घटनाएँ और प्रियाएँ घटनाएँ और प्रियाएँ इस खण्ड में आप प़्रफांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति और नात्सीवाद के उदय का इतिहास पढ़ेंगे। आधुनिक विश्व की रचना में इन तीनों घटनाओं का महत्त्वपूणर् योगदान रहा है। अध्याय 1 प़्रफांसीसी क्रांति के बारे में है। आज हम मुक्ित, स्वतंत्राता और समानता को सहज - सुलभ और सामान्य मान कर चलते हैं। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि इन सबका भी एक इतिहास रहा है। प़्रफांसीसी क्रंाति के शरिए आपको इस इतिहास के एक हिस्से को समझने में मदद मिलेगी। प़्रफांसीसी क्रांति ने प़्रफांस में राजतंत्रा को समाप्त कर दिया। विशेषािाकारों पर आधारित व्यवस्था से शासन की एक नइर् व्यवस्था उदित हुइर्। क्रांति के दौरान तैयार किया गया मानव अिाकार घोषणापत्रा एक नए युग के आगमन का द्योतक था। सबके एक समान अिाकार होते हैं और हर व्यक्ित बराबरी का दावा कर सकता है - यह सोच राजनीति की नइर् भाषा का हिस्सा बन गइर्। समानता और स्वतंत्राता की यह सोच नए युग का वेंफद्रीय विचार थीऋ लेकिन विभ्िान्न देशों में इन विचारों को नाना रूपों में समझा और साधा गया। भारत और चीन, अप़्रफीका और दक्ष्िाणी अमेरिका के उपनिवेशवाद - विरोधी आंदोलनों ने कइर् ऐसे विचारों को जन्म दिया जो बेहद रचनात्मक और मौलिक थे लेकिन इन आंदोलनों की भाषा और मुहावरे को अठारहवीं सदी के उत्तराधर् की घटनाओं से ही वैधता मिल रही थी। अध्याय 2 में आप यूरोप में समाजवाद के आगमन और उस नाटकीय घटनाक्रम के बारे में पढ़ेंगे जिसके चलते रूस के शासक शार निकोलस - प्प् को सत्ता छोड़नी पड़ी। रूसी क्रांति ने समाज परिवतर्न का एक नया तरीका गढ़ने का प्रयास किया। इस क्रांति ने आथ्िार्क समानता और मशदूर - किसानों की बेहतरी का सवाल उठाया। इस अध्याय में आप नइर् सोवियत सरकार द्वारा शुरू किए गए बदलावों, उसके सामने आइर् समस्याओं और उनसे निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में जानेंगे। सोवियत रूस की सरकार ने खेती के औद्योगीकरण और मशीनीकरण का कायर्क्रम तो दृढ़ता के साथ आगे बढ़ाया लेकिन उसने नागरिकों के कइर् ऐसे अिाकारों का हनन भी किया जो किसी भी लोकतांत्रिाक समाज के संचालन के लिए अनिवायर् होते हैं। पिफर भी, समाजवाद का नारा विभ्िान्न देशों के उपनिवेशवाद - विरोधी आंदोलन का हिस्सा बना। आज सोवियत संघ बिखर चुका है और समाजवाद संकट में है, लेकिन बीसवीं सदी के पैमाने पर समकालीन विश्व का रूपाकार तय करने में यह सबसे शक्ितशाली ताकत था। फांसीसी क्रांति़प्रचैदह जुलाइर् 1789 की सुबह, पेरिस नगर में आतंक का माहौल था। सम्राट ने सेना को शहर में घुसने का आदेश दे दिया था। अप़फवाह थी कि वह सेना को नागरिकों पर गोलियाँ चलाने का आदेश देने वाला है। लगभग 7000 मदर् तथा औरतें टाॅउन हाॅल के सामने एकत्रा हुए और उन्होंने एक जन - सेना का गठन करने का निणर्य किया। हथ्िायारों की खोज में वे बहुत - से सरकारी भवनों में जबरन प्रवेश कर गए। अंततः सैकड़ों लोगों का एक समूह पेरिस नगर के पूवीर् भाग की ओर चल पड़ा और बास्तील ;ठंेजपससमद्ध किले की जेल को तोड़ डाला जहाँ भारी मात्रा में गोला - बारूद मिलने की संभावना थी। हथ्िायारों पर कब्शे की इस सशस्त्रा लड़ाइर् में बास्तील का कमांडर मारा गया और वैफदी छुड़ा लिए गए, यद्यपि उनकी संख्या केवल सात थी। सम्राट की निरंवुफश शक्ितयों का प्रतीक होने के कारण बास्तील किला लोगों की घृणा का वेंफद्र था। इसलिए किले को ढहा दिया गया और उसके अवशेष बाशार में उन लोगों को बेच दिए गए जो इस ध्वंस को बतौर स्मृति - चिÉ संजोना चाहते थे। इस घटना के बाद कइर् दिनों तक पेरिस तथा देश के देहाती क्षेत्रों में कइर् और संघषर् हुए। अिाकांश जनता पावरोटी की महँगी कीमतों का विरोध कर रही थी। बाद में इस दौर का सिंहावलोकन करते हुए इतिहासकारों ने इसे एक लंबे घटनाक्रम की ऐसी शुरुआती कडि़यों के रूप में देखा जिनकी परिणति प़्रफांस के सम्राट को पफाँसी दिए जाने में हुइर्, हालँाकि उस समय अिाकांश लोगों को ऐसे नतीजे की उम्मीद नहीं थी। ऐसा क्यों और वैफसे हुआ? चित्रा 1 - बास्तील का ध्वंसबास्तील ध्वंस के बाद चित्राकारों ने इस घटना की याद में कइर् चित्रा बनाए। अठारहवीं सदी के उत्तराधर् में प़्रफांसीसी समाज सन् 1774 में बूबो± राजवंश का लुइर् ग्टप् Úांस की राजगद्दी पर आसीन हुआ। उस समय उसकी उम्र केवल बीस साल थी और उसका विवाह आॅस्िट्रया की राजवुफमारी मेरी एन्तोएनेत से हुआ था। राज्यारोहण के समय उसने राजकोष खाली पाया। लंबे समय तक चले यु(ों के कारण प़्रफांस के वित्तीय संसाधन नष्ट हो चुके थे। वसार्य ;टमतेंपससमेद्ध के विशाल महल और राजदरबार की शानो - शौकत बनाए रखने की प्िाफशूलखचीर् का बोझ अलग से था। लुइर् ग्टप् के शासनकाल में प़्रफांस ने अमेरिका के 13 उपनिवेशों को साझा शत्राु बि्रटेन से आशाद कराने में सहायता दी थी। इस यु( के चलते प्ऱफांस पर दस अरब लिव्रे से भी अिाक का कशर् और जुड़ गया जबकि उस पर पहले से ही दो अरब लिवे्र का बोझ चढ़ा हुआ था। सरकार से कशर्दाता अब 10 प्रतिशत ब्याज की माँग करने लगे थे। पफलस्वरूप प़्रफांसीसी सरकार अपने बजट का बहुत बड़ा हिस्सा दिनोंदिन बढ़ते जा रहे कशर् को चुकाने पर मजबूर थी। अपने नियमित खचो± जैसे, सेना के रख - रखाव, राजदरबार, सरकारी कायार्लयों या विश्वविद्यालयों को चलाने के लिए प़्रफांसीसी सरकार करों में वृि के लिए बाध्य हो गइर् पर यह कदम भी नाकाप़्ाफी था। अठारहवीं सदी में पफांसीसी समाज तीन एस्टेट्स में बँटा था और केवल ़्रतीसरे एस्टेट के लोग ;जनसाधारणद्ध ही कर अदा करते थे। वगो± में विभाजित प़्रफांसीसी समाज मध्यकालीन सामंती व्यवस्था का अंग था। ‘प्राचीन राजतंत्रा’ पद का प्रयोग सामान्यतः सन् 1789 से पहले के ़प्रफांसीसी समाज एवं संस्थाओं के लिए होता है। चित्रा 2 प़्रफांसीसी समाज की वगर् - व्यवस्था को दशार्ता है। पूरी आबादी में लगभग 90 प्रतिशत किसान थे। लेकिन, शमीन के मालिक किसानों की संख्या बहुत कम थी। लगभग 60 प्रतिशत शमीन पर वुफलीनों, चचर् और तीसरे एस्टेट्स के अमीरों का अिाकार था। प्रथम दो एस्टेट्स, वुफलीन वगर् एवं पादरी वगर् के लोगों को वुफछ विशेषािाकार जन्मना प्राप्त थे। इनमें से सबसे महत्त्वपूणर् विशेषािाकार था - - राज्य को दिए जाने वाले करों से छूट। वुफलीन वगर् को वुफछ अन्य सामंती विशेषािाकार भी हासिल थे। वह किसानों से सामंती कर वसूल करता था। किसान अपने स्वामी की सेवा - - स्वामी के घर एवं खेतों में काम करना, सैन्य सेवाएँ देना अथवा सड़कों के निमार्ण में सहयोग आदि - - करने के लिए बाध्य थे। चचर् भी किसानों से करों का एक हिस्सा, टाइद ;ज्पजीमए धामिर्क करद्ध के रूप में वसूलता था। उफपर से तीसरे एस्टेट के तमाम लोगों को सरकार को तो कर चुकाना ही होता था। इन करों में टाइल ;ज्ंपससमए प्रत्यक्ष करद्ध और अनेक अप्रत्यक्ष कर शामिल थे। अप्रत्यक्ष कर नमक और तम्बावूफ जैसी रोशाना उपभोग की वस्तुओं पर लगाया जाता था। इस प्रकार राज्य के वित्तीय कामकाज का सारा बोझ करों के माध्यम से जनता वहन करती थी। नए शब्द लिव्रे: प़्रफांस की मुद्रा जिसे 1794 में समाप्त कर दिया गया। एस्टेट: क्रांति - पूवर् Úांसीसी समाज में सत्ता और सामाजिक हैसियत को अभ्िाव्यक्त करने वाली श्रेणी। पादरी वगर्: चचर् के विशेष कायो± को करने वाले व्यक्ितयों का समूह। टाइद: चचर् द्वारा वसूल किया जाने वाला कर। यह कर कृष्िा उपज के दसवें हिस्से के बराबर होता था। टाइल: सीधे राज्य को अदा किया जाने वाला कर। ‘बेचारा गरीब अनाज, पफल, पैसा, सलाद सब वुफछ लाता है। मोटू शमींदार सब वुफछ स्वीकार करने कोे तैयार बैठा है। पर वह उसको एक नशर देखता तक नहीं।’ ियाकलाप बताएँ कि चित्राकार ने वुफलीन व्यक्ित को मकड़े और किसान को मक्खी के रूप में क्यों चित्रिात किया है। ‘वुफलीन व्यक्ित मकड़ा है और किसान ‘शैतान को जितना दो, उसका लालच उतना ही बढ़ता जाता है।’मक्खी।’ चित्रा 3 - मकड़ा और मक्खीएक अनाम उत्कीणर् चित्रा। 1.1 जीने का संघषर् प़्रफांस की जनसंख्या सन् 1715 में 2.3 करोड़ थी जो सन् 1789 में बढ़कर 2.8 करोड़ हो गइर्। परिणामतः अनाज उत्पादन की तुलना में उसकी माँग काप़्ाफी तेशी से बढ़ी। अिाकांश लोगों के मुख्य खाद्य - पावरोटी - की कीमत में तेशी से वृि हुइर्। अिाकतर कामगार कारखानों में मशदूरी करते थे और उनकी मशदूरी मालिक तय करते थे। लेकिन मशदूरी महँगाइर् की दर से नहीं बढ़ रही थी। पफलस्वरूप, अमीर - गरीब की खाइर् चैड़ी होती गइर्। स्िथतियाँ तब और बदतर हो जातीं जब सूखे या ओले के प्रकोप से पैदावार गिर जाती। इससे रोशी - रोटी का संकट पैदा हो जाता था। ऐसे जीविका संकट प्राचीन राजतंत्रा के दौरान प़्रफांस में काप़्ाफी आम थे। नए शब्द जीविका संकट: ऐसी चरम स्िथति जब जीवित रहने के न्यूनतम साधन भी खतरे में पड़ने लगते हैं। अनाम: जिसका नाम मालूम नहीं है। 1.2 जीविका का संकट वैफसे उत्पन्न होता है 1.3 उभरते मध्य वगर् ने विशेषािाकारों के अंत की कल्पना की पहले भी कर बढ़ने एवं अकाल के समय किसान और कामगार विद्रोह कर चुके थे। परंतु उनके पास सामाजिक एवं आथ्िार्क व्यवस्था में बुनियादी बदलाव लाने के लिए साधन एवं कायर्क्रम नहीं थे। ये िाम्मेदारी तीसरे एस्टेट के उन समूहों ने उठाइर् जो समृ( और श्िाक्ष्िात होकर नए विचारों के संपवर्फ में आ सके थे। अठारहवीं सदी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ जिसे मध्य वगर् कहा गया, जिसने पैफलते समुद्रपारीय व्यापार और ऊनी तथा रेशमी वस्त्रों के उत्पादन के बल पर संपिा अजिर्त की थी। ऊनी और रेशमी कपड़ों का या तो नियार्त किया जाता था या समाज के समृ( लोग उसे खरीद लेते थे। तीसरे एस्टेट में इन सौदागरों एवं निमार्ताओं के अलावा प्रशासनिक सेवा व वकील जैसे पेशेवर लोग भी शामिल थे। ये सभी पढ़े - लिखे थे और इनका मानना था कि समाज के किसी भी समूह के पास जन्मना विशेषािाकार नहीं होने चाहिए। किसी भी व्यक्ित की सामाजिक हैसियत का आधार उसकी योग्यता ही होनी चाहिए। स्वतंत्राता, समान नियमों तथा समान अवसरों के विचार पर आधारित समाज की यह परिकल्पना जाॅन लाॅक और श्याँ शाक रूसो जैसे दाशर्निकों ने प्रस्तुत की थी। अपने टू ट्रीटाइशेश आॅप़्ाफ गवनर्मेंट में नीचे दिए गए शब्दों में से सही शब्द चुनकर चित्रा 4 के रिक्त स्थानों को भरें: खाद्य दंगे, अन्नाभाव, मृतकों की संख्या में वृि, खाद्य पदाथो± की बढ़ती कीमत, कमशोर शरीर। लाॅक ने राजा के दैवी और निरंवुफश अिाकारों के सि(ांत का खंडन किया था। रूसो ने इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए जनता और उसके प्रतिनििायों के बीच एक सामाजिक अनुबंध पर आधारित सरकार का प्रस्ताव रखा। माॅन्तेस्क्यू ने द स्िपरिट आॅपफ द लाॅश ़नामक रचना में सरकार के अंदर विधायिका, कायर्पालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता विभाजन की बात कही। जब संयुक्त राज्य अमेरिका में 13 उपनिवेशों ने बि्रटेन से खुद को आशाद घोष्िात कर दिया तो वहाँ इसी माॅडल की सरकार बनी। प़्रफांस के राजनीतिक चिंतकों के लिए अमेरिकी संविधान और उसमें दी गइर् व्यक्ितगत अिाकारों की गारंटी प्रेरणा का एक महत्त्वपूणर् ड्डोत थी। दाशर्निकों के इन विचारों पर काॅपफी हाउसों व सैलाॅन की गोष्िठयों में ़गमार्गमर् बहस हुआ करती और पुस्तकों एवं अखबारों के माध्यम से इनका व्यापक प्रचार - प्रसार हुआ। पुस्तकों एवं अखबारों को लोगों के बीच शोर से पढ़ा जाता ताकि अनपढ़ भी उन्हें समझ सवेंफ। इसी समय लुइर् ग्टप् द्वारा राज्य के खचो± को पूरा करने के लिए पिफर से कर लगाये जाने की खबर से विशेषािाकार वाली व्यवस्था के विरु( गुस्सा भड़क उठा। ड्डोत क ियाकलाप यहाँ यंग क्या संदेश देने की कोश्िाश कर रहे हैं? ‘गुलामों’ से उनका क्या आशय है? वह किसकी आलोचना कर रहे हैं? सन् 1787 में उन्हें किन खतरों का आभास होता है? क्रांति की शुरुआत पिछले भाग में आप देख चुके हैं कि किन कारणों से लुइर् ग्टप् ने कर बढ़ा दिए थे। क्या आप सोच सकते हैं कि उसने ऐसा वैफसे किया होगा? प्राचीन राजतंत्रा के तहत प्ऱफांसीसी सम्राट अपनी मशीर् से कर नहीं लगा सकता था। इसके लिए उसे एस्टेट्स जेनराल ;प्रतिनिध्ि सभाद्ध की बैठक बुला कर नए करों के अपने प्रस्तावों पर मंशूरी लेनी पड़ती थी। एस्टेट्स जेनराल एक राजनीतिक संस्था थी जिसमें तीनों एस्टेट अपने - अपने प्रतिनििा भेजते थे। लेकिन सम्राट ही यह निणर्य करता था कि इस संस्था की बैठक कब बुलाइर् जाए। इसकी अंतिम बैठक सन् 1614 में बुलाइर् गइर् थी। प़्रफांसीसी सम्राट लुइर् ग्टप् ने 5 मइर् 1789 को नये करों के प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए एस्टेट्स जेनराल की बैठक बुलाइर्। प्रतिनििायों की मेशबानी के लिए वसार्य के एक आलीशान भवन को सजाया गया। पहले और दूसरे एस्टेट ने इस बैठक में अपने 300 - 300 प्रतिनििा भेजे जो आमने - सामने की कतारों में बिठाए गए। तीसरे एस्टेट के 600 प्रतिनििा उनके पीछे खड़े किए गए। तीसरे एस्टेट का प्रतिनिध्ित्व इसके अपेक्षाकृत समृ( एवं श्िाक्ष्िात वगर् कर रहे थे। किसानों, औरतों एवं कारीगरों का सभा में प्रवेश वजिर्त था। पिफर भी लगभग 40,000 पत्रों के माध्यम से उनकी श्िाकायतों एवं माँगों की सूची बनाइर् गइर्, जिसे प्रतिनििा अपने साथ लेकर आए थे। एस्टेट्स जेनराल के नियमों के अनुसार प्रत्येक वगर् को एक मत देने का अिाकार था। इस बार भी लुइर् ग्टप् इसी प्रथा का पालन करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ था। परंतु तीसरे वगर् के प्रतिनििायों ने माँग रखी कि अबकी बार पूरी सभा द्वारा मतदान कराया जाना चाहिए, जिसमें प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अिाकार होगा। यह एक लोकतांत्रिाक सि(ांत था जिसे मिसाल के तौर पर रूसो ने अपनी पुस्तक द सोशल काॅन्ट्रैक्ट में प्रस्तुत किया था। जब सम्राट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तो तीसरे एस्टेट के प्रतिनििा विरोध जताते हुए सभा से बाहर चले गए। तीसरे एस्टेट के प्रतिनििा खुद को संपूणर् प़्रफांसीसी राष्ट्र का प्रवक्ता मानते थे। 20 जून को ये प्रतिनििा वसार्य के इन्डोर टेनिस कोटर् में जमा हुए। उन्होंने अपने आप को नैशनल असेंबली घोष्िात कर दिया और शपथ ली कि जब तक सम्राट की शक्ितयों को कम करने वाला संविधान तैयार नहीं किया जाएगा तब तक असेंबली भंग नहीं होगी। उनका नेतृत्व मिराब्यो और आबे सिए ने किया। मिराब्यो का जन्म वुफलीन परिवार में हुआ था लेकिन वह सामंती विशेषािाकारों वाले समाज को खत्म करने की शरूरत से सहमत था। उसने एक पत्रिाका निकाली और वसार्य में जुटी भीड़ के समक्ष शोरदार भाषण भी दिए। आबे सिए मूलतः पादरी था और उसने ‘तीसरा एस्टेट क्या है?’ शीषर्क से एक अत्यंत प्रभावशाली प्रचार - पुस्ितका ;पैम्फ्ऱलेटद्ध लिखी। वुफछ महत्त्वपूणर् तिथ्िायाँ 1774 लुइर् ग्टप् प़्रफांस का राजा बनता है। सरकारी खशाना खाली हो चुका है और प्राचीन राजतंत्रा के समाज में असंतोष गहराता जा रहा है। 1789 एस्टेट्स जेनराल का आह्नान। तृतीय एस्टेट नैशनल असेंबली का गठन करता है। बास्तील पर हमला, देहात में किसानों का विद्रोह। 1791 सम्राट की शक्ितयों पर अंवुफश लगाने और सभी मनुष्यों को मूलभूत अिाकार प्रदान करने के लिए संविधान बनाया जाता है। 1792 - 93 प़्रफांस गणराज्य बनता हैऋ सिर काट कर राजा को मार दिया जाता है। जैकोबिन गणराज्य का पतनऋ प़्रफांस पर डिरेक्ट्री का शासन। 1804 नेपोलियन प़्रफांस का सम्राट बनता हैऋ यूरोप के विशाल भूभाग पर कब्शा कर लेता है। 1815 वाॅटरलू में नेपोलियन की हार। ियाकलाप तृतीय एस्टेट के प्रतिनििा मध्य में एक मेश पर खड़े असेंबली अध्यक्ष बेयली की ओर हाथ उठाकर शपथ लेते हैं। क्या आप मानते हैं कि उस समय बेयली निवार्चित प्रतिनििायों की ओर पीठ करके खड़ा रहा होगा? बेयली को इस तरह दशार्ने ;चित्रा 5द्ध के पीछे डेविड का क्या इरादा प्रतीत होता है? चित्रा 5 - टेनिस कोटर् में शपथ एक विशाल पेंटिंग के लिए शाक - लुइर् डेविड द्वारा बनाया गया शुरुआती रेखांकन। यह तस्वीर नैशनल असेंबली में लगाइर् जानी थी। जिस वक्त नैशनल असेंबली संविधान का प्रारूप तैयार करने में व्यस्त थी, पूरा प़्रफांस आंदोलित हो रहा था। कड़ाके की ठंड के कारण पफसल मारी ़गइर् थी और पावरोटी की कीमतें आसमान छू रही थीं। बेकरी मालिक स्िथति का पफायदा उठाते हुए जमाखोरी में जुटे थे। बेकरी की दुकानों पर घंटों वेफ़इंतशार के बाद गुस्सायी औरतों की भीड़ ने दुकान पर धावा बोल दिया। दूसरी तरप़्ाफ सम्राट ने सेना को पेरिस में प्रवेश करने का आदेश दे दिया था। क्रु( भीड़ ने 14 जुलाइर् को बास्तील पर धावा बोलकर उसे नेस्तनाबूद कर दिया। देहाती इलाकों में गाँव - गाँव यह अपफवाह पफैल गइर् कि जागीरों वेफ़मालिकों ने भाड़े पर लठैतों - लुटेरों के गिरोह बुला लिए हैं जो पकी पफसलों़को तबाह करने निकल पड़े हैं। कइर् िालों में भय से आक्रांत होकर किसानों ने वुफदालों और बेलचों से ग्रामीण किलों ;बींजमंनद्ध पर आक्रमण कर दिए। उन्होंने अन्न भंडारों को लूट लिया और लगान संबंधी दस्तावेशों को जलाकर राख कर दिया। वुफलीन बड़ी संख्या में अपनी जागीरें छोड़कर भाग गए, बहुतों ने तो पड़ोसी देशों में जाकर शरण ली। अपनी विद्रोही प्रजा की शक्ित का अनुमान करके, लुइर् ग्टप् ने अंततः नैशनल असेंबली को मान्यता दे दी और यह भी मान लिया कि उसकी सत्ता पर अब से संविधान का अंवुफश होगा। 4 अगस्त, 1789 की रात को असेंबली ने करों, कत्तर्व्यों और बंधनों वाली सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया। पादरी वगर् के लोगों को भी अपने विशेषािाकारों को छोड़ देने के लिए विवश किया गया। धामिर्क कर समाप्त कर दिया गया और चचर् के स्वामित्व वाली भूमि शब्त कर ली गइर्। इस प्रकार कम से कम 20 अरब लिवे्र की संपिा सरकार के हाथ में आ गइर्। चित्रा 6 - भय की लहर का प्रसार मानचित्रा से पता चलता है कि किस तरह किसानों के जत्थे एक जगह से दूसरी जगह पैफलते चले गए। 2.1 प़्रफांस संवैधानिक राजतंत्रा बन गया नैशनल असेंबली ने सन् 1791 में संविधान का प्रारूप पूरा कर लिया। इसका मुख्य उद्देश्य था - - सम्राट की शक्ितयों को सीमित करना। एक व्यक्ित के हाथ में वेंफद्रीकृत होने के बजाय अब इन शक्ितयों को विभ्िान्न संस्थाओं - विधायिका, कायर्पालिका एवं न्यायपालिका - में विभाजित एवं हस्तांतरित कर दिया गया। इस प्रकार प़फांस में संवैधानिक राजतंत्रा की नींव पड़ी। चित्रा 7 दिखाता है कि ्रनयी राजनीतिक व्यवस्था वैफसे काम करती थी। संविधान ‘पुरुष एवं नागरिक अिाकार घोषणापत्रा’ के साथ शुरू हुआ था। जीवन के अिाकार, अभ्िाव्यक्ित की स्वतंत्राता के अिाकार और कानूनी बराबरी के अिाकार को ‘नैसगिर्क एवं अहरणीय’ अिाकार के रूप में स्थापित किया गया अथार्त् ये अिाकार प्रत्येक व्यक्ित को जन्मना प्राप्त थे और इन अिाकारों को छीना नहीं जा सकता। राज्य का यह कत्तर्व्य माना गया कि वह प्रत्येक नागरिक के नैसगिर्क अिाकारों की रक्षा करे। ड्डोत ख क्रांतिकारी पत्राकार श्याँ - पाॅल मरा ;श्रमंद.च्ंनस डंतंजद्ध ने अपने अखबार लामि द पप्ल ;जनता का मित्राद्ध में नैशनल असेंबली द्वारा तैयार किए गए संविधान पर यह टिप्पणी की थीः ‘जनता के प्रतिनििात्व का कायर्भार अमीरों को सौंप दिया गया है ... गरीबों और शोष्िातों की दशा केवल शांतिपूणर् तरीकों से कभी नहीं सुधर सकती। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि धनाढ्य वगर् कानून को वैफसे प्रभावित करता है। पिफर भी ये कानून तभी तक चलेंगे जब तक लोग इन्हें मानेंगे। जिस तरह उन्होंने वुफलीनों द्वारा लादे गए जुए को उतार पेंफका है एक दिन वही हश्र अमीरों का करेंगे।’ समाचारपत्रा लामि द पप्ल से उ(ृत। चित्रा 8 - ‘पुरुष एवं नागरिक अिाकार घोषणापत्रा’ का 1790 में ले बाबिर्ये द्वारा बनाया गया चित्रा। दायीं ओर की आकृति प़्रफांस को और बायीं ओर की कानून को निरूपित करती है। ड्डोत ग पुरुष एवं नागरिक अिाकार घोषणापत्रा 1 आदमी स्वतंत्रा पैदा होते हैं, स्वतंत्रा रहते हैं और उनके अिाकार समान होते हैं। 2 हरेक राजनीतिक संगठन का लक्ष्य आदमी के नैसगिर्क एवं अहरणीय अिाकारों को संरक्ष्िात रखना है। ये अिाकार हैं - स्वतंत्राता, सम्पिा, सुरक्षा एवं शोषण के प्रतिरोध का अिाकार। 3 समग्र संप्रभुता का ड्डोत राज्य में निहित हैऋ कोइर् भी समूह या व्यक्ित ऐसा अनािाकार प्रयोग नहीं करेगा जिसे जनता की सत्ता की स्वीकृति न मिली हो। 4 स्वतंत्राता का आशय ऐसे काम करने की शक्ित से है जो औरों के लिए नुकसानदेह न हो। 5 समाज के लिए किसी भी हानिकारक कृत्य पर पाबंदी लगाने का अिाकार कानून के पास है। 6 कानून सामान्य इच्छा की अभ्िाव्यक्ित है। सभी नागरिकों को व्यक्ितगत रूप से या अपने प्रतिनििायों के माध्यम से इसके निमार्ण में भाग लेने का अिाकार है। कानून की नशर में सभी नागरिक समान हैं। 7 कानूनसम्मत प्रिया के बाहर किसी भी व्यक्ित को न तो दोषी ठहराया जा सकता है और न ही गिरफ्ऱतार अथवा नशरबंद किया जा सकता है। 11.प्रत्येक नागरिक बोलने, लिखने और छापने के लिए आशाद है। लेकिन कानून द्वारा निधार्रित प्रिया के तहत ऐसी स्वतंत्राता के दुरुपयोग की िाम्मेदारी भी उसी की होगी। 12.सावर्जनिक सेना तथा प्रशासन के खचेर् चलाने के लिए एक सामान्य कर लगाना अपरिहायर् है। सभी नागरिकों पर उनकी आय के अनुसार समान रूप से कर लगाया जाना चाहिए। 17.चूँकि संपिा का अिाकार एक पावन एवं अनुलंघनीय अिाकार है, अतः किसी भी व्यक्ित को इससे वंचित नहीं किया जा सकता है, जब तक कि वििा द्वारा स्थापित प्रिया के तहत सावर्जनिक आवश्यकता के लिए संपिा का अिाग्रहण करना आवश्यक न हो। ऐसे मामले में अगि्रम मुआवशा शरूर दिया जाना चाहिए। बाॅक्स 1 राजनीतिक प्रतीकों के मायने अठारहवीं सदी में श्यादातर स्त्राी - पुरुष पढ़े - लिखे नहीं थे। इसलिए महत्त्वपूणर् विचारों का प्रचार करने के लिए छपे हुए शब्दों के बजाय अकसर आकृतियों एवं प्रतीकों का प्रयोग किया जाता था। ले बाबिर्ये ने अपनी पेंटिंग ;चित्रा 8द्ध में अिाकारों के घोषणापत्रा को लोगों तक पहुँचाने के लिए अनेक प्रतीकों का प्रयोग किया। आइए, इन प्रतीकों को समझने की कोश्िाश करें। टूटी हुइर् शंजीर: दासों को बाँधने के लिए शंजीरों का प्रयोग होता था। टूटी हुइर् हथकड़ी उनकी आशादी का प्रतीक है। छड़ों का बछीर्दार गऋर: अकेली छड़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है पर पूरे गऋर को नहीं। एकता में ही बल है। त्रिाभुज के अंदर रोशनी बिखेरती आँख: सवर्दशीर् आँख ज्ञान का प्रतीक है। सूयर् की किरणें अज्ञान रूपी अंधेरे को मिटा देंगी। राजदंड: शाही सत्ता का प्रतीक। अपनी पूँछ मुँह में लिए साँप: सनातनता का प्रतीक। अँगूठी का कोइर् ओर - छोर नहीं होता। लाल Úाइजियन टोपी: दासों द्वारा स्वतंत्रा होने के बाद पहनी जाने वाली टोपी। फद - लाल: प़फांस के ्रमानवीय रूप। वििा पट: कानून सबके लिए समान है और उसकी नशर में सब बराबर हैं। ियाकलाप 1.बाॅक्स 1 में स्वतंत्राता, समानता एवं बंधुत्व के प्रतीकों की पहचान करें। 2.ले बाबिर्ये के ‘पुरुष एवं नागरिक अिाकार घोषणापत्रा’ ;चित्रा 8द्ध में चित्रिात प्रतीकों की व्याख्या करें। 3.1791 के संविधान में नागरिकों को दिए गए राजनीतिक अिाकारों के घोषणापत्रा ;ड्डोत गद्ध के अनुच्छेद 1 एवं 6 में दिए गए अिाकारों से तुलना करें। क्या दोनों दस्तावेश एक - दूसरे के अनुरूप हैं? क्या दोनों दस्तावेशों से एक ही विचार का बोध होता है? 4.1791 के संविधान से प़फांसीसी समाज के कौन - से ्रसमूह लाभान्िवत हुए होते? किन समूहों को इससे असंतोष हो सकता था? मरा ने भविष्य के बारे में कौन - से पूवार्नुमान ;ड्डोत खद्ध लगाए थे? 5.प़्रफांस की घटनाओं से निरंवुफश राजतंत्रा वाले प्रशा, आॅस्िट्रया, हंगरी या स्पेन आदि देशों पर पड़ने वाले प्रभावों की कल्पना कीजिए। पफांस में हो रही ़्रघटनाओं की खबरों पर राजाओं, व्यापारियों, किसानों, वुफलीनों एवं पादरियों ने वैफसी प्रतििया दी होगी? प़्रफांस में राजतंत्रा का उन्मूलन और गणतंत्रा की स्थापना प़्रफांस की स्िथति आने वाले वषो± में भी तनावपूणर् बनी रही। यद्यपि लुइर् ग्टप् ने संविधान पर हस्ताक्षर कर दिए थे, परन्तु प्रशा के राजा से उसकी गुप्त वातार् भी चल रही थी। प़्रफांस की घटनाओं से अन्य पड़ोसी देशों के शासक भी चिंतित थे। इसलिए 1789 की गमिर्यों के बाद होने वाली ऐसी घटनाओं को नियंत्रिात करने के लिए इन शासकों ने सेना भेजने की योजना बना ली थी। लेकिन जब तक इस योजना पर अमल होता, अप्रैल 1792 में नैशनल असेंबली ने प्रशा एवं आॅस्िट्रया के विरु( यु( की घोषणा का प्रस्ताव पारित कर दिया। प्रांतों से हशारों स्वयंसेवी सेना में भतीर् होने के लिए जमा होने लगे। उन्होंने इस यु( को यूरोपीय राजाओं एवं वुफलीनों के विरु( जनता की जंग के रूप में लिया। उनके होठों पर देशभक्ित के जो तराने थे उनमें कवि राॅजेट दि लाइल द्वारा रचित मासिर्ले भी था। यह गीत पहली बार मासिर्लेस के स्वयंसेवियों ने पेरिस की ओर वूफच करते हुए गाया था। इसलिए इस गाने का नाम मासिर्ले हो गया जो अब प़्रफांस का राष्ट्रगान है। क्रांतिकारी यु(ों से जनता को भारी क्षति एवं आथ्िार्क कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं। पुरुषों के मोचेर् पर चले जाने के बाद घर - परिवार और रोशी - रोटी की िाम्मेवारी औरतों के कंधों पर आ पड़ी। देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को ऐसा लगता था कि क्रांति के सिलसिले को आगे बढ़ाने की शरूरत है क्योंकि 1791 के संविधान से सिप़्ार्फ अमीरों को ही राजनीतिक अिाकार प्राप्त हुए थे। लोग राजनीतिक क्लबों में अंे जमा कर सरकारी नीतियों और अपनी कायर्योजना पर बहस करते थे। इनमें से जैकोबिन क्लब सबसे सपफल था, जिसका नाम पेरिस के भूतपूवर् काॅन्वेंट आॅपफ सेंट जेकब के नाम पर पड़ा, जो़अब इस राजनीतिक समूह का अंा बन गया था। इस पूरी अविा में महिलाएँ भी सिय थीं और उन्होंने भी अपने क्लब बना लिए। इस अध्याय के खण्ड 4 में आप उनकी गतिवििायों एवं माँगों के बारे में और जानेंगे। जैकोबिन क्लब के सदस्य मुख्यतः समाज के कम समृ( हिस्से से आते थे। इनमें छोटे दुकानदार और कारीगर - - जैसे जूता बनाने वाले, पेस्ट्री बनाने वाले, घड़ीसाश, छपाइर् करने वाले और नौकर व दिहाड़ी मशदूर शामिल थे। उनका नेता मैक्समिलियन रोबेस्प्येर था। जैकोबिनों के एक बड़े वगर् ने गोदी कामगारों की तरह धारीदार लंबी पतलून पहनने का निणर्य किया। ऐसा उन्होंने समाज के पैफशनपरस्त वगर्, खासतौर से घुटने तक पहने जाने वाले ब्रीचेस़;घुटन्नाद्ध पहनने वाले वुफलीनों से खुद को अलग करने के लिए किया। यह ब्रीचेस पहनने वाले वुफलीनों की सत्ता समाप्ित के एलान का उनका तरीका था। नए शब्द काॅन्वेंट: धामिर्क जीवन को समपिर्त समूह की इमारत। यह किसी महिला कलाकार द्वारा रचित दुलर्भ चित्रों में से एक है। क्रांतिकारी घटनाक्रम के बाद महिलाओं के लिए यह संभव हो गया कि वे स्थापित चित्राकारों के साथ प्रश्िाक्षण प्राप्त कर सवेंफ और हर दो साल में लगने वाली सैलाॅन नामक नुमाइश में अपने चित्रों को प्रदश्िार्त कर सवेंफ। यह तस्वीर स्वतंत्राता का नारी रूपक है अथार्त् नारी - आकृति स्वतंत्राता का प्रतीक है। ियाकलाप इस चित्रा को ध्यान से देखें और उन वस्तुओं की सूची बनाएँ जिन्हें आपने राजनीतिक प्रतीकों के रूप में बाॅक्स 1 में देखा है ;लाल टोपी, टूटी हुइर् शंजीर, छड़ों का बछीर्दार गऋर, अिाकारों का घोषणापत्राद्ध। पिरामिड समानता का प्रतीक है जिसे अकसर एक त्रिाभुज के रूप में दिखाया जाता था। इन प्रतीकों की सहायता से इस चित्रा की व्याख्या करें। स्वतंत्राता की प्रतिमूतिर् इस महिला मूतिर् के बारे में आपके क्या विचार हैं। इसलिए जैकोबिनों को ‘सौं वुफलाॅत’ के नाम से जाना गया जिसका शाब्िदक अथर् होता है - बिना घुटन्ने वाले। सौं वुफलाॅत पुरुष लाल रंग की टोपी भी पहनते थे जो स्वतंत्राता का प्रतीक थी। लेकिन महिलाओं को ऐसा करने की अनुमति नहीं थी। सन् 1792 की गमिर्यों में जैकोबिनों ने खाद्य पदाथो± की महँगाइर् एवं अभाव से नाराश पेरिसवासियों को लेकर एक विशाल हिंसक विद्रोह की योजना बनायी। 10 अगस्त की सुबह उन्होंने ट्यूलेरिए के महल पर धावा बोल दिया, राजा के रक्षकों को मार डाला और खुद राजा को कइर् घंटों तक बंधक बनाये रखा। बाद में असेंबली ने शाही परिवार को जेल में डाल देने का प्रस्ताव पारित किया। नये चुनाव कराये गए। 21 वषर् से अिाक उम्र वाले सभी पुरुषों - चाहे उनके पास संपिा हो या नहीं - को मतदान का अिाकार दिया गया। नवनिवार्चित असेंबली को कन्वेंशन का नाम दिया गया। 21 सितंबर 1792 को इसने राजतंत्रा का अंत कर दिया और प़्रफांस को एक गणतंत्रा घोष्िात किया। जैसा कि आप जानते हैं, गणतंत्रा सरकार का वह रूप है जहाँ सरकार एवं उसके प्रमुख का चुनाव जनता करती है। यह वंशानुगत राजशाही नहीं है। आप वुफछ अन्य गणतांत्रिाक देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोश्िाश करें और देखें कि वे कब और वैफसे गणतंत्रा बने। लुइर् ग्टप् को न्यायालय द्वारा देशद्रोह के आरोप में मौत की सशा सुना दी गइर्। 21 जनवरी 1793 को प्लेस डी लाॅ काॅन्काॅडर् में उसे सावर्जनिक रूप से पफाँसी दे दी गइर्। जल्द ही रानी मेरी एन्तोएनेत का भी वही हश्र हुआ। 3.1 आतंक राज सन् 1793 से 1794 तक के काल को आतंक का युग कहा जाता है। रोबेस्प्येर ने नियंत्राण एवं दंड की सख्त नीति अपनाइर्। उसके हिसाब से गणतंत्रा के जो भी शत्राु थे - वुफलीन एवं पादरी, अन्य राजनीतिक दलों के सदस्य, उसकी कायर्शैली से असहमति रखने वाले पाटीर् सदस्य - उन सभी को गिरफ्ऱतार कर जेल में डाल दिया गया और एक क्रांतिकारी न्यायालय द्वारा उन पर मुकदमा चलाया गया। यदि न्यायालय उन्हें ‘दोषी’ पाता तो गिलोटिन पर चढ़ाकर उनका सिर कलम कर दिया जाता था। गिलोटिन दो खंभों के बीच लटकते आरे वाली मशीन था जिस पर रख कर अपराधी का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता था। इस मशीन का नाम इसके आविष्कारक डाॅ. गिलोटिन के नाम पर पड़ा। रोबेस्प्येर सरकार ने कानून बना कर मशदूरी एवं कीमतों की अिाकतम सीमा तय कर दी। गोश्त एवं पावरोटी की राशनिंग कर दी गइर्। किसानों को अपना अनाज शहरों में ले जाकर सरकार द्वारा तय कीमत पर बेचने के लिए बाध्य किया गया। अपेक्षाकृत महँगे सप़्ोफद आटे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गइर्। सभी नागरिकों के लिए साबुत गेहूँ से बनी और बराबरी का प्रतीक मानी जाने वाली, ‘समता रोटी’ खाना अनिवायर् कर दिया गया। बोलचाल और संबोधन में भी बराबरी का आचार - व्यवहार लागू करने की कोश्िाश की गइर्। परंपरागत माॅन्स्यूर ;महाशयद्ध एवं मदाम ;महोदयाद्ध के स्थान पर अब सभी प़्ा्रफांसीसी पुरुषों एवं महिलाओं को सितोयेन ;नागरिकद्ध एवं सितोयीन नए शब्द देशद्रोह: अपने देश या सरकार से विश्वासघात करना। ड्डोत घ स्वतंत्राता ;लिबटीर्द्ध क्या है ? दो परस्पर विरोधी विचार: क्रांतिकारी पत्राकार वैफमिल डेस्माॅलिन्स ने सन् 1793 में यह लिखा। इसके वुफछ ही दिनों बाद आतंक राज के दौरान उसे पफाँसी दे दी गईं ‘वुफछ लोगों का मानना है कि स्वतंत्राता एक श्िाशु के समान है जिसे परिपक्व होने तक अनुशासन की अवस्था से गुशरना आवश्यक है। पर सत्य वुफछ और है। स्वतंत्राता सुख - शांति है, विवेक है, समानता एवं न्याय है, यह अिाकारों का घोषणापत्रा है...। आप शायद अपने सभी दुश्मनों का सिर काट देना चाहते हैं। क्या इससे बड़ी मूखर्ता हो सकती है? क्या किसी एक व्यक्ित को, उसके दसियों सगे - संबंिायों को दुश्मन बनाये बिना पफाँसी के तख्ते तक लाना संभव है? ़;नागरिकाद्ध नाम से संबोिात किया जाने लगा। चचो± को बंद कर दिया गया और उनके भवनों को बैरक या दफ्ऱतर बना दिया गया। रोबेस्प्येर ने अपनी नीतियों को इतनी सख्ती से लागू किया कि उसके समथर्क भी त्राहि - त्राहि करने लगे। अंततः जुलाइर् 1794 में न्यायालय द्वारा उसे दोषी ठहराया गया और गिरफ्ऱतार करके अगले ही दिन उसे गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया। ियाकलाप डेस्माॅलिन्स और रोबेस्प्येर के विचारों की तुलना करें। राज्य - शक्ित के प्रयोग से दोनों का क्या तात्पयर् है? ‘निरंवुफशता के विरु( स्वतंत्राता की लड़ाइर्’ से रोबेस्प्येर का क्या मतलब है? डेस्माॅलिन्स स्वतंत्राता को वैफसे देखता है? एक बार पिफर ड्डोत ग देखें। व्यक्ितगत अिाकारों के बारे में संविधान में कौन - से प्रावधान थे? इस विषय पर अपनी कक्षा में चचार् करें। 7 पफरवरी 1794 को रोबेस्प्येर ने कन्वेंशन में भाषण दिया जो ल मोनीतेर यूनिवसेर्ल अखबार में छपा। उसी भाषण का एक अंश: ‘लोकतंत्रा को स्थापित और सुदृढ़ करने के लिए, संविधान सम्मत शांतिपूणर् शासन के लिए हमें सबसे पहले अत्याचारी निरंवुफशता के विरु( स्वतंत्राता की लड़ाइर् को अंतिम परिणति तक पहुँचाना होगा... गणतंत्रा के घरेलू एवं बाहरी दुश्मनों का विनाश करना आवश्यक है अन्यथा हम खुद नष्ट हो जाएँगे। क्रांति के दौर में लोकतांत्रिाक सरकार आतंक का सहारा ले सकती है। आतंक बस कठोर, तुरंता और अनम्य न्याय है... जिसका प्रयोग पितृभूमि की अत्यावश्यक शरूरतों को पूरा करने के लिए किया ही जाएगा। आतंक के शरिए स्वतंत्राता के दुश्मनों पर अंवुफश लगाना गणतंत्रा के संस्थापक का अिाकार है।’ 3.2 डिरेक्ट्री शासित प़्रफांस जैकोबिन सरकार के पतन के बाद मध्य वगर् के संपन्न तबके के पास सत्ता आ गइर्। नए संविधान के तहत सम्पिाहीन तबके को मतािाकार से वंचित कर दिया गया। इस संविधान में दो चुनी गइर् विधान परिषदों का प्रावधान था। इन परिषदों ने पाँच सदस्यों वाली एक कायर्पालिका - डिरेक्ट्री - को नियुक्त किया। इस प्रावधान के शरिए जैकोबिनों के शासनकाल वाली एक व्यक्ित - वेंफदि्रत कायर्पालिका से बचने की कोश्िाश की गइर्। लेकिन, डिरेक्टरों का झगड़ा अकसर विधान परिषद्ों से होता और तब परिषद् उन्हें बखार्स्त करने की चेष्टा करती। डिरेक्ट्री की राजनीतिक अस्िथरता ने सैनिक तानाशाह - नेपोलियन बोनापाटर् - के उदय का मागर् प्रशस्त कर दिया। सरकार के स्वरूप में इन सभी परिवतर्नों के दौरान स्वतंत्राता, वििासम्मत समानता और बंधुत्व प्रेरक आदशर् बने रहे। इन मूल्यों ने आगामी सदी में न सिप़्ार्फ प़्रफांस बल्िक बाकी यूरोप के राजनीतिक आंदोलनों को भी प्रेरित किया। ियाकलाप यहाँ चित्रिात जनसमूह, उनकी वेशभूषा, भूमिका एवं ियाकलाप का वणर्न करें। इस चित्रा से क्रांतिकारी उत्सव की वैफसी छवि बनती है? क्या महिलाओं के लिए भी क्रांति हुइर्? चित्रा 12 - वसार्य की ओर वूफच करती पेरिस की औरतेंयह चित्रा 5 अक्टूबर 1789 की घटनाओं के कइर् चित्रों में से एक है। उस दिन महिलाएँ पेरिस से वसार्य जाकर राजा को अपने साथ लेकर लौटी थीं। महिलाएँ शुरू से ही प़्रफासीसी समाज में इतने अहम परिवतर्न लाने वाली गतिवििायों में सिय रूप से शामिल थीं। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी भागीदारी क्रांतिकारी सरकार को उनका जीवन सुधारने हेतु ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगी। तीसरे एस्टेट की अिाकांश महिलाएँ जीविका निवार्ह के लिए काम करती थीं। वे सिलाइर् - बुनाइर्, कपड़ों की धुलाइर् करती थीं, बाशारों में पफल - पूँंफल - सब्िशया बेचती थीं अथवा सपन्न घरों में घरेलू काम करती थीं। बहुत सारी महिलाएँ वेश्यावृिा करती थीं। अिाकांश महिलाओं के पास पढ़ाइर् - लिखाइर् तथा व्यावसायिक प्रश्िाक्षण के मौके नहीं थे। केवल वुफलीनों की लड़कियाँ अथवा तीसरे एस्टेट के धनी परिवारों की लड़कियाँ ही काॅन्वेंट में पढ़ पाती थीं, इसके बाद उनकी शादी कर दी जाती थी। कामकाजी महिलाओं को अपने परिवार का पालन - पोषण भी करना पड़ता था - - जैसे खाना पकाना, पानी लाना, लाइन लगा कर पावरोटी लाना और बच्चों की देख - रेख आदि करना। उनकी मशदूरी पुरुषों की तुलना में कम थी। महिलाओं ने अपने हितों की हिमायत करने और उन पर चचार् करने के लिए खुद के राजनीतिक क्लब शुरू किए और अखबार निकाले। प़्ा्रफांस के विभ्िान्न नगरों में महिलाओं के लगभग 60 क्लब अस्ितत्व में आए। उनमें ियाकलाप चित्रा 12 में अंकित औरतों, उनवफी ियाओं, उनके हाव - भाव एवं उनके हाथ की वस्तुओं का विवरण दें। गौर से देखें कि क्या वे सभी एक ही सामाजिक वगर् की लगती हैं? चित्राकार ने इस आकृति में किन प्रतीकों को शामिल किया है? इन प्रतीकों के क्या मायने हैं? क्या महिलाओं को देखकर लगता है कि वे सावर्जनिक रूप से वही कर रही हैं जिसकी उनसे उम्मीद की जाती थी? आप क्या सोचते हैं: चित्राकार महिलाओं के साथ है या उनके विरोध में खड़ा है? कक्षा में अपनी राय पर विचार - विमशर् कीजिए। ‘द सोसाइटी आॅप़्ाफ रेवलूशनरी एंड रिपब्िलकन विमेन’ सबसे मशहूर क्लब था। उनकी एक प्रमुख माँग यह थी कि महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अिाकार प्राप्त होने चाहिए। महिलाएँ इस बात से निराश हुईं कि 1791 के संविधान में उन्हें निष्िक्रय नागरिक का दजार् दिया गया था। महिलाओं ने मतािाकार, असेंबली के लिए चुने जाने तथा राजनीतिक पदों की माँग रखी। उनका मानना था कि तभी नइर् सरकार में उनके हितों का प्रतिनििात्व हो पाएगा। प्रारंभ्िाक वषो± में क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार लाने वाले वुफछ कानून लागू किए। सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी लड़कियों के लिए स्वूफली श्िाक्षा को अनिवायर् बना दिया गया। अब पिता उन्हें उनकी मशीर् के ख्िालापफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे। ़शादी को स्वैच्िछक अनुबंध माना गया और नागरिक कानूनों के तहत उनका पंजीकरण किया जाने लगा। तलाक को कानूनी रूप दे दिया गया और मदर् - औरत दोनों को ही इसकी अशीर् देने का अिाकार दिया गया। अब महिलाएँ व्यावसायिक प्रश्िाक्षण ले सकती थीं, कलाकार बन सकती थीं और छोटे - मोटे व्यवसाय चला सकती थीं। पिफर भी, राजनीतिक अिाकारों के लिए महिलाओं का संघषर् जारी रहा। आतंक राज के दौरान सरकार ने महिला क्लबों को बंद करने और उनकी राजनीतिक गतिवििायों पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लागू किया। कइर् जानी - मानी महिलाओं को गिरफ्ऱतार कर लिया गया और उनमें से वुफछ को पफाँसी पर चढ़ा दिया गया। मतािाकार और समान वेतन के लिए महिलाओं का आंदोलन अगली सदी में भी अनेक देशों में चलता रहा। मतािाकार का संघषर् उन्नीसवीं सदी के अंत एवं बीसवीं सदी के प्रारंभ तक अंतरार्ष्ट्रीय मतािाकार आंदोलन के शरिए जारी रहा। क्रांतिकारी आंदोलन के दौरान प़्रफांसीसी महिलाओं की राजनीतिक सरगमिर्यों को प्रेरक स्मृति के रूप में ¯शदा रखा गया। अंततः सन् 1946 में प़्रफांस की महिलाओं ने मतािाकार हासिल कर लिया। ड्डोत च ड्डोत छ ओलम्प दे गूश के घोषणापत्रा में उल्िलख्िात वुफछ मूलभूत अिाकार 1.औरत जन्मना स्वतंत्रा है और अिाकारों में पुरुष के समान है। 2.सभी राजनीतिक संगठनों का लक्ष्य पुरुष एवं महिला के नैसगिर्क अिाकारों को संरक्ष्िात करना है। ये अिाकार हैं - स्वतंत्राता, संपिा, सुरक्षा और सबसे बढ़कर शोषण के प्रतिरोध का अिाकार। 3.समग्र संप्रभुता का ड्डोत राष्ट्र में निहित है जो पुरुषों एवं महिलाओं के संघ के सिवाय वुफछ नहीं है। 4.कानून सामान्य इच्छा की अभ्िाव्यक्ित होनी चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिकों का या तो व्यक्ितगत रूप से या अपने प्रतिनििायों के माध्यम से वििा - निमार्ण में दखल होना चाहिए। यह सभी के लिए समान होना चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिक अपनी योग्यता एवं प्रतिभा के बल पर समान रूप से एवं बिना किसी भेदभाव के हर तरह के सम्मान व सावर्जनिक पद के हकदार हैं। 5.कोइर् भी महिला अपवाद नहीं है। वह वििासम्मत प्रिया द्वारा अपराधी ठहरायी जा सकती है, गिरफ्ऱतार और नशरबंद की जा सकती है। पुरुषों की तरह महिलाएँ भी इस कठोर कानून का पालन करें। ियाकलाप ओलम्प दे गूश द्वारा तैयार किए गए घोषणापत्रा ;ड्डोत छद्ध तथा ‘पुरुष एवं नागरिक अिाकार घोषणापत्रा’ ;ड्डोत गद्ध की तुलना करें। ड्डोत ज सन् 1793 में जैकोबिन राजनीतिज्ञ शोमेत ने इन आधारों पर महिला क्लबों को बंद करने के निणर्य को उचित ठहराया: ‘क्या प्रकृति ने घरेलू कायर् पुरुषों को सौंपा है? क्या प्रकृति ने बच्चों को दूध पिलाने के लिए हमें स्तन दिए हैं? नहीं। प्रकृति ने पुरुष से कहा: पुरुष बनो। श्िाकार, कृष्िा, राजनीतिक कत्तर्व्य ... यह तुम्हारा साम्राज्य है। प्रकृति ने महिला से कहा: स्त्राी बनो ... गृहस्थी के काम, मातृत्व के सुखद दायित्व ियाकलाप कल्पना करें कि आप चित्रा 13 की कोइर् महिला हैं और शोमेत ;ड्डोत जद्ध के तको± का जवाब दें। - यही तुम्हारे कायर् हैं। पुरुष बनने की इच्छा रखने वाली महिलाएँ निलर्ज्ज हैं। क्या िाम्मेदारियों का उचित बँटवारा हो नहीं चुका है?’ दास - प्रथा का उन्मूलन प़्ा्रफांसीसी उपनिवेशों में दास - प्रथा का उन्मूलन जैकोबिन शासन के क्रांतिकारी सामाजिक सुधारों में से एक था। वैफरिबिआइर् उपनिवेश - - माटिर्निक, गाॅडेलोप और सैन डोमिंगों - - तम्बावूफ, नील, चीनी एवं काॅपफी जैसी वस्तुओं वेफ़महत्त्वपूणर् आपूतिर्कतार् थे। अपरिचित एवं दूर देश जाने और काम करने के प्रति यूरोपियों की अनिच्छा का मतलब था - - बागानों में श्रम की कमी। इस कमी को यूरोप, अप़फीका एवं अमेरिका के बीच त्रिाकोणीय दास - व्यापार द्वारा्रपूरा किया गया। दास - व्यापार सत्राहवीं शताब्दी में शुरू हुआ। प़्ा्रफांसीसी सौदागर बोदेर् या नान्ते बन्दरगाह से अप़्रफीका तट पर जहाश ले जाते थे, जहाँ वे स्थानीय सरदारों से दास खरीदते थे। दासों को दाग कर एवं हथकडि़याँ डाल कर अटलांटिक महासागर के पार वैफरिबिआइर् देशों तक तीन माह की लंबी समुद्री - यात्रा के लिए जहाशों में ठूँस दिया जाता था। वहाँ उन्हें बागान - मालिकों को बेच दिया जाता था। दास - श्रम के बल पर यूरोपीय बाशारों में चीनी, काॅप़फी एवं नील की बढ़ती माँग को पूरा करना संभव हुआ। बोदेर् और नान्ते जैसे बंदरगाह पफलते - पूफलते दास - व्यापार के कारण ही समृ( नगर बन गए। अठारहवीं सदी में प़्रफांस में दास - प्रथा की ज्यादा निंदा नहीं हुइर्। नैशनल असेंबली में लंबी बहस हुइर् कि व्यक्ित के मूलभूत अिाकार उपनिवेशों में रहने वाली प्रजा सहित समस्त प़्रफांसीसी प्रजा को प्रदान किए जाएँ या नहीं। परन्तु दास - व्यापार पर निभर्र व्यापारियों के विरोध के भय से नैशनल असेंबली में कोइर् कानून पारित नहीं किया गया। लेकिन अंततः सन् 1794 के कन्वेंशन ने प़्रफांसीसी उपनिवेशों में सभी दासों की मुक्ित का कानून पारित कर दिया। पर यह कानून एक छोटी - सी अविा तक ही लागू रहा। दस वषर् बाद नेपोलियन ने दास - प्रथा पुनः शुरू कर दी। बागान - मालिकों को अपने आथ्िार्क हित साधने के लिए अप़्रफीकी नीग्रो लोगों को गुलाम बनाने की स्वतंत्राता मिल गयी। प़्रफांसीसी उपनिवेशों से अंतिम रूप से दास - प्रथा का उन्मूलन 1848 में किया गया। सन् 1794 के इस चित्रा में दासों की मुक्ित का विवरण है। शीषर् पर तिरंगे बैनर का नारा है - ‘मनुष्य के अिाकार’। नीचे अभ्िालेख कहता है - ‘गुलामों की मुक्ित’। एक प़फांसीसी महिला अप्ऱफीकी एवं्रअमेरिकी - इंडियन दासों को यूरोपीय कपड़े देकर उन्हें ‘सभ्य’ बनाने की चेष्टा कर रही है। नए शब्द नीग्रो: अप़्रफीका में सहारा रेगिस्तान के दक्ष्िाण में रहने वाले स्थानीय लोग। यह अपमानजनक शब्द है, जिसका अब प्रायः इस्तेमाल नहीं किया जाता। क्रांति और रोशाना की िांदगी क्या राजनीति लोगों का पहनावा, उनकी बोलचाल अथवा उनके द्वारा पढ़ी जानेवाली पुस्तकों को बदल सकती है? सन् 1789 से बाद के वषो± में प़फांस्रके पुरुषों, महिलाओं एवं बच्चों के जीवन में ऐसे अनेक परिवतर्न आए। क्रांतिकारी सरकारों ने कानून बना कर स्वतंत्राता एवं समानता के आदशो± को रोशाना की िांदगी में उतारने का प्रयास किया। बास्तील के विध्वंस के बाद सन् 1789 की गमिर्यों में जो सबसे महत्त्वपूणर् कानून अस्ितत्व में आया, वह था - सेंसरश्िाप की समाप्ित। प्राचीन राजतंत्रा के अंतगर्त तमाम लिख्िात सामग्री और सांस्कृतिक गतिवििायों - - किताब, अखबार, नाटक - - को राजा के सेंसर अिाकारियों द्वारा पास किए जाने के बाद ही प्रकाश्िात या मंचित किया जा सकता था। परंतु अब अिाकारों के घोषणापत्रा ने भाषण एवं अभ्िाव्यक्ित की स्वतंत्राता को नैसगिर्क अिाकार घोष्िात कर दिया। परिणामस्वरूप प़्रफांस के शहरों में अखबारों, पचो±, पुस्तकों एवं छपी हुइर् तस्वीरों की बाढ़ आ गइर् जहाँ से वह तेशी से गाँव - देहात तक जा पहुँची। उनमें प़्रफांस में घट रही घटनाओं एवं परिवतर्नों का ब्यौरा और उन पर टिप्पणी होती थी। प्रेस की स्वतंत्राता का मतलब यह था कि किसी भी घटना पर परस्पर विरोधी विचार भी व्यक्त किए जा सकते थे। पि्रंट माध्यम का उपयोग करके एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को अपने दृष्िटकोण से सहमत कराने की कोश्िाश की। नाटक, संगीत और उत्सवी जुलूसों में असंख्य लोग जाने लगे। स्वतंत्राता और न्याय के बारे में राजनीतिज्ञों व दाशर्निकों के पांडित्यपूणर् लेखन को समझने और उससे जुड़ने का यह लोकपि्रय तरीका था क्योंकि किताबों को पढ़ना तो मुट्ठी भर श्िाक्ष्िातों के लिए ही संभव था। ियाकलाप इस चित्रा का अपने शब्दों में वणर्न करें। चित्राकार ने लोभ, समानता, न्याय, राज्य द्वारा चचर् की सम्पिा का अिाग्रहण आदि विचारों को संप्रेष्िात करने के लिए किन प्रतीकों का सहारा लिया है? अज्ञात चित्राकार द्वारा बनाया गया 1790 का यह चित्रा न्याय के विचार को व्यवहार में बदलना चाहता है। चित्रा 16 - मरा जनता को संबोिात करते हुए। लुइर् लियोपोल्ड बाॅइली रचित चित्रा इस अध्याय से मरा के बारे में आपको क्या याद है? उसके इदर् - गिदर् मौजूद दृश्य का वणर्न कीजिए तथा उसकी लोकपि्रयता के बारे में समझाइए। किसी सैलाॅन में आने वाले विभ्िान्न वगर् के लोगों पर इस पेंटिंग की क्या प्रतििया होती होगी? सारांश 1804 में नेपोलियन बोनापाटर् ने खुद को प़्रफांस का सम्राट घोष्िात कर दिया। उसने पड़ोस के यूरोपीय देशों की विजय यात्रा शुरू की। पुराने राजवंशों को हटा कर उसने नए साम्राज्य बनाए और उनकी बागडोर अपने खानदान के लोगों के हाथ में दे दी। नेपोलियन खुद को यूरोप के आधुनिकीकरण का अग्रदूत मानता था। उसने निजी संपिा की सुरक्षा के कानून बनाए और दशमलव प(ति पर आधारित नाप - तौल की एक समान प्रणाली चलायी। शुरू - शुरू में बहुत सारे लोगों को नेपालियन मुक्ितदाता लगता था और उससे जनता को स्वतंत्राता दिलाने की उम्मीद थी। पर जल्दी ही उसकी सेनाओं को लोग हमलावर मानने लगे। आख्िारकार 1815 में वाॅटरलू में उसकी हार हुइर्। यूरोप के बाकी हिस्सों में मुक्ित और आधुनिक कानूनों को पैफलाने वाले उसके क्रांतिकारी उपायों का असर उसकी मृत्यु के काप़्ाफी समय बाद सामने आया। चित्रा 17 - आल्प्स पार करता नेपोलियन। डेविड द्वारा बनाया गया चित्रा स्वतंत्राता और जनवादी अिाकारों के विचार प़्रफांसीसी क्रांति की सबसे महत्त्वपूणर् विरासत थे। ये विचार उन्नीसवीं सदी में प़्रफांस से निकल कर बाकी यूरोप में पैफले और इनके कारण वहाँ सामंती व्यवस्था का नाश हुआ। औपनिवेश्िाक समाजों ने संप्रभु राष्ट्र - राज्य की स्थापना के अपने आंदोलनों में दासता से मुक्ित के विचार को नयी परिभाषा दी। टीपू सुल्तान और राजा राममोहन राॅय क्रांतिकारी प़्रफांस में उपजे विचारों से प्रेरणा लेने वाले दो ठोस उदाहरण थे। बाॅक्स 2 राजा राममोहन राॅय उस समय यूरोप में पैफल रहे नए विचारों से प्रभावित होने वालों में से एक थे। प़्रफांसीसी क्रांति और बाद में जुलाइर् क्रांति ने उनकी कल्पना को नइर् धार दी। ‘प़्ा्रफांस में 1830 में हुइर् जुलाइर् क्रांति के बारे में जानने के बाद वह और किसी चीश के बारे में बात ही नहीं करते थे। हालाँकि एक दुघर्टना के कारण वे उन दिनों लंगड़ा कर चलते थे लेकिन इंग्लैंड जाते हुए केपटाउफन में वह िाद करने लगे कि उन्हें क्रांतिकारी तिरंगे झंडे वाले यु(पोत दिखाए जाएँ।’ सुशोभन सरकार, नोट्स आॅन द बंगाल रेनेसाँ, 1946। ियाकलाप प्रश्न

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