर शमीन बाँटते हैं उससे पता चलता है कि वह स्वाभाविक रूप से समाजवादी भावना वाले लोग हैं। इसी आधार पर उनका मानना था कि रूस में मशदूर नहीं बल्िक किसान ही क्रांति की मुख्य शक्ित बनेंगे। वे क्रांति का नेतृत्व करेंगे और रूस बाकी देशों के मुकाबले श्यादा जल्दी समाजवादी देश बन जाएगा। उन्नीसवीं सदी के आख्िार में रूस के ग्रामीण इलाकों में समाजवादी कापफी सिय थे। सन् 1900 में उन्होंने सोशलिस्ट रेवलूशनरी पाटीर् ;समाजवादी क्रांतिकारी पाटीर्द्ध का गठन कर लिया। इस पाटीर् ने किसानों के अिाकारों के लिए संघषर् किया और माँग की कि सामंतों के कब्शे वाली शमीन पफौरन किसानों को सौंपी जाए। किसानों के सवाल पर ड्डोत क उस समय के समाजवादी कायर्कतार् अलेक्शेंडर श्ल्याप्िनकोव के वक्तव्य से पता चलता है कि बैठकें वैफसे आयोजित की जाती थीं: ‘एक - एक कारखाने और दुकान में जा - जाकर प्रचार किया जाता था। अध्ययन चक्र भी चलाए जाते थे...। संबंिात ;अिाकृत मुद्दों केद्ध मामलों पर कानूनी बैठवेंफ भी बुलाइर् जाती थीं, लेकिन इस गतिवििा को मशदूर वगर् की मुक्ित के व्यापक संघषर् में बड़ी निपुणता से पिरो दिया जाता था। गैरकानूनी बैठवेंफ ... शरूरत के वक्त प़्ाफौरन आयोजित कर ली जाती थीं लेकिन लंच के दौरान, शाम को, पफाटक के बाहर, याडर् में या कइर् मंिाला इमारतों की सीढि़यों में व्यवस्िथत ढंग से बैठवेंफ आयोजित की जाती थीं। सबसे जागरूक मशदूर दरवाशे के पास ‘‘प्लग’’ का काम संभालते थे और मुहाने पर पूरी भीड़ इकट्ठा हो जाती थी। वहाँ सबके सामने एक आंदोलनकारी खड़ा होता था। मालिक टेलिप़्ाफोन पर पुलिस को इस बारे में जानकारी देते थे लेकिन जब तक पुलिस पहुँचती थी तब तक भाषण पूरे हो चुके होते थे और शरूरी प़्ौफसले ले लिए जाते थे...।’ अलेक्शेंडर श्ल्याप्िनकोव, आॅन दि इर्व आॅपफ 1917रेमिनिसेंसेश प़्रफाॅम द रेवलूशनरी अंडरग्राउंड। सामाजिक लोकतंत्रावादी ;ैवबपंस क्मउवबतंजेद्ध खेमा समाजवादी क्रांतिकारियों से सहमत नहीं था। लेनिन का मानना था कि किसानों में एकजुटता नहीं हैऋ वे बँटे हुए हैं। वुफछ किसान गरीब थे तो वुफछ अमीर, वुफछ मशदूरी करते थे तो वुफछ पँूजीपति थे जो नौकरों से खेती करवाते थे। इन आपसी ‘विभेदों’ के चलते वे सभी समाजवादी आंदोलन का हिस्सा नहीं हो सकते थे। सांगठनिक रणनीति के सवाल पर पाटीर् में गहरे मतभेद थे। व्लादिमीर लेेनिन ;बोल्शेविक खेमे के मुख्िायाद्ध सोचते थे कि शार ;राजाद्ध शासित रूस जैसे दमनकारी समाज में पाटीर् अत्यंत अनुशासित होनी चाहिए और अपने सदस्यों की संख्या व स्तर पर उसका पूरा नियंत्राण होना चाहिए। दूसरा खेमा ;मेन्शेविकद्ध मानता था कि पाटीर् में सभी को सदस्यता दी जानी चाहिए। 2.4 उथल - पुथल का समय: 1905 की क्रांति रूस एक निरंवुफश राजशाही था। अन्य यूरोपीय शासकों के विपरीत बीसवीं सदी की शुरुआत में भी शार राष्ट्रीय संसद के अधीन नहीं था। उदारवादियों ने इस स्िथति को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर मुहिम चलाइर्। 1905 की क्रांति के दौरान उन्होंने संविधान की रचना के लिए सोशल डेमोव्रेफट और समाजवादी क्रांतिकारियों को साथ लेकर किसानों और मशदूरों के बीच कापफी काम किया। रूसी साम्राज्य के तहत उन्हें राष्ट्रवादियों ;जैसे पोलैंड मेंद्ध और इस्लाम के आधुनिकीकरण के समथर्क जदीदियों ;मुस्िलम - बहुल इलाकों मेंद्ध का भी समथर्न मिला। रूसी मशदूरों के लिए 1904 का साल बहुत बुरा रहा। शरूरी चीशों की कीमतें इतनी तेजी से बढ़ीं कि वास्तविक वेतन में 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ गइर्। उसी समय मशदूर संगठनों की सदस्यता में भी तेजी से वृि हुइर्। जब 1904 में ही गठित की गइर् असेंबली आॅप़फ रश्िायन वकर्सर् ;रूसी श्रमिक सभाद्ध के चार सदस्यों को प्युतिलोव आयरन वक्सर् में उनकी नौकरी से हटा दिया गया तो मशदूरों ने आंदोलन छेड़ने का एलान कर दिया। अगले वुफछ दिनों के भीतर सेंट पीटसर्बगर् के 110,000 से श्यादा मशदूर काम के घंटे घटाकर आठ घंटे किए जाने, वेतन में वृि और कायर्स्िथतियों में सुधार की माँग करते हुए हड़ताल पर चले गए। इसी दौरान जब पादरी गैपाॅन के नेतृत्व में मशदूरों का एक जुलूस विंटर पैलेस ;शार का महलद्ध के सामने पहुँचा तो पुलिस और कोसैक्स ने मशदूरों पर हमला बोल दिया। इस घटना में 100 से श्यादा मशदूर मारे गए और लगभग 300 घायल हुए। इतिहास में इस घटना को खूनी रविवार के नाम से याद किया जाता है। 1905 की क्रांति की शुरुआत इसी घटना से हुइर् थी। सारे देश में हड़तालें होने लगीं। जब नागरिक स्वतंत्राता के अभाव का विरोध करते हुए विद्याथीर् अपनी कक्षाओं का बहिष्कार करने लगे तो विश्वविद्यालय भी बंद कर दिए गए। वकीलों, डाॅक्टरों, इंजीनियरों और अन्य मध्यवगीर्य कामगारों ने संविधान सभा के गठन की माँग करते हुए यूनियन आॅप़फ यूनियंस की स्थापना कर दी। ियाकलाप रूस में 1905 में क्रांतिकारी उथल - पुथल क्यों पैदा हुइर् थी? क्रांतिकारियों की क्या माँगें थीं? नए शब्द निरंवुफश राजशाहीः राजा का बिना रोकटोक शासन। जदीदी - रूसी साम्राज्य में सिय मुस्िलम सुधारवादी। वास्तविक वेतन: यह इस बात का पैमाना है कि किसी व्यक्ित के वेतन से वास्तव में कितनी चीशें खरीदी जा सकती हैं। 1905 की क्रांति के दौरान शार ने एक निवार्चित परामशर्दाता संसद या ड्यूमा के गठन पर अपनी सहमति दे दी। क्रांति के समय वुफछ दिन तक पैफक्ट्री मशदूरों की बहुत सारी ट्रेड यूनियनें और प़्ौफक्ट्री कमेटियाँ भी अस्ितत्व़में रहीं। 1905 के बाद ऐसी श्यादातर कमेटियाँ और यूनियनें अनिाकृत रूप से काम करने लगीं क्योंकि उन्हें गैरकानूनी घोष्िात कर दिया गया था। राजनीतिक गतिवििायों पर भारी पाबंदियाँ लगा दी गईं। शार ने पहली ड्यूमा को मात्रा 75 दिन के भीतर और पुननिर्वार्चित दूसरी ड्यूमा को 3 महीने के भीतर बखार्स्त कर दिया। वह किसी तरह की जवाबदेही या अपनी सत्ता पर किसी तरह का अंवुफश नहीं चाहता था। उसने मतदान कानूनों में पेफरबदल करके तीसरी ड्यूमा में रुढि़वादी राजनेताओं को भर डाला। उदारवादियों और क्रांतिकारियों को बाहर रखा गया। 2.5 पहला विश्वयु( और रूसी साम्राज्य 1914 में दो यूरोपीय गठबंधनों के बीच यु( छिड़ गया। एक खेमे में जमर्नी, आॅस्िट्रया और तुकीर् ;वेंफद्रीय शक्ितयाँद्ध थे तो दूसरे खेमे में प़फांस, बि्रटेन व ्ररूस ;बाद में इटली और रूमानिया भी इस खेमे में शमिल हो गएद्ध थे। इन सभी देशों के पास विशाल वैश्िवक साम्राज्य थे इसलिए यूरोप के साथ - साथ यह यु( यूरोप के बाहर भी पैफल गया था। इसी यु( को पहला विश्वयु( कहा जाता है। इस यु( को शुरू - शुरू में रूसियों का काप़्ाफी समथर्न मिला। जनता ने शार का साथ दिया। लेकिन जैसे - जैसे यु( लंबा ख्िांचता गया, शार ने ड्यूमा में मौजूद मुख्य पाटिर्यों से सलाह लेना छोड़ दिया। उसके प्रति जनसमथर्न कम होने लगा। जमर्नी - विरोधी भावनाएँ दिनोंदिन बलवती होने लगीं। जमर्नी - विरोधी भावनाओं के कारण ही लोगों ने सेंट पीटसर्बगर् का नाम बदल कर पेत्रोग्राद रख दिया क्योंकि सेंट पीटसर्बगर् जमर्न नाम था। शारीना ;शार की पत्नी - महारानीद्ध अलेक्सांद्रा के जमर्न मूल का होने और उसके घटिया सलाहकारों, खास तौर से रासपुतिन नामक एक संन्यासी ने राजशाही को और अलोकपि्रय बना दिया। प्रथम विश्वयु( के ‘पूवीर् मोचेर्’ पर चल रही लड़ाइर् ‘पश्िचमी मोचेर्’ की लड़ाइर् से भ्िान्न थी। पश्िचम में सैनिक पूवीर् प़्रफांस की सीमा पर बनी खाइयों से लड़ाइर् लड़ रहे थे जबकि पूवीर् मोचेर् पर सेना ने कापफी बड़ा प़्ाफासला तय़कर लिया था। इस मोचेर् पर बहुत सारे सैनिक मौत के मुँह मंें जा चुके थे। सेना की पराजय ने रूसियों का मनोबल तोड़ दिया। 1914 से 1916 के बीच जमर्नी और आॅस्िट्रया में रूसी सेनाओं को भारी पराजय झेलनी पड़ी। 1917 तक 70 लाख लोग मारे जा चुके थे। पीछे हटती रूसी सेनाओं ने रास्ते में पड़ने वाली प़्ाफसलों और इमारतों को भी नष्ट कर डाला ताकि दुश्मन की सेना वहाँ टिक ही न सके। प़्ाफसलों और इमारतों के विनाश से रूस में 30 लाख से श्यादा लोग शरणाथीर् हो गए। इन हालात ने सरकार और शार, दोनों को अलोकपि्रय बना दिया। सिपाही भी यु( से तंग आ चुके थे। अब वे लड़ना नहीं चाहते थे। चित्रा 7 - पहले विश्वयु( के दौरान रूसी सिपाहीशाही रूसी सेना को ‘रूसी स्टीमरोलर’ कहा जाता था। यह दुनिया की सबसे बड़ी सशस्त्रा सेना थी। जब इस सेना ने अपनी निष्ठा बदल कर क्रांतिकारियों को समथर्न देना शुरू कर दिया तो शार की सत्ता भी ढह गइर्। यु( से उद्योगों पर भी बुरा असर पड़ा। रूस के अपने उद्योग तो वैसे भी बहुत कम थे, अब तो बाहर से मिलने वाली आपूतिर् भी बंद हो गइर् क्योंकि बाल्िटक समुद्र में जिस रास्ते से विदेशी औद्योगिक सामान आते थे उस पर जमर्नी का कब्शा हो चुका था। यूरोप के बाकी देशों के मुकाबले रूस के औद्योगिक उपकरण श्यादा तेजी से बेकार होने लगे। 1916 तक रेलवे लाइनें टूटने लगीं। अच्छी सेहत वाले मदो± को यु( में झोंक दिया गया। देश भर में मशदूरों की कमी पड़ने लगी और शरूरी सामान बनाने वाली छोटी - छोटी वकर्शाॅप्स ठप्प होने लगीं। श्यादातर अनाज सैनिकों का पेट भरने के लिए मोचेर् पर भेजा जाने लगा। शहरों में रहने वालों के लिए रोटी और आटे की किल्लत पैदा हो गइर्। 1916 की सदिर्यों में रोटी की दुकानों पर अकसर दंगे होने लगे। ियाकलाप 1916 के दिन हैं। आप शार की सेना में जनरल हैं और पूवीर् मोचेर् पर तैनात हैं। आप मास्को सरकार के लिए एक रिपोटर् लिख रहे हैं। अपनी रिपोटर् में सुझाव दीजिए कि स्िथति को सुधारने के लिए आपकी राय में क्या किया जाना चाहिए। पेत्रोग्राद में पफरवरी क्रांति सन् 1917 की सदिर्यों में राजधानी पेत्रोग्राद की हालत बहुत खराब थी। ऐसा लगता था मानो जनता में मौजूद भ्िान्नताओं को ध्यान में रखकर ही शहर की बनावट तय की गइर् थी। मशदूरों के क्वाटर्र और कारखाने नेवा नदी के दाएँ तट पर थे। बाएँ किनारे पर पैफशनेबल इलाके, विंटर पैलेस और सरकारी इमारतें थीं। जिस महल में ड्यूमा की बैठक होती थी वह भी इसी तरपफ था।़पफरवरी में मशदूरों के इलाके में खाद्य पदाथो± की भारी कमी पैदा हो गइर्। उस साल ठंड भी वुफछ श्यादा पड़ी थी। भीषण कोहरा और बप़्ार्फबारी हुइर् थी। संसदीय प्रतिनििा चाहते थे कि निवार्चित सरकार बची रहे इसलिए वह शार द्वारा ड्यूमा को भंग करने के लिए की जा रही कोश्िाशों का विरोध कर रहे थे। 22 पफरवरी को दाएँ तट पर स्िथत एक प़्ौफक्ट्री में तालाबंदी घोष्िात कर दी गइर्। अगले दिन इस प़्ौफक्ट्री के मशदूरों के समथर्न में पचास पैफक्िट्रयों के मशदूरों ने़भी हड़ताल का एलान कर दिया। बहुत सारे कारखानों में हड़ताल का नेतृत्व औरतें कर रही थीं। इसी दिन को बाद में अंतरार्ष्ट्रीय महिला दिवस का नाम दिया गया। आंदोलनकारी जनता बस्ती पार करके राजधानी के बीचोंबीच - नेव्स्की प्रोस्पेक्ट - तक आ गइर्। इस समय तक कोइर् राजनीतिक पाटीर् आंदोलन को सिय रूप से संगठित और संचालित नहीं कर रही थी। जब पैफशनेबल़रिहायशी इलाकों और सरकारी इमारतों को मशदूरों ने घेर लिया तो सरकार ने कफ्ऱयूर् लगा दिया। शाम तक प्रदशर्नकारी तितर - बितर हो गए लेकिन 24 और 25 तारीख को वह पिफर इकट्ठा होने लगे। सरकार ने उन पर नशर रखने के लिए घुड़सवार सैनिकों और पुलिस को तैनात कर दिया। रविवार, 25 पफरवरी को सरकार ने ड्यूमा को बखार्स्त कर दिया। सरकार के इस पैफसले के ख्िालाप़्ाफ़राजनीतिज्ञ बयान देने लगे। 26 तारीख को प्रदशर्नकारी बहुत बड़ी संख्या में बाएँ तट के इलाके में इकट्ठा हो गए। 27 को उन्होंने पुलिस मुख्यालयों पर हमला करके उन्हें तहस - नहस कर दिया। रोटी, तनख्वाह, काम के घंटों में कमी और लोकतांत्रिाक अिाकारों के पक्ष में नारे लगाते असंख्य लोग सड़कों पर जमा हो गए। सरकार ने स्िथति पर नियंत्राण कायम करने के लिए एक बार पिफर घुड़सवार सैनिकों को तैनात कर दिया। लेकिन घुड़सवार नए शब्द तालाबंदीः प़्ौफक्ट्री को स्थायी रूप से बंद करने के लिए मालिकों द्वारा मुख्य पफाटक पर ताला डाल देना। ियाकलाप बाॅक्स 2 देखें और वतर्मान वैफलेंडर के हिसाब से अंतरार्ष्ट्रीय महिला दिवस की तिथ्िा का पता लगाएँ। सैनिकों की टुकडि़यों ने प्रदशर्नकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। गुस्साए सिपाहियों ने एक रेजीमेंट की बैरक में अपने ही एक अपफसर पर गोली चला दी। तीन दूसरी रेशीमेंटों ने भी बगावत कऱदी और हड़ताली मशदूरोें के साथ आ मिले। उस शाम को सिपाही और मशदूर एक सोवियत या ‘परिषद्’ का गठन करने के लिए उसी इमारत में जमा हुए जहाँ अब तक ड्यूमा की बैठक हुआ करती थी। यहीं से पेत्रोग्राद सोवियत का जन्म हुआ। अगले दिन एक प्रतिनििामंडल शार से मिलने गया। सैनिक कमांडरों ने उसे सलाह दी कि वह राजगद्दी छोड़ दे। उसने कमांडरों की बात मान ली और 2 माचर् को गद्दी छोड़ दी। सोवियत और ड्यूमा के नेताओं ने देश का शासन चलाने के लिए एक अंतरिम सरकार बना ली। तय किया गया कि रूस के भविष्य के बारे में पैफसला लेने की िाम्मेदारी संविधान सभा को सौंप़दी जाए और उसका चुनाव सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार के आधार पर किया जाए। पफरवरी 1917 में राजशाही को गद्दी से हटाने वाली क्रांति का झंडा पेत्रोग्राद की जनता के हाथों में था। नए शब्द सोवियतः रूस के स्थानीय स्वशासी संगठन। बाॅक्स 1 पफरवरी क्रांति में महिलाएँ ‘महिला कामगार, अकसर ... अपने पुरुष सहकमिर्यों को प्रेरित करती रहती थीं ...। लाॅरेंश टेलीप़़़फोन पैफक्ट्री में, ... मापफार् वासीलेवा ने लगभग अकेले ही एक सपफल हड़ताल को अंजाम दिया था। उसी दिन सुबह को महिला दिवस समारोह के मौके पर महिला कामगारों ने पुरुष कामगारों को लाल पटि्टयाँ बाँधी थीं। ... इसके बाद, मिलिंग मशीन आॅपरेटर का काम करने वाली मापफार् वासीलेवा ने काम रोक दिया और आनन - पफानन हड़ताल का आह्वान कर डाला। काम पर मौजूद मशदूऱउसके समथर्न को पहले ही तैयार थे। ... पफोरमैन ने इस बारे में प्रबंधकों को सूचित कर दिया और उसके लिए पावरोटी़भ्िाजवायी। उसने पावरोटी तो ले ली लेकिन काम पर लौटने से इनकार कर दिया। जब प्रशासक ने उससे पूछा कि वह काम क्यों नहीं करना चाहती तो उसने पलट कर जवाब दिया कि ‘‘जब बाकी सारे भूखे हों तो मैं अकेले पेट भरने की नहीं सोच सकती।’’ मापफार् के समथर्न में प़्ौफक्ट्री के दूसरे विभाग में काम करने वाली महिलाएँ भी इकट्ठी हो गईं औऱधीरे - धीरे बाकी सारी औरतों ने भी काम रोक दिया। जल्दी ही पुरुषों ने भी औशार शमीन पर डाल दिए और पूरा हुजूम सड़क पर निकल आया।’ ड्डोतः चाॅइर् चैटजीर्, सेलिब्रेटिंग विमेन ;2002द्ध। 3.1 पफरवरी के बाद अंतरिम सरकार में सैनिक अिाकारी, भूस्वामी और उद्योगपति प्रभावशाली थे। उनमें उदारवादी और समाजवादी जल्दी से जल्दी निवार्चित सरकार का गठन ियाकलापचाहते थे। जन सभा करने और संगठन बनाने पर लगी पाबंदी हटा ली गइर्। हालाँकि निवार्चन का तरीका सब जगह एक जैसा नहीं था लेकिन पेत्रोग्राद ड्डोत क और बाॅक्स 1 को एक बार पिफर देखें। सोवियत की तशर् पर सब जगह ‘सोवियतें’ बना ली गईं। ऽ मशदूरों की मनोदशा में आए पाँच परिवतर्न अप्रैल 1917 में बोल्शेविकों के निवार्सित नेता व्लादिमीर लेनिन रूस बताएँ। लौट आए। लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक 1914 से ही यु( का विरोध कर ऽ खुद को इन दोनों परिस्िथतियों की प्रत्यक्षदशीर् रहे थे। उनका कहना था कि अब सोवियतों को सत्ता अपने हाथों में ले लेनी महिला के रूप में देख्िाए और लिख्िाए कि पहले वाली स्िथति से दूसरी स्िथति के बीच क्या बदलावचाहिए। लेनिन ने बयान दिया कि यु( समाप्त किया जाए, सारी शमीन आया है।किसानांे के हवाले की जाए और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाए। इन तीन माँगों को लेनिन की ‘अप्रैल थीसिस’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने ये भी सुझाव दिया कि अब अपनेे रैडिकल उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिए बोल्शेविक पाटीर् का नाम कम्युनिस्ट पाटीर् रख दिया जाए। बोल्शेविक पाटीर् के श्यादातर लोगों को अप्रैल थीसिस के बारे में सुनकर काप़्ाफी हैरानी हुइर्। उन्हें लगता था कि अभी समाजवादी क्रांति के लिए सही वक्त नहीं आया है इसलिए प्ि़ाफलहाल अंतरिम सरकार को ही समथर्न दिया जाना चाहिए। लेकिन अगले वुफछ महीनों की घटनाओं ने उनकी सोच बदल दी। गमिर्यों में मशदूर आंदोलन और पफैल गया। औद्योगिक इलाकों में पैफक्ट्री़कमेटियाँ बनाइर् गईं। इन कमेटियों के माध्यम से मशदूर पैफक्ट्री चलाने वेफ़मालिकों के तौर - तरीकों पर सवाल खड़ा करने लगे। ट्रेड यूनियनों की तादाद बढ़ने लगी। सेना में सिपाहियों की समितियाँ बनने लगीं। जून में लगभग 500 सोवियतों ने अख्िाल रूसी सोवियत कांग्रेस में अपने प्रतिनििा भेजे। जैसे - जैसे अंतरिम सरकार की ताकत कमशोर होने लगी और बोल्शेविकों का प्रभाव बढ़ने लगा, सरकार असंतोष को दबाने के लिए सख्त कदम उठाने लगी। सरकार ने पैफक्िट्रयाँ चलाने की मशदूरों द्वारा की जा रही कोश्िाशों को रोकना़और मशदूरों के नेताओं को गिरफ्ऱतार करना शुरू कर दिया। जुलाइर् 1917 में बोल्शेविकों द्वारा आयोजित किए गए विशाल प्रदशर्नों का भारी दमन किया गया। बहुत सारे बोल्शेविक नेताओं को छिपना या भागना पड़ा। गांवों में किसान और उनके समाजवादी क्रांतिकारी नेता भूमि पुनविर्तरण के लिए दबाव डालने लगे थे। इस काम के लिए भूमि समितियाँ बना दी गइर् थीं। सामाजिक क्रांतिकारियों से प्रेरणा और प्रोत्साहन लेते हुए जुलाइर् से सितंबर के बीच किसानों ने बहुत सारी शमीन पर कब्शा कर लिया। चित्रा 9 - अप्रैल 1917 में मशदूरों को संबोिात करते लेनिन की एक बोल्शेविक छवि 17 जुलाइर् 1917 को बोल्शेविक समथर्क प्रदशर्नकारियों पर सेना द्वारा गोलीबारी का दृश्य। 3.2 अक्तूबर 1917 की क्रांति जैसे - जैसे अंतरिम सरकार और बोल्शेविकों के बीच टकराव बढ़ता गया, लेनिन को अंतरिम सरकार द्वारा तानाशाही थोप देने की आशंका दिखाइर् देने लगी। सितंबर में उन्होंने सरकार के ख्िालापफ विद्रोह के बारे में चचार् शुरू कर दी। सेना और प़्ौफक्ट्री सोवियतों में मौजूद बोल्शेविकों को इकट्ठा किया गया। 16 अक्तूबर 1917 को लेनिन ने पेत्रोग्राद सोवियत और बोल्शेविक पाटीर् को सत्ता पर कब्शा करने के लिए राजी कर लिया। सत्ता पर कब्शे के लिए लियाॅन ट्राॅट्स्की के नेतृत्व में सोवियत की ओर से एक सैनिक क्रांतिकारी समिति का गठन किया गया। इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि योजना को किस दिन लागू किया जाएगा। 24 अक्तूबर को विद्रोह शुरू हो गया। संकट की आशंका को देखते हुए प्रधानमंत्राी केरेंस्की सैनिक टुकडि़यों को इकट्ठा करने शहर से बाहर चले गए। तड़के ही सरकार के वपफादार सैनिकों ने दो बोल्शेविक अखबारों वेफ़दफ्ऱतरों पर घेरा डाल दिया। टेलीपफोन और टेलीग्राप़़़्ाफ दफ्रतरों पर नियंत्राण प्राप्त करने और विंटर पैलेस की रक्षा करने के लिए सरकार समथर्क सैनिकों को रवाना कर दिया गया। पलक झपकते क्रांतिकारी समिति ने भी अपने समथर्कों को आदेश दे दिया कि सरकारी कायार्लयों पर कब्शा कर लें और मंत्रिायों को गिरफ्ऱतार कर लें। उसी दिन आॅरोरा नामक यु(पोत ने विंटर पैलेस पर बमबारी शुरू कर दी। अन्य यु(पोतों ने नेवा के रास्ते से आगे बढ़ते हुए विभ्िान्न सैनिक ठिकानों को अपने नियंत्राण में ले लिया। शाम ढलते - ढलते पूरा शहर क्रांतिकारी समिति के नियंत्राण में आ चुका था और मंत्रिायों ने आत्मसमपर्ण कर दिया था। पेत्रोग्राद में अख्िाल रूसी सोवियत कांग्रेस की बैठक हुइर् जिसमें बहुमत ने बोल्शेविकों की कारर्वाइर् का समथर्न किया। अन्य शहरों में भी बगावतें होने लगीं। दोनों तरपफ से जमकर गोलीबारी हुइर्, खास़तौर से मास्को में, लेकिन दिसंबर तक मास्को - पेत्रोग्राद इलाके पर बोल्शेविकों का नियंत्राण स्थापित हो चुका था। बाॅक्स 2 रूसी क्रांति की तारीख रूस में 1 पफरवरी 1918 तक जूलियन वैफलेंडर का अनुसरण किया जाता था। इसके बाद रूसी सरकार ने ग्रेगोरियन वैफलेंडर अपना लिया जिसका अब सब जगह इस्तेमाल किया जाता है। ग्रेगोरियन वैफलेंडर जूलियन वैफलेंडर से 13 दिन आगे चलता है। इसका मतलब है कि हमारे वैफलेंडर के हिसाब से ‘पफरवरी’ क्रांति 12 माचर् को और ‘अक्तूबर क्रांति’ 7 नवंबर को संपन्न हुइर् थी। वुफछ महत्त्वपूणर् तिथ्िायाँ 1850 - 1880 रूस में समाजवाद पर बहस 1898 रश्िायन सोशल डेमोव्रैफटिक ववर्फसर् पाटीर् की स्थापना। 1905 खूनी रविवार और 1905 की क्रांति। 1917 2 माचर् - शार द्वारा पदत्याग। 24 अक्तूबर - पेत्रोग्राद में बोल्शेविक विद्रोह। 1918 - 20 गृहयु(। 1919 काॅमिन्टनर् का गठन। 1929 सामूहिकीकरण की शुरुआत। नए शब्द काॅमिन्टनर्: कम्युनिस्ट पाटिर्यों की अंतरार्ष्ट्रीय संस्था। यह शब्द, ‘कम्युनिस्ट इंटरनैशनल’ ;ब्वउउनदपेज प्दजमतदंजपवदंसद्ध का संक्ष्िाप्त रूप है। चित्रा 11 - पेत्रोग्राद में लेनिन ;बाएँद्ध और ट्राॅट्स्की ;दाएँद्ध मशदूरों के साथअक्तूबर के बाद क्या बदला? बोल्शेविक निजी संपिा की व्यवस्था के पूरी तरह ख्िालापफ थे। श्यादातर उद्योगों और बैंकों का नवंबर 1917 में ही राष्ट्रीयकरण किया जा चुका था। उनका स्वामित्व और प्रबंधन सरकार के नियंत्राण में आ चुका था। शमीन को सामाजिक संपिा घोष्िात कर दिया गया। किसानों को सामंतों की शमीनों पर कब्शा करने की खुली छूट दे दी गइर्। शहरों में बोल्शेविकों ने मकान - मालिकों के लिए पयार्प्त हिस्सा छोड़कर उनके बड़े मकानों के छोटे - छोटे हिस्से कर दिए ताकि बेघरबार या शरूरतमंद लोगों को भी रहने की जगह दी जा सके। उन्होंने अभ्िाजात्य वगर् द्वारा पुरानी पदवियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। परिवतर्न को स्पष्ट रूप से सामने लाने के लिए सेना और सरकारी अपफसरों की वदिर्या़ँ बदल दी गईं। इसके लिए 1918 में एक परिधान प्रतियोगिता आयोजित की गइर् जिसमें सोवियत टोपी ;बुदियोनोव्काद्ध का चुनाव किया गया। बोल्शेविक पाटीर् का नाम बदल कर रूसी कम्युनिस्ट पाटीर् ;बोल्शेविकद्ध रख दिया गया। नवंबर 1917 में बोल्शेविकों ने संविधान सभा के लिए चुनाव कराए लेकिन इन चुनावों में उन्हें बहुमत नहीं मिल पाया। जनवरी 1918 में असेंबली ने बोल्शेविकों के प्रस्तावों को खारिज कर दिया और लेनिन ने असेंबली बखार्स्त कर दी। उनका मत था कि अनिश्िचत परिस्िथतियों में चुनी गइर् असेंबली के मुकाबले अख्िाल रूसी सोवियत कांग्रेस कहीं श्यादा लोकतांत्रिाक संस्था है। माचर् 1918 में अन्य राजनीतिक सहयोगियों की असहमति के बावजूद बोल्शेविकों ने ब्रेस्ट लिटोव्स्क में जमर्नी से संिा कर ली। आने वाले सालों में बोल्शेविक पाटीर् अख्िाल रूसी सोवियत कांग्रेस के लिए होने वाले चुनावों में हिस्सा लेने वाली एकमात्रा पाटीर् रह गइर्। अख्िाल रूसी सोवियत कांग्रेस को अब देश की संसद का दजार् दे दिया गया था। रूस एक - दलीय राजनीतिक व्यवस्था वाला देश बन गया। ट्रेड यूनियनों पर पाटीर् का नियंत्राण रहता था। गुप्तचर पुलिस ;जिसे पहले चेका और बाद में ओजीपीयू तथा एनकेवीडी का नाम दिया गयाद्ध बोल्शेविकों की आलोचना करने वालों को दंडित करती थी। बहुत सारे युवा लेखक और कलाकार भी पाटीर् की तरपफ आकष्िार्त हुए़क्योंकि वह समाजवाद और परिवतर्न के प्रति समपिर्त थी। अक्तूबर 1917 के बाद ऐसे कलाकारों और लेखकों ने कला और वास्तुश्िाल्प के क्षेत्रा में नए प्रयोग शुरू किए। लेकिन पाटीर् द्वारा थोपी गइर् सेंसरश्िाप के कारण बहुत सारे लोगों का पाटीर् से मोह भंग भी होने लगा था। बाॅक्स 3 अक्तूबर क्रांति और रूसी ग्रामीण इलाके: दो दृष्िटकोण ‘25 अक्तूबर 1905 को हुइर् क्रांतिकारी उथल - पुथल की खबर अगले ही दिन गाँव में पहुँच गइर्। लोगों ने खूब खुश्िायाँ मनायीं। किसानों के लिए इसका मतलब था मुफ्ऱत शमीन और यु( का खात्मा। ... जिस दिन खबर मिली उसी दिन जमींदार की हवेली लूट ली गइर्, उसके खेत कब्शे में ले लिए गए और उसके विशालकाय बाग के पेड़ काट कर सारी लकड़ी किसानों के बीच बाँट दी गइर्। उसकी सारी इमारतेें तोड़ दी गईं और उसकी शमीन किसानों के बीच बाँट दी गइर् जो एक नइर् सोवियत िांदगी जीने को तैयार थे।’ पेफदोर बेलोव,़द हिस्ट्री आॅपफ ए सोवियत कलेक्िटव पफामर्।़एक शमींदार परिवार के सदस्य ने अपने रिश्तेदार को भेजे खत में लिखा कि उसके परिवार की जागीर के साथ क्या हुआः ‘तख्तापलट, बिना किसी परेशानी के, खामोशी से और शांतिपूवर्क पूरा हो गया...। शुरुआती दिन बदार्श्त के बाहर थे... मिखाइल मिखाइलोविच ;जागीर का मालिकद्ध शांत था...। लड़कियाँ भी...। इसमें कोइर् शक नहीं कि चेयरमैन का व्यवहार सही है, बल्िक वह बड़ी विनम्रता से बात करता है। हमारे पास दो गाय और दो घोड़े छोड़ दिए गए। नौकर बार - बार उन्हें यही कहते हैं कि हमारी प्िाफक्र न करें। ‘‘उन्हें जीने दो। उनकी सुरक्षा और संपिा का िाम्मा हमारे उफपर है। हम उनसे मानवता भरा व्यवहाऱही करेंगे...।’’ ...अपफवाह है कि कइर् गाँवों में लोग कमेटियों को बाहर निकाल कर पूरी जागीर दोबारा मिखाइल मिखाइलोविच को सौंपना चाहते हैं। पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, या यह हमारे लिए अच्छा भी रहेगा या नहीं। पर हमें इस बात का संतोष है कि हमारे लोगों में चेतना है...।’ सजर् श्मेमान, एकोश आॅपफ ए नेटिव लैंड। टू सेंचुरीश आॅपफ ए रश्िायन विलेज ;1997द्ध। 4.1 गृह यु( ियाकलाप जब बोल्शेविकों ने शमीन के पुनविर्तरण का आदेश दिया तो रूसी सेना टूटने ग्रामीण इलाकों में हुइर् क्रांति के बारे में दोनों दृष्िटकोणों लगी। श्यादातर सिपाही किसान थे। वे भूमि पुनविर्तरण के लिए घर लौटना को पढि़ए। कल्पना कीजिए कि आप इन घटनाओं के चाहते थे इसलिए सेना छोड़कर जाने लगे। गैर - बोल्शेविक समाजवादियों, साक्षी हैं। निम्नलिख्िात की नशर से इन घटनाओं का उदारवादियों और राजशाही के समथर्कों ने बोल्शेविक विद्रोह की निंदा की। ब्यौरा लिख्िाएः उनके नेता दक्ष्िाणी रूस में इकट्ठा होकर बोल्शेविकों ;‘रेड्स’द्ध से लड़ने के ऽ एस्टेट मालिक लिए टुकडि़याँ संगठित करने लगे। 1918 और 1919 में रूसी साम्राज्य के ऽ छोटा किसान श्यादातर हिस्सों पर सामाजिक क्रांतिकारियों ;‘ग्रीन्स’द्ध और शार - समथर्कों ऽ पत्राकार ;‘व्हाइट्स’द्ध का ही नियंत्राण रहा। उन्हें प़्रफांसीसी, अमेरिकी, बि्रटिश और जापानी टुकडि़यों का भी समथर्न मिल रहा था। ये सभी शक्ितयाँ रूस में समाजवाद को पफलते - पूफलते नहीं देखना चाहती थीं। इन टुकडि़यों और बोल्शेविकों के बीच चले गृह यु( के दौरान लूटमार, डवैफती और भुखमरी ियाकलाप जैसी समस्याएँ बड़े पैमाने पर पैफल गईं। ड्डोत ख को देखें और बताएँ कि रूसी क्रांति पर मध्य ‘व्हाइट्स’ में जो निजी संपिा के हिमायती थे उन्होंने शमीन पर कब्शा एश्िाया के लोगों की प्रतििया इतनी अलग - अलग क्यों थी?करने वाले किसानों के ख्िालापफ काप़्ाफी सख्त रवैया अपनाया। उनकी इऩहरकतों के कारण तो गैर - बोल्शेविकों के प्रति जनसमथर्न और भी तेजी से घटने लगा। जनवरी 1920 तक भूतपूवर् रूसी साम्राज्य के श्यादातर हिस्सों पर बोल्शेविकों का नियंत्राण कायम हो चुका था। उन्हें गैर - रूसी राष्ट्रवादियों और मुस्िलम जदीदियों की मदद से यह कामयाबी मिली थी। जहाँ रूसी उपनिवेशवादी ही बोल्शेविक विचारधारा के अनुयायी बन गए थे, वहाँ यह मदद काम नहीं आ सकी। मध्य एश्िाया स्िथत खीवा में बोल्शेविक उपनिवेशकों ने समाजवाद की रक्षा के नाम पर स्थानीय राष्ट्रवादियों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया। ऐसे हालात में बहुत सारे लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि बोल्शेविक सरकार क्या चाहती है। आंश्िाक रूप से इसी समस्या से निपटने के लिए श्यादातर गैैर - रूसी राष्ट्रीयताओं को सोवियत संघ ;यूएसएसआरद्ध - दिसंबर 1922 में रूसी साम्राज्य में से बोल्शेविकों द्वारा स्थापित किया गया राज्य - के अंतगर्त राजनीतिक स्वायत्तता दे दी गइर्। लेकिन, क्योंकि बोल्शेविकों ने स्थानीय सरकारों पर कइर् अलोकपि्रय और सख्त नीतियाँ - जैसे, घुमंतूवाद की रोकथाम की कड़ी कोश्िाशें - थोप दी थीं इसलिए विभ्िान्न राष्ट्रीयताओं का विश्वास जीतने के प्रयास आंश्िाक रूप से ही सपफल हो पाए। 4.2 समाजवादी समाज का निमार्ण गृह यु( के दौरान बोल्शेविकों ने उद्योगों और बैंकों के राष्ट्रीयकरण को जारी रखा। उन्होंने किसानांे को उस शमीन पर खेती की छूट दे दी जिसका समाजीकरण किया जा चुका था। शब्त किए गए खेतों का इस्तेमाल बोल्शेविक यह दिखाने के लिए करते थे कि सामूहिकता क्या होती है। शासन के लिए केंद्रीकृत नियोजन की व्यवस्था लागू की गइर्। अप़्ाफसर इस बात का हिसाब लगाते थे कि अथर्व्यवस्था किस तरह काम कर सकती है। इस आधार पर वे पाँच साल के लिए लक्ष्य तय कर देते थे। इसी आधार पर उन्होंने पंचवषीर्य योजनाएँ बनानी शुरू कीं। पहली दो ‘योजनाओं’ ;1927 - 1932 और 1933 - 1938द्ध के दौरान औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने सभी तरह की कीमतें स्िथर कर दीं। केंद्रीकृत नियोजन से आथ्िार्क विकास को कापफी गति मिली। औद्योगिक उत्पादन बढ़ने लगा ;1929 से 1933 के बीच तेल, कोयले और स्टील के उत्पादन में 100 प्रतिशत वृि हुइर्द्ध। नए - नए औद्योगिक शहर अस्ितत्व में आए। मगर, तेज निमार्ण कायो± के दबाव में कायर्स्िथतियाँ खराब होनेे लगीं। मैग्नीटोगोस्वर्फ शहर में एक स्टील संयंत्रा का निमार्ण कायर् तीन साल के भीतर पूरा कर लिया गया। इस दौरान मशदूरों को बड़ी सख्त िांदगी गुशारनी पड़ी जिसका नतीजा ये हुआ कि पहले ही साल में 550 बार काम रुका। रिहायशी क्वाटर्रों में ‘जाड़ों में शौचालय जाने के लिए 40 डिग्री कम तापमान पर लोग चैथी मंिाल से उतर कर सड़क के पार दौड़कर जाते थे।’ एक विस्तारित श्िाक्षा व्यवस्था विकसित की गइर् और पैफक्ट्री कामगारों एवं ़किसानों को विश्वविद्यालयों में दाख्िाला दिलाने के लिए खास इंतजाम किए ड्डोत ख अक्तूबर क्रांति के समय मध्य एश्िाया: दो दृष्िटकोण एम.एन.राॅय भारतीय क्रांतिकारी, मैक्िसकन कम्युनिस्ट पाटीर् के संस्थापक और भारत, चीन व यूरोप में काॅमिन्टनर् के एक प्रमुख नेता थे। 1920 के दशक में जब रूस में गृह यु( चल रहा था उस समय वे मध्य एश्िाया में थे। उन्होंने लिखा: ‘मुख्िाया एक भला - सा बुशुगर् था...। उसका सहायक .. एक नौजवान ... जो रूसी भाषा बोलता था। ... उसेे क्रांति के बारे में पता था जिसमें शार को राजगद्दी से हटा दिया गया था और उन जनरलों को भी खदेड़ दिया था जिन्होंने किगिर्शों की मातृभूमि पर कब्शा किया था। इस प्रकार क्रांति का मतलब था कि अब किगीर्श ;किगिर्स्तानद्ध लोग एक बार पिफर अपनी मातृभूमि के स्वामी बन गए थे। जन्मजात बोल्शेविक से लगने वाले युवक ने हुंकार लगाइर् ‘‘इंकलाब जिंदाबाद’’। पूरा कबीला उसके साथ नारे लगाने लगा।’ एम.एन.राॅय, मेमाॅयसर् ;1964द्ध। ‘किगीर्श लोग पहली क्रांति ;यानी पफरवरी क्रांतिद्ध पर खुशी से झूम उठे और दूसरी क्रांति की खबर से वे अचंभे और दहशत में डूब गए। ... पहली क्रांति ने उन्हें शार के दमनकारी शासन से आशाद कराया था और ये उम्मीद जगायी थी कि ... उन्हें स्वायत्तता मिल जाएगी। दूसरी क्रांति ;अक्तूबर क्रांतिद्ध हिंसा, लूटपाट, करों के बोझ और तानाशाही सत्ता की स्थापना के साथ आयी। ... पहले एक बार शार के नौकरशाहों के छोटे से गुट ने किगिर्शों का दमन किया था। अब वही लोग ... उसी व्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं...।’ एक कशाक नेता ;1919द्ध, अलेक्शेंडर बेनिगसन एवं चांताल केलकेजे, ले माॅवमेंत्स नेशनाॅ शेश ले मुसुलमान्स दे रूसी, ;1960द्ध में उ(ृत। नए शब्द स्वायत्तताः अपना शासन स्वयं चलाने का अिाकार। घुमंतूः ऐसे लोग जो किसी एक जगह ठहर कर नहीं रहते बल्िक अपनी आजीविका की खोज में एक जगह से दूसरी जगह आते - जाते रहते हैं। कायर्स्िथतियाँः काम के हालात। चित्रा 15 - तीस के दशक में सोवियत रूस के एक स्वूफल में पढ़ते बच्चेबच्चे सोवियत अथर्व्यवस्था का अध्ययन कर रहे हैं। चित्रा 14 - कारखानों को समाजवाद के प्रतीक की तरह माना जाता था पोस्टर में लिखा हैः ‘चिमनियों से निकलता धुआँ ही सोवियत रूस की साँस है।’ यह बच्चा सोवियत रूस के लिए काम कर रहा है। चित्रा 17 - तीस के दशक में एक कारखाने का भोजन कक्षबाॅक्स 4 यूक्रेन के एक गांव में समाजवादी खेती ‘दो ;कब्शा किए गएद्ध खेतों को लेकर एक कम्यून बनाया गया। कम्यून में वुफल तेरह परिवार और सत्तर लोग थे। ... खेतों से हासिल किए गए कृष्िा उपकरणों को ... कम्यून के हवाले कर दिया गया। ... सभी सदस्य सामूहिक भोजनालय में खाना खाते थे। ‘‘सहकारी साम्यवाद’’ के सि(ांत के आधार पर आमदनी को सबके बीच बाँट लिया जाता था। सदस्यों के श्रम से होने वाली सारी आय और कम्यून के पास मौजूद सारे रिहायशी मकानों और सुविधाओं का कम्यून के सदस्य मिलकर इस्तेमाल करते थे।’ पेफदोर बेलोव,़द हिस्ट्री आॅपफ ए सोवियत कलेक्िटव पफामऱ्;1955द्ध। गए। महिला कामगारों के बच्चों के लिए पैफक्िट्रयों में बालवाडि़याँ खोल दी़गईं। सस्ती स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करायी गइर्। मशदूरों के लिए आदशर् रिहायशी मकान बनाए गए। लेकिन इन सारी कोश्िाशों के नतीजे सभी जगह एक जैसे नहीं रहे क्योंकि सरकारी संसाधन सीमित थे। 4.3 स्तालिनवाद और सामूहिकीकरण नियोजित अथर्व्यवस्था का शुरुआती दौर खेती के सामूहिकीकरण से पैदा हुइर् तबाही से जुड़ा हुआ था। 1927 - 1928 के आसपास रूस के शहरों में अनाज का भारी संकट पैदा हो गया था। सरकार ने अनाज की कीमत तय कर दी थी। उससे श्यादा कीमत पर कोइर् अनाज नहीं बेच सकता था। लेकिन किसान उस कीमत पर सरकार को अनाज बेचने के लिए तैयार नहीं थे। लेनिन के बाद पाटीर् की कमान संभाल रहे स्तालिन ने स्िथति से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए। उन्हें लगता था कि अमीर किसान और व्यापारी कीमत बढ़ने की उम्मीद में अनाज नहीं बेच रहे हैं। स्िथति पर काबू पाने के लिए सट्टेबाशी पर अंकुश लगाना और व्यापारियों के पास जमा अनाज को जब्त करना शरूरी था। 1928 में पाटीर् के सदस्यों ने अनाज उत्पादक इलाकों का दौरा किया। उन्होंने किसानों से जबरन अनाज खरीदा और ‘वुफलकों’ के ठिकानों पर छापे मारे। रूस में संपन्न किसानों को कुलक कहा जाता था। जब इसके बाद भी अनाज की कमी बनी रही तो खेतों के सामूहिकीकरण का प़्ौफसला लिया गया। इस पफैसले के पक्ष में एक तवर्फ यह दिया गया कि अनाज की कमी इसलिए है क्योंकि खेत बहुत छाटे - छोटे हैं। 1917 के बाद शमीन किसानों को सौंप दी गइर् थी। पफलस्वरूप श्यादातर किसानों के पास छोटे खेत थे जिनका आधुनिकीकरण नहीं किया जा सकता था। आधुनिक खेत विकसित करने और उन पर मशीनों की सहायता से औद्योगिक खेती करने के लिए ‘कुलकों का सप़्ाफाया’ करना, किसानों से शमीन छीनना और राज्य नियंत्रिात यानी सरकारी नियंत्राण वाले विशालकाय खेत बनाना शरूरी माना गया। इसी के बाद स्तालिन का सामूहिकीकरण कायर्क्रम शुरू हुआ। 1929 से पाटीर् ने सभी किसानों को सामूहिक खेतों ;कोलखोजद्ध में काम करने का आदेश जारी कर दिया। श्यादातर शमीन और साशो - सामान सामूहिक खेतों के स्वामित्व में सौंप दिए गए। सभी किसान सामूहिक खेतों पर काम करते थे और कोलखोश के मुनापेफ को सभी किसानों के बीच बाँट दिया जाता था। इस़प़्ौफसले से गुस्साए किसानों ने सरकार का विरोध किया और वे अपने जानवरों को खत्म करने लगे। 1929 से 1931 के बीच मवेश्िायों की संख्या में एक - तिहाइर् कमी आ गइर्। सामूहिकीकरण का विरोध करने वालों को सख्त सशा दी जाती थी। बहुत सारे लोगों को निवार्सन या देश - निकाला दे दिया गया। सामूहिकीकरण का विरोध करने वाले किसानों का कहना था कि वे न तो अमीर हैं और न ही समाजवाद के विरोधी हैं। वे बस विभ्िान्न कारणों से ड्डोत ग 1933 में सोवियत बचपन के स्वप्न और यथाथर् पि्रय दादाजी कालीनिन ..मेरा परिवार बड़ा है, चार बच्चे हैं। हमारे पिता अब नहीं हैं, वे मशदूरों के लिए लड़ते हुए मारे गए थे ..और मेरी माँ ... बीमार हैं। ... मैं बहुत पढ़ना चाहता हूँ, पर स्वूफल नहीं जा सकता। मेरे पास पुराने जूते थे पर अब वह इतने पफट चुके हैं कि कोइर् उनकी मरम्मत नहीं कर सकता। मेरी माँ बीमार हैं, हमारे पास न तो पैसा है और न ही रोटीऋ पर मैं पढ़ना बहुत चाहता हूँ। ...हमारे सामने पढ़ने, पढ़ने और बस पढ़ने की जिम्मेदारी है। व्लादिमीर इलीच लेनिन ने यही कहा है। पर मुझे स्वूफल जाना छोड़ना पड़ेगा। हमारा कोइर् रिश्तेदार नहीं है, कोइर् भी हमारी मदद नहीं कर सकता, इसलिए मुझे पैफक्ट्री में काम करना पड़ेगा़ताकि मेरा परिवार भूखों मरने से बच जाए। पि्रय दादाजी, मैं 13 साल का हूँ, पढ़ाइर् में अव्वल आता हूँ और मेरी कोइर् खराब रिपोटर् नहीं है। मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ता हूँ...। सोवियत राष्ट्रपति कालिनिन के नाम 13 वषीर्य एक मशदूर बालक द्वारा 1933 में लिखा गया पत्रा। वी. सोकोलोव ;सं.द्ध, आॅब्शचेस्त्वो प् व्लास्त, वी 1930 - ये गोदी ;मास्को, 1997द्ध। सामूहिक खेतों पर काम नहीं करना चाहते थे। स्तालिन सरकार ने सीमित स्तर पर स्वतंत्रा किसानी की व्यवस्था भी जारी रहने दी लेकिन ऐसे किसानों को कोइर् खास मदद नहीं दी जाती थी। सामूहिकीकरण के बावजूद उत्पादन में नाटकीय वृि नहीं हुइर्। बल्िक 1930 - 1933 की खराब प़्ाफसल के बाद तो सोवियत इतिहास का सबसे बड़ा अकाल पड़ा जिसमें 40 लाख से श्यादा लोग मारे गए। पाटीर् में भी बहुत सारे लोग नियोजित अथर्व्यवस्था के अंतगर्त औद्योगिक उत्पादन में पैदा हो रहे भ्रम और सामूहिकीकरण के परिणामों की आलोचना करने लगे थे। स्तालिन और उनके सहयोगियों ने ऐसे आलोचकों पर समाजवाद के ख्िालाप़्ाफ साजिश रचने का आरोप लगाया। देश भर में बहुत सारे लोगों पर इसी तरह के आरोप लगाए गए और 1939 तक आते - आते 20 लाख से श्यादा लोगों को या तो जेलों में या श्रम श्िाविरों में भेज दिया गया था। श्यादातर लोगों ने ऐसा कोइर् अपराध नहीं किया था लेकिन उनकी सुनने वाला कोइर् नहीं था। बहुत सारे लोगों को यातनाएँ दे - देकर उनसे इस आशय के बयान लिखवा लिए गए कि उन्होंने समाजवाद के विरु( सािाश में हिस्सा लिया है और इसी आधार पर उन्हें मार दिया गया। इनमें कइर् प्रतिभावान पेशेवर लोग थे। ड्डोत घ सामूहिकीकरण के विरोध और सरकार की प्रतििया का सरकारी विवरण ‘इस साल पफरवरी के दूसरे पखवाड़े से यूवे्रफन के विभ्िान्न क्षेत्रों में ... किसानों ने बड़े पैमाने पर विद्रोह किए हैं। यह स्िथति सामूहिकीकरण के ियान्वयन के दौरान पाटीर् के निचले कायर्कतार्ओं द्वारा पाटीर् लाइन को ठीक से लागू न किए जाने और गमिर्यों में होने वाली कटाइर् की तैयारियों का परिणाम है। बहुत थोड़े से समय में उपरोक्त क्षेत्रों में चल रही गतिवििायाँ आसपास के इलाकों में भी पैफल गइर् हैं। सबसे आक्रामक विद्रोह सीमावतीर् इलाकों में हुए हैं। विद्रोही किसानों का श्यादा शोर इस बात पर है कि सामूहिकीकरण के कारण उनसे छीन लिया गया अनाज, मवेशी और औशार ..उन्हें लौटा दिए जाएँ। 1 पफरवरी से 15 माचर् के बीच 25,000 गिरफ्ऱतारियाँ हो चुकी हैं ... 656 को मृत्युदंड दिया गया है, 3,673 को श्रम श्िाविरों में बंद कर दिया गया है और 5,580 को देश निकाला दिया गया है ...।’ यूक्रेन राज्य पुलिस प्रशासन के प्रमुख के.एम.कालर्सन द्वारा कम्युनिस्ट पाटीर् की वेंफद्रीय समिति को भेजी गइर् रिपोटर्, 19 माचर् 1930वी. सोकोलोव ;सं.द्ध, आॅब्शचेस्त्वो प् व्लास्त, वी 1930 - ये गोदी। ड्डोत च यह एक ऐसे किसान द्वारा लिखा गया पत्रा है जो सामूहिक खेत में काम नहीं करना चाहता। उसने क्रस्ितयान्स्काया गज़ेटा ;कृषक समाचारपत्राद्ध को यह खत लिखा था। ‘ ... मैं स्वाभाविक रूप से खेती करने वाला किसान हूँ। मेरा जन्म 1879 में हुआ था ... मेरे परिवार में 6 सदस्य हैं। मेरी पत्नी की पैदाइश 1871 की है। मेरा बेटा 16 साल का और दो बेटियाँ 19 साल की हैं। तीनों बच्चे स्वूफल जाते हैं, मेरी बहन 71 साल की है। 1932 से मेरे उफपर इतने भारी कर थोप दिए गए हैं कि उन्हें चुकाना असंभव है। 1935 में तो स्थानीय अपफसरों ने़कर और भी बढ़ा दिए ... मैं इतना कर नहीं चुका पाया और मेरी सारी संपिा वुफवर्फ कर ली गइर्: मेरा घोड़ा, गाय, बछड़ा, भेड़, मेमने, सारे औज़ार, प़्ाफनीर्चर और घर की मरम्मत के लिए रखी लकड़ी, सब वुफछ वुफवर्फ करके बेच डाला। 1936 में उन्होंने मेरी दो इमारतें बेच दीं ... कोलखोश ने ही उन्हें खरीद लिया। 1937 में मेरी दोनों झोपडि़यों में से भी एक बेच दी गइर् और दूसरी को ज़ब्त कर लिया गया ...।’ वी. सोकोलोव ;सं.द्ध, आॅब्शचेस्त्वो प् व्लास्त, वी 1930 - ये गोदी। रूसी क्रांति और सोवियत संघ का वैश्िवक प्रभाव बोल्शेविकों ने जिस तरह सत्ता पर कब्शा किया था और जिस तरह उन्होंने शासन चलाया उसके बारे में यूरोप की समाजवादी पाटिर्याँ बहुत सहमत नहीं थीं। लेकिन मेहनतकशों के राज्य की स्थापना की संभावना ने दुनिया भर के लोगों में एक नइर् उम्मीद जगा दी थी। बहुत सारे देशों में कम्युनिस्ट पाटिर्यों का गठन किया गया - जैसे, इंग्लैंड में कम्युनिस्ट पाटीर् आॅपफ ग्रेट बि्रटेन की स्थापना की गइर्। बोल्शेविकों ने उपनिवेशों की जनता को भी उनके रास्ते का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया। सोवियत संघ के अलावा भी बहुत सारे देशों के प्रतिनिध्ियों ने काॅन्प़फ्रे स आॅप़्ाफ द पीपुल आॅप़्ाफ दि इर्स्ट ;1920द्ध और बोल्शेविकों द्वारा बनाए गए काॅमिन्टनर् ;बोल्शेविक समथर्क समाजवादी पाटिर्यों का अंतरार्ष्ट्रीय महासंघद्ध में हिस्सा लिया था। वुफछ विदेश्िायों को सोवियत संघ की कम्युनिस्ट युनिवसिर्टी आॅप़़्ाफ द वकर्सर् आॅपफ दि इर्स्ट में श्िाक्षा दी गइर्। जब दूसरा विश्वयु( शुरू हुआ तब तक सोवियत संघ की वजह से समाजवाद को एक वैश्िवक पहचान और हैसियत मिल चुकी थी। लेकिन पचास के दशक तक देश के भीतर भीे लोग यह समझने लगे थे कि सोवियत संघ की शासन शैली रूसी क्रांति के आदशो± के अनुरूप नहीं है। विश्व समाजवादी आंदोलन में भी इस बात को मान लिया गया था कि सोवियत संघ में सब कुछ ठीक - ठाक नहीं चल रहा है। एक पिछड़ा हुआ देश महाशक्ित बन चुका था। उसके उद्योग और खेती विकसित हो चुके थे और गरीबों को भोजन मिल रहा था। लेकिन वहाँ के नागरिकों को कइर् तरह की आवश्यक स्वतंत्राता नहीं दी जा रही थी और विकास परियोजनाओं को दमनकारी नीतियों के बल पर लागू किया गया था। बीसवीं सदी के अंत तक एक समाजवादी देश के रूप में अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर सोवियत संघ की प्रतिष्ठा कापफी कम रह गइर् थी हालाँकि वहाँ के लोग अभी भी समाजवाद के आदशो± का सम्मान करते थे। लेकिन सभी देशों में समाजवाद के बारे में विविध प्रकार से व्यापक पुनविर्चार किया गया। दूसरे विश्वयु( के दौरान भारतीय कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ के लिए जनमत निमार्ण किया। बाॅक्स 5 रूसी क्रांति से प्रेरित होने वालों में बहुत सारे भारतीय भी थे। उनमें से कइर् ने कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय में श्िाक्षा प्राप्त की। 1920 के दशक में भारत में भी कम्युनिस्ट पाटीर् का गठन कर लिया गया। इस पाटीर् के सदस्य सोवियत कम्युनिस्ट पाटीर् के संपकर् में रहते थे। कइर् महत्त्वपूणर् भारतीय राजनीतिक एवं सांस्कृतिक व्यक्ितयों ने सोवियत प्रयोग में दिलचस्पी ली और वहाँ का दौरा किया। रूस जाने वाले भारतीयों में जवाहर लाल नेहरू और रबीन्द्रनाथ टैगोर भी थे जिन्होंने सोवियत समाजवाद के बारे में लिखा भी। भारतीय लेखन में सोवियत रूस की अलग - अलग छवियाँ दिखाइर् देती थीं। हिंदी में आर.एस. अवस्थी ने 1920 - 21 में रश्िायन रेवल्यूशन, लेनिन, हिश लाइपफ ऐन्ड हिश थाॅट्स़ और द रेड रेवल्यूशन नामक किताबें लिखीं। उनके अलावा एस.डी.विद्यालंकार ने द रीबथर् आॅपफ रश्िाया तथा द सोवियत स्टेट आॅपफ रश्िाया नामक पुस्तकें लिखीं। इन विषयों पर बंगाली, मराठी, मलयालम, तमिल और तेलुगु में भी बहुत वुफछ लिखा गया। ड्डोत छ सोवियत रूस में एक भारतीय, 1920 ‘अपनी जिंदगी में पहली बार हम लोग यूरोपियों को एश्िायाइयों के साथ मुक्त भाव से मिलते - बतियाते देख रहे थे। जब हमने रूसियों को देश के बाकी लोगों के साथ सहज भाव से घुलते - मिलते देखा तो हमें यकीन हो गया कि हम सच्ची समानता की दुनिया में आ पहुँचे हैं। हमें स्वतंत्राता सही मायनों में साकार होती दिखायी दे रही थी। प्रतिक्रांतिकारियों और साम्राज्यवादियों की हरकतों से पैदा हुइर् गरीबी के बावजूद लोग - बाग पहले से श्यादा खुश और संतुष्ट दिखायी दे रहे थे। क्रांति ने उनमें आत्मविश्वास और निडरता भर दी है। पचास अलग - अलग राष्ट्रीयताओं के लोगों के बीच मानवता का असली भाइर्चारा यहीं साकार होने वाला है। जाति या धमर् की कोइर् सीमा उन्हें एक - दूसरे के साथ घुलने - मिलने से नहीं रोक रही थी। हर जीव को एक कुशल वक्ता बना दिया गया है। आप वहाँ मशदूरों, किसानों और सिपाहियों, सभी को पेशेवर वक्ता की तरह बहस करते देख सकते हैं।’ शौकत उस्मानी, हिस्टाॅरिक टिªप्स आॅपफ ए रेवल्यूशनरी।़ड्डोत ज रूस से रबीन्द्रनाथ टैगोर, 1930 ‘मास्को बाकी यूरोपीय राजधानियों के मुकाबले कम साप़्ाफ - सुथरा दिखाइर् देता है। सड़क पर भागम - भाग में लगा कोइर् व्यक्ित बहुत स्माटर् नहीं लगता। सारी जगह मशदूरों की है। ... यहाँ आम जनता रइर्सों के साए में किसी तरह दबती दिखाइर् नहीं देती। जो लोग सदियों से नेपथ्य में छिपे हुए थे आज सामने आ खड़े हुए हैं। ... मैं अपने देश के किसानों और मशदूरों के बारे में सोचने लगा। मेरे सामने जो वुफछ था उसे देखकर लगता था कि यह अरेबियन नाइट्स के किसी जिन्न की करामात है। ;यहाँद्ध महश एक दशक पहले ये भी हमारे लोगों जितने ही अनपढ़, लाचार और भूखे थे। ... ये देख कर मेरे जैसे अभागे हिंदुस्तानी से श्यादा अचंभा और भला किसको होगा कि इन लोगों ने इतने थोड़े से सालों में अज्ञानता और बेसहारेपन के पहाड़ को उतार पेंफका है।’ नए शब्द प्रतिक्रांतिकारीः क्रंाति - विरोध्ी। ियाकलाप शौकत उस्मानी और रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे गए उ(रणों की तुलना कीजिए। उन्हें ड्डोत ग, घ और च के साथ मिला कर पढि़ए और बताइए कि - ऽ भारतीयों को सोवियत संघ में सबसे प्रभावशाली बात क्या दिखायी दी? ऽ ये लेखक किस चीश को नहीं देख पाए? ियाकलाप प्रश्न

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