अध्याय 13 हम बीमार क्यों होते हैं ियाकलाप ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ13ण्1 ऽ ऽ ऽ ऽ हमने लातूर, भुज, कश्मीर आदि में आए भूकंप अथवा तटवतीर् भाग को प्रभावित करने वाले चक्रवात के विषय में सुना है। आप यह कल्पना करें कि इनके जैसी कितनी संभावित आपदाओं से लोगों का स्वास्थ्य किस प्रकार प्रभावित होगा, यदि ये हमारे आस - पास घटित हों। इन आपदाओं के वास्तव में घटने के समय हमारेऊपर क्या - क्या प्रभाव पड़ेंगे? आपदा घटित होने के पश्चात् कितने समय तक विभ्िान्न प्रकार की स्वास्थ्य संबंध्ी समस्याएँ पैदा होती रहेंगी? पहली स्िथति में ;आपदा के समयद्ध स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ते हैं? तथा दूसरी स्िथति में ;आपदा के पश्चात्द्ध स्वास्थ्य संबंध्ी कौन - कौन सी समस्याएँ उत्पन्न होंगी? इस ियाकलाप के दौरान हमें यह अनुभव होता है कि मानव समुदाय में स्वास्थ्य एवं रोग एक जटिल समस्या है, जिसके लिए एक - दूसरे से संबंिात अनेककारक उत्तरदायी हैं। हम यह भी अनुभव करते हैं कि ‘स्वास्थ्य’ और ‘रोग’ का अथर् स्वयं में बहुत जटिल है। जब हम पूछते हैं कि बीमारियों के क्या कारण हैं और इसकी रोकथाम केस होगी? तो हमें इन अवधारणाओं के अथर् जानने होंगे। हम जानते हैं कि कोश्िाकाएँ सजीवों की मौलिक इकाइर् हैं। कोश्िाकाएँ विभ्िान्न प्रकार के रासायनिक पदाथो±ऋ जैसेμप्रोटीन, काबोर्हाइड्रेट, वसा अथवा लिपिड, आदि से बनी होती हैं। यद्यपि चित्रा में ये स्िथर प्रतीत होती हंै लेकिन इनमें कापफी सियता पाइर् जाती है। ;ॅील क्व ॅम थ्ंसस प्ससद्ध इसके अंदर वुफछ न वुफछ ियाएँ सदैव होती रहती हैं। कोश्िाकाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान को गतिशील रहती हंै। यहाँ तक कि जिन कोश्िाकाओं में गति नहीं होती है उनमें भी वुफछ न वुफछ मरम्मत का कायर् चलता रहता है। नइर् - नइर् कोश्िाकाएँ बनती रहती हैं।हमारे अंगों अथवा ऊतकों में बहुत - सी विश्िाष्ट ियाएँ चलती रहती हैंऋ जैसेμहृदय ध्ड़कता है, पफेपफड़े सांस लेते हैं, वृक्क में निस्पंदन द्वारा मूत्रा बनता है, मस्ितष्क सोचता है। ये सभी वि्रफयाएँ परस्पर संबंध्ित हंै। उदाहरणतः यदि वृक्क में निस्पंदन न हो तो विषैले पदाथर् हमारे शरीर में एकत्रा हो जाएँगे। इस परिस्िथति में मस्ितष्क उचित प्रकार से नहीं सोच सकेगा। इन सभी पारस्परिकियाओं को करने के लिए ऊजार् तथा कच्चे पदाथो± की आवश्यकता होती है। ये कच्चे पदाथर् हमारे शरीर को बाहर से प्राप्त होते हैं अथार्त् कोश्िाकाओं तथाऊतकों को कायर् करने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। ऐसा कोइर् भी कारक जो कोश्िाकाओं एवंऊतकों को उचित प्रकार से कायर् करने से रोकता है, वह हमारे शरीर की समुचित िया में कमी का कारण होगा। उपरोक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर हम स्वास्थ्य तथा रोग की अवधरणाओं को समझेंगे। 13ण्1 स्वास्थ्य तथा इसका बिगड़ना 13ण्1ण्1 ‘स्वास्थ्य’ का महत्त्व ;साथर्कताद्ध हम सभी ने ‘स्वास्थ्य’ शब्द को सुना है तथा इस शब्द का प्रयोग भी हम प्रायः करते हैं, जैसे कि हम कहते हैं कि ‘मेरी दादी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है’। हमारे अध्यापक भी इस शब्द का प्रयोग करते हैं जबकहते हैं कि ‘आपकी अभ्िावृिा स्वस्थ नहीं है’। इस ‘स्वास्थ्य’ शब्द का अथर् क्या है? यदि हम इस विषय पर विचार करें तो हमें बोध् होगा कि इनका अथर् ‘अच्छा’ रहने से है। हम इस अच्छापन का अथर् ‘प्रभावी कायर् करना’ सोच सकते हैं। हमारी दादी के लिए बाशार जाना अथवा पास - पड़ोस में जाने योग्य होना ‘अच्छे स्वास्थ्य’ के प्रतीक हैं। यदि वे, ये करने योग्य नहीं हैं तो हम कहते हैं कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। जब आपकी रुचि कक्षा में पढ़ने की है तो हम कहते हैं किआपकी अभ्िावृिा ठीक है और यदि पढ़ने की रुचिनहीं है तो कहते हैं अभ्िावृिा स्वस्थ नहीं है। अतः ‘स्वास्थ्य’ वह अवस्था है जिसके अंतगर्त शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कायर् समुचित क्षमता द्वारा उचित प्रकार से किया जा सके। 13ण्1ण्2व्यक्ितगत तथा सामुदायिक समस्याएँः दोनों ही स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं स्वास्थ्य किसी व्यक्ित की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक जीवन क्षमता की पूणर्रूपेण - समन्वयित स्िथति है तो कोइर् भी व्यक्ित इसे स्वयं ही पूणर्रूपेण प्राप्त नहीं कर सकता। सभी जीवों का स्वास्थ्य उसके पास - पड़ोस अथवा उसके आस - पास के पयार्वरण पर आधरित होता है। पयार्वरण में भौतिक कारक आते हैं। उदाहरणाथर्ः चक्रवात हमारे स्वास्थ्य को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। लेकिन उससे भी महत्वपूणर् यह है कि मानव समाज में रहता है। अतः हमारा सामाजिक पयार्वरण हमारे व्यक्ितगत स्वास्थ्य के लिए अध्िक महत्वपूणर् है। हम गाँवों, कस्बों अथवा शहरों में रहते हैं। ऐसे स्थानों में हमारे भौतिक पयार्वरण का निधर्रण सामाजिक पयार्वरण द्वारा ही होता है। सोचिए कूड़ा - करकट उठाने वाली एजेंसी कचरे का निपटारा न करे तो क्या होगा? सोचिए यदि नालियाँ सापफ न हांे तो क्या होगा? यदि कापफी मात्रा में वूफड़ा - करकट गलियों में पेंफका जाता है अथवा खुले नाले के रुके हुऐ पानी में स्िथर पड़ा रहता है, तो खराब स्वास्थ्य की संभावना बढ़ जाती है। अतः सामुदायिक स्वच्छता व्यक्ितगत स्वास्थ्य के लिए महत्वपूणर् है। ियाकलाप ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ13ण्2 ऽ पता करें कि आपके स्थानीय प्राध्िकरण ;पंचायत/नगर निगमद्ध ने स्वच्छ जल की आपूतिर् के लिए क्या उपाय किए हैं? ऽ क्या आपके मोहल्ले में सभी निवासियों को स्वच्छ जल प्राप्त हो रहा है। ियाकलाप ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ13ण्3 ऽ पता करें कि आपका स्थानीय प्राध्िकरण आपके मोहल्ले में उत्पन्न कचरे का निपटारा वैफसे करता है? ऽ क्या प्राध्िकरण द्वारा किए गए उपाय पयार्प्त हैं? ऽ यदि नहीं, तो इसके सुधर के लिए आप क्या सुझाव देंगे? ऽ आप अपने घर में दैनिक/साप्ताहिक उत्पन्न होने वाले कचरे को कम करने के लिए क्या करेंगे? स्वास्थ्य के लिए हमें भोजन की आवश्यकता होती है। इस भोजन को प्राप्त करने के लिए हमें काम करना पड़ता है। इसके लिए, हमें काम करने के अवसर खोजने पड़ते हैं। अच्छी आथ्िार्क परिस्िथतियाँ तथा कायर् भी व्यक्ितगत स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। स्वस्थ रहने के लिए हमें प्रसन्न रहना आवश्यक है। यदि किसी से हमारा व्यवहार ठीक नहीं है और एक - दूसरे से डर हो तो हम प्रसन्न तथा स्वस्थ नहीं रह सकते। इसलिए व्यक्ितगत स्वास्थ्य के लिए सामाजिक समानता बहुत आवश्यक है। हम इसी प्रकार सोच सकते हैं कि अनेक सामुदायिक समस्याएँ हमारे व्यक्ितगत स्वास्थ्य को वैफसे प्रभावित करती हैं? 13ण्1ण्3‘स्वस्थ रहने’ तथा ‘रोगमुक्त’ में अंतर यदि हम इसे स्वास्थ्य समझते हैं तो रोग अथवा व्याध्ि क्या है? अंग्रेजी का यह शब्द ;क्प्ै़ठ।ैम्द्ध स्वयं को परिभाष्िात करता है ‘बाध्ित आराम’। रोग का दूसरा अथर् है असुविध। यद्यपि इस शब्द के अथर् का प्रयोग बहुत सीमित है। हम रोग के विषय में तब बात करते हैं जब हमें असुविध के विश्िाष्ट कारण का पता होता है। इसका अथर् यह बिलवुफल नहीं है किहम इसका सही तथा अंतिम उत्तर जानंेऋ हम बिना कारण जाने यह कह सकते हैं कि कोइर् व्यक्ित प्रवाहिका से ग्रस्त है। हम यह सरलता से पाते हैं कि बिना किसी विशेष रोग के भी आप अस्वस्थ हो सकते हैं। केवल कोइर् रोग न होने का अथर् यह नहीं कि आप स्वस्थ हैं। नतर्क के लिए अच्छे स्वास्थ्य का अथर् है कि वह श्िाष्टतापूवर्क अपने शरीर द्वारा विषम परिस्िथतियों की मुद्रा अभ्िाव्यक्त कर सके। संगीतकार के लिए इसका अथर् है कि वह लंबा श्वास ले सके जिससे कि वह अपनी बाँसुरी में स्वर को नियंत्रिात कर सके। हमें अपनी विश्िाष्ट क्षमता को प्राप्त करने का अवसर भी वास्तविक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इस प्रकार हम किसी रोग के लक्षणों की अभ्िाव्यक्ित के बिना भी अस्वस्थ हो सकते हैं। यही कारण है जब हम स्वास्थ्य के विषय में सोचते हैं, हम समाज तथा समुदाय के विषय में सोचते हैं। और रोग के विषय में सोचते समय हम सिपर्फ अपने बारे में विचार करते हैं। श्न 1.अच्छे स्वास्थ्य की दो आवश्यक स्िथतियाँ बताइए।प्र2.रोगमुक्ित की कोइर् दो आवश्यक परिस्िथतियाँ बताइए। 3.क्या उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर एक जैसे हैं अथवा भ्िान्न क्यों? 13ण्2 रोग तथा इसके कारण 13ण्2ण्1 रोग किस तरह के दिखाइर् देते हैं? आओ, रोग के विषय में और अध्िक सोचें। पहले यह कि हमें वैफसे पता लगता है कि हमें कोइर् रोग है? अथार्त् वैफसे पता लगता है कि शरीर में वुफछ दोष है? हमने छठे अध्याय में पढ़ा है कि हमारे शरीर में अनेकऊतक होते हैं। ये ऊतक हमारे शरीर के ियात्मक तंत्रों अथवा अंगतंत्रों को बनाते हैं जो शरीर के विभ्िान्न कायो± को संपादित करते हैं। हर अंग तंत्रा का अपना एक विशेष अंग होता है जिसका एक विशेष कायर् होता है। जैसेः पाचन तंत्रा में आमाशय तथा आँत्रा होते हैं, जो हमारे द्वारा खाए गए भोजन को पचाते हं।ैपेश्िायों तथा अस्िथयों से बना पेशी - वंफकाल तंत्रा, हमारे शरीर को संभालता है और शरीर की गति में सहायता करता है। जब कोइर् रोग होता है तब शरीर के एक अथवा अनेक अंगों एवं तंत्रों में िया अथवा संरचना में ‘खराबी’ परिलक्ष्िात होने लगती है। ये बदलाव ;परिवतर्नद्ध रोग के लक्षण दशार्ते हैं। रोग के लक्षण हमें ‘खराबी’ का संकेत देते हैं। इस प्रकार सिरददर्, खाँसी, दस्त, किसी घाव में पस ;मवादद्ध आना, ये सभी लक्षण हैं। इन लक्षणों से किसी - न - किसी रोग का पता लगता है। लेकिन इनसे यह नहीं पता चलता कि कौन - सा रोग है? उदाहरण के लिए, सिरददर् का कारण परीक्षा का भय अथवा इसका अथर् मस्ितष्क का वरण शोथ ;उमदपदहपजपेद्ध होना अथवा दजर्नों विभ्िान्न बीमारियों में से एक हो सकता है।रोग के चिÉ वे हैं जिन्हें चिकित्सक लक्षणों के आधर पर देखते हैं। लक्षण किसी विशेष रोग के बारे में सुनिश्िचत संकेत देते हैं। चिकित्सक रोग के सही कारण को जानने के लिए प्रयोगशाला में वुफछ परीक्षण भी करवा सकता है। 13ण्2ण्2तीव्र ;प्रचंडद्ध तथा दीघर्कालिक रोग ;बीमारीद्ध रोगों की अभ्िाव्यक्ित भ्िान्न - भ्िान्न हो सकती है और कइर् कारकों पर निभर्र करती है। इनमें सबसे स्पष्ट कारक जिससे रोग का पता चलता है, वह है अविा। वुफछ रोगों की अवध्ि कम होती है जिन्हें तीव्र रोग कहते हैं। हम सभी ने अनुभव किया है कि खाँसी - जुकाम बहुत कम अवध्ि तक रहते हंै। अन्य ऐसे रोग हैं जो लंबी अवध्ि तक अथवा जीवनपय±त रहते हैं, ऐसे रोगों को दीघर्कालिक रोग कहते हैं। इसका एक उदाहरण एलिप़ेफनटाइसिस अथवा पफीलपाँव रोग है। यह भारत के वुफछ क्षेत्रों में बहुत आम है। ियाकलाप ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ13ण्4 ऽ निम्न का पता करने के लिए अपने पास - पड़ोस का पयार्वलोकन करंेः ऽ पिछले तीन महीनों में कितने लोग तीव्र रोगों से ग्रसित हुए? ऽ पिछले तीन महीनों में कितने लोग दीघर्कालिक रोग से ग्रसित हुए? ऽ आपके पड़ोस में वुफल कितने लोग दीघर्कालिक रोग से पीडि़त हैं? ऽ क्या उपरोक्त प्रश्न 1 तथा 2 के उत्तर भ्िान्न हैं? ऽ क्या उपरोक्त प्रश्न 2 तथा 3 के उत्तर भ्िान्न हैं? ऽ क्या आप सोच सकते हैं कि इस भ्िान्नता के क्या कारण हो सकते हैं? इस भ्िान्नता का लोगों के सामान्य स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव होगा? 13ण्2ण्3दीघर्कालिक रोग तथा अस्वस्थता जैसा कि हम कल्पना कर सकते हैं कि तीव्र तथा दीघर्कालिक रोगों के हमारे स्वास्थ्य पर भ्िान्न - भ्िान्न प्रभाव होते हंै। कोइर् भी रोग जो हमारे शरीर के किसी भी भाग के कायर् को प्रभावित करता है, तो वह हमारे सामान्य स्वास्थ्य को भी प्रभावित करेगा। क्यांेकि सामान्य स्वास्थ्य के लिए शरीर के सभी अंगों का समुचित कायर् करना आवश्यक है। लेकिन तीव्र रोग, जो बहुत कम समय तक रहता है, उसे सामान्य स्वास्थ्य को प्रभावित करने का समय ही नहीं मिलता। लेकिन दीघर्कालिक रोग हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। हम बीमार क्यों होते हैं उदाहरणतः खाँसी - जुकाम के विषय में सोचो जो हम सभी को प्रायः होता रहता है। हममें से अिाकांश लगभग एक सप्ताह में ठीक हो जाते हैं और हमारे स्वास्थ्य पर कोइर् विशेष वुफप्रभाव नहीं पड़ता। खाँसी - जुकाम के कारण हमारा वजन भी कम नहीं होता, हमारी साँस भी नहीं पूफलती, हम सदैव थकान भी महसूस नहीं करते। लेकिन यदि हम दीघर्कालिक रोग जैसे - पफेपफड़ों के क्षय रोग से संक्रमित हो जाएँ तो कइर् वषो± तक बीमार होने के कारण वजन कम हो जाता है और हर समय थकान महसूस करते हैं। यदि आप तीव्र रोग से पीडि़त हैं तो आप वुफछ दिनों के लिए विद्यालय नहीं जा सकते हैं लेकिन यदि दीघर्कालिक रोग से पीडि़त हैं तो हमें स्वूफल में पढ़ाइर् को समझने में कठिनाइर् होगी और हमारे सीखने की क्षमता भी कम हो जाएगी अथार्त् हम काप़फी समय तक अस्वस्थ रह सकते हैं। इसलिए दीघर्कालिक रोग तीव्र रोग की अपेक्षा लोगों के स्वास्थ्य पर लंबे समय तक विपरीत प्रभाव बनाए रखता है। 13ण्2ण्4रोग के कारक रोग के क्या कारण हंै? जब हम रोग के कारण के विषय में सोचते हैं तब हमें यह याद रखना चाहिए कि इस कारण के बहुत से स्तर होते हैं। आओ, एक उदाहरण लें। यदि कोइर् छोटा बच्चा पतले दस्त ;सववेम उवजपवदेद्ध से ग्रस्त है तो हम कह सकते हैं कि इसका कारण वायरस है। इसलिए रोग का तात्कालिक कारण वायरस है। लेकिन अगला प्रश्न उठता हैμवाइरस कहाँ से आता है ? मान लो कि हमें पता लगता है कि वायरस दूष्िात जल पीने से आता है। लेकिन अन्य बच्चों ने भी तो दूष्िात जल पिया है। तब इसका क्या कारण है कि एक बच्चे को ही दस्त लग गया और दूसरों को नहीं? इसका एक कारण यह हो सकता है कि बच्चा स्वस्थ्य न हो। जिसके परिणामस्वरूप, ऐसा संभव हुआ कि जब यह बच्चा वायरस के संपवर्फ में आता 201 है, तो वह बीमार हो जाता है जबकि अन्य बच्चे नहीं। अब प्रश्न उठता है कि बच्चा स्वस्थ्य क्यों नहीं है? शायद बच्चे का पोषण ठीक न हो और वह पयार्प्त भोजन नहीं करता हो। अतः पयार्प्त पोषण का न होना ही रोग का दूसरा कारण है। बच्चा पयार्प्त पोषण क्यों नहीं पाता? शायद बच्चे के माता - पिता गरीब हों। यह भी संभव है कि बच्चे में आनुवंश्िाक भ्िान्नता हो जो वायरस के संपवर्फ में आने पर पतले दस्त से प्रभावित हो जाता है। केवल आनुवंश्िाक विभ्िान्नता अथवा कम पोषण भी बिना वायरस के पतले दस्त नहीं उत्पन्न कर सकते। लेकिन ये भी रोग के कारण में सहयोगी बनते हैं। बच्चे के लिए साप़फ पानी उपलब्ध् क्यों नहीं था? शायद जहाँ बच्चे का परिवार रहता है वहाँ पर खराब लोक सेवाओं के कारण साप़फ पानी उपलब्ध् न हो। इस प्रकार गरीबी तथा लोक सेवाओं की अनुप्लब्धता बच्चे की बीमारी के तीसरे स्तर के कारण हैं। इस प्रकार अब यह स्पष्ट हो गया है कि सभी रोगों के तात्कालिक कारण तथा सहायक कारण होते हैं। साथ ही विभ्िान्न प्रकार के रोग होने के एक नहीं बल्िक बहुत से कारण होते हैं। 13ण्2ण्5 संक्रामक तथा असंक्रामक कारक हमने देखा कि जब कभी भी रोग के कारण के विषय में सोचंे तो हमें लोक स्वास्थ्य तथा समुदाय स्वास्थ्य संबंध्ी कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है। हम इस विषय में और चचार् करते हैं। रोग के तात्कालिक कारणों के विषय में सोचना अच्छा है, क्योंकि ये दोनों भ्िान्न - भ्िान्न प्रकार के होते हैं। रोग के कारण का एक वगर् है, संक्रामक कारक, जो अध्िकांशतः सूक्ष्म जीव होते हैं। वह रोग जिनके तात्कालिक कारक सूक्ष्म जीव होते हैं उन्हें संक्रामक रोग कहते हैं। इसका कारण यह है कि सूक्ष्म जीव समुदाय में पैफल सकते हैं और इनके कारण होने वाले रोग भी इनके साथ पफैल जाते हैं। इनके विषय में सोचोः 1.क्या रोगी व्यक्ित के संपवर्फ में आने पर सभी रोग पफैल जाते हैं ? 2.ऐसे कौन से रोग हैं जो नहीं पैफलते ? 3.मनुष्यों में वे रोग वैफसे हो जाते हैं, जो रोगी के संपवर्फ में आने से नहीं पैफलते? दूसरी तरप़फ, वुफछ रोग ऐसे होते हैं जो संक्रामक कारकों द्वारा नहीं होते। उनके कारक भ्िान्न होते हैं। लेकिन वे बाहरी कारक जो सूक्ष्म जीव नहीं होते वे समुदाय में पैफल सकते हैं। यद्यपि ये बहुध आंतरिक एवं असंक्रामक हंै। उदाहरणतः, वुफछ प्रकार के वैंफसर आनुवंश्िाक असामान्यता के कारण होते हैं। उच्च रक्त चाप का कारण अिाक वजन होना तथा व्यायाम न करना है। आप ऐसे ही अन्य रोगों के विषय में सोच सकते हैं जो संक्रामक नहीं हैं। पेप्िटक व्रण तथा नोबेल पुरस्कार कइर् वषो± से हम यही सोचते थे कि पेप्िटक व्रण, जो आमाशय तथा ग्रहणी में ऐसिडिटी संबंध्ित ददर् तथा रक्तस्राव करता है, का कारण रहने - सहने का ढंग है। प्रत्येक व्यक्ित सोचता था कि परेशानी भरे जीवन से आमाशय में एसिड का स्राव होता है जिसके कारण पेप्िटक व्रण हो जाता है। दो आस्ट्रेलियाइर् वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि एक बैक्टीरिया - हेलीकोबैक्टर पायलोरी पेप्िटक व्रण का कारण है। पथर्, आस्ट्रेलिया के रोग विज्ञानी राॅबिन वाॅरेन ;जन्म सन् 1937द्ध ने इन छोटे - छोटे वक्राकार बैक्टीरियाओं को अनेक रोगियों के आमाशय के निचले भाग में देखा। बैरी माशर्ल ;जन्म सन् 1951द्ध, एक चिकित्सक ने वाॅरेन की खोश में दिलचस्पी ली और उन्होंने इन स्रोतों से बैक्टीरिया का संवधर्न करने में सपफलता प्राप्त की। अपने उपचार अध्ययन में माशर्ल तथा वाॅरेन ने पता लगाया कि रोगी के पेप्िटक व्रण का उपचार तभी हो सकता है जब बैक्टीरियाओं को आमाशय में मार दिया जाए। माशर्ल तथा वाॅरेन के इस अद्भुत कायर् के लिए विश्व समुदाय आभारी है कि पेप्िटक व्रण अब दीघर्कालिक एवं असहाय स्िथति वाला रोग नहीं रहा, बल्िक वुफछ समय तक प्रतिजैविक ;एंटीबायोटिकद्ध के उपचार से ठीक हो जाता है। इस खोश के लिए माशर्ल तथा वाॅरेन को ;चित्रा देखेंद्ध शरीरिया विज्ञान तथा औषध्ि ;उमकपबपदमद्ध के लिए सन् 2005 में संयुक्त रूप में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। रोगों के पैफलने के तरीके तथा उनके उपचार वफी विध्ियाँ तथा सामुदायिक स्तर पर उनके निवारण वफी विध्ियाँ विभ्िान्न रोगों के लिए भ्िान्न - भ्िान्न होती हैं। यहाँ पर यह निभर्र करता है कि इनके तात्कालिक कारण संक्रामक हैं अथवा असंक्रामक। श्न 1.ऐसे तीन कारण लिख्िाए जिससे आप सोचते हैं कि आप बीमार हैं तथा चिकित्सक के पास जाना चाहते हैंे। यदि इनमें से एक भी लक्षण हो तो क्या आप पिफर भी चिकित्सक के पास जाना चाहेंगे? क्यों अथवा क्यों नहीं ? प्र 2.निम्नलिख्िात में से किसके लंबे समय तक रहने के कारण आप समझते हैं कि आपके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। तथा क्यों? ऽ यदि आप पीलिया रोग से ग्रस्त हैं। ऽ यदि आपके शरीर पर जूँ ;सपबमद्ध हैं। ऽ यदि आप मुँहासों से ग्रस्त हैं। 13ण्3 संक्रामक रोग 13ण्3ण्1संक्रामक कारक हमने देखा कि सजीव जगत की संपूणर् विविधता को वुफछ ही वगो± में विभाजित किया जा सकता है। विभ्िान्न जीवों का वगीर्करण वुफछ सामान्य गुणों के आधर पर करते हैं। रोग उत्पन्न करने वाले जीव इनमें से अनेक वगो± के अंतगर्त आते हैं। उनमें से वुफछ वाइरस, वुफछ बैक्टीरिया, वुफछ पंफजाइर् ;कवकद्ध, वुफछ एककोश्िाक जंतु अथवा प्रोटोजोआ हैं। वुफछ रोगबहुकोश्िाक जीवों, जैसे अनेक प्रकार के कृमि से भी होते हैं। वाइरस से होने वाले सामान्य रोग हैं खाँसी - जुकाम,इंफ्रलुएंजा, डेंगु बुखार तथा एड्स ;।प्क्ैद्ध। वुफछ रोग जैसे कि टायपफाॅयड बुखार, हैजा, क्षयरोग तथा एंथ्रेक्स बैक्टीरिया द्वारा होते हैं। बहुत से सामान्य त्वचा रोग विभ्िान्न प्रकार की पंफजाइर् द्वारा होते हैं। प्रोटोजोआ से मलेरिया, तथा कालाजार नामक रोग हो जाते हैं। हमआँत्रा कृमि संक्रमण से परिचित हैं। इसी प्रकार पफीलपाँंवनामक रोग भी कृमि की विभ्िान्न स्पीशीश द्वारा होता है। यह क्यों महत्वपूणर् है कि हम संक्रामक कारकोंके इन वगो± के विषय में सोचते हैं? इसका उत्तर यह है कि ये वगर् उपचार की विध्ि निधार्रित करते हैं। इन वगो± के प्रत्येक सदस्यों के जैविक गुणों में समानता है ;जैसे वाइरस, बैक्टीरिया आदिद्ध। उदाहरणतः, सभी वाइरस, परपोषी की कोश्िाकाओं में रहते हैं, लेकिन बैक्टीरिया में ऐसा कम ही होता है। वाइरस, बैक्टीरिया तथा पफंजाइर् में गुणन अत्यंत तेशी से चित्रा 13ण्1;ंद्धरू संक्रमित कोश्िाका से बाहर निकलते हुए ै।त्ै बैक्टीरिया चित्रा में तीर द्वारा इंगित किए गए हैं। चित्रा में सप़ेफद रेखा 500 नैनोमीटर माप को दशार्ती है, जो एक माइक्रोमीटर का आध है। एक माइक्रोमीटर एक मिलीमीटर के एक हशारवें भाग के बराबर है। यह मापचित्रा इस बात को दशार्ता है कि हम कितनी सूक्ष्म वस्तुओं को देख रहे हैं। सौजन्य - इमजि±ग इंपेफक्शस डिसीश, सीडीसी यू. एस. का एक जनर्ल चित्रा 13ण्1;बद्धरू प्रोटोजोआ टिªप्नोसोमा यह निंद्रालु व्याध्ि का कारक है। टिªप्नोसोमा को तस्तरीनुमा लाल रक्त कोश्िाका के साथ प्रदश्िार्त किया गया है जिससे आपको उसके आकार का पता चल सके काॅपीराइटμओरेगाॅज हैल्थ एंड सांइस युनीवसिर्टी, यू.एसचित्रा 13ण्1;कद्धरू लेश्मानियादृकालाशार व्याध्ि कारक प्रोटोजोआ। यह जीव अंडाकार तथा प्रत्येक में एक चाबुकनुमा संरचना होती है। विभाजित होते जीव को तीर द्वारा दशार्या गया है चित्रा 13ण्1;मद्धरू गोलकृमि ;एस्केरिस लुंब्रीकाॅयडिसद्ध छोटी आँत में पाया जाता है। 4बउ के स्केल की माप एक व्यस्क गोलवृफमि के आकार के अनुमान के लिए है होता है जबकि तुलनात्मक रूप से कृमि में गुणन मंद होता है। वगीर्करण के अनुसार सभी बैक्टीरिया एक - दूसरे से वाइरस की अपेक्षा अध्िक निकट होते हैं। ऐसा वाइरस में भी होता है। इसका अथर् यह है कि अनेक जैव प्रियाएँ सभी बैक्टीरियाओं में समान होती हैं, लेकिन वाइरस वगर् से भ्िान्न होंगी। इसके परिणामस्वरूप औषध्ि जो किसी वगर् में किसी एक जैव प्रिया को रोकती है तो यह उस वगर् के अन्य सदस्यों पर भी इसी प्रकार का प्रभाव डालेगी। लेकिन वही औषध्ि अन्य वगर् से संबंध्ित रोगाणुओं पर प्रभाव नहीं डालेगी। हम एंटीबायोटिक का ही उदाहरण लेते हैं। वे सामान्यतः बैक्टीरिया के महत्वपूणर् जैव रासायनिक मागर् को बंद कर देते हैं। उदाहरणतः, बहुत - से बैक्टीरियाअपनी रक्षा के लिए कोश्िाका भ्िािा बना लेते हैं।पेनिसिलीन, एंटीबायोटिक बैक्टीरिया की कोश्िाका भ्िािा बनाने वाली प्रिया को बाध्ित कर देती है। इसकेपरिणामस्वरूप बैक्टीरिया कोश्िाका भ्िािा नहीं बना सकते हैं और वे सरलता से मर जाते हैं। मानव कीकोश्िाकाएँ कोश्िाका भ्िािा नहीं बना सकतीं इसलिए पेनिसिलीन का प्रभाव हम पर नहीं होता। पेनिसिलीन ऐसे सभी बैक्टीरिया को प्रभावित करेंगे जिनमें कोश्िाकाभ्िािा बनाने की प्रिया होती है। इसी प्रकार बहुत से एंटीबायोटिक बैक्टीरिया की अनेक स्पीशीश को प्रभावित करते हैं न कि केवल एक स्पीशीश को। लेकिन वाइरस में ऐसा मागर् नहीं होता और यही कारण है कि कोइर् भी एंटीबायोटिक वाइरस संक्रमण पर प्रभावकारी नहीं है। यदि हम खाँसी - जुकाम से ग्रस्त हैं तो एंटीबायोटिक लेने से रोग की तीव्रता अथवा उसकी समय अविा कम नहीं होती। यद्यपि, यदि वाइरस संव्रफमित खाँसी - जुकाम के साथ बैक्टीरिया संक्रमण होता है तब एंटीबायोटिक का उपयोग लाभदायक होगा लेकिन पिफर भी एंटीबायोटिक बैक्टीरिया संक्रमण पर ही उपयोगी होगा न कि वाइरस संक्रमण पर। ियाकलापऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ13ण्5 ऽ पता कीजिए कि आपकी कक्षा में वुफछ दिनों पहले कितने विद्याथ्िार्यों को जुकाम/ खाँसी/बुखार हुआ था। ऽ उनको बीमारी कितने दिनों तक रही ? ऽ इनमें से कितनों ने एंटीबायोटिक का उपयोग किया ;अपने माता - पिता से पूछो कि आपने एंटीबायोटिक लिया अथवा नहीं।द्ध ऽ जिन्होंने एंटीबायोटिक लिया था वे कितने दिनों तक बीमार रहे ? ऽ जिन्होंने एंटीबायोटिक नहीं लिया था वे कितने दिनों तक बीमार रहे? ऽ क्या इन दोनों वगो± में कोइर् अंतर हैं? ऽ यदि हाँ तो क्योंऋ यदि नहीं तो क्यों नहीं ? 13ण्3ण्2 रोग पफैलने के साध्न संक्रामक रोग वैफसे पफैलते हैं? बहुत से सूक्ष्मजीवीय कारक रोगी से अन्य स्वस्थ मनुष्य तक विभ्िान्न तरीकों से पफैलते हैं अथार्त् वे संचारित हो सकते हैं अतः इन्हें संचारी रोग भी कहते हैं। ऐसे रोगों के सूक्ष्म जीव हवा द्वारा पफैलते हैं। ऐसा तब होता है जब रोगी मनुष्य छींकता है अथवा खाँसी करता है। उस समय छोटे - छोटे बूँदक बाहर निकलते हैं। जब उसके समीप कोइर् अन्य व्यक्ित हो तो श्वास द्वारा ये बूँदक उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इनसे सूक्ष्म जीवों को नए संक्रमण करने का अवसर मिल जाता है। वायु द्वारा पैफलने वाले रोगों के उदाहरण हैं खाँसी - जुकाम, निमोनिया तथा क्षय रोग। हम सभी ने ऐसा अनुभव किया होगा कि जब हम किसी खाँसी - जुकाम से ग्रस्त व्यक्ित के पास बैठते हैं तो हमें भी खाँसी - जुकाम हो जाता है। जहाँ पर अध्िक भीड़ होगी वहाँ पर हवा द्वारा पैफलने वाले रोग भी अध्िक होंगे। जल द्वारा भी रोग पैफल सकते हैं। जब संक्रमणीय रोग यथा हैजा से ग्रसित रोगी के अपश्िाष्ट पेयजल में मिल जाते हैं और यदि कोइर् स्वस्थ व्यक्ित जाने - अनजाने में इस जल को पीता है तो रोगाणुओं को एक नया पोषी मिल जाता है जिससे वह भी इस रोग से ग्रसित हो जाता है। ऐसे रोग अध्िकतर साप़फ पेय जल न मिलने के कारण पैफलते हैं। छोटी - छोटी बूँदवेंफ वायु वेग के साथ मिनटों से घंटों तक वातावरण में प्रवाहित होती रहती हैं। चित्रा 13ण्2रू वायु से वाहित रोगों का संक्रमण रोगी के पास खड़े व्यक्ित को होने की अध्िक संभावना होती है। अिाक भीड़ - भाड़ वाले एवं कम रोशनदान वाले घरों में वायु वाहित रोग होने की संभावना अध्िक होती है लैंगिक ियाओं द्वारा दो लोग शारीरिक रूप से एक - दूसरे के संपवर्फ में आते हैं अतः यह आश्चयर्जनक नहीं है कि वुफछ सूक्ष्मजीवीय रोग जैसे सिपफलिस अथवा एड्स ;।प्क्ैद्ध लैंगिक संपवर्फ के समय एक साथी से दूसरे साथी में स्थानांतरित हो जाए। यद्यपि ऐसे लैंगिक संचारी रोग सामान्य संपवर्फ जैसे हाथ मिलाना अथवा गले मिलना अथवा खेलवूफद जैसे वुफश्ती, अथवा और कोइर् अन्य विध्ि जिसमें हम सामाजिक रूप से एक - दूसरे के संपवर्फ में आते हैं, से नहीं पैफलते। ।प्क्ैए लैंगिक संपवर्फ के अतिरिक्त रक्त स्थानांतरण द्वारा भी संक्रमित होता हैऋ जैसे ।प्क्ै से ग्रसित व्यक्ित का रक्त स्वस्थ व्यक्ित को स्थानांतरित किया जाय अथवा गभार्वस्था में रोगी माता से अथवा श्िाशु को स्तनपान द्वारा। हम ऐसे पयार्वरण में रहते हैं जिसमें हमारे अतिरिक्त अन्य जीव भी रहते हैं। इसलिए वुफछ रोग अन्य जंतुओं द्वारा भी संचारित होते हैं। ये जंतु रोगाणुओं ;संक्रमण करने वाले कारकद्ध को रोगी से लेकर अन्य नए पोषी तक पहुंचा देते हैं। अतः ये मध्यस्थ का काम करते हैं जिन्हें रोगवाहक ;वेक्टरद्ध कहते हैं। सामान्य रोगवाहक का मच्छर एक उदाहरण है। मच्छर की बहुत सी ऐसी स्पीशीश हैं जिन्हें अत्यिाक पोषण की आवश्यकता होती है जिससे कि वे परिपक्व अंडे उत्पन्न कर सकें। मच्छर अनेक समतापी प्राण्िायों ;जिसमें मनुष्य भी शामिल हैंद्ध पर निवार्ह करता है। इस प्रकार वे एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में रोग को पैफलाते हैं। 13ण्3ण्3अंग - विश्िाष्ट तथा ऊतक - विश्िाष्ट अभ्िाव्यक्ित विभ्िान्न साध्नों द्वारा रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म जीव शरीर में प्रवेश करते हैं। पिफर ये कहाँ जाते हैं? सूक्ष्मजीव की अपेक्षा शरीर बहुत बड़ा है। इसलिएहमारे शरीर में बहुत से स्थान, अंग, ऊतक आदि हंै जहाँ ये सूक्ष्मजीव जा सकते हैं। क्या सभी सूक्ष्मजीवएक ही अंग अथवा ऊतक में जाते हैं अथवा वे भ्िान्न - भ्िान्न स्थानों पर जाते हैं ? सूक्ष्मजीव के विभ्िान्न स्पीशीश शरीर के विभ्िान्न भागों में विकसित होते हैं। ऐसा चुनाव उनके प्रवेश के स्थान पर निभर्र करता है। यदि ये हवा से नाक द्वारा प्रवेश करें तो ये पेफपफड़ों में जाएँगे। ऐसा बैक्टीरिया से होने वाले क्षय रोग में होता है। यदि ये मुँह के द्वारा प्रवेश करें तो ये आहार नाल में रहेंगे, जैसे टायपफायड रोगउत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया। अथवा ये यकृत में जाएँगे जैसे हेपेटाइटिस बैक्टीरिया जो पीलिया के कारक हैं। लेकिन सदैव ऐसा नहीं होता। भ्प्ट वाइरस जो लैंगिक अंगों द्वारा शरीर में प्रवेश करता है, लसीका गं्रथ्िायों में पफैलता है। मलेरिया उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव जो मच्छर के काटने से शरीर में प्रवेश करते हैं, वेयकृत में जाते हैंऋ उसके बाद लाल रुध्िर कोश्िाकाओं में आते हैं। इसी प्रकार जापानी मस्ितष्क ज्वर उत्पन्न करने वाला वाइरस भी मच्छर के काटने से शरीर में पहुँचता है। लेकिन यह मस्ितष्क को संक्रमित करता है।जिस ऊतक अथवा अंग पर सूक्ष्म जीव आक्रमण करता है, रोग के लक्षण तथा चिह्न उसी पर निभर्र करते हैं। यदि पेफपफड़े पर आक्रमण होता है तब लक्षणखाँसी तथा कम साँस आना होंगे। यदि यकृत पर आक्रमण होता है तब पीलिया होगा। यदि मस्ितष्क पर आक्रमण होता है तब सिरददर्, उल्टी आना, चक्कर अथवा बेहोशी आना होगा। यदि हम यह जानते होंकि कौन - से ऊतक अथवा अंग पर आक्रमण हुआ हैऔर उनके क्या कायर् हैं तो हम संक्रमण के चिÉ तथा लक्षण का अनुमान लगा सकते हैं।संक्रामक रोगों के ऊतक - विश्िाष्ट प्रभाव के अतिरिक्त उनके अन्य सामान्य प्रभाव भी होते हैं। अिाकांश सामान्य प्रभाव इस पर निभर्र करते हैं कि संक्रमण से शरीर का प्रतिरक्षा तंत्रा ियाशील हो जाएएक सिय प्रतिरक्षा तंत्रा प्रभावित ऊतक के चारों ओर रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों को मारने के लिए अनेक कोश्िाकाएँ बना देता है। नयी कोश्िाकाओं के बनने के प्रक्रम को शोथ कहते हैं। इस प्रक्रम के अंतगर्त स्थानीय प्रभाव जैसे पूफलना तथा ददर् होना और सामान्य प्रभाव जैसे बुखार होते हैं। वुफछ मामलों में संक्रमण के विश्िाष्ट ऊतक अति सामान्य प्रभाव को लक्ष्िात करते हैं। उदाहरणतः भ्प्ट संक्रमण में वाइरस प्रतिरक्षा तंत्रा में जाते हैं और इसके कायर् को नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार भ्प्ट.।प्क्ै से बहुत से प्रभाव इसलिए होते हैं क्योंकि हमारा शरीर प्रतिदिन होने वाले छोटे संक्रमणों का मुकाबला नहीं कर पाता है। हलके खाँसी - जुकाम से भी निमोनिया हो सकता है। इसी प्रकार आहार नाल के संक्रमण से रुध्िरयुक्त प्रवाहिका हो सकता है। अंततः ये अन्य संक्रमण ही भ्प्ट.।प्क्ै के रोगी की मृत्यु के कारण बनते हैं। हमें यह भी स्मरण रखना आवश्यक है कि रोग की तीव्र्रता की अभ्िाव्यक्ित शरीर में स्िथत सूक्ष्मजीवों की संख्या पर निभर्र करती है। यदि सूक्ष्मजीव की संख्या बहुत कम है तो रोग की अभ्िाव्यक्ित भी कम होगी। यदि उसी सूक्ष्म जीव की संख्या अध्िक होगी तो रोग की अभ्िाव्यक्ित इतनी तीव्र होगी कि जीवन को भी खतरा हो सकता है। प्रतिरक्षा तंत्रा एक प्रमुख कारक है जो शरीर में जीवित सूक्ष्मजीवों की संख्या को निधर्रित करता है। इस विषय में हम इस अध्याय के अंत में पढ़ेंगे। 13ण्3ण्4 उपचार के नियम जब आप बीमार हो जाते हैं तो आपके वुफटुंब के सदस्य क्या करते हैं ? क्या आपने कभी सोचा है कि आप वुफछ समय सोेने के बाद अच्छा क्यों अनुभव करते हैं? उपचार में दवाइर् का उपयोग कब करते हैं? अब तक के ज्ञान के आधर पर ऐसा लगता है कि संव्रफामक रोगों के उपचार के दो उपाय हैं। एक तो यह है कि रोग के प्रभाव को कम कर दे और दूसरा रोग के कारण को समाप्त कर दे। पहले, उपाय के लिए हम ऐसा उपचार करते हैं जिससे लक्षण ;ेलउचजवउद्ध कम हो जाते हैं। लक्षण प्रायः शोथ ;पदसिंउउंजपवदद्ध के कारण होते हैं। उदाहरण के लिए हम बुखार, ददर् अथवा दस्त को कम करने के लिए दवाइर् का उपयोग करते हैं। हम आराम करऊजार् का संरक्षण कर सकते हैं जो हमारे स्वस्थ होने में सहायक होगी। लेकिन इस प्रकार के लक्षणμआधरित उपचार स्वयं में संक्रामक सूक्ष्मजीवों को समाप्त नहीं करेंगे और रोग ठीक नहीं होंगे। इसके लिए हमें सूक्ष्म जीवों को मारना ही पड़ेगा। हम सूक्ष्मजीवों को वैफसे मारते हैं? सूक्ष्मजीवों को मारने की एक विध्ि है औषध्ियों का उपयोग करना। हम पहले ही पढ़ चुके हैं कि सूक्ष्मजीव विभ्िान्न वगो± में आते हैं। ये हैं वाइरस, बैक्टीरिया, पफंजाइर् अथवा प्रोटोशोआ। जीवों के प्रत्येक वगर् में वुफछ आवश्यक जैवरासायनिक जैवप्रियाएँ हांेगी जो इस वगर् के लिए विश्िाष्ट होंगी और अन्य वगो± में नहीं होंगी। ये प्रियाएँ नए पदाथर् बनाने के विभ्िान्न चरण अथवा श्वसन हो सकती हैं। इन मागो± का उपयोग हम नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए, हमारी कोश्िाकाएँ ऐसे प्रक्रम से नए पदाथर् बना सकती हैं जो बैक्टीरिया के प्रक्रम से भ्िान्न हों। हमें ऐसी औषध्ि का उपयोग करना है जो हमारे शरीर को प्रभावित किए बिना ही बैक्टीरिया के संश्लेषी मागर् को रोक सके। ऐसा एंटीबायोटिक से संभव है। इसी प्रकार वुफछ ऐसी औषध्ियाँ हैं जो मलेरिया के परजीवी प्रोटोशोआ को मारती हैं। एंटीवाइरल औषध्ि का बनाना एंटीबैक्टीरियल औषध्ि के बनाने की अपेक्षा कठिन है। इसका कारण है बैक्टीरिया में अपनी जैव रासायनिक प्रणाली होती है जबकि वाइरस में अपनी जैव रासायनिक प्रणाली बहुत कम होती है। वाइरस हमारे शरीर मंे प्रवेश करते हैं और अपनी जीवन प्रिया के लिए हमारी मशीनरी का उपयोग करते हैं। इसका अथर् यह है कि आक्रमणकरने के लिए अपेक्षाकृत कम वाइरस विश्िाष्ट लक्ष्य होते हैं। इन सीमाओं के बावजूद अब प्रभावशाली एंटीवाइरल औषध्ियाँ भी उपलब्ध् हैं, उदाहरण के लिए, भ्प्ट संक्रमण को नियंत्रिात करने की औषिा। 13ण्3ण्5 निवारण के सि(ांत अभी तक हमने यह पढ़ा है कि किसी व्यक्ित में कोइर् रोग है तो संक्रमण से वैफसे छुटकारा मिल सकता है। संक्रामक रोगों से छुटकारा पाने की तीन सीमाएँ ;कठिनाइयाँद्ध हैं। पहली यह है कि यदि कोइर् एक बार बीमार हो जाए तो उनके शारीरिक कायो± को बहुत हानि होती है और वे पिफर पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होते। दूसरी यह है कि उपचार में लंबा समय लग सकता है अथार्त् सही उपचार होने पर भी रोगी को बिस्तर पर लंबे समय तक आराम करना पड़ सकता है। तीसरी यह कि संक्रमित रोगी अन्य व्यक्ितयों में रोग को पैफलाने का स्रोत बन जाए इससे उपरोक्त कठिनाइयाँ और बढ़ जाएँगी। इसीलिए रोगों का निवारण उपचार से अच्छा है। हम रोगों का निवारण वैफसे कर सकते हैं? इसकी दो विध्ियाँ हैं। एक सामान्य तथा दूसरी रोग विश्िाष्ट। संक्रमण से बचने की सामान्य विध्ि है रोगी से दूर रहें। इससे हम संक्रामक सूक्ष्मजीवों से बचाव कर सकते हैं? यदि हम उनके पैफलने की विध्ियों को जानते हैं तो हमें बड़़ी सुगमता होगी। वातोढ़ ;वायु द्वारा पफैलने वालेद्ध सूक्ष्मजीवों से बचाव के लिए हम खुले स्थानों में रहें और भीड़ भरे स्थानों पर न जाएँ। जलोढ़ ;जल द्वारा पैफलनाद्ध सूक्ष्मजीवों से बचने के लिए हम साप़फ जल पिएँ। इसके लिए आप पानी में स्िथत सूक्ष्मजीवों को मारने के लिए उपाय कर सकते हैं। रोग वाहक सूक्ष्मजीवों से बचने के लिए हमें साप़्ाफ पयार्वरण में रहना चाहिए। ऐसे वातावरण में मच्छर उत्पन्न नहीं होते अथार्त् संक्रामक रोगों से बचने के लिए स्वच्छता आवश्यक है। पयार्वरण से संबंध्ित विषयों के अतिरिक्त, संक्रामक रोगों से बचने के और भी अन्य सामान्य नियम हैं। नियमों की बात करने से पहले हम एक प्रश्न पूछते हैं जिसकी ओर अभी तक ध्यान नहीं गया है। प्रायः हम प्रतिदिन संक्रमण से गुजरते हैं। यदि कक्षा में कोइर् विद्याथीर् खाँसी - जुकाम से पीडि़त है तो ऐसा संभव है कि उसके आस - पास के विद्याथीर् भी संक्रमित हो जाएँ। लेकिन हम सभी वास्तव में रोग से पीडि़त नहीं होते हैं। ऐसा क्यों नहीं होता है? इसका कारण है हमारे शरीर में स्िथत प्रतिरक्षा तंत्रा जो रोगाणुओं से लड़ता रहता है। हमारे शरीर में विश्िाष्ट कोश्िाकाएँ होती हैं जो रोगाणुओं को मार देती हैं। हमारे शरीर में जैसे ही कोइर् संक्रामक रोगाणु आता है ये कोश्िाकाएँ सिय हो जाती हैं। यदि ये उन्हें मार देती हैं तो हमें रोग नहीं होगा। प्रतिरक्षी कोश्िाकाएँ संक्रमण को पैफलने से पहले ही समाप्त कर देती हैं। जैसा कि हमने पहले देखा, यदि रोगाणुओं की संख्या नियंत्रिात हो जाती है तो रोग की अभ्िाव्यक्ित बहुत कम होगी। अथार्त्, संक्रामक रोगाणुओं से संक्रमित होने का अथर् यह नहीं है कि हमें कोइर् विशेष बीमारी होगी। गंभीर संक्रामक रोग प्रतिरक्षा तंत्रा की असपफलता को इंगित करता है। प्रतिरक्षा तंत्रा हमारे शरीर में स्िथत अन्य तंत्रों की तरह सपफल नहीं होगा यदि हमें पयार्प्त भोजन तथा पोषण प्राप्त न हो। इसलिए संक्रामक रोगों से बचने के लिए दूसरी मूल आवश्यकता है उचित मात्रा में सबके लिए भोजन की उपलब्ध्ता। ियाकलाप ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ13ण्6 ऽ अपने मोहल्ले में एक सवेर्क्षण करो। दस परिवारों से बात करो जिनका रहन - सहन उच्च स्तर का है जो अच्छी प्रकार रहते हैं, और दस ऐसे परिवार लो जो आपके अनुमान के अनुसार गरीब हैं। इन दोनों परिवारों में बच्चे होने चाहिए जिनकी आयु पाँच वषर् से कम हो। प्रत्येक बच्चे की उफँचाइर् मापो और आयु लिखो तथा एक ग्रापफ बनाओ। ऽ क्या वगर् में कोइर् अंतर है? यदि हाँ, तो क्यों? ऽ यदि उनमें कोइर् अंतर नहीं है तो क्या आप यह निष्कषर् निकालते हैं कि स्वास्थ्य के लिए अमीरीतथा गरीबी का कोइर् महत्त्व नहीं है? हम बीमार क्यों होते हैं ये संक्रमण से बचने की सामान्य विध्ियाँ हैं। विश्िाष्ट विध्ियाँ क्या हैं? ये प्रतिरक्षा तंत्रा के विश्िाष्ट गुणों से संबंध्ित है जो प्रायः रोगाणु से लड़ते रहते हैं। इसे समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। इन दिनों सारे विश्व में चेचक नही है। लेकिन सौ वषर् पहले चेचक महामारी बहुत होती थी। ऐसी स्िथति में लोग रोगी के पास आने से डरते थे। क्योंकि उन्हें डर होता था कि उन्हें भी चेचक न हो जाए। लेकिन एक ऐसा भी वगर् था जो चेचक से नहीं डरता था। यह वगर् चेचक के रोगी की सेवा करता था। यह वह वगर् था जिन्हें बहुत भयानक चेचक हुआ था। लेकिन पिफर भी जीवित रहे, लेकिन उनके शरीर पर चेचक के बहुत से दाग थे। अथार्त््, यदि आपको एक बार चेचक हो जाए तो आपको चेचक रोग पुनः होने की संभावना नहीं होती। इसलिए एक बार रोग होने पर उसी रोग से बचने की यह एक विध्ि है। ऐसा इसलिए होता है कि जब रोगाणु प्रतिरक्षा तंत्रा पर पहली बार आक्रमण करते हैं तो प्रतिरक्षा तंत्रा रोगाणुओं के प्रति िया करता है और पिफर इसका विश्िाष्ट रूप से स्मरण कर लेता है। इस प्रकार जब वही रोगाणु या उससे मिलता - जुलता रोगाणु संपवर्फ में आता है तो पूरी शक्ित से उसे नष्ट कर देता है। इससे पहले संक्रमण की अपेक्षा दूसरा संक्रमण शीघ्र ही समाप्त हो जाता है। यह प्रतिरक्षाकरण के नियम का आधर है। अब हम कह सकते हैं कि टीकाकरण का सामान्य नियम यह है कि शरीर मंे विश्िाष्ट संक्रमण प्रविष्ट कराकर प्रतिरक्षा तंत्रा को ‘मूखर्’ बना सकते हैं। वह उन रोगाणुओं की नकल करता है जो टीके के द्वारा शरीर में पहुँचे हैं। यह वास्तव में रोग नहीं करते लेकिन यह वास्तव में रोग करने वाले रोगाणुओं को उसके बाद रोग करने से रोकता है। 209 प्रतिरक्षा परंपरा के अनुसार भारतीय तथा चीनी चिकित्सकीय तंत्रा में कभी - कभी जानबूझ कर चेचक से पीडि़त व्यक्ित तथा स्वस्थ व्यक्ित की त्वचा वफो आपस में रगड़ते थे। उन्हें इससे ऐसी आशा थी कि इसके कारण से चेचक के मंद रोगाणु स्वस्थ व्यक्ित के शरीर में रोग के प्रति प्रतिरोध्क क्षमता उत्पन्न कर देंगे। दो सौ वषर् पूवर् एक इंगलिश चिकित्सक, जिसका नाम एडवडर् जेनर था, ने पता लगाया कि ग्वाले जिन्हें गो - चेेचक हुइर् है उन्हें महामारी के समय भी चेचक नहीं हइर्। गौ - चेचक मन्द रोग है। जेनर ने जान बूझकर लोगों को गौ - चेचक दिया ;जैसा कि तस्वीर में दिखाया गया हैद्ध। इससे उन्होंने पाया कि अब वे लोग चेचक के प्रतिरोध्ी हैं। इसका कारण यह है कि चेचक का बैक्टीरिया गौ - चेचक के वाइरस का निकट संबंध्ी है। लैटिन में बवू ;गायद्ध का अथर् है ‘वाक्का’ तथा बवूचवग ;गौ - चेचकद्ध का अथर् है ‘वैक्सीनिया’। इस आधार पर वैक्सीन अथार्त् टीका शब्द आया है, जिसका हम आजकल उपयोग करते हैं। ऐसे बहुत से टीके आजकल उपलब्ध् हैं जो संक्रामक रोगों का निवारण करते हैं और रोग निवारण का विश्िाष्ट साध्न प्रदान करते हैं। टेटनस, डिप्थीरिया, वुफकर खाँसी, चेचक, पोलियो आदि के टीके उपलब्ध् हैं। यह बच्चों की संक्रामक रोगों से रक्षा करने के लिए सरकारी स्वास्थ्य कायर्क्रम है। ऐसे कायर्क्रम तभी सपफल होते हैं जबकि ऐसी स्वास्थ्य सुविधएँ सभी बच्चों को प्राप्त हों। क्या आप इसका कारण सोच सकते हैं कि ऐसा क्यों होना चाहिए? हिपेटाइटिस के वुफछ वाइरस जिससे पीलिया होता है पानी द्वारा संचारित होता है। हिपेटाइटिस श्।श् के लिए टीका उपलब्ध् है। लेकिन देश के अध्िकांश भागों में जब बच्चे की आयु पाँच वषर् हो जाती है तब तक वह हिपेटाइटिस श्।श् के प्रति प्रतिरक्षी हो चुका होता है। इसका कारण यह है कि वह पानी के द्वारा वाइरस के प्रभाव में आ चुका हो। इन परिस्िथतियों में क्या आप टीका लगवाएँगे ? ियाकलाप ऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋऋ13ण्7 प्रऽ संक्रमित वुफत्ते तथा अन्य जंतुओं के काटने से रैबीज वाइरस पफैलता है। मनुष्य तथा जंतु दोनों के लिए प्रति - रैबीश टीके उपलब्ध् हैं। पता करो कि आपके पास - पड़ोस में स्थानीय प्रशासन रैबीश को पफैलने से रोकने के लिए क्या कर रहा है? क्या ये उपाय पयार्प्त हैं? यदि नहीं तो आप इसके सुधर के लिए क्या सुझाव देंगे? श्न 1.जब आप बीमार होते हैं तो आपको सुपाच्य तथा पोषणयुक्त भोजन करने का परामशर् क्यों दिया जाता है? 2.संक्रामक रोग पफैलने की विभ्िान्न विध्ियाँ कौन - कौन सी हैं ? 3.संक्रामक रोगांे को पफैलने से रोकने के लिए आपके विद्यालय में कौन - कौन सी सावधानियाँ आवश्यक हंै? 4.प्रतिरक्षीकरण क्या है ? 5.आपके पास में स्िथत स्वास्थ्य वेंफद्र में टीकाकरण के कौन - से कायर्क्रम उपलब्ध् हैं? आपके क्षेत्रा में कौन - कौन सी स्वास्थ्य संबंधी मुख्य समस्या है? ऽ स्वास्थ्य व्यक्ित की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक जीवन की एक समग्र समन्वयित अवस्था है। ऽ किसी का स्वास्थ्य उसके भौतिक पयार्वरण तथा आथ्िार्क अवस्था पर निभर्र करता है। ऽ रोगों की अवध्ि के आधर पर इसे तीव्र तथा दीघर्कालिक दो वगो± में विभाजित कर सकते हैं। ऽ रोग के कारक संक्रामक अथवा असंक्रामक हो सकते हैं। ऽ संक्रामक कारक जीवों के विभ्िान्न वगर् से हो सकते हैं। ये एककोश्िाक सूक्ष्मजीव अथवा बहुकोश्िाक हो सकते हैं। ऽ रोग का उपचार उसके कारक रोगाणु के वगर् के आधर पर किया जाता है। ऽ संक्रामक कारक वायु, जल, शारीरिक संपवर्फ अथवा रोगवाहक द्वारा पफैलते हैं। ऽ रोगों का निवारण सपफल उपचार की अपेक्षा अच्छा है। ऽ संक्रामक रोगों का निवारण जन स्वास्थ्य स्वच्छता विध्ियों द्वारा किया जा सकता है जिससे संक्रामक कारक कम हो जाते हैं। ऽ टीकाकरण द्वारा संक्रामक रोगों का निवारण किया जा सकता है। ऽ संक्रामक रोगों के निवारण को प्रभावशाली बनाने के लिए आवश्यक है कि सावर्जनिक स्वच्छता तथा टीकाकरण की सुविध सभी को उपलब्ध् हो। अभ्यास 1. पिछले एक वषर् में आप कितनी बार बीमार हुए? बीमारी क्या थीं? ;ंद्ध इन बीमारियों को हटाने के लिए आप अपनी दिनचयार् में क्या परिवतर्न करेंगे? ;इद्ध इन बीमारियों से बचने के लिए आप अपने पास - पड़ोस में क्या परिवतर्न करना चाहेंगे? 2. डाॅक्टर/नसर्/स्वास्थ्य कमर्चारी अन्य व्यक्ितयों की अपेक्षा रोगियों के संपवर्फ में अध्िक रहते हैं। पता करो कि वे अपने - आपको बीमार होने से वैफसे बचाते हैं? 3.अपने पास - पड़ोस में एक सवेर्क्षण कीजिए तथा पता लगाइए कि सामान्यतः कौन - सी तीन बीमारियाँ होती हैं? इन बीमारियों को पैफलने से रोकने के लिए अपने स्थानीय प्रशासन को तीन सुझाव दीजिए। 4.एक बच्चा अपनी बीमारी के विषय में नहीं बता पा रहा है। हम वैफसे पता करेंगे कि ;ंद्ध बच्चा बीमार है? ;इद्ध उसे कौन - सी बीमारी है? 5.निम्नलिख्िात किन परिस्िथतियों में कोइर् व्यक्ित पुनः बीमार हो सकता है? क्यों? ;ंद्ध जब वह मलेरिया से ठीक हो रहा है। ;इद्ध वह मलेरिया से ठीक हो चुका है और वह चेचक के रोगी की सेवा कर रहा है। ;बद्ध मलेरिया से ठीक होने के बाद चार दिन उपवास करता है और चेचक के रोगी की सेवा कर रहा है? 6.निम्नलिख्िात में से किन परिस्िथतियों में आप बीमार हो सकते हैं? क्यों? ;ंद्ध जब आपकी परीक्षा का समय है? ;इद्ध जब आप बस तथा रेलगाड़ी में दो दिन तक यात्रा कर चुके हैं? ;बद्ध जब आप का मित्रा खसरा से पीडि़त है। 7. यदि आप किसी एक संक्रामक रोग के टीके की खोज कर सकते हो तो आप किसको चुनते हैं ? ;ंद्ध स्वयं की ? ;इद्ध अपने क्षेत्रा में पैफले एक सामान्य रोग की। क्यों ?

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