NEW size अध्याय 3 संविधान निर्माण परिचय पिछले अध्याय में हमने देखा कि लोकतंत्र में शासक लोग मनमानी करने के लिए आज़ाद नहीं हैं। कुछ बुनियादी नियम है जिनका पालन नागरिकों और सरकार, दोनों को करना होता है। ऐसे सभी नियमों का सम्मिलित रूप संविधान कहलाता है। देश का सर्वोच्च कानून होने की हैसियत से संविधान नागरिकों के अधिकार, सरकार की शक्ति और उसके कामकाज के तौर-तरीकों का निर्धारण करता है। | इस अध्याय में हम लोकतंत्र के संवैधानिक स्वरूप पर कुछ बुनियादी सवाल उठाएँगे। हमें संविधान की ज़रूरत क्यों होती है? संविधान बनते कैसे हैं? उन्हें कौन बनाता है और किस तरीके से बनाता है? किसी लोकतांत्रिक देश के संविधान को आकार देने वाले मूल्य कौन-कौन से हैं? एक बार संविधान बन जाने के बाद क्या हम बाद में बदलती स्थितियों के अनुरूप उसमें बदलाव कर सकते हैं? हाल के दिनों में संविधान बनाने का एक उदाहरण दक्षिण अफ्रीका का है। वहाँ क्या हुआ और दक्षिण अफ्रीकी लोगों ने किस तरह अपने संविधान निर्माण के काम को अंजाम दिया? हम इस अध्याय की शुरुआत में इसी अनुभव पर गौर करेंगे। इसके बाद हम भारतीय संविधान के निर्माण और इसके पीछे के मौलिक विचारों-मूल्यों की चर्चा करेंगे और देखेंगे कि यह किस तरह नागरिकों के जीवन और सरकार के अच्छे कामकाज के लिए बढ़िया ढाँचा उपलब्ध कराता है। 44 लोकतांत्रिक राजनीति 3.1 दक्षिण अफ्रीका में लोकतांत्रिक संविधान “मैंने गोरों के प्रभुत्व के खिलाफ़ संघर्ष किया है हथियारों और जोर-ज़बर्दस्ती से गुलाम बनाया और मैंने ही अश्वेतों के प्रभुत्व का विरोध किया है। जैसे भारत को। पर भारत से उलट काफ़ी बड़ी मैंने एक ऐसे लोकतांत्रिक और स्वतंत्र समाज की संख्या में गोरे लोग दक्षिण अफ्रीका में बस गए। कामना की है जिसमें सभी लोग पूरे मेल-जोल के और उन्होंने स्थानीय शासन को अपने हाथों में साथ रहें और सबको समान अवसर उपलब्ध हों। मैं ले लिया। रंगभेद की राजनीति ने लोगों को नेल्सन मंडेला इसी आदर्श के लिए जीवित रहना और इसे पाना उनकी चमड़ी के रंग के आधार पर बाँट दिया। चाहता हूँ और अगर ज़रूरत पड़ी तो इस आदर्श के दक्षिण अफ्रीका के स्थानीय लोगों की चमड़ी लिए मैं जान देने को भी तैयार हैं।'' का रंग काला होता है। आबादी में उनका हिस्सा यह नेल्सन मंडेला का कथन है जिन पर तीन-चौथाई है और उन्हें 'अश्वेत' कहा जाता दक्षिण अफ्रीका की गोरों की सरकार ने देशद्रोह था। श्वेत और अश्वेतों के अलावा वहाँ मिश्रित का मुकदमा चलाया था। उन्हें और सात अन्य नस्लों जिन्हें 'रंगीन' चमड़ी वाला कहा जाता था नेताओं को 1964 में देश में रंगभेद से चलने और भारत से गए लोग भी थे। गोरे शासक, वाली शासन व्यवस्था का विरोध करने के लिए गोरों के अलावा शेष सब को छोटा और नीचा आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। अगले मानते थे। इन्हें वोट डालने का अधिकार भी नहीं था। रंगभेद की शासकीय नीति अश्वेतों के लिए खास तौर से दमनकारी थी। उन्हें गोरों की बस्तियों में रहने–बसने की इजाजत नहीं थी। परमिट होने पर ही वे वहाँ जाकर काम कर सकते थे। रेल गाड़ी, बस, टैक्सी, होटल, अस्पताल, स्कूल और कॉलेज, पुस्तकालय, सिनेमाघर, नाट्यगृह, समुद्र तट, तरणताल और सार्वजनिक शौचालयों तक में गोरों और कालों के लिए एकदम अलग-अलग इंतजाम थे। इसे पृथक्करण या अलग-अलग करने रंगभेद वाले दौर (1953) का एक साइन बोर्ड जिससे तब 2 वर्षों तक उन्हें दक्षिण अफ्रीका की सबसे का इंतजाम कहा जाता था। काल लाग गारा क के तनावपूर्ण संबंधों का पता भयावह जेल, रोब्बेन द्वीप में कैद रखा गया था। लिए आरक्षित जगह तो क्या उनके गिरजाघर तक चलता है। में नहीं जा सकते थे। अश्वेतों को संगठन बनाने इस साइन बोर्ड पर लिखा हैः “खतरा! देशी अश्वेत, रंगभेद के विलाफ़संघर्ष और इस भेदभावपूर्ण व्यवहार का विरोध करने हिंदुस्तानी और रंगीन चमड़ी का भी अधिकार नहीं था। वालो अगर तुम रात में इस रंगभेद नस्ली भेदभाव पर आधारित उस व्यवस्था 198 से ही अश्वेत रंगीन चमड़ी वाले और परिसर में घुसे तो तुम्हे का नाम है जो दक्षिण अफ्रीका में विशिष्ट तौर भारतीय मूल के लोगों ने रंगभेद प्रणाली के लापता घोषित कर दिया जाएगा। हथियारबंद सुरक्षा पर चलाई गई। दक्षिण अफ्रीका पर यह व्यवस्था खिलाफ़ संघर्ष किया। उन्होंने विरोध प्रदर्शन गाईस देखते ही गोली मार यूरोप के गोरे लोगों ने लादी थी। 17वीं और किए और हड्तालें आयोजित कीं। भेदभाव वाली देंगे और जंगली कुत्ते लाश को । 18वीं सदी में व्यापार करने आई यूरोप की इस शासन प्रणाली का विरोध करने वाले संगठन नोंच-नोंच कर खा जाएँगे। तुमको चेतावनी दे दी गई है। कंपनियों ने दक्षिण अफ्रीका को भी उसी तरह अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के झंडे तले एकजुट साउथ अफ्रीका हिस्ट्री ऑनलाइन का टा संविधान निर्माण 45 हुए। इनमें कई मजदूर संगठन और कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। अनेक समझदार और संवेदनशील गोरे लोग भी रंगभेद समाप्त करने के आंदोलन में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के साथ आए और उन्होंने इस संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाई। अनेक देशों ने रंगभेद की निंदा की और इस व्यवस्था के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। लेकिन गोरी सरकार ने हजारों अश्वेत और रंगीन चमड़ी वाले लोगों की हत्या और दमन करते हुए अपना शासन जारी रखा। © जान मूलेन, विकीपेडिया, जीएनयू फ्री डाक्यूमेंटेशन लाइसेंस डरबन समुद्र तट पर अंग्रेजी, अफ्रीकांस और जुलू भाषा में लिखा नोटिस बोर्ड। इस पर लिखा है- डरबन नगर, डरबन समुद्र तटः कानून की धारा 37 के तहत इस तट पर नहाने का अधिकार सिर्फ श्वेत नस्ल के लोगों को ही है। खुद करें, खुद सीखें नेल्सन मंडेला के जीवन और संघर्षों पर एक पोस्टर बनाएँ। अगर उनकी आत्मकथा, ‘द लॉग वाक टू फ्रीडम' उपलब्ध हो तो कक्षा में उसके कुछ हिस्से पढ़कर आपस में चर्चा करें। एक नए संविधान की ओर “ऐतिहासिक रूप से एक-दूसरे के दुश्मन रहे दो समूह रंगभेद वाली शासन व्यवस्था की जगह शांतिपूर्ण रंगभेद के खिलाफ़ जब संघर्ष और विरोध बढ़ता " ढंग से लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने पर सहमत हो गया तो सरकार को यह एहसास हो गया कि गए क्योंकि दोनों को एक-दूसरे की भलमनसाहत अब वह जोर-जबर्दस्ती से अश्वेतों पर अपना पर भरोसा था और वे इसे मानने को तैयार थे। मेरी राज कायम नहीं रख सकती। इसलिए, गोरी कामना है कि दक्षिण अफ्रीकी लोग कभी भी अच्छाई सरकार ने अपनी नीतियों में बदलाव शुरू किया। पर विश्वास करना न छोड़ें और इस बात में आस्था भेदभाव वाले कानूनों को वापस ले लिया गया। रखें कि मनुष्य जाति पर विश्वास करना ही हमारे राजनैतिक दलों पर लगा प्रतिबंध और मीडिया लोकतंत्र का आधार है।'' पर लगी पाबंदियाँ उठा ली गई28 वर्ष तक जेल में नए लोकतांत्रिक दक्षिण अफ्रीका के उदय के कैद रखने के बाद नेल्सन मंडेला को आजाद कर । साथ ही अश्वेत नेताओं ने अश्वेत समाज से आग्रह किया कि सत्ता में रहते हुए गोरे लोगों ने जो जुल्म दिया गया। आखिरकार 26 अप्रैल 1994 की मध्य किए थे उन्हें वे भूल जाएँ और गोरों को माफ़ कर रात्रि को दक्षिण अफ्रीका गणराज्य का नया झंडा दें। उन्होंने कहा कि आइए, अब सभी नस्लों तथा लहराया और यह दुनिया का एक नया लोकतांत्रिक स्त्री-पुरुष की समानता, लोकतांत्रिक मूल्यों, देश बन गया। रंगभेद वाली शासन व्यवस्था समाप्त सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों पर आधारित हुई और सभी नस्ल के लोगों की मिलीजुली सरकार नए दक्षिण अफ्रीका का निर्माण करें। एक पार्टी ने अजर टक्षिण के के गठन का रास्ता खुला।। | दमन और नृशंस हत्याओं के ज़ोर पर शासन बहुसंख्यक काले लोगों | यह सब कैसे हुआ? आइए इस असाधारण किया था और दूसरी पार्टी ने आजादी की लड़ाई । ने गोरों से अपने दमन और शोषण का बदला बदलाव के बाद नए दक्षिण अफ्रीका के पहले की अगुवाई की थी। नए संविधान के निर्माण के लेने का निश्चय किया राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के मुँह से यह जानेंः लिए दोनों ही साथ-साथ बैठीं। होता तो क्या होता? 46 लोकतांत्रिक राजनीति आज का दक्षिण अफ्रीकाः यह तस्वीर आज के दक्षिण अफ्रीका की सोच को उजागर करती है। आज का दक्षिण अफ्रीका खुद को ‘इंद्रधनुषी देश' कहता है। क्या आप बता सकते हैं क्यों? © विकीपेडिया, जीएनयू फ्री डाक्यूमेंटेशन लाइसेंस को बहुत खूबसूरत ढंग से व्यक्त करती है (पृष्ठ 54 देखें)। दक्षिण अफ्रीकी संविधान से दुनिया भर के लोकतांत्रिक लोग प्रेरणा लेते हैं। अभी हाल तक जिस देश की दुनिया भर में अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों के लिए निंदा की जाती थी, आज उसे लोकतंत्र के मॉडल के रूप में देखा जाता है। यह काम दक्षिण अफ्रीकी लोगों द्वारा साथ रहने, साथ काम करने के दृढ़ निश्चय और पुराने कड़वे अनुभवों को आगे के इंद्रधनुषी समाज बनाने में एक सबक के रूप में प्रयोग करने की समझदारी दिखाने के कारण संभव हुआ। एक बार फिर मंडेला दो वर्षों की चर्चा और बहस के बाद उन्होंने के शब्दों में ही ये बातें समझें: जो संविधान बनाया वैसा अच्छा संविधान दुनिया “दक्षिण अफ्रीका का संविधान इतिहास और में कभी नहीं बना था। इस संविधान में नागरिकों भविष्य, दोनों की बातें करता है। एक तरफ तो को जितने व्यापक अधिकार दिए गए हैं उतने यह एक पवित्र समझौता है कि दक्षिण अफ्रीकी दुनिया के किसी संविधान ने नहीं दिए हैं। साथ - थ के रूप में हम, एक-दूसरे से यह वायदा करते ही उन्होंने यह फैसला भी किया कि मुश्किल हैं कि हम अपने रंगभेदी, क्रूर और दमनकारी मामलों के समाधान की कोशिशों में किसी को भी अलग नहीं किया जाएगा और न ही किसी इतिहा । इतिहास को फिर से दोहराने की अनुमति नहीं को बरा या दष्ट मानकर बर्ताव किया जाएगा। देंगे। पर बात इतनी ही नहीं है। यह अपने देश इस बात पर भी सहमति बनी कि पहले जिसने को इसके सभी लोगों द्वारा वास्तविक अर्थों में चाहे जो कुछ किया हो लेकिन अब से हर समस्या साझा करने का घोषणापत्र भी है-श्वेत और के समाधान में सबकी भागीदारी होगी। दक्षिण अश्वेत, स्त्री और पुरुष, यह देश पूर्ण रूप से अफ्रीकी संविधान की प्रस्तावना ही इस भावना हम सभी का है।'' DĚT पहुँचे? क्या दक्षिण अफ्रीका के स्वतंत्रता संग्राम से आपको भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की याद आई? इन बिंदुओं के आधार पर दोनों संघर्षों में समानताएँ और असमानताएँ बताएँ: विभिन्न समुदायों के बीच संबंध । नेतृत्वः गांधी/मंडेला । संघर्ष का नेतृत्व करने वाली पार्टीः अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस/भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस संघर्ष का तरीका । उपनिवेशवाद का चरित्र qur समझे? संविधान निर्माण 3.2 हमें संविधान की ज़रुरत क्यों है ? हमें एक संविधान की ज़रूरत क्यों है और भविष्य में शासकों का चुनाव कैसे होगा, इसके संविधान क्या करता है, इस बात को हम दक्षिण बारे में नियम तय होकर लिखित रूप में आ अफ्रीका के उदाहरण से समझ सकते हैं। इस जाते हैं। चुनी हुई सरकार क्या-क्या कर सकती नए लोकतंत्र में दमन करने वाले और दमन है और क्या-क्या नहीं कर सकती यह भी लिखित सहने वाले, दोनों ही साथ-साथ समान हैसियत रूप में मौजूद होता है। इन्हीं लिखित नियमों में से रहने की योजना बना रहे थे। दोनों के लिए नागरिकों के अधिकार भी होते हैं। पर ये नियम ही एक-दूसरे पर भरोसा कर पाना आसान नहीं तभी काम करेंगे जब जीतकर आने वाले लोग था। उनके अंदर अपने-अपने किस्म के डर थे। इन्हें आसानी से और मनमाने ढंग से नहीं बदलें। वे अपने हितों की रखवाली भी चाहते थे। दक्षिण अफ्रीकी लोगों ने इन्हीं चीजों का इंतजाम बहुसंख्यक अश्वेत इस बात पर चौकस थे कि किया। वे कुछ बुनियादी नियमों पर सहमत लोकतंत्र में बहुमत के शासन वाले मूल सिद्धांत हुए। वे इस बात पर भी सहमत हुए कि ये से कोई समझौता न हो। उन्हें बहुत सारे सामाजिक नियम सबसे ऊपर होंगे और कोई भी सरकार और आर्थिक अधिकार चाहिए थे। अल्पसंख्यक इनकी उपेक्षा नहीं कर सकती। इन्हीं बुनियादी गोरों को अपनी संपत्ति और अपने विशेषाधिकारों नियमों के लिखित रूप को संविधान कहते हैं। की चिंता थी। संविधान रचना सिर्फ दक्षिण अफ्रीका की ही लंबे समय तक चली बातचीत के बाद दोनों खासियत नहीं है। हर देश में अलग-अलग समूहों पक्ष समझौते का रास्ता अपनाने को तैयार हुए। के लोग रहते हैं। संभव है कि उनके रिश्ते गोरे लोग बहुमत के शासन का सिद्धांत और दक्षिण अफ्रीका के गोरे और कालों जितने एक व्यक्ति एक वोट को मान गए। वे गरीब कटुतापूर्ण नहीं हों। पर दुनिया भर में लोगों के लोगों और मजदूरों के कुछ बुनियादी अधिकारों बीच विचारों और हितों में फ़र्क रहता है। पर भी सहमत हुए। अश्वेत लोग भी इस बात लोकतांत्रिक शासन प्रणाली हो या न हो पर पर सहमत हुए कि सिर्फ बहुमत के आधार दुनिया के सभी देशों को ऐसे बुनियादी नियमों पर सारे फैसले नहीं होंगे। वे इस बात पर की जरूरत होती है। यह बात सिर्फ़ सरकारों पर सहमत हुए कि बहुमत के ज़रिए अश्वेत लोग ही लागू नहीं होती। हर संगठन के कायदे- अल्पसंख्यक गोरों की जमीन-जायदाद पर कानून होते हैं, संविधान होता है। इस तरह आपके कब्ज़ा नहीं करेंगे। यह समझौता आसान नहीं इलाके का कोई क्लब हो या सहकारी संगठन था। इस समझौते को लागू करना और भी कठिन या फिर राजनैतिक दल, सभी को एक संविधान था। इसे लागू करने के लिए पहली ज़रूरत थी की ज़रूरत होती है। कि वे एक-दूसरे पर भरोसा करें और अगर वे एक-दूसरे पर भरोसा कर भी लें तो क्या गारंटी खुद करें, खुद सीखें है कि भविष्य में इसे तोड़ा नहीं जाएगा? यह तो गड़बड़ हो गई। । अपने इलाके के किसी क्लब, सहकारी संगठन अथवा मज़दूर संघ । ऐसी स्थिति में भरोसा बनाने और बरकरार अगर सभी बुनियादी या राजनैतिक दल के दफ़्तर में जाएँ और उनसे उनके संविधान या बातों पर पहले ही फैसला रखने का एक ही तरीका है कि जो बातें तय हुई। संगठन के नियमों की पुस्तिका माँगें तथा उसका अध्ययन करें। हो गया था तो संविधान हैं उन्हें लिखत-पढ़त में ले लिया जाए जिससे । क्या उसके नियम लोकतांत्रिक नियमों के अनुकूल हैं? क्या वे बिना सभा बनाने का क्या सभी लोगों पर उन्हें मानने की बाध्यता रहे। भेदभाव के सभी को सदस्यता देते हैं? औचित्य था? 48 लोकतांत्रिक राजनीति संविधान लिखित नियमों की ऐसी किताब है। तय करता है और हमें बताता है कि नागरिकों जिसे किसी देश में रहने वाले सभी लोग सामूहिक के क्या अधिकार हैं, और रूप से मानते हैं। संविधान सर्वोच्च कानून है। चौथा, यह अच्छे समाज के गठन के जिससे किसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों (जिन्हें लिए लोगों की आकांक्षाओं को व्यक्त नागरिक कहा जाता है) के बीच के आपसी करता है। संबंध तय होने के साथ-साथ लोगों और सरकार । जिन देशों में संविधान है, वे सभी लोकतांत्रिक के बीच के संबंध भी तय होते हैं। संविधान शासन वाले हों यह जरूरी नहीं है। लेकिन जिन अनेक काम करता है जिनमें ये प्रमुख हैं: देशों में लोकतांत्रिक शासन है वहाँ संविधान का । 'पहला' यह साथ रह रहे विभिन्न तरह के होना ज़रूरी है। ब्रिटेन के खिलाफ़ आज़ादी की लोगों के बीच ज़रूरी भरोसा और सहयोग । लड़ाई के बाद अमेरिकी लोगों ने अपने लिए विकसित करता है। संविधान का निर्माण किया। फ्रांसीसी क्रांति के दूसरा' यह स्पष्ट करता है कि सरकार का बाद फ्रांसीसी लोगों ने एक लोकतांत्रिक संविधान गठन कैसे होगा और किसे फ़ैसले लेने का को मान्यता दी। इसके बाद से यह चलन हो अधिकार होगा। गया कि हर लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में 'तीसरा' यह सरकार के अधिकारों की सीमा एक लिखित संविधान हो। 3.3 भारतीय संविधान का निर्माण ZRC दक्षिण अफ्रीका की ही तरह भारत का संविधान जा रहा था तब देश का भविष्य इतना सुरक्षित भी बहुत कठिन परिस्थितियों के बीच बना। और चैन भरा नहीं लगता था जितना आज है। वल्लभभाई झावरभाई पटेल भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश के संविधान निर्माताओं को देश के वर्तमान और (1875-1950), जसजशत अंतरिम लिए संविधान बनाना आसान काम नहीं था। भविष्य की चिंता थी। सरकार में गृह, सूचना एवं भारत के लोग तब गुलाम की हैसियत से प्रसारण मंत्री। वकील और बारदोली किसान सत्याग्रह निकलकर नागरिक की हैसियत पाने जा रहे थे। खुद करें, खुद सीखें के नेता। भारतीय रियासतों के विलय में निर्णायक देश ने धर्म के आधार पर हुए बँटवारे की अपने दादा-दादी, नाना-नानी या इलाके के किसी बुजुर्ग से बात भूमिका। बाद में उप विभीषिका झेली थी। भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री। कीजिए।उनसे पूछिए कि क्या उनको आज़ादी या बँटवारे या संविधान लोगों के लिए बँटवारा भारी बर्बादी और दहलाने । निर्माण के बारे में कुछ बातें याद हैं। उस समय लोगों को किन बातों की वाला अनुभव था। उम्मीद थी और क्या-क्या अंदेशे थे ? अपनी कक्षा में इन बातों की विभाजन से जुड़ी हिंसा में सीमा के दोनों चर्चा कीजिए। तरफ कम-से-कम दस लाख लोग मारे जा चुके थे। एक बड़ी समस्या और भी थी। अंग्रेजों ने पिपाणी संविधान निर्माण का रास्ता देसी रियासतों के शासकों को यह आजादी दे सारी मुश्किलों के बावजूद भारतीय संविधान सरोजिनी नायडू (1879-1949) दी थी कि वे भारत या पाकिस्तान जिसमें इच्छा निर्माताओं को एक बड़ा लाभ था। दक्षिण अफ्रीका जन्मः आंध्र प्रदेश | कवयित्री, लेखिका'औ जतक हो अपनी रियासत का विलय कर दें या स्वतंत्र में जिस तरह संविधान निर्माण के दौर में ही कार्यकर्ता । कांग्रेस की अग्रणी रहें। इन रियासतों का विलय मुश्किल और सारी बातों पर सहमति बनानी पड़ी वैसी स्थिति महिला नेता। बाद में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल अनिश्चय भरा काम था। जब संविधान लिखा उस समय के भारत में नहीं थी। भारत में संविधान निर्माण 49 | मंत्री । आजादी की लड़ाई के दौरान ही लोकतंत्र समेत को अपनी संस्थाएँ और व्यवस्थाएँ बनानी थीं अधिकांश बुनियादी बातों पर राष्ट्रीय सहमति और चलाना था। इसी कारण भारतीय संविधान बनाने का काम हो चुका था। हमारा राष्ट्रीय में कई संस्थाओं और व्यवस्थाओं को पुरानी आंदोलन सिर्फ़ एक विदेशी सत्ता के खिलाफ़ व्यवस्था से लगभग जस का तस अपना लिया संघर्ष भर नहीं था। यह न केवल अपने समाज गया जैसे कि 1935 का भारत सरकार कानून।। को फिर से जगाने का वरन् अपने समाज आज़ादी के बाद भारत के स्वरूप को लेकर अबुल कलाम आज़ाद और राजनीति को बदलने और नए सिरे से वर्षों पहले से चले चिंतन और बहसों ने भी (1888-1958), जन्मः सऊदी गढने का आंदोलन भी था। आजादी के बाद काफी लाभ पहुंचाया। हमारे नेताओं में इतना । अरब । शिक्षाविद्, लेखक और धर्मशास्त्रों के ज्ञाता; भारत को किस रास्ते पर चलना चाहिए इसे आत्मविश्वास आ गया था कि उन्हें बाहर के अरबी के विद्वान । कांग्रेसी लेकर आजादी के संघर्ष के दौरान भी तीखे विचार और अनुभवों को अपनी ज़रूरत के नेता, राष्ट्रीय आंदोलन में अग्रणी भूमिका | मुस्लिम मतभेद थे। ऐसे कुछ मतभेद अब तक भी बने अनुसार अपनाने में कोई हिचक नहीं हुई। हमारे । अलगाववादी राजनीति के हुए हैं। पर कुछ बुनियादी विचारों पर लगभग अनेक नेता कासासा पर लगभग अनेक नेता फ्रांसीसी क्रांति के आदर्शो, ब्रिटेन । विरोधी। बाद में पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में शिक्षा सभी लोगों की सहमति कायम हो चकी थी। के संसदीय लोकतंत्र के कामकाज और अमेरिका | 1928 में ही मोतीलाल नेहरू और कांग्रेस के के अधिकारों की सूची से काफ़ी प्रभावित थे। आठ अन्य नेताओं ने भारत का एक संविधान रूस में हुई समाजवादी क्रांति ने भी अनेक लिखा था। 1931 में कराची में हए भारतीय राष्ट्रीय भारतीयों को प्रभावित किया और वे सामाजिक कांग्रेस के अधिवेशन में एक प्रस्ताव में यह और आर्थिक समता पर आधारित व्यवस्था बनाने रूपरेखा रखी गई थी कि आजाद भारत का की कल्पना करने लगे थे। लेकिन वे दूसरों की संविधान कैसा होगा। इन दोनों ही दस्तावेजों में सिर्फ नकल नहीं कर रहे थे। हर कदम पर वे स्वतंत्र भारत के संविधान में सार्वभौम वयस्क यह सवाल ज़रूर पूछते थे कि क्या ये चीजें टी.टी. कृष्णामचारी (1899-1974) मताधिकार, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार भारत के लिए उपयुक्त होंगी। इन सभी चीजों ने जन्मः तमिलनाडू | प्रारूप और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की बात हमारे संविधान के निर्माण में मदद की। कमेटी के सदस्य । उद्यमी और कांग्रेसी नेता। बाद में कही गई थी। इस प्रकार संविधान की रचना करने केंद्रीय मंत्रिमंडल में वित्त के लिए बैठने से पहले ही कुछ बुनियादी मूल्यों पर सावधाजनमा बनियादी मल्यों पर संविधानसभा सभी नेताओं की सहमति बन चुकी थी। फिर, भारत के संविधान के निर्माता कौन थे? औपनिवेशिक शासन की राजनैतिक संस्थाओं यहाँ आपको संविधान बनाने में प्रमुख भूमिका और व्यवस्थाओं को जानने-समझने से भी नई निभाने वाले कुछ नेताओं के बारे में बहुत संक्षेप राजनैतिक संस्थाओं का स्वरूप तय करने में में कुछ-कुछ जानकारियाँ मिलेंगी। मदद मिली। अंग्रेजी हुकूमत ने बहुत कम लोगों चुने गए जनप्रतिनिधियों की जो सभा संविधान को वोट का अधिकार दिया था। इसके आधार नामक विशाल दस्तावेज़ को लिखने का पर अंग्रेजों ने जिस विधायिका का गठन किया काम करती है उसे संविधान सभा कहते हैं। था वह बहुत कमजोर थी। 1937 के बाद पूरे भारतीय संविधान सभा के लिए जुलाई 1946 में राजेंद्र प्रसाद ब्रिटिश शासन वाले भारत में प्रादेशिक असेंबलियों चुनाव हुए थे। संविधान सभा की पहली बैठक (1884-1963), जव्याः के लिए चुनाव कराए गए थे। इनमें बनी सरकारें दिसंबर 1946 को हुई थी। इसके तत्काल बाद । बिहार । संविधान सभा के | अध्यक्ष | वकील और । पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं थीं। पर विधानसभाओं देश दो हिस्सों- भारत और पाकिस्तान में बँट चंपारण सत्याग्रह के प्रमुख भागीदार। तीन बार कांग्रेस में जाने और काम करने का अनुभव तब बहुत गया। संविधान सभा भी दो हिस्सों में बँट गई- अध्यक्ष । बाद में भारत के लाभदायक हुआ क्योंकि इन्हीं भारतीय लोगों भारत की संविधान सभा और पाकिस्तान की प्रथम राष्ट्रपति । मंत्री। 50 लोकतांत्रिक राजनीति वयस्क मताधिकार नहीं था। इसलिए संविधान खुद करें, खुद सीखें । सभा का चुनाव देश के लोग प्रत्यक्ष ढंग से नहीं। अपने राज्य या इलाके से संविधान सभा में गए ऐसे सदस्य का नाम पता कर सकते थे। इसका चनाव मख्य रूप से उन करे जिनका ज़िक्र यहाँ नहीं किया गया है। उस नेता की तस्वीर जुटाएँ प्रांतीय असेंबलियों के सदस्यों ने ही किया था या उनका स्केच बनाएँ। हमने जिस तरह संक्षेप में कुछ नेताओं के बारे जिनका जिक्र हम पहले कर चुके हैं। इसके में सूचना दी है उसी तरह उनके बारे में भी व्यौरा दें। यानि नाम (जन्म वर्ष-मत्य वर्ष), जन्म स्थान (वर्तमान राजनैतिक सीमाओं के आधार कारण देश के सभी भौगोलिक क्षेत्रों का इसमें जयपाल सिंह (1903-1970), जन्मः उचित प्रतिनिधित्व हो गया था। इस सभा में | पर), राजनैतिक गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण, संविधान सभा के । झारखंड । खिलाड़ी और बाद की भूमिका। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्यों का प्रभुत्व शिक्षाविद् । भारतीय हॉकी टीम के पहले कप्तान। था जिसने राष्ट्रीय आंदोलन की अगुवाई की आदिवासी महासभा के संविधान सभा। भारतीय संविधान लिखने वाली थी। पर स्वयं कांग्रेस के अंदर कई राजनैतिक संस्थापक अध्यक्ष । बाद में झारखंड पार्टी के सभा में 299 सदस्य थे। इसने 26 नवंबर 1949 समूह और विचारों के लोग थे। सभा में कई संस्थापक।। को अपना काम पूरा कर लिया। संविधान 26 सदस्य ऐसे थे जो कांग्रेस के विचारों से सहमत जनवरी 195 को लागू हुआ। इसी दिन की याद नहीं थे। सामाजिक रूप से इस सभा में सभी में हम हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समूह, जाति, वर्ग, धर्म और पेशों के लोग थे। मनाते हैं। अगर संविधान सभा का गठन सार्वभौम वयस्क इस सभा द्वारा पचास साल से भी पहले बनाए मताधिकार के ज़रिए हुआ होता तब भी इसका संविधान को हम क्यों मानते हैं? हमने पहले ही स्वरूप काफी कुछ इसी तरह का होता। एक कारण का जिक्र किया है। संविधान सिर्फ और अंततः जिस तरह संविधान सभा ने काम संविधान सभा के सदस्यों के विचारों को ही व्यक्त किया, वह संविधान को एक तरह की पवित्रता एच.सी. मुखर्जी (1887-1956), जन्मः नहीं करता है। यह अपने समय की व्यापक और वैधता देता है। संविधान सभा का काम काफी बंगाल । संविधान सभा के उपाध्यक्ष | प्रसिद्ध लेखक सहमतियों को व्यक्त करता है। दुनिया के कई व्यवस्थित, खुला और सर्वसम्मति बनाने के प्रयास और शिक्षाविद् । कांग्रेसी देशों में संविधान को फिर से लिखना पड़ा क्योंकि पर आधारित था। सबसे पहले कुछ बुनियादी नेता। ऑल इंडिया क्रिश्चियन कपिल और संविधान में दर्ज बुनियादी बातों पर ही वहाँ के सिद्धांत तय किए गए और उन पर सबकी बंगाल विधानसभा के सभी सामाजिक समूहों या राजनैतिक दलों की सहमति बनाई गई। फिर प्रारूप कमेटी के प्रमुख सदस्य । बाद में बंगाल के सहमति नहीं थी। कई देशों में संविधान है पर वह डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने चर्चा के लिए एक कागज़ का टुकड़ा या किसी भी अन्य किताब की प्रारूप संविधान बनाया। संविधान के प्रारूप की तरह का दस्तावेज़ भर है। कोई भी उस पर आचरण प्रत्येक धारा पर कई-कई दौर में चर्चा हुई। दो नहीं करता। पर हमारे संविधान का अनुभव एकदम हज़ार से ज्यादा संशोधनों पर विचार हुआ। अलग है। पिछली आधी सदी से ज्यादा की अवधि तीन वर्षों में कुल 114 दिनों की गंभीर चर्चा में अनेक सामाजिक समूहों ने संविधान के कुछ हुई। सभा में पेश हर प्रस्ताव, हर शब्द और वहाँ प्रावधानों पर सवाल उठाए। पर किसी भी बड़े कही गई हर बात को रिकॉर्ड किया गया और जी. दुर्गाबाई देशमुख सामाजिक समूह या राजनैतिक दल ने खुद संविधान संभाला गया। इन्हें कांस्टीट्यूएंट असेम्बली (1909-1981), जन्मः बम आ आंध्र की वैधता पर सवाल नहीं उठाया। यह हमारे डिबेट्स नाम से 12 मोटे-मोटे खंडों में प्रकाशित प्रदेश | वकील और महिला मुक्ति कार्यकर्ता। आंध्र संविधान की एक असाधारण उपलब्धि है। किया गया। इन्हीं बहसों से हर प्रावधान के पीछे महिला सभा की संविधान को मानने का दूसरा कारण यह है की सोच और तर्क को समझा जा सकता है। संस्थापक। कांग्रेस की सक्रिय नेता । बाद में कि संविधान सभा भी भारत के लोगों का ही संविधान की व्याख्या के लिए भी इस बहस के केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड । प्रतिनिधित्व कर रही थी। उस समय सार्वभौम दस्तावेज़ों का उपयोग होता है। की संस्थापक अध्यक्ष । राज्यपाल । संविधान निर्माण 51 पहुँचे? qui समझे? भारतीय संविधान निर्माताओं के बारे में यहाँ दी गई सभी जानकारियों को पढ़ें। आपको यह जानकारी कंठस्थ करने की ज़रूरत नहीं है। इस आधार पर निम्नलिखित कथनों के पक्ष में उदाहरण प्रस्तुत करें: 1. संविधान सभा में ऐसे अनेक सदस्य थे जो कांग्रेसी नहीं थे। 2. सभा में समाज के अलग-अलग समूहों का प्रतिनिधित्व था। 3. सभा के सदस्यों की विचारधारा भी अलग-अलग थी। बलदेव सिंह (1901-1961), जन्मः हरियाणा। सफल उद्यमी और पंजाब विधानसभा में पंथक अकाली पार्टी के नेता । संविधान सभा में । कांग्रेस द्वारा मनोनीत । बाद में केंद्रीय मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री । 3.५ भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्य इस किताब में हम विभिन्न विषयों पर संविधान सपने और वायदे के प्रावधानों का अध्ययन करेंगे। अभी हम यही आपमें से कछ को भारतीय संविधान जानने की कोशिश करें कि हमारे संविधान के के निर्माताओं की सूची में एक बड़ा नाम न होने पीछे का दर्शन क्या है। यह काम हम दो तरीकों से । कर सकते हैं। अपने नेताओं के संविधान संबंधी । ' पर हैरानी हुई होगी यानि महात्मा गांधी का विचार पढ़कर हम इस बात को समझ सकते हैं। नाम। वे संविधान सभा के सदस्य नहीं थे। पर परंत, हमारा संविधान स्वयं अपने दर्शन के बारे में संविधान सभा के अनेक सदस्य उनके विचारों जो कहता है उसे पढ़ना भी उतना ही जरूरी है। के अनुयायी थे। 1931 में अपनी पत्रिका 'यंग संविधान की प्रस्तावना यही काम करती है। आइए इंडिया' में उन्होंने संविधान से अपनी अपेक्षा इस पर बारी-बारी से गौर करें। के बारे में लिखा थाः कन्हैयालाल माणिकलाल | मुंशी (1887-1971), जन्मः गुजरात | वकील, इतिहासकार और भाषाविद् । कांग्रेसी नेता और गांधीवादी। बाद में केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री। स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक। MỸ III X4 BacSilaÊUIRãAôQH đêYẾUY TÌcâ5x1 •gdU... 5 -2AG :Ma(AaixCKETCPANE #GUGU5c7fe -600x3GGeeeelaieaJ, PC CâỖ BỐ QUYẾUdU9iULỖI, TUICâỞ đề ael 26»AddJxdAditpaid AceTROU Telècèo .çüo .@SÜÁJUSB autó xf¥i-Ua6... •x SIÊẲHẾ 488) श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953), जन्मः । भेदभाव और गैर-बराबरी मुक्त भारत का दूसरों से अलग थे। उन्होंने अक्सर गांधी पश्चिम बंगाल अंतरिम सपना डॉ. अंबेडकर के मन में भी था और उनके नजरिए की कटु आलोचना की। सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री । शिक्षाविद् जिन्होंने संविधान निर्माण में महत्त्वपूर्ण संविधान सभा में दिए गए अपने अंतिम और वकील । हिंदू महासभा भूमिका निभायी। असमानता कैसे दूर की भाषण में उन्होंने अपनी चिंताओं को बहुत में सक्रिय। बाद में भारतीय जनसंघ के जा सकती है इस बारे में उनके विचार स्पष्ट ढंग से रखा थाः संस्थापक। 52 लोकतांत्रिक राजनीति W AUTÈw-Z® .ôākçbíói o aðCÍVÁÈS] D Amore cíldúÚFQãUĐÚÑECI DO xüxõ axolangi â culæãÕèÂU Yaçſü:D yaâuXÇÁDÁJSJ Xâculatã ãð ötlete aboÚI XỐ akº. g£Ì o.glẬUYẾU ĐUÔI TÔaxãÓ TâI 6 Xð »Ð¥Adâexcá.QXMLU ÇÍÜ-QÁSJYG LUX ADâexA.QXMLU ÇÍÜ-Q ÉLBEI Eð munta वैE, OP.gAE_०.g -Gree -60-%eAeUpakabla AediAd) họ: BUỔbâyØÌgelỖIRỒLỖ: k¥ÂbâÁ: YOUCfi-ga3xỖ GÕÌg ad]z DÙ-UCCIU-LITZRfe0Ỡbâ8Ìa PIồ k Ố 5 8dBa#Jx37x0 U भीमराव रामजी अंबेडकर (1891-1956), जन्मः । महाराष्ट्र। प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष । सामाजिक क्रांतिकारी चिंतक, जातिगत बँटवारे और भेदभाव के खिलाफ़ अग्रणी आंदोलनकारी। बाद में स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में कानून मंत्री। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के संस्थापक।। | आखिर में आइए हम 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि के समय संविधान सभा में दिए जवाहर लाल नेहरू के प्रसिद्ध भाषण को याद करें: जवाहर लाल नेहरू (1889-1964), जन्मः उत्तर प्रदेश | अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री। वकील और कांग्रेस नेता । समाजवाद, लोकतंत्र और साम्राज्यवाद- विरोध के पक्षधर। बाद में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री । dscôzkaiðað ÂÈ Çieci Dâneſ âneze.oudc.exe Ía, katÕ BEI kemãoç.Dāk Âuðsſo ẤMXÜ-ÍÕU-A ÚLê Tú UwJÚřadise èāÎ Ìfasc Wæj KÕRLê-OXIDO Ga-ef=ACere, ADEfeeleabd), CCCUPa) •ed •d, polozî ãowScaliânð íèmíãèãèÂvo. De jæla MÚJ TU, AõGKAH- ARUTIUDP3 Aye -qUU, AO०.g•e¥lableU¥GUAOCa2cUbe Ôeakira II BÌeầu, mẾTiềâĐỒ Strex, ax b%, QUÌ YẾU GA-60 Tee¥Ci- gS2 •eadsex axcAT •U, ZHead/०७:D Vazele dâmachozex keçút exe; ÜveleãĐÖHLÌ Dâcâycéïóô CÂÍÇİÇÜÇÜB.cítiðrüèsâ a cây calzatíma ve DañÕçedelèã kaszele Máx@DÂèsüd võÂTêÂMaseç, linede ãdusa.YX HP teó adataibeçilmlêão são lucēce@baratçúcè, SciālâÕãèì ¿é. Cea mudúÕÖGB bãið atraídâ¢Ì fðútão 28UC2Cd8x-CIAAe =-=CF- 2015 -6AdJe-U PCCU A8-2-SeaJAUG¥-8UC-4eaUGU०. 24fax¥ACEBC -ede cho.xſüãt, Îél QU FR XÂÇÕJÜ - Otoçt üố cease.olmasa. ¥íüãU ÎÇÚNIQ.com, Ying Yawõòaçúcô.00, visat.cê aula. ¥¢ÈÐão de Baix e-e-bea%e;1%e;#AAJ •eaDadaJGJ-2xadJGUAGUEUabALU AO][6:26¥e;6x5%e# U, JaJIO]gae x1xCHEaba सोमनाथ लाहिड़ी (1901-1984), जन्मः पश्चिम । | बंगाल । लेखक और संपादक। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता । बाद में पश्चिम बंगाल विधानसभा में सदस्य। पहले दिए तीनों उद्धरणों को गौर से पढ़ें। DET पहुँचे? । पहचानिए कि कौन-सा एक विचार इन तीनों उद्धरणों में उपस्थित है। qui इन तीनों उद्धरणों में इस साझे विचार को व्यक्त करने का तरीका किस तरह एक- दूसरे से भिन्न है? समझे ? संविधान निर्माण 53 संविधान का दर्शन धाराएँ इन्हीं के अनुरूप बनी हैं। संविधान की जिन मूल्यों ने स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा दी और शुरुआत बुनियादी मूल्यों की एक छोटी-सी उसे दिशा-निर्देश दिए तथा जो इस क्रम में जाँच- उद्देश्यिका के साथ होती है। इसे संविधान की परख लिए गए वे ही भारतीय लोकतंत्र का आधार प्रस्तावना या उद्देशिका कहते हैं। अमेरिकी बने। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में इन्हें संविधान की प्रस्तावना से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया। भारतीय संविधान की सारी समकालीन दुनिया के अधिकांश देश अपने Kin¥ tafeỠ, CONX - SITE AI, TIÊà giŨ HỔ, âm đấeeẼSÍPŨ HỔ, TÙ •Fee :%ELHede Jeaehd gele -©d - EUR.O¥U-%e डॉ0-6STA dUGU:0*2-datE ABsclaid P¥•6S.CU - 730; AERATU¥le¥di - Pakfai 725-Jष्म #Sax gdU; 360#AdiJQa-2x3x Bf de ventu-idU; YOU xoănUc-oÎCüzlethe-Ze wäre.de Áote úblõău, Date CecBasilæão 61JU; PGMA86%DAli -> » ta-ale : A)-20 AUG -26TU - 7datUCAAAA- DAUGUC6- 2-> , A-g 22¥dUC-2 - 5 AU¥ ०.gaAQJa; ०.3 ° • •¥GUE âÁ SÍPea6câỐ CU-CHUCỐ ĐẸP Ở YÊUGỒIỚIUỐTÍãU QU:g Cô • RaaUCeleb; deexJ-6 -Ad) •eetalsex luab¥GUJ०.8A2E : atomo CEPÜD TÜD-CÈSÈ¢ææãô xáto.câtel duid-caçãDÎçæta xumeme.seçimütze CÔÁO Bố XâHUỖ .gate SUẤUteCISIJARE] TUÂỖĐSẤU, âm Ubố Hend) संविधान की शुरुआत एक प्रस्तावना के साथ शामिल है जिस पर पूरे संविधान का निर्माण करते हैं। हुआ है। यह दर्शन सरकार के किसी भी कानून आइए हम अपने संविधान की प्रस्तावना को और फैसले के मूल्यांकन और परीक्षण का मानक बहुत सावधानी से पढ़ें और उसमें आए प्रत्येक तय करता है-इसके सहारे परखा जा सकता महत्वपूर्ण शब्द के मतलब को समझें: है कि कौन कानून, कौन फैसला अच्छा या संविधान की प्रस्तावना लोकतंत्र पर एक बुरा है। इसमें भारतीय संविधान की आत्मा खूबसूरत कविता-सी लगती है। इसमें वह दर्शन बसती है। 54 लोकतांत्रिक राजनीति भारत का संविधान उद्देशिका हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण | प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों कोः । सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म | और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, | प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए। दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, | अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। संविधान निर्माण 55 ३ ३ ॐ ॐ संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत और दक्षिण अफ्रीका के संविधानों की प्रस्तावना की तुलना कीजिए। DET । इन सभी में जो विचार साझा हैं, उनकी सूची बनाएँ। पहुँचे? इन सभी में कम-से-कम एक बड़े अंतर को रेखांकित करें। । तीनो में से कौन-सी प्रस्तावना अतीत की ओर संकेत करती है? qui । इन प्रस्तावनाओं में से से कौन-सी ईश्वर का आह्वान नहीं करती? समझे? संस्थाओं का स्वरूप को पहली बार पढ़े तो इसे समझना मुश्किल लगेगा। संविधान सिर्फ मूल्यों और दर्शन का बयान भर फिर भी संस्थाओं के बुनियादी स्वरूप को समझना नहीं है। जैसा कि हमने पहले जिक्र किया है, बहुत मुश्किल नहीं है। किसी भी संविधान की संविधान इन मल्यों को संस्थागत रूप देने की तरह भारतीय संविधान भी वे नियम बताता है जिनके कोशिश है। जिसे हम भारत का संविधान कहते अनुसार शासकों का चुनाव किया जाएगा। इसमें हैं उसका अधिकांश हिस्सा इन्हीं व्यवस्थाओं स्पष्ट लिखा है कि किसके पास कितनी शक्ति को तय करने वाला है। यह एक बहुत ही लंबा होगी और कौन किस बारे में फैसले लेगा। साथ ही और विस्तृत दस्तावेज़ है इसलिए समय-समय संविधान नागरिकों को कुछ स्पष्ट अधिकार देकर पर इसे नया रूप देने के लिए इसमें बदलाव की सरकार के लिए लक्ष्मण रेखा तय कर देता है कि जरूरत पड़ती है। भारतीय संविधान के निर्माताओं सरकार इससे आगे नहीं बढ़ सकती। पुस्तक के को लगा कि इसे लोगों की भावनाओं के अनुरूप शेष तीन अध्याय भारतीय संविधान के इन्हीं तीन चलना चाहिए और समाज में हो रहे बदलावों से पक्षों के बारे में हैं। प्रत्येक अध्याय में हम कुछ दूर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने इसे पवित्र, स्थायी प्रमुख संवैधानिक प्रावधानों पर नज़र डालेंगे और और न बदले जा सकने वाले कानून के रूप में यह समझने की कोशिश करेंगे कि लोकतांत्रिक नहीं देखा था। इसलिए उन्होंने बदलावों को समय- राजनीति में ये किस तरह काम करते हैं। लेकिन समय पर शामिल करने का प्रावधान भी रखा। इन यह किताब भारतीय संविधान के द्वारा स्थापित सारी बदलावों को संविधान संशोधन कहते हैं। प्रमुख संस्थाओं और व्यवस्थाओं को नहीं समेटती। संविधान ने संस्थागत व्यवस्थाओं को बड़ी इसके कुछ पहलुओं पर आपके अगले वर्ष की कानूनी भाषा में दर्ज किया है। अगर आप संविधान किताब में चर्चा होगी। शब्दावली रंगभेदः दक्षिण अफ्रीका की सरकार की 1948 से 1989 के बीच काले लोगों के साथ नस्ली-अलगाव और खराब व्यवहार करने वाली शासन व्यवस्था। धाराः किसी दस्तावेज़ का खास हिस्सा, अनुच्छेद। संविधानः देश का सर्वोच्च कानून। इसमें किसी देश की राजनीति और समाज को चलाने वाले मौलिक कानून होते हैं। संविधान संशोधनः देश की सर्वोच्च विधायी संस्था द्वारा उस देश के संविधान में किया जाने वाला बदलाव। संविधान सभाः जनप्रतिनिधियों की वह सभा जो संविधान लिखने का काम करती है। प्रारूपः किसी कानूनी दस्तावेज़ का प्रारंभिक रूप। दर्शनः किसी सोच और काम को दिशा देने वाले सबसे बुनियादी विचार। प्रस्तावनाः संविधान का वह पहला कथन जिसमें कोई देश अपने संविधान के बुनियादी मूल्यों और अवधारणाओं को स्पष्ट ढंग से कहता है। देशद्रोहः देश की सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश करने का अपराध। 56 लोकतांत्रिक राजनीति 1. नीचे कुछ गलत वाक्य दिए गए हैं। हर एक में की गई गलती पहचानें और इस अध्याय के आधार पर उसको ठीक करके लिखें। क. स्वतंत्रता के बाद देश लोकतांत्रिक हो या नहीं, इस विषय पर स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने | अपना दिमाग खुला रखा था। ख. भारतीय संविधान सभा के सभी सदस्य संविधान में कही गई हरेक बात पर सहमत थे। ग. जिन देशों में संविधान है वहाँ लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था ही होगी। घ. संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है इसलिए इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता। 2. प्रश्नावली दक्षिण अफ्रीका का लोकतांत्रिक संविधान बनाने में, इनमें से कौन-सा टकराव सबसे महत्वपूर्ण थाः क. दक्षिण अफ्रीका और उसके पड़ोसी देशों का ख. स्त्रियों और पुरुषों का । ग. गोरे अल्पसंख्यक और अश्वेत बहुसंख्यकों का घ. रंगीन चमड़ी वाले बहुसंख्यकों और अश्वेत अल्पसंख्यकों का 3. लोकतांत्रिक संविधान में इनमें से कौन-सा प्रावधान नहीं रहता? क. शासन प्रमुख के अधिकार ख. शासन प्रमुख का नाम ग. विधायिका के अधिकार घ. देश का नाम 4. संविधान निर्माण में इन नेताओं और उनकी भूमिका में मेल बैठाएँ: क. मोतीलाल नेहरू 1. संविधान सभा के अध्यक्ष ख. बी.आर. अंबेडकर 2. संविधान सभा की सदस्य ग. राजेंद्र प्रसाद प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष घ. सरोजिनी नायडू 4. 1928 में भारत का संविधान बनाया m 5. जवाहर लाल नेहरू के नियति के साथ साक्षात्कार वाले भाषण के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों का जवाब दें: क. नेहरू ने क्यों कहा कि भारत का भविष्य सुस्ताने और आराम करने का नहीं है? ख. नए भारत के सपने किस तरह विश्व से जुड़े हैं? ग. वे संविधान निर्माताओं से क्या शपथ चाहते थे? घ. “हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की कामना हर आँख से आँसू पोंछने की है। वे इस कथन में किसका जिक्र कर रहे थे? हमारे संविधान को दिशा देने वाले ये कुछ मूल्य और उनके अर्थ हैं। इन्हें आपस में मिलाकर दोबारा लिखिए। क. संप्रभु 1. सरकार किसी धर्म के निर्देशों के अनुसार काम नहीं करेगी। ख. गणतंत्र 2. फैसले लेने का सर्वोच्च अधिकार लोगों के पास है। ग. बंधुत्व 3. शासन प्रमुख एक चुना हुआ व्यक्ति है। घ. धर्मनिरपेक्ष 4. लोगों को आपस में परिवार की तरह रहना चाहिए। संविधान निर्माण 51 कुछ दिन पहले नेपाल से आपके एक मित्र ने वहाँ की राजनैतिक स्थिति के बारे में आपको पत्र लिखा था। वहाँ अनेक राजनैतिक पार्टियाँ राजा के शासन का विरोध कर रही थीं। उनमें से कुछ का कहना था कि राजा द्वारा दिए गए मौजूदा संविधान में ही संशोधन करके चुने हुए प्रतिनिधियों को ज्यादा अधिकार दिए जा सकते हैं। अन्य पार्टियाँ नया गणतांत्रिक संविधान बनाने के लिए नई संविधान सभा गठित करने की मांग कर रही थीं। इस विषय में अपनी राय बताते हुए अपने मित्र को पत्र लिखें। 8. भारत के लोकतंत्र के स्वरूप में विकास के प्रमुख कारणों के बारे में कुछ अलग-अलग विचार इस प्रकार हैं। आप इनमें से हर कथन को भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कितना महत्त्वपूर्ण कारण मानते हैं? क. अंग्रेज़ शासकों ने भारत को उपहार के रूप में लोकतांत्रिक व्यवस्था दी। हमने ब्रिटिश हुकूमत के समय बनी प्रांतीय असेंबलियों के जरिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम करने का प्रशिक्षण पाया। ख. हमारे स्वतंत्रता संग्राम ने औपनिवेशिक शोषण और भारतीय लोगों को तरह-तरह की आज़ादी न | दिए जाने का विरोध किया। ऐसे में स्वतंत्र भारत को लोकतांत्रिक होना ही था। ग. हमारे राष्ट्रवादी नेताओं की आस्था लोकतंत्र में थी। अनेक नव स्वतंत्र राष्ट्रों में लोकतंत्र का न आना हमारे नेताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। प्रश्नावली 9. 1912 में प्रकाशित ‘विवाहित महिलाओं के लिए आचरण' पुस्तक के निम्नलिखित अंश को पढ़ें: “ईश्वर ने औरत जाति को शारीरिक और भावनात्मक, दोनों ही तरह से ज्यादा नाजुक बनाया है। उन्हें आत्म रक्षा के भी योग्य नहीं बनाया है। इसलिए ईश्वर ने ही उन्हें जीवन भर पुरुषों के संरक्षण में रहने का भाग्य दिया है-कभी पिता के, कभी पति के और कभी पुत्र के। इसलिए महिलाओं को निराश होने की जगह इस बात से अनुगृहीत होना चाहिए कि वे अपने आपको पुरुषों की सेवा में समर्पित कर सकती हैं। क्या इस अनुच्छेद में व्यक्त मूल्य संविधान के दर्शन से मेल खाते हैं या वे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ़ हैं? 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए। क्या आप उनसे सहमत हैं? अपने कारण भी बताइए। क. संविधान के नियमों की हैसियत किसी भी अन्य कानून के बराबर है। ख. संविधान बताता है कि शासन व्यवस्था के विविध अंगों का गठन किस तरह होगा। ग. नागरिकों के अधिकार और सरकार की सत्ता की सीमाओं का उल्लेख भी संविधान में स्पष्ट रूप में है। घ. संविधान संस्थाओं की चर्चा करता है, उसका मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है। संविधान संशोधन के किसी प्रस्ताव या किसी संशोधन की माँग से संबंधित अखबारी खबरों को ध्यान से पढ़िए। आप किसी एक विषय पर, जैसे संसद/विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण विषय पर छपी खबरों पर गौर कर सकते हैं। क्या इस सवाल पर कोई सार्वजनिक चर्चा हुई थी? । संशोधन के पक्ष में क्या-क्या तर्क दिए गए हैं? संविधान संशोधन पर विभिन्न दलों की क्या प्रतिक्रिया थी? क्या यह संशोधन हो गया है? 58 लोकतांत्रिक राजनीति संविधान निर्माण नेहरू मेमोरियल म्यूज्यिम एवं लाइब्रेरी, नई दिल्ली 59

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